commit 30b2fcb7513645c97a8c9ffdce62aeee0777add1 Author: Gourab <19bcs118@iiitdwd.ac.in> Date: Thu Jun 17 19:11:03 2021 +0530 Added words to match ben-hin diff --git a/.DS_Store b/.DS_Store new file mode 100644 index 0000000..f9f8af9 Binary files /dev/null and b/.DS_Store differ diff --git a/apertium-hin.hin.dix b/apertium-hin.hin.dix index 124d07c..331a43a 100644 --- a/apertium-hin.hin.dix +++ b/apertium-hin.hin.dix @@ -1647,9 +1647,10 @@
- + सिवा बकौल + अगला ज़रीए हेतु सिवाय @@ -1673,7 +1674,9 @@ लिये उपरसे केउपर - केविरुद्ध + केबावजूद + केविरुद्ध + विरुद्ध केविरूद्ध केखिलाफ केअन्तर्गत @@ -1921,6 +1924,7 @@ लाख करोड़ अरब + म @@ -8246,7 +8250,7 @@ अम्ल-प्रक्षालनक - अभय + अभय आदित्य अजित आकाङ्क्षा @@ -9468,8 +9472,8 @@ पाकिस्तान अफगानिस्तान - -बलुआ + इमारतें + बलुआ उम्मत फ़ौज सन्दूक @@ -9635,6 +9639,7 @@ श मौलव दैनिक + इमारतें मायन शहंशाह हिन्दुस्तान diff --git a/texts/wiki_hin.txt b/texts/wiki_hin.txt new file mode 100644 index 0000000..31984d8 --- /dev/null +++ b/texts/wiki_hin.txt @@ -0,0 +1,80237 @@ + +मुखपृष्ठ: + +आओ भूगोल सीखें: +यह भूगोल विषय का प्रारंभिक परिचय कराने वाली पुस्तक है। + +हिंदू धर्म-संस्कृति सार/चौसठ कलाएँ: +भारतीय साहित्य में 64 कलाओं का वर्णन है, जो इस प्रकार हैं - +1- गानविद्या +2- वाद्य : भांति-भांतिके बाजे बजाना +3- नृत्य +4- नाट्य +5- चित्रकारी +6- बेल-बूटे बनाना +7- चावल और पुष्पादिसे पूजा के उपहार की रचना करना +8- फूलों की सेज बनान +9- दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना +10- मणियों की फर्श बनाना +11- शय्मा-रचना +12- जलको बांध देना +13- विचित्र सििद्धयां दिखलाना +14- हार-माला आदि बनाना +15- कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना +16- कपड़े और गहने बनाना +17- फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना +18- कानों के पत्तों की रचना करना +19- सुगंध वस्तुएं-इत्र, तैल आदि बनाना +20- इंद्रजाल-जादूगरी +21- चाहे जैसा वेष धारण कर लेना +22- हाथ की फुतीकें काम +23- तरह-तरह खाने की वस्तुएं बनाना +24- तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना +25- सूई का काम +26- कठपुतली बनाना, नाचना +27- पहली +28- प्रतिमा आदि बनाना +29- कूटनीति +30- ग्रंथों के पढ़ाने की चातुरी +31- नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना +32- समस्यापूर्ति करना +33- पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना +34- गलीचे, दरी आदि बनाना +35- बढ़ई की कारीगरी +36- गृह आदि बनाने की कारीगरी +37- सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा +38- सोना-चांदी आदि बना लेना +39- मणियों के रंग को पहचानना +40- खानों की पहचान +41- वृक्षों की चिकित्सा +42- भेड़ा, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति +43- तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना +44- उच्चाटनकी विधि +45- केशों की सफाई का कौशल +46- मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना +47- म्लेच्छ-काव्यों का समझ लेना +48- विभिन्न देशों की भाषा का ज्ञान +49- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना +50- नाना प्रकार के मातृकायन्त्र बनाना +51- रत्नों को नाना प्रकार के आकारों में काटना +52- सांकेतिक भाषा बनाना +53- मनमें कटकरचना करना +54- नयी-नयी बातें निकालना +55- छल से काम निकालना +56- समस्त कोशों का ज्ञान +57- समस्त छन्दों का ज्ञान +58- वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या +59- द्यू्त क्रीड़ा +60- दूरके मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण +61- बालकों के खेल +62- मन्त्रविद्या +63- विजय प्राप्त कराने वाली विद्या +64- बेताल आदि को वश में रखने की विद्या + +गणित के खेल/9 से गुणा: +अगर आप किसी सन्ख्या को ९ से गुना करना चाहते हैं +9×1=9=9 +9×2=18=9 +9×3=27=9 +अब ११ से करने पर १८ होंगे +9×11=99=18 +9×12=108=18 +२१ से करने पर २७ +9×21=189=27 + +प्रश्नोत्तर रूप में सन् १८५७ का स्वातंत्र्य समर: +प्रकाशकीय. +1857 के स्वातंत्र्य समर की 150 वीं वर्षगांठ पर अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ +के द्वारा करणीय कार्यों की सूची में दो कार्य निश्चित हुए। प्रथम इस विषय पर समाज के सभी +वर्गों के विचारणीय प्रज्ञा पुरुषों को इसकी सम्यक जानकारी प्रदान करने के लिए जिलाश: गोष्ठियाँ +आयोजित करना तथा दूसरा विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन विद्यार्थियों को इस विषय पर पुस्तक +उपलब्ध कराकर स्पर्धात्मक भाव से विषय को समझने का अवसर देकर प्रान्तश: प्रतियोगिता +आयोजित करने का लक्ष्य रखा गया। इस प्रकार का सुझाव रा.स्व.संघ के अ.भा.प्रचार प्रमुख +माननीय अधीश कुमार जी ने अपने कैंसर के इलाज के दौरान हुई भेंट के समय रखा। जिसे +राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ ने स्वीकार कर उसको क्रियान्वित कर रहे हैं। आज मा. अधीश कुमार +जी अपने मध्य नहीं हैं परन्तु उनकी प्रेरणादायी स्मृति हमें सदैव स्फुरित करेगी, ऐसा विश्वास है। +1857 का स्वातंत्र्य समर भारतीय समाज की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी ऐसा कहना +युक्तियुक्त होगा। 1857 के स्वातंत्र्य समर को 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में सम्पूर्ण भारतीय +समाज आज इसका स्मरण कर उन वीर योद्धाओं के अप्रतिम त्याग, शौर्य और बलिदान को +चिरस्मरणीय बनाये रखने वाली तरूणाई के समक्ष देश, धर्म की रक्षार्थ किये गये इस महासंग्राम +का एक स्वर्णिम पृष्ठ सामने हो तथा वे इसे आज़ादी के दीवानों के अतुलनीय प्रयास की गाथा +को सदैव अपने पास संजो कर रखे। +इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए श्री हनुमान सिंह राठौड़, व्याख्याता, कृषि ने हमारे आग्रह +को स्वीकार कर अपनी अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद '1857 का स्वातंत्र्य समर: प्रश्नोत्तर +रूप में' लिखकर अतिशीघ्र हमें उपलब्ध करा दी। हम उनके इस प्रयास से अभिभूत हैं तथा उन्हें +साधुवाद देते हैं। +इस पुस्तक का बहुरंगा आवरण पृष्ठ को आकल्पित करने वाले पत्रकार एवं सामाजिक +कार्यकर्ता श्री सुरेन्द्र चतुर्वेदी हैं, उन्हें कोटिश: धन्यवाद। अजमेर के पेस प्रिन्टर्स ने प्रभावी अक्षर +संयोजन किया है तथा प्रीमियर प्रिन्टर्स, जयपुर ने आकर्षक मुद्रण कर पुस्तक हमें समय पर +उपलब्ध करा दी। हम इन सभी के आभारी हैं। +सुधी पाठकों के हाथों में '1857 का स्वातंत्र्य समर: प्रश्नोत्तर रूप में' पुस्तक देते हुए +हमें हर्ष है। आशा है सभी को यह पुस्तक पसन्द आयेगी। देश के आज़ादी की लड़ाई में शहीद +हुए हुतात्माओं की क़ुर्बानी का थोड़ा भी श्रद्धा भाव नवीन पीढ़ी को प्रदान करने में सफल होने +पर ही पुस्तक की सार्थकता सिद्ध होगी। जय स्वरा…य, जय स्वधर्म। +-- प्रकाशन समिति +सार वाक्. +भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र की सुदीर्घ ऐतिहासिक परम्परा में स्वाभाविक रूप से जय +के जयमाल तो पराजय के प्रसंग भी आए हैं और पराजय को पराभूत करने की विजिगिषु +वृत्ति की दृष्टि से हमारा इतिहास सतत् संघर्ष का इतिहास है। 1857 का स्वातंत्य समर भी +इसी शृंखला में होने के कारण 'प्रथम' तो नहीं पर विश्व में अप्रतिम अवश्य है। इसमें +लगभग तीन लाख सैनिकों व नागरिकों ने बलिदान दिया, भयंकर नरसंहार लोमहर्षक +उत्पीडऩ तथा अपार धन राशि की लूटमार हुई। हजारों गाँवों को भस्मीभूत किया गया, +अनेक नगर वीरान हो गए तथा किले खण्डहर बना दिए गए। सम्पूर्ण देश एक युद्घ क्षेत्र बन +गया था। +हमारे राष्ट्र जीवन में 1857 का स्वातंत्र्य समर एक ऐसा प्रसंग था जब इस पुरातन +राष्ट्र ने पुन: अपना तेजोमय स्वरूप विश्व के सामने प्रकट किया। 'यत्र द्रुमोनास्ति तत्रऽरंडो +द्रुमायते' की उक्ति के अनुसार जहाँ अनेक देश इतिहास की अपनी छोटी से छोटी घटना में +प्रेरणा का उत्स ढूँढकर महिमा मंडन करते हैं, वहाँ अपने यहाँ, अंग्रेजों का 1857 के +स्वातंत्र्य समर पर लिखने का दृष्टिकोण तो क्षम्य है, मार्क्स-मैकाले पुत्रों ने इस प्रसंग को +महत्वहीन बनाने की पूरी कोशिश की- +अनेक प्रकार से साहित्यिक-ऐतिहासिक वामाचार किया गया। 1857 के उस महासमर की 150 वीं वर्षगाँठ ने हमें उक्त भ्रम एवं विसंगतियों के +परिमार्जन तथा अपने गौरवमयी इतिहास एवं इतिहास-पुरुषों के स्मरण का अवसर प्रदान किया है। अपनी मातृभूमि पर अवैध रूप से कब्जा जमाए बैठे विदेशी अंग्रेजों के विरुद्घ उठ खड़ा होना 'विद्रोह' कैसे हो गया? विदेशी को बाहर निकालने का प्रयत्न तो स्वतंत्रता +संग्राम ही कहलाएगा चाहे इसका प्रारम्भ एक जवान करे या किसान, नृप करे या फकीर। +कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि मुस्लिम भी तो इस देश में विदेशी थे और अपनी खोई +सत्ता को पुन: प्राप्त करने के लिए हिन्दुओं को साथ रखना चाहते थे, अत: उनकी भाषा, +शब्दावली, दृष्टिकोण में कृत्रिम परिवर्तन आया। परन्तु इसका सकारात्मक पक्ष भी था - +ठ्ठ मुस्लिमों के मन में हिन्दुओं एवं उनकी परम्पराओं एवं अपने मूल पूर्वजों के प्रति +अनुकूल परिवर्तन आया। वह एक सुखद अवसर था जब जिहाद और जाजिया के +बल पर मजहब का झंडा लेकर चलने वाले राष्ट्रीयता का पैगाम और शहादत की +प्रेरणा लेकर भारतीय होने का गर्व महसूस करने की प्रक्रिया में स्वप्रेरणा से गुजर रहे +थे। 1857 में पहली बार भारत की राष्ट्रीयता के अखिल भारतीय सांस्कृतिक आधार +के प्रति उन्होंने समर्पण के भाव को प्रत्यक्ष रूप से दिखाया था। इसका एक उदाहरण +दिल्ली से प्रकाशित 'पयामे आजादी' के पहले अंक (8 फरवरी 1857) में +प्रकाशित गीत है। इसकी कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं - +"आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा। +तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा॥" +प्रतिष्ठित रूप में किया गया। +में भारत को 'मादरे वतन' (मातृभूमि) कहा है। सह अस्तित्व व अतुष्टिकारक +सहयोग के उदाहरण उपलब्ध हैं। बाद के समय में मुस्लिम तुष्टीकरण ही देश +विभाजन का कारण बना था। +तथा उल्लंघन करने वाले को मृत्युदंड या हाथ-पैर काटने की सजा का प्रावधान +किया था। +घोषणा की थी कि श्री राम जन्मभूमि पर भव्य मन्िदर बनना चाहिए। उक्त समझौता +करने वाले अयोध्या के बाबा रामचरण दास और अमीर अली को अंग्रेजों ने फाँसी दे +दी। +स्वाभाविक केन्द्र था इसलिए बहादुर शाह को दिल्ली सम्राट के नाते नेतृत्व दिया +था, मुगल सम्राट के नाते नहीं। बहादुर शाह की यह घोषणा दृष्टव्य है - +"मेरे शासन के स्थान पर जो भी व्यक्ति भारत को स्वरा…य और स्वाधीनता प्रदान +कराने के लिए संकल्पबद्घ हो मैं उसको ही सम्राट पद समर्पित कर देने के लिए +सहर्ष सिद्घ हूँ।" (1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर : वीर सावरकर; पृष्ठ 311) +बहादुर शाह जफर ने अपने हाथों से ही राजपुताने के राजाओं को पत्रों में लिखा - +"मेरी यह उत्कट अभिलाषा है कि अंग्रेजों की दासता की श्रंखला टूक-टूक होते +देखूँ। ...यदि आप सब शासनाधिपतिगण स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए किए जाने +वाले इस युद्घ में अपनी तलवारें हाथों में सम्भालकर आगे आने को तैयार हों तो मैं +स्वे‘छा और प्रसन्नता सहित अपने सम्पूर्ण अधिकार ऐसे किसी भी रा…यमंडल को +समर्पित कर दूँगा और ऐसा करने में मुझे आनन्द भी प्राप्त होगा।" (मेटकाफ कृत +'टू नेटिव नेरेटिव्ह्स; पृ. 226') +चर्बी वाले कारतूसों के कारण क्रान्ति का समय पूर्व अकस्मात् विस्फोट अवश्य हो +गया किन्तु क्रान्ति का यही एकमात्र कारण नहीं था बल्कि यह तो क्रान्ति की विफलता का +कारण बना। इस समय पूर्व विस्फोट से अंग्रेजों को सम्भलने का अवसर मिल गया। +क्रान्ति केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं थी। गौमुख में उत्स पर जो गंगा की +धारा क्षीण होती है वही मैदान में आकर विशालकाय हो जाती है, उसी प्रकार स्वातंत्र्य समर +का प्रारम्भ उत्तर भारत में होगा पर इसका व्याप अखिल भारतीय था। दक्षिण भारत में +स्वतंत्रता संग्राम की व्यापकता डॉ. वा.द. दिवेकर की शोध पूर्ण पुस्तक 'साउथ इंडिया इन +1857 : वार ऑफ इन्िडपेंडेंस' के अध्ययन से स्पष्ट है। 1857 में अंडमान में निर्वासित +800 लोगों में से 250 से अधिक दक्षिण भारत के थे। बंगाल, मुम्बई तथा मद्रास में कोर्ट +मार्शल की कुल संख्या क्रमश: 1954, 1213 तथा 1044 थी। यह संख्या ही अखिल +भारतीय व्याप तथा क्रान्ति की समान तीव्रता को बताने के लिए पर्याप्त है। +पंजाब का 'ब्लैक होल' कहलाने वाले अजनाला की घटना कौन विस्मरण कर +सकता है? पंजाब की तत्कालीन शासकीय रिपोर्टों से ज्ञात होता है कि स्वतंत्रता संग्राम के +दौरान 386 क्रान्तिकारियों को फाँसी दी गई, 2000 लोग मारे गए व अनेक बंदी बनाए गए। +यह उस पंजाब का वृत्त है जिसके लिए कहा जाता है कि 1857 में पंजाब निर्लिप्त रहा। +यह भी असत्य है कि इस युद्घ में वे ही रजवाड़े शामिल हुए जिनके रा…य अंग्रेजों +ने अधिग्रहित कर लिए थे। युद्घ में ये भी थे पर ये ही शामिल नहीं थे। ग्वालियर और टोंक +के शासक युद्घ के विरोध में थे पर दोनों स्थानों की जनता व सेना ने तात्या टोपे का साथ +दिया। जगदीशपुर के कुँवर सिंह, रूइया गढ़ी के नरपत सिंह, आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह +का तो अंग्रेजों से रा…य का झगड़ा नहीं था। जोधपुर सेना के सेनापति अनाड़ सिंह की युद्घ +में मृत्यु पर शोक स्वरूप 'नौबत' नहीं बजी पर पॉलिटिकल एजेंट मैसन के मारे जाने पर +'नौबत' बजाना स्थगित नहीं किया। यह निर्णय उस जोधपुर नरेश का है जिसे अंग्रेज +समर्थक माना जाता है। +स्वातंत्र्य युद्घ का वास्तविक कारण क्या था? वीर सावरकर के शब्दों में "राम- +रावण संघर्ष में सीता हरण भी तो निमित्त मात्र ही था" उसी प्रकार उत्तराधिकार कानून, देशी +रा…यों का अधिग्रहण, चर्बी लगे कारतूस, आर्थिक शोषण आदि तो निमित्त कारण थे। +वस्तुत: 1857 के इस स्वातंत्र्य संग्राम को प्रदीप्त करने वाले दिव्य तत्व थे - स्वधर्म व स्वराज्…य। +स्वामी विवेकानन्द ने कहा है - "भारत के राष्ट्रीय जीवन का मूलाधार धर्म है। +यदि कहीं तुमने इस मर्मस्थल को छेड़ दिया, तो सावधान! तुम सर्वनाश को निमंत्रण दे +दोगे।" 1813 ई. में ब्रिटिश संसद में सरकारी स्तर पर भारत में ईसाई मत के प्रचार का +कानून बनाकर अंग्रेजों ने भारत की इस सनातन चेतावनी को नजर अंदाज किया था और इसी +का एक अवश्यम्भावी परिणाम 1857 की क्रान्ति था। 1850 तक भारत के 260 प्रमुख +स्थानों पर अड्डे बनाकर ईसाईकरण के लिए लगभग एक हजार पादरी सक्रिय थे। सैनिक +छावनियों में उ“ा पद व वेतन पर पादरी रखे हुए थे। बैरकपुर छावनी के कर्नल ह्वीलर जैसे +अंग्रेज सैन्य अधिकारी भी इस कार्य में लगे थे। मेजर एडवर्ड ने अपनी डायरी में लिखा है +- "भारत पर हमारे अधिकार का अन्तिम उद्देश्य देश को ईसाई बनाना है।" +दिल्ली के सम्राट ने जो घोषणा पत्र प्रस्तुत किया था उससे क्रान्ति की मूल प्रेरणा +का बोध होता है - +'हे हिन्दभूमि के सपूतों, यदि हम संकल्प कर लेंगे तो शत्रु को क्षण भर में नष्ट कर +सकते हैं। हम शत्रुओं का नाश कर अपने प्राण प्रिय धर्म एवं स्वदेश को पूर्णरूपेण भयमुक्त +कर लेने में सफलता प्राप्त कर लेंगे।' (लेकी कृत 'फिक्शन एक्सपो…ड') +स्वधर्म के अभाव में स्वरा…य भी त्या…य है और स्वरा…य के न होने पर स्वधर्म भी +बलहीन होता है। स्वरा…य और स्वधर्म के साधन और साध्य का यह तत्व 1857 ई. के इस +क्रान्ति युद्घ में भी अभिव्यक्त हुआ था। समर्थ गुरू रामदास ने मराठों को यही आह्वान दिया +था - +"धर्मासाठी मरावें। मरोनी अवध्यांसि मारावें। +मारिता मारिता ध्यावें। रा…य आपुले॥" +(अपने धर्म के लिए प्राण दो। अपने धर्म के लिए शत्रुओं का वध करो, अन्तिम +साँस तक इसी प्रकार युद्घ करो और स्वरा…य की स्थापना करो) +इस स्वाधीनता संग्राम में पहली बार भारतीय समाज को बाँटने वाले तीन कारण +- मजहब, जाति और वर्ग - तिरोहित हो गए थे। यह ऐसा विलक्षण संग्राम था जिसने +सम्पूर्ण भारत को जगाया। कार्ल माक्र्स ने 1857 की घटनाओं पर उसी समय 'न्यूयॉर्क डेली +ट्रिब्यून' में अपने लेखों में सिद्घ किया है कि अंग्रेजी अत्याचारों के कारण सम्पूर्ण भारत +बारुद के ढेर पर बैठा हुआ था तथा 1857 भारत का स्वाधीनता संग्राम था। वीर सावरकर ने +1907 में ब्रिटिश दस्तावेजों के आधार पर ही '1857 च्या स्वातंत्र्य समरांचा इतिहास' +नामक कालजयी ग्रंथ लिखकर उक्त तथ्यों की पुष्टि की। +1857 का स्वातंत्र्य समर आकस्मिक घटना न होकर एक कुशल योजना तथा +संगठन का उदाहरण है। यह आश्चर्यजनक है कि इस योजना का एक भी मुखबिर अंग्रेजों +को नहीं मिला। मृत्यु भय या प्रलोभन से एक भी क्रान्ति सैनिक नहीं टूटा। +क्रान्ति के मूल कल्पक कौन थे? इस दृष्टि से विचार करने पर दो नाम ध्यान में +आते हैं - रंगो बापू जी गुप्ते और अजीमुल्ला खाँ। रंगो बापू जी गुप्ते छत्रपति शिवाजी के +वंशज, सतारा के अपदस्थ शासक प्रताप सिंह के वकील के रूप में 1840 में इंग्लैंड गए +थे तथा 14 वर्ष तक वहाँ रहे। वे अपने मूल कार्य में तो सफलता नहीं पा सके पर अंग्रेजों की +रीति-नीति व कुटिलता का सहज अध्ययन हो गया। इसी में से यह विचार पुष्ट हुआ कि +अंग्रेज विनय की भाषा नहीं समझते, इनसे मुक्ति का संगठित सशस्त्र उपाय आवश्यक है। +1854 में नाना साहब पेशवा का पक्ष रखने के लिए अजीमुल्ला खाँ इंग्लैंड गए। उनको भी +अंग्रेजों की कपट-नीति का ही साक्षात्कार हुआ। राजनीति के इन दो धुरंधरों की लंदन में +मुलाकात हुई तो 1857 के स्वातंत्र्य समर का बीज-वपन हो गया। +भारत आने के बाद आधुनिक चाणक्य रंगो बापू जी गुप्ते ने चन्द्रगुप्त की तलाश +प्रारम्भ की तो उनकी नजर नाना साहब पेशवा पर टिकी। रंगो बापू जी गुप्ते साधुवेश में तात्या +टोपे के साथ नाना साहब से मिले। तब तक रूस आदि देशों से सहायता का आश्वासन +लेकर अजीमुल्ला खाँ भी भारत आ गए। तीर्थाटन के बहाने पूरे देश में विचार विमर्श हुआ +और अन्तत: क्रान्ति के लिए 31 मई की तिथि तय की। इस योजना की स्तम्भित करने वाली +बातें क्या हैं? - +पहुँचाया गया? क्रान्ति के योजनाकारों के पास अंग्रेजों की तरह तो टेलीग्राफ +व्यवस्था नहीं थी। +मेरठ में 10 मई को हुए विस्फोट के बाद ही अंग्रेज कुछ जान पाए। +वास्तव में क्रान्ति की रचना कई चरणों में हुई थी - +बैंक में जमा अपने पाँच लाख पौंड दो वर्ष की अवधि में धीरे-धीरे +निकाल लिए। +जन-जागरण अभियान साधु-फकीरों के माध्यम से। +व्यवहार तीसरा चरण था। +तिथि तय करना। +तीर्थाटन, रक्त-कमल और रोटी, साधुओं-फकीरों का प्रवास, विशेष गूढ़ार्थ वाले +आल्हा और पवाड़े गायन के आयोजन आदि अनेक तरीके इस क्रान्ति की तैयारी में अपनाए +गए और अत्यन्त सोच-विचार कर 31 मई की तिथि तय की गई। 31 मई की तिथि क्यों तय +की गई? - +भेजने की तैयारी हो रही थी। रूस-तुर्की युद्घ में इंग्लैंड को अपार जन-धन हानि +हुई थी। +गर्मी को सहन नहीं कर सकते थे। +रहते हैं अत: उनकी असावधानी का लाभ उठाना। +अत्यन्त सुनियोजित पर दुर्भाग्य से समय पूर्व हुई क्रान्ति, परिणाम की दृष्टि से +स्थूल रूप से असफल रही। इसकी असफलता के कारणों में पंजाब, राजस्थान, ग्वालियर +जैसी अनेकों रियासतों के शासकों का असहयोग, उत्कृष्ट शस्त्रास्त्रों की कमी, कमजोर व वृद्घ +नेतृत्वकर्ता बहादुर शाह जफर का चयन, विद्रोही सैनिकों में अनुशासनहीनता, विश्व में +अंग्रेजों की अनुकूल स्थिति होना आदि गिना सकते हैं। किन्तु सफलता प्राप्ति पर यही सब +कारण गौण हो जाते। मूल रूप से असमय विस्फोट से अंग्रेजों को सम्भलने का मौका मिल +गया और हमारी सद्गुण विकृति का अंग्रेजों ने लाभ उठाया। क्रान्ति सैनिकों ने प्रत्येक +छावनी से अंग्रेज अधिकारियों को सकुशल जाने ही नहीं दिया बल्कि कई जगह तो पहुँचाने +की व्यवस्था की, मार्ग में उन्हें शरण ही नहीं दी बल्कि सब प्रकार से सहायता की। यदि +दुश्मन को प्रत्येक ग्राम-नगर में घ्ोरकर मार दिया होता तो पुन: उन्हीं के हाथों पराजय का +दुर्दिन नहीं देखना पड़ता। अंग्रेजों ने अपना अवसर आने पर यह दयालुता नहीं दिखाई। +मोंटगोमरी मार्टिन 'बोम्बे टेलीग्राफ' में लिखता है - "(दिल्ली के) एक-एक मकान में +चालीस-चालीस, पचास-पचास आदमी छिपे हुए थे। ये लोग विद्रोही न थे बल्कि नगर +निवासी थे, जिन्हें हमारी दयालुता और क्षमाशीलता पर विश्वास था। मुझे खुशी है कि +उनका भ्रम दूर हो गया।" +"दिल्ली के बाशिन्दों के कत्लेआम का खुला ऐलान कर दिया गया, यद्यपि हम +जानते थे कि उनमें से बहुत से हमारी विजय चाहते थे।" +(ञ्जद्धद्ग ष्टद्धड्डश्चद्यड्डद्बठ्ठ'ह्य ठ्ठड्डह्म्ह्म्ड्डह्लद्ब1द्ग शद्घ ह्लद्धद्ग स्द्बद्गद्दद्ग शद्घ ष्ठद्गद्यद्धद्ब, +ह्नह्वशह्लद्गस्र ड्ढ4 ्यड्ड4द्ग.) +जय हो या पराजय, परिणाम प्रत्येक अवस्था में होता है। इस स्वतंत्रता संग्राम का +भी हुआ - अंग्रेजों पर, हम पर, विश्व पर। इस समर के ही परिणाम स्वरूप ईस्ट इंडिया +कम्पनी के शासन की समाप्ति हुई और भारतीय प्रशासन ब्रिटिश क्राउन के अधीन आया - +गवर्नर जनरल वायसरॉय हो गया। 1861 की पील कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार सेना में +ब्रिटिश सैनिकों की संख्या बढ़ा दी तथा तोपखाने से भारतीय सैनिक हटा दिए गए। हिन्दू- +मुस्लिम वैमनस्य को जन्म देने वाली नीतियों को प्रश्रय दे अन्तत: देश विभाजन की +विभीषिका तक पहुँचाया, अपनी विस्तारवादी नीति को तीव्र आर्थिक शोषण की ओर मोड़ा। +भारत की दृष्टि से इस क्रान्ति का क्या प्रभाव हुआ? मध्यकाल में स्थानीय नेतृत्व +व छोटे रा…यों के कारण अखिल भारतीय भाव का लोप हो रहा था। इस समर के कारण नाना +साहब पेशवा, तात्या टोपे, महारानी लक्ष्मीबाई, रंगोबापू जी गुप्ते, अजीमुल्ला खाँ, बहादुर +शाह जफर, वीर कुँवर सिंह, मौलवी अहमद शाह जैसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान वाले प्रेरक +चरित्र सामने आए। इस प्रकार से अंग्रेजों के विरुद्घ प्रथम बार स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आन्दोलन +का सूत्रपात हुआ। इसी को ध्यान में रखकर वीर सावरकर ने जो पुस्तक लिखी वह बाद के +क्रान्तिकारियों के लिए क्रान्ति-गीता बन गई। चाहे संत रामसिंह कूका हो या वासुदेव +बलवन्त फड़के, लाला हरदयाल हो चाहे रासबिहारी बोस, भगतसिंह हो या चन्द्रशेखर +आजाद, सभी 1857 के स्वातंत्र्य समर से ही प्रेरणा लेकर आत्म बलिदान के पथ पर अग्रसर +हुए। +भारत के 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों में भी स्वतंत्र होने +की ललक पैदा हुई थी। कई देशों के शासक मजबूरी में, कठोर ब्रिटिश अंकुश के कारण, +अंग्रेजों के साथ सहयोग एवं मित्रता दिखा रहे थे परन्तु वहाँ की जनता की भारतीय +क्रान्तिकारियों से सहानुभूति थी और उनसे सहायता भी प्राप्त हो रही थी। उदाहरणार्थ नेपाल +के राणा ईस्ट इंडिया कम्पनी से बँधे थे पर नाना साहब से उनका पत्र व्यवहार था तथा +हजरत महल व नाना साहब नेपाल में सुरक्षित रहे थे। उत्तर-पश्चिम में वहाबियों ने +आन्दोलन चला रखा था। अफगान कबीले अंग्रेजों के विरुद्घ वहाबियों की मदद कर रहे थे। +तिब्बत तथा भूटान में भी अंग्रेजों के प्रति असंतोष दिखाई देता था। वस्तुत: 1857 के +स्वातंत्र्य समर के आलोक में इन सब देशों की स्थिति तथा मानसिकता के सन्दर्भ में खोज +की आवश्यकता है। +1857 की 150 वीं वर्षगाँठ पर हमें एक और दृष्टि से भी विचार करना चाहिए। +दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक स्तर पर दुष्चक्र रचकर पाठ्यपुस्तकों व समाचार +माध्यमों से इस प्रकार का सुनियोजित वातावरण बनाने का प्रयत्न हुआ है कि आजादी के +वास्तविक प्रयत्न तो ए.ओ. ह्यूम द्वारा गठित कांग्रेस संगठन के बाद ही हुए तथा स्वतंत्रता +'बिना खड्ग, बिना ढाल' मिली है। स्वतंत्रता संग्राम के समस्त प्रयत्नों का Ÿोय एक परिवार +को प्रदान करने का यह षड्यंत्र है। +सन् 1857 के बाद तुष्टिकरण का जो खेल अंग्रेजों ने प्रारम्भ किया था, यहाँ के +तथाकथित सेकुलर नेता उनके दुष्चक्र में फँसते गए और राजनीतिक स्वार्थवश वह खेल +भारत विभाजन के बाद भी अभी तक रुका नहीं है। 1857 के अनुभव से साम्रा…यवादी +अंग्रेजों ने मुसलमानों को राष्ट्रीयता किंवा हिन्दुत्व के सांस्कृतिक प्रवाह से पृथक रखने के +लिए हिन्दू हित और मुस्लिम हित के बीच भेद करना शुरु किया था। इसीलिए 1871 में +हंटर कमीशन बनाया गया, जिसने मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक +आवश्यकताओं एवं हितों को राष्ट्रीय हितों से अलग स्थापित किया। यह भारत के विभाजन +का प्रथम आधार बना दस्तावेज था जिसका उपयोग अलगाववादी 1947 तक करते रहे। +दुर्भाग्य से, 1857 की 150 वीं जयन्ती पर हम अपने देश में उसी साम्रा…यवादी व्यवहार एवं +नीतियों का संचार होता देख रहे हैं। आज हंटर की जगह स“ार कमेटी बन गई है। इसके +निष्कर्ष, दार्शनिक आधार और मान्यताएँ वही हैं जो हंटर कमीशन की थीं। अत: स्वातंत्र्य +समर की 150 वीं जयन्ती पर हमें राष्ट्र की दशा एवं दिशा पर, हमारी नीतियों एवं नतीजों पर +विचार करना ही चाहिए। +स्वातंत्र्य समर की 150 वीं वर्षगाँठ का यह अवसर आज की युवा पीढ़ी को यह +बताने में उपयोगी हो सकता है कि हमारे क्रान्ति धर्मा पूर्वजों ने स्वतंत्रता की क्या कीमत +चुकाई है। दुर्भाग्य से, प्रेरणा के अभाव में, आज की युवा पीढ़ी भँड-नचैया और डाँड- +खिलैयाओं को अपना नायक (हीरो) बना बैठी है। उन्हें अपने राष्ट्र पुरुषों की बलिदानी +परम्परा का स्मरण करवाकर उनकी तेजस्विता जगाने का कार्य इस अवसर पर किया जा +सकता है। +भारतीय इतिहास के एक उ……वल स्वर्णिम पृष्ठ 'सन् सत्तावन' पर एक सौ पचासवें +वर्ष में दृष्टिपात करते समय उपरोक्त सभी बिन्दुओं को हमें याद रखना चाहिए। इस महासमर +की अनेक बातें अभी जनश्रुतियों में हैं तथा अनेक त‰यों की शोधपूर्ण गवेषणा अपेक्षित है। +अभी तक ज्ञात त‰यों का सिंहावलोकन करते हुए 'स्वातंत्र्य मन्िदर' में प्रतिष्ठापित राष्ट्र पुरुषों +की स्मृति-मूर्ति की परिक्रमा का प्रयत्न मात्र इस पुस्तिका में हुआ है। पुस्तिका का उद्देश्य +विस्तृत अध्ययन हेतु उत्प्रेरक का कार्य करना मात्र है। न यह पुस्तक अभिकारक है, न +उत्पाद। अभिकारक इस पुस्तक के अध्येता हैं, पुस्तक सकारात्मक समांगी उत्प्रेरक है और +उत्पाद हमारे युग नायकों के प्रति हृदय में श्रद्घा भाव का जागरण है। +पुस्तक शुष्क प्रश्नोत्तरी नहीं है। शैली ही प्रश्नोत्तर की है। प्रश्नों से भी कई प्रश्न +उपस्थित किए जा सकते हैं। प्रश्नों में प्रश्न उलझाए भी जा सकते हैं और प्रश्नों से प्रश्न +सुलझाए भी जा सकते हैं। प्रश्न अपने आप में एक त‰य का वक्तव्य है अत: लगेगा उत्तर तो +वस्तुनिष्ठ है और सामान्य व्यवहार के विपरीत प्रश्न उससे कई गुना बड़ा है। किन्तु यह +जानबूझकर किया गया है ताकि प्रश्नों के माध्यम से कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का बोध भी +हो जाए और प्रज्ञा-स्फुरण हित सही उत्तर का शोध भी हो जाए। आशा है प्रश्नोत्तरी का यह +नवीन प्रकार आपको रोचक व प्रेरक लगेगा। आपके आज के सुझाव पुस्तिका के भविष्य में +परिमार्जन के आधार बनेंगे। +"काल रात्रि व्यतीत हुई अब +उतिष्ठ! नव प्रयाण करें हम +क्षत आँचल को फिर से सँवरें +आओ, नव निर्माण करें हम॥" +- हनुमान सिंह राठौड़ +प्रश्नोत्तरी १ से १००. +1. 1857 की क्रान्ति 'स्वातंत्र्य समर' था, इस त‰य से हमारे इतिहास की किस +विशेषता का बोध होता है? +
उ. सतत् संघर्ष का इतिहास। +2. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक के लेखक का नाम बताइये। +
उ. स्वातंत्र्य वीर सावरकर। +3. वीर सावरकर का पूरा नाम बताइये। +
उ. श्री विनायक दामोदर सावरकर। +4. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक के साथ प्रकाशन क्षेत्र में विश्व +की कौनसी विलक्षण घटना जुड़ी हुई है? +
उ. प्रकाशन पूर्व ही जब्ती के आदेश। +5. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक की रचना तिथि बताइये। +
उ. 10 मई 1907। +6. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक की मूल पांडुलिपि किस +भाषा में थी? +
उ. मराठी। +7. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक को क्रान्तिकारियों ने क्या +विशेषण दिया? +
उ. क्रान्ति की गीता। +8. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' ग्रंथ किस स्थान पर लिखा गया था? +
उ. लंदन। +9. 'जिस राष्ट्र को अपने अतीत के सम्बन्ध में ही वास्तविक ज्ञान न हो, उसका +कोई भविष्य भी नहीं होता।' यह उद्घरण '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' +पुस्तक के किस प्रकरण से लिया है? +
उ. प्रथम संस्करण की भूमिका। +10. 'तलवार' नामक पत्र का प्रकाशन किस संगठन द्वारा होता था? +
उ. अभिनव भारत। +11. 'तलवार' नामक पत्र का प्रकाशन किस स्थान से होता था? +
उ. पेरिस। +12. वीर सावरकर के 'तलवार' नामक पत्र में लिखे लेख का विषय क्या था? +
उ. ग्रन्थ लेखन का उद्देश्य बताना। +13. वीर सावरकर अपने ग्रन्थ के कुछ अध्यायों का अंग्रेजी अनुवाद अपने +भाषणों के माध्यम से रखते थे। यह बैठकें किस संगठन की होती थीं? +
उ. फ्री इंडिया सोसायटी। +14. प्रतिबंध की अवस्था में भी '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' ग्रन्थ +सर्वप्रथम कहाँ से प्रकाशित हुआ? +
उ. हॉलैंड से। +15. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' ग्रन्थ सर्वप्रथम किस भाषा में प्रकाशित +हुआ? +
उ. इंग्िलश। +16. प्रतिबंध काल में गुप्त रूप से '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तकों +का बक्सा भारत लाने वाले व्यक्ित का नाम बताइये जो बाद में पंजाब के +प्रधानमंत्री भी रहे। +
उ. सर सिकन्दर हयात खाँ। +17. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक की मूल पांडुलिपि 'जेवर +बैंक ऑफ पेरिस' में किसने सुरक्षित रखी? +
उ. मैडम कामा। +18. प्रथम विश्व युद्घ में फ्रांस को असुरक्षित जानकर '1857 का भारतीय +स्वातंत्र्य समर' पुस्तक की मूल पांडुलिपि अमेरिका कौन ले गये? +
उ. गोवा निवासी डॉ. कुटिनो। +19. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक से विधिवत प्रतिबंध किस सन् +में हटा? +
उ. 1945 में। +20. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' ग्रन्थ का तृतीय अंग्रेजी संस्करण 1929 +में गुप्त रूप से किस क्रान्तिकारी ने करवाया? +
उ. सरदार भगतसिंह ने। +21. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' ग्रन्थ में लेखक की जगह क्या लिखा +रहता था? +
उ. एन इंिडयन नेशनलिस्ट। +22. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' के सन् 1929 के तृतीय अंग्रेजी संस्करण +की क्या विशेषता थी? +
उ. सर्वप्रथम लेखक के रूप में वीर सावरकर का नामोल्लेख। +23. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' ग्रन्थ के प्रथम खंड से एक प्रसिद्घ +नारा सुभाषचन्द्र बोस ने दिया। वह नारा बताइये। +
उ. दिल्ली चलो। +24. '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' ग्रन्थ का प्रारम्भ जिन सन्त के पद्य से +होता है, उनका नाम बताइये। +
उ. समर्थ गुरू रामदास। +25. 'क्रान्ति का अर्थ ही है मानव जाति के ऐतिहासिक जीवन की पुनव्र्यवस्था' +यह परिभाषा देने वाले प्रसिद्घ क्रान्तिकारी का नाम बताइये। +
उ. मैजिनी। +26. 'चर्बी वाले कारतूस और अवध के सिंहासन का हड़पा जाना तो क्रान्ति के +अस्थाई और निमित्त कारण थे।' इसे समझाने के लिए वीर सावरकर ने क्या +उपमा दी? +
उ. राम-रावण संघर्ष में सीता हरण तो निमित्त मात्र है। +27. वस्तुत: 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम को प्रदीप्त करने वाले दिव्य तत्व क्या थे? +
उ. स्वधर्म व स्वरा…य। +28. 'हम शत्रुओं का नाश कर अपने प्राण प्रिय धर्म एवं स्वदेश को पूर्णरूपेण +भयमुक्त कर लेने में सफलता प्राप्त कर लेंगे' दिल्ली सम्राट की इस घोषणा +का उद्घरण किस पुस्तक में मिलता है? +
उ. फिक्शन एक्सपोज्…ड। +29. 'यह (क्रान्ति) तो भारत पर आंग्ल सत्ता के विरुद्घ सैनिक कठिनाइयों, +राष्ट्रीय घृणा और धार्मिक कट्टरता का संयुक्त उभार था।' यह आकलन किस +प्रसिद्घ इतिहासकार का है? +
उ. जस्टिन मैकार्थी का। +30. 'जिस दिन अंग्रेजों ने इस हिन्दू भूमि पर अपनी दासता का पाश लादने के +लिए राक्षस सरीखा धावा बोला, उसी दिन हिन्दुओं और अंग्रेजों में होने वाले +युद्घ का भी निश्चय हो गया था।' उसका आरम्भ कैसे होगा? यह जिस +व्यक्ति के कारण निर्धारित हुआ उसका नाम बताइये। +
उ. लॉर्ड डलहौजी। +31. अंग्रेज इतिहासकारों ने 'साम्रा…य निर्माता' की संज्ञा किसे दी है? +

उ. डलहौजी को। +32. 'मैं भारत की भूमि को सपाट करके रख दूँगा।' यह साम्रा…यवादी गर्वोक्ति +किसने की थी? +

उ. लॉर्ड डलहौजी ने। +33. महाराजा रणजीत सिंह के नाबालिग पुत्र का नाम बताइये जिसे अंग्रेजों ने +ईसाई बना दिया? +

उ. दिलीप सिंह। +34. '... उसे बंगाल की सेना के एक सहायक कर्मचारी की देखरेख में रखा +गया, जिसके निर्देशन में सिख राजकुमार का विकास एक भद्र ईसाई, एक +अंग्रेज दरबारी के रूप में हुआ।' अंग्रेजों की इस कुटिल नीति को उजागर +करने वाले इतिहासकार का नाम बताइये। +
उ. केयी। +35. 1825 में कोटा तथा 1837 में ओरछा नरेश को दत्तक पुत्र की अनुमति दी +पर 1848 में औरस पुत्र उत्तराधिकारी न होने के आधार पर अंग्रेजों ने किस +रा…य को हड़प लिया? +
उ. सतारा। +36. वैध उत्तराधिकारी के अभाव में अंग्रेजों की रा…य हड़प नीति का विरोध +करने इंग्लैंड जाने वाले मराठा का नाम बताइये। +
उ. रंगो बापू जी गुप्ते। +37. 1826 में 'सतत् मैत्री' की संधि ईस्ट इंडिया कम्पनीऔर नागपुर के जिस +शासक के बीच हुई उनका नाम बताइये। +
उ. रघोजी भोंसले। +38. डलहौजी ने 'सतत् मैत्री' संधि का उल्लंघन कर किस सन् में नागपुर को +हड़प लिया? +
उ. सन् 1853 ई. में। +39. नाना साहब पेशवा के जन्म स्थान का नाम बताइये। +
उ. वेणु ग्राम। +40. नाना साहब पेशवा की माता का नाम बताइये। +
उ. गंगा बाई। +41. नाना साहब पेशवा के पिता का नाम बताइये। +
उ. माधवराव नारायण। +42. नाना साहब पेशवा का जन्म किस वर्ष में हुआ? +
उ. सन् 1824 ई. में। +43. बाजीराव द्वितीय ने नाना साहब को अपने दत्तक पुत्र के रूप में किस दिन +को ग्रहण किया? +
उ. 7 जून 1827 ई. को। +44. लक्ष्मी बाई का जन्म किस नगर में हुआ? +
उ. काशी में। +45. लक्ष्मी बाई के पिताजी का नाम बताइये। +
उ. मोरोपन्त तांबे। +46. लक्ष्मी बाई की माता का नाम बताइये। +
उ. भागीरथी बाई। +47. लक्ष्मी बाई की जन्मतिथि बताइये। +
उ. 19 नवम्बर 1835। +48. लक्ष्मी बाई का माता-पिता ने क्या नाम रखा था? +
उ. मनु बाई। +49. लक्ष्मी बाई को बचपन में किस Œयार के नाम से बोलते थे? +
उ. छबीली। +50. लक्ष्मी बाई का विवाह झांसी के किस राजा से हुआ? +
उ. महाराजा गंगाधर से। +51. 'यदि यह पेंशन सदैव के लिए टिकने वाली नहीं है तो फिर इस पेंशन के +बदले में दिया गया रा…य भी सदैव के लिए तुम्हारे पास किस प्रकार रह +सकता है।' यह प्रसिद्घ वाक्य किनका है? +
उ. नाना साहब पेशवा का। +52. नाना साहब ने कम्पनी सरकार के विरुद्घ लंदन में अपना पक्ष रखने के +लिए राजदूत के रूप में किसे भेजा? +
उ. अजीमुल्ला खाँ को। +53. नाना साहब का निवास किस नगर में था? +
उ. बिठूर में। +54. नाना साहब को प्रतिदिन अंग्रेजी समाचार पत्र पढ़कर सुनाने वाले अंग्रेज +का नाम बताइये। +
उ. टॉड। +55. 1853 में अपने पति की मृत्यु के बाद लक्ष्मीबाई ने दत्तक पुत्र के रूप में +किसे ग्रहण किया? +
उ. दामोदर राव को। +56. अंग्रेजों द्वारा झाँसी का अधिग्रहण करने के फैसले पर रानी ने गरजकर क्या +प्रतिक्रिया व्यक्त की? +
उ. 'मैं अपनी झाँसी किसी को भी नहीं दूँगी।' +57. अंग्रेजी सेना पर प्रति वर्ष सोलह लाख रुपये खर्च देने में असमर्थ रहने पर +अंग्रेजों ने अवध के नवाब का कौनसा क्षेत्र बलात् हड़प लिया? +
उ. रूहेलखंड। +58. 'मेरा यह सुदृढ़ विश्वास है कि यदि यह शिक्षा योजना सुचारू रूप से जारी +रही तो तीस वर्ष पश्चात् बंगाल में एक भी मूर्तिपूजक न रह जाएगा।' लॉर्ड +मैकाले ने यह पत्र 12 अक्टूबर 1836 को किसे लिखा था? +
उ. अपनी माँ को। +59. कम्पनी सरकार के सरकारी कागज-पत्रों में भारतवासियों का उल्लेख +किस शब्द से किया जाता था? +
उ. हीदन। +60. मिशनरियों ने सेना के ईसाईकरण का प्रयत्न किस उद्देश्य से प्रारम्भ किया +था? +
उ. सेना को राजभक्त बनाने के लिए। +61. 'मैं निरन्तर बीस वर्ष से सिपाहियों को ईसाई बनाने के कार्य में संलग्न हूँ। +इन मूर्तिपूजकों की आत्मा एक शैतान से सुरक्षित रहे, ऐसा करना मैं अपना +सैनिक कर्त्तव्य समझता हूँ।' यह कथन किसका है? +
उ. बंगाली सेना के कमांडर का। +62. अंग्रेजों द्वारा विवादास्पद कारतूस किस वर्ष से भारत में लाए जा रहे थे? +
उ. 1853 से। +63. चर्बी लगे कारतूसों के कपट का सैनिकों को पता किस सन् में लगा? +
उ. सन् 1857 में। +64. कारतूसों में किन जानवरों की चर्बी का मिश्रण था? +
उ. सूअर व गाय। +65. कारतूसों पर चर्बी लगाने का उल्लेख सरकारी प्रतिवेदन में सर्वप्रथम +किसने किया? +
उ. कर्नल टकर ने। +66. कारतूसों पर चर्बी के उल्लेख के सरकारी प्रतिवेदन की तिथि बताइये। +
उ. दिसम्बर 1853 ई.। +67. कारतूसों के लिए गाय की चर्बी आपूर्ति के लिए ठेकेदार से अनुबन्ध में +क्या दर तय हुई थी? +
उ. 2 पेन्स प्रति रतल। +68. भारत में चर्बी लगे कारतूस का निर्माण कारखाना कहाँ लगाया गया? +
उ. दमदम में। +69. 1857 की क्रान्ति की योजना का प्रमुख केन्द्र किस स्थान पर था? +
उ. बिठूर में। +70. 1857 की क्रान्ति में सहयोग की सम्भावना तलाशने के लिए इंग्लैंड से +लौटते हुए अजीमुल्ला खाँ किन दो देशों में गए थे? +
उ. रूस व तुर्की। +71. 1856 ई. के प्रारम्भ में ही भारत को युद्घ के लिए मानसिक व शारीरिक +रूप से तैयार करने का कार्य किन दो व्यक्तियों ने प्रारम्भ कर दिया था? +
उ. नाना साहब व अजीमुल्ला खाँ ने। +72. काली नदी पर हुए युद्घ में पकड़े गए एक भारतीय सैनिक से पूछा - +'हमारे विरुद्घ युद्घ में उतरने का साहस तुमने कैसे किया? सिपाही ने क्या +उत्तर दिया? +
उ. 'हिन्दुस्थानी सिपाही एक हो गए तो गोरा यहाँ कदापि नहीं ठहर पाएगा।' +73. मुसलमानी रा…यों विशेषकर अवध की सहायता प्राप्त करने के लिए बहादुर +शाह जफर ने कौनसा पंथ स्वीकार करने की घोषणा की थी? +
उ. शिया पंथ। +74. नाना साहब के पत्र के जवाब में सेना व धन से सहायता का आश्वासन देने +वाले जम्मू-कश्मीर के महाराजा का नाम बताइये। +
उ. महाराजा गुलाब सिंह। +75. 'राजमहलों के द्वारों के समीप बैठकर मुगल तथा अन्य लोग स्वातंत्र्य युद्घ +के सम्बन्ध में परामर्श किया करते थे।' दिल्ली बादशाह के जिस गृहमंत्री +की यह स्वीकारोक्ति है, उनका नाम बताइये। +
उ. मुकुन्दलाल। +76. अंग्रेज गुप्तचरों से बचने के लिए, क्रान्ति योजना के लिए परामर्श हेतु किन +स्थानों को चुना? +
उ. तीर्थ स्थल। +77. 1857 में एक क्रान्ति गीत लिखा गया तथा उसे गाने की राजाज्ञा प्रसारित +की गई। इसका उल्लेख करने वाले अंग्रेज लेखक का नाम बताइये। +
उ. ट्रेवेलियन। +78. गूढ़ संदेश प्रसारण तथा शौर्य जगाने के लिए गायकों ने सार्वजनिक स्थानों +पर कौनसे गीत गाना प्रारम्भ किया? +
उ. पवाड़े तथा आल्हा। +79. महिलाओं में क्रान्ति संगठन व योजना प्रचार के लिए भविष्यवक्ता व +औषधी देने वाली जिन महिलाओं का सहयोग लिया गया वे किस समुदाय +की थीं? +
उ. वैदू या जिŒसी। +80. मद्रास की दीवारों पर चिपके भिžिा-पत्रों में लिखा था - 'ये फिरंगी हमारे +देश को धूल-धूसरित करने पर तुल गए हैं। अब इनके अत्याचारों से मुक्ति +प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है, इनसे समरभूमि में युद्घ।' इन पत्रकों के +चिपकाने की तिथि बताइये। +
उ. जनवरी 1857। +81. 'रेजीमेंट में हमारे भाई का मत हमारे लिए मान्य है। कारतूसों के सम्बन्ध में +इसी के अनुरूप व्यवहार करो।' सातवीं रेजीमेंट ने यह पत्र कौनसी रेजीमेंट +को लिखा था? +
उ. अवध की 48 वीं रेजीमेंट को। +82. 'भाइयों! उठो, अत्याचारियों के विरुद्घ संघर्ष करो।' बैरकपुर के सिपाही +ने यह पत्र संदेश किस स्थान पर भेजा था? +
उ. स्यालकोट। +83. 1857 में क्रान्ति-संदेश के रूप में गाँव-गाँव में भेजे गए प्रतीक क्या थे? +
उ. रक्त कमल और रोटी। +84. क्रान्ति का प्रतीक चिह्न-कमल मिलने पर कौनसा रहस्यमयी कथन किया +जाता था? +
उ. सबकुछ लाल हो जाएगा। +85. क्रान्ति युद्घ के इतिहास में योजना की गोपनीयता के सम्बन्ध में '1857 के +स्वातंत्र्य समर' की क्या विलक्षणता है? +
उ. योजना की गोपनीयता कहीं भंग नहीं हुई। +86. क्रान्ति के लिए ललकारते हुए अपने साथी सिपाहियों से यह किसने कहा +- 'उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगन्ध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन +अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार कर दो'? +
उ. मंगल पांडे। +87. मंगल पांडे को बंदी बनाने का आदेश किसने दिया? +
उ. सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने। +88. मंगल पांडे को बंदी बनाने के अंग्रेज सार्जेंट के आदेश का क्या परिणाम +हुआ? +
उ. एक भी सैनिक आगे नहीं आया। +89. मंगल पांडे की गोली से मरे अंग्रेज सैनिक अधिकारी का नाम बताइये। +
उ. सार्जेंट मेजर ह्यूसन। +90. मंगल पांडे ने तलवार के वार से जिस अंग्रेज सैनिक अधिकारी को +धराशायी किया, उसका नाम बताइये। +
उ. लैफ्टिनेन्ट बॉब्ह। +91. कर्नल ह्वीलर ने गोरे सैनिकों से मंगल पांडे को बंदी बनाने के लिए कहा +तो भारतीय सैनिकों ने क्या कहा? +
उ. 'मंगल पांडे को हाथ लगाने का कोई दुस्साहस न करे।' +92. अंग्रेजों के हाथ पडऩे से बचने के लिए मंगल पांडे ने क्या किया? +
उ. स्वयं को गोली मार ली। +93. 1857 की क्रान्ति का प्रथम विस्फोट किस तिथि को हुआ? +
उ. 29 मार्च 1857 को। +94. 1857 की क्रान्ति का प्रथम विस्फोट किस छावनी से हुआ? +
उ. बैरकपुर। +95. 1857 की क्रान्ति का प्रथम विस्फोट करने वाले क्रान्तिकारी का नाम +बताइये। +
उ. मंगल पांडे। +96. घायल मंगल पांडे को किस दिन प्राणदंड दिया गया? +
उ. 8 अप्रेल 1857 को। +97. मंगल पांडे से अंग्रेज इतने भयभीत थे कि स्वतंत्रता समर के प्रत्येक +सिपाही को ही उन्होंने एक सम्बोधन दिया जो क्रान्तिकारी का पर्यायवाची +बन गया। वह सम्बोधन क्या था? +
उ. पांडे। +98. रात्रि में गोरे सैनिक अधिकारियों के घरों में आग लगाकर बदला लेने का +तरीका सर्वप्रथम किस छावनी में अपनाया गया? +
उ. अम्बाला। +99. पुरस्कार के लालच के बाद भी कोई मुखबिर अंग्रेजों को प्राप्त न होता था। +निराश होकर गवर्नर जनरल को यह किसने लिखा - 'इट इज रियली स्ट्रेंज +दैट द इंसिदिअरीस शुड नेवर बी डिटेक्टेड'? +
उ. अंग्रेजों के प्रधान सेनापति एन्सन ने। +100. क्रान्ति समय पूर्व प्रारम्भ हो गई। पूरे देश में एक साथ क्रान्ति की वास्तविक +तिथि क्या तय की गई थी? +
उ. 31 मई। +प्रश्नोत्तरी १०१ से २००. +101. 3 मई 1857 को चार सिपाही अंग्रेज अधिकारी के तम्बू में घुसे और बोले- +'व्यक्तिगत रूप से तो तुम्हारे प्रति हमारे मन में कोई द्वेष नहीं है, किन्तु तू +फिरंगी है अत: तुझे मरना ही चाहिए।' उस अंग्रेज अधिकारी का नाम क्या +था? +
उ. लैफ्टिनेंट मैशम। +102. 6 मई 1857 को मेरठ छावनी की घुड़सवार टुकड़ी के 90 सैनिकों में से +कितनों ने कारतूस छूने से भी मना कर दिया? +
उ. 85 सैनिकों ने। +103. जिन सैनिकों ने कारतूस छूने से मना किया उन्हें क्या सजा सुनाई गई? +
उ. 8 से 10 वर्ष कारावास। +104. जिन सैनिकों ने कारतूस छूने से मना किया, तोपखाने के पहरे में उनके +हथियार छीन लिये, वरदी फाड़ दी तथा हथकड़ी-बेडिय़ाँ डाल दी। इतना +ही नहीं, यह दृश्य देखने के लिए मेरठ छावनी के भारतीय सैनिकों को +विवश किया गया। यह घटना किस तिथि की है? +
उ. 9 मई 1857 की। +105. 'तुम्हारे भाई कारागारों में हैं और तुम यहाँ मक्िखयाँ मारते घूम रहे हो। +तुम्हारे जीवन पर शत् बार धिक्कार है।' बाजार में घूमते सैनिकों पर महिलाओं +के ताने कसने की यह घटना किस स्थान की है? +
उ. मेरठ। +106. मेरठ छावनी में क्रान्ति का बिगुल किस तिथि को बजा? +
उ. 10 मई को। +107. मेरठ छावनी का क्रान्ति घोष क्या था? +
उ. मारो फिरंगी को। +108. मेरठ छावनी में क्रान्ति का प्रारम्भ किस पलटन ने किया? +
उ. बीसवीं व अश्वारोही पलटन ने। +109. मेरठ छावनी के क्रान्तिकारी सिपाहियों ने सबसे पहला काम क्या किया? +
उ. जेल में बंदी साथियों को छुड़ाया। +110. यदि कोई अंग्रेज पर दया दिखाने का प्रयत्न करता तो क्रान्तिकारी बंदी +सिपाहियों की बेडिय़ों के निशान दिखाकर क्या कहते थे? +
उ. 'इसका प्रतिशोध अवश्य लो।' +111. मेरठ से दिल्ली की ओर प्रस्थान करते हुए क्रान्ति सैनिकों का नारा क्या +था? +
उ. 'दिल्ली चलो।' +112. 'हम कल पहुँच रहे हैं, आप लोग आवश्यक व्यवस्थाएँ कर लीजिये' यह +अन अपेक्षित और विचित्र संदेश कहाँ से कहाँ भेजा गया था? +
उ. मेरठ से दिल्ली। +113. मेरठ के क्रान्तिकारी सैनिकों के प्रथम दल ने दिल्ली में किस दरवाजे से +प्रवेश किया था? +
उ. कश्मीरी दरवाजे से। +114. मेरठ के क्रान्तिकारी सैनिकों के द्वितीय दल ने दिल्ली में किस दरवाजे से +प्रवेश किया था? +
उ. कलकत्ता दरवाजे से। +115. 'मेरे पास तो राजकोष में भी कुछ नहीं, फिर मैं तुम्हारा वेतन कहाँ से दे +पाऊँगा।' यह बात किसने कही? +
उ. बहादुर शाह जफर ने। +116. दिल्ली के शस्त्रागार का अधिकारी कौन था जिसने क्रान्तिकारियों के हाथ +पडऩे से पूर्व ही उसमें आग लगाकर आत्मबलि दे दी? +
उ. लैफ्टिनेंट विलोवी। +117. 'किसी ग्राम अथवा दिल्ली में एक भी ऐसी घटना नहीं घटित हुई जिसमें +किसी अंग्रेज महिला के पावित्र्य का भंग किया गया हो' अंग्रेजों द्वारा नियुक्त +जाँच-समिति की यह स्वीकारोक्ति भारतीय संस्कृति की किस विशेषता को +बताती है? +
उ. मातृवत् परदारेषु। +118. 'जहाँ तक मैंने जाँच की है, महिलाओं से छेड़छाड़ का कोई भी प्रमाण मुझे +नहीं मिला' यह स्वीकारोक्ति करने वाले गुप्तचर विभाग के प्रमुख का नाम +बताइये। +
उ. सर विलियम म्यूर। +119. मई 1857 में बैरकपुर से आगरा पर्यन्त 750 मील के क्षेत्र में अंग्रेजों की +एकमात्र रेजीमेंट कहाँ थी? +
उ. दानापुर में। +120. अंग्रेजों के सौभाग्य से किस देश से उनका युद्घ समाप्त होने के कारण वहाँ +की सेना को तुरन्त भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन को दबाने के लिए लाना +सम्भव हो पाया? +
उ. ईरान से। +121. लॉर्ड कैनिंग ने स्वतंत्रता युद्घ को दबाने के लिए किस देश से संघर्ष के +लिए प्रस्थान कर रही सेना को भारत में ही रोक लिया? +
उ. चीन से। +122. 'तुम्हारे धर्म अथवा जाति विषयक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप करने का +हमारा किंचित भी इरादा नहीं है। तुम यदि चाहते हो तो अपने हाथों से ही +कारतूसों का निर्माण कर सकते हो।' यह वक्तव्य किसने दिया? +
उ. लॉर्ड कैनिंग ने। +123. दिल्ली में क्रान्ति होने का समाचार प्रधान अंग्रेज सेनापति को किस स्थान +पर प्राप्त हुआ? +
उ. शिमला में। +124. अम्बाला छावनी से दिल्ली के बीच स्थित उन तीन देशी रा…यों के नाम +बताइये जिनके आचरण से क्रान्ति की सफलता या असफलता तय होने +वाली थी? +
उ. पटियाला, नाभा और जींद। +125. अम्बाला छावनी से दिल्ली के बीच स्थित तीन देशी रा…यों का अंग्रेजों के +लिए सामरिक दृष्टि से क्या महत्व था? +
उ. इनके सहयोग बिना दिल्ली पर आक्रमणकारी अंग्रेज सेना का पृष्ठ भाग +असुरक्षित हो जाता। +126. पटियाला के शासक ने अंग्रेज हित में किस मार्ग की सुरक्षा का दायित्व +लिया? +
उ. थानेसर मार्ग का। +127. अंग्रेजों के आग्रह पर पानीपत की रक्षा का भार किस देशी रा…य ने लिया? +
उ. जींद। +128. 'मैं अपराधियों के निर्दोष अथवा दोषी होने पर विचार न करता हुआ उन्हें +निश्चित रूप से मृत्युदंड ही दूँगा।' यह शपथ अंग्रेजों द्वारा क्रान्तिकाल में +स्थापित किन न्यायालयों के न्यायाधीशों को लेनी पड़ती थी? +
उ. सैनिक न्यायालय। +129. जहाँ बैठकर काले लोगों को सामूहिक मृत्युदंड का ही फैसला जिन +अंग्रेज पंचों को प्रतिज्ञापूर्वक करना था, उन आसनों को अंग्रेजों ने क्या नाम +दिया? +
उ. कोर्ट मार्शल। +130. पाँच तोपें अंग्रेजों के हाथ पडऩे से बचाने के लिए ग्यारहवीं पलटन के एक +सैनिक ने बारूद में आग लगाकर तोपों के साथ स्वयं का भी बलिदान दे +दिया। 30 मई 1857 का यह युद्घ किस स्थान पर हुआ? +
उ. हिंडन नदी के तट पर। +131. मेजर रीड के नेतृत्व में मेरठ की अंग्रेज सेना की सहायता किस देशी +पलटन ने की थी? +
उ. गोरखा पलटन ने। +132. दिल्ली के समीप किस स्थान पर अंग्रेज सेना व क्रान्तिकारियों के बीच +प्रथम युद्घ हुआ? +
उ. बुन्देलों की सराय। +133. दिल्ली के समीप अंग्रेज सेना व क्रान्तिकारियों के बीच प्रथम युद्घ किस +तिथि को हुआ। +
उ. 7 जून 1857 को। +134. दिल्ली के समीप अंग्रेज सेना व क्रान्तिकारियों के बीच प्रथम युद्घ में मारे +गये प्रमुख अंग्रेज अधिकारी का नाम बताइये। +
उ. कर्नल चेस्टर। +135. पंजाब के लोगों का निरस्त्रीकरण तथा सिखों को अंग्रेजी सेना में भर्ती कर +उनकी स्वातंत्र्य प्रवृžिा का दमन करने के षड्यंत्र में अग्रणी दो अंग्रेज +अधिकारियों में से किसी एक का नाम बताइये। +
उ. सर हेनरी लॉरेन्स तथा सर जॉन लॉरेन्स। +136. 'लोग शान्ति के युग को सदा ही Ÿोयस्कर मानते हैं। उनके कृषि कार्य में +जिन क्रान्तिकारी गतिविधियों के कारण व्यवधान पड़ता है उसमें योगदान +देना भी उन्हें नहीं सुहाता।' अंग्रेजों की कूटनीति का यह कुटिलतम सिद्घान्त +1857 में किस प्रान्त में पूर्णतया सफलतम सिद्घ दिखता है? +
उ. पंजाब। +137. 'साहब वे सब फिसाद की भावनाओं से भरे हुए हैं।' अंग्रेजों के एक +गुप्तचर ने यह बात किस छावनी के सैनिकों के सम्बन्ध में कही? +
उ. मीयां मीर छावनी, लाहौर। +138. मेरठ के समाचार तथा गुप्तचर की सूचना पर लाहौर के सेनाधिकारी रॉबर्ट +मोन्टगुमरी ने क्या कदम उठाया? +
उ. सेना का निरस्त्रीकरण। +139. अंग्रेजों ने क्रान्ति के बाद दिल्ली पर आक्रमण में सिखों का सहयोग प्राप्त करने के +लिए जिस भविष्यवाणी का योजनापूर्वक स्मरण उन्हें कराया, वह क्या थी? +
उ. 'जिस स्थान पर मुगल बादशाह ने सिख गुरूओं की हत्या की थी, उसी +दिल्ली पर बारह दिन खालसा वीर आक्रमण कर उसे धूल में मिला देंगे।' +140. 21 अक्टूबर 1857 ई. को किस अंग्रेज अधिकारी ने अपने पत्र में यह +लिखा था - 'यदि सिख हमारे विरुद्घ क्रान्तिकारियों के साथ मिल जाते तो +हमारी रक्षा करना मानवी शक्ति से परे था'? +
उ. सर जॉन लॉरेन्स। +141. बहादुर शाह जफर के विरुद्घ सिखों में रोष की …वाला भड़काने के लिए +अंग्रेजों ने क्या अफवाह उड़ाई? +
उ. बहादुरशाह ने प्रथम आदेश यह प्रसारित किया है कि जहाँ कहीं भी सिख +मिले, उसकी हत्या कर दी जाए। +142. पंजाब की किस छावनी में 13 मई को क्रान्ति का विस्फोट हुआ? +
उ. फिरोजपुर। +143. सैनिकों के हथियार रखवाने से क्षुब्ध अफसरों ने उनके पक्ष में अपने +पदक व पद का परित्याग कर दिया। यह घटना किस छावनी की है? +
उ. पेशावर। +144. 55 वीं पलटन के उस अंग्रेज अधिकारी का नाम बताइये जिसने पलटन +के नि:शस्त्रीकरण के अपमान से क्षुब्ध होकर आत्महत्या कर ली? +
उ. कर्नल स्पाटिस्वुड। +145. अपने अधिकारी की आत्महत्या का समाचार सुनकर क्रान्ति यज्ञ में कूद +पडऩे वाली 55 वीं पलटन पंजाब की किस छावनी में तैनात थी? +
उ. होतीमर्दान। +146. अपने प्रिय धर्म को छोडऩे की बजाय जिन वीरों ने तोप के मुँह पर बँधकर +मरना पसन्द किया, 55 वीं पलटन के उन सैनिकों की संख्या बताइये। +
उ. एक हजार। +147. अंग्रेजों की क्रूरता का बचाव अंग्रेजी इतिहासकारों ने क्या कहकर किया? +
उ. 'घड़ी भर की क्रूरता में सदैव के लिए मानवता का मंगल निहित था।' +148. पूर्व निर्धारित योजनानुसार जालंधर क्वींस रेजीमेंट ने किस दिन क्रान्ति का +शंखनाद किया? +
उ. 9 जून 1857 को। +149. पुराने कैदी सैनिकों की चौकसी से छुटकारा पाने तथा नए कैदियों के लिए +जगह करने के लिए अजनाला में कितने सैनिकों की हत्या की गई? +
उ. 282 सैनिकों ने। +150. 'अजनाला हत्याकांड' का हत्यारा कौन था? +
उ. कूपर। +151. 'अजनाला हत्याकांड' की तिथि बताइये। +
उ. 1 अगस्त 1857 के दिन। +152. 'सम्पूर्ण हिन्दुस्थान के सिपाही चाहे विद्रोह करें, किन्तु यह पलटन विद्रोह +में कदापि सहयोग नहीं देगी।' किस पलटन के सम्बन्ध में अंग्रेजों की यह +गर्वोक्ति थी? +
उ. अलीगढ़ की 9 वीं रेजीमेंट। +153. 'बन्धुओं! तुम देख रहे हो इस हुतात्मा ने रक्त से स्नान कर लिया है।' +क्रान्ति के संदेशवाहक को मृत्युदंड के बाद इस ललकार ने तुरन्त क्रान्ति +की आग सुलगा दी; यह पलटल कौनसी थी? +
उ. अलीगढ़ की 9 वीं रेजीमेंट। +154. क्रान्ति सेना ने किस तिथि को अलीगढ़ अंग्रेजों से मुक्त करा लिया? +
उ. 20 मई 1857 को। +155. इटावा के उस जिलाधीश का नाम बताइये जो क्रान्ति के बाद भारतीय +महिला का वेश बनाकर भाग गया। +
उ. एलेन ओ. ह्यूम। +156. 15 वीं व 30 वीं पलटन ने 28 मई 1857 को क्रान्ति का शंखनाद कर +दिया। यह घटना किस छावनी की है? +
उ. नसीराबाद। +157. रुहेलखंड की तात्कालिक राजधानी बरेली में किस तिथि को क्रान्ति +हुई? +
उ. 31 मई 1857 को। +158. काशी के निकट सैनिक छावनी किस स्थान पर थी? +
उ. सिक्रोली ग्राम। +159. 'भाग्य की विडम्बना देखिए कि वारेन हैस्टिंग्ज ने जिस चेतसिंह पर अपने +बूट की ठोकरों का प्रहार किया था उसी के वंशज अंग्रेजों के तलुए चाटने में +सौभाग्य का अनुभव करने लग गए थे।' यह कथन किस रा…य के लिए +किया गया है? +
उ. काशी। +160. 4 जून 1857 को किस स्थान पर क्रान्ति हुई? +
उ. काशी। +161. 'अनेक प्रमुख व्यापारियों एवं अन्य लोगों ने भी हमारे प्रति प्रचंड द्वेष +भावना अभिव्यक्त की। इतना ही नहीं, उनमें से अनेकों ने तो हमारे विरुद्घ +सक्रिय युद्घ में भी भाग लिया।' नील के इस पत्र में किन व्यापारियों का +उल्लेख है? +
उ. मारवाड़ी। +162. प्रयाग के क्रान्तिकारियों के नेतृत्वकर्ता का नाम लिखिये। +
उ. मौलवी लियाकत अली। +163. 'प्रतिदिन हम आठ-दस व्यक्तियों को तो निश्चित रूप से ही फँसाते थे। +... दंिडत अपराधी को उसके गले में फन्दा डालकर एक गाड़ी पर +चढ़ाकर वृक्ष से बाँध दिया जाता था। गाड़ी को आगे बढ़ाया कि उसकी देह +वृक्ष से झूल गई।' यह स्वीकारोक्ति करने वाले जाँच समिति के अध्यक्ष का +नाम बताइये। +
उ. चाल्र्स बॉल। +164. सम्पूर्ण हिन्दुस्थान में जितने अंग्रेजों की हत्या हुई उनसे अधिक संख्या में +भारतीयों की हत्या केवल प्रयाग में ही करवाने वाले अंग्रेज अधिकारी का +नाम बताइये। +
उ. जनरल नील। +165. 'तीन मास तक आठ शव ढोने वाली गाडिय़ाँ सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त +तक उन शवों को एकत्र करने के लिए चक्कर लगाती थीं, जो राजमार्गों और +बाजारों में लटकाए जाते थे। इस प्रकार लगभग छ: हजार व्यक्तियों को +प्राणदंड दिया गया।' यह घटना किस क्षेत्र की है? +
उ. कानपुर। +166. 'स्वदेश के लिए मैंने यह घोर अत्याचार किए हैं। परमात्मा मुझे क्षमा प्रदान +करेगा।' अपनी क्रूरता को इंग्लैंड हित में क्षम्य बताने वाले इस अंग्रेज +अधिकारी का नाम बताइये। +
उ. जनरल नील। +167. तात्या टोपे का जन्म-स्थान बताइये। +
उ. यवला (परगना पालोडा, जिला नगर) +168. तात्या टोपे का बचपन का नाम बताइये। +
उ. रघुनाथ/रामचन्द्र। +169. तात्या टोपे का जन्म किस सन् में हुआ? +
उ. सन् 1814 ई. में। +170. तात्या टोपे के पिताजी का नाम बताइये। +
उ. श्री पांडुरंग। +171. कानपुर में क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र स्थल किनका निवास स्थान +था? +
उ. सूबेदार टीकासिंह का। +172. गुप्त क्रान्ति कार्य में सहयोगी कानपुर की नर्तकी का नाम बताइये। +
उ. अजीजन बाई। +173. कानपुर की क्रान्तिकारी गतिविधियों को अपनी डायरी में लेखबद्घ करने +वाले अंग्रेजों के क्रीतदास वकील का नाम बताइये। +
उ. नानकचन्द। +174. कानपुर में क्रान्ति का शंखनाद किस तिथि को हुआ? +
उ. 4 जून 1857 रात्रि को। +175. 'हम अब आक्रमण करने वाले हैं, अत: आपको पूर्व सूचना दे रहे हैं।' 6 +जून 1857 को नाना साहब का यह पत्र किसे प्राप्त हुआ? +
उ. सर ओ. ह्वीलर को। +176. कानपुर की जिस गढ़ी में अंग्रेजों ने मोर्चेबन्दी कर रखी थी वहाँ, कितने +दिन तक घ्ोराबन्दी के साथ युद्घ चला? +
उ. 21 दिन। +177. कानपुर की गढ़ी से सहायता के लिए एक पत्र कबूतर के साथ लखनऊ +पहुँचाया गया जिसमें लिखा था - 'अविलम्ब सहायता प्रदान करो, शीघ्रता +करो, अन्यथा हमारी आशा त्याग दो' यह पत्र जिन तीन भाषाओं में लिखा +गया था, उनके नाम बताइये। +
उ. लैटिन, फ्रैंच और अंग्रेजी। +178. कानपुर की गढ़ी की अंग्रेजों के लिए महत्वपूर्ण इमारतों को स्वाहा करने +के लिए नवीन विस्फोटक अस्त्र का आविष्कारक कौन था? +
उ. काने करीम अली का पुत्र। +179. क्रान्ति के समय लूटपाट व अराजकता पर नियंत्रण के लिए नाना साहब ने +किस संस्था का गठन किया? +
उ. न्याय सभा। +180. कानपुर की गढ़ी के अंग्रेजों ने किस तिथि को आत्मसमर्पण कर दिया? +
उ. 23 जून 1857 को। +181. कानपुर की गढ़ी के समर्पण करने वाले अंग्रेजों को सकुशल प्रयाग भेजने +के लिए कितनी नौकाएँ तैयार करवाई गई? +
उ. चालीस। +182. कानपुर में आत्मसमर्पण करने वाले अंग्रेजों को प्रयाग भेजने के लिए +नौकाएँ किस घाट पर लगाई गईं? +
उ. सती चौरा घाट। +183. कानपुर में आत्मसमर्पण करने वाले अंग्रेज, सकुशल प्रयाग पहुँ‘ाने के +आश्वासन पर नौकाओं में बैठे, तात्या टोपे ने हाथ हिलाकर विदाई दी तभी +बिगुल बजा और नौकाएँ डुबो दी गईं। यह घटना किस तिथि की है? +
उ. 27 जून 1857 की। +184. कानपुर में 7 जून को एक हजार अंग्रेज थे। 30 जून तक उनमें से कितने +बचे थे? +
उ. 525 अंग्रेज बचे थे। +185. कानपुर विजय के बाद नाना साहब का रा…याभिषेक किस तिथि को +सम्पन्न हुआ? +
उ. 1 जुलाई 1857 को। +186. झाँसी में तैनात 12 वीं रेजीमेंट में क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन का +प्रमुख सूत्र कौन था? +
उ. लक्ष्मण राव। +187. झाँसी के दुर्ग पर चढ़ाई कर क्रान्तिकारियों ने विजय पताका फहराई। इस +घटना की तिथि बताइये। +
उ. 7 जून 1857 को। +188. 'झांसी के दुर्ग पर विद्रोहियों के आक्रमण का नेतृत्व करने वालों के नाम +बताइये'। +
उ. रिसालदार काले खां व तहसीलदार मुहम्मद हुसैन। +189. लखनऊ स्थित अंग्रेजों की सुरक्षा के लिए सर हेनरी लारेन्स ने किन दो +स्थानों का चयन किया? +
उ. म‘छी भवन, रेजीडेंसी रोड। +190. लखनऊ में क्रांति का विस्फोट किस तिथि को हुआ? +
उ. 30 मई 1857 को। +191. फैजाबाद के सिपाहियों ने दलीपसिंह के नेतृत्व में कारागृह पर आक्रमण +कर जिस क्रांतिकारी मौलवी को छुड़ाया, उनका नाम बताइये? +
उ. मौलवी अहमद शाह। +192. फैजाबाद की जेल से छूटने के बाद मौलवी ने सर्वप्रथम धन्यवाद का +सन्देश उस अंग्रेज अधिकारी के पास भेजा जिसने कारागार में हुक्का रखने +की अनुमति दी थी? +
उ. कर्नल लेनाक्स। +193. 9 जून 1857 को एक पत्र प्रकाशित कर अवध में किसके शासन की +पुनस्र्थापना की घोषणा की गई? +
उ. नवाब वाजिद अलीशाह। +194. अवध के जिन नरेशों ने अपनी शरण में आने वाले गोरों की प्राणरक्षा मात्र +ही नहीं की अपितु इनकी भली भांती आवभगत भी की ऐसे किसी एक +शरणदाता का नाम बताइये। +
उ. मानसिंह / बुलीसिंह / नजीम हुसैन खाँ। +195. 'इन्हें प्राणदान न दो, क्योंकि समय आने पर ये हमसे पुन: संघर्ष करने को +सिद्घ हो जायेंगे।' गोरों को शरण देने वालों से यह आग्रह किसने किया? +
उ. जनता ने। +196. 'हमने प्रजा के कल्याण की भावना से ही वाजिद अली को सिंहासन‘युत +किया है।' यह बात किसने कही थी? +
उ. लॉर्ड डलहौजी। +197. हेनरी लारेन्स के नेतृत्व में लखनऊ से चली सेना पर क्रांतिकारियों के +आक्रमण में 400 में से 150 गोरे मारे गये। यह युद्घ किस स्थान पर हुआ था? +
उ. चिनहट। +198. ग्वालियर के उस शासक का नाम बताइये जिसे जनता ने यह कहा- +'मातृभूमि को तुम मुक्त नहीं कराना चाहते तो तुम्हारे बिना ही, और यदि +समय आ जाए तो तुम्हारे विरोध को सहन करके भी हम अपने इस पावन +दायित्व का निर्वाह करेंगे।' +
उ. जयाजी शिन्दे। +199. 'हम अपने देश बांधवों के विरूद्घ हथियार उठाने को भी तैयार नहीं हैं।' +आगरा में क्रांतिकारियों से लडऩे के लिए भेजी किन रा…यों की सेनाओं ने +यह बात कही? +
उ. बितौली और भरतपुर। +200. भयभीत, अधीर, सन्तŒत अंग्रेजों ने हाउस ऑफ लॉर्डस में यह प्रश्न पूछा- +'क्या कानपुर के हत्याकांड के समाचार सही हैं?' यह प्रश्न किस तिथि को +पूछा गया था? +
उ. 14 अगस्त 1857 को। +प्रश्नोत्तरी २०१ से ३००. +201. '1857 के भारतीय स्वातंत्र्य समर में चार-पांच स्थानों में ही हुए हत्याकांडों +की क्रूरता पर आश्चर्य व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं' तो आश्चर्य +किस बात पर होना चाहिए? +
उ. हत्याकांडों की ये घटनाऐं इतनी कम क्यों हुई। +202. 'जिस अवध के सीने में अंग्रेजों ने अपनी खूनी कटार बडी गहराई तक +घोंप दी थी, उसी अवध के नागरिकों ने तितर-बितर होकर पलायन +करने वाले अंग्रेजों से नितांत ही उदारता का व्यवहार किया था।' यह +त‰य फारेस्ट द्वारा लिखित जिन दस्तावेजों में उपलब्ध है, उनका नाम +बताइये। +
उ. स्टेट पेपर्स। +203. नवाब को फांसी के तख्ते पर चढ़ाने से पूर्व उसके शरीर पर सूअर की +चर्बी का लेप करने की निर्ल”ा आज्ञा दी गई। यह नवाब कहां के थे? +
उ. फर्रुखाबाद। +204. 1857 में किसी को गाली देनी होती तो क्या कहते थे? +
उ. राजभक्त। +205. 'जो व्यक्ित गोवध करते मिल जाए, उसे तोप के गोले से उड़ा दिया जाए +या उसके हाथ पैर काट दिये जाएं।' हाथी पर बैठकर शहर में यह घोषणा +किसने करवायी थी? +
उ. बहादुरशाह जफर। +206. दिल्ली के परकोटे के एक द्वार के पास, यमुना नदि से चार मील की दूरी +तक फैली पहाड़ी,जिस पर अंग्रेजों ने मोर्चेबन्दी की थी, उसे अंग्रेजों ने क्या +नाम दिया? +
उ. रिज। +207. दिल्ली की क्रांतिकारी सेना का प्रधान सेनापति किसे नियुक्त किया गया? +
उ. बख्त खाँ को। +208. कानपुर पर आक्रमण करने आने वाली अंग्रेज सेना से युद्घ के लिए नाना +साहब ने किस नदी के तट पर मोर्चा लगाया? +
उ. पांडु नदी के। +209. जब अंग्रेजों ने फतेहपुर में आग लगा दी तो उसके प्रतिशोध में किस +बन्दीगृह को जलाने का निश्चय किया गया? +
उ. बीबी की कोठी। +210. कानपुर पर पुन: अंग्रेजों का अधिकार किस तिथि को हुआ? +
उ. 10 जुलाई 1857 को। +211. कानपुर पर आक्रमणकारी अंग्रेज सेना का प्रमुख कौन था? +
उ. जनरल हेवलॉक। +212. 'मुझे यह विदित है कि फिरंगी के रक्त का स्पर्श करने अथवा उसके दागों +को झाडू से धोने पर हिन्दू धार्मिक दृष्टि से पतित हो जाते हैं। किन्तु हमने +केवल इसलिए ऐसा नहीं किया, अपितु हम तो वध स्तम्भ पर लटकाने से +पूर्व उनकी सभी धार्मिक भावनाओं को पददलित करने के लिए ऐसा कर +रहे हैं, जिससे कि उनको मरने से पूर्व यह संतोष भी न मिल सके कि हम हिन्दू +रहते हुए ही प्राण दे रहे हैं।' यह स्वीकारोक्ित किस पुस्तक में उपलब्ध है? +
उ. रेड पेम्फलेट में। +213. हिन्दू मुसलमान अपनी धार्मिक वैर भावना को तिलांजलि दे चुके थे तो +चतुर फिरंगी ने कानपुर में 'छूत-अछूत' का नया विवाद खड़ा कर दिया। +यह कुटिल अंग्रेज अधिकारी कौन था? +
उ. नील। +214. कानपुर में छूत-अछूत का झगड़ा खड़ा करने के लिए कुटिल फिरंगी ने +किस सेना का गठन किया? +
उ. अछूत सेना। +215. 1857 के स्वातंत्र्य समर का एक मराठी ब्राह्मण प्रत्यक्षदर्शी था, उसका नाम +बताइये। +
उ. विष्णु भट्ट गोडसे। +216. 1857 के स्वातंत्र्य समर का आंखों देखा हाल एक मराठी ब्राह्मण ने जिस +पुस्तक में लिखा है, उसका नाम बताइये। +
उ. माँझा प्रवास। +217. 'हिन्दू धर्म और हिन्दू रा…य की स्थापनार्थ पुन: एक बार प्रयास हुआ है। +इसके करने में ईश्वर ने हमारे हाथों जो संकट आप लोगों को उठाने पडे हैं, +उनके लिए कृपा करके आप मुझे क्षमा करना।' कानपुर छोड़ते हुए जनता से +यह बात किसने कही? +
उ. श्रीमंत बाला साहब। +218. 1857 में मुसलमानों के बहावी नामक कट्टर पंथ का प्रधान केन्द्र कहां था? +
उ. पटना। +219. 1857 की क्रान्ति से भी 5 वर्ष पूर्व ही वहाबियों का एक विध्वंसक संगठन +विद्यमान था। इस त‰य को सिद्घ करने वाले अंग्रेज का नाम बताइये। +
उ. सर विलियम हन्टर। +220. 'जो परकीयों के चरणों का चुम्बन कर रहे हैं, गुरू गोविन्द सिंह के स“ो +सिख कदापि नहीं हो सकते' यह कहकर ग्रंथियों ने सिख सैनिकों को +गुरूद्वारे में प्रवेश नहीं करने दिया। यह गुरूद्वारा कौनसा था? +
उ. गुरूद्वारा पटना साहिब। +221. उस नेता का नाम बताइये जिसके निवास स्थान पर हुई क्रान्ति मंडल की +बैठक में पटना में विद्रोह का सम्पूर्ण कार्यक्रम निर्धारित किया गया? +
उ. पीर अली। +222. पटना में क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना बनाने की बैठक किस तिथि को हुई? +
उ. 3 जुलाई 1857 को। +223. पटना के प्रमुख क्रान्तिकारी नेता का व्यवसाय क्या था? +
उ. पुस्तक विक्रय। +224. 'मेरी मृत्यु के उपरान्त मेरे रक्त के प्रत्येक बिन्दु से सहस्रों वीर उठकर +खड़े होंगे और तुम्हारे रा…य को धूल में मिलाकर ही शान्ति प्राप्त करेंगे।' प्राण +दंड के समय यह साहसिक घोषणा करने वाले वीर का नाम बताइये। +
उ. पीर अली। +225. स्वरा…य के नेता वीर कुँवर सिंह कहाँ के शासक थे? +
उ. जगदीशपुर (शाहबाद जिला) के। +226. 1857 में वीर कुँवर सिंह की आयु कितनी थी? +
उ. 80 वर्ष। +227. दिल्ली में कुल कितने क्रान्ति सैनिक एकत्रित थे? +
उ. पचास हजार। +228. 'मेरी यह उत्कट अभिलाषा है कि अंग्रेजों की दासता की श्रंखला टूक- +टूक होते हुए देखूँ' यह हार्दिक इ‘छा प्रकट करने वाले कौन थे?, +
उ. बहादुर शाह जफर। +229. 'यदि आप सब शासनाधिपतिगण स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए किए जाने +वाले इस युद्घ में अपनी तलवारें हाथों में सम्भालकर आगे आने को तैयार हों +तो मैं स्वे‘छा और प्रसन्नता सहित अपने सम्पूर्ण अधिकार ऐसे किसी भी +रा…य मंडल को समर्पित कर दूँगा और ऐसा करने में मुझे आनन्द भी प्राप्त +होगा।' दिल्ली सम्राट द्वारा विभिन्न रा…यों को लिखे पत्रों का उद्घरण 'टू +नेटिव नेरेटिव्स' नामक जिस पुस्तक में मिलता है उसके लेखक का नाम +बताइये। +
उ. मेटकाफ। +230. अपनी छावनी के अहंकार व अनुशासनहीनता के कारण क्रान्ति सैनिक +साथ न लड़ सके और हम केन्द्रीय मोर्चा हार गए। यह केन्द्रीय मोर्चा कौनसा +था? +
उ. दिल्ली। +231. दिल्ली में अंग्रेजी सेना ने किस तिथि को प्रवेश किया? +
उ. 14 सितम्बर को। +232. अंग्रेजी सेना सर्वप्रथम किस मार्ग से दिल्ली में प्रविष्ट हुई? +
उ. कश्मीर बुर्ज की दरार से। +233. 'जब एक ही गली मेरे इतने वीर सैनिकों को निगल गई और दिल्ली पर +अधिकार कर लेने की मेरी आकांक्षा भी अतृप्त ही है, साथ ही सहस्रों +क्रान्तिकारी अभी भी युद्घ का आह्वान कर रहे हैं तो अब अपने सभी सैनिकों +को बलिदान का बकरा बनाकर चढ़ा देने की अपेक्षा तो पराजय और +अपयश का कलंक लगवाकर लौट जाना ही अधिक उचित है।' विलसन +किस गली की बात कर रहे हैं? +
उ. बर्न बुर्ज की। +234. 14 सितम्बर को दिल्ली में अंग्रेज सेना के कितने लोग मरे? +
उ. 66 अधिकारी और 1104 सैनिक। +235. क्रान्ति सैनिक दिल्ली में किस तिथि तक अंग्रेजों से निरन्तर लड़ते रहे? +
उ. 24 सितम्बर तक। +236. 'मैं यह समझता हूँ कि अब एक ही स्थान पर एकत्रित होकर युद्घ करने के +स्थान पर यदि हम बाहर निकलकर खुले प्रदेशों में शत्रु को थकाने में जुट +जाएँगे तो अन्तिम विजय हमारी ही होगी।' बहादुर शाह जफर को यह राय +किसने दी? +
उ. बख्त खाँ ने। +237. वार्धक्य से हताश, राजविलास से मतिमंद, पराजय से भयभीत बहादुर शाह +दिल्ली से बाहर जाकर संघर्ष जारी रखने का निर्णय न कर एक मकबरे में +छुप गया। यह मकबरा किसका था? +
उ. हुमायूँ का मकबरा। +238. अंग्रेजों के उस जासूस का नाम बताइये जिसने बहादुर शाह जफर को +आत्म समर्पण के लिए तैयार किया? +
उ. मिर्जा इलाहीबख्श। +239. 'शाहजादे तो अभी भी मकबरे में छुपे बैठे हैं।' यह सूचना देने वाले कौन +थे? +
उ. मिर्जा इलाहीबख्श और मुंशी रजब अली। +240. बहादुर शाह जफर के कितने पुत्रों को गोली मारी गई? +
उ. तीन। +241. बहादुर शाह जफर के पुत्रों को गोली मारने वाले अंग्रेज का नाम बताइये। +
उ. कैŒटन हडसन। +242. 'लूटमार करने में तो हमारी सेनाओं ने नादिर शाह को भी पीछे छोड़ +दिया।' यह स्वीकारोक्ति करने वाले लॉर्ड एल्फिन्सटन और जॉन लॉरेन्स की +पुस्तक का नाम बताइये। +
उ. लाइफ ऑफ लॉरेन्स। +243. दिल्ली ने अंग्रेजों के विरुद्घ कितने दिन तक अनवरत युद्घ किया? +
उ. 134 दिन। +244. दिल्ली की रक्षा में शहीद होने वाले क्रान्तिकारियों की अनुमानित संख्या +कितनी थी? +
उ. 5-6 हजार। +245. नवाब वाजिद अली शाह अंग्रेजों द्वारा किस स्थान पर कैद किए गए थे? +
उ. कलकत्ता। +246. नवाब वाजिद अली शाह की अनुपस्थिति में उनके जिस पुत्र को अवध +का नवाब बनाया गया, उसका नाम बताइये। +
उ. बर्जिस कादर। +247. बहादुर शाह जफर की वृद्घावस्था के कारण दिल्ली का वास्तविक शासन +किसके हाथ में था? +
उ. बेगम जीनत महल। +248. नवाब वाजिद अली शाह का पुत्र अल्पवयस्क होने के कारण शासन का +सम्पूर्ण भार उसकी माँ पर था। उसका नाम बताइये। +
उ. बेगम हजरत महल। +249. 28 जुलाई को लखनऊ के किस स्थान पर एकत्रित हुए अंग्रेजों पर आक्रमण +का निर्णय लिया गया? +
उ. लखनऊ रेजीडेंसी। +250. अचूक निशानेबाज लखनऊ के हब्शी हिंजड़े से आतंकित अंग्रेजों ने +उसका उल्लेख किस नाम से किया? +
उ. ऑथेल्लो। +251. अंग्रेजों ने अनेक राजनिष्ठ दूत लखनऊ से अन्य प्रदेशों में भेजे थे। किन्तु +उनमें से केवल एक वापस लौटने में सफल हुआ। उसका नाम बताइये। +
उ. अंगद। +252. हेवलॉक एक सप्ताह में क्रान्तिकारियों को गोमती तक तो क्या हटा पाता, +वह तो स्वयं ही स्थानबद्घ सा होकर रह गया। हेवलॉक कहाँ स्थानबद्घ होकर +रह गया? +
उ. गंगा तट पर। +253. 'उस दिन हेवलॉक की सेना की जब गिनती हुई तो उसे विदित हुआ कि +1500 के स्थान पर अब उसके केवल 850 सैनिक ही रह गए हैं।' यह +गणना अवध के किस युद्घ के बाद हुई थी? +
उ. बशीरगंज। +254. 'कम से कम हमें अवध प्रान्त के लोगों द्वारा किए गए संघर्ष को तो +स्वातंत्र्य संग्राम के रूप में ही मान्यता देनी पड़ेगी।' यह लिखने वाले +इतिहासकार का नाम बताइये। +
उ. अन्नेस। +255. लखनऊ पर आक्रमण करने वाली सेना का नेतृत्व हताश हेवलॉक से +छीनकर किसे दिया गया? +
उ. आउट्रम को। +256. 'लखनऊ का घ्ोरा तोडऩे हेतु आज तक जिस व्यक्ति ने महान शौर्य और +धैर्य का प्रदर्शन किया है और कष्ट सहन किए हैं, मुख्य सेनापति होते हुए भी +मैं वीर हेवलॉक को ही अपने पद का अधिकार समर्पित करता हूँ और मैं +स्वयं एक स्वयंसेवक के नाते उनके अधीन कार्य करूँगा।' आउट्रम ने 15 +सितम्बर को यह घोषणा किस स्थान पर की थी? +
उ. कानपुर। +257. 23 सितम्बर 1857 को लखनऊ के समीप किस स्थान पर हेवलॉक व +क्रान्तिकारी सेना में युद्घ प्रारम्भ हुआ? +
उ. आलम बाग। +258. लखनऊ की रेजीडेंसी पर कितने दिन अहर्निश संग्राम चला? +
उ. 87 दिन। +259. हेवलॉक के, लखनऊ रेजीडेंसी तक पहुँचने में, कितने सैनिक मारे गए? +
उ. 722 सैनिक। +260. हेवलॉक के सेना सहित लखनऊ में प्रवेश करते ही क्रान्तिकारियों ने +रेजीडेंसी को पुन: घ्ोर लिया। इस घटना की तिथि बताइये। +
उ. 25 सितम्बर 1857 को। +261. 'हेवलॉक हमारे लिए क्या लाया है, मुक्ति या सहायता?' यह व्यंग्योक्ति +लखनऊ रेजीडेंसी के अंग्रेजों ने कब की? +
उ. क्रान्तिकारियों द्वारा पुन: घ्िारने पर। +262. 13 अगस्त 1857 को अंग्रेजों का नया सेनापति कलकत्ता पहुँचा। उसका +नाम बताइये। +
उ. सर कॉलिन केम्पबेल। +263. कुँवर सिंह के सैनिकों ने काजवा नदी के तट पर अंग्रेज नौ सेना पर +छापामार आक्रमण कर उसके कर्नल को मार दिया। उस कर्नल का नाम +बताइये। +
उ. कर्नल पावेल। +264. कुछ क्षण के अन्तर से, अपनी गाड़ी पुन: मोड़ लेने के कारण, केम्पबेल +कुँवर सिंह के सैनिकों की नजर से बच गया। यह घटना किस स्थान की है? +
उ. शेर घाटी की। +265. लखनऊ रेजीडेंसी में आत्मरक्षा की क्या व्यवस्था है, यह जानने के लिए +एक गोरा अपने मुँह पर काला रंग पोतकर, पहरेदारों को धोखा दे वहाँ प्रवेश +पाने में सफल हो गया। उस गोरे का नाम क्या था? +
उ. केव्हेना। +266. केम्पबेल ने लखनऊ पर आक्रमण की कौनसी तिथि तय की? +
उ. 14 नवम्बर 1857 +267. सिकन्दर बाग पर 16 नवम्बर को अंग्रेजों के हमले का भीषण प्रतिकार +क्रान्तिकारियों ने किया। इस युद्घ में कितने क्रान्तिकारी शहीद हुए? +
उ. 2000 क्रान्तिकारी शहीद हुए। +268. लखनऊ रेजीडेंसी तक पहुँचने में अंग्रेजों को कितने दिन संघर्ष करना +पड़ा? +
उ. 10 दिन (14 नवम्बर से 23 नवम्बर तक) +269. कानपुर के बाद तात्या टोपे ने क्रान्ति का केन्द्र जिस कालपी को बनाया +वह किस नदी के किनारे है? +
उ. यमुना। +270. ग्वालियर के सैनिकों को साथ लेकर तात्या टोपे कालपी किस तिथि को +पहुँचे? +
उ. 9 नवम्बर 1857 को। +271. 'मु_ी भर अंग्रेजों को भी तीर के समान एशियाई सैनिकों के विशाल समूह +पर टूट पडऩा चाहिए और विजय श्री का वरण करना ही चाहिए।' इस +ब्रिटिश युद्घ सिद्घान्त के अनुसार एक अंग्रेज सेनापति ने तात्या टोपे पर +आक्रमण कर दिया पर ऐसी मार पड़ी कि वह कानपुर ही जाकर रुका। उस +अंग्रेज सेनापति का नाम क्या था? +
उ. विंडहम। +272. तात्या टोपे के आक्रमण से अंग्रेज सेना तम्बू तक छोड़कर भाग गई। +कानपुर में यह घटना किस तिथि को घटित हुई? +
उ. 26 नवम्बर 1857 को। +273. 6-9 दिसम्बर तक सतत् संघर्ष के बाद कानपुर पर अंग्रेजों का पुन: +अधिकार हो सका। तात्या टोपे से निर्णायक युद्घ किस स्थान पर हुआ? +
उ. शिवराजपुर। +274. पूरा नगर खाली था किन्तु एक भवन से होती गोलीबारी ने पूरी अंग्रेज सेना +को तब तक रोके रखा जब तक अंग्रेजों ने भवन को बारुदी सुरंग से न उड़ा +दिया। इटावा की इस घटना में कितने वीर शहीद हुए? +
उ. 25 वीर शहीद हुए। +275. इटावा के जिस मकान से क्रान्तिकारी प्राणान्त तक गोलीबारी करते रहे उसे +सुरंग से उड़ाने वाले इंजीनियर्स के नाम क्या थे? +
उ. स्केचली व बोशीर्क। +276. इटावा के एक मकान से कुछ क्रान्तिकारियों ने गोलीबारी कर अंग्रेज सेना +को कितने घंटे तक रोके रखा। +
उ. तीन घंटे। +277. घाघरा नदी के पार उस स्थान का नाम बताइये जहाँ केवल 34 क्रान्तिकारियों +का दस्ता था पर अन्तिम क्रान्तिकारी के शहीद होने तक उन्होंने गोरों की +सेना को एक कदम भी आगे नहीं रखने दिया? +
उ. अंबरपुर। +278. अगर हमारी नवीन मालगुजारी पद्घति से नाराज होकर राजाओं ने विद्रोह +किया जो चंदा, वैंजा और गोंड के राजाओं ने ऐसा क्यों किया? यह कथन +किसका है? +
उ. लॉर्ड कैनिंग (गवर्नर जनरल) का। +279. कारागार से मुक्त करने के बाद जब उससे युद्घ की स्थिति के सम्बन्ध में +प्रश्न किया गया तो उसने उत्तर दिया कि 'स्वर्ण अवसर तो हम हाथ से खो +बैठे हैं, अब तो मुझे सर्वत्र ढिलाई ही प्रतीत हो रही है, फिर भी कर्त्तव्यपालन +मात्र के लिए तो संग्राम करना ही होगा।' यह कथन किसका है? +
उ. मौलवी अहमदशाह का। +280. 16 जनवरी 1858 को प्रात: 10 बजे से सूर्यास्त तक अंग्रेज सेना से जूझने +वाले अवध के वीर का नाम बताइये। +
उ. विदेही हनुमान। +281. 14 मार्च 1858 को फिरंगी सेना लखनऊ के राजमहल में प्रविष्ट हो गई। +मॉलेसन ने इस विजय का Ÿोय किसे दिया है? +
उ. सिख सैनिक व दसवीं पलटन को। +282. कॉलिन की सेनाओं ने अवध में प्रवेश करते ही कत्लेआम शुरु कर दिया। +अंगेजों ने विद्रोही किसे माना? +
उ. 5 से 80 वर्ष की आयु तक के लोगों को। +283. अवध में अंग्रेजों के अत्याचार से क्षुब्ध क्रान्ति सैनिकों ने बेगम से अंग्रेज +बंदी सौंपने को कहा। बेगम ने किनको मारने से मनाकर उनकी प्राण रक्षा +की? +
उ. अंग्रेज स्त्रियों की। +284. लॉर्ड कैनिंग ने ढिंढोरा पीटा 'जो भी इस विद्रोह में शामिल होगा उसकी +सम्पूर्ण सम्पžिा, भूमि आदि जब्त कर ली जाएगी और जो इसमें भाग नहीं +लेगा, उसे माफ कर दिया जाएगा।' इस घोषणा का परिणाम क्या हुआ? +
उ. एक भी क्रान्तिकारी ने आत्मसमर्पण नहीं किया। +285. 'प्रतीत होता है कि यह सैनिकों का साधारण सा विद्रोह नहीं, यह विŒलव +है, क्रान्ति का विस्फोट है। यही कारण है इसके दमन में हमें थोड़ा ही यश +मिला पाता है और प्रतीत हो रहा है कि यह शीघ्र दबने वाला भी नहीं है।' +इस उद्घरण के लेखक का नाम बताइये। +
उ. डॉक्टर डफ। +286. 'ऐसा कहीं भी हमें अनुभव नहीं हो पाता कि हम शत्रुओं का समूलो‘छेद +कर देने में सफल हो गए हैं और न ही हमारी विजयों से लोगों में भय उत्पन्न +होता दिखाई पड़ता है।' यह उद्घरण जिस पुस्तक का है उसका नाम बताइये। +
उ. इण्िडयन रिबेलियन। +287. कुँवर सिंह किस युद्घ पद्घति के तज्ञ थे? +
उ. वृक युद्घ पद्घति (छापामार) +288. इलाहाबाद और कलकत्ता का सम्बन्ध तोडऩे के लिए कुँवर सिंह ने कहाँ +आक्रमण किया? +
उ. बनारस। +289. जनरल लुगार्ड को आजमगढ़ में नजरबंद अंग्रेजों को छुड़ाने जाने से रोकने +के लिए कुँवर सिंह ने एक टुकड़ी किस नदी के पुल पर मोर्चेबंदी के लिए +भेजी? +
उ. तानू नदी। +290. कुँवर सिंह ने आजमगढ़ रक्षा के लिए सेना तैनाती का दिखावाकर वंचिका +देते हुए जगदीशपुर मुक्त कराने के लिए हमला कर दिया। कुँवर सिंह की +इस योजना की मॅलेसन ने क्या कहकर प्रशंसा की है? +
उ. सैन्य संचालन की अद्भुत दूरदर्शिता। +291. वर्ष भर अंग्रेजों ने कुँवर सिंह के विरुद्घ जो किया वह स्वत: नष्ट हो जाएगा +तथा अंग्रेजों को अपना सम्पूर्ण कार्यक्रम फिर से प्रारम्भ करना पड़ेगा। इस +योजना से कुँवर सिंह ने कहाँ पहुँचने की सफल व्यूह रचना की थी? +
उ. जगदीशपुर के जंगल में। +292. प्रदेश भर में यह अफवाह फैला दी कि कुँवर सिंह हाथियों से गंगा पार +करेगा। गंगा पार करने का स्थान कहाँ बताया गया? +
उ. बलिया। +293. कुँवर सिंह ने अंग्रेजों को चकमा देकर रातों-रात किस घाट से गंगा पार +होने की योजना क्रियान्िवत की? +
उ. शिवपुर घाट। +294. अन्तिम नौका गंगा पार जाने को थी कि अंग्रेज सैन्य अधिकारी को, जो +सात मील दूर मोर्चा लगाए था, भनक लग गई। उस अंग्रेज सैन्य अधिकारी +का नाम क्या था? +
उ. डगलस। +295. अन्तिम नौका में कुँवर सिंह सवार थे। नौका मझधार में थी कि उनको +गोली लगी। गोली कौनसे हाथ में लगी थी? +
उ. बायें हाथ की कलाई पर। +296. हाथ में गोली लगी, जहर फैलने का डर था अत: कुँवर सिंह ने क्या +किया? +
उ. कुहनी तक का हाथ काट दिया। +297. कुँवर सिंह ने जगदीशपुर की सुरक्षा का जिम्मा अपने छोटे भाई को सौंपा, +उनका नाम क्या था? +
उ. अमर सिंह। +298. 23 अप्रेल 1858 को चार सौ गोरे सैनिक व दो तोपें लेकर लेग्रांद ने +जगदीशपुर पर हमला कर दिया। हमले का परिणाम क्या हुआ? +
उ. सेनापति लेंग्राद सहित 110 गोरे सैनिक मारे गए। +299. अंग्रेजी में लिखे सरकारी कागजों को नष्ट करने पर उतारू क्रान्तिकारियों +से यह बात किसने कही - 'अंग्रेजों के भारत से चले जाने पर, जिन +कागजातों के आधार पर लोगों के वंश, वारिसदारी के अधिकार तथा लोगों +के आपसी लेन-देन का प्रमाण हमें मिलेगा, इन कागजों को जलाकर जब +यह सब आप नष्ट कर देंगे जो आपको नहीं करना चाहिए'? +
उ. कुँवर सिंह ने। +300. शरीर में जहर फैल जाने के कारण कुँवर सिंह को वीरगति प्राप्त हुई। वह +तिथि कौनसी है? +
उ. 26 अप्रेल 1858 को। +प्रश्नोत्तरी ३०१ से ४००. +301. जंगल काटकर सड़क व चौकियाँ बना लीं। ब्रिगेडियर डगलस ने सात +तरफ से जगदीशपुर पर आक्रमण की योजना की किन्तु वीर अंग्रेजी चक्रव्यूह +भेदकर सेना सहित निकल गया। उस वीर का नाम बताइये। +
उ. वीर अमरसिंह। +302. वीर कुँवर सिंह के परिवार की स्त्रियों ने जब बचाव का कोई मार्ग नहीं +देखा तो स्वयं को तोपों के मुँह से बाँधकर बलिदान दे दिया। इस बारुदी +जौहर में कितनी ललनाओं ने बलिदान दिया? +
उ. 150 ललनाओं ने। +303. 'प्रतिपक्षी की प्रबल सेना से खुले मैदान में सामना मत करो। सैन्य शक्ति, +अनुशासन और तोपें आदि युद्घ सामग्री में वह तुमसे …यादा परिपूर्ण हैं। अब +उसकी योजनाओं, गतिविधियों पर निगरानी रखो; नदी के घाटों पर चौकसी +रखो, शत्रु की डाक काटो, रसद रोको और चौकियाँ तोड़ दो। उसके पड़ाव +के इर्द-गिर्द मंडराते रहो, फिरंगी को चैन मत लेने दो।' रूहेलखंड के +क्रान्तिकारियों द्वारा प्रसारित इस घोषणा को उद्धृत करते हुए अपनी डायरी +में यह किसने लिखा कि 'इस घोषणा पत्र ने दूरदर्शिता तथा चातुर्य का +परिचय दिया है'? +
उ. डब्ल्यू. एच. रसेल ने। +304. लखनऊ के निकट रूइया के जमींदार का नाम बताइये जिसने वॉलपोल +की फिरंगी सेना को परास्त किया? +
उ. नरपत सिंह। +305. रूइया के किले पर आक्रमण के समय मरे उस अंग्रेज सैन्य अधिकारी का +नाम बताइये जिसके लिए कहा गया कि 'उस साहसी वीर की मृत्यु से +अंग्रेजी राष्ट्र को इतना धक्का लगा कि जो सैंकड़ों सैनिकों के मारे जाने से भी +नहीं लगता।' +
उ. होप ग्रंट। +306. केवल पचास हजार के पुरस्कार के लिए मौलवी अहमद शाह का सिर +काटने वाले का नाम क्या था? +
उ. पोवेन राजा जगन्नाथ का भाई। +307. मौलवी अहमद शाह का सिर अंग्रेजों ने द्वार पर लटकवा दिया। यह +कौनसा स्थान था? +
उ. शाहजहाँपुर। +308. अब तक की खोज में ज्ञात उन लोगों की संख्या बताइये जिन्हें 1857 में +काला पानी की सजा हुई? +
उ. 800 संख्या। +309. 1857 में जिन लोगों को अंडमान निर्वासित किया गया उनमें दक्षिण भारत +के कितने लोग थे? +
उ. 250 से अधिक। +310. 'साउथ इंडिया इन 1857 : वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस' के लेखक का नाम +बताइये। +
उ. श्री वासुदेव दत्तात्र्ोय दिवेकर। +311. बंगाल, मुम्बई व मद्रास के 1857-58 के कोर्ट मार्शल अभियोगों की +संख्या क्रमश: बताइये। +
उ. 1954, 1213 तथा 1044 अभियोग। +312. भारत सरकार द्वारा अनुमोदित सुरेन्द्रनाथ सेन की रचना में सम्पूर्ण मुम्बई +प्रान्त का 1857 से सम्बन्िधत वर्णन कितने वाक्यों में है? +
उ. पाँच। +313. सुरेन्द्रनाथ सेन 1857 के सम्बन्ध में लिखते हैं - 'यह विलक्षण है कि +सतारा में विŒलव के उठने की आवाज मराठा सरदार से नहीं उठी बल्कि +एक हिन्दुस्थानी चपरासी से उठी।' यहाँ उन्होंने चपरासी के रूप में किनका +उल्लेख किया है? +
उ. क्रान्ति के योजनाकार रंगो बापू जी गुप्ते का। +314. 1856 में जिस सतारा पुलिस प्रमुख ने ब्रिटिश सत्ता नाश के लिए रोहिलों +की सेना लाने की योजना की, उसका नाम क्या है? +
उ. अन्ताजी राजे शिर्के। +315. 12 जून 1857 को सतारा छावनी में विद्रोह कराने के आरोप में पकड़े गए +उस व्यक्ति का नाम बताइये जो स्थानीय न्यायाधीश की अदालत में +संदेशवाहक का कार्य करता था। +
उ. मानसिंह परदेशी। +316. सतारा छावनी में विद्रोह फैलाने के आरोप में पकड़े गए राजपूत युवक को +जनसाधारण के समक्ष किस तिथि को फाँसी दी गई? +
उ. 20 जून 1857 को। +317. रंगो बापू जी गुप्ते सतारा के किस अपदस्थ शासक के वकील के रूप में +इंग्लैंड गए थे? +
उ. प्रताप सिंह। +318. रंगो बापू जी गुप्ते सतारा के वकील के रूप में कितने समय तक इंग्लैंड में +रहे? +
उ. 1840 से 1853 तक (14 वर्ष)। +319. रंगो बापू जी गुप्ते ने अपने दो भतीजों के नेतृत्व में 500 मावलों की एक +फौज 1857 में दिल्ली भेजी। उनके भतीजों के नाम बताइये। +
उ. यशवन्तराव देशपांडे और वामनराव देशपांडे। +320. रंगो बापू जी गुप्ते द्वारा बनाई गई क्रान्ति की योजना का पता कब लगा? +तिथि बताइये। +
उ. 11 जून 1857 को। +321. रंगो बापू जी की क्रान्ति योजना का पता लगने पर उन्हें गिरफ्तार कर कहाँ +भेज दिया गया? +
उ. ग्वालियर। +322. रंगो बापू जी ने जेल से भागने की योजना की और वे उसमें सफल हुए तथा +फिर कभी पकड़े नहीं जा सके। उनके जेल से पलायन की तिथि बताइये। +
उ. 5 जुलाई 1857 को। +323. 12 जून 1857 को हैदराबाद अश्वारोही सैन्य दल ने विद्रोह कर दिया। यह +पलटन किस स्थान पर तैनात थी? +
उ. औरंगाबाद। +324. वह तिथि बताइये जब हैदराबाद की जनता ने स्वस्फूर्त ब्रिटिश प्रतिनिधि +निवास पर हमला कर दिया। +
उ. 17 जुलाई 1857 के दिन। +325. 18 अप्रेल 1858 में नाना साहब पेशवा की ओर से भेजे गए एक पत्र में +क्रान्ति संगठन के लिए किन दो लोगों को अधिकृत किया था? +
उ. नारखेड़ के रत्नाकर पागे और हैदराबाद के सोनाजी पंत। +326. नाना साहब के व्यक्तिगत पत्र दाढ़ी बनाने वाले शीशे के पृष्ठ भाग में +छिपाकर गंतव्य तक ले जाने वाले व्यक्ति का नाम बताइये। +
उ. रंगाराव रत्नाकर पांगे। +327. डेविडसन ने एक राजद्रोहात्मक पत्र पकड़कर मद्रास सरकार को अग्रेसित +किया था। इस पत्र के लेखक का नाम क्या था? +
उ. झनुलबदीन। +328. मैसूर में 1857 की क्रान्ति के प्रमुख नेता का नाम बताइये। +
उ. कृष्ण शास्त्री मल्हार। +329. उस राजा का नाम क्या था जिसके नेतृत्व में आंध्र की पहाड़ी जाति के +लोगों ने 1845-1848 तक अंग्रेजों के विरुद्घ युद्घ किया? +
उ. चिन्न भूपति। +330. 28 फरवरी 1857 को विजयनगरम् की स्थानीय पलटन ने कूच की आज्ञा +मानने से मना कर दिया। उन्हें कहाँ कूच करने की आज्ञा मिली थी? +
उ. कर्नूल। +331. जुलाई 1857 में विजयनगरम्, अलीपुर, बंगलौर आदि के बाजारों में विद्रोह +हुआ। इस विद्रोह को क्या नाम दिया गया है? +
उ. अन्न विद्रोह। +332. चिन्न भूपति और उसके भतीजे सन्यासी भूपति के नेतृत्व में 1858 में +किस क्षेत्र में ब्रिटिश विरोधी क्रान्ति हुई? +
उ. गोलकुंडा। +333. गंजम के सवारा ग्राम के प्रधान का नाम बताइये जिसे 1857 की क्रान्ति में +फाँसी की सजा हुई? +
उ. राधाकृष्ण डंडसेन। +334. तमिलनाडु के तिरुनेवेली क्षेत्र के पालिगरों के प्रमुख नेता का नाम बताइये +जो अठारहवीं सदी के अन्त तक अंग्रेजों से लड़ता रहा। +
उ. पांडयम् कोट्टावोम्मन। +335. तमिलनाड़ के तिरुनेवेली क्षेत्र के स्वातंत्र्य वीर को अठारहवीं सदी के +अन्त तक अंग्रेजों के विरुद्घ सतत् संघर्ष के कारण सरेआम फाँसी दी गई। +उसकी फाँसी की तिथि बताइये। +
उ. 16 अक्टूबर 1799 को। +336. जुलाई 1852 में मद्रास में एक सभा का गठन हुआ, उसका नाम क्या था? +
उ. मद्रास नेटिव एसोसिएशन। +337. दिसम्बर 1858 में मद्रास के किस स्थान पर झगड़े में ईसाईयों ने 10 +हिन्दुओं की हत्या कर दी व 19 को घायल कर दिया? +
उ. तिरुनेवल्ली। +338. ईसाईयों द्वारा मद्रास में हिन्दुओं के हत्याकांड के विरुद्घ स्मरण पत्र देने के +लिए मद्रास नेटिव एसोसिएशन ने आम सभा किस तिथि को बुलाई? +
उ. अप्रेल 1859 में। +339. मद्रास के चिंगलपेट क्षेत्र में विद्रोह का नेतृत्व करने वाले दो नेता कौन थे? +
उ. अन्ना गिरि और कृष्णा गिरि। +340. एक सरकारी परिपत्र में कहा गया कि फकीर, वैरागी तथा पंडों और +संदिग्ध चरित्र वालों के जिलों में प्रवेश पर सूक्ष्मता से निरीक्षण हो। मद्रास +की ब्रिटिश सरकार का यह परिपत्र किस तिथि को जारी हुआ था? +
उ. 10 जुलाई 1857 को। +341. 26 जनवरी 1852 को दीपू जी रांो के नेतृत्व में स्वतंत्रता आन्दोलन कहाँ +प्रारम्भ हुआ? +
उ. गोआ। +342. दीपू जी रांो के साथ पुर्तगाली सरकार को संधि के लिए बाध्य होना पड़ा। +इस संधि से ग्राम पंचायतों के सभी अधिकार पुनर्जीवित हो गए, ईसाई मत +के निर्देश का क्रियान्वयन वापस लिया गया। यह संधि किस तिथि को हुई? +
उ. 2 जून 1855 को। +343. पुर्तगाली सरकार द्वारा संधि का पालन न करने पर दीपू जी रांो ने अपना +संघर्ष किस सन् में पुन: प्रारम्भ कर दिया? +
उ. 1856 में। +344. दीपू जी रांो की गिरफ्तारी के बाद नवम्बर 1858 में उन्हें कहाँ निष्कासित +कर दिया गया? +
उ. इंडोनेशिया। +345. दीपू जी रांो का वंश मूलत: किस प्रान्त से सम्बद्घ था? +
उ. राजस्थान। +346. पुंो में 1857 के किस माह में अंग्रेजों के विरुद्घ एक विŒलव का प्रयत्न +हुआ किन्तु वह असफल हो गया? +
उ. जून मास में। +347. अगस्त 1857 में खुफिया पुलिस की सूचना के अनुसार ब्रिटिश सरकार के +विरुद्घ चर्चा का पुंो शहर में प्रमुख केन्द्र कौनसा था? +
उ. सार्वजनिक वाचनालय। +348. सितम्बर 1857 में पेशवा सरकार की घोषणा के अनुसार ब्रिटिश गवर्नर को +समाप्त करने वाले को कितना पारितोषिक मिलता? +
उ. पाँच हजार। +349. 'हमें व्यक्तिगत पत्र के आधार पर ज्ञात हुआ है कि दक्षिण में नाना साहब +आयेंगे और दशहरा के दिन पेशवा सरकार की गद्दी सम्भालेंगे।' अगस्त +1857 में यह समाचार प्रकाशित करने वाले सरकारी लिपिक कौन थे? +
उ. बालकृष्ण चिमन जी। +350. अगस्त 1857 में नाना साहब पेशवा के दक्षिण में आने का समाचार +सरकारी लिपिक ने किसमें दिया? +
उ. ज्ञान प्रकाश पुंो के अंक में। +351. बलवन्तराव बाबाजी भोंसले, शनिवार पेठ, पुंो का 22 मार्च 1858 का +खुफिया पत्र किसे सम्बोधित था? +
उ. दादा साहब भोंसले, कोल्हापुर को। +352. बलवन्तराव बाबाजी भोंसले के 22 मार्च 1858 के खुफिया पत्र में प्रमुख +बात क्या थी? +
उ. यहाँ पलटनें पूर्णत: हमारे साथ हैं और शपथ ले चुकी हैं। +353. बलवन्तराव बाबाजी भोंसले के 22 मार्च 1858 के खुफिया पत्र में धनाभाव +का जिक्र कर एक व्यक्ति का नाम लिखा है जो 25,000 रुपये दे रहा है। उस +व्यक्ति का नाम क्या लिखा है? +
उ. नग्गा रामचन्द्र मारवाही। +354. जून 1857 और उसके आगे उत्तरी कर्नाटक में क्रान्ति संगठन करने वाले +जमखिंडी के राजा का नाम बताइये। +
उ. रामचन्द्र राव (उपाख्य अŒपा साहब पटवर्धन) +355. जमखिंडी के राजा के प्रमुख सहयोगी जो जमखिंडी का किलेदार था, +उसका नाम क्या था? +
उ. छोटू सिंह। +356. जमखिंडी के एक कुएँ में क्रान्ति के लिए युद्घ सामग्री का विशाल +भंडार जमा किया गया था। वह कुआँ किस नाम से प्रसिद्घ था? +
उ. अŒपा साहब बान्ची विहिर। +357. 4 नवम्बर 1857 को बीजापुर के जिस व्यक्ति के घर से सत्तरह मन बारुद +पकड़ा गया उसका नाम क्या था? +
उ. ठोंधरी। +358. क्रान्तिकारी गतिविधियों के लिए होने वाली बैठकों में भाग लेने वाले +बीजापुर की बाईसवीं पलटन के हवालदार का नाम क्या था? +
उ. शेख अली। +359. बेलगाँव विद्रोह के कारण जिसे 14 अगस्त 1857 को फाँसी पर चढ़ाया +गया उस वीर का नाम बताइये। +
उ. महीपाल सिंह। +360. 1857 के शेख पीर शाह और कृष्णामाचारी को आंध्र प्रदेश के किस क्षेत्र में +विद्रोह भड़काने के आरोप में पकड़ा गया था? +
उ. कड़Œपा। +361. नेलौर में विŒलव की सम्भावना समाप्त करने के लिए बड़ी संख्या में +संदिग्ध सैनिक व नागरिकों को गिरफ्तार कर लिया गया। यह घटना कब +की है? +
उ. दिसम्बर 1857 की। +362. अगस्त 1857 में तमिलनाड़ के किस क्षेत्र में नरसिम्हादास, दामोदरदास +तथा निर्गुणदास नामक साधुओं को क्रान्ति के संदेह में पकड़ा गया था? +
उ. उत्तरी अर्काट। +363. अगस्त 1857 में तमिलनाड़ में पकड़े गए साधु वेश में क्रान्तिकारी +नरसिम्हादास, दामोदरदास तथा निर्गुणदास मूलत: कहाँ के रहने वाले थे? +
उ. बंगाल के। +364. नवम्बर 1858 में तमिलनाडु के किस स्थान पर सैनिक विद्रोह में केŒटन +हार्ट और जेलर स्टफर्ड मारे गए? +
उ. वेल्लोर। +365. 1 अगस्त 1857 को एक विशाल भीड़ अय्यम प्रमलाचारी की घोषणा पर +एकत्रित हो गई कि भारतीय सैनिक आयेंगे तथा ब्रिटिश ध्वज का पतन हो +जाएगा। यह घटना तमिलनाडु में किस स्थान की है? +
उ. पुतनूल गली, सेलम। +366. कोयम्बटूर के निकट उस औद्योगिक नगर का नाम बताइये जहाँ 1857 में +एक मठम् के स्वामी ब्रिटिश विरोधी संगठन के लिए उपदेश देते थे। +
उ. भवानी। +367. 1857 में कोयम्बटूर के पास एक औद्योगिक नगरी में ब्रिटिश विरोधी +संगठन के लिए उपदेश देने वाले मठम् के स्वामी का नाम क्या था? +
उ. मुलबागल स्वामी। +368. सितम्बर 1857 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्घ भड़काने के आरोप में तेलीचरी +की गली से गिरफ्तार क्रान्तिकारी का नाम बताइये। +
उ. बानाजी कुदरत कुँजी मायाँ। +369. ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के कारण 1857 में कुनी मोई नामक व्यक्ति +को कहाँ से पकड़ा गया था? +
उ. मालाबार से। +370. 17 जुलाई 1857 को हैदराबाद छावनी आवास भवन पर आक्रमण के लिए +उसके निकट के दो भवन मोर्चेबंदी के हेतु लिए थे, वे जिन साहूकारों के थे +उनके नाम बताइये। +
उ. अव्वन साहब और जयगोपाल दास। +371. राजामुन्दरी जिले के करतूर निवासी उस व्यक्ति का नाम क्या था जो +ब्रिटिश संस्थानों पर आक्रमण का प्रमुख था? +
उ. करकोन्दा सुब्बाराव रेड्डी। +372. 10 जुलाई 1857 को सिविल लाइन्स के खुले मैदान में आजादी का झंडा +फहराया गया जिस पर हिन्दुस्थानी में लिखा था - 'सभी अंग्रेजों को खत्म +कर दो।' यह घटना किस स्थान की है? +
उ. मछलीपट्टम। +373. अंग्रेजों की रैय्यतवारी प्रथा, कठोर कराधान व वसूली के निर्मम तरीकों के +विरोध में 1859 में भारत के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट लॉर्ड स्टेनले को ज्ञापन देने +वाली संस्था का नाम क्या था? +
उ. मद्रास नेटिव एसोसिएशन। +374. जुलाई 1857 में मद्रास में चिंगलपुट के निकट स्थित दो मन्िदर-क्रान्ति +केन्द्र थे। ये मन्िदर किन स्थानों पर स्थित थे? +
उ. मनिपकम और पल्लवरम। +375. 27 जुलाई 1857 की रात्रि को चिंगलपुट के दक्षिण में स्थित एक तालाब के +निकट लगभग 600 क्रान्तिकारी एकत्रित हुए। उस तालाब का नाम क्या था? +
उ. वमगोलुम। +376. 27 जुलाई 1857 की रात्रि को चिंगलपुट में एकत्रित लगभग 600 क्रान्तिकारियों +ने प्रथम कार्य क्या किया? +
उ. टेलीग्राफ व्यवस्था ध्वस्त करना। +377. 2 फरवरी 1858 की रात्रि को फोंद सावन्त के पुत्र राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में +सम्मिलित होने के लिए गोवा से निकलकर आने के बाद किसके नेतृत्व में +क्रान्ति कार्य में लगे? +
उ. बाबा देसाई। +378. तीन फडणवीस भाई करतार, सूपा और बिदी के जंगलों में क्रान्तिकारियों +का नेतृत्व कर रहे थे। तीनों के नाम बताइये। +
उ. राघोवा, चिन्तोबा व शान्ताराम फडणवीस। +379. 31 जुलाई 1857 को कोल्हापुर की 27 वीं स्थानीय पैदल सेना में क्रान्ति के +प्रमुख का नाम क्या था? +
उ. रामजी शिरसाट। +380. कोल्हापुर की 27 वीं पलटन में 31 जुलाई 1857 से सम्बन्िधत कितने +लोगों का कोर्ट मार्शल हुआ? +
उ. 165 लोगों का। +381. 31 जुलाई 1857 को कोल्हापुर की 27 वीं पलटन के विद्रोह में आरोपियों +के सम्बन्ध में यह किसने लिखा - 'सभी ने अपने रहस्य बताने से मना कर +दिया और धैर्य के साथ मृत्यु का सामना किया'? +
उ. मेजर जनरल जैकब। +382. 23 नवम्बर 1857 को मुम्बई के आयुक्त को लिखे अपने पत्र में यह किसने +लिखा कि 'संक्षेप में स्पष्टत: कोई भी दूसरा व्यक्ति असंतोष और राजद्रोह +फैलाने में उससे अधिक उपयुक्त संदेशवाहक नहीं हो सकता'? +
उ. रत्नागिरि के मजिस्टे्रट ने। +383. 23 नवम्बर 1857 को मुम्बई के आयुक्त को एक मजिस्टे्रट ने लिखा - +'संक्षेप में स्पष्टत: कोई भी दूसरा व्यक्ति असंतोष और राजद्रोह फैलाने में +उससे अधिक उपयुक्त संदेशवाहक नहीं हो सकता।' इस पत्र में किस +व्यक्ति का उल्लेख है? +
उ. रामाचार्य पुराणिक का। +384. 21 नवम्बर 1857 में कोल्हापुर से लिखे एक पत्र में यह किसने लिखा - +'पूरे रा…य में अंग्रेजी रा…य के प्रति बड़ी घृणा की भावना है और किसी +विपरीत अवस्था में यह सक्रिय संघर्ष का रूप ले सकता है'? +
उ. मेजर जनरल ल-ग्राड जैकब ने। +385. नाना साहब पेशवा पुन: शीघ्र आयेंगे, 1857 में इस विश्वास को बनाए +रखने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले मुम्बई से प्रकाशित दो अखबारों के नाम +बताइये। +
उ. वर्तमान सार और वृत्त सार। +386. 31 जुलाई 1857 की फौजी क्रान्ति और 6-7 दिसम्बर 1857 की कोल्हापुर +जन क्रान्ति के प्रमुख प्रेरक कौन थे? +
उ. चीमा साहब (बुवा साहब) +387. अंग्रेजों ने चीमा साहब को गिरफ्तार कर किस स्थान पर स्थानबद्घ रखा? +
उ. कराची। +388. चीमा साहब की मृत्यु किस तिथि को हुई? +
उ. 15 मई 1869 को। +389. चीमा साहब का स्मारक किस स्थान पर है? +
उ. कराची में लिहारी नदी के तट पर। +390. 'जब कोल्हापुर केम्प ने विद्रोह किया था आप ने कुछ भी नहीं किया, +लेकिन अब आप ऐसी व्यवस्था करें कि पुन: विद्रोह हो। आप महान व्यक्ित +हैं, इसे आप हृदयस्थ कर लें।' नाना साहब की प्रेरणा से 13 सितम्बर 1857 +को यह पत्र कोल्हापुर के राजा को किसने लिखा? +
उ. जगन्नाथ वासुदेव थत्ते। +391. सितम्बर 1857 में लोगों को डराने-धमकाने के लिए मुम्बई पुलिस आयुक्त +कार्यालय के समक्ष बड़ी सूली खड़ी करवाने वाले अंग्रेज अधिकारी का +नाम क्या था? +
उ. फोरजेन्ट। +392. मुम्बई की भारतीय पलटन का विद्रोह की योजना पर कौन से दो स्थानों से +पत्र व्यवहार चल रहा था? +
उ. कोल्हापुर तथा अजमेर। +393. 'ऐसा आभास होता है कि तीन महीनों से भी अधिक समय से पलटन के +देशी व्यक्ित मुम्बई के किसी अज्ञात भाग में, सेना निवास के निकट विद्रोही +बैठकों में जाने लगे हैं।' यह पत्र किस तिथि को लिखा गया था? +
उ. 31 अक्टूबर 1857 को। +394. 'ऐसा आभास होता है कि तीन महीनों से भी अधिक समय से पलटन के +देशी व्यक्ित मुम्बई के किसी अज्ञात भाग में, सेना निवास के निकट विद्रोही +बैठकों में जाने लगे हैं।' यह पत्र लिखने वाले अंग्रेज अधिकारी का नाम +बताइये। +
उ. ब्रिगेडियर जे.एम.श्रोट। +395. मुम्बई स्थित जिस सिपाही के घर पर क्रांति योजना हेतु नियमित गोपनीय +बैठकें होती थीं, उसका नाम क्या था? +
उ. गंगा प्रसाद। +396. मुम्बई के भारतीय फौजियों ने अक्टूबर 1857 में जिस दिन अंग्रेजों के +विरुद्घ क्रान्ति का निश्चय किया, उस दिन कौनसा त्यौहार था? +
उ. दीपावली का। +397. मुम्बई में अक्टूबर में तय क्रान्ति योजना का सुराग अंग्रेजों को लग गया। +उन्होंने क्रान्ति योजना प्रमुखों को गिरफ्तार कर उनमें से दो प्रमुख सैयद हुसैन +व मंगल को सरेआम तोप से उड़ा दिया। यह दिन कौनसा था? +
उ. दीपावली का (15 अक्टूबर 1857) +398. मुम्बई क्रान्ति योजना में पकड़े गए सैयद हुसैन व मंगल को अंग्रेजों ने +ऐसŒलेनेड मैदान में तोप से उड़ाया था। इस मैदान का वर्तमान नाम क्या है? +
उ. आजाद मैदान। +399. मुम्बई क्रान्ति योजना में पकड़े गए सैयद हुसैन व मंगल को अंग्रेजों ने +ऐसŒलेनेड मैदान में तोप से उड़ाया था। इसके प्रत्यक्षदर्शी सर डी. ई. वा‘छा +ने इस घटना का अपनी जिस आत्मकथा में विवरण दिया है, उस पुस्तक का +नाम बताइये। +
उ. मुम्बई की रेत की सीपें। +400. ब्रिटिश शासन ने निशस्त्रीकरण कानून किस तिथि को पारित किया? +
उ. 11 सितम्बर 1857 को। +प्रश्नोत्तरी ४०१ से ५००. +401. कर्नाटक में ब्रिटिश सरकार के निशस्त्रीकरण कानून का सशस्त्र विरोध +कहाँ हुआ? +
उ. हलगली ग्राम में। +402. ब्रिटिश सरकार के निशस्त्रीकरण कानून के विरुद्घ सशस्त्र विरोध खड़ा +करने वाले प्रमुख व्यक्ति का नाम क्या था? +
उ. बाबाजी निम्बालकर। +403. ब्रिटिश सरकार के निशस्त्रीकरण कानून का विरोध करने वाले लोग +प्रमुखत: किस समुदाय के थे? +
उ. बेदर। +404. 27 नवम्बर 1857 को बीजापुर की घुड़सवार सेना के आक्रमण को रोकने +वाला वीर भीमंणा किस सुरक्षा चौकी पर तैनात था? +
उ. पदगट्टी। +405. बीजापुर की घुड़सवार सेना से भीमंणा एक हाथ कटने के बाद भी +अकेला लड़ता रहा। एक भुजा से लडऩे के कारण उसका कौनसा नाम +प्रसिद्घ हो गया? +
उ. मंडगै भीमंणा। +406. काजी सिंह और भीमा नाइक किस क्षेत्र के स्वातंत्र्य प्रेमी भीलों के नायक थे? +
उ. खानदेश। +407. 'विभिन्न दलों के इतनी बड़ी संख्या में एकत्रित होकर लूट मचाने से यह +सिद्घ होता है कि सारी भील आबादी विद्रोही हो गई है।' 2 नवम्बर 1857 को +अपने पत्र में यह बात लिखने वाले जिला मजिस्टे्रट का नाम क्या था? +
उ. एस. मेन्सफील्ड। +408. 11 अप्रेल 1858 को कौनसे युद्घ में काजी सिंह का एकमात्र पुत्र मारा गया? +
उ. अम्बापानी का युद्घ। +409. 11 अप्रेल 1858 को युद्घ में मारे गए काजी सिंह के एकमात्र पुत्र का नाम +क्या था? +
उ. पोलाद सिंह। +410. 1830 से अंग्रेजों के विरुद्घ सतत् संघर्षरत दक्षिण नासिक व उत्तर अहमदनगर +की दो पहाड़ी जातियाँ कौनसी थीं? +
उ. कोल व भील। +411. महाराष्ट्र का कौनसा वर्तमान जिला खानदेश कहलाता था? +
उ. जलगाँव। +412. काजी सिंह ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन में किस पहाड़ी क्षेत्र में सक्रिय थे? +
उ. सतपुड़ा। +413. नासिक-अहमदनगर क्षेत्र की सतमाला पहाडिय़ों में 1857 की क्रान्ति के +नेतृत्वकर्ता का नाम क्या था? +
उ. भागोजी नाइक। +414. नासिक जिले की पेठ रियासत के राजा का नाम बताइये जिन्हें नाना साहब +से पत्र व्यवहार के कारण 4 जनवरी 1858 को अंग्रेजों द्वारा फाँसी दी गई? +
उ. भगवन्त राव। +415. नासिक के निकट किस जगह स्थित ब्रिटिश कचहरी और खजाने पर 5 +दिसम्बर 1857 की रात में भीलों और ठाकुरों के दल का आक्रमण हुआ? +
उ. त्र्यम्बकेश्वर। +416. 5 दिसम्बर 1857 को नासिक के निकट ब्रिटिश खजाने व कचहरी पर +आक्रमणकारी भीलों व ठाकुरों के दल का प्रमुख कौन था? +
उ. वासुदेव भगवन्त जोगलेकर। +417. अजन्ता क्षेत्र की उस जागीर का नाम बताइये जिसके प्रमुख गोविन्द +काशीराज देशपांडे ने क्रान्ति हेतु भीलों के संगठन में सक्रिय सहयोग दिया। +
उ. वैजापुर। +418. 1857 में दक्षिण भारत में क्रान्ति का प्रमुख केन्द्र शोरापुर आजकल कहाँ +स्थित है? +
उ. जिला गुलबर्गा (कर्नाटक) +419. धारवाड़ जिले के पुलिस पटेल के घर से 1 अक्टूबर 1857 को ब्रिटिश +अधिकारियों द्वारा विद्रोह से सम्बन्िधत दो पत्र पकड़े गए। इन्हें लिखने वाले +आनन्द राव कहाँ के थे? +
उ. शोरापुर के। +420. दक्षिण भारत के प्रमुख क्रान्ति केन्द्र शोरापुर के 1857 के तत्कालीन राजा +का नाम क्या था? +
उ. वैंकटŒपा नाईक। +421. 'नहीं कोई सामान्य से सामान्य 'वेदूर' भी बन्दी बनकर जीना नहीं चाहेगा +- क्या राजा होकर मैं ऐसा करूँगा? जब वे मुझे तोप से बाँध देंगे तो भी मैं +नहीं थर्राऊँगा, मुझे फाँसी पर मत चढ़ाने देना। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है +कि मुझे डाकू की तरह फाँसी पर लटकाया जाए।' शोरापुर के राजा ने अपने +बाल्यकाल के अभिभावक जिस अंग्रेज से यह बात कही उसका नाम +बताइये। +
उ. मीडोल टेलर। +422. शोरापुर का राजा जो ब्रिटिश कैद में रहना या फाँसी पर चढऩा नहीं चाहता +था, मौका पाकर लेफ्टिनेंट पिक्टर की रिवॉल्वर से स्वयं को गोली मार ली। +यह घटना किस तिथि की है? +
उ. 11 मई 1858 की। +423. धारवाड़ जिले के नरगुन्द रा…य के प्रमुख का नाम बताइये। +
उ. भास्कर राव उपाख्य बाबा साहब भावे। +424. ब्रिटिश सरकार के निशस्त्रीकरण अभियान के तहत 7 मई 1858 को +नरगुन्द की सभी तोपें, बारुद और शोरे के भंडार कहाँ पहुँचा दिए गए? +
उ. धारवाड़। +425. नरगुन्द के शासक ने स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग के लिए किस रा…य के +शासक को पत्र में लिखा कि 'अपमान से मृत्यु अधिक Ÿोयस्कर है'? +
उ. रामदुर्ग। +426. नरगुन्द पर आक्रमण के लिए सेना के साथ मैनसन चला। सुरेबान में डेरा +डाले मैनसन पर जब नरगुन्द के शासक ने आक्रमण किया तो मैनसन कहाँ +छिप गया? +
उ. मारुति मन्िदर में। +427. नरगुन्द की सेना के जिस व्यक्ति ने 29 मई 1858 को सुरेबान में पराजित +मैनसन का सिर काटा, उसका नाम बताइये। +
उ. विष्णु हिरेकोप (विष्णु कृष्ण कुलकर्णी)। +428. नरगुन्द के शासक को दक्षिणी मराठा शासकों में सबसे बुद्घिमान समझा +जाता था। उसके व्यक्तिगत संग्रह में संस्कृत के कितने ग्रन्थ थे? +
उ. 4000 ग्रंथ। +429. नरगुन्द के शासक का व्यक्तिगत पुस्तकालय अंग्रेजों ने कब नष्ट कर +दिया? +
उ. 1-2 जून 1858 के आक्रमण में। +430. नरगुन्द के शासक की माता यमुना बाई तथा पत्नी सावित्री बाई ने अंग्रेजों +के अपमान से बचने के लिए साँगला के समीप जिस नदी में जल समाधि ले +ली उसका नाम बताइये। +
उ. मलप्रेमा। +431. भीमराव मुंडर्गी ने 1857 में उत्तरी कर्नाटक की किन दो नदियों के बीच +के क्षेत्र में अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के लिए क्रान्ति की योजना बनाई? +
उ. कृष्णा और तुंगभद्रा। +432. भीमराव मुंडर्गी ने जन क्रान्ति की तारीख 27 मई 1858 निश्चित की थी, +पर बिना तैयारी के उससे पूर्व ही सशस्त्र संघर्ष किस तारीख को प्रारम्भ हो +गया? +
उ. 24 मई 1858 को। +433. उस गाँव का नाम बताइये जहाँ भीमराव मुंडर्गी के सहयोगी कंचन गौड़ा +के किलेबंद मकान से ब्रिटिश दल को युद्घ सामग्री का भंडार मिला। +
उ. हम्मिगी। +434. भीमराव मुंडर्गी ने ब्रिटिश रक्षा दल पर आक्रमण कर जब्त युद्घ सामग्री +तथा साथी कंचन गौड़ा को छुड़ा लिया। इस घटना की तिथि क्या थी? +
उ. 24 मई 1858 को। +435. भीमराव मुंडर्गी ने कोŒपल के किले को किस तिथि को जीता? +
उ. 30 मई 1858 को। +436. भीमराव मुंडर्गी द्वारा जीता गया कोŒपल का किला वर्तमान में कहाँ स्थित +है? +
उ. बेलारी जिला (कर्नाटक) +437. हैदराबाद का ब्रिटिश प्रतिनिधि 15 मार्च 1859 को निजाम के दरबार में +ब्रिटिश गवर्नर जनरल की ओर से धन्यवाद पत्र लेकर उपस्थित हुआ। +कार्यक्रम के बाद टहलते हुए प्रतिनिधि पर एक पठान ने कारबाइन से +हमला कर दिया। यह ब्रिटिश प्रतिनिधि कौन था? +
उ. कर्नल सी. डेविडसन। +438. सतारा के उन अपदस्थ राजा का नाम बताइये जो साधु बन गए तथा +जिन्होंने 1859 में बीड़ क्षेत्र में क्रान्ति की योजना को क्रियान्िवत किया। +
उ. बालाजी गोसावी। +439. बीड़ के उस व्यक्ति का नाम बताइये जिसने अपना मकान 2000 रुपये में +गिरवी रखकर प्राप्त पैसों से अंग्रेजों के विरुद्घ फौज खड़ी की। +
उ. तात्या मुदगल। +440. मार्च 1862 में निजाम की रियासत में ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के लिए +आए नाना साहब पेशवा के भतीजे का क्या नाम था? +
उ. राव साहब पेशवा। +441. निजाम के रा…य में अंग्रेजों के विरुद्घ एक साथ विभिन्न स्थानों पर जन +आन्दोलन की योजना भेद खुलने से विफल हो गई। इसके आरोपियों पर +अभियोग किस कांड के नाम से प्रसिद्घ है? +
उ. बेगम बाजार कांड। +442. सतारा के छत्रपति शाहू के भांजे रामराव ने 1867 में बीदर जिले की किस +गढ़ी को जीतकर भगवा ध्वज फहराया? +
उ. अष्ठी गढ़ी। +443. कर्नाटक के भीमराव मुंडर्गी के सामान में नाना साहब पेशवा द्वारा दक्षिणी +भारत के लिए 1858 में जारी घोषणा पत्र की कितनी प्रतियाँ मिली? +
उ. बारह। +444. नरगुन्द किले के उस द्वार का नाम बताइये जिस पर सी. जे. मैनसन का +सिर लटकाया गया था। +
उ. केम्पगसी (लाल फाटक) +445. 'विश्वसनीय सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि पुंो के समीप तीन संस्थानों की +वार्षिक सहायता, जिनके नाम त्र्यम्बकेश्वर, परशुराम तथा पासन हैं, ईस्ट +इंडिया कम्पनी की सरकार के द्वारा समाप्त कर दी गई है।' 21 दिसम्बर +1857 को यह समाचार पुंो के किस समाचार पत्र में छपा था? +
उ. ज्ञान प्रकाश। +446. '... मुन्नी बाई ने नित्य प्रति की पूजा के लिए धूप बत्ती जलाकर देवी और +देवताओं से प्रार्थना की- वर्तमान शासन समाप्त हो जाए और नाना साहब +विजयी हों...' यह किस अभियोग से सम्बन्िधत प्रपत्र का अंश है? +
उ. कोयम्बटूर अभियोग। +447. 1857 की क्रान्ति के लिए दंिडत अंडमान स्थित व्यक्तियों में अन्तिम +जीवित व्यक्ति का नाम बताइये जिसे 1907 में मुक्त किया गया था। +
उ. मुसाई सिंह। +448. भारतीय समाज को बाँटने वाले तीनों कारणों का 1857 में अतिक्रमण हो +गया। ये तीन बाँटने वाले कारण क्या थे? +
उ. मजहब, जाति और वर्ग। +449. 1857 पर सबसे पहली पुस्तक जॉन केयी ने लिखी। उसका नाम क्या है? +
उ. 'ए हिस्टरी ऑफ द सिपॉय वॉर इन इंडिया'। +450. जॉन केयी के आकस्मिक निधन के बाद जॉर्ज मालेसन ने 1857 पर जो +अगले खंड प्रकाशित किए उनका नाम क्या रखा? +
उ. 'हिस्टरी ऑफ इंिडयन म्यूटिनी'। +451. जॉन केयी के ही कार्य को आगे बढ़ाने वाले जॉर्ज मालेसन ने पुस्तक के +शीर्षक में क्या मूलभूत परिवर्तन कर दिया? +
उ. केयी ने जिसे 'वॉर' कहा, मालेसन ने उसे 'म्यूटिनी' बना दिया। +452. न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में छपे अपने लेखों में किसने स्पष्ट लिखा कि 1857 +भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम था? +
उ. कार्ल माक्र्स ने। +453. वीर सावरकर द्वारा 1857 पर लिखित पुस्तक का मराठी शीर्षक क्या था? +
उ. 1857 ‘या स्वातंत्र्य समरांचा इतिहास। +454. 'यह सत्य है कि ब्रिटिश साम्रा…य पर कभी सूर्य अस्त नहीं होता, लेकिन +यह भी सत्य है कि उसके साम्रा…य में खून की नदियाँ कभी नहीं सूखती' +यह कथन जिस लंदनवासी प्रसिद्घ लेखक का है, उनका नाम लिखिये। +
उ. अर्नेस्ट जोंस। +455. दिल्ली में 1857 की घटनाओं पर 'दस्तंबू' नामक डायरी के लेखक का +नाम बताइये। +
उ. मिर्जा गालिब। +456. '1857 के स्वाधीनता संग्राम का हिन्दी साहित्य पर प्रभाव' इस शोध ग्रन्थ +के लेखक का नाम बताइये। +
उ. डॉ. भगवानदास माहौर। +457. ब्रिटिश संसद में सरकारी स्तर पर भारत में ईसाई मत का प्रचार करने का +कानून किस सन् में बना? +
उ. 1813 ई. में। +458. 'भारत पर हमारे अधिकार का अन्तिम उद्देश्य देश को ईसाई बनाना है।' +यह वाक्यांश किस अंग्रेज अधिकारी की डायरी का है? +
उ. मेजर एडवर्ड। +459. अंग्रेजों ने एक कानून बनाया कि गोद लिए ब“ो को पैतृक सम्पžिा में +अधिकार नहीं होगा। पर इसके लागू न होने का क्या प्रावधान था? +
उ. ईसाई बनने पर। +460. 1857 के क्रान्ति यज्ञ में कितने लोगों की आहुति हुई? +
उ. लगभग तीन लाख। +461. अंग्रेजों की कुल सेना में कितने प्रतिशत भारतीय थे? +
उ. 84 प्रतिशत। +462. भारत में अंग्रेजों की कुल सेना कितनी थी? +
उ. 2,83,000 अंग्रेज सैनिक। +463. दिल्ली पर स्वतंत्रता सेनानियों का कब्जा होने के बाद भागने वाले ईस्ट +इंडिया कम्पनी के अधिकारियों में पंिडत जवाहरलाल नेहरु के दादा भी +थे। उनका नाम क्या है? +
उ. पंिडत गंगाधर नेहरु। +464. 1857 के सभी मुस्लिम नेताओं ने अपने लेखों, भाषणों, घोषणाओं में भारत +को क्या सम्बोधन दिया है? +
उ. मादरे वतन। +465. 1857 के स्वातंत्र्य समर के समय अवध प्रान्त के अमीर अली और बाबा +रामचरण दास के मध्य क्या समझौता हुआ? +
उ. अयोध्या में राम मन्िदर निर्माण का। +466. अयोध्या के बाबा रामचरण दास व अमीर अली को अंग्रेजों ने फाँसी पर +लटका दिया। उनकी फाँसी की तिथि बताइये। +
उ. 18 मार्च 1858 के दिन। +467. पंजाब की तत्कालीन प्रशासकीय रिपोर्टों के अनुसार 1857 के स्वतंत्रता +संग्राम के दौरान कितने लोगों को फाँसी दी गई व हत्या की गई? +
उ. फाँसी - 386 तथा हत्या - 2000 की गई। +468. मंगल पांडे को फाँसी लगने से कुछ दिन पहले चित्तौडग़ढ़ के एक +चित्रकार उनसे जेल में मिले और उनका चित्र बनाया था। उस चित्रकार का +नाम क्या है? +
उ. प्रेम जी। +469. जन साधारण से संवाद स्थापित करने के लिए अजीमुल्ला खाँ द्वारा निकाले +गए समाचार पत्र का नाम क्या था? +
उ. पयामे आजादी। +470. अजीमुल्ला खाँ को कितनी भाषाओं का ज्ञान था? +
उ. छ: (अंग्रेजी, फ्रैंच, अरबी, फारसी, हिन्दी, संस्कृत)। +471. रूस के तत्कालीन जार ने अंग्रेजों के विरुद्घ भारतीय स्वातंत्र्य योद्घाओं की +सहायता का वचन अजीमुल्ला खाँ को दिया था। किन्तु मार्च 1855 में उनका +निधन होने से सहायता नहीं मिली। रूस के उस जार का नाम क्या है? +
उ. जार निकोलस। +472. 'वस्तुत: इस गीत में उन सभी आक्षेपों का करारा उत्तर है जो 1857 के +स्वतंत्रता संग्राम को कुछ धर्मान्ध सिपाहियों का निरा गदर या सामन्ती +प्रतिक्रियावादियों की एक प्रतिक्रान्ति का प्रयास प्रतिपादित करने का प्रयास +कर रहे थे।' इस गीत के लेखक कौन थे? +
उ. अजीमुल्ला खाँ। +473. 1857 के स्वातंत्र्य समर के समय लिखा गया झंडा गीत या प्रयाण गीत +सर्वप्रथम किसमें प्रकाशित हुआ? +
उ. पयामे आजादी नामक पत्र में। +474. जानिमी कावा किसे कहते हैं? +
उ. छापामार या वृक युद्घ पद्घति को। +475. तात्या टोपे का 'टोपे' नाम किस कारण से जुड़ा? +
उ. पेशवा बाजीराव (द्वितीय) द्वारा भेंट रत्नजडि़त टोपी के कारण। +476. तात्या टोपे अंग्रेजों की प्रचंड शक्ति से किस अवधि तक सतत् संघर्ष +करते रहे? +
उ. जून 1858 से अप्रेल 1859 तक (दस माह)। +477. ग्वालियर के जयाजीराव सिंधिया ने तात्या टोपे पर आक्रमण के लिए जो +सेना भेजी, उसका परिणाम क्या हुआ? +
उ. सारी सेना तात्या टोपे के साथ हो गई। +478. मानसिंह की चतुराई से अंग्रेजों ने किसे तात्या टोपे समझकर बन्दी बना +लिया? +
उ. नारायण राव भागवत को। +479. अंग्रेज सेना को उलझाकर लक्ष्मीबाई को झाँसी से निकालने में सहायता के +लिए महारानी का वेश बनाकर प्राणान्त तक लडऩे वाली वीरांगना का नाम +बताइये। +
उ. झलकारी बाई। +480. लक्ष्मीबाई को रातोंरात झाँसी से कालपी पहुँचाकर घोड़े ने दम तोड़ दिया। +घोड़े की पीठ पर रानी ने एक रात में कुल कितना सफर किया था? +
उ. 102 मील। +481. महारानी लक्ष्मीबाई की सेना की महिला तोपची का नाम बताइये। +
उ. जूही। +482. उस नाले का नाम बताइये जिसे पार करते हुए महारानी लक्ष्मीबाई का नया +घोड़ा अड़ गया और उसी समय अंग्रेज सैनिक ने पीछे से वार कर महारानी +के मस्तक का दायाँ भाग काट दिया। +
उ. स्वर्ण रेखा नाला। +483. महारानी लक्ष्मीबाई का अन्तिम संस्कार किस स्थान पर किया गया? +
उ. बाबा गंगादास की कुटिया पर। +484. महारानी लक्ष्मीबाई के साथ ही उनकी एक प्रिय सहेली का अन्तिम +संस्कार किया गया। सहेली का नाम बताइये। +
उ. मुंदर। +485. महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस बताइये। +
उ. 18 जून 1858 का दिन। +486. महारानी लक्ष्मीबाई के पास अन्तिम समय पर कौन दो लोग थे? +
उ. रघुनाथ सिंह व रामचन्द्र राव देशमुख। +487. महारानी लक्ष्मीबाई की बलिदान के समय आयु कितने वर्ष थी? +
उ. 23 वर्ष। +488. 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी' इस प्रसिद्घ कविता को +जिसने लिखा उसका नाम बताइये। +
उ. सुभद्राकुमारी चौहान। +489. उस व्यक्ति का नाम बताइये जिसे वीर सावरकर ने स्वातंत्र्य समर के समय +का राष्ट्रीय संत कहा है। +
उ. मौलवी अहमदशाह। +490. पूरे रुहेलखंड में स्वातंत्र्य समर के लिए गुप्त संगठन बनाने वाले व्यक्ति +का नाम बताइये। +
उ. खान बहादुर खान। +491. वयोवृद्घ कुँवर सिंह लगातार कितने माह तक युद्घ के मैदान में रहे? +
उ. नौ माह। +492. बहादुर शाह जफर को कैद करके किस जगह भेजा गया था? +
उ. रंगून। +493. बहादुर शाह जफर की मृत्यु कब हुई? +
उ. 7 नवम्बर 1862 को। +494. 'गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग +हिन्दुस्थान की।' बहादुर शाह जफर ने किसके व्यंग्य बाणों के प्रत्युत्तर में +यह कविता कही। +
उ. मेजर हडसन। +495. नाना साहब पेशवा की उस छोटी सी पुत्री का नाम बताइये जिसे अंग्रेजों ने +जिन्दा जला दिया। +
उ. मैना। +496. रामगढ़ की उस रानी का नाम बताइये जिसने अंग्रेज सेनापति वाडिंगटन +को खैर नामक स्थान पर परास्त किया। +
उ. रानी अवन्ती बाई। +497. गोंडा की लक्ष्मीबाई के नाम से प्रसिद्घ वीरांगना कौन है? +
उ. तुलसीपुर की रानी ईश्वरी कुमारी। +498. जिसने अकेले लड़ते हुए घंटों अंग्रेजी सेना को लखनऊ के सिकन्दर बाग +में प्रवेश नहीं करने दिया उस वीर माता का नाम बताइये। +
उ. ऊदा देवी। +499. राजस्थान में अंग्रेजों की कितनी सैनिक छावनियाँ थीं? +
उ. छ: (नसीराबाद, नीमच, ब्यावर, देवली, एरिनपुरा तथा खैरवाड़ा) +500. राजस्थान में क्रान्ति का विस्फोट किस तिथि को हुआ? +
उ. 28 मई 1857 को। +प्रश्नोत्तरी ५०१ से ६००. +501. राजस्थान में क्रान्ति का प्रारम्भ किस छावनी से हुआ? +
उ. नसीराबाद। +502. राजस्थान में क्रान्ति का आरम्भ करने वाली सेना की कौनसी पलटन थी? +
उ. 15 वीं नेटिव इन्फेन्ट्री। +503. राजस्थान में क्रान्ति का आरम्भ करने वाले सैनिकों का नेतृत्वकर्ता कौन था? +
उ. बख्तावर सिंह। +504. नीमच छावनी में सैनिकों ने किस तिथि को अंग्रेजों के विरुद्घ शस्त्र उठा +लिए? +
उ. 3 जून 1857 को। +505. नीमच के क्रान्तिकारियों ने अपना कमांडर किसे नियुक्त किया था? +
उ. सूबेदार गुरेसराम को। +506. नीमच से आने वाले सैनिकों का मेवाड़ के एक ठिकाने के नरेश ने स्वागत +व सहयोग किया। उस ठिकाने का नाम बताइये। +
उ. शाहपुरा। +507. कोटा में मौजूद भारतीय सैनिकों तथा जनता में आजादी की प्रबल अग्िन +प्र……वलित करने वाले देशभक्तों के दो मुखियाओं के नाम बताइये। +
उ. लाला जयदयाल और मेहराब खान। +508. 15 अक्टूबर 1857 को कोटा रा…य की दो पलटनों के सभी सैनिकों ने जिस +अंग्रेज मेजर को घ्ोरकर मार दिया, उसका नाम बताइये। +
उ. मेजर बर्टन। +509. 15 अक्टूबर 1857 को कोटा रा…य की जिन दो पलटनों ने क्रान्ति की, +उनके नाम लिखिये। +
उ. नारायण पलटन तथा भवानी पलटन। +510. 17 सितम्बर 1860 को कोटा एजेंसी के बंगले के पास उसी स्थान पर दो +लोगों को फाँसी दी गई जिस जगह मेजर बर्टन का वध हुआ था। फाँसी के +फँदे को चूमने वाले उन दो वीरों के नाम बताइये। +
उ. लाला जयदयाल तथा मेहराब खान। +511. जोधपुर रा…य प्रतिवर्ष अंग्रेजों को कितना धन देता था? +
उ. सवा लाख रुपया। +512. जोधपुर रा…य के खर्च पर अंग्रेजों ने एरिनपुरा छावनी में एक सेना रखी थी। +उस सेना का नाम क्या था? +
उ. जोधपुर लीजन। +513. नसीराबाद के क्रान्तिकारी सनिकों को दबाने के लिए भेजी गई जोधपुर की +सेना ने क्रान्तिकारियों के विरुद्घ लडऩे से मना कर दिया। इस सेना के प्रमुख +का नाम क्या था? +
उ. कुशलराज सिंघवी। +514. अगस्त 1857 में एरिनपुरा छावनी में सैनिकों की एक टुकड़ी को रोवा +ठाकुर के विरुद्घ अनादरा भेजा गया था। इस टुकड़ी का नायक कौन था? +
उ. हवलदार गोजन सिंह। +515. रोवा ठाकुर के विरुद्घ अनादरा भेजी गई एरिनपुरा छावनी की सैनिक +टुकड़ी ने सौंपा गया कार्य करने की बजाय फिरंगियों पर हमला कर क्रान्ति +का शंखनाद कर दिया। फिरंगियों पर यह आक्रमण किस स्थान पर हुआ +था? +
उ. आबू पर्वत (माउंट आबू) +516. एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने किस तिथि को फिरंगियों पर आक्रमण +किया था? +
उ. 21 अगस्त 1857 को। +517. एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने अपना मुखिया किसे बनाया? +
उ. मेहराब सिंह को। +518. 1857 में क्रान्ति का प्रतीक बना 'आउवा' राजस्थान के किस जिले में है? +
उ. पाली। +519. 'आउवा' के क्रान्तिकारी ठाकुर का नाम क्या था? +
उ. ठाकुर कुशाल सिंह। +520. अंग्रेजों के विरुद्घ आउवा में एकत्रित फौजों में लगभग कितने ठिकानों की +फौजें थीं? +
उ. 10 (आसोप, गूलर, आलनियावास, लाम्बिया, बन्तावास, रूदावास, सलूम्बर, +रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द) +521. आउवा की क्रान्ति को दबाने के लिए गई जोधपुर की विशाल सेना के +प्रमुख का नाम क्या था? +
उ. अनाड़ सिंह। +522. आउवा पर आक्रमण के लिए कूच करने वाली जोधपुर की सेना के साथ +अंग्रेज अपनी सेना के साथ आ मिला। इस अंग्रेज सेनानायक का नाम क्या था? +
उ. हीथकोट। +523. 8 सितम्बर 1857 को स्वरा…य के सैनिकों ने जोधपुर की सेना पर आक्रमण +कर दिया। यह युद्घ किस स्थान पर हुआ? +
उ. बिथौड़ा। +524. 8 सितम्बर 1857 को जोधपुर सेना व स्वरा…य सैनिकों के मध्य युद्घ का +परिणाम क्या रहा? +
उ. अनाड़ सिंह मारा गया, हीथकोट भाग गया। +525. 18 सितम्बर को जॉर्ज लॉरेंस ब्यावर से विशाल सेना लेकर आउवा की +तरफ चला। स्वातंत्र्य सैनिकों से इसका युद्घ किस स्थान पर हुआ? +
उ. चेलावास। +526. जॉर्ज लॉरेंस की युद्घ में सहायता के लिए जोधपुर का पॉलिटिकल एजेन्ट +भी था। क्रान्तिकारियों ने उसका सिर काटकर शव आउवा किले के दरवाजे +पर उल्टा टांग दिया। उस पॉलिटिकल एजेन्ट का नाम बताइये। +
उ. मॉक मेसन। +527. दिल्ली में क्रान्तिकारियों की स्थिति कमजोर होने का समाचार आउवा +पहुँचने पर सबने मंत्रणा कर क्रान्ति सेना का बड़ा हिस्सा दिल्ली के लिए +रवाना कर दिया। इस फौज की कमान किसे सौंपी गई? +
उ. आसोप ठाकुर शिवनाथ सिंह को। +528. फौज का बड़ा हिस्सा दिल्ली भेजने तथा किलेदार के विश्वासघात के +कारण अन्तत: आउवा की पराजय हो गई। इस युद्घ की तिथि बताइये। +
उ. 20 जनवरी 1858 के दिन। +529. आउवा की पराजय के बाद कर्नल होम्स किले की एक प्रसिद्घ देवी +प्रतिमा उठा लाया। यह प्रतिमा किस देवी की है? +
उ. महाकाली की। +530. कर्नल होम्स द्वारा आउवा से लाई गई देवी प्रतिमा इस समय कहाँ है? +
उ. राजकीय संग्रहालय, अजमेर। +531. मासिक 'चाँद' का नवम्बर 1928 के अंक का नाम बताइये जिसे प्रकाशन +पूर्व प्रतिबंधित कर दिया गया? +
उ. फाँसी अंक। +532. मासिक 'चाँद' के नवम्बर 1928 के अंक में 1857 पर एक लेख किस +शीर्षक से छपा था? +
उ. सन् 57 के कुछ संस्मरण। +533. 'ये लोग विद्रोही न थे, बल्कि नगर निवासी थे, जिन्हें हमारी दयालुता और +क्षमाशीलता पर विश्वास था। मुझे खुशी है उनका भ्रम दूर हो गया।' बोम्बे +टेलीग्राफ में एक पत्र में दिल्ली के कत्लेआम और लूट को जायज ठहराने +वाले अंग्रेज अधिकारी का नाम बताइये। +
उ. मोंटगोमरी मार्टिन। +534. 'जिस कविता को लिखने के कारण हम लोगों को मृत्युदंड दिया जा रहा +है, हम लोग मृत्यु से पूर्व वह कविता सुनाना चाहते हैं।' गढ़ मंडला के उन +पिता-पुत्र कवियों के नाम बताइये। +
उ. राजा शंकर शाह तथा रघुनाथ शाह। +535. गढ़ मंडला के पिता-पुत्र कवियों को क्रान्तिकारी रचनाओं के कारण तोप +के मुँह पर बाँधकर उड़ा दिया गया। उनके बलिदान की तिथि बताइये। +
उ. 18 सितम्बर 1858 के दिन। +536. सेठ लाला मटोलचंद अग्रवाल ने स्वाधीनता के संघर्ष हेतु अपना सारा खजाना +बहादुर शाह जफर को भेंट कर दिया। इन सेठजी का निवास स्थान कहाँ था? +
उ. डासना (गाजियाबाद)। +537. दिल्ली के गुड़वाला सेठ का पूरा नाम बताइये जिन्होंने बहादुर शाह जफर +की आर्थिक सहायता की पर अंग्रेजों को धन देने से मना कर दिया। +
उ. सेठ रामजीदास गुड़वाला। +538. दिल्ली के गुड़वाला सेठ द्वारा अंग्रेजों को धन देने से मना करने पर अंग्रेजों +ने अपनी क्रूरता दिखाते हुए सेठजी को एक गड्ढे में कमर तक गाड़कर +शिकारी कुत्ते छोड़े तथा अन्तत: फाँसी पर लटका दिया। दिल्ली का वह +प्रसिद्घ स्थान कौनसा है जहाँ उन्हें फाँसी दी गई? +
उ. चाँदनी चौक। +539. ग्वालियर के सेठ अमरचन्द बाँठिया मूलत: कहाँ के रहने वाले थे? +
उ. बीकानेर (राजस्थान)। +540. सेठ अमरचन्द बाँठिया ने ग्वालियर का सारा राजकोष किस स्वातंत्र्य योद्घा +को भेंट कर दिया? +
उ. महारानी लक्ष्मीबाई। +541. सेठ अमरचन्द बाँठिया पर राजद्रोह का आरोप लगा तब यह बात उन्होंने +किस अंग्रेज अधिकारी से कही - 'तुम हमारे देश के दुश्मन हो और दुश्मन +के प्रति द्रोह करना अपने देश के प्रति वफादारी है'? +
उ. ब्रिगेडियर नेपियर। +542. कंदर्पेश्वर सिंह और मनीराम दत्त ने किस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन को +उखाडऩे की तैयारी की? +
उ. असम। +543. नाथद्वारा में तात्या टोपे को श्रीनाथ जी के दर्शन कराने वाले मन्िदर के मुख्य +पुजारी जी का नाम बताइये। +
उ. गोस्वामी तिलकायत जी। +544. मेरठ छावनी के उस अंग्रेज अधिकारी का नाम बताइये जो क्रान्ति सैनिकों +की ओर से लड़ा। +
उ. रिचर्ड विलियम्स। +545. डॉ. वाकणकर के अनुसार अम्बाजी का मन्िदर किसने बनवाया, जिनका +साधुवेश में चित्र उसी मन्िदर में लगा है? +
उ. तात्या टोपे। +546. स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने स्वरचित जीवन चरित्र में 1857-1859 +की अवधि में किस क्षेत्र में रहने का उल्लेख किया है? +
उ. नर्मदा तट पर। +547. नरसी महता के प्रसंग में 1857 में अंग्रेजों द्वारा मन्िदर की मूर्ति तोडऩे तथा +बाघ्ोर लोगों द्वारा उसे बचाने के लिए वीरता दिखाने का उल्लेख स्वामी +दयानन्द सरस्वती ने 'सत्यार्थ प्रकाश' के किस समुल्लास में किया है? +
उ. ग्यारहवाँ समुल्लास। +548. 'वत्स! भारत देश से विदेशी शासन को उखाड़ फैंकने के लिए नर्मदा तट +पर सन्त वर्ग एक रूपरेखा तैयार कर रहा है। वह सर्वथा गुप्त है। समस्त देश +में निश्चित तिथि को नियत समय पर उसका विस्फोटन होगा।' कनखल +हरिद्वार में स्वामी दयानन्द सरस्वती से यह बात किसने कही? +
उ. महात्मा सम्पूर्णानन्द जी ने। +549. नाना साहब पेशवा स्वामी दयानन्द सरस्वती से विचार विमर्श करने के +लिए आए थे। यह विवरण 12 जनवरी 69 के जिस साप्ताहिक पत्र में छपा है +उसका नाम बताइये। +
उ. सार्वदेशिक। +550. आर्य समाज द्वारा जुटाए गए विवरण के अनुसार नाना साहब पेशवा की +समाधि नेपाल में नहीं है। तो उनके अनुसार उनकी समाधि कहाँ स्थित है? +
उ. मोरवी (गुजरात) के शंकर आश्रम में। +551. नीमच छावनी में कर्नल एबॉट ने सैनिकों द्वारा ली गई वफादारी की शपथ +का स्मरण कराया तो यह किसने कहा - 'अंग्रेजों ने स्वयं ने अपनी शपथ का +पालन नहीं किया है, क्या आपने अवध का अपहरण नहीं किया? इसलिए +भारतीय भी अपनी शपथ का पालन करने को बाध्य नहीं हैं।' +
उ. मोहम्मद अली। +552. नीमच छावनी से भयभीत होकर भागे अंग्रेज परिवारों के 40 सदस्यों को +मेवाड़ के डूँगला गाँव के एक किसान ने शरण प्रदान की। उस किसान का +नाम बताइये। +
उ. रूँगाराम। +553. टोंक की जनता व सेना क्रान्तिकारियों के साथ थी तथा यहाँ से 600 +स्वातंत्र्य योद्घा दिल्ली गए थे। यह सूचना जिस डायरी से प्राप्त होती है, उसके +लेखक का नाम बताइये। +
उ. मुंशी जीवनलाल। +554. टोंक नवाब के मामा का नाम बताइये जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार +का खुला विरोध किया था? +
उ. मीर आलम खाँ। +555. मोहम्मद मुजीब के उस नाटक का नाम बताइये जिसमें 1857 की क्रान्ति +में टोंक की स्त्रियों के भी भाग लेने का उल्लेख है। +
उ. आजमाइस। +556. अंग्रेजों को आउवा के किले से कितने शस्त्रास्त्र मिले? +
उ. 6 पीतल, 7 लोहे की तोप, तीन टन बारुद, तीन हजार राउंड तोप के +गोले। +557. अंग्रेजों ने आउवा से प्राप्त तोपें कहाँ भेजी? +
उ. अजमेर। +558. अंग्रेजों ने आउवा से प्राप्त बारुद का उपयोग किस कार्य में किया? +
उ. गढ़ को ध्वस्त करने में। +559. 'ठाकुर कुशाल सिंह के सहयोगी समरथ सिंह द्वारा मारवाड़ व मेवाड़ के +सामन्तों को अंग्रेजों के विरुद्घ संगठित करने का प्रयत्न हो रहा था।' यह बात +जिस पत्र से ज्ञात होती है वह किसने लिखा था? +
उ. देवगढ़ (मेवाड़) के रावत रणजीत सिंह ने। +560. 'ठाकुर कुशाल सिंह के सहयोगी समरथ सिंह द्वारा मारवाड़ व मेवाड़ के +सामन्तों को अंग्रेजों के विरुद्घ संगठित करने का प्रयत्न हो रहा था।' कार्तिक +कृष्णा-13 संवत् 1914 को लिखे गए जिस पत्र से यह बात ज्ञात होती है वह +पत्र नीमच छावनी में नियुक्त किस व्यक्ति को लिखा गया था? +
उ. मेहता शेरसिंह को। +561. आउवा से पराजित होकर लौटते समय जॉन लॉरेंस की सेना को रसद और +आश्रय देने से मना करने वाले ठाकुर कौन थे? +
उ. बगड़ी ठाकुर। +562. आउवा से आए विद्रोही सैनिकों को अपने गढ़ में आश्रय देने वाले और +इसके लिए अंग्रेजों की सेना से युद्घ करने वाले ठाकुर कहाँ के थे? +
उ. सिरियारी के। +563. 1857 में अजमेर के खजाने की सुरक्षा के लिए जोधपुर से भेजी गई सेना +का पड़ाव किस स्थान पर था? +
उ. आनासागर के किनारे। +564. 1857 में जोधपुर से अजमेर भेजी गई सेना को लेफ्टिनेंट कारनेल ने +वापस क्यों भेजा? +
उ. सैनिकों ने भूतपूर्व ए.जी.जी. सदरलैंड की प्रतिमा पर पत्थर फैंके थे। +565. नसीराबाद एवं नीमच के क्रान्तिकारियों का पीछा करने के लिए जोधपुर से +एक सेना भेजी गई। इस सेना ने पीछा तो किया पर उन्हें रोकने या टकराने +का प्रयत्न नहीं किया। इस सेना का नेतृत्व कौन कर रहा था? +
उ. केप्टन हार्ड केसल। +566. मरवाड़ की सेना की क्रान्तिकारियों से सहानुभूति थी अत: युद्घ में उनके +व्यवहार से खिन्न होकर यह किसने लिखा - 'मारवाड़ी सैनिक विद्रोहियों +के समक्ष अर्दली की भाँति नृत्य करने के अभ्यस्थ हैं'? +
उ. जॉर्ज लौरेंस (ए.जी.जी.)। +567. आउवा में संघर्ष किस सन् तक चलता रहा? +
उ. 1861 ई. तक। +568. 1857 की क्रान्ति के समय जोधपुर सम्भाग में ब्रिटिश विरोधी भावना सर्वत्र +व्याप्त थी। यह बात जॉर्ज लॉरेंस को 16 मई 1858 को लिखे पत्र में किसने +स्वीकार की? +
उ. जोधपुर के कार्यवाहक पॉलिटिकल एजेंट मोरीसन ने। +569. जोधपुर के बारुद भंडार में विस्फोट किस तिथि को हुआ था? +
उ. 10 अगस्त 1857 को। +570. जोधपुर किले में बारुद भंडार किस जगह स्थित था? +
उ. गोपाल पोल के पास। +571. जोधपुर किले के बारुद भंडार की विशालता का अनुमान इस बात से +होता है कि विस्फोट के बाद चारमन का पत्थर कितनी दूर पहुँचा। +
उ. छ: मील। +572. केप्टन मेसन की हत्या का समाचार उसकी पत्नी एवं ब“ाों को देने के +लिए जोधपुर महाराजा ने मेहता विजयमल और सिंघवी समरथ राज को +उनके आवास पर भेजा। जोधपुर में उसका आवास कहाँ था? +
उ. सूर सागर। +573. केप्टन मेसन की आउवा में हत्या के बाद भी जोधपुर किले में शोकस्वरूप +'नौबत' बजाना नहीं रुका जबकि जोधपुर सेना के एक सेनापति के आउवा +में मारे जाने पर 'नौबत' नहीं बजी। उस सेनापति का नाम बताइये। +
उ. अनाड़ सिंह पँवार। +संदर्भ ग्रंथ. +1. 1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर, विनायक दामोदर सावरकर, +हिन्दी संस्करण, 1993 +2. 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दक्षिण भारत का योगदान : डॉ. +वा.द.दिवेकर, हिन्दी संस्करण, 2001, भारतीय इतिहास संकलन +समिति, आगरा। +3. 1857 का स्वातंत्र्य समर : एक पुनरावलोकन, डॉ. सतीश चन्द्र +मित्तल, अ.भा. इतिहास संकलन योजना। +4. राजस्थान का स्वाधीनता संग्राम : डॉ. प्रकाश व्यास, संस्करण +1985, पंचशील प्रकाशन, जयपुर। +5. आधुनिक राजस्थान का वृहत इतिहास : भाग-2। +6. पाथेय-कण, अप्रेल 2007। +7. आँखों देखा गदर (विष्णु भट्ट गोडशे कृत 'माझा प्रवास' का हिन्दी +अनुवाद) अनुवादक : अमृतलाल नागर, राजपाल एंड सन्स, 1990 संस्करण। +8. 1857 का संग्राम : वि. स. तालिंबे। अनुवादक : विजय प्रभाकर, +नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, संस्करण 2006। +9. रानी लक्ष्मीबाई : वृन्दावन लाल वर्मा, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, +उन्तीसवीं आवृत्ति, 2006। +10. उन्नीसवीं शताब्दी का अजमेर : डॉ. राजेन्द्र जोशी, राजस्थान +हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, संस्करण 1972। +11. अट्ठारह सौ सत्तावन और स्वामी दयानन्द : वासुदेव शर्मा, प्रथम +संस्करण : 1970, भारतीय लोक समिति, नई दिल्ली। +12. पाञ्चजन्य : 6 मई 2007। + +प्राचीन आर्य इतिहास का भौगोलिक आधार: +परिचय. +भारतीय आर्यों के प्राचीन इतिहास तथा भूगोल का अज्ञान, या तो हमारे आलस्य के कारण या हमारी बहुमूल्य ऐतिहासिक पुस्तकों के शत्रुओं द्वारा नष्ट हो जाने के कारण, अभी तक हमें पूर्ण निश्चय के साथ यह उद्घोषित करने का अवसर नहीं देता कि हमारी प्राचीन आर्य संस्कृति किस श्रेणी तक उस समय पहुंच चुकी थी, जिस समय आधुनिक नव्य-सभ्य राष्ट्रों का उदय तो कौन कहे, नाम व निशान भी नहीं था ! अवश्य ही हमारे प्राचीन इतिहास के अनुशीलन में योरपीय विद्वानों ने जो सहायता पहुंचायी है, वह बहुमूल्य है। विदेशी होकर भी आज तक उन लोगों ने जो कुछ किया, वह आशातीत और हमारी आंखें खोलने के लिये पर्याप्त है। हमारा इतिहास कुछ ख्रीष्टाब्द या विक्रमाब्द से मर्यादित नहीं; यह तो सृष्टि-सनातन और आधुनिक विद्वानों के मस्तिष्क रूपी अनुवीक्षण यन्त्र की दृष्टि से बाहर है। सच पूछा जाय, तो आर्यों का इतिहास ही विश्व का इतिहास है। आज तक यह कोई भी ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि आर्यों का सम्पूर्ण इतिहास विश्व की विद्वन्मण्डली को कब दृष्टिगोचर होगा। योरपीय विद्वानों ने अन्धकार से निकलने की युक्ति हमें बता दी है। अब तो हमारा कर्तव्य है कि अपने इतिहास का देदीप्यमान चित्र विश्व के सामने रख दें। पाश्चात्य विद्वानों की प्रायः यह धारणा रही है और है कि भारतवासी आर्य इतिहास लिखना या सुरक्षित रखना नहींजानते थे। यह विवाद, जो किसी भी भारतीय विद्वान् को असह्य है, बहुत दिनों से चला आ रहा है। प्राचीन इतिहास के अनुशीलन के लिये प्रायः दो परिपाटी चल पड़ी हैं, और ऐतिहासिक तत्त्वों का स्पष्टीकरण भी प्रायः दो ज़ुदे-ज़ुदे मार्गों से हो रहा है। पाश्चात्य विद्वान् अवश्य ही समय-निर्धारण में अत्यन्त संकोच और द्वेष बुद्धि से काम लेते आये हैं। यह आज बिल्कुल निर्विवाद है कि हमारे आर्य ऋषि-प्रवर साहित्य, ज्योतिष, विज्ञान, आयुर्वेद आदि समस्त कलाओं में उस पूर्णता तक पहुंच चुके थे, जो आज भी योरप के लिये स्वप्नवत् प्रतीत हो रही है। यह एक सत्य है, जिसे पहले तो नहीं, परन्तु अब प्रत्येक पाश्चात्य विद्वान् मुक्त-कण्ठ से स्वीकार कर रहा है। हाँ, समय निर्धारण का प्रश्न बड़ा ही जटिल है, और वह भी इसलिये कि हमारे पास ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव-सा समझा जाता है। हमारे हृदय सम्राट् बाल गङ्गाधर तिलक का ’ओरायन’ गन्थ इस दिशा में हमें बहुत कुछ प्रकाश में ला चुका है। उनका विचार एवं निष्कर्ष ज्योतिष, गणित और वैदिक ऋचाओं पर अवलम्बित है। सच तो यह है कि जिस समय हम थे, उस समय हमारी जाति के सिवा संसार में और कोई भी सभ्य जाति नहीं के बराबर थी। हमारी ऐतिहासिक प्राचीनता में एक ऐतिहासिक गौरव सन्निहित है। आज "हम" हम नहीं, आज बहुतेरे हम हो गये और इसी हमाहमी में एक भारतीय इतिहास ही नहीं, प्रत्युत विश्व इतिहास झगड़े की चीज़ बन गया। संसार में आर्य और अनार्य दो ही मुख्य जातियां हैं। आर्यों की शाखायें-प्रशाखायें इतनी बढ़ गयी हैं कि उस अन्धकार में इतिहास के पन्ने उलटना बड़ी विकट समस्या है। उस पर एक आश्चर्य यह कि सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास के मुख्यतः दो ही आधार हैं-एक तो वैदिक साहित्य, और दूसरे भौगोलिक आधार पर पृथ्वी की भिन्न-भिन्न सतहों की खोज। दिन-दिन हमारे इतिहास को नव-नव प्रकाश मिलता जा रहा है। आर्य-इतिहास एक बुझौवल या प्रहेलिका के रूप में हमें मिल रहा है। वैदिक साहित्य की व्याख्यान का रूप दिन-दिन विकसित और गम्भीर होता जा रहा है। सच पूछिये तो वैदिक साहित्य संसार-मात्र का साहित्य हो रहा है। इसमें सभी समान रूप से दिलचस्पी ले रहे हैं। कोई नहीं कह सकता कि भविष्य में हमारे आर्य इतिहास का क्या रूप होगा तथा हमारा अन्तर-राष्ट्रीय सम्बन्ध कैसा रहेगा। हमारा समस्त साहित्य विश्व का साहित्य हो रहा है। कौन कह सकता है कि हमारे दर्शन, साहित्य और इतिहास एक दिन विश्वमात्र के लिये दर्शन, साहित्य और इतिहास नहीं हो जायँगे ? विश्व आज उसी की पुनरावृत्ति कर रहा है, जो आर्य लोग कर चुके हैं; और सम्भवतः वहीं पहुँचेगा, जहाँ हम एक बार पहुँचकर भटक से गये हैं। यह एक ऐतिहासिक सत्य है। यह एक दिन सबके सामने आयेगा। इसी से कहा जाता है कि अन्तर-राष्ट्रीय मिलन का एकमात्र आधार भारतवर्ष होगा; क्योंकि उसकी कुंजी इसी के हाथ मॆं है। +हाँ, तो हमारा इतिहास आज एक प्रकार से प्रमाणों के अभाव में Mythology सा बन गया है। पुराण गप्प-सा बन गया है और रामायण और महाभारत को रूपक का रूप मिल गया है ! यह हमारे लिये लाचारी और लज्जा की बात है । भारतीय विद्वान् इसी गुत्थी के सुलझाने का प्रयत्न कर रहे हैं । विद्वद्वर श्रीयुत् के. पी. जायसवाल ने, बिहार और ओरिसा-रिसर्च-सोसाइटी के जर्नल में , गर्ग-संहिता के एक अध्याय के आधार पर यह साफ-साफ साबित कर दिया है कि भारतवासी इतिहास लिखना जानते थे, तथा गर्ग के ऐतिहासिक अध्याय से हम प्राचीन राजवंश के इतिहास तक निर्विघ्न पहुँच जा सकते हैं । बहुत निकट-भविष्य में महाभारत से आज तक का सुसम्बद्ध इतिहास हमारे सामने आ जायगा, ऐसी आशा की जाती है। गर्ग-संहिता का ऐतिहासिक विवरण ग्रीक विद्वानों के उस ऐतिहासिक विवरण से मिल जाता है , जो उन्होंने भारतवर्ष के बारे में लिखा है । जायसवालजी का यह प्रयत्न ऐतिहासिक संसार में युगान्तर पैदा कर सकता है । अपार संस्कृत-साहित्य के अनुशीलन से ही हम अपने इतिहास की खोज करने में सफल मनोरथ हो सकते हैं । लोकमान्य तिलक हमारे पथ-प्रदर्शक हो गये हैं; अब हमें आगे बढ़ना है । हमें इस लेख में भौगोलिक आधार पर भारत के प्राचीन इतिहास के दिग्दर्शन कराने का प्रयत्न करना है । इस सम्बन्ध में उपनिषद्, पुराण और महाभारत के भौगोलिक वर्णनों से हमें बहुत कुछ पता लग सकता है। श्रीमद्भागवत में तो भूगोल का पूर्ण ख़ाका ही खींचा गया है । इस लेख में मैं केवल भौगोलिक आधार पर यह सिद्ध करने की कोशिश करूँगा कि आर्य लोग भारतवर्ष में काबुल की ओर से न आकर काश्मीर की राह से आये और सिन्धु-नदी के किनारे-किनारे आकर सारे पंजाब में बस गये । पंजाब से वे पश्चिमोत्तर की ओर बढ़ते-बढ़ते काबुल नदी के आस-पास तक पहुँच गये और वहीं पर आर्यों की उस शाखा से उनकी मुठभेड़ हुई, जो ऑक्सस-नदी के पश्चिमोत्तर-प्रदेश Airya nem Vaejo (अरियानम् व्वज) अर्थात् ’आर्यानां व्रजः’ से आर्यों की भारतीय शाखा से विलग हो गयी । उनका भारतीय आर्यों से मतैक्य नहीं था, तथा वे भारतीय आर्यों को देव-पूजक कहने लगे थे। भारतीय आर्य उन्हें ’असुर’ कह कर पुकारते थे । ऋग्वेद में ’असुर’ शब्द का अर्थ वही नहीं है, जो आज समझा जाता है। पहले ’असुं राति लाति ददाति इति असुरः’ अर्थात् देवता के अर्थ में ’असुर’ शब्द प्रयुक्त होता था। अब इसका अर्थ हो गया है-’न सुरः असुरः’। इरानी आर्यों से भारतीय आर्यों की लड़ाई का मुख्य कारण बतलाना तो मुश्किल है, परन्तु इतना कहा जा सकता है कि इस द्वेष का कारण कुछ तो आर्थिक और कुछ धार्मिक था । हम ऋग्वेद में देखते हैं कि आर्यों के देवों की संख्या क्रमशः बढ़ती जाती है। अवेस्ता में वैदिक साहित्य के ब्राह्मण भाग का कोई भी संकेत नहीं मिलता। हाँ, ऋग्वेद की भाँति जिन्दा-अवेस्ता में मन्त्र और सूत्र अवश्य विद्यमान हैं। मन्त्र का रूप उसमें ’मन्थ्रन्’ है। पारसियों के पवित्र ग्रन्थों का नाम ’मन्थ्र-स्वेन्त’ है। अवेस्ता के देवताओं में- जो भारतीय आर्यों से मिलते-जुलते हैं-मित्र, वरुण, आर्यमन् और यमी (यम) है। वैदिक साहित्य में इधर आर्यों ने दिन-दिन विकास प्राप्त किया। विचार-धारा शाश्वत रूप से बहती गयी। +भारतीय आर्य तथा पारसियों की भौगोलिक स्थिति और आलोचना-अब भारतीय तथा पारसियों की भौगोलिक स्थिति पर सम्यक् विचार करके मैं यह स्पष्ट करूँगा कि किस तरह भारतीय साहित्य में वर्णित भूगोल की परिपाटी अवेस्ता के भूगोल से भिन्न है। पहले मैं संक्षेप में वायु-पुराण में वर्णित जम्बूद्वीप में आये देशों की सूची देता हूँ- +इदम् हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्। हेमकूटं परं तस्मात् नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्॥
+नैषधं हेमकूटात् तु हरिवर्षं तदुच्यते। हरिवर्षात् परञ्चैव मेरोश्च तदिलावृतम्॥
+इलावृतात् परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्। रम्यात् परं श्वेत विश्रुतं तत् हिरण्मयम्॥
+हिरण्मयात् परं चापि शृंगवांस्तु कुरुः स्मृतम्। (वायु पुराण)
+(१) हैमवत् वर्ष अर्थात् प्रसिद्ध भारतवर्ष, +(२) उसके बाद हेमकूट पर्वत है, जिसे किम्पुरुष देश कहते हैं, +(३) हेमकूट के बाद नैषध है, जिसे हरिवर्ष कहते हैं, +(४) हरिवर्ष के बाद मेरु-पर्वत के उत्तर इलावृत है, +(५) इलावृत के बाद नील वर्ष है, जो ’रम्यक’ नामसे प्रसिद्ध है, +(६) रम्यक के उत्तर श्वेत-प्रदेश है, जिसे हिरण्मय कहते हैं और +(७) हिरण्मय के बाद शृंगवान् है, जो कुरु नाम से प्रख्यात है। +इस प्रकार जम्बूद्वीप के अन्तर्गत वायुपुराण के अनुसार सात देश हुये। सातों देशों में सबसे उत्तर कुरु देश हुआ। यह ’कुरु’ कहाँ है सो ब्रह्माण्डपुराण के निम्न-लिखित श्लोक से स्पष्ट हो जाता है- +उत्तरस्य समुद्रस्य समुद्रान्ते च दक्षिणे। कुरवः तत्र तद्वर्षं पुण्यं सिद्ध-निषेवितम्॥ +यह कुरु उत्तरीय समुद्र के दक्षिण की ओर बसा हुआ है। यहाँ सिद्ध पुरुष रहते हैं, जिनका नाम ’कुरु’ है। +अवश्य ही यह कुरु उत्तरसागर के दक्षिण रहा होगा, जो उत्तर ध्रुव के उत्तरीय वृत्त में बसा होगा। इससे लो. तिलक की सम्मति को कोई आघात नहीं पहुँचता। परन्तु प्रश्न यह होता है कि इस कुरु और भरत-खण्ड के कुरु में क्या सम्बन्ध है ? इसका समाधान मैं पीछे करूँगा। तब तक यह देख लेना चाहिये कि इस कुरु का हमारे पुराणों में कैसा वर्णन आया है। पद्मपुराण के निम्नलिखित श्लोक अनावश्यक नहीं कहे जा सकते-
+उत्तरेण तु शृंगस्य समुद्रान्ते द्विजोत्तमाः। वर्षमैरावतं नाम तस्मात् शृंगवतः परम्॥
+न तु तत्र सूर्यगतिः न जीर्य्यन्ति च मानवाः। चन्द्रमाश्च सनक्षत्रो ज्योतिर्भूत इवावृतः॥

+अर्थात्, शृंग के उत्तर समुद्र के अन्त में ऐरावत वर्ष है, जहाँ ’द्विजों में श्रेष्ठ ’ रहते हैं। यह वर्ष शृंगवान् के बाद है तथा यहाँ पर न तो सूर्य की गति है, न मनुष्य जीर्ण होते हैं और स-नक्षत्र चन्द्रमा शाश्वत चमकते रहते हैं। +यहाँ उत्तरतम प्रदेश कुरु न होकर ऐरावत हो गया है। किन्तु पद्मपुराण के अनुसार उत्तर कुरु को इस मेरु और नील के मध्य में पाते हैं। जैसे- +दक्षिणेन तु नीलस्य मेरोः पार्श्वे तथोत्तरे। उत्तराः कुरवो विप्राः पुण्याः सिद्धनिषेविताः॥
+इस श्लोक में हम ब्रह्माण्डपुराण की छाया तो अवश्य पाते हैं, परन्तु कुरु यहाँ उत्तर-कुरु होकर, उत्तर-ध्रुव के निकटवर्त्ती प्रदेशों से हटकर, मेरु और नील के मध्य में आ गया है। अवश्य ही यह आर्यों के स्थानान्तरित होने का सूचक है। आर्य लोग मध्य-एशिआ की ओर बढ़ते आते हैं और अपने प्रिय प्रदेश का नाम अपने साथ लेते आते हैं, जो मध्य-एशिआ से दक्षिण की ओर हटते-हटते, भरत-खण्ड में कुरु-पाञ्चाल के रूप में परिवर्तित हो गया है। यह मैं उपसंहार में दिखलाऊँगा। तब तक मैं अन्य प्रमाण द्वारा यह सिद्ध करूँगा कि यही कुरु महाभारत में हरिवर्ष में किस प्रकार आ गया है। +अर्जुन की विजय-यात्रा और कुरु या उत्तरकुरु. +महाभारत के सभा-पर्व में अर्जुन की विजय-यात्रा के प्रसंग में भी उत्तर-कुरु का उल्लेख आया है। इसमें उत्तर-कुरु लोगों का हरिवर्ष में रहना सिद्ध होता है। यह हरिवर्ष अब उत्तरीय ध्रुव के समीपवर्ती वृत्त के अन्तर्गत नहीं है। यह बहुत ही दक्षिण की ओर हटकर मानसरोवर के प्रदेशों के उत्तर में बतलाया जाता है। अर्जुन का विजय क्रम इस प्रकार है-वह पहले +(१) श्वेत पर्वत को पार कर किम्पुरुषों के रहने की जगह पर अर्थात् किम्पुरुष-वर्ष में जाते हैं, जो द्रुमराजा के पुत्र द्वारा रक्षित है। +(२) तदनन्तर उन्हें जीतकर और उनसे कर ले गुह्यकों से रक्षित ’हाटक’ नाम के देश में चले गये। उन्हें भी जीतकर वह मानसरोवर की ओर आगे बढ़ गये। +(३) उधर हाटक देश के बाद मानसरोवर के निकट ही गन्धर्वों का देश था। इस देश को भी जीतकर गन्धर्वों से तित्तिर-किल्मिष और मण्डूक-नामक घोड़े कर-स्वरूप उन्होंने ग्रहण किये। +(४) इससे उत्तर जाने पर उन्हें हरिवर्ष मिला। यहाँ महाकाय, महावीर्य द्वारपालों ने इनकी गति अनुनय-विनय करके रोक दी। उन लोगों ने कहा कि यहाँ मनुष्यों की गति नहीं, यहाँ उत्तर-कुरु के लोग रहते हैं; यहाँ कुछ जीतने योग्य चीज़ भी नहीं। यहाँ प्रवेश करने पर भी, हे पार्थ, तुम्हें कुछ भी नज़र नहीं आयेगा और न मनुष्य तन से यहाँ कुछ दर्शनीय ही है। उन लोगों ने पुनः पार्थ की मनोवाञ्छा की जांच की। पार्थ ने कहा कि मैं केवल धर्मराज युधिष्ठिर के पार्थिवत्व का स्वीकार चाहता हूँ। इसलिये युधिष्ठिर के लिये कर-पण्य की आवश्यकता है। यह सुनकर उन लोगों ने दिव्य-दिव्य वस्त्र, क्षौमाजिन तथा दिव्य आभरण दिये।

+स श्वेतपर्वतं वीरः समतिक्रम्य वीर्यवान्। देशं किम्पुरुषावासं द्रुमपुत्रेण रक्षितम्॥
+महता सन्निपातेन क्षत्रियान्तकरेण ह। अजयत्पाण्डवश्रेष्ठः करे चैनं न्यवेशयत्॥
+तं जित्वा हाटकं नाम देशं गुह्यकरक्षितम्। पाकशासनीव व्यग्रः सहसैन्यः समासदत्॥
+सरो मानसमासाद्य हाटकानभितः प्रभुः। गन्धर्वरक्षितं देशमजयत् पाण्डवस्ततः॥
+तत्र तित्तिरकिल्मिषान् मण्डूकाख्यान् हयोत्तमान्। लेभे स करमत्यन्तं गन्धर्वनगरात्तदा॥
+उत्तरं हरिवर्षन्तु स समासाद्य पाण्डवः। इयेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः॥
+तत एनं महावीर्या महाकाया महाबला । द्वारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनमब्रुवन्॥
+पार्थ नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथञ्चन । उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत॥
+न चात्र किञ्चिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते । उत्तराः कुरवो ह्येते गात्रयुद्धं प्रवर्तते॥
+प्रविष्टोऽपि हि कौन्तेय नेह द्रक्ष्यसि किञ्चन । नहि मानुषदेहेन शक्यमत्राभिवीक्षितुम्॥
+... पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः।..युधिष्ठिराय यत्किञ्चित् करपण्यं प्रदीयताम्॥
+ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च। क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददुः करम्॥
+-- (महाभारत, सभापर्व) +कालिदास और मेघदूत. +कालिदास के बतलाये हुये मेघ की राह में मिलने वाले प्रायः सभी नद-नदी, गिरि और नगर का पता आज चल गया है। कनखल यानी हरिद्वार तक या कैलाश तक तो हम मान जाते हैं, परन्तु इसके उत्तर गन्धर्वों की नगरी अलकापुरी को हम कोरी कल्पना समझते हैं। कम-से-कम हम इतना मानने को तैयार नहीं होते कि यह भी भौगोलिक सत्य है। अर्जुन श्वेत-पर्वत यानी हिमालय पार कर उत्तर की ओर बढ़े; परन्तु इसे हम कवि-कल्पना से बढ़कर और कुछ मानने के लिये अभी तैयार नहीं। यह मेघ की राह तो और भी कल्पना है। परन्तु इसके पूर्व हम यह दिखलाना चाहेंगे कि बौद्ध लोग किस प्रकार हिमालय के उत्तर-प्रदेशों से अपना सम्बन्ध रखते हैं। बिहार-नेशनल-कालेज के प्रिन्सिपल श्रीयुत् देवेन्द्रनाथ सेन् एम्.ए., आई.ई.एस्. ने अपने Trans-Himalayan-Reminiscences in Pali-literature नामक निबन्ध में यह बहुत ही अच्छी तरह से दिखलाया है कि बौद्धों का प्रभाव हिमालयोत्तर-प्रदेश में ही इतना अधिक क्यों पड़ा तथा बौद्ध लोग मानसरोवर के निकटवर्ती प्रदेशों के ही इतने प्रेमी क्यों हुये । उन्होंने बौद्ध जातकों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि भारतीय आर्यों का प्रेम हिमालयोत्तर-प्रदेश से कुछ नैसर्गिक-सा था। हम उनके निकाले हुये निष्कर्ष को अस्वीकार नहीं कर सकते। +गर्ग-संहिता और भारतीय इतिहास. +महाभारत के पश्चात् के इतिहास का दिग्दर्शन गर्गाचार्य ने अपनी गर्ग-संहिता में किया है। ऊपर लिखा जा चुका है कि श्रीयुत के. पी. जायसवाल ने Behar & Orissa Research Society के Journal में, गर्गसंहिता के ‘युग-पुराण’ नामक अध्याय के आधार पर, किस प्रकार जनमेजय से लेकर ख्रीष्टाब्द से दो शताब्दी पूर्व तक के इतिहास का दिग्दर्शन कराया है। गर्गाचार्य ने कृष्णा (द्रौपदी) की मृत्यु के बाद से भारतीय इतिहास लिखा है। उनके इतिहास की परिपुष्टि प्राचीन मुद्राओं, विदेशी विद्वानों के रेकर्ड तथा स्वतन्त्र प्रमाणों से भी होती है। उन्होंने जनमेजय और ब्राह्मणों के बीच वैमनस्य का जिक्र किया है। दूसरी बात, जो गर्ग-संहिता से विदित होती है, यह है कि महाभारत के बाद धीरे-धीरे ब्राह्मण धर्म का केन्द्र तक्षशिला से हटकर मगध के पाटलिपुत्र में आ गया। जनमेजय की राजधानी तक्षशिला है और उसकी ब्राह्मणों से शत्रुता है। +महाभारत के बाद वैदिक धर्म. +महाभारत के बाद अवश्य ही ब्राह्मण धर्म यानी वैदिक धर्म के विरुद्ध आन्दोलन उठने का संकेत पाया जाता है। ऐसा क्यों हुआ, यह उस समय का इतिहास ही बतला सकता है। हिन्दू प्रणाली के अनुसार महाभारत का समय ख्रीष्टाब्द से ३,००० वर्ष के लगभग पहले माना जाता है और यह समय पाकर सत्य भी साबित हो सकता है। हमें विदित ही है कि ख्रीष्ट से पूर्व सातवीं शताब्दी के मध्य में बुद्धदेव और महावीर-जैन का उदय हुआ। स्वभावतः इस धार्मिक क्रान्ति के सफल होने में २,४०० वर्ष का समय बहुत नहीं है। वैदिक काल से ही हमारे धार्मिक विचार में परिवर्तन होते आये हैं और हिन्दू दर्शन के क्रमिक विकास का भी हमें पता मिल जाता है। तब वैदिक काल के अनेकेश्वरवाद से (जिसमें एकेश्वरवाद का बीज-वपन हो गया है) उपनिषत्काल के एकेश्वरवाद तक हम आ जाते हैं। एकेश्वरवाद के बाद हमें ब्रह्मवाद मिलता है, जिससे वेदान्त की उत्पत्ति हुई। इस ब्रह्मवाद में मायावाद सम्मिलित है। संसार माया का जाल और ब्रह्म ही एक सत्य समझा जाता है। परन्तु इसी ब्रह्मवाद और मायावाद की धूम के बाद पुरुष और प्रकृति-वाद का आन्दोलन जाग्रत् हो जाता है। ब्रह्म पुरुष और माया प्रकृति बन जाती है। इस विचार विकास में पर्याप्त समय लगा होगा। आते-आते सूत्रकाल में हमें कपिल का सांख्य-सूत्र मिलता है। यद्यपि सांख्यकारिका सांख्यधर्म के उदय के बहुत दिनों के बाद एक विशिष्ट दर्शन के रूपमें प्रकट हुई, तथापि हम इसे कम-से-कम बौद्ध धर्म से ५-६ सौ वर्ष पूर्व समय देने में कोई आपत्ति नहीं समझते। मैकडानेल्ड महोदय भी ख्रीष्टाब्द से १,००० वर्ष पूर्व सांख्यधर्म का उदय होना तो कम-से-कम स्वीकार ही करते हैं। सांख्य के आधिभौतिक धर्म को हम बौद्धों या जैनों के धर्म का मूल -कारण समझते हैं। कपिल अपने विचार के कारण नास्तिक समझे गये। धीरे-धीरे ४०० वर्षों तक नास्तिकता का, जैसा कि उस समय समझा गया, विकास होता गया। इन्हीं चार-सौ वर्षों में चार्वाक आदि का भी प्रादुर्भाव हुआ। अथर्व-काल के बाद हमें तन्त्र-धर्म का भी सूत्रपात होते देख पड़ता है। धीरे-धीरे यह तन्त्रवाद ज़ोर पकड़ता गया और वैदिक धर्म का रूप विकृत होता गया। यही तन्त्रवाद सम्भवतः शाक्त-धर्म का मूल-कारण रहा। गौतम बुद्ध के समय तक साधारण जनमानस में हिंसा का पूर्णतः प्रचार हो गया होगा। +महाभारत के बाद बौद्धकालीन इतिहास का अदर्शन. +परीक्षित के पुत्र जनमेजय के समय से ही ब्राह्मणों के विरुद्ध दुर्भाव फैलने लगे, और यही कारण है कि तक्षशिला छोड़कर ब्राह्मणधर्मावलम्बी आर्य मगध की ओर आ गये। गर्ग-संहिता के आचार्य गर्गजी ब्राह्मणधर्म का अनुयायी होने के कारण अवश्य ही बौद्ध या उसके पूर्व के इतिहास का दिग्दर्शन कराने से बाज़ आये से मालूम पड़ते हैं। सच पूछिये, तो संस्कृत साहित्य ही इस विषय में बिल्कुल चुप है। वह अवश्य ही परस्पर विद्रोह और अशान्ति का समय रहा होगा। गर्ग के सामने अवश्य ही ऐतिहासिक ग्रन्थ मौजूद रहे होंगे; परन्तु उन ग्रन्थों में नास्तिकों की कथा न लिखी गयी हो, यह सम्भव प्रतीत होता है। फलतः बौद्ध साहित्य के अनुशीलन के बिना भारतीय इतिहास का पूरा पता नहीं पा सकते। +बौद्ध जातकों में हिमालयोत्तर-प्रदेश. +फिर भी हम प्रसङ्गानुसार बौद्ध जातकों में आये हुए हिमालयोत्तर-प्रदेशों का वर्णन करेंगे। यद्यपि ये गल्पवत् प्रतीत होते हैं, तथापि हम उत्तर कुरु के सच्चे अस्तित्व का पता पा जाते हैं। ’मिलिन्दपन्ह’ में ’सागल’ नगर की उत्तर-कुरु से तुलना की है, जैसे-’उत्तरकुरु संकासं सम्पन्न सस्यं’। विधुर पण्डित के जातक में भी हम उत्तर-कुरु के दक्षिण में जम्बूद्वीप को पाते हैं। स्मरण रखना चाहिये कि यहाँ पर जम्बूद्वीप ख़ास भारत समझा गया। जैसे-

+पुरतो विदेहे पस्स गोयानिये च पच्छतो करुयो। जम्बूदीपञ्च पस्स मणिम्हि पस्स निमित्तं॥
+इसके अनन्तर फिर भी हम निम्न-लिखित वाक्य मिलता है-

+विदेहेति पुव्वविदेहं गोयानिर्यति अपरगोयानिदीपं; कुरयो ति उत्तरकुरु च दक्षिणतो जम्बूदीपञ्च।
+अर्थात् विदेह पूर्व-विदेह को, गोयानिर्य अपरगोयानि-द्वीप को, कुरु उत्तर-कुरु को और उसके दक्षिण जम्बूद्वीप को कहते हैं। इससे उत्तर-कुरु का हिमालय से उत्तर होना सिद्ध हुआ। इस उत्तर-कुरु के बासिन्दे भी जम्बूद्वीप (भारत के अर्थ में) के बासिन्दों से अच्छे समझे गये हैं। जैसे-
+तीहि भिक्खवे ठानेहि उत्तरकुरुका मनुस्सा देवे च तावतिंसे अधिगण्हन्ति जम्बूदीपके च मनुस्से। कतमेति तीहि ? अमना च, अपरिग्गहा, नियतायुका, विसेसभुजो।
+अर्थात् तीनों बातों में उत्तर-कुरु के मनुष्य और तावतिंस के देव जम्बूद्वीप के मनुष्यों से भिन्न हैं। वे तीन कौन-कौन सी ? वे निर्मम हैं यानी मायारहित हैं, परिग्रह नहीं लेते, अमर हैं तथा कोई विशेष भोजन खाने वाले हैं। +मानसरोवर या अनोतत्तमहासर. +श्रीयुत देवेन्द्रनाथ सेन ने ’पालीसुत्त’ के आधार पर अनोतत्तमहासर का मानसरोवर होना साबित किया है। पाली-सूत्रों में सात नदियों का वर्णन पाया जाता है; जैसे-अनोतत्त, सिंहपपात, रथकार, कण्णमुण्ड, कुणाल, छ्द्धन्त और मन्दाकिनी। हिमालय से निकली नदियाँ गंगा, यमुना, अचिरावती, सरभू और मही है। ’सरभू’ सम्भवतः सरयू और अचिरावती वैदिक काल की सदानीरा है। मही उत्तर बिहार की एक प्रसिद्ध नदी है। अनोतत्त का अर्थ अनवतप्त है। सूत्रों के अनुसार यह झील उत्तर-कुरु में है; क्योंकि उत्तरकुरु में बोधिसत्त्व और बौद्ध भिक्षु लोग भिक्षाटन कर, अनोतत्त दह में विश्राम करते थे। +कीथ और मैकडानेल्ड की सम्मति. +The Uttar Kurus who play a mythical part in the epic and later literature, are still a historical people in the ऐतरेय ब्राह्मण where they are located beyond the Himalayas (परेण हिमवन्तम्). In another passage, however, the country of the Uttar Kurus is stated by Vashishtha Satyahavya to be a land of Gods (देवक्षेत्र), but जानन्तापि अत्याराति was anxious to conquer it, so that it is still not wholly mythical.-Keith. +The territory of the Kuru Panchal is declared in the ऐतरेय ब्राह्मण to be the middle country (मध्यदेश). A group of the Kuru people still remained further north-the Uttar Kurus beyond the Hiamlayas. It appears from a passage of the शतपथ ब्राह्मण that the speech of the Norherners-that is presumably the Norhern Kurus-and of the Kuru Panchal was similar and regarded as specially pure. There seems little doubt that the Brahmanical culture was developed in the country of the कुरुपाञ्चाल and that it spread then east, south and west-Macdonald. +स्पष्ट है कि उत्तर-कुरु हिमालय के उत्तर में है और ऐतरेय ब्राह्मण के समय में यह एक ऐतिहासिक प्रदेश रहा है, जहाँ से और कुरुपाञ्चाल से प्रत्यक्ष सम्बन्ध था। सम्भवतः कुरुपाञ्चाल-निवासी उत्तर-कुरु के ही वंशधर और शाखा हैं। इस उत्तर-कुरु का भौगोलिक विकास हमारे इतिहास के लिये परम आश्चर्यजनक और महत्त्व की चीज़ है। इससे आर्यों का क्रमशः उत्तरीय ध्रुव के प्रदेशों से आते-आते सिन्धु-नदी के तटवर्त्ती प्रदेश की राह से भारतवर्ष अर्थात् जम्बूद्वीप में आना सिद्ध होता है। आर्यों के हिमालय की तराई से आने के लिये कई मार्ग हो सकते हैं। यह काश्मीर से तिब्बत (त्रिविष्टप) तक विस्तीर्ण है। इस संकटापन्न मार्ग का संकेत हमें ऋग्वेद के सूत्रों से भलीभाँति मिल जाता है। इरानी आर्य कहाँ से भारतीय आर्यों से विलग हुये, यह आगे बतलाया जायगा। हमारा साहित्य हिमालयोत्तर प्रदेश की पुण्य-स्मृतियों से ओतप्रोत है। कभी किसी का ध्यान काबुल की ओर नहीं गया। क्यों ? यह हम उपसंहार भाग में दिखलाएँगे। स्वर्ग के अस्तित्व की धारणा हमारे मन से अभी तक नहीं गयी है। यह हमारी विकट भूल होगी, यदि हम इस प्रत्यक्ष ऐतिहासिक तथ्य को खुले दिल से स्वीकार न करें। +बौद्ध धर्म के हिमालयोत्तर-प्रदेश में प्रचार का नैसर्गिक कारण. +दूसरी बात जिसे भूलने की सामर्थ्य नहीं, यह है कि बौद्ध धर्म का प्रचार हिमालय से उत्तर ही व्यापक रूप में हुआ। इस नैसर्गिक प्रचार का मूल कारण भी नैसर्गिक हो सकता है। चीनी यात्री फ़ाहियान और हुएनसांग के वर्णन इसके लिये पर्याप्त हैं। फ़ाहियान को, भारत में प्रवेश के पूर्व, खोटन आदि स्थानों में बौद्ध धर्म का पूर्णतः प्रचार मिला। हीनयान-पन्थ के हज़ारों भिक्षु उत्तर की ओर गये। शेनशेन में हीनयान और खोटन में महायान-सम्प्रदाय का प्रचार पाया गया। सर्वत्र संस्कृत और पाली का बोलबाला था। हुएनसांग को, जो गोबी (ओकिनि अर्थात् अग्नि) की मरुभूमि से आया, भारतीय लिपि से ही मिलती-जुलती लिपि गोबी के आसपास के प्रदेशों में मिली। बुद्धदेव की मूर्ति, संघाराम तथा अनेक मन्दिर भी मिले। वह अक्षु से होता हुआ आक्सस की तराई में आया और वहाँ से बल्ख़ चला गया। यह बल्ख़ अपने मन्दिरों की बहुलता के कारण राजगृह कहा जाता था। आश्चर्य नहीं, यदि सर आरेलस्टेन को खोटन की बालुका के अन्दर संस्कृत और प्राकृत के गड़े हुए ग्रन्थ मिले। उधरके शहरों के नाम तक संस्कृत और प्राकृतमय हैं। प्रिन्सिपल सेन के अनुसार यह भारतवर्ष से पूर्व तुर्किस्तान के परस्पर-संसर्ग का अचूक सम्भवनीय प्रमाण है। यह संसर्ग वैदिक सभ्यता से भी पूर्व का होगा। +ईरानी आर्यों की शाखा कब और कहाँ से अलग हुई? +अब हम अपनी लक्ष्य-पूर्ति के लिये उन आर्यों की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं, जो भारतीय शाखा से अलग हो ईरान की ओर चले गये। हम ऊपर कह चुके हैं कि भारतीय आर्य उस स्मरणातीत समय में अलग हुए, जब उनके वैदिक देवताओं की संख्या बहुत बढ़ने नहीं पायी थी। ’आर्यानां व्रजः’ कहाँ है-इसका स्पष्टीकरण ही इन दोनों शाखाओं के अन्तिम मिलन का इतिहास होगा। वे अवश्य ही उस समय विलग हुए, जब वे ’आर्यानां व्रजः’ में रहते थे। सेन महोदय ने आक्सस-नदी के कहीं पश्चिमोत्तर-प्रदेश में इसका होना बतलाया है। अतएव यह कैस्पियन या कश्यप सागर के दक्षिण-पूर्ववर्त्ती प्रान्त में कहीं हो सकता है। ज़ेन्दावेस्ता के भौगोलिक वर्णन से यह बात स्पष्ट हो जायगी। किन्तु भौगोलिक वर्णन के पूर्व यह निश्चय कर लेना उचित है कि आर्यों के इस परस्पर वैमनस्य का कारण क्या हो सकता है। +दिति और अदिति की कथा तथा आर्यों का परस्पर संघर्ष. +कश्यप ऋषि की दो पत्नियों से दैत्यों और आदित्यों की उत्पत्ति की कथा सबको विदित है। बहुत सम्भव है, कश्यप-सागर के आसपास ही कश्यप ऋषि का रहना हुआ हो। दैत्य और आदित्य की कथा में देवासुर-संघर्ष का आभास मिल जाता है। पारसियों के इष्टदेव ज़ोरोस्टर को ज़ेन्दावेस्ता में ’मंथ्रन’ कहा गया है। आर्यों के प्राचीन इष्टदेव पारसी और भारतीय आर्यों के बिलकुल एक ही हैं। ज़ोरोस्टर ने आर्यों से मतभेद होते ही देव-पूजक आर्यों के विरुद्ध बग़ावत शुरु कर दी। ऋग्वेद के प्राचीन सूक्तों में सुर और असुर की भिन्नता न होने पर पीछे यह भेदभाव बहुत प्रबल हो गया है। असुरों के विरुद्ध देवदल और देवदल के विरुद्ध असुरदल पीछे प्रकट हो गये हैं। आश्चर्य तो यह है कि जिस तरह फ़ारस यानी ईरान में देव का अर्थ राक्षस हो गया है, उसी प्रकार भारतवर्ष में भी असुर का अर्थ राक्षस ही समझा जाता है ! मुसलमानों के "हिन्दू" शब्द की व्याख्या में भी यही भेदभाव सन्निहित पाया जाता है, जिसका अर्थ वे कुछ और ही करते हैं। कम-से-कम इतना तो निश्चित है कि भारतीय तथा पारसी आर्य किसी बड़ी बात को लेकर ही एक दूसरे से ज़ुदा हुए। धार्मिक विकास अधिकतर भारतीय आर्यों के ही द्वारा हुआ। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय शाखा का झुकाव इस ओर अधिक था तथा उनकी विचारधारा दिन-दिन आगे की ओर बढ़ती गयी। चाहे ये दोनों दल आक्सस-नदी के आसन्न प्रान्तों से विलग हुए हों चाहे और किसी स्थान से, परन्तु वे अलग हुए विकट वैमनस्य के बाद ! यह बात तब और भी पुष्ट हो जाती है, जब हम देखते हैं कि दोनों शाखाओं के मार्ग दो हो गये। ईरानी शाखा को सहज मार्ग मिला और भारतीय शाखा को पहाड़ी प्रदेशों की शरण लेनी पड़ी। ऋग्वेद की एक-एक पंक्ति से, पथ की दुर्गमता दूर करने के लिये, एक आहभरी दीन प्रार्थना प्रकट होती है। भारत में आ जाने पर आर्यों को ऐसी कठिनाई नहीं थी कि उन्हें पग-पग पर अत्याचारी शत्रुओं के नाश के लिये इष्टदेवों की दुहाई देनी पड़ती। अत्याचार-प्रिय अन्य शाखा से हार मानकर ही इन्हें यह मार्ग पकड़ना पड़ा होगा। +अवेस्ता से भौगोलिक ज्ञान तथा उससे ईरानी शाखा के इतिहास पर प्रकाश. +यह निश्चित करने के पूर्व कि आर्य लोग उत्तर की ओर से दक्षिण की ओर हिमालय के मार्ग से आये और आर्यावर्त्त के कुरुक्षेत्र तक फैलते-फैलते अपने प्राचीन उत्तर-कुरु की स्मृति में कुरुक्षेत्र का उद्घाटन जम्बूद्वीप में किया, यह जान लेना जरूरी है कि ईरानी शाखा किस मार्ग से यहाँ आकर बसी और कालान्तर में उसकी स्थिति और मनोवृत्ति कैसी रही। अहुर (असुर) मज़्द ने, जो ईरानी शाखा के ज़ोरोस्टर-सम्प्रदाय के नायक थे, १६ प्रदेश बसाये थे, जिनमें निम्नलिखित प्रदेशों का आधुनिक प्रदेशों से मिलान हो चुका है- +ऊपर की तालिका से स्पष्ट है कि ईरानी शाखा भारतीय शाखा से अलग हो पहले पहल ’आर्यानां व्रजः’ (Aryanem vaejo) में ही रही। इसका अर्थ है कि आर्यों की भूमि। इस नामकरण से यह स्पष्ट है कि वे भी आर्य-शब्द की स्मृति में अपने वासस्थान का नाम रखना पसन्द करते थे। यह व्रज Vanguhi Daliya पर बसा हुआ समझा जाता है। यह नदी आक्सस-नदी के कहीं उत्तर-पश्चिम की ओर थी। इसके बाद वे लोग क्रमशः समरकन्द, मर्व, बल्ख, हेरात, काबुल और सप्तसिन्धु अर्थात् पंजाब की ओर बढ़ते गये। इस भौगोलिक वर्णन में एक बात, जिस पर हमें विचार करना है, यह है कि जिस प्रकार हमारे साहित्य में मेरु या उत्तर-कुरु से आरम्भ कर किम्पुरुषवर्ष आदि होते हुये हिमवन्त और जम्बूद्वीप का क्रमिक सम्बद्ध वर्णन है, उसी प्रकार और ठीक उसी प्रकार ईरानियों की गति का सिलसिला भी पाया जाता है। किसी भी सुधी को एक नज़र डालने से यह स्पष्त विदित हो जाता है कि दोनों शाखाओं के दो भिन्न-भिन्न मार्ग हैं; दो भौगोलिक सम्प्रदाय हैं; दोनों के वियोग के अनन्तर भिन्न-भिन्न देवता हैं ! एक बात और; ’आर्यानां व्रजः’, Celestial Mountain (स्वर्गीय पर्वत)-जिसका नाम Thianshan भी है-के ठीक निकटवर्त्ती प्रदेश हैं। दोनों शाखाओं के विद्रोह पर दृढ़ विश्वास तब और भी हो जाता है, जब हम यह देखते हैं कि इन्द्र, जो भारतीय शाखा के आराध्य देव हैं, पारसियों के लिये एक दुर्दान्त दैत्य हैं। ऋग्वेद की ऋचाएँ इसकी साक्षी हैं। इन्द्र, जिनके आर्य लोग बड़े कृतज्ञ हैं, बारबार अपनी वीरता की प्रशंसा सुनते हैं। उन्होंने असुरों का दल-बल नष्ट कर आर्यों की सहायता की है। देव और असुरों की लड़ाई में वह सदा अग्रसर रहते हैं। इन्द्र इन्हीं स्वर्गीय पर्वतों पर रहते थे। सुमेरु-पर्वत का निर्देश हमें Thianshan या Celestial या स्वर्गीय पर्वतों में मिल जाता है। अवश्य ही सुर और असुरों का यह घोर युद्ध ईरान के पूर्वी सीमा-प्रान्त में हुआ होगा। Vendidad के वर्णनानुसार मर्व (Merv) पापपूर्ण और नष्ट-भ्रष्ट हो गया था। इसी प्रकार निशय (Nisaya) जो मर्व और बल्ख के अन्तर्गत था, पाप और नास्तिकता का परिपोषक था, हेरात अश्रुपात और विकल वेदना से परितप्त था; और Vaekereta या काबुल में बुतपरस्ती बढ़ रही थी, तथा किरिसस्प (Keresaspa) देवपूजक बन गये थे। +ये दोनों शाखायें कब और कहाँ अलग हुईं, इसका ठीक-ठीक अंदाज़ा करना कठिन है; परन्तु इतना अनुमान किया जा सकता है कि आक्सस के दक्षिण और थियानशान या मेरु-पर्वत-माला के निकटवर्ती प्रदेशों में कहीं इनके दो दल हुए। इन्द्र भारतीय शाखा के प्रमुख जान पड़ते हैं। अहुरमज़्द के नेतृत्व में दूसरा दल रहा होगा। एक का दूसरे को विधर्मी समझना तथा एक का दूसरे के इष्टदेव को दैत्य बनाना धार्मिक असहिष्णुता की पराकाष्ठा है। अस्तु, ज़ेन्दा अवेस्ता ’आर्यानां व्रजः’ से मर्व, बल्ख, ईरान, काबुल और सप्तसिन्धु का निर्देश देता है। इससे यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ईरानी शाखा यानी पारसी, आर्यों से विलग हो, ईरान की अधित्यका को तय करते हुए काबुल की राह से सप्तसिन्धु तक फैल गये। भारतीय शाखा भी काबुल की राह से आयी, यह अत्यन्त ही सन्देहास्पद सिद्धान्त है। जब हम देखते हैं कि ज़ेन्दावेस्ता अपने भूगोल का मानचित्र इस प्रकार खींचता है तथा वैदिक साहित्य का काबुल से ही अपना बयान प्रारम्भ कर पूर्व की ओर बढ़ता है, तब हम दो ही निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं- एक तो यह कि आर्य लोगों के सप्तसिन्धु से ही दो दल हो गये और ईरानी शाखा सप्तसिन्धु से पश्चिमोत्तर-प्रदेश की ओर बढ़ चली। और, दूसरे यह कि भारतीय शाखा उत्तर की ओर से सीधे सिन्धु-नदी की राह से आयी तथा सप्तसिन्धु में फैलकर पूर्व की ओर बढ़ने लगी। इसी बीच में, जब कि पामीर, काराकोरम और सिन्धु के मार्ग से काबुल तक फैल गयी, ईरानी शाखा भी पूर्व निर्दिष्ट मार्ग से काबुल तक फैल गयी। सम्भवतः यहाँ फिर उनकी ईरानियों से मुठभेड़ हो गयी। दोनों शाखाओं का लक्ष्य सप्तसिन्धु की ओर ही था, यह एक सन्देह की बात हो सकती है; परन्तु हम ज़रा अधिक विचार करके देखते हैं, तो साफ़ प्रकट हो जाता है कि दोनों दल के विस्तार के लिये दूसरा कोई क्षेत्र नहीं था। थियानशान के पूर्व थोड़ी ही दूर पर गोबी की मरुभूमि दीख पड़ती है। उस समय इस मरुभूमि का क्या रूप था, सो तो ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता; परन्तु या तो यह समुद्र था या जैसा कुछ भूतत्त्वविशारदों का कथन है, या यह पहाड़ी-धूसरित चट्टानों की राशि थी। भूतत्त्ववेत्ताओं का कथन है कि साइबेरिया जिस अवस्था में आज है, उसी अवस्था में कभी मध्य-एशिया का यह भाग रहा होगा। साइबेरिया में प्राचीन कालीन वन के चिह्न मिलते हैं और ऐसा अनुमान किया जाता है कि किसी समय इसकी आबोहवा ऐसी थी कि मनुष्य यहाँ रह सकते थे। तात्पर्य यह कि भारतीय शाखा को सिवा मानसरोवर से जाकर तिब्बत तक फैलने के दूसरा कोई चारा नहीं था। सम्भवतः वे भारतवर्ष में एक ही बार नहीं आये, अपितु समय समय पर अपनी सुविधानुसार आते रहे। +ऋग्वेद के सूक्तों में ईरान की अधित्यका या काबुल के पश्चिमी प्रदेशों का आभासन मिलकर हिमालयोत्तर-प्रदेश की स्मृति का आभास मिलता है-ऋग्वेद के अध्ययन से इस बात का पता चल जायगा कि जिन प्राकृतिक दृश्यों को देखकर आर्य-ऋषि मन्त्रमुग्ध हो अपनी सरल परिमार्जित कविता की अंजलि समर्पित करते थे, वे प्राकृतिक दृश्य हिमवन्त के इस पार या उस पार ही सुलभ हैं। उन स्तुतिपूर्ण कविताओं में वे प्रकृति का दृश्य खींचते तथा अपने मंगल और विभव की अभ्यर्थना करते हैं। लोकमान्य जिन सूक्त या ऋचाओं के आधार पर आर्यों को हिमालयोत्तर-प्रदेशों के आदि-निवासी बताते हैं, वे सूक्त उनकी स्मृति के जीते जागते चित्र हैं। सम्भवतः आज कोई भी लो. तिलक के सिद्धान्तों का खण्डन सफलतापूर्वक नहीं कर सकता। चाहे आर्य पहले-पहल उत्तर ध्रुव के निकटवर्ती वृत्त के निवासी रहे हों चाहे और इधर आकर साइबेरिया के मैदान में बसे हों, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा कि वे आये उसी दिशा से और अन्त तक, आर्यावर्त में बस जाने तक, अपनी पुण्य-स्मृति को ताज़ा रखते गये। उत्तर-कुरु के भौगोलिक निर्देश से यह स्पष्ट ही प्रकट हो जाता है कि आर्य लोग अन्त तक ’कुरु’ शब्द से प्रेम रखते गये। आर्यों का यह ऐतिहासिक और भौगोलिक सिलसिला ठीक उतना ही सत्य है, जितना उनका प्राकृतिक दृश्यों का मनन कर दर्शन और ज्योतिष-शास्त्र का विकास करना। ऋग्वेद के कौन सूक्त कब रचे गये, यह सन्दिग्ध होने पर भी यह कहा जा सकता है कि कौन सा सूक्त किस विषय को निर्दिष्ट कर रहा है। हम नीचे उन सूक्तों को देते हैं, जिनकी व्याख्या तिलक के बाद सभी वैदिक विद्वान् करने लगे हैं-

+अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृशे कुहचित् दिवेयुः ?
+अद् वधानि वरुणस्य व्रतानि विचाकशत् चन्द्रमा नक्तमेति।

+अर्थात् वे ऋक्ष (सप्तर्षि), जो उच्च गगन-मण्डल में स्थित हैं, रात में देखे जाते हैं। वे दिन में कहाँ चले जाते हैं ? वरुण के कामों को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। उन्हीं की आज्ञा से चन्द्रमा रात में चान्दनी देते हैं। +यह ऋचा उस समय बनी होगी, जब आर्य लोग उत्तर-ध्रुव के प्रदेशों से हटकर बहुत इधर आ गये होंगे। तिलक महोदय ने ऋचाओं के बल पर यह दिखलाया है कि वे जहाँ रहते थे, वहाँ एक ही तारा (उत्तर-ध्रुव) बराबर प्रकाशित था, जहाँ दिन कम और रात बहुत बड़ी होती थी। यह उत्तरीय प्रदेशों का चित्र है। उपर्युक्त ऋचा वहीं बनी , जहाँ दिन-रात क्रम से होते रहे होंगे, और चन्द्रमा का भी उदय होता होगा। +पवेपयन्ति पर्वतान् विविञ्चन्ति वनस्पतीन्। प्रो आरत मरुतो दुर्मदा इव देवासः सर्वथा विशा॥ +अर्थात् पर्वतों को हिलाते हुए, वृक्षों को गिराते हुए, हे मरुतो ! तुम मदमत्त देवों की भाँति अबाध रूप से चलते हो।

+दासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठत् निरुद्धा आपःपणिनेव गावः।
+अपां विलमपि हितं यदासीत् वृत्रं जघन्वा अप तत् ववार॥

+अर्थात् पणि द्वाराछिपायी गायों की भाँति जल वृत्रा द्वारा जो उनके पति और स्वामी हैं, रोक दिया गया। इन्द्र ने वृत्रा का वध किया और मार्ग स्वच्छ कर दिया, जिससे पानी बह गया, जो वृत्रा द्वारा रोक दिया गया था। +उपर्युक्त वर्णन ऋषियों का आंखों देखा है। वृत्रा का अर्थ मेघ है। प्रायः पहाड़ी नदियाँ, जो बहुधा सूखी रहती हैं, वर्षा होने पर ज़ोरों से उमड़कर बहने लगती हैं। दूसरी ऋचा से पहाड़ी तूफ़ानों से होनेवाला वृक्ष-कम्पन साफ़-साफ़ नज़र के सामने आ जाता है। यह दृश्य पञ्चनद की समभूमि पर सम्भव नहीं। यह उस समय की स्मृति है, जिस समय आर्य हिमालयोत्तर पहाड़ी प्रदेशों में रहते होंगे। +एक दूसरी ऋचा जो ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के १५वें सूक्त में है, स्पष्ट कर देती है कि आर्य लोग सिन्धु नदी के उद्गमस्थान, काश्मीर के पूर्वोत्तर-प्रदेश, मानसरोवर के निकट, पास से पंजाब में आये। यह ऋचा निम्नलिखित है-

+सोदञ्चं सिन्धुमरिणात् महित्वा वज्रेणान उषसः संपिपेव।
+अजवसो जविनीभिः विवृश्चन् सोमस्य ता मद इन्द्रश्चकार॥

+अर्थात् इन्द्र ने अपनी महत्ता से सिन्धु-नदी को उत्तर की ओर बहा दिया तथा उषा के रथ को अपनी प्रबल तीव्र सेना से निर्बल कर दिया। इन्द्र यह तब करते हैं, जब वह सोम मद से मत्त हो जाते हैं। सिन्धु-नदी अपने उद्गम-स्थान मानसरोवर से काश्मीर तक उत्तर-मुँह होकर बहती है; काश्मीर के बाद दक्षिण-पश्चिम-मुखी होकर बहती है। सम्भवतः इन्द्र ने पहाड़ी दुर्गम मार्ग को काटकर, सिन्धु-नदी के संकीर्ण मार्ग को विस्तीर्ण कर उत्तर की ओर नदी की धारा स्वच्छन्द कर दी हो। इससे आर्यों का मार्ग बहुत सुगम हो गया होगा। यह मत निम्नलिखित ऋचा से और भी दृढ़ हो जाता है-

+इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री।
+अहन् अहि मन्वपस्ततर्द प्रवक्षणा अभिनत् पर्व्वतानाम्। (ऋ.मं. १/३२/१)

+अर्थात् इन्द्र के उन पुरुषार्थपूर्ण कार्यों का वर्णन करूँगा जिनको उन्होंने पहले-पहल किया। उन्होंने अहि यानी मेघ को मारा; (अपः) जल को नीचे लाये और पर्वतों को जलमार्ग बनाने के निमित्त काटा (अभिनत्)।
+इसके बाद ही इसी सूक्त की आठवीं ऋचा इस प्रकार है-

+नदं न भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अतियन्ति आपः।
+याः चित् वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत् त्रासामहिः यत्सुतः शीर्बभूव॥ (१/३२/८)

+अर्थात् ठीक जिस प्रकार नदी ढहे हुए कगारों पर उमड़कर बहती है, उसी प्रकार प्रसन्न जल पड़े हुए वृत्र (बादल) पर बह रहा है। जिस वृत्रा ने अपनी शक्ति से जल को जीते-जी रोक रक्खा था, वही (आज) उनके पैरों तले पड़ा हुआ है। +यह दृश्य पहाड़ी प्रदेशों के दृश्य का स्मरण दिलाता है। वर्षा होने के समय काले-काले बादलों के झुण्ड और पंक्तियाँ, बिजली की चमक, तड़क-भड़क के साथ गर्जन और अन्त में वृष्टिपात होने पर जल की अटूट धारा तथा मेघों का लोप ! ऐसे मनोरम हृदयाकर्षक दृश्य को देखकर-जिसमें मेघ पहाड़ों के सिर पर अड्डा जमाये रहते हैं और बरस जाने पर यत्र-तत्र हलके होकर विलीन हो जाते हैं-आर्यों का यह चित्र खींचना बिलकुल स्वाभाविक है। ऐसी ऋचायें प्रचुर मात्रा में मिलती हैं।

+तुलनात्मक अध्ययन के लिये ईरानी शाखा का गतिक्रम दिया जाता है-
+अवेस्ता और ऋग्वेद में आर्यों के आदि-निवास की झलक. +ऋग्वेद और ज़ेन्दा-अवेस्ता (Zenda Avesta) दोनों में उत्तरीय ध्रुव के निकटवर्ती प्रदेशों की लम्बी छः महीने वाली रातों की स्मृति विद्यमान है। लोकमान्य तिलक का उत्तरीय ध्रुव के प्रदेशों को आर्यों का आदि-निवास-भूमि बतलाना तथा ज्योतिर्गणना के आधार पर ख्रीष्टाब्द से हज़ारों वर्ष पूर्व उन ध्रुव-प्रान्तों में आर्यों के रहने का सिद्धान्त ध्रुव-सा ज्ञात होता है। वहाँ से महाप्रलय (The Great Deluge) के उपरान्त Post Glacier Period में वे लोग साइबेरिया के विस्तृत भूभाग में, सम्भवतः आधुनिक यूराल पर्वतश्रेणी से पूर्व और पश्चिम दोनों ओर फैल गये होंगे। भूतत्त्व-विशारदों के कथनानुसार साइबेरिया उस समय अनुकूल बसने योग्य आबोहवा में रहा होगा, जैसा कि उस मैदान के अन्दर पाये जाने वाले पौधों और जन्तुओं के कंकाल से अनुमान किया जाता है। मैंने यूरेशिया का एक मानचित्र अपनी सुविधा के लिये तैयार किया है, जो इस लेख के साथ नहीं दिया गया है। उसमें मैंने प्राचीन और अर्वाचीन नामों की तुलना कर आर्यों की गति का चित्र खींचा है। यह चित्र काल्पनिक होने पर भी लोकमान्य के सिद्धान्त के समर्थन के साथ-साथ पुराण तथा महाकाव्यों में वर्णित भौगोलिक क्रम की पूर्ण परिपुष्टि करता है। इससे स्पष्ट विदित हो जायगा कि पुराणकारों तथा महाकाव्य के रचयिताओं को अपने आदिकालीन सनातन इतिहास और भूगोल का स्मरण था। वे अपने आदि-निवास-स्थल का पुण्य-स्मरण कर उनकी विविध प्रशंसा करते हैं। वे उन स्थानों को पवित्र समझते और वहाँ विविध सुख की कल्पना करते हैं। बौद्ध साहित्य, जिसका इन दिनों ज़ोरों के साथ अध्ययन हो रहा है, इस विषय पर प्रकाश डालता है। हिमालयोत्तर-प्रदेशों तथा पर्वतश्रेणियों के नामों में संस्कृतत्व का आभास मिल जाता है। +अर्वाचीन और प्राचीन नामों की तुलना से सम्भवनीय स्थान-निर्देश. +मैं उत्तर-ध्रुव से आरम्भ कर, ऐसे शब्द-साम्य का दिग्दर्शन करा आर्यों की प्राचीन स्थिति की एक झलक देखने का प्रयत्न करूंगा। मैंने अपने कल्पित मानचित्र में अर्वाचीन प्रचलित नामों को और जहाँ-तहाँ प्राचीन पौराणिक नामों को अंकित किया है। उत्तर-महासागर (Arctic ocean) के दक्षिण कारासागर और नोवा ज़ेम्बला (Nova Zembla) द्वीप के दक्षिण कोरा का मुहाना है। वायु पुराण के अनुसार कुरु उत्तरतम प्रदेश माना गया है। ब्रह्माण्ड पुराण इसे उत्तर समुद्र के तट ही पर दक्षिण की ओर मानता है। पद्मपुराण कुरु के बदले ऐरावत को उत्तर-समुद्र के दक्षिण और शृङ्गवान्-पर्वतके उत्तर मानता है। यह ऐरावत, पद्मपुराण के अनुसार ऐसा स्थान है जहाँ सूर्य की गति भी नहीं है। अतएव ब्रह्माण्डपुराण का कुरु-वर्ष या उत्तर-कुरु ही पद्मपुराण में ऐरावत हो गया है और पद्मपुराण में, उत्तर-कुरु मध्य-एशिया में आकर मेरु-पर्वत के पास ही उत्तर और नील-पर्वत के पास दक्षिण हो गया है। वायुपुराण का कुरु जम्बूद्वीप का उत्तरतम प्रदेश है; पद्मपुराण में यह भारत और उत्तर ध्रुव के बीच में आ गया है। यह आर्यों के उत्तर की ओर से, महाप्रलय के बाद, एशिया में आने का द्योतक है। मैं वायुपुराण के ’कुरु’, को जो उत्तर-समुद्र के समीप यानी ध्रुव-प्रदेश में है-कारा-सागर (Karasea) और कोरा के मुहाने (Strait of Kora) के आस-पास के स्थलों में मानता हूँ। यह कारा-सागर ही पद्म-पुराण या ब्रह्माण्ड पुराण का उत्तर-समुद्र है। यह कारा-सागर के ठीक दक्षिण है। आजकल जिसे North Sea कहा जाता है, वह योरप के उत्तर है। किन्तु उस समय जब आर्य लोग उत्तर-ध्रुव के निकटस्थ प्रदेशों में रहते थे, कारा सागर ही उत्तर समुद्र का द्योतक हो सकता है। ’कारा’ और ’कोरा’ शब्दों से कुरु शब्द का निकटतम सम्बन्ध भी है। +शृङ्गवान् , ऐरावत, यूराल नदी या संस्कृत का ’इरालय’. +शृङवान्-पर्वत का पता लगाना कुछ टेढ़ा अवश्य मालूम होता है; परन्तु इसके अर्थ पर ध्यान देने से विदित होता है कि किसी पर्वत को, जिसके शिखर (शृङ्ग) हो, शृङ्गवान् कहा जा सकता है। पद्मपुराण उत्तर-समुद्र के बाद ऐरावत का होना मानता है; और शृङ्ग इसके दक्षिण है, अतएव उत्तर-समुद्र और शृङ्ग (Mammoth Country) के बीच ऐरावत का होना निश्चित हुआ। इस ऐरावत-वर्ष में भी सूर्य की गति नहीं है। ऐरावत शब्द ’इर्’ धातु से बना हुआ है। ’इर्’ और ’इल्’ धातु जाने के अर्थ में प्रयुक्त हैं। अतएव ’इरा’ का अर्थ पृथ्वी भी होता है। जल और सरस्वती के अर्थ में भी इसका प्रयोग हुआ है। इरावत का अर्थ समुद्र और इसी प्रकार इराधर और इलाधर का अर्थ पहाड़ होता है। इरेश का प्रयोग हम वरुण के अर्थ में करते हैं। ऋग्वेद में वरुण की महिमा बहुत गायी गयी है। इन्द्र के समान वरुण भी धीरे-धीरे आर्यों के प्रधान देवता बन गये हैं। इरावत का अर्थ समुद्र होने से, ऐरावत (स्वार्थे अण्) का अर्थ समुद्र-तट का वासी हो सकता है। उत्तरीय ध्रुव के प्रदेशों में सूर्य की गति नहीं है। ऐरावत में भी सूर्य का प्रकाश दुर्बल माना गया है। चूँकि यह ऐरावत-शृङ्ग के उत्तर है, अतएव यूराल-पर्वतश्रेणी के उत्तर-स्थित प्रदेशों को ऐसा मान लेने में कोई अड़चन नहीं जान पड़ती। देखकर आश्चर्य होता है कि उत्तर-ध्रुव से आरम्भ कर मध्य-एशिया के प्रदेश से लेकर फ़ारस या अफ़गानिस्थान और भारतवर्ष की अर्वली-पर्वत-श्रेणी तक ऐसे तत्सम शब्दों का ताँता लगा हुआ है। यही यूराल-पर्वतश्रेणी आर्यों का दूसरा अड्डा हो सकता है। यहीं के आस-पास के स्थान ऐरावत देश के द्योतक हैं। यूराल-पर्वत से ’यूराल’ नाम की एक नदी भी निकलती है। यह नदी कैस्पियन-सागर में गिरती है। ’इरा’ का अर्थ जल होने से इरालय का अर्थ नदी हो जाता है। आर्यों की योरपीय शाखा सम्भवतः यूराल-पर्वत-श्रेणी के आसपास के प्रदेशों से ही अलग हुई। +इलास्पद, इरास्प (द) और योरप का साम्य. +इसका नाम इलास्पद और इरास्पद दोनों हो सकता है। यदि हम इसी स्थान को इलास्पद या इरास्पद मान लें, तो योरप के नामकरण में भी हमें इरास्प (द) का आभास मिल जाता है। स्वामी दयानन्द ने योरप की तुलना हरिवर्ष से की है। हरि का अर्थ पीत और बन्दर भी है। हरिनेत्र का अर्थ पीली आँखवाला भी है। यह हरिवर्ष योरप का नाम भी हो सकता है; परन्तु प्रिन्सिपल महोदय ने इस हरिवर्ष को पामीर-पर्वत-श्रेणी के उत्तर और थियानशान के दक्षिणवर्ती प्रदेशों के बीच बतलाया है। चूँकि आर्य लोग अपने प्रिय नामों को जहाँ गये, अपने साथ लेते गये, इसलिये हरिवर्ष को योरप मानने में कोई बाधा नहीं। योरपवासियों की नेत्राकृति से भी यह युक्तिसंगत मालूम होता है। पीछे से हरिवर्ष हिमालयोत्तर-प्रदेश हो गया। +इलावृत और एलबर्ज़ पर्वत का साम्य. +इसके अनन्तर वायुपुराण में हिरण्मयवर्ष का होना बतलाया गया है। हिरण्मय के बाद श्वेत-पर्वत और उसके बाद रम्यक-वर्ष है। रम्यकवर्ष के बाद नीलपर्वत और तत्पश्चात् इलावृत है। हम एशिया के मानचित्र में इन पाञ्च स्थानों का क्रमिक निर्देश करते हुए इलावृत का निर्देश Elburz (एलबर्ज़)-पर्वत से कर सकते हैं। यह एलबर्ज़ कास्पियन-सागर के उत्तर पश्चिम तक फैला हुआ है। इन पहाड़ी प्रदेशों के उत्तर काकेसस पर्वत है। काकेसस पर्वत के निकटवर्ती प्रदेश की भूमि, लोकमान्य तिलक के पूर्व आर्यों की आदि-भूमि मानी जाती थी। यदि एलबर्ज़ के आसपास (कास्पियन-सागर के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्व तक) आर्यों के इलावृत-देश को मान लें तो काकेसस, जो नील-सागर के उत्तर-पूर्व है, नील-पर्वत का स्थान ग्रहण कर सकता है। +रम्यकवर्ष और श्वेतपर्वत. +वायुपुराण नीलपर्वत के बाद रम्यकवर्ष का होना बतलाता है। सम्भवतः आर्य लोग ऐरावतवर्ष से दक्षिण की ओर यूराल-नदी के तटवर्ती प्रदेशों से आकर कास्पियन-सागर से उत्तर, काकेसस (नीलपर्वत) से एशियाई टर्की के अरब-सागर (इरा = जल) तक फैल गये हों। यह प्रदेश यूराल पर्वत की तराई होने के कारण सुन्दर है तथा पहाड़ी प्रदेश यहाँ बहुत कम है। बहुत सम्भव है, इस रम्यक-भूमि के उत्तर यूराल की पर्वतश्रेणी में कोई श्वेतपर्वत भी रहा हो। श्वेतसागर (White sea) कोरासागर के पश्चिम की ओर अब तक विद्यमान है। वायुपुराण, ऐरावत के बाद शृंगवान् और शृंगवान् के बाद हिरण्मय वर्ष का होना बतलाता है। यह हिरण्मयवर्ष सम्भवतः यूराल-पर्वतश्रेणी के आसपास ऐरावतवर्ष के दक्षिण-पश्चिम की ओर रहा होगा। अथवा हो सकता है, यह यूराल-पर्वतश्रेणी के पश्चिम से यूराल-नदी के तट तक फैला हुआ हो। +मध्यएशिया के प्रदेशों में आर्यों का रहना और वहाँ से भारतीय और ईरानी शाखाओं का अलग-अलग होना- इसमें संदेह है कि आर्य लोग रम्यकवर्ष के बाद ऐरल-सागर की ओर से ’आर्यानां व्रजः’ में आये या एलबर्ज़ (इलावर्त) के बाद कास्पियन-सागर केपूर्व की ओर ऐरल-सागर की ओर फैल गये। +ऐरल-सागर और ऐरावत का साम्य. +ऐरल-सागर के ऐरावत से साम्य होने के कारण संभव है। यूराल-नदी के तटवर्ती प्रदेशों से होते हुए ऐरल की ओर कुछ लोग बढ़ गये हों और कुछ आर्य काकेसस से होते हुए फिर भी समयान्तर में कास्पियन-सागर के पूर्ववर्ती प्रदेशों की ओर आक्सस (अक्षु) नदी के तटों पर ऐरल-सागर तक फैल गये हों। चूँकि आर्यों की दोनों शाखाएँ इसी आक्सस नदी के तटवर्ती प्रदेशों से अलग हुई बतायी जाती हैं और चूँकि ईरानी आर्यों की प्रथम भूमि ’आर्यानां व्रजः’ है, इसलिये ’आर्यानां व्रजः’ का आक्सस-नदी के उत्तर-पश्चिम की ओर होना निश्चित किया गया है। चाहे कहीं भी हो, लेकिन यह प्रदेश ऐरल के दक्षिण, आक्सस से पूर्व-उत्तर और कास्पियन से पूर्व की ओर कहीं रहा होगा; क्योंकि इसके बाद ईरानियों का दूसरा प्रदेश स्रग्ध (समरकन्द) है। भारतीय शाखा ’आर्यानां व्रजः’ से ही ईरानियों से अलग हुई, ऐसा प्रतीत होता है। पूर्वी टर्की में ताजिक (Tajik) -नामक आर्य-जाति का रहना माना जा चुका है। यही पीछे टर्की के पहाड़ी प्रदेशों में जा बसी और वहाँ पर यह आज गल्च (Galch) कही जाती है। आक्सस-नदी ऐरल-सागर से निकलती है और यह निर्विवाद सा है कि दोनों शाखायें आक्सस-नदी के दोनों तटों पर कभी रहती थीं। जब हम टर्की में आर्यों के कभी रहने का पता पाते हैं और जब उनमें भारतीय आर्यों की संस्कृति का आभास मिलता है, तो यह कहना कि आर्य लोग आक्सस-नदी के उस भाग से आये, जो ऐरल-सागर से आरम्भ होकर नदी के पूर्वी तट पर फैला हुआ है, अयुक्तिक नहीं है। ईरानी लोग समरकन्द, बल्ख़ और मर्व की ओर बढ़ते गये और भारतीय आर्यशाखा दक्षिण-पूर्व प्रदेशों की ओर बढ़ती-बढ़ती समय पाकर थियानशान, तारीम और कुएनलन-पर्वतश्रेणी से सिन्धु-नदी के मुहाने तक फैल गयी होगी। +ईरानी शाखा के विलग होने पर आर्यों का गतिक्रम. +वायुपुराण का भौगोलिक वर्ष-विभाग प्राय़ः पर्वतश्रेणिओं से विभक्त है। हम ऊपर दिखा चुके हैं कि किस प्रकार प्रत्येक वर्ष (Country) पर्वतों या सागरों से सीमाबद्ध है। हम यह भी देखते हैं कि एलबर्ज़-पर्वतश्रेणी से आक्सस-नदी के तट-प्रान्तों तक एक बृहत् मैदान फैला हुआ है, जिसके किसी भाग-विशेष को ही ’आर्यानां व्रजः’ कहना होगा। चूँकि इलावृतवर्ष के बाद वायुपुराण में मेरु-पर्वत का नाम आया है, इससे कहना पड़ता है कि एलबर्ज़-पर्वत से मेरु तक का भूभाग ’आर्यानां व्रजः’ का द्योतक रहा होगा। आक्सस का पश्चिमी किनारा ईरानियों और पूर्वी किनारा भारतीय आर्यों के हाथ में रहा हुआ माना जा सकता है। एलबर्ज़ और मेरु के बीच का भूभाग उस समय उपजाऊ और सुखद रहा होगा तथा आर्यों के संघर्ष का कारण भी यही बना होगा। ईरानी शाखा ने, सम्भवतः ज़बर्दस्त और अपेक्षाकृत अशिक्षित होने के कारण भारतीय शाखा को दक्षिण-पश्चिम यानी ईरान की ओर जाने से रोक दिया हो और भारतीय शाखा को पर्वतीय प्रदेशों की शरण लेने को विवश होना पड़ा हो। यह मेरु-पर्वत कौन सा पर्वत है, यह अभी तक ठीक-ठीक नहीं कहा जा सका है; परन्तु जब हम देखते हैं कि महाभारत में किम्पुरुषवर्ष के बाद हाटक, हाटक के बाद मानसरोवर, मानसरोवर के बाद समीप ही गन्धर्व और गन्धर्व के बाद हरिवर्ष यानी उत्तर-कुरु है, तो हमें कहना पड़ता है कि यह हरिवर्ष थियानशान-पर्वत के दक्षिण और पामीर के पूर्ववर्ती प्रदेश का नाम रहा होगा। इन प्रदेशों के आसपास ही तुर्किस्तान की मरुभूमि है। यह मरुभूमि उस समय किस दशामें थी, यह कहना तो मुश्किल है; परन्तु इसकी दशा उस समय आज की-सी ही होगी, यह सन्देहात्मक है। सम्भवतः यह दशा बर्फ़ से गली चट्टानों के कारण हुई हो। चीनी भाषा में ’थियान’ का अर्थ स्वर्ग और ’शान’ का अर्थ पहाड़ है। हम उत्तर-कुरु के प्रदेशों का वर्णन महाभारत में या बौद्ध साहित्य में स्वर्ग का-सा पाते हैं। हम अल्टाई-पर्वत के नाम में भी संस्कृत की छाप पाते हैं। क्या यही थियानशान उत्तर-कुरु-प्रदेशों की उत्तरी सीमा हो सकती है ? क्या आर्य लोग थियानशान और पामीर के मध्यवर्ती मार्ग से दक्षिण-पूर्व की ओर नहीं बढ़ सकते थे ? क्या गोबी की मरुभूमि उस समय अच्छी दशा में नहीं हो सकती थी ? क्या मानसरोवर के उत्तरवर्ती या पश्चिमस्थ प्रदेश की भूमि कभी आर्यों की भूमि नहीं थी ? हमारा साहित्य तो भारत का हिमालयोत्तर-प्रदेश से सम्बन्ध होना बतलाता है। इसकी स्मृतियाँ, जहाँ देखिये वहीं प्रचुर मात्रा में पड़ी हुई हैं। ज़रूरत है उनका अध्ययन करने और भारतीय इतिहास पर नवीन प्रकाश डालने की। +सोमरस और सुर-असुर का विभेद. +हमें मेरु पामीर को मानना हो चाहे थियानशान को, दोनों हालतों में हरिवर्ष यानी उत्तरकुरु को मानसरोवर के उत्तर होना मानना ही पड़ेगा। महाभारत, बौद्धसाहित्य, पुराण या रामायण-सबके अनुसार यह उत्तर-कुरु--जिसके मनुष्यों का वर्णन कुरु के निवासियों से यानी भारतीय आर्यों से कुछ विचित्र है और जो भारतीय आर्यों की प्रिय भूमि है, जिसका काल्पनिक स्मरण भी आज प्रत्येक आर्य को प्रफुल्लित किये देता है, जिसके आधार पर ही स्वर्ग की सारी कपना स्थित है--भारतवर्ष के उत्तर है। हिमालय आज भी आर्यसाहित्य की सृष्टि का प्रधान उत्तेजक है। यह कल्पना नहीं--पौराणिक-दन्तकथा नहीं--तथ्य है। हमारे सुर, हमारे इन्द्र, वरुण और कुबेर, यक्ष और गन्धर्व--सभी हिमालय के उत्तर हैं। मेरु के बाद हरिवर्ष, नैषध, किम्पुरुष, हेमकूट और भारतवर्ष की भूमि आर्यों की लीलाभूमि रही है। इसमें कवित्व नहीं, कोरा साहित्य नहीं, एक अचल ऐतिहासिक सत्य है। हम इस सिद्धान्त को तब और भी दृढ़ पाते हैं, जब हम सोमरस के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं। ऋग्वेद के सभी देवता सोमरस के मतवाले हैं; आर्यों के सभी यज्ञों में सोमरस की पग-पग पर आवश्यकता है। सोम-स्तुति पर ऋग्वेद का एक सम्पूर्ण मण्डल ही समर्पित है। अवेस्ता में भी इसका नाम है Haum, परन्तु इसकी वह महिमा नहीं, जो आर्यों के ऋग्वेद में है। अवेस्ता में सोमरस का पीनेवाला इन्द्र महज़ Demon हो जाता है और यहाँ इन्द्र आर्यों के एकमात्र उद्धारक बन जाते हैं। हमारे यहाँ सुरा की एक कथा प्रचलित है। यह सुरा सोमरस के सिवा और कुछ नहीं। पहले सुर और असुर दोनों आर्य ही थे; परन्तु जिन लोगों ने सुरा नहीं ग्रहण की, वे असुर और जिन्होंने ग्रहण की, वे सुर कहलाये। रामायण का यह श्लोक इसी प्रकार का है-

+सुराप्रतिग्रहाद्देवाः सुरा इत्यभिविश्रुताः। अप्रतिग्रहणात् तस्या दैतेयाश्चासुरास्तथा॥
+हम ऊपर दिति और अदिति का ज़िक्र कर चुके हैं। ये दैत्य असुर कहलाये और ’आर्यानां व्रजः’ से, जो कश्यप-सागर (Caspian Sea) से पूर्व-उत्तर और दक्षिण की ओर फैला हुआ है, दोनों अलग-अलग हो गये। अस्तु, हमें यह देखना है कि आर्यों को सोमरस इतना प्रिय क्यों हुआ ? सोमरस से आविष्ट हो इन्द्र दैत्यों और असुरों को परास्त करते हैं। हिमालयोत्तर-प्रदेश में, जो स्वभावतः ठण्ढा रहा होगा और है, सोमरस का पीना अस्वाभाविक नहीं। सोमरस के पत्थरों से पीसे जाने का वर्णन ऋग्वेद में बहुलता से मिलता है। सोमलता हिमालय की तराई या हिमालयोत्तर-प्रदेश-- ख़ासकर काराकोरम के आसपास अब भी पायी जाती है। यह सोम भारतीय आर्यों की अपनी सम्पत्ति है। अहुरों (असुरों) का इससे कोई सम्बन्ध नहीं। अवश्य ही सुर-दल को पहाड़ी प्रदेशों में आने के कारण कठिनाइयां झेलनी पड़ी हैं; परन्तु सोम उनके प्राणों का आधार है। यह पदार्थ, यह रस हिमालयोत्तर प्रदेश का ही स्मरण कराता है। +आर्यों के आर्यावर्त में आने का समय, अर्जुन की विजय-यात्रा तथा महेन्जोदारो और हरप्पा की खोज. +यद्यपि इस लेख का विषय महेंजोदारो और हरप्पा से कुछ सम्बन्ध नहीं रखता, तथापि इन खोजों तथा इनके निर्णयों से हमें महाभारत के समय के निर्णय में बहुत सहायता मिलती है। महेंजोदारो में जिस सभ्यता का पता चला है, उसका समय ख्रीष्टाब्द से ३,२०० या ३,३०० वर्ष पूर्व निश्चित किया गया है। आज से ५,००० वर्ष पूर्व जब भारत के पश्चिमोत्तर-प्रदेश में एक ऐसी सभ्यता थी, जिसमें लोहा गलाना, ईंट के मकान बनवाना, नहर ख़ुदवाना, संगमरमर का काम करना, कला, शिल्प-ज्ञान और शीशे का प्रयोग प्रचलित था, उस समय भारत के अन्य भागों में भी ऐसी सभ्यता रही होगी जो इस सभ्यता से लाभ उठा सकती थी या इसे अपने अधिकार में रख सकती थी। इस १९२३ ई. के आविष्कार की जो सबसे बड़ी महत्ता है, वह यह है कि उस समय भारत में लिपि प्रचलित थी। इससे योरपीय पण्डितों का यह कहना कि भारतवासी ख्रीष्टाब्द से कुछ ही सौ वर्ष पहले लिखना नहीं जानते थे, बिलकुल असत्य और निराधार प्रमाणित हो जाता है। परन्तु एक बात, जो बहुत ही खटकती है, यह है कि यह सभ्यता आर्यों की नहीं, प्रत्युत अनार्यों की है। इस सिद्धान्त का आधार यह है कि यहाँ आविष्कृत पदार्थों में ऐसे चित्रफलक (Pictograms) और लिंग (Phallus) तथा पूर्ण (Complete) एवं अर्द्ध (Partial) समाधियां हैं जो आर्यों की कला से नहीं मिलतीं। ये पदार्थ मेसोपोटेमिया, मिश्र और क्रेट के तत्कालीन सम्बन्ध के द्योतक बताये जाते हैं। हिन्दू-युनिवर्सिटी के इतिहासाध्यापक श्री आर्. डी. बनर्जी, एम्.ए. इन चित्रफलकों और लिंगों को आर्यों के शिवलिंग या चित्रफलकों के अनुकरण पर बने होने में सन्देह करते हैं; क्योंकि इन लिंगों के साथ-साथ आर्य-प्रणाली के अनुसार अर्घ्यपट्ट या गौरीपट्ट नहीं है, अतएव यह बैबिलोनिया के लिंग का अनुकरण है, न कि शैवों के शिवलिंग का। इसके सिवा उस समय की अग्निपूजा की विधि आर्यों की अग्निपूजा की विधि से मिलती-जुलती नहीं है। उन्होंने आंशिक समाधि की तुलना--जिसमें शव को लोग मचान पर रख छोड़ते और अस्थि के अवशिष्ट रह जाने पर उसे किसी मिट्टी के बर्तन में रखकर गाड़ देते थे--आधुनिक छोटानागपुर के मुण्डों में प्रचलित आंशिक समाधि से की है। यहाँ पर प्राप्त खोपड़ियां भी मदरास के द्रविड़ों की शक्ल की पायी जाती हैं। महाभारत के विराट पर्व में पाण्डवों ने अपने अस्त्रों को, आंशिक समाधि के अनुकरण पर, कपड़े से छिपाकर रख छोड़ा था। यह अध्यापक बनर्जी महोदय ने भी लिखा है। इससे विदित होता है कि पाण्डव लोगों के समय में जंगली जातियों में ऐसा रिवाज रहा होगा। वैदिक साहित्य में इसका वर्णन या संकेत न मिलना कोई आश्चर्य नहीं। महाभारत का काल हिन्दू-प्रणाली के अनुसार ख्रीष्टाब्द से ३,००० वर्ष पहले समझा जाता है। +यह समय इस महेंजोदारो के समय से मिल जाता है। महाभारत के समय भी जंगली जातियों का होना वर्णित है। यह हमें महाभारत-काल को आज से ५,००० वर्ष पूर्व हटाने में कोई अड़चन नहीं डाल सकता है। सच तो यह है कि मोहेंजोदारो के अनुसार हमें अपने इतिहास का प्रोग्राम ही बदलना पड़ेगा। हम पुराणों और महाकाव्यों का अध्ययन कर इस जटिल समय के प्रश्न को हल कर सकते हैं। इसके नये प्रकाश में हम इतिहास पर नया प्रकाश डाल सकते हैं। महाभारत कब लिखा गया तथा कब-कब इसकी काया में परिवर्द्धन होता गया, यह सोचने पर भी हम महाभारत के समय पर अविश्वास नहीं कर सकते। गर्गसंहिता के ’युगपुराण’ पर विश्वास कर, जैस कि ऊपर बतला चुके हैं, महाभारत से आजतक अर्थात् ३,००० ख्री.पू. से बीसवीं शताब्दी तक के गौरवपूर्वक दृष्टिपात कर सकते हैं। ईश्वर जाने, यह सुयोग हमें कब मिलेगा; परन्तु यह देखकर संतोष होता है कि इन दिनों क्या योरपीय और क्या भारतीय विद्वान् पुराणों के अध्ययन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अस्तु, वह दिन बहुत दूर नहीं है जब आर्यों का पूर्ण इतिहास हमारे साहित्य में मिल जाय। +लेख बहुत बढ़ गया, परन्तु उपसंहार में कुछ कह देना आवश्यक होने के कारण यही कहना अलम् है कि ऋग्वेद और अवेस्ता के अध्ययन के बाद पौराणिक तथा बौद्ध साहित्य के अध्ययन करने पर हमें हिमालयोत्तर-प्रदेशों का सच्चा ऐतिहासिक परिचय मिल सकता है। यदि हम भारतीय आर्यों के हिमालय की ओर से एक बार नहीं, समय-समय पर कई मार्गों से भारत में आने की विचार-दृष्टि से वेदों और अन्य संस्कृत-साहित्यों का अनुशीलन करें तो उसकी व्याख्या अत्यन्त सरल, सुबोध और ऐतिहासिक बन जाय। आशा है, भारतीय इतिहास के प्रेमी विद्वान् और विद्यार्थी लोकमान्य तिलक की बतायी सरिणी पर अग्रसर हो, अपने इतिहास का जीर्णोद्धार कर हमारे अन्धकार को दूर करेंगे। एक बात और, योरपीय विद्वानों ने स्वार्थ बुद्धि से प्रेरित हो जिस प्रकार हमारे गौरवपूर्ण इतिहास को एक तुच्छ तथा हेय रूप देना प्रारम्भ किया था, उससे शायद छुटकारा मिलने में अभी बहुत विलम्ब है। हमारी आँखों पर अपना इतिहास देखने के लिये भी योरपीय चश्मा लगाने की आवश्यकता पड़ती है। इससे बढ़कर शर्म की बात और क्या हो सकती है कि आर्यों के एकमात्र प्रामाणिक इतिहास पुराण, बौद्ध-साहित्य तथा अन्यान्य साहित्य पर हम अविश्वास करें एवं भारतीय इतिहास की जानकारी के लिये दर-दर की ख़ाक छानते फिरें। पुराणों में आर्यों का भौगोलिक ज्ञान भरा पड़ा है। इनमें वर्णित स्थानों का पता हम तभी लगा सकते हैं जब यह पूर्णतः समझ लें कि आर्यों की सभ्यता उस समय, जब यह भूगोल लिखा गया, उन देशों तक फैल गयी थी। चक्रवर्तित्व प्राप्त करने के लिये भारतीय राजाओं का देश-देशान्तर जाकर राजाओं को पराजित करना एक परम्परा की बात थी। अर्जुन का दिग्विजय के लिये हिमालयोत्तर-प्रदेशों में जाना महाभारतकार की कपोल-कल्पना नहीं, एक अक्षुण्ण सत्य है। सच तो यह है कि भारतीय आर्य--चाहे वे भारत के आदिम-निवासी रहे हों और अन्य आर्य यहीं से अन्यत्र संसार में फैले हों, जैसा कि कई विद्वानों की धारणा है, चाहे वे तिलक के कथनानुसार उत्तरीय ध्रुव से आते-आते अन्त में भारत पहुँचे हों--भूगोल की पूर्ण जानकारी रखते थे। उस भूगोल और इतिहास पर अविश्वास करना प्राचीन आर्य ऋषियों के प्रति महा अपराध करना है। अभी यह नहीं कहा जा सकता कि आर्यों की आदि-भूमि कौन-सी है। प्रत्येक भारतीय की यह नैसर्गिक धारणा है कि भारत ही आर्यों की सृष्टि-सनातन क्रीड़ा-स्थली है। जो कुछ सत्य साबित हो, अभी तो हमें योरपीय विद्वानों के मायाजाल के फन्दे से निकलकर स्वतन्त्र रूप से अपने प्राचीन इतिहास का पता लगाना है। हमारे पढ़ने के लिये रक्खा गया आज का इतिहास तो प्रहसन या उपन्यास ही कहा जा सकता है। आर्यावर्त से लेकर हरिवर्ष तक का इतिहास हमारे प्राचीन आरण्यक या पौराणिक साहित्य ही बता सकते हैं। ईश्वर करे, हम इसके लिये कटिबद्ध हो अपने साहित्य के अवगाहन में लग जायँ। क्या प्रत्येक आर्य-सन्तान को इस सभ्यता की आदि-जननी, कुतूहल-मयी, विशुद्ध आर्य-गाथा के जानने की लालसा नहीं होती ? +अर्जुन की विजय-यात्रा को सत्य मानने तथा पुराण में दिये हुए भौगोलिक नामों की आधुनिक नामों से तुलना करने पर यह कहना पड़ता है कि महाभारत के समय में अर्थात् आज से ५,००० वर्ष पूर्व भारतीय आर्यों को हरिवर्ष तक अर्थात् थियानशान (Celestial Mountain) पर्वत के आसन्नवर्त्ती हिमालयोत्तर-प्रदेशों तक का पूर्ण ज्ञान था। इसी हरिवर्ष को उस समय आर्य लोग उत्तर-कुरु कहते थे तथा आर्यावर्त के ’कुरु’ को उसी उत्तर-कुरु की स्मृति-रक्षा के लिय बसाया। मध्य-एशिया के ’आर्यानां व्रजः’ का अर्थ आर्यावर्त से मिलता है। कोरासागर से (उत्तर-सागर) जो Arctic Circle में है आरंभ कर आर्य लोग सीधे उत्तर की ओर पुराण निर्दिष्ट मार्ग से आये, इसमें सन्देह नहीं है। यूराल-नदी और ऐरल-सागर से ’इर्’ धातु का निर्विवाद और घनिष्ट सम्बन्ध है। ’इर्’ से ही ऐरावत बना है। इसका सम्यक् विवेचन एक-एक कर पहले किया जा चुका है। ऐरल-सागर के पश्चिम की ओर एलबर्ज़ (इलावृत) है। इरास्य, इलास्पद या इरास्पद की मैंने योरप से तुलना की है। ऐरल-सागर से (उक्ष) नदी निकलती है। इसी नदी के दोनों तरफ़ आर्य लोग कुछ काल तक रहे और यहीं से (इलावृत और उक्ष के मध्यवर्ती देश से) आर्य और ईरानी अलग हुए। ईरानियों का मार्ग तभी से बदल गया और भारतीय आर्यों का थियानशान, पामीर, मानसरोवर, तारीम (भद्राश्व) आदि से होकर काश्मीर या हिन्दुकुश के मार्ग से आना हुआ। सिन्ध में आ जाने पर ईरानी शाखा से सीमाप्रान्त पर भेंट हुई; क्योंकि वे भी अब तक काबुल पहुँच गये थे। भारतीय आर्यों का उत्तर-ध्रुव से लेकर आर्यावर्त तक का सीधा वर्णन यही बतलाता है। मानसरोवर और हिमालय ही उनका एकमात्र आदर्श है। काबुल के मार्ग से वे अभी नहीं आये, बल्कि भारत में पदार्पण के बाद वे काबुल की ओर भी फैले। किस समय वे भारत में आये, इसका निर्णय करना नितान्त दुष्कर है। कम-से-कम ५,००० वर्ष पूर्व तो महाभारत का समय है, जिस समय आर्य बहुत पुराने पड़ गये थे। ऋग्वेद की ऋचायें सिन्धु और सरस्वती के किनारे भी रची गयीं। लोकमान्य के सिद्धान्त की पुष्टि पौराणिक भूगोल से पूर्णतः होती है। यह धारणा कि आर्य आदि से भारत में रहे--सत्य या असत्य है यह अभी नहीं कहा जा सकता। परन्तु इतना तो निश्चित है कि भारतीय ऋषियों का जो समय-निरूपण अब-तक माना जा रहा है, वह सत्य सिद्ध होगा। और, ऐसा होने पर महाभारत से हज़ारों वर्ष पूर्व आर्यावर्त में आर्यों का बसना सिद्ध होगा। कम-से-कम इस समय यह सिद्ध करने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता कि भारत से ही आर्य लोग अन्यत्र फैले। देवताओं के एक दिन-रात (जो मनुष्यों के एक वर्ष के तुल्य है) के प्रमाण से उत्तर-ध्रुव में उनका रहना स्पष्ट है। अतएव यदि आर्यों का आधिपत्य उत्तर-ध्रुव से आर्यावर्त तक यानी प्राचीन आर्यावर्त से अर्वाचीन आर्यावर्त तक माना जाय, तो कोई दुःख की बात नहीं, प्रत्युत हर्ष की बात है। फिर यदि आर्य ही पहले-पहल भारतवर्ष में आये तब तो उनका आधिपत्य स्वाभाविक और न्याय-सिद्ध है। ईश्वर करे, हमारा इतिहास हमारे सामने आ जाय। + +नेहरू-गांधी परिवार: +नेहरू-गांधी राजवंश की शुरुआत होती है गंगाधर नेहरू से, यानी मोतीलाल नेहरू जी के पिता से। नेहरू जी ने खुद की आत्मकथा में एक जगह लिखा है कि उनके दादा अर्थात् मोतीलाल के पिता गंगा धर नेहरू थे। वह मुगल सल्तनत में बतौर कोतवाल मुलाजिम थे। १८५७ की क्रांति के पश्चात जब अंग्रेजों ने मुगल सल्तनत के कोतवालों को हठाना शुरु किया तब गंगाधर नेहरू अपने परिवार समेत आगरा चले गए। वहाँ उन्होनें नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोक कर पूछताछ की थी। लेकिन तब उन्होंने अपनी बेटियों की शादी कश्मीरी पण्डित परिवारों में कर १८६१ में परम धाम को कूच कर गए। मोतीलाल नेहरू का जन्म उनकी म्रत्यु के तीन महीनें पश्चात हुअा । +अपनी पुस्तक द नेहरू डायनेस्टी में लेखक के.एन.राव लिखते हैं - ऐसा माना जाता है कि जवाहरलाल, मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर। यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल की एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू। कमला नेहरू उनकी माता का नाम था, जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी। कमला शुरू से ही फिरोज को पसन्द करती थी, और चाहती थी कि फिरोज गाँधी और इन्दिरा कि विवाह हो। राजीव गाँधी के दादा थे रईस गाँधी। ये पारसी परिवार था। + +रूसी भाषा और भारत: +माधुरी +शक जाति. +मज्झिम निकाय - कम्बोज (उत्तरी अफ़गानिस्तान); यवन = यूनान +ईसा पूर्व पहली शताब्दी से ईसवी ३री शताब्दी तक उत्तरी भारत का बहुत सा भाग शकों के हाथ में था। पंजाब पांचवीं शताब्दी तक शकों के हाथ में रहा जिसे ’श्वेत हूण’ के नाम से कहा गया था। +बाह्लीक - (वाख्तर या बल्ख) +शकों से ही शाकद्वीपी ब्राह्मण, चौहान, बनाफर, जाट, गुर्जर जाति बने। +शक भाषायें और संस्कृत. +शकों के सम्बन्ध से भाषा भी प्रभावित हुई। १८वीं शताब्दी के अन्त में अंग्रेजों का ध्यान इधर गया। जर्मन प्राध्यापक शॅप को इसका श्रेय है जिन्होंने हिन्दी-युरोपीय-भाषा तत्त्व की नींव डाली। +फ़ारसी संस्कृत की सगी बहन-भतीजी +रूसी और उसकी स्लाव बहनें. +संस्कृत की भागिनेयी और प्रभागिनेयी वस्तुतः रूसी भाषा यूरोपीय भाषाओं के वर्ग की नहीं है बल्कि वह संस्कृत-ईरानी भाषा वर्गों से सम्बन्ध रखती है। १८वीं शताब्दी के अन्त तक रूसी भी अपने को यूरोप से अलग समझते थे। ईरानिओं और हिन्दी आर्यों का घनिष्ठ सम्पर्क भाषा के अतिरिक्त उनकी देवावली और पूजा प्रकार से भी सिद्ध होता है। +प्राक् हिन्दी-यूरोपीय भाषा. +जिसे भारत और ईरान के आर्यों और रूसी तथा यूरोपीय जातिओं के पूर्वज एक कबीला होने के वक्त बोला करते थे। +शक तथा आर्यों के स्थान. +मानव तत्त्ववेत्ताओं में इस सम्बन्ध में मतभेद है कि प्राक् हिन्दी यूरोपीय जाति रूसिया की रहने वाली थी या यूरोप की। +पूर्वी प्राक् हिन्दी-युरोपीय जाति की दो शाखायें - आर्य और शक (शतवंश या शकार्य) +पश्चिमी शाखा के केंट पश्चिमी युरोपीय जातियों के वंशज थे। ख्वारोज़्म की खोजों के अनुसार वहां की संस्कृति सिन्धु उपत्यका की संस्कृति से सम्बद्ध थी अर्थात् सिन्धु उपत्यका की जाति और प्राक् हिन्दी युरोपीय जाति की सीमा अराल समुद्र और सीर दरिया थी। सम्भवतः प्राक् हिन्दी युरोपीय जाति हिमयुग के बाद की हिन्दी युरोपीय जातिओं से निकली थी और उसके विचरण स्थान की सीमा वोल्गा या एमा नदी रही होगी, जो कज्ज़ाकस्तान के पश्चिम है। इसके पूर्वाञ्चल में पूर्वी शाखा वाले शकार्य रहते थे। +शकार्य जाति का सम्मिलित वासस्थान काकेशस पर्वतमाला से पूर्व रहा होगा, जिसके पूर्व में आर्य और पश्चिम में शक रहते थे। +शकों और आर्यों के संघर्ष के कारण आर्यों को अपना मूल स्थान छोड़ना पड़ा था। एक भाग कास्पियन से पश्चिम काकेशस पर्वत-माला से होते हुए क्षुद्र एशिया (तुर्की) और उत्तरी ईरान के तरफ बढ़ते असीरिया क्रेसन्थ देश की सीमा पर पहुंचा और दूसरा भाग कास्पियन से पूरब की तरफ अराल समुद्र के किनारे होते हुए ख्वारेज़्म की भूमि में पहुंचा। ईसा पूर्व द्वितीय सहस्राब्दी में वोगज कुई (अंकारा के पास) में मितन्नी आर्यों के अभिलेख में यह मिलता है। इसी सहस्राब्दी में हिन्दी युरोपीय ग्रीक ग्रीस देस में गये। +शकों से आर्यों के प्रथम अलग होने का काल ईसा पूर्व ३००० वर्ष के आसपास था। +मध्य एशिया में आर्य कास्पियन से पामीर तक फैल गये जो पीछे ’आर्यानां वेइजा’ (आर्यानां व्रजः) कहलाया। +ईसा पूर्व २,५०० के आसपास आर्यों के भाई शक पूरब की ओर बढ़े और धीरे धीरे पूरब में त्यानशान् और अल्ताई की उपत्यकाओं को लेते गोबी और द्विनायु पर्वतमाला तक पहुंच गए। शकों के निवासस्थान ईसा पूर्व १५०० में तरिम, इली और चूकी समृद्ध उपत्यकाएं थीं। गोबी से कारपाथीय पर्वत-माला तक उनका वास-स्थान था। ग्रीक इतिहासकार ईसा पूर्व छठी सदी में डेन्यूब से उत्तर तथा अराल तट पर शकों (स्कुथ, सिथ) का होना बतलाते हैं। ईसा पूर्व २००० से अलिकसुन्दर के समय तक कारपाथीय पर्वतमाला से गोबी तक की भूमि शकों की विचरणभूमि रही। यही महाशकद्वीप था। +मगेसगेत्. +अराल समुद्र के पास मगेसगेत् नामकी एक जाति कावर्णन हेरोदेत ने किया है। ई.पू. २०६ में जबकि ग्रीक बाह्लीक राजा युथिदेमो ने सिरदर्या पर चढ़ाई की थी, उस काल भी वहां शकों का ही निवास था। कितने ही पश्चिमी विद्वानों का मत है कि महाशकद्वीप में रहने वाली शक जाति वस्तुतः भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलनेवाली अनेक जातियां थीं। परन्तु ये भाषायें भिन्न-भिन्न बोलियां ही उच्चारण भेद के साथ हो सकती थीं। शकों का यह आधिपत्य ई.पू. १७२ तक था। +मंगोल चिंगिज. +गोबी से उत्तर और पूरब मंगोल जातियां थीं जिनमें सिन् (चीनी) और हूण का नाम इतिहास में सबसे पहले आता है। २५० ई.पू. में ’तुमन् सन् यू’ के नेतृत्व में हूणों की प्रबलता के आगे चीन को झुकना पड़ा। ये हूण जिनके वंशज चिंगिज खाँ के मंगोल थे-आधुनिक मंगोलिया में रहा करते थे। इन्हीं से बचने के लिये चीनी दीवाल बनी। +मा उ युन (तुमन् शन् यू) का पुत्र हूणों का राजा हुआ था जो १८३ ई.पू. में मौज़ूद था। इसने चीन को कई बार हराया और हूणों का राज्य पश्चिम में अल्ताई तक और पूर्व में कोरिया तक पहुँचाया। अल्ताई और बलखाश के पूर्व के शकों ने माउदुन की अधीनता स्वीकार की। इनके पुत्र ’ची युई’ ने १७२ ई.पू. में शकों का उच्छेद करना शुरु किया। शक दक्षिण की ओर भागने लगे। पहले भागने वाले ’यू ची’ थे जिसने वाख्तर (बलख) में ग्रीक बाह्लीक राज्य को समाप्त कर अपने राज्य की स्थापना की और इस तरह हिन्दुकुश तक का भूभाग शकों के हाथ में चला गया। +चीन ने शकों के मित्र हूणों को हराना चाहा। त्याङ् शाङ् और अल्ताई और अलाई पर्वतमालाओं के बीच वू सन् शक (कुषाण) रहा करते थे और १२८ ई.पू. में हूणों से अपने को स्वतन्त्र कर लिया और च्याङ् काङ् को मुक्ति मिली। यह पहला यात्री था जो फ़र्गना के रास्ते सिर तट पर खोकन्द नगर में पहुँचा। चीन ने १२१ ई.पू. में हूणों के विरुद्ध एक सेना आधुनिक मंगोलिया पर भेजी और हूणों को हराया। यूचिओं ने भी अन्त में चीन की अधीनता स्वीकार की। शकराजाओं ने इसी समय चीनी उपाधि ’देवपुत्र’ धारण की। +हूण माउ दुन् के नेतृत्वमें शकों को भगाते गये और सीस्तान (शकस्थान) और बिलोचिस्तान होते हुए ११० ई.पू. में सिन्ध पहुँचे और ई.पू. ८० में तक्षशिला और गान्धार के स्वामी बन गये और एक शताब्दी से जड़ जमाये यवन राज्य का उच्छेद कर दिया।’यू ची’ सरदार (शक) ’मोग’ भारत का प्रथम शक राजा था। ११०-८० ई.पू. तक गुजरात भी शकों के हाथ में चला गया। ६० ई.पू. तक मथुरा में भी शकों की छत्रपी कायम हो गयी। मोग की मृत्यु ५८ ई.पू. में हुई जिसके बाद शकों के भिन्न-भिन्न कबीलों में झगड़ा हो गया और शकों के कुषाण कबीले के यवमू (सरदार) कजुल कदफिस्-१ की शक्ति बढ़ी। उसने बख्तर और तुषार पर भी अधिकार कर लिया। कजुल के पुत्र वीम कदफिस् द्वितीय (७५-७८ ई.) ने सारे उत्तर भारत को जीता। इसी का पुत्र ’वसीले उस् वसीले उन् कनेर् कोस’ (राजाधिराज कनिष्क) हुआ जिसने शक संवत् चलाया और ७८-१०३ ई. तक राज्य किया। इसके सिक्के अराल समुद्र से बिहार तक मिलते हैं। वह बौद्ध पहले ही से था क्योंकि ईसा पूर्व २य शताब्दी में ही बौद्ध धर्म यू ची शकों की मूल भूमि तरिम उपत्यका में पहुँच चुका था। +काशगर काश्मीर ? +काशगर वाले कश नामी शकों का ही एक उपनिवेश सम्भवतः काश्मीर में था जिससे उसका यह नाम पड़ा। +हूण और चीन. +हूणों ने चीन के प्रहार से जर्जर होकर उनकी अधीनता स्वीकार की। इस पर हूणों में मतभेद हो गया। स्वतन्त्रतावादी हूण (उत्तरी) पश्चिम की ओर भागने लगे और शकों को हराकर उनकी जगह लेने लगे; परन्तु सिर दरिया के दक्खिन उन्होंने हाथ नहीं बढ़ाया। ३७० ई. में अराल और कास्पियन तट पर रहने वाले आलानों का उन्होंने ध्वंस किया। ३७५ ई. में वालामेर के नेतृत्व में दोन तट पर पहुंचे और माओस्य गते (जार) को छिन्न-भिन्न किया। फिर दानिए पर पहुंच गायों का ध्वंस किया। अत्तिला (हूण सरदार) के समय तक (४५३ ई. में मृत्यु) मध्य दुनाह तक हूण राज्य स्थापित हुआ। पौने पांच सौ साल के हूणों के इस भयंकर तूफ़ान ने शकों को बड़ी हानि पहुंचाई और वोल्गा से गोबी तक के शक द्वीप को शकों से खाली करवा दिया। सबसे अन्त में +हिन्दुस्तान जिंदाबाद पाकिस्तान मादरचोद +३६० ई. में हूणों के एक कबीले अवार (ज्वेन्-ज्वेन्) ने शक्ति-सम्पन्न हो पश्चिम की ओर बढ़ना शुरु कर दिया। हेफ्ताल भागे और ४२५ ई.। इन्होंने सारे मध्य एशिया के (सिर दरिया से हिन्दुकुश तक) अपने पूर्ववर्ती कुषाण राज्य का उच्छेद किया। किदार उनका महान नेता था जिसके नाम से ही हेफताल ’किदारीय हूण’ कहलाये। किदार का पुत्र ४५५ ई. में श्वेत हूणों का राजा था और सम्भवतः इसी का पुत्र तोरमाण था जिसने ग्वालियर और सागर दमोह तक को जीत लिया था। इसका पुत्र मिहिरकुल ५०२ ई. में राजा बना। मिहिर मित्र का फ़ारसी रूप है। पीछे शकद्वीपियों के प्रयास से मिहिर भी शुद्ध संस्कृत हो गया। +कुल हूणी शब्द गुल या ग्युल का अपभ्रंश है. +कुल हूणी शब्द गुल या ग्युल का अपभ्रंश है जिसका अर्थ राजकुमार या दास होता है। +सूर्य मन्दिर - तोरमाण ने ग्वालिअर में सूर्यमन्दिर बनवाया था। यह उसके शिलालेख से पता चलता है। +मिहिरकुल ने मगध पर आक्रमण किया था परन्तु मगध राजा बालादित्य ने उसे बुरी तरह हराया। मालवा के विजयी राजा यशोधर्मा विक्रमादित्य ने मिहिरकुल को हराकर उसे कश्मीर की ओर खदेड़ दिया। हूण नाम से प्रसिद्ध किन्तु वस्तुतः शक मिहिरकुल अन्तिम शक राजा था। हेफ़तालों की राजधानी बुखारा के पास वरख्शमें थी जहाँ हाल की खुदाई में भारतीय शैली पर बने कितने ही भित्तिचित्र मिले हैं। +शकों का विस्तार. +सूर्य- शकों के सबसे प्रबल जातीय देवता सूर्य थे। +शक द्वीप-गोबी से वोल्गा और पश्चिम कारपाथिया तक फैला शकों का मुख्य निवास था। दक्षिण की ओर भारत तक भागकर आने वाले शक पूर्वीय शक द्वीप के थे। +सूर्य देवता-शकद्वीपी प्रधानता वाले इलाकों में अधिकांश सूर्य मूर्त्तियां द्विभुज मिलती हैं। इनके कन्धे के ऊपर सूर्यमुखी के फूल असाधारण से मालूम होते हैं, जो भारतीय परम्परा के प्रतिकूल हैं। सूर्य के पैरों में बूट होते हैं। बूटधारी हिन्दु देवता कोई नहीं। वही बूट हमें मथुरा से मिली कनिष्क प्रतिमा के पैरों में दिखाई पड़ता है। आज भी रूसी लोग जाड़ों में उसी तरह के घुटने तक के बूटों को पहनते हैं जो कनिष्क और सूर्य प्रतिमाओं के पैरों में दिखते हैं। +हूणों ने शकों को शक द्वीप से हटा दिया था। उनके ही वंशज तुर्क, उइगुर, और मंगोल थे। ५५७ ई. के लगभग तुर्की से मध्यएशिया तक न शकों का नाम रहा न आर्यवंशीय लोगों (थोड़े से ताजिकों को छोड़कर) का। +इसलाम. +अरबों के प्रभाव से जैसे ८वीं सदी पहुँचते-पहुँचते सारा ईरान और मध्यएशिया मुसलमान हो गया। इसी तरह खजार, वुल्गार आदि हूण जातिओं ने भी इसलाम स्वीकार किया। आजकल वुल्गार चुवाश के नाम से पुकारे जाते हैं। वुल्गारिया देश से कोई सम्बन्ध नहीं। वुल्गारिया वाले स्लाव हैं और वोल्गा वाले वुल्गार हूण वंशज। +रूस में सूर्य पूजा. +इसाई होने से पहले रूस वाले भी सूर्य की पूजा करते और घी में पके लाल चीले खाते थे, जैसे यहाँ छठ में ठेकुआ चढ़ाते हैं। आज भी उस खास पर्व के दिन मीठे चीले खातेहैं। एक अरबी पर्यटक ने वोल्गा के किनारे खरीद बिक्री के लिये आये रूसिओं में मृतात्मा को पत्नी के साथ जलाने का उल्लेख किया है। +स्लाव और श्रव. +उपनिषद् काल के श्रवान्त नामों का स्लाव शब्द से साम्य है। स्वेतीस्लाव, व्याचिस्लाव आदि नाम अब भी हैं। मोलोतोव का नाम व्याचिस्लाव है। +वुलगर सर्व क्रोआत (क्रोत) रूसी उक्रइनी बेलोरूसी. +दक्षिणी स्लावों में पोल चेक भाषा का रूसी से अवधी बंगला जैसा तथा रूसी उक्रइनी भाषायें भोजपुरी मैथिली की तरह हैं। स्लावों ने पहले पहल ग्रीकों के सम्पर्क में आकर इसाई धर्म स्वीकार किया। पीछे पोल, चेक, स्लोवाक तथा क्रोवात् रोमन चर्च द्वारा इसाई बनाये गये और रोमन लिपि उन्होंने स्वीकार की। ग्रीक चर्च द्वारा इसाई बनाये गये बाकी स्लावों ने ग्रीक लिपि स्वीकार की। +९८८ में विजन्तिन् ने सामूहिक रूप से इसाई धर्म स्वीकार किया और सारी राजधानी एक दिन में इसाई बन गयी। हजारों वर्षों से चले आए धर्म और देवताओं को छोड़ने में कितने ही जगह विद्रोह भी हुए। किएफ़ के रूसों ने अपनी प्राचीन संस्कृति की बहुत सी निधिओं को खो डाला। देवताओं और पूजा प्रकार के साथ-साथ उनके हजारों शब्द भी लुप्त हो गये। अपनी भाषा के लिये नयी लिपि, ग्रीक साहित्य एवं ग्रीक कला सीखने का रास्ता खुल गया। +१०१४ में व्लादिमीर के मरने के बाद किएफ़ रूस राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। १३वीं सदी के मध्य में छङ् गिस् खान के मंगोल उसके पुत्र बानू खान के नेतृत्व में पहुँचे और प्रायः १५० वर्षों तक सिर उठाने का मौका नहीं मिला। तैमूर ने दिल्ली लूटने (१३९८ ई.) से तीन साल पहले जब १३९५ में मास्को के पास तक का धावा किया। +इस प्रकार शक ही रूस में और भारत में भी गये और रूसी उन्हीं के वंशज हैं। भारत में भी शकद्वीपी ब्राह्मण, कितने ही राजपूत, गूजर और जाट आदि शकों के वंशज हैं। संस्कृत और रूसी भाषाओं में जो घनिष्ठ सम्बन्ध मालूम होता है वह इसी पुराने सम्बन्ध के कारण। +स्लाव और लिथुआनी भाषा. +लिथुआनी भाषा संस्कृत के बहुत समीप है। रामानन्द और कबीर के समय तक लिथुआनी लोग इसाई नहीं हुए थे। उनके देवता वैदिक देवताओं में से थे। उनकी भाषा का विकास भी बहुत मन्द गति से हुआ था। +शतम् और केन्तम् (१००). +हिन्दी और यूरोपीय भाषाओं के ’शतम्’ और ’केन्तम्’ दोनों भाषाओं के समुदायों में हैं। स्लाव भाषाएं संस्कृत और ईरानी के साथ शतम् वंश की हैं। लिथुआनी की समीपता ’केन्तम्’ से है। +रूसी भाषा स्लाव भाषा वंश की पूर्वी शाखा की एक भाषा है। पूर्वी स्लाव भाषाएं हैं-रूसी, वोलगरी, और सेर्वी। उक्रइनी और बेलोरूसी भाषाएं यद्यपि स्वतन्त्र साहित्यिक भाषाएं हैं किन्तु वह रूसी के अत्यन्त समीप हैं। + +डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस: +डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस एक सिंगल लॉजिकल डाटबेस है, जो कि डाटा क्मयूनिकेशन लिंक द्वारा कनेक्टेड मल्टीपल लोकेशन्स में कम्प्यूटर्स में एक छोर से दूसरे छोर तक फैला हुआ है। एक डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस में प्रत्येक रिमोट साइट पर मल्टीपल डाटाबेस मैनेजमेण्ट सिस्टम को रन करने की आवश्यकता होती है। डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस के कई डाटाबेस एन्वायरमेण्ट हैं- +-होमोजिनियस +-हेट्रोजिनियस +डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस के लक्ष्य +1.लोकेशन ट्रान्सपेरेन्सी +2.लोकल आटोनॉमी +डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस के लाभ +1.अधिक विश्वसनियता और उपलब्धता +2.लोकल कण्ट्रोल +3.मॉड्यूल ग्रोथ +4.लोअर कम्यूनिकेशन कॉस्ट +5.फास्टर रिस्पॉन्स +डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस के दोष +1.सॉफ्टवेयर कॉस्ट और जटिलताएँ +2.प्रोसेसिंग ओवरहेड +3.डाटा इन्टीग्रीटी +1.डाटा रिप्लीकेशन +2.हॉरिजोण्टल पार्टिशनिंग +3.वर्टिकल पार्टिशनिंग +डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम +1.डिस्ट्रिब्यूटेड डाटा डायरेक्टरी में डाटा कहाँ लोकेट किया गया है, इसकी खबर रखना। +2.यह निशचित करना कि किस लोकेशन से रिक्वेस्टेट डाटा को रिट्रीव करना हैऔर डिस्ट्रिब्यूटेड क्वैरी के हर भाग को किस लोकेशन पर प्रोसेस करना है। +3.सिक्योरिटी, कॉन्करेंसी और डेडलॉक क्वैरी ऑप्टीमाइजेशन और फेलियर रिकवरी जैसे डाटा मेनेजमेंट फंक्शन्स प्रदान करना। +4.रिमोट साइट्स के बीच डाटा की प्रतियों के बीच स्थिरता प्रदान करना। +डिस्ट्रिब्यूटेड डाटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम के कार्य +1.लोकेशन ट्रान्सपेरेन्सी +2.रिप्लीकेशन ट्रान्सपेरेन्सी +3.फेलियर ट्रान्सपेरेन्सी +4.कॉन्करेंसी ट्रान्सपेरेन्सी + +कविता क्या है?: +कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है, मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत् से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह है कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करुणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ, तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छ्वासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं। कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है। हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है। +कविता क्या है? +जब कवि 'भावनाओं के प्रसव' से गुजरते हैं, तो कविताएं प्रस्फुटित होती हैंं। +कार्य में प्रवृत्ति. +कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है। केवल विवेचना के बल से हम किसी कार्य में बहुत कम प्रवृत्त होते हैं। केवल इस बात को जानकर ही हम किसी काम के करने या न करने के लिए प्रायः तैयार नहीं होते कि वह काम अच्छा है या बुरा, लाभदायक है या हानिकारक। जब उसकी या उसके परिणाम की कोई ऐसी बात हमारे सामने उपस्थित हो जाती है, जो हमें आह्लाद, क्रोध और करुणा आदि से विचलित कर देती है, तभी हम उस काम को करने या न करने के लिए प्रस्तुत होते हैं। केवल बुद्धि हमें काम करने के लिए उत्तेजित नहीं करती। काम करने के लिए मन ही हमको उत्साहित करता है। अतः कार्य-प्रवृत्ति के लिए मन में वेग का आना आवश्यक है। यदि किसी से कहा जाये कि अमुक देश तुम्हारा इतना रुपया प्रतिवर्ष उठा ले जाता है, इसी से तुम्हारे यहाँ अकाल और दारिद्र्य बना रहता है, तो सम्भव है कि उस पर कुछ प्रभाव न पड़े। पर यदि दारिद्र्य और अकाल का भीषण दृश्य दिखाया जाए, पेट की ज्वाला से जले हुए प्राणियों के अस्थिपंजर सामने पेश किए जाए और भूख से तड़पते हुए बालक के पास बैठी हुई माता का आर्त्तस्वर सुनाया जाए तो वह मनुष्य क्रोध और करुणा से विह्वल हो उठेगा और इन बातों को दूर करने का यदि उपाय नहीं तो संकल्प अवश्य करेगा। पहले प्रकार की बात कहना राजनीतिज्ञ का काम है और पिछले प्रकार का दृश्य दिखाना, कवि का कर्तव्य है। मानव-हृदय पर दोनों में से किसका अधिकार अधिक हो सकता है, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। +मनोरंजन और स्वभाव-संशोधन. +कविता के द्वारा हम संसार के सुख, दुःख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव कर सकते हैं। किसी लोभी और कंजूस दुकानदार को देखिए, जिसने लोभ के वशीभूत होकर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि मनोविकारों को दबा दिया है और संसार के सब सुखों से मुँह मोड़ लिया है अथवा किसी महाक्रूर राजकर्मचारी के पास जाइए, जिसका हृदय पत्थर के समान जड़ और कठोर हो गया है, जिसे दूसरे के दुःख और क्लेश का अनुभव स्वप्न में भी नहीं होता। ऐसा करने से आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि क्या इनकी भी कोई दवा है। ऐसे हृदयों को द्रवीभूत करके उन्हें अपने स्वाभाविक धर्म पर लाने की सामर्थ्य काव्य ही में है। कविता ही उस दुकानदार की प्रवृत्ति भौतिक और आध्यात्मिक सृष्टि के सौन्दर्य की ओर ले जाएगी, कविता ही उसका ध्यान औरों की आवश्यकता की ओर आकर्षित करेगी और उनकी पूर्ति करने की इच्छा उत्पन्न करेगी, कविता ही उसे उचित अवसर पर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि सिखावेगी। इसी प्रकार उस राजकर्मचारी के सामने कविता ही उसके कार्यों का प्रतिबिम्ब खींचकर रक्खेगी और उनकी जघन्यता और भयंकरता का आभास दिखलावेगी तथा दैवी किंवा अन्य मनुष्यों द्वारा पहुँचाई हुई पीड़ा और क्लेश के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश को दिखलाकर उसे दया दिखाने की शिक्षा देगी। +प्रायः लोग कहा करते हैं कि कविता का अन्तिम उद्देश्य मनोरंजन है, पर मेरी समझ में मनोरंजन उसका अन्तिम उद्देश्य नहीं है। कविता पढ़ते समय मनोरंजन अवश्य होता है, पर इसके सिवा कुछ और भी होता है। मनोरंजन करना कविता का प्रधान गुण है। इससे मनुष्य का चित्त एकाग्र हो जाता है, इधर-उधर जाने नहीं पाता। यही कारण है कि नीति और धर्म-सम्बन्धी उपदेश चित्त पर वैसा असर नहीं करते जैसा कि किसी काव्य या उपन्यास से निकली हुई शिक्षा असर करती है। केवल यही कहकर कि ‘परोपकार करो’ ‘सदैव सच बोलो’ ‘चोरी करना महापाप है’ हम यह आशा कदापि नहीं कर सकते कि कोई अपकारी मनुष्य परोपकारी हो जाएगा, झूठा सच्चा हो जाएगा और चोर चोरी करना छोड़ देगा, क्योंकि पहले तो मनुष्य का चित्त ऐसी शिक्षा ग्रहण करने के लिए उद्यत ही नहीं होता, दूसरे मानव-जीवन पर उसका कोई प्रभाव अंकित हुआ न देखकर वह उनकी कुछ परवा नहीं करता, पर कविता अपनी मनोरंजक शक्ति के द्वारा पढ़ने या सुनने वाले का चित्त उचटने नहीं देती। उसके हृदय आदि अत्यन्त कोमल स्थानों को स्पर्श करती है और सृष्टि में उक्त कर्मों के स्थान और सम्बन्ध की सूचना देकर मानव जीवन पर उनके प्रभाव और परिणाम को विस्तृत रूप से अंकित करके दिखलाती है। इन्द्रासन खाली कराने का वचन देकर, हूर और गिलमा का लालच दिखाकर, यमराज का स्मरण दिलाकर और दोजख़ की जलती हुई आग की धमकी देकर हम बहुधा किसी मनुष्य को सदाचारी और कर्तव्य-परायण नहीं बना सकते। बात यह है कि इस तरह का लालच या धमकी ऐसी है जिससे मनुष्य परिचित नहीं और जो इतनी दूर की है कि उसकी परवा करना मानव-प्रकृति के विरुद्ध है। सदा-चार में एक अलौकिक सौन्दर्य और माधुर्य होता है। अतः लोगों को सदाचार की ओर आकर्षित करने का प्रकृत उपाय यही है कि उनको उसका सौन्दर्य और माधुर्य दिखाकर लुभाया जाए, जिससे वे बिना आगा पीछा सोचे मोहित होकर उसकी ओर ढल पड़ें। +मन को हमारे आचार्यों ने ग्यारहवीं इन्द्रिय माना है। उसका रञ्जन करना और उसे सुख पहुँचाना ही यदि कविता का धर्म माना जाए तो कविता भी केवल विलास की सामग्री हुई। परन्तु क्या हम कह सकते हैं कि वाल्मीकि का आदि-काव्य, तुलसीदास का रामचरितमानस, या सूरदास का सूरसागर विलास की सामग्री है? यदि इन ग्रन्थों से मनोरंजन होगा, तो चरित्र-संशोधन भी अवश्य ही होगा। खेद के साथ कहना पड़ता है कि हिन्दी भाषा के अनेक कवियों ने शृंगार रस की उन्माद कारिणी उक्तियों से साहित्य को इतना भर दिया है कि कविता भी विलास की एक सामग्री समझी जाने लगी है। पीछे से तो ग्रीष्मोपचार आदि के नुस्खे भी कवि लोग तैयार करने लगे। ऐसी शृंगारिक कविता को कोई विलास की सामग्री कह बैठे तो उसका क्या दोष? सारांश यह कि कविता का काम मनोरंजन ही नहीं कुछ और भी है। +चरित्र-चित्रण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है, उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं। आदि-काव्य रामायण में जब हम भगवान् रामचन्द्र के प्रतिज्ञा-पालन, सत्यव्रताचरण और पितृभक्ति आदि की छटा देखते हैं, भारत के सर्वोच्च स्वार्थत्याग और सर्वांगपूर्ण सात्विक चरित्र का अलौकिक तेज देखते हैं, तब हमारा हृदय श्रद्धा, भक्ति और आश्चर्य से स्तम्भित हो जाता है। इसके विरुद्ध जब हम रावण को दुष्टता और उद्दंडता का चित्र देखते हैं तब समझते हैं कि दुष्टता क्या चीज है और उसका प्रभाव और परिणाम सृष्टि में क्या है। अब देखिए कविता द्वारा कितना उपकार होता है। उसका काम भक्ति, श्रद्धा, दया, करुणा, क्रोध और प्रेम आदि मनोवेगों को तीव्र और परिमार्जित करना तथा सृष्टि की वस्तुओं और व्यापारों से उनका उचित और उपयुक्त सम्बन्ध स्थिर करना है। +उच्च आदर्श. +कविता मनुष्य के हृदय को उन्नत करती है और उसे उत्कृष्ट और अलौकिक पदार्थों का परिचय कराती है, जिनके द्वारा यह लोक देवलोक और मनुष्य देवता हो सकता है। +कविता की आवश्यकता. +कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता अवश्य ही होगी। इसका क्या कारण है? बात यह है कि संसार के अनेक कृत्रिम व्यापारों में फंसे रहने से मनुष्य की मनुष्यता जाती रहने का डर रहता है। अतएव मानुषी प्रकृति को जागृत रखने के लिए ईश्वर ने कविता रूपी औषधि बनाई है। कविता यही प्रयत्न करती है कि प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पावे। जानवरों को इसकी जरूरत नहीं। हमने किसी उपन्यास में पढ़ा है कि एक चिड़चिड़ा बनिया अपनी सुशीला और परम रुपवती पुत्रवधू को अकारण निकालने पर उद्यत हुआ। जब उसके पुत्र ने अपनी स्त्री की ओर से कुछ कहा तब वह चिढ़कर बोला, ‘चल चल! भोली सूरत पर मरा जाता है’ आह! यह कैसा अमानुषिक बर्ताव है! सांसारिक बन्धनों में फंसकर मनुष्य का हृदय कभी-कभी इतना कठोर और कुंठित हो जाता है कि उसकी चेतनता - उसका मानुषभाव - कम हो जाता है। न उसे किसी का रूप माधुर्य देखकर उस पर उपकार करने की इच्छा होती है, न उसे किसी दीन दुखिया की पीड़ा देखकर करुणा आती है, न उसे अपमानसूचक बात सुनकर क्रोध आता है। ऐसे लोगों से यदि किसी लोमहर्षण अत्याचार की बात कही जाए, तो मनुष्य के स्वाभाविक धर्मानुसार, वे क्रोध या घृणा प्रकट करने के स्थान पर रुखाई के साथ यही कहेंगे - “जाने दो, हमसे क्या मतलब, चलो अपना काम देखो.” याद रखिए, यह महा भयानक मानसिक रोग है। इससे मनुष्य जीते जी मृतवत् हो जाता है। कविता इसी मरज़ की दवा है। +सृष्टि-सौन्दर्य. +कविता सृष्टि-सौन्दर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुन्दर वस्तुओं में अनुरक्त करती है। जो कविता रमणी के रूप माधुर्य से हमें आह्लादित करती है, वही उसके अन्तःकरण की सुन्दरता और कोमलता आदि की मनोहारिणी छाया दिखा कर मुग्ध भी करती है। जिस बंकिम की लेखनी ने गढ़ के ऊपर बैठी हुई राजकुमारी तिलोत्तमा के अंग प्रत्यंग की शोभा को अंकित किया है, उसी ने आयशा के अन्तःकरण की अपूर्व सात्विकी ज्योति दिखा कर पाठकों को चमत्कृत किया है। भौतिक सौन्दर्य के अवलोकन से हमारी आत्मा को जिस प्रकार सन्तोष होता है उसी प्रकार मानसिक सौन्दर्य से भी। जिस प्रकार वन, पर्वत, नदी, झरना आदि से हम प्रफुल्लित होते हैं, उसी प्रकार मानवी अन्तःकरण में प्रेम, दया, करुणा, भक्ति आदि मनोवेगों के अनुभव से हम आनंदित होते हैं और यदि इन दोनों पार्थिव और अपार्थिव सौन्दर्यों का कहीं संयोग देख पड़े तो फिर क्या कहना है। यदि किसी अत्यन्त सुन्दर पुरुष या अत्यन्त रूपवती स्त्री के रूप मात्र का वर्णन करके हम छोड़ दें तो चित्र अपूर्ण होगा, किन्तु यदि हम साथ ही उसके हृदय की दृढ़ता और सत्यप्रियता अथवा कोमलता और स्नेह-शीलता आदि की भी झलक दिखावें तो उस वर्णन में सजीवता आ जाएगी। महाकवियों ने प्रायः इन दोनों सौन्दर्यों का मेल कराया है जो किसी किसी को अस्वाभाविक प्रतीत होता है। किन्तु संसार में प्रायः देखा जाता है कि रूपवान् जन सुशील और कोमल होते हैं और रूपहीन जन क्रूर और दुःशील। इसके सिवा मनुष्य के आंतरिक भावों का प्रतिबिम्ब भी चेहरे पर पड़कर उसे रुचिर या अरुचिर बना देता है। पार्थिव सौन्दर्य का अनुभव करके हम मानसिक अर्थात् अपार्थिव सौन्दर्य की ओर आकर्षित होते हैं। अतएव पार्थिव सौन्दर्य को दिखलाना कवि का प्रधान कर्म है। +कविता का दुरुपयोग. +जो लोग स्वार्थवश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं, वे सरस्वती का गला घोंटते हैं। ऐसी तुच्छ वृत्ति वालों को कविता न करना चाहिए। कविता का उच्चाशय, उदार और निःस्वार्थ हृदय की उपज है। सत्कवि मनुष्य मात्र के हृदय में सौन्दर्य का प्रवाह बहाने वाला है। उसकी दृष्टि में राजा और रंक सब समान हैं। वह उन्हें मनुष्य के सिवा और कुछ नहीं समझता। जिस प्रकार महल में रहने वाले बादशाह के वास्तविक सद् गुणों की वह प्रशंसा करता है, उसी प्रकार झोंपड़े में रहने वाले किसान के सद्गुणों की भी। श्रीमानों के शुभागमन की कविता लिखना और बात बात पर उन्हें बधाई देना सत्कवि का काम नहीं। हाँ, जिसने निःस्वार्थ होकर और कष्ट सहकर देश और समाज की सेवा की है, दूसरों का हित साधन किया है, धर्म का पालन किया है, ऐसे परोपकारी महात्मा का गुण गान करना उसका कर्तव्य है। +कविता की भाषा. +मनुष्य स्वभाव ही से प्राचीन पुरुषों और वस्तुओं को श्रद्धा की दृष्टि से देखता है। पुराने शब्द हम लोगों को मालूम ही रहते हैं। इसी से कविता में कुछ न कुछ पुराने शब्द आ ही जाते हैं। उनका थोड़ा बहुत बना रहना अच्छा भी है। वे आधुनिक और पुरातन कविता के बीच सम्बन्ध सूत्र का काम देते हैं। हिन्दी में ‘राजते हैं’ ‘गहते हैं’ ‘लहते हैं’ ‘सरसाते हैं’ आदि प्रयोगों का खड़ी बोली तक की कविता में बना रहना कोई अचम्भे की बात नहीं। अँग्रेज़ी कविता में भी ऐसे शब्दों का अभाव नहीं, जिनका व्यवहार बहुत पुराने जमाने से कविता में होता आया है। ‘Main’ ‘Swain’ आदि शब्द ऐसे ही हैं। अंग्रेज़ी कविता समझने के लिए इनसे परिचित होना पड़ता है, पर ऐसे शब्द बहुत थोड़े आने चाहिए, वे भी ऐसे जो भद्दे और गंवारू न हों। खड़ी बोली में संयुक्त क्रियाएँ बहुत लंबी होती हैं, जैसे - "लाभ करते हैं,” “प्रकाश करते हैं” आदि। कविता में इनके स्थान पर “लहते हैं” “प्रकाशते हैं” कर देने से कोई हानि नहीं, पर यह बात इस तरह के सभी शब्दों के लिए ठीक नहीं हो सकती। +कविता में कही गई बात हृत्पटल पर अधिक स्थायी होती है। अतः कविता में प्रत्यक्ष और स्वभावसिद्ध व्यापार-सूचक शब्दों की संख्या अधिक रहती है। समय बीता जाता है, कहने की अपेक्षा, समय भागा जाता है, कहना अधिक काव्य सम्मत है। किसी काम से हाथ खींचना, किसी का रुपया खा जाना, कोई बात पी जाना, दिन ढलना, मन मारना, मन छूना, शोभा बरसना आदि ऐसे ही कवि-समय-सिद्ध वाक्य हैं, जो बोल-चाल में आ गए हैं। नीचे कुछ पद्य उदाहरण-स्वरूप दिए जाते हैं -
+(क) धन्य भूमि वन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाँव तुम धारा।। -तुलसीदास +(ख) मनहुँ उमगि अंग अंग छवि छलकै।। -तुलसीदास, गीतावलि +(ग) चूनरि चारु चुई सी परै चटकीली रही अंगिया ललचावे +(घ) वीथिन में ब्र में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरो बसंत है। -पद्माकर +(ङ) रंग रंग रागन पै, संग ही परागन पै, वृन्दावन बागन पै बसंत बरसो परै।
+बहुत से ऐसे शब्द हैं, जिनसे एक ही का नहीं किन्तु कई क्रियाओं का एक ही साथ बोध होता है। ऐसे शब्दों को हम जटिल शब्द कह सकते हैं। ऐसे शब्द वैज्ञानिक विषयों में अधिक आते हैं। उनमें से कुछ शब्द तो एक विलक्षण ही अर्थ देते हैं और पारिभाषिक कहलाते हैं। विज्ञानवेत्ता को किसी बात की सत्यता या असत्यता के निर्णय की जल्दी रहती है। इससे वह कई बातों को एक मानकर अपना काम चलाता है, प्रत्येक काम को पृथक पृथक दृष्टि से नहीं देखता। यही कारण है जो वह ऐसे शब्द अधिक व्यवहार करता है, जिनसे कई क्रियाओं से घटित एक ही भाव का अर्थ निकलता है। परन्तु कविता प्राकृतिक व्यापारों को कल्पना द्वारा प्रत्यक्ष कराती है- मानव-हृदय पर अंकित करती है। अतएव पूर्वोक्त प्रकार के शब्द अधिक लाने से कविता के प्रसाद गुण की हानि होती है और व्यक्त किए गए भाव हृदय पर अच्छी तरह अंकित नहीं होते। बात यह है कि मानवी कल्पना इतनी प्रशस्त नहीं कि एक दो बार में कई व्यापार उसके द्वारा हृदय पर स्पष्ट रीति से खचित हो सकें। यदि कोई ऐसा शब्द प्रयोग में लाया गया जो कई संयुक्त व्यापारों का बोधक है तो सम्भव है, कल्पना शक्ति किसी एक व्यापार को भी न ग्रहण कर सके अथवा तदन्तर्गत कोई ऐसा व्यापार प्रगट करे, जो मानवी प्रकृति का उद्दीपक न हो। तात्पर्य यह कि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तथा ऐसे शब्दों का समावेश जो कई संयुक्त व्यापारों की सूचना देते हैं, कविता में वांछित नहीं। +किसी ने ‘प्रेम फ़ौजदारी’ नाम की शृंगार-रस-विशिष्ट एक छोटी-सी कविता अदालती कार्रवाइयों पर घटा कर लिखी है और उसे ‘एक तरफा डिगरी’ आदि क़ानूनी शब्दों से भर दिया है। यह उचित नहीं। कविता का उद्देश्य इसके विपरीत व्यवहार से सिद्ध होता है। जब कोई कवि किसी दार्शनिक सिद्धान्त को अधिक प्रभावोत्पादक बना कर उसे लोगों के चित्त पर अंकित करना चाहता है, तब वह जटिल और पारिभाषिक शब्दों को निकाल कर उसे अधिक प्रत्यक्ष और मर्म स्पर्शी रुप देता है। भर्तृहरि और गोस्वामी तुलसीदास आदि इस बात में बहुत निपुण थे। भर्तृहरि का एक श्लोक लीजिए- +तृषा शुष्य्तास्ये पिबति सलिलं स्वादु सुरभि
+क्षुधार्त्तः संछालीन्कवलयति शाकादिवलितान्।
+प्रदीप्ते रागाग्रौ सुदृढ़तरमाश्ल्ष्यिति वधूं
+प्रतीकारो व्याधैः सुखमिति विपर्यस्यति जनः।।
+भावार्थ - प्यासे होने पर स्वादिष्ट और सुगन्धित जल-पान, भूखे होने पर शाकादि के साथ चावलों का भोज और हृदय में अनुरागाग्नि के प्रज्वलित होने पर प्रियात्मा का आलिंगन करने वाले मनुष्य विलक्षण मूर्ख हैं, क्योंकि प्यास आदि व्याधियों की शान्ति के लिए जल-पान आदि प्रतीकारों ही को वे सुख समझते हैं। वे नहीं जानते कि उनका यह उपचार बिलकुल ही उलटा है। +देखिए, यहाँ पर कवि ने कैसी विलक्षण उक्ति के द्वारा मनुष्य की सुखःदुख विषयक बुद्धि की भ्रामिकता दिखलाई है। +अंग्रेज़ों में भी पोप कवि इस विषय में बहुत सिद्धहस्त था। नीचे उसका एक साधारण सिद्धान्त लिखा जाता है- +“भविष्यत् में क्या होने वाला है, इस बात की अनभिज्ञता इसलिए दी गई है, जिसमें सब लोग, आने वाले अनिष्ट की शंका से, उस अनिष्ट घटना के पूर्ववर्ती दिनों के सुख को भी न खो बैठें.” +इसी बात को पोप कवि इस तरह कहता है-
+The lamb thyariot dooms to bleed to day
+Had he thy reason would he skip and play?
+Pleased to the last he crops the flow’ry food
+And licks the hand just raised to shed his blood.
+The blindness to the future kindly given। Essay on man.
+भावार्थ - उस भेड़ के बच्चे को, जिसका तू आज रक्त बहाना चाहता है, यदि तेरा ही सा ज्ञान होता तो क्या वह उछलता कूदता फिरता? अन्त तक वह आनन्दपूर्वक चारा खाता है और उस हाथ को चाटता है जो उसका रक्त बहाने के लिए उठाया गया है। … भविष्यत् का अज्ञान हमें (ईश्वर ने) बड़ी कृपा करके दिया है। +‘अनिष्ट’ शब्द बहुत व्यापक और संदिग्ध है, अतः कवि मृत्यु ही को सबसे अधिक अनिष्ट वस्तु समझता है। मृत्यु की आशंका से प्राणिमात्र का विचलित होना स्वाभाविक है। कवि दिखलाता है कि परम अज्ञानी पशु भी मृत्यु सिर पर नाचते रहते भी सुखी रहता है। यहाँ तक कि वह प्रहारकर्ता के हाथ को चाटता जाता है। यह एक अद्भुत और मर्मस्पर्शी दृश्य है। पूर्वोक्त सिद्धान्त को यहाँ काव्य का रूप प्राप्त हुआ है। +एक और साधारण-सा उदाहरण लीजिए। “तुमने उससे विवाह किया” यह एक बहुत ही साधारण वाक्य है। पर “तुमने उसका हाथ पकड़ा” यह एक विशेष अर्थ-गर्भित और काव्योचित वाक्य है। ‘विवाह’ शब्द के अन्तर्गत बहुत से विधान हैं, जिन सब पर कोई एक दफ़े दृष्टि नहीं डाल सकता। अतः उससे कोई बात स्पष्ट रूप से कल्पना में नहीं आती। इस कारण उन विधानों में से सबसे प्रधान और स्वाभाविक बात जो हाथ पकड़ना है उसे चुन कर कवि अपने अर्थ को मनुष्य के हृत्पटल पर रेखांकित करता है। +श्रुति सुखदता. +कविता की बोली और साधारण बोली में बड़ा अन्तर है। “शुष्को वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे” और “नीरसतरुरिह विलसति पुरतः” वाली बात हमारी पण्डित मण्डली में बहुत दिन से चली आती है। भाव-सौन्दर्य और नाद-सौन्दर्य दोनों के संयोग से कविता की सृष्टि होती है। श्रुति-कटु मानकर कुछ अक्षरों का परित्याग, वृत्त-विधान और अन्त्यानुप्रास का बन्धन, इस नाद-सौन्दर्य के निबाहने के लिए है। बिना इसके कविता करना अथवा केवल इसी को सर्वस्व मानकर कविता करने की कोशिश करना निष्फल है। नाद-सौन्दर्य के साथ भाव-सौन्दर्य भी होना चाहिए। हिन्दी के कुछ पुराने कवि इसी नाद-सौन्दर्य के इतना पीछे पड़ गए थे कि उनकी अधिकांश कविता विकृत और प्रायः भावशून्य हो गई है। यह देखकर आजकल के कुछ समालोचक इतना चिढ़ गए हैं, कि ऐसी कविता को एकदम निकाल बाहर करना चाहते हैं। किसी को अन्त्यानुप्रास का बन्धन खलता है, कोई गणात्मक द्वन्द्वों को देखकर नाक भौं चढ़ाता है, कोई फ़ारसी के मुखम्मस और रुबाई की ओर झुकता है। हमारी छन्दोरचना तक की कोई कोई अवहेलना करते हैं- वह छन्दो रचना जिसके माधुर्य को भूमण्डल के किसी देश का छन्द शास्त्र नहीं पा सकता और जो हमारी श्रुति-सुखदता के स्वाभाविक प्रेम के सर्वथा अनुकूल है। जो लोग अन्त्यानुप्रास की बिलकुल आवश्यकता नहीं समझते उनसे मुझे यही पूछना है कि अन्त्यानुप्रास ही पर इतना कोप क्यों? छन्द (Metre) और तुक (Rhyme) दोनों ही नाद-सौन्दर्य के उद्देश्य से रखे गए हैं, फिर क्यों एक को निकाला जाए दूसरे को नहीं? यदि कहा जाए कि सिर्फ छन्द से उस उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है तो यह जानने की इच्छा बनी रहती है कि क्या कविता के लिए नाद-सौन्दर्य की कोई सीमा नियत है। यदि किसी कविता में भाव-सौन्दर्य के साथ नाद-सौन्दर्य भी वर्तमान हो, तो वह अधिक ओजस्विनी और चिरस्थायिनी होगी। नाद-सौन्दर्य कविता के स्थायित्व का वर्धक है, उसके बल से कविता ग्रंथाश्रय-विहीन होने पर भी किसी न किसी अंश में लोगों की जिह्वा पर बनी रहती है। अतएव इस नाद-सौन्दर्य को केवल बन्धन ही न समझना चाहिए। यह कविता की आत्मा नहीं, तो शरीर अवश्य है। +नाद-सौन्दर्य संबंधी नियमों को गणित-क्रिया समान काम में लाने से हमारी कविता में कहीं-कहीं बड़ी विलक्षणता आ गई है। श्रुति-कटु वर्णों का निर्देश इसलिए नहीं किया गया कि जितने अक्षर श्रवण-कटु हैं, वे एकदम त्याज्य समझे जाएँ और उनकी जगह पर श्रवण-सुखद वर्ण ढूंढ-ढूंढ कर रखे जाएँ। इस नियम-निर्देश का मतलब सिर्फ इतना ही है कि यदि मधुराक्षर वाले शब्द मिल सकें और बिना तोड़ मरोड़ के प्रसंगानुसार खप सकें तो उनके स्थान पर श्रुति-कर्कश अक्षर वाले शब्द न लाए जाएँ। संस्कृत से सम्बन्ध रखने वाली भाषाओं में इस नाद-सौन्दर्य का निर्वाह अधिकता से हो सकता है। अतः अंग्रेजी आदि अन्य भाषाओं की देखा-देखी जिनमें इसके लिए कम जगह है, अपनी कविता को भी हमें इस विशेषता से वंचित कर देना बुद्धिमानी का काम नहीं। पर, याद रहे, सिर्फ श्रुति-मधुर अक्षरों के पीछे दीवाने रहना और कविता को अन्यान्य गुणों से भूषित न करना सबसे बड़ा दोष है। एक और विशेषता हमारी कविता में है। वह यह है कि कहीं कहीं व्यक्तियों के नामों के स्थान पर उनके रूप या कार्यबोधक शब्दों का व्यवहार किया जाता है। पद्य के नपे हुए चरणों के लिए शब्दों की संख्या का बढ़ाना ही इसका प्रयोजन जान पड़ता है, पर विचार करने से इसका इससे भी गुरुतर उद्देश्य प्रगट होता है। सच पूछिए तो यह बात कृत्रिमता बचाने के लिए की जाती है। मनुष्यों के नाम यथार्थ में कृत्रिम संकेत हैं, जिनसे कविता की परिपोषकता नहीं होती। अतएव कवि मनुष्यों के नामों के स्थान पर कभी कभी उनके ऐसे रूप, गुण या व्यापार की ओर इशारा करता है जो स्वाभाविक होने के कारण सुनने वाले के ध्यान में अधिक आ सकते हैं और प्रसंग विशेष के अनुकूल होने से वर्णन की यथार्थता को बढ़ाते हैं। गिरिधर, मुरारि, त्रिपुरारि, दीनबन्धु, चक्रपाणि, दशमुख आदि शब्द ऐसे ही हैं। ऐसे शब्दों को चुनते समय प्रसंग या अवसर का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। जैसे, यदि कोई मनुष्य किसी दुर्घर्ष अत्याचारी के हाथ से छुटकारा पाना चाहता हो तो उसके लिए - ‘हे गोपिकारमण!’ ‘हे वृन्दावनबिहारी!’ आदि कहकर कृष्ण को पुकारने की अपेक्षा ‘हे मुरारि!’ ‘हे कंसनिकंदन’ आदि सम्बोधनों से पुकारना अधिक उपयुक्त है, क्योंकि श्रीकृष्ण के द्वारा मुर और कंस आदि दुष्टों को मारा जाना देख कर उसे उनसे अपनी रक्षा की आशा हुई है न कि उनकी वृन्दावन में गोपियों के साथ विहार करना देख कर। इसी तरह किसी आपत्ति से उद्धार पाने के लिए कृष्ण को ‘मुरलीधर’ कह कर पुकारने की अपेक्षा ‘गिरिधर’ कहना अधिक तर्क-संगत है। +अलंकार. +कविता में भाषा को खूब जोरदार बनाना पड़ता है- उसकी सब शक्तियों से काम लेना पड़ता है। कल्पना को चटकीली करने और रस-परिपाक के लिए कभी कभी किसी वस्तु का गुण या आकार बहुत बढ़ाकर दिखाना पड़ता है और कभी घटाकर। कल्पना-तरंग को ऊँचा करने के लिए कभी कभी वस्तु के रूप और गुण को उसके समान रूप और धर्म वाली और वस्तुओं के सामने लाकर रखना पड़ता है। इस तरह की भिन्न भिन्न प्रकार की वर्णन-प्रणालियों का नाम अलंकार है। इनका उपयोग काव्य में प्रसंगानुसार विशेष रूप से होता है। इनसे वस्तु वर्णन में बहुत सहायता मिलती है। कहीं कहीं तो इनके बिना कविता का काम ही नहीं चल सकता, किन्तु इससे यह न समझना चाहिए कि अलंकार ही कविता है। ये अलंकार बोलचाल में भी रोज आते रहते हैं। जैसे, लोग कहते हैं ‘जिसने शालग्राम को भून डाला उसे भंटा भूनते क्या लगता है?’ इसमें काव्यार्थापत्ति अलंकार है। ‘क्या हमसे बैर करके तुम यहाँ टिक सकते हो?’ इसमें वक्रोक्ति है। +कई वर्ष हुए ‘अलंकारप्रकाश’ नामक पुस्तक के कर्ता का एक लेख ‘सरस्वती’ में निकला था। उसका नाम था- ‘कवि और काव्य’। उसमें उन्होंने अलंकारों की प्रधानता स्थापित करते हुए और उन्हें काव्य का सर्वस्व मानते हुए लिखा था कि ‘आजकल के बहुत से विद्वानों का मत विदेशी भाषा के प्रभाव से काव्य विषय में कुछ परिवर्तित देख पड़ता है। वे महाशय सर्वलोकमान्य साहित्य-ग्रन्थों में विवेचन किए हुए व्यंग्य-अलंकार-युक्त काव्य को उत्कृष्ट न समझ केवल सृष्टि-वैचित्र्य वर्णन में काव्यत्व समझते हैं। यदि ऐसा हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या?’ रस और भाव ही कविता के प्राण हैं। पुराने विद्वान् रसात्मक कविता ही को कविता कहते थे। अलंकारों को वे आवश्यकतानुसार वर्णित विषय को विशेषतया हृदयंगम करने के लिए ही लाते थे। यह नहीं समझा जाता था कि अलंकार के बिना कविता हो ही नहीं सकती। स्वयं काव्य-प्रकाश के कर्ता मम्मटाचार्य ने बिना अलंकार के काव्य का होना माना है और उदाहरण भी दिया है- “तददौषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि.” किन्तु पीछे से इन अलंकारों ही में काव्यत्व मान लेने से कविता अभ्यासगम्य और सुगम प्रतीत होने लगी। इसी से लोग उनकी ओर अधिक पड़े। धीरे-धीरे इन अलंकारों के लिए आग्रह होने लगा। यहाँ तक कि चन्द्रालोककार ने कह डाला कि-
+अंगीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।
+असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती।। +अर्थात् - जो अलंकार-रहित शब्द और अर्थ को काव्य मानता है वह अग्नि को उष्णता रहित क्यों नहीं मानता? परन्तु यथार्थ बात कब तक छिपाई जा सकती है। इतने दिनों पीछे समय ने अब पलटा खाया। विचारशील लोगों पर यह बात प्रगट हो गई कि रसात्मक वाक्यों ही का नाम कविता है और रस ही कविता की आत्मा है। +इस विषय में पूर्वोक्त ग्रंथकार महोदय को एक बात कहनी थी, पर उन्होंने नहीं कही। वे कह सकते थे कि सृष्टि-वैचित्र्य-वर्णन भी तो स्वभावोक्ति अलंकार है। इसका उत्तर यह है कि स्वभावोक्ति को अलंकार मानना उचित नहीं। वह अलंकारों की श्रेणी में आ ही नहीं सकती। वर्णन करने की प्रणाली का नाम अलंकार है। जिस वस्तु को हम चाहें उस प्रणाली के अन्तर्गत करके उसका वर्णन कर सकते हैं। किसी वस्तु-विशेष से उसका सम्बन्ध नहीं। यह बात अलंकारों की परीक्षा से स्पष्ट हो जाएगी। स्वभावोक्ति में वर्ण्य वस्तु का निर्देश है, पर वस्तु-निर्वाचन अलंकार का काम नहीं। +इससे स्वभावोक्ति को अलंकार मानना ठीक नहीं। उसे अलंकारों में गिनने वालों ने बहुत सिर खपाया है, पर उसका निर्दोष लक्षण नहीं कर सके। काव्य-प्रकाश के कारिकाकार ने उसका लक्षण लिखा है-
+
+अर्थात्- जिसमें बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है। बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है। बालकादिक कहने से किसी वस्तुविशेष का बोध तो होता नहीं। इससे यही समझा जा सकता है कि सृष्टि की वस्तुओं के व्यापार और रूप का वर्णन स्वभावोक्ति है। इस लक्षण में अतिव्याप्ति दोष के कारण अलंकारता नहीं आती। अलंकारसर्वस्व के कर्ता राजानक रूय्यक ने इसका यह लक्षण लिखा है-
+सूक्ष्मवस्तु स्वभावयथावद्वर्णनं स्वभावोक्तिः।
+अर्थात्- वस्तु के सूक्ष्म स्वभाव का ठीक-ठीक वर्णन करना स्वभावोक्ति है। +आचार्य दण्डी ने अवस्था की योजना करके यह लक्षण लिखा है-
+नानावस्थं पदार्थनां रुपं साक्षाद्विवृण्वती।
+स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या सालंकृतिर्यथा।। +बात यह है कि स्वभावोक्ति अलंकार के अंतर्गत आ ही नहीं सकती, क्योंकि वह वर्णन की शैली नहीं, किन्तु वर्ण्य वस्तु या विषय है। +जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार धारण करने से सुन्दर नहीं हो सकती उसी प्रकार अस्वाभाविक भद्दे और क्षुद्र भावों को अलंकार-स्थापना सुन्दर और मनोहर नहीं बना सकती। महाराज भोज ने भी अलंकार को ‘अलमर्थमलंकर्त्तुः’ अर्थात् सुन्दर अर्थ को शोभित करने वाला ही कहा है। इस कथन से अलंकार आने के पहले ही कविता की सुन्दरता सिद्ध है। अतः उसे अलंकारों में ढूंढना भूल है। अलंकारों से युक्त बहुत से ऐसे काव्योदाहरण दिए जा सकते हैं जिनको अलंकार के प्रेमीलोग भी भद्दा और नीरस कहने में संकोच न करेंगे। इसी तरह बहुत से ऐसे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं जिनमें एक भी अलंकार नहीं, परंतु उनके सौन्दर्य और मनोरंजकत्व को सब स्वीकार करेंगे। जिन वाक्यों से मनुष्य के चित्त में रस संचार न हो - उसकी मानसिक स्थिति में कोई परिवर्तन न हो - वे कदापि काव्य नहीं। अलंकारशास्त्र की कुछ बातें ऐसी हैं, जो केवल शब्द चातुरी मात्र हैं। उसी शब्दकौशल के कारण वे चित्त को चमत्कृत करती हैं। उनसे रस-संचार नहीं होता। वे कान को चाहे चमत्कृत करें, पर मानव-हृदय से उनका विशेष सम्बन्ध नहीं। उनका चमत्कार शिल्पकारों की कारीगरी के समान सिर्फ शिल्प-प्रदर्शनी में रखने योग्य होता है। +अलंकार है क्या वस्तु? विद्वानों ने काव्यों के सुन्दर-सुन्दर स्थलों को पहले चुना। फिर उनकी वर्णन शैली से सौन्दर्य का कारण ढूंढा। तब वर्णन-वैचित्र्य के अनुसार भिन्न-भिन्न लक्षण बनाए। जैसे ‘विकल्प’ अलंकार को पहले पहल राजानक रुय्यक ने ही निकाला है। अब कौन कह सकता है कि काव्यों के जितने सुन्दर-सुन्दर स्थल थे सब ढूंढ डाले गए, अथवा जो सुन्दर समझे गए - जिन्हें लक्ष्य करने लक्षण बने- उनकी सुन्दरता का कारण कही हुई वर्णन प्रणाली ही थी। अलंकारों के लक्षण बनने तक काव्यों का बनना नहीं रुका रहा। आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि ने - “मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः” का उच्चारण किसी अलंकार को ध्यान में रखकर नहीं किया। अलंकार लक्षणों के बनने से बहुत पहले कविता होती थी और अच्छी होती थी। अथवा यों कहना चाहिए की जब से इन अलंकारों को हठात् लाने का उद्योग होने लगा तबसे कविता कुछ बिगड़ चली। (जय हिन्द वन्देमातरम) + +गीता: + +भारत की भीषण भाषा समस्या और उसके सम्भावित समाधान: +भारत एक उप महाद्वीप है। इसके विस्तृत क्षेत्रफल और जनसंख्या के कारण विविध समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जिनमें से भाषा की समस्या एक है। + +सामान्य ज्ञान भास्कर: +यहाँ सामान्य ज्ञान के लेख एवं प्रश्न-उत्तर आदि दिये जायेंगे जिससे हिन्दीभाषी छात्रों को लाभ हो।The first women's court in India was established in which state? + +हिन्दी में अर्थ और विकास संबन्धी लेख: +यहाँ पर हिन्दी में वित्तीय, आर्थिक, विकास-सम्बन्धी लेख लिखे जायेंगे या उनका लिंक दिया जायेगा। हिन्दी भाषा , हिन्दीभाषियों और सभी भारतीयों को 'आर्थिक साक्षर' होना ही चाहिये। इससे ही भला होगा। देश में सुख-सम्पत्ति और शान्ति आयेगी। + +व्‍यापारिक घरानों की सामाजिक जिम्‍मेदारी: +यह पुस्तक व्यापारिक घरानों की सामाजिक जिम्मेदारी के विविद पहलुओं का परिचय कराने वाली है। यह अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र से संबंधित शिक्षकों, छात्रों एवं शोधार्थियों के लिए ुपयोगी हो सकती है। + +पंचायतों का सशक्तीकरण: +पंचायती राज संस्थायें भारत में लोकतंत्र की मेरूदंड है। निर्वाचित स्थानीय निकायों के लिए विकेन्द्रीकृत, सहभागीय और समग्र नियोजन प्रक्रिया को बढावा देने और उन्हें सार्थक रूप प्रदान करने के लिए पंचायती राज मंत्रालय ने अनेक कदम उठाए हैं। +पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ). +इस योजना के तहत अनुदान प्राप्त करने की अनिवार्य शर्त विकेन्द्रीकृत, सहभागीय और समग्र नियोजन प्रक्रिया को बढावा देना है। यह विकास के अन्तर को पाटता है और पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) और उसके पदाधिकारियों की क्षमताओं का विकास करता है। हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने में बीआरजीएफ अत्यधिक उपयोगी साबित हुआ है और पीआरआई’ज तथा राज्यों ने योजना तैयार करने एवं उन पर अमल करने का अच्छा अनुभव प्राप्त कर लिया है। बीआरजीएफ के वर्ष 2009-10 के कुल 4670 करोड़ रुपए के योजना परिव्यय में से 31 दिसबर, 2009 तक 3240 करोड़ रुपए जारी किये जा चुके हैं। +ई-गवर्नेंस परियोजना. +एनईजीपी के अन्तर्गत ईपीआरआई की पहचान मिशन पध्दति की परियोजनाओं के ही एक अंग के रूप में की गई है। इसके तहत विकेन्द्रीकृत डाटाबेस एवं नियोजन, पीआरआई बजट निर्माण एवं लेखाकर्म, केन्द्रीय और राज्य क्षेत्र की योजनाओं का क्रियान्वयन एवं निगरानी, नागरिक-केन्द्रित विशिष्ट सेवायें, पंचायतों और व्यक्तियों को अनन्य कोड (पहचान संख्या), निर्वाचित प्रतिधिनियों और सरकारी पदाधिकारियों को ऑन लाइन स्वयं पठन माध्यम जैसे आईटी से जुड़ी सेवाओं की सम्पूर्ण रेंज प्रदान करने का प्रस्ताव है। ईपीआरआई में आधुनिकता और कार्य कुशलता के प्रतीक के रूप में पीआरआई में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने और व्यापक आईसीटी (सूचना संचार प्रविधि) संस्कृति को प्रेरित करने की क्षमता है। +ईपीआरआई में सभी 2.36 लाख पंचायतों को तीन वर्ष के लिए 4500 करोड़ रुपए के अनन्तिम लागत से कम्प्यूटरिंग सुविधाएं मय कनेक्टिविटी (सम्पर्क सुविधाओं सहित) के प्रदान करने की योजना है। चूंकि पंचायतें, केन्द्र राज्यों के कार्यक्रमों की योजना तैयार करने तथा उनके क्रियान्वयन की बुनियादी इकाइयां होती हैं, ईपीआरआई, एक प्रकार से, एमएमपी की छत्रछाया के रूप में काम करेगा। अत: सरकार, ईएनईजीपी के अन्तर्गत ईपीआरआई को उच्च प्राथमिकता देगी। देश के प्राय: सभी राज्यों (27 राज्यों) की सूचना और सेवा आवश्यकताओं का आकलन, व्यापार प्रक्रिया अभियांत्रिकी और विस्तृत बजट रिपोर्ट पहले ही तैयार की जा चुकी हैं और परियोजना पर अब काम शुरू होने को ही है। +महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण. +राष्ट्रपति ने 4 जून, 2009 को संसद में अपने अभिभाषण में कहा था कि वर्ग, जाति और लिंग के आधार पर अनेक प्रकार की वर्जनाओं से पीड़ित महिलाओं को पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण के फैसले से अधिक महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश का अवसर प्राप्त होगा। तद्नुसार मंत्रिमंडल ने 27 अगस्त, 2009 को संविधान की धारा 243 घ को संशोधित करने के प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया ताकि पंचायत के तीनों स्तर की सीटों और अध्यक्षों के 50 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित किये जा सकें। पंचायती राज मंत्री ने 26 नवम्बर, 2009 को लोकसभा में संविधान (एक सौ दसवां) सशोधन विधेयक, 2009 पेश किया। +वर्तमान में, लगभग 28.18 लाख निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में से 36.87 प्रतिशत महिलायें हैं। प्रस्तावित संविधान संशोधन के बाद निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 14 लाख से भी अधिक हो जाने की आशा है। +पंचायती राज संस्थाओं को कार्यों, वित्त और पदाधिकारियों का हस्तान्तरण. +पंचायतें जमीनी स्तर की लोकतांत्रिक संस्थायें हैं और कार्यों, वित्त तथा पदाधिकारियों के प्रभावी हस्तांतरण से उन्हें और अधिक सशक्त बनाए जाने की आवश्यकता है। इससे पंचायतों द्वारा समग्र योजना बनाई जा सकेगी और संसाधनों को एक साथ जुटाकर तमाम योजनाओं को एक ही बिन्दु से क्रियान्वित किया जा सकेगा। +ग्राम सभा का वर्ष. +पंचायती राज के 50 वर्ष पूरे होने पर 2 अक्तूबर, 2009 को समारोह का आयोजन किया गया। स्वशासन में ग्राम सभाओं और ग्राम पंचायतों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के महत्व को देखते हुए 2 अक्तूबर, 2009 से 2 अक्तूबर, 2010 तक की अवधि को ग्राम सभा वर्ष के रूप में मनाया जाएगा। ग्राम सभाओं की कार्य प्रणाली में प्रभाविकता सुनिश्चित करने के सभी संभव प्रयासों के अतिरिक्त, निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं–पंचायतों, विशेषत: ग्राम सभाओं के सशक्तीकरण के लिए आवश्यक नीतिगत, वैधानिक और कार्यक्रम परिवर्तन, पंचायतों में अधिक कार्य कुशलता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु सुव्यवस्थित प्रणालियों और प्रक्रियाओं को और ग्राम सभाओं तथा पंचायतों की विशिष्ट गतिविधियों को आकार देना और ग्राम सभाओं तथा पंचायतों की विशिष्ट गतिविधियों के बारे में जन-जागृति फैलाना। +न्याय पंचायत विधेयक, 2010. +वर्तमान न्याय प्रणाली, व्ययसाध्य, लम्बी चलने वाली प्रक्रियाओं से लदी हुई, तकनीकी और मुश्किल से समझ में आने वाली है, जिससे निर्धन लोग अपनी शिकायतों के निवारण के लिए कानूनी प्रक्रिया का सहारा नहीं ले पाते। इस प्रकार की दिक्कतों को दूर करने के लिए मंत्रालय ने न्याय पंचायत विधेयक लाने का प्रस्ताव किया है। प्रस्तावित न्याय पंचायतें न्याय की अधिक जनोन्मुखी और सहभागीय प्रणाली सुनिश्चित करेंगी, जिनमें मध्यस्थता, मेल-मिलाप और समझौते की अधिक गुंजाइश होगी। भौगोलिक और मनोवैज्ञानिक रूप से लोगों के अधिक नजदीक होने के कारण न्याय पंचायतें एक आदर्श मंच संस्थायें साबित होंगी, जिससे दोनों पक्षों और गवाहों के समय की बचत होनी, परेशानियां कम होंगी और खर्च भी कम होगा। इससे न्यायपालिका पर काम का बोझ भी कम होगा। +पंचायत महिलाशक्ति अभियान. +यह निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों (ईडब्ल्यूआर) के आत्मविश्वास और क्षमता को बढाने की योजना है ताकि वे उन संस्थागत, समाज संबंधी और राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर काम कर सकें, जो उन्हें ग्रामीण स्थानीय स्वशासन में सक्रियता से भाग लेने में रोकते हैं। बाइस राज्यों में कोर (मुख्य) समितियां गठित की जा चुकी हैं और राज्य स्तरीय सम्मेलन हो चुके हैं। योजना के तहत 9 राज्य समर्थन केन्द्रों की स्थापना की जा चुकी है। ये राज्य हैं– आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, सिक्किम, केरल, पश्चिम बंगाल और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह। योजना के तहत 11 राज्यों में प्रशिक्षण के महत्त्व के बारे में जागरूकता लाने के कार्यक्रम हो चुके हैं। ये राज्य हैं– आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ, ग़ोवा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, मणिपुर, केरल, असम, सिक्किम और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह। +संभागीय स्तर के 47 सम्मेलन 11 राज्यों (छत्तीसगढ, ग़ोवा, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, सिक्किम, मणिपुर, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह) में आयोजित किए गए हैं। गोवा और सिक्किम में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों और निर्वाचित युवा प्रतिनिधियों (ईडब्ल्यूआर्स ईवाईआर्स) के राज्य स्तरीय संघ गठित किये जा चुके हैं। +ग्रामीण व्यापार केन्द्र (आरबीएच) योजना. +भारत में तेजी से हो रहे आर्थिक विकास को ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से पहुंचाने के लिए 2007 में आरबीएच योजना शुरू की गई थी। आरबीएच, देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विकास का एक ऐसा सहभागीय प्रादर्श है जो फोर पी अर्थात पब्लिक प्राईवेट पंचायत पार्टनरशिप (सरकार, निजी क्षेत्र, पंचायत भागीदारी) के आधार पर निर्मित है। आरबीएच की इस पहल का उद्देश्य आजीविका के साधनों में वृध्दि के अलावा ग्रामीण गैर-कृषि आमदनी बढाक़र और ग्रामीण रोजगार को बढावा देकर ग्रामीण समृध्दि का संवर्धन करना है। +राज्य सरकारों के परामर्श से आरबीएच के अमल पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करने के लिए 35 जिलों का चयन किया गया है। संभावित आरबीएच की पहचान और उनके विकास के लिए पंचायतों की मदद के वास्ते गेटवे एजेन्सी के रूप में काम करने हेतु प्रतिष्ठित संगठनों की सेवाओं को सूचीबध्द किया गया है। आरबीएच की स्थापना के लिए 49 परियोजनाओं को वित्तीय सहायता दी जा चुकी है। भविष्य में उनका स्तर और ऊंचा उठाने के लिए आरबीएच का मूल्यांकन भी किया जा रहा है। + +उपभोक्ता अधिकार एवं शिकायत निवारण प्रणाली: +वैश्वीकरण एवं भारतीय बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए खोले जाने के कारण आज भारतीय उपभोक्ताओं की कई ब्रांडों तक पहुंच कायम हो गयी है। हर उद्योग में, चाहे वह त्वरित इस्तेमाल होने वाली उपभोक्ता वस्तु (एफएमसीजी) हो या अधिक दिनों तक चलने वाले सामान हों या फिर सेवा क्षेत्र हो, उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर 20 से अधिक ब्रांड हैं। पर्याप्त उपलब्धता की यह स्थिति उपभोक्ता को विविध प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं में से कोई एक चुनने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उपभोक्ता को उसकी धनराशि की कीमत मिल रही है? आज के परिदृश्य में उपभोक्ता संरक्षण क्यों जरूरी हो गया है? क्या खरीददार को जागरूक बनाएं की अवधारणा अब भी कायम है या फिर हम उपभोक्ता संप्रुभता की ओर आगे बढ रहे हैं। +उपभोक्ता कल्याण की महत्ता. +उपभोक्तावाद, बाजार में उपभोक्ता का महत्व और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता भारत में उपभोक्ता मामले के विकास में कुछ मील के पत्थर हैं। दरअसल किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके बाजार के चारों ओर घूमती है। जब यह विक्रेता का बाजार होता है तो उपभोक्ताओं का अधिकतम शोषण होता है। जब तक क्रेता और विक्रेता बड़ी संख्या में होते हैं तब उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प होते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनने से पहले तक भारत में विक्रेता बाजार था। इस प्रकार वर्ष 1986 एक ऐतिहासिक वर्ष था क्योंकि उसके बाद से उपभोक्ता संरक्षण भारत में गति पकड़ने लगा था। +1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने भारतीय उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद पाने का अवसर प्रदान किया। उसके पहले सरकार ने हमारे अपने उद्योग जगत को सुरक्षा प्रदान करने के लिए विदेशी प्रतिस्पर्धा पर रोक लगा दी थी। इससे ऐसी स्थिति पैदा हुई जहां उपभोक्ता को बहुत कम विकल्प मिल रहे थे और गुणवत्ता की दृष्टि से भी हमारे उत्पाद बहुत ही घटिया थे। एक कार खरीदने के लिए बहुत पहले बुकिंग करनी पड़ती थी और केवल दो ब्रांड उपलब्ध थे। किसी को भी उपभोक्ता के हितों की परवाह नहीं थी और हमारे उद्योग को संरक्षण देने का ही रुख था। +इस प्रकार इस कानून के जरिए उपभोक्ता संतुष्टि और उपभोक्ता संरक्षण को मान्यता मिली। उपभोक्ता को सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रणाली का अपरिहार्य हिस्सा समझा जाने लगा, जहां दो पक्षों यानि क्रेता और विक्रेता के बीच विनिमय का तीसरे पक्ष यानी कि समाज पर असर होता है। हालांकि बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन एवं बिक्री में लाभ की स्वभाविक मंशा कई विनिर्माताओं एवं डीलरों को उपभोक्ताओं का शोषण करने का अवसर भी प्रदान करती है। खराब सामान, सेवाओं में कमी, जाली और नकली ब्रांड, गुमराह करने वाले विज्ञापन जैसी बातें आम हो गयीं हैं और भोले-भाले उपभोक्ता अक्सर इनके शिकार बन जाते हैं। +संक्षिप्त इतिहास. +9 अप्रैल, 1985 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उपभोक्ता संरक्षण के लिए कुछ दिशानिर्देशों को अपनाते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सदस्य देशों खासकर विकासशील देशों को उपभोक्ताओं के हितों के बेहतर संरक्षण के लिए नीतिंयां और कानून अपनाने के लिए राजी करने का जिम्मा सौंपा था। उपभोक्ता आज अपने पैसे की कीमत चाहता है। वह चाहता है कि उत्पाद या सेवा ऐसी हो जो तर्कसंगत उम्मीदों पर खरी उतरे और इस्तेमाल में सुरक्षित हो। वह संबंधित उत्पाद की खासियत को भी जानना चाहता है। इन आकांक्षाओं को उपभोक्ता अधिकार का नाम दिया गया। 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है। +इस तारीख का ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि यह वही दिन है जब 1962 में अमेरिकी संसद कांग्रेस में उपभोक्ता अधिकार विधेयक पेश किया गया था। अपने भाषण में राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने कहा था, न्नन्न यदि उपभोक्ता को घटिया सामान दिया जाता है, यदि कीमतें बहुत अधिक है, यदि दवाएं असुरक्षित और बेकार हैं, यदि उपभोक्ता सूचना के आधार पर चुनने में असमर्थ है तो उसका डालर बर्बाद चला जाता है, उसकी सेहत और सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और राष्ट्रीय हित का भी नुकसान होता है। +उपभोक्ता अंतर्राष्ट्रीय (सीआई), जो पहले अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ता यूनियन संगठन (आईओसीयू) के नाम से जाना जाता था, ने अमेरिकी विधेयक में संलग्न उपभोक्ता अधिकार के घोषणापत्र के तत्वों को बढा क़र आठ कर दिया जो इस प्रकार है- 1.मूल जरूरत 2.सुरक्षा, 3. सूचना, 4. विकल्पपसंद 5. अभ्यावेदन 6. निवारण 7. उपभोक्ता शिक्षण और 8. अच्छा माहौल। सीआई एक बहुत बड़ा संगठन है और इससे 100 से अधिक देशों के 240 संगठन जुड़े हुए हैं। +इस घोषणापत्र का सार्वभौमिक महत्व है क्योंकि यह गरीबों और सुविधाहीनों की आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र ने अप्रैल, 1985 को उपभोक्ता संरक्षण के लिए अपना दिशानिर्देश संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया। +उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986. +भारत ने इस प्रस्ताव के हस्ताक्षरकर्ता देश के तौर पर इसके दायित्व को पूरा करने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनाया। संसद ने दिसंबर, 1986 को यह कानून बनाया जो 15 अप्रैल, 1987 से लागू हो गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करना है। इसके तहत उपभोक्ता विवादों के निवारण के लिए उपभोक्ता परिषदों और अन्य प्राधिकरणों की स्थापना का प्रावधान है। +यह अधिनियम उपभोक्ताओं को अनुचित सौदों और शोषण के खिलाफ प्रभावी, जनोन्मुख और कुशल उपचार उपलब्ध कराता है। अधिनियम सभी सामानों और सेवाओं, चाहें वे निजी, सार्वजनिक या सहकारी क्षेत्र की हों, पर लागू होता है बशर्ते कि वह केंद्र सरकार द्वारा अधिकारिक गजट में विशेष अधिसूचना द्वारा मुक्त न कर दिया गया हो। अधिनियम उपभोक्ताओं के लिये पहले से मौजूदा कानूनों में एक सुधार है क्योंकि यह क्षतिपूर्ति प्रकृति का है, जबकि अन्य कानून मूलत: दंडाधारित है और उसे विशेष स्थितियों में राहत प्रदान करने लायक बनाया गया है। इस अधिनियम के तहत उपचार की सुविधा पहले से लागू अन्य कानूनों के अतिरिक्त है और वह अन्य कानूनों का उल्लंघन नहीं करता। अधिनियम उपभोक्ताओं के छह अधिकारों को कानूनी अमली जामा पहनाता है वे हैं- सुरक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, चुनाव का अधिकार, अपनी बात कहने का अधिकार, शिकायत निवारण का अधिकार और उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार। अधिनियम में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सलाहकार एवं न्याय निकायों के गठन का प्रावधान भी है। इसके सलाहकार स्वरूप के तहत केंद्र, राज्य और जिला स्तर पर उपभोक्ता सुरक्षा परिषद आते हैं। परिषदों का गठन निजी-सार्वजनिक साझेदारी के आधार पर किया जाता है। इन निकायों का उद्देश्य सरकार की उपभोक्ता संबंधी नीतियों की समीक्षा करना और उनमें सुधार के लिए उपाय सुझाना है। +अधिनियम में तीन स्तरों जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर जिला फोरम, राज्य उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग जैसे अर्ध्दन्यायिक निकाय मशीनरी का भी प्रावधान है। फिलहाल देश में 621 जिला फोरम, 35 राज्य आयोग और एक राष्ट्रीय आयोग है। जिला फोरम उन मामलों में फैसले करता है जहां 20 लाख रूपए तक का दावा होता है। राज्य आयोग 20 लाख से ऊपर एक करोड़ रूपए तक के मामलों की सुनवाई करता है जबकि राष्ट्रीय आयोग एक करोड़ रूपए से अधिक की राशि के दावे वाले मामलों की सुनवाई करता है। ये निकाय अर्ध्द-न्यायिक होते हैं और प्राकृतिक न्याय के सिध्दांतों से संचालित होते हैं। उन्हें नोटिस के तीन महीनों के अंदर शिकायतों का निवारण करना होता है और इस अवधि के दौरान कोई जांच नहीं होती है जबकि यदि मामले की सुनवाई पांच महीने तक चलती है तो उसमें जांच भी की जाती है। +उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 समेकित एवं प्रभावी तरीके से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और संवर्ध्दन से संबंधित सामाजिक-आर्थिक कानून है। अधिनियम उपभोक्ताओं के लिए विक्रेताओं, विनिर्माताओं और व्यापारियों द्वारा शोषण जैसे खराब सामान, सेवाओं में कमी, अनुचित व्यापारिक परिपाटी आदि के खिलाफ एक हथियार है। अपनी स्थापना से लेकर 01 जनवरी, 2010 तक राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की उपभोक्ता अदालतों में 33,30,237 मामले दर्ज हुए और 29,58,875 मामले निपटाए गए। + +वन और जैव विविधता: +विश्व वानिकी दिवस एक अंतरराष्ट्रीय दिवस है और यह हर वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है। यह दुनियाभर में लोगों को वनों की महत्ता तथा उनसे मिलने वाले अन्य लाभों की याद दिलाने के लिए पिछले 30 वर्षों से मनाया जा रहा है। +विश्व वानिकी दिवस मनाने का विचार 1971 में यूरोपीय कृषि परिसंघ की 23 वीं महासभा में आया। वानिकी के तीन महत्वपूर्ण तत्वों- सुरक्षा, उत्पादन और वनविहार के बारे में लोगों को जानकारियां देने के लिए उसी साल बाद में 21 मार्च के दिन को यानि दक्षिणी गोलार्ध में शरद विषव और दक्षिण गोलार्ध में वसंत विषव के दिन को चुना गया। +वन प्रागैतिहासिक काल से ही मानवजाति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है। वन का मतलब केवल पेड़ नहीं है बल्कि यह एक संपूर्ण जटिल जीवंत समुदाय है। वन की छतरी के नीचे कई सारे पेड़ और जीवजंतु रहते हैं। वनभूमि बैक्ट्रेरिया, कवक जैसे कई प्रकार के अकशेरूकी जीवों के घर हैं। ये जीव भूमि और वन में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। +वन पर्यावरण, लोगों और जंतुओं को कई प्रकार के लाभ पहुंचाते हैं। वन कई प्रकार के उत्पाद प्रदान करते हैं जैसे फर्नीचर, घरों, रेलवे स्लीपर, प्लाईवुड, ईंधन या फिर चारकोल एव कागज के लिए लकड़ी, सेलोफेन, प्लास्टिक, रेयान और नायलॉन आदि के लिए प्रस्संकृत उत्पाद, रबर के पेड़ से रबर आदि। फल, सुपारी और मसाले भी वनों से एकत्र किए जाते हैं। कर्पूर, सिनचोना जैसे कई औषधीय पौधे भी वनों में ही पाये जाते हैं। +पेड़ों की जड़ें मिट्टी को जकड़े रखती है और इस प्रकार वह भारी बारिश के दिनों में मृदा का अपरदन और बाढ भी रोकती हैं। पेड. कार्बन डाइ आक्साइड अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं जिसकी मानवजाति को सांस लेने के लिए जरूरत पड़ती है। वनस्पति स्थानीय और वैश्विक जलवायु को प्रभावित करती है। पेड़ पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं और जंगली जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं। वे सभी जीवों को सूरज की गर्मी से बचाते हैं और पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं। वन प्रकाश का परावर्तन घटाते हैं, ध्वनि को नियंत्रित करते हैं और हवा की दिशा को बदलने एवं गति को कम करने में मदद करते हैं। इसी प्रकार वन्यजीव भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ये हमारी जीवनशैली के महत्वपूर्ण अंग हैं। +समय की मांग है कि वनों को बचाया जाए क्योंकि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से समस्याएं पैदा होती हैं। वनक्षेत्र घटकर 30 प्रतिशत रह गया है जबकि पहले 60 प्रतिशत पर ही इसके क्षरण का विरोध किया गया था। इस वर्ष विश्व वानिकी दिवस का ध्येय वाक्य वन एवं जैवविविधता रखा गया है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को यह सूचना देने का अवसर उपलब्ध कराना है कि कैसे वनों का रखरखाव और संपोषणीय रूप से उनका इस्तेमाल किया जाए। +वन जैव विविधता एक व्यापक शब्दावली है जो वन्यक्षेत्र में पाए जाने वाले सभी सजीवों और उनकी पारिस्थतिकीय भूमिका से संबध्द है। इसके तहत न केवल पेड़ आते हैं बल्कि विविध प्रकार के जंतु और सूक्ष्मजीव, जो वन्यक्षेत्र में रहते हैं और उनकी गुणसूत्रीय विविधता भी आती है। इसे पारिस्थितिकी तंत्र, भूदृश्य, प्रजाति, संख्या, आनुवांशिकी समेत विभिन्न स्तरों पर समझा जा सकता है। इन स्तरों के अंदर और इनके बीच जटिल अंत:क्रिया हो सकती है। जैव विविध वनों में यह जटिलता जीवों को लगातार बदलते पर्यावरणीय स्थितियों में अपने आप को ढालने में मदद करती है और पारिस्थितिकी तंत्र को सुचारू बनाती है। +पिछले 8000 वर्षों में पृथ्वी के मूल वनक्षेत्र का 45 प्रतिशत हिस्सा गायब हो गया। इस 45 प्रतिशत हिस्से में ज्यादातर हिस्सा पिछली शताब्दी में ही साफ किया गया। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने हाल ही में अनुमान लगाया है कि हर वर्ष 1.3 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र कटाई की वजह से खत्म होता जाता है। वर्ष 2000-2005 के बीच वनक्षेत्र की वार्षिक कुल क्षति 73 लाख हेक्टेयर रही है (जो विश्व के वन क्षेत्र के 0.18 फीसदी के बराबर है)। +पिछले वर्षों में शहतीर लगाना वनों के लिए महत्त्वपूर्ण कामकाज माना जाता था। हालांकि हाल के वर्षों में यह अवधारणा ज्यादा बहुप्रयोजन एवं संतुलित दृष्टकोण की ओर बदली है। अन्य वन्य प्रयोजनों और सेवाओं जैसे वनविहार, स्वास्थ्य, कुशलता, जैवविविधता, पारिस्थतिकी तंत्र सेवाओं का प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन का उपशमन अब वनों की महत्ता के अंग समझे जाने लगे हैं। इसे लगातार जटिल एवं अनोखे तत्व के रूप में मान्यता मिलती जा रही है। +जैव विविधता संधिपत्र(सीबीडी) में सीधे वन जैव विविधता के विस्तारित कार्यक्रम के जरिए वनों पर ध्यान दिया गया है। यह संधिपत्र 2002 में सीबीडी के सदस्य देशों की छठी बैठक में स्वीकार किया गया। वन कार्य कार्यक्रम में वन जैवविविधता के संरक्षण, उसके अवयवों का संपोषणी रूप से इस्तेमाल, वन आनुवांशिक संसाधन का न्यायोचित उपयोग आदि पर केंद्रित लक्ष्य और गतिविधियां शामिल हैं। जैव विविधता पर कार्यक्रम में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य शामिल हैं, वे हैं- संरक्षण, संपोषणीय इस्तेमाल, लाभ साझेदारी, संस्थानात्मक एवं सामाजिक-आर्थिक रूप से उपयुक्त पर्यावरण और ज्ञान आकलन एवं निगरानी आदि। + +सबके लिए अनन्य पहचान की ओर एक कदम: +शायद हम में से ज्यादातर ने हाल ही में समाचारपत्रों या पत्रिकाओं में राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीयक (एनपीआर) के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन यह सारी चहल-पहल आखिर है क्या ? एनपीआर क्या है ? इसका उद्देश्य क्या है ? और इन सबसे बढ़कर, इससे आम आदमी को क्या फायदा होने जा रहा है ? +एनपीआर के बारे में जानने के लिए, पहले जनगणना के बारे में कुछ जान लेना आवश्यक है। अब, भारत के लिए जनगणना कोई नई चीज़ नहीं है। यह अंग्रेजाें के राज से ही की जाती रही है। भारत में पहली जनगणना 1872 में हुई थी। वर्ष 1881 से, जनगणना बिना किसी रूकावट के हर दस साल में की जाती रही है। जनगणना एक प्रशासनिक अभ्यास है जो भारत सरकार करवाती है। इसमें जनांकिकी, सामाजिक -सांस्कृतिक और आर्थिक विशेषताओं जैसे अनेक कारकों के संबंध में पूरी आबादी के बारे में सूचना एकत्र की जाती है। +वर्ष 2011 में भारत की 15वीं तथा स्वतंत्रता के बाद यह सातवीं जनगणना होगी। एनपीआर की तैयारी वर्ष 2011 की जनगणना का मील का पत्थर है। जनगणना दो चरणों में की जाएगी। पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2010 के दौरान होगा जिसमें घरों का सूचीकरण, घरों की आबादी और एनपीआर के बारे में डाटा एकत्र किया जाएगा। इस चरण में एनपीआर कार्यक्रम के बारे में प्रचार करना भी शामिल है जो दो भाषाओं- अंग्रेजी और हर राज्य#संघीय क्षेत्र की राजभाषा में तैयार किया जाएगा। पहला चरण पहली अप्रैल, 2010 को पश्चिम बंगाल, असम, गोवा और मेघालय राज्यों तथा संघीय क्षेत्र अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में शुरू होगा। दूसरे चरण में आबादी की प्रगणना करना शामिल है। +देश के साधारण निवासियों का राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीयक बनाना एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के बारे में विशिष्ट सूचना एकत्र की जाएगी। इसमें अनुमानित एक अरब 20 करोड़ की आबादी को शामिल किया जाएगा तथा इस स्कीम की लागत कुल 3539.24 करोड़ रुपए होगी। भारत में पहली बार एनपीआर तैयार किया जा रहा है। भारत का पंजीयक यह डाटाबेस तैयार करेगा। +इस परिस्थिति में, इस बात पर बल देना महत्वपूर्ण हो जाता है कि यद्यपि इन दोनों अभ्यासों का मक़सद सूचना का संग्रह है मगर जनगणना और एनपीआर अलग-अलग बातें हैं। जनगणना जनांकिकी, साक्षरता एवं शिक्षा, आवास एवं घरेलू सुख-सुविधाएं, आर्थिक गतिविधि, शहरीकरण, प्रजनन शक्ति, मृत्यु संख्या, भाषा, धर्म और प्रवास के बारे में डाटा का सबसे बड़ा स्रोत है। यह केंद्र एवं राज्यों की नीतियों के लिए योजना बनाने तथा उनके कार्यान्वयन के लिए प्राथमिक डाटा के रूप में काम आता है। यह संसदीय, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनावों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण के लिए भी इस्तेमाल की जाती है। +दूसरी तरफ एनपीआर में, देश के लिए व्यापक पहचान का डाटाबेस बनाना शामिल है। इससे आयोजना, सरकारी स्कीमों#कार्यक्रमों का बेहतर लक्ष्य निर्धारित करना तथा देश की सुरक्षा को मजबूत करना भी सुगम होगा। एक अन्य पहलू जो एनपीआर को जनगणना से अलग करता है, वह यह है कि एनपीआर एक सतत प्रक्रिया है। जनगणना में, संबंधित अधिकारियों का कर्तव्य सीमित अवधि के लिए होता है तथा काम समाप्त होने के बाद उनकी सेवाएं अनावश्यक हो जाती हैं जबकि एनपीआर के मामले में संबंधित अधिकारियों और तहसीलदार एवं ग्रामीण अधिकारियों जैसे उनके मातहत अधिकारियों की भूमिका स्थायी होती है। +एनपीआर में व्यक्ति का नाम, पिता का नाम, मां का नाम, पति#पत्नी का नाम, लिंग, जन्म तिथि, वर्तमान वैवाहिक स्थिति, शिक्षा, राष्ट्रीयता (घोषित), व्यवसाय, साधारण निवास के वर्तमान पते और स्थायी निवास के पते जैसी सूचना की मद शामिल होंगी। इस डाटाबेस में 15 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के फोटो और फिंगर बायोमेट्री (उंगलियों के निशान) भी शामिल होंगे। साधारण निवासियों के प्रमाणीकरण के लिए मसौदा डाटाबेस को ग्राम सभा या स्थानीय निकायों के समक्ष रखा जाएगा। +आम आवासियों के स्थानीय रजिस्टर का मसौदा ग्रामीण इलाके में गांवों में और शहरी इलाकों में वार्डों में रखे जाएंगे ताकि नाम के हिज्जों, पत्रों जन्म, तिथियों आदि गलतियों पर शिकायतें प्राप्त की जा सकें। इसके अलावा दर्ज व्यक्ति की रिहायश के मामले में भी शिकायतें प्राप्त की जा सकें। इस मसौदे को आम आवासियों की तस्दीक के लिए ग्राम सभा या स्थानीय निकायों के सामने पेश किया जाएगा। +डाटाबेस पूरा होने के बाद, अगला काम भारतीय अनन्य पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के जरिए हर व्यक्ति को अनन्य पहचान संख्या (यूआईडी) तथा पहचान पत्र देना होगा। बाद में इस यूआईडी नंबर में एनपीआर डाटाबेस जोड़ा जाएगा। पहचान पत्र स्मार्ट कार्ड होगा जिस पर 16 अंक की अनन्य संख्या होगी तथा उसमें शैक्षिक योग्यताएं, स्थान और जन्म तिथि, फोटो और उंगलियों के निशान भी शामिल होंगे। फिलहाल, मतदाता पहचान पत्र या आय कर दाताओं के लिए स्थायी लेखा संख्या (पैन) जैसे सरकार की तरफ से जारी विभिन्न कार्ड एक दूसरे के सब-सेट्स के रूप में काम करते हैं। इन सभी को अनन्य बहुद्देश्यीय पहचान कार्ड में एकीकृत किया जा सकता है। +समूचे देश में एनपीआर का कार्यान्वयन तटीय एनपीआर परियोजना नामक प्रायोगिक परियोजना से हासिल अनुभव के आधार पर समूचे देश में एनपीआर का कार्यान्वयन किया जाएगा। यह परियोजना 9 राज्यों और 4 संघीय क्षेत्रों के 3,000 से अधिक गांवों में चलायी गयी है। मुंबई आतंकी हमलों के बाद तटीय सुरक्षा बढ़ाने के मद्देनज़र तटीय एनपीआर परियोजना कार्यान्वित करने का निर्णय लिया गया था क्योंकि आंतकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई में घुसे थे। +एनपीआर से लोगों को क्या फायदा होगा ? +भारत में, मतदाता पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, पैन कार्ड जैसे विभिन्न डाटाबेस हैं लेकिन इन सबकी सीमित पहुंच है। ऐसा कोई मानक डाटाबेस नहीं है जिसमें पूरी आबादी शामिल हो। एनपीआर मानक डाटाबेस उपलब्ध कराएगा तथा प्रत्येक व्यक्ति को अनन्य पहचान संख्या का आवंटन सुगम कराएगा। यह संख्या व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक स्थायी पहचान प्रदान करने जैसी ही होगी। +एनपीआर का महत्व इस तथ्य में निहित है कि देश में समग्र रूप से विश्वसनीय पहचान प्रणाली की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। गैरकानूनी प्रवास पर लगाम कसने तथा आंतरिक सुरक्षा के मसले से निपटने के लिए भी देश के हर क्षेत्र और हर कोने के लोगों तक पहुंच बनाने की ज़रूरत जैसे विभिन्न कारकों की वजह से यह सब और भी महत्वपूर्ण हो गया है। +अनन्य पहचान संख्या से आम आदमी को कई तरह से फायदा होगा। यह संख्या उपलब्ध होने पर बैंक खाता खोलने जैसी विविध सरकारी या निजी सेवाएं हासिल करने के लिए व्यक्ति को पहचान के प्रमाण के रूप में एक से अधिक दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की ज़रूरत नहीं होगी। यह व्यक्ति के आसान सत्यापन में भी मदद करेगी। बेहद गरीब लोगों के लिए सरकार अनेक कार्यक्रम और योजनाएं चला रही है लेकिन अनेक बार वे लक्षित आबादी तक नहीं पहुंच पाते। इस प्रकार यह पहचान डाटाबेस बनने से सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों की विविध लाभार्थी केंद्रित स्कीमों का लक्ष्य बढ़ाने में मदद मिलेगी। +एनपीआर देश की आंतरिक सुरक्षा बढ़ाने की ज़रूरत भी पूरा करेगा। सबको बहुउद्देश्यीय पहचान पत्र उपलब्ध होने से आतंकवादियों पर भी नज़र रखने में मदद मिलेगी जो अकसर आम आदमियों में घुलमिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त, इससे कर संग्रह बढ़ाने तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में कल्याण योजनाओं के बेहतर लक्ष्य निर्धारण के अलावा गैरकानूनी प्रवासियों की पहचान करने में भी मदद मिलेगी। +भारत अनुमानित 1 अरब 20 करोड़ की आबादी को अनन्य बायोमीट्रिक कार्ड उपलब्ध कराने के वायदे के साथ सबसे बड़ा डाटाबेस बनाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस तरह अनन्य पहचान उपलब्ध कराने का रास्ता निर्धारित कर दिया गया है। यह अभ्यास इतना विशाल है कि इस परियोजना को सफल बनाने के लिए लोगों के उत्साहपूर्ण समर्थन एवं सहयोग की आवश्यकता है जो सबके लिए फायदेमंद होगी। + +प्लास्टिक थैले-पर्यावरणीय मुसीबत: +पर्यावरण. +प्लास्टिक कचरे से पर्यावरण को पहुंचने वाले खतरों का अध्ययनअनेक समितियों ने किया है। प्लास्टिक थैलों के इस्तेमाल से होने वाली समस्यायें मुख्य रूप से कचरा प्रबंधन प्रणालियों की खामियों के कारण पैदा हुई हैं। अंधाधुंध रसायनों के इस्तेमाल के कारण खुली नालियों का प्रवाह रूकने, भूजल संदूषण आदि जैसी पर्यावरणीय समस्यायें जन्म लेती हैं। प्लास्टिक रसायनों से निर्मित पदार्थ है जिसका इस्तेमाल विश्वभर में पैकेजिंग के लिये होता है, और इसी कारण स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिये खतरा बना हुआ है। यदि अनुमोदित प्रक्रियाओं और दिशा-निर्देशों के अनुसार प्लास्टिक की रिसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) किया जाए तो पर्यावरण अथवा स्वास्थ्य के लिये ये खतरा नहीं बनेगा। +प्लास्टिक किसे कहते हैं? +प्लास्टिक एक प्रकार का पॉलीमर यानी मोनोमर नाम की दोहराई जाने वाली इकाइयों से युक्त बड़ा अणु है। प्लास्टिक थैलों के मामले में दोहराई जाने वाली इकाइयां एथिलीन की होती हैं। जब एथिलीन के अणु को पॉली एथिलीन बनाने के लिए ‘पॉलीमराइज’ किया जाता है, वे कार्बन अणुओं की एक लम्बी शृंखला बनाती हैं, जिसमें प्रत्येक कार्बन को हाइड्रोजन के दो परमाणुओं से संयोजित किया जाता है। +क्या प्लास्टिक के थैले स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद है? +प्लास्टिक मूल रूप से विषैला या हानिप्रद नहीं होता। परन्तु प्लास्टिक के थैले रंग और रंजक, धातुओं और अन्य तमाम प्रकार के अकार्बनिक रसायनो को मिलाकर बनाए जाते हैं। रंग और रंजक एक प्रकार के औद्योगिक उत्पाद होते हैं जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक थैलों को चमकीला रंग देने के लिये किया जाता है। इनमें से कुछ कैंसर को जन्म देने की संभावना से युक्त हैं तो कुछ खाद्य पदार्थों को विषैला बनाने में सक्षम होते हैं। रंजक पदार्थों में कैडमियम जैसी जो भरी धातुएं होती हैं वे फैलकर स्वास्थ्य के लिये खतरा साबित हो सकती हैं। +प्लास्टिसाइजर अल्प अस्थिर प्रकृति का जैविक (कार्बनिक) एस्सटर (अम्ल और अल्कोहल से बना घोल) होता है। वे द्रवों की भांति निथार कर खाद्य पदार्थों में घुस सकते हैं। ये कैंसर पैदा करने की संभावना से युक्त होते हैं। +एंटी आक्सीडेंट और स्टैबिलाइजर अकार्बनिक और कार्बनिक रसायन होते हैं जो निर्माण प्रक्रिया के दौरान तापीय विघटन से रक्षा करते हैं। +कैडमियम और जस्ता जैसी विषैली धातुओं का इस्तेमाल जब प्लास्टिक थैलों के निर्माण में किया जाता है, वे निथार कर खाद्य पदार्थों को विषाक्त बना देती हैं। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और हृदय का आकार बढ सक़ता है। लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होकर नुकसान पहुंचता है। +प्लास्टिक थैलों से उत्पन्न समस्याएं. +प्लास्टिक थैलियों का निपटान यदि सही ढंग से नहीं किया जाता है तो वे जल निकास (नाली) प्रणाली में अपना स्थान बना लेती हैं, जिसके फलस्वरूप नालियों में अवरोध पैदा होकर पर्यावरण को अस्वास्थ्यकर बना देती हैं। इससे जलवाही बीमारियों भी पैदा होती हैं। रि-साइकिल किये गए अथवा रंगीन प्लास्टिक थैलों में कतिपय ऐसे रसायन होते हैं जो निथर कर जमीन में पहुंच जाते हैं और इससे मिट्टी और भूगर्भीय जल विषाक्त बन सकता है। जिन उद्योगों में पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तकनीक वाली रि-साइकिलिंग इकाइयां नहीं लगी होतीं, वे प्रक्रम के दौरान पैदा होने वाले विषैले धुएं से पर्यावरण के लिये समस्याएं पैदा कर सकते हैं। प्लास्टिक की कुछ थैलियों जिनमें बचा हुआ खाना पड़ा होता है, अथवा जो अन्य प्रकार के कचरे में जाकर गड-मड हो जाती हैं, उन्हें प्राय: पशु अपना आहार बना लेते हैं, जिसके नतीजे नुकसान दायक हो सकते हैं। चूंकि प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जो सहज रूप से मिट्टी में घुल-मिल नहीं सकता और स्वभाव से अप्रभावनीय होता है, उसे यदि मिट्टी में छोड़ दिया जाए तो भूगर्भीय जल की रिचार्जिंग को रोक सकता है। इसके अलावा, प्लास्टिक उत्पादों के गुणों के सुधार के लिये और उनको मिट्टी से घुलनशील बनाने के इरादे से जो रासायनिक पदार्थ और रंग आदि उनमें आमतौर पर मिलाए जाते हैं, वे प्राय: स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालते हैं। +प्लास्टिक कचरा प्रबंधन हेतु कार्य योजनायें. +अनेक राज्यों ने तुलनात्मक दृष्टि से मोटे थैलों का उपाय सुझाया है। ठोस कचरे की धारा में इस प्रकार के थैलों का प्रवाह काफी हद तक कम हो सकेगा, क्योंकि कचरा बीनने वाले रिसाइकिलिंग के लिये उनको अन्य कचरे से अलग कर देंगे। पतली प्लास्टिक थैलियों की कोई खास कीमत नहीं मिलती और उनको अलग-थलग करना भी कठिन होता है। यदि प्लास्टिक थैलियों की मोटाई बढा दी जाए, तो इससे वे थोड़े महंगे हो जाएंगे और उनके उपयोग में कुछ कमी आएगी। +प्लास्टिक की थैलियों, पानी की बोतलों और पाउचों को कचरे के तौर पर फैलाना नगरपालिकाओं की कचरा प्रबंधन प्रणाली के लिये एक चुनौती बनी हुई है। अनेक पर्वतीय राज्यों (जम्मू एवं कश्मीर, सिक्किम, पश्चिम बंगाल) ने पर्यटन केन्द्रों पर प्लास्टिक थैलियोंबोतलों के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक कानून के तहत समूचे राज्य में 15.08.2009 से प्लास्टिक के उपयोग पर पाबंदी लगा दी है। +केन्द्र सरकार ने भी प्लास्टिक कचरे से पर्यावरण को होने वाली हानि का आकलन कराया है। इसके लिये कई समितियां और कार्यबल गठित किये गए, जिनकी रिपोर्ट सरकार के पास है। +पर्यावरण और वन मंत्रालय ने रि-साइकिंल्ड प्लास्टिक मैन्यूफैक्चर ऐंड यूसेज रूल्स, 1999 जारी किया था, जिसे 2003 में, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1968 के तहत संशोधित किया गया है ताकि प्लास्टिक की थैलियों और डिब्बों का नियमन और प्रबंधन उचित ढंग से किया जा सके। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने धरती में घुलनशील प्लास्टिक के 10 मानकों के बारे में अधिसूचना जारी की है। +प्लास्टिक के विकल्प. +प्लास्टिक थैलियों के विकल्प के रूप में जूट और कपड़े से बनी थैलियों और कागज की थैलियों को लोकप्रिय बनाया जाना चाहिए और इसके लिए कुछ वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जाना चाहिए। यहां, ध्यान देने की बात है कि कागज की थैलियों के निर्माण में पेड़ों की कटाई निहित होती है और उनका उपयोग भी सीमित है। आदर्श रूप से, केवल धरती में घुलनशील प्लास्टिक थैलियों का उपयोग ही किया जाना चाहिये। जैविक दृष्टि से घुलनशील प्लास्टिक के विकास के लिये अनुसंधान कार्य जारी है। +vsuediv vgkyhwk + +शिक्षा का अधिकार अब एक मौलिक अधिकार: +भारत माता के महान सपूतों में से एक, गोपाल कृष्ण गोखले यदि आज जिंदा होते तो देश के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार के अपने सपने को साकार होते देखकर सबसे अधिक प्रसन्न होते। गोखले वही व्यक्ति थे, जिन्होंने आज से एक सौ वर्ष पहले ही इम्पीरियल लेजिस्लेटिव एसेम्बली से यह मांग की थी कि भारतीय बच्चों को ऐसा अधिकार प्रदान किया जाए। इस लक्ष्य तक पहुंचने में हमें एक सदी का समय लगा है। +सरकार ने अंतत: सभी विसंगतियों को दूर करते हुए इस वर्ष पहली अप्रैल से शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू किया है। शिक्षा का अधिकार अब 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए एक मौलिक अधिकार है। सरल शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सरकार प्रत्येक बच्चे को आठवीं कक्षा तक की नि:शुल्क पढार्ऌ के लिए उत्तरदायी होगी, चाहे वह बालक हो अथवा बालिका अथवा किसी भी वर्ग का हो। इस प्रकार इस कानून देश के बच्चों को मजबूत, साक्षर और अधिकार संपन्न बनाने का मार्ग तैयार कर दिया है। +इस अधिनियम में सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और अनिवार्य शिक्षा प्रदान का प्रावधान है, जिससे ज्ञान, कौशल और मूल्यों से लैस करके उन्हें भारत का प्रबुध्द नागरिक बनाया जा सके। यदि विचार किया जाए तो आज देशभर में स्कूलों से वंचित लगभग एक करोड़ बच्चों को शिक्षा प्रदान करना सचमुच हमारे लिए एक दुष्कर कार्य है। इसलिए इस लक्ष्य को साकार करने के लिए सभी हितधारकों — माता-पिता, शिक्षक, स्कूलों, गैर-सरकारी संगठनों और कुल मिलाकर समाज, राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार की ओर से एकजुट प्रयास का आह्वान किया गया है। जैसा कि राष्ट्र को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि सबको साथ मिलकर काम करना होगा और राष्ट्रीय अभियान के रूप में चुनौती को पूरा करना होगा। +डॉ. सिंह ने देशवासियों के सामने अपने अंदाज में अपनी बात रखी कि वह आज जो कुछ भी हैं, केवल शिक्षा के कारण ही। उन्होंने बताया कि वह किस प्रकार लालटेन की मध्दिम रोशनी में पढार्ऌ करते थे और वाह स्थित अपने स्कूल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी पैदल चलकर तय करते थे, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने बताया कि उस दौर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने में भी काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। वंचित वर्गों के लिए शिक्षा पाने की मांग के संदेश बेहतर रूप में पेश नहीं किए जा सके। +इस अधिनियम में इस बात का प्रावधान किया गया है कि पहुंच के भीतर वाला कोई निकटवर्ती स्कूल किसी भी बच्चे को प्रवेश देने से इनकार नहीं करेगा। इसमें यह भी प्रावधान शामिल है कि प्रत्येक 30 छात्र के लिए एक शिक्षक के अनुपात को कायम रखते हए पर्याप्त संख्या में सुयोग्य शिक्षक स्कूलों में मौजूद होना चाहिए। स्कूलों को पांच वर्षों के भीतर अपने सभी शिक्षकों को प्रशिक्षित करना होगा। उन्हें तीन वर्षों के भीतर समुचित सुविधाएं भी सुनिश्चित करनी होगी, जिससे खेल का मैदान, पुस्तकालय, पर्याप्त संख्या में अध्ययन कक्ष, शौचालय, शारीरिक विकलांग बच्चों के लिए निर्बाध पहुंच तथा पेय जल सुविधाएं शामिल हैं। स्कूल प्रबंधन समितियों के 75 प्रतिशत सदस्य छात्रों की कार्यप्रणाली और अनुदानों के इस्तेमाल की देखरेख करेंगे। स्कूल प्रबंधन समितियां अथवा स्थानीय अधिकारी स्कूल से वंचित बच्चों की पहचान करेंगे और उन्हें समुचित प्रशिक्षण के बाद उनकी उम्र के अनुसार समुचित कक्षाओं में प्रवेश दिलाएंगे। सम्मिलित विकास को बढावा देने के उद्देश्य से अगले वर्ष से निजी स्कूल भी सबसे निचली कक्षा में समाज के गरीब और हाशिये पर रहने वाले वर्गों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करेंगे। +इन लक्ष्यों पर जोर देने की जरूरत है। किन्तु उन्हें साकार करना एक बड़ी चुनौती हे। देश में लगभग एक करोड़ बच्चे स्कूलों से वंचित हैं, जो अपने आप में एक बड़ी संख्या है। प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, स्कूलों में सुविधाओं का अभाव, अतिरिक्त स्कूलों की आवश्यकता और धन की कमी होना अन्य बड़ी चुनौतियां हैं। +मौजूदा स्थिति चौंकाने वाली है। लगभग 46 प्रतिशत स्कूलों में बालिकाओं के लिए शौचालय नहीं हैं, जो माता-पिता द्वारा बच्चों को स्कूल नहीं भेजने का एक प्रमुख कारण है। देशभर में 12.6 लाख शिक्षकों के पद खाली हैं। देश के 12.9 लाख मान्यता प्राप्त प्रारंभिक स्कूलों में अप्रशिक्षित शिक्षकों की संख्या 7.72 लाख है, जो कुल शिक्षकों की संख्या का 40 प्रतिशत है। लगभग 53 प्रतिशत स्कूलों में अधिनियम के प्रावधान के अनुसार निर्धारित छात्र-शिक्षक अनुपात 1: 30 से अधिक है। +इस अधिनियम के क्रियान्वयन में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी एक प्रमुख बाधा है। इन रिक्तियों को भरने के उद्देश्य से अगले छ: वर्षों में लगभग पांच लाख शिक्षकों को भर्ती करने की योजना है। +जहां तक धन की कमी का प्रश्न है, इस अधिनियम में राज्यों के साथ हिस्सेदारी का प्रावधान है, जिसमें कुल व्यय मे केन्द्र सरकार का हिस्सा 55 प्रतिशत है। एक अनुमान के अनुसार इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए अगले पांच वर्ष में 1.71 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी और मौजूदा वर्ष में 34 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इनमें से केन्द्रीय बजट में 15,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वहीं दूसरी ओर केन्द्र सरकार द्वारा शैक्षिक कार्यक्रमों के लिए पहले से राज्यों को दिए गए लगभग 10,000 करोड़ रुपये का व्यय नहीं हो पाया है। इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए वित्त आयोग ने राज्यों को 25,000 करोड़ रुपये आबंटित किए हैं। इसके बावजूद, बिहार, उत्तर प्रदेश और ओड़िशा जैसे राज्यों ने अतिरिक्त निधि की मांग की है। प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि इस अधिनियम के क्रियान्वयन में धन की कमी नहीं होने दी जाएगी। इस परियोजना की सफलता के लिए सभी हितधारकों की ओर से एक ईमानदार पहल की आवश्यकता है। इस कानून के उल्लंघन पर नजर रखने के लिए एक बाल अधिकार आयोग गठित किया जाएगा। +हमारे सामने कई अन्य चुनौतियां भी होंगी। निम्न आय समूह वाले माता-पिता परिवार की आय बढाने के लिए अपने बच्चों को काम करने के लिए भेजते हैं। कम उम्र में विवाह होना और जीविका के लिए लोगों का प्रवास करना भी ऐसे मुद्दे हैं जिनका हल करना इस अधिनियम के सफलातापूर्वक क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है। +इस प्रकार भारत ने वैधानिक समर्थन के साथ एक सशक्त देश की आधारशिला रखने के लिए एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया है। यह उन देशों के एक छोटे समूह में शामिल हुआ हे, जिनके पास ऐसे वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं। वास्तव में यह शिक्षा को व्यापक बनाने की दिशा में उठाया गया एक अद्वितीय कदम है। प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि दलितों, अल्पसंख्यक और बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करने के लिए मुख्य रूप से प्रयास किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने हरेक भारतीय को सुंदर भविष्य का सपना देखने की अपनी चाहत के बारे में बताकर प्रत्येक भारतीय को साक्षर बनाने हेतु अपनी सरकार की प्रतिबध्दता के बारे मे अवगत करा दिया है। अब इस लक्ष्य की ओर देखना हम सबका दायित्व है। शिक्षा का मुद्दा भारत के संविधान की समवर्ती सूची में शामिल है, अत: इसके लिए सभी स्तरों पर बेहतर सहयोग की जरूरत है। + +शहरी भारत के स्वास्थ्य संबंधी खतरे: +इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस स्वास्थ्य पर शहरीकरण के प्रभाव विषय पर केंद्रित है। इस बार विश्व स्वास्थ्य संगठन ”1000 शहर-1000 जीवन” अभियान लेकर आया है। यह अभियान स्वास्थ्य गतिविधियों के लिए सड़कों को खोलने के लिए शहरों के आह्वान के साथ दुनिया भर में आयोजित किया जाएगा। बाकी सभी की तरह यह विषय भारतीय संदर्भ में भी बहुत ज़रूरी माना जाता है जहां स्वास्थ्य मंत्री श्री गुलाम नबी आज़ाद कहते हैं, ” यद्यपि हम अपना आर्थिक सूचकांक सुधार रहे हैं, मगर फिर भी हम अब तक दुनिया में बीमारी का बोझ बढ़ाने के सबसे बड़े योगदानकर्ता बने हुए हैं। ” +अनुमान बहुत भयावह हैं। आज वयोवृध्द लोगों की आबादी बढ़ने तथा ज्यादा महत्त्वपूर्ण रूप से तेजी से हुए शहरीकरण के कारण असंक्रामक रोग (एनसीडी), विशेषरूप से कार्डियोवस्कुलर रोग (सीवीडी), डायबिटीज मेलिटस, कैंसर, आघात और जीर्ण फेफड़ा रोग प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में उभरे हैं। भारत में हुए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि करीब 10 प्रतिशत वयस्क उच्च रक्त चाप से पीड़ित हैं। हृदयवाहिका यानी कार्डियोवस्कुलर रोगों में वृध्दि जारी है। भारत में अस्थानिक अरक्तता हृदय रोगों के कारण मृत्यु की संख्या 1990 में 12 लाख से बढ़कर वर्ष 2000 में 16 लाख तथा 2010 में 20 लाख होने का अनुमान है। जीवन के बेहद उत्पादक दौर में अपरिपक्व मातृ अस्वस्थता दर और मृत्यु दर भारतीय समाज और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। अनुमान है कि वर्ष 2005 में भारत में हुई कुल मौतों (10,362,000) में एलसीडी का योगदान 5,466,000 (53 प्रतिशत) था। इस भयावह आंकड़े से शहर बहुत अधिक त्रस्त हैं। अगर उपचारात्मक उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में भी कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2035 तक शहर दुनिया भर में गरीबी के प्रधान स्थल बन जाएंगे। शहरी गरीबों की स्वास्थ्य समस्याओं में हिंसा, जीर्ण रोग, और टीबी एवं एचआईवी#एड्स जैसे संक्रामक रोगों के लिए जोखिम में वृध्दि शामिल है। +संकट से निपटना. +भारत ने इस स्थिति पर ध्यान दिया है तथा स्थिति से निपटने के लिए ठोस शुरूआत की है। दस राज्यों के दस जिलों में (प्रत्येक में एक) मधुमेह, कार्डियो-वस्कुलर रोगों और आघात से बचाव एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीसीडीएस) की प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई है। ग्यारहवीं योजना में इसके लिए कुल योजना आबंटन 1620.5 करोड़ रुपए है। अन्य बातों के अलावा एनपीसीडीएस इस रोग के बारे में जल्दी पता लगाने की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए है। इस योजना के तहत पूरे देश को लाया जाएगा। स्वास्थ्य को प्रोत्साहन एनसीडी से बचाव और नियंत्रण का प्रमुख घटक है। इसमें समर्थक माहौल उपलब्ध कराने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप के साथ शैक्षिक गतिविधियां शामिल होनी चाहिए। यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि एनसीडी नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य प्रोत्साहन सरल संदेश के साथ दिया जा सकता है अर्थात नमक एवं चीनी का कम इस्तेमाल, व्यायाम, तनाव से बचना, तंबाकू एवं अल्कोहल के सेवन से बचना तथा सब्जियों एवं फलों का इस्तेमाल बढ़ाना। इन आसान से उपायों से एनसीडी से बचाव किया जा सकता है या इसे ज्यादा देर तक टाला जा सकता है। +असंक्रामक रोगों के क्षेत्र में अनेक पहल की गई हैं अर्थात राष्ट्र्र्रीय बधिरता नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय वयोवृध्द स्वास्थ्य देखरेख कार्यक्रम, राष्ट्रीय मौखिक स्वास्थ्य कार्यक्रम। अनुमान है कि हमारी सड़कों पर रोजाना 275 व्यक्ति मरते हैं तथा 4,100 घायल होते हैं। इस तथ्य के मद्देनज़र, स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग सुश्रुत देखरेख परियोजना शुरू की जो अपनी तरह की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है तथा इसके तहत सम्पूर्ण स्वर्णिम चतुर्भुज तथा उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम गलियारों को शामिल करने का इरादा है तथा इन्हें 200 अस्पताल, अस्पताल-पूर्व देखरेख इकाई तथा एकीकृत संचार प्रणाली के साथ उन्नत किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना बड़े पैमाने पर अछूती आबादी को स्वास्थ्य सेवाओं के दायरे में लाने की एक अन्य पहल है। +योजना ही कुंजी है. +विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, शहरीकरण सहज रूप में सकारात्मक या नकारात्मक नहीं होता है। निम्न घटक भी सामाजिक निर्धारकों के रूप में संदर्भित हैं- शहरी ठिकानों का अभिसरित होना जो स्वास्थ्य दशा और अन्य निष्कर्षों को बहुत ज्यादा प्रभावित करता है। इन निर्धारकों में भौतिक बुनियादी ढांचा, सामाजिक एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, स्थानीय शासन, और आमदनी एवं शैक्षिक अवसरों का वितरण शामिल हैं। एचआईवी#एड्स और टीबी जैसे संक्रामक रोग, हृदय रोग एवं मधुमेह, मानसिक विकार जैसे जीर्ण रोगों तथा हिंसा एवं सड़क यातायात दुर्घटनाओं के कारण हुई मृत्यु – सभी इन सामाजिक निर्धारकों से निर्देशित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शहरी केंद्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के संबंध में बढ़ती असमानता पर चिंता प्रकट की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का दृढ़ विश्वास है कि सक्रिय परिवहन, शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए निर्धारित क्षेत्रों में निवेश और तंबाकू पर नियंत्रण एवं खाद्य सुरक्षा के लिए कानून पारित करने के जरिए शहरी आयोजना स्वस्थ व्यवहारों एवं सुरक्षा को बढ़ावा दे सकती है। आवास, पानी एवं स्वच्छता के क्षेत्रों में शहरी जीवन दशाओं में सुधार करना स्वास्थ्य जोखिमों के उन्मूलन में बहुत मददगार होगा। ऐसे कार्यो के लिए अनिवार्य रूप से अतिरिक्त वित्त की ज़रूरत नहीं होगी लेकिन प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों के लिए संसाधनों को पुननिर्देशित करने की प्रतिबध्दता की ज़रूरत होगी, इस प्रकार ज्यादा कार्यदक्षता हासिल की जा सकेगी। +शहरीकरण हमारे समय की वास्तविकता है, हम इसे सकारात्मक मानकर अनुक्रिया करें या नकारात्मक मानकर यह पूरी तरह हमारे ऊपर निर्भर है। इस संदर्भ में शहरीकरण नीति संबंधी चुनौती भी है और महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत विकल्प भी। स्वस्थ आदतों को आत्मसात करके तथा तत्काल खपत के बजाय संसाधनों को लंबे समय तक कायम रखने के प्रति चिंतित होकर ही समाज इस वास्तविकता का सामना ज्यादा सार्थक ढंग से कर सकता है। (पसूका) + +नदियों में प्रदूषण: +पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण प्रमुख नदियों में प्रदूषण का बोझ बढ गया है। सिंचाई, पीने के लिए, बिजली तथा अन्य उद्देश्यों के लिए पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल से चुनौती काफी बढ गयी हैं। +प्रदूषण का स्रोत. +नदियां नगर निगमों के शोधित एवं अशोधित अपशिष्ट एवं औद्योगिक कचरे से प्रदूषित होती हैं। सभी बड़े एवं मझौले उद्योगों ने तरल अपशिष्ट शोधन संयंत्र लगा रखे हैं और वे सामान्यत: जैव रसायन ऑक्सीजन मांग (बीओडी) के निर्धारित मानकों का पालन करते हैं। हालांकि कई औद्योगिक क्षेत्र देश के कई हिस्सों में प्रदूषण को काफी बढा देते हैं। नगर निगम अपशिष्ट के मामले में ऐसा अनुमान है कि प्रथम श्रेणी शहर (423) और द्वितीय श्रेणी शहर (449) प्रति दिन 330000 लाख लीटर तरल अपशिष्ट उत्सर्जित करते हैं जबकि देश में प्रति दिन तरल अपशिष्ट शोधन की क्षमता महज 70000 लाख लीटर है। अपशिष्ट पदार्थों के शोधन का काम संबंधित नगर निगमों का होता है। जबतक ये निगम प्रशासन पूर्ण क्षमता तक अपशिष्टों का शोधन नहीं कर लेते तबतक डीओबी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। +नदी संरक्षण केंद्र और राज्य सरकारों के सामूहिक प्रयास से लगातार चल रहा है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के तहत नदियों के पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रदूषण घटाने संबंधी कार्य चलाए जा रहे हैं। एनआरसीपी के तहत 20 राज्यों में गंगा, यमुना, दामोदर, और स्वर्णरेखा समेत 37 नदियों के प्रदूषित खंडों पर ध्यान दिया जा रहा है। जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन जैसी अन्य केंद्रीय योजनाओं तथा राज्यों की शहरी अवसरंचना विकास योजना जैसी योजनाओं के तहत भी नदी संरक्षण गतिविधियां चल रही हैं। +नदी संरक्षण कार्यक्रम के क्रियान्वयन पर भूमि अधिग्रहण की समस्या, सृजित परिसंपत्तियों के सही प्रबंधन नहीं हो पाने, अनियमित बिजली आपूर्ति, सीवरेज शोधन संयंत्रों के कम इस्तेमाल आदि का प्रतिकूल असर पड़ता है। +प्रदूषित खंड. +फिलहाल, 282 नदियों पर 1365 प्रदूषित खंड केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) के नजर में हैं। +सीपीसीबी ने वर्ष 2000 में पानी की गुणवत्ता संबंधी आंकड़े के आधार पर प्रदूषित खंड की सूची को अद्यतन किया था। 86 प्रदूषित जलाशयों खंडों की पहचान की गयी। उनमें से 71 नदियों, 15 झीलों और तालाबों से संबंधित हैं। बाद में सन् 2000 से 2006 तक के सात वर्षों के दौरान पानी की गुणवत्ता संबंधी आकंड़ों के आधार पर 178 प्रदूषित जलाशयों खंडों की पहचान की गयी जिनमें से 139 नदियों से , 33 झीलों, तालाबों आदि से तथा तीन छोटी नदियों एवं तीन नहरों से संबंधित हैं। +प्रदूषित खंड की पहचान के मापदंड. +प्रदूषित खंड वह क्षेत्र है जहां पानी की गुणवत्ता का वांछित स्तर बीओडी के अनुकूल नहीं होता। फिलहाल , जिन जलाशयों का बीओडी 6 मिलीग्राम1 से ज्यादा होता है उन्हें प्रदूषित जलाशय कहा जाता है। नदी के किसी भी हिस्से में पानी की उच्च गुणवत्ता संबंधी मांग को उसका निर्धारित सर्वश्रेष्ठ उपयोग समझा जाता है। हर निर्धारित सर्वश्रेष्ठ उपयोग के लिए गुणवत्ता संबंधी शर्त सीपीसीबी द्वारा तय किया गया है। +श्रेणी ए के तहत जल की गुणवत्ता बताती है कि बिना किसी शोधन के वह पेयजल स्रोत है जिसमें कीटाणुशोधन के बाद, घुल्य ऑक्सीजन छह मिलीग्राम1, बीओडी 2 मिलीग्राम1, या कुल कॉलिफॉर्म 50एमपीएन100 एमएल होना चाहिए। +श्रेणी बी का पानी केवल नहाने योग्य होता है। इस पानी में घुल्य ऑक्सीजन 5 मिलीग्राम1 या उससे अधिक होना चाहिए और बीओडी -3एमजी1 होना चाहिए। कॉलीफार्म 500 एमपीएन100(वांछनीय) होना चाहिए लेकिन यदि यह 2500एमपीएन100एमएल हो तो यह अधिकतम मान्य सीमा है। +श्रेणी सी का पानी पारंपरिक शोधन और कीटाणुशोधन के बाद पेयजल स्रोत है। घुल्य ऑक्सीजन 4 मिलीग्राम1 या उससे अधिक होना चाहिए तथा बीओडी 3 मिलीग्राम1 या उससे कम होना चाहिए तथा कॉलीफार्म 5000एमपीएन100 एमएल होना चाहिए। +श्रेणी डी और ई का पानीद्ग वन्यजीवों के लिए तथा सिंचाई के लिए होता है। घुल्य ऑक्सीजन 4 मिली ग्राम1 उससे अधिक होना चाहिए तथा 1.2एमजी1 पर मुक्त अमोनिया जंगली जीवों के प्रजनन एवं मात्स्यिकी के लिए अच्छा माना जाता है। 2250 एमएचओएससीयू बिजली संचालकता, सोडियम अवशोषण अनुपात 26 और उससे कम तथा बोरोन 2 एमजी1 वाले पानी का इस्तेमाल सिंचाई, औद्योगिक प्रशीतन और नियंत्रित अपशिष्ट निवारण के लिए किया जा सकता है। +एनआरसीपी एवं इसका कवरेज. +केंद्र प्रायोजित राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) की केंद्र सरकार राज्य सरकारें मिलकर चलाती हैं और दोनों मिलकर इसका खर्च वहन करते हैं। देश में एनआरसीपी के तहत 20 राज्यों के 166 शहरों में 37 प्रमुख नदियों के चिह्नित प्रदूषित खंडों में प्रदूषण कम करने का कार्य चल रहा है। एनआरसीपी के तहत इन परियोजनाओं के लिए 4391.83 करोड़ रूपए अनुमोदित किए गए हैं जबकि अबतक 3868.49 करोड़ रूपए व्यय किए जा चुके हैं। फिलहाल 1064 अनुमोदित परियोजनाओं में से 783 पूरी हो चुकी हैं तथा 4212.81 एमएलडी अनुमोदित क्षमता में से 3057.29 एमएलडी तक की सीवरेज क्षमता तैयार कर ली गयी है। इन आंकड़ों में गंगा कार्य योजना के तहत किए जा रहे कार्य शामिल हैं और नदी कार्य योजनाओं के तहत तैयार की गयी जीएपी-।.ए सीवरेज शोधन क्षमता इसमें शामिल नहीं हैं। +एनआरसीपी के उद्देश्य. +एनआरसीपी के तहत नदियों में पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रदूषण निम्नीकरण कार्य किए जाते हैं ताकि पानी स्नान के लायक हो। इनमें अपशिष्टों को नदी में बहने से रोकना और उसे शोधन के लिए भेजना, नदीतट पर खुले में शौच पर रोक लगाने के लिए सस्ते शौचालय की व्यवस्था करना, शवों की अंत्येष्टि के लिए बिजली शवदाह गृह या उन्नत किस्म के जलावन वाले शवदाह गृह की व्यवस्था करना, स्नान के लिए घाटों में सुधार जैसे सौंदर्यीकरण कार्य करना तथा लोगों के बीच प्रदूषण के प्रति जागरूकता फैलाना शामिल है। +एनआरसीपी के तहत धन की व्यवस्था. +नदी स्वच्छता कार्यक्रम के लिए धन जुटाने की व्यवस्था में पिछले कई वर्षों के दौरान कई बदलाव हुए हैं। गंगा कार्य योजना (जीएपी), जो 1985 में शुरू हुई थी, शत प्रतिशत केंद्र पोषित योजना थी। जीएपी के दूसरे चरण में 1993 में आधी राशि केद्र सरकार और आधी राशि संबंधित राज्य सरकारों द्वारा जुटाए जाने की व्यवस्था की गई। एक अप्रैल, 1997 में यह व्यवस्था फिर बदल दी गयी और शत प्रतिशत धन केंद्र की मुहैया कराने लगा। एक अप्रैल, 2001 से केंद्र द्वारा 70 प्रतिशत राशि और राज्य द्वारा 30 प्रतिशत राशि जुटाने की व्यवस्था लागू हो गयी। इस 30 प्रतिशत राशि का एक तिहाई पब्लिक या स्थानीय निकाय के शेयर से जुटाया जाना था। +ग्यारहवीं योजना में एनआरसीपी के तहत कार्यों के लिए 2100 करोड़ रूपए दिए गए जबकि अनुमानित आवश्यकता 8303 करोड़ रूपए की थी और यह अनुमान योजना आयोग द्वारा नदियों के मुद्दे पर गठित कार्यबल की रिपोर्ट में जारी किया गया था। एनआरसीपी के तहत वित्तीय वर्ष 2007-08 के दौरान 251.83 करोड़ रूपए तथा 2008-09 के दौरान 276 करोड़ रूपए व्यय किए गए। +कार्यान्वयन में समस्याएं. +यह देखा गया कि सीवरेज शोधन संयंत्रों जैसी परिसंपत्तियों के निर्माण के बाद राज्य सरकारों स्थानीय शहरी निकायों ने उनके प्रबंधन एवं रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया। प्रबंधन एवं रखरखाव के लिए बिजली की आपूर्ति नहीं करने, इन परिसंपत्तियों के प्रबंधन एवं रखरखाव के लिए उपयुक्त कौशल एवं क्षमता के अभाव जैसे कई मामले सामने आए हैं। नदी तटों पर लगातार बढती ज़नसंख्या और औद्योगिकीकरण तथा फिर उस जनसंख्या के हिसाब से प्रदूषण निम्नीकरण कार्य शुरू करने के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी के चलते हमेशा ही प्रदूषण निम्नीकरण कार्यों में पिछला कुछ कार्य बच जाता है। +नदी कार्य योजना की आंशिक सफलताएं. +एसटीपी के माध्यम से नब्दिन्यों के प्रदूषण रोकने की सीमित पहल की गयी है। राज्य सरकारें अपनी क्रियान्वयन एजेंसियों के माध्यम से प्रदूषण निम्नीकरण कार्य करती है। लेकिन इस कार्य को उचित प्राथमिकता नहीं दी जाती है। परिसंपत्तियों के प्रबंधन एवं रखरखाव पक्ष की अक्सर उपेक्षा होती है। दूसरा कारण यह है कि कई एसटीपी में बीओडी और एसएस के अलावा कॉलीफार्म के नियंत्रण के लिए सीवरेज प्रबंधन नहीं किया जाता है। सिंचाई, पीने के लिए, तथा बिजली के लिए भी राज्यों द्वारा पानी का दोहन नियंत्रित ढंग से नहीं किया जाता है। पानी के दोहन जैसे मुद्दों पर अंतर-मंत्रालीय समन्वय का भी अभाव है। अबतक नदियों का संरक्षण कार्य घरेलू तरल अपशिष्ट की वजह से होने वाले प्रदूषण के रोकथाम तक ही सीमित है। जलीय जीवन की देखभाल, मृदा अपरदन के रोकथाम आदि के माध्यम से नदियों की पारिस्थितिकी में सुधार आदि कार्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।अयिए आज हम साब यह प्रन ले कि हम नदियोन को प्रदुशित होने से बचाएन्गे। + +मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति: + +पूर्वानुमान सेवाओं में सुधार: +मौसम , जलवायु और सामाजिक हितों से जुड़ी सेवाओं के लिए जोखिमों के पूर्वानुमान के महत्‍व को स्‍वीकारते हुए पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय ने पृथ्‍वी प्रणाली (वायुमंडल, हाइड्रोस्फेयर, क्रायोस्‍फेयर, जियोस्‍फेयर और बायोस्‍फेयर) के प्रति समझ में सुधार की दिशा में एक समन्‍वित तरीके से अपनी गतिविधियों पर जोर दिया है। विभिन्‍न घटकों के अध्‍ययन का उद्देश्‍य उनके बीच अंतक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझना है, जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं और मानवोत्‍पत्‍ति संबंधी गतिविधियों द्वारा प्रभावित हो और जिनसे पूर्वानुमान सेवाओं में सुधार हो। पृथ्‍वी प्रणाली विज्ञान संगठन एक मिशन के रूप में काम करता है , जहां पिछले एक वर्ष के दौरान महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धियां प्राप्‍त हुई हैं +मौसम की भविष्‍यवाणी और सेवाएं. +सांख्‍यिकी मौसम भविष्‍यवाणी के प्रारूपों के इस्‍तेमाल से लघुकालिक (तीन दिनों तक) और मध्‍यकालिक (पाँच से सात दिनों तक) पूर्वानुमान किया जाता है। वर्ष के दौरान टी 382 एल 64 प्रारूप पर आधारित एक नई और अत्‍यधिक स्‍पष्‍ट जीएफएस (भूमंडल पूर्वानुमान प्रणाली) और विकिरण मापन सहित इसके सहायक आंकड़ा मापन प्रणाली का काम शुरू हो गया है। इसके बल पर 35 किलोमीटर दूरी तक की विश्लेषण प्रणाली में सुधार हुआ। इसके अलावा कटिबंधीय दबावों, बिजली और गरज के साथ आंधी जैसी मौसम प्रणालियों के पुर्वानुमान के लिए एक मेसो-स्केल मॉडल (27 किलोमीटर) डब्‍ल्‍यू आरएफ मॉडल पूर्वानुमान प्रणाली तैयार की गई। गंभीरतापूर्वक मौसम के विशेष अध्‍ययन के लिए बहुत स्‍पष्‍ट विश्‍लेषण पर आधारित डब्‍ल्‍यू आरएफ प्रणाली स्‍थापित की गई है। इसकी शुद्धता लगभग 70-75 प्रतिशत है। एक प्रायोगिक आधार पर 4 डी वीएआर के इस्‍तेमाल से एक वैश्‍विक प्रारूप मापन प्रणाली स्‍थापित की जा रही है। इसके आधारभूत पूर्वानुमान मानकों में वर्षा, वायु की गति, वायु की दिशा,आर्द्रता और तापमान शामिल हैं। इस वर्ष पूर्वानुमान प्रणालियों को आपस में जोड़कर एक महत्‍वपूर्ण प्रणाली तैयार करना एक बड़ी उपलब्‍धि रही है। इसके अंतर्गत विभिन्‍न उपकरणों और पर्यवेक्षण प्रणालियों को आपस में जोड़कर एक सेंट्रल डाटा प्रोसेसिंग प्रणाली के साथ जोड़ दिया गया। इसके बल पर देशभर में सभी पूर्वानुमान कर्मियों को सूचना प्रौद्योगिकी पर आधारित एक अत्‍याधुनिक पूर्वानुमान प्रणाली उपलब्‍ध हुई। इसमें सभी पर्यवेक्षणों को एक साथ जोड़ना और समुचित विश्‍लेषण के बाद लोगों के लिए मौसम पूर्वानुमान प्रसारित करना शामिल है। भूस्‍खलन , मौलिक पूर्वानुमान , प्रबलता आदिऐसे मानक हैं जिनके आधार पर 24 से 36 घंटे पूर्व चक्रवात के बारे में अनुमान जारी किया जाता है। +कृषि आधारित मौसम विज्ञान सेवाएं. +देश की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्‍या कृषि पर निर्भर है, इसलिए मौसम आधारित कृषि से जुड़े सुझाव काफी महत्‍वपूर्ण हैं। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए कृषि आधारित मौसम विज्ञान की 130 क्षेत्रीय इकाइयों के लिए 35 किलोमीटर एमएमई प्रणाली के आधार पर नियमित रूप से वर्षा , अधिकतम और न्‍यूनतम तापमान, बादल वाले कुल्‍क्षेत्र , भूतल पर आपेक्षिक आर्द्रता और वायु का लघुकालिक पूर्वानुमान जारी किया जाता है। इसके माध्‍यम से फसल बोने, उर्वरकों, कीटनाशकों, सिंचाई करने और फसल कटाई के लिए उपयुक्‍त समय पर जानकारी दी जाती है। किसानों के वास्‍ते 575 से भी अधिक जिलों के लिए सप्‍ताह में दो बार बुलेटिन जारी किए जाते हैं। राज्‍य और राष्‍ट्रीय स्तर पर ऐसे बुलेटिन के बल पर नीति संबंधी निर्णय भी लिए जाते हैं। ऐसे सुझाव पत्र पत्रिकाओं, इलेक्‍ट्रानिक मीडिया और बहुभाषा वेब पोर्टलों के माध्‍यम से प्रचारित किए जाते हैं। मोबाइल फोन के माध्‍यम से स्‍थान आधारित सेवाओं का विकास होना काफी सफल रहा है, फिलहाल 12 लाख किसानों ने इस सेवा की मांग की है। +विमानन सेवाएं धुंध पूर्वानुमान. +जाड़े के दिनों में धुंध से विमानन सेवाएं काफी प्रभावित होती हैं। कुहासे की तीव्रता और अवधि की निगरानी , उसका अनुमान और प्रसार काफी महत्‍वपूर्ण है। सभी हवाई पट्टियों के बारे में हवाई पट्टी दृश्‍यता रिकार्डरों के माध्‍यम से दृश्‍यता संबंधी स्‍थितियों के बारे में जानकारी मिलती है। मौसम विज्ञान (9 से 30 घंटे के पूर्वानुमान ) प्रत्‍येक 30 मिनट पर रिपोर्ट आती है। कुहासे के बारे में अगले 6 घंटे के लिए और 12 घंटे के परिदृश्‍य के बारे में जानकारी दी जाती है। अगले दो घंटे के लिए पूर्वानुमानों के लक्षण प्राप्‍त करने की जानकारी वेबसाइटों , एसएमएस , आईवीआरएस, फोन, फैक्‍स आदि के माध्‍यम से भी उपलब्‍ध कराई जाती है। वर्ष 2009-10 के दिसम्‍बर और जनवरी माहों के लिए पुर्वानुमान की शुद्धता छूट है क्रमश: 94 प्रतिशत और 86 प्रतिशत रही, जो वर्ष 2008-09 के दिसम्‍बर और जनवरी माहों की क्रमश: 74 प्रतिशत और 58 प्रतिशत शुद्धता की तुलना में काफी अधिक है। +पर्यावरण आधारित सेवा इलाहाबाद , जोधपुर, कोडइकनाल, मिनीकॉय, मोहनबाड़ी, नागपुर, पोर्ट ब्‍लेयर, पुणे श्रीनगर और विशाखापट्टनम में वायु प्रदूषण निगरानी केन्‍द्रों का एक नेटवर्क स्‍थापित किया गया है। यहां से वर्षा जल के नमूने लेकर उनका रासायनिक विश्‍लेषण किया जाता है और वायुमंडल के घटकों में दीर्घकालिक बदलावों का रिकार्ड तैयार करने के लिए वायुमंडलीय गंदलेपन का मापन किया जाता है। थर्मल पावर केन्‍द्रों , उद्योगों और खनन गतिविधियों से उत्‍पन्‍न वायु प्रदूषण के संभावित कुप्रभावों के मूल्‍यांकन से संबंधित विशेष सेवाएं भी प्रदान की जाती हैं विभिन्‍न्‍जलवायु और भौगोलिक स्‍थितियों में बहुविध स्रोतों का वायु की गुणवत्‍ता पर पड़ने वाले प्रभावों के लिए वायुमंडलीय विस्‍तार प्रणाली विकसित की गई है और इनका इस्‍तेमाल उद्योगों के लिए स्‍थानों का चयन करने तथा वायु प्रदूषण नियंत्रण संबंधी रणनीतियों को लागू करने में किया जाता है। एडब्‍ल्‍यूएस, डीडब्‍ल्‍यूआर आयोग और अन्‍य पर्यवेक्षण प्रणालियों के माध्‍यम से राष्‍ट्रमंडल खेल 2010 के लिए मौसम और वायु गुणवत्‍ता पूर्वानुमान का काम पूरा किया गया है। +मछुआरों को चेतावनी लगभग 70 लाख लोग भारत के समुद्रतटीय क्षेत्रों में रहते हैं। भारत का समुद्रतट लगभग 7500 किलोमीटर लंबा है। मछली पकड़ना इन लोगों की आजीविका का साधन है। मछली उत्‍पादन का केवल 15 प्रतिशत भाग जलाशयों द्वारा हो पाता है। मछलियों का पता लगाना और उसे पकड़ना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्‍योंकि मछलियों का समूह समुद्रतट से दूर स्‍थान बदलता रहता है और उसे ढूंढने में अधिक समय , धन तथा प्रयास की जरूरत होती है। मछलियों की अधिकता वाले संभावित क्षेत्रों के बारे में समय पर पूर्वानुमान प्राप्‍त हो जाने से मछलियों की खेाज में लगने वाले समय और प्रयासों में कमी लाने में मदद मिलती है, जो मछुआरा समुदाय के सामाजिक-आर्थिक हित के अनुकूल है। मछलियों को समुद्री जल के तापमान, लवणता, रंग, दृश्‍यता, जल में ऑक्‍सीजन की मात्रा आदि के रूप में जहां अनुकूल स्‍थितियां प्रतीत होती हैं, वे अपने आसपास के पर्यावरण के उस जलीय भाग की ओर शीघ्र ही चली जाती हैं। उपग्रह से प्राप्‍त चित्रों के आधार पर समुद्रतल के तापमान के बारे में आसानी से पता चलता है, जो पर्यावरण का एक मानक संकेतक है। समुद्री हिस्‍से में उनके लिए खाने की चीजों की उपलब्‍धता पर भी उनका आगमन, पर्याप्‍तता और प्रवास निर्भर करता है। क्‍लोरोफिल-ए एक ऐसा संकेतक है जो मछलियों के लिए आहार की उपलब्‍धता का सूचक है। ये पूर्वानुमान नियमित रूप से एक सप्‍ताह में तीन बार जारी किए जाते हैं और महासागरीय स्‍थितियों के पूर्वानुमान के साथ तीन दिनों की अवधि के लिए मान्‍य हैं। ये चेतावनियां नौ स्‍थानीय भाषाओं और अंग्रेजी में वेब ई-मेल, फैक्‍स, रेडियो और टेलीविजन के साथ ही इलेक्‍ट्रॉनिक डिस्‍प्‍ले बोर्डों और इनफॉर्मेशन किओस्‍कों के माध्‍यम से दी जाती हैं। एक अनुमान के अनुसार लगभग 40,000 मछुआरे इन चेतावनियों से लाभान्‍वित होते हैं। इसके बल पर काफी ईंधन और समय (60-70 प्रतिशत) की बचत होती है और वे प्रभावकारी तरीके से मछली पकड़ पाते हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि इस दिशा में सफलता की दर 80 प्रतिशत के आसपास है। +महासागरीय स्‍थिति का पूर्वानुमान. +सांख्‍यिक प्रारूपों के इस्‍तेमाल से हिन्‍द महासागर के लिए यथासमय पूर्वानुमान तैयार करने का प्रयास प्रारंभिक चरण में है। फरवरी 2010 में शुरू की गई हिन्‍द महासागर पूर्वानुमान प्रणाली (इंडोफोस) में महासागरीय लहरों की ऊँचाई, लहर की दिशा, समुद्री सतह का तापमान, सतह की धारायें, मिश्रित तल की गहराई और 20 डिग्री सेल्‍सियस समताप की गहराई के बारे में अगले पाँच दिनों के लिए छ: घंटे के अंतराल पर पूर्वानुमान जारी करना शामिल है। इंडोफेस के लाभार्थियों में पारंपरिक और प्रणालीबद्ध मछुआरे, समुद्री बोर्ड, भारतीय नौसेना, तटरक्षक नौवहन कंपनियां और पेट्रोलियम उद्योग, ऊर्जा उद्योग तथा शैक्षिक संस्‍थान शामिल हैं। गुजरात, महाराष्‍ट्र, कर्नाटक और पुडुचेरी के लिए लहरों के पूर्वानुमान हेतु स्‍थान विशेष पर आधारित प्रारूप स्‍थापित किए गए हैं और बंदरगाह प्राधिकरणों द्वारा इनका व्‍यापक इस्‍तेमाल किया जाता है। +खनन प्रौद्योगिकी. +भारत महासागरीय खनिज संसाधनों के देाहन के प्रति इच्‍छुक रहा है। इसके लिए तीन उपकरणों- तत्‍काल मृदा जांच उपकरण, दूर से संचालन-योग्‍य वाहन (आरओवी) और गहरे समुद्र में रेंगनेवाली प्रणाली विकसित करने की जरूरत होती है। समुद्र के नीचे मिट्टी के गुणों की जांच के लिए उपकरण और आरओवी का 5300 मीटर की गहराई में अप्रैल 2010 में सफल परीक्षण किया गया। इस उपकरण के लिए पूरा-का-पूरा हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर तथा नियंत्रण प्रणाली अपने देश में ही विकसित की गई। तट के पास नेाड्यूल इकट्ठा करने वाले क्रॉलर का भी 450 मीटर की गहराई में परीक्षण किया गया है। समुद्र में 3000 मीटर की गहराई तक 100 मीटर क्रोड़ संग्रह की क्षमता वाली एक कोरिंग प्रणाली विकसित की गई है। इन्‍हें दर्शाए जाने की प्रक्रिया चल रही है। गैस हाइड्रेट के दोहन के लिए प्रौद्योगिकी विकास के एक हिस्‍से के रूप में यह उपकरण विकसित किया जा रहा है। +हैचरी प्रौद्योगिकी. +वाणिज्‍यिक दृष्‍टि से महत्‍वपूर्ण प्रजातियों के लिए हैचरी प्रौद्योगिकी का विकास करना मछुआरों को एक वैकल्‍पिक रोजगार प्रदान करने के लिए एक प्रमुख क्षेत्र है। अंडमान स्‍थित हैचरी में काला मोती तैयार किया जाता है। समुद्री सजावटी मछलियों का उत्‍पादन करने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित करने का काम पूरा किया गया है और क्‍लॉन मछलियों की आठ प्रजातियों और दमसेल मछलियों की दस प्रजातियों का इसके लिए चयन किया गया है। गैस्‍ट्रोपॉडों को चार प्रजातियों के उत्पादन, लार्वा विकास और मछलियों के बच्‍चों को सामूहिक तौर पर पालन करने की तकनीक को मजबूत किया गया है। यह प्रौद्योगिकी स्‍थानीय मछुआरों को उपलब्‍ध करायी गई है। +जलवायु में बदलाव और परिवर्तन +इस कार्यक्रम के माध्‍यम से स्‍वास्‍थ्‍य, कृषि और जल जैसे क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव सहित जलवायु परिवर्तन से संबंधित अनेक वैज्ञानिक समस्‍याओं का हल किया जाता है। भारतीय क्ष्‍ेात्र के लिए विशेष रूप से संबंधित और वैश्‍विक प्रभाव वाले जलवायु परिवर्तन के लक्षित वैज्ञानिक पहलुओं की खोज करने और उनके मूल्‍यांकन के प्रयास के क्रम में जलवायु प्रारूप और गतिविज्ञान, भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन के क्षेत्रीय पहलुओं की जानकारी के लिए उपकरणों और जलवायु संबंधी रिकार्डों का इस्‍तेमाल, जलवायु संबंधी लघुकालिक और दीर्घकालिक निदान और पूर्वानुमान आदि कुछ ऐसे प्रमुख कार्यक्रम हैं, जिन पर काम शुरू किया गया है। +ध्रुवीय विज्ञान. +नवम्‍बर 2010 में आठ-सदस्‍यों वाले एक दल ने दक्षिणी ध्रुव तक पहले वैज्ञानिक अभियान में सफलता प्राप्‍त की। इस दल ने अभियान के दौरान कुल 4680 मिलोमीटर की दूरी तय की। इस दौरान वैज्ञानिकों ने बर्फ के नीचे ढ़की चट्टानों के अध्‍ययन के लिए विशेष राडार का इस्‍तेमाल किया। बर्फ के रासायनिक गुणों के अध्‍ययन के लिए बर्फ के क्रोड़ संग्रह किए तथा ग्‍लेशियरों में भूस्‍खलन की घटनाओं का अध्‍ययन किया। + +प्रौद्योगिकी तथा स्वरोजगार: + +भारत को विकसित बनने के लिए अपरिहार्य शर्तें: +यह करना ही पड़ेगा और और यह संभव भी है - तो इस दिशा कदम बढ़ने में बाधक कौन है??? +१-कांग्रेस को जड़ से ख़तम करके दुबारा सत्ता में लौटने की सभी सम्भावनाये समाप्त करना होगा। +२-विदेशी कंपनियों का भारत में आयात शुन्य करके इनके उत्पादों की खरीद का बहिष्कार करके भारत की कंपनियों का उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ाना होगा और उन्हें निर्यात की तरफ ले जाकर विदेशी मुद्रा कमाना होगा। +३-स्वदेशी कंपनियों की बाढ़ लाकर देश के जनता के लिए उत्पाद बनाकर और उसकी खपत बढाकर भारत में सभी को रोजगार सुनिश्चित करना होगा। +४-सरकारी नौकरी वेतन की गारंटी न होकर सेवा गारंटी का विभाग बनाना होगा उसके लिए सरकारी नियंत्रण से मुक्त "एक भ्रष्टाचार रोधी" संस्था का विशाल ढांचा बनाना बहुत जरुरी है। +५-उर्जा के लिए परमाणु ऊर्जा के बजाय सौर्य उर्जा को खुली छुट देकर हर घर में बिजली दिया जाय और यह २ साल में किया जा सकता है। +६-कालाधन को राष्ट्रीय संपती घोषित करके उसे विदेशो से वापस लाया जाना सुनिश्चित किया जाये . +७-ऐसे कर प्रणाली बनाई जाये की लोग कर बचाने केलिए कालाधन पैदा ही ना करे. +८-देश की विकास धन की लुट करने वालो के लिए आजीवन कारावास और ज्यादा से ज्यादा मौत की सजा दी जाये. +९-ऐसा माहौल बनाया जाये की सरकारी अधिकारी कर्मचारी जनता के सेवक लगे न की जनता के साहब बने इसके लिए "जनसेवा जबाबदेही बिल" को कड़ाई से लागु किया जाये. जिम्मेदारी विभागागीय न होकर वैयक्तिक हो। +१०-विश्व के देशी से किये गए नुकसान वाले समझौतों को तोड़कर अपने हिसाब से देश को आगे बढ़ाना होगा। +११-विदेशी कर्ज जो की २८०००/- प्रति व्यक्ति है, को तत्काल कालेधन से, भूसंपदा के दोहन से समाप्त करके दुबारा कर्ज लिया ही न जाये. +१२-शिक्षा प्रणाली में देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम के पाठ कक्षा १ से १२ तक अनिवार्य कर दिए जाये और हमारे आदर्श के रूप में उनको पेश किया जाये जो की चरित्र +से बहुत महान थे न की जवाहर लाल नेहरू जैसे को। शिक्षा भारत की भाषा में दिया जाये . +१३-लोगो की धर्म के साथ आस्था को मजबूत किया जाये और सभी लोगो को खुलकर धार्मिक और राष्ट्र अनुष्ठानो में खुलकर भाग लेना चाहिए। नैतिक शिक्षा और हमारे पूर्वज, योग , प्राणायाम, व्यायाम आदि हमारे शिक्षा का हिस्सा हो। +१४-इतिहास की सच्चाई को सबके सामने रखा जाये जिससे लोगो को प्रेरणा मिले। +१५-वेश्यावृत्ति, शराब बनाना/बेचना, गौ हत्या पर कड़ाई से तत्काल प्रतिबन्ध लगाकर समाज को बुराई से दूर रखकर चरित्रवान बनाया जाये. +१६-खेती में जहर का प्रयोग बंदकरके सबको अच्छा स्वास्थ्य मुहैया कराया जाये. और आयुर्वेदिक, यूनानी और अन्य पुराणी सस्ती स्वस्थ्य पद्धतियों को फिर से जोरदार धन से फैलाया जाये. +१७- भारत की सम्पूर्ण भूसंपदा की दोहन स्वयं भारतीय लोग करे और बहुत राजस्व पैदा करे और जंगल / नदी/पर्यावरण/पहाड़ आदि का पूरा ध्यान रखा जाये और वनक्षेत्र को उतना रखा जाये जितना यह अंग्रेजो के आने से पहले था। +१८-राजनीति में चरित्रवान लोगो का पदार्पण हो चाहे वह बहुत ही गरीब क्यों नहो, परन्तु पढ़े लिखे और दूरदर्शी हो। +१९-बड़े नोटों १०००/५००/१०० को बंद करा दिया जाये और बैंको की प्रभावी प्रणाली बनाकर कर ट्रांजक्शन टैक्स लगाया जाये. +२०-मिडिया को भारत प्रेमी बनाकर अच्छी बातो के प्रचार में लगा चीनी ऐप्स का बहिष्कार करें और सबसे अच्छे भारतीय ऐप बनाएं जो कर सकते हैं हमें अपने भारत को अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश बनाना होगा हमें भारतीय चीजों को बनाना होगा। उदाहरण के लिए, भारतीय स्मार्टफोन,भारतीय ब्रांड, भारतीय ऐप, कपड़े, भारतीय कंपनियां आदि। धन्यवाद। + +बाल मनोविज्ञान: +विपत्ति आने पर ही हम अपने धैर्य की, धर्म की, मित्र की और पत्नि की परख कर पाते हैं। हमारा संपूर्ण जीवन अपने परिस्थितियों के साथ क्रिया प्रतिक्रिया करते हुए बीतता है। हमारे अंदर बीज रूप में विद्यमान गुण अनुकूल परिस्थितियां पाकर अंकुरित होते हैं और धीरे धीरे बढ़ कर पूर्ण छायादार वृक्ष बन जाते हैं। अगर हम अपनी आंतरिक शक्तियों का सदुपयोग करें तो हमारा जीवन कुंदन के समान निखर जाता है। और यदि हमनें अपने गुणों को नकारात्मक वृत्तियों से हार जाने दिया तो समझ लीजिए हम अपनी पहचान खो देते हैं। +हमारी पहचान. +संस्कृत में धर्म शब्द का प्रयोग पहचान अर्थ में भी होता है। जैसे हम कहते हैं आग का धर्म है – गर्मी देना, प्रकाश देना और गति देना। अग्नि में रोशनी भी है, गर्माहट भी और वह भाप से रेल का इंजन और पानी के बड़े-बड़े जहाज़ भी चला सकती है। प्रत्येक वस्तु के अनेक गुण और धर्म होते हैं। मनुस्मृति में मनु महाराज ने मनुष्य का धर्म बताते हुए लिखा – +अर्थात धैर्य, दूसरो को क्षमा करना, अपने मन पर, विचारो पर, नियंत्रण होना, चोरी की भावना का न होना, शारीरिक और मानसिक पवित्रता, इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण, अच्छी बुद्धि, सद्विद्या का ग्रहण करना, सत्य के मार्ग पर चलना और क्रोध न करना – यही मनुष्यता के दस लक्षण हैं। इन गुणों को अपनाकर हम सच्चे अर्थों में मनुष्य बनते हैं। यही वेद का आदेश है। मनुर्भव – मनुष्य बनो। +वेदो का कहना है कि ईश्वर में बीज रूप में सभी गुण मनुष्य को दिए हैं। हमें केवल इन गुणों को अभ्यास के द्वारा पूर्ण रूप से विकसित करना है। +हमारा कार्यक्षेत्र. +हमने अध्यापन कार्य अपनाया है। यह हमारी योग्यता और इच्छा के अनुकूल भी है। पर यहां पग पग पर हमारे धैर्य की परीक्षा होती है। कक्षा में 40 छोटे छोटे बालक बालिकाएं हमारे सामने हैं। हम उनका मार्ग दर्शन कर रहे हैं और वे भी बीज रूप में अपनी शक्तियों के साथ हमारे सामने हैं। हमें माली के समान उनकी शक्तियों, योग्यताओं को पूर्ण रूप से पल्लवित, पुष्पित होने का अवसर देना है। यह एक चुनौती है। +मार्गदर्शन का आधार. +1. हमें चाहिए कि हम बच्चो को सभी संभावनाओं से पूर्ण मानें। हम समझें कि सभी बालक-बालिकाओं में कुछ बनने की योग्यता है। कोई न कोई विशेष गुण है। वह अपनी इन योग्यताओं का विकास चाहते हैं। हम उन्हे विकसित होने का पूर्ण वातावरण प्रदान करें और उनके गुणों की प्रशंसा करें। +2. अच्छे कुशल माली के समान – उन्हें स्वस्थ पोषण दें। माली पौधे को खाद पानी देता है। खर पतवार को पास उगने नहीं देता। धूप, अतिवृष्टि, अनावृष्टि से बचाता है। यदि डालियां इधर-उधर बढ़ रही हैं तो सुंदर रूप देने के लिए काट छांट भी करता है। हम भी विद्यार्थियों को स्वस्थ साहित्य पढ़ने को दें, बुराई से बचाएं, गंदे व्यवहार की निंदा करते हुए उन्हें उनसे दूर रखें। आप कहेंगे कि पेड़ तो जड़ पदार्थ है – काटनें छांटने पर विरोध नही करता। और यह नन्हे-मुन्ने तो पूरे आफत का पिटारा होते हैं उन्हें कैसे समझाएं। उत्तर है बच्चों का मनोविज्ञान समझें। +3. हम बच्चों का मनोविज्ञान समझें और अपना भी। इस बात को पूरी तरह समझ लें कि जैसे तेज़ रफ्तार से बहती नदी के प्रवाह को रोका नहीं जा सकता – उसे केवल थोड़ा सा मोड़ दे सकते हैं। जैसे मनोविज्ञान में हम पढ़ते थे – +YOU CANNOT CHECK THE EMOTIONS, YOU CAN ONLY SUBLIMATE IT... +हम बच्चों की भावनाओं को रोक नही सकते केवल दिशा दे सकते हैं। जैसे कोई बच्चा शैतानी कर रहा है या रो रहा है तो हम केवल डांट कर चुप नही करा सकते – उसे कोई काम दे दें ताकि उसका ध्यान उस शैतानी से हट जाए। कोई नई कहानी सुना कर, नई चीज़े दिखा कर परिस्थितियों को आकर्षक बना सकते हैं। +4. प्रेरक बनें - अध्यापक का कार्य बच्चों को किसी विषय से संबंधित सूचनाओं का ख़ज़ाना नहीं बनाना है। हमें तो उसका व्यक्तित्व उभारना है। जैसे हम कहते हैं कि सूर्य हमारा प्रेरक है। एक बीज में वृक्ष बनने की योग्यता है, कलि में फूल बनने की योग्यता है, सूर्य अपनी किरणों से उन्हें विकसित होने की प्रेरणा देता है। इसीलिए सूर्य का नाम सविता है। हम अध्यापक भी इन बच्चो को खिलने का अवसर प्रदान करें। ये ऐमेटी के फूल भी हैं, माता-पिता के फूल भी हैं और भारत माता की बगिया के फूल भी हैं। उनकी योग्यता का विस्तार हो सके इसके लिए उन्हें उपयुक्त वातावरण प्रदान करें। उन्हें मानवीय गुणों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करें। केवल विषय से संबंधित सूचनाओं का पिटारा न बना दें। अन्यथा ज्ञान प्राप्त करके वे स्वार्थी भी बन सकते हैं। उन्हें सर्वभूत हिते रता: की भावना से काम करने की प्रेरणा दें। +5. विद्यार्थियों को स्वयं उनके अंदर छिपी शक्तियों को पहचानने के योग्य बनाएं। यह ज़रूरी नहीं है कि पढ़ लिखकर सभी डॉक्टर या इंजीनियर ही बनें – वे खिलाड़ी भी बन सकते हैं और व्यापारी भी। वे गायक भी बन सकते हैं या चित्रकार भी। नेता, अभिनेता, सैनिक, आई ए एस – कुछ भी बनना चाहें बन सकते हैं। +6. कर्म के प्रति निष्ठा – हम अपने कार्य को पूरी निष्ठा के साथ करें। कर्म ही धर्म है – इस भावना से करें। कुछ और बनना चाहते थे या करना चाहते थे – नहीं कर पाए – इसीलिए अध्यापन कार्य शुरू कर दिया और बेमन से पढ़ाने लगें – ऐसा न करें। ऐसा करने से हमारा असंतोष, हमारे व्यवहार में झलकेगा। +7. नवीनता और तैयारी – कक्षा में जाने से पूर्व हमेशा तैयारी के साथ जाएं। कुछ नए विचार साथ लेकर जाएं। नवीनता के लिए कभी आप पाठ स्वयं पढ़ कर सुनाना आरंभ करें तो कभी विद्यार्थियों से पढ़ने के लिए कहें। तो कभी बच्चों को उस विषय से संबंधित कुछ और जानकारी दें या किसी कविता की कुछ पंक्तियां सुना कर आप पाठ आरंभ कर सकते हैं। जैसे भोजन में नित्य नवीनता भोजन को नित्य अधिक आकर्षक और स्वादिष्ट बना देती है – एक सा खाना नीरस लगने लगता है ऐसे ही पढ़ाने का एक ही ढंग – बच्चो को विषय से विमुख कर सकता है। +8. बच्चो की भागीदारी – बच्चो के ज्ञान में कुछ और जोड़ने के लिए उसमें उनकी भागीदारी भी होना ज़रूरी है। वो केवल श्रोता बनकर बेमन से सुनते न रहें। वे भी सीखने में पूरे हिस्सेदार बनें। उन्हे पाठ में सक्रिय बनाईए। उन्हें जितना आता है उसे पहले वे स्पष्ट करें फिर उसके आगे आप बताईए। तब सुननें में उनका ज्यादा ध्यान लगेगा। अन्यथा वो अनमने ढंग से सुनेंगे। कभी कभी पाठ का अभिनय भी करा सकते हैं। +9. अपने व्यवहार को आदर्श बनाएं – बच्चे अपने बढ़ो का अनुकरण आरंभ से ही करने लगते हैं। बहुत सी शिक्षा इस अनुकरण प्रणाली से ही हम उन्हें दे सकते हैं। हम स्वयं सत्य का पालन करें – सब बच्चों को समान दृष्टि से देखें, निश्छल व्यवहार करें व समय का पालन करें – तो यह गुण बच्चों में स्वत: आ जाएंगे। वे भी समय पर अपना कार्य पूर्ण कर के दिखाएंगे व सबके साथ मित्रवत व्यवहार करेंगे। +10. बच्चों के माता पिता से भी संपर्क रखें – बच्चो की समस्याओं को समझने व सुलझाने में उनकी मदद करें। अध्यापक केवल अध्यापक नही मित्र भी होता है। जैसा कि शतपथ ब्राह्णण का वचन है – मातृमान् पित्रमान् आचार्यवान पुरुषो वेद । अर्थात माता-पिता और आचार्य मिलकर बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं – उनका मार्गदर्शन करके उन्हें सही अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। हम अपनी ज़िम्मेदारी समझें। काम को केवल मशीन की ही तरह पूरा न करें, उसमें मानवीय सहृदयता का पुट रखें तो अवश्य ही विद्यार्थी का संतुलित विकास हो सकेगा। +11. स्वाध्याय – हम अपने को प्रज्वलित दीप के समान बनाए रखें। प्रतिदिन होने वाले परिवर्तनों से अपने को परिचित रखें। नए बच्चों की नई सोच से तालमेल बैठाएं। स्वयं अपने विषय की पुस्तकें पढ़ते रहें ताकि हमारा ज्ञान सदैव बढ़ता रहे और हम नए नए ढंग से विद्यार्थियों का ज्ञानवर्धन करते रहें। +अंत में शिक्षण-प्रशिक्षण और स्वाध्याय निरंतर चलते रहने वाली प्रक्रिया है। इसका प्रवाह बनाए रखें। +बच्चो का मनोविज्ञान समझना कोई आसान बात नहीं है | उनका स्वभाव .उनकी रुचियाँ और उनके शौक यदि हर माता पिता समझ ले तो बच्चों के दिल तक आसानी से पहुंचा जा सकता है | बहुत सी ऐसी बातें होती है जिनको समझने के लिए कई तरकीब ,कई तरह के मनोविज्ञानिक तरीके हैं जिस से बच्चो को समझ कर उनके स्वभाव को समझा जा सकता है | एक मनोवेज्ञानिक ने इसी आधार पर बच्चे के व्यक्तितव को समझने के लिए उनके लिखने के ढंग ,पेंसिल के दबाब और वह रंग करते हुए किस किस रंग का अधिक इस्तेमाल करते हैं ..के आधार पर विस्तार पूर्वक लिखा है ...माता पिता के लिए इस को जानना रुचिकर होगा ... +बच्चो को चित्रकला बहुत पसंद आती है | वह पेन्सिल हाथ में पकड़ते हो कुछ न कुछ बनना शुरू कर देते हैं | इसी आधार पर कुछ बच्चो के समूह को एक बड़ा कागज और उस पर चित्र बनाने को कहा गया ..कुछ बच्चो ने तो पूरा कागज ही भर दिया ..कुछ ने आधे पर चित्र बनाये और कुछ सिर्फ थोडी सी जगह पर चित्र बना कर बैठ गए | इसी आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि जो बच्चे पूरा कागज भर देते हैं वह अक्सर बहिर्मुखी होते हैं |ऐसे बच्चे उत्साही और दूसरे लोगों से बहुत जल्दी घुल मिल जाते हैं .इस तरह के बच्चे स्वयम को अच्छे से अभिव्यक्त कर पाते हैं और अक्सर मनमौजी स्वभाव के और कम भावुक होते हैं | +आधा कागज इस्तेमाल करने वाले बच्चे अधिकतर अन्तर्मुखी होते हैं |ऐसे बच्चे बहुत कम मित्र बनाते हैं ,लेकिन जिसके साथ दोस्ती करते हैं उसके साथ लम्बे समय तक दोस्ती निभाते हैं | इस तरह के बच्चो में अधिक सोच विचार करने की आदत होती है | +बिलकुल छोटा चित्र बनाने वाले बच्चे में आत्मविश्वास की कमी होती है और यह निराशा वादी होते हैं इनका आत्मविश्वास बढाने के लिए प्रोत्साहन बढाना बहुत जरुरी है ... +पेंसिल का दबाब. +बच्चा आपका पेंसिल कैसे पकड़ता है किस तरह से उसको दबाब डाल कर लिखता है ,इस से भी उसके स्वभाव को जाना जा सकता है|यदि आपका बच्चा किसी रेखा या बिंदु पर पेंसिल का अधिक दबाब डालता है तो इसका अर्थ है कि वह अपनी मांसपेशियों को अधिक इस्तेमाल कर रहा है और वह किसी तनाव में है जिस से वह मुक्त होना चाहता है | यदि बच्चे ने कोई मानव आकृति बनायी है और उस में उस आकृति की बाहें ४५ डिग्री से अधिक ऊपर उठी हुई हैं या अन्दर की और मुडी हैं तो बच्चे का ध्यान आपको अधिक रखना होगा यह उसकी अत्यधिक उत्सुकता कई निशानी है | +बच्चे का लिखने के ढंग से भी आप उसके स्वभाव को परख सकते हैं | जैसे लिखते वक़्त बच्चे ने चित्र में उन स्थानों पर तीखे कोनों का इस्तेमाल किया है जहाँ हल्की गोलाई होनी चाहिए थी तो यह उस बच्चे की आक्रामकता की सूचक है| यदि यह आक्रमकता उसके ताजे चित्रों में दिख रही तो उसके पुराने बनाए चित्र और शैली देखे इस से आप जान सकेंगे कि घर में ऐसा क्या घटित हुआ है जो आपके बच्चे के मनोभाव यूँ बदले हैं | अक्सर इस तरह से बदलाव दूसरे बच्चे के आने पर पहले बच्चे में दिखाई देते हैं उसको अपने प्यार में कमी महसूस होती है और वह यूँ आकर्मक हो उठता है | +रंगों के इस्तेमाल से. +बच्चे किस तरह के रंगों का इस्तेमाल अधिक करते हैं यह भी मनुष्य के स्वभाव की जानकारी देता है ..लाल रंग अधिक प्रयोग करने वाले बच्चे मानसिक तनाव से गुजर रहे होते हैं +नीले रंग का प्रयोग करने वाले बच्चे धीरे धीरे परिपक्व होने की दिशा मेंबढ़ रहे होते हैं और अपनी भावनाओं परनियंत्रण पाने की कोशिश में होते हैं ,पर यदि यह नीला रंग अधिक से अधिक गहरा दिखता है तो यह भी आक्रमकता का सूचक है ऐसे में बच्चे के मन में छिपी बात को समझने की कोशिश करनी चाहिए +पीला रंग इस्तेमाल करने वाले बच्चे अधिकतर उत्साही बाहिर्मुखी और अधिक भावुक होते हैं ऐसे बच्चे दूसरो अपर अधिक निर्भर रहते हैं और हमेशा दूसरो का ध्यान अपनी और आकर्षित करने कि कोशिश में रहते हैं | हरा रंग इस्तेमाल करने वाले बच्चे शांत स्वभाव के होते हैं और अक्सर उनके स्वभाव में नेतर्त्व के गुण पाए जाते हैं | +काला रंग या गहरा बेंगनी रंग इस्तेमाल करने वाले बच्चे को आपकी सहायता चाहिए |यह रंग बच्चे में दुःख और निराशा का प्रतीक है | +माता-पिता का एक मनोविज्ञान होता है सभी माता-पिता एक समय बाद बच्चों से प्रेम मांगने लगते हैं। प्रेम कभी मांगकर नहीं मिलता है और जो प्रेम मांगकर मिले उसका कोई मूल्य नहीं होता। +एक बात और समझ लें कि यदि माता-पिता बच्चों से प्रेम करें तो वह बड़ा स्वाभाविक है, सहज है, बड़ा प्राकृतिक है, क्योंकि ऐसा होना चाहिए। नदी जैसे नीचे की ओर बहती है, ऐसा माता-पिता का प्रेम है। लेकिन बच्चे का प्रेम माता-पिता के प्रति बड़ी अस्वाभाविक घटना है। ये बिल्कुल ऐसा है जैसे पानी को ऊपर चढ़ाना। कई मां-बाप यह सोचते हैं कि हमने बच्चे को जीवनभर प्रेम दिया और जब अवसर आया तो वह हमें प्रेम नहीं दे रहा, वह लौटा नहीं रहा। +इसमें एक सवाल तो यह है कि क्या उन्होंने अपने मां-बाप को प्रेम दिया था? यदि आप अपने माता-पिता को प्रेम, स्नेह और सम्मान नहीं दे पाए तो आपके बच्चे आपको कैसे दे सकेंगे? इसलिए हमारे यहां सभी प्राचीन संस्कृतियां माता-पिता के लिए प्रेम की के स्थान पर आदर की स्थापना भी करती हैं। इसे सिखाना होता है, इसके संस्कार डालने होते हैं, इसके लिए एक पूरी संस्कृति का वातावरण बनाना होता है। +जब बच्चा पैदा होता है तो वह इतना निर्दोष होता है, इतना प्यारा होता है कि कोई भी उसको स्नेह करेगा, तो माता-पिता की तो बात ही अलग है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है, हमारा प्रेम सूखने लगता है। हम कठोर हो जाते हैं। बच्चा बड़ा होता है, अपने पैरों पर खड़ा होता है तब हमारे और बच्चे के बीच एक खाई बन जाती है। अब बच्चे का भी अहंकार बन चुका है वह भी संघर्ष करेगा, वह भी प्रतिकार करेगा, उसको भी जिद है, उसका भी हठ है। इसलिए प्रेम का सौदा न करें इसे सहज बहने दें। +बाल विकास (या बच्चे का विकास). +मनुष्य के जन्म से लेकर किशोरावस्था के अंत तक उनमें होने वाले जैविक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों को कहते हैं, जब वे धीरे-धीरे निर्भरता से और अधिक स्वायत्तता की ओर बढ़ते हैं. चूंकि ये विकासात्मक परिवर्तन काफी हद तक जन्म से पहले के जीवन के दौरान आनुवंशिक कारकों और घटनाओं से प्रभावित हो सकते हैं इसलिए आनुवंशिकी और जन्म पूर्व विकास को आम तौर पर बच्चे के विकास के अध्ययन के हिस्से के रूप में शामिल किया जाता है. संबंधित शब्दों में जीवनकाल के दौरान होने वाले विकास को संदर्भित करने वाला विकासात्मक मनोविज्ञान और बच्चे की देखभाल से संबंधित चिकित्सा की शाखा बालरोगविज्ञान (पीडीऐट्रिक्स)शामिल हैं. विकासात्मक परिवर्तन, परिपक्वता के नाम से जानी जाने वाली आनुवंशिक रूप से नियंत्रित प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप या पर्यावरणीय कारकों और शिक्षण के परिणामस्वरूप हो सकता है लेकिन आम तौर पर ज्यादातर परिवर्तनों में दोनों के बीच का पारस्परिक संबंध शामिल होता है. +बच्चे के विकास की अवधि के बारे में तरह-तरह की परिभाषाएँ दी जाती हैं क्योंकि प्रत्येक अवधि के शुरू और अंत के बारे में निरंतर व्यक्तिगत मतभेद रहा है. +फॉर इन्फैन्ट मेंटल हेल्थ जैसे संगठन शिशु शब्द का इस्तेमाल एक व्यापक श्रेणी के रूप में करते हैं जिसमें जन्म से तीन वर्ष तक की उम्र के बच्चे शामिल होते हैं; यह एक तार्किक निर्णय है क्योंकि शिशु शब्द की लैटिन व्युत्पत्ति उन बच्चों को संदर्भित करती है जो बोल नहीं पाते हैं. +बच्चों के इष्टतम विकास को समाज के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है और इसलिए बच्चों के सामाजिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक, और शैक्षिक विकास को समझना जरूरी है. इस क्षेत्र में बढ़ते शोध और रुचि के परिणामस्वरूप नए सिद्धांतों और रणनीतियों का निर्माण हुआ है और इसके साथ ही साथ स्कूल सिस्टम के अंदर बच्चे के विकास को बढ़ावा देने वाले अभ्यास को विशेष महत्व भी दिया जाने लगा है. इसके अलावा कुछ सिद्धांत बच्चे के विकास की रचना करने वाली अवस्थाओं के एक अनुक्रम का वर्णन करने की भी चेष्टा करते हैं। + +शिक्षा का माध्यम: + +भारतीय दण्ड संहिता, 1860: + +भारतीय दण्ड संहिता, अध्याय 1: +भारतीय दण्ड संहिता, 1860 +प्रस्तावना. +उद्देशिका. +2[भारत] के लिए एक साधारण दण्ड संहिता का उपबंध करना समीचीन है; अत: यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया जाता है :-- +1. संहिता का नाम और उसके प्रवर्तन का विस्तार--यह अधिनियम भारतीय दण्ड संहिता कहलाएगा, और इसका 34[जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर होगा ]। +2. भारत के भीतर किए गए अपराधों का दण्ड--हर व्यक्ति इस संहिता के उपबन्धों के प्रतिकूल हर कार्य या लोप के लिए जिसका वह 5[भारत] 6।।। के भीतर दोषी होगा, इसी संहिता के अधीन दण्डनीय होगा अन्यथा नहीं। +3. भारत से परे किए गए किन्तु उसके भीतर विधि के अनुसार विचारणीय अपराधों का दण्ड--5से परे किए गए अपराध के लिए जो कोई व्यक्ति किसी 7[भारतीय विधि के अनुसार विचारण का पात्र हो, 8से परे किए गए किसी कार्य के लिए उससे इस संहिता के उपबन्धों के अनुसार ऐसा बरता जाएगा, मानो वह कार्य 5[भारत के भीतर किया गया था। +9[4. राज्यक्षेत्रातीत अपराधों पर संहिता का विस्तार--इस संहिता के उपबंध-- +1 भारतीय दंड संहिता का विस्तार बरार विधि अधिनियम, 1941 (1941 का 4) द्वारा बरार पर किया गया है और इसे निम्नलिखित स्थानों पर प्रवॄत्त घोषित किया गया है :-- +संथाल परगना एयवस्थापन विनियम (1872 का 3) की धारा 3 द्वारा संथाल परगनों पर ; +पंथ पिपलोदा, विधि विनियम, 1929 (1929 का 1) की धारा 2 तथा अनुसूची द्वारा पंथ पिपलोदा पर ; +खोंडमल विधि विनियम, 1936 (1936 का 4) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा खोंडमल जिले पर ; +आंगूल विधि विनियम, 1936 (1936 का 5) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा आंगूल जिले पर ; +इसे अनुसूचित जिला अधिनियम, 1874 (1874 का 14) की धारा 3 (क) के अधीन निम्नलिखित जिलों में प्रवॄत्त घोषित किया गया है, अर्थात्:-- +संयुक्त प्रान्त तराई जिले--देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1876, भाग 1, पॄ0 505, हजारीबाग, लोहारदग्गा के जिले [(जो अब रांची जिले के नाम से ज्ञात हैं,--देखिए कलकत्ता राजपत्र (अंग्रेजी), 1899, भाग 1, पॄ0 44 और मानभूम और परगना]। दालभूम तथा ासिंहभूम जिलों में कोलाहल—देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1881, भाग 1, पॄ0 504। +उपरोक्त अधिनियम की धारा 5 के अधीन इसका विस्तार लुशाई पहाड़ियों पर किया गया है--देखिए भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1898, भाग 2, पॄ0 345। +इस अधिनियम का विस्तार, गोवा, दमण तथा दीव पर 1962 के विनियम सं0 12 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा ; दादरा तथा नागार हवेली पर 1963 के विनियम सं0 6 की धारा 2 तथा अनुसूची 1 द्वारा ; पांडिचेरी पर 1963 के विनियम सं0 7 की धारा 3 और अऩुसूची 1 द्वारा और लकादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप पर 1965 के विनियम सं0 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किया गया है। +2 “ब्रिटिश भारत” शब्द अनुक्रामशः भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं0 3 को धारा 3 और अनुसूची द्वारा प्रतिस्थापित किए गए हैं। +3 मूल शब्दों का संशोधन अनुक्रामशः 1891 के अधिनियम सं0 12 की धारा 2 और अनुसूची 1, भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937, भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा किया गया है। +4 1951 के अधिनियम सं0 3 को धारा 3 और अनुसूची द्वारा “भाग ख राज्यों को छोड़कर” के स्थान पर प्रतिस्थापित। +5 “उक्त राज्यक्षेत्र” मूल शब्दों का संशोधन अनुक्रामशः भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937, भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं0 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किया गया है। +6 1891 के अधिनियम सं0 12 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा “पर या 1861 की मई के उक्त प्रथम दिन के पश्चात्” शब्द और अंक निरसित। +7 भारतीय शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा “सपरिषद् भारत के गर्वनर जनरल द्वारा पारित विधि” के स्थान पर प्रतिस्थापित। +8 “उक्त राज्यक्षेत्रों की सीमा” मूल शब्दों का संशोधन अनुक्रामशः भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937, भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948, विधि अनुकूलन आदेश, 1950 और 1951 के अधिनियम सं0 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किया गया है। +9 1898 का अधिनियम सं0 4 की धारा 2 द्वारा मूल धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित। +2 +1[(1) भारत के बाहर और परे किसी स्थान में भारत के किसी नागरिक द्वारा ; +(2) भारत में रजिस्ट्रीकॄत किसी पोत या विमान पर, चाहे वह कहीं भी हो किसी व्यक्ति द्वारा, किए गए किसी अपराध को भी लागू है। ] +स्पष्टीकरण--इस धारा में “अपराध” शब्द के अन्तर्गत 2से बाहर किया गया ऐसा हर कार्य आता है, जो यदि 5[भारत में किया जाता तो, इस संहिता के अधीन दंडनीय होता। +4।।। क. 56[भारत का नागरिक है] उगांडा में हत्या करता है। वह 5[भारत] के किसी स्थान में, जहां वह पाया जाए, हत्या के लिए विचारित और दोषसिद्द किया जा सकता है। +7।।।। ।। +8कुछ विधियों पर इस अधिनियम द्वारा प्रभाव न डाला जाना--इस अधिनियम में की कोई बात भारत सरकार की सेवा के आपिसरों, सैनिकों, नौसैनिकों या वायु सैनिकों द्वारा विद्रोह और अभित्यजन को दाण्डित करने वाले किसी अधिनियम के उपबन्धों, या किसी विशेष या स्थानीय विधि के उपबन्धों, पर प्रभाव नहीं डालेगी। + +वह खगोलीय पिंडों की गति: +खगोलीय गति. +आलेखः-अशोक कुमार शुक्ला +वर्ष २०१२ ई० मे आजाद हिन्दुस्तान में यह दूसरा अवसर होगा जब मकर संक्रांति पर्व की तिथि परिवर्तित होकर 15 जनवरी हो जायेगी । इससे पूर्व 1950 में इसकी तिथि 13 जनवरी से परिवर्तित होकर 14 जनवरी हुयी थी और तब से इस पर्व को लगातार इसी तिथि को ही मनाया जाता रहा है। मकर संक्रांति के इस रोचक परिवर्तन का खगोलीय वैज्ञानिक आधार है। +वास्तव में जिसे दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है उसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष इस खगोलीय गति में 20 मिनट का अंतर आता है अर्थात सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 365 दिवस और 20 मिनट बाद होता है । इस हिसाब से तीन वर्ष में यह अंतर 1 घंटे का हो जाता है और 24 घंटे का अंतर होने में 72 वर्ष का समय लगता है । यही कारण है कि प्रत्येक 72 वर्ष के बाद मकर संक्रांति का पर्व अगली तिथि में परिवर्तित हो जाता है। +अब अगर समय रेखा पर 72 -72 वर्ष पीछे की ओर जाया जाय तो 72 ग् 15 वर्ष यानी 1080 वर्ष पहले यानी 920 ई0 में मकर संक्रांति का पर्व 1 जनवरी को पडा होगा। +कैलेन्डर से जुडे कुछ रोचक तथ्य. +क्या आपके लिये यह जानना रोचक नहीं है कि किसी भी सामान्य वर्ष की शुरूआत जिस दिन से होती है उसकी समाप्ति भी उसी दिन से होती है अर्थात यदि किसी सामान्य वर्ष में 1 जनवरी का दिवस रविवार है तो उस वर्ष 31 दिसम्बर को भी रविवार ही होगा । +यह तथ्य सामान्य वषों में लागू होता है लीप वर्ष में नहीं लीप वर्ष में जिस दिन से वर्ष का आरंभ होता है उस वर्ष की समाप्ति उसके अगले दिवस से होती है अर्थात यदि किसी लीप वर्ष में 1 जनवरी का दिवस रविवार है तो उस लीप वर्ष में 31 दिसम्बर का दिवस सोमवार होगा जैसा कि इस वर्ष 2012 में नव वर्ष का आरंभ रविवार दिवस से हुआ हेै और समाप्ति सोमवार से होगी। -- १६:३७, १२ जनवरी २०१२ (UTC) +कुछ और रोचक तथ्य. +वर्ष २०८४ ई० मे मकर संक्रांति पर्व की तिथि परिवर्तित होकर 1६ जनवरी हो जायेगी । इससे पूर्व 1950 में इसकी तिथि 13 जनवरी से परिवर्तित होकर 14 जनवरी हुयी थी और २०१२ में इसकी तिथि 1४ जनवरी से परिवर्तित होकर 1५ जनवरी हुयी थी मकर संक्रांति के इस रोचक परिवर्तन का खगोलीय वैज्ञानिक आधार है। + +कला और विज्ञान: +विज्ञान की कसौटी पर कला +डॉ. अशोक कुमार शुक्ला +‘‘तपस्या’’ 2-614 सेक्टर ‘‘एच’’जानकीपुरम् , लखनऊ +विज्ञान और कला के बगैर आधुनिक जीवन की कल्पना करना असंभव है। परन्तु विभिन्न कलाओ में विज्ञान के योगदान को हम कितना याद रखते हैं ? शायद बिल्कुल भी नहीं। वास्तव में विज्ञान एकत्रित ज्ञान है जबकि कला समस्त उपलब्ध संसाधनों के आधार पर मनुष्य के मनोभावों का निरूपण। अर्थात कोई वैज्ञानिक कार्य चाहे कितना ही महान क्यों न हो समय के साथ उसके वैज्ञानिक ज्ञान का समकालीन ज्ञान में समावेश हो जाता है। +विज्ञान मे ज्ञान की सम सामयिक स्थिति. +सच में किसी वैज्ञानिक का कार्य तभी उपयोगी होता है जब उसके समकक्ष वैज्ञानिकेां के द्वारा उसे स्वीकार किया जाता है। परन्तु विडंवना है कि शीध्र ही उस कार्य को पीछे छोडकर नया कार्य प्रारंभ कर दिया जाता है। +विज्ञान मे ज्ञान की केवल सम सामयिक स्थिति ही महत्व्पूर्ण होती है क्यों कि भूत वर्तमान में समा चुका होता है। उदाहरण के लिये हम लोग संगीत के क्षेत्र में महान संगीतकारों बडे गंलाम अली खां या उस्ताद फैयाज खंा जैसे के संगीत को आज भी सुनते और उसकी सरााहना करते हैं। लियोनार्दाे दी विंची की महान कृति मोनालिसा की अनुकृतियां संसार भर के कला प्रेमियों द्वारा आज भी बडे शौक से खरीदी जाती है। आज भी शैक्सपेयर की और कालिदास की कृतियां पढी जाती हैं। किन्तु न्यूटन के वैज्ञानिक ग्रंन्थ प्रिसिंपिया मैथेमैटिका और आइन्सटाइन के मूल विज्ञान शोध पत्रों को अब अधिकांश लोग पढने की आवश्यकता नही समझते। वास्तव में विज्ञान के लिये यह महत्वपूर्ण भी हैं। +प्रागैतिहासिक मानव द्वारा बनाया गया गुफा चित्र +विज्ञान की सार्वंभौमिकता. +प्रत्येक कला के क्षेत्र में व्यक्ति केा उसके अपने विश्वासों और भावनाओं के कारण ही आकषर्ण मिलता है इसके विपरीत वैज्ञानिक क्रिया कलाप हमेंशा वैयक्तिकता के कम करने तथा वस्तुनिष्ठ आधार बनाने का प्रयास करते हैं। सही विज्ञान की सार्वंभौमिकता है। कला के क्षेत्र मे जिन महान कलाकार और उनकी उपलब्धियों की चर्चा होती है वह वास्तव में संबंधित कलाकारों की व्यक्तिगत उपलब्धियां होती हैं और उन मील के पत्थरो को पाने के लिये किसी भी नये कलाकार को अपनी यात्रा पुनः शून्य से ही प्रारंभ करनी होती है ,और निरन्तर अभ्यास ही उसे उन मानकों के समरूप या उससे भी उंचे स्थान पर पहंुचा सकता है। +इसके विपरीत विज्ञान का आधार प्रेक्षण और प्रयोग है। प्रेक्षण और प्रयोग वैज्ञानिक संक्रियाओं के अनिवार्य अंग हैं। पूर्व के वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर ‘वस्तुओ के वर्तमान स्वरूप’ की व्याख्या हेतु एक सैद्धान्तिक परिकल्पना का निर्माण करने के उपरान्त कुछ अरिवर्तनीय नियम अवधारित होते हैं जो वैज्ञानिक युक्ति के ऐसे मील के पत्थर होते हैं जहां से नया वैज्ञानिक अपनी यात्रा आरंभ करता है। निश्चित रूप से इस स्टेशन से अपनी या़त्रा आरंभ करने वाले को कुछ नयी यात्राये करते हुये आने वाले नये वैज्ञानिको के लिये नये मानक स्थापित करने होते हैं। +ब्रहमांड के बारे में मिश्र की 2700 वर्ष पूर्व की धारणाओं का तत्कालीन निरूपण +अपनी विधा और अपना अलग मार्ग. +कला के क्षेत्र में प्रत्येक महारथी की अपनी विधा और अपना अलग मार्ग होता है जबकि विज्ञान के क्षेत्र में आपको पूर्व से स्थापित मार्ग पर ही चलकर आगंे बढना होता है। चित्रकला की ही बात करें तो प्रागैतिहासिक मानव द्वारा बनाये गये गुफाा चित्रों में आदि मानव का समूह में शिकार करने का दृष्य हो अथवा ब्रम्हांड के बारे में मिश्र की प्राचीन धारणाओं पर निर्मित तत्कालीन चित्र इनमें मानव मन में बसी भावनाओं का ही निरूपण प्रतीत होता है। आज इनकी व्याख्या वर्तमान परिपेक्ष में करने पर आश्चर्यजनक तथ्य प्रकाश में आते हैं। पहले चित्र में शिकार के लिये भटकते मनुष्यों का संघर्ष और शिकार की मनोदशा न्यूनतम रेखाओं के माध्यम से प्रदर्शित होती है। आज भी कला के पारखी अपने मनोभावों को न्यूनतम रेखाओं के माध्यम से प्रदर्शित करने वाली कृति को ही को ही श्रेष्ठ कलाकृति के रूप में परिभाषित करतें हैं तथा कला विद्यालयों में न्यूनतम रेखाओं के आधार पर विषय का भाव पकडने का अभ्यास कराया जाता है। +इसी प्रकार ब्रम्हांड के बारे में मिश्र की प्राचीन धारणाओं पर निर्मित 2700 वर्ष पुराने तत्कालीन दूसरे चित्र में आकाश की देवी नूट का चित्र अंकित है तथा उसके नीचे अंकित पवन के देवता शू के हाथों में अमरत्व प्रतीेक और उसके चरणों में भूमि के देवता गेब की पत्तियों से ढकी आकृति और प्रतिदिन सूर्य को आकाश में ले जाती नावें प्रदशित हैं। इस चित्र को वर्तमान कला के रूप में देखने की स्थिति में हमको यह बिल्कुल भी कालबाधित प्रतीत नहीें होतीं। यह किसी वर्तमान कलाकार के द्वारा की गयी सारे वृहमांड की मौलिक कल्पना की अनुभूति जैसी प्रतीत होती है। जबकि यह वास्तव में उस समय तक सृष्ठि के संबंध में उपलब्ध पूर्व ज्ञान और प्रेक्षणों के आधार पर ‘ क्यों ’ प्रश्न का उत्तर देने के लिये सामान्यता निर्मित होने वाले सैद्धांतिक ढांचे का प्रतिरूप है। +कैनवास पर नयी परिकल्पनायें. +विज्ञान में एक परिकल्पना को सही सिद्व करने के लिये अनेक प्रयोग किये जाते हैं और उसके परिणामेंा के आधार पर नियम एवं सिद्धांतों का निर्माण होता है। प्रत्येक नियम कुछ विशिष्ट दशाओं में तथा एक निश्चित सीमाओं में ही सत्य होता है। नया प्रयोग नयी परिकल्पनायें देता है और नयी परिकल्पना वैज्ञानिक के मष्तिष्क में वैसा ही एक प्रतिरूप तैयार करता है जैसा किसी कलाकार के मन में उठे किसी विचार को कैनवास पर उतारने से पहले आता है। अन्तर केवल अभिब्यक्ति का होता है। जहां चित्रकार अपने विचार को दक्षता के साथ कैनवास पर उतार सकता है वहीं वैज्ञानिक उसे कैनवास पर उतारने की दक्षता नहीं रखता क्योेकि एक वैज्ञानिक का कैनवास दुनिया और समाज होता है जहां उसके अविष्कार सांसारिक बस्तियों में जाकर मनुष्य की जीवन शैलियों को प्रभावित करते हैं और उनके दैनिक क्रिया कलापों में उसका समावेश कुछ इस प्रकार होता है कि मानेा उन अविष्कारों के बगैर रहना कभी संभव ही न रहा हो। +इन्हें भी देखें. +भारत की भीषण भाषा समस्या और उसके सम्भावित समाधान +कला और विज्ञान + +आओ भूगोल सीखें/भूगोल एक सामान्य परिचय: +भूगोल (भू+गोल) पृथ्वी पर विभिन्न स्थलों की जानकारी देता है। भूगोल वह शास्त्र है जिसके द्बारा पृथ्वी के ऊपरी स्वरुप और उसके प्राकृतिक विभागों (जैसे, पहाड़, महादेश, देश, नगर, नदी, समुद्र, झील, ड़मरुमध्य, उपत्यका, अधित्यका, वन आदि) का ज्ञान होता है। पृथ्वी की सतह पर जो स्थान विशेष हैं उनकी समताओं तथा विषमताओं का कारण और उनका स्पष्टीकरण भूगोल का निजी क्षेत्र है। भूगोल शब्द दो शब्दों भू यानि पृथ्वी और गोल से मिलकर बना है। मानव स्रष्टि का सबसे ज्ञानवान व बुद्धिमान जीव है। वह खगोलीय पिंडों की गति तथा पृथ्वी सम्बन्धी सभी तथ्यों के ज्ञान और उसके छिपे हुए रहस्यों के अनावरण के किए सदैव जिज्ञासु और प्रयत्नशील रहा हैं। स्रष्टि में पायी जाने वाली विविधता को देखकर वैज्ञानिक बहुत चकित और अचंभित हुए हैं। विज्ञान के आधारभूत नियम भी इस गुत्थी को सुलझाने में असमर्थ रहे हैं। भूगोल धरातल पर पाए जाने वाले विविध तथ्यों का अध्यन करता हैं। इसके अन्तर्गत धरातल के विविध तत्वों के क्षेत्रीय वितरण का वर्णन मात्र नहीं हैं वरन उनके स्वरुप तथा उत्पत्ति का सकारण विवरण भी अपेक्षित हैं। सर्वप्रथम प्राचीन यूनानी विद्वान इरैटोस्थनिज़ ने भूगोल को धरातल के एक विशिष्टविज्ञान के रुप में मान्यता दी। इसके बाद हिरोडोटस तथा रोमन विद्वान स्ट्रैबो तथा क्लाडियस टॉलमी ने भूगोल को सुनिश्चित स्वरुप प्रदान किया। इस प्रकार भूगोल में 'कहां' 'कैसे 'कब' 'क्यों' व 'कितनें' प्रश्नों की उचित वयाख्या की जाती हैं। +परिभाषा. +"भूगोल पृथ्वी कि झलक को स्वर्ग में देखने वाला आभामय विज्ञान हैं" -क्लाडियस टॉलमी +"भूगोल एक ऐसा स्वतंत्र विषय है, जिसका उद्देश्य लोगों को इस विश्व का, आकाशीय पिण्डो का, स्थल, महासागरों, जीव-जन्तुओं, वनस्पतियों , फलों तथा भूधरातल के क्षेत्रों मे देखी जाने वाली प्रत्येक अन्य वस्तु का ज्ञान प्रात कराना हैं" - स्ट्रैबो +अंग तथा शाखाएँ. +भूगोल के दो प्रधान अंग है : श्रृंखलाबद्ध भूगोल तथा प्रादेशिक भूगोल। पृथ्वी के किसी स्थानविशेष पर श्रृंखलाबद्ध भूगोल की शाखाओं के समन्वय को केंद्रित करने का प्रतिफल प्रादेशिक भूगोल है। +भूगोल एक प्रगतिशील विज्ञान है। प्रत्येक देश में विशेषज्ञ अपने अपने क्षेत्रों का विकास कर रहे हैं। फलत: इसकी निम्नलिखित अनेक शाखाएँ तथा उपशाखाएँ हो गई है : +भौतिक भूगोल -- इसके भिन्न भिन्न शास्त्रीय अंग स्थलाकृति, हिम-क्रिया-विज्ञान, तटीय स्थल रचना, भूस्पंदनशास्त्र, समुद्र विज्ञान, वायु विज्ञान, मृत्तिका विज्ञान, जीव विज्ञान, चिकित्सा या भैषजिक भूगोल तथा पुरालिपि शास्त्र हैं। +आर्थिक भूगोल-- इसकी शाखाएँ कृषि, उद्योग, खनिज, शक्ति तथा भंडार भूगोल और भू उपभोग, व्यावसायिक, परिवहन एवं यातायात भूगोल हैं। अर्थिक संरचना संबंधी योजना भी भूगोल की शाखा है। +मानव भूगोल -- इसके प्रधान अंग वातावरण, जनसंख्या, आवासीय भूगोल, ग्रामीण एवं शहरी अध्ययन के भूगोल हैं। +प्रादेशिक भूगोल -- इसके दो मुख्य क्षेत्र हैं प्रधान तथा सूक्ष्म प्रादेशिक भूगोल। +राजनीतिक भूगोल -- इसके अंग भूराजनीतिक शास्त्र, अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, औपनिवेशिक भूगोल, शीत युद्ध का भूगोल, सामरिक एवं सैनिक भूगोल हैं। +ऐतिहासिक भूगोल --प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक वैदिक, पौराणिक, इंजील संबंधी तथा अरबी भूगोल भी इसके अंग है। +रचनात्मक भूगोल -- इसके भिन्न भिन्न अंग रचना मिति, सर्वेक्षण आकृति-अंकन, चित्रांकन, आलोकचित्र, कलामिति (फोटोग्रामेटरी) तथा स्थाननामाध्ययन हैं। +इसके अतिरिक्त भूगोल के अन्य खंड भी विकसित हो रहे हैं जैसे ग्रंथ विज्ञानीय, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, गणित शास्त्रीय, ज्योतिष शास्त्रीय एवं भ्रमण भूगोल तथा स्थाननामाध्ययन। + +हिन्दी साहित्य का इतिहास: +हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन को यदि आरंभिक, मध्य व आधुनिक काल में विभाजित कर विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। हिन्दी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में प्रचलित धारणाओं पर विचार करते समय हमारे सामने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न दसवीं शताब्दी के आसपास की प्राकृताभास भाषा तथा अप्रभंश भाषाओं की ओर जाता है। अपभ्रंश शब्द की व्युत्पत्ति और जैन रचनाकारों की अपभ्रंश कृतियों का हिन्दी से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए जो तर्क और प्रमाण हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों में प्रस्तुत किये गये हैं उन पर विचार करना भी आवश्यक है। सामान्यतः प्राकृत की अन्तिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिन्दी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही पद्य रचना प्रारम्भ हो गयी थी। +साहित्य की दृष्टि से पद्यबद्ध जो रचनाएँ मिलती हैं वे दोहा रूप में ही हैं और उनके विषय, धर्म, नीति, उपदेश आदि प्रमुख हैं। राजाश्रित कवि और चारण नीति, श्रृंगार, शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे। यह रचना-परम्परा आगे चलकर शैरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिन्दी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरन्तर बढ़ता गया। इस भाषा को विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किन्तु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिन्दी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब और किस देश में प्रारम्भ हुआ। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में हिन्दी शब्द का प्रयोग विदेशी मुसलमानों ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य भारतीय भाषा का था। +आधुनिक काल के पूर्व गद्य की अवस्था. +आधुनिक काल के पूर्व हिन्दी का अस्तित्व किस परिमाण और किस रूप में था, संक्षेप में इसका विचार कर लेना चाहिए। अब तक साहित्य की भाषा ब्रजभाषा ही रही है, इसे सूचित करने की आवश्यकता नहीं। अत: गद्य की पुरानी रचना जो थोड़ी सी मिलती है वह ब्रजभाषा ही में। हिन्दी पुस्तकों की खोज में हठयोग, ब्रह्मज्ञान आदि से संबंध रखनेवाले कई गोरखपंथी ग्रंथ मिले हैं जिनका निर्माणकाल संवत् 1407 के आसपास है। किसी-किसी पुस्तक में निर्माणकाल दिया हुआ है। एक पुस्तक गद्य में भी है जिसका लिखनेवाला 'पूछिबा', 'कहिबा' आदि प्रयोगों के कारण राजपूताने का निवासी जान पड़ता है। इसके गद्य को हम संवत् 1400 के आसपास के ब्रजभाषा गद्य का नमूना मान सकते हैं। थोड़ा सा अंश उध्दृत किया जाता है , +श्री गुरु परमानंद तिनको दंडवत है। हैं कैसे परमानंद, आनंदस्वरूप है सरीर जिन्हि को, जिन्हि के नित्य गाए तें शरीर चेतन्नि अरु आनंदमय होतु है। मैं जु हौं गोरिष सो मछंदरनाथ को दंडवत करत हौं। हैं कैसे वे मछंदरनाथ! आत्मजोति निश्चल हैं अंत:करन जिनके अरु मूलद्वार तैं छह चक्र जिनि नीकी तरह जानैं। +इसे हम निश्चयपूर्वक गद्य का पुराना रूप मान सकते हैं। साथ ही यह भी ध्यान होता है कि यह किसी संस्कृत लेख का 'कथंभूती' अनुवाद न हो। चाहे जो हो, है यह संवत् 1400 के ब्रजभाषा गद्य का नमूना। +ब्रजभाषा गद्य. +1. विट्ठलनाथ इसके उपरांत फिर हमें भक्तिकाल में कृष्णभक्ति शाखा के भीतर गद्यग्रंथ मिलते हैं। श्री बल्लभाचार्य के पुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ जी ने 'श्रृंगाररस मंडन' नामक एक ग्रंथ ब्रजभाषा में लिखा। उनकी भाषा का स्वरूप देखिए , +प्रथम की सखी कहतु है। जो गोपीजन के चरण विषै सेवक की दासी करि जो इनको प्रेमामृत में डूबि कै इनके मंद हास्य न जीते हैं। अमृत समूह ता करि निकुंज विषै श्रृंगाररस श्रेष्ठ रसना कीनो सो पूर्ण होतभई +यह गद्य अपरिमार्जित और अव्यवस्थित है। पर इसके पीछे दो और सांप्रदायिक ग्रंथ लिखे गए जो बड़े भी हैं और जिनकी भाषा भी व्यवस्थित और चलती है। बल्लभसंप्रदाय में इनका अच्छा प्रसार है। इनके नाम हैं , 'चौरासी वैष्णवों की वार्ता' तथा 'दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता'। इनमें से प्रथम आचार्य श्री बल्लभाचार्य जी के पौत्र गोसाईं विट्ठलनाथ जी के पुत्र गोसाईं गोकुलनाथजी की लिखी कही जाती है, पर गोकुलनाथजी के किसी शिष्य की लिखी जान पड़ती है, क्योंकि इसमें गोकुलनाथजी का कई जगह बड़े भक्तिभाव से उल्लेख है। इसमें वैष्णव भक्तों और आचार्य जी की महिमा प्रकट करनेवाली कथाएँ लिखी गई हैं। इसका रचनाकाल विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध्द माना जा सकता है। 'दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता' तो और भी पीछे औरंगजेब के समय के लगभग लिखी प्रतीत होती है। इन वार्ताओं की कथाएँ बोलचाल की ब्रजभाषा में लिखी गई हैं जिसमें कहीं कहीं बहुत प्रचलित अरबी और फारसी शब्द भी निस्संकोच रखे गए हैं। साहित्यिक निपुणता या चमत्कार की दृष्टि से ये कथाएँ नहीं लिखी गई हैं। उदाहरण के लिए यह उध्दृत अंश पर्याप्त होगा , +सो श्री नंदगाम में रहतो हतो। सो खंडन ब्राह्मण शास्त्र पढयो हतो। सो जितने पृथ्वी पर मत हैं सबको खंडन करतो; ऐसो वाको नेम हतो। याही तें सब लोगन ने बाको नाम खंडन पारयो हतो। सो एक दिन श्री महाप्रभु जी के सेवक वैष्णव की मंडली में आयो। सो खंडन करन लाग्यौ। वैष्णवन ने कही जो तेरो शास्त्रार्थ करनो होवै तो पंडित के पास जा हमारी मंडली में तेरे आयबो को काम नहीं। इहाँ खंडन मंडन नहीं है। भगवद्वार्ता को काम है भगवद्यश सुननो होवै तो इहाँ आवो। +2. नाभादास जी इन्होंने भी संवत् 1660 के आसपास 'अष्टयाम' नामक एक पुस्तक ब्रजभाषा में लिखी जिसमें भगवान राम की दिनचर्या का वर्णन है। भाषा इस ढंग की है , +तब श्री महाराज कुमार प्रथम वसिष्ठ महाराज के चरण छुइ प्रनाम करत भए। फिर ऊपर वृद्ध समाज तिनको प्रनाम करत भए। फिर श्री राजाधिराज जू को जोहार करिकै श्री महेंद्रनाथ दशरथ जू निकट बैठते भए। +3. वैकुंठमणि शुक्ल संवत् 1680 के लगभग वैकुंठमणि शुक्ल ने, जो ओरछाकेमहाराज जसवंत सिंह के यहाँ थे, ब्रजभाषा गद्य में 'अगहन माहात्म्य' और 'वैशाख माहात्म्य' नाम की दो छोटी छोटी पुस्तकें लिखीं। द्वितीय के संबंध में वे लिखते हैं , +सब देवतन की कृपा ते बैकुंठमनि सुकुल श्री महारानी चंद्रावती के धरम पढ़िबे के अरथ यह जसरूप ग्रंथ वैसाख महातम भाषा करत भए। एक समय नारद जू ब्रह्मा की सभा से उठिकै सुमेर पर्वत को गए। +ब्रजभाषा गद्य में लिखा एक 'नासिकेतोपाख्यान' मिला है जिसके कर्ता का नाम ज्ञात नहीं। समय संवत् 1760 के उपरांत है। भाषा व्यवस्थित है , +हे ऋषीश्वरो! और सुनो, मैं देख्यो है सो कहूँ। कालै वर्ण महादुख के रूप, जम किंकर देखे। सर्प, बिछू, रीछ, व्याघ्र, सिंह बड़े-बड़े ग्रंध्र देखे। पंथ में पाप कर्मी कौ जमदूत चलाइ कै मुदगर अरु लोहे के दंड कर मार देते हैं। आगे और जीवन को त्रास देते देखे हैं। सु मेरो रोम-रोम खरो होत है। +4. सूरति मिश्र इन्होंने संवत् 1767 में संस्कृत से कथा लेकर बैतालपचीसी लिखी, जिसको आगे चलकर लल्लूलाल ने खड़ी बोली हिंदुस्तानी में किया। जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह की आज्ञा से लाला हीरालाल ने संवत् 1852 में 'आईने अकबरी की भाषा वचनिका' नाम की एक बड़ी पुस्तक लिखी। +भाषा इसकी बोलचाल की है जिसमें अरबी फारसी के कुछ बहुत चलते शब्द भी हैं। नमूना यह है , +अब शेख अबुलफजल ग्रंथ को करता प्रभु को निमस्कार करि कै अकबर बादशाह की तारीफ लिखने को कसद करै है अरु कहै है , याकी बड़ाई और चेष्टा अरु चिमत्कार कहाँ तक लिखूँ। कही जात नाहीं। तातें याकें पराक्रम अरु भाँति भाँति के दसतूर वा मनसूबा दुनिया में प्रगट भए ताको संखेप लिखत हौं। +इस प्रकार की ब्रजभाषा गद्य की कुछ पुस्तकें इधर उधर पाई जाती हैं जिनमें गद्य का कोई विकास प्रकट नहीं होता। साहित्य की रचना पद्य में ही होती रही। गद्य का भी विकास यदि होता आता तो विक्रम की इस शताब्दी के आरंभ में भाषासंबंधिनी बड़ी विषम समस्या उपस्थित होती। जिस धड़ाके के साथ गद्य के लिए खड़ी बोली ले ली गई उस धड़ाके के साथ न ली जा सकती। कुछ समय सोच विचार और वाद-विवाद में जाता और कुछ समय तक दो प्रकार के गद्य की धाराएँ साथ साथ दौड़ लगातीं। अत: भगवान का यह भी एक अनुग्रह समझना चाहिए कि यह भाषाविप्लव नहीं संघटित हुआ और खड़ी बोली, जो कभी अलग और कभी ब्रजभाषा की गोद में दिखाई पड़ जाती थी, धीरे धीरे व्यवहार की शिष्ट भाषा होकर गद्य के नये मैदान में दौड़ पड़ी। +गद्य लिखने की परिपाटी का सम्यक् प्रचार न होने के कारण ब्रजभाषा गद्य जहाँ का तहाँ रह गया। उपर्युक्त 'वैष्णववार्ताओं' में उसका जैसा परिष्कृत और सुव्यवस्थित रूप दिखाई पड़ा वैसा आगे चलकर नहीं। काव्यों की टीकाओं आदि में जो थोड़ा बहुत गद्य देखने में आता था वह बहुत ही अव्यवस्थित और अशक्त था। उसमें अर्थों और भावों को भी संबद्ध रूप में प्रकाशित करने तक की शक्ति न थी। ये टीकाएँ संस्कृत की 'इत्यमर:' और 'कथम्भूतम्' वाली टीकाओं की पद्ध ति पर लिखी जाती थीं। इससे इनके द्वारा गद्य की उन्नति की संभावना न थी। भाषा ऐसी अनगढ़ और लद्ध ड़ होती थी कि मूल चाहे समझ में आ जाय पर टीका की उलझन से निकलना कठिन समझिए। विक्रम की अठारहवीं शताब्दी में लिखी 'श्रृंगारशतक' की एक टीका की कुछ पंक्तियाँ देखिए , +उन्मत्ताप्रेमसंरम्भादालभंते यदंगना:। +तत्रा प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातर: +अंगना जु है स्त्री सु। प्रेम के अति आवेश करि। जु कार्य करन चाहति है ता कार्य विषै। ब्रह्माऊ। प्रत्यूहं आधातुं। अंतराउ कीबै कहँ। कातर। काइरु है। काइरु कहावै असमर्थ। जु कछु स्त्री करयो चाहैं सु अवस्य करहिं। ताको अंतराउ ब्रह्मा पहँ न करयो जाई और की कितीक बात। +आगे बढ़कर संवत् 1872 की लिखी जानकीप्रसाद वाली रामचंद्रिका की प्रसिद्ध टीका लीजिए तो उसकी भाषा की भी यही दशा है , +राघव शर लाघव गति छत्रा मुकुट यों हयो। +हंस सबल अंसु सहित मानहु उड़ि कैगयो +सबल कहें अनेक रंग मिश्रित हैं, अंसु कहे किरण जाके ऐसे जे सरूय्य हैं तिन सहित मानो कलिंदगिरि शृंग तें हंस कहे हंस समूह उड़ि गयो है। यहाँ जाति विषै एकवचन है। हंसन के सदृश श्वेत छत्रा है और सूर्यन के सदृश अनेक रंग नगजटित मुकुट हैं। +इसी ढंग की सारी टीकाओं की भाषा समझिए। सरदार कवि अभी हाल में हुए हैं। कविप्रिया, रसिकप्रिया, सतसई आदि की उनकी टीकाओं की भाषा और भी अनगढ़ और असंबद्ध है। सारांश यह है कि जिस समय गद्य के लिए खड़ी बोली उठ खड़ी हुई उस समय तक गद्य का विकास नहीं हुआ था, उसका कोई साहित्य नहीं खड़ा हुआ था, इसी से खड़ी बोली के ग्रहण में कोई संकोच नहीं हुआ। +खड़ी बोली का गद्य. +देश के भिन्न भिन्न भागों में मुसलमानों के फैलने तथा दिल्ली की दरबारी शिष्टता के प्रचार के साथ ही दिल्ली की खड़ी बोली शिष्ट समुदाय के परस्पर व्यवहार की भाषा हो चली थी। खुसरो ने विक्रम की चौदहवीं शताब्दी में ही ब्रजभाषा के साथ साथ खालिस खड़ी बोली में कुछ पद्य और पहेलियाँ बनाई थीं। औरंगजेब के समय से फारसी मिश्रित खड़ी बोली या रेखता में शायरी भी शुरू हो गई और उसका प्रचार फारसी पढ़े लिखे लोगों में बराबर बढ़ता गया। इस प्रकार खड़ी बोली को लेकर उर्दू साहित्य खड़ा हुआ, जिसमें आगे चलकर विदेशी भाषा के शब्दों का मेल भी बराबर बढ़ता गया और जिसका आदर्श भी विदेशी होता गया। +मोगल साम्राज्य के धवंस से भी खड़ी बोली के फैलने में सहायता पहुँची। दिल्ली, आगरे आदि पछाँही शहरों की समृद्धि नष्ट हो चली थी और लखनऊ, पटना, मुर्शिदाबाद आदि नई राजधानियाँ चमक उठीं। जिस प्रकार उजड़ती हुई दिल्ली को छोड़कर मीर इंशा आदि अनेक उर्दू शायर पूरब की ओर आने लगे, उसी प्रकार दिल्ली के आसपास के प्रदेशों की हिंदू व्यापारी जातियाँ (अगरवाल, खत्री आदि) जीविका के लिए लखनऊ, फैजाबाद, प्रयाग, काशी, पटना आदि पूरबी शहरों में फैलने लगीं। उनके साथ साथ उनकी बोलचाल की भाषा खड़ी बोली भी लगी चलती थी। यह सिद्ध बात है कि उपजाऊ और सुखी प्रदेशों के लोग व्यापार में उद्योगशील नहीं होते। अत: धीरे धीरे पूरब के शहरों में भी इन पश्चिमी व्यापारियों की प्रधानता हो चली। इस प्रकार बड़े शहरों के बाजार की व्यावहारिक भाषा भी खड़ी बोली हुई। यह खड़ी बोली असली और स्वाभाविक भाषा थी, मौलवियों और मुंशियों की उर्दू ए मुअल्ला नहीं। यह अपने ठेठ रूप में बराबर पछाँह से आई जातियों के घरों में बोली जाती है। अत: कुछ लोगों का यह कहना या समझना कि मुसलमानों के द्वारा ही खड़ी बोली अस्तित्व में आई और उसका मूल रूप उर्दू है जिससे आधुनिक हिन्दी गद्य की भाषा अरबी फारसी शब्दों को निकालकर गढ़ ली गई, शुद्ध भ्रम या अज्ञान है। इस भ्रम का कारण यही है कि देश के परंपरागत साहित्य की , जो संवत् 1900 के पूर्व तक पद्यमय ही रहा , भाषा ब्रजभाषा ही रही और खड़ी बोली वैसे ही एक कोने में पड़ी रही जैसे और प्रांतों की बोलियाँ। साहित्य या काव्य में उसका व्यवहार नहीं हुआ। +पर किसी भाषा का साहित्य में व्यवहार न होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उस भाषा का अस्तित्व ही नहीं था। उर्दू का रूप प्राप्त होने के पहले भी खड़ी बोली अपने देशी रूप में वर्तमान थी और अब भी बनी हुई है। साहित्य में भी कभी कभी कोई इसका व्यवहार कर देता था, यह दिखाया जा चुका है। +भोज के समय से लेकर हम्मीरदेव के समय तक अपभ्रंश काव्यों की जो परंपरा चलती रही उसके भीतर खड़ी बोली के प्राचीन रूप की भी झलक अनेक पद्यों में मिलती है। जैसे , +भल्ला हुआ जु मारिया, बहिणि! म्हारा कंतु। +अड़बिहि पत्ती, नइहि जलु, तो बिन बूहा हत्थ। +सोउ जुहिट्ठिर संकट पाआ। देवक लेखिअ कोण मिटाआ +उसके उपरांत भक्तिकाल के आरंभ में निर्गुणधारा के संत कवि जिस प्रकार खड़ी बोली का व्यवहार अपनी सधुक्कड़ी भाषा में किया करते थे, इसका उल्लेख भक्तिकाल के भीतर हो चुका है। कबीरदास के ये वचन लीजिए , +कबीर मन निर्मल भया जैसा गंगानीर। +कबीर कहता जात हूँ, सुनता है सब कोइ। +राम कहे भला होयगा, नहितर भला न होइ +आऊँगा न जाऊँगा, मरूँगा न जीऊँगा। +गुरु के सबद रम रम रहूँगा +अकबर के समय में गंग कवि ने 'चंद छंद बरनन की महिमा' नामक एक गद्य पुस्तक खड़ी बोली में लिखी थी। उसकी भाषा का नमूना देखिए , +सिद्धि श्री 108 श्री श्री पातसाहिजी श्री दलपतिजी अकबरसाहजी आमखास में तखत ऊपर विराजमान हो रहे। और आमखास भरने लगा है जिसमें तमाम उमराव आय आय कुर्निश बजाय जुहार करके अपनी अपनी बैठक पर बैठ जाया करें अपनी अपनी मिसल से। जिनकी बैठक नहीं सो रेसम के रस्से में रेसम की लूमें पकड़ के खड़े ताजीम में रहे। +इतना सुन के पातसाहिजी, श्री अकबरसाहजी आद सेर सोना नरहरदास चारन को दिया। इनके डेढ़ सेर सोना हो गया। रास बंचना पूरन भया। आमखास बरखास हुआ। +इस अवतरण से स्पष्ट लगता है कि अकबर और जहाँगीर के समय में ही खड़ी बोली भिन्न भिन्न प्रदेशों में शिष्ट समाज के व्यवहार की भाषा हो चली थी। यह भाषा उर्दू नहीं कही जा सकती; यह हिन्दी खड़ी बोली है। यद्यपि पहले से साहित्य भाषा के रूप में स्वीकृत न होने के कारण इसमें अधिक रचना नहीं पाई जाती, पर यह बात नहीं है कि इसमें ग्रंथ लिखे ही नहीं जाते थे। दिल्ली राजधानी होने के कारण जब से शिष्ट समाज के बीच इसका व्यवहार बढ़ा तभी से इधर उधर कुछ पुस्तकें इस भाषा के गद्य में लिखी जाने लगीं। +विक्रम संवत् 1798 में रामप्रसाद 'निरंजनी' ने 'भाषायोगवासिष्ठ' नाम का ग्रंथ साफ सुथरी खड़ी बोली में लिखा। ये पटियाला दरबार में थे और महारानी को कथा बाँचकर सुनाया करते थे। इनके ग्रंथ देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि मुंशी सदासुख और लल्लूलाल से बासठ वर्ष पहले खड़ी बोली का गद्य अच्छे परिमार्जित रूप में पुस्तकें आदि लिखने में व्यवहृत होता था। अब तक पाई गई पुस्तकों में यह 'भाषा योगवासिष्ठ' ही सबसे पुराना है जिसमें गद्य अपने परिष्कृत रूप में दिखाई पड़ता है। अत: जब तक और कोई पुस्तक इससे पुरानी न मिले तब तक इसी को परिमार्जित गद्य की प्रथम पुस्तक और राम प्रसाद निरंजनी को प्रथम प्रौढ़ गद्यलेखक मान सकते हैं। 'भाषायोगवासिष्ठ' से दो उद्ध रण आगे दिए जाते हैं , +(क) प्रथम परब्रह्म परमात्मा का नमस्कार है जिससे सब भासते हैं और जिसमें सब लीन और स्थित होते हैं, × × × जिस आनंद के समुद्र के कण से संपूर्ण विश्वआनंदमय है, जिस आनंद से सब जीव जीते हैं। अगस्तजी के शिष्य सुतीक्षण के मन में एक संदेह पैदा हुआ तब वह उसके दूर करने का कारण अगस्त मुनि के आश्रम को जा विधिसहित प्रणाम करके बैठे और बिनती कर प्रश्न किया कि हे भगवान! आप सब तत्वों शास्त्रों के जाननहारे हो, मेरे एक संदेह को दूर करो। मोक्ष का कारण कर्म है किज्ञान है अथवा दोनों हैं, समझाय के कहो। इतना सुन अगस्त मुनि बोले कि हे ब्रह्मण्य! केवल कर्म से मोक्ष नहीं होता और न केवल ज्ञान से मोक्ष होता है, मोक्ष दोनों से प्राप्त होता है। कर्म से अंत:करण शुद्ध होता है, मोक्ष नहीं होता और अंत:करण की शुद्धि बिना केवल ज्ञान से मुक्ति नहीं होती। +(ख) हे रामजी! जो पुरुष अभिमानी नहीं है वह शरीर के इष्ट-अनिष्ट में रागद्वेष नहीं करता क्योंकि उसका शुद्ध वासना है। × × × मलीन वासना जन्मों का कारण है। ऐसी वासना को छोड़कर जब तुम स्थित होगे तब तुम कर्ता होते हुए भी निर्लेप रहोगे। और हर्ष, शोक आदि विकारों से जब तुम अलग रहोगे तब वीतराग, भय, क्रोध से रहित रहोगे। × × × जिसने आत्मतत्व पाया है वह जैसे स्थित हो वैसे ही तुम भी स्थित हो। इसी दृष्टि को पाकर आत्मतत्व को देखो तब विगतज्वर होगे और आत्मपद को पाकर फिर जन्म मरण के बंधान में न आवोगे। +कैसी श्रृंखलाबद्ध साधु और व्यवस्थित भाषा है। +इसके पीछे संवत् 1818 में बसवा (मध्य प्रदेश) निवासी पं. दौलतराम ने हरिषेणाचार्य कृत 'जैन पर्पिुंराण' का भाषानुवाद किया जो 700 पृष्ठों से ऊपर का एक बड़ा ग्रंथ है। भाषा इसकी उपर्युक्त 'भाषायोगवासिष्ठ' के समान परिमार्जित नहीं है, पर इस बात का पूरा पता देती है कि फारसी उर्दू से कोई संपर्क न रखनेवाली अधिकांश शिष्ट जनता के बीच खड़ी बोली किसी स्वाभाविक रूप में प्रचलित थी। मध्य प्रदेश पर फारसी या उर्दू की तालीम कभी नहीं लादी गई थी और जैन समाज, जिसके लिए यह ग्रंथ लिखा गया, बराबर व्यापार से संबंध रखनेवाला समाज रहा है। खड़ी बोली को मुसलमानों द्वारा जो रूप दिया गया है उससे सर्वथा स्वतंत्र वह अपने प्रकृत रूप में भी दो-ढाई सौ वर्ष से लिखने पढ़ने के काम में आ रही है, यह बात 'भाषायोगवासिष्ठ' और 'पर्पिुंराण' अच्छी तरह प्रमाणित कर रहे हैं। अत: यह कहने की गुंजाइश अब जरा भी नहीं रही कि खड़ी बोली गद्य की परंपरा अंग्रेजी की प्रेरणा से चली। 'पर्पिुंराण' की भाषा का स्वरूप यह है , +जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र विषै मगध नामा देश अति सुंदर है, जहाँ पुण्याधिकारी बसे हैं, इंद्रलोक के समान सदा भोगोपयोग करै हैं और भूमि विषय साँठन के बाड़े शोभायमान हैं। जहाँ नाना प्रकार के अन्नों के समूह पर्वत समान ढेर हो रहे हैं। +आगे चलकर संवत् 1830 और 1840 के बीच राजस्थान के किसी लेखक ने 'मंडोवर का वर्णन' लिखा जिसकी भाषा साहित्य की नहीं, साधारण बोलचाल की है, जैसे , +अवल में यहाँ मांडव्य रिसि का आश्रम था। इस सबब से इस जगे का नाम मांडव्याश्रम हुआ। इस लफ्ज का बिगड़ कर मंडोवर हुआ है। +ऊपर जो कहा गया है कि खड़ी बोली का ग्रहण देश के परंपरागत साहित्य में नहीं हुआ था, उसका अर्थ यहाँ स्पष्ट कर देना चाहिए। उक्त कथन में साहित्य से अभिप्राय लिखित साहित्य का है, कथित या मौखिक का नहीं। कोई भाषा हो, उसका कुछ न कुछ साहित्य अवश्य होता है , चाहे वह लिखित न हो, श्रुति परंपरा द्वारा ही चला आता हो। अत: खड़ी बोली के भी कुछ गीत, कुछ पद्य, कुछ तुकबंदियाँ खुसरो के पहले से अवश्य चली आती होंगी। खुसरो की सी पहेलियाँ दिल्ली के आसपास प्रचलित थीं जिनके नमूने पर खुसरो ने अपनी पहेलियाँ या मुकरियाँ कहीं। हाँ, फारसी पद्य में खड़ी बोली को ढालने का प्रयत्न प्रथम कहा जा सकता है। +खड़ी बोली का रूप रंग जब मुसलमानों ने बहुत कुछ बदल दिया और वे उसमें विदेशी भावों का भंडार भरने लगे तब हिन्दी के कवियों की दृष्टि में वह मुसलमानों की खास भाषा सी जँचने लगी। इससे भूषण, सूदन आदि कवियों ने मुसलमान दरबारों के प्रसंग में या मुसलमान पात्रों के भाषण में ही इस बोली का व्यवहार किया है। पर जैसा कि अभी दिखाया जा चुका है, मुसलमानों के दिए हुए कृत्रिम रूप से स्वतंत्र खड़ी बोली का स्वाभाविक देशी रूप भी देश के भिन्नभिन्न भागों में पछाँह के व्यापारियों आदि के साथ साथ फैल रहा था। उसके प्रचार और उर्दू साहित्य के प्रचार से कोई संबंध नहीं। धीरे धीरे यही खड़ी बोली व्यवहार की सामान्य शिष्ट भाषा हो गई। जिस समय अंग्रेजी राज्य भारत में प्रतिष्ठित हुआ उस समय सारे उत्तरी भारत में खड़ी बोली व्यवहार की शिष्ट भाषा हो चुकी थी। जिस प्रकार उसके उर्दू कहलाने वाले कृत्रिम रूप का व्यवहार मौलवी मुंशी आदि फारसी तालीम पाए हुए कुछ लोग करते थे उसी प्रकार उसके असली स्वाभाविक रूप का व्यवहार हिंदू साधु, पंडित, महाजन आदि अपने शिष्ट भाषण में करते थे। जो संस्कृत पढ़े लिखे या विद्वान होते थे उनकी बोली में संस्कृत के शब्द भी मिले रहते थे। +रीतिकाल के समाप्त होते होते अंग्रेजों का राज्य देश में पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो गया था। अत: अंग्रेजों के लिए यहाँ की भाषा सीखने का प्रयत्न स्वाभाविक था। पर शिष्ट समाज के बीच उन्हें दो ढंग की भाषाएँ चलती मिलीं। एक तो खड़ी बोली का सामान्य देशी रूप, दूसरा वह दरबारी रूप जो मुसलमानों ने उसे दिया था और उर्दू कहलाने लगा था। +अंगरेज यद्यपि विदेशी थे पर उन्हें यह स्पष्ट लक्षित हो गया कि जिसे उर्दू कहते हैं वह न तो देश की स्वाभाविक भाषा है, न उसका साहित्य देश का साहित्य है, जिसमें जनता के भाव और विचार रक्षित हों। इसीलिए जब उन्हें देश की भाषा सीखने की आवश्यकता हुई और वे गद्य की खोज में पड़े तब दोनों प्रकार की पुस्तकों की आवश्यकता हुई , उर्दू की भी और हिन्दी (शुद्ध खड़ी बोली) की भी। पर उस समय गद्य की पुस्तकें वास्तव में न उर्दू में थीं न हिन्दी में। जिस समय फोर्ट विलियम कॉलेज की ओर से उर्दू और हिन्दी गद्य की पुस्तकें लिखने की व्यवस्था हुई उसके पहले हिन्दी खड़ी बोली में गद्य की कई पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं। +'भाषायोगवासिष्ठ' और 'पर्पिुंराण' का उल्लेख हो चुका है। उसके उपरांत जब अंग्रेजों की ओर से पुस्तकें लिखाने की व्यवस्था हुई उसके दो-एक वर्ष पहले ही मुंशी सदासुख की ज्ञानोपदेशवाली पुस्तक और इंशा की 'रानी केतकी की कहानी' लिखी जा चुकी थी। अत: यह कहना कि अंग्रेजी की प्रेरणा से ही हिन्दी खड़ी बोली गद्य का प्रादुर्भाव हुआ, ठीक नहीं है। जिस समय दिल्ली के उजड़ने के कारण उधर के हिंदू व्यापारी तथा अन्य वर्ग के लोग जीविका के लिए देश के भिन्नभिन्न भागों में फैल गए और खड़ी बोली अपने स्वाभाविक देशी रूप में शिष्टों की बोलचाल की भाषा हो गई उसी समय में लोगों का ध्यान उसमें गद्य लिखने की ओर गया। तब तक हिन्दी और उर्दू दोनों का साहित्य पद्यमय ही था। हिन्दी कविता में परंपरागत काव्यभाषा ब्रजभाषा का व्यवहार चला आता था और उर्दू कविता में खड़ी बोली के अरबीफारसी मिश्रित रूप का। जब खड़ी बोली अपने असली रूप में भी चारों ओर फैल गई तब उसकी व्यापकता और भी बढ़ गई और हिन्दी गद्य के लिए उसके ग्रहण में सफलता की संभावना दिखाई पड़ी। +इसीलिए जब संवत् 1860 में फोर्ट विलियम कॉलेज (कलकत्ता) के हिन्दी उर्दू अध्यापक जान गिलक्राइस्ट ने देशी भाषा की गद्य पुस्तकें तैयार कराने की व्यवस्था की तब उन्होंने उर्दू और हिन्दी दोनों के लिए अलग अलग प्रबंध किया। इसका मतलब यही है कि उन्होंने उर्दू से स्वतंत्र हिन्दी खड़ी बोली का अस्तित्व भाषा के रूप में पाया। फोर्ट विलियम कॉलेज के आश्रय में लल्लूलालजी गुजराती ने खड़ी बोली के गद्य में 'प्रेमसागर' और सदल मिश्र ने 'नासिकेतोपाख्यान' लिखा। अत: खड़ी बोली गद्य को एक साथ आगे बढ़ानेवाले चार महानुभाव हुए हैं , मुंशी सदासुख लाल, सैयद इंशाअल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र। ये चारों लेखक संवत् 1860 के आसपास हुए। +1. मुंशी सदासुखलाल 'नियाज' दिल्ली के रहनेवाले थे। इनका जन्म संवत् 1803 और मृत्यु 1881 में हुई। संवत् 1850 के लगभग ये कंपनी की अधीनता में चुनार (जिला , मिर्जापुर) में एक अच्छे पद पर थे। इन्होंने उर्दू और फारसी में बहुत सी किताबें लिखी हैं और काफी शायरी की है। अपनी 'मुंतखबुत्तावारीख' में अपने संबंध में इन्होंने जो कुछ लिखा है उससे पता चलता है कि 65 वर्ष की अवस्था में ये नौकरी छोड़कर प्रयाग चले गए और अपनी शेष आयु वहीं हरिभजन में बिताई। उक्त पुस्तक संवत् 1875 में समाप्त हुई जिसके छह वर्ष उपरांत इनका परलोकवास हुआ। मुंशीजी ने विष्णुपुराण से कोई उपदेशात्मक प्रसंग लेकर एक पुस्तक लिखी थी, जो पूरी नहीं मिली है। कुछ दूर तक सफाई के साथ चलने वाला गद्य जैसा 'भाषायोगवासिष्ठ' का था वैसा ही मुंशीजी की इस पुस्तक में दिखाई पड़ा। उसका थोड़ा-सा अंश नीचे उध्दृत किया जाता है , +इससे जाना गया कि संस्कार का भी प्रमाण नहीं; आरोपित उपाधि है। जो क्रिया उत्तम हुई तो सौ वर्ष में चांडाल से ब्राह्मण हुए और जो क्रिया भ्रष्ट हुई तो वह तुरंत ही ब्राह्मण से चांडाल होता है। यद्यपि ऐसे विचार से हमें लोग नास्तिक कहेंगे, हमें इस बात का डर नहीं। जो बात सत्य होय उसे कहना चाहिए कोई बुरा माने कि भला माने। विद्या इसी हेतु पढ़ते हैं कि तात्पर्य इसका (जो) सतोवृत्ति है वह प्राप्त हो और उससे निज स्वरूप में लय हूजिए। इस हेतु नहीं पढ़ते हैं कि चतुराई की बातें कह के लोगों को बहकाइए और फुसलाइए और सत्य छिपाइए, व्यभिचार कीजिए और सुरापान कीजिए और धान द्रव्य इकठौर कीजिए और मन को, कि तमोवृत्ति से भर रहा है निर्मल न कीजिए। तोता है सो नारायण का नाम लेता है, परंतु उसे ज्ञान तो नहीं है। +मुंशीजी ने यह गद्य न तो किसी अंगरेज अधिकारी की प्रेरणा से और न किसी दिए हुए नमूने पर लिखा। वे एक भगवद्भक्त थे। अपने समय में उन्होंने हिंदुओं की बोलचाल की जो शिष्ट भाषा चारों ओर , पूरबी प्रांतों में भी , प्रचलित पाई उसी में रचना की। स्थान स्थान पर शुद्ध तत्सम संस्कृत शब्दों का प्रयोग करके उन्होंने उसके भावी साहित्यिक रूप का पूर्ण आभास दिया। यद्यपि वे खास दिल्ली के रहने वाले अह्लेजबान थे पर उन्होंने अपने हिन्दी गद्य में कथावाचकों, पंडितों और साधु संतों के बीच दूर दूर तक प्रचलित खड़ी बोली का रूप रखा, जिसमें संस्कृत शब्दों का पुट भी बराबर रहता था। इसी संस्कृतमिश्रित हिन्दी को उर्दूवाले 'भाषा' कहते थे जिसका चलन उर्दू के कारण कम होते देख मुंशी सदासुख ने इस प्रकार खेद प्रकट किया था , +रस्मौ रिवाज भाखा का दुनिया से उठ गया। +सारांश यह कि मुंशीजी ने हिंदुओं की शिष्ट बोलचाल की भाषा ग्रहण की, उर्दू से अपनी भाषा नहीं ली। इन प्रयोगों से यह बात स्पष्ट हो जाती है , +स्वभाव करके वे दैत्य कहलाए। बहुत जाधा चूक हुई। उन्हीं लोगों से बन आवै है। जो बात सत्य होय। +काशी पूरब में है पर यहाँ के पंडित सैकड़ों वर्ष से 'होयगा', 'आवता है', 'इस करके' आदि बोलते चले आते हैं। ये सब बातें उर्दू से स्वतंत्र खड़ी बोली के प्रचार की सूचना देती हैं। +2. इंशाअल्ला खाँ उर्दू के बहुत प्रसिद्ध शायर थे जो दिल्ली के उजड़ने पर लखनऊ चले आए थे। इनके पिता मीर माशाअल्ला खाँ कश्मीर से दिल्ली आए थे जहाँ वे शाही हकीम हो गए थे। मोगल सम्राट की अवस्था बहुत गिर जाने पर हकीम साहब मुर्शिदाबाद के नवाब के यहाँ चले गए थे। मुर्शिदाबाद ही में इंशा का जन्म हुआ। जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला मारे गए और बंगाल में अंधेर मचा तब इंशा, जो पढ़ लिखकर अच्छे विद्वान और प्रतिभाशाली कवि हो चुके थे, दिल्ली चले आए और शाहआलम दूसरे के दरबार में रहने लगे। वहाँ जब तक रहे अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल से अपने विरोधी, बड़े बड़े नामी शायरों को ये बराबर नीचा दिखाते रहे। जब गुलामकादिर बादशाह को अंधा करके शाही खजाना लूटकर चल दिया तब इंशा का निर्वाह दिल्ली में कठिन हो गया और वे लखनऊ चले आए। जब संवत् 1855 में नवाब सआदतअली खाँ गद्दी पर बैठे तब ये उनके दरबार में आने जाने लगे। बहुत दिनों तक इनकी बड़ी प्रतिष्ठा रही पर अंत में एक दिल्लगी की बात पर इनका वेतन आदि सब बंद हो गया था और इनके जीवन का अंतिम भाग बड़े कष्ट में बीता। संवत् 1875 में इनकी मृत्यु हुई। +इंशा ने 'उदयभानचरित या रानी केतकी की कहानी' संवत् 1855 और 1860 के बीच लिखी होगी। कहानी लिखने का कारण इंशा साहब यों लिखते हैं , +एक दिन बैठे बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिंदवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जा के मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो।...अपने मिलनेवालों में से एक कोई बड़े पढ़े लिखे, पुराने धुराने डाँग, बूढ़े घाघ यह खटराग लाए...और लगे कहने, यह बात होते दिखाई नहीं देती। हिंदवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो। बस, जैसे भले लोग , अच्छों से अच्छे , आपस में बोलते चालते हैं ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी की न हो। यह नहीं होने का। +इससे स्पष्ट है कि इंशा का उद्देश्य ठेठ हिन्दी लिखने का था जिसमें हिन्दी को छोड़कर और किसी बोली का पुट न रहे। उध्दृत अंश में 'भाखापन' शब्द ध्यान देने योग्य है। मुसलमान लोग भाषा शब्द का व्यवहार साहित्यिक हिन्दी भाषा के लिए किया करते थे जिसमें आवश्यकतानुसार संस्कृत के शब्द आते थे , चाहे वह ब्रजभाषा हो, चाहे खड़ी बोली। तात्पर्य यह कि संस्कृतमिश्रित हिन्दी को ही उर्दूफारसी वाले 'भाषा' कहा करते थे। 'भाखा' से खास ब्रजभाषा का अभिप्राय उनका नहीं होता था, जैसा कुछ लोग भ्रमवश समझते हैं। जिस प्रकार वे अपनी अरबीफारसी मिली हिन्दी को उर्दू कहते थे उसी प्रकार संस्कृत मिली हिन्दी को 'भाखा'। भाषा का शास्त्रीय दृष्टि से विचार न करने वाले या उर्दू की ही तालीम खासतौर पर पाने वाले कई नए पुराने हिन्दी लेखक इस 'इस भाखा' शब्द के चक्कर में पड़कर ब्रजभाषा को हिन्दी कहने में संकोच करते हैं। 'खड़ी बोली पद्य' का झंडा लेकर घूमनेवाले स्वर्गीय बाबू अयोध्याप्रसाद खत्री चारों ओर घूम घूमकर कहा करते थे कि अभी हिन्दी में कविता हुई कहाँ, सूर, तुलसी, बिहारी आदि ने जिसमें कविता की है वह तो 'भाखा' है 'हिन्दी' नहीं। संभव है इस सड़े गड़े खयाल को लिए अब भी कुछ लोग पड़े हों। +इंशा ने अपनी भाषा को तीन प्रकार के शब्दों से मुक्त रखने की प्रतिज्ञा की है , बाहर की बोली = अरबी, फारसी, तुरकी। गँवारी = ब्रजभाषा, अवधी आदि। भाखापन = संस्कृत के शब्दों का मेल। +इस बिलगाव से, आशा है, ऊपर लिखी बात स्पष्ट हो गई होगी। इंशा ने 'भाखापन' और 'मुअल्लापन' दोनों को दूर रखने का प्रयत्न किया, पर दूसरी बला किसी न किसी सूरत में कुछ लगी रह गई। फारसी के ढंग का वाक्यविन्यास कहींकहीं, विशेषत: बड़े वाक्यों में आ ही गया है; पर बहुत कम। जैसे , +'सिर झुकाकर नाक रगड़ता हूँ अपने बनाने वाले के सामने जिसने हम सबको बनाया।' +'इस सिर झुकाने के साथ ही दिन रात जपता हूँ उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को।' +'यह चिट्ठी जो बिसभरी कुँवर तक जा पहुँची।' +आरंभकाल के चारों लेखकों में इंशा की भाषा सबसे चटकीली, मटकीली, मुहावरेदार और चलती है। पहली बात यह है कि खड़ी बोली उर्दू कविता में पहले बहुत कुछ मँज चुकी थी जिससे उर्दूवालों के सामने लिखते समय मुहावरे आदि बहुतायत से आया करते थे। दूसरी बात यह है कि इंशा रंगीन और चुलबुली भाषा द्वारा अपना लेखन कौशल दिखाना चाहते थे। 1 मुंशी सदासुखलाल भी दिल्ली खास के थे और उर्दू साहित्य का अभ्यास भी पूरा रखते थे, पर वे धर्मभाव से जानबूझकर अपनी भाषा गंभीर और संयत रखना चाहते थे। सानुप्रास विराम भी इंशा के गद्य में बहुत स्थलों पर मिलते हैं, जैसे , +जब दोनों महाराजों में लड़ाई होने लगी, रानी केतकी सावन भादों के रूप रोने लगी और दोनों के जी में यह आ गई , यह कैसी चाहत जिनमें लहू बरसने लगा और अच्छी बातों को जी तरसने लगा। +इंशा के समय तक वर्तमान कृदंत या विशेषण और विशेष्य के बीच का समानाधिकरण कुछ बना हुआ था, जो उनके गद्य में जगह-जगह पाया जाता है, जैसे , +आतियाँ जातियाँ जो साँसें हैं। उसके बिना ध्यान यह सब फाँसेहैं॥ +घरवालियाँ जो किसी डौल से बहलातियाँ हैं। +इन विचित्रताओं के होते हुए भी इंशा ने जगह जगह बड़ी प्यारी घरेलू ठेठ भाषा का व्यवहार किया है और वर्णन भी सर्वथा भारतीय रखे हैं। इनकी चलती चटपटी भाषा का नमूना देखिए , +इस बात पर पानी डाल दो नहीं तो पछताओगी और अपना किया पाओगी। मुझसे कुछ न हो सकेगा। तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती तो मेरे मुँह से जीतेजी न निकलती, पर यह बात मेरे पेट नहीं पच सकती। तुम अभी अल्हड़ हो, तुमने अभी कुछ देखा नहीं। जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूँगी तो तुम्हारे बाप से कहकर वह भभूत जो वह मुआ निगोड़ा भूत, मुछंदर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूँगी। +3. लल्लूलालजी ये आगरे के रहनेवाले गुजराती ब्राह्मण थे। इनका जन्म संवत् 1820 में और मृत्यु संवत् 1882 में हुई। संस्कृत के विशेष जानकार तो ये नहीं जान पड़ते, पर भाषा कविता का अभ्यास इन्हें था। उर्दू भी कुछ जानते थे। संवत् 1860 में कलकत्ता के फोर्टविलियम कॉलेज के अध्यापक जान गिलक्राइस्ट के आदेश से इन्होंने खड़ी बोली गद्य में 'प्रेमसागर' लिखा जिसमें भागवत दशमस्कंध की कथा वर्णन की गई है। इंशा के समान इन्होंने केवल ठेठ हिन्दी लिखने का संकल्प तो नहीं किया था पर विदेशी शब्दों के न आने देने की प्रतिज्ञा अवश्य लक्षित होती है। यदि ये उर्दू न जानते होते तो अरबी फारसी के शब्द बचाने में उतने कृतकार्य कभी न होते जितने हुए। बहुतेरे अरबी फारसी के शब्द बोलचाल की भाषा में इतने मिल गए थे कि उन्हें केवल संस्कृत हिन्दी जानने वाले के लिए पहचानना भी कठिन था। मुझे एक पंडितजी का स्मरण है जो 'लाल' शब्द तो बराबर बोलते थे, पर 'कलेजा' और 'बैगन' शब्दों को म्लेच्छ भाषा के समक्ष बचाते थे। लल्लूलाल जी अनजान में कहीं कहीं ऐसे शब्द लिख गए हैं जो फारसी या तुरकी के हैं। जैसे 'बैरख' शब्द तुरकी का 'बैरक' है, जिसका अर्थ झंडा है। प्रेमसागर में यह शब्द आया है देखिए , +शिवजी ने एक धवजा बाणासुर को दे के कहा इस बैरख को ले जाय। +पर ऐसे शब्द दो ही चार जगह आए हैं। +यद्यपि मुंशी सदासुखलाल ने भी अरबीफारसी के शब्दों का प्रयोग न कर संस्कृतमिश्रित साधु भाषा लिखने का प्रयत्न किया है पर लल्लूलाल की भाषा से उसमें बहुत कुछ भेद दिखाई पड़ता है। मुंशीजी की भाषा साफसुथरी खड़ी बोली है पर लल्लूलाल की भाषा कृष्णोपासक व्यासों की-सी ब्रजरंजित खड़ी बोली है। 'सम्मुख जाय', 'सिर नाय', 'सोई', 'भई', 'कीजै', 'निरख', 'लीजौ' ऐसे शब्द बराबर प्रयुक्त हुए हैं। अकबर के समय में गंग कवि ने जैसी खड़ी बोली लिखी थी वैसी ही खड़ी बोली लल्लूलाल ने भी लिखी। दोनों की भाषाओं में अंतर इतना ही है कि गंग ने इधर उधर फारसी अरबी के प्रचलित शब्द भी रखे हैं पर लल्लूलालजी ने ऐसे शब्द बचाए हैं। भाषा की सजावट भी प्रेमसागर में पूरी है। विरामों पर तुकबंदी के अतिरिक्त वर्णन वाक्य भी बड़े बड़े आए हैं और अनुप्रास भी यत्रा-तत्रा हैं। मुहावरों का प्रयोग कम है। सारांश यह कि लल्लूलालजी का 'काव्याभास' गद्यभक्तों की कथावार्ता के काम का ही अधिकतर है, न नित्य व्यवहार के अनुकूल है, न संबद्ध विचारधारा के योग्य। प्रेमसागर से दो नमूने नीचे दिए जाते हैं , +श्रीशुकदेव मुनि बोले , महाराज! ग्रीष्म की अति अनीति देख, नृप पावस प्रचंड पशु पक्षी, जीव जंतुओं की दशा विचार चारों ओर से दल बादल साथ ले लड़ने को चढ़ आया। तिस समय घन जो गरजता था सोई तौ धौंसा बजता था और वर्ण वर्ण की घटा जो घिर आई थी सोई शूर वीर रावत थे, तिनके बीच बिजली की दमक शस्त्रा की सी चमकती थी, बगपाँत ठौर ठौर धवज-सी फहराय रही थी, दादुर, मोर, कड़खैतों की सी भाँति यश +बखानते थे और बड़ी बड़ी बूँदों की झड़ी बाणों की सी झड़ी लगी थी। +इतना कह महादेव जी गिरजा को साथ ले गंगा तीर पर जाय, नीर में न्हाय न्हिलाय, अति लाड़ प्यार से लगे पार्वतीजी को वस्त्र आभूषण पहिराने। निदान अति आनंद में मग्न हो डमरू बजाय बजाय तांडव नाच नाच, संगीतशास्त्र की रीति से गाय गाय लगे रिझाने। +जिस काल ऊषा बारह वर्ष की हुई तो उसके मुखचंद्र की ज्योति देख पूर्णमासी का चंद्रमा छबिछीन हुआ, बालों की श्यामता के आगे अमावस्या की अंधेरी फीकी लगने लगी। उसकी चोटी सटकाई लख नागिन अपनी केंचुली छोड़ सटक गई। भौंह की बँकाई निरख धानुष धकधकाने लगा; ऑंखों की बड़ाई चंचलाई पेख मृग मीन खंजन खिसाय रहे। +लल्लूलाल ने उर्दू, खड़ी बोली हिन्दी और ब्रजभाषा तीनों में गद्य की पुस्तकें लिखीं। ये संस्कृत नहीं जानते थे। ब्रजभाषा में लिखी हुई कथाओं और कहानियों को उर्दू और हिन्दी गद्य में लिखने के लिए इनसे कहा गया था जिसके अनुसार इन्होंने सिंहासनबत्तीसी, बैतालपचीसी, शकुंतला नाटक, माधोनल और प्रेमसागर लिखे। प्रेमसागर के पहले की चारों पुस्तकें बिल्कुल उर्दू में हैं। इनके अतिरिक्त संवत् 1869 में इन्होंने 'राजनीति' के नाम से हितोपदेश की कहानियाँ (जो पद्य में लिखी जा चुकी थीं) ब्रजभाषा गद्य में लिखी। 'माधवविलास' और 'सभाविलास' नाम से ब्रजभाषा पद्य के संग्रह ग्रंथ भी इन्होंने प्रकाशित किए थे। इनकी 'लालचंद्रिका' नाम की बिहारी सतसई की टीका भी प्रसिद्ध है। इन्होंने अपना एक निज का प्रेस कलकत्तो में (पटलडाँगे) में खोला था जिसे ये संवत् 1881 में फोर्टविलियम कॉलेज की नौकरी से पेंशन लेने पर, आगरे लेते गए। आगरे में प्रेस जमाकर ये एक बार फिर कलकत्ते गए जहाँ इनकी मृत्यु हुई। अपने प्रेस का नाम इन्होंने 'संस्कृत प्रेस' रखा था, जिसमें अपनी पुस्तकों के अतिरिक्त ये रामायण आदि पुरानी पोथियाँ भी छापा करते थे। इनके प्रेस की छपी पुस्तकों की लोग बहुत आदर करते थे। +4. सदल मिश्र ये बिहार के रहनेवाले थे। फोर्टविलियम कॉलेज में काम करते थे। जिस प्रकार उक्त कॉलेज के अधिकारियों की प्रेरणा से लल्लूलाल ने खड़ी बोली गद्य की पुस्तक तैयार की उसी प्रकार इन्होंने भी। इनका 'नासिकेतोपाख्यान' भी उसी समय लिखा गया जिस समय 'प्रेमसागर'। पर दोनों की भाषा में बहुत अंतर है। लल्लूलाल के समान इनकी भाषा में न तो ब्रजभाषा के रूपों की वैसी भरमार है और न परंपरागत काव्य भाषा की पदावली का स्थान स्थान पर समावेश। इन्होंने व्यवहारोपयोगी भाषा लिखने का प्रयत्न किया है और जहाँ तक हो सकता है खड़ी बोली का ही व्यवहार किया है। पर इनकी भाषा भी साफ सुथरी नहीं। ब्रजभाषा के भी कुछ रूप हैं और पूरबी बोली के शब्द तो स्थान स्थान पर मिलते हैं। 'फूलन्ह के बिछौने', 'चहुँदिस', 'सुनि', 'सोनन्ह के थंभ' आदि प्रयोग ब्रजभाषा के हैं, 'इहाँ', 'मतारी', 'बरते थे', 'जुड़ाई', 'बाजने', 'लगा', 'जौन' आदि पूरबी शब्द हैं। भाषा के नमूने के लिए 'नासिकेतोपाख्यान' से थोड़ा सा अवतरण नीचे दिया जाता है , +इस प्रकार के नासिकेत मुनि यम की पुरी सहित नरक का वर्णन कर फिर जौन जौन कर्म किए से जो भोग होता है सो सब ऋषियों को सुनाने लगे कि गौ, ब्राह्मण, माता पिता, मित्र, बालक, स्त्री, स्वामी, वृद्ध गुरु इनका जो बधा करते हैं वो झूठी साक्षी भरते, झूठ ही कर्म में दिन रात लगे रहते हैं, अपनी भार्य्या को त्याग दूसरे की स्त्री को ब्याहते, औरों की पीड़ा देख प्रसन्न होते हैं और जो अपने धर्म से हीन पाप ही में गड़े रहते हैं वो माता-पिता की हित की बात को नहीं सुनते, सबसे बैर करते हैं, ऐसे जो पापी जन हैं सो महा डेरावने दक्षिण द्वार से जा नरकों में पड़ते हैं। +गद्य की एक साथ परंपरा चलाने वाले उपर्युक्त चार लेखकों में से आधुनिक हिन्दी का पूरा पूरा आभास मुंशी सदासुखलाल और सदल मिश्र की भाषा में ही मिलता है। व्यवहारोपयोगी इन्हीं की भाषा ठहरती है। इन दो में मुंशी सदासुख की साधु भाषा अधिक महत्व की है। मुंशी सदासुख ने लेखनी भी चारों में पहले उठाई अत: गद्य का प्रवर्तन करनेवालों में उनका विशेष स्थान समझना चाहिए। +संवत् 1860 के लगभग हिन्दी गद्य का प्रवर्तन तो हुआ पर उसके साहित्य की अखंड परंपरा उस समय से नहीं चली। इधर उधर दो-चार पुस्तकें अनगढ़ भाषा में लिखी गई हों तो लिखी गई हों पर साहित्य के योग्य स्वच्छ सुव्यवस्थित भाषा में लिखी कोई पुस्तक संवत् 1915 के पूर्व की नहीं मिलती। संवत् 1881 में किसी ने 'गोरा बादल री बात' का, जिसे राजस्थानी पद्यों में जटमल ने संवत् 1680 में लिखा था, खड़ी बोली के गद्य में अनुवाद किया। अनुवाद का थोड़ासा अंश देखिए , +गोरा बादल की कथा गुरु के बल, सरस्वती के मेहरबानगी से पूरन भई। तिस वास्ते गुरु कूँ व सरस्वती कूँ नमस्कार करता हूँ। ये कथा सोल: से असी के साल में फागुन सुदी पूनम के रोज बनाई। ये कथा में दो रस हैं वीररस व सिंगाररस है, सो कथा मोरछड़ो नाँव गाँव का रहने वाला कबेसर। +उस गाँव के लोग भोहोत सुखी हैं। घर घर में आनंद होता है, कोई घर में फकीर दीखता नहीं। +संवत् 1860 और 1915 के बीच का काल गद्यरचना की दृष्टि से प्राय: शून्य ही मिलता है। संवत् 1914 के बलवे के पीछे ही हिन्दी गद्य साहित्य की परंपरा अच्छी तरह चली। +संवत् 1860 के लगभग हिन्दी गद्य की जो प्रतिष्ठा हुई उसका उस समय यदि किसी ने लाभ उठाया तो ईसाई धर्मप्रचारकों ने, जिन्हें अपने मत को साधारण जनता के बीच फैलाना था। सिरामपुर उस समय पादरियों का प्रधान अड्डा था। विलियम केरे (ॅपससपंउ ब्ंतमल) तथा और कई अंगरेज पादरियों के उद्योग से इंजील का अनुवाद उत्तर भारत की कई भाषाओं में हुआ। कहा जाता है कि बाइबिल का हिन्दी अनुवाद स्वयं केरे साहब ने किया। संवत् 1866 में उन्होंने 'नए धर्म नियम' का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया और संवत् 1875 में समग्र ईसाई धर्म पुस्तक का अनुवाद पूरा हुआ। इस संबंध में ध्यान देने की बात यह है कि इन अनुवादकों ने सदासुख और लल्लूलाल की विशुद्ध भाषा को ही आदर्श माना, उर्दूपन को बिल्कुल दूर रखा, इससे यही सूचित होता है कि फारसीअरबी मिली भाषा से साधारण जनता का लगाव नहीं था जिसके बीच मत का प्रचार करना था। जिस भाषा में साधारण हिन्दू जनता अपने कथापुराण कहतीसुनती आती थी उसी भाषा का अवलंबन ईसाई उपदेशकों को आवश्यक दिखाई पड़ा। जिस संस्कृत मिश्रित भाषा का विरोध करना कुछ लोग एक फैशन समझते हैं उससे साधारण जनसमुदाय उर्दू की अपेक्षा कहीं अधिक परिचित रहा है और है। जिन अंग्रेजों को उत्तर भारत में रहकर केवल मुंशियों और खानसामों की ही बोली सुनने का अवसर मिलता है वे अब भी उर्दू या हिंदुस्तानी को यदि जनसाधारण की भाषा समझा करें तो कोई आश्चर्य नहीं। पर उन पुराने पादरियों ने जिस शिष्ट भाषा में जनसाधारण को धर्म और ज्ञान आदि के उपदेश सुनतेसुनाते पाया उसी को ग्रहण किया। +ईसाइयों ने अपनी धर्मपुस्तक के अनुवाद की भाषा में फारसी और अरबी के शब्द जहाँ तक हो सका है नहीं लिए हैं और ठेठ ग्रामीण शब्द तक बेधाड़क रखे गए हैं। उनकी भाषा सदासुख और लल्लूलाल के ही नमूने पर चली है। उसमें जो कुछ विलक्षणतासी दिखाई पड़ती है वह मूल विदेशी भाषा की वाक्यरचना और शैली के कारण। 'प्रेमसागर' के समान ईसाई धर्मपुस्तक में भी 'करने वाले' के स्थानपर 'करनहारे', 'तक' के स्थान पर 'लौ', 'कमरबंद' के स्थान पर 'पटुका' प्रयुक्त हुए हैं। पर लल्लूलाल के इतना ब्रजभाषापन नहीं आने पाया है। 'आय', 'जाय' का व्यवहार न होकर 'आके', 'जाके' व्यवहृत हुए हैं। सारांश यह कि ईसाई मतप्रचारकों ने विशुद्ध हिन्दी का व्यवहार किया है। एक नमूना नीचे दिया जाता है , +तब यीशु योहन से बपतिस्मा लेने को उस पास शालील से यर्दन के तीर पर आया। परंतु योहन यह कह कर उसे बर्जने लगा कि मुझे आपके हाथ से बपतिस्मा लेना अवश्य है और क्या आप मेरे पास आते हैं! यीशु ने उसको उत्तर दिया कि अब ऐसा होने दे क्योंकि इसी रीति से सब धर्म को पूरा करना चाहिए। यीशु बपतिस्मा लेके तुरन्त जल के ऊपर आया और देखो उसके लिए स्वर्ग खुल गया और उसने ईश्वर के आत्मा को कपोत के नाईं उतरते और अपने ऊपर आते देखा, और देखो यह आकाशवाणी हुई कि यह मेरा प्रिय पुत्र है जिससे मैं अति प्रसन्न हूँ। +इसके आगे ईसाइयों की पुस्तकें और पंफलेट बराबर निकलते रहे। उक्त 'सिरामपुर प्रेस' से संवत् 1893 में 'दाऊद के गीतें' नाम की पुस्तक छपी जिसकी भाषा में कुछ फारसी अरबी के बहुत चलते शब्द भी रखे मिलते हैं। पर इसके पीछे अनेक नगरों से बालकों की शिक्षा के लिए ईसाइयों के छोटे मोटे स्कूल खुलने लगे और शिक्षा संबंधी पुस्तकें भी निकलने लगीं। इन पुस्तकों की हिन्दी भी वैसी ही सरल और विशुद्ध होती थी जैसी 'बाइबिल' के अनुवाद की थी। आगरा, मिर्जापुर, मुंगेर आदि जिले उस समय ईसाइयों के प्रचार के मुख्य केंद्र थे। +अंग्रेजी की शिक्षा के लिए कई स्थानों पर स्कूल और कॉलेज खुल चुके थे जिनमें अंग्रेजी के साथ हिन्दी, उर्दू की पढ़ाई भी कुछ चलती थी। अत: शिक्षा संबंधी पुस्तकों की माँग संवत् 1900 के पहले ही पैदा हो गई थी। शिक्षा संबंधिनी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए संवत् 1890 के लगभग आगरा में पादरियों की एक 'स्कूल बुक सोसाइटी' स्थापित हुई थी जिसमें संवत् 1894 में इंग्लैंड के एक इतिहास का और संवत् 1896 में मार्शमैन साहब के 'प्राचीन इतिहास का अनुवाद', 'कथासार' के नाम से प्रकाशित किया। 'कथासार' के लेखक या अनुवादक पं. रतनलाल थे। इसके संपादक पादरी मूर साहब ;श्रण् श्रण् डववतमद्ध ने अपने छोटे से अंग्रेजी वक्तव्य में लिखा था कि यदि सर्वसाधारण से इस पुस्तक को प्रोत्साहन मिला तो इसका दूसरा भाग 'वर्तमान इतिहास' भी प्रकाशित किया जायगा। भाषा इस पुस्तक की विशुद्ध और पंडिताऊ है। 'की' के स्थान पर 'करी' और 'पाते हैं' के स्थान पर 'पावते हैं' आदि प्रयोग बराबर मिलते हैं। भाषा का नमूना यह है , +परंतु सोलन की इन अत्युत्ताम व्यवस्थाओं से विरोधभंजन न हुआ। पक्षपातियों के मन का क्रोध न गया। फिर कुलीनों में उपद्रव मचा और इसलिए प्रजा की सहायता से पिसिसटे्रटस नामक पुरुष सबों पर पराक्रमी हुआ। इसने सब उपाधियों को दबाकर ऐसा निष्कंटक राज्य किया कि जिसके कारण वह अनाचारी कहाया, तथापि यह उस काल में दूरदर्शी और बुद्धि मानों में अग्रगण्य था। +आगरे की उक्त सोसाइटी के लिए संवत् 1897 में पंडित ओंकार भट्ट ने 'भूगोल सार' और संवत् 1904 में पं. बद्रीलाल शर्मा ने 'रसायन प्रकाश' लिखा। कलकत्तो में भी ऐसी ही एक स्कूल बुक सोसाइटी थी जिसने 'पदार्थ विद्यासागर' (संवत् 1903) आदि कई वैज्ञानिक पुस्तकें निकाली थीं। इसी प्रकार कुछ रीडरें भी मिशनरियों के छापेखाने से निकली थीं , जैसे 'आजमगढ़ रीडर' जो इलाहाबाद मिशन प्रेस से संवत् 1897 में प्रकाशित हुई थी। +बलवे के कुछ पहले ही मिर्जापुर में ईसाइयों का एक 'आरफेन प्रेस' खुला था जिससे शिक्षा संबंधिनी कई पुस्तकें शेरिंग साहब के संपादन में निकली थीं, जैसे , भूचरित्रदर्पण, भूगोलविद्या, मनोरंजक वृत्तांत, जंतुप्रबंध, विद्यासार, विद्वान संग्रह। ये पुस्तकें संवत् 1912 और 1919 के बीच की हैं। तब से मिशन सोसाइटियों के द्वारा बराबर, विशुद्ध हिन्दी में पुस्तकें और पंफलेट आदि छपते आ रहे हैं जिनमें कुछ खंडन मंडन, उपदेश और भजन आदि रहा करते थे। 'आसी' और 'जान' के भजन देशी ईसाइयों मे बहुत प्रचलित हुए और अब तक गाए जाते हैं। सारांश यह कि हिन्दी गद्य के प्रसार में ईसाइयों का बहुत कुछ योग रहा है। शिक्षा संबंधिनी पुस्तकें तो पहले पहल उन्होंने तैयार कीं। इन बातों के लिए हिन्दी प्रेमी उनके सदा कृतज्ञ रहेंगे। +कहने की आवश्यकता नहीं कि ईसाइयों के प्रचारकार्य का प्रभाव हिंदुओं की जनसंख्या पर ही पड़ रहा था। अत: हिंदुओं के शिक्षित वर्ग के बीच स्वधर्म रक्षा की आकुलता दिखाई पड़ने लगी। ईसाई उपदेशक हिंदू धर्म की स्थूल और बाहरी बातों को लेकर ही अपना खंडन-मंडन चलाते आ रहे थे। यह देखकर बंगाल में राजा राममोहन राय उपनिषद् और वेदांत का ब्रह्मज्ञान लेकर उसका प्रचार करने खड़े हुए। नूतन शिक्षा के प्रभाव से पढ़े लिखे लोगों में से बहुतों के मन में मूर्तिपूजा, तीर्थाटन, जातिपाँति, छुआछूत आदि के प्रति अश्रध्दा हो रही थी। अत: राममोहन राय ने इन बातों को अलग करके शुद्ध ब्रह्मोपासना का प्रवर्तन करने के लिए 'ब्रह्मसमाज' की नींव डाली। संवत् 1872 में उन्होंने वेदांत सूत्रों के भाष्य का हिन्दी अनुवाद करके प्रकाशित कराया था। संवत् 1886 में उन्होंने 'बंगदूत' नाम का एक संवाद पत्र भी हिन्दी में निकाला। राजा साहब की भाषा में एकआधा जगह कुछ बँग्लापन जरूर मिलता है, पर उसका रूप अधिकांश में वही है जो शास्त्रज्ञ विद्वानों के व्यवहार में आता था। नमूना देखिए , +जो सब ब्राह्मण सांग वेद अध्ययन नहीं करते सो सब व्रात्य हैं, यह प्रमाण करने की इच्छा करके ब्राह्मण धर्मपरायण श्री सुब्रह्मण्य शास्त्रीजी ने जो पत्र सांगवेदाधययनहीन अनेक इस देश के ब्राह्मणों के समीप पठाया है, उसमें देखा जो उन्होंने लिखा है , वेदाधययनहीन मनुष्यों को स्वर्ग और मोक्ष होने शक्ता नहीं। +कई नगरों में, जिनमें कलकत्ता मुख्य था, अब छापेखाने हो गए थे। बंगाल से कुछ अंग्रेजी और कुछ बँग्ला के पत्र भी निकलने लगे थे जिनके पढ़नेवाले भी हो गए थे। इस परिस्थिति में पं. जुगुलकिशोर ने, जो कानपुर के रहनेवाले थे, संवत् 1883 में 'उदंत मार्तंड' नाम का एक संवाद पत्र निकाला जिसे हिन्दी का पहला समाचार पत्र समझना चाहिए जैसा कि उसके इस लेख से प्रकट होता है , +यह उदंत मार्तंड अब पहिले पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेत जो आज तक किसी ने नहीं चलाया, पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बँगले में जो समाचार का कागज छपता है उसका सुख उन बोलियों के जान्ने ओ पढ़ने वालों को ही होता है। इससे सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देखकर आप पढ़ ओ समझ लेयँ ओ पराई अपेक्षा न करें ओ अपने भाषे की उपज न छोड़ें इसलिए श्रीमान गवरनर जनरल बहादुर की आयस से ऐसे साहस में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठाटा। जो कोई प्रशस्त लोग इस खबर के कागज के लेने की इच्छा करें तो अमड़ा तला की गली 37 अंक मार्तंड छापाघर में अपना नाम ओ ठिकाना भेजने ही से सतवारे के सतवारे यहाँ के रहने वाले घर बैठे ओ बाहिर के रहने वाले डाक पर कागज पाया करेंगे। +यह पत्र एक ही वर्ष चलकर सहायता के अभाव में बंद हो गया। इसमें 'खड़ी बोली' का 'मध्यदेशीय भाषा' के नाम से उल्लेख किया गया है। भाषा का स्वरूप दिखाने के लिए कुछ और उदाहरण दिए जाते हैं , +1. एक यशी वकील वकालत का काम करते करते बुङ्ढा होकर अपने दामाद को यह काम सौंप के आप सुचित हुआ। दामाद कई दिन काम करके एक दिन आया ओ प्रसन्न होकर बोला , हे महाराज! आपने जो फलाने का पुराना वो संगीन मोकद्दमा हमें सौंपा था सो आज फैसला हुआ। यह सुनकर वकील पछता करके बोला , तुमने सत्यानाश किया। उस मोकद्दमे से हमारे बाप बड़े थे तिस पीछे हमारे बाप मरती समय हमें हाथ उठाकर के दे गए ओ हमने भी उसको बना रखा ओ अब तक भलीभाँति अपना दिन कटा ओ वही मोकद्दमा तुमको सौंप कर समझा था कि तुम भी अपने बेटे पोते परोतों तक पलोगे पर तुम थोड़े से दिनों में उसे खो बैठे। +2. 19 नवंबर को अवधबिहारी बादशाह के आवने की तोपें छूटीं। उस दिन तीसरे पहर को र्प्टांलग साहिब ओ हेल साहिब ओ मेजर फिडल लार्ड साहिब की ओर से अवधबिहारी की छावनी में जा करके बड़े साहिब का सलाम कहा और भोर होके लार्ड साहिब के साथ हाजिरी करने का नेवता किया। फिर अवधबिहारी बादशाह के जाने के लिए कानपुर के तले गंगा में नावों की पुलबंदी हुई और बादशाह बड़े ठाट से गंगा पार हो गवरनर जेनरल बहादुर के सन्निद्ध गए। +रीतिकाल के समाप्त होते होते अंग्रेजी राज्य देश में पूर्ण रूप में स्थापित हो गया। इस राजनीतिक घटना के साथ देशवासियों की शिक्षाविधि में भी परिवर्तन हो चला। अंगरेज सरकार ने अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार की व्यवस्था की। संवत् 1854 में ही ईस्ट इंडिया कंपनी के डाइरेक्टरों के पास अंग्रेजी की शिक्षा द्वारा भारतवासियों को शिक्षित बनाने का परामर्श भेजा गया था। पर उस समय उस पर कुछ न हुआ। पीछे राजा राममोहन राय प्रभृति कुछ शिक्षित और प्रभावशाली सज्जनों के उद्योग से अंग्रेजी की पढ़ाई के लिए कलकत्ता में हिंदू कॉलेज की स्थापना हुई जिसमें से लोग अंग्रेजी पढ़ पढ़कर निकलने और सरकारी नौकरियाँ पाने लगे। देशी भाषा पढ़कर भी कोई शिक्षित हो सकता है, यह विचार उस समय तक लोगों को न था। अंग्रेजी के सिवाय यदि किसी भाषा पर ध्यान जाता था तो संस्कृत या अरबी पर। संस्कृत की पाठशालाओं और अरबी के मदरसों को कंपनी की सरकार से थोड़ी बहुत सहायता मिलती आ रही थी पर अंग्रेजी के शौक के सामने इन पुरानी संस्थाओं की ओर से लोग उदासीन होने लगे। इनको जो सहायता मिलती थी धीरे धीरे वह भी बंद हो गई। कुछ लोगों ने इन प्राचीन भाषाओं की शिक्षा का पक्ष ग्रहण किया था पर मेकाले ने अंग्रेजी भाषा की शिक्षा का इतने जोरों के साथ समर्थन किया और पूरबी साहित्य के प्रति ऐसी उपेक्षा प्रकट की कि अंत में संवत् 1892 (मार्च 7, सन् 1835) में कंपनी की सरकार ने अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार का प्रस्ताव पास कर दिया और धीरे धीरे अंग्रेजी के स्कूल खुलने लगे। +अंग्रेजी शिक्षा की व्यवस्था हो जाने पर अंग्रेजी सरकार का ध्यान अदालती भाषा की ओर गया। मोगलों के समय में अदालती कार्रवाइयाँ और दफ्तर के सारे काम फारसी भाषा में होते थे जब अंग्रेजों का आधिापत्य हुआ तब उन्होंने भी दफ्तरों में वही परंपरा जारी रखी। +दफ्तरों की भाषा फारसी रहने तो दी गई, पर उस भाषा और लिपि से जनता के अपरिचित रहने के कारण लोगों को जो कठिनता होती थी उसे कुछ दूर करने के लिए संवत् 1860 में, एक नया कानून जारी होने पर, कंपनी सरकार की ओर से यह आज्ञा निकाली गई , +किसी को इस बात का उजूर नहीं होए कि ऊपर के दफे का लीखा हुकुम सभसे वाकीफ नहीं है, हरी एक जिले के कलीकटर साहेब को लाजीम है कि इस आईन के पावने पर एक केता इसतहारनामा निचे के तरह से फारसी व नागरी भाखा के अच्छर में लिखाय कै...कचहरी में लटकावही। अदालत के जजसाहिब लोग के कचहरी में भी तमामी आदमी के बुझने के वास्ते लटकावही (अंग्रेजी सन् 1803 साल, 31 आईन 20 दफा)। +फारसी के अदालती भाषा होने के कारण जनता को कठिनाइयाँ होती थीं, उनका अनुभव अधिाकाधिक होने लगा। अत: सरकार ने संवत् 1893 (सन् 1836ई ) में 'इश्तहारनामे' निकाले कि अदालती सब काम देश की प्रचलित भाषाओं में हुआ करें। हमारे संयुक्त प्रदेश के सदर बोर्ड की तरफ से जो 'इश्तहारनामा' हिन्दी में निकलता था उसकी नकल नीचे दी जाती है , +इश्तहारनामा : बोर्ड सदर +पच्छाँह के सदर बोर्ड के साहिबों ने यह ध्यान किया है कि कचहरी के सब काम फारसी जबान में लिखा पढ़ा होने से सब लोगों का बहुत हर्ज पड़ता है और बहुत कलप होता है, और जब कोई अपनी अर्जी अपनी भाषा में लिख के सरकार में दाखिल करने पावे तो बड़ी बात होगी। सबको चैन आराम होगा। इसलिए हुक्म दिया गया है कि 1244 की कुवार बदी प्रथम से जिसका जो मामला सदर व बोर्ड में हो सो अपना अपना सवाल अपनी हिन्दी को बोली में और पारसी के नागरी अच्छरन में लिखे दाखिल करे कि डाक पर भेजे और सवाल जौन अच्छरन में लिखा हो तौने अच्छरन में और हिन्दी बोली में उस पर हुक्म लिखा जायगा। मिति 29 जुलाई, सन् 1836 ई.। +इस इश्तहारनामे में स्पष्ट कहा गया है कि बोली 'हिन्दी' ही हो, अक्षर नागरी के स्थान पर फारसी भी हो सकते हैं। खेद की बात है कि यह उचित व्यवस्था चलने न पाई। मुसलमानों की ओर से इस बात का घोर प्रयत्न हुआ कि दफ्तरों में हिन्दी रहने न पाए, उर्दू चलाई जाय। उनका चक्र बराबर चलता रहा यहाँ तक कि एक वर्ष बाद ही अर्थात् संवत् 1894 (सन् 1837 ई.) में उर्दू हमारे प्रांत के सब दफ्तरों की भाषा कर दी गई। +सरकार की कृपा से खड़ी बोली का अरबी फारसीमय रूप लिखने पढ़ने की अदालती भाषा होकर सबके सामने आ गया। जीविका और मान मर्यादा की दृष्टि से उर्दू सीखना आवश्यक हो गया। देश भाषा के नाम पर लड़कों को उर्दू ही सिखाई जाने लगी। उर्दू पढ़े लिखे लोग ही शिक्षित कहलाने लगे। हिन्दी की काव्यपरंपरा यद्यपि राजदरबारों के आश्रय में चली चलती थी पर उसके पढ़नेवालों की संख्या भी घटती जा रही थी। नवशिक्षित लोगों का लगाव उसके साथ कम होता जा रहा था। ऐसे प्रतिकूल समय में साधारण जनता के साथ उर्दू पढ़े लिखे लोगों की जो भी थोड़ी बहुत दृष्टि अपने पुराने साहित्य की बनी हुई थी, वह धर्मभाव से। तुलसीकृत रामायण्ा की चौपाइयाँ और सूरदास जी के भजन आदि ही उर्दूग्रस्त लोगों का कुछ लगाव 'भाखा' से भी बनाए हुए थे। अन्यथा अपने परंपरागत साहित्य के नवशिक्षित लोगों का मन अधिकांश कालचक्र के प्रभाव से विमुख हो रहा था। श्रृंगाररस की भाषा कविता का अनुशीलन भी गाने बजाने आदि के शौक की तरह इधर उधर बना हुआ था। इस स्थिति का वर्णन करते हुए स्वर्गीय बाबू बालमुकुंद गुप्त लिखते हैं, +जो लोग नागरी अक्षर सीखते थे फारसी अक्षर सीखने पर विवश हुए और हिन्दी भाषा हिन्दी न रहकर उर्दू बन गई।...हिन्दी उस भाषा का नाम रहा जो टूटीफूटी चाल पर देवनागरी अक्षरों में लिखी जाती थी। +संवत् 1902 में यद्यपि राजा शिवप्रसाद शिक्षा विभाग में नहीं आए थे पर विद्याव्यसनी होने के कारण अपनी भाषा हिन्दी की ओर उनका ध्यान था। अत: इधर उधर दूसरी भाषाओं में समाचार पत्र निकलते देख उन्होंने उक्त संवत् में उद्योग करके काशी से 'बनारस अखबार' निकलवाया। पर अखबार पढ़नेवाले पहले पहल नवशिक्षितों में मिल सकते थे जिनकी लिखने पढ़ने की भाषा उर्दू ही हो रही थी। अत: इस पत्र की भाषा भी उर्दू ही रखी गई, यद्यपि अक्षर देवनागरी के थे। यह पत्र बहुत ही घटिया कागज पर लीथो में छपता था। भाषा इसकी यद्यपि गहरी उर्दू होती थी पर हिन्दी की कुछ सूरत पैदा करने के लिए बीच में 'धार्मात्मा', 'परमेश्वर', 'दया' ऐसे कुछ शब्द भी रख दिए जाते थे। इसमें राजा साहब भी कभी कभी कुछ लिख दिया करते थे। इस पत्र की भाषा का अंदाजा नीचे उध्दृत अंश से लग सकता है , +यहाँ जो नया पाठशाला कई साल से जनाब कप्तान किट साहिब बहादुर के इहतिमाम और धार्मात्माओं के मदद से बनता है उसका हाल कई दफा जाहिर हो चुका है।...देखकर लोग उस पाठशाले के किते के मकानों की खूबियाँ अकसर बयान करते हैं और उनके बनने के खर्च की तजबीज करते हैं कि जमा से जियादा लगा होगा और हर तरह से लायक तारीफ के हैं। सो यह सब दानाई साहिब ममदूह की है। +इस भाषा को लोग हिन्दी कैसे समझ सकते थे? अत: काशी से ही एक दूसरा पत्र 'सुधाकर' बाबू तारामोहन मित्र आदि कई सज्जनों के उद्योग से संवत् 1907 में निकला। कहते हैं कि काशी के प्रसिद्ध ज्योतिषी सुधाकरजी का नामकरण इसी पत्र के नाम पर हुआ था। जिस समय उनके चाचा के हाथ में डाकिए ने यह पत्र दिया था ठीक उसी समय भीतर से उनके पास सुधाकरजी के उत्पन्न होने की खबर पहुँची थी। इस पत्र की भाषा बहुत कुछ सुधारी हुई थी तथा ठीक हिन्दी थी, पर यह पत्र कुछ दिन चला नहीं। इसी समय के लगभग अर्थात् संवत् 1909 में आगरे से मुंशी सदासुखलाल के प्रबंध और संपादन में 'बुद्धि प्रकाश' निकला जो कई वर्ष तक चलता रहा। 'बुद्धि प्रकाश' की भाषा उस समय को देखते हुए बहुत अच्छी होती थी। नमूना देखिए , +कलकत्ते के समाचार +इस पश्चिमीय देश में बहुतों को प्रगट है कि बंगाले की रीति के अनुसार उस देश के लोग आसन्नमृत्यु रोगी को गंगातट पर ले जाते हैं और यह तो नहीं करते कि उस रोगी के अच्छे होने के लिए उपाय करने में काम करें और उसे यत्न से रक्षा में रक्खें वरन् उसके विपरीत रोगी को जल के तट पर ले जाकर पानी में गोते देते हैं और 'हरी बोल', 'हरी बोल' कहकर उसका जीव लेते हैं। +स्त्रियों की शिक्षा के विषय +स्त्रियों में संतोष और नम्रता और प्रीत यह सब गुण कर्ता ने उत्पन्न किए हैं, केवल विद्या की न्यूनता है, जो यह भी हो तो स्त्रिायाँ अपने सारे ऋण से चुक सकती हैं और लड़कों को सिखानापढ़ाना जैसा उनसे बन सकता है वैसा दूसरों से नहीं। यह काम उन्हीं का है कि शिक्षा के कारण बाल्यावस्था में लड़कों को भूलचूक से बचावें और सरलसरल विद्या उन्हें सिखाएँ। +इस प्रकार हम देखते हैं कि अदालती भाषा उर्दू बनाई जाने पर भी विक्रम की बीसवीं शताब्दी के आरंभ के पहले से ही हिन्दी खड़ी बोली गद्य की परंपरा हिन्दी साहित्य में अच्छी तरह चल पड़ी, उसमें पुस्तकें छपने लगीं, अखबार निकलने लगे। पद्य की भाषा ब्रजभाषा ही बनी रही। अब अंगरेज सरकार का ध्यान देशी भाषाओं की शिक्षा की ओर गया और उसकी व्यवस्था की बात सोची जाने लगी। हिन्दी को अदालतों से निकलवाने में मुसलमानों को सफलता हो चुकी थी। अब वे इस प्रयत्न में लगे कि हिन्दी को शिक्षाक्रम में भी स्थान न मिले, उसकी पढ़ाई का भी प्रबंध न होने पाए। अत: सर्वसाधारण की शिक्षा के लिए जब जगहजगह मदरसे खुलने की बात उठी और सरकार यह विचारने लगी कि हिन्दी का पढ़ना सब विद्यार्थियों के लिए आवश्यक रखा जाय तब प्रभावशाली मुसलमानों की ओर से गहरा विरोध खड़ा किया गया। यहाँ तक कि तंग आकर सरकार को अपना विचार छोड़ना पड़ा और उसने संवत् 1905 (सन् 1848) में यह सूचना निकाली , +ऐसी भाषा का जानना सब विद्यार्थियों के लिए आवश्यक ठहराना जो मुल्क की सरकारी और दफ्तरी जबान नहीं है, हमारी राय में ठीक नहीं है। इसके सिवाय मुसलमान विद्यार्थी, जिनकी संख्या देहली कॉलेज में बड़ी है, इसे अच्छी नजर से नहीं देखेंगे। +हिन्दी के विरोध की यह चेष्टा बराबर बढ़ती गई। संवत् 1911 के पीछे जब शिक्षा का पक्का प्रबंध होने लगा तब यहाँ तक कोशिश की गई कि वर्नाक्यूलर स्कूलों में हिन्दी की शिक्षा जारी ही न होने पाए। विरोध के नेता थे सर सैयद अहमद साहब जिनका अंग्रेजों के बीच बड़ा मान था। वे हिन्दी को एक गँवारी बोली बताकर अंग्रेजों को उर्दू की ओर झुकाने की लगातार चेष्टा करते आ रहे थे। इस प्रांत के हिंदुओंमेंराजाशिवप्रसाद अंग्रेजों के उसी ढंग के कृपापात्र थे जिस ढंग से सर सैयद अहमद। अत: हिन्दी की रक्षा के लिए उन्हें खड़ा होना पड़ा और वे बराबर इस संबंध में यत्नशील रहे। इससे हिन्दी उर्दू का झगड़ा बीसों वर्ष तक , भारतेंदु के समय तक , चलता रहा। +'गार्सां द तासी' एक फरांसीसी विद्वान थे जो पेरिस में हिंदुस्तानी या उर्दू के अध्यापक थे। उन्होंने संवत् 1896 में 'हिंदुस्तानी साहित्य का इतिहास' लिखा था जिसमें उर्दू के कवियों के साथ हिन्दी के भी कुछ विद्वान कवियों का उल्लेख था। संवत् 1909 (5 दिसंबर, सन् 1852) के अपने व्याख्यान में उन्होंने उर्दू और हिन्दी दोनों भाषाओं की युगपद् सत्ता इन शब्दों में स्वीकार की थी , +उत्तर के मुसलमानों की भाषा यानी हिंदुस्तानी उर्दू पश्चिमोत्तार प्रदेश (अब संयुक्त प्रांत) की सरकारी भाषा नियत की गई है। यद्यपि हिन्दी भी उर्दू के साथसाथ उसी तरह बनी हुई है जिस तरह वह फारसी के साथ थी। बात यह है कि मुसलमान बादशाह सदा से एक हिन्दी सेक्रेटरी, जो हिन्दीनवीस कहलाता था और एक फारसी सेक्रेटरी, जिसको फारसीनवीस कहते थे, रखा करते थे, जिससे उनकी आज्ञाएँ दोनों भाषाओं में लिखी जायँ। इस प्रकार अंगरेज सरकार पश्चिमोत्तार प्रदेश में हिंदू जनता के लिए प्राय: सरकारी कानूनों का नागरी अक्षरों में हिन्दी अनुवाद भी उर्दू कानूनी पुस्तकों के साथ देती है। +तासी के व्याख्यानों से पता लगता है कि उर्दू के अदालती भाषा नियत हो जाने पर कुछ दिन सीधी भाषा और नागरी अक्षरों में भी कानूनों और सरकारी आज्ञाओं के हिन्दी अनुवाद छपते रहे। जान पड़ता है कि उर्दू के पक्षपातियों का जोर जब बढ़ा तब उनका छपना एकदम बंद हो गया। जैसा कि अभी कह आए हैं राजा शिवप्रसाद और भारतेंदु के समय तक हिन्दीउर्दू का झगड़ा चलता रहा। गार्सां द तासी ने भी फ्रांस में बैठेबैठे इस झगड़े में योग दिया। ये अरबीफारसी के अभ्यासी और हिंदुस्तानीया उर्दू के अध्यापक थे। उस समय के अधिकांश और यूरोपियनों के समानउनका भी मजहबी संस्कार प्रबल था। यहाँ जब हिन्दी-उर्दू का सवाल उठा तब सर सैयद अहमद, जो अंग्रेजों से मेलजोल रखने की विद्या में एक ही थे, हिन्दी विरोध में और बल लाने के लिए मजहबी नुसखा भी काम में लाए। अंग्रेजों को सुझाया गया कि हिन्दी हिंदुओं की जबान है, जो 'बुतपरस्त' हैं और उर्दू मुसलमानों की जिनके साथ अंग्रेजों का मजहबी रिश्ता है , दोनों 'सामी' या 'पैगंबरी' मत के माननेवाले हैं। +जिस गार्सां द तासी ने संवत् 1909 के आसपास हिन्दी और उर्दू दोनों का रहना आवश्यक समझा था और कभी कहा था कि , +यद्यपि मैं खुद उर्दू का बड़ा भारी पक्षपाती हूँ, लेकिन मेरे विचार में हिन्दी को विभाषा या बोली कहना उचित नहीं। +वही गार्सां द तासी आगे चलकर, मजहबी कट्टरपन की प्रेरणा से, सर सैयद अहमद की भरपेट तारीफ करके हिन्दी के संबंध में फरमाते हैं , +इस वक्त हिन्दी की हैसियत भी एक बोली (डायलेक्ट) की सी रह गई है, जो हर गाँव में अलग अलग ढंग से बोली जाती है। +हिन्दी उर्दू का झगड़ा उठने पर आपने महजबी रिश्ते के खयाल से उर्दू का पक्ष ग्रहण किया और कहा , +हिन्दी में हिंदू धर्म का आभास है , वह हिंदू धर्म जिसके मूल में बुतपरस्ती और उसके आनुषंगिक विधान हैं। इसके विपरीत उर्दू में इसलामी संस्कृति और आचार व्यवहार का संचय है। इस्लाम भी 'सामी' मत है और एकेश्वरवाद उसका मूल सिध्दांत है; इसीलिए इसलामी तहजीब में ईसाई या मसीही तहजीब की विशेषताएँ पाई जाती हैं। +संवत् 1927 के अपने व्याख्यान में गार्सां द तासी ने साफ खोलकर कहा , +मैं सैयद अहमद खाँ जैसे विख्यात मुसलमान विद्वान की तारीफ में और ज्यादा नहीं कहना चाहता हूँ। उर्दू भाषा और मुसलमानों के साथ मेरा जो लगाव है वह कोई छिपी हुई बात नहीं है। मैं समझता हूँ कि मुसलमान लोग कुरान को तो आसमानी किताब मानते ही हैं, इंजील की शिक्षा को भी अस्वीकार नहीं करते; पर हिंदू लोग मूर्तिपूजक होने के कारण इंजील की शिक्षा नहीं मानते। +परंपरा से चली आती हुई देश की भाषा का विरोध और उर्दू का समर्थन कैसे कैसे भावों की प्रेरणा से किया जाता रहा है, यह दिखाने के लिए इतना बहुत है। विरोध प्रबल होते हुए भी जैसे देश भर में प्रचलित अक्षरों और वर्णमाला को छोड़ना असंभव था वैसे ही परंपरा से चले आते हुए हिन्दी साहित्य को भी। अत: अदालती भाषा उर्दू होते हुए भी शिक्षा विधान में देश की असली भाषा हिन्दी को भी स्थान देना ही पड़ा। काव्यसाहित्य तो प्रचुर परिमाण में भरा पड़ा था। अत: जिस रूप में वह था उसी रूप में उसे लेना ही पड़ा। गद्य की भाषा को लेकर खींचतान आरंभ हुई। इसी खींचतान के समय में राजा लक्ष्मण और राजा शिवप्रसाद मैदान में आए। +संदर्भ +1. अपनी कहानी का आरंभ ही उन्होंने इस ढंग से किया है , जैसे लखनऊ के भाँड़ घोड़ा कुदाते हुए महिफल में आते हैं। +प्रकरण 2 +गद्य साहित्य का आविर्भाव +किस प्रकार हिन्दी के नाम से नागरी अक्षरों में उर्दू ही लिखी जाने लगी थी, इसकी चर्चा 'बनारस अखबार' के संबंध में कर आए हैं। संवत् 1913 में अर्थात् बलवे के एक वर्ष पहले राजा शिवप्रसाद शिक्षाविभाग में इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। उस समय दूसरे विभागों के समान शिक्षाविभाग में भी मुसलमानों का जोर था जिनके मन में 'भाखापन' का डर बराबर समाया रहता था। वे इस बात से डरा करते थे कि कहीं नौकरी के लिए 'भाखा' संस्कृत से लगाव रखनेवाली 'हिन्दी', न सीखनी पड़े। अत: उन्होंने पहले तो उर्दू के अतिरिक्त हिन्दी की पढ़ाई की व्यवस्था का घोर विरोध किया। उनका कहना था कि जब अदालती कामों में उर्दू ही काम में लाई जाती है तब एक और जबान का बोझ डालने से क्या लाभ? 'भाखा' में हिंदुओं की कथावार्ता आदि कहते सुन वे हिन्दी को 'गँवारी' बोली भी कहा करते थे। इस परिस्थिति में राजा शिवप्रसाद को हिन्दी की रक्षा के लिए बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा। हिन्दी का सवाल जब आता तब मुसलमान उसे 'मुश्किल जबान' कहकर विरोध करते। अत: राजा साहब के लिए उस समय यही संभव दिखाई पड़ा कि जहाँ तक हो सके ठेठ हिन्दी का आश्रय लिया जाय जिसमें कुछ फारसीअरबी के चलते शब्द भी आएँ। उस समय साहित्य के कोर्स के लिए पुस्तकें नहीं थीं। राजा साहब स्वयं तो पुस्तकें तैयार करने में लग ही गए, पं. श्रीलाल और पं. वंशीधार आदि अपने कई मित्रों को भी उन्होंने पुस्तकें लिखने मेंं लगाया। राजा साहब ने पाठयक्रम में उपयोगी कई कहानियाँ आदि लिखीं , जैसे राजा भोज का सपना, वीरसिंह का वृत्तांत, आलसियों को कोड़ा इत्यादि। संवत् 1909 और 1919 के बीच शिक्षा संबंधी अनेक पुस्तकें हिन्दी में निकलीं जिनमें से कुछ का उल्लेख किया जाता है , +पं. वंशीधार ने, जो आगरा नार्मल स्कूल के मुदर्रिस थे, हिन्दी उर्दू का एक पत्र निकाला था जिसके हिन्दी कॉलम का नाम 'भारतखंडामृत' और उर्दू कॉलम का नाम 'आबेहयात' था। उनकी लिखी पुस्तकों के नाम ये हैं , +1. पुष्पवाटिका (गुलिस्ताँ के एक अंग का अनुवाद, संवत् 1909) +2. भारतवर्षीय इतिहास (संवत् 1913) +3. जीविका परिपाटी (अर्थशास्त्र की पुस्तक, संवत् 1913) +4. जगत् वृत्तांत (संवत् 1915) +पं. श्रीलाल ने, संवत् 1909 में 'पत्रमालिका' बनाई। गार्सां द तासी ने इन्हें कई पुस्तकों का लेखक कहा है। +बिहारीलाल ने गुलिस्ताँ के आठवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद संवत् 1919 में किया। +पं. बद्रीलाल ने डॉ. बैलंटाइन के परामर्श के अनुसार संवत् 1919 में 'हितोपदेश' का अनुवाद किया जिसमें बहुत सी कथाएँ छाँट दी गई थीं। उसी वर्ष 'सिध्दांतसंग्रह' (न्यायशास्त्र) और 'उपदेश पुष्पावती' नाम की दो पुस्तकें और निकली थीं। +यहाँ यह कह देना आवश्यक है कि प्रारंभ में राजा साहब ने जो पुस्तकें लिखीं वे बहुत ही चलती सरल हिन्दी में थीं, उनमें उर्दूपन नहीं भरा था जो उनकी पिछली किताबों (इतिहासतिमिरनाशक आदि) में दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए 'राजा भोज का सपना' से कुछ अंश उध्दृत किया जाता है , +वह कौन सा मनुष्य है जिसने महाप्रतापी महाराज भोज का नाम न सुना हो। उसकी महिमा और कीर्ति तो सारे जगत् में ब्याप रही है। बड़ेबड़े महिपाल उसका नाम सुनते ही काँप उठते और बड़े बड़े भूपति उसके पाँव पर अपना सिर नवाते। सेना उसकी समुद्र के तरंगों का नमूना और खजाना उसका सोने चाँदी और रत्नों की खान से भी दूना। उसके दान ने राजा कर्ण को लोगों के जी से भुलाया और उसके न्याय ने विक्रम को भी लजाया। +अपने 'मानवधर्मसार' की भाषा उन्होंने अधिक संस्कृतगर्भित रखी है। इसका पता इस उध्दृत अंश से लगेगा , +मनुस्मृति हिंदुओं का मुख्य धर्मशास्त्र है। उसको कोई भी हिंदू अप्रामाणिक नहीं कह सकता। वेद में लिखा है कि मनु जी ने जो कुछ कहा है उसे जीव के लिए औषधिा समझना; और बृहस्पति लिखते हैं कि धर्म शास्त्राचार्यों में मनु जी सबसे प्रधान और अति मान्य हैं क्योंकि उन्होंने अपने धर्मशास्त्र में संपूर्ण वेदों का तात्पर्य लिखा है।...खेद की बात है कि हमारे देशवासी हिंदू कहलाके अपने मानवधर्मशास्त्र को न जानें और सारे कार्य्य उसके विरुद्ध करें। +'मानवधर्मसार' की भाषा राजा शिवप्रसाद की स्वीकृत भाषा नहीं है। प्रारंभकाल से ही वे ऐसी चलती ठेठ हिन्दी के पक्षपाती थे जिसमें सर्वसाधारण के बीच प्रचलित अरबीफारसी शब्दों का भी स्वच्छंद प्रयोग हो। यद्यपि अपने 'गुटका' में जो साहित्य की पाठयपुस्तक थी उन्होंने थोड़ी संस्कृत मिली ठेठ और सरल भाषा का ही आदर्श बनाए रखा, पर संवत् 1917 के पीछे उनका झुकाव उर्दू की ओर होने लगा जो बराबर बना क्या रहा, कुछ न कुछ बढ़ता ही गया। इसका कारण चाहे जो समझिए। या तो यह कहिए कि अधिकांश शिक्षित लोगों की प्रवृत्ति देखकर उन्होंने ऐसा किया अथवा अंगरेज अधिाकारियों का रुख देखकर। अधिकतर लोग शायद पिछले कारण को ही ठीक समझेंगे। जो हो, संवत् 1917 के उपरांत जो इतिहास, भूगोल आदि की पुस्तकें राजा साहब ने लिखीं उनकी भाषा बिल्कुल उर्दूपन लिए है। 'इतिहासतिमिरनाशक' भाग-2 की अंग्रेजी भूमिका में, जो संवत् 1864 की लिखी है, राजा साहब ने साफ लिखा है कि मैंने 'बैताल पचीसी' की भाषा का अनुकरण किया है , +प् उंल इम चंतकवदमक वित ेंलपदह ं मिू ूवतके ीमतम जव जीवेम ूीव ंसूंले नतहम जीम मगबसनेपवद व िच्मतेपंद ूवतकेए मअमद जीवेम ूीपबी ींअम इमबवउम वनत ीवनेमीवसक ूवतकेए तिवउ वनत भ्पदकप इववो ंदक नेम पद जीमपत ेजमंक ैंदोतपज ूवतके ुनपजम वनज व िचसंबम ंदक ेंिीपवद वत जीवेम बवनतेम मगचतमेपवदे ूीपबी बंद इम जवसमतंजमक वदसल ंउवदह ं तनेजपब चवचनसंजपवदण् +प् ींअम ंकवचजमक जव ं बमतजंपद मगजमदजए जीम संदहनंहम व िजीम ष्ठंपजंस चंबीपेपष् +लल्लूलालजी के प्रसंग में यह कहा जा चुका है कि 'बैताल पचीसी' की भाषा बिल्कुल उर्दू है। राजा साहब ने अपने इस उर्दूवाले पिछले सिध्दांत का 'भाषा का इतिहास' नामक जिस लेख में निरूपण किया है, वही उनकी उस समय की भाषा का एक खास उदाहरण है, अत: उसका कुछ अंश नीचे दिया जाता है , +हम लोगों को जहाँ तक बन पड़े चुनने में उन शब्दों को लेना चाहिए कि जो आम फहम और खासपसंद हों अर्थात् जिनको जियादा आदमी समझ सकते हैं और जो यहाँ के पढ़े लिखे, आलिमफाजिल, पंडित, विद्वान की बोलचाल में छोड़े नहीं गए हैं और जहाँ तक बन पड़े हम लोगों को हरगिज गैरमुल्क के शब्द काम में न लाने चाहिए और न संस्कृत की टकसाल कायम करके नए नए ऊपरी शब्दों के सिक्के जारी करने चाहिए; जब तक कि हम लोगों को उसके जारी करने की जरूरत न साबित हो जाय अर्थात् यह कि उस अर्थ का कोई शब्द हमारी जबान में नहीं है, या जो है अच्छा नहीं है, या कविताई की जरूरत या इल्मी जरूरत या कोई और खास जरूरत साबित हो जाय। +भाषा संबंधी जिस सिध्दांत का प्रतिपादन राजा साहब ने किया है उसके अनुकूल उनकी यह भाषा कहाँ तक ठीक है, पाठक आप समझ सकते हैं। 'आमफहम', 'खासपसंद', 'इल्मी जरूरत' जनता के बीच प्रचलित शब्द कदापि नहीं हैं। फारसी के 'आलिमफाजिल' चाहे ऐसे शब्द बोलते हों पर संस्कृत हिन्दी के 'पंडित विद्वान' तो ऐसे शब्दों से कोसों दूर हैं। किसी देश के साहित्य का संबंध उस देश की संस्कृति परंपरा से होता है। अत: साहित्य की भाषा उस संस्कृति का त्याग करके नहीं चल सकती। भाषा में जो रोचकता या शब्दों में जो सौंदर्य का भाव रहता है वह देश की प्रकृति के अनुसार होता है। इस प्रवृत्ति के निर्माण में जिस प्रकार देश के प्राकृतिक रूप रंग, आचार व्यवहार आदि का योग रहता है उसी प्रकार परंपरा से चले आते हुए साहित्य का भी। संस्कृत शब्दों में थोड़े बहुत मेल से भाषा का जो रुचिकर साहित्यिक रूप हजारों वर्षों से चला आता था उसके स्थान पर एक विदेशी रूप रंग की भाषा गले में उतारना देश की प्रकृति के विरुद्ध था। यह प्रकृतिविरुद्ध भाषा खटकी तो बहुत लोगों को होगी, पर असली हिन्दी का नमूना लेकर उस समय राजा लक्ष्मण सिंह ही आगे बढ़े। उन्होंने संवत् 1918 में 'प्रजाहितैषी' नाम का एक पत्र आगरे से निकाला और 1919 में 'अभिज्ञान शाकुंतल' का अनुवाद बहुत ही सरस और विशुद्ध हिन्दी में प्रकाशित किया। इस पुस्तक की बड़ी प्रशंसा हुई और भाषा के संबंध में मानो फिर से लोगों की ऑंख खुली। राजा साहब ने उस समय इस प्रकार की भाषा जनता के सामने रखी , +अनसूया , (हौले प्रियंवदा से) सखी! मैं भी इसी सोच विचार में हूँ। अब इससे कुछ पूछूँगी। (प्रगट) महात्मा! तुम्हारे मधुर वचनों के विश्वास में आकर मेरा जी यह पूछने को चाहता है कि तुम किस राजवंश के भूषण हो और किस देश की प्रजा को विरह में व्याकुल छोड़ यहाँ पधाारे हो? क्या कारन है जिससे तुमने अपने कोमल गात को कठिन तपोवन में आकर पीड़ित किया है? +यह भाषा ठेठ और सरल होते हुए भी साहित्य में चिरकाल से व्यवहृत संस्कृत के कुछ रसिक शब्द लिए हुए है। रघुवंश के गद्यानुवाद के प्राक्कथन में राजा लक्ष्मण सिंहजी ने भाषा के संबंध में अपना मत स्पष्ट शब्दों में प्रकट किया है। +हमारे मत में हिन्दी और उर्दू दो बोली न्यारी न्यारी हैं। हिन्दी इस देश के हिन्दू बोलते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और पारसी पढ़े हुए हिन्दुओं की बोलचाल है। हिन्दी में संस्कृत के पद बहुत आते हैं, उर्दू में अरबी पारसी के। परंतु कुछ अवश्य नहीं है कि अरबी पारसी के शब्दों के बिना हिन्दी न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिन्दी कहते हैं जिसमें अरबी पारसी के शब्द भरे हों। +अब भारत की देशभाषाओं के अध्ययन की ओर इंगलैंड के लोगों का भी ध्यान अच्छी तरह जा चुका था। उनमें जो अध्ययनशील और विवेकी थे, जो अखंड भारतीय साहित्य परंपरा और भाषा परंपरा से अभिज्ञ हो गए थे, उन पर अच्छी तरह प्रकट हो गया था कि उत्तरीय भारत की असली स्वाभाविक भाषा का स्वरूप क्या है। इन अंगरेज विद्वानों में फ्रेडरिक पिंकाट का स्मरण हिन्दी प्रेमियों को सदा बनाए रखना चाहिए। इनका जन्म संवत् 1893 में इंगलैंड में हुआ। उन्होंने प्रेस के कामों का बहुत अच्छा अनुभव प्राप्त किया और अंत में लंदन की प्रसिद्ध ऐलन ऐंड कंपनी (ॅण् भ्ण्। ससमद ंदक ब्वण् 13 ँजमतसवव चसंबमए च्ंसस डंससए ैण् ॅण्) के विशालछापेखाने के मैनेजर हुए। वहीं वे अपने जीवन के अंतिम दिनों के कुछ पहले तक शांतिपूर्वक रहकर भारतीय साहित्य और भारतीय जनहित के लिए बराबर उद्योग करते रहे। +संस्कृत की चर्चा पिंकाट साहब लड़कपन से ही सुनते आते थे, इससे उन्होंने बहुत परिश्रम के साथ उसका अध्ययन किया। इसके उपरांत उन्होंने हिन्दी और उर्दू का अभ्यास किया। इंगलैंड में बैठे ही बैठे उन्होंने इन दोनों भाषाओं पर ऐसा अधिकार प्राप्त कर लिया कि इनमें लेख और पुस्तकें लिखने और अपने प्रेस में छपाने लगे। यद्यपि उन्होंने उर्दू का भी अच्छा अभ्यास किया था, पर उन्हें इस बात का अच्छी तरह निश्चय हो गया था कि यहाँ की परंपरागत प्रकृत भाषा हिन्दी है, अत: जीवन भर ये उसी की सेवा और हितसाधना में तत्पर रहे। उनके हिन्दी लेखों, कविताओं और पुस्तकों की चर्चा आगे चलकर भारतेंदुकाल के भीतर की जाएगी। +संवत् 1947 में उन्होंने उपर्युक्त ऐलन कंपनी से संबंध तोड़ा और गिलवर्ट ऐंड रिविंगटन (ळपसइमतज ंदक त्पअपदहजवद ब्समतामदूमसस स्वदकवद) नामक विख्यात व्यवसाय कार्यालय में पूर्वीय मंत्री (व्तपमदज। कअपेमत ंदक म्गचमतज) नियुक्त हुए। उक्त कंपनी की ओर से एक व्यापार पत्र 'आईन सौदागरी' उर्दू में निकलता था जिसका संपादन पिंकाट साहब करते थे। उन्होंने उसमें कुछ पृष्ठ हिन्दी के लिए भी रखे। कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दी के लेख वे ही लिखते थे। लेखों के अतिरिक्त हिंदुस्तान में प्रकाशित होनेवाले हिन्दी समाचार पत्रों (जैसे हिंदोस्तान, आर्यदर्पण, भारतमित्र) से उद्ध रण भी उस पत्र के हिन्दी विभाग में रहते थे। +भारत का हित वे सच्चे हृदय से चाहते थे। राजा लक्ष्मणसिंह, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, कार्तिकप्रसाद खत्री इत्यादि हिन्दी लेखकों से उनका बराबर हिन्दी में पत्रव्यवहार रहता था। उस समय के प्रत्येक हिन्दी लेखक के घर में पिंकाट साहब के दो-चार पत्र मिलेंगे। हिन्दी के लेखकों और ग्रंथकारों का परिचय इंगलैंडवालों को वहाँ के पत्रों में लेख लिखकर वे बराबर दिया करते थे। संवत् 1952 में (नवंबर सन् 1895) में वे रीआ घास (जिसके रेशों से अच्छे कपड़े बनते थे) की खेती का प्रचार करने हिंदुस्तान में आए, पर साल भर से कुछ ऊपर ही यहाँ रह पाए थे कि लखनऊ में उनका देहांत (7 फरवरी, 1896) हो गया। उनका शरीर भारत की मिट्टी में ही मिला। +संवत् 1919 में जब राजा लक्ष्मणसिंह ने 'शकुंतला नाटक' लिखा तब उसकी भाषा देख वे बहुत ही प्रसन्न हुए और उसका एक बहुत सुंदर परिचय उन्होंने लिखा। बात यह थी कि यहाँ के निवासियों पर विदेशी प्रकृति और रूप-रंग की भाषा का लादा जाना वे बहुत अनुचित समझते थे। अपना यह विचार उन्होंने अपने उस अंग्रेजी लेख में स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है जो उन्होंने बाबू अयोध्याप्रसाद खत्री के 'खड़ी बोली का पद्य' की भूमिका के रूप में लिखा था। देखिए, उसमें वे क्या कहते हैं , +फारसी मिश्रित हिन्दी (अर्थात् उर्दू या हिंदुस्तानी) के अदालती भाषा बनाए जाने के कारण उसकी बड़ी उन्नति हुई। इससे साहित्य की एक नई भाषा ही खड़ी हो गई। पश्चिमोत्तार प्रदेश के निवासी, जिनकी यह भाषा कही जाती है, इसे एक विदेशी भाषा की तरह स्कूलों में सीखने के लिए विवश किये जाते हैं। +पहले कहा जा चुका है कि शिवप्रसाद ने उर्दू की ओर झुकाव हो जाने पर भी साहित्य की पाठयपुस्तक 'गुटका' में भाषा का आदर्श हिन्दी ही रखा। उक्त गुटका में उन्होंने 'राजा भोज का सपना', 'रानी केतकी की कहानी' के साथ ही राजा लक्ष्मणसिंह के 'शकुंतला नाटक' का भी बहुत सा अंश रखा। पहला गुटका शायद संवत् 1924 में प्रकाशित हुआ था। +संवत् 1919 और 1924 के बीच कई संवाद पत्र हिन्दी में निकले। 'प्रजाहितैषी' का उल्लेख हो चुका है। संवत् 1920 में 'लोकमित्र' नाम का एक पत्र ईसाईधर्म प्रचार के लिए आगरे (सिकंदरे) से निकला था जिसकी भाषा शुद्ध हिन्दी होती थी। लखनऊ से जो 'अवध अखबार' (उर्दू) निकलने लगा था उसके कुछ भाग में हिन्दी के लेख भी रहते थे। +जिस प्रकार इधर संयुक्त प्रांत में राजा शिवप्रसाद शिक्षाविभाग में रहकर हिन्दी की किसी न किसी रूप में रक्षा कर रहे थे उसी प्रकार पंजाब में बाबू नवीनचंद्र राय महाशय कर रहे थे। संवत् 1920 और 1937 के बीच नवीन बाबू ने भिन्नभिन्न विषयों की बहुत सी हिन्दी पुस्तकें तैयार कीं और दूसरों से तैयार कराईं। ये पुस्तकें बहुत दिनों तक वहाँ कोर्स में रहीं। पंजाब में स्त्री शिक्षा का प्रचार करनेवालों में ये मुख्य थे। शिक्षा प्रचार के साथ साथ समाज सुधार आदि के उद्योग में भी बराबर रहा करते थे। ईसाइयों के प्रभाव को रोकने के लिए किस प्रकार बंगाल में ब्रह्मसमाजकी स्थापना हुई थी और राजा राममोहन राय ने हिन्दी के द्वारा भी उसके प्रचार की व्यवस्था की थी, इसका उल्लेख पहले हो चुका है। नवीनचंद्र ने ब्रह्मसमाज के सिध्दांतों के प्रचार के उद्देश्य से समय समय पर कई पत्रिकाएँ भी निकालीं। संवत्1924 (मार्च, सन् 1867) में उनकी 'ज्ञानप्रदायिनी पत्रिका' निकली जिसमें शिक्षासंबंधी तथा साधारण ज्ञान विज्ञानपूर्ण लेख भी रहा करते थे। यहाँ पर यह कह देना आवश्यक है कि शिक्षा विभाग द्वारा जिस हिन्दी गद्य के प्रचार में ये सहायक हुए वह शुद्ध हिन्दी गद्य था। हिन्दी को उर्दू के झमेले में पड़ने से ये सदा बचाते रहे। +हिन्दी की रक्षा के लिए उन्हें उर्दू के पक्षपातियों से उसी प्रकार लड़ना पड़ता था जिस प्रकार यहाँ राजा शिवप्रसाद को। विद्या की उन्नति के लिए लाहौर में 'अंजुमन लाहौर' नाम की एक सभा स्थापित थी। संवत् 1923 के उसके एक अधिावेशन में किसी सैयद हादी हुसैन खाँ ने एक व्याख्यान देकर उर्दू को ही देश में प्रचलित होने के योग्य कहा, उस सभा की दूसरी बैठक में नवीनबाबू ने खाँ साहब के व्याख्यान का पूरा खंडन करते हुए कहा , +उर्दू के प्रचलित होने से देशवासियों को कोई लाभ न होगा क्योंकि वह भाषा खास मुसलमानों की है। उसमें मुसलमानों ने व्यर्थ बहुत से अरबी फारसी के शब्द भर दिए हैं। पद्य या छंदोबद्ध रचना के भी उर्दू उपयुक्त नहीं। हिंदुओं का यहर् कत्ताव्य है कि ये अपनी परंपरागत भाषा की उन्नति करते चलें। उर्दू में आशिकी कविता के अतिरिक्त किसी गंभीर विषय को व्यक्त करने की शक्ति ही नहीं है। +नवीन बाबू के इस व्याख्यान की खबर पाकर इसलामी तहबीज के पुराने हामी, हिन्दी के पक्के दुश्मन गार्सां द तासी फ्रांस में बैठे बैठे बहुत झल्लाए और अपने एक प्रवचन में उन्होंने बड़े जोश के साथ हिन्दी का विरोध और उर्दू का पक्षमंडन किया तथा नवीन बाबू को कट्टर हिंदू कहा। अब यह फरांसीसी हिन्दी से इतना चिढ़ने लगा था कि उसके मूल पर ही उसने कुठार चलाना चाहा और बीम्स साहब (डण् ठमंउमे) का हवाला देते हुए कह डाला कि हिन्दी तो एक पुरानी भाषा थी जो संस्कृत से बहुत पहले प्रचलित थी, आर्यों ने आकर उसका नाश किया, और जो बचे खुचे शब्द रह गए उनकी व्युत्पत्तिा भी संस्कृत से सिद्ध करने का रास्ता निकाला। इसी प्रकार जब जहाँ कहीं हिन्दी का नाम लिया जाता तब तासी बड़े बुरे ढंग से विरोध में कुछ न कुछ इस तरह की बातें कहता। +सर सैयद अहमद का अंगरेज अधिकारियों पर कितना प्रभाव था, यह पहले कहा जा चुका है। संवत् 1925 में इस प्रांत के शिक्षा विभाग के अधयक्ष हैवेल ;डण् ैण् भ्ंमनससद्ध साहब ने अपनी यह राय जाहिर की कि , +यह अधिक अच्छा होता यदि हिंदू बच्चों को उर्दू सिखाई जाती न कि एक ऐसी 'बोली' में विचार प्रकट करने का अभ्यास कराया जाता जिसे अंत में एक दिन उर्दू के सामने सिर झुकाना पड़ेगा। +इस राय को गार्सां द तासी ने बड़ी खुशी के साथ अपने प्रवचन में शामिल किया। इसी प्रकार इलाहाबाद इंस्टीटयूट के एक अधिावेशन में (संवत् 1925) जब यह विवाद हुआ था कि 'देसी जबान' हिन्दी को मानें या उर्दू को, तब हिन्दी के पक्ष में कई वक्ता उठकर बोले थे। उन्होंने कहा था कि अदालतों में उर्दू जारी होने का यह फल हुआ है कि अधिकांश जनता , विशेषत: गाँवों की , जो उर्दू से सर्वथा अपरिचित है, बहुत कष्ट उठाती है, इससे हिन्दी का जारी होना बहुत आवश्यक है। बोलने वालों में से किसी किसी ने कहा कि केवल अक्षर नागरी के रहें और कुछ लोगों ने कहा कि भाषा भी बदलकर सीधी सादी की जाय। इस पर भी गार्सां द तासी ने हिन्दी के पक्ष में बोलने वालों का उपहास किया था। +उसी काल में इंडियन डेली न्यूज के एक लेख में हिन्दी प्रचलित किए जाने की आवश्यकता दिखाई गई थी। उसका भी जवाब देने तासी साहब खड़े हुए थे। 'अवध अखबार' में जब एक बार हिन्दी के पक्ष में लेख छपा था तब भी उन्होंने उसके संपादक की राय का जिक्र करते हुए हिन्दी को एक 'भद्दी बोली' कहा था जिसके अक्षर भी देखने में सुडौल नहीं लगते। +शिक्षा के आंदोलन के साथ ही साथ ईसाई मत का प्रचार रोकने के लिए मतमतांतर संबंधी आंदोलन देश के पश्चिमी भागों में भी चल पड़े। पैगंबरी एकेश्वरवाद की ओर नवशिक्षित लोगों को खिंचते देख स्वामी दयानंद सरस्वती वैदिक एकेश्वरवाद लेकर खड़े हुए और संवत् 1920 से उन्होंने अनेक नगरों में घूम घूम कर व्याख्यान देना आरंभ किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये व्याख्यान देश में बहुत दूरतक प्रचलित साधु हिन्दी भाषा में ही होते थे। स्वामी जी ने अपना 'सत्यार्थप्रकाश' तो हिन्दी या आर्यभाषा में प्रकाशित ही किया, वेदों के भाष्य भी संस्कृत और हिन्दी दोनों में किए। स्वामी जी के अनुयायी हिन्दी को 'आर्यभाषा' कहते थे। स्वामी जी ने संवत् 1922 में 'आर्यसमाज' की स्थापना की और सब आर्यसमाजियों के लिए हिन्दी या आर्यभाषा का पढ़ना आवश्यक ठहराया। संयुक्त प्रांत के पश्चिमी जिलों और पंजाब में आर्य समाज के प्रभाव से हिन्दी गद्य का प्रचार बड़ी तेजी से हुआ। पंजाबी बोली में लिखित साहित्य न होने से और मुसलमानों के बहुत अधिक संपर्क में पंजाबवालों की लिखने पढ़ने की भाषा उर्दू हो रही थी। आज जो पंजाब में हिन्दी की पूरी चर्चा सुनाई देती है इन्हीं की बदौलत है। +संवत् 1920 के लगभग ही विलक्षण प्रतिभाशाली विद्वान श्रध्दाराम फुल्लौरी के व्याख्यानों और कथाओं की धूम पंजाब में आरंभ हुई। जालंधार के पादरी गोकुलनाथ के व्याख्यानों के प्रभाव से कपूरथला नरेश महाराज रणबीरसिंह ईसाई मत की ओर झुक रहे थे। पं. श्रध्दाराम जी तुरंत संवत् 1920 में कपूरथले पहुँचे और उन्होंने महाराज के सब संशयों का समाधान करके प्राचीन वर्णाश्रम धर्म का ऐसा सुंदर निरूपण किया कि सब लोग मुग्धा हो गए। पंजाब में सब छोटे बड़े स्थानों में घूमकर पं. श्रध्दाराम जी उपदेश और वक्तृताएँ देते तथा रामायण, महाभारत आदि की कथाएँ सुनाते। उनकी कथाएँ सुनने के लिए दूर दूर से लोग आते और सहòों आदमियों की भीड़ लगती थी। उनकी वाणी में अद्भुत आकर्षण था और उनकी भाषा बहुत जोरदार होती थी। स्थान स्थान पर उन्होंने धर्मसभाएँ स्थापित कीं और उपदेशक तैयार किए। उन्होंने पंजाबी और उर्दू में भी कुछ पुस्तकें लिखी हैं। पर अपनी मुख्य पुस्तकें हिन्दी में ही लिखी हैं। अपना सिध्दांतग्रंथ 'सत्यामृतप्रवाह' उन्होंने बड़ी प्रौढ़ भाषा में लिखा है। वे बड़े ही स्वतंत्र विचार के मनुष्य थे और वेदशास्त्र के यथार्थ अभिप्राय को किसी उद्देश्य से छिपाना अनुचित समझते थे। इसी से स्वामी दयानंद की बहुत सी बातों का विरोध वे बराबर करते रहे। यद्यपि वे बहुत सी बातें कह और लिख जाते थे जो कट्टर अंधविश्वासियों को खटक जाती थीं और कुछ लोग इन्हें नास्तिक तक कह देते थे पर जब तक वे जीवित रहे सारे पंजाब के हिंदू उन्हें धर्म का स्तंभ समझते रहे। +पं. श्रध्दारामजी कुछ पद्यरचना भी करते थे। हिन्दी गद्य में तो उन्होंने बहुत कुछ लिखा और वे हिन्दी भाषा के प्रचार में बराबर लगे रहे। संवत् 1924 में उन्होंने 'आत्मचिकित्सा' नाम की एक अध्यात्मसंबंधी पुस्तक लिखी जिसे संवत् 1928 में हिन्दी में अनुवाद करके छपाया। इसके पीछे 'तत्वदीपक', 'धर्मरक्षा', 'उपदेश संग्रह', (व्याख्यानों का संग्रह), 'शतोपदेश' (दोहे) इत्यादि धर्मसंबंधी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने अपना एक बड़ा जीवनचरित (1400 पृष्ठों के लगभग) लिखा था जो कहीं खो गया। 'भाग्यवती' नाम का एक सामाजिक उपन्यास भी संवत् 1934 में उन्होंने लिखा, जिसकी बड़ी प्रशंसा हुई। +अपने समय के वे सच्चे हितैषी और सिद्ध हस्त लेखक थे। संवत् 1938 में उनकी मृत्यु हुई। जिस दिन उनका देहांत हुआ उस दिन उनके मुँह से सहसा निकला कि 'भारत में भाषा के लेखक दो हैं , एक काशी में; दूसरा पंजाब में। परंतु आज एक ही रह जाएगा।' कहने की आवश्यकता नहीं कि काशी के लेखक से अभिप्राय हरिश्चंद्र से था। +राजा शिवप्रसाद 'आमफहम' और 'खासपसंद' भाषा का उपदेश ही देते रहे, उधर हिन्दी अपना रूप आप स्थिर कर चली। इस बात में धार्मिक और सामाजिक आंदोलनों ने भी बहुत कुछ सहायता पहुँचाई। हिन्दी गद्य की भाषा किस दिशा की ओर स्वभावत: जाना चाहती है, इसकी सूचना तो काल अच्छी तरह दे रहा था। सारी भारतीय भाषाओं का साहित्य चिरकाल से संस्कृत की परिचित और भावपूर्ण पदावली का आश्रय लेता चला आ रहा था। अत: गद्य के नवीन विकास में उस पदावली का त्याग और किसी विदेशी पदावली का सहसा ग्रहण कैसे हो सकता था? जब कि बँग्ला, मराठी आदि अन्य देशी भाषाओं का गद्य परंपरागत संस्कृत पदावली का आश्रय लेता हुआ चल पड़ा था तब हिन्दी गद्य उर्दू के झमेले में पड़कर कब तक रुका रहता? सामान्य संबंधसूत्र को त्यागकर दूसरी देशी भाषाओं से अपना नाता हिन्दी कैसे तोड़ सकती थी? उनकी सगी बहन होकर एक अजनबी के रूप में उनके साथ वह कैसे चल सकती थी जबकि यूनानी और लैटिन के शब्द यूरोप के भिन्न भिन्न मूलों से निकली हुई देशी भाषाओं के बीच एक प्रकार का साहित्यिक संबंध बनाए हुए हैं तब एक ही मूल से निकली हुई आर्य भाषाओं के बीच उस मूल भाषा के साहित्यिक शब्दों की परंपरा यदि संबंधसूत्र के रूप में चली आ रही है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? +कुछ अंगरेज विद्वान संस्कृतगर्भित हिन्दी की हँसी उड़ाने के लिए किसी अंग्रेजी वाक्य में उसी भाषा में लैटिन के शब्द भरकर पेश करते हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि अंग्रेजी का लैटिन के साथ मूल संबंध नहीं है, पर हिन्दी, बँग्ला, मराठी, गुजराती आदि भाषाएँ संस्कृत के ही कुटुंब की हैं , उसी के प्राकृत रूपों से निकली हैं। इन आर्यभाषाओं का संस्कृत के साथ बहुत घनिष्ठ संबंध है। इन भाषाओं के साहित्य की परंपरा को भी संस्कृत साहित्य की परंपरा का विस्तार कह सकते हैं। देशभाषा के साहित्य को उत्तराधिकार में जिस प्रकार संस्कृत साहित्य के कुछ संचित शब्द मिले हैं उसी प्रकार विचार और भावनाएँ भी मिली हैं। विचार और वाणी की इस धारा से हिन्दी अपने को विच्छिन्न कैसे कर सकती थी? +राजा लक्ष्मणसिंह के समय में ही हिन्दी गद्य की भाषा अपने भावी रूप का आभास दे चुकी थी। अब आवश्यकता ऐसे शक्तिसम्पन्न लेखकों की थी जो अपनी प्रतिभा और उद्भावना के बल से उसे सुव्यवस्थित और परिमार्जित करते और उसमें ऐसे साहित्य का विधान करते जो शिक्षित जनता की रुचि के अनुकूल होता। ठीक इसी परिस्थिति में भारतेंदु का उदय हुआ। +आधुनिक गद्य साहित्य परंपरा का प्रवर्तन प्रथम उत्थान +प्रकरण 1 +सामान्य परिचय +भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रभाव भाषा और साहित्य दोनों पर बड़ा गहरा पड़ा। उन्होंने जिस प्रकार गद्य की भाषा को परिमार्जित करके उसे बहुत ही चलता, मधुर और स्वच्छ रूप दिया, उसी प्रकार हिन्दी साहित्य को भी नए मार्ग पर लाकर खड़ा कर दिया। उनके भाषासंस्कार की महत्ता को सब लोगों ने मुक्तकंठ से स्वीकार किया और वे वर्तमान हिन्दी गद्य के प्रवर्तक माने गए। मुंशी सदासुख की भाषा साधु होते हुए भी पंडिताऊपन लिए थी, लल्लूलाल में ब्रजभाषापन और सदल मिश्र में पूरबीपन था। राजा शिवप्रसाद का उर्दूपन शब्दों तक ही परिमित न था वाक्यविन्यास तक में घुसा था, राजा लक्ष्मणसिंह की भाषा विशुद्ध और मधुर तो अवश्य थी, पर आगरे की बोलचाल का पुट उसमें कम न था। भाषा का निखरा हुआ सामान्य रूप भारतेंदु की कला के साथ ही प्रकट हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने पद्य की ब्रजभाषा का भी बहुत कुछ संस्कार किया। पुराने पड़े हुए शब्दों को हटाकर काव्यभाषा में भी वे बहुत कुछ चलतापन और सफाई लाए। +आठ मास बीते, जजमान! अब तौ करौ दच्छिना दान + +द्विवेदीमंडल के बाहर की काव्यभूमि: +द्विवेदीजी के प्रभाव से हिन्दी काव्य ने जो स्वरूप प्राप्त किया उसके अतिरिक्त और अनेक रूपों में भी भिन्न भिन्न कवियों की काव्यधारा चलती रही। कई एक बहुत अच्छे कवि अपने अपने ढंग पर सरस और प्रभावपूर्ण कविता करते रहे जिनमें मुख्य राय देवी प्रसाद 'पूर्ण', पं. नाथूरामशंकर शर्मा, पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही', पं. सत्यनारायण कविरत्न, लाला भगवानदीन, पं. रामनरेश त्रिपाठी, पं. रूपनारायण पांडेयहैं। +इन कवियों में से अधिकांश तो दोरंगी कवि थे, जो ब्रजभाषा में तो श्रृंगार, वीर, भक्ति आदि की पुरानी परिपाटी की कविता कवित्त-सवैयों या गेय पदों में करते आते थे और खड़ी बोली में नूतन विषयों को लेकर चलते थे। बात यह थी कि खड़ी बोली का प्रचार बराबर बढ़ता दिखाई पड़ता था और काव्य के प्रवाह के लिए कुछ नई नई भूमियाँ भी दिखाई पड़ती थीं। देशदशा, समाजदशा, स्वदेशप्रेम, आचरणसंबंधी उपदेश आदि ही तक नई धारा की कविता न रहकर जीवन के कुछ और पक्षों की ओर भी बढ़ी, पर गहराई के साथ नहीं। त्याग, वीरता, उदारता, सहिष्णुता इत्यादि के अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंग पद्यबद्ध हुए जिनके बीच बीच में जन्मभूमि प्रेम, स्वजाति गौरव आत्मसम्मान की व्यंजना करने वाले जोशीले भाषण रखे गए। जीवन की गूढ़, मार्मिक या रमणीय प्रवृत्ति नहीं दिखाई पड़ी। पं. रामनरेश त्रिपाठी ने कुछ ध्यान कल्पित प्रबंध की ओर दिया। +दार्शनिकता का पुट राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' की रचनाओं में कहीं कहीं दिखाई पड़ता है, पर किसी दार्शनिक तथ्य को हृदयग्राह्य रसात्मक रूप देने का प्रयास उनमें भी नहीं पाया जाता। उनके 'वसंतवियोग' में भारतदशासूचक प्राकृतिक विभूति के नाना चित्रों के बीच बीच में कुछ दार्शनिक तत्व रखे गए हैं और अंत में आकाशवाणी द्वारा भारत के कल्याण के लिए कर्मयोग और भक्ति का उपदेश दिलाया गया है। प्रकृतिवर्णन की ओर हमारा काव्य कुछ अधिक अग्रसर हुआ पर प्राय: वहीं तक रहा जहाँ तक उसका संबंध मनुष्य के सुख सौंदर्य की भावना से है। प्रकृति के जिन सामान्य रूपों के बीच नरजीवन का विकास हुआ है, जिन रूपों से हम बराबर घिरे रहते आए हैं उनके प्रति वह राग या ममता न व्यक्त हुई जो चिर सहचरों के प्रति स्वभावत: हुआ करती है। प्रकृति के प्राय: वे ही चटकीले भड़कीले रूप लिए गए जो सजावट के काम के समझे गए। सारांश यह कि जगत और जीवन के नानारूपों और तथ्यों के बीच हमारे हृदय का प्रसार करने में वाणी वैसी तत्पर न दिखाई पड़ी। +8. राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' , पूर्णजी का उल्लेख 'पुरानी धारा' के भीतर हो चुका है। वे ब्रजभाषा काव्य परंपरा के बहुत ही प्रौढ़ कवि थे और जब तक जीवित रहे, अपने 'रसिक समाज' द्वारा उस परंपरा की पूरी चहल पहल बनाए रहे। उक्त समाज की ओर से 'रसिक वाटिका' नाम की एक पत्रिका निकली थी जिसमें उस समय के प्राय: सब व्र्रजभाषा कवियों की सुंदर रचनाएँ छपती थीं। जब संवत् 1977 में पूर्णजी का देहावसान हुआ उस समय उक्त समाज निरवलंब सा हो गया, और , +रसिक समाजी ह्वै चकोर चहुँ ओर हेरैं, +कविता को पूरन कलानिधि कितै गयो। (रतनेश) +पूर्णजी सनातनधर्म के बड़े उत्साही अनुयायी तथा अध्ययनशील व्यक्ति थे। उपनिषद् और वेदांत में उनकी अच्छी गति थी। सभा समाजों के प्रति उनका बहुत उत्साह रहता था और उसके अधिावेशनों में वे अवश्य कोई न कोई कविता पढ़ते थे। देश में चलनेवाले आंदोलनों (जैसे , स्वदेशी) को भी उनकी वाणी प्रतिध्वनित करती थी। भारतेंदु, प्रेमघन आदि प्रथम उत्थान के कवियों के समान पूर्णजी में भी देशभक्ति और राजभक्ति का समन्वय पाया जाता है। बात यह है कि उस समय तक देश के राजनीतिक प्रयत्नों में अवरोधा या विरोध का बल नहीं आया था और लोगों की पूरी तरह धाड़क नहीं खुली थी। अत: उनकी रचना में यदि एक ओर 'स्वदेशी' पर देशभक्तिपूर्ण पद्य मिलें और दूसरी ओर सन् 1911 वाले दिल्ली दरबार के ठाटबाट का वर्णन, तो आश्चर्य न करना चाहिए। +प्रथम उत्थान के कवियों के समान पूर्णजी पहले नूतन विषयाेंे की कविता भी ब्रजभाषा में करते थे, जैसे , +विगत आलस की रजनी भई। रुचिर उद्यम की द्युति छै गई +उदित सूरज है नव भाग को। अरुन रंग भये अनुराग को +तजि बिछौनन को अब भागिए। भरत खंड प्रजागण जागिए +इस प्रकार 'संग्रामनिंदा' आदि अनेक विषयों पर उनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में ही हैं। पीछे खड़ी बोली की कविता का प्रचार बढ़ने पर बहुत सी रचना उन्होंने खड़ी बोली में भी की, जैसे , 'अमलतास', 'वसंतवियोग', 'स्वदेशी कुंडल', 'नए सन् (1910) का स्वागत', 'नवीन संवत्सर (1967) का स्वागत' इत्यादि। 'स्वदेशी', 'देशोध्दार' आदि पर उनकी अधिकांश रचनाएँ इतिवृत्तात्मक पद्यों के रूप में हैं। 'वसंतवियोग' बहुत बड़ी कविता है जिसमें कल्पना अधिक सचेष्ट मिलती है। उसमें भारतभूमि की कल्पना एक उद्यान के रूप में की गई है। प्राचीनकाल में यह उद्यान सत्वगुणप्रधान तथा प्रकृति की सारी विभूतियों से सम्पन्न था और इसके माली देवतुल्य थे। पीछे मालियों के प्रमाद और अनैक्य से उद्यान उजड़ने लगता है। यद्यपि कुछ यशस्वी महापुरुष (विक्रमादित्य ऐसे) कुछ काल के लिए उसे सँभालते दिखाई पड़ते हैं, पर उसकी दशा गिरती ही जाती है। अंत में उसके माली साधना और तपस्या के लिए कैलास मानसरोवर की ओर जाते हैं जहाँ आकाशवाणी होती है कि विक्रम की बीसवीं शताब्दी में जब 'पच्छिमी शासन' होगा तब उन्नति का आयोजन होगा। 'अमलतास' नाम की छोटी सी कविता में कवि ने अपने प्रकृति निरीक्षण का भी परिचय दिया है। ग्रीष्म में जब वनस्थली के सारे पेड़ पौधो झुलसे से रहते हैं और कहीं प्रफुल्लता नहीं दिखाई देती है, उस समय अमलतास चारों ओर फूलकर अपनी पीतप्रभा फैला देता है। इससे कवि भक्ति के महत्व का संकेत ग्रहण करता है , +देख तव वैभव, द्रुमकुल संत! बिचारा उसका सुखद निदान। +करे जो विषम काल को मंद, गया उस सामग्री पर ध्यान +रँगा निज प्रभु ऋतुपति के रंग, द्रुमों में अमलतास तूभक्त। +इसी कारण निदाघ प्रतिकूल, दहन में तेरे रहा अशक्त +पूर्णजी की कविताओं का संग्रह 'पूर्ण संग्रह' के नाम से प्रकाशित हो चुकाहै। उनकी खड़ी बोली की रचना के कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं , +नंदन वन का सुना नहीं है किसने नाम। +मिलता है जिसमें देवों को भी आराम +उसके भी वासी सुखरासी, उग्र हुआ यदि उनका भाग। +आकर के इस कुसुमाकर में, करते हैं नंदन रुचि त्याग +है उत्तर में कोट शैल सम तुंग विशाल। +विमल सघन हिमवलित ललित धावलित सब काल +हे नरदक्षिण! इसके दक्षिण-पश्चिम, पूर्व। +है अपार जल से परिपूरित कोश अपूर्व +पवन देवता गगन पंथ से सुघन घटों में लाकरनीर। +सींचा करते हैं यह उपवन करके सदा कृपागंभीर +कर देते हैं बाहर भुनगों का परिवार। +तब करते हैं कीश उदुंबर का आहार +पक्षीगृह विचार तरुगण को नहीं हिलाते हैं गजवृंद। +हंस भृंग हिंसा के भय से छाते नहीं बंद अरविंद +धोनुवत्स जब छक जाते हैं पीकर क्षीर, +तब कुछ दुहते हैं गौओं को चतुर अहीर। +लेते हैं हम मधुकोशों से मधु जो गिरे आप ही आप। +मक्खी तक निदान इस थल की पाती नहीं कभी संताप +सरकारी कानून का रखकर पूरा ध्यान। +कर सकते हो देश का सभी तरह कल्यान +सभी तरह कल्यान देश का कर सकते हो। +करके कुछ उद्योग सोग सब हर सकते हो +जो हो तुममें जान, आपदा भारी सारी। +हो सकती है दूर, नहीं बाधा सरकारी +पं. नाथूराम शंकर शर्मा. +इनका जन्म संवत् 1916 में और मृत्यु 1989 में हुई। वे अपना उपनाम 'शंकर' रखते थे और पद्यरचना में अत्यंत सिद्ध हस्त थे। पं. प्रतापनारायण मिश्र के वे साथियों में थे और उस समय के कवि समाजों में बराबर कविता पढ़ा करते थे। समस्यापूर्ति वे बड़ी ही सटीक और सुंदर करते थे जिनसे उनका चारों ओर पदक, पगड़ी, दुशाले आदि से सत्कार होता था। 'कवि व चित्रकार', 'काव्यसुधाकर', 'रसिक मित्र' आदि पत्रों में उनकी अनूठी पूर्तियाँ और ब्रजभाषा की कविताएँ बराबर निकला करती थीं। छंदों के सुंदर नपे तुले विधान के साथ ही उनकी उद्भावनाएँ भी बड़ी अनूठी होती थीं। वियोग का यह वर्णन पढ़िए , +शंकर नदी नद नदीसन के नीरन की +भाप बन अंबर तें ऊँची चढ़ जाएगी। +दोनों ध्रुव छोरन लौं पल में पिघल कर +घूम घूम धारनी धुरी सी बढ़ जाएगी +झारेंगे अंगारे ये तरनि तारे तारापति +जारैंगे खमंडल में आग मढ़ जाएगी। +काहू बिधि विधि की बनावट बचैगी नाहिं +जो पै वा वियोगिनी की आह कढ़ जाएगी +पीछे खड़ी बोली का प्रचार होने पर वे उसमें बहुत अच्छी रचना करने लगे। उनकी पदावली कुछ उद्दंडता लिए होती थी। इसका कारण यह है कि उनका संबंध आर्यसमाज से रहा जिसमें अंधाविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के उग्र विरोध की प्रवृत्ति बहुत दिनों तक जागृत रही। उसकी अंतर्वृत्तिा का आभास उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ता है। 'गर्भरंडा रहस्य' नामक एक बड़ा प्रबंधकाव्य उन्होंने विधवाओं की बुरी परिस्थिति और देवमंदिरों के अनाचार आदि दिखाने के उद्देश्य से लिखा था। उसका एक पद्य देखिए , +फैल गया हुड़दंग होलिका की हलचल में। +फूल फूल कर फाग फला महिला मंडलमें +जननी भी तज लाज बनी ब्रजमक्खी सबकी। +पर मैं पिंड छुड़ाय जवनिका में जा दबकी +फबतियाँ और फटकार इनकी कविताओं की एक विशेषता है। फैशन वालों पर कही हुई 'ईश गिरिजा को छोड़ि ईशु गिरिजा में जाय' वाली प्रसिद्ध फबती इन्हीं की है। पर जहाँ इनकी चित्तवृत्ति दूसरे प्रकार की रही है, वहाँ की उक्तियाँ बड़ी मनोहर भाषा में है। यह कवित्त ही लीजिए , +तेज न रहेगा तेजधाारियों का नाम को भी, +मंगल मयंक मंद मंद पड़ जायँगे। +मीन बिन मारे मर जायँगे सरोवर में, +डूब डूब 'शंकर' सरोज सड़ जायँगे +चौंक चौंक चारों ओर चौकड़ी भरेंगे मृग, +खंजन खिलाड़ियों के पंख झड़ जायँगे। +बोलो इन अंखियों की होड़ करने को अब, +विस्व से अड़ीले उपमान अड़ जायँगे +पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'. +ये हिन्दी के एक बड़े ही भावुक और सरसहृदय कवि हैं। ये पुरानी और नई दोनों चाल की कविताएँ लिखते हैं। इनकी बहुत सी कविताएँ 'त्रिाशूल' के नाम से निकली हैं। उर्दू कविता भी इनकी बहुत ही अच्छी होती है। इनकी पुरानी ढंग की कविताएँ 'रसिकमित्र', 'काव्यसुधानिधि' और 'साहित्यसरोवर' आदि में बराबर निकलती रहीं। पीछे इनकी प्रवृत्ति खड़ी बोली की ओर हुई। इनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं , 'प्रेमपचीसी', 'कुसुमांजलि', 'कृषकक्रंदन'। इस मैदान में भी इन्होंने अच्छी सफलता पाई। एक पद्य नीचे दिया जाता है , +तू है गगन विस्तीर्ण तो मैं एक तारा क्षुद्र हूँ। +तू है महासागर अगम, मैं एक धारा क्षुद्र हूँ +तू है महानद तुल्य तो मैं एक बूँद समान हूँ। +तू है मनोहर गीत तो मैं एक उसकी तान हूँ +पं. रामनरेश त्रिपाठी. +त्रिपाठीजी का नाम भी खड़ी बोली के कवियों में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। भाषा की सफाई और कविता के प्रसादगुण पर इनका बहुत जोर रहता है। काव्यभाषा में लाघव के लिए कुछ कारक चिद्दों और संयुक्त क्रियाओं के कुछ अंतिम अवयवों को छोड़ना भी (जैसे 'कर रहा है' के स्थान पर 'कर रहा' या करते हुए' के स्थान पर 'करते') ये ठीक नहीं समझते। काव्यक्षेत्र में जिस स्वाभाविक स्वच्छंदता (रोमांटिसिज्म) का आभास पं. श्रीधार पाठक ने दिया था उसके पथ पर चलनेवाले द्वितीय उत्थान में त्रिपाठीजी ही दिखाई पड़े। 'मिलन', 'पथिक' और 'स्वप्न' नामक इनके तीनों खंडकाव्यों में इनकी कल्पना ऐसे मर्मपथ पर चलती है जिसपर मनुष्य मात्र का हृदय स्वभावत: ढलता आया है। ऐतिहासिक या पौराणिक कथाओं के भीतर न बँधाकर अपनी भावना के अनुकूल स्वच्छंद संचरण के लिए कवि ने नूतन कथाओं की उद्भावना की है। कल्पित आख्यानों की ओर यह विशेष झुकाव स्वच्छंद मार्ग का अभिलाष सूचित करता है। इन प्रबंधों में नरजीवन जिन रूपों में ढालकर सामने लाया गया है, ये मनुष्यमात्र का मर्मस्पर्श करने वाले हैं तथा प्रकृति के स्वच्छंद और रमणीय प्रसार के बीच अवस्थित होने के कारण शेष सृष्टि से विच्छिन्न नहीं प्रतीत होते। +स्वदेशभक्ति की जो भावना भारतेंदु के समय से चली आती थी उसे सुंदर कल्पना द्वारा रमणीय और आकर्षक रूप त्रिपाठीजी ने ही प्रदान किया। त्रिपाठीजी के उपर्युक्त तीनों काव्य देशभक्ति के भाव से प्रेरित हैं। देशभक्ति का यह भाव उनके मुख्य पात्रों को जीवन के कई क्षेत्रों में सौंदर्य प्रदान करता दिखाई पड़ता है , कर्म के क्षेत्र में भी, प्रेम के क्षेत्र में भी। ये पात्र कई तरफ से देखने में सुंदर लगते हैं। देशभक्ति को रसात्मक रूप त्रिपाठीजी द्वारा प्राप्त हुआ, इसमें संदेह नहीं। +त्रिपाठीजी ने भारत के प्राय: सब भागों में भ्रमण किया है, इससे इनके प्रकृतिवर्णन में स्थानगत विशेषताएँ अच्छी तरह आ सकी हैं। इनके 'पथिक' में दक्षिण भारत के रम्य दृश्यों का बहुत विस्तृत समावेश है। इसी प्रकार इनके 'स्वप्न' में उत्ताराखंडऔर कश्मीर की सुषमा सामने आती है। प्रकृति के किसी खंड के संश्लिष्ट चित्रण की प्रतिभा इनमें अच्छी है। सुंदर आलंकारिक साम्य खड़ा करने में भी इनकी कल्पना प्रवृत्त होती है पर झूठे आरोपों द्वारा अपनी उड़ान दिखाने या वैचित्रय खड़ा करने के लिए नहीं। +'स्वप्न' नामक खंड काव्य तृतीय उत्थान काल के भीतर लिखा गया है जबकि 'छायावाद' नाम की शाखा चल चुकी थी, इससे उस शाखा का भी रंग कहीं कहीं इसके भीतर झलक मारता है, जैसे , +प्रिय की सुधिसी ये सरिताएँ, ये कानन कांतार सुसज्जित। +मैं तो नहीं किंतु है मेरा हृदय किसी प्रियतम से परिचित। +जिसके प्रेमपत्र आते हैं प्राय: सुखसंवाद सन्निहित +अत: इस काव्य को लेकर देखने से थोड़ी थोड़ी इनकी सब प्रवृत्तियाँ झलक जाती हैं। इसके आरंभ में हम अपनी प्रिया में अनुरक्त वसंत नामक एक सुंदर और विचारशील युवक को जीवन की गंभीर वितर्कदशा में पाते हैं। एक ओर उसे प्रकृति की प्रमोदमयी सुषमाओं के बीच प्रियतमा के साहचर्य का प्रेमसुख लीन रखना चाहता है, दूसरी ओर समाज के असंख्य प्राणियों का कष्ट क्रंदन उसे उध्दार के लिए बुलाता जान पड़ता है। दोनों पक्षों के बहुत से सजीव चित्र बारी बारी से बड़ी दूर तक चलते हैं। फिर उस युवक के मन में जगत् और जीवन के संबंध में गंभीर जिज्ञासाएँ उठती हैं। जगत् के इस नाना रूपों का उद्गम कहाँ है? सृष्टि के इन व्यापारों का अंतिम लक्ष्य क्या है? यह जीवन हमें क्यों दिया गया है? इसी प्रकार के प्रश्न उसे व्याकुल करते रहते हैं और कभी कभी वह सोचता है , +इसी तरह की अमित कल्पना के प्रवाह में मैं निशिवासर, +बहता रहता हूँ विमोहवश; नहीं पहुँचता कहीं तीर पर। +रात दिवस ही बूँदों द्वारा तन घट से परिमित यौवन जल; +है निकला जा रहा निरंतर, यह रुक सकता नहीं एक पल +कभी कभी उसकी वृत्ति रहस्योन्मुख होती है, वह सारा खेल खड़ा करने वाले उस छिपे हुए प्रियतम का आकर्षण अनुभव करता है और सोचता है कि मैं उसके अन्वेषण में क्यों न चल पड़न्नँ। +उसकी प्रिया सुमना उसे दिन रात इस प्रकार भावनाओं में ही मग्न और अव्यवस्थित देखकर कर्म मार्ग पर स्थिर हो जाने का उपदेश देती है , +सेवा है महिमा मनुष्य की, न कि अति उच्च विचार द्रव्य बल। +मूल हेतु रवि के गौरव का है प्रकाश ही न कि उच्च स्थल +मन की अमित तरंगों में तुम खोते हो इस जीवन का सुख +इसके उपरांत देश पर शत्रु चढ़ाई करता है और राजा उसे रोकने में असमर्थ होकर घोषणा करता है कि प्रजा अपनी रक्षा कर ले। इसपर देश के झुंड के झुंड युवक निकल पड़ते हैं और उनकी पत्नियाँ और माताएँ गर्व से फूली नहीं समाती हैं। देश की इस दशा में वसंत को घर में पड़ा देख उसकी पत्नी सुमना को अत्यंत लज्जा होती है और वह अपने पति से स्वदेश के इस संकट के समय शस्त्रा ग्रहण करने को कहती है। जब वह देखती है कि उसका पति उसी के प्रेम के कारण नहीं उठता है तब वह अपने को ही प्रिय केर् कत्ताव्यपथ का बाधक समझती है। वह सुनती है कि एक रुग्णा वृध्दा यह देखकर कि उसका पुत्र उसी की सेवा के ध्यान से युद्ध पर नहीं जाता है, अपना प्राण त्याग कर देती है। अंत में सुमना अपने को वसंत के सामने से हटाना ही स्थिर करती है और चुपचाप घर से निकल पड़ती है। वह पुरुष वेष में वीरों के साथ सम्मिलित होकर अत्यंत पराक्रम के साथ लड़ती है। उधर वसंत उसके वियोग में प्रकृति के खुले क्षेत्र में अपनी प्रेम वेदना की पुकार सुनाता फिरता है, पर सुमना उस समय प्रेमक्षेत्र से दूर थी , +अर्ध्द निशा में तारागण से प्रतिबिंबित अति निर्मल जलमय। +नीलझील के कलित कूल पर मनोव्यथा का लेकर आश्रय +नीरवता में अंतस्तल का मर्म करुण स्वर लहरी में भर। +प्रेम जगाया करता था वह विरही विरह गीत गा गा कर +भोजपत्र पर विरहव्यथामय अगणित प्रेमपत्र लिख लिखकर। +डाल दिए थे उसने गिरि पर, नदियों के तट पर, वनपथ पर +पर सुमना के लिए दूर थे ये वियोग के दृश्य कदंबक। +और न विरही की पुकार ही पहुँच सकी उसके समीप तक +अंत में वसंत एक युवक (वास्तव में पुरुष वेष में सुमना) के उद्बोधा से निकल पड़ता है और अपनी अद्भुत वीरता द्वारा सबका नेता बनकर विजय प्राप्त करता है। राजा यह कहकर कि 'जो देश की रक्षा करे वही राजा' उसको राज्य सौंप देता है। उसी समय सुमना भी उसके सामने प्रकट हो जाती है। +स्वदेशभक्ति की भावना कैसे मार्मिक और रसात्मक रूप में कथा के भीतर व्यक्त हुई है, यह उपर्युक्त सारांश द्वारा देखा जा सकता है। जैसाकि हम पहले कह आए हैं त्रिपाठीजी की कल्पना मानवहृदय के सामान्य मर्मपथ पर चलनेवाली है। इनका ग्रामगीत संग्रह करना इस बात को और भी स्पष्ट कर देता है। अत: त्रिपाठीजी हमें स्वच्छंदतावाद (रोमांटिसिज्म) के प्रकृत पथ पर दिखाई पड़ते हैं। इनकी रचना के कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं , +चारु चंद्रिका से आलोकित विमलोदक सरसी के तट पर, +बौरगंधा से शिथिल पवन में कोकिल का आलाप श्रवण कर। +और सरक आती समीप है प्रमदा करती हुई प्रतिध्वनि; +हृदय द्रवित होता है सुनकर शशिकर छूकर यथा चंद्रमणि +किंतु उसी क्षण भूख प्यास से विकल वस्त्र वंचित अनाथगण, +'हमें किसी की छाँह चाहिए' कहते चुनते हुए अन्नकण, +आ जाते हैं हृदय द्वार पर, मैं पुकार उठता हूँ तत्क्षण , +हाय! मुझे धिाक् है जो इनका कर न सका मैं कष्टनिवारण। +उमड़घुमड़ कर जब घमंड से उठता है सावन में जलधार, +हम पुष्पित कदंब के नीचे झूला करते हैं प्रतिवासर। +तड़ित्प्रभा या घनगर्जन से भय या प्रेमोद्रेक प्राप्त कर, +वह भुजबंधान कस लेती है, यह अनुभव है परम मनोहर। +किंतु उसी क्षण वह गरीबिनी, अति विषादमय जिसके मँहपर, +घुने हुए छप्पर की भीषण चिंता के हैं घिरे वारिधार, +जिसका नहीं सहारा कोई, आ जाती है दृग के भीतर, +मेरा हर्ष चला जाता है एक आह के साथ निकल कर +प्रतिक्षण नूतन भेष बनाकर रंगबिरंग निराला। +रवि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिदमाला +नीचे नील समुद्र मनोहर ऊपर नील गगन है। +घन पर बैठ बीच में बिचरूँ, यही चाहता मन है +सिंधुविहंग तरंग पंख को फड़का कर प्रतिक्षण में। +है निमग्न नित भूमि अंड के सेवन में, रक्षण में +मेरे लिए खड़ा था दुखियों के द्वार पर तू। +मैं बाट जोहता था तेरी किसी चमन में। +बनकर किसी के ऑंसू मेरे लिए बहा तू। +मैं देखता तुझे था माशूक के वदन में +स्वर्गीय लाला भगवानदीन. +दीनजी के जीवन का प्रारंभिक काल उस बुंदेलखंड में व्यतीत हुआ था जहाँ देश की परंपरागत पुरानी संस्कृति अभी बहुत कुछ बनी हुई है। उनकी रहन सहन बहुत सादी और उनका हृदय सरल और कोमल था। उन्होंने हिन्दी के पुराने काव्यों का नियमित रूप में अध्ययन किया था इससे वे ऐसे लोगों से कुढ़ते थे जो परंपरागत हिन्दी साहित्य की कुछ भी जानकारी प्राप्त किए बिना केवल थोड़ी सी अंग्रेजी शिक्षा के बल पर हिन्दी कविताएँ लिखने लग जाते थे। बुंदेलखंड में शिक्षित वर्ग के बीच और सर्वसाधारण में भी हिन्दी कविता का सामान्य रूप में प्रचार चला आ रहा है। ऋतुओं के अनुसार जो त्योहार और उत्सव रखे गए हैं, उनके आगमन पर वहाँ लोगों में अब भी प्राय: वही उमंग दिखाई देती है। विदेशी संस्कारों के कारण वह मारी नहीं गई है। लाला साहब वही उमंगभरा हृदय लेकर छतरपुर से काशी आ रहे। हिन्दी शब्दसागर के संपादकों में एक वे भी थे। पीछे हिंदू विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक हुए। हिन्दी साहित्य की व्यवस्थित रूप से शिक्षा देने के लिए काशी में उन्होंने एक साहित्य विद्यालय खोला जो उन्हीं के नाम से अब तक बहुत अच्छे ढंग पर चला जा रहा है। कविता में वे अपना उपनाम 'दीन' रखते थे। +लालाजी का जन्म संवत् 1924 (अगस्त 1866) में और मृत्यु 1987 (जुलाई,1930) में हुई। +पहले वे ब्रजभाषा में पुराने ढंग की कविता करते थे, पीछे 'लक्ष्मी' के संपादक हो जाने पर खड़ी बोली की कविताएँ लिखने लगे। खड़ी बोली में उन्होंने वीरों के चरित्र लेकर बोलचाल की कड़कड़ाती भाषा में जोशीली रचना की है। खड़ी बोली की कविताओं का तर्ज उन्होंने प्राय: मुंशियाना ही रखा था। बद्द या छंद भी उर्दू के रखते थे और भाषा में चलते अरबी या फारसी शब्द भी लाते थे। इस ढंग से उनके तीन काव्य निकले हैं , 'वीर क्षत्राणी', 'वीर बालक' और 'वीर पंचरत्न'। लालाजी पुराने हिन्दी काव्य और साहित्य के अच्छे मर्मज्ञ थे। बहुत से प्राचीन काव्यों की नए ढंग की टीकाएँ करके उन्होंने अध्ययन के अभिलाषियों का बड़ा उपकार किया है। रामचंद्रिका, कविप्रिया, दोहावली, कवितावली, बिहारी सतसई आदि की इनकी टीकाओं ने विद्यार्थियों के लिए अच्छा मार्ग खोल दिया। भक्ति और श्रृंगार की पुराने ढंग की कविताओं में उक्ति चमत्कार वे अच्छा लाते थे। +उनकी कविताओं के दोनों तरह के नमूने नीचे देखिए , +सुनि मुनि कौसिक तें साप को हवाल सब, +बाढ़ी चित करुना की अजब उमंग है। +पदरज डारि करे पाप सब छारि, +करि नवल सुनारि दियो धामहू उतंग है। +'दीन' भनै ताहि लखि जात पतिलोक, +ओर उपमा अभूत को सुझानों नयो ढंग है। +कौतुकनिधान राम रज की बनाय रज्जु, +पद तें उड़ाई ऋषिपतिनीपतंग है +वीरों की सुमाताओं का यश जो नहींगाता। +वह व्यर्थ सुकवि होने का अभिमान जनाता +जो वीरसुयश गाने में है ढील दिखाता। +वह देश के वीरत्व का है मान घटाता +सब वीर किया करते हैं सम्मान कलम का। +वीरों का सुयशगान है अभिमान कलम का +इनकी फुटकल कविताओं का संग्रह 'नवीन बीन' या 'नदीमें दीन' में है। +पं. रूपनारायण पांडेय. +पांडेयजी ने यद्यपि ब्रजभाषा में भी बहुत कुछ कविता की है, पर इधर अपनी खड़ी बोली की कविताओं के लिए ही ये अधिक प्रसिद्ध हैं। इन्होंने बहुत उपयुक्त विषय कविता के लिए चुने हैं और उनमें पूरी रसात्मकता लाने में समर्थ हुए हैं। इनके विषय के चुनाव में ही भावुकता टपकती है, जैसे , दलित कुसुम, वनविहंगम, आश्वासन। इनकी कविताओं का संग्रह 'पराग' के नाम से प्रकाशित हो चुका है। पांडेयजी की 'वनविहंगम' नाम की कविता में हृदय की विशालता और सरसता का बहुत अच्छा परिचय मिलता है। 'दलित कुसुम' की अन्योक्ति भी बड़ी हृदयग्राहिणी है। संस्कृत और हिन्दी दोनों के छंदों में खड़ी बोली को इन्होंने बड़ी सुघड़ाई से ढाला है। यहाँ स्थानाभाव से हम दो ही पद उध्दृत कर सकते हैं , +अहह! अधम ऑंधाी, आ गई तू कहाँ से? +प्रलय घनघटासी छा गई तू कहाँ से? +परदुखसुख तू ने, हा! न देखा न भाला। +कुसुम अधाखिला ही, हाय! यों तोड़ डाला +बन बीच बसे थे फँसे थे ममत्व में एक कपोत कपोती कहीं। +दिन रात न एक को दूसरा छोड़ता, ऐसे हिले मिले दोनों वहीं +बढ़ने लगा नित्य नया नया नेह, नईनई कामना होती रही। +कहने का प्रयोजन है इतना, उनके सुख की रही सीमा नहीं +पं. सत्यनारायण 'कविरत्न'. +खड़ी बोली की खरखराहट (जो तब तक बहुत कुछ बनी हुई थी) के बीच 'वियोगी हरि' के समान स्वर्गीय पं. सत्यनारायण 'कविरत्न' (जन्म संवत् 1936, मृत्यु 1975) भी ब्रज की मधुरवाणी सुनाते रहे। रीतिकाल के कवियों की परंपरा पर न चलकर वे या तो भक्तिकाल के कृष्णभक्त कवियों के ढंग पर चले हैं अथवा भारतेंदुकाल की नूतन कविता की प्रणाली पर। ब्रजभूमि, ब्रजभाषा और ब्रजपति का प्रेम उनके हृदय की संपत्ति थी। ब्रज के अतीत दृश्य उनकी ऑंखों में फिरा करते थे। इंदौर के पहले साहित्य सम्मेलन के अवसर पर ये मुझे वहाँ मिले थे। वहाँ की अत्यंत काली मिट्टी देख वे बोले, 'या माटी को तो हमारे कन्हैया न खाते'। +अंग्रेजी की ऊँची शिक्षा पाकर भी उन्होंने अपनी चाल ढाल ब्रजमंडल के ग्रामीण भलेमानसों की ही रखी। धोती, बगलबंदी और दुपट्टा, सिर पर एक गोल टोपी; यही उनका वेष रहता था। ये बाहर जैसे सरल और सादे थे, भीतर भी वैसे ही थे। सादापन दिखावे के लिए धारण किया हुआ नहीं है, स्वभावत: है, यह बात उन्हें देखते ही और उनकी बातें सुनते ही प्रकट हो जाती थी। बाल्यकाल से लेकर जीवनपर्यंत वे आगरा से डेढ़ कोस पर ताजगंज के पास धााँधाूपुर गाँव में ही रहे। उनका जीवन क्या था, जीवन की विषमता का एक छाँटा हुआ दृष्टांत था। उनका जन्म और बाल्यकाल, विवाह और गार्हस्थ, सब एक दुखभरी कहानी के संबद्ध खंड थे। वे थे ब्रजमाधुरी में पगे जीव, उनकी पत्नी थीं आर्यसमाज के तीखेपन में पली महिला। इस विषमता की विरसता बढ़ती ही गई और थोड़े ही अवस्था में कविरत्नजी की जीवन यात्रा समाप्त हो गई। +ब्रजभाषा की कविताएँ वे छात्राावस्था से ही लिखने लगे थे। वसंतागमन पर वर्षा के दिनों में वे रसिए आदि ग्रामगीत अपढ़ ग्रामीणों में मिलकर निस्संकोच गाते थे। सवैया पढ़ने का ढंग उनका ऐसा आकर्षक था कि सुननेवाले मुग्धा हो जाते थे। जीवन की घोर विषमताओं के बीच भी वे प्रसन्न और हँसमुख दिखाई देते थे। उनके लिए उनका जीवन ही एक काव्य था, अत: जो बातें प्रत्यक्ष उनके सामने आती थीं, उन्हें काव्य का रूप रंग देते उन्हें देर नहीं लगती थी। मित्रों के पास वे प्राय: पद्य में पत्र लिखा करते थे जिनमें कभी कभी उनके स्वभाव की झलक भी रहती थी, जैसे स्वर्गीय पद्मसिंहजी के पास भेजी हुई इस कविता में , +जो मों सों हँसि मिलै होत मैं तासु निरंतर चेरो। +बस गुन ही गुन निरखत तिह मधिा सरल प्रकृति को प्रेरो +यह स्वभाव को रोग जानिए, मेरो बस कछु नाहीं। +नित नव विकल रहत याही सो सहृदय बिछुरन माहीं +सदा दारुयोषित सम बेबस आज्ञा मुदित प्रमानै। +कोरो सत्य ग्राम को वासी कहा 'तकल्लुफ' जानै +किसी का कोई अनुरोध टालना उनके लिए असंभव था। यह जानकर बराबर लोग किसी न किसी अवसर के उपयुक्त कविता बना देने की प्रेरणा उनसे किया करते थे और वे किसी को निराश न करते थे। उनकी वही दशा थी जो उर्दू के प्रसिद्ध शायर इंशा की लखनऊ दरबार में हो गई थी। इससे उनकी अधिकांश रचनाएँ सामयिक हैं और जल्दी में जोड़ी हुई प्रतीत होती हैं, जैसे , स्वामी रामतीर्थ, तिलक गोखले, सरोजिनी नायडू इत्यादि की प्रशस्तियाँ, लोकहितकर आयोजनों के लिए अपील (हिंदू विश्वविद्यालय के लिए लंबी अपील देखिए), दुख और अन्याय के निवारण के लिए पुकार (कुली प्रथा के विरुद्ध 'पुकार' देखिए)। +उन्होंने जीती जागती ब्रजभाषा ली है। उनकी ब्रजभाषा उसी स्वरूप में बँधी न रहकर जो काव्यपरंपरा के भीतर पाया जाता है, बोलचाल के चलते रूपों को लेकर चली है। बहुत से ऐसे शब्द और रूपों का उन्होंने +व्यवहार किया है जो परंपरागत काव्यभाषा में नहीं मिलते। +'उत्तररामचरित' और 'मालतीमाधव' के अनुवादों में श्लोकों के स्थान पर उन्होंने बड़े मधुर सवैये रखे हैं। मकाले के अंग्रेजी खंडकाव्य 'होरेशस' का पद्यबद्ध अनुवाद उन्होंने बहुत पहले किया था। कविरत्नजी की बड़ी कविताओं में 'प्रेमकली' और 'भ्रमरदूत' विशेष उल्लेख योग्य हैं। 'भ्रमरदूत' में यशोदा ने द्वारका में जा बसे हुए कृष्ण के पास संदेश भेजा है। उसकी रचना नंददास के 'भ्रमरगीत' के ढंग पर की गई है, पर अंत में देश की वर्तमान दशा और अपनी दशा का भी हलका सा आभास कवि ने दिया है। सत्यनारायण जी की रचना के कुछ नमूने देखिए , +अलबेली कहु बेलि द्रुमन सों लिपटि सुहाई। +धाोयेधाोये पातन की अनुपम कमनाई +चातक शुक कोयल ललित बोलत मधुरे बोल। +कूकि कूकि केकी कलित कुंजन करत कलोल +निरखि घन की घटा। +लखि वह सुषमा जाल लाल निज बिन नंदरानी। +हरि सुधि उमड़ी घुमड़ी तन उर अति अकुलानी +सुधि बुधिा तजि माथौ पकरि, करि करि सोच अपार। +दृगजल मिस मानहु निकरि बही विरह की धार +कृष्ण रटना लगी। +कौने भेजौं दूत, पूत सों बिथा सुनावै। +बातन में बहराइ जाइ ताको यहँ लावै +त्यागि मधुपुरी को गयो छाँड़ि सबन के साथ। +सात समुंदर पै भयो दूर द्वारकानाथ +जाइगो को उहाँ? +नित नव परत अकाल, काल को चलत चक्र चहुँ। +जीवन को आनंद न देख्यो जात यहाँ कहुँ +बढ़यो जथेच्छाचार कृत जहँ देखौ तहँ राज। +होत जात दुर्बल विकृत दिन दिन आर्यसमाज +दिनन के फेर सों। +जे तजि मातृभूमि सों ममता होत प्रवासी। +तिन्हैं बिदेसी तंग करत दै बिपदा खासी +नारीशिक्षा अनादरत जे लोग अनारी। +ते स्वदेश अवनति प्रचंड पातक अधिकारी +निरखि हाल मेरो प्रथम लेहु समुझि सब कोइ। +विद्याबल लहि मति परम अबला सबला होइ +लखौं अजमाइ कै। +भयो क्यों अनचाहत को संग? +सब जग के तुम दीपक, मोहन! प्रेमी हमहुँ पतंग +लखि तब दीपति, देहशिखा में निरत, बिरह लौं लागी। +खींचति आप सों आप उतहि यह, ऐसी प्रकृति अभागी +यद्यपि सनेह भरी तव बतियाँ, तउ अचरज की बात। +योग वियोग दोउन में इक सम नित्य जरावत गात +संदर्भ +1. संवत् 1967 में प्रकाशित हो गया। + +काव्यखंड (संवत् 1975): +प्रकरण 4 +नई धारा : तृतीय उत्थान : वर्तमान काव्यधाराएँ. +द्वितीय उत्थान के समाप्त होते होते खड़ी बोली में बहुत कुछ कविता हो चुकी थी। इन 25-30 वर्षों के भीतर वह बहुत कुछ मँजी, इसमें संदेह नहीं, पर इतनी नहीं जितनी उर्दू काव्य क्षेत्र के भीतर जाकर मँजी है। जैसा पहले कह चुके हैं, हिन्दी में खड़ी बोली के पद्यप्रवाह के लिए तीन रास्ते खोले गए , उर्दू या फारसी की बÐों का, संस्कृत के वृत्तों का और हिन्दी के छंदों का। इनमें से प्रथम मार्ग का अवलंबन तो मैं नैराश्य या आलस्य समझता हूँ। वह हिन्दी काव्य का निकालाहुआ अपना मार्ग नहीं। अत: शेष दो मार्गों का ही थोड़े में विचार किया जाता है। +इसमें तो कोई संदेह नहीं कि संस्कृत के वर्णवृत्तों का माधुर्य अन्यत्रा दुर्लभ है, पर उनमें भाषा इतनी जकड़ जाती है कि वह भावधारा के मेल में पूरी तरह से स्वच्छंद होकर नहीं चल सकती। इसी से संस्कृत के लंबे समासों का बहुत कुछ सहारा लेना पड़ता है। पर संस्कृत पदावली के अधिक समावेश से खड़ी बोली की स्वाभाविक गति के प्रसार के लिए अवकाश कम रहता है। अत: वर्णवृत्तों का थोड़ा बहुत उपयोग किसी बड़े प्रबंध के भीतर बीच में ही उपयुक्त हो सकता है। तात्पर्य यह कि संस्कृत पदावली का अधिक आश्रय लेने से खड़ी बोली के मँजने की संभावना दूर ही रहेगी। +हिन्दी के सब तरह के प्रचलित छंदों में खड़ी बोली की स्वाभाविक वाग्धारा का अच्छी तरह खपने के योग्य हो जाना ही उनका मँजना कहा जाएगा। हिन्दी के प्रचलित छंदों में दंडक और सवैया भी हैं। सवैया यद्यपि वर्णवृत्त है, पर लय के अनुसार लघुगुरु का बंधान उसमें बहुत कुछ उसी प्रकार शिथिल हो जाता है जिस प्रकार उर्दू के छंदों में। मात्रिाक छंदों में तो कोई अड़चन ही नहीं है। प्रचलित मात्रिाक छंदों के अतिरिक्त कविजन इच्छानुसार नए छंदों का विधान भी बहुत अच्छी तरह कर सकते हैं। +खड़ी बोली की कविताओं की उत्तरोत्तर गति की ओर दृष्टिपात करने से यह पता चल जाता है कि किस प्रकार ऊपर लिखी बातों की ओर लोगों का ध्यान क्रमश: गया है और जा रहा है। बाबू मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं में चलती हुई खड़ी बोली का परिमार्जित और सुव्यवस्थित रूप गीतिका आदि हिन्दी के प्रचलित छंदों में तथा नए गढ़े हुए छंदों में पूर्णतया देखने में आया। ठाकुर गोपालशरण सिंहजी कवित्तों और सवैयों में खड़ी बोली का बहुत ही मँजा हुआ रूप सामने ला रहे हैं। उनकी रचनाओं को देखकर खड़ी बोली के मँज जाने की पूरी आशा होती है। +खड़ी बोली का पूर्ण सौष्ठव के साथ मँजना तभी कहा जाएगा जबकि पद्यों में उसकी अपनी गतिविधि का पूरा समावेश हो और कुछ दूर तक चलनेवाले वाक्य सफाई के साथ बैठेंं। भाषा का इस रूप में परिमार्जन उन्हीं के द्वारा हो सकता है जिनका हिन्दी पर पूरा अधिकार है, जिन्हें उसकी प्रकृति की पूरी परख है। पर जिस प्रकार बाबू मैथिलीशरण गुप्त और ठाकुर गोपालशरण सिंहजी ऐसे कवियों की लेखनी से खड़ी बोली को मँजते देख आशा का पूर्ण संचार होता है उसी प्रकार कुछ ऐसे लोगों को जिन्होंने अध्ययन या शिष्ट समागम द्वारा भाषा पर पूरा अधिकार नहीं प्राप्त किया है, संस्कृत की विकीर्ण पदावली के भरोसे पर या अंग्रेजी पद्यों के वाक्यखंडों के शब्दानुवाद जोड़ जोड़ कर, हिन्दी कविता के नए मैदान में उतरते देख आशंका भी होती है। ऐसे लोग हिन्दी जानने या उसका अभ्यास करने की जरूरत नहीं समझते। पर हिन्दी भी एक भाषा है, जो आते आते आती है। भाषा बिना अच्छी तरह जाने वाक्यविन्यास, मुहावरे आदि कैसे ठीक हो सकते हैं? +नए नए छंदों के व्यवहार और तुक के बंधन के त्याग की सलाह द्विवेदीजी ने बहुत पहले दी थी। उन्होंने कहा था कि 'तुले हुए शब्दों में कविता करने और तुक, अनुप्रास आदि ढूँढ़ने से कवियों के विचारस्वातंत्रय में बाधा आती है।' +नए नए छंदों की योजना के संबंध में हमें कुछ नहीं कहना है। यह बहुत अच्छी बात है। 'तुक' भी कोई ऐसी अनिवार्य वस्तु नहीं। चरणों के भिन्न भिन्न प्रकार के मेल चाहे जितने किए जायँ, ठीक हैं। पर इधर कुछ दिनों से बिना छंद (मीटर) के पद्य भी , बिना तुकांत के होना तो बहुत ध्यान देने की बात नहीं , निरालाजी ऐसे नई रंगत के कवियों में देखने में आते हैं। यह अमेरिका के एक कवि वाल्ट ह्निटमैन ;ँसज ॅीपजउंदद्ध की नकल है, जो पहले बँग्ला में थोड़ी बहुत हुई। बिना किसी प्रकार की छंदोव्यवस्था की अपनी पहली रचना 'लीव्स ऑफ ग्रास' उसने सन् 1855 ई. में प्रकाशित की। उसके उपरांत और भी बहुत सी रचनाएँ इसी प्रकार की मुक्त या स्वच्छंद पंक्तियों में निकलीं, जिनके संबंध में एक समालोचक ने लिखाहै , +ष्ष्। बींवे व िपउचतमेपवदेए जीवनहीज व िमिमसपदहे जीतवूद जवहमजीमत ूपजीवनज तीलउमए ूीपबी उंजजमते सपजजसमए ूपजीवनज उमजतमए ूीपबी उंजजमते उवतम ंदक वजिमद ूपजीवनज तमेंवदए ूीपबी उंजजमते उनबीण्ष्ष्1 +सारांश यह कि उसकी ऐसी रचनाओं में छंदोव्यवस्था का ही नहीं, बुद्धि तत्व का भी प्राय: अभाव है। उसकी वे ही कविताएँ अच्छी मानी और पढ़ी गईं जिनमें छंद और तुकांत की व्यवस्था थी। +पद्यव्यवस्था से मुक्त काव्यरचना वास्तव में पाश्चात्य ढंग के गीतकाव्यों के अनुकरण का परिणाम है। हमारे यहाँ के संगीत में बँधी हुई राग रागनियाँ हैं। पर योरप में संगीत के बड़े बड़े उस्ताद (कंपोजर्स) अपनी अलग अलग नादयोजना या स्वरमैत्राी चलाया करते हैं। उस ढंग का अनुकरण पहले बंगाल में हुआ। वहाँ की देखादेखी हिन्दी में भी चलाया गया। 'निरालाजी' का तो इनकी ओर प्रधान लक्ष्य रहा। हमारा इस संबंध में यही कहना है कि काव्य का प्रभाव केवल नाद पर अवलंबित नहीं। +छंदों के अतिरिक्त वस्तुविधान और अभिव्यंजनशैली में भी कई प्रकार की प्रवृत्तियाँ इस तृतीय उत्थान में प्रकट हुईं जिससे अनेकरूपता की ओर हमारा काव्य कुछ बढ़ता दिखाई पड़ा। किसी वस्तु में अनेकरूपता आना विकास का लक्षण है, यदि अनेकता के भीतर एकता का कोई एक सूत्र बराबर बना रहे। इस समन्वय से रहित जो अनेकरूपता होगी यह भिन्न भिन्न वस्तुओं की होगी, एक ही वस्तु की नहीं। अत: काव्यत्व यदि बना रहे तो काव्य का अनेक रूप-धारण करके भिन्न भिन्न शाखाओं में प्रवाहित होना उसका विकास ही कहा जाएगा। काव्य के भिन्न भिन्न रूप एक दूसरे के आगे पीछे भी आविर्भूत हो सकते हैं और साथ साथ भी निकल और चल सकते हैं। पीछे आविर्भूत होनेवाला रूप पहले से चले आते हुए रूप से अवश्य ही श्रेष्ठ या समुन्नत हो, ऐसा कोई नियम काव्यक्षेत्र में नहीं है। अनेक रूपों की धारणा करनेवाला तत्व यदि एक है तो शिक्षित जनता की बाह्य और आभ्यंतर स्थिति के साथ सामंजस्य के लिए काव्य अपना रूप भी कुछ बदल सकता है और रुचि की विभिन्नता का अनुसरण करता हुआ एक साथ कई रूपों में भी चल सकता है। +प्रथम उत्थान के भीतर हम देख चुके हैं कि किस प्रकार काव्य को भी देश की बदलती हुई स्थिति और मनोवृत्ति के मेल में लाने के लिए भारतेंदु मंडल ने कुछ प्रयत्न किया पर यह प्रयत्न केवल सामाजिक और राजनीतिक स्थिति की ओर हृदय को थोड़ा प्रवृत्त करके रह गया। राजनीतिक और सामाजिक भावनाओं को व्यक्त करनेवाली वाणी भी दबी सी रही। उसमें न तो संकल्प की दृढ़ता और न्याय के आग्रह का जोश था, न उलटफेर की प्रबल कामना का वेग। स्वदेश प्रेम व्यंजित करनेवाला यह स्वर अवसाद और खिन्नता का स्वर था, आवेश और उत्साह का नहीं। उसमें अतीत के गौरव का स्मरण और वर्तमान Ðास का वेदनापूर्ण अनुभव ही स्पष्ट था। अभिप्राय यह कि यह प्रेम जगाया तो गया, पर कुछ नया नया सा होने के कारण उस समय काव्यभूमि पर पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित न हो सका। +कुछ नूतन भावनाओं के समावेश के अतिरिक्त काव्य की परंपरागत पद्ध ति में किसी प्रकार का परिवर्तन भारतेंदुकाल में न हुआ। भाषा ब्रजभाषा ही रहने दी गई और उसकी अभिव्यंजनाशक्ति का कुछ विशेष प्रसार न हुआ। काव्य को बँधी हुई प्रणालियों से बाहर निकाल कर जगत् और जीवन के विविधा पक्षों की मार्मिकता झलकाने वाली धाराओं में प्रवाहित करने की प्रवृत्ति भी न दिखाई पड़ी। +द्वितीय उत्थान में कुछ दिन ब्रजभाषा के साथ साथ चलकर खड़ी बोली क्रमश: अग्रसर होने लगी; यहाँ तक कि नई पीढ़ी के कवियों को उसी का समय दिखाईपड़ा। स्वदेशगौरव और स्वदेशप्रेम की जो भावना प्रथम उत्थान में जगाई गई थी उसका अधिक प्रसार द्वितीय उत्थान में हुआ और 'भारत भारती' ऐसी पुस्तक निकली। इस भावना का प्रसार तो हुआ पर इसकी अभिव्यंजना में प्रातिभ प्रगल्भता न दिखाईपड़ी। +शैली में प्रगल्भता और विचित्रता चाहे न आई हो, पर काव्यभूमि का प्रसार अवश्य हुआ। प्रसार और सुधार की जो चर्चा नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना के समय से ही रह रहकर थोड़ी बहुत होती आ रही थी वह 'सरस्वती' निकलने के साथ ही कुछ अधिक ब्योरे के साथ हुई। उस पत्रिका के प्रथम दो तीन वर्षों के भीतर ही ऐसे लेख निकले जिनमें साफ कहा गया है कि अब नायिका भेद और श्रृंगार में ही बँधो रहने का जमाना नहीं है, संसार में न जाने कितनी बातें हैं जिन्हें लेकर कवि चल सकते हैं। इस बात पर द्विवेदीजी बराबर जोर देते रहे और कहते रहे कि 'कविता के बिगड़ने और उसकी सीमा परिमित हो जाने से साहित्य पर भारी आघात होता है।' द्विवेदीजी 'सरस्वती' के संपादन काल में कविता में नयापन लाने के बराबर इच्छुक रहे। नयापन आने के लिए वे नएनए विषयोंका नयापन या नानात्व प्रधान समझते रहे और छंद, पदावली, अलंकार आदि का नयापन उसका अनुगामी। रीतिकाल की श्रृंगारी कविता की ओर लक्ष्य करके उन्होंने लिखा , +इस तरह की कविता सैकड़ों वर्ष से होती आ रही है। अनेक कवि हो चुके जिन्हाेंने इस विषय पर न मालूम क्या क्या लिख डाला है। इस दशा में नए कवि अपनी कविता में नयापन कैसे ला सकते हैं; वही तुक, वही छंद, वही शब्द, वही उपमा, वही रूपक! इसपर भी लोग पुरानी लकीर बराबर पीटते जाते हैं। कवित्त, सवैये, दोहे, सोरठे लिखने से बाज नहीं आते। +द्वितीय उत्थान के भीतर हम दिखा आए हैं कि किस प्रकार काव्यक्षेत्र का विस्तार बढ़ा, बहुत से नए नए विषय लिए गए और बहुत से कवि कवित्त, सवैये लिखने से बाज आकर संस्कृत के अनेक वृत्तों में रचना करने लगे। रचनाएँ चाहे अधिकतर साधारण गद्यनिबंधों के रूप में ही हुई हों, पर प्रवृत्ति अनेक विषयों की ओर रही, इसमें संदेह नहीं। उसी द्वितीय उत्थान में स्वतंत्र वर्णन के लिए मनुष्येतर प्रकृति को कवि लोग लेने लगे पर अधिकतर उसके ऊपरी प्रभाव तक ही रहे। उसके रूप, व्यापार कैसे सुखद, सजीले और सुहावने लगते हैं, अधिकतर यही देख दिखाकर उन्होंने संतोष किया। चिर साहचर्य से उत्पन्न उनके प्रति हमारा राग व्यंजित न हुआ। उनके बीच मनुष्य जीवन को रखकर उसके प्रकृत स्वरूप पर व्यापक दृष्टि नहीं डाली गई। रहस्यमयी सत्ता के अक्षरप्रसार के भीतर व्यंजित भावों और मार्मिक तथ्यों के साक्षात्कार तथा प्रत्यक्षीकरण की ओर झुकाव न देखने में आया। इसी प्रकार विश्व के अत्यंत सूक्ष्म और अत्यंत महान् विधानों के बीच जहाँ तक हमारा ज्ञान पहुँचा है वहाँ तक हृदय को भी पहुँचाने का कुछ प्रयास होना चाहिए था, पर न हुआ। द्वितीय उत्थानकाल का अधिकांश भाग खड़ी बोली को भिन्न भिन्न प्रकार के पद्यों में ढालने में ही लगा। +तृतीय उत्थान में आकर खड़ी बोली के भीतर काव्यत्व का अच्छा स्फुरण हुआ। जिस देशप्रेम को लेकर काव्य की नूतन धारा भारतेंदुकाल में चली थी वह उत्तरोत्तर प्रबल और व्यापक रूप धारण करता आया। शासन की अव्यवस्था और अशांति के उपरांत अंग्रेजी के शांतिमय और रक्षापूर्ण शासन की प्रति कृतज्ञता का भाव भारतेंदुकाल में बना हुआ था। इससे उस समय की देशभक्ति संबंधी कविताओं में राजभक्ति का स्वर भी प्राय: मिला पाया जाता है। देश की दुखदशा का प्रधान कारण राजनीतिक समझते हुए भी उस दुखदशा में उध्दार के लिए कवि लोग दयामय भगवान को ही पुकारते मिलते हैं। कहीं कहीं उद्योग धांधाों को न बढ़ाने, आलस्य में पड़े रहने और देश की बनी वस्तुओं का व्यवहार न करने के लिए वे देशवासियों को भी कोसते पाए जाते हैं। सरकार पर रोष या असंतोष की व्यंजना उनमें नहीं मिलती। कांग्रेस की प्रतिष्ठा होने के उपरांत भी बहुत दिनों तक देशभक्ति की वाणी में विशेष बल और वेग न दिखाई पड़ा। बात यह थी कि राजनीति की लंबी चौड़ी चर्चा साल भर में एक बार धूमधाम के साथ थोड़े से शिक्षित बड़े आदमियों के बीच हो जाया करती थी जिसका कोई स्थायी और क्रियोत्पादक प्रभाव नहीं देखने में आता था। अत: द्विवेदीकाल की देशभक्ति संबंधी रचनाओं में शासनपद्ध ति के प्रति असंतोष तो व्यंजित होता था पर कर्म में तत्पर कराने का, आत्मत्याग करनेवाला जोश और उत्साह न था। आंदोलन भी कड़ी याचना के आगे नहीं बढ़े थे। +तृतीय उत्थान में आकर परिस्थिति बहुत बदल गई। आंदोलनों ने सक्रिय रूप धारण किया और गाँव गाँव में राजनीतिक और आर्थिक परतंत्रता के विरोध की भावना जगाई गई। सरकार से कुछ माँगने के स्थान पर अब कवियों की वाणी देशवासियों को ही 'स्वतंत्रता देवी की वेदी पर बलिदान' होने को प्रोत्साहित करने लगी। अब जो आंदोलन चले वे सामान्य जनसमुदायों को भी साथ लेकर चले। इससे उनके भीतर अधिक आवेश और बल का संचार हुआ। सबसे बड़ी बात यह हुई कि आंदोलन संसार के और भागों में चलनेवाले आंदोलनों के मेल में लाए गए, जिससे ये क्षोभ की एक सार्वभौम धारा की शाखाओं से प्रतीत हुए। वर्तमान सभ्यता और लोक की घोर आर्थिक विषमता से जो असंतोष का ऊँचा स्वर पच्छिम में उठा उसकी गूँज यहाँ भी पहुँची। दूसरे देशों का धान खींचने के लिए योरप में महायंत्राप्रवर्तन का जो क्रम चला उससे पूँजी लगाने वाले थोड़े से लोगों के पास तो अपार धानराशि इकट्ठी होने लगी पर अधिकांश श्रमजीवी जनता के लिए भोजन, वस्त्र मिलना भी कठिन हो गया। अत: एक ओर तो योरप में मशीन की सभ्यता के विरुद्ध टालस्टाय की धर्मबुद्धि जगानेवाली वाणी सुनाई पड़ी जिसका भारतीय अनुवाद गाँधाीजी ने किया; दूसरी ओर इस घोर आर्थिक विषमता की ओर प्रतिक्रिया के रूप में साम्यवाद और समाजवाद नामक सिध्दांत चले जिन्होंने रूस में अत्यंत उग्र रूप धारण करके भारी उलटफेर कर दिया। +अब संसार के प्राय: सारे सभ्य भाग एक दूसरे के लिए खुले हुए हैं। इससे एक भूखंड में उठी हुई हवाएँ दूसरे भूखंड में शिक्षित वर्गों तक तो अवश्य ही पहुँच जाती हैं। यदि उनका सामंजस्य दूसरे भूखंड की परिस्थिति के साथ हो जाता है तो उस परिस्थिति के अनुरूप शक्तिशाली आंदोलन चल पड़ते हैं। इसी नियम के अनुसार शोषक साम्राज्यवाद के विरुद्ध राजनीतिक आंदोलन के अतिरिक्त यहाँ भी किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन, अछूत आंदोलन इत्यादि कई आंदोलन एक विराट् परिवर्तनवाद के नाना व्यावहारिक अंगों के रूप में चले। श्री रामधाारीसिंह 'दिनकर', बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', माखनलाल चतुर्वेदी आदि कई कवियों की वाणी द्वारा ये भिन्न भिन्न प्रकार के आंदोलन प्रतिध्वनित हुए। ऐसे समय में कुछ ऐसे भी आंदोलन दूसरे देशों की देखादेखी खड़े होते हैं जिनकी नौबत वास्तव में नहीं आई रहती। योरप में जब देश बड़े बड़े कल कारखानों से भर गए हैं और जनता का बहुत सा भाग उसमें लग गया है तब मजदूर आंदोलन की नौबत आई है। यहाँ अभी कल कारखाने केवल चल खड़े हुए हैं और उनमें काम करने वाले थोड़े से मजदूरों की दशा खेत में काम करने वाले करोड़ों अच्छे अच्छे किसानों की दशा से कहीं अच्छी है। पर मजदूर आंदोलन साथ लग गया। जो कुछ हो, इन आंदोलनों का तीव्र स्वर हमारी काव्यवाणी में सम्मिलित हुआ। +जीवन के कई क्षेत्रों में जब एक साथ परिवर्तन के लिए पुकार सुनाई पड़ती है तब परिवर्तन एक 'वाद' का व्यापक रूप धारण करता है और बहुतों के लिए सब क्षेत्रों में स्वत: एक चरम साधय बन जाता है। 'क्रांति' के नाम से परिवर्तन की प्रबल कामना हमारे हिन्दी काव्य क्षेत्र में प्रलय की पूरी पदावली के साथ व्यक्त की गई। इस कामना के साथ कहीं कहीं प्राचीन के स्थान पर नवीन के दर्शन की उत्कंठा भी प्रकट हुई। सब बातों में परिवर्तन ही परिवर्तन की यह कामना कहाँ तक वर्तमान परिस्थिति के स्वंतत्रा पर्यालोचन का परिणाम है और कहाँ तक केवल अनुकृत है, नहीं कहा जा सकता है। इतना अवश्य दिखाई पड़ता है कि इस परिवर्तनवाद के प्रदर्शन की प्रवृत्ति अधिक हो जाने से जगत और जीवन के स्वरूप की यह अनुभूति ऐसे कवियों में कम जग पाएगी जिसकी व्यंजना काव्य को दीर्घायु प्रदान करती है। +यह तो हुई काल के प्रभाव की बात। थोड़ा यह भी देखना चाहिए कि चली आती हुई काव्यपरंपरा की शैली से अतृप्ति या असंतोष के कारण परिवर्तन की कामना कहाँ तक जगी और उसकी अभिव्यक्ति किन किन रूपों में हुई। भक्तिकाल और रीतिकाल की चली आती हुई परंपरा के अंत में किस प्रकार भारतेंदुमंडल के प्रभाव से देशप्रेम और जातिगौरव की भावना को लेकर एक नूतन परंपरा की प्रतिष्ठा हुई, इसका उल्लेख हो चुका है। द्वितीय उत्थान में काव्य की नूतन परंपरा का अनेक विषयस्पर्शी प्रसार अवश्य हुआ पर द्विवेदीजी के प्रभाव से एक ओर उसमें भाषा की सफाई आई, दूसरी ओर उसका स्वरूप गद्यवत, रूखा, इतिवृत्तात्मक और अधिकतर बाह्यार्थ निरूपक हो गया। अत: इस तृतीय उत्थान में जो प्रतिवर्तन हुआ और पीछे 'छायावाद' कहलाया वह उसी द्वितीय उत्थान की कविता के विरुद्ध कहा जा सकता है। उसका प्रधान लक्ष्य काव्यशैली की ओर था, वस्तुविधान की ओर नहीं। अर्थभूमि या वस्तुभूमि का तो उसके भीतर बहुत संकोच हो गया। समन्वित विशाल भावनाओं को लेकर चलने की ओर ध्यान न रहा। +द्वितीय उत्थान की कविता में काव्य का स्वरूप खड़ा करनेवाली दोनों बातों की कमी दिखाई पड़ती थी, कल्पना का रंग भी बहुत कम या फीका रहता था और हृदय का वेग भी खूब खुलकर नहीं व्यंजित होता था। इन बातों की कमी परंपरागत ब्रजभाषा काव्य का आनंद लेनेवालों को भी मालूम होती थी और बँग्ला या अंग्रेजी कविता का परिचय करनेवालों को भी। अत: खड़ी बोली की कविता में पदलालित्य, कल्पना की उड़ान, भाव की वेगवती व्यंजना, वेदना की विवृत्ति, शब्द प्रयोग की विचित्रता इत्यादि अनेक बातें देखने की आकांक्षा बढ़ती गई। +सुधार चाहने वालों में कुछ लोग नए नए विषयों की ओर प्रवृत्त खड़ी बोली की कविता को ब्रजभाषा काव्य की सी ललित पदावली तथा रसात्मकता और मार्मिकता से समन्वित देखना चाहते थे। जो अंग्रेजी या अंग्रेजी के ढंग पर चली हुई बँग्ला की कविताओं से प्रभावित थे वे कुछ लाक्षणिक वैचित्रय, व्यंजक चित्रविन्यास और रुचिर अन्योक्तियाँ देखना चाहते थे। श्री पारसनाथ सिंह के किए हुए बँग्ला कविताओं के हिन्दी अनुवाद 'सरस्वती' आदि पत्रिकाओं में संवत् 1967 (सन् 1910) से ही निकलने लगे थे। ग्रे, वड्र्सवर्थ आदि अंग्रेजी कवियों की रचनाओं के कुछ अनुवाद भी (जैसे जीतन सिंह द्वारा अनूदित वड्र्सवर्थ का 'कोकिल') निकले। अत: खड़ी बोली की कविता जिस रूप में चल रही थी उससे संतुष्ट न रहकर द्वितीय उत्थान के समाप्त होने से कुछ पहले ही कई कवि खड़ी बोली काव्य को कल्पना का नया रूप रंग देने और उसे अधिक अंतर्भाव व्यंजक बनाने में प्रवृत्त हुए जिनमें प्रधान थे सर्वश्री मैथिलीशरण गुप्त, मुकुटधार पांडेय और बदरीनाथ भट्ट। कुछ अंग्रेजी ढर्रा लिए हुए जिस प्रकार की फुटकल कविताएँ और प्रगीत मुक्तक (लिरिक्स) बँग्ला में निकल रहे थे, उनके प्रभाव से कुछ विशृंखल वस्तुविन्यास और अनूठे शीर्षकों के साथ चित्रमयी, कोमल और व्यंजक भाषा में इनकी नए ढंग की रचनाएँ संवत्1970-71 से ही निकलने लगी थीं जिनमें से कुछ के भीतर रहस्य भावना भी रहतीथी। +मैथिलीशरण गुप्त. +गुप्तजी की 'नक्षत्रानिपात' (सन् 1914), अनुरोध (सन्1915), पुष्पांजलि (सन् 1917), स्वयं आगत (सन् 1918) इत्यादि कविताएँ ध्यान देने योग्य हैं। 'पुष्पांजलि' और 'स्वयं आगत' की कुछ पंक्तियाँ आगे देखिए , +(क) मेरे ऑंगन का एक फूल। +सौभाग्य भाव से मिला हुआ, +श्वासोच्छ्वासन से हिला हुआ, +संसार विटप से खिला हुआ, +झड़ पड़ा अचानक झूल झूल। +(ख) तेरे घर के द्वार बहुत हैं किससे होकर आऊँ मैं? +सब द्वारों पर भीड़ बड़ी है कैसे भीतर जाऊँ मैं! +इसी प्रकार गुप्तजी की और भी बहुत-सी गीतात्मक रचनाएँ हैं, जैसे , +(ग) निकल रही है उर से आह, +ताक रहे सब तेरी राह। +चातक खड़ा चोंच खोले है, सम्पुट खोले सीप खड़ी, +मैं अपना घट लिये खड़ा हूँ, अपनी अपनी हमें पड़ी। +(घ) प्यारे! तेरे कहने से जो यहाँ अचानक मैं आया, +दीप्ति बढ़ी दीपों की सहसा, मैंने भी ली साँस कहा। +सो जाने के लिए जगत का यह प्रकाश है जाग रहा, +किंतु उसी बुझते प्रकाश में डूब उठा मैं और बहा। +निरुद्देश नख रेखाओं में देखी तेरी मूर्ति; अहा +मुकुटधर पांडेय. +गुप्त जी तो, जैसा पहले कहा जा चुका है, किसी विशेष पद्ध ति या 'वाद' में न बँधाकर कई पद्ध तियों पर अब तक चले आ रहे हैं। पर मुकुटधार जी बराबर नूतन पद्ध ति ही पर चले। उनकी इस ढंग की प्रारंभिक रचनाओं में 'ऑंसू', 'उद्गार' इत्यादि ध्यान देने योग्य हैं। कुछ नमूने देखिए , +(क) हुआ प्रकाश तमोमय मग में, +मिला मुझे तू तत्क्षण जग में, +दंपति के मधुमय विलास में, +शिशु के स्वप्नोत्पन्न हास में, +वन्य कुसुम के शुचि सुवास में, +था तव क्रीड़ा स्थान +(ख) मेरे जीवन की लघु तरणी, +ऑंखों के पानी में तर जा। +मेरे उर का छिपा खजाना, +अहंकार का भाव पुराना, +बना आज तू मुझे दिवाना, +तप्त श्वेत बूँदों में ढर जा +(ग) जब संधया को हट जावेगी भीड़ महान्, +तब जाकर मैं तुम्हें सुनाऊँगा निज गान। +शून्य कक्ष के अथवा कोने में ही एक, +बैठ तुम्हारा करूँ वहाँ नीरव अभिषेक +पं. बदरीनाथ भट्ट. +भट्टजी भी सन् 1911 के पहले से भी भावव्यंजक और अनूठे गीत रचते आ रहे थे। दो पंक्तियाँ देखिए , +दे रहा दीपक जलकर फूल, +रोपी उज्ज्वल प्रभा पताका अंधकार हिय हूल। +श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी. +बख्शीजी के भी इस ढंग के कुछ गीत सन् 1915-16 के आसपास मिलेंगे। +ये कवि जगत् और जीवन के विस्तृत क्षेत्र के बीच नई कविता का संचार चाहते थे। ये प्रकृति के साधारण, असाधारण, सब रूपों पर प्रेमदृष्टि डालकर, उसके रहस्यभरे सच्चे संकेतों को परखकर, भाषा को अधिक चित्रमय, सजीव और मार्मिक रूप देकर कविता का एक अकृत्रिम, स्वच्छंद मार्ग निकाल रहे थे। भक्तिक्षेत्र में उपास्य की एकदेशीय या धर्मविशेष में प्रतिष्ठित भावना के स्थान पर सार्वभौम भावना की ओर बढ़ रहे थे जिसमें सुंदर रहयात्मक संकेत भी रहते थे। अत: हिन्दी कविता की नई धारा का प्रवर्तक इन्हीं को , विशेषत: श्री मैथिलीशरण गुप्त और श्री मुकुटधार पांडेय को , समझना चाहिए। इस दृष्टि से छायावाद का रूप रंग खड़ा करने वाले कवियों के संबंध में अंग्रेजी या बँग्ला की समीक्षाओं से उठती हुई इस प्रकार की पदावली का कोई अर्थ नहीं कि 'इन कवियों के मन में एक ऑंधाी उठ रही थी जिसमें आंदोलित होते हुए वे उड़े जा रहे थे; एक नूतन वेदना की छटपटाहट थी जिसमें सुख की मीठी अनुभूति भी लुकी हुई थी; रूढ़ियों के भार से दबी हुई युग की आत्मा अपनी अभिव्यक्ति के लिए हाथ पैर मार रही थी।' न कोई ऑंधाी थी, न तूफान, न कोई नई कसक थी, न वेदना, न प्राप्त युग की नाना परिस्थितियों का हृदय पर कोई नया आघात था, न उसका आहत नाद। इन बातों का कुछ अर्थ तब हो सकता था जब काव्य का प्रवाह ऐसी भूमियों की ओर मुड़ता जिनपर ध्यान न दिया गया रहा होता। छायावाद के पहले नए नए मार्मिक विषयों की ओर हिन्दी कविता प्रवृत्त होती आ रही थी। कसर थी तो आवश्यक और व्यंजक शैली की, कल्पना और संवेदना के अधिक योग की। तात्पर्य यह कि छायावाद जिस आकांक्षा का परिणाम था उसका लक्ष्य केवल अभिव्यंजना की रोचक प्रणाली का विकास था जो धीरे धीरे अपने स्वतंत्र ढर्रे पर श्री मैथिलीशरण गुप्त, श्री मुकुटधार पांडेय आदि के द्वारा हो रहा था। +गुप्तजी और मुकुटधार पांडेय आदि के द्वारा स्वच्छंद नूतन धारा चली ही थी कि श्री रवींद्रनाथ ठाकुर की उन कविताओं की धूम हुई जो अधिकतर पाश्चात्य ढाँचे का आध्यात्मिक रहस्यवाद लेकर चली थी। परंतु ईसाई संतों के छायाभास (फैंटसमाटा) तथा योरोपीय काव्यक्षेत्र में प्रवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (सिंबालिज्म) के अनुकरण पर रची जाने के कारण बँग्ला में ऐसी कविताएँ 'छायावाद' कही जाने लगी थीं। यह 'वाद' क्या प्रकट हुआ, एक बने बनाए रास्ते का दरवाजा सा खुल पड़ा और हिन्दी के कुछ नए कवि उधर एकबारगी झुक पड़े। यह अपना क्रमश: बनाया हुआ रास्ता नहीं था। इसका दूसरे साहित्यक्षेत्र में प्रकट होना, कई कवियों का इसपर एक साथ चल पड़ना और कुछ दिनों तक इसके भीतर अंग्रेजी और बँग्ला की पदावली का जगह जगह ज्यों का त्यों अनुवाद रखा जाना, ये बातें मार्ग की स्वतंत्र उद्भावना नहीं सूचित करतीं। +'छायावाद' नाम चल पड़ने का परिणाम यह हुआ कि बहुत से कवि रहस्यात्मकता, अभिव्यंजना के लाक्षणिक वैचित्रय, वस्तुविन्यास की विशृंखलता, चित्रमयी भाषा और मधुमयी कल्पना को ही साधय मानकर चले। शैली की इन विशेषताओं की दूरारूढ़ साधना में ही लीन हो जाने के कारण अर्थभूमि के विस्तार की ओर उनकी दृष्टि न रही। विभावपक्ष या तो शून्य अथवा अनिर्दिष्ट रह गया। इस प्रकार प्रसारणोन्मुख काव्यक्षेत्र बहुत कुछ संकुचित हो गया। असीम और अज्ञात प्रियतम के प्रति अत्यंत चित्रमयी भाषा में अनेक प्रकार के प्रेमोद्गारों तक ही काव्य की गतिविधि प्राय: बँधा गई। हृत्तांत्राी की झंकार, नीरव संदेश, अभिसार, अनंत प्रतीक्षा, प्रियतम का दबे पाँव आना, ऑंखमिचौली, मद में झूमना, विभोर होना इत्यादि के साथ साथ शराब, प्याला, साकी आदि सूफी कवियों के पुराने सामान भी इकट्ठे किए गए। कुछ हेर फेर के साथ वही बँधी पदावली, वेदना का वही प्रकांड प्रदर्शन, कुछ विशृंखलता के साथ प्राय: सब कविताओं में मिलने लगा। +अज्ञेय और अव्यक्त को अज्ञेय और अव्यक्त ही रखकर कामवासना के शब्दों में प्रेमव्यंजना भारतीय काव्यधारा में कभी नहीं चली, यह स्पष्ट बात 'हमारे यहाँ यह भी था, वह भी था', की प्रवृत्तिवालों को अच्छी नहीं लगती। इससे खिन्न होकर वे उपनिषद् से लेकर तंत्र और योगमार्ग तक की दौड़ लगाते हैं। उपनिषद् में आए हुए आत्मा के पूर्ण आनंदस्वरूप के निर्देश, ब्रह्मानंद की अपरिमेयता को समझाने के लिए स्त्री पुरुष संबंधवाले दृष्टांत या उपमाएँ, योग के सहòदल कमल आदि की भावना को बीच बीच में वे बड़े संतोष के साथ उध्दृत करते हैं। यह सब करने के पहले उन्हें समझना चाहिए कि जो बात ऊपर कही गई है उसका तात्पर्य क्या है? यह कौन कहता है कि मत मतांतरों की साधना के क्षेत्र में रहस्यमार्ग नहीं चले? योग रहस्यमार्ग है; तंत्र रहस्यमार्ग है; रसायन भी रहस्यमार्ग है। पर ये सब साधनात्मक हैं; प्रकृत भावभूमि या +काव्यभूमि के भीतर चले हुए मार्ग नहीं। भारतीय परंपरा का कोई कवि मणिपूर, अनाहत आदि के चक्रों को लेकर तरह तरह के रंगमहल बनाने में प्रवृत्त नहीं हुआ। +संहिताओं में तो अनेक प्रकार की बातों का संग्रह है। उपनिषदों में ब्रह्म और जगत् आत्मा और परमात्मा के संबंध में कई प्रकार के मत हैं। वे काव्यग्रंथ नहीं हैं। उनमें इधर उधर काव्य का जो स्वरूप मिलता है वह ऐतिह्य, कर्मकांड, दार्शनिक चिंतन, सांप्रदायिक गुह्य साधना, मंत्रतंत्र, जादू टोना इत्यादि बहुत सी बातों में उलझा हुआ है। विशुद्ध काव्य का निखरा हुआ स्वरूप पीछे अलग हुआ। रामायण का आदिकाव्य कहलाना साफ यही सूचित करता है। संहिताओं और उपनिषदों को कभी किसी ने काव्य नहीं कहा। अब सीधा सवाल यह रह गया कि क्या वाल्मीकि से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक कोई एक भी ऐसा कवि बताया जा सकता है जिसने अज्ञेय और अव्यक्त को अज्ञेय और अव्यक्त ही रखकर प्रियतम बनाया हो और उसके प्रति कामुकता के शब्दों में प्रेमव्यंजना की हो। कबीरदास किस प्रकार हमारे यहाँ की ज्ञानवाद और सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद को लेकर चले, यह हम पहले दिखा आए हैं। 2 उसी भावात्मक रहस्यपरंपरा का यह नूतन भावभंगी और लाक्षणिकता के साथ आविर्भाव है। बहुत रमणीय है, कुछ लोगों को अत्यंत रुचिकर है, यह और बात है। +प्रणयवासना का यह उद्गार आध्यात्मिक पर्दे में ही छिपा न रह सका। हृदय की सारी कामवासनाएँ, इंद्रियों के सुखविलास की मधुर और रमणीय सामग्री के बीच एक बँधी हुई रूढ़ि पर व्यक्त होने लगी। इस प्रकार रहस्यवाद से संबंध न रखने-वाली कविताएँ भी छायावाद ही कही जाने लगीं। अत: 'छायावाद' शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्यशैली के संबंध में भी प्रतीकवाद (सिंबालिज्म) के अर्थ में होने लगा। +छायावाद की इस धारा के आने के साथ ही साथ अनेक लेखक नवयुग के प्रतिनिधि बनकर योरप के साहित्यक्षेत्र में प्रवर्तित काव्य और कला संबंधी अनेक नए पुराने सिध्दांत सामने लाने लगे। कुछ दिन 'कलावाद' की धूम रही और कहा जाता रहा 'कला का उद्देश्य कला ही है'। इस जीवन के साथ काव्य का कोई संबंध ही नहीं, उसकी दुनिया ही और है। किसी काव्य के मूल्य का निर्धारण जीवन की किसी वस्तु के मूल्य के रूप में नहीं हो सकता। काव्य तो एक लोकातीत वस्तु है। कवि एक प्रकार का रहस्यदर्शी (सीयर) या पैगंबर है। 3 इसी प्रकार क्रोचे के अभिव्यंजनावाद को लेकर बताया गया कि काव्य में वस्तु या वर्ण्य विषयक कुछ नहीं; जो कुछ है वह अभिव्यंजना के ढंग का अनूठापन है। 4 इन दोनों वादों के अनुसार काव्य का लक्ष्य उसी प्रकार सौंदर्य की सृष्टि या योजना कहा गया जिस प्रकार बेलबूटे या नक्काशी का। कविकल्पना को प्रत्यक्षजगत से अलग एक स्मरणीय स्वप्न घोषित किया जाने लगा और कवि सौंदर्य भावना के मद में झूमनेवाला एक लोकातीत जीव। कला और काव्य की प्रेरणा का संबंध स्वप्न और कामवासना से बतानेवाला मत भी इधर उधर उध्दृत हुआ। सारांश यह कि इस प्रकार के अनेक वाद प्रवाद पत्र पत्रिकाओं में निकलते रहे। +छायावाद की कविता की पहली दौड़ तो बंगभाषा की रहस्यात्मक कविताओं के सजीले और कोमल मार्ग पर हुई। पर उन कविताओं की बहुत कुछ गतिविधि अंग्रेजी वाक्यखंडों के अनुवाद द्वारा संघटित देख, अंग्रेजी काव्यों से परिचित हिन्दी कवि सीधे अंग्रेजी से ही तरह तरह के लाक्षणिक प्रयोग लेकर उनके ज्यों के त्यों अनुवाद जगह जगह अपनी रचनाओं में जड़ने लगे। 'कनक प्रभात', 'विचारों में बच्चों की साँस', 'स्वर्ण समय', 'प्रथम मधुबाल', 'तारिकाओं की तान', 'स्वप्निल कांति' ऐसे प्रयोग अजायबघर के जानवरों की तरह उनकी रचनाओं के भीतर इधर उधर मिलने लगे। निरालाजी की शैली कुछ अलग रही। उसमें लाक्षणिक वैचित्रय का उतना आग्रह नहीं पाया जाता जितना पदावली की तड़क भड़क और पूरे वाक्य के वैलक्षण्य का। केवल भाषा के प्रयोगवैचित्रय तक ही बात न रही। ऊपर जिन अनेक योरोपीय वादों और प्रवादों का उल्लेख हुआ है उन सबका प्रभाव भी छायावाद कही जानेवाली कविताओं के स्वरूप पर कुछ न कुछ पड़ता रहा। +कलावाद और अभिव्यंजनावाद का पहला प्रभाव यह दिखाई पड़ा कि काव्य में भावानुभूति के स्थान पर कल्पना का विधान ही प्रधान समझा जाने लगा और कल्पना अधिकतर अप्रस्तुतों की योजना करने तथा लाक्षणिक मूर्तिमत्ता और विचित्रता लाने में ही प्रवृत्त हुई। प्रकृति के नाना रूप और व्यापार इसी अप्रस्तुत योजना के काम में लाए गए। सीधे उनके मर्म की ओर हृदय प्रवृत्त न दिखाई पड़ा। पंतजी अलबत्ता प्रकृति के कमनीय रूपों की ओर कुछ रुककर हृदय रमाते पाए गए। +दूसरा प्रभाव यह देखने में आया कि अभिव्यंजना प्रणाली या शैली की विचित्रता ही सब कुछ समझी गई। नाना अर्थभूमियों पर काव्य का प्रसार रुक सा गया। प्रेमक्षेत्र (कहीं आध्यात्मिक, कहीं लौकिक) के भीतर ही कल्पना की चित्रविधाायिनी क्रीड़ा के साथ प्रकांड वेदना, औत्सुक्य, उन्माद आदि की व्यंजना तथा क्रीड़ा से दौड़ी हुई प्रिय के कपोलों पर की ललाई, हावभाव, मधुस्राव, अश्रुप्रवाह इत्यादि के रँगीले वर्णन करके ही अनेक कवि अब तक पूर्ण तृप्त दिखाई देते हैं। जगत और जीवन के नाना मार्मिक पक्षों की ओर उनकी दृष्टि नहीं है। बहुत से नए रसिक प्रस्वेद, गंधायुक्त, चिपचिपाती और भिनभिनाती भाषा को ही सब कुछ समझने लगे हैं। लक्षणाशक्ति के सहारे अभिव्यंजना प्रणाली या काव्यशैली का अवश्य बहुत अच्छा विकास हुआ है पर अभी तक कुछ बँधो हुए शब्दों की रूढ़ि चली चल रही है। रीतिकाल की श्रृंगारी कविता की भरमार की तो इतनी निंदा की गई। पर वही श्रृंगारी कविता , कभी रहस्य का पर्दा डालकर, कभी खुले मैदान , अपनी कुछ अदा बदलकर फिर प्राय: सारा काव्यक्षेत्र छेंककर चल रही है। +'कलावाद' के प्रसंग में बार बार आनेवाले 'सौंदर्य' शब्द के कारण बहुत से कवि बेचारी स्वर्ग की अप्सराओं को पर लगाकर कोहकाफ की परियों या बिहिश्त के फरिश्तों की तरह उड़ाते हैं, सौंदर्य चयन के लिए इंद्रधानुषी बादल, उषा, विकच कलिका, पराग, सौरभ, स्मित आनन, अधारपल्लव इत्यादि बहुत ही सुंदर और मधुर सामग्री प्रत्येक कविता में जुटाना आवश्यक समझते हैं। स्त्री के नाना अंगों के आरोप के बिना वे प्रकृति के किसी दृश्य के सौंदर्य की भावना ही नहीं कर सकते। 'कला कला' की पुकार के कारण योरप में गीत मुक्तकों (लिरिक्स) का ही अधिक चलन देखकर यहाँ भी उसी का जमाना यह बताकर कहा जाने लगा कि अब ऐसी लंबी कविताएँ पढ़ने की किसी को फुरसत कहाँ जिनमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता हो। अब तो विशुद्ध काव्य की सामग्री जुटाकर सामने रख देनी चाहिए जो छोटे छोटे प्रगीत मुक्तकों में ही संभव है। इस प्रकार काव्य में जीवन को अनेक परिस्थितियों की ओर ले जानेवाले प्रसंगों या आख्यानों की उद्भावना बंद सी हो गई। +खैरियत यह हुई कि कलावाद की उस रसवर्जिनी सीमा तक लोग नहीं बढ़े जहाँ यह कहा जाता है कि रसानुभूति के रूप में किसी प्रकार का भाव जगाना तो वक्ताओं का काम है, कलाकार का काम तो केवल कल्पना द्वारा बेलबूटे या बारात की फुलवारी की तरह की शब्दमयी रचना खड़ी करके सौंदर्य की अनुभूति उत्पन्न कराना है। हृदय और वेदना का पक्ष छोड़ा नहीं गया है, इससे काव्य के प्रकृतस्वरूप के तिरोभाव की आशंका नहीं है। पर छायावाद और कलावाद के सहसा आ धामकने से वर्तमान काव्य का बहुत सा अंश एक बँधी हुई लीक के भीतर सिमट गया, नाना अर्थभूमियों पर न जाने पाया, यह अब अवश्य कहा जाएगा। +छायावाद की शाखा के भीतर धीरे धीरे काव्यशैली का बहुत अच्छा विकास हुआ, इसमें संदेह नहीं। उसमें भावावेश की आकुल व्यंजना, लाक्षणिक वैचित्रय, मूर्ति प्रत्यक्षीकरण, भाषा की वक्रता, विरोध चमत्कार, कोमल पदविन्यास इत्यादि काव्य का स्वरूप संघटित करनेवाली प्रचुर सामग्री दिखाई पड़ी। भाषा के परिमार्जनकाल में किस प्रकार खड़ी बोली की कविता के रूखेसूखे रूप से ऊबकर कुछ कवि उसमें सरसता लाने के चिद्द दिखा रहे थे, यह कहा जा चुका है। 5 अत: आध्यात्मिक रहस्यवाद का नूतन रूप हिन्दी में न आता तो भी शैली और अभिव्यंजना पद्ध ति की उक्त विशेषताएँ क्रमश: स्फुरित होतीं और उनका स्वतंत्र विकास होता। हमारी काव्यभाषा में लाक्षण्0श्निाकता का कैसा अनूठा आभास घनानंद की रचनाओं में मिलता है, यह हम दिखा चुकेहैं। 6 +छायावाद जहाँ तक आध्यात्मिक प्रेम लेकर चला है वहाँ तक तो रहस्यवाद के ही अंतर्गत रहा है। उसके आगे प्रतीकवाद या चित्रभाषावाद (सिंबालिज्म) नाम की काव्यशैली के रूप में गृहीत होकर भी वह अधिकतर प्रेमगान ही करता रहा है। हर्ष की बात है कि अब कई कवि उस संकीर्ण क्षेत्र से बाहर निकलकर जगत् और जीवन के और और मार्मिक पक्षों की ओर भी बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। इसी के साथ काव्यशैली में प्रतिक्रिया के प्रदर्शन व नएपन की नुमाइश का शौक भी घट रहा है। अब अपनी शाखा की विशिष्टता को विभिन्नता की हद पर ले जाकर दिखाने की प्रवृत्ति का वेग क्रमश: कम तथा रचनाओं को सुव्यवस्थित और अर्थगर्भित रूप देने की रुचि क्रमश: अधिक होती दिखाई पड़ती है। +स्वर्गीय जयशंकर प्रसादजी अधिकतर तो विरहवेदना के नाना सजीले शब्दपथ निकालते तथा लौकिक और अलौकिक प्रणय मधुगान ही करते रहे, पर इधर 'लहर' में कुछ ऐतिहासिक वृत्त लेकर छायावाद की चित्रमयी शैली को विस्तृत अर्थभूमि पर ले जाने का प्रयास भी उन्होंने किया और जगत के वर्तमान दुखद्वेषपूर्ण मानव जीवन का अनुभव करके इस 'जले जगत के वृंदावन बन जाने' की आशा भी प्रकट की तथा 'जीवन के प्रभात' को भी जगाया। इसी प्रकार श्री सुमित्रानंदन पंत ने 'गुंजन' में सौंदर्य चयन से आगे बढ़ जीवन के नित्य स्वरूप पर भी दृष्टि डाली है; सुख दुख दोनों के साथ अपने हृदय का सामंजस्य किया है और जीवन की गति में भी लय' का अनुभव किया है। बहुत अच्छा होता यदि पंतजी उसी प्रकार जीवन कीअनेक परिस्थितियों को नित्य रूप में लेकर अपनी सुंदर, चित्रमयी प्रतिभा को अग्रसर करते जिस प्रकार उन्होंने 'गुंजन' और 'युगांत' में किया है। 'युगवाणी' में उनकी वाणी बहुत कुछ वर्तमान आंदोलनों की प्रतिध्वनि के रूप में परिणत होती दिखाई देती है। +निरालाजी की रचना का क्षेत्र तो पहले से ही कुछ विस्तृत रहा। उन्होंने जिस प्रकार 'तुम और मैं' में उस रहस्य 'नाद वेग ओंकार सार' का गान किया, 'जूही की कली' और 'शेफालिका' में उन्मद प्रणय चेष्टाओं के पुष्पचित्र खड़े किए उसी प्रकार 'जागरण वीणा' बजाई; इस जगत् के बीच विधवा की विधुर और करुण मूर्ति खड़ी की और इधर आकर 'इलाहाबाद के पथ पर' एक पत्थर तोड़ती दीन स्त्री के माथे पर के श्रमसीकर दिखाए। सारांश यह कि अब शैली के वैलक्षण्य द्वारा प्रतिक्रिया प्रदर्शन का वेग कम हो जाने से अर्थभूमि के रमणीय प्रसार के चिद्द भी छायावादी कहे जानेवाले कवियों की रचनाओं में दिखाई पड़ रहे हैं। +इधर हमारे साहित्य क्षेत्र की प्रवृत्तियों का परिचालन बहुत कुछ पच्छिम से होता है। कला में 'व्यक्तित्व' की चर्चा खूब फैलने से कुछ कवि लोक के साथ अपना मेल न मिलने की अनुभूति की बड़ी लंबी चौड़ी व्यंजना, कुछ मार्मिकता और कुछ फक्कड़पन के साथ करने लगे हैं। भावक्षेत्र में असामंजस्य की इस अनुभूति का भी एक स्थान अवश्य है, पर यह कोई व्यापक या स्थायी मनोवृत्ति नहीं। हमारा भारतीय काव्य +उस भूमि की ओर प्रवृत्त रहा है जहाँ जाकर प्राय: सब हृदयों का मेल हो जाता है। वह सामंजस्य को लेकर अनेकता में एकता को लेकर , चलता रहा है, असामंजस्य को लेकर नहीं। +उपर्युक्त परिवर्तनवाद और छायावाद को लेकर चलनेवाली कविताओं के साथ साथ दूसरी धाराओं की कविताएँ भी विकसित होती हुई चल रही हैं। द्विवेदीकाल में प्रवर्तित विविधा, वस्तुभूमियों पर प्रसन्न प्रवाह के साथ चलनेवाली काव्यधारा सर्वश्री मैथिलीशरण गुप्त, ठाकुर गोपालशरण सिंह, अनूप शर्मा, श्यामनारायण पांडेय, पुरोहित प्रतापनारायण, तुलसीराम शर्मा 'दिनेश' इत्यादि अनेक कवियों की वाणी के प्रसाद से विविधा प्रसंग, आख्यान और विषय लेकर निखरती तथा प्रौढ़ और प्रगल्भ होती चली आ रही है। उसकी अभिव्यंजना प्रणाली में अब अच्छी सरसता और सजीवता तथा अपेक्षित वक्रता का भी विकास होता चल रहा है। +यद्यपि कई वादों के कूद पड़ने और प्रेमगान की परिपाटी (लव लिरिक्स) का फैशन चल पड़ने के कारण अर्थभूमि का बहुत कुछ संकोच हो गया और हमारे वर्तमान काव्य का बहुत सा भाग कुछ रूढ़ियों को लेकर एक बँधी लीक पर बहुत दिनों तक चला, फिर भी स्वाभाविक स्वच्छंदता (ट्रई रोमांटिसिज्म) के उस नूतन पथ को ग्रहण करके कई कवि चले जिनका उल्लेख पहले हो चुका है। पं. रामनरेश त्रिपाठी के संबंध में द्वितीय उत्थान के भीतर कहा जा चुका है। तृतीय उत्थान के आरंभ में मुकुटधार पांडेय की रचनाएँ छायावाद के पहले किस प्रकार नूतन, स्वच्छंद मार्ग निकाल रही थीं यह भी हम दिखा आए हैं। मुकुटधारजी की रचनाएँ नरेतर प्राणियों की गतिविधि का भी रागरहस्यपूर्ण परिचय देती हुई स्वाभाविक स्वच्छंदता की ओर झुकती मिलेंगी। प्रकृति प्रांगण के चर अचर प्राणियों का रागपूर्ण परिचय उनकी गतिविधि पर आत्मीयताव्यंजक दृष्टिपात, सुख दुख में उनके साहचर्य की भावना, ये सब बातें स्वाभाविक स्वच्छंदता के पथचिद्द हैं। सर्वश्री सियारामशरण गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, ठाकुर गुरुभक्त सिंह, उदयशंकर भट्ट इत्यादि कई कवि विस्तृत अर्थभूमि पर स्वाभाविक स्वच्छंदता का मर्मपथ ग्रहण करके चल रहे हैं। वे न तो केवल नवीनता के प्रदर्शन के लिए पुराने छंदों का तिरस्कार करते हैं, न उन्हीं में एकबारगी बँधाकर चलते हैं। वे प्रसंग के अनुकूल परंपरागत पुराने छंदों का व्यवहार और नये ढंग के छंदों तथा चरण व्यवस्थाओं का विधान भी करते हैं। व्यंजक, चित्रविन्यास, लाक्षणिक वक्रता और मूर्तिमत्ता, सरसपदावली आदि का भी सहारा लेते हैं, पर इन्हीं बातों को सब कुछ नहीं समझते। एक छोटे से घेरे में इनके प्रदर्शनमात्र से वे संतुष्ट नहीं दिखाई देते हैं। उनकी कल्पना इस व्यक्त जगत् और जीवन की अनंत वीथियों में हृदय को साथ लेकर विचरने के लिए आकुल दिखाई देती है। +तृतीयोत्थान की प्रवृत्तियों के इस संक्षिप्त विवरण से ब्रजभाषा काव्यपरंपरा के अतिरिक्त इस समय चलनेवाली खड़ी बोली की तीन मुख्य धाराएँ स्पष्ट हुई होंगी , द्विवेदीकाल की क्रमश: विस्तृत और परिष्कृत होती हुई धारा, छायावाद कही जानेवाली धारा तथा स्वाभाविक स्वच्छंदता को लेकर चलती हुई धारा जिसके अंतर्गत राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की लालसा व्यक्त करनेवाली शाखा भी हम ले सकते हैं। ये धाराएँ वर्तमानकाल में चल रही हैं और अभी इतिहास की सामग्री नहीं बनी हैं। इसलिए इनके भीतर की कुछ कृतियों और कुछ कवियों का थोड़ा सा विवरण देकर ही हम संतोष करेंगे। इनके बीच मुख्य भेद वस्तुविधान और अभिव्यंजनकला के रूप और परिमाण में है। पर काव्य की भिन्न भिन्न धाराओं के भेद इतने निर्दिष्ट नहीं हो सकते कि एक की कोई विशेषता दूसरी में कहीं दिखाई ही न पड़े। जबकि धाराएँ साथ साथ चल रही हैं तब उनका थोड़ा बहुत प्रभाव एक दूसरे पर पड़ेगा ही। एक धारा का कवि दूसरी धारा की किसी विशेषता में भी अपनी कुछ निपुणता दिखाने की कभी कभी इच्छा कर सकता है। धाराओं का विभाग सबसे अधिक सामान्य प्रवृत्ति देखकर ही किया जा सकता है फिर भी दो चार कवि ऐसे रह जाएँगे जिनमें सब धाराओं की विशेषताएँ समान रूप से पाई जाएँगी, जिनकी रचनाओं का स्वरूप मिलाजुला होगा। कुछ विशेष प्रवृत्ति होगी भी तो व्यक्तिगत होगी। +ब्रजभाषा काव्यपरंपरा. +जैसाकि द्वितीयोत्थान के अंत में कहा जा चुका है, ब्रजभाषा की काव्यपरंपरा भी चल रही है। यद्यपि खड़ी बोली का चलन हो जाने से अब ब्रजभाषा की रचनाएँ प्रकाशित बहुत कम होती हैं पर अभी देश में न जाने कितने कवि नगरों और ग्रामों में बराबर ब्रजवाणी की रसधारा बहाते चल रहे हैं। जब कहीं किसी स्थान पर कवि सम्मेलन होता है तब न जाने कितने अज्ञात कवि आकर अपनी रचनाओं से लोगों को तृप्त कर जाते हैं। रत्नाकरजी की 'उद्ध वशतक' ऐसी उत्कृष्ट रचनाएँ इस तृतीय उत्थान में ही निकली थीं। सर्गबद्ध प्रबंध काव्यों में हमारा 'बुद्ध चरित'7 संवत् 1979 में प्रकाशित हुआ जिसमें भगवान बुद्ध का लोकपावन चरित उसी परंपरागत काव्यभाषा में वर्णित है जिसमें राम कृष्ण की लीला का अब भी घर घर गान होता है। श्री वियोगीहरिजी की 'वीरसतसई' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिले बहुत दिन नहीं हुए। देवपुरस्कार से पुरस्कृत श्री दुलारे लालजी भार्गव के दोहे बिहारी के रास्ते पर चल ही रहे हैं। अयोध्या के श्री रामनाथ ज्योतिषी को 'रामचंद्रोदय' काव्य के लिए देवपुरस्कार थोड़े ही दिन हुए मिला है। मेवाड़ के श्री केसरीसिंह बारहठ का 'प्रतापचरित' वीररस का एक बहुत उत्कृष्ट काव्य है जो संवत् 1992 में प्रकाशित हुआ है। पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की सरस कविताओं की धूम कवि-सम्मेलनों में बराबर रहा करती है। प्रसिद्ध कलाविद् रायकृष्णदासजी का 'ब्रजरज' इसी तृतीयोत्थान के भीतर प्रकाशित हुआ है। इधर श्री उमाशंकर वाजपेयी 'उमेश' जी की 'ब्रजभारती' में ब्रजभाषा बिल्कुल नई सजधाज के साथ दिखाई पड़ी है। +हम नहीं चाहते, और शायद कोई भी नहीं चाहेगा, कि ब्रजभाषा काव्य की धारा लुप्त हो जाए। उसे यदि इस काल में भी चलना है तो वर्तमान भावों को ग्रहण करने के साथ ही साथ भाषा का भी कुछ परिष्कार करना पड़ेगा। उसे चलती ब्रजभाषा के अधिक मेल में लाना होगा। अप्रचलित संस्कृत शब्दों को भी अब बिगड़े रूपों में रखने की आवश्यकता नहीं। 'बुद्ध चरित' काव्य में भाषा के संबंध में हमने इसी पद्ध ति का अनुसरण किया था और कोई बाधा नहीं दिखाई पड़ी थी। +काव्यखंड (संवत् 1975) +प्रकरण 4 + +हिन्दू: +हिन्दूओं का मानना है कि हिंदू धम॔ विश्व के सबसे पुराने धर्मो मे से एक हे। यह धम॔ पुन॔जनम में यकीन करता हे। यह धम॔ अहिन्सा,दया, जातीय शुद्धता का संस्कार सिखाता हे। हिन्दू धर्म को सनातन, वैदिक या आर्य धर्म भी कहते हैं। हिन्दू एक अप्रभंश शब्द है। प्राचीनकाल में कोई धर्म विशेष प्रचलित नहीं था |था। एक हजार वर्ष पूर्व न तो हिंदू और न ही सनातन शब्द धर्म के नाम से प्रचलन में था। 12वीं शती ई0 सन के आसपास नागवंश की लिपि +जो अब देवनागरी नाम से प्रसिद्ध है में लिपिबद्ध ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया, जो लद्दाख और पाक से बहती है। +भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की 'स' ध्वनि ईरानी भाषाओं की 'ह' ध्वनि में बदल जाती है। आज भी भारत के कई इलाकों में 'स' को 'ह' उच्चारित किया जाता है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। किंतु पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोगों को आज भी सिंधू या सिंधी कहा जाता है। +ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक 'अवेस्ता' में 'हिन्दू' और 'आर्य' शब्द का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिंदू' कहने लगे। +आर्य शब्द का अर्थ : आर्य समाज के लोग इसे आर्य धर्म कहते हैं, जबकि आर्य किसी जाति या धर्म का नाम न होकर इसका अर्थ सिर्फ श्रेष्ठ ही माना जाता है। अर्थात जो मन, वचन और कर्म से श्रेष्ठ है वही आर्य है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। +हिन्दू इतिहास की भूमिका : जब हम इतिहास की बात करते हैं तो वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है। अर्थात यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: काल्पनिक रूप से कृष्ण के समय (अनिश्चित) में वेद व्यास द्वारा पूरी तरह से वेद को चार भाग में विभाजित कर दिया। इस मान से लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। यह भी तथ्‍य नहीं नकारा जा सकता कि कृष्ण के आज से 5500 वर्ष पूर्व होने के तथ्‍य ढूँढ लिए गए। +हिंदू और जैन धर्म की उत्पत्ति पूर्व आर्यों की अवधारणा में है जो 4500 ई.पू. (आज से 6500 वर्ष पूर्व) मध्य एशिया से हिमालय तक फैले थे। कहते हैं कि आर्यों की ही एक शाखा ने पारसी धर्म की स्थापना भी की। इसके बाद क्रमश: यहूदी धर्म 2 हजार ई.पू.। बौद्ध धर्म 500 ई.पू.। ईसाई धर्म सिर्फ 2000 वर्ष पूर्व। इस्लाम धर्म 14 सौ साल पहले हुए। +लेकिन धार्मिक साहित्य अनुसार हिंदू धर्म की कुछ और धारणाएँ भी हैं। मान्यता यह भी है कि 90 हजार वर्ष पूर्व इसकी शुरुआत हुई थी। दरअसल हिंदुओं ने अपने इतिहास को गाकर, रटकर और सूत्रों के आधार पर मुखाग्र जिंदा बनाए रखा। यही कारण रहा कि वह इतिहास धीरे-धीरे काव्यमय और श्रंगारिक होता गया। वह दौर ऐसा था जबकि कागज और कलम नहीं होते थे। इतिहास लिखा जाता था शिलाओं पर, पत्थरों पर और मन पर। +जब हम हिंदू धर्म के इतिहास ग्रंथ पढ़ते हैं तो ऋषि-मुनियों की परम्परा के पूर्व मनुओं की परम्परा का उल्लेख मिलता है जिन्हें जैन धर्म में कुलकर कहा गया है। ऐसे क्रमश: 14 मनु माने गए हैं जिन्होंने समाज को सभ्य और तकनीकी सम्पन्न बनाने के लिए अथक प्रयास किए। धरती के प्रथम मानव का नाम स्वायंभव मनु था और प्रथम ‍स्त्री थी शतरूपा। + +जे एल पी टी नी५ काञ्जी: +JLPT Level N5. +The following is a list of 80 kanji, which is most of the kanji necessary to pass the N5 level of the Japanese Language Proficiency Test (JLPT), prior to the updating of the list several years ago. +There are now 103 kanji in the level N5 exam (23 more than listed below). Kanji used in the N5 test are used in more difficult levels, too. +As of 2010, the JLPT no longer publishes an official vocabulary list. + +स्वास्थ्य शिक्षा: +यहाँ पर स्वास्थ्य के बारे में छोटे-छोटे लेख उपलब्ध कराए जाँएंगे। + +हिस्टेरेक्टॉमी: +हिस्टेरेक्टॉमी एक शल्यक्रिया है, जिसके माध्यम से किसी महिला के गर्भाशय को निकाला जाता है। गर्भाशय महिलाओं की प्रजनन प्रणाली का एक अंग है तथा यह मनुष्य की बंद मुट्ठी के आकार का होता है। आपका गर्भाशय निकाले जाने के बाद आप संतान पैदा नहीं कर सकती, तथा इसके बाद आपको मासिक धर्म भी नहीं होगा। यदि आपके अंडाशय (ओवरी) नहीं निकाले गए हैं, तो आप मादा हार्मोन पैदा करती रहेंगी। यदि आपके अंडाशय (ओवरी) निकाले गए हैं, तो मासिक धर्म रुक जाएगा। +हिस्टेरेक्टॉमी शल्य क्रिया की कई किस्में हैं। अपने चिकित्सक से पूछें कि आप किस प्रकार की शल्य क्रिया करा रहीं हैं तथा क्या आपकी गर्भग्रीवा (सर्विक्स), डिंबवाही नलियां तथा अंडाशय भी हटाए जा रहे हैं। +• योनीय (वेजाइनल) हिस्टेरेक्टॉमी - गर्भाशय को योनि मार्ग से हटाया जाता है, तथा पेट में कोई चीरफाड़ नहीं होती। +• उदरीय (एब्डॉमिनल) हिस्टेरेक्टॉमी - पेट में चीरा लगाकर, गर्भाशय को निकाला जाता है। +• लेप्रोस्कोपिक हिस्टेरेक्टॉमी - पेट में कई छोटे सुराख किए जाते हैं और डॉक्टर इन छोटे सुराखों के माध्यम से लेप्रोस्कोप का प्रयोग करते हुए काम करता है। यह यंत्र डॉक्टर को शल्य क्रिया के दौरान छोटे स्थानों को देख पाना आसान बनाता है। अन्य छोटे यंत्र गर्भाशय को अलग करने और निकालने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। +तैयारी के लिए. +• आपके द्वारा ली जाने वाली सभी दवाओं के बारे में अपने डॉक्टर को बताएँ। किसी भी डॉक्टर द्वारा निर्धारित या काउंटर पर मिलने वाली दवाओं, विटामिन और जड़ी बूटियों के बारे में भी अवश्य बताएँ। +• अपने चिकित्सक से पूछें कि क्या आपको अपनी शल्य क्रिया वाले दिन की सुबह अपनी दवाई लेनी चाहिए। यदि हाँ, तो पानी की छोटी-छोटी घूंट के साथ ही इन्हें लें। +• अपनी शल्य क्रिया से पहले की मध्य रात्रि के बाद से ही, कुछ खाएं-पिएं नहीं, इसमें पानी भी शामिल है। +• यदि आपको दवाओंए खाद्य पदार्थ या अन्य चीज़ों से कोई एलर्जी है, तो शल्य क्रिया से पहले इसके बारे में स्टाफ को बताएँ। +• जब आप अस्पताल से लौटती हैं, उस समय आपके परिवार का कोई वयस्क सदस्य अथवा मित्र/सहेली आपको घर लेकर जाएं। आपके लिए गाड़ी चलाना अथवा अकेले जाना, सुरक्षित नहीं है। +शल्य क्रिया के दौरान. +• आप अस्पताल का गाउन पहनेंगी। +• आपकी बांह की शिरा में एक अंतः शिरा (इंट्रावेनस) नली डाली जाएगी जिसके माध्यम से आपको दवाएं तथा द्रव दिए जाएंगे। +• आपको एक ट्राली पर शल्य क्रिया कक्ष में ले जाया जाएगा तथा वहां मेज पर लिटाया जाएगा। +• आपके अंतः शिरा (आई वी) में दवा डाली जाएगी, जिससे आप निद्राग्रस्त तथा दर्दमुक्त रहें। +• आपको एक कैथेटर लगाया जाएगा, जिससे होकर आपकी मूत्रनली से मूत्र निकलता रहेगा। यह नली सामान्यतः आपकी शल्य क्रिया के अगले दिन, प्रातः काल हटा दी जाती है। +• एक और नली आपकी नाक के माध्यम से डाली जा सकती है, जो आपके पेट तक पहुंचेगी तथा वहां से द्रवों को हटाएगी, जिससे आपको अपने पेट में तकलीफ का अनुभव न हो। यह नली सामान्यतः आपके स्वास्थ्य लाभ कक्ष (रिकवरी रूम) से निकलने से पूर्व हटा ली जाती है। +• शल्य क्रिया के क्षेत्र या उदर को साफ किया जाता है। +• आपके गर्भाशय को निकाल दिया जाता है। आपकी गर्भाशय ग्रीवा, नलियों तथा अंडकोशों को भी हटाया जा सकता है। +• काटे गए भागों को टांकों, स्टेपल्स अथवा विशेष प्रकार की टेप, जिन्हें ‘स्टेरी-स्ट्रिप’ कहा जाता है, द्वारा बंद किया जाता हैं। +• काटे गए भागों के ऊपर पट्टी बांध दी जाती है। +शल्य क्रिया बाद. +अस्पताल में. +• आपको पुनः रिकवरी रूम में ले जाया जाता है, जहां आपकी उस समय तक गहन देखभाल की जाती है, जब तक आप जाग जाएं तथा भली प्रकार हों। +• आपके श्वसन, रक्तचाप तथा नाड़ी की बार-बार जांच की जाती है। +• यदि आप अस्पताल में रह रही हैं, तो आपको आपके कक्ष में ले जाया जाएगा। +• आपकी टांगों के बीच में एक पैड रखा जाएगा क्योंकि हो सकता है आपकी योनि से रक्तस्राव हो। +• जब आप बिस्तर में रहती हैं तब रक्त जमने से रोकने के लिए आपको अपनी टांगों पर विशेष प्रकार की स्टॉकिंग्स पहनने की आवश्यकता हो सकती है। +• अस्पताल का स्टाफ आपको खांसने, गहरी सांस लेने तथा ‘इंसेटिव स्पिरोमीटर’ का प्रयोग करने के सही तरीके सिखा सकता हैं। ‘इंसेटिव स्पिरोमीटर’ वह यंत्र है जो आपको गहरी सांस लेने में सहायता करने हेतु प्रयोग में लाया जाता है। ये अभ्यास फेफड़ों के वायु मार्ग खोलने तथा निमोनिया से बचाव में सहायक होते हैं। यदि आपके पेट में चीरा लगाया गया है, तो अपने काटे गए स्थान के ऊपर तकिया अथवा तह किया गया कंबल, गहरी सांस लेते अथवा खांसते समय, सहारे के लिए रखें। जब आप जाग रही हों तब प्रत्येक 1 से 2 घंटों में, ये अभ्यास करें। +• आपका दर्द नियंत्रित करने के लिए, आपको दवाएं दी जाएंगी। यदि आपको दर्द होता है तो अपनी नर्स को बताएं। +• इंट्रावेनस (आई वी) का प्रयोग उस समय तक आपको दवाएं एवं द्रव प्रदान करने के लिए किया जाता है, जब तक आप भली प्रकार खाने-पीने में सक्षम नहीं हो जातीं। यदि आपके पेट में तकलीफ नहीं है तो आपको कुछ ‘आइस चिप’ भी दी जा सकती हैं। +• आपको प्रारंभ में स्वच्छ द्रव प्रदान किए जाएंगे तथा फिर धीरे-धीरे आप नियमित भोजन की ओर बढेंगी। +• आपकी पट्टी शल्य क्रिया के अगले दिन खोल दी जाएगी। आपको लगाए गए चीरे में ये हो सकते हैं: +• यदि आपकी योनीय (वेजाइनल) हिस्टेरेक्टामी हुई है तो, आपको चीरा नहीं लगाया जाएगा। +• आपकी सुरक्षा की दृष्टि से, जब आप अस्पताल छोड़ती हैं तब आपके साथ कोई वयस्क संबंधी अथवा मित्र, आपको घर ले जाने के लिए साथ होना/होनी चाहिए। घर में आपके कम से कम पहले 24 घंटों के दौरान कोई आपके साथ रहना चाहिए। +घर में. +• अपनी दवाएं निर्देशानुसार लें। +• अपने चिकित्सक के साथ एक अनुवर्तन मुलाकात निश्चित करें। आपको अपने चिकित्सक के साथ 4 से 6 सप्ताह में मुलाकात करने की आवश्यकता होगी। +• चीरा लगे स्थान को धीरे से साबुन एवं पानी द्वारा साफ करें तथा थपकी देकर सुखा लें। आप शावर अथवा स्पंज-स्नान कर सकती हैं, परंतु टब में स्नान न करें। +• शल्य क्रिया के बाद, योनि से 2 से 4 सप्ताह तक थोड़ी मात्रा में स्राव सामान्य है। प्रत्येक कुछ घंटों बाद पैड बदलती रहें। योनि क्षेत्र को साबुन और पानी से साफ करें तथा थपकी देकर सुखा लें। +• जब तक आपका चिकित्सक आपकी जांच न कर लें, अपनी योनि में कुछ न डालें। +गतिविधि की सीमाएं. +• 4 से 6 सप्ताह तक अपनी गतिविधियां सीमित रखें। +• 2 सप्ताह तक 4ण्5 किलो ( 10 पौंड) से अधिक वजन न उठाएं। +• आप हल्के घरेलू कार्य जैसे बर्तन साफ करना, खाना बनाना आदि कर सकती हैं। +• कम से कम दो सप्ताह तक, मेहनत वाले कार्य जैसे वैक्यूम करना, व्यायाम आदि न करें। +• 2 सप्ताह तक वाहन न चलाएं, परंतु आप कार में छोटी यात्राएं कर सकती हैं। +• सीढ़ियों पर धीमी गति से, एक समय में एक कदम रखते हुए चढ़ें तथा उतरें। +• सैर करें, छोटी दूरी से प्रारंभ करें। जितनी दूरी तथा गति बढ़ा सकती हैं, धीरे-धीरे बढ़ाएं। +अन्य मामले. +• यदि आपके अंडाशय (ओवरी) निकाले गए हैं, तो आपको रजोनिवृत्ति के लक्षण हो सकते हैं, जैसे गुस्सा आना, योनि का सूखापन अथवा मूड बदलना। +• शल्य क्रिया के बाद अनेक प्रकार के भाव मन में आना सामान्य बात है। आप उदास, भयभीत, आशंकित अथवा क्रोधित हो सकती हैं। ये भावनाएं अपने प्रियजनों तथा मित्रों को बताएं, जिससे वे इनसे उबरने में आपकी सहायता कर सकें। यदि कुछ सप्ताह बाद भी उदासी दूर नहीं होती है तो अपने चिकित्सक से परामर्श प्राप्त करें। +• इस शल्य क्रिया से आपके रूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसमें कोई भौतिक परिवर्तन नहीं होता, हाँ केवल आपको जहां चीरा लगा था, वहां दाग का निशान हो सकता है। +• आपकी शल्य क्रिया से आपकी संभोग कुशलता अथवा आपके साथ संभोग करते समय आपका साथी क्या महसूस करता है, उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अपने चिकित्सक से पूछें कि आप सेक्स गतिविधियां कब से पुनः प्रारंभ कर सकती हैं तथा यदि आपके मन में कोई चिंता है तो उसके संबंध में भी पूछें। +यदि आपको निम्नलिखित में से कुछ हो तो तुरंत अपने चिकित्सक को फोन करें- +• कंपन, सर्दी लगना अथवा 38 डिग्री ब् या 101 डिग्री थ् से अधिक बुखार +• कोई चीरा जो सूजा हो, लाल हो, उसमें रिसाव हो अथवा वह खुल गया हो +• चीरे के स्थान से रक्तस्राव +• आपके पांवों में दर्द, गर्मी अथवा मुलायमपन +• योनि से अधिक रक्तस्राव, एक घंटे में 2 से 3 पैड भर जाना +• योनि से गंधयुक्त स्राव +• पेशाब करने में परेशानी +• पेशाब करते समय जलन अथवा बार-बार पेशाब आने का अनुभव +• त्वचा में जलन, सूजन अथवा चकते होना +• मनः स्थिति में तेजी से बदलाव अथवा नैराश्य का भाव +यदि आपको अचानक सांस लेने में तकलीफ अथवा सीने में दर्द हो, तो तुरंत फोन करें। +"यदि आपके मन में कोई प्रश्न अथवा चिंता है तो अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।" + +आपात स्थिति हेतु योजना तैयार करना: +आपात स्थिति कोई तूफान, घर में लगी आग, बाढ़ अथवा बम विस्फोट हो सकती है । स्वयं की तथा +अपने परिवार की सहायता हेतु तथा आपात स्थिति के प्रभावों को सीमित करने के लिए, पहले से योजना +तैयार करें । +तैयारी के लिए, इन तीन कदमों का प्रयोग करें: +कदम 1. एक योजना तैयार करें. +स्वयं के लिए तथा अपने परिवार के लिए एक आपातकालीन योजना तैयार करें । इस योजना के संबंध में, +अपने परिवार से बात करें । आपके परिवार को घर में रहना पड़ सकता है अथवा उनको घर छोड़कर +किसी सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ सकता है । यह निर्णय लें कि आपके परिवार के सदस्य आपस में किस +प्रकार संपर्क करेंगे । आप यह निर्णय ले सकते हैं कि परिवार का प्रत् येक सदस्य किसी एक व्यक्ति से फोन +अथवा ई-मेल द्वारा संपर्क करे । नगर से बाहर का संपर्क सर्वश्रेष्ठ रहेगा, क्योंकि स्थानीय संपर्क भी हादसे +से प्रभावित हो सकता है अथवा संभव है कि स्थानीय फोन सेवाएँ कार्यशील न हों । परिवार के लिए मिलने +के स्थान के संबंध में योजना तैयार करें तथा यह भी तय करें कि प्रत्येक व्यक्ति वहाँ कैसे पहुँचेगा । +आपकी योजना में ये सब भी शामिल होनी चाहिए: +विशेष परिस्थितियों के लिए पहले से योजना तैयार करें +• बच्चे तथा शिशु देखभाल केन्द्र अथवा स्कूल - अधिकांश स्कूलों तथा शिशु देखभाल केन्द्रों की अपनी आपातकालीन योजनाएँ होती हैं तथा वे आग लगने, भूकंप तथा तूफान की स्थिति संबंधी अभ्यास कराते हैं । यह सुनिश्चित करें कि शिशु देखभाल केन्द्र अथवा स्कूल के पास आपके कार्यस्थल, घर का वर्तमान फोन नंबंर एवं ई-मेल पता उपलब्ध है । यह पूछना सुनिश्चित करें: +• कार्यस्थल - अपने नियोजक से कार्य संबंधी नीतियों तथा आपातकालीन योजनाओं पर चर्चा करें यदि आपको कार्य पर जाना होगा तो अपने परिवार के संबंध में योजना तैयार करें । +• विशेष आवश्यकताओं वाले लोग - कोई चिकित्सकीय चेतावनी टैग अथवा कड़ा पहनें, जिसमें आपकी स्वास्थ्य देखभाल संबंधी आवश्यकताओं की सूची दी गई हो । आपातकालीन स्थिति में सहायता हेतु किसी के उपलब्ध होने संबंधी योजना बनाएँ । इस व्यक्ति के, आपके घर में प्रवेश करने तथा यह जानने की आवश्यकता होगी कि आपकी देखभाल किस प्रकार की जाए । +• सुरक्षित शरण स्थल - यदि ऐसी आपात स्थिति आती है, जिसके दौरान हवा में जहरीलापन हो, तब आपको घर के भीतर रहने के लिए कहा जा सकता है । सभी भट्ठियाँ, एयर कंडीशनर तथा पंखे बंद कर दें । रोशनदान बंद करें । सभी दरवाजे एवं खिड़कियाँ बंद करके ताले लगा दें । सूचनाओं के लिए टेलीविजन तथा बैटरी चालित रेडियो को देखें/सुनें । +• पालतू पशु - अपने पालतू पशु के लिए एक आपूर्ति किट तैयार करें, जिसमें आहार, पानी, दवाएँ, डोली, पट्टा तथा बिछौना (बिल्लियों के लिए) शामिल हों । अपने पालतू पशु को अपने साथ लाने अथवा उसकी देखभाल की जिम्मेदारी किसी को देने की तैयारी रखें । पालतू पशु को पूरे टीके लगाकर रखें तथा उनके सूचक पट्टे (टैग) उनके गले में लगाकर रखें । +कदम 2. आपातकालीन किट तैयार करना. +यदि कोई आपात स्थिति आती है तो संभव है कि आपको कई दिनों अथवा सप्ताहों तक भोजन अथवा पानी +न मिल पाए तथा बिजली भी बंद हो सकती है । अपनी आपातकालीन आपूर्तियाँ एक डिब्बे जैसे बड़े थैले +अथवा प्लास्टिक के कंटेनर में रखें, जिसे घर छोड़ने की आवश्यकता पड़ने पर आप ले जा सकें । इन +आपूर्तियों के ताजा होने की स्थिति हेतु प्रत्येक कुछ महीनों बाद इनकी जाँच करें । +प्रत्येक व्यक्ति तथा पालतू पशु के लिए इन मदों की 3 दिन की आपूर्ति तैयार रखें । +प्राथमिक सहायता किट. +यदि आपको घर छोड़ने की आवश्यकता पड़ती है, तो निम्नलिखित आपूर्तियाँ भी शामिल करें: +कार हेतु आपूर्तियाँ. +अपनी कार में हमेशा एक छोटा सा आपातकालीन आपूर्ति किट तैयार रखें: +कदम 3. सूचनाओं को सुनें. +स्थानीय तथा राज्य के अधिकारियों की जनता के बचाव हेतु योजनाएँ होती हैं । शांत रहें तथा टेलीविजन, +रेडियो अथवा इंटरनेट पर रिपोर्टों को देखें/सुनें । अतिरिक्त बैटरियों के साथ एक रेडियो रखें, जिससे +बिजली न आने की स्थिति में उसका उपयोग किया जा सके । यदि सीमित संचार संभव हो, तो आपको +यह निर्णय लेना पड़ सकता है कि आपके तथा आपके परिवार के लिए क्या सर्वश्रेष्ठ है । + +शिशु को स्तनपान कराने हेतु तैयारी: +माँ का दूध, आपके शिशु के लिए परिपूर्ण आहार है। यही एकमात्र आहार है, जिसकी आपके +शिशु को जीवन के प्रारंभिक 6 महीनों में आवश्यकता होती है। स्तनपान किस प्रकार कराया +जाए, यह सीखने में समय लग सकता है। धैर्य रखें। आप और आपका शिशु दोनों कुछ नया +सीख रहे हैं। +आपका शरीर प्रारंभ में जो दुग्ध निर्मित करता है, वह कोलोस्ट्रम कहलाता है। कोलोस्ट्रम ऐसे +पोषकों तथा एंटीबॉडीज़ से समृद्ध होता है, जो आपके शिशु की संक्रमणों तथा रोगों से रक्षा +करते हैं। जैसे-जैसे आपका शिशु बड़ा होता जाता है, आपके स्तनों से निकलने वाला दूध +बदलता जाता है। यह पतला एवं सफेद द्रव बन जाता है, जो कभी-कभी नीलापन लिए भी +लग सकता है। +शिशुओं को अतिरिक्त जल की आवश्यकता नहीं होती। उन्हें केवल दूध की ही आवश्यकता +होती है। अपने शिशु को उसके जीवन के प्रारंभ के कुछ सप्ताहों में बोतल, शांत करने वाले +अन्य साधन देने अथवा निप्पल शील्ड के प्रयोग से बचें, बशर्ते चिकित्सक द्वारा ऐसा करने के +लिए न कहा गया हो। आप जितना अधिक स्तनपान कराएंगी आपके शरीर में उतना ही +अधिक दूध उत्पादित होगा। प्रारंभ में शिशुओं द्वारा, प्रत्येक 1 से 3 घंटों में स्तनपान करना +सामान्य बात है। +स्तनपान कराने हेतु तैयार होना. +अपने हाथ धोकर साफ करें तथा आराम से बैठें। अपने शिशु को पकड़ने तथा सहारा देने के +लिए तकियों का प्रयोग करें। कुछ माताएं स्तनपान कराने से पहले, अपने स्तनों की हल्की +मालिश करती हैं। +शिशु को स्तनपान कराने हेतु, गोदी में लेना. +ऐसी अनेक स्थितियां हैं जिनमें आप अपने शिशु को स्तनपान कराने हेतु, गोदी में ले सकती +हैं। यह सुनिश्चित करें कि आपने अपने शिशु को अपने स्तनों की ऊंचाई पर उठाया हुआ है, +जिससे आपको अपने शिशु के ऊपर झुकना न पड़े। हमेशा अपना स्तन शिशु के मुंह में डालने +का प्रयास करने के स्थान पर, शिशु को अपने स्तन तक लाएं। +'फुटबाल' तथा ‘क्रास क्रैडल’ मुद्राओं में पकड़ने से, नवजात शिशु के सिर को सर्वश्रेष्ठ तरीके से +सुरक्षित रूप से पकड़ा जा सकता है। +• फुटबाल अथवा हाथ के नीचे पकड़ +1. शिशु को अपनी बगल में, तकिए पर लिटाएं। +2. अपने स्तन को, नीचे चार उंगलियां तथा ऊपर अंगूठा रखकर अंग्रेजी अक्षर ष्ब्ष् का आकार बनाते हुए, सहारा दें। यह सुनिश्चित करें कि आपकी उंगलियां, आपके निप्पल के गहरे रंग के भाग ‘एरेओला’ के पीछे हैं। +3. अपने शिशु को अपनी बांह के नीचे लपेटकर रखें। अपनी हथेली, शिशु की पीठ के ऊपरी भाग में कंधों के बीच रखें। अपने शिशु के सिर को गर्दन पर तथा कानों के नीचे नियंत्रित रखें। +4. शिशु को अपने स्तनों के स्तर तक ऊपर उठाएं। +5. अपने शिशु के होठों पर, अपने निप्पल गुदगुदाएं तथा शिशु द्वारा मुंह खोले जाने की प्रतीक्षा करें। +6. शिशु को अपने स्तनों तक लाएं। +• क्रास क्रैडल पकड़ +1. शिशु को अपनी गोदी में तकिए पर लिटाएं, जिससे वह आपके स्तन के सामने रहे। +2. अपने स्तन को, उस तरह से हाथ द्वारा, ऊपर अपनी उंगलियों से तथा नीचे अंगूठे द्वारा, अंग्रेजी अक्षर ‘U’ का आकार बनाते हुए सहारा दें। +3. अपने शिशु के पांव, उस स्तन से दूसरी तरफ के हाथ के नीचे रखें, जिससे वह स्तनपान करेगा। +4. अपने शिशु के सिर तथा पीठ को, अपनी उस बांह एवं हाथ द्वारा सहारा दें, जिसके नीचे आपके शिशु के पांव हैं। +• क्रैडल (झूला) पकड़ +बहुत सी महिलाओं को प्रारंभ में यह पकड़ कठिन महसूस होती है। जैसे-जैसे आपका शिशु कुछ बड़ा होता है, तथा पालन प्राप्त करने में कुशल हो जाता है, यह पकड़ आसान होती जाती है। +1. अपने शिशु को तकिये का प्रयोग करते हुए, उसका पेट अपनी तरफ करके अपनी एक तरफ इस प्रकार लिटाएं, कि वह आपके स्तन के स्तर पर हो। +2. अपने शिशु के सिर को अपनी बांह के अग्रभाग का सहारा दें। +3. अपने शिशु की पीठ को सहारा दें तथा उसके निचले भाग को अपने हाथ से पकड़ें। +• बगल में लिटाकर पकड़ना +पकड़ने का यह तरीका भी प्रारंभ में कठिन होता है, जब तक आपको सहायता न प्राप्त हो। +1. उसी तरफ होकर आराम से लेट जाएं, जिस तरफ के स्तन से आप दुग्धपान कराएंगी। +2. सहारे के लिए तकियों का प्रयोग करें। +3. शिशु को उसकी तरफ, अपने स्तन के सामने लिटाएं। +4. शिशु के सिर के निचले भाग को, अपनी मुड़ी हुई बांह में झूले की तरह से टिका लें। +चिपकना (लैंचिग ऑन). +जब आपका शिशु एक स्थिति में स्थिर हो जाता है तथा आपके स्तन को सहारा मिला हुआ +हो, तब आप इसके लिए तैयार होती हैं कि शिशु आपके निप्पल को कसकर जकड़ ले। +• अपना हाथ, अपने स्तन के नीचे, अपने निप्पल के चारों तरफ के गहरे रंग के क्षेत्र, एरेओला के पीछे रखें। धीरे से स्तन को ऊपर उठाएं। अपने निप्पल को शिशु के मुंह की ओर ले जाएं। +• शिशु के होठों को अपने निप्पल से गुदगुदाएं। धीरे से दबाकर कुछ दूध निकालें। आपके बच्चे द्वारा अपना मुंह खोला जाना चाहिए। अपने निप्पल को ऊपर तथा पीछे, अपने शिशु के मुंह के भीतर तक ले जाएं। +• जब आपका शिशु अपना मुंह चौड़ा करके खोलता/खोलती है, जैसे जमुहाई लेते हैं, तब शिशु को अपनी ओर खींच लें। इससे आपको ऐरेओला का अधिकाधिक भाग शिशु के मुंह के भीतर ले जाने में सहायता मिलेगी। +• अपने शिशु के शरीर को अपने पेट से लगाकर इस प्रकार पकड़ें, कि शिशु की नाक का अग्रभाग तथा ठोड़ी, आपके स्तन के निकट हो। अपने स्तन को पकड़े रहें, जिससे इसके भार को सहारा मिलता रहे तथा जिससे आपका निप्पल, शिशु के मुंह से बाहर न निकल जाए। +• दूसरे स्तन से पिलाना प्रारंभ करने से पूर्व, शिशु को डकार दिलाएं। अगले स्तनपान हेतु, उस तरफ से प्रारंभ करें, जिस तरफ आपने पिछली बार बंद किया था। +मुझे कितनी बार स्तनपान कराना चाहिए? +दिन में प्रत्येक 2 से 3 घंटे बाद स्तनपान कराएं, जिससे आपका शिशु, रात में स्तनपान हेतु न +जागे। दिन में कम बार स्तनपान कराने का अर्थ है कि आपके शिशु को रात के समय, और +स्तनपान की आवश्यकता होगी। पहले 3 माह के दौरान, शिशुओं को 24 घंटो की अवधि में 8 +से 10 बार स्तनपान की आवश्यकता होती है। स्तनपान कराने से आपको अधिक दूध उत्पन्न +करने में सहायता मिलती है, तथा आपके स्तनों का अधिक भरे होने अथवा फूल जाने से बचाव +होता है। +शिशु के जन्म होने के बाद मुझे कितनी देर बाद स्तनपान कराना चाहिए? +यदि संभव हो तो प्रसव के तुरंत बाद स्तनपान कराना चाहिए। प्रत्येक 2-3 घंटों बाद स्तनपान +कराती रहें, भले ही दूध न आ रहा हो। जीवन के प्रारंभिक दिनों में, स्तनपान बहुत महत्वपूर्ण +होता है। एक साथ बार-बार अभ्यास करने से आप और आपका शिशु एक दूसरे को जानने +लगते हैं। स्वयं के लिए तथा अपने शिशु के संबंध में धैर्य रखें। +मैं अपने शिशु को कितनी देर तक स्तनपान कराऊं ? +प्रारंभ के 24 से 48 घंटों में अधिकांश शिशु 15 से 20 मिनट तक स्तनपान करते हैं। इसके +बाद, शिशु 20 मिनट तक एक स्तन से स्तनपान करना चाह सकता है तथा अगले 20 मिनट +तक दूसरे स्तन से दुग्धपान करता रह सकता है। स्तनपान कब संपन्न करना है, इसका +निर्णय घड़ी के स्थान पर, अपने शिशु पर छोड़ दें। +कुछ सहायक उपाय. +• अपने शिशु को पहले स्तन से स्तनपान कराएं जब तक कि वह संतुष्ट न हो जाए। संभव है कि शिशु धीमी गति से स्तनपान करने लगे तथा आराम से चूसे, निप्पल छोड़ दे, अथवा सोने लगे, जब कि निप्पल अभी भी उसके मुंह में हो। +• अपने शिशु को थपकी दें तथा दूसरे स्तन पर ले जाएं। +• कुछ शिशु प्रत्येक स्तनपान के समय, दोनों स्तनों से दूध पीते हैं। जबकि अन्य एक ही स्तन से पी सकते हैं। यदि आपका शिशु दूसरे स्तन पर जाता है, तो उसे स्तन से दूध पीने दें, जब तक कि उसका पेट न भर जाए। +• जब वह स्तनपान कर चुकेगा तो आपका शिशु, भरे पेट आराम से और संतुष्ट हो ऐसा व्यवहार करेगा। +मैं अपने शिशु को स्तन से कैसे हटाऊं? +आपके शिशु को स्तन से दूर हटाना अथवा उसका दूध पीना बंद करना दो प्रकार से किया +जा सकता हैः +• अपनी उंगली शिशु के मुंह के किनारे से, शिशु के दोनों मसूड़ों के बीच ले जाएं। +• अपने शिशु के निचले होंठ को उसके निचले मसूड़े के ऊपर घुमाएं जब तक कि आप यह महसूस न करें कि शिशु की जीभ ने आपके निप्पल को छोड़ दिया है। इसके बाद शिशु के सिर को धीरे से अपने स्तन से दूर ले जाएं। +मैं यह कैसे जानूं कि मेरे शिशु को पर्याप्त आहार मिल रहा है ? +आपका शरीर उतना दूध बनाता है जितनी आपके शिशु को आवश्यकता होती है। यदि आप +प्रत्येक 2-3 घंटे बाद अपने प्रत्येक स्तन से 20 मिनट तक दूध पिलाती हैं, तो आपका शरीर +आपके शिशु के लिए पर्याप्त मात्रा से अधिक दूध पैदा करेगा। यदि आपके शिशु को पर्याप्त +दूध मिल रहा है, तो आपके स्तन दूध से भरे रहेंगे, दूध पिलाने के बाद मुलायम तथा दूध +पिलाने की दो अवधियों के बीच ये पुनः भर जाएंगे। आपके शिशु केः +• 24 घंटों में 6 अथवा अधिक बार डायपर भीग जाएंगे। +• वह स्तनपान के बीच की अवधियों में सो जाएगा। +• वह प्रतिदिन 2 से अधिक बार शौच करेगा। +• उसका वजन बढ़ेगा। +यदि आपको लगता है कि आपके शिशु को पर्याप्त आहार नहीं मिल रहा है, तो अपने शिशु के चिकित्सक, क्लीनिक अथवा दुग्धपान विशेषज्ञ से संपर्क करें। + +सिर की जूँ: +सिर में होने वाली जूंएँ, तिल के आकार की छोटी कीट होती हैं। वे बालों में रहती हैं तथा +सिर की चमड़ी पर काटती हैं और खून चूसती हैं। ये उड़ती अथवा कूदती नहीं हैं, परंतु ये +बड़ी तेजी से चल सकती हैं। इस कारण, बालों के बीच इन्हें खोजना कठिन हो जाता है। ये +सभी उम्रों तथा प्रजातियों के लोगों को संक्रमित करती हैं। परंतु ये अफ्रीकी तथा अमरीकी +बच्चों में कम होती हैं, जिसका कारण उनके बालों की डंठल का आकार है। +जुओं के अंडे ‘लीख’ कहलाते हैं। ये पीलापन युक्त सफेद अथवा भूरी खारिश (डेंड्रफ) जैसे +लगते हैं। जुएं बालों की डंठल पर अपने अंडों को पानी से अप्रभावित रहने वाले ‘गोंद’ से +चिपका देती हैं। इन अंडों को आप गर्दन के पीछे तथा कानों के पीछे देख सकते हैं। ये अंडे +धो कर अथवा ब्रश द्वारा साफ नहीं किए जा सकते। इन्हें एक-एक करके चुनकर उठाना +पड़ता है। +कारण. +जुएं तेजी से, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैल सकती हैं यदि वे लोगः +उपचार. +आपके बच्चे का चिकित्सक, आपको जुओं संबंधी शैम्पू अथवा लोशन लगाने का सुझाव दे +सकता है। आप जुओं संबंधी कुछ उत्पाद भी खरीद सकते हैं, जैसे निक्स क्रीम, रिंस जो +आपको स्थानीय दवा विक्रेता से बिना नुस्खा-पर्ची (प्रेस्क्रिप्शन) के मिल सकते हैं। कुछ +उत्पादों के साथ पैकेज के रूप में, विशेष लीख कंघी आती है अथवा आप इसे अलग से भी +खरीद सकते हैं। ये विशेष कंघी अंडों (लीख) को खोजने एवं निकालने में सहायक हो सकती +है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सभी लीख (जूं के अंडे) हटाई जाएं तथा घर के सभी सदस्यों +का उपचार किया जाए। +जूं के उपचारों के बारे में खास चेतावनियाँ. +निक्स क्रेम रिंस (अथवा पर्मेथ्रिन के प्रचलित ब्रांड) का प्रयोग किस प्रकार करें- +1. सामान्य शैम्पू से बाल साफ करें। कंडीशनर का प्रयोग न करें। इसके कारण जुओं की दवा का प्रभाव समाप्त हो सकता है। गर्म पानी से बाल धोकर उन्हें तौलिये से सुखा लें। इस तौलिये का दुबारा प्रयोग तब तक न करें, जब तक यह धो न लिया जाए। +2. बालों पर सफेद सिरका लगाएं - यह उस ‘गोंद’ को ढीला करने में सहायक होता है, जो ‘लीखों’ को बालों से चिपकाए हुए है। +3. पर्याप्त मात्रा में ‘निक्स क्रेम रिंस’ लगाए जिससे कि बाल तथा सिर की चमड़ी पूरी तरह भीग जाएं। यह सुनिश्चित करें कि गर्दन का पिछला भाग तथा कानों के पीछे का भाग, अवश्य भीग जाए। यदि निक्स क्रेम रिंस आंखों में चला जाता है, तो तुरंत ठंडे पानी से इन्हें साफ कर लें। +4. निक्स क्रेम रिंस, बालों में 10 मिनट तक लगा रहने दें, परंतु इससे अधिक समय तक नहीं। +5. बालों तथा सिर के चारों ओर के भाग को पानी से भली भांति साफ करें। एक ताजा, सूखे तौलिये से रगड़ें। हेयर ड्रायर का प्रयोग न करें- जूं संबंधी कुछ उत्पाद ज्वलनशील होते हैं। +6. बालों को महीन कंघी से साफ करें, जिससे ये अंडे निकल आएं। बालों को इधर-उधर करके कंघी करना उपयोगी हो सकता है। सभी अंडों का हटाया जाना आवश्यक है। इसमे 2 अथवा 3 घंटे या अधिक लग सकते हैं, तथा यदि कंघी काम नहीं करती है तो आपको हाथों सं अंडे चुनने पड़ सकते हैं। +7. इन अंडों को प्लास्टिक की थैली में भर लें, इसको कसकर बांध ले तथा फेंक दें। अपने हाथों को भली भांति साफ करें तथा नाखूनों का निचला भाग रगड़ें। +8. अपने बच्चे को साफ कपड़े पहनाएं। यदि आप ‘रिड’ अथवा पिपेरोनाइल बूटॉक्साइड’ के बाजार में उपलब्ध ब्रांड खरीदते हैं, तो ये +उत्पाद सूखे बालों में लगाएं। ऊपर के चरण 3 से प्रारंभ करें तथा ‘निक्स’ के स्थान पर इस उत्पाद के प्रयोग हेतु अगले कदम उठाएं। +बचाव. +यदि आपके मन में कोई प्रश्न अथवा चिंताएं हैं, तो अपने बच्चे के चिकित्सक अथवा स्थानीय स्वास्थ्य विभाग से बात करें। + +सामान्य ज्ञान कोष: +इस पुस्तक में हम सामान्य ज्ञान के प्रश्न एवं उनके उत्तर प्रस्तुत करेंगे। अलग अलग क्षेत्र से +अंतर्राष्ट्रीय संगठन. +1.संयुक्त राष्ट्रीय संघ के सदस्य देशों की कुल संख्या है- +-193 एक नया देश जुड़ा है अभी 193 व साउथ सूडान +2.अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बनाए रखने की जिम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र संघ के किस अंग की है? +-सुरक्षा परिषद +3.संयुक्त राष्ट्र महासचिव का कार्यकाल कितने वर्षो का होता है ? +-5 वर्ष +4.संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थायी सदस्यों की संख्या हैं? +-5 +5.’अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ में कार्यरत न्यायाधीशों का कार्यकाल कितने वर्षो का होता हैं? +-9 वर्ष +भारत की कला एवं संस्कृति. +1. भरतनाटयम कहा का प्रमुख लोक नृत्य है? +- तमिलनाडु +2. गरबा किस राज्य का प्रमुख लोक नृत्य है? +- गुजरात +3. मोहीनीअटटयम की राज्य का शास्त्रीय नृत्य हैं? +- केरल +4. उस्ताद बिस्मिल्ला खा को किस वर्ष भारतरत्न की उपाधि दी गई थी? +- 2001 ई. +5. शिव कुमार शर्मा सम्बंधित हैं- +- संतूर +6. कुचिपुड़ी की राज्य का शास्त्रीय नृत्य है? +- आंद्रप्रदेश +7.पंडित रविशंकर सम्बंधित हैं- +- सितार वादन से +8.भारत में टेलीविज़न की शुरुआत कब की गई? +- 15 सितम्बर 1959 +9. प्रतिष्ठित मैग्सेसे फाउंडेशन की और से दिया जाता है? +- फिलिपिन्स +10. दूरदर्शन ने रास्ट्रीय नेटवर्क डी.डी. वन की शुरुआत किस वर्ष की? +- 1982 ई. +11. प्रतिष्ठित लता मंगेशकर पुरुस्कार किसने द्वारा प्रदान किया जाता हैं? +- मद्यप्रदेश सरकार +12.साहित्य के में दिया जाने वाला बुकर पुरुस्कार प्राप्त करने वाली प्रथम भारतीय महिला हैं– +- अरुंधती रॉय +आर्थिक भुगोल. +1.’केसर’ का सर्वाधिक उत्पादन होता है- +जम्मू कश्मीर +2. बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान स्तिथ है? +कर्णाटक +3.कैमूर वन्य जीव अभयारण्य कहा स्थित है +बिहार +4. दिसपुर किस राज्य की राजधानी है? +असम +5. निम्न में से कोंसी नदी डेल्टा नहीं बनाती? +नर्मदा +6.भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील है – +गोविन्द सागर +7.भारत की साफ़ पानी की सबसे बड़ी झील है +वुलर झील +8.भारत की सबसे लम्बी नहर है +इंदिरा गाँधी +9.भारत में प्रथम बहूद्दीशीय परियोजना का निर्माण किस नदी पर किया गया +दामोदर +10.सोने का रेशा कहा जाता है +जुट +11.अंकलेश्वर में सर्वशिक मात्र में प्राप्त हुआ है- +तेल एंव प्राकृतिक गैस +12.निम्नलिखित में से कोंसी रिफ्ट घाटी में होकर बहती है ? +नर्मदा +13.राजगीर अभयारण्य स्थित है +बिहार में +14.स्वान्गला कहा की जनजाति है +पंजाब +15.मुंडा कहा की जनजाति है +झारखंड +6.’यूरो’ किस संगठन की मुद्रा हैं? +-यूरोपीय संघ +स्वतंत्रता आन्दोलन. +स्वतंत्रता आन्दोलन +1.इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष थे – +व्योमेश्चंद्र बनर्जी +2. किस तिथि से बंगाल का विभाजन प्रभावी हुआ? +7 अगस्त 1905 +3. किस अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन हुआ? +सूरत 1907 +4.’अभिनव भारत’ के संस्थापक थे- +वि. डी. सावरकर +5.लन्दन में इंडिया हाउस की स्थापना किसने की +श्याम कृष्ण वर्मा +6.मुज्जफरपुर बम कांड में किस कान्तिकारी को फांसी दी गई +खुदीराम बोस +7.’ग़दर पार्टी’ के संस्थापक थे +लाला हरदयाल +8.’भारत सेवक समाज’ के संस्थापक थे +गोपालकृष्ण गोखले +9.’हिन्दू मुस्लिम’ एकता का राजदूत किसे कहा गया था ? +मुहम्मद अली जिन्ना +10.गांधीजी किसे अपना राजनितिक गुरु मानते थे ? +गोपालकृष्ण गोखले +11.स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल कौन थे? +लॉर्ड माउंटबेटन +12.भारत के प्रथम वायसराय कौन थे? +लॉर्ड कैनिंग +13.भारत की प्रथम महिला राजदूत कौन थी? +विजयलक्ष्मी पंडित +14.भारत के प्रथम परमाणु रिएक्टर का क्या नाम है? +अप्सरा +15.भारत की प्रथम महिला पायलट कौन थी? +प्रेमा माथुर +16.भारतीय वायुसेना की प्रथम महिला पायलट? +हरिता कौर देओल +17.भारतीय वायुसेना का प्रथम अधिकारी जिसने परमवीर चक्र प्राप्त किया? +निर्मलजीत सेंखो +18.भारत की प्रथम महिला लोकसभा अध्यक्ष? +मीरा कुमार +19.भारत के प्रथम साम्यवादी लोकसभा अध्यक्ष कौन थे? +सोमनाथ चटर्जी +20.भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त कौन थे? +सुकुमार सेन +21.भारत के पहले गृह मंत्री कौन थे? +सरदार वल्लभ भाई पटेल +22.भारत के पहले रक्षा मंत्री कौन थे? +सरदार बलदेव सिंह +23.भारत के पहले वित्त मंत्री कौन थे? +आर.के. षंमुखम चेट्टी +24.भारत के पहले केन्द्रीय शिक्षा मंत्री कौन थे? +मौलाना अबुल कलाम आजाद +स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित आंदोलन एवं वर्ष. +1.भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना +1885 ई. +2.बंग-भंग आंदोलन(स्वदेशी आंदोलन) +1905 ई. +3.मुस्लिम लीग की स्थापना +1906 ई. +4.कांग्रेस का बंटवारा +1907 ई. +5.होमरूल आंदोलन +1916 ई. +6.लखनऊ पैक्ट +दिसंबर 1916 ई. +7.मांटेग्यू घोषणा +20 अगस्त 1917 ई. +8.रौलेट एक्ट +19 मार्च 1919 ई. +9.जालियांवाला बाग हत्याकांड +13 अप्रैल 1919 ई. +10.खिलाफत आंदोलन +1919 ई. +11.हंटर कमिटी की रिपोर्ट प्रकाशित +18 मई 1920 ई. +12.कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन +दिसंबर 1920 ई. +13.असहयोग आंदोलन की शुरुआत +1 अगस्त 1920 ई. +14.चौरी-चौरा कांड +5 फरवरी 1922 ई. +15.स्वराज्य पार्टी की स्थापना +1 जनवरी 1923 ई. +16. हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन +अक्टूबर 1924 ई. +17.साइमन कमीशन की नियुक्ति +8 नवंबर 1927 ई. +18.साइमन कमीशन का भारत आगमन +3 फरवरी 1928 ई. +19.नेहरू रिपोर्ट +अगस्त 1928 ई. +20.बारदौली सत्याग्रह +अक्टूबर 1928 ई. +21.लाहौर षड्यंत्र केस +8 अप्रैल 1929 ई. +22.कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन +दिसंबर 1929 ई. +23.स्वाधीनता दिवस की घोषणा +2 जनवरी 1930 ई. +24.नमक सत्याग्रह +12 मार्च 1930 ई. से 5 अप्रैल 1930 ई. तक +25.सविनय अवज्ञा आंदोलन +6 अप्रैल 1930 ई. +26.प्रथम गोलमेज आंदोलन +12 नवंबर 1930 ई. +27.गांधी-इरविन समझौता +8 मार्च 1931 ई. +28.द्वितीय गोलमेज सम्मेलन +7 सितंबर 1931 ई. +29.कम्युनल अवार्ड (साम्प्रदायिक पंचाट) +16 अगस्त 1932 ई. +30.पूना पैक्ट +सितंबर 1932 ई. +31.तृतीय गोलमेज सम्मेलन +17 नवंबर 1932 ई. +32.कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन +मई 1934 ई. +33.फॉरवर्ड ब्लाक का गठन +1 मई 1939 ई. +34.मुक्ति दिवस +22 दिसंबर 1939 ई. +35.पाकिस्तान की मांग +24 मार्च 1940 ई. +36.अगस्त प्रस्ताव +8 अगस्त 1940 ई. +37.क्रिप्स मिशन का प्रस्ताव +मार्च 1942 ई. +38.भारत छोड़ो प्रस्ताव +8 अगस्त 1942 ई. +39.शिमला सम्मेलन +25 जून 1945 ई. +40.नौसेना का विद्रोह +19 फरवरी 1946 ई. +41.प्रधानमंत्री एटली की घोषणा +15 मार्च 1946 ई. +42.कैबिनेट मिशन का आगमन +24 मार्च 1946 ई. +43.प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस +16 अगस्त 1946 ई. +44.अंतरिम सरकार की स्थापना +2 सितंबर 1946 ई. +45.माउंटबेटन योजना +3 जून 1947 ई. +46.स्वतंत्रता मिली +15 अगस्त 1947 ई. +बाहरी कडियाँ. +[https://vkvishalyou.blogspot.Com/?m=1] -सामान्य ज्ञान ब्लॉग + +निक्कू: +एक जंगल में एक छोटा खरगोश रहता था उसका नाम निक्कू था ! +वो काफी उछल कूद करता था +एक बार जंगल में नन्हा खरगोश एक बार गलती करते हुए पकड़ा गया और उसकी मम्मी ने एक थोड़ी पिटाई कर दी तब +वो मम्मी से नाराज हो कर भाग गया और उसने सोचा की वो कभी वापस नहीं आएगा +वो घर से भाग गया और थोड़ी दूर जाकर अकेले बैठ गया और सोचने लगा की अब मम्मी से कभी बात नहीं करूँगा +काफी देर अकेला बैठा रहा अब अँधेरा बढ़ रहा था +और डर भी लग रहा था पर वो अपनी बात पर अडा़ रहा कुछ भी हो पर घर नहीं जायेगा +और वो वह से निकल गया रास्ते में अँधेरा था। +निक्कू की मम्मी भी परेशान थी वो नाराज हो कर कहा चला गया अँधेरा भी बढ़ रहा रहा है +और इधर निक्कू का डर बढ़ने लगा तब +उसने देखा की उसके दोस्त रिंकू के घर दिया लग रहा था +तब वो चुप चाप रिंकू के घर के पास गया और वहाँ बैठा रहा घर के अंदर नहीं गया +उस घर के अंदर जाने की उसकी हिम्मत नहीं हुए। +पर फिर भी उसके रिंकू ने पत्ते बजने की आवाज़ सुनी और उसे वह निक्कू देख लिया और उसके पास गया और पूछा क्या हुआ पर निक्कू कुछ नहीं बोला तब रिंकू उसको घर में ले गया और साथ में खाना खाया +और टीवी देखी अब रात काफी हो चुकी थी रिंकू ने कहा के सुबह चले जाना तब रिंकू के पापा ने कहा की तुम्हारे मम्मी पापा इंतजार कर रहे होंगे +तब रिंकू घर तक छोड़ने आया और +अपना नन्हा खरगोश दौड़ता हुआ घर चला गया और सब भूल गया और अपनी माँ के पास कूद के चला गया तब निक्कू की मम्मी ने डाटा की कहा चला गया था +काफी अँधेरा हो चूका था इसीलिए तो मैं तुझे इतना डाटतइ हु एसा कह कर निक्कू को गले ले लगा लिया। + +सर्जरी के बाद घर पर देखभाल: +ये सर्जरी के बाद आपकी देखभाल के लिए सामान्य निर्देश हैं। आपकी जरूरतों के आधार पर, आपका डॉक्टर आपको अन्य निर्देश दे सकता है। आपके नर्स या डॉक्टर द्वारा आपको दिए गए निर्देशों का पालन करें। +अगर आप सर्जरी के 24 घंटे के भीतर घर चले जाते हैं: +चीरे की देखभाल. +अगर आपको इनमें से कुछ भी हो, तो अपने डॉक्टर को तुरंत फोन करें: +अगर आपको इनमें से कुछ भी हो, तो तुरंत 108 पर फोन करें: +अगर आप अपने डॉक्टर से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं, या अगर आपके लक्षण गंभीर हैं, तो 108 पर फोन करें। + +सुरक्षित रूप से दवाइयाँ लेना: +दवाइयाँ अक्सर बीमारी या चोट के उपचार का हिस्सा होतीं हैं। दवाई लेने में दुष्प्रभावों का थोड़ा जोखिम है। दवाइयाँ सुरक्षित रूप से लेने के लिए इन सुझावों का पालन कीजिए। +दवाइयों का संग्रह करना. +अपनी दवाइयाँ लिखने के लिए इसके बाद वाले पन्ने पर दिये हुए फार्म का उपयोग करें और उसे अपने बटुए में रखें ताकि आपको जब उसकी जरूरत हो तब वह आपके पास हो। + +हृदयगति का रुक जाना: +हृदयगति के रुकने, जिसे रक्ताधिक्य हृदपात (congestive heart failure) भी कहा जाता +है, के कारण हृदय की मांसपेशी कमज़ोर हो जाती है और उतनी ताकत से पम्प नहीं करती +जितनी ताकत से इसे करना चाहिए। रक्त का प्रवाह धीमा हो जाता है और आपके फेफड़ों +और शरीर के अन्य अंगों में तरल पदार्थ एकत्र हो सकता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि +आपके हृदय ने रक्त को पम्प करना बंद कर दिया है। हृदय गति का रुक जाना हृदपात ठीक +नहीं होता, इसलिए आपको यह जानने की आवश्यकता होगी कि अपने रोग पर कैसे नियंत्रण +करना है। +आपकी देखभाल. +यदि आपको कोई प्रश्न या शंका हो, तो अपने चिकित्सक या नर्स से बात करें। + +हृदय कैथ और हृदय एंजियोप्लास्टी: +इस जांच को कार्डियक कैथेटराइज़ेशन, कार्डियक कैथ या कोरोनरी एंजियोग्राम भी कहते +हैं। हृदय कैथ , पम्प (रक्त पम्प करना) के दौरान हृदय की रक्त धमनियों को और हृदय +के अंदर के हिस्से को दिखाता है। कैथेटर कहा जाने वाला एक ट्यूब आपके पैर के सबसे +ऊपरी हिस्से, आपकी जांघ (ग्रॉइन) या आपके हाथ की रक्त-धमनी में डाला जाता है। इसके +बाद इसे आपके हृदय तक पहुंचाया जाता है। कैथेटर के माध्यम से डाई डाली जाती है तथा +एक्स-रे लिए जाते हैं। +रक्त धमनियों के संकरा होने को कारण सीने में दर्द या हृदय आघात हो सकता है। यदि +आपके हृदय की रक्त धमनियाँ संकरी हैं तो हृदय एंजियोप्लास्टी किया जा सकता है, इसे +पीटीसीए (परकुटेनियस ट्रांसलुमिनल कोरोनरी एंजियोप्लास्टी) या बैलून एंजियोप्लास्टी भी कहा +जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से रक्त प्रवाह बेहतर बनाने के लिए कैथेटर के आखिर में +लगे बैलून का उपयोग रक्त-धमनी खोलने के लिए किया जाता है। रक्त-धमनी को खुला +रखने के लिए एक स्टेंट लगाया जा सकता है, यह एक छोटा, तार की नली नुमा उपकारण +होता है। +जांच के लिए समय पर आए। आपको अस्पताल में पूरी एक रात रुकना पड़ सकता है। घर +वापस जाने की योजना परिवार के किसी वयस्क सदस्य या दोस्त के साथ बनाए। +प्रक्रिया के बाद. +घर पर. +यदि स्थल से खून बहना बंद नहीं हो रहा है या वहाँ सूजन बढ़ती जा रही है तो सीधा लेट जाइए और स्थल पर दबाव डालिए तथा 911 पर फोन कीजिए। +यदि आपके सवाल हैं या कोई चिंता है तो अपने चिकित्सक या नर्स से बात कीजिए। + +सर्जरी के बाद अस्पताल में देखभाल: +शल्य चिकित्सा के बाद आप रिकवरी रूम में आंखें खोलेंगे। नर्स प्रायः आपकी जांच करेगी और दर्द की दवाइयां देगी। होश में आने पर जरूरत होगी तो आपको आपके कमरे में ले जाया जायेगा। +खून के थक्के. +खून के थक्के जमने की आशंका से बचने में मदद के लिएः + +शारीरिक जोड़ के पूर्ण प्रतिस्थापन (टोटल जॉइंट रिप्लेसमेंट) के बाद घरेलू देखभाल: +देखभाल हेतु निम्नलिखित मार्गनिर्देशों का पालन करें, क्योंकि आपके नये जोड़ (जॉइंट) को ठीक होने में अगले 6 से 8 सप्ताह का समय लगेगा। अधिक गतिविधि करने अथवा स्वयं को सहन योग्य दर्द की सीमाओं से आगे ले जाने प्रयास न करें। +संक्रमण से बचाव. +यदि नये जोड़ की देखभाल के संबंध में, आपके मन में कोई प्रश्न अथवा चिंता है, तो अपनी स्वास्थ्य देखभाल टीम से चर्चा करें। + +वॉकर के प्रयोग करके शरीर का भार वहन करना: +अपने घायल अथवा कमजोर पाँवों के लिए, यहाँ लगाये गये निशान के मुताबिक उल्लिखित निर्देशों का पालन करें। +‰भार न डालने वाला तरीका. +इस तरीके के लिए खड़े होते अथवा चलते समय अपने घायल अथवा कमजोर पाँव को फर्श पर न पड़ने दें। वॉकर का प्रयोग करते समय, अपने घायल अथवा कमजोर पाँव को फर्श से ऊपर उठाए रखें। +‰नीचे छूते हुए भार संवहन. +इस तरीके के लिए अपने पाँव के अग्रतल (बॉल) को फर्श से छूने दें, जिससे आपको संतुलन कायम रखने में सहायता मिले, परंतु इस पर अपना भार न डालें। +‰आंशिक भार संवहन. +इस तरीके के लिए आपको बताया जाएगा कि आप अपने घायल अथवा कमजोर पाँव पर कितना भार डाल सकते हैं। +‰सहन हो सके ऐसे भार वहन करना. +इस तरीके के लिए, घायल अथवा कमजोर पाँव पर उतना भार डालें जितना आप, अधिक दर्द महसूस किये बिना सहन कर सकते हैं। वॉकर आपको कुछ सहारा देने तथा संतुलन बनाए रखने में सहायक होगा। +यदि आपके कुछ प्रश्न अथवा चिंताएं हैं तो अपने चिकित्सक, नर्स अथवा काया-चिकित्सक (फिजिकल थैरेपिस्ट) से चर्चा करें। + +व्रणीय बृहदान्त्र शोथ: +अल्सरेटिव कोलाइटिस आँत की बीमारी है। इसका कारण अज्ञात है। बृहदान्त्र के अंदर की परत, जिसे बड़ी आँत भी कहा जाता है, में जलन होने लगती है या इसमें सूजन हो जाती है। इसमें छोटे घाव या फोड़े उत्पन्न हो जाते हैं। यह आमतौर पर कोलन के निचले भाग से +आरम्भ होता है और यह फैल सकता है। +लक्षण. +आपके इन में से कुछ या सभी लक्षण हो सकते हैं: +आपकी देखभाल. +आपका चिकित्सक आपकी जाँच करेगा और परीक्षणों का आदेश देगा। इन परीक्षणों में निम्नलिखित परीक्षण सम्मिलित हो सकते हैं: +आपके उपचार में निम्नलिखित सम्मिलित हो सकते हैं: +यदि आपका कोई प्रश्न या शंका हो, तो अपने चिकित्सक या नर्स से पूछें। + +श्रोणि अस्थिभंग: +जब कमर की एक या अधिक हड्डियां चिटक जाती हैं या टूट जाती हैं तो उसे 'पेल्विक फैक्चर' कहा जाता है। बहुत-से पेल्विक फ्रैक्चर इनका नतीजा होते हैं- +• कार दुर्घटना +• काफी ऊंचाई से गिरने +• हल्के से गिऱने, चोट लगने या आकस्मिक गति जिससे पेशियां कमर की किसी हड्डी को नोच कर अलग कर देती हैं। अगर आपके साथ कोई दुर्घटना हो गयी थी या किसी और तरह से चोट लग गयी थी तो यह पता लगाने के लिए आपकी जांच की जायेगी कि कहीं आपकी दूसरी हड्डियों या अंगों में चोट तो नहीं लगी है। +पेल्विक फ्रैक्चर के लक्षण. +• गुमटा पड़ना, सुकोमल हो जाना +• सूजन +• आपके योनि प्रदेश में सुन्नपन या पैरों के ऊपरी हिस्से में झुनझुनी होना +• खड़े होने पर परेशानी या दर्द +आपकी देख भाल. +शल्य क्रिया करके या बाहर से आपकी हड्डी में पिन चुभो कर आपके पेल्विक फैक्चर को बैठाना होगा। अगर आपको और कहीं चोट लगी है तो शल्य क्रिया के दौरान उनका भी उपचार किया जायेगा। अस्पताल छोड़ने के बाद आपको निम्न की जरूरत पड़ सकती हैः +• खून का थक्का जमने से रोकने के लिए खून पतला करने वाली दवाइयां +• कई महीने के लिए अपनी गतिविधियां सीमित करना +• अपनी कमर का घाव भरने में सहूलियत के लिए पलस्तर चढ़ाने, बैसाखी या वॉकर का उपयोग करना +• आपकी हड्डियों के घाव के बेहतर (ढंग से भरने और पेशियों की मजबूती के लिए भौतिकोपचार +• आपकी छाती में अचानक दर्द होने लगे और सांस लेने में परेशानी हो। +• आपकी त्वचा में खुजली होने लगे, सूजन आ जाये या छाले पड़ जायें। +• आपका दर्द और सूजन बढ़ जाये। +• 38°C (101°F) से ज्यादा बुखार हो जाये। +अगर आपके मन में पेल्विक फ्रैक्टर को लेकर कोई सवाल है या आप किसी चीज को लेकर चिंतित हैं तो अपने डॉक्टर या नर्स से बात करें। + +सरल उदाहरणों द्वारा संस्कृत सीखें: +वद का अर्थ क्या है old +अव्यय. +इन शब्दों के रूप बदलते नहीं हैं । इसलिये इन्हें अव्यय कहा जाता है +लट् लकार. +लट् लकार वर्तमान को कहते हैं । ये सब लकार verbs को बदलने के लिये प्रयोग किये जाते हैं । +जैसे भू धातु है । जिसका मतलब है 'होना' तो अगर हमें वर्तमान में इसका प्रयोग करना है, तो हम लट् लकार का प्रयोग करते हैं । लकार है कि धातु में क्या बदलाव आयेगा । उसका क्या भाव होगा। +भू (लट्लकार मतलब वर्तमान काल) +प्रथम (अन्य) पुरुष : भवति - भवतः - भवन्ति +मध्यम पुरुष : भवसि - भवथः - भवथ +उत्तम पुरुष : भवामि - भवावः - भवामः +प्रथम पुरुष होता है कोई तीसरा (अन्य) आदमी । मध्यम पुरुष है 'तुम, आप, तुम लोग आदि' । उत्तम पुरुष मतलब 'मैं, हम सब' । +तो एक संख्या के लिये भवति (प्रथम पुरुष), भवसि (मध्यम पुरुष) और भवामि (उत्तम पुरुष) प्रयोग होगा । +उसी तरह दो संख्याओं के लिये भवतः भवथः भवावः, और दो से अधिक संख्याओं के लिये भवन्ति, भवथ, भवामः का प्रयोग होगा । +जैसे +अहम् पठामि (मैं पढ रहा हूँ । ) +अहम् खादामि (मैं खा रहा हूँ ) +अहम् वदामि । (मैं बोल रहा हूँ) +त्वम गच्छसि । (तुम जा रहे हो) +सः पठति (वह पढता है) +तौ पठतः (वे दोनो पढते हैं) +ते पठन्ति (वे सब पढते हैं) +युवाम वदथः (तुम दोनो बताते हो ) +युयम् वदथ (तुम सब बताते हो, बता रहे हो) +आवाम् क्षिपावः (हम दोनो फेंकते हैं) +वयं सत्यम् कथामः (हम-सब सत्य कहते हैं) +तो अगर अभी कुछ हो रहा है, उसे बताना है तो धातुयों को लकार का रूप देते हैं । +उसी प्रकार और भी कई लकार हैं । +लोट् लकार. +जैसे लट् वर्तमान काल या वर्तमान भाव बताने के लिये होता है, उसी प्रकार लोट् लकार होता है आज्ञार्थक भाव बताने या आज्ञा देने के लिये अथवा आदेश देने के लिए । +आज्ञा देना, या याचना करने के लिये या आज्ञा लेने के लिये भी । +जैसे +भवतु भवताम् भवन्तु +भव भवतम् भवत +भवानि भवाव भवाम +Some Shlokas and Random Stuff for learning Sanskrit. +ॐ नमः भगवते वासुदेवाय - भगवान वासुदेव को मैं नमस्कार करता हूं । +जो विद्या के लिये प्रयत्न नहीं करते, न तप करते हैं, न दान देते हैं, न ज्ञान के लिये यत्न करते हैं, न शील हैं और न ही जिनमें और कोई गुण हैं, न धर्म है (सही आचरण है), ऍसे लोग मृत्युलोक में इस धरती पर बोझ ही हैं, मनुष्य रुप में वे वास्तव में जानवर ही हैं । +रत्नकरो - रत्न करः - सागर +सहोदरी - सह + उदर (गर्भ योनि) +भिक्षाटनं - भिक्षा + अटन (विचरना) +पिता जिसका सागर है, और लक्ष्मी जिसकी बहन है (यहाँ शंख की बात हो रही है, जो सागर से उत्पन्न होता है, और क्योंकि लक्ष्मी जी सागर मंथन में जल से प्रकट हुईं थीं, इसलिये वो उसकी बहन हैं) । वह शंख भिक्षा माँगता सडकों पर भटक रहा है । देखिये! फल भाग्य के अनुसार ही मिलते हैं । +अस्मद् (मम): +युष्माद् (तुम): +उदार मुनुष्य के लिये धन घास के बराबर है । शूर के लिये मृत्यु घार बराबर है । जो विरक्त हो चुका हो (स्नेह हीन हो चुका हो) उसके लिये उसकी पत्नी का कोई महत्व नहीं रहता (घास बराबर) । और जो इच्छा और स्पृह से दूर है, उसके लिये तो यह संपूर्ण जगत ही घास बराबर, मूल्यहीन है । +विघ्न (रस्ते की रुकावटों) के भय से जो कर्म को आरम्भ ही नहीं करते हैं, वे नीचे हैं । लेकिन जो आरम्भ करने पर विघ्नों के आने पर उसे बीच में छोड देते हैं, वे मध्य में हैं (थोडे बेहतर हैं) । बार बार विघ्नों की मार सहते हुए भी, जो आरम्भ किये काम को नहीं त्यागते, वे जन उत्तम हैं । +एकदम से (बिना सोचे समझे) कोई भी कार्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि अविवेक (विवेक हिनता) परम आपदा (मुसीबत) का पद है । जो सोचते समझते हैं, गुणों की ही तरह, संपत्ति भी उनके पास अपने आप आ जाती है । + +सामाजिक परिवर्तन: +जैसा कि महान दार्शनिक अरस्तू ने भी कहा है- परिवर्तन संसार का नियम है। परिवर्तन किसी भी वस्तु, विषय अथवा विचार में समय के अन्तराल से उत्पन्न हुई भिन्नता को कहते हैं। परिवर्तन एक बहुत बड़ी अवधारणा है और यह जैविक, भौतिक तथा सामाजिक तीनों जगत में पाई जाती है किंतु जब परिवर्तन शब्द के पूर्व सामाजिक शब्द जोड़ कर उसे सामाजिक परिवर्तन बना दिया जाता है तो निश्चित हीं उसका अर्थ सीमित हो जाता है। परिवर्तन अवश्यम्भावी है क्योंकि यह प्रकृति का नियम है। संसार में कोई भी पदार्थ नहीं जो स्थिर रहता है। उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन सदैव होता रहता है। स्थिर समाज की कल्पना करना आज के युग में संभव नहीं है। समाज में सामंजस्य स्थापित करने के लिए परिवर्तन आवश्यक है। मैकाइवर तथा पेज का कहना है कि समाज परिवर्तनशील तथा गत्यात्मक दोनो है। वास्तव में समाज से संबंधित विभिन्न पहलुओं में होने वाले परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है। सामाजिक परिवर्तन एक स्वभाविक प्रक्रिया है। यदि हम समाज में सामंजस्य और निरंतरता को बनाए रखना चाहते हैं तो हमें यथास्थिति अपने व्यवहार को परिवर्तनशील बनाना ही होगा। यदि ऐसा न होता तो मानव समाज की इतनी प्रगति संभव नहीं होती। निश्चित और निरंतर परिवर्तन मानव समाज की विशेषता है। सामाजिक परिवर्तन का विरोध होता है क्योंकि समाज में रूढीवादी तत्त्व प्राचीनता से ही चिपटे रहना पसंद करते हैं। स्त्री स्वतंत्रता और समान अधिकार की भावना, स्त्रियों की शिक्षा, पर्दा प्रथा की समाप्ति, स्त्रियों का आत्मनिर्भर होना, बाल विवाह प्रथा पर रोक, यौन शोषण पर रोक, विधवा विवाह की प्रथा, भ्रूण हत्या की समाप्ति और भ्रष्टाचार की समाप्ति आदि अनेक परिवर्तनों को आज भी समाज के कुछ तत्त्व स्वीकार नहीं कर पाते हैं। तथापि इनमें परिवर्तन होता जा रहा है। + +स्वराज: +यह पुस्तक क्यों? +मैं पहले आयकर विभाग में काम किया करता था। 90 के दशक के अंत में आयकर विभाग ने कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सर्वे किया। सर्वे में ये कंपनियां रंगे हाथों टैक्स की चोरी करती पकड़ी गयींए उन्होंने सीधे अपना जुर्म कबूल कर लिया और बिना कोई अपील किये सारा टैक्स जमा करा दिया। अगर ये लोग किसी और देश में होते तो अभी तक उनके वरिष्ठ अधिकारियों को जेल हो गई होती। ऐसी ही एक कंपनी पर सर्वे के दौरान उस कंपनी के विदेशी मुखिया ने आयकर टीम को धमकी दी - 'भारत एक बहुत ग़रीब देश है। हम आपके देश में आपकी मदद करने आए हैं। यदि आप लोग हमें इस तरह तंग करोगे तो हम आपका देश छोड़कर चले जाएंगे। आपको पता नहीं हम कितने ताकतवर हैं। हम चाहें तो आपकी संसद से कोई भी क़ानून पारित करा सकते हैं। हम आप लोगों का तबादला भी करा सकते हैं।ज् इसके कुछ दिन बाद ही हमारी टीम के एक वरिष्ठ अफ़सर का तबादला कर दिया गया। +उस वक्त मैंने उस विदेशी की बातों को ज़्यादा महत्व नहीं दिया। मैंने सोचा कि शायद वो आयकर सर्वे से परेशान होकर बोल रहा था। लेकिन पिछले कुछ सालों की घटनाओं से मुझे धीरे-धीरे उसकी बातों में सच्चाई नज़र आने लगी है। मन में प्रश्न उठने लगे हैं - 'क्या वाकई इन विदेशियों का हमारी संसद पर नियंत्रण है। +जैसे जुलाई 2008 में यूण्पीण्एण् सरकार को संसद में अपना बहुमत साबित करना था। खुलेआम सांसदों की खरीद फरोख्त चल रही थी। कुछ टीण्वीण् चैनलों ने सांसदों को पैसे लेकर खुलेआम बिकते दिखाया। उन तस्वीरों ने इस देश की आत्मा को हिला दिया। अगर सांसद इस तरह से बिक सकते हैं तो हमारे वोट की क्या कीमत रह जाती है? दूसरेए आज उन्हें अपनी सरकार बचाने के लिए इस देश की एक पार्टी खरीद रही है। कल को उन्हें कोई और देश भी खरीद सकता है। जैसे अमरीकाए पाकिस्तान इत्यादि। हो सकता है ऐसा हो भी रहा होए किसे पता? यह सोच कर पूरे शरीर में सिहरन दौड़ पड़ी - 'क्या हम एक आज़ाद देश के नागरिक हैं? क्या हमारे देश की संसद सभी क़ानून इस देश के लोगों के हित के लिए ही बनाती है। +अभी कुछ दिन पहले जब अखबारों में संसद में हाल ही में प्रस्तुत न्यूक्लियर सिविल लायबिलिटी बिल के बारे में पढ़ा तो सभी डर सच साबित होते नज़र आने लगे। यह बिल कहता है कि कोई विदेशी कंपनी भारत में अगर परमाणु संयंत्र लगाती है और यदि उस संयंत्र में कोई दुर्घटना हो जाती है तो उस कंपनी की ज़िम्मेदारी केवल 1500 करोड़ रुपये तक की होगी। दुनियाभर में जब भी कभी परमाणु हादसा हुआ तो हज़ारों लोगों की जान गयी और हज़ारों करोड़ का नुकसान हुआ। +भोपाल गैस त्रासदी में ही पीड़ित लोगों को अभी तक 2200 करोड़ रुपया मिला है जो कि काफी कम माना जा रहा है। ऐसे में 1500 करोड़ रुपये तो कुछ भी नहीं होता। एक परमाणु हादसा न जाने कितने भोपाल के बराबर होगा? इसी बिल में आगे लिखा है कि उस कंपनी के खि़लाफ कोई आपराधिक मामला भी दर्ज नहीं किया जाएगा और कोई मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। कोई पुलिस केस भी नहीं होगा। बस 1500 करोड़ रुपये लेकर उस कंपनी को छोड़ दिया जाएगा। +यह क़ानून पढ़कर ऐसा लगता है कि इस देश के लोगों की ज़िंदगियों को कौड़ियों के भाव बेचा जा रहा है। साफण्साफ ज़ाहिर है कि यह क़ानून इस देश के लोगों की ज़िंदगियों को दांव पर लगाकर विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाया जा रहा है। हमारी संसद ऐसा क्यों कर रही है? यकीनन या तो हमारे सांसदों पर किसी तरह का दबाव है या कुछ सांसद या पार्टियां विदेशी कंपनियों के हाथों बिक गयीं हैं। +भोपाल गैस त्रासदी के हाल ही के निर्णय के बाद अख़बारों में ढेरों ख़बरें छप रहीं हैं कि किस तरह भोपाल के लोगों के हत्यारे को हमारे देश के उच्च नेताओं ने भोपाल त्रासदी के कुछ दिनों के बाद ही राज्य अतिथि सा सम्मान दिया और उसे भारत से भागने में पूरी मदद की। +इन सब बातों को देखकर मन में प्रश्न खड़े होते हैं - 'क्या भारत सुरक्षित हाथों में है? क्या हम अपनी ज़िंदगी और अपना भविष्य इन कुछ नेताओं और अधिकारियों के हाथों में सुरक्षित देखते हैंघ्ज् +ऐसा नहीं है कि हमारी सरकारों पर केवल विदेशी कंपनियों या विदेशी सरकारों का ही दबाव है। पैसे के लिए नेता और अफ़सर कुछ भी कर सकते हैं। कितने ही मंत्री और अफ़सर औद्योगिक घरानों के हाथों की कठपुतली बन गए हैं। कुछ औद्योगिक घरानों का वर्चस्व बहुत ज़्यादा बढ़ गया है। अभी हाल ही में एक फोन टैपिंग मामले में खुलासा हुआ था कि मौजूदा सरकार के कुछ मंत्रालयों में कौन मंत्री बनेंगे - इसका निर्णय हमारे प्रधानमंत्री ने नहीं बल्कि कुछ औद्योगिक घरानों ने लिया था। अब तो ये खुली बात हो गई है कि कौन सा नेता या अफ़सर किस घराने के साथ है। खुलकर ये लोग साथ घूमते हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि कुछ राज्यों की सरकारें और केंद्र सरकार के कुछ मंत्रालय ये औद्योगिक घराने ही चला रहे हैं। +अभी कुछ दिन पहले ख़बर छपी थी कि रिलायंस के मुकेश अंबानी महाराष्ट्र में कोई प्राइवेट यूनिवर्सिटी शुरू करना चाहते हैं। वो महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री राजेश टोपे से मिले और उनकी ये इच्छा पूरी करने के लिए राजेश टोपे ने विधान सभा में प्राइवेट यूनिवर्सिटी बिल लाना मंज़ूर कर दिया। औद्योगिक घरानों की इच्छा पूरी करने के लिए हमारी विधान सभाएं तुरंत क़ानून पारित करने को राज़ी हो जाती हैं। +हमारे देश की खदानों को कौड़ियों के भाव इन औद्योगिक घरानों को बेचा जा रहा है। जैसे लौह अयस्क (आयरन ओर) की खदानें लेने वाली कंपनियां सरकार को महज 27 रुपये प्रति टन रॉयल्टी देती हैं। उसी आयरन ओर को ये कंपनियां बाज़ार में 6000 रुपये प्रति टन के हिसाब से बेचती हैं। (खदान से लोहा निकाल कर उसकी सफाई इत्यादि करने में लगभग 300 रुपये प्रति टन का खर्च आता है।) क्या यह सीधे सीधे देश की संपत्ति की लूट नहीं है। +इसी तरह से औने पौने दामों में वनों को बेचा जा रहा हैए नदियों को बेचा जा रहा हैए लोगों की ज़मीनें छीन छीन कर कंपनियों को औने पौने दामों में बेची जा रही हैं। इन पार्टियोंए नेताओं और अफ़सरों के हाथ में हमारे देश के प्राकृतिक संसाधन और हमारे देश की संपदा खतरे में है। जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो ये लोग मिलकर सब कुछ बेच डालेंगे। +इन सब को देखकर भारतीय राजनीति और भारतीय जनतंत्र पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगता है। सभी पार्टियों का चरित्र एक ही है। हम किसी भी नेता या किसी भी पार्टी को वोट देंए उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। +पिछले 60 सालों में हम हर पार्टीए हर नेता को आज़मा कर देख चुके हैं। लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। इससे एक चीज़ तो साफ है- केवल पार्टियां और नेता बदल देने से बात नहीं बनने वाली। हमें कुछ और करना पड़ेगा। +हम अपने संगठन 'परिवर्तनज् के ज़रिये पिछले दस सालों में विभिन्न मुद्दों पर काम करते रहे। कभी राशन व्यवस्था परए कभी पानी के निजीकरण परए कभी विकास कार्यों में भ्रष्टाचार को लेकर इत्यादि। आंशिक सफलता भी मिली। लेकिन जल्द ही यह आभास होने लगा कि यह सफलता क्षणिक और भ्रामक है। किसी मुद्दे पर सफलता मिलती। जब तक हम उस क्षेत्र में उस मुद्दे पर काम कर रहे होतेए ऐसा लगता कि कुछ सुधार हुआ है। जैसे ही हम किसी दूसरे मुद्दे को पकड़तेए पिछला मुद्दा पहले से भी बुरे हाल में हो जाता। धीरे धीरे लगने लगा कि देश भर में कितने मुद्दों पर काम करेंगेए कहां कहां काम करेंगे। धीरे धीरे यह भी समझ में आने लगा कि इन सभी समस्याओं की जड़ राजनीति में है। क्योंकि इन सब मुद्दों पर पार्टियां और नेता भ्रष्ट और आपराधिक तत्वों के साथ हैं। और जनता का किसी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं है। मसलन राशन की व्यवस्था को ही लीजिए। राशन चोरी करने वालों को पार्टियों और नेताओं का पूरा-पूरा संरक्षण है। यदि कोई राशन वाला चोरी करता है तो हम खाद्य कर्मचारी या खाद्य आयुक्त या खाद्य मंत्री से शिकायत करते हैं। पर ये सब तो उस चोरी में सीधे रूप से शामिल हैं। उस चोरी का एक बड़ा हिस्सा इन सब तक पहुंचता है। तो उन्हीं को शिकायत करके क्या हम न्याय की उम्मीद कर सकते हैं? यदि किसी जगह मीडिया का या जनता का बहुत दबाव बनता है तो दिखावे मात्र के लिए कुछ राशन वालों की दुकानें निरस्त कर दी जाती हैं। जब जनता का दबाव कम हो जाता है तो रिश्वत खाकर फिर से वो दुकानें बहाल कर दी जाती हैं। +इस पूरे तमाशे में जनता के पास कोई ताकत नहीं है। जनता केवल चोरों को शिकायत कर सकती है कि ‘कृपया आप अपने खि़लाफ कार्रवाई कीजिए’ जो होने वाली बात नहीं है। +तो ये समझ में आने लगा कि सीधे जनता को क़ानूनन यह ताकत देनी होगी कि यदि राशन वाला चोरी करे तो शिकायत करने की बजाय सीधे जनता उसे दंडित कर सके। सीधे-सीधे जनता को व्यवस्था पर नियंत्रण देना होगा जिसमें जनता निर्णय ले और नेता और अफ़सर उन निर्णयों का पालन करें। +क्या ऐसा हो सकता है? क्या 120 करोड़ लोगों को क़ानूनन निर्णय लेने का अधिकार दिया जा सकता है? +वैसे तो जनतंत्र में जनता ही मालिक होती है। जनता ने ही संसद और सरकारों को जनहित के लिए निर्णय लेने का अधिकार दिया है। संसदए विधान सभाओं और सरकारों ने इन अधिकारों का जमकर दुरुपयोग किया है। उन्होंने पैसे खाकर खुलेआम और बेशर्मी से जनता को और जनहित को बेच डाला है। क्या समय आ गया है कि जनता नेताओंए अफ़सरों और पार्टियों से अपने बारे में निर्णय लेने के अधिकार वापस ले लें? क्या ऐसा हो सकता है? क्या इससे अव्यवस्था नहीं फैलेगी? +इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर की खोज में हम बहुत घूमेए बहुत लोगों से मिले और कुछ पढ़ा भी। जो कुछ समझ में आयाए उसे इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे पढ़ने के बाद यदि आपके मन में कोई शंका हो तो हमसे ज़रूर संपर्क कीजिए। और यदि आप हमारी बातों से सहमत हों तो अपने तनए मनए धन से इस आंदोलन में शामिल हों। समय बहुत कम है। देश की सत्ता और देश के साधन बहुत तेज़ी से देशी-विदेशी कंपनियों और विदेशी सरकारों के हाथों में जा रहे हैं। जल्द कुछ नहीं किया गया तो बहुत देर हो चुकी होगी। +जनता की एक नहीं चलती. +समस्या की जड़ ये है कि हम देश की राजनैतिक व्यवस्था के अंतर्गत पांच साल में एक बार वोट डालते हैं और फिर अगले पांच साल उन्हीं नेताओं के सामने गिड़गिड़ाते हैं जिन्हें हमने वोट डालकर चुना था। जनता का पूरी व्यवस्था पर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है। +सरकारी कर्मचारियों पर कोई नियंत्रण नहीं. +मान लीजिएए आपके गांव के सरकारी स्कूल में अध्यापक ठीक से नहीं पढ़ाताए अध्यापक समय पर नहीं आता या आता ही नहीं है। तो क्या आप उसका कुछ बिगाड़ सकते हैं? नहींए हम कुछ नहीं कर सकते। शिकायत करते हैं और शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होती। +आपके सरकारी अस्पताल मेंए मान लीजिएए डॉक्टर ठीक से इलाज नहीं करताए दवाईयाँ नहीं देताए समय पर नहीं आता या आता ही नहीं है। कुछ कर सकते हैं आप उसका? आप उसका कुछ नहीं कर सकते। आप शिकायत करेंगे तो शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। +राशन वाला खुलेआम राशन चोरी करता है। मगर आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। आप शिकायत करते हैं और शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। +उसी तरह से थाने में रिर्पोट लिखवाने के लिए जाते हैं तो थानेदार रिर्पोट नहीं लिखता या आपके खि़लाफ झूठे मुकदमे दायर कर देता है और आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। +तो मोटे मोटे तौर पर यह निकलकर आता है कि इन सरकारी कर्मचारियों के ऊपर हमारा किसी किस्म का कोई नियंत्रण नहीं है। +हम टैक्स देते हैंए इस देश का ग़रीब से ग़रीब आदमी भी टैक्स देता है। यहां तक कि एक भिखारी भी टैक्स देता है। क्योंकि जब एक भिखारी बाज़ार से साबुन ख़रीदता है तो उसके ऊपर सेल्स टैक्स देता हैए एक्साइज़ ड्यूटी देता है और न जाने कितने तरह के टैक्स देता है। ये सारा टैक्स का पैसा हमारा पैसा है। +कहा जा रहा है कि देश में 70 प्रतिशत आबादी 20 रुपया प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से भी कम में गुज़ारा करती है। तो यदि एक परिवार में 5 लोग होते हैं तो इस परिवार का मासिक खर्च हुआ 3000 रुपया। यदि सभी किस्म के कर जोड़ लिये जायें तो बाज़ार से कुछ भी खरीदने पर औसतन 10 प्रतिशत कर तो लगता ही है। इस हिसाब से एक गरीब परिवार भी मासिक 300 रुपया और सालाना 3600 रुपया का कर देता है। यदि आपके गांव में 1000 परिवार हैं तो वे सभी मिलकर औसतन 36 लाख रुपये सालाना कर सरकार को देते हैं। तो पिछले दस वर्षों में आपके गांव ने लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये का कर सरकार को दिया। +ये जितना कर सरकार हमसे इकट्ठा करती हैए हम इस पैसे के मालिक हैं। और जो ये सरकारी कर्मचारी हैंए सरकारी अधिकारी हैंए नेता हैं - ये सारे हमारे नौकर हैं। क्योंकि हमारे पैसे से इनको तनख्वाह मिलती है। हमारे पैसे से इनके बंगले चलते हैं। हमारे पैसे से इनके एअरकंडीश्नर चलते हैं। इनकी लाल बत्ती की गाड़ियाँए इनका पेट्रोलए इनके नौकर चाकरए ये सारे हमारे पैसों से चलते हैं। +और ये सारे हमें आंखें दिखाते हैं। हमारे पैसे से तनख्वाह मिलने वाले लोगों पर हमारी चलती ही नहीं है। हमारे नौकर पर ही हमारी नहीं चलती। सरकारी डॉक्टर का कुछ नहीं कर सकतेए अध्यापक का कुछ नहीं कर सकतेए राशन वाले का कुछ नहीं कर सकतेए थानेदार का कुछ नहीं कर सकते। कभी कलक्टर के दफ़्तर में गये हैं आप? उससे मिलने की कोशिश की? वो मिलता ही नहीं है। हमारा नौकर हैए लेकिन हमें आंखे दिखाता है। उसका चपरासी हमें आंखे दिखाता है। तो ये सारे सरकारी कर्मचारी जिनको हमारे टैक्स के पैसे से तनख्वाह मिलती हैए उनके ऊपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। +सरकारी पैसे पर कोई नियंत्रण नहीं. +दिल्ली में कॉमनवैल्थ खेलों के नाम पर सरकार ने 70 हज़ार करोड़ रुपया फूंक दिया। अच्छी खासी सड़कें तोड़ तोड़ कर दोबारा बनाई गईं। अच्छे खासे फुटपाथ तोड़ तोड़ कर दोबारा बनाये गए। एक अखबार में ख़बर आयी थी कि सरकार 400 करोड़ रुपये के अच्छे खासे फुटपाथ तोड़ कर दोबारा बना रही है। +दूसरी तरफ दिल्ली नगर निगम में सफाई कर्मचारियों को तीन-तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। ठेकेदारों को पांच-पांच साल से भुगतान नहीं हुए हैं। लेकिन दिल्ली नगर निगम की छत के ऊपर हैलीपैड बनाया जा रहा है। ताकि नेताओं के हैलीकॉप्टर वहां उतर सकें। +जब हम उसी सरकार के पास अपनी कोई समस्या लेकर जाते हैं तो सरकार कहती है कि फ़ंड नहीं है। जैसे सुंदर नगरी का उदाहरण लें। सुंदर नगरी दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती का इलाक़ा है। वहां पर लोगों के पास पीने का पानी नहीं है। लोगों के पास सेकेंडरी स्कूल नहीं है। सीवर सिस्टम नहीं है। जब भी सरकार के पास जाते हैं सरकार कहती है पैसा नहीं है। लेकिन कुछ साल पहले सरकार ने उसी इलाके में 60 लाख रुपये के फव्वारे लगवाये। वहां के लोगों के पास पीने को पानी नहीं है। और सरकार ने फव्वारे लगवाये। इससे बड़ा मज़ाक हो सकता है कोई? बताइये? वो फव्वारे एक दिन भी नहीं चले क्योंकि वहां पर पानी ही नहीं है। जिस दिन उद्घाटन था उस दिन भी नहीं चले क्योंकि पानी ही नहीं है। +इससे ज़ाहिर है कि सरकार के पास पैसा तो है लेकिन वो पैसा ग़लत चीज़ों पर इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसी चीज़ों पर इस्तेमाल किया जा रहा है जिनकी हमें ज़रूरत ही नहीं है। +गांवों का उदाहरण लें। गांव के अंदर लोगों की समस्याएं कुछ और हैं लेकिन जितना पैसा वहां जाता है वह अजीबो-ग़रीब योजनाओं के तहत जाता है। दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठ कर तय होता है कि इस देश की 120 करोड़ जनता की समस्याएं क्या हैंए हमारी क्या ज़रूरतें है और सरकारी पैसा हमारे इलाके में कहां और कैसे इस्तेमाल होना चाहिए? किस्म किस्म की योजनाएं बनती हैंए जैसे वृद्धावस्था पेंशनए विधवा पेंशनए नरेगाए राशन इत्यादि। और ये सारी योजनाएं दिल्ली में बैठेए लखनऊ में बैठेए भोपाल में बैठेए राजधानियों में बैठे अफ़सर और नेता बनाते हैं। +हम पश्चिमी बंगाल के खिजूरी गांव में गये। वहां के सरपंच ने हमें बताया कि उनके पास 6 करोड़ रुपया आया हुआ है गांव में। लेकिन उस 6 करोड़ रुपये से वो लोग अपने गांव में 20 लाख रुपये खर्च करके स्कूल नहीं बनवा सकते क्योंकि वो सारा का सारा पैसा ‘टाईड’ फ़ंड है। सारा का सारा पैसा किसी न किसी योजना से बंधा हुआ है। इतने पैसे की वृद्धावस्था पेंशन दी जायगीए इतने पैसे से इंदिरा आवास के मकान बनेंगेए इतने पैसे से विधवा पेंशन दी जायगीए इतने पैसे से ये होगाए इतने पैसे से वो होगा। +तो हमारी ज़रूरत कुछ और है। जैसे हो सकता है कि हमए हमारे गांव मेंए सिंचाई पर पैसा खर्च करना चाहते हैं। या हम कुछ डॉक्टर और लगाना चाहते हैं। लेकिन सारा का सारा पैसा दिल्ली में तय होकर आता है कि कितना पैसा किसके ऊपर खर्च किया जायेगा। +हम उड़ीसा के एक गांव में गये। उस गांव में हैज़े से 63 परिवार पीड़ित थे। जो सबसे बगल का अस्पताल था वो वहां से करीब 15 किमीण् दूर था और वहां तक पहुंचने का कोई साधन नहीं था। गांव की पंचायत के पास 6 लाख रुपये से भी ज़्यादा पैसा था। लेकिन सारा पैसा टाईड पफ़ंड था। किसी न किसी योजना में आया था। उस पैसे को इस्तेमाल करके वो एक वाहन किराये पर नहीं ले सकते थे। ताकि जो पीड़ित लोग हैं उनको अस्पताल पहुंचाया जाता। और नतीजा ये हुआ कि 7 लोगों की मौत हो गयी। तो वो पैसा किस काम आया? जिस पैसे से हम अपने लोगों की जान न बचा पायेंए वो पैसा किस काम आया? +एक और उदाहरण लें। ऐसा लगता है कि एक बार दिल्ली के एक अफ़सर को एक सपना आया। उसने सपने में देखा कि अगर हमारे देश के हर गांव के लोग अपने अपने गांव का पानी संचित करना चालू कर दें तो हमारे देश की पानी की समस्या दूर हो जायेगी। तो बस एक फरमान जारी हुआ। ऊपर से एक योजना बनी। योजना का नाम कुछ इसी तरह का था - ‘हमारा गांव हमारा पानी’ए कि जो जो गांव अपने अपने यहां ऐसे सिविल ढांचे बनायेंगे कि अपने गांव के पानी को गांव में ही संचयन करेंगे तो उन गांवों को सरकार ऐसे ढांचे बनाने के लिए 60 हज़ार रुपये या एक लाख रुपये देगी। दिल्ली से योजना चलीए एक राज्य की राजधानी में पहुंची। वहां से हर कलक्टर के पास गयी। एक ज़िले के ज़िला कलक्टर ने अपने ज़िले के सारे सरपंचों को बुलाया और उनको कहा कि ऐसे ऐसे योजना आयी हैए आप लोग भी अपने अपने गांव में ऐसा कीजिए। तो इस गांव का सरपंच अपने गांव में वापस आया और सारे गांव को उसने इकट्ठा किया और कहा भई ऐसी योजना आयी है और हमें ऐसी तैयारी करनी है कि हमारे गावं का पानी हमारे गांव में ही रह जाय। उसके लिए हमें एक लाख रुपया मिलेगा। लोगों ने जब ये बात सुनी तो सब लोग हंसने लगे। लोग हंस इसलिए रहे थेए क्योंकि उस गांव में बाढ़ आती है। लोग पानी संचयन नहीं करना चाहतेए लोग पानी बाहर भेजना चाहते हैं। +तो इतनी बेतुकी योजनाएं दिल्ली से बनके आती हैं। सारे देश की सारी समस्याओं का समाधान योजनाओं से नहीं निकल सकता। मेरा तो ये मानना है कि देश की किसी भी समस्या का समाधान दिल्ली में बनने वाली योजनाओं से नहीं हो सकता। दो अगल-बगल के गांवों की ही स्थिति इतनी भिन्न होती हैए इतनी अलग होती है कि आप उनकी समस्याओं को दिल्ली में बैठे समझ ही नहीं सकते। उनके समाधान आप सोच ही नहीं सकते। +बी पी एल की राजनीति. +एक और बात। ये जितनी भी सरकारी योजनाएं बनती हैंए इन सारी सरकारी योजनाओं ने लोगों को भिखारी बनाके रख दिया है। इनमें से ढेरों योजनाएं ग़रीबी उन्मूलन के नाम परए ग़रीबों के नाम पर बनती हैं। बीपीएल के नाम पर बनती हैं। इस बीपीएल की राजनीति को हमें समझना पड़ेगा। +ये बीपीएल की योजनाएं दिल्ली में इसलिए बनाई जाती हैं ताकि सत्तारूढ़ पार्टी को वोट मिले। दिखावा किया जाता है। कहा जाता है कि हम ग़रीबों की सरकार हैं। ग़रीबों के लिए योजनाएं बना रहे हैं। ग़रीबी उन्मूलन चाहते हैं। ग़रीबों के लिए कहकर योजनाएं बनायी जाती हैं लेकिन जो लोग योजना बनाते हैं उनको पहले दिन से पता है कि ये पैसा ग़रीबों तक नहीं पहुंचने वाला और वो केवल दिखावा कर रहे हैं। +हम हमारे देश की एक राष्ट्रीय पार्टी के एक बड़े नेता से मिले। हमने उनको कहा कि 'आप ये सारी योजनाएं दिल्ली में बनाना बंद कीजिए और सीधे सीधे पैसा गांव में भेज दीजिए। हर गांव में जनता खुद तय कर लेगी कि उनको क्या चाहिएज्। तो उसने कहा कि 'क्या आपको पता है कि एक एक योजना के इर्द गिर्द कितने बड़े बड़े मगरमच्छ बैठे हैं? अगर हमने योजनाएं बनानी बंद कर दीं तो हमारी पार्टी की सरकार गिर जाएगी। ये पार्टियां अपना समर्थन वापस ले लेंगीज्। तो इसका मतलब इनको पता है कि ये पैसा ग़रीबों तक न ही पहुंच रहा है और न ही पहुंचेगा। फिर ये क्यों योजनाएं बना रहे हैं? योजनाएं वो इसलिए बना रहे हैं क्योंकि इनको चोरी करनी है। ये जानबूझ कर एक तरफ तो योजनाएं बना कर दिखाते हैं कि ये ग़रीबों की सरकार है। और दूसरे इनको पता है कि ये पैसा तो उनकी अपनी जेब में ही आना है। तो ये योजनाएं इसलिए बनाई जाती हैं ताकि एक तरफ तो वोट मिले और दूसरी तरफ चोरी करने के लिए मौका मिले। +उधर इन योजनाओं का गांव की जनता के ऊपर बहुत बुरा असर पड़ा है। आप किसी गांव में घुस जाइये। वहां पर लोग आपको घेर लेंगे और सबसे पहली मांग उनकी ये होगी कि साहब मेरा बीपीएल की सूची में नाम नहीं आया। मेरा नाम बीपीएल में डलवा दीजिए। बीपीएल का मतलब क्या होता है? बीपीएल का मतलब ‘भिखारी’। एक ऐसा व्यक्ति जो ये कहता है कि मैं सक्षम नहीं हूँए मेरे पास पैसा नहीं हैए मैं एक बहुत ही दीन हीन व्यक्ति हूं और समाज से चाहता हूं कि समाज मेरी मदद करे। और इस देश की विसंगति देखिये कि हर आदमी ये कह रहा है कि 'मेरे को भिखारी बना दोए मेरे को भिखारी बना दोए मेरे को भिखारियों की लिस्ट में डाल दोज्। होड़ लगी हुई है लोगों के अंदर कि हम सारे भिखारी बनना चाहते हैं। ऐसा देश जिसका हर आदमी भिखारी बनना चाहता होए ऐसा देश कैसे प्रगति कर सकता है? कभी प्रगति नहीं कर सकता। +मैं देश में इतना घूमा लेकिन मुझे एक आदमी ऐसा नहीं मिला जो ये कहे कि मैं अभी तक बीपीएल की लिस्ट में थाए मैं भिखारियों की लिस्ट में थाए लेकिन अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूंए मुझे बीपीएल की लिस्ट से निकाल दो। कोई अपने पैरों पर खड़ा नहीं होना चाहता है। सब कहते हैं कि मुझे भिखारियों की लिस्ट में डाल दो। तो ये सारी की सारी योजनाएं लोगों की मानसिकता को बर्बाद कर रही हैं। +तो पहली बात तो हमें ये समझ में आई कि हमारा सरकारी कर्मचारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। दूसरी बात ये समझ में आई कि हमारा सरकारी फ़ंड के इस्तेमाल पर भी कोई नियंत्रण नहीं है। +सरकारी नीतियों और क़ानूनों पर कोई नियंत्रण नहीं. +हमारी सरकारें इतने क़ानून बनाती हैंए इतनी नीतियां बनाती हैं। इन सारे क़ानूनों के बनने परए इन सारी नीतियों के बनाने पर भी हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। +इस पुस्तक के पहले अध्याय में इस बात का ज़िक्र है कि किस तरह हमारी संसद ऐसे ऐसे क़ानून पारित करती है जो देशी विदेशी कंपनियों या विदेशी सरकारों के प्रभाव में आकर किये जाते हैं। इस देश के लोगों की ज़िदंगी कौड़ियों के भाव दांव पर लगा दी जाती है। +तो वोट डालते हैं हमए सरकार चुनते हैं हम और हमसे सरकार पूछती नहीं है कि हमें किस तरह के क़ानून चाहिएं। क़ानून बनाने के पहले सरकार कंपनियों और विदेशी सरकारों से पूछती है। +तो तीसरी बात ये निकलकर आती है कि हमारे देश के क़ानूनों के बनने परए हमारे देश की संसद परए हमारे देश की विधान सभाओं पर जनता का किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है। +प्राकृतिक संसाधनों पर कोई नियंत्रण नहीं. +हमाराए हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों पर भी कोई नियंत्रण नहीं है। हमारे जितने प्राकृतिक संसाधन हैं जैसे जलए जंगलए ज़मीनए खनिज आदि इनको छीन छीन कर कंपनियों को दिया जा रहा है। +इस वक्त पूरे देश में ज़मीनों के अधिग्रहण को लेकर आग लगी हुई है। लगभग हर राज्य में कम से कम तीन या चार जगहों पर तो ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ लोगों के आंदोलन चल ही रहे हैं। लोगों की मर्ज़ी के ख़िलाफ ज़मीनें अधिग्रहण की जा रहीं हैं। ज़मीनों के अधिग्रहण को लेकर लोगों की बुनियादी तौर पर निम्न आपत्तियां हैंरू- +(क) कई किसानों का कहना है कि हम ज़मीनें नहीं देंगे। लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि जिन योजनाओं के लिए ज़मीनें छीनी जा रहीं हैंए वो जनहित में कैसे हैं? सरकारें इस देश के लोगों को यह समझाने में नाकाम रही हैं। अधिकतर जगहों पर ज़मीनें कुछ कंपनियों को देने के लिए अधिग्रहित की जा रहीं हैं। यह बात इस देश के लोगों की समझ के बिल्कुल परे है कि लोगों के द्वारा चुनी हुई सरकारेंए लोगों के कड़े विरोध के बावजूद कुछ कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए क्यों ज़मीनें छीन रही हैं? +(ख) कुछ का कहना है कि हमें ज़मीन के बेहतर दाम चाहिए। जिन दामों पर किसानों से ज़मीनें छीनी जाती हैंए वे बहुत कम हैं। लगभग हर आंदोलन में लोगों का दाम को लेकर सरकार से झगड़ा चल रहा है। बिना लोगों से सलाह मशविरा किएए लोगों से ज़मीन छीन ली जाती है और दाम भी तय कर दिये जाते हैं। ऊपर से यह पैसा भी लोगों को कई कई दशकों तक नहीं मिलता। +(ग) कई आदिवासी इलाकेए जहां से ज़मीनें अधिग्रहित की गई हैंए वहां मुआवजे़ के तौर पर यदि किसान को एक या दो लाख रुपये मिल भी गएए तो इससे उसकी ज़िंदगी चलने वाली नहीं है। इस दो लाख रुपये का वो क्या करेंगे? कुछ एकड़ ज़मीन पर खेती करके वो अपनी ज़िंदगी बसर ज़रूर कर लेते हैं। पर एक या दो लाख रुपये से ज़िंदगी नहीं कटेगी। ऐसे सभी किसानों को सरकारें उनकी ज़मीनें छीनकर भुखमरी के कगार पर छोड़ देती हैं। +(घ) अक्सर जब गांव के गांव अधिग्रहित किये जाते हैं तो ज़मीन वालों को तो ज़मीन के दाम मिल जाते हैं पर जो लोग वहां मज़दूरी करते थे या गांव में कोई दुकान आदि लगाते थे या कोई अन्य व्यवसाय करते थेए उन्हें कुछ नहीं मिलता। वो सब के सब बेरोज़गार हो जाते हैं। +(घ) तो विभिन्न परियोजनाओं के लिए किये जा रहे भूमि अधिग्रहण में कंपनी को मोटा मुनाफा होता हैए अफ़सरों और नेताओं को मोटी रिश्वत मिलती हैए किसानों को बेरोज़गारी मिलती हैए भूमिहीनों को भुख़मरी और देश की खाद्य सुरक्षा कमज़ोर होती है। सरकारें जनता को भी तो समझाएं कि यह ‘जनहित’ में कैसे है? +आज की भूमि अधिग्रहण की व्यवस्था को हमें ठीक से समझना होगा। मान लीजिए हमारे गांव में कोई कंपनी एक फैक्टरी लगाना चाहती है। तो वो कंपनी हमारे गांव वालों के पास नहीं आती। वो कंपनी जाती है राज्य सरकार के पास। और राज्य सरकार में बैठा हुआ कोई अधिकारी या नेता उनसे पैसे खा लेता है और उसे मंज़ूरी दे देता है कि 'आप इस गांव में फैक्टरी लगा सकते होज्। और उसके बाद सारी सरकारी ताकत इस्तेमाल करकेए पुलिस इस्तेमाल करके लोगों को बेदखल किया जाता हैए उनसे ज़मीन कौड़ियों के भाव छीनी जाती है। और वो ज़मीन इन कंपनियों को कौड़ियों के भाव दे दी जाती है। क्योंकि राज्य सरकार में किसी ने रिश्वत ले ली है। +स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन (सेज़) के नाम पर इस देश में न जाने कितने लोगों की ज़मीनें छीनी गईं। क्या आपको पता है कि केंद्र सरकार में एक घंटे की मीटिंग में सेज़ के 30-30 प्रोजेक्ट पास किये जाते थे? एक सेज़ प्रोजेक्ट इतना बड़ा होता है। उसे आप मात्र दो मिनट की चर्चा में कैसे पास कर सकते हो? तो पास करना तो महज़ दिखावा था। पास करने के नाम पर पैसे खाते हैं। जिस जिस कंपनी की रिश्वत का पैसा आ गयाए उसका प्रोजेक्ट दो मिनट में पास। जिनकी रिश्वत नहीं आईए उनका प्रोजेक्ट लटका दिया जाता है। +तो लोगों का अपनी ज़मीनों पर भी कोई नियंत्रण नहीं है। +हमारे देश में ख़निज पदार्थों की ख़दानें निजी कंपनियों को औने-पौने दाम में बेची जा रही हैं या लीज़ पर दी जा रही हैं। हमारे देश में ख़निज बहुतायत में हैं। कोयला हैए लोहा हैए बौक्साइट है। ये एक दिन में पैदा नहीं हुए। ये हजा़रों साल की प्राकृतिक प्रक्रिया से बने हैं। पर हमारे देश की सरकारें इन्हें निजी कंपनियों को धड़ल्ले से औने पौने दामों में बेच रही हैं। निजी कंपनियां इन ख़निजों को हमारे देश के फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं करतीं। ये कंपनियां उन ख़निजों को निकालकर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बहुत अधिक दामों में बेचकर भारी मुनाफ़ा कमाती हैं। +जैसे लोहे की ख़दानें लेने वाली कंपनियां सरकार को महज़ 27 रुपये प्रति टन रॉयल्टी देती हैं। उसी लोहे को ये कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में 6000 रुपये प्रति टन के हिसाब से बेचती हैं। (ख़दान से लोहा निकाल कर उसकी सफाई इत्यादि करने में लगभग 300 रुपये प्रति टन खर्च होता है।) क्या यह सीधे सीधे देश की संपत्ति की लूट नहीं है? +जिस तेज़ी से देश की ख़दानों से ख़निज निकाला जा रहा हैए ऐसा लगता है कि कुछ वर्षों में देश के ख़निज खत्म हो जाएंगे। देश के कुछ भागों में तो ख़निज खत्म भी होने लगे हैं जैसे कुछ वर्षों पहले तक गोवा से बड़ी मात्र में लोहा जापान निर्यात किया जाता था। सुनते हैं कि गोवा का अच्छा लोहा लगभग समाप्त हो गया है। कर्नाटक के बेलाडिला का लोहा दुनिया का सबसे बेहतरीन लोहा माना जाता है। यह लोहा पिछले कुछ वर्षों से कर्नाटक के कुछ नेताओं और कंपनियों द्वारा इतनी तेज़ी से निकाला जा रहा है कि अगले 25 वर्षों में बेलाडिला की खदानें खाली हो जायेंगी। यह लोहा चीन भेजा जा रहा है। चीन के पास लोहे की अपनी ख़दाने हैं पर वो अभी उन्हें नहीं खोद रहा। शायद दुनिया का लोहा खत्म होने के बाद वो अपनी खदानें इस्तेमाल करेगा। +ज़ाहिर है कि देश के ख़निजए केंद्र और राज्यों की सरकारों में बैठे नेताओं और अफ़सरों के हाथों में बिल्कुल सुरक्षित नहीं है। ये पार्टियांए ये नेता पूरे देश को उठाकर बेच डालेंगे। +दूसरी बातए इन कंपनियों को जब इन ख़दानों के परमिट दिये जाते हैंए तो जो लोग वहां रह रहे हैं वहां से उन्हें उजाड़ा जाता है। उड़ीसाए झारखंड और छत्तीसगढ़ की सरकारें खनन के लिए ढेरों करार भिन्न भिन्न कंपनियों के साथ साइन कर चुकीं हैंए जिनके तहत कई लाख एकड़ भूमि आदिवासियों से छीनकर इन कंपनियों को दी जा रहीं हैं। उड़ीसाए झारखंड और छत्तीसगढ़ के अनेक इलाक़े जनता और पुलिस के बीच युद्ध के मैदान बन गए हैं। इसी से इन इलाकों में नक्सलवाद को बढ़ावा मिला है। आदिवासियों की ज़मीनें औने-पौने दामों में छीन कर इन कंपनियों को दे दी जाती हैं। इन ख़दानों से ये कंपनियां भारी मुनाफ़ा कमाती हैंए लेकिन आदिवासी बेरोज़गारी और भुखमरी का शिकार हो जाते हैं। उनके गांव और समाज टूट जाते हैं। +तीसरी बातए ये कंपनियां ख़निज निकालते वक्त कोई एहतियात नहीं बरततीं। ये ख़निज निकालते वक्त पर्यावरण खराब करती हैं। जिसका खामियाज़ा आस पास के रहने वाले लोगों को भुगतना पड़ता है। जब लोग अफ़सरों को शिकायत करते हैं तो सरकारी अफ़सर रिश्वत खाकर लोगों की शिकायतों को अनदेखा कर देते हैं। +जैसे रांची के पास एक गांव है, वहां पर ओएन जी सी के तेल निकालने के कुंए हैं। ओण्एनण्जीण्सीण् के कुछ कुँओं में एक बार मीथेन गैस लीक होने लगी। इस तरह के बहुत हादसे आस पास के गांव में हो चुके थे। जब मीथेन गैस चारों तरफ वातावरण में लीक होती है तो आप कहीं भी आग नहीं जला सकते। जैसे ही माचिस की तीली लगाएंगे पूरे वातावरण में आग भभक उठेगी। लोग बहुत परेशान हो गये। उनके पास कोई चारा नहीं था। वो ओण्एनण्जीण्सीण् के ख़िलाफ कुछ नहीं कर सकते। उन्होंने कलक्टर को शिकायत की। कलक्टर ने कहा कि हम कार्रवाई कर रहे हैं। कलक्टर ने इतने काम चलाऊ तरीके से बात की कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। उसने कहा कि इस इलाके में मीथेन गैस का रिसना या लीक होना तो आम बात है। लोगों को इसे सहन करना पड़ेगा। कलक्टर को गैस रिसने से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उसकी ज़िंदगी बड़े सुचारू रूप से चल रही है। तो लोगों का देश के ख़निजों परए उनकी खुली लूट पर और उनके ख़नन से फैल रहे प्रदूषण पर कोई नियंत्रण नहीं है। +बीर सिंह मरकम छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले के एक गांव का रहने वाला आदिवासी है। जंगल की एक छोटी सी ज़मीन के टुकड़े पर वह मक्का उगाता था। इसी से उसके पूरे परिवार की रोटी चलती थी। 1998 में वन विभाग वाले बीर सिंह के साथ उसके गांव के 75 लोगों को गिरफ़्तार करके ले गए और जंगल की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा करने के जुर्म में उन सबको जेल में डाल दिया। +रिहा होने के बाद अगले कुछ वर्षों में मरकम को कम से कम 20 बार कोर्ट जाना पड़ा। कोर्ट उसके गांव से लगभग 30 किमी दूर है। हर कोर्ट की पेशी ने उसकी और कमर तोड़ दी। अंततः सभी खर्चे और जुर्माना चुकाने के लिए उसे अपने बैल बेचने पड़े। +मरकम जैसे लाखों करोड़ों ऐसे आदिवासी हैं जिनके साथ भारत की आज़ादी ने सबसे भद्दा मज़ाक किया। 1947 तकए अंग्रेज़ों ने जब जब आदिवासी क्षेत्रें पर कब्ज़ा करने की कोशिश कीए उन्हें मुंह की खानी पड़ी। तब अंग्रेज़ों ने आदिवासी इलाकों को अपने सीधे कब्ज़े से बाहर रखने की नीति अपनाई। पूरे भारत पर लागू होने वाले अंग्रेज़ी क़ानून इन आदिवासी इलाकों पर लागू नहीं होते थे। अंग्रेज़ों के ज़माने में इन आदिवासी इलाकों कोए जहां अंग्रेज़ों का क़ानून लागू नहीं होता थाए ‘एक्सक्लूडेड एरिया’ कहा जाता था अर्थात् ये इलाके अंग्रेज़ी सत्ता से काफ़ी हद तक बाहर थे। +1950 में भारतीय संविधान बना और सभी भारतीय क़ानून सभी आदिवासी इलाकों पर भी लागू कर दिये गए। जिस ज़मीन पर आदिवासी सदियों से रह रहे थेए उस ज़मीन की मिल्कियत दिखाने के लिए अधिकतर आदिवासियों के पास तो कोई कागज़ ही नहीं थे। बाहरी लोगों ने इसका फ़ायदा उठाया और छल से उनकी ज़मीनें हथियाने लगे। उसी तरह जिन आदिवासियों की अभी तक जंगलों पर आजीविका निर्भर थी (कई आदिवासी तो जंगलों में ही रहते थे) इन सभी जंगलों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया और अचानक ये आदिवासी अपने ही घर मेंए अपनी ही ज़मीन पर और अपने ही जंगलों में गुनहगार हो गये। वन विभाग के कर्मचारी उन्हें तरह तरह से तंग करने लगे। +वन विभाग के अधिकारीए यहां तक की अदने से कर्मचारी भीए आदिवासियों के गांवों में आकर उन्हें परेशान करते हैं। हालांकि ये आदिवासी सदियों से जंगलों में रहते आएए लेकिन उनके पास इन ज़मीनों के कागज़ नहीं हैं। तो इन्हें इन ज़मीनों पर अनाधिकृत कब्ज़ा किया हुआ माना जाता है। अधिकारी आकर लोगों को खेत जोतने से रोकते हैंए लकड़ी लेने से रोकते हैंए पत्ते और फल नहीं बीनने देतेए पशु नहीं चराने देते। हाथियों को लाकर खेतों को रौंद दिया जाता है। बबूल के बीज चारों तरफ फेंक कर मिट्टी बर्बाद कर देते हैं। लोगों को पीटा जाता हैए गिरफ़्तार किया जाता है और उनकी फसलें बर्बाद कर दी जाती हैं। वन विभाग के कर्मचारी तो एक तरह से अपनी ड्यूटी कर रहे हैं - वनों की रक्षा। +एक तरफ तो आदिवासियों को जंगलों से बेदखल किया जा रहा हैए दूसरी तरफ वन विभाग के कर्मचारीए ठेकेदार और नेता मिलकर जंगलों को खुलेआम लूट रहे हैं। जो वन आदिवासियों और लोगों के संरक्षण में सदियों से सुरक्षित थेए वही वन अब वन विभाग के अधीन आते ही लुप्त होने लगे हैं। आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय और जंगलों की खुली लूट के कुछ उदाहरणः- +(क) हर वर्ष सरकार वनों से तेंदू पत्ते निकालने के लिए ठेके देती है। एक ठेकेदार को 1500 से 5000 तक बोरे निकालने का ठेका मिलता है। ठेका तो इतने का मिलता है पर वन विभाग के अधिकारियों को रिश्वत देकर असली में वो कितना निकालता हैए ये किसी को नहीं पता चलता। एक छोटे से छोटा ठेकेदार भी साल में 15 लाख से ज़्यादा कमा लेता है। पर वो आदिवासियों को जंगल से तेंदू पत्ता निकालने का 30 पैसा प्रति बंडल से भी कम देता थाए जो बाद में नक्सलियों के दबाव में एक रुपया प्रति बंडल किया गया। +(ख) सरकार पेपर मिलों को बहुत ही सस्ते में कई कई वर्षों तक लाखों टन बांस निकालने की इजाज़त देती है। और ये मिल वाले वहीं के आदिवासियों को एक बंडल निकालने के 10 से 20 पैसे मज़दूरी देते हैं। और खुद भारी मुनाफ़ा कमाते हैं। +तो हमारे देश के वनों को नेताए अफ़सर और ठेकेदार मिलकर जमकर लूट रहें हैंए पर लोगों का इस लूट पर कोई नियंत्रण नहीं है। +देश के कई शहरों में पानी की व्यवस्था विदेशी कंपनियों को बेची जा रही है। दिल्ली की सरकार दिल्ली की पानी व्यवस्था को कुछ विदेशी कंपनियों को बेचने जा रही थी। पर लोगों के आंदोलन के बाद उन्हें इसे रोकना पड़ा। +हमारे देश की नदियां तक बेची जा रही हैं। छत्तीसगढ़ में तो पूरी की पूरी शिवनाथ नदी एक कंपनी को बेच दी गयी। अब अगर किसी व्यक्ति को किसी भी काम के लिए उस नदी का पानी इस्तेमाल करना है - सिंचाई के लिएए पीने के लिएए कपड़े धोने के लिए तो कंपनी की मर्ज़ी के बिना नहीं कर सकते। +देश की लगभग सभी नदियों पर बांध बनाए जा रहें है। गंगा पर इतने बांध बनाए जा रहें है कि बताते हैं कि गंगा का अस्तित्व ही नहीं बचेगा। गंगा महज़ बांधों के बीच में बहने वाली एक धारा मात्र रह जाएगी। हम सहमत हैं देश को बिजली की ज़रूरत है। पर क्या हम इस बात को नकार सकते हैं कि देश को नदियों की भी ज़रूरत है? कई देशों में राष्ट्रीय नदियों को अपनी अविरल धारा में बहते रहने के लिए क़ानूनी संरक्षण है। हमारे देश में ऐसा नहीं है। पिछले कुछ सालों में जिस तेज़ी से हर नदी पर बांध बनाने के ठेके कंपनियों को दिए गए हैंए उससे लगता है कि सरकार में बैठे नेताओं और अफ़सरों को बिजली उत्पादन की कम और ठेकों में मिलने वाली रिश्वत कमाने की ज़्यादा तत्परता है। इस रफ़्तार से कुछ ही वर्षों में सभी नदियां गंदे नालों में बदल जाएंगी। +इन सब उदाहरणों से एक बात तो साफ है कि इन पार्टियोंए नेताओं और अफ़सरों के हाथों में हमारे देश के प्राकृतिक संसाधन खतरे में है। जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो ये लोग मिलकर सब कुछ बेच डालेंगे। +क्या यही जनतंत्र है? +तो ज़ाहिर है कि इस पूरी की पूरी व्यवस्था पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। हम सरकारी कर्मचारियों का कुछ नहीं कर सकते। सरकारी फ़ंड पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। सरकारी नीतियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। क़ानून बनने पर कोई नियंत्रण नहीं है। विधान सभाओं व संसद पर कोई नियंत्रण नहीं है। जलए जंगलए ज़मीन सहित जितने प्राकृतिक संसाधन हैं इनको बेचा जा रहा है। इस पर भी हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। एक दिन ये सारी पार्टियां और नेता मिलकर देश को बेच डालेंगे। +क्या यही जनतंत्र है? +क्या इसी को हम जनतंत्र कहेगें कि पांच साल में एक बार वोट डालो और उसके बाद अपनी ज़िंदगी इन नेताओं और अफ़सरों के हाथ में गिरवी रख दो। +ये जनतंत्र नहीं हो सकता। ज़रूर कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। तो हमारे देश की मूल समस्या ये है कि हमारे देश में जनतंत्र नहीं है। +हमें जनतंत्र चाहिए। अब ये पांच साल में एक बार वोट डालने की राजनीति नहीं चलेगी। अब सीधे सीधे जनता को सत्ता में भागीदारी चाहिए। जनता निर्णय ले और नेता और अफ़सर उन निर्णयों का पालन करें। +बीते समय की बात. +जब हम इस तरह की बातें करते हैं तो बहुत लोग कहते हैं कि जनता कैसे निर्णय लेगी? जनता तो आपस में लड़ेगी। जनता निर्णय नहीं ले सकती। +इस देश में सदियों से जनता निर्णय लेती आयी है। ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हम अपने देश की संस्कृति भूल गये। भारत ने जनतंत्र कहां से सीखा? बहुत लोगों का मानना है कि हमने जनतंत्र अमरीका से सीखा। कोई कहता कि हमने जनतंत्र इंग्लैंड से सीखा। सच बात ये है कि जनतंत्र भारत में बुद्ध के ज़माने से चला आ रहा है। बुद्ध के ज़माने का जनतंत्र आज के जनतंत्र से कहीं ज़्यादा सशक्त था। वैशाली दुनिया का सबसे पहला गणतंत्र था। उन दिनों में राजा का बेटा राजा तो बनता थाए राजा के चुनाव नहीं होते थेए लेकिन राजा की चलती नहीं थी। सारे निर्णय पूरे गांव की ग्राम सभा में लिए जाते थे। जो ग्राम सभा कहती थीए जो गांव के लोग कहते थेए राजा को वही निर्णय मानने पड़ते थे। आज हम पांच साल में अपने राजा को चुनते तो हैं लेकिन हमारी उस राजा पर चलती नहीं हैं। उन दिनों में राजा को चुनते तो नहीं थे लेकिन राजा पर जनता की चलती थी। +उन्हीं दिनों की एक घटना है। वैशाली का एक राजा हुआ। एक दिन सभा चल रही थी। सारे नगर के लोग बैठे हुए थेए राजा बैठे थे। कुछ व्यक्ति एक लड़की की तरफ इशारा करके कहते हैं कि आप हमारे नगर की नगर वधू बन जाइए। वो लड़की कहती है कि 'ठीक हैए मैं नगर वधू बन जाऊँगी। लेकिन मेरी एक शर्त है। मुझे राजा का राजमहल चाहिए। अगर आप मुझे राजमहल दे दें तो मैं नगर की नगर वधू बनने के लिए तैयार हूंज्। तो वहां पर प्रस्ताव रखा जाता है और प्रस्ताव पारित हो जाता है कि आज से इस राजा का राजमहल उस लड़की का हुआ। राजा वहीं बैठा हुआ था और सब कुछ सुन रहा था। वो सकपका जाता हैए बेचैन होता है और कहता है - 'ऐसे कैसे हुआए ये तो मेरा राजमहल है। आप मेरा राजमहल इस लड़की को कैसे दे सकते हैंघ्ज् तो जनता कहती है - 'ये आपका राजमहल नहीं है। ये राजमहल हम लोगों ने आपको दिया है। हम टैक्स देते हैं। हमारे पैसे से ये राजमहल बना। आज इस देश की जनता ये राजमहल आपसे वापस लेकर इस लड़की को दे रही है। अगर आपको राजमहल चाहिए तो आप अपने लिए दूसरा राजमहल बनवा लीजिए।ज् और उस राजा को वो राजमहल खाली करके उस लड़की को देना पड़ा और अपने लिए दूसरा राजमहल बनवाना पड़ा। किसी लड़की को नगर वघू बनाना एक गलत प्रथा है लेकिन उस समय की राजनीति में जनता की ताकत का अन्दाज़ हम इस उदाहरण से लगा सकते हैं। +हमारे देश की राष्ट्रपति इतने बड़े बंगले में रहती है। दिल्ली के बीचों-बीच 340 एकड़ ज़मीन पर राष्ट्रपति का बंगला है। और उसी दिल्ली की 40 प्रतिशत आबादी झुग्गी झोंपड़ी में कुलबुला रही है। कीड़े मकोड़ों की तरह रहती है। दो गज़ ज़मीन नहीं है उनके पास सोने के लिए। एक एक झोंपड़ी में दस दस लोग फंसे रहते है। अगर हम लोग प्रस्ताव पारित करें कि हमारे देश की राष्ट्रपति को थोड़े छोटे बंगले में चले जाना चाहिएए तो आपको क्या लगता है - क्या वो मानेंगी? बिल्कुल नहीं मानने वाली। +नई दिल्ली में अफ़सरों केए मंत्रियों के इतने बड़े बडे बंगले हैं। एक मिंया बीवी इतने बड़े बंगले में रहते हैं। अगर हम इन सारे अफ़सरों को और नेताओं को कहें कि आप थोड़े छोटे बंगले में चले जाओ ताकि दिल्ली की जनता को पांव पसारने के लिए ज़मीन मिलेए तो क्या वो बंगले खाली करेगें? नही करेंगे। +वो जनतंत्र था जब लोग प्रस्ताव पारित करके अपने राजा का राजमहल खाली करवा लेते थे। आज जनतंत्र नहीं है जब हम एक प्रस्ताव पारित करके अपने घर के सामने की सड़क नहीं बनवा सकतेए अपने स्कूल के अध्यापक को ठीक नहीं कर सकतेए अपने अस्पताल के डॉक्टर को ठीक नहीं कर सकते। +तो पहले ऐसी व्यवस्था थी कि सीधे सीधे जनता निर्णय लेती थी और राजा उसका पालन करते थे। इस किस्म की बात हमारे देश में 1860 तक चलती रही। गांव की व्यवस्था पर सीधे सीधे गांव के लोगों का नियंत्रण था। हमारे गांव की सिंचाई व्यवस्था कैसी होगीए गांव के लोग तय करते थे। हमारे गांव की शिक्षा व्यवस्था कैसी होगीए स्कूल कैसे चलेंगेए गांव के लोग तय करते थे। स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी होगीए गांव के लोग तय करते थे। हमारे देश पर कई लोगों ने आक्रमण कियाए लेकिन उन्होंने केवल केन्द्र सरकार पर कब्ज़ा किया। उन्होंने गांव की व्यवस्था को नहीं छेड़ा। केन्द्र सरकार में बैठकर वो केवल गांव से वसूलने वाला टैक्स कम या ज़्यादा करते रहते थे। लेकिन गांव की व्यवस्था को उन्होने नहीं छेड़ा। +1830 में लॉर्ड मैट काल्फए जो कि उस वक्त के कार्यकारी गवर्नर जनरल हुएए वो लिखते हैं कि इस देश की बुनियाद यहां की ग्राम सभाएं है। यहां के लोग मिलते हैं और सारा गांव निर्णय लेता है। और उसी से गांव चलता है। 1860 में अंग्रेज़ों ने इन ग्राम सभाओं को तोड़ने के लिए क़ानून बनाया। क्योंकि वो समझ गये थे कि जब तक ग्राम सभाएं नहीं तोड़ी जाएंगी तब तक अंग्रेज़ों की बुनियाद इस देश में नहीं टिकेगी। उन्होंने क़ानून बनाकर कलक्टर राज कायम किया। सारे अधिकार जो पहले लोगों के पास थेए ग्राम सभाओं के पास थेए वो सारे अधिकार उनसे छीन कर एक अंग्रेज़ कलक्टर को दे दिये गये। तो पहले गांव के लोग सिंचाई व्यवस्था चलाते थे। अब एक सिंचाई विभाग बना दिया गया। पहले गांव के लोग शिक्षा व्यवस्था चलाते थे। अब एक शिक्षा विभाग बना दिया गया। ज़िंदगी के हर पहलू से संबंधित हर चीज़ का एक विभाग बना दिया गया। और उन सारे विभागों के ऊपर एक अंग्रेज़ अफ़सर को लाकर बिठा दिया गयाए जिसको कहा गया ‘कलक्टर’। +दुर्भाग्यवश आज़ादी के वक्त 1947 में हम लोगों ने जनता के जो अधिकार थे वो जनता को वापस नहीं लौटाए। ग्राम सभाओं के जो अधिकार थेए वो ग्राम सभाओं को वापस नहीं लौटाये। हमने केवल अंग्रेज़ कलक्टर को हटाके एक भारतीय कलक्टर बिठा दिया। बाकी सारी की सारी अंग्रेज़ी व्यवस्था हमने बरकरार रखी। जब तक वो अधिकार जनता को वापस नहीं दिये जाएगें तब तक सुधार नहीं हो सकता। तब तक आज़ादी नहीं आयेगी। +वर्तमान पंचायती राज की विसंगतियाँ. +कई लोग कहते हैं कि हम नया क्या कह रहे हैं? अभी भीए पंचायतें हैं तो सही। पंचायती राज व्यवस्था के ज़रिऐ सीधे जनता की भागीदारी होए यह विचार तो बहुत अच्छा है। अंग्रेज़ों के पहले हमारे देश में ऐसा होता भी था। लेकिन आज़ादी के बाद हमारे देश में पंचायती राज के नाम पर जो व्यवस्था लागू की गईए उसने जनता को सीधे अधिकार देने के बजाय नेताओं और अधिकारियों के भ्रष्टाचार के लिए नए मौके खोल दिये हैं। +स्वशासन की प्रभावी संस्था होने के बजाय दुर्भाग्यवश पंचायतें केन्द्र एवं राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं एवं निर्देशों को लागू करने की एजेंसी बन कर रह गयी हैं। अधिकतर योजनाएं दिल्ली या प्रांतीय राजधानियों में बनायी जाती हैं। पंचायतों को केवल उन्हें लागू करने का निर्देश दिया जाता है। ग्राम सभाओं यानी पूरे गांव की खुली बैठक का आयोजन कभी-कभार ही होता हैए क्योंकि उन्हें बुलाने में किसी की रुचि नहीं होती है। जब कभी ग्राम सभाओं की बैठक बुलायी जाती हैए तब भी लोग इनमें भाग लेने के लिए बामुश्किल ही आते हैंए क्योंकि ग्राम सभाओं में रखी गयी उनकी मांगों पर शायद ही कभी कोई कार्रवाई होती है। +हमारी पंचायती राज व्यवस्था में ढेरों कमियां हैंए पर मोटे तौर पर निम्न बातें इस व्यवस्था का गला घोटे हुए हैंरू- +(क) पंचायतों को बहुत कम अधिकार व शक्तियां दिये गये हैं। सरकारी कर्मचारियों और सरकारी फ़ंड पर पंचायतों का किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है। +(ख) जो थोड़े बहुत अधिकार पंचायतों को दिये भी गये हैंए वो सभी सरपंच या प्रधान में निहित हैं। किसी भी पंचायत में सरपंच ही सर्वे सर्वा है। वही सभी निर्णय लेता है। ग्राम सभाओं को यानि कि लोगों को किसी तरह का कोई अधिकार नहीं है। अधिकांश पंचायती राज क़ानूनों में ग्राम सभा को केवल सरपंच को सलाह देने का अधिकार है - सरपंच उस सलाह को मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र है। +(ग) इसीलिए अधिकतर सरपंच भ्रष्ट हो गए हैं। जब वो भ्रष्टाचार करते हैं तो लोगों को उसके ख़िलाफ किसी प्रकार की कोई कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं दिया है। लोग केवल बेबस होकर देखते रहते हैं। +(घ) सरपंच के भ्रष्टए निकम्मे या गै़र ज़िम्मेदाराना व्यवहार के ख़िलाफ कार्रवाई करने का अधिकार कलक्टर को दिया गया है। कलक्टर किसी भी सरपंच के ख़िलाफ कभी भी कोई भी कार्रवाई शुरू कर सकता है। उन्हें निलंबित कर सकता है। इसीलिए अधिकतर सरपंच कलक्टर और बीण्डीण्ओण् से डरे रहते हैं। किसी भी ज़िले में कलक्टर एक तरह से राज्य सरकार के नुमाइंदे के रूप में काम करता है। जैसे राज्य सरकार में गवर्नर केन्द्र सरकार का नुमाइंदा होता हैए वैसे ही ज़िले में कलक्टर राज्य सरकार का नुमाइंदा होता है। सौभाग्य से गवर्नर के पास राज्य सरकार में हस्तक्षेप करने के बहुत कम अधिकार हैंए पर दुर्भाग्यवश कलक्टर के पास किसी भी पंचायत में हस्तक्षेप करने के असीम अधिकार हैं। राज्य सरकारें कलक्टर के ज़रिये पंचायतों में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप कर रही हैं। आइये देखते हैं मौजूदा पंचायती राज व्यवस्था की विसंगतियों के कुछ उदाहरण। +भौंडसी गांव में वृक्षारोपण अभियान. +किसी भी गांव में लोगों को पानी की भी ज़रूरत होती हैए मिट्टी की भी ज़रूरत होती हैए फ़सल की भी ज़रूरत होती हैए सिंचाई की भी ज़रूरत होती हैए हर चीज की ज़रूरत होती है। लेकिन सरकार में सिंचाई विभाग को इस से कोई मतलब नहीं है कि मिट्टी का क्या होगा? मिट्टी वाले विभाग को इस से कोई मतलब नहीं है कि पानी का क्या होगा? पानी वाले विभाग को इससे कोई मतलब नहीं है कि पेड़ों का क्या होगा? पेड़ों वाले विभाग को इससे कोई मतलब नहीं है कि दूसरी चीजों का क्या होगा? हर विभाग का वार्षिक लक्ष्य होता है और हर विभाग अपने लक्ष्य पूरे करने में लगा हुआ है। +दिल्ली के पास हरियाणा में एक गांव है भौंडसी। वन विभाग को एक बार लक्ष्य मिला कि उन्हें ज़्यादा पेड़ लगाने हैं। और इस गांव में पेड़ों की संख्या कम थी। तो उन्होंने अपने पेड़ ज़्यादा दिखाने के लिए हैलीकॉप्टर से कीकड़ के पेड़ों के बीजों की पूरे इलाके में बौछार करा दी। उसकी वजह से चारों तरफ कीकड़ ही कीकड़ के पेड़ हो गये। कीकड़ के पेड़ की इसलिए बौछार की गयी क्योंकि ये पेड़ बहुत जल्दी उग जाते हैं। तो उन्हें अपने लक्ष्य पूरे करने थे। उन्हें ये दिखाना था कि इस इलाके में पेड़ों का कितना घना जाल फैल गया है। लेकिन इन कीकड़ के पेड़ों ने वहां की सारी पानी व्यवस्था को बर्बाद कर दिया। क्योंकि कीकड़ का पेड़ बहुत पानी सोखता है। तो उस इलाके की ज़मीन में पानी का स्तर बहुत नीचे चला गया। चले थे भलाई करने और कर दी बुराई। +यह है हमारी पंचायती राज व्यवस्था। हमारे इलाके में कौन से पेड़ लगने चाहिएए इस पर न वहां के लोगों का नियंत्रण है और न ही पंचायतों का। +कुटुम्बाकम में शहर का कूड़ा. +मद्रास के पास एक गांव है कुटुम्बाकम। मद्रास के आसपास के 6 शहरों का कूड़ा डालने के लिए कई सालों से जगह ढूंढी जा रही थी। अचानक सरकार की बुरी नज़र इस गांव की गोचर भूमि पर पड़ी। इस गांव में लगभग 100 एकड़ गोचर भूमि है। जिस पर रोज़ लगभग 5000 पशु चरते हैं। वहां के कलक्टर ने आदेश पारित करके 70 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया। ताकि उन 6 शहरों का कूड़ा इस ज़मीन पर डाला जा सके। ज़ाहिर है कि यहां के लोग बहुत क्रोधित हुए। उनकी पहली चिंता थी कि अब उनके पशु कहां चारा खाऐंगे? दूसरी बात कि शहरों का कूड़ा उनके गांव में क्यों डाला जाएए क्या उस गांव में बसने वाले लोग इंसान नहीं है? हद तो ये है कि गांव के लोगों से बिना पूछे कलक्टर ने ज़मीन अधिग्रहण कर ली थी। लोगों ने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन कोर्ट में भी वो लोग हार गये +क्योंकि क़ानूनन कलक्टर इस तरह से ज़मीन अधिग्रहित करने के लिए अधिकृत है। +क्या यही पंचायती राज है? जहां न पंचायतों को अधिकार हैए न सरपंच को अधिकार है और न ही जनता को अधिकार है। तो मौजूदा पंचायती राज व्यवस्था में सरकार और कलक्टर मिलकर गांव के लोगों और वहां की पंचायत की मर्ज़ी के ख़िलाफ गांव की ज़मीन छीन सकते हैं। आस पास के शहरों का कूड़ा हमारी मर्ज़ी के ख़िलाफ हमारे गांव में डाल सकते हैं। +नरेगा का मज़ाक. +आज सारा का सारा पैसा ऊपर से नीचे चलता है। वो पैसा नीचे पहुंचने ही नहीं दिया जाता। हर अधिकारी उस पैसे को अपने स्तर पर ही खर्च करने पर तुला हुआ है। जैसेए नरेगा के क़ानून के मुताबिकए 4 प्रतिशत पैसा कंटिनजैंसी का होता है। मतलब कि इस पैसे से नरेगा के प्रोजैक्ट के ऊपर काम करने वाली महिलाओं के बच्चों के लिए सुविधा केन्द्र बनाया जायए वहां पर मज़दूरों की पानी की व्यवस्था की जायए उनके लिए सुविधाओं की व्यवस्था की जाए। तो इन सब चीजों के लिए और प्रशासनिक खर्चों के लिए या वहां के मज़दूरों के भले के लिए 4 प्रतिशत कंटिनजैंसी का पैसा दिया जाता है। +लेकिन कई ज़िलों में कलक्टरों की मनमानी हो रही है। ये पैसा नीचे गांव तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता है। उत्तर प्रदेश के एक ज़िले में नरेगा का 4 प्रतिशत पैसा ज़िला अधिकारी ने ही रख लिया। और उस ज़िले में जितने गांव थेए उन सारे गांवों के लिए ज़िला अधिकारी ने अलमारियां खरीद दींए दरियां खरीद दींए और सारे गांवों में वो दरियां और अलमारियां बांट दी। लोगों को दरियों और अलमारियों की ज़रूरत नहीं थी। हालांकि क़ानूनन इस पैसे को खर्चने के बारे में ग्राम सभा में निर्णय होना चाहिएए लेकिन चूंकि पैसा ऊपर से नीचे चलता हैए इसलिए बीच के अधिकारी मनमाने ढंग से अपने ही स्तर पर उसे खर्च देते हैं। क़ानून की बात करें तो यह गलत हैए पर क्योंकि लोगों का इन अधिकारियों पर कोई नियंत्रण नहीं हैए तो वो उनकी दादागिरी के ख़िलाफ कुछ नहीं कर सकते। +झाड़ू भी नहीं खरीद पातीं पंचायतें. +क़ानून में लिखा है कि अगर कोई सरपंच ठीक से काम नहीं करेगाए वो मीटिंग में नहीं आयेगाए भ्रष्टाचार करेगा तो कलक्टर को ये अधिकार है कि वो उस सरपंच के ख़िलाफ कार्रवाई कर सकता हैए उसकी जांच कर सकता हैए उसको हटा सकता है। अब एक कलक्टर के नीचे हज़ार दो हज़ार गांव आते हैं। उसे क्या पता कि कोई सरपंच ठीक से काम कर रहा है कि नहीं। ये किसको ज़्यादा पता होगा? जनता को या कलक्टर को? निश्चित तौर पर जनता को ये ज़्यादा पता होगा कि वो ठीक से काम कर रहा है या नहीं। लेकिन उसके ख़िलाफ कार्रवाई करने की ताकत जनता को नहीं दी गयीए कलक्टर को दी गयी है। तो हुआ क्या है कि जहां जहां भ्रष्ट कलक्टर हैंए उन्होंने इन सारे सरपंचों से हफ़्ता मांगना चालू कर दिया है। जो जो सरपंच पैसा दे देते हैं उनके ख़िलाफ कुछ नहीं किया जाता। लेकिन जो पैसा देने से मना करते हैं उनके ख़िलाफ फर्ज़ी जांच चालू कर दी जाती है। फर्ज़ी जांच की धमकी देकर या उनके ख़िलाफ फर्ज़ी जांच शुरू करके उनसे गलत काम करवाने का दबाव डाला जाता है। +एक उदाहरण से समझते हैं कि आज पंचायती राज व्यवस्था में किस तरह राज्य सरकारें सरपंचों का ग़लत इस्तेमाल करती हैं। चूंकि सरपंच की गर्दन सरकारों के हाथ में होती हैए तो सरपंचए मुखिया या प्रधान उनके गलत निर्देशों का भी पालन करने पर मजबूर होते हैं। +उत्तर प्रदेश में राज्य सरकार ने एक ठेकेदार को पूरे राज्य के सारे गांवों को सफाई का सामान मुहैया कराने को कह दिया। ठेलीए फावड़ाए नाली साफ करने का तसला इत्यादि। और उस ठेकेदार को कह दिया कि हर सरपंच को ये दे आओ। अब वो ठेकेदार जा रहा है और हर सरपंच के घर के बाहर वो सामान फेंक देता है। बी डी ओ के यहां से सरपंच को फोन चला जाता है कि इसका भुगतान करा दीजिए। सरपंचों को भुगतान कराना पड़ता हैए नहीं तो उनके ख़िलाफ कोई झूठी कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। +तो कागज़ों में ये दिखाया गया है कि सामान पंचायत ने खरीदाए लेकिन राज्य सरकार ने एक ठेकेदार को गैरक़ानूनी ढंग से वो सारा सामान सप्लाई करने के लिए आदेश दे दिये। और फोन के ऊपर हर सरपंच को ये कह दिया जाता है कि 'ये सामान देने आयेगाए इससे सामान ले लेना और इसका भुगतान करा देना। +सर्व शिक्षा अभियान में भी यही हो रहा है। सर्व शिक्षा अभियान में सामान खरीदने का अधिकार पंचायतों को है। लेकिन वही दादागिरी यहां भी देखने को मिलती है। सर्व शिक्षा अभियान का पैसा हर गांव की ग्राम शिक्षा निधि में हस्तांतरित कर दिया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के कुछ ज़िलों में देखा गया कि ज़िला स्तर पर एक ठेकेदार को सारे गांवों के स्कूलों की बिजली व्यवस्था ठीक करने को कह दिया गया। वो गांव के स्कूल में जाता है। कुछ नहीं करता या घटिया काम करता है। घटिया माल सप्लाई करता है। और फिर हर गांव के सरपंच को फोन के ऊपर कह दिया जाता है कि इसका भुगतान करा दो। तो राज्य सरकारों और ज़िला स्तर के अधिकारियों की इस तरह की दादागिरी गांव के सरपंचों के ऊपर चल रही हैं। +पंचायत सचिव - पंचायत का या राज्य सरकार का ? +क़ानून में ये लिखा है कि पंचायत सचिव या हमारे गांव के जितने कर्मचारी हैं उन सारे कर्मचारियों की नियुक्ति राज्य सरकार करेगी। पंचायत सचिव क्या काम करेगा इसका निर्देश भी राज्य सरकार देगी। बताइयेए हमारे गांव की पंचायत के सचिव की नियुक्ति हम अच्छी करेंगे कि राज्य सरकार अच्छी करेगी? उसे क्या काम करने चाहिएए ये वहां की जनता को तय करना चाहिए कि राज्य सरकार को तय करना चाहिए? राज्य सरकार को क्या पता कि किस गांव में किस चीज की ज़रूरत है? +बैकवर्ड रीजन ग्रांट फ़ंड’ का किस्सा. +केन्द्र सरकार की पिछड़े इलाकों के लिए एक योजना है जिसे कहते हैं बैकवर्ड रीजन ग्रांट फ़ंड। इस योजना के तहत हमारे देश के सबसे पिछड़े ज़िलों को केन्द्र सरकार फ़ंड देती है। योजना में कहा गया है कि उन ज़िलों के सभी गांवों में ग्राम सभाओं के ज़रिए योजना बनाई जाएगी कि उस गांवों में लोगों की क्या ज़रूरते हैं? उस फ़ंड से वही प्रोजेक्ट किए जाएंगे जो ग्राम सभा में तय होंगे। +देश में लगभग 250 ऐसे ज़िले हैं जहां ये योजना चल रही है। हरियाणा में दो ज़िले हैं दृ सिरसा और महेंद्रगढ़ - जहां ये योजना चल रही है। जब हम उन ज़िलों में गए तो हमें पता चला कि वहां तो ग्राम सभाएं हो ही नहीं रही हैं और बिना ग्राम सभाओं के इस फ़ंड का इस्तेमाल किया जा रहा है। तहकीकात करने पर पता चला कि इस फ़ंड का पैसा कलक्टर के अकाउंट में आता है। क़ानूनन यह प्रावधान है कि ग्राम सभाएं जो योजनाएं बनाकर भेजेंगीए कलक्टर को वो फ़ंड उसी के हिसाब से आबंटन करना होगा। लेकिन कलक्टर गांवों से प्रस्ताव मंगाने के बजाय अपनी मन मर्ज़ी से उस फ़ंड का इस्तेमाल कर रहे हैं। +जैसे कलक्टर तय कर लेता है कि इन 100 गांवों में स्कूल बनेंगे। फिर वो एक ठेकेदार को बुला कर 100 गांवों में स्कूल बनाने को कह देता है। और उन 100 गांवों के सरपंचों को बुलाकर कह दिया जाता है कि आप सभी अपने अपने गांवों की ग्राम सभाओं के फर्ज़ी प्रस्ताव ले आइए कि आपके गांव की ग्राम सभा स्कूल बनवाना चाहती है। +कई बड़े-बड़े नेता भी कलक्टरों पर दबाव डाल कर बैकवर्ड रीजन ग्रांट फ़ंड से अपनी मनमर्ज़ी के कार्य करवा रहे हैं। जैसेए एक गांव में पता चला कि एक नेता की बहुत बड़ी खेती की ज़मीन है। उसने कलक्टर पर दबाव डाल कर अपनी ज़मीन के आसपास कई काम करवाए। अगर ग्राम सभाओं को ये निर्णय लेना होता तो वो कभी इस तरह का प्रस्ताव पारित नहीं करतीं। +सिरसा ज़िले के कुछ लड़कों ने 18 गांवों में प्रयास करके असली में ग्राम सभाएं कराईं और प्रस्ताव बना कर ऊपर भेजे। इस योजना में लिखा है कि ग्राम सभाएं प्रस्ताव बनाएंगी और कलक्टर को भेजेगी। कलक्टर उन योजनाओं को मंज़ूर करके फ़ंड आबंटन करेगा। इसके बावजूद सिरसा ज़िले के कलक्टर ने एक साल से ज़्यादा बीत जाने के बाद भी आज तक इन 18 गांवों की ग्राम सभाओं द्वारा पारित किए गए प्रस्तावों को मंज़ूर ही नहीं किया है। +निष्कर्ष. +देशभर से ऐसे ढेरों उदाहरण दिए जा सकते हैं कि आज की पंचायती राज व्यवस्था किसी भी तरह से प्रशासन और राजनीति में लोगों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित नहीं करती। लोगों को सीधे सत्ता देने के लिए राज्य सरकारए कलक्टर और सरपंच की ताकत छीन कर क़ानूनन निर्णय लेने की ताकत ग्राम सभाओं को देनी होगी। +अन्य देशों के उदाहरण. +हमने अन्य देशों की जनतांत्रिक व्यवस्था का भी अध्ययन किया - अमरीका में क्या होता हैए ब्राज़ील में क्या होता हैए स्विट्ज़रलैंड में क्या होता है? इनमें से कुछ सफल और बेहतर जनतांत्रिक ढांचे आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। +अमरीका - वॉलमार्ट हार गया. +अमरीका में स्थानीय स्तर परए शहर के स्तर परए म्यूनिसिपालिटी के स्तर परए काउंटी के स्तर पर कोई भी निर्णय बिना जनता की मर्ज़ी से नहीं होता। कई शहरों में हर सप्ताह मीटिंग होती है। जैसे ‘मिडिल टाउन’ एक शहर है। आप उसकी वेबसाईट पर चले जाइए तो पता चलता है कि वहां पर हर सोमवार शाम को पांच बजे जनता की मीटिंग होती है। जनता को टाउन हॉल में बुलाया जाता है। जनता आती है। और उस मीटिंग में सारे निर्णय जनता ही लेती है। उसी हिसाब से उस शहर की व्यवस्था चलती है। +जैसेए वॉलमार्ट अमरीका की एक कंपनी है। वो भारत आना चाहती है। बहुत लोगों को ये लगता है कि अगर वो भारत आयी तो भारत में बेरोज़गारी फ़ैलेगी। अब बेरोज़गारी फैलेगी कि नहीं फैलेगीए ये अलग मुद्दा है। पर जब वो हमारे देश में आना चाह रही है तो हमारे देश में ये निर्णय कौन लेता है कि उसको यहां आने देना चाहिए या नहीं? ये निर्णय हमारे देश के केवल दो लोग लेते हैं - हमारे देश के प्रधानमंत्री और वाणिज्य मंत्री। हमसे तो पूछा तक नहीं जाता। जबकि रोज़गार हमारा जाएगाए हम बेरोज़गार हो जायेंगेए हम ग़रीबी में जीएंगे। पर फिर भी हम से नहीं पूछते। +वही कंपनी अमरीका के राज्य ओरेगॉन के एक शहर में दुकान खोलना चाहती थी। तो उस शहर के सारे लोगों के घर में एक नोटिस गया कि हमारे शहर में वॉलमार्ट दुकान खोलना चाहती हैए हमें इसे खोलने देना चाहिए कि नहीं। आप इस दिन इतने बजे टाउन हॉल में आइए (इन सबको टाउन हॉल मीटिंग कहते हैं) और बताइये कि वॉलमार्ट को इजाज़त दें कि न दें। लोग टाउन हॉल में इकट्ठे हुए और कहा कि 'हम वॉलमार्ट नहीं चाहते क्योंकि अगर वॉलमार्ट आयी तो यहां की सारी किराने की दुकानें बंद हो जाएंगीज्। और वॉलमार्ट वहां पर दुकान नहीं खोल पायी। तो वह कंपनी अपने ही देश के एक शहर में दुकान नहीं खोल पायी लेकिन जब वो भारत आती है तो हमसे पूछा तक नहीं जाता। +ब्राज़ील - गलियों में तैयार होता बजट. +ब्राज़ील का उदाहरण लेते हैं। ब्राज़ील का एक शहर है पोर्तो एलेग्रे। उस शहर की 30-40 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है। 1990 में पोर्तो एलेग्रे में वर्कस पार्टी की सरकार आयी। उन दिनों झुग्गी बस्तियों में न सड़कें थींए न पीने का पानी थाए न सीवर कनेक्शन थेए और काफ़ी लोग अनपढ़ थे। उस पार्टी ने आकर निर्णय लिया कि अब पोर्तो एलेग्रे का बजट नगर निगम के हॉल में नहीं बनेगाए कांउसिल में नहीं बनेगा - ये गलीए मोहल्लों में बनेगा। उन्होंने पूरे पोर्तो एलेग्रे को छोटे छोटे मोहल्लों में बांट दिया। अब हर साल के शुरू में लोग अपने अपने मोहल्लों में मिलते हैं और हर आदमी अपनी मांग लेकर आता है। कोई कहता है हमारी सड़क खराब है सड़क बनवा दीजिएए कोई कहता है पीने का पानी नहीं है पाइप लाइन लगवा दीजिएए कोई कहता है टंकी लगवा दीजिएए कोई कहता है सीवर ठीक करवा दीजिएए कोई कहता है अध्यापकों की और नियुक्ति होनी चाहिए। हर आदमी अपनी अपनी मांग रखता है। पूरे शहर के लोगों की मांगों को इकट्ठा कर लिया जाता है और वो बजट बन जाता है। और बजट क्या होता है? बजट कोई बंद हॉल में या असेंबली में बैठ कर क्यों बने? बजट तो गली गली मोहल्ले मोहल्ले में बनना चाहिए। बजट बनाने का मतलब ही है कि सरकारी पैसा लोगों की ज़रूरत के हिसाब से कैसे इस्तेमाल किया जाये। +इस प्रयोग का नतीजा बड़ा अच्छा हुआ। उस पार्टी की सरकार 15 साल में चार चुनाव लगातार जीती है। कुछ साल पहले की विश्व बैंक रिर्पोट बताती है कि इस प्रयोग की वजह से काफ़ी विकास हुआ है। पहले वहां पीने को पानी नहीं थाए अब 98 प्रतिशत घरों में पीने को पानी पहुंच गया है। 87 प्रतिशत घरों में सीवर कनेक्शन पहुंच गया। शत प्रतिशत लोग शिक्षित हो गये हैं। और जहां पहले भ्रष्टाचार का बोलबाला थाए विश्व बैंक की रिर्पोट कहती है कि वहां अब भ्रष्टाचार काफ़ी कम हो गया है। +स्विट्ज़रलैंड - जनता के इशारे पर चलती संसद. +स्विट्ज़रलैंड का उदाहरण लें। स्विट्ज़रलैंड को दुनिया का सबसे बेहतरीन जनतंत्र माना गया है। क्योंकि वहां पर अगर पचास हज़ार लोग हस्ताक्षर कर कोई का़नून की मांग करें तो उसको वहां पर विद्येयक के रूप में संसद में प्रस्तुत करना पड़ता है। और अगर एक लाख लोग हस्ताक्षर कर दें तो उसको उन्हें संसद में संविधान के संशोधन के विद्येयक के रूप में प्रस्तुत करना पड़ता है। तो लोगों का सीधे सीधे संविधान के ऊपर और वहां की क़ानून बनाने की प्रक्रिया पर नियंत्रण है। +मैं ये सोच रहा था कि हमारे देश में अगर पचास हज़ार लोग एक कागज़ पर हस्ताक्षर करके हमारी संसद में भेजें तो मुझे नहीं लगता कि एक पावती भी आयेगी कि आपकी चिट्ठी मिल गयी। +तो हमने देखा कि कुछ अन्य देशों में किस तरह से जनता का व्यवस्था के ऊपर सीधा नियंत्रण है। लेकिन हमारे देश में हम लोग गिड़गिड़ाते रहते हैं और हमारा व्यवस्था के ऊपर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है। +जनता का तिलक करो. +आज हम पांच साल में एक बार वोट डालते हैं और अगले पांच साल तक हमारी ज़िंदगी का हर फैसला लेने का अधिकार कुछ लोगों के हाथ में सौंप देते हैं। उनके हाथ में इतनी सत्ता सौंप देते हैं कि या तो वो भ्रष्ट हो जाते हैं - हमें और हमारी ज़िंदगी को ही दांव पर लगा देते हैं - या सत्ता के मद में उनका दिमाग खराब हो जाता है। +इसी को बदलना होगा। अब हमें ऐसा करना होगा कि निर्णय सीधे जनता ले और उन निर्णयों पर अमल नेता और अधिकारी करें। यदि वो हमारे निर्णयों पर अमल न करें तो हम सीधे उन्हें हटा सकें। ये कैसे हो सकता है? जब हम ये बात करते हैं तो लोग कहते हैं कि जनता कैसे निर्णय ले सकती है। सौ करोड़ जनता कैसे निर्णय लेगी? ये नहीं हो सकता। +बिल्कुल हो सकता है। हमारे गांव में ग्राम सभाएं है। संविधान में लिखा है कि ग्राम सभाएं होंगी। ग्राम सभा का मतलब पंचायत नहीं होता। पंचायत होती है उस गांव के कुछ चुने हुए लोग-सरपंच या प्रधान या मुखिया और वार्ड सदस्य-उन सबको मिलाकर पंचायत बनती है। लेकिन ग्राम सभा का मतलब सारे गांव के लोगों की खुली बैठक। इसमें सारा गांव इकट्ठा होता है। सब लोग आते हैं। उस सारे गांव की मीटिंग को कहते हैं - ग्राम सभा। +सरकारी कर्मचारियों पर नियंत्रण हो. +गांव की सारी व्यवस्थाए गांव के बारे में सारे निर्णय लेने का अधिकार सीधे सीधे ग्राम सभा को मिलना चाहिए। पंचायती राज और अन्य क़ानूनों में संशोधन करके यह व्यवस्था की जाए कि अगर हमारे सरकारी स्कूल में अध्यापक ठीक से न पढ़ाएए अध्यापक समय पर न आये तो ग्राम सभा उस अध्यापक की तनख्वाह रोक सके। +अगर सरकारी डॉक्टर ठीक से इलाज न करेए तो ग्राम सभा अपनी मीटिंग में उस डॉक्टर की तनख्वाह रोक सके। अगर राशन वाला ठीक से राशन न देए राशन की चोरी करेए तो राशन वाले की दुकान ग्राम सभा कैंसिल कर सके। थानेदार अगर हमारी रिपोर्ट न लिखेए थानेदार अगर फर्ज़ी मुकदमे हमारे ऊपर लगायेए तो गांव की ग्राम सभा उस थानेदार की तनख्वाह रोक सके। +आपको क्या लगता है? ऐसा करने से सुधार होगा? हमें तो लगता है ये सारे के सारे सुधर जायेंगे। अध्यापक ठीक से पढ़ाने लगेगाए थानेदार ठीक से अपना काम करेगाए डॉक्टर ठीक से इलाज करने लगेगा और राशन वाला ठीक से राशन देने लगेगा। तो सरकारी कर्मचारियों के ऊपर ग्राम सभा के ज़रिये सीधे-सीधे जनता का नियंत्रण होना चाहिए। +हमारे गांव के अध्यापक की नियुक्ति भी ग्राम सभा करे। अभी हम देखते हैं कि राज्य सरकारें दस हज़ार अध्यापकों की भर्ती एक साथ करती हैं और उसमें पैसा खाती हैं। जो अध्यापक रिश्वत देकर भर्ती होगाए वो बच्चों को क्या पढ़ायेगा? +सूचना अधिकार से पता चला है कि झारखंड के दसवीं कक्षा तक के अनेकों स्कूलों में एक भी अध्यापक नहीं है। जैसे वमनी उच्च विद्यालय केनुगाए सरायकेलाए खरसावा में 310 बच्चें हैं पर एक भी अध्यापक नहीं है। सिरूम के विद्यालय में 435 बच्चों की दस कक्षाओं में केवल एक बंगला टीचर है। यह राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो अध्यापकों की नियुक्ति करे। लोगों ने राज्य सरकार को कई बार लिखा पर कोई जवाब नहीं आया। तो क्या हमारे बच्चे राज्य सरकार की दया दृष्टि का इंतज़ार करते रहें? क्या हमारे लाखों करोड़ों बच्चों की ज़िंदगी के साथ खिलवाड़ नहीं हो रहा? +ये सिस्टम बंद करना पड़ेगा। जिन लोगों के बच्चे वहां पढ़ते हैंए वही गांव वाले उस अध्यापक की नियुक्ति करेंए वही उसको निकालें। जो लोग सरकारी अस्पताल में इलाज कराने जाते हैंए वही सरकारी डॉक्टर की नियुक्ति करेंगेए और वही उसको निकालेंगे। सीधे सीधे व्यवस्था जनता के हाथ में देनी चाहिए। गांव के स्तर के सारे सरकारी कर्मचारियों को नियुक्त करने कीए आदेश करने कीए दंडित करने की और ज़रूरत पड़ने पर बर्ख़ास्त करने की ताकत सीधे ग्राम सभा के ज़रिए जनता के हाथ में होनी चाहिए। +इससे काफी फ़ायदा होगा। आज राज्य सरकारें गांव में पढ़ाने के लिए शहर के लोगों को भर्ती कर लेती हैं। उन्हें 15000 रुपये महीना देती हैं। फिर भी वो लोग गांव में पढ़ाने नहीं जाते। उनमें से कुछ लोग तो गांव वालों के साथ बैठना भी इज्जत के ख़िलाफ समझते हैं। +यदि सीधे गांव के लोग अध्यापक को नियुक्त करेंगे तो उस गांव के पढ़े लिखे लोगों को भी रोज़गार मिलेगा। वो तो 5000 रुपये महीने में ही पढ़ा लेंगे। और अगर ठीक से नहीं पढ़ायेंगे तो लोग उन्हें दंडित भी कर सकते हैं। +क़ानून बदलकर यह व्यवस्था की जाए कि ज़िला और ब्लॉक स्तर तक किसी भी अधिकारी को आदेश देने और उसको ग्राम सभाओं में तलब करने का अधिकार उस इलाके की ग्राम सभाओं के पास होना चाहिए। ज़िला या ब्लॉक स्तर के किसी भी अधिकारी को जनता निर्देश दे सके। कलक्टर तक को कह सके कि तुम्हें ऐसा करना है। और अगर वो न करे तो कलक्टर तक को तलब कर सकेए एसण् डीण् एमण् को तलब कर सकेए तहसीलदार को तलब कर सकेए बी डी ओ को तलब कर सकेए राशन अधिकारी को तलब कर सके। और अगर ग्राम सभा के आदेश पर कोई अधिकारी हाज़िर न हो तो ग्राम सभा के पास उनको दंडित करने की ताकत भी होनी चाहिए। +तो ब्लॉक व ज़िला सतर के अधिकारियों को सीधे आदेश देनेए तलब करने और अगर वो आदेश न मानें तो उन्हें दंडित करने का अधिकार ग्राम सभाओं को हो। ब्लॉक व ज़िला स्तर के कर्मचारियों की नियुक्ति व बर्खास्तगी में भी ब्लॉक पंचायत व ज़िला पंचायत के माध्यम से ग्राम सभाएं हस्तक्षेप कर सकेंगी। +राज्य स्तर तक के किसी भी अधिकारी से अपने गांव से संबंधित कोई भी सूचना मांगने का अधिकार ग्राम सभा के पास होना चाहिए। क्योंकि गांव के बारे में अजीब अजीब किस्म की योजनाएं बनती हैं। तो गांव के लोगों को ये अधिकार होने चाहिए कि उनके बारे में किस किस्म के निर्णय लिए जा रहे हैंए उनके बारे में क्या योजना बनाई जा रही हैए ये सारी सूचना मांगने का अधिकार गांव की ग्राम सभा को होना चाहिए। +सरकारी पैसों पर नियंत्रण हो. +केन्द्र या राज्य सरकारों से जितना पैसा आता है वो सारा का सारा पैसा मुक्त फ़ंड (बिना किसी योजना में बंधे) के रूप में आना चाहिए। हमें कोई सरकारी योजना नहीं चाहिएए हमें वृद्धावस्था पेंशन नहीं चाहिएए विधवा पेंशन नहीं चाहिएए नरेगा नहीं चाहिएए राशन नहीं चाहिएए इंदिरा आवास योजना नहीं चाहिएए हमें कोई योजना नहीं चाहिए। +अगर आज आप एक गांव में पांच करोड़ रुपये की योजनाएं भेज रहे हैं तो आप चाहे तीन करोड़ रुपये ही भेज दीजिए। लेकिन वो सारा पैसा मुक्त फ़ंड होए ‘अनटाइड’ फ़ंड हो। गांव के लोग ग्राम सभा में बैठें और वो तय करें कि उन्हें इसमें से कितना सिंचाई पर खर्च करना हैए कितना शिक्षा पर खर्च करना हैए कितना स्वास्थ्य पर खर्च करना है। गांव की जनता तय करेगी कि कितना पैसा कहां कहां खर्च करना है। +उसी तरह से गांव की जनता ही तय करेगी कि हमारे गांव में किसे बीण् पीण् एलण् माना जायेगा। उसका पैमाना क्या होगा? हांगकांग में जिस व्यक्ति के पास एंयरकंडीशनर नहीं होताए उसको बीपीएल माना जाता है। दिल्ली में एक रिक्शा वाला भी 5000 रुपये महीने से ज़्यादा कमाता है। लेकिन इतना कमाने के बावजूद भी दो जून की रोटी ठीक से नहीं खा पाता। झुग्गी में कीड़े मकोड़ों की तरह रहता है। पर 5000 रुपये महीना गांव के किसी परिवार के लिए बहुत होता है। +पूरे देश के लिए दिल्ली में बैठकर ग़रीबी का एक ही पैमाना बना देना बिल्कुल ग़लत है। दिल्ली के लोगों के लिए जो बीपीएल हैए कालाहांडी के लोगों के लिए बीपीएल का मापदंड बिल्कुल अलग हो सकता है। +गांव का समाज बैठेगा। गांव का समाज यह तय करेगा कि इस व्यक्ति के पास रहने को घर नहीं है तो इसको हम घर देंगें। समाज उसको ग्राम सभा के फ़ंड से घर देगा। लोगों को किसी इंदिरा आवास योजना का मुंह नहीं देखना पड़ेगा। आज इंदिरा आवास योजना के नाम पर साल में एक गांव में सरकार दो घर का पैसा भेजती है। रिश्वत खाकर वो ऐसे लोगों को मिल जाते हैं जिन्हें उसकी ज़रूरत नहीं होती। अब गांव के लोग तय करेंगे कि उनके गांव में वाकई कौन बेघर हैं। उन सभी को घर दिया जाए। किसी व्यक्ति के पास खाने को नहीं हैंए कोई साधन नहीं हैं कमाने काए उसको ग्राम सभा कुछ दिनों के लिए राशन दे सकती है ताकि वो भूखे न मरे। पूरी ग्राम सभा का ये फर्ज़़ होगा कि उस गांव में कोई भूखा न मरे। उस गांव में हर आदमी के सिर पर छत हो। उस गांव में हर बच्चा स्कूल जाये। उस गांव में हर व्यक्ति के तन पर कपड़े हाें। ये पूरा समाज सुनिश्चित करेगाए ये पूरी ग्राम सभा सुनिश्चित करेगी। उस पैसे को उसी तरह से खर्च किया जाएगा। +इसी तरह सेए मान लीजिएए कोई रोज़गार करना चाहता हैए कोई खेती करना चाहता है। उसे कर्ज़ा चाहिए तो आज साहूकारों के चंगुल में फंस कर बेचारे की दुर्गति बन जाती है। सौ-सौ प्रतिशत ब्याज देना पड़ता है उनको। अब वो ग्राम सभा से कर्ज़ा ले सकेगा। अगर ग्राम सभा को मुक्त फ़ंड मिलेंगे तो वो किसी को भी कर्ज़ा दे सकेगी। +देश के कई इलाकों में आज किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ग्राम सभाओं को मुक्त फ़ंड देने से उनकी आत्महत्याएं भी बंद होंगी। क्योंकि अगर कोई किसान आत्महत्या के कगार पर पहुंचता है तो ग्राम सभा बैठकर उसको कर्ज़ा दे देगी। +तीसरी चीजए जब फसल निकलती है तो कई बार किसानों के पास फसल रखने के लिए जगह नहीं होती है। फसल निकलने वाली होती है और बारिश आ जाती है और सारी फसल बर्बाद हो जाती है। अगर गांव के लोग फसलों के रखने के लिए गोदाम बनाना चाहें तो वो ग्राम सभा के मुक्त फ़ंड से बना सकेंगे। +मान लीजिए गांव के लोग फैक्टरी लगाना चाहें तो उस पैसे से मिल भी लगा सकेंगे। चेन्नई के पास एक गांव है कुटुम्बाकम। वहां के सरपंच हैं इलेंगो। उन्होंने ज़बरदस्त काम किया है। वो पहले कैमिकल इंजीनियर थे और अपनी नौकरी छोड़कर 15 साल पहले कुटुम्बाकम गांव के सरपंच बन गये। उनके गांव में एक हज़ार परिवार हैं। उन्होंने अनुमान लगाया है कि उनके गांव में एक महीने में लगभग 50 लाख रुपये के सामान की खपत होती है। लोग खाना खाते हैंए साबुन इस्तेमाल करते हैंए तेल इस्तेमाल करते हैंए किस्म किस्म की चीजें इस्तेमाल करते हैं। इलेंगो का ये कहना है कि इनमें से 80 प्रतिशत चीजें गांव में ही बन सकती हैं। साबुन गांव में बन सकता है। धान से जो चावल बनाया जाता हैए वो गांव में बन सकता है। तेल गांव में बन सकता है। ईंट गांव में बन सकती है। गांव के इस्तेमाल की 80 प्रतिशत चीजें गांव में ही बन सकती हैं। तो क्यों न ये चीजें गांव में ही बनाई जायं। मुक्त फ़ंड आयेगा तो लोग ग्राम सभा के फ़ंड से मिलए उद्योग आदि लगा सकेंगें। अगर ये सारी चीजें लोग अपने आप गांव में ही बनाने लग जायें तो बेरोज़गारी और ग़रीबी बहुत जल्द दूर हो जायेगी। +पुणे के पास एक ब्लॉक के कई गांवों में पिछले कई वर्षों से एक बहुत ही सफल प्रयास चल रहा है। इन गांवों में पहले हर वर्ष जून से सितंबर तक लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ता था। इस दौरान या तो लोग शहरों की तरफ भागते थे या साहूकार से 150 प्रतिशत की ब्याज दर पर कर्ज़ा लेते थे। साहूकार से यदि 100 किलो अनाज लेते थे तो चार महीने के बाद 150 किलो ब्याज़ चुकाना पड़ता था। इसके बावजूद जब भी बुलाया जाताए अपनी खेती छोड़कर साहूकार के घर और खेतों में मुफ़्त में काम करने जाना पड़ता था। इससे अपनी खेती पर भी काफ़ी बुरा असर पड़ता था। अपने खेत की सारी जलावन लकड़ी भी साहूकार को मुफ़्त में देनी पड़ती थी। +एक बार एक संस्था ने वहां अनाज का बैंक शुरू किया। वहीं के लोगों की एक समिति बनाकर उस समिति को पूरे गांव की ज़रूरत के बराबर अनाज कर्ज़ पर दे दिया। यह समिति उस कर्जे से गांव के ज़रूरतमंद परिवारों को कर्ज़ा देती है। चार महीने बाद किसी भी परिवार को 100 किलो के बदले 125 किलो अनाज वापिस करना पड़ता है। और साहूकार के बेगार से छुट्टी। चार साल में एक गांवए संस्था से लिया हुआ कर्ज़ा वापस कर देता है। और उसके बाद गांव में ही हर वर्ष समिति के पास अनाज का भंडार जमा होता जाता है। आस पास के लगभग 150 गांवों में इस तरह का प्रयास सफलतापूर्वक चल रहा है। अगर मुक्त फ़ंड आयेगा तो लोग अपने अपने गांव में इस तरह का अनाज बैंक भी शुरू कर पायेंगे। इससे भूख और साहूकारए दोनों के चंगुल से छुटकारा मिलेगा। +सारी सरकारी योजनाएं बंद करके गांव में सीधे मुक्त फ़ंड भेजना - इस एक विचार को क्रियान्वित करने से देश में क्रांति आ सकती है। बेरोजग़ारी दूर हो सकती है। गऱीबी दूर हो सकती है। +क्या ग्राम सभाओं को ताकत देने से भ्रष्टाचार बढ़ेगा? +कुछ लोगों का मानना है कि अगर सीधे-सीधे ग्राम सभाओं को मुक्त फ़ंड जायेगा तो उसका ग़लत इस्तेमाल हो सकता है। तो हमने पूछा कि कैसे ग़लत इस्तेमाल हो सकता है? तो कुछ लोगों ने कहा कि मान लीजिए ग्राम सभा को तीन करोड़ रुपया ऊपर से आया है और मान लीजिए ग्राम सभा में बैठ कर सभी लोग कहें कि 'हम तीन करोड़ रुपये का कुछ नहीं करेगेंए हम आपस में बांट कर खायेंगेज्। तो इसमें क्या बुरा है? ठीक हैए बांट कर खा लेने दो। अगर सारा गांव बैठकर ये निर्णय लेता है कि हम इस पैसे को आपस में बांटकर खायेंगे। तो खा लेने दो। अभी उस पैसे को कौन खाता है? अधिकारी खाते हैंए नेता खाते हैंए बीडीओ खाता हैए तहसीलदार खाता हैए कलक्टर खाता है। अगर गांव के सारे लोग मिलकर उस सारे पैसे को बांट लें तो क्या हर्ज़़ है? सीधे-सीधे जनता तक तो पहुंचेगा पैसा। +लेकिन गांव वाले ऐसा कतई नहीं करेगें। आपको क्या लगता है? एक बच्चे को उसके मां बाप ज़्यादा प्यार करते हैं या एक शिक्षा सचिव ज़्यादा प्यार करता है? निश्चित तौर पर उसके मां बाप ज़्यादा प्यार करते हैं। तो क्या आप सोचते हैं कि अगर उसके मां बाप ग्राम सभा में बैठेंगे तो वो ये कहेंगे कि 'मेरे बच्चे के लिए स्कूल न बनवाया जायज्ए क्या वो कहेंगे कि 'मेरे बच्चे के लिए स्वास्थ्य केंद्र न बनाया जायज्ए क्या वो कहेंगे कि 'ये सब चीजें नहीं होनी चाहिए और सब पैसा हम बांट कर खा जाऐंघ्ज् ऐसा कतई नहीं होने वाला। सब गांव वालों को अपनी ज़िंदगी के हर पहलू की चिंता है। वो शिक्षा पर भी पैसा खर्च करेंगेए स्वास्थ्य पर भी पैसा खर्च करेंगेए वो अपनी सड़कों पर भी पैसा खर्च करेंगें। तो ये सोचना कि इस पैसे को वो सारे बांट कर खा जाएंगे एकदम कोरी कल्पना है। +दूसरा दुरुपयोग ये हो सकता है कि सरपंच ग्राम सभा ही न बुलाएए गांव के लोगों के झूठे हस्ताक्षर कर ले और सारा का सारा मुक्त फ़ंड का पैसा खा जाय। ये बिल्कुल हो सकता है। लेकिन आज भी तो यही हो रहा है। भई गांव में पैसा मुक्त फ़ंड में आये या बिना मुक्त फ़ंड में आये। अगर भ्रष्ट सरपंच होगा तो वो तो पैसे खा ही लेगा। अगर योजनाओं में पैसा आता है तो भी वो पैसा खाता है। अगर बिना योजनाओं के पैसा आयेगा तो भी वो पैसा खाएगा। तो सरपंच को तो पैसा खाना ही है। कुछ लोगों का ये मानना है कि 'नहीं आज जब योजनाओं में ये पैसा आ रहा है तो कम से कम कुछ लोगों को तो पैसा मिल रहा हैज्। ये बात बिल्कुल ग़लत है। किसी गांव में कितना पैसा लोगों तक पहुंच रहा है ये इस बात पर निर्भर करता है कि वहां का सरपंच कितना भ्रष्ट हैए और वहां की जनता कितनी जागरुक है। जनता जहां-जहां आवाज़ उठाती है वहां जनता तक पैसा ज़्यादा पहुंचता है। जहां-जहां जनता आवाज़ उठायेगी वहां पर मुक्त फ़ंड भी ज़्यादा पहुंचेगा। जहां-जहां सरपंच कम भ्रष्ट होगाए वहां पर मुक्त फ़ंड ज़्यादा पहुंचेगा। आज जब योजनाओं में पैसा जाता है तो उस पैसे की चोरी रोकने में उस योजना से लाभान्वित होने वाले लोगों की ही रुचि होती है। बाकी जनता को उससे कोई मतलब नहीं होता। जैसे इंदिरा आवास की योजना मे एक गांव में मान लीजिए तीन मकान का पैसा आये तो उसमें कुछ ही लोगों की रुचि होती है। यदि सरपंच तीनों का पैसा चोरी कर ले या तीनों लोगों से रिश्वत ले ले तो गांव में और किसी को उससे कोई मतलब नहीं है। कोई आवाज़ नहीं उठाता। केवल वो तीन लोग उसकी वजह से पीड़ित होते हैं। लेकिन मुक्त फ़ंड जाएगा तो उस पूरे पैसे पर पूरे के पूरे गांव के लोगों की नज़र होगी। सारे गांव के लोग उसमें दखल देंगे। तो हमारा ये मानना है कि मुक्त फ़ंड से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ लड़ने में पूरे गांव की जनता एकजुट होगी और भ्रष्टाचार में ज़रूर कमी आयेगी। क्योंकि पूरा गांव उस पैसे के इस्तेमाल में दखल देगा। दूसरेए आज भ्रष्ट सरपंच या भ्रष्ट अधिकारी के ख़िलाफ जनता कुछ नहीं कर सकती। स्वराज की व्यवस्था में ग्राम सभा उन्हें सीधे दंडित कर सकेगी और ज़रूरत पड़ने पर निकाल भी सकेगी। +क़ानूनों और नीतियों पर जनता की राय ली जाए. +हमारे देश के संविधान के मुताबिक विधायक और सांसद ब्लॉक स्तर और ज़िला स्तर की पंचायतों के पदेन सदस्य होते हैं। लेकिन संविधान या क़ानून में यहाँ उनको कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी गयी है। हमारे हिसाब से उनकी ये ड्यूटी होनी चाहिए कि अगर हमारी संसद में या हमारी विधान सभा में कोई भी क़ानून प्रस्तुत किया जाता हैए तो वो उस क़ानून की एक प्रति लेकर ब्लॉक स्तर पर और ज़िला स्तर पर आयेंगे। और उस क्षेत्र की सारी ग्राम सभाओं में उस क़ानून की प्रतियां बांटी जाएंगी और वहां की ग्राम सभाओं से वो पूछेंगे कि 'आपको इस क़ानून के बारे में क्या कहना हैघ्ज् जनता उसके बारे में चर्चा करेगी। और जो विचार सभी ग्राम सभाएं मिलकर प्रस्तुत करेंगीए वही बात उस सांसद या विधायक को संसद या विधान सभा में रखनी पड़ेगी। उसे कहना पड़ेगा कि ये मेरे क्षेत्र के लोगों की राय हैए वही राय उसे वहां रखनी होगी। +हम आज अपने विधायक और सांसद को चुनकर भेजते हैं। हमने उसको वोट दिया है। वो हमारा प्रतिनिधि है। वो पहले जनता का प्रतिनिधि है बाद में कांग्रेस या भाजपा का या किसी अन्य पार्टी का प्रतिनिधि है। लेकिन क़ानूनों और सरकारी नीतियों पर अपना मत रखने के पहले वो हमसे पूछते ही नहीं हैं। अभी क्या होता है? सोनिया गांधी कहती है तो सारे कांग्रेस वाले उसी के हिसाब से वोटिंग करते हैं। आडवाणी या नितिन गडकरी कहते हैं तो उसी हिसाब से सारे भाजपा वाले वोटिंग करते हैं। मायावती कहती है तो उसकी पार्टी के सारे विधायक उसी के हिसाब से वोटिंग करते हैं। हमारे द्वारा चुने हुए लोगों पर पार्टियों की चलती हैए जनता की नहीं चलती। +‘हाई कमांड’ की इस दादागिरी को बंद करना होगा। जो जनता कहेगी वही हमारे विधायक को या सांसद को विधान सभा में या संसद मे रखना पड़ेगा। इससे संसद और विधान सभाओं में बनने वाले क़ानूनों पर सीधे जनता का नियंत्रण बनेगा। +फिर संसद को ‘न्यूक्लियर लायबिलिटी’ जैसे विद्येयक पास कराना मुश्किल हो जायेगा। फिर संसद को देशी विदेशी कंपनियों या विदेशी सरकारों के दबाव में आकर क़ानून बनाना मुश्किल हो जायेगा। फिर जो जनता चाहेगीए हमारी संसद और विधान सभाओं को वही क़ानून बनाने पड़ेंगे। +प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण हो. +जल, जंगल, ज़मीन, ख़निज और अन्य प्राकृतिक संसाधन - इनके ऊपर सीधे-सीधे नियंत्रण जनता का होना चाहिए। +जैसा पहले बताया गया कि आज अगर कोई कंपनी किसी गांव में फैक्ट्री लगाना चाहती है तो उस फैक्ट्री को लगाने के लिए उसको राज्य सरकार से इजाज़त लेनी पड़ती है। राज्य सरकार में कोई मंत्री या अफ़सर पैसा खाते हैं और वो गांव वालों की ज़मीन को पैसे वालों को बेच देते हैं। किसानों से पूछा भी नहीं जाता कि तुम खेती करना चाहते हो या ज़मीन देना चाहते हो। +क़ानून में बदलाव होने चाहिए कि अगर कोई कंपनी फैक्ट्री लगाना चाहेगी तो उसको अपना प्रस्ताव राज्य सरकार की बजाय ग्राम सभा में रखना पड़ेगा। उसको अब राज्य सरकार से अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए। वो उस गांव की ग्राम सभा से अनुमति लेगी। जो गांव प्रभावित हो रहे हैंए जहां जहां से उसे ज़मीन चाहिएए वहां की सारी पंचायतों में वो पंचायत सचिव के पास आवदेन करेगी। वो पंचायत सचिव ग्राम सभा की मीटिंग में उस प्रस्ताव को लोगों के सामने रखेगा। जनता निर्णय लेगी कि हम अपनी ज़मीन देना चाहते हैं कि नहीं देना चाहते और अगर देना चाहते हैं तो किन शर्तों पर देना चाहते हैं। वो शर्तें भी ग्राम सभा ही तय करेगी। अगर उस कंपनी को वह शर्तें मंज़ूर हैं तो वह ज़मीन ले सकती है। +इसी तरहए यदि राज्य सरकार या केंद्र सरकार किसी गांव की ज़मीन अधिग्रहण करना चाहती है तो उसे उसके लिए वहां की पंचायत में आवेदन करना पड़ेगा और सीधे ग्राम सभा से बात करनी होगी। +कई गांव ऐसे हैं जहां 10 प्रतिशत या 15 प्रतिशत लोगों के पास ही ज़मीन होती है। बाकी सारे के सारे लोग तो उस ज़मीन पर मज़दूरी करते हैं। ज़मीन बेचने की बात आती है तो पैसा केवल ज़मीन वाले को मिलता है। जो लोग ज़मीन पर मज़दूरी करते थे उनको कुछ भी नहीं मिलता। तो ग्राम सभा अधिग्रहण के बारे में कोई फैसला करने के पहले उन लोगों के हितों को भी ध्यान में रखेगी जिन लोगों के पास ज़मीन नहीं हैए जो मज़दूरी करते हैं। +तो सीधे-सीधे गांव की ज़मीन पर ग्राम सभाओं का नियंत्रण होना चाहिए। +छोटे मोटे ख़निजों के ऊपर सीधे ग्राम सभाओं की मिल्कियत हो। बड़े ख़निजों पर मिल्कियत किस की हो? हमारे देश के ख़निजों पर यकीनन पूरे देश का अधिकार होना चाहिए - इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। लेकिन इनका व्यापक जनहित में इस्तेमाल होए यह कैसे सुनिश्चित किया जाए - यह काफ़ी पेचीदा प्रश्न है। आज खदानों का परमिट देने का अधिकार राज्य और केंद्र सरकारों के पास है। इन्होंने इस अधिकार का ग़लत इस्तेमाल किया है और रिश्वत खाकर खदानों को औने पौने दामों में कंपनियों को बेच रहें हैं। +तो क्या खदानों के परमिट देने का अधिकार वहां की ग्राम सभाओं को दिया जाए? कुछ लोगों का कहना है कि खनन करने वाली ये कंपनियां इतनी शक्तिशाली हैं कि इनके लिए एक गांव के लोगों पर तरह-तरह के दबाव डालकर और भारी प्रलोभन देकर उनको खरीदना बड़ा आसान है। +इसका समाधान शायद बीच के रास्ते का होगा। हमारे देश के ख़निज कैसे इस्तेमाल किये जाएंए कितने निकाले जाएंए कितने निर्यात किये जाएं - ऐसी राष्ट्रीय नीति देश भर की सभी ग्राम सभाओं में चर्चा के बाद बने। उसी नीति के मुताबिक अपने गांवए ब्लॉक या ज़िले के ख़निजों का परमिट देने का निर्णय उससे प्रभावित होने वाली सभी गांवों की ग्राम सभाओं के द्वारा मिलकर लिया जाए। +जंगल के लघु उत्पादों पर सीधे ग्राम सभा की मिल्कियत हो। टिंबर और बांस का ठेका किसी भी ठेकेदार को वहां की ग्राम सभाओं की मंज़ूरी के बिना न दिया जाए। ग्राम सभाएं उसकी शर्तें भी तय करें। +गांव की सीमा में पड़ने वाले सभी जल स्त्रेतों पर वहां की ग्राम सभा की मिल्कियत हो। जल के बड़े स्त्रेत जैसे नदी आदि के बारे में निर्णय उससे प्रभावित सभी ग्राम सभाओं की मंज़ूरी के बिना न लिये जायें। +सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच कार्य विभाजन हो. +सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच कार्यों काए सरकारी संपत्ति का और सरकारी संस्थाओं का विभाजन करना होगा। अभी राज्य और केंद्र सरकारों के बीच तो ये विभाजन हो गया है पर राज्य सरकार और पंचायतों के विभिन्न स्तरों के बीच ये विभाजन नहीं हुआ है। +गांव के स्तर के जितने निर्णय हैं वो सारे के सारे निर्णय ग्राम सभाओं में लिए जायें। सबसे पहले गांव के लोग बैठकर निर्णय लें कि उनके गांव में सीधे कौन कौन से कार्य किये जा सकते हैं? कौन कौन सी सरकारी संपत्ति जैसे सड़केंए नालियां इत्यादि पूरी उनके गांव में ही पड़ती हैं? कौन कौन सी सरकारी संस्थाएं केवल उनके गांव के लोगों को सेवा देती हैं? जैसे कौन सा स्कूल केवल उसी गांव के बच्चों को पढ़ाता है? ऐसे सभी कार्यए सरकारी संपत्ति और संस्थाऐं क़ानून बनाकर उस गांव की ग्राम सभा को हस्तांतरित कर दिये जायें। इन सभी कार्यों को करनेए संपत्ति के रख रखाव और संस्थाओं को चलाने के लिए जो फ़ंड और कर्मचारी चाहिएए वो वहां की पंचायत को हस्तांतरित कर दिये जायें। +सबसे पहले हर गांव ऐसी लिस्ट बनाए। उसके बाद हर ब्लॉक ऐसे कार्योंए संपत्ति और संस्थाओं की लिस्ट बनाए जो दो या दो से अधिक गांवों से संबंधित हों। उसी तरह से जो कार्यए संपत्ति और संस्थाएं दो या दो से अधिक ब्लॉकों से संबंधित होंए उन्हें ज़िला स्तर की लिस्ट में डाला जाये और जो दो या दो से अधिक ज़िलों से संबंधित हों उन्हें राज्य स्तर की लिस्ट में डाला जाये। किसी भी कार्यए संपत्ति और संस्था के रखरखाव या उसे चलाने से संबंधित सारा पैसा और सभी कर्मचारियों पर पूर्ण नियंत्रण उस स्तर को हस्तांतरित किया जाये जिसके ज़िम्मे वो आई हैं। यदि दो गांवों के बीच किसी कार्यए संपत्ति या संस्था को लेकर विवाद होता हैए तो उसे ब्लॉक स्तर पर निपटाया जाये। ब्लॉक स्तर के विवादों को ज़िला स्तर पर और ज़िला स्तर के विवादों को राज्य स्तर पर निपटाया जाये। +स्वराज की व्यवस्था में निर्णय कैसे लिये जायेंगे? +एक ब्लॉक के सभी गांवों के प्रधानों को मिलाकर ब्लॉक पंचायत बनेगी। एक ज़िले के सभी ब्लॉकों के अध्यक्षों को मिलाकर ज़िला पंचायत बनेगी। +अगर ऐसा कोई निर्णय है जो तीन या चार गांवों को प्रभावित करता हैए जैसेए मान लीजिए एक सड़क बन रही है जो चार गांवों से होकर गुज़रती है। ऐसी स्थिति में निर्णय ब्लॉक स्तर पर लिए जाएंगे। लेकिन ब्लॉक स्तर पर जो भी निर्णय लिया जाएगाए तो जो उस निर्णय से प्रभावित गांव हैंए उनकी ग्राम सभाओं से पहले पूछा जायेगा कि उनको इस बारे में क्या कहना है। उन गांवों की अनुमति और उन ग्राम सभाओं की सहमति के बिना वो निर्णय ब्लॉक स्तर पर नहीं लिये जाएंगे। उसी तरह से मान लीजिए तीन या चार ब्लॉक के बारे में कोई निर्णय लेना है तो वो निर्णय ज़िला स्तर पर लिया जाएगा। अगर तीन या चार ज़िलों के बारे में कोई निर्णय लेना है तो वो निर्णय राज्य स्तर पर लिया जाएगा। ज़िला स्तर पर भी कोई निर्णय उस निर्णय से प्रभावित गांवों की सहमति या अनुमति के बिना नहीं लिया जाएगा। प्रभावित सभी ग्राम सभाओं से पहले अनुमति ली जाएगी। उनके विचार जाने जाएंगे। उसी के बाद कोई निर्णय लिया जाएगा। +राज्य स्तर पर कोई भी काम करने से पहले सरकारों को ग्राम सभाओं से अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं होगी। लेकिन किसी भी मुद्दे पर ग्राम सभाएं अपनी बात रखने के लिए सक्षम होंगी। अगर किसी मुद्दे पर उस राज्य की 5 प्रतिशत से ज़्यादा ग्राम सभाएं कोई प्रस्ताव पारित करती हैंए तो राज्य सरकार को वह प्रस्ताव सारी ग्राम सभाओं के पास भेजना पड़ेगा। और 50 प्रतिशत से ज़्यादा ग्राम सभाएं अगर उस प्रस्ताव को अनुमोदन कर देती हैं तो राज्य सरकार को वो प्रस्ताव पालन करना पड़ेगाए चाहे इसके लिए क़ानून ही क्यों न बदलने पड़ें। +भारतीय राजनीति पर इसका असर. +जिस दिन इस देश के सारे गांवों में ग्राम सभाएं होने लग गयीं तो इससे देश की संसद पर भी सीधे-सीधे ग्राम सभाओं का नियंत्रण होगा। तो एक तरह से इस देश की राजनीति के ऊपर सीधे-सीधे लोगों का नियंत्रण होगा। इस देश की राजनीति के ऊपर भ्रष्ट पार्टियों काए भ्रष्ट नेताओं काए अपराधियों का जो आज पूरी तरह से नियंत्रण बन गया हैए वो कमज़ोर होगा। और सीधे-सीधे इस देश की राजनीति के ऊपरए इस देश की सत्ता के ऊपर लोगों का नियंत्रण बनेगा। ताकि विकास हो सकेए ग़रीबी दूर हो सकेए बेरोज़गारी दूर हो सके। +इस तरह जब सीधे सत्ता जनता के हाथ में आयेगीए हमें लगता है तभी इस देश में जनतंत्र आएगा। अगर ऐसा होता है तो शिक्षा सुधरेगीए स्वास्थ्य सुधरेगाए सड़कें बनेंगीए पानी आयेगाए बिजली मिलेगीए बेरोज़गारी दूर होगीए ग़रीबी दूर होगी और तभी नक्सलवाद भी दूर होगा। +पंचायती राज और अन्य क़ानूनों में व्यापक फेरबदल की ज़रूरत. +इस पुस्तक के अंत में कई सुझाव दिये गये हैंए वो सभी सुझाव राज्य एवं केंद्र सरकारें अपने स्तर पर पंचायती राज क़ानून और अन्य क़ानून संशोधित करके लागू कर सकती हैं। इनके लिए संविधान के संशोधन की ज़रूरत नहीं है। +स्वराज के स्वदेशी टापू. +प्राचीन भारत में जनता शासकीय निर्णय लेती थी। आधुनिक समय में भी ऐसा ही कई देशों में हो रहा हैए ये बातें अधिकतर लोग जानते हैं। क्या वर्तमान समय में भारत में भी इसके कोई उदाहरण हैंए इस बारे में लोगों की जानकारी बहुत कम है। सबको लगता है कि यह सब अपने देश में संभव नहीं। लेकिन यह धारणा गलत है। देश के विभिन्न इलाकों में स्थानीय नेतृत्व के प्रयास से प्रत्यक्ष लोकतंत्र के कई सफल प्रयोग हुए हैं। इन प्रयोगों से स्थानीय शासन में कैसे गुणात्मक सुधार आयाए आइए उसकी कुछ बानगी देखते हैंरू +महाराष्ट्र का हिवरे बाज़ार गाँव. +हिवरे बाज़ार पुणे से 100 किमीण् दूरए अहमदनगर ज़िले में बसा एक गांव है। इस गांव में 1972 से 1989 तक ढेरों अकाल पड़े। उन अकालों ने वहां के लोगों की कमर तोड़ दी। लोग गांव छोड़ छोड़ कर पुणे और बम्बई भागने लगे। 90 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा के नीचे चले गये। गांव में इतना बुरा हाल था कि हर घर में शराब बनती थी। हर घर में शराब पी जाती थी। लोग अशिक्षित थेए ग़रीब थे। इतनी गुटबाजी थी कि कई हत्याएं हो चुकी थी। लगभग हर सप्ताह पुलिस आयी रहती थी। हर तरह की बुराई थी उस गांव में। +1989 में वहां के 20-30 लड़के इकट्ठे हुए। उन्होंने तय किया कि वह अपने गांव को बदलेंगे। गांव की ऐसी व्यवस्था नहीं चल सकती। उन्होंने अपने में से एक लड़के को चुना। उसका नाम था पोपट राव पवार। उस लड़के को कहा कि तुम हमारे गांव के सरपंच बन जाओ। वो लड़का बम्बई में एमण् कॉमण् की पढ़ाई कर रहा था। उसको बम्बई से वापस बुलाया। गांव में जितने गुट थेए लड़के उन सब गुटों के बड़े बुजुर्गों के पास गये। सबको हाथ जोड़कर कहा कि इस लड़के को एक साल के लिए सरपंच बना दीजिएए हम गांव की व्यवस्था बदल देंगे। वो सारे बड़े बुजुर्ग काफी हंसे इन लड़कों पर। फिर भी सब मान गये उसको एक साल के लिए सरपंच बनाने के लिए। +उस लड़के ने एक ही निर्णय लिया - 'मैं जो काम करूंगा उसके बारे में सारे गांव के साथ मिल कर निर्णय लूँगा। कोई भी निर्णय मैं खुद नही लूँगाज्। सरकारी क़ानून के मुताबिक साल में केवल दो ग्राम सभाएं होनी होती हैं - 15 अगस्त और 26 जनवरी को। वो महीने में चार-चार ग्राम सभाएं कराने लगा। कोई भी समस्या होती थी तो सारे गांव को इकट्ठा कर लेता था। और उनसे पूछता था कि बताइये क्या समस्या है और इसका कैसे समाधान करें? +इसके नतीजे चमत्कारिक हुए। 1989 में उस गांव में प्रति व्यक्ति औसत सालाना आय 840 रुपये थी। आज प्रति व्यक्ति सालाना आय 28000 रुपये है। 28000 रुपये का मतलब है कि अगर किसी परिवार में पांच लोग हों तो उस परिवार की सालाना आय लगभग डेढ़ लाख रुपये हो गई। बहुत होती है इतनी आय गांव के लोगों के लिए। +अब वहां पर बहुत खूबसूरत सड़कें बन गयी हैं। पहले लोग झुग्गियों में रहते थेए अब सबके पास बहुत खूबसूरत मकान हैं। इतना बढ़िया स्कूलए इतना बढ़िया अस्पतालए वहां राशन की बिल्कुल चोरी नहीं होती। राशन आता है तो सबके सामने उतारा जाता है। पहले घर-घर में शराब बनती थी। अब शराब बननी तो दूर की बातए लोगों ने पीनी भी बंद कर दी है। पिछले पांच साल से इस गांव में एक भी पुलिस केस दर्ज नहीं हआ है। +सबसे बड़ी बात ये हुई कि पोपट राव पवार को पहले एक साल के लिए लोगों ने सरपंच बनाया था। अपने काम की वजह से वो इतना लोकप्रिय हो गया कि आज वो बीस साल से सरपंच है। उसको कोई हरा नहीं पाया। उसके ख़िलाफ कोई खड़ा ही नहीं होता। निर्विरोध रूप से वो हर बार सरपंच चुना जाता है। +ये सब इस वजह से हुआ क्योंकि वहां के सरपंच ने एक तरह से अपने हाथ काटकर जनता के सामने रख दियेए कि मैं जो भी निर्णय लूँगा जनता की मर्ज़ी से लूँगा। +पोपट राव पवार ने एक और बात की। जैसा पहले बताया गया है कि सरकारी योजनाओं ने हमारे देश के लोगों को भिखारी बना दिया है। इस सरपंच ने सारी सरकारी योजनाओं को रखा एक तरफ। उसने सबसे पहली ग्राम सभा में सबसे पूछा कि हमारे गांव की समस्याएं क्या हैं और इनके समाधान क्या हैं। किसी ने कहा पीने को पानी नहीं है। किसी ने कहा सिंचाई के लिए पानी नहीं है। किसी ने कहा बिजली नहीं है। किसी ने कहा स्कूल नहीं है। यह निर्णय हुआ कि सबसे पहले स्कूल होना चाहिए बच्चों के लिए। तो पोपट राव ने किसी सरकारी विभाग को नहीं लिखा कि हमारे लिए स्कूल बनवाइए। उसने ग्राम सभा में सबसे पूछा कि क्या हमारे गांव में कुछ लोगों के घर खाली हैं? तो दो लोग खड़े हो गये। उन्होंने कहा हमारे दो दो कमरे खाली हैं। आप ले लीजिए। तो उन्होंने उन चार कमरों का स्कूल बना लिया। फिर अध्यापक कहां से आयें? तो उन्होंने सरकार को नहीं लिखा कि अध्यापक भेजिएए अतिरिक्त अध्यापकों की भर्ती कीजिए। उन्होंने ग्राम सभा में पूछा कि 'भई कोई लड़के खाली होंए पढ़ा सकें तो बड़ा अच्छा होगाज्। तो चार लड़के तैयार हो गये। उन्होंने पढ़ाना चालू कर दिया। एक साल में परिणाम अच्छे आये। +पोपट राव बताते हैं कि जब उन्होने ग्राम सभाएं शुरू की तो उस गांव में इतनी गुटबाजी थी कि लोग ग्राम सभा में आते ही नहीं थे। गुट थेए बहुत ज़्यादा लड़ाई झगड़े थे। लेकिन एक साल में धीरे धीरे लोगों ने देखा कि सरपंच तो हमारे भले का काम कर रहा है। हमारे बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल खोला है। तो लोगों ने ग्राम सभा में आना चालू किया। +फिर ग्राम सभा में चर्चा हुई कि गांव में इतने अकाल पड़े जिसकी वजह से गांव का पानी 80 फीट नीचे पहुंच गया। उन्होंने तय किया कि हम पानी संचयन करेंगेए पेड़ लगाएंगे। फिर सेए उन्होंने सरकार की तरफ नहीं देखा। खुद पेड़ लगाए। खुद जल संचयन किया और उसकी वजह से जो पानी 80 फीट पर था वो 15 फीट पर आ गया। पहले लोग एक भी फसल नहीं निकाल पाते थे। अब दो दो तीन तीन फसलें निकालने लगे। +एक और बड़े मज़े की बात है। 1980 में वन विभाग के लोगों ने भी यहाँ पेड़ लगाये थे। उन पेड़ों को यही गांव वाले काट काट कर ले गये थे। क्योंकि वो पेड़ उनके नहीं थे। उनको उन पेड़ों से कोई आत्मीयता नहीं थी। ये पेड़ तो सरकारी पेड़ थे। लेकिन अब जब इन लोगों ने खुद अपने पेड़ लगायेए तो इन्होंने किसी को काटने नहीं दिया। क्योंकि अब ये इनके अपने पेड़ थे। लोगों ने स्वयं मिलकर लगाये थे। इस तरह से इस गांव का विकास हुआ। +हिवरे बाज़ार की कहानी सुनने के बाद बहुत सारे लोग कहते हैं कि यहां विकास इसलिए हुआ क्योंकि यहां तो अच्छा सरपंच था। पोपट राव पवार था। बिल्कुल ठीक बात है। हिवरे बाज़ार में विकास इसीलिए हुआ क्योंकि वहां अच्छा सरपंच था। अगर पोपट राव पवार नहीं होता तो वहां विकास नहीं हो सकता था। +अच्छा सरपंच कौन होता है? हम कई ऐसे लोगों से मिले जो बहुत अच्छे सरपंच हैंए बड़े ईमानदार सरपंच है। बिल्कुल चोरी नहीं करते। राजस्थान में एक सरपंच से मिले जो बहुत अच्छा है। बहुत अमीर हैए बहुत पैसे वाला है। अपने खुद के पैसे खर्च करता है। चोरी बिल्कुल नहीं करता है। लेकिन वो जनता से नहीं पूछताए जनता की मांगे पूरी नहीं करता। वो अपनी मर्ज़ी से काम करता रहता है। उसने अपने गांव के बाहर अपने पैसे खर्च करके शौचालय बनवा दिये। लेकिन लोगों को शौचालय नहीं चाहिए। जब से शौचालय बने हैंए वो बंद पड़े हैं क्योंकि लोग उन्हें इस्तेमाल नहीं करते। +तो अच्छा सरपंच वो हुआ जो लोगों के साथ मिलकर ग्राम सभाओं में निर्णय ले। सारे निर्णय जनता ले और वो उन निर्णयों का केवल पालन करे। ऐसा सरपंच ही अच्छा सरपंच है। +पोपट राव पवार इसलिए एक अच्छे सरपंच हैं क्योंकि वो सभी निर्णय जनता के साथ मिलकर लेते हैं। आज पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम सभाओं को किसी किस्म के कोई अधिकार नहीं दिये गये है। तो जहां-जहां अच्छे सरपंच हैंए वो अपने हाथ काटकर जनता के सामने रख देते हैंए और कहते हैं कि हम कोई निर्णय नहीं लेंगे-केवल जनता के निर्णयों का पालन करेंगे। वहां-वहां तो विकास हो रहा है। लेकिन जहां-जहां सरपंच ग्राम सभाओं को निर्णय नहीं लेने देतेए वहां-वहां विकास नहीं होता। +हमारे गांव में जनता के साथ मिलकर ग्राम सभाओं में निर्णय होंगे या नहीं-आज की मौजूदा व्यवस्था में ये इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा सरपंच अच्छा है या नहीं। वो पोपट राव की तरह है या नहीं। +हम चाहते हैं कि ये राजनीति बदले। ये जो अच्छे सरपंच के ऊपर सारी राजनीति केंद्रित हो गई हैए ये बदले। +जिस दिन क़ानून बदलकर सत्ता सीधे जनता के हाथ में दी जायेगीए उस दिन हमें अच्छे सरपंच का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। उस दिन हमें ये इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी कि किस दिन हमारे गांव में एक पोपट राव पवार पैदा होगा। फिर चाहे अच्छा सरपंच हो चाहे बुराए सीधे-सीधे जनता अपने काम करवा लेगी। अपनी ग्राम सभाओं में उसको खुद ठीक कर लेगी। क्योंकि तब क़ानूनन जनता को निर्णय लेने का अधिकार होगा। +उत्तरी केरल के एक गांव का उदाहरण. +ग्राम सभाओं को यानि कि सीधे जनता को निर्णय लेने का अधिकार देने से क्या फ़ायदा होगा? इसे हम केरल के एक उदाहरण से समझने की कोशिश करें। केरल की पंचायती राज व्यवस्था में किसी भी गांव में कोई भी उद्योग तब तक नहीं लगाया जा सकता जब तक वहां के लोग ग्राम सभा में उस उद्योग को मंज़ूरी न दे दें। उत्तर केरल के एक गांव में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी लकड़ी का एक कारखाना लगाना चाहती थी। अगर वो लकड़ी का कारखाना लगाती तो उस गांव के आस-पास के बहुत सारे पेड़ों को काटा जाताए लेकिन वहां की जनता नहीं चाहती थी कि वहां के पेड़ों को काटा जाय। उस कारखाने को राज्य सरकार से मंज़ूरी मिल गयीए मंत्री से मंज़ूरी मिल गयीए कलक्टर से मंज़ूरी मिल गयीए यहां तक कि उस गांव के प्रधान को भी पार्टी के दबाव में आकर मंज़ूरी देनी पड़ी। लेकिन जब ये मामला ग्राम सभा में गया तो ग्राम सभा ने मंज़ूरी देने से मना कर दिया। क्योंकि ग्राम सभा को अपने पेड़ों की परवाह थी। वो नहीं चाहते थे कि उनके पेड़ों को काटा जाये। +तो इस उदाहरण से ये साफ ज़ाहिर है कि सरकार बिक सकती हैए मंत्री बिक सकता हैए कलक्टर बिक सकता हैए यहां तक कि प्रधान को भी खरीदा जा सकता है या उसके ऊपर दबाव डाला जा सकता है। लेकिन ग्राम सभा में सारे लोगों को खरीदना नामुमकिन है। ये उनकी ज़िंदगी का सवाल है और लोग जब निर्णय लेते हैं तो वो ये देखते हैं कि किस तरह से उनकी ज़िंदगी बेहतर बनेगी। +मध्य प्रदेश में नए क़ानून का करिश्मा. +2002 में मध्य प्रदेश पंचायती राज क़ानून संशोधित किया गया और उसमें ये व्यवस्था की गयी कि अगरए गांव के स्तर का कोई सरकारी कर्मचारी ठीक से काम नहीं करता है तो गांव के लोग ग्राम सभा में बैठकर उसकी तनख्वाह रोक सकते हैं। इस निर्णय के कई अच्छे परिणाम आए। कुछ उदाहरणः +हम छिंदवाड़ा ज़िले के अमरवाड़ा ब्लॉक के कुछ गांवों में गये। उन गांवों में पहले स्कूल में अध्यापक नहीं आया करते थे। वो आखिरी दिन आते थे और अपनी तनख्वाह लेकर चले जाते थे। जब ये क़ानून आया तो उस गांव के लोगों नेए पूरी ग्राम सभा में बैठकर उन अध्यापकों की तनख्वाह रोक ली। दो महीने तक तनख्वाह रोकीए और तीसरे महीने से उन सब अध्यापकों ने आना चालू कर दिया। कितना सीधा सा समाधान है। अगर आप सीधे-सीधे जनता को सत्ता देते हैं तो लोग अपना विकास खुद कर लेंगे। +इसी तरह से मध्य प्रदेश के एक और गांव में हम गये। वहां पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले नहीं आया करती थी। एक दिन वहां के सरपंच ने सारे गांव को शाम को इकट्ठा किया। उस आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को सारे गांव के सामने खड़ा कर दिया। सबके सामने उससे पूछा गया कि 'बताओ तुम पिछले छः महीने में कितनी बार आयी होघ्ज् अब आप ये सोच कर देखिए कि सारे गांव के सामने वो झूठ नहीं बोल सकती। उसने सारे गांव के सामने कबूल किया कि वह पिछले छः महीने में केवल दो दिन आयी थी। उससे पूछा गया कि 'अगर तुम केवल दो दिन आयी तो सरकार जो आंगनवाड़ी केन्द्र के लिए पैसा भेजती हैए उस पैसे का क्या हुआघ्ज् उसने सारे गांव के सामने कबूल किया कि वह उस पैसे को खा गयी। +आप सोचिये कि अगर क़ानून में ग्राम सभा को यह ताकत नहीं दी गई होती तो लोगों के पास क्या चारा था? वो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आ नहीं रही थीए उसने पैसे का गबन किया थाए तो लोग क्या कर सकते थे? लोगों के पास एक ही चारा था कि वो किसी निदेशक (आंगनवाड़ी) को शिकायत करते। या तो उनकी शिकायत को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दिया जाता या कोई बहुत अच्छा अधिकारी होता तो उस पर कोई जांच बिठा देता। जांच अधिकारी उस गांव में जाताए उस आंगनवाड़ी कार्यकर्ता से रिश्वत लेता और कागज़ों में लिख देता कि ये तो पिछले छः महीने से लगातार आ रही है। और इन शिकायतों का कोई सिर पैर नहीं है। शिकायतों को खारिज कर दिया जाय। और उन शिकायतों को खारिज कर दिया जाता। उसके बाद गांव के लोग धरना प्रदर्शन करते रहते और उसका कुछ नहीं निकलता। +लेकिन जब गांव वालों को सीधे-सीधे सत्ता दी गयीए निर्णय लेने का अधिकार दे दिया गया तो किसी जांच की ज़रूरत नहीं पड़ी। उस महिला ने सारे गांव के सामने दो मिनट में कबूल कर लिया कि वह छः महीने में केवल दो बार आयी थी और उसने पैसे का गबन किया। +अब देखियेए जैसे ही उसने जुर्म कबूल किया तो कुछ लड़के खड़े हुए और उन्होंने कहा कि इस महिला को निकालो। तो कुछ बड़े बुजुर्ग खड़े हुए। उन्होंने कहा कि इसको निकालना हमारा मकसद नहीं है। हमारा मकसद है कि ये सुधरे। हम इसे दस दिन का समय देते हैं। अगर ये दस दिन में सुधर जाती है तो ठीक हैए नहीं तो दस दिन के बाद दोबारा पूरी ग्राम सभा बुलाकरए गांव को इकट्ठा करके हम इसे निकाल देंगे। और वो महिला सुधर गयी। उसे निकालने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। +जब जनता निर्णय लेगी. +आइये देखते हैं कि अगर स्वराज आता हैए अगर क़ानून में सीधे जनता को ताकत दी जाती हैए तो किस तरह से अलग-अलग क्षेत्रें में सुधार होने की संभावनाएं पैदा होती हैं। वैसे तो हर क्षेत्र में सुधार की संभावनाएं बढ़ेंगी, नीचे हम केवल कुछ उदाहरण दे रहे हैं- +शिक्षा में सुधार. +आज सरकारी स्कूलों की हालत बहुत खराब है। ठीक से पढ़ाई नहीं होतीए बच्चों के बैठने के लिए डेस्क नहीं हैए पंखे नहीं हैए शौचालय नहीं हैए पीने का पानी नहीं है। और जब भी लोग सरकार को शिकायत करते हैं तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती। +अगर सरकार ऊपर से मुक्त फ़ंड भेजेगी तो ग्राम सभा में बैठकर लोग ये तय कर सकेंगे कि उन्हें अपने बच्चों के लिए स्कूल में क्या-क्या सुविधाएं देनी हैं। सीधे-सीधे उसके बारे में निर्णय ले सकेंगे। उन्हें कहीं ऊपर किसी अधिकारी सेए या किसी नेता सेए या राज्य सरकार से अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। +उसी तरह सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की कमी है। एक अध्यापक 200-300 बच्चों को पढ़ा रहा है। 3-4 कक्षाओं के बच्चों को एक साथ एक ही अध्यापक पढ़ाता है। ऐसे पढ़ाई नहीं हो सकती। पढ़ाई के नाम पर तमाशा हो रहा है। अगर सीधे-सीधे लोगों को ताकत दी जाएगी तो ग्राम सभाओं में बैठकर लोग आपस में निर्णय लेंगे कि हमारे यहां अध्यापकों की इतनी कमी है। इतने और अध्यापकों की ज़रूरत है। फिर उन्हें राज्य सरकारों को लिखने की ज़रूरत नहीं है कि इतने और पद बनाओए इतनी रिक्तियां करोए इस पर भर्ती करो। वो अपनी ग्राम सभा में बैठेंगेए कितने और अध्यापकों की ज़रूरत है ये तय करेंगेए और खुद ही भर्ती करेंगे। +इसी तरह से जो अध्यापक आज नियुक्त भी हैं वो भी ठीक से नहीं पढ़ाते। महीने के अंत में आते हैं और तनख्वाह ले जाते हैं। या अगर स्कूल आ भी जाते हैं तो पेड़ के नीचे बैठकर गप्पे मारते रहते हैंए बच्चों को नहीं पढ़ाते और बच्चे खेलते रहते हैं। अगर ग्राम सभा को ताकत दी जाएगी तो लोग इन अध्यापकों को तलब कर सकेंगे। ग्राम सभा में उनसे सवाल-जवाब कर सकेंगे। और ज़रूरत पड़ी तो उन्हें दंडित भी कर सकेंगे। सीधे-सीधे उन अध्यापकों को ठीक करने की ताकत ग्राम सभा को होगी। +स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार. +उसी तरह से स्वास्थ्य सेवाओं को लेते हैं। गांव के सरकारी अस्पताल में डॉक्टर ठीक से इलाज नहीं करतेए गाली गलौच करते हैंए बदतमीज़ी करते हैंए आते ही नहीं हैए दवाईयां चोरी हो जाती हैं। अगर ग्राम सभा के पास ताकत होगी तो वह इन डॉक्टरों को सीधे-सीधे तलब कर पायेगीए इनसे सवाल-जवाब कर सकेगी। और ज़रूरत पड़ने पर इन्हें दडिंत भी कर सकेगी। अगर अस्पताल में दवाओं की कमी है और ग्राम सभा को मुक्त फ़ंड मिलेगें तो उससे वो अस्पताल के लिए दवाएं भी खरीद सकती है। और अगर दवाओं की चोरी होती है तो सीधे-सीधे सरकारी अस्पताल के कर्मचारियों से सवाल-जवाब कर सकती हैंए उन्हें दंडित कर सकती हैं। इससे सीधे-सीधे भ्रष्टाचार कम होगा। क्योंकि आज भ्रष्ट अधिकारियों के ख़िलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती। अगर ग्राम सभा के पास ताकत होगी तो वो भ्रष्ट अधिकारियों को तलब कर सकेगी और उन्हें दंडित कर सकेगी। +नक्सलवाद से छुटकारा. +ग्राम सभाओं को ताकत देने से नक्सलवाद पर बहुत बड़ा असर पडेगा। इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। छत्तीसगढ़ में लोहांडीगुड़ा में टाटा एक स्टील प्लांट लगाना चाहता था। उसे 10 गांवों की ज़मीन की ज़रूरत थी। ये 10 गांव अनुसूचित क्षेत्र हैं। यहां पर पेसा क़ानून लागू होता है। पेसा क़ानून कहता है कि अगर सरकार वहां की ज़मीन अधिग्रहण करना चाहती है तो उसे वहां की ग्राम सभाओं से विचार विमर्श करना पड़ेगा। सरकार ने यहां की ग्राम सभाओं को लिखा। ग्राम सभाएं हुईं। लोगों ने ज़मीन देने से मना कर दिया। सरकार ने दोबारा इनसे निवेदन किया। दोबारा ग्राम सभाएं हुईं। और उसमें उन्होंने सरकार के सामने 15 शर्तें रखीं और कहा कि अगर आप हमारी ये 15 शर्तें मान लें तो हम ज़मीन देने के लिए तैयार हैं। वो शर्तें बहुत वाज़िब थीं। जैसे उनमें एक शर्त थी कि हमें इतना मुआवज़ा चाहिएए एक शर्त थी कि इतने पेड़ कटेंगे तो इतने पेड़ लगने चाहिए। हर घर से एक व्यक्ति को रोज़गार मिलना चाहिए इत्यादि। सारी वाज़िब मांगें थी। सरकार के पास ये मांगे गयी तो सरकार ने ये मांगें नहीं मानी और ज़ोर ज़बरदस्ती से पुलिस भेज कर ज़मीनें अधिग्रहण कर लीं। इसके बाद इन गांवों के लोगों ने वहां की दीवारों पर लिख दिया ‘नक्सली आओए हमें बचाओ’। सुनने में आया कि बाद में ये दसों गांव जाकर नक्सलियों के साथ मिल गये। +तो अगर सीधे-सीधे जनता को अपने और अपने गांव के बारे में अंतिम निर्णय लेने के अधिकार होंगे तो जनता नक्सलियों के पास न ही जाएगी और न उनका समर्थन करेगी। बिना जन आधार केए बिना जनता के सहयोग के नक्सलवाद नहीं रह पाएगा। +नशाबंदी में सफलता. +दिल्ली के कुछ वार्डों में पिछले एक साल से मोहल्ला सभाएं चल रहीं हैं। हर महीने मोहल्ले के लोगए वहां के अधिकारी और वहां के नेता इकट्ठे होते हैं और अपने इलाके के विकास के बारे में चर्चा करते हैं। सोनिया विहार की ऐसी ही एक मोहल्ला सभा में एक लड़़के ने खड़े होकर कहा - ज्हमारे इलाके में दारू की दुकान बहुत दूर हैए एक दारू की दुकान हमारी कॉलोनी में भी खुलनी चाहिएज्। इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हुई। मज़े की बात ये है कि मोहल्ला सभा में बैठे हुए कई लोग दारू पीते थे। लेकिन पब्लिक में सब धर्मात्मा बनते हैं। एक के बाद एक सबने कहा कि दारू बुरी चीज है और दारू की दुकान नहीं खुलनी चाहिए। और दारू की दुकान खुलने का प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। उस दिन लगा कि भरी सभा में ग़लत प्रस्ताव पारित होना काफ़ी मुश्किल होता है। आज किसी भी इलाके में दारू की दुकान खोलने के लिए वहां के नेता और किसी अफ़सर की मंज़ूरी लेनी होती है। जनता से तो पूछा ही नहीं जाता। नेता और अफ़सर या तो रिश्वत लेकर या दबाव में आकर मंज़ूरी दे देते हैं। यदि यह क़ानून बना दिया जाए कि किसी भी इलाके में दारू की दुकान वहां की मोहल्ला सभा या वहां की ग्राम सभा की मंज़ूरी के बिना नहीं खोली जाएगी। तो दारू की दुकान खोलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। नशाबंदी की दिशा में यह एक ठोस कदम होगा। +ग़रीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी का निदान. +अगर सीधे लोगों को ताकत दी जाती है तो इसका सबसे बड़ा असर बेरोज़गारी और ग़रीबी पर पड़ेगा। जैसा कि पहले भी हम इस पुस्तक में लिख चुके हैं कि अगर गांव में मुक्त फ़ंड आएगा तो लोग ग्राम सभा में बैठकर ये तय करेगें कि अपने गांव में सबसे ग़रीब कौन हैं? उनकी हमें मदद करनी है। इन्हें राशन देना है। ये भूखे हैं। किसी को भूखे नहीं रहने देना है। हर व्यक्ति के सर पर छत होनी चाहिए। हर बच्चा स्कूल जाये। +अगर कोई व्यवसाय करना चाहता है तो ग्राम सभा मुक्त फ़ंड से उसे क़र्जा दे सकेगी। वह अपना व्यवसाय चालू कर सकेगा। आज वो साहूकार के चंगुल में फंस कर 150 प्रतिशत ब्याज की दर से कर्ज़ा लेता है। और पूरी ज़िदगी उसके चंगुल में फंस जाता है। +उसी तरह से इस देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्योंकि वो साहूकार से कर्ज़ा लेते हैं और उसका कर्ज़ा चुका नहीं पाते। ग्राम सभा ऐसे किसानों को कर्ज़ा दे सकेगी। +अगर ग्राम सभा को मुक्त फ़ंड मिलेगा तो लोग अपने गांव में गांव की ज़रूरतों के लिए साबुन की फैक्ट्री लगा सकते हैंए तेल की मिल लगा सकते हैंए चावल मिल लगा सकते हैंए आटा चक्की लगा सकते हैंए किस्म-किस्म के उद्योग लगा सकते हैं। इन उद्योगों में लोगों को रोज़गार मिलेगा। उनकी ग़रीबी दूर होगी। +तो ग्राम सभा में सीधे मुक्त फ़ंड भेजना एक ऐसा राम बाण है जिससे लोगों की आमदनी बढ़ेगी और ग़रीबी और बेरोज़गारी से काफ़ी हद तक छुटकारा मिलेगा। +निर्मूल आशंकाएं और भ्रांतियाँ. +जब सीधे जनता को सत्ता देने की बात की जाती है तो लोग तरह तरह की शंकाऐं जताते हैं। इन्हीं कुछ शंकाओं का जवाब हमने यहां देने की कोशिश की है। +दलितों पर अत्याचार. +कुछ लोगों को शंका है कि अगर ग्राम सभाओं को ताकत दी गयी तो दलितों के ऊपर अत्याचार बढ़ेगा। इसका जवाब ढूंढने के लिए हम बिहार के कुछ दलितों की बस्तियों में गए। उन्हें स्वराज के बारे में समझाया और सीधे उनसे पूछा कि उन्हें क्या लगता है? ग्राम सभाओं को ताकतवर बनाने से क्या उन पर अत्याचार बढ़ेगा? दलितों का ये मानना है कि ऐसी व्यवस्था आने से उनके संघर्ष करने के मौके बढ़ेंगे। आज अगर किसी दलित के ऊपर किसी गांव में अत्याचार होता है तो वो कहां जा सकता है? आज की व्यवस्था में कौन उसके साथ है? कोई नहीं। ये पूरी की पूरी व्यवस्था शोषण करने वाले लोगों के साथ है। उस गांव का पुलिस वाला शोषकों के साथ है। उस ज़िले का कलक्टरए बी डी ओए तहसीलदारए ये सब के सब लोग शोषकों के एजेंट के रूप में काम करते हैं। ये सब के सब लोग शोषण करने वालों के साथ हैं। तो वो शोषित दलित कहां जाय? और अगर उस गांव के सारे दलित इकट्ठे भी हो जायंए तो उनके पास केवल कलक्टर के सामने धरना प्रदर्शन करने के सिवाय कोई चारा नहीं है। दलितों ने हमें ये कहा कि अगर सीधे ग्राम सभाओं को अधिकार दिये जाते हैं और अगर दलित इकट्ठे हो जाते हैं तो ग्राम सभा की मीटिंग में वो इकट्ठे होकर अपनी आवाज़ को रखने की कोशिश कर सकते हैं। इसके लिए संघर्ष कर सकते हैं। दूसरी बात अग्रिम जाति में भी कुछ ऐसे लोग हो सकते हैंए जो दलितों का साथ देना चाहते हैं। वो गांव में शोषण होते देखते हैं और दलितों का साथ देना चाहते हैं। लेकिन आज वो कुछ नहीं कर पातेए क्योंकि उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है। और आज की व्यवस्था में उनकी कोई भूमिका नहीं है। अगर ग्राम सभा होगी तो ऐसे लोग भी अपनी आवाज़ उठायेंगे। वो दलितों के हक में बोलेंगे। दलितों के साथ बातचीत में दलितों ने हमें ऐसा कहा। +इसके अलावा स्वराज की व्यवस्था में दलितों के संघर्ष के लिए एक और मार्ग खुलेगा। नई व्यवस्था में एक लोकपाल बनाया जाएगा। अगर किसी गांव के लोगों को ग्राम सभा में आने से रोका जाता है या उनकी बातों को नहीं लिखा जाता है तो वो लोकपाल को शिकायत कर सकते हैं। और लोकपाल की ज़िम्मेदारी होगी कि वो एक और दिन ग्राम सभा बुलाकर अपनी निगरानी में ग्राम सभा कराये और अपनी निगरानी में ये देखे कि वहां सब लोगों को आने दिया जाता है। +तो ऐसी नई व्यवस्था में दलितों को लड़ने के लिए तीन और नये मौके मिलेंगे। दलितों की व्यवस्था में तुरंत सुधार होगाण्ऐसा नहीं है। हमारा प्रश्न है कि आज जब सारी की सारी राजनैतिक सत्ता सरपंच के अंदर केंद्रित हैए ऐसी व्यवस्था में राजनैतिक सत्ता के दुरुपयोग के ज़्यादा अवसर हैं या तब जब कि ये सारी सत्ता सरपंच से छीनकर ग्राम सभा को दे दी जायए उसमें ज़्यादा शोषण के आसार हैं? हमें लगता है कि ग्राम सभा में शोषण होने के अवसर कम होंगे। जब सारी सत्ता सरपंच के अंदर निहित हैए तब शोषण के ज़्यादा अवसर हैं। +कम से कम यह कहना तो सरासर ग़लत होगा कि ग्राम सभाओं को सत्ता देने से दलितों पर अत्याचार बढ़ेगा। उनकी स्थिति में सुधार हो या न होए अत्याचार बढ़ने के आसार नज़र नहीं आते। फिर आज की व्यवस्था में जो समाधान दलितों के पास हैंए वो तो रहेंगे ही। उन्हें खत्म नहीं किया जाएगा। +खाप पंचायतों का डर. +कुछ लोग खाप पंचायत का उदाहरण देते हैं कि ये खाप पंचायतें लड़के लड़कियों को मरवा देती हैं। क्या खाप पंचायतों की तरह ग्राम सभाएं भी ग़लत निर्णय नहीं लेंगी? +खाप पंचायतों ने वाकई ऐसे आदेश दिये या नहीं - इस पर एक विवाद है। उस विवाद में पड़े बिना हम केवल यह कहना चाहेंगे कि क़ानूनन ग्राम सभाओं को न तो ये अधिकार है और न ही उन्हें यह अधिकार दिया जाएगा कि वो किसी को मारने का आदेश दे सकें। वो निर्णय मान्य नहीं होगा। वो निर्णय गैरक़ानूनी होगा। क्योंकि जिस व्यवस्था की हम बात कर रहे हैंए उस व्यवस्था में ग्राम सभाऐं क़ानून के दायरे में ही निर्णय ले पायेंगीए संविधान के दायरे में ही निर्णय ले पायेंगी। संविधान और क़ानून के दायरे से बाहर जाकर निर्णय लेने का अधिकार इनको नहीं होगा। तो किसी को मरवानाए किसी को कटवानाए किसी को फांसी देनाण् ये क़ानून के ख़िलाफ हैं। ये किसी को अधिकार नहीं है कि वो किसी को मरवा दे। इस तरह तो मान लीजिए कल को कोई ग्राम सभा खड़ी होकर कह दे कि ‘‘भई हम तो भारत का हिस्सा नहीं हैए हम तो भारत से अलग होना चाहते हैं’’। ऐसा निर्णय लेने का इनको अधिकार नहीं होगा। उनको संविधान के दायरे में काम करना पड़ेगा। उनको जितनी ताकतें दी गयी हैं केवल उतनी ताकतों का वो इस्तेमाल कर सकते हैं। +ग्राम सभाओं को ताकत देने से सामाजिक कुरीतियां बढेंगी या घटेंगी? +ग्राम सभाओं को ताकत देने से सामाजिक कुरीतियों पर क्या असर पड़ेगा? जैसे दहेज प्रथाए बाल विवाहए किसी को डायन घोषित कर उस पर अत्याचार करनाए भूत-प्रेत पिशाच पर अंधविश्वास इत्यादि। यदि ग्राम सभाओं को अधिकार दिये जाते हैं तो क्या ये कुरीतियां बढेंगी? +सभी सामाजिक कुरीतियां सदियों से चली आ रही ग़लत मान्यताओं का नतीजा है। ये मान्यताऐं लोगों के दिलो दिमाग़़़ पर बुरी तरह से हावी हैं। इनमें से कई बुराइयों को क़ानूनन अपराध घोषित कर दिया गया है और इनके ख़िलाफ सज़ा का प्रावधान भी है। अतः यदि कोई ग्राम सभा किसी कुरीति का समर्थन करती है तो वह गैरक़ानूनी होगा। +अतः ग्राम सभाओं से कुरीतियां बढ़ेंगी - ऐसा होने के आसार कम नज़र आते हैं लेकिन उनके कम होने के आसार भी नज़र नहीं आते। हमें यह समझना पड़ेगा कि यदि हम वाकई इन सामाजिक कुरीतियों को दूर करना चाहते हैं तो इसके लिए व्यापक रूप से लोगों के बीच सामाजिक आंदोलन छेड़ने होंगेए लोगों के साथ संवाद करना होगा। उनके दिल और दिमाग पर छाई सदियों की मान्यताओं को दूर करना होगा। +ग्राम सभाओं में तो लोग लड़ेंगे? +कई लोगों का ये मानना है कि गांव के लोग निर्णय नहीं ले सकतेए गांव के लोग अनपढ़ होते हैं। अगर ग्राम सभा होगी तो ग्राम सभा में लोग लड़ेंगे। कुछ लोग तर्क देते हैं कि जब सरपंच चुना जाता है तो सरपंच को मान लीजिए 60 प्रतिशत वोट मिले। तो 40 प्रतिशत लोग तो उसके ख़िलाफ हुए। इन लोगों का कहना है कि ऐसे विरोधी लोग ग्राम सभाएं नहीं होने देंगे। दुनिया भर के अभी तक के अनुभव यही बताते हैं कि यह डर बेबुनियाद है। +इस पुस्तक में हिवरे बाज़ार का उदाहरण है। वहां पहले खूब गुटबाजी थी। लोग लड़ते थे। यहां तक कि गांव में रंजिश के चलते खून भी हो चुके थे। हर सप्ताह पुलिस आई रहती थी। वहां भी जब ग्राम सभाएं शुरू हुईं तो पहले कम लोग आते थे। धीरे धीरे लोगों ने आना चालू किया। गांव के झगड़ों की भी ग्राम सभा में चर्चा होने लगी। सबके मिल बैठकर बात करने का मंच बना और आज हिवरे बाज़ार सर्व संपन्न है। +दिल्ली में साल भर से मोहल्ला सभाएं चल रही हैं। इन मोहल्ला सभाओं में हर किस्म के लोग आ रहे हैं। भाजपा का पार्षद होता है तो कांग्रेस वाले भी आते हैं। कांग्रेस का पार्षद होता है तो भाजपा वाले भी आते हैं। वहां पर चर्चाएं होती हैं। थोड़ा बहुत लड़ाई झगड़ा ज़रूर होता हैए वाद-विवाद भी ज़रूर होता है। तर्क-बहस ज़रूर होती है। लेकिन अंत में निर्णय भी होते हैं। +चलिए और कुछ हो या न हो कम से कम इतना तो ज़रूर होगा कि जिन-जिन गांवों में लोग आपस में बैठकर निर्णय लेंगेए वहां-वहां सुधार होगा। जिन-जिन गांवों के लोग आपस में लड़ेंगे वहां सुधार नहीं होगा। तो उसके बाद लोग यह नहीं कह सकते कि फ़लाँ अधिकारी चोर हैए या फ़लाँ पार्टी चोर है या फ़लाँ नेता चोर है। उन्हें ये कहना पड़ेगा कि 'हम ही निकम्मे हैं। हम ही लड़ते रहते हैं। और जब तक हम नहीं सुधरेंगे तब तक सुधार नहीं हो सकताज्। अब वो किसी और को दोष नहीं दे पायेंगे। अपनी तकदीरए अपनी ज़िंदगीए अपनी ग़रीबीए अपनी बेरोज़गारी के लिए उनको खुद अपने को दोष देना पड़ेगा। +आज की व्यवस्था में दिल्ली में बैठकर या लखनऊ या भोपाल में बैठकर कोई अधिकारी या कोई नेताए हमारी ज़िदंगी के बारे में निर्णय लेता है। अब आप ही बताइये कि कौन सी बात ज़्यादा ठीक है - हमारी ज़िदंगी के बारे में हमारे गांव के लोग निर्णय लें या दूर बैठकर कोई अधिकारी या नेता निर्णय ले? यकीनन हमारा सारा गांव बैठकर खुद निर्णय ले - ये ज़्यादा अच्छी बात है। हमारा सारा गांव बैठेगा तो ठीक है हम लड़ेंगेए झगड़ेंगेए मरेंगेए कटेंगे सब होगा लेकिन अंत में हमारे गांव में हम ही लोग निर्णय लेंगे। हम प्यासे हैंए हमें पानी चाहिए और वो दूर बैठा अधिकारी कहता है कि नहीं-नहीं पार्क बनवाएंगेए कम्प्यूटर भेजेंगे। उसे हमारी ज़रूरतों का क्या पता? तो चाहे हमारे गांव में लड़ाई होंए झगड़े होंए लेकिन हमारे गांव के निर्णय हमारे गांव में ही लिये जायं। हमारे मोहल्ले के निर्णय हमारे मोहल्ले में ही लिये जायं। उसी में हम सब लोगों का फ़ायदा है। +‘पेसा’ क़ानून का क्या हुआ? +कई लोगों का कहना है कि पेसा क़ानून में ग्राम सभाओं को सभी ताकतें दी तो हैं। क्या आदिवासी क्षेत्रए जहां पेसा लागू होता हैए वहां ग्राम सभायें अच्छा काम कर रही हैं? क्या उन इलाकों में कोई सुधार हुआ। नहीं। बिल्कुल नहीं। पेसा इलाकों में भी ग्राम सभायें बिल्कुल निष्क्रिय और अक्षम हैं। वह इसलिए क्योंकि पेसा क़ानून ग्राम सभाओं को आधी अधूरी ताकत देता है। दूसरी बातए जितना पेसा क़ानून में लिखा हैए उसे भी राज्य सरकारों ने आधे अधूरे तरीके से क्रियान्वित किया है। +जैसेए पेसा कहता है कि गांव के विकास की योजना ग्राम सभा में बनेगी। मतलब गांव में सरकारी पैसा कहां खर्च होगाए यह ग्राम सभा तय करेगी। आंकड़ों के मुताबिक गांव में पहुंचने वाला सारा सरकारी पैसा दिल्ली में बनी योजनाओं के तहत पहुंचता है। मुक्त फ़ंड बिल्कुल नहीं दिया जाता। सारे पैसे के बारे में दिल्ली या राज्य की राजधानियों में तय हो जाता है कि कितना पैसा किस गांव में कहां खर्च होगा। तो गांव वाले अपने गांव की क्या योजना बनाएं? है न मज़े़ की बात। गांव वालों को पैसा खर्च करने का अधिकार दे दिया पर पैसा नहीं दिया। दूसरेए पेसा में गांव के सरकारी कर्मचारियों पर ग्राम सभा के नियंत्रण की कोई बात नहीं है। पेसा के तहत ग्राम सभा का गांव के अध्यापकए वन अधिकारीए पुलिस कर्मचारीए तहसीलदारए स्वास्थ्य कर्मचारी इत्यादि पर किसी तरह का कोई भी नियंत्रण नहीं है। ग्राम सभा कोई भी निर्णय ले ले। उन निर्णयों का पालन तो इन अधिकारियों को ही करना होता है। अगर ये उन निर्णयों का पालन न करें तो ग्राम सभाऐं उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। ये सभी कर्मचारी सीधे राज्य सरकारों के मातहत हैं। ये ग्राम सभाओं की बजाय राज्य सरकारों की मज़दूरी करते हैं। अक्सर देखा गया है कि ग्राम सभाओं के निर्णयों का पालन करने की बजाय ये अधिकारी गांव के लोगों पर अत्याचार करते हैं। +फिर पेसा में लिखा है कि ज़मीन अधिग्रहण के पहले राज्य सरकार ग्राम सभा से ‘विचार विमर्श’ करेगी। अधिकतर जगहों पर देखा गया कि ‘विचार विमर्श’ केवल औपचारिकता है। यह औपचारिकता पूरी करने के बाद पुलिस भेजकर ज़बरदस्ती ज़मीन छीन ली जाती है। +अतः हालांकि पेसा क़ानून पंचायती राज क़ानूनों के मुकाबले अधिक प्रगतिशील हैए पर जब तक सीधे सीधे सरकारी फ़ंडए सरकारी कर्मचारी और प्राकृतिक संसाधनों के बारे में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभाओं को नहीं मिलेगाए तब तक स्वराज का सपना अधूरा रहेगा। +अच्छे लोगों के सत्ता में आने से सुधार होगा? +कई लोगों का ये मानना है कि अगर हम अच्छे लोगों को विधायक या सांसद चुनेंगेए अच्छे लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनेंगे तो इससे हमारे इलाके की समस्याओं में फर्क पड़ेगाए इससे हमारे इलाके की समस्याओं का निवारण होगा। यह सोचना बिल्कुल ग़लत है। +ये समझना बहुत ज़रूरी है कि एक विधायक या सांसद की हमारी पूरी व्यवस्था में क्या भूमिका है? संविधान के हिसाब से एक विधायक मैंम्बर ऑफ लेजिसलेटिव असेंबली होता है। यानि कि वो विधान सभा का सदस्य होता है। एक सांसद मैंम्बर ऑफ पार्लियामेंट होता हैए यानि कि वो संसद का सदस्य होता है। +अगर हमारे इलाके में पानी नहीं आ रहाए बिजली नहीं आ रहीए सड़क टूट गयी हैए सफाई नहीं होती हैए ग़रीबी हैए बेरोज़गारी हैए तो हम हर समस्या के लिए दौड़े-दौड़े विधायक और सांसद के पास जाते हैं। हमें ये समझना पड़ेगा कि विधायक और सांसद के पास इन सभी समस्याओं के निवारण के लिए किसी प्रकार की कोई शक्ति नहीं है। संविधान के हिसाब से ये उनका काम नहीं है। संविधान के हिसाब से एक विधायक का काम विधान सभा में अच्छे क़ानून बनवाना है। सांसद का काम संसद में अच्छे क़ानून बनवाना है। अगर हमारे इलाके की सरकारी व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है तो उसके बारे में विधायक और सांसद कुछ नहीं कर सकते। संविधान में या क़ानून में इन समस्याओं का समाधान करवाने के लिए उन्हें कोई शक्ति नहीं दी गयी है। मान लीजिएए कि हमारे इलाके में सड़क टूट गयी है या हमारे इलाके में राशन वाला ठीक से राशन नहीं दे रहा। तो विधायक और सांसद उस इंजीनियर के ख़िलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। उस राशन वाले के ख़िलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। वो संसद या विधान सभा में प्रश्न ज़रूर उठा सकते हैं। अब हर सांसद या विधायक प्रश्न करना चाहता है। तो संसद और विधान सभाओं में इतने प्रश्नों के लिए निवदेन आ जाते हैंए कि कौन कौन से प्रश्न उठाये जायेंगे - इसका चयन लाटरी द्वारा होता है। चाह कर भी आपका विधायक या सांसद आपकी समस्याओं के प्रश्न संसद या विधान सभा में नहीं उठा सकता। +एक सांसद या विधायक को दो करोड़ रुपऐ का फ़ंड भी मिलता है। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि इस फ़ंड से वे अपने विधान सभा क्षेत्र या संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य करें। लेकिन इस फ़ंड से क्या क्या काम होने चाहिए - वो केवल उन कामों की मंज़ूरी दे सकते हैं। वो काम अच्छा हुआ या बुरा हुआ - इस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। यह अधिकार विभिन्न सरकारी विभागों के अफ़सरों के पास होता है। सांसद या विधायक का इन सरकारी विभागों और उनके अफ़सरों के ऊपर किसी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं होता है। ऐसा सुनने में ज़रूर आता है कि कुछ सांसद धविधायक उस फ़ंड से काम सैंक्शन करने की रिश्वत लेते हैं। यह तो ग़लत है ही। पर यदि उस फ़ंड से किया गया कोई काम खराब हुआ हो तो उसका भुगतान रोकने का या उसे ठीक कराने तक का अधिकार उन्हें नहीं है। +सांसद और विधायक का काम है कि वो संसद और विधान सभा में अच्छे क़ानून बनायें। लेकिन दुर्भाग्यवश इसमें भी उनके हाथ बंधे हुए हैं क्योंकि जब भी कोई क़ानून विधान सभा या संसद में प्रस्तुत किया जाता है तो हर पार्टी अपने-अपने सारे सांसदों को या अपने सारे विधायकों को निर्देश जारी करती है कि इस क़ानून के पक्ष में वोट देना है कि विपक्ष में। और सांसद या विधायक को अपनी पार्टी की बात माननी पड़ती है। सांसद या विधायक की इतनी भी नहीं चलती कि वो अपनी मर्ज़ी से किसी क़ानून के पक्ष या विपक्ष में वोट डाल सकें। +इससे ये ज़ाहिर है कि न तो वो हमारी दिन ब दिन की समस्याओं का समाधान कर सकते हैं और न ही अच्छे क़ानून बनवा सकते हैं। तो ये बड़ी विडंबना है कि उनको हम वोट डालकर चुनते हैं। लेकिन जब वो संसद में अपनी बात रखते हैं तो उन्हें अपनी पार्टी की बात माननी पड़ती है। अगर वे बात न मानें तो उन्हें दंडित किया जा सकता है। उनकी सांसद या विधायक की कुर्सी छिन सकती है। +इसका मतलब अगर आप अपने इलाके में एक अच्छे व्यक्ति को विधायक या सांसद चुन भी लें तो इससे न तो आपके इलाके की समस्याओं का समाधान होगा और न ही वो व्यक्ति आपके लिए अच्छे क़ानून बनवा पायेगा। है न बड़ा अजीब जनतंत्र जिसमें न तो लोगों की चलती हैए और न हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों की। केवल कुछ की चलती है - जो मंत्री या प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनते हैंए केवल उन लोगों की चलती है। तो चुनाव में चुनकर भेजते हैं हम लोग लेकिन उसके बाद पांच साल तक सत्ता कुछ मंत्री और इस देश के अधिकारी मिलकर चलाते हैं। न ही लोगों का इस व्यवस्था पर नियंत्रण है और न ही लोगों के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का किसी तरह का नियंत्रण है। क्या ऐसा लोकतंत्र हमारे हितों की रक्षा कर सकता है? क्या हम ऐसे लोकतंत्र पर गर्व कर सकते हैं? +हरियाणा में मिर्चीपुर में दलितों के साथ अमानवीय बर्ताव किया गया। हमारी संसद में 70 से ज़्यादा सांसद अनुसूचित जाति और जन जाति के हैं। ये सब आरक्षित सीटों से चुन कर आये हैं। इन सीटों को इसलिए आरक्षित किया गया था कि ये सांसद अनुसूचित जाति और जन जाति के लोगों के हितों की रक्षा करेंगे। जब मिर्चीपुर में दलितों के साथ अत्याचार हुआ तो स्वभाविक प्रश्न उठता है कि इन सभी सांसदों ने इस मामले को संसद में क्यों नहीं उठायाए इन्होंने इसकी आवाज़ क्यों नहीं उठाई? जब इनमें से कुछ सांसदों से बात की तो उन्होंने कहा कि हम पार्टी की इजाज़त के बिना कुछ नहीं कर सकते। क्या हमारा जनतंत्र पार्टियों की राजनीति और दादागिरी में फंस कर रह गया है? +जो लोग ये कहते हैं कि हमें अच्छे लोगों को चुनकर भेजना चाहिएए हम उनसे सहमत हैं। बिल्कुल अच्छे लोगों को भेजना चाहिएए इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन अच्छे लोगों को चुनकर भेजने से व्यवस्था में सुधार होगा ऐसा कतई नहीं होने वाला। लेकिन ये भी बात है कि अगर हम अपराधी को चुनकर भेजेंगे तो वो व्यवस्था को और ज़्यादा दूषित कर देंगे। अच्छे लोगों को चुनकर भेजने से व्यवस्था में सुधार तो नहीं होने वालाए हां! व्यवस्था का और पतन ज़रूर रुकेगा या पतन की गति धीमी होगी। +आज व्यवस्था इतनी दूषित हो गई है कि अच्छा अधिकारी या अच्छा मंत्री भी कुछ नहीं कर पाता। उसके ऊपरए नीचे और साथ में काम करने वाले लोग उसे काम नहीं करने देते। अक्सर कई बहुत अच्छे और ईमानदार अफ़सरों को कहते सुना है - 'भई हम आपकी बात से पूरी तरह से सहमत हैं। आपका मुद्दा बिल्कुल ठीक है। लेकिन हमारे ऊपर इतना दबाव है कि हम आपकी कुछ मदद नहीं कर पायेंगे।ज् +राजनीति में बदलाव बिना सुधार असंभव. +हमारे देश में बहुत सारे अच्छे-अच्छे कार्यकर्ताए अच्छे-अच्छे संगठन अलग मुद्दों पर काम कर रहे हैं। जैसे कोई शिक्षा पर काम कर रहा हैए कोई स्वास्थ्य पर काम कर रहा हैए कोई जलए जंगलए ज़मीन के मुद्दे पर काम कर रहा है। हमें ये समझना पड़ेगा कि जब तक ये पूरी की पूरी राजनैतिक व्यवस्था नहीं बदलेगीए मतलब निर्णय लेने का अधिकार सीधे-सीधे जनता के हाथ में नहीं आयेगा तब तक न शिक्षा सुधरेगीए न स्वास्थ्य सुधरेगा और न जलए जंगलए ज़मीन के मुद्दों में सुधार होगा। अगर हमने सारी ताकत लगाकर मान लीजिए ज़मीन के क़ानून को बदलवा भी दियाए जंगल के क़ानून को बदलवा भी दियाए जल के क़ानून को बदलवा भी दियाए शिक्षा के क़ानून को बदलवा भी दिया तो इसको लागू करना कलक्टर का काम है। वो अगर फिर भी नहीं करेगा और अगर क़ानून की अवहेलना करेगा तो हम उसका क्या कर लेंगे? अक्सर हमारे देश में ऐसा ही होता आया है - क़ानून बहुत अच्छे अच्छे बने पर हर क़ानून की अवहेलना की गई। जिन अधिकारियों को इन क़ानूनों को लागू करना है वो फिर भी इन क़ानूनों को अगर लागू नहीं करेंगे तो क्या होगा? +जब तक इन लोगों के ऊपर सीधे सीधे ग्राम सभा का नियंत्रण नहीं होगा - कि गांव की ग्राम सभा में बैठकर लोग अधिकारियों को तलब कर सकेंए अगर वो ठीक से काम नहीं करते तो उनको दंडित कर सकेंए जब तक ये व्यवस्था नहीं आयेगी तब तक न शिक्षा सुधरेगीए न स्वास्थ्य सुधरेगाए न ज़मीन सुधरेगीए न जल सुधरेगाए न जंगल सुधरेगा। इसलिए हमें समझना होगा कि जब तक हम इस जड़ को नहीं पकड़ेंगे तब तक सुधार होना मुश्किल है। +व्यक्ति निर्माण और व्यवस्था सुधार. +कुछ लोगों का मानना है कि हमें व्यक्ति निर्माण पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए। अगर लोग सुधर गये तोए व्यवस्था अपने आप सुधर जाएगी। +प्रश्न यह उठता है कि वर्तमान व्यवस्था इतनी दूषित हो गई है - क्या यह व्यवस्था व्यक्ति निर्माण होने देगी? क्या यह व्यवस्था व्यक्ति निर्माण में बाधक नहीं है? +आज की सबसे बड़ी समस्या ये है कि वर्तमान व्यवस्था व्यक्ति को अच्छा बनने ही नहीं देती। वह चाहकर भी अच्छा नहीं बन सकता। वर्तमान व्यवस्था सुधार के बिना क्या व्यक्ति निर्माण हो पायेगा? +इसे एक उदाहरण से समझें। राशन और मिट्टी का तेल वितरण करने वालों का कमीशन इतना कम है कि वो बिना चोरी के अपना गुज़ारा कर ही नहीं सकते। मिट्टी तेल के हर एक लीटर पर 7 पैसे कमीशन मिलता हैए एक मिट्टी तेल के डीलर का लगभग 10 हजार लीटर महीने का कोटा होता है। इसका मतलब उसकी महीने की कमाई 700 रुपये हुई। इन 700 रुपयों में उसे अपनी दुकान के खर्च निकालकर अपने परिवार को भी पालना है। जो कि असंभव है। वो बेचारा चोरी नहीं करेगा तो क्या करेगा? दिल्ली में लगभग 4000 राशन वाले हैं। तो एक ही झटके में सरकार ने ग़लत व्यवस्था कायम करके 4000 लोगों को दूषित कर दिया। तो जब तक सरकार उनका कमीशन नहीं बढ़ायेगीए तब तक उन राशन दुकानदारों से ईमानदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? जब तक व्यवस्था नहीं सुधरेगी तो क्या उनका व्यक्ति निर्माण संभव है? +आखिर व्यक्ति निर्माण क्यों? और व्यवस्था निर्माण क्यों? अपनी आसक्तियों और विकारों पर नियंत्रण कर व्यक्ति अंततः बुद्धत्व को प्राप्त हो - यह जीवन का लक्ष्य माना गया है। तो व्यक्ति निर्माण तो जीवन और सृष्टि का ध्येय है। अच्छी व्यवस्थाए व्यक्ति निर्माण में मदद करती है। बुरी व्यवस्था व्यक्ति निर्माण में बाधा पहुंचाती है। अच्छी व्यवस्था होगी तो व्यक्ति निर्माण की गति और तेज होगी। तो व्यवस्था निर्माण केवल रास्ता है। व्यक्ति निर्माण के लिए वह मात्र एक सीढ़ी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जैसे जैसे व्यक्ति निर्माण होता जाएगाए वैसे वैसे व्यवस्था सुधरती जायेगी। और जैसे जैसे व्यवस्था सुधरेगीए व्यक्ति निर्माण में गति आयेगी। सच्चाई के रास्ते पर चलकर न्याय के लिए लड़ाई लड़ना और व्यवस्था निर्माण में सहयोग करना सबसे बड़ा कर्मयोग है। ऐसा कर्मयोग करने से ही व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया सुदृढ़ होती है। +अभी हम देखते हैं कि अधिकतर नेताए अफ़सर और व्यवसायी चोरी करते हैं। इनमें अधिकतर मजबूरी में ग़लत काम करते हैं। यदि उन्हें सही व्यवस्था दी जाये तो क्या इनमें से कई लोग ठीक नहीं हो जायेंगे? तो व्यक्ति निर्माण और व्यवस्था निर्माण दोनों कार्य ही अत्याधिक आवश्यक हैं। +ग्राम स्वराज के लिए क़ानून बने. +ग्राम सभाओं के ज़रिए सीधे जनता निर्णय लेए इसके लिए हमारी क़ानूनी व्यवस्था में निम्न परिवर्तन करने होंगे। ताकि लोगों का अपने जीवन और अपनी नियति पर नियंत्रण हो सके और वे अपने विकास की ज़िम्मेदारी खुद ले सकें। +ग्राम सभा सर्वोच्च होनी चाहिए. +समस्या : वर्तमान व्यवस्था में पंचायतों को बहुत कम अधिकार दिए गए हैं। जो थोड़े-बहुत अधिकार दिए गए हैंए उन पर सरपंच (मुखिया या प्रधान) का नियंत्रण होता है। ग्राम सभाओं का सरपंच पर कोई नियंत्रण नहीं है। उन्हें सरपंचों का पिछलग्गू बना दिया गया है। अधिकतर पंचायती क़ानूनों में ग्राम सभाओं की भूमिका केवल सरपंचों को सलाह देने तक सीमित हैए जिसे सरपंच माने या न माने। परिणाम स्वरूप अधिकतर सरपंच भ्रष्ट हो गए हैं। पंचायत के कामों में हो रहे खुलेआम भ्रष्टाचार को लोग असहाय होकर देखते रहते हैं। वो इस बारे में कुछ नहीं कर सकते। इसीलिए पंचायत की गतिविधियों या ग्राम सभाओं की बैठकों से लोग दूर रहते हैं। +जब सरपंच कुछ ग़लत काम करता हैए या भ्रष्टाचार करता है तो उसे सही करने का अधिकार क़ानून में लोगों को नहीं दिया गया है। ज़िलाधिकारी को उसके ख़िलाफ कार्रवाई करने का अधिकार है। एक ज़िलाधिकारी के नीचे 1000 से भी अधिक पंचायतें होती हैं। ज़िलाधिकारी गांवों से बहुत दूर ज़िला मुख्यालय में बैठता हैए भला उसके लिए यह जानना कैसे संभव है कि कोई सरपंच अच्छा है या बुरा। जब लोग सरपंच के ख़िलाफ ज़िलाधिकारी से शिकायत करते हैंए तो अधिकतर मामलों में तो उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई ही नहीं की जातीए क्योंकि ज़िलाधिकारी के पास समय ही नहीं होता। यदि सरपंच सत्ताधारी पार्टी का होए या किसी स्थानीय विधायकए सांसद या अन्य किसी राजनीतिज्ञ से उसकी मित्रता हो तो प्रायः ज़िलाधिकारी दबाव में आकर वैसे ही कोई जांच नहीं करते। और इस प्रकार दोषी सरपंचों के ख़िलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। +उल्टे ज़िलाधिकारी के स्तर पर इस अधिकार का दुरुपयोग भी होता है। कई ईमानदार सरपंचों के ख़िलाफ झूठी कार्रवाई शुरू करके उन्हें तंग किया जाता है। क्योंकि ज़िलाधिकारी के पास कई गांव होते हैंए तो वह प्रायः सरपंचों की निगरानी का अपना काम बीण्डीण्ओण् या अन्य किसी अधिकारी के ज़िम्मे लगा देता है। ये कनिष्ठ अधिकारी प्रायः सरपंचों से पैसा उगाही करना शुरू कर देते हैं। जो सरपंच पैसा नहीं देतेए कई बार उनके ख़िलाफ फर्ज़ी आरोप लगा कर जांच शुरू कर दी जाती है। कई बार यही अधिकारी सरपंचों को ग़लत काम करने के लिए विवश भी करते हैं या राजनीतिक दबाव में आकर विरोधी पार्टी के सरपंचों के ख़िलाफ झूठे आरोप लगाकर जांच शुरू कर दी जाती है। +सुझाव : सबसे पहले हमें सरपंच को कलक्टर के चंगुल से मुक्ति दिलानी होगी और उन्हें सीधा जनता के प्रति जवाबदेह बनाना होगा। इसके लिए हमारे निम्न सुझाव हैं। +(क) सभी निर्णयों को लेने का अधिकार ग्राम सभा के पास हो। ग्राम सभा के द्वारा लिये गये निर्णय अंतिम हों। सरपंच का काम केवल इन निर्णयों को लागू करने का हो। +(ख) यदि सरपंच भ्रष्टाचार या अन्य किसी आपराधिक गतिविधि में लिप्त पाया जाए तो ग्राम सभा पुलिस को निर्देश दे सके कि वह आरोपी सरपंच के ख़िलाफ केस दर्ज करके समय-समय पर जांच की प्रगति रिपोर्ट ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत करे। +(ग) जब तक ग्राम सभा की ओर से विशेष रूप से आग्रह न किया जाए तब तक ज़िलाधिकारी या अन्य किसी अधिकारी को सरपंच के ख़िलाफ किसी प्रकार की कोई कार्रवाई करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। +(घ) यदि सरपंच ग्राम सभा की इच्छा का अनुपालन न करे तो ग्राम सभा उस सरपंच को वापस बुला सके। यदि आधे से ज़्यादा मतदाता सरपंच में अविश्वास व्यक्त करते हुए अपने हस्ताक्षर युक्त नोटिस राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपते हैं तो राज्य निर्वाचन आयोग 15 दिन के भीतर सभी हस्ताक्षरों को सत्यापित कराकर एक महीने के भीतर (सत्यापन के बाद) महाभियोग के लिए गुप्त मतदान करवाए। अविश्वास मत सफल होने पर सरपंच को उसके पद से हटा दिया जाए और नया सरपंच चुनने के लिए फिर से मतदान करवाया जाए। +सरपंचों को वापस बुलाने का अधिकार एक तरह का ब्रह्मस्त्र है जिसका अन्तिम उपाय के रूप में ही इस्तेमाल होना चाहिए। हालांकि कई राज्यों ने यह अधिकार आज भी ग्राम सभाओं को दे रखा है। और इन राज्यों के कुछ गावों ने अपने इन अधिकारों का प्रयोग भी किया है। लेकिन दुर्भाग्य से इन क़ानूनों में बीच की स्थितियों में सरपंच पर नियंत्रण रखने के लिए ग्राम सभाओं को कोई अधिकार नहीं दिये गये हैं। स्थिति यह है कि या तो सरपंच को रखो या उसे हटा दो। समय-समय पर उपर्युक्त दिशा निर्देश दे कर लोग सरपंच को ठीक नहीं कर सकते। गांव में सरपंच को हटाने की प्रक्रिया ज्यों ही शुरू होती हैए स्थानीय राजनीति अपना काम शुरू कर देती है। साथ ही बाहर से दलगत राजनीति से जुड़े प्रभाव भी दिखाई देने लगते हैंए जिसके कारण गांव में कई अवांछनीय गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इन सब के कारण सरपंच के ख़िलाफ अविश्वास मत के प्रस्ताव पर स्वस्थ बहस नहीं हो पाती। +हमारा मानना है कि यदि ग्राम सभाओं को उपर्युक्त सुझावों के अनुरूप सभी प्रकार के निर्णय लेने का अधिकार मिल जाए तो लोग समय-समय पर सरपंच को आवश्यक दिशा निर्देश जारी कर सकेंगे। सरपंच को हटाने की तब शायद ही कभी ज़रूरत पड़ेए क्योंकि निर्णय लेने की हर-एक प्रक्रिया में वह ग्राम सभा के साथ स्वयं साझीदार होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो ब्रह्मस्त्र प्रयोग करने की शायद ही कभी ज़रूरत पड़े। +ग्राम स्तर का काम ग्राम स्तर पर हो. +समस्या : आज इस बात को ले कर घोर भ्रम की स्थिति है कि कौन से कार्यए संसाधन और संस्थान किसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं? +सुझाव : किसी कार्यए संसाधन या संस्थान पर किसका नियत्रंण होगा - पृष्ठ संख्या 36 पर दी गई प्रक्रिया के मुताबिक इनकी सूचियां बनाकर इनका हस्तांतरण किया जाए। इसके बाद हर कार्यए संसाधन एवं संस्थान को चलाने और उसके रख रखाव से संबंधित फ़ंड एवं कर्मचारी उसी स्तर को हस्तांतरित किए जाएं जिसके नियंत्रण में वो आएंगे। +सरकारी कर्मचारियों पर नियंत्रण. +समस्या : आज स्थानीय सरकारी कर्मचारियों के आगे लोग अपने को पूरी तरह असहाय महसूस करते हैं। +(क) विभिन्न स्तरों की पंचायतों को सौंपे गए कार्योंए संसाधनों एवं संस्थानों से जुड़े सभी कर्मचारियों का पूरा नियंत्रण (प्रशासनिक एवं कार्यकारी नियत्रंण सहित) संबंधित स्तर को दिया जाना चाहिए। आगे से सभी कर्मचारियों को उस पंचायत का कर्मचारी माना जाना चाहिए जहां उन्हें स्थानांतरित किया गया है। जब पूर्व नियुक्त कर्मचारी सेवा निवृत्त हों तो संबंधित पंचायत द्वारा ही उनके स्थान पर सीधे नयी नियुक्तियां की जाएं। तब नियुक्तियों में राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। +(ख) सभी स्तरों पर पंचायतों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक संख्या में नए कर्मचारियों की भर्ती करने का भी अधिकार होना चाहिए। इन कर्मचारियों को राज्य सरकार का कर्मचारी नहीं माना जाना चाहिए। वे पंचायत के कर्मचारी हों। +(ग) पंचायतों का अपने कर्मचारियों के ऊपर सम्पूर्ण अनुशासनात्मक नियंत्रण होना चाहिएए भले ही वे स्थानांतरित हो कर आये हों या उनकी पंचायतों द्वारा सीधी नियुक्ति की गई हो। यानि कि ग्राम सभाएं अपने कर्मचारियों को चेतावनी दे सकें या अन्य प्रकार का दंड देने के साथ-साथ ज़रूरत पड़ने पर उन्हें बर्खास्त भी कर सकें। +(घ) ग्राम सभाओं को यह ताकत भी दी जानी चाहिए कि वे किसी सरकारी डीलर जैसेए राशन की दुकान वाले का लाइसेंस रद्द कर के उसकी जगह किसी नये दुकानदार को नियुक्त कर सकें। +(ङ) सभी ग्राम सभाओं को यह अधिकार भी होना चाहिए कि वे अपने ब्लॉक या ज़िला पंचायत के किसी कर्मचारी को दिशा निर्देश जारी कर सकें और यदि आवश्यकता पड़े तो उसे ‘समन’ भेज कर अपने यहां उपस्थित होने का भी आदेश दे सकें। यदि ग्राम सभा के इन निर्देशों का किसी दूसरे गांव के निर्देशों से टकराव नहीं होता हो तो उन निर्देशों को संबंधित अधिकारियों के लिए बाध्यकारी माना जाना चाहिए। टकराव की स्थिति में उनका हल उपयुक्त पंचायत स्तर पर किया जाना चाहिए। यदि कोई अधिकारी ग्राम सभा से आये समन की अवहेलना करता है अथवा उसके निर्देशों का उल्लंघन करता हैए वैसी स्थिति में ग्राम सभा को यह अधिकार होना चाहिए कि वह संबंधित अधिकारी को फटकार लगा सके या उस पर जुर्माना लगा सके। +सरकारी फ़ंड पर नियंत्रण. +समस्या : केन्द्र एवं राज्य सरकारें प्रायः ऐसी हवाई योजनाएं बनाकर जनता पर थोप देती हैं जिनका जनता की प्राथमिकताओं से कोई लेना-देना नहीं होता। किस तरह से ये योजनाएं भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही हैंए जनता की ज़रूरतों से परे हैं और जनता में भिखमंगन की आदत डाल रही हैं - इस पर विस्तृत रूप से इस पुस्तक में पहले ही चर्चा की जा चुकी है। +सुझाव : हमारा मानना है कि इन तमाम योजनाओं को बंद किया जाना चाहिए। पंचायतों को दिया जाने वाला अधिकतर फ़ंड किसी भी योजना के बंधन से मुक्त होना चाहिए। ग्राम सभाओं में जनता तय करे कि वह उस पैसे को कैसे खर्च करना चाहती है। +केरल सरकार अपने वार्षिक बजट का 40 प्रतिशत भाग सीधे सीधे पंचायतों को हस्तांतरित करती है। आज ज़रूरत है कि हर राज्य के कुल बजट का कम से कम 50 प्रतिशत सीधे-सीधे पंचायतों को मुक्त राशि के रूप में आवंटित किया जाए। इस राशि के साथ कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। गांव वाले इस फ़ंड को अपनी मर्ज़ी से खर्च करने में सक्षम होने चाहिए। +उच्च अधिकारियों के यहां से फ़ंड रिलीज़ करवाने में पंचायतों को कई बार समस्या होती है और उन्हें रिश्वत भी देनी पड़ती है। इसलिएए जैसा कि केरल में होता हैए प्रत्येक स्तर पर प्रत्येक पंचायत का पैसा प्रत्येक वर्ष के अप्रैल की पहली तारीख़ को सीधे उसके खाते में जमा हो जाना चाहिए। इससे पंचायतों को अपने काम के लिए कहीं से पैसा रिलीज़ नहीं करवाना पड़ेगा। +यदि किसी गांव में दलितों का कोई समूह मांग करे तो संबंधित गांव में उनकी आबादी को ध्यान में रखते हुए ग्राम पंचायत के फ़ंड का एक निश्चित हिस्सा उस दलित ग्राम सभा को आवंटित किया जाना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि दलितों पर गांव के दबंग लोगों का ज़ोर न चले। +ब्लॉक एवं ज़िला पंचायतों पर नियंत्रण. +समस्या : वर्तमान व्यवस्था में ग्राम पंचायतें मध्य स्तरीय और ज़िला पंचायतों के अधीन होकर काम करती हैं। मध्य स्तरीय पंचायतें ग्राम पंचायतों के प्रस्तावों को मंज़ूरी देती हैं और प्रायः ग्राम सभा के कार्यों का भुगतान भी मध्य स्तरीय या ज़िला स्तरीय पंचायतों के द्वारा होता है। इन मध्य स्तरीय व ज़िला स्तरीय पंचायतों के काम-काज पर जनता का कोई नियंत्रण नहीं होता। +सुझाव : ग्राम सभाएं मध्य स्तरीय और ज़िला पंचायतों के नीचे होने के बजाय उन पर सीधे सीधे नियंत्रण कर सकें - हमें ऐसी व्यवस्था बनानी होगी। हमारा प्रस्ताव है कि लोग अपनी ग्राम सभाओं एवं ग्राम प्रधानों के माध्यम से मध्य स्तरीय एवं ज़िला स्तरीय पंचायतों पर सीधा नियंत्रण रख सकें। +(क) ग्राम सभाओं के प्रस्ताव और निर्णय अंतिम हों। उन्हें ऊपर के किसी भी स्तर से प्रशासनिकए आर्थिक अथवा अन्य किसी भी तरह की मंज़ूरी लेने की ज़रूरत न पड़े। +(ख) कोई नई परियोजना शुरू करने के पहले ब्लॉक या ज़िला पंचायतों को उससे प्रभावित सभी ग्राम सभाओं से मंज़ूरी लेनी पड़े। दूसरी ओरए कोई भी ग्राम सभा अपने ब्लॉक या ज़िला पंचायत को कोई नई परियोजना शुरू करने का सुझाव दे सकती है। सामान्यतः किसी भी निर्णय को तभी लागू किया जाना चाहिए जब सभी प्रभावित ग्राम सभाओं ने उसके लिए मंज़ूरी दे दी हो। +(ग) सरपंच केवल ग्राम सभा और ब्लॉक पंचायत के बीच पुल का काम करेगा। ब्लॉक पंचायत में कोई वायदा करने से पहले सरपंच को अपनी ग्राम सभा से परामर्श करना पड़ेगा और मंज़ूरी लेनी होगी। इसी प्रकार एक ब्लॉक अध्यक्ष को ज़िला स्तरीय पंचायत में कोई वायदा करने से पहले अपनी ब्लॉक पंचायत से परामर्श करके मंज़ूरी लेनी होगी। ग्राम सभा चाहे तो सरपंच को एक हद तक मंज़ूरी न लेने की छूट दे सकती है। लेकिन यह छूट बड़ी सीमित होगी। +नीति निर्माण एवं विधान सभाओं पर सीधा नियंत्रण. +समस्या : भारत में प्रतिनिधित्व लोकतंत्र है। यद्यपि हम अपने राजनेताओं को चुनते हैंए फिर भी दो चुनावों के बीच हमारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं होता। राज्य एवं केन्द्र सरकारों द्वारा बनाए जाने वाले क़ानूनों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसा देखने में आ रहा है कि सरकारें ऐसे क़ानून बना रहीं हैं जो अकसर जनता के हितों के ख़िलाफ होते हैं और कुछ देशी विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिये या विदेशी सरकारों के दबाव में बनाये जाते हैं। इस पर अंकुश लगाने की ज़रूरत है। +सुझाव : क़ानूनों के बनने पर जनता का कुछ हद तक सीधा नियंत्रण होना चाहिए। यह नियंत्रण लोगों को दो प्रकार से दिया जा सकता है- +(क) नये क़ानूनों या नई नीतियों को बनवाने में जनता की भूमिकाः +यदि पांच प्रतिशत से अधिक ग्राम सभाएं किसी क़ानून या नीति को बनाने का प्रस्ताव दें तो राज्य सरकार उस प्रस्ताव की एक प्रति शेष सभी ग्राम सभाओं को भेजे। यदि 50 प्रतिशत से अधिक ग्राम सभाएं उस प्रस्ताव को पारित कर दें तब राज्य सरकार को वह क़ानून बनाना पड़ेगा या उस नीति को लागू करना पड़ेगा। इसी प्रकार ग्राम सभाओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे किसी क़ानून को पूर्णतः या आंशिक रूप से रद्द करवा सकें। या किसी सरकारी नीति अथवा परियोजना को संशोधित या निरस्त करवा सकें। +इससे जनता विभिन्न क्षेत्रें में सुधार के लिए सीधी पहल कर सकेगी जैसे पुलिस सुधारए न्यायिक सुधारए भ्रष्टाचार विरोधी सशक्त क़ानूनों का निर्माण इत्यादि। इससे सुधारों का एक नया सिलसिला प्रारंभ होगा। +(ख) संसद एवं राज्य विधान सभाओं में प्रस्तुत सभी क़ानूनों एवं प्रस्तावों के मामले में जनता की रायः +संविधान के अनुसार स्थानीय विधायक एवं सांसद ब्लॉक एवं ज़िला पंचायतों के पदेन सदस्य होते हैं। पर क़ानून में उनको कोई काम नहीं दिया गया है। ऐसा प्रावधान किया जाए कि विधान सभा या संसद में प्रस्तुत सभी विधेयकों एवं प्रस्तावों (वित्त विधेयकों एवं अविश्वास प्रस्तावों को छोड़कर) की एक प्रति वे ब्लॉक पंचायत (या ज़िला परिषद) में लेकर आएं और उसकी एक एक प्रति उस ब्लॉक (या ज़िला) की सभी ग्राम सभाओं के प्रतिनिधियों के बीच बंटवाएं। सभी ग्राम सभाओं में इस पर चर्चा हो और ग्राम सभाओं की सामूहिक राय के आधार पर विधान सभा या संसद में वे अपनी राय रखें। +ग्राम सभा द्वारा सूचना प्राप्त करने का अधिकार. +समस्या : राज्य सरकार द्वारा लिये जाने वाले ऐसे कई फैसलों की जनता को कोई जानकारी नहीं हो पाती जिनका उनके जीवन पर सीधा असर होता है। +सुझाव : ग्राम सभाओं को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे राज्य स्तर तक के किसी भी सरकारी अधिकारी से वह सूचना मांग सके जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके गांव से संबंधित है। मांगी गई सूचना न देने पर ग्राम सभा को संबंधित अधिकारी पर 25 हज़ार रुपये तक का जुर्माना लगाने का अधिकार होना चाहिए। +पंचायत सचिव के ऊपर नियंत्रण. +समस्या : पंचायत सचिव की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है। वह सरपंच एवं अन्य अधिकारियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। जनता के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं होती। जनता का उस पर कोई नियंत्रण भी नहीं होता। +सुझाव : पंचायत सचिव की नियुक्ति ग्राम सभा द्वारा की जानी चाहिए। उसका काम केवल ग्राम सभा के निर्णयों को लागू करना होना चाहिए। ग्राम सभा का उसके ऊपर पूर्ण निंयत्रण होना चाहिए जिसमें उसको दंडित करनेए उसका वेतन रोकने और यदि ज़रूरत पड़े तो उसे बर्खास्त करने का अधिकार भी शामिल होना चाहिए। +पंचायतों में भ्रष्टाचार का मामला. +समस्या : सरकारी कार्यों में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। कई बार तो अत्यंत घटिया और कागज़ी कामों के लिए भी भुगतान कर दिया जाता है। जनता शिकायत करती है पर कोई सुनवाई नहीं होती। इस प्रकार के भ्रष्टाचार के पीछे दो मुख्य कारण हैं - +(क) जब भी कभी गांव में कोई सरकारी काम होता है तो कोई सरकारी अधिकारी यह सत्यापित करता है कि काम संतोषजनक हो गया और उसके लिए भुगतान किया जा सकता है। इस संबंध में ग्राम सभा या जनता से नहीं पूछा जाता। जैसे उत्तर प्रदेश में एसण्डीण्एम यह प्रमाणित करता है कि किसी नहर की सफाई ठीक हो गई। प्रायः रिश्वत लेकर एसण्डीण्एमण् यह प्रमाणित कर देता हैए भले ही नहर में कोई काम हुआ हो या नहीं। वे किसान जो संबंधित नहर के पानी का उपयोग सिंचाई में करते हैंए उनसे कोई कुछ नहीं पूछता। +(ख) दूसरा कारण यह है कि जब इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायतें की जाती हैं तो उनकी जांच संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जाती है। जो लापरवाही वश या घूस लेकर या फ़िर राजनीतिक दबाव के कारण उन शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करते। और जनता का उन अधिकारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। +सुझाव : हमारी राय है कि उपर्युक्त दोनों मामलों में ग्राम सभा को निम्न अधिकार दिये जाने चाहिए - +(क) जब तक ग्राम सभा संतुष्टि प्रमाण-पत्र न देए तब तक गांव में किसी सरकारी काम का भुगतान नहीं किया जाना चाहिए। यदि ग्राम सभा को लगे कि काम संतोषजनक नहीं हैए तो वह भुगतान रोकने के साथ साथए जांच करके घटिया काम के कारणों की पड़ताल भी कर सके। दोषियों को चिन्ह्ति करके उन सभी कमियों को दूर करने के आदेश भी दे सके। यदि दोषी कर्मचारी पंचायत के किसी स्तर से संबंधित हैं तो ग्राम सभा के पास उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का भी अधिकार होना चाहिए। +(ख) यदि आपराधिक भ्रष्टाचार का मामला बनता हो तो ग्राम सभा पुलिस को मामला दर्ज करने और समय-समय पर उस केस की प्रगति के बारे में बताने के लिए निर्देश देने में भी सक्षम होनी चाहिए। +गांवों में शराब की लत. +समस्या : वर्तमान समय में शराब की दुकानों के लिए राजनेताओं की सिफारिश पर अधिकारियों द्वारा लाइसेंस दे दिया जाता है। वे प्रायः रिश्वत लेकर लाइसेंस देते हैं। शराब की दुकानों के कारण भारी समस्याएं पैदा होती हैं। लोगों का पारिवारिक जीवन तबाह हो जाता है। विडंबना यह है कि जो लोग इससे सीधे तौर पर प्रभावित होते हैंए उन्हें इस बात के लिए कोई नहीं पूछता कि क्या शराब की दुकान खुलनी चाहिए या नहीं? इन दुकानों को उनके ऊपर थोप दिया जाता है। +सुझाव : शराब की दुकान खोलने का कोई लाइसेंस तभी दिया जाना चाहिए जब ग्राम सभा इसकी मंज़ूरी दे दे और ग्राम सभा की संबंधित बैठक मेंए वहां उपस्थित 90 प्रतिशत महिलाएं इसके पक्ष में मतदान करें। ग्राम सभा में उपस्थित महिलाएं साधारण बहुमत से मौजूदा शराब की दुकानों का लाइसेंस भी रद्द करा सकें। +उद्योग एवं खनन के लिए लाइसेंस. +समस्या: उद्योग या खनन गतिविधियों के लिए लाइसेंस केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा दिया जाता है। लेकिन इसके दुष्प्रभावों से वहां रहने वाले लोगों को दो-चार होना पड़ता है। लाइसेंस देने की प्रकिया में इन लोगों की कोई भूमिका नहीं होती है। +सुझाव : ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना किसी औद्योगिक इकाई या बड़े खनन उद्यम को शुरू करने की इजाज़त न दी जाए। अनुमति देने के पहले ग्राम सभाएं कुछ शर्तें भी जोड़ सकती हैं। यदि भविष्य में किसी शर्त का उल्लंघन किया जाता है तो ग्राम सभाओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे अपनी अनुमति को निरस्त कर सकें। +भूमि अधिग्रहण. +समस्या : जनता की राय की परवाह किये बिना राज्य की विभिन्न एजेंसियों द्वारा लोगों की भूमि का अधिग्रहण किया जाता है। इसके कारण लोग जहां अपना घर-बार खो बैठते हैं वहीं उन्हें बेरोज़गार भी होना पड़ता है। इसके बदले में दिया गया मुआवज़ा प्रायः अपर्याप्त होता है। यदि यह बाज़ार की कीमतों के अनुरूप हो तब भी इससे एक किसान की समस्या नहीं सुलझती। एक किसान अपनी एक एकड़ ज़मीन की उपज से अपने परिवार का भरण पोषण कर सकता हैए लेकिन वह इसी एक एकड़ ज़मीन के बदले (उदाहरण के लिए) मिले 40 हज़ार रुपये से पूरी ज़िंदगी अपना और अपने परिवार का गुज़र-बसर नहीं कर सकता। इस प्रकार भूमि अधिग्रहण के कारण ग़रीब लोग और ग़रीब हो जाते हैं। +इसके अलावा जब भूमि अधिग्रहित की जाती है तो ज़मीन वालों को तो मुआवज़ा मिल जाता है। लेकिन उन भूमिहीनों कोए जो उस ज़मीन पर मज़दूरी करते थेए उन्हें कुछ नहीं मिलता। वो बिल्कुल बेरोज़गार हो जाते हैं। +कई स्थानों पर देखा गया कि स्थानीय लोगों के कड़े प्रतिरोध के बावजूद जब भूमि अधिग्रहण किया गया तो लोग नक्सलवादियों से जा मिले। +सुझाव : ग्राम सभाओं को यह निर्णय लेने की ताकत दी जाए कि कोई परियोजना जनहित में है या नहींए उसके लिए ज़मीन देनी है या नहीं और अगर देनी है तो किन शर्तों पर देनी है - इस बारे में वो अंतिम निर्णय ले सकें। इसे लागू करने के लिए क़ानून में निम्न प्रावधान किए जाएं। +(क) यदि कोई कंपनी या केंद्र सरकार या राज्य सरकार किसी गांव की ज़मीन अधिग्रहण करना चाहती हैए तो वह उस गांव की पंचायत में इस बावत आवेदन दे। +(ख) उस ज़मीन का क्या किया जायेगा और उस पर क्या प्रोजेक्ट लगाया जायेगाए इससे संबंधित सारे कागज़ों के मूल दस्तावेज़ों की प्रतियों के साथ साथ उनके स्थानीय भाषा में अनुवाद उस प्रोजेक्ट से प्रभावित सभी गांवों की पंचायतों में भेजे जायें ताकि लोग उससे जुड़े हर पहलू को जान सकें। +(ग) पंचायतें अपने अपने गांवों में इन कागज़ों के आधार पर जनजागरण अभियान चलाएं। यदि कोई गांव का व्यक्ति इन कागज़ों की फोटो कॉपी लेना चाहेए तो उसे फोटो कॉपी शुल्क लेकर यह उपलब्ध करायी जाये। +(घ) पंचायतों को सारे कागज़ मुहैया कराने के दो महीने के अंदर हर पंचायत अपनी ग्राम सभा बुलाए। हर ग्राम सभा में इस प्रोजेक्ट पर चर्चा होगी। यदि ग्राम सभा को कुछ प्रश्न या शंकायें हों तो ग्राम सभा अपनी पंचायत के माध्यम से आवेदन करने वाली कंपनी या राज्य सरकार या केन्द्र सरकार को लिखेगी कि वो अगली ग्राम सभा की मीटिंग में गांव के लोगों के प्रश्नों के जवाब देने के लिए किसी जानकार अधिकारी को भेजें। यदि कुछ और कागज़ों की ज़रूरत है तो ग्राम सभा उनकी भी मांग कर सकती हैं। +(घ) अगली ग्राम सभा की मीटिंग में भेजे गए अधिकारी से जनता सवाल जवाब करेगी। लेकिन ज़मीन देने के संबंध में इस सभा में निर्णय नहीं लिया जायेगा। इस सभा में केवल अधिकारी से सवाल जवाब किये जायेंगे। +(च) अधिकारी द्वारा दिये गये उत्तरों और अभी तक मुहैया कराये गये सभी कागज़ों से यदि ग्राम सभा संतुष्ट है तो वह अंतिम निर्णय लेने के लिए एक और ग्राम सभा बुलाएगीए नहीं तो वह कंपनीध राज्य सरकारध केंद्र सरकार को लिखकर और जानकारी मांग सकती है। +(छ) अंतिम निर्णय वाली ग्राम सभा में बाहर का कोई व्यक्ति या अधिकारी मौजूद नहीं होगा। न ही पुलिस होगी। केवल मीडिया को दूर बैठकर देखने की इजाज़त होगी। ऐसी ग्राम सभा की अध्यक्षता सरपंच या प्रधान नहीं करेगा। वहीं मौजूद गांव के लोग मौके पर आम सहमति से गांव के किसी आदरणीय व्यक्ति को ग्राम सभा की अध्यक्षता के लिए चुनेंगे। मीटिंग के मिनिट्स पंचायत सेक्रेटरी नहीं लिखेगा। गांव के लोग गांव के किसी भी व्यक्ति को यह ज़िम्मेदारी सौंप सकते हैं। इस ग्राम सभा में आम सहमति से तय होगा कि गांव के लोग ज़मीन देना चाहते हैं या नहीं और यदि देना चाहते हैंए तो किन शर्तों पर देना चाहते हैं। आम सहमति बनाते वक्त ग्राम सभा सभी लोगों के हितों का उचित ख्याल रखेगी। ऐसे लोगों के हितों की भी रक्षा की जाएगी जो भूमिहीन हैं और भूमि अधिग्रहण से उनका रोज़गार छिनने की आशंका है। यदि आवश्यक हो तो एक से अधिक गांवों की संयुक्त ग्राम सभा बैठक आयोजित की जा सकती है। ताकि बातचीत के द्वारा एक मत पर पहुंचा जा सके। +(ज) ग्राम सभा का यह निर्णय अंतिम होगा। इसे कोई सरकार न तो रद्द कर सकेगी और न ही उसमें किसी प्रकार का बदलाव कर सकेगी। +(झ) राष्ट्रीय स्तर पर एक पुनर्वास नीति बनाई जाए जिसमें भूमि वाले और भूमिहीनए दोनों के न्यूनतम अधिकारों की बात लिखी हो। यदि कोई ग्राम सभा भूमि अधिग्रहण के लिए तैयार होती है तो इस पुनर्वास नीति में लिखे प्रावधान लोगों के न्यूनतम अधिकार होंगे। पर यदि ग्राम सभा चाहेगी तो इनसे अधिक मांग करने के लिए भी स्वतंत्र होगी। ग्राम सभा का निर्णय अंतिम निर्णय होगा। +(ञ) देश इस वक्त भारी खाद्य संकट से गुजर रहा है। आने वाले समय में यह संकट और भी ज़्यादा गहराएगा। इसीलिए राष्ट्र हित में यह बहुत ज़रूरी है कि देश की उपजाऊ भूमि को खेती के लिए ही इस्तेमाल किया जाए। सड़कए बिजली और कारखानों के बिना तो देश का काम चल जाएगा पर रोटी के बिना हमारा एक दिन भी काम नहीं चलेगा। इसीलिए यह क़ानून में डाला जाये कि जिस भूमि पर दो या दो से ज़्यादा फसलें निकलती हैंए हर गांव अपनी ऐसी भूमि को ग्राम सभाओं में चिन्ह्ति करे। ऐसी भूमि को किसी भी हालत में कृषि के अलावा किसी दूसरे उपयोग में नहीं लाया जाए। +भूमि दस्तावेज. +समस्या : स्थानीय सरकारी कर्मचारियों द्वारा भूमि दस्तावेजों के साथ बड़े पैमाने पर छेड़-छाड़ और धोखाधड़ी होती है। ऐसे कई मामले सामने आये हैं जिनमें ज़मीन के ग़रीब मालिक की जानकारी के बगैर ही उसकी ज़मीन किसी दूसरे व्यक्ति के नाम हस्तांतरित कर दी गई। इसके अलावा भूमि दस्तावेज के कार्यालयों से कोई जानकारी हासिल करना भी टेढ़ी खीर है। कार्यालय से काम करा लेना तो और भी कठिन है। +सुझाव : भूमि से संबंधित सभी दस्तावेजों की देख-रेख व उन पर कार्य ग्राम सभा की देख रेख में पंचायत कार्यालय द्वारा किये जाने चाहिए। हर महीनेए होने वाले हस्तांतरण की सूची ग्राम सभा की ओर से प्रकाशित होनी चाहिए। +प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण. +समस्या : सदियों से स्थानीय लोग प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग करते थे और उनके संरक्षण की ज़िम्मेदारी भी उठाते थे। अंग्रेज़ों के ज़माने से नदीए जंगलए खदान आदि पर सरकारों का नियंत्रण शुरू हुआ। तभी से इन प्राकृतिक संसाधनों का जमकर शोषण भी शुरू हुआ और स्थानीय लोगों को विस्थापित किया जाने लगा। आज़ादी के बाद भी यह प्रक्रिया जारी रही। पिछले कुछ वर्षों से स्थानीय लोगों की ज़मीनें छीन करए उन्हें विस्थापित करके प्राकृतिक संसाधनों के शोषण में भारी तेज़ी आई है। जैसा कि इस पुस्तक में पहले लिखा जा चुका हैए हमारी सरकारें तेज़ी के साथ औने पौने दामों में प्राकृतिक संसाधनों को ठेकेदारों और कंपनियों को बेच रहीं हैं। +सुझाव : ग्राम सभा को उसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी छोटे जल स्त्रेतोंए छोटे मोटे खनिजों और छोटे मोटे वन उत्पादों का मालिक बनाया जाए। इसके साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी प्रभावित ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना किसी को भी ज़मीनए जंगलए खदानों और नदियों से जुड़े बड़े संसाधनों के किसी प्रकार से दोहन का अधिकार न दिया जाए। ग्राम सभाएं यह फैसला करें कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की अनुमति दी जाए या नहीं और अगर दी जाए तो किन शर्तों और नियमों के साथ। अगर इन शर्तों का भविष्य में कभी उल्लंघन होता हुआ नज़र आये तो ग्राम सभा को यह अधिकार होना चाहिए कि वह संबंधित प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए दी गई अनुमति को निरस्त कर दे। ऐसी अवस्था में पर्यावरण एवं समुदाय को हुए नुकसान के लिए संबंधित औद्योगिक इकाई की ओर से क्षतिपूर्ति की जाएगी। +जैसा कि इस पुस्तक में पहले कहा गया है कि सभी प्राकृतिक संसाधन इस देश की धरोहर हैं। उनका राष्ट्र और जनहित में कैसे प्रयोग हो- इस बारे में देश भर की ग्राम सभाओं में चर्चा के बाद राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां बनें। भविष्य में अपने इलाके में किसी भी योजना के लिए ग्राम सभाएं इन नीतियों के अनुरूप अनुमति दें। +एस डी एम कार्यालय में भ्रष्टाचार. +समस्या : लोगों को विभिन्न प्रकार के प्रमाण पत्र बनवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है और तमाम तरह की परेशानियां भी उठानी पड़ती हैं। +सुझाव : जातिए आयए निवास स्थान आदि से संबंधित प्रमाण पत्र पंचायतों के द्वारा जारी किए जाएं। अगर पंचायत सचिव अपने काम में ढिलाई बरते तो ग्राम सभा की अगली बैठक में उससे पूछताछ की जा सकती है। +कर उगाही. +समस्या : हमारे देश में करों की उगाही और उन्हें खर्च करने का बहुत ही अवैज्ञानिक तरीका अपनाया जा रहा है। अधिकतर करों को केन्द्र और राज्य सरकारें इकट्ठा करती हैं और फिर उन्हें विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नीचे भेजा जाता है। इस व्यवस्था में दो जगह रिसाव होता हैए पहला तो कर उगाही के स्तर पर जब पैसा ऊपर की ओर जाता है और दूसरा खर्च करते समय जब पैसा नीचे की ओर आता है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि क्यों नहीं कुछ करों को स्थानीय स्तर पर ही इकट्ठा करके खर्च किया जाता है? +सुझाव : अनुभव यह बताता है कि अगर कर उगाही में लोगों को प्रत्यक्ष रूप से शामिल किया जाए और लोगों को अपने द्वारा दिए गए करों से होने वाले सीधे-सीधे फायदे समझ आ जाएं तो करों की उगाही बहुत बेहतर हो जाती है। +इसलिए जहां तक संभव हो सके विभिन्न प्रकार के करों की उगाही में ग्राम सभा की सेवाएं ली जानी चाहिए। ग्राम सभा चूंकि उन्हीं लोगों की एक प्राथमिक इकाई है जिनके सामूहिक लाभ के लिए कर लिया जाना हैए इस कारण कर उगाही करने और उसे खर्च करने के लिए ग्राम सभा से बेहतर और कोई दूसरी सरकारी या गैर सरकारी संस्था नहीं हो सकती। इस कारण हम निम्न बातों का सुझाव देते हैं - +राज्य सरकार को निम्न सूचियां बनानी चाहिए - +(क) वे कर जिन्हें राज्य सरकार द्वारा लगाया और इकट्ठा किया जाएगा। +(ख) वे कर जिन्हें राज्य सरकार द्वारा लगाया जाएगा लेकिन उन्हें इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी पंचायत के निर्दिष्ट स्तर की होगी। +(ग) वे कर जिन्हें निर्दिष्ट उच्च स्तरीय पंचायत द्वारा लगाया जाएगा लेकिन उन्हें इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी पंचायत के निर्दिष्ट निचले स्तर की होगी। +(घ) वे कर जिन्हें लगाने और इकट्ठा करने का काम पंचायत के एक ही निर्दिष्ट स्तर के द्वारा किया जाएगा। ज़्यादा से ज़्यादा कर कोशिश करके इस सूची में डाले जाएं ताकि पंचायत का हर स्तर वित्तीय रूप से स्वायत्त बन सके। +ग्राम सभा की संपत्ति से होने वाली आय एवं वहां से इकट्ठा होने वाले करों को सीधे पंचायत के खाते में जमा कराया जाना चाहिए। मंडी द्वारा इकट्ठा किये गये शुल्क का भी कुछ हिस्सा ग्राम पंचायतों को सौंपा जाना चाहिए। +कई गांवों को एक पंचायत में मिलाना. +समस्या : दूर दराज के कई गांवों को एक पंचायत में समाहित कर दिया जाता है। इसके चलते लोगों का ग्राम सभा की बैठकों में भाग लेना मुश्किल हो जाता है। फिर सभी गांव एक-दूसरे से काफी अलग होते हैं। यहां तक कि आस-पड़ोस के गांव भी अपने रहन-सहनए जातीय समीकरणए आर्थिक व्यवस्था एवं संसाधनों आदि की दृष्टि से काफी अलग होते हैं। उनकी समस्याएं अलग हैंए इसलिए उनके समाधान भी अलग होंगे। कई मामलों में पाया गया है कि पड़ोसी गांवों में कई पुश्तों से दुश्मनी चली आ रही होती है। इन सब पहलुओं के साथ जब गांवों के बीच की लंबी दूरी और परिवहन का अभाव जैसे कारण जुड़ जाते हैं तो एक पंचायत में आने वाले सभी गांवों की सामूहिक ग्राम सभा में लोगों का आ पाना लगभग असंभव हो जाता है। +सुझाव : प्रत्येक गांव कोए भले ही वह छोटा ही क्यों न होए एक अलग पंचायत घोषित किया जाना चाहिए। यदि आस-पड़ोस के दो या उससे अधिक गांवों की ग्राम सभाएं आपस में मिलकर एक पंचायतध ग्राम सभा होने का फैसला करें तभी उन्हें मिलाकर एक पंचायत का दर्जा दिया जाना चाहिए। आदिवासी इलाकों में पेसा क़ानून के तहत ऐसा ही प्रावधान है। अतः गैर आदिवासी क्षेत्रें में भी ऐसा प्रावधान किया जाना चाहिए। +ब्लॉक एवं ज़िला स्तरीय पंचायतों का गठन. +समस्या : वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत किसी इलाके में आने वाली सभी निचली पंचायतों के अध्यक्ष ऊपरी स्तर की पंचायत के सदस्य होते हैं। इसके अलावा ब्लॉक एवं ज़िला पंचायतों के लिए कुछ सदस्यों का सीधे जनता के द्वारा चुनाव भी होता है। अनुभव बताता है कि इन चुने हुए सदस्यों की वजह से ब्लॉक अथवा ज़िला स्तर की पंचायतों की कार्यप्रणाली में किसी भी तरह का सुधार हुआ हो - ऐसा कहीं दिखाई नहीं देता। उल्टे इन्होंने भ्रष्टाचार को ही बढ़ाया है। जब कभी मध्य स्तरीय या ज़िला स्तरीय पंचायत अध्यक्षों के ख़िलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता हैए तब अधिकतर सदस्य अपने मतों की बोली लगाने में व्यस्त हो जाते हैं। कई मामलों में तो अध्यक्षों को अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए इन सदस्यों को नियमित रूप से पैसा देना पड़ता है। इसके अलावा ये सदस्य अपने चुनावों के दौरान बेतहाशा पैसा खर्च करते हैं। चूंकि उनका चुनाव क्षेत्र काफी बड़ा होता हैए इसलिए वे ग्राम पंचायतों के मुखिया या प्रधान की तुलना में कई गुना अधिक पैसा खर्च करते हैं। स्पष्ट है कि चुनावों में खर्च सारा पैसा वे अपनी जीत के बाद ब्याज समेत वसूल करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। +सुझावर : माध्यमिक एवं ज़िला स्तरीय पंचायतों में सीधे निर्वाचित सदस्यों की व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए। केवल निचली पंचायतों के प्रतिनिधियों को ही ऊपरी स्तर की पंचायतों में सदस्य बनाया जाना चाहिए। इस तरह ग्राम सभा उच्च स्तरीय पंचायतों को अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से सीधे नियंत्रित करने या उससे सवाल-जवाब करने में भी सक्षम हो पाएगी। तो एक ब्लॉक के सभी सरपंचों को ब्लॉक पंचायत का सदस्य बनाया जाए। वे लोग अपने बीच में से किसी एक को ब्लॉक अध्यक्ष के रूप में चुन लेंगे। इसी प्रकार सभी ब्लॉक अध्यक्षों को ज़िला पंचायत का सदस्य बनाया जाना चाहिए और वे फिर अपने में से किसी एक को ही ज़िला पंचायत अध्यक्ष के रूप में चुन लें। ग्राम पंचायत का सरपंच ग्राम सभा और ब्लॉक पंचायत के बीच एक कड़ी का काम करे। ग्राम सभा के फैसलों से वह ब्लॉक पंचायत को अवगत कराये और ब्लॉक पंचायत के फैसलों से वह ग्राम सभा को परिचित कराये। इस तरह सरपंच के माध्यम से ग्राम सभा ब्लॉक स्तर पर हो रही गतिविधियों को नियंत्रित कर पाएगी। इसी व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए ब्लॉक पंचायतों के अध्यक्ष ब्लॉक पंचायत और ज़िला पंचायत के बीच एक कड़ी के रूप में काम करेंगे। +दस्तावेजों की पारदर्शितारू +समस्या : सूचना के अधिकार के बावजूद सभी स्तरों की पंचायतों की कार्यप्रणाली एवं उनके फैसलों के बारे में जानकारी हासिल करना मुश्किल होता है। कई इलाकों में जिन लोगों ने पंचायतों के काम-काज के संबंध में सरपंचों और अधिकारियों से जानकारी मांगी हैए उन्हें प्रताड़ित करने के तमाम मामले सामने आ रहे हैं। पुलिस और मुखिया की मिलीभगत से उन्हें झूठे मामलों में फंसा देना आम बात हो गयी है। कई जगह तो उन पर जानलेवा हमला भी किया गया है। +सुझाव : पंचायत के सभी स्तरों द्वारा किये जा रहे काम-काज में पारदर्शिता लाने के लिए पंचायतों के दस्तावेजों को पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। ग्रामए ब्लॉक और ज़िला पंचायतों के सभी दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार बिना कोई आवेदन दिए इन दस्तावेजों का निरीक्षण कर सके। इसके लिए प्रत्येक सप्ताह में काम-काज के दो दिनों के दौरान निश्चित समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति दस्तावेजों के किसी हिस्से की प्रतिलिपि लेना चाहे तो उससे क्षेत्र में प्रचलित फोटो कॉपी का शुल्क लेकर एक सप्ताह के अंदर मांगी गई प्रतिलिपी उपलब्ध करायी जानी चाहिए। किसी प्रकार का उल्लंघन होने पर ग्राम सभा को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने दोषी कर्मचारियों को दण्डित कर सके। +लोकपाल की व्यवस्था होरू +समस्या : आज यदि पंचायती राज क़ानून के प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा होए या ग्राम सभा के काम-काज को ठीक ढंग से न चलने दिया जा रहा होए या समाज के किसी वर्ग विशेष को ग्राम सभा की बैठक में शामिल होने से रोका जा रहा होए या फिर ग्राम सभा की कार्यवाही का लिखित विवरण (मिनिट्स) ठीक ढंग से न तैयार हो रहा होए ऐसी स्थितियों से निपटने का कोई प्रभावी तरीका वर्तमान क़ानून में नहीं है। ऐसे मामलों में ज़िलाधिकारी को कार्रवाई करनी होती है जो अक्सर स्थानीय नेताओं के दबाव में आकर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करते। +इस बात की भी आशंका व्यक्त की जाती है कि कई इलाकों में उच्च जाति के लोग दलितों को ग्राम सभा की बैठकों में बैठने से ही मना कर देंगे। यदि उन्हें अनुमति दे भी दी गयी तो उन्हें बोलने नहीं दिया जाएगा और अगर बोलने दिया गया तो उनकी मांगों को बैठक के लिखित विवरण अर्थात मिनिट्स में शामिल ही नहीं किया जाएगा। +सुझाव : इसलिए हमारा प्रस्ताव है कि इस प्रकार की शिकायतों को सुनने और उन पर समयबद्ध कार्रवाई करने के लिए लोकपाल का गठन किया जाना चाहिए। केरल में ऐसी संस्था अस्तित्व में भी हैए जिसके अच्छे परिणाम निकले हैं। +हमारा सुझाव है कि राज्य स्तर पर लोकपाल की नियुक्ति होनी चाहिए। लोकपाल का काम होगा कि पंचायती क़ानून के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों और संबंधित विवादों का निपटारा करने के साथ-साथ इसके विभिन्न प्रावधानों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए वो कदम उठाएं। +इसके चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और जन सहभागिता पर आधारित होनी चाहिए। प्रभावी रूप से और समयबद्ध होकर काम करने के लिए इसे सभी आवश्यक अधिकार और संसाधन दिए जाने चाहिए। +यदि कोई यह शिकायत करे कि उसके गांव में ग्राम सभा की बैठक नियमित रूप से नहीं हो रही हैए या कुछ लोगों को उनमें बैठने या बोलने नहीं दिया जा रहा या उनकी बातों को मिनिट्स में नहीं लिखा जा रहा तो ऐसी स्थिति में लोकपाल को चाहिए कि वह इस शिकायत की जांच करे और यदि शिकायत सच्ची पायी जाए तो वह या तो स्वयं या अपने किसी प्रतिनिधि की उपस्थिति में उस गांव में ग्राम सभा की बैठक का आयोजन करे और साथ ही यह भी सुनिश्चित करे कि ऐसी बैठकें आगे भी होती रहें। +राज्य सरकार के हस्तक्षेप पर रोक लगे. +समस्या : वर्तमान पंचायती राज क़ानूनों के अंतर्गत राज्य सरकारें समय-समय पर पंचायतों को कोई भी दिशा निर्देश दे सकती हैं। इसके चलते पंचायतें राज्य सरकार के एक निकम्मे विभाग के रूप में तब्दील हो गयी हैं। लोगों से परामर्श करने या उनका दुख-सुख सुनने की बजाए सरपंच या ग्राम प्रधान राज्य सरकार के निर्देशों का पालन करने में ही व्यस्त रहते हैं। ग्राम सभाएं किस-किस तारीख को होंगीए उनका एजेंडा क्या होगाए विभिन्न समितियों का गठन कब होगा तथा उनकी संरचना और काम-काज की प्रक्रिया क्या होगीए ऐसे तमाम फैसले गांव में नहीं बल्कि राज्य सरकार के सचिवालय में लिए जाते हैं। राज्य की कोशिश होती है कि लोगों के जीवन से जुड़े छोटे से छोटे फैसले भी वह खुद ही करे। इसका परिणाम यह हुआ कि लोग अपना उद्यम भूल गए और साथ ही पंचायतों एवं ग्राम सभाओं की आज़ादी भी खत्म हो गयी। +सुझाव : पंचायतों को निर्देश देने का अधिकार राज्य सरकार से वापस ले लिया जाना चाहिए। पंचायतों को प्रशासन का तीसरा स्वतंत्र ढांचा माना जाना चाहिए। बहुत हुआ तो राज्य सरकारों की ओर से पंचायतों को कुछ सुझाव दिया जा सकता हैए लेकिन पंचायतों को बार-बार आदेश देकर उनके दैनिक काम-काज में हस्तक्षेप की छूट राज्य सरकारों को कदापि नहीं होनी चाहिए। +लाभार्थी सभाओं का गठन हो. +समस्या : मान लीजिए 100 लोगों के गांव में दस लोग ही राशन लेते हैं। यदि सभी 100 लोगों से राशन व्यवस्था के बारे में पूछा जाए तो बाकी 90 लोग ग़लत बोल सकते हैं। +सुझाव : इस समस्या को कुछ हद तक लाभार्थी सभाओं की अवधारणा से सुलझाया जा सकता है। लाभार्थी सभाओं में उन लोगों को शामिल किया जाएगा जो ग्राम सभा के किसी विशेष निर्णय से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हों। उपर्युक्त उदाहरण में दस राशन लेने वाले लोग मिलकर लाभार्थी सभा बनाएंगे। इसी तरह मान लीजिए कि ग्राम सभा कोई सड़क बनाने का निर्णय लेती हैए तो उस सड़क के दोनों ओर रहने वाले लोग लाभार्थी सभा के सदस्य माने जाएंगे। सड़क ठीक ढंग से बनायी गयी है या नहींए इसका फैसला संबंधित लाभार्थी सभा द्वारा किया जाएगा। लाभार्थी सभाओं द्वारा लिए गए निर्णय को ग्राम सभा का ही निर्णय माना जाएगा। +नगर स्वराज भी ज़रूरी. +किसी भी गांव में रहने वाले लोगों की आम सभा को ग्राम सभा कहते हैं। ऐसा हमारे संविधान में लिखा है। यद्यपि संविधान में ग्राम सभा का ज़िक्र तो है फिर भी ग्राम सभाओं को कोई अधिकार नहीं दिये गये हैं। स्वराज के तहत हमारा मानना है कि सरकारी फ़ंडए सरकारी कर्मचारीए सरकारी नीतियांए क़ानून बनाने की प्रक्रिया और प्राकृतिक संसाधनों पर ग्राम सभाओं के ज़रिए सीधे जनता का नियंत्रण बने। दुर्भाग्यवश शहरों में रहने वाले लोगों की आम सभा को न तो संवैधानिक मान्यता है और न ही किसी क़ानून में मान्यता है। इसके लिए अलग से नया क़ानून बनाना पड़ेगा। +दिल्ली के प्रयोग. +यह सच है कि मोहल्ला सभाओं को अभी क़ानूनी मान्यता नहीं मिली है। लेकिन कई स्थानों पर नागरिकों ने अपनी पहल पर इनकी शुरुआत कर दी है। इनमें दिल्ली का प्रयोग उल्लेखनीय है। पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाकों में एक लंबे समय से स्वराज अभियान की पहल पर मोहल्ला सभाएं आयोजित की जा रही हैं। स्थानीय मामलों में सरकारी निर्णय वहां की जनता ले रही है। नेता और अफ़सर उन्हें लागू करवाने में जुटे हैं। यह अद्भुत कार्य दिल्ली नगर निगम के त्रिलोकपुरी और सुंदरनगरी वार्ड में हो रहा है। यहां प्रत्येक वार्ड को 10 मोहल्लों में बांट दिया गया है। प्रत्येक मोहल्ला सभा महीने या दो महीने में एक बार बैठती है। +मोहल्ला सभा की बैठकों में पार्षद और नगर निगम के अन्य स्थानीय अधिकारी उपस्थित रहते हैं। निगम के पैसे का इस्तेमाल मोहल्ले में कहां और कैसे करना हैए इसका फैसला लोग मिलकर मोहल्ला सभा में करते हैं। इसके पहले ये सारे निर्णय कुछ अफ़सर और नेता बंद कमरों में बैठ कर लिया करते थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि मोहल्ला सभा का कोई भी नागरिक बैठक में पहुंचकर पानी-बिजली-सड़क जैसी किसी भी समस्या को उठा सकता है। उसकी मांग को बैठक में उपस्थित पार्षद और अधिकारी नोट करते हैं तथा उसके लिए फ़ंड आवंटित किया जाता है। यदि कामों की फेहरिस्त लंबी हो गयी और उसे पूरा करने लायक फ़ंड न हुआ तो मौके पर ही वोटिंग कराके तय किया जाता है कि कामों को किस प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए। +त्रिलोकपुरी और सुंदरनगरी के पार्षदों ने घोषणा कर दी है कि उनके क्षेत्र में हुए किसी काम के लिए ठेकेदार को तभी भुगतान किया जाएगाए जब मोहल्ला सभा किए गए काम को लेकर अपनी संतुष्टि ज़ाहिर कर दे। इस निर्णय से इलाके में होने वाले कामों की गुणवत्ता में बहुत सुधार हुआ है। +सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के अंतर्गत वृद्धा पेंशनए विकलांगता पेंशन और विधवा पेंशन जैसे कई लाभों को प्राप्त करने वाले नागरिकों की सूची इन मोहल्ला सभाओं में खुले आम बनायी जाती है। लोग पूरी पारदर्शिता के साथ यह चर्चा करते हैं कि उनमें से सबसे गरीब कौन है और किसे इन योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए। पहले ये लाभ पार्षद के नज़दीकी या परिचित लोगों को ही मिल पाते थे। +दिल्ली के उपराज्यपाल ने अपने वार्ड में मोहल्ला सभा कराने वाले पार्षदों को बधाई दी है। उन्होंने इलाके के पुलिस अधिकारियों को भी मोहल्ला सभा में उपस्थित रहने का आदेश दिया है। साथ ही उन्होंने नगर निगम आयुक्त से कहा है कि ऐसी सभाएं दिल्ली के अन्य इलाकों में करवाने का प्रयास हो। +केन्द्र सरकार की पहल. +मोहल्ला सभाओं को क़ानूनी मान्यता और अधिकार देने की मांग अब चारों ओर उठने लगी है। गत वर्ष केन्द्र सरकार की ओर से सभी राज्य सरकारों को ‘नगर राज बिल’ का एक प्रारूप भेजा गया था और यह अनुरोध किया गया था कि वे अपने विवेकानुसार आवश्यक संशोधन के बाद इसे अपनी विधान सभाओं में पारित करवाएं। केन्द्र सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम एक बड़ी घटना थी। ऐसा पहली बार हुआ था कि शहरों में मोहल्ला सभा के नाम से नागरिकों की एक नई इकाई को मान्यता दी गयी। लेकिन दुख की बात है कि केन्द्र सरकार के प्रारूप में मोहल्ला सभाओं को कोई वास्तविक अधिकार नहीं दिया गया। +केन्द्र सरकार द्वारा भेजे गए वर्तमान नगर राज विधेयक के प्रारूप से अपनी असहमति प्रकट करते हुए देश के कुछ गणमान्य नागरिक जैसे उच्चतम न्यायालय के वकील प्रशांत भूषणए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजा़रेए मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एसण्सीण् बहर आदि ने मिलकर नगर राज विधेयक का एक नया प्रारूप तैयार किया है। आइए जानते हैंए नगर राज बिल के उन मुख्य प्रावधानों को जिन्हें देश के प्रमुख नागरिक क़ानून का रूप दिए जाने की मांग कर रहे हैं। +प्रस्तावित क़ानून के मुख्य प्रावधान. +(क) शहर के किसी एक निश्चित इलाके में रहने वाले तीन हज़ार लोगों (मतदाताओं) को मिलाकर एक मोहल्ला सभा का गठन किया जाना चाहिए। यदि शहर के किसी वार्ड की जनसंख्या तीन हज़ार से अधिक हो तो प्रत्येक तीन हज़ार की जनसंख्या पर एक मोहल्ला सभा का गठन किया जाए। संबंधित मोहल्ला सभा के भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले सभी मतदाताओं को मोहल्ला सभा का सदस्य माना जाना चाहिए। +(ख) प्रत्येक मोहल्ला सभा के एक प्रतिनिधि को राज्य निर्वाचन आयोग की मदद से चुना जाना चाहिए। +(ग) एक वार्ड में स्थित सभी मोहल्ला सभाओं के प्रतिनिधियों को मिलाकर वार्ड कमेटी बनायी जाए। इस वार्ड कमेटी की अध्यक्षता संबंधित वार्ड के पार्षदधसभासद द्वारा की जाए। +(घ) मोहल्ले से जुड़े सभी मामलों का प्रबंधन मोहल्ला सभा द्वारा किया जाए। सभी मोहल्ला सभाओं से संवाद और सहमति के माध्यम से वार्ड कमेटी वार्ड से जुड़े सभी मामलों का प्रबंधन करे। +(घ) मोहल्ला सभा की बैठकों की अध्यक्षता मोहल्ला सभा के प्रतिनिधि द्वारा हो। उसे मोहल्ला सभा और वार्ड कमेटी के बीच संवाद का माध्यम बनना चाहिए। मोहल्ला सभा के सभी निर्णयों को मानना उसके लिए अनिवार्य होगा। वह मोहल्ला सभा की अनदेखी करके कोई निर्णय नहीं ले सकेगा। +(च) मोहल्ला सभा के सभी निर्णय उसकी हर महीने होने वाली खुली बैठकों में लिए जाने चाहिए। यदि कोई निर्णय खुली बैठक की बजाए कहीं और लिया गया है तो उसकी मंज़ूरी खुली बैठक में ली जानी चाहिए। +(क) वार्ड कमेटी के पास राजस्व के स्वतंत्र स्त्रेत होने चाहिए। अपनी मोहल्ला सभाओं से विचार विमर्श करके वार्ड कमेटियां संबंधित वार्ड में कुछ मामलों में कर लगाने और इकट्ठा करने के लिए अधिकृत होनी चाहिए। +(ख) स्थानीय स्तर पर इकट्ठा किए जाने वाले करों के अतिरिक्त वार्ड कमेटियों को नगर पालिकाए राज्य और केन्द्र सरकार की ओर से भी विकास कार्यों के लिए मुक्त फ़ंड दिया जाना चाहिए। +(ग) किसी मोहल्ले में कौन सा कार्य और किस जगह किया जाना हैए इसका निर्णय संबंधित मोहल्ला सभा द्वारा किया जाना चाहिए। +(घ) मोहल्ले में काम करने वाले ठेकेदार को भुगतान तभी किया जाएए जब मोहल्ला सभा की ओर से काम के बारे में संतुष्टि प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया हो। +(क) मोहल्ला सभाओं के सभी निर्णय सामूहिक रूप से मोहल्ला सभाओं में ही लिए जाने चाहिए। मोहल्ला सभा के निर्वाचित प्रतिनिधि और स्थानीय अधिकारियों की ज़िम्मेदारी केवल इन निर्णयों को लागू करने की होनी चाहिए। +(ख) यदि मोहल्ला सभा के प्रतिनिधि या वार्ड सभासद द्वारा मोहल्ला सभा के निर्देशों का पालन नहीं किया जाता तो ऐसी स्थिति में मोहल्ला सभा के पास उन्हें वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। +(ग) मोहल्ला सभा को अपने इलाके में कार्यरत कनिष्ठ अभियंताए प्रधानाध्यापकए राशन की दुकान के संचालकए स्वास्थ्य पर्यवेक्षकए मालीए अस्पताल के मेडिकल सुपरिन्टेडेन्ट आदि के स्तर के स्थानीय अधिकारियों को अपनी बैठकों में उपस्थित रहने का निर्देश देने का अधिकार होना चाहिए। +(घ) यदि स्थानीय सरकारी कर्मचारी जैसे अध्यापकए मालीए सफाईकर्मीए स्वास्थ्यकर्मीए कनिष्ठ अभियंता आदि मोहल्ला सभा के निर्देशों का पालन नहीं करते या अपने काम में लापरवाही बरतते हैंए तो ऐसी स्थिति में मोहल्ला सभा के पास दोषी कर्मचारियों का वेतन रोकने या उन पर जुर्माना लगाने का अधिकार होना चाहिए। कर्मचारियों को दंडित करने के लिए किसी अन्य एजेंसी से पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। +(घ) यदि मोहल्ले में चल रही राशन की दुकान से राशन का उचित ढंग से वितरण नहीं किया जा रहा हो तो मोहल्ला सभा संबंधित राशन की दुकान का लाइसेंस रद्द कर सके। मोहल्ला सभा राशन की दुकान चलाने का लाइसेंस किसी नए व्यक्ति को देने के लिए भी अधिकृत होनी चाहिए। +(क) मोहल्ला सभाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके मोहल्ले में कोई भी व्यक्ति बिना घर के न होए कोई भूखा न सोएए कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे और सभी को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें। +(ख) संबंधित वार्ड में वार्ड कमेटियों के अधिकार और उत्तरदायित्व मोहल्ला सभाओं की तरह ही होने चाहिए। तथापि वार्ड कमेटी के सभी बड़े फैसलों को लागू करने के पहले संबंधित मोहल्ला सभाओं की मंज़ूरी आवश्यक होनी चाहिए। +(ग) मोहल्ले में स्थित झुग्गी झोपड़ियों को तब तक नहीं हटाया जाएए जब तक सरकारी नीतियों के अनुरूप उचित पुनर्वास न कर दिया जाए। पुनर्वास से संबंधित संतुष्टि प्रमाणपत्र संबंधित मोहल्ला सभाओं द्वारा जारी किया जाना चाहिए। +(घ) दिल्ली जैसे महानगरों में स्थित गांवों को उनकी अपनी ज़मीन पर पूरा अधिकार मिलना चाहिए। +कोई भी मोहल्ला सभा दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संबंधित नगरनिगमध नगरपालिका को किसी भी मुद्दे पर विचार करने और निर्णय लेने के लिए कह सकती है। ऐसा प्रस्ताव मिलने पर संबंधित नगर निगम ध नगर पालिका के लिए निर्देशित मुद्दे पर विचार करना और निर्णय लेना ज़रूरी होना चाहिए। +अपनी ग्राम सभा या अपनी मोहल्ला सभा से जुड़िए, बातचीत करिए। +जब भी ग्राम सभाओं और मोहल्ला सभाओं के ज़रिए लोगों को सीधे सत्ता देने की बात की जाती है तो सरकारें कहती हैं कि लोग तो लड़ेंगे। लोग तो विभाजित हैं - धर्म के नाम पर विभाजित हैंए जाति के नाम पर विभाजित हैं। इसीलिए लोगों को सत्ता नहीं दी जा सकती। इतिहास गवाह है कि जब जब आज़ादी की बात की गईए तब तब सत्ताधारियों ने जनता के बीच के विभाजनों को कारण बता कर जनता को सत्ता देने से मना कर दिया। अंग्रेज़ों ने भी जनता के बीच के विभाजनों का सहारा लिया। अक्सर सत्ताधारी लोग जनता के बीच के विभाजनों को पाटने की बजाय और गहरा करते हैं और फिर इन्हीं विभाजनों को कारण बताकर जनता को सत्ता देने से इंकार करते हैं। हमारे नेताए पार्टियां और अफ़सर हमारे देश में धर्म और जाति की राजनीति खेलते हैं और हमारे बीच में विभाजनों को और गहरा करते हैं। इसीलिए पहला काम तो यह करने की ज़रूरत है कि हम सीधे-सीधे नेताओं को कह दें - 'हम अपने विभाजनों को खुद दूर कर लेंगे। लेकिन अब हमें सत्ता वापिस चाहिए। जो सत्ता हमने आपको 26 जनवरी 1950 को दी थीए आपने उसका दुरुपयोग कियाए हम आपसे सत्ता वापिस लेते हैंज्। दूसरा काम हमें यह करना होगा कि अपने समाज के विभाजनों को दूर करने के लिए अभियान चलाने होगें। इसीलिए ज़रूरी है कि हर गांव में ग्राम सभाऐं शुरू हों। +हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कहीं ग्राम सभाएं सरकारी योजनाओं की बंदरबांट करने वाली मीटिंग न बन जाएं। डाण् बीडी शर्मा का कहना है कि ग्राम सभा ‘आप कैसे हो’ से शुरू होनी चाहिए। पहले कुछ देर लोग एक दूसरे का हाल पूछें। ग्राम सभा में लोग अपने घर की समस्याएं रखने को भी स्वतंत्र होने चाहिए। ग्राम सभा लोगों की निजीए पारिवारिकए सामाजिक और गांव से संबंधित सभी समस्याओं की चर्चा करने का एक मंच बने। लोग अपनी समस्याएं बताएं और वहीं समाधान पर भी चर्चा हो। लोग आपस में ही गांव के स्तर पर ही अधिकतर समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करेंगे। जैसेए मान लीजिएए किसी के घर में कोई बीमार है तो ग्राम सभा में बैठकर लोग चर्चा करेंगे कि उसकी मदद कैसे करें। इससे लोग आपस में जुड़ेंगे। ज़्यादा से ज़्यादा लोग ग्राम सभाओं में आने लगेंगे। +यदि आपके गांव का सरपंच हर महीने ग्राम सभाएं बुलाने को तैयार होता है तो अच्छी बात है। अगर वह नहीं बुलाता है तो कोई बात नहीं। आप खुद अपनी ओर से हर महीने एक निश्चित स्थान पर पूरे गांव की सभा बुलानी आरंभ कीजिए। पहले कुछ लोग ही आएंगे। प्रयास करके गांव के दलित परिवारों को ज़रूर बुलाएं। यही ग्राम सभा है। इसमें हर व्यक्ति अपनी हर समस्या रखने को स्वतंत्र हो। समस्याओं के समाधान पर भी चर्चा हो। आपस में मिलकर लोग समाधान ढूंढने की कोशिश करेंगे। लोगों को अपनी समस्याएं रखने का मौका मिलेगा और इनमें से कुछ समस्याओं का भी यदि निवारण होगा- इसी से महीना दर महीना लोगों की संख्या इन सभाओं में बढे़गी। +हर सभा में प्रधान को निमंत्रित किया जाए। यदि दो तीन सभाओं के बाद भी वो नहीं आता तो हर माह सूचना अधिकार के तहत पंचायत द्वारा पिछले माह में किये गये काम-काज के ब्यौरे की जानकारी प्राप्त करके जनता के समक्ष रखी जाए। हर गांव में लोगों की खुली बैठकों का दौर चालू हो - यह अति आवश्यक है। +जिस तरह गांवों में ग्राम सभा की जानी चाहिए उसी प्रकार शहरों में मोहल्ला सभाओं का आयोजन होना चाहिए। आप अपने आसपास के लोगों को इकट्ठा करिए। पहली ज़रूरत है कि लोग एक-दूसरे से जुड़ें। सबके बीच एक सामाजिक रिश्ता स्थापित हो। धीरे-धीरे स्थानीय एवं राष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा होगी। फिर सबसे बातचीत करके स्थानीय वार्ड पार्षद को बुलाइए। उसे मोहल्ला सभा को लेकर चल रहे देश भर में प्रयोगों के बारे में बताइए। वह तैयार हो जाए तो उसके साथ मिलकर नियमित रूप से मोहल्ला सभाओं का आयोजन शुरू करिए। वह साथ नहीं आता तो भी एक जगह मिलने का सिलसिला जारी रखें। इस संबंध में स्वराज अभियान के अंतर्गत चल रहे विभिन्न प्रयोगों से आप बहुत कुछ सीख सकते हैंए जान सकते हैं। लोगों के बीच के विभाजन इसी तरह दूर होगें। जब तक नेताओं और पार्टियों के हाथों में सत्ता हैए वे विभाजन को और गहरा करेंगे। जिस दिन गांव में ग्राम सभाऐं और शहरों में मोहल्ला सभाऐं होनी शुरू हो गईए विभाजन दूर करने की यात्र शुरू हो जायेगी। +ग्राम सभा और मोहल्ला सभा के आयोजन और उसकी कार्यवाही से जुड़े अपने अनुभवों के बारे में हमें फोन करकेए ईमेल भेज कर या पत्र लिखकर ज़रूर बताएं। आपके अनुभवों को जानकर हमारी समझ भी बढ़ेगी। देश की तस्वीर यदि बदलनी है तो हम सभी को मिलजुलकर ही काम करना होगा। +"स्वराज अभियान प्रकाशन"' +"ए-119, प्रथम तल, कौशाम्बी, गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश : 201 010" +"फ़ोन : 0 99687 01659" + +अविकारी श्ब्द्: +अविकरि शब्द पन्च्ह प्रकर के होते हैं - क्रिय विशेश्द, सम्बन्ध्बोधक्, समुचय्बोधक्, विस्मयदिबोधक और अवध्राक्(निपात्)। +क्रिय-विशेषन् +रितिवचक्, स्थानवाचक्, कालवाचक और परिमान्वाचक् सन्बन्ध्बोधक् +योजक्(समुचय्बोधक्) +समनाधिकरन और व्याधिकरन् +ऐन्जला- १५:१३, १४ मार्च २०१३ (UTC) + +मूत्र नमूना (पुरूष): +यह परीक्षण मूत्राशय या मूत्र ग्रंथि में संक्रमण की जाँच के लिये किया जाता है। जाँच के लिये निम्नलिखित चरणों का अनुसरण करें। +1. अपने हाथों को साबुन और पानी से धोयें फिर इन्हें अच्छी तरह से खँगालें और सुखायें। +2. मूत्र नमूना किट का उपयोग करें। किट में एक कप और दो पोंछे होते हैं। +3. आप शौचालय में एक स्थान पर साफ कागज का तौलिया या कपड़ा रखें, जो आपकी पहुँच में हो। +4. पोंछे को खोलकर उसे तोलिये पर रख दें। +5. यदि कप के ढक्कन के सिरे पर स्टीकर लगा हो तो इसे न हटायें क्योंकि यह अंदर से नुकीला होता है। +6. कप के ढक्कन को हटा दें। ढक्कन को समतल दिशा में पोछे के पास रख दें। कप या ढक्कन के अंदरुनी भाग को न छूएँ। +7. अगर आपका खतना नहीं हुआ है तो अपने शिश्न के आगे के भाग की चमड़ी को मोड़ दें। +8. अपने शिश्न के अंतिम सिरे को पोंछे से साफ करें। पोंछा फेंक दें। +9. अपने शिश्न को दूसरे पोंछे से साफ करें। पोंछा फेंक दें। +10. कप को पकड़े। +11. शौचालय में थोड़ी मात्रा में पेशाब करना शुरु करें। +12.कप को मूत्र के प्रवाह की दिशा में रखें। जब तक कप लगभग आधा न भर जाए तब तक इसमें पेशाब जमा करें। +13. कप के ढक्कन को कसकर बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि कप या ढक्कन का अंदरूनी भाग स्पर्श न हो जाएँ। +14. अपने हाथों को धोएँ। +15. अगर आप अस्पताल में हैं तो नमूने को कर्मचारी को सौंपें। अगर आप घर में हैं तो कप को प्लास्टिक की थैली में रखें। थैली को रेफ्रिजेरेटर में रख दें। निर्देशानुसार इसे परीक्षणशाला या डॉक्टर के कार्यालय में ले जाएँ। +परीक्षण का परिणाम आपके डॉक्टर को भेज दिया जाएगा। आपका डॉक्टर परीक्षण के परिणामों की जानकारी आपको देगा। +यदि आपके मन में कोई प्रश्न या कोई चिंता है तो अपने डॉक्टर या नर्स से बात करें। + +मूत्र नमूना (स्त्री): +यह परीक्षण मूत्राशय या मूत्र ग्रंथि में संक्रमण की जाँच के लिये किया जाता है। जाँच के लिये निम्नलिखित चरणों का अनुसरण करें। +1. अपने हाथों को साबुन और पानी से धोंये। इन्हें अच्छी तरह से खँगालें और सुखायें। +2. मूत्र नमूना किट का उपयोग करें। किट में एक कप और दो पोंछे होते हैं। +3. आप शौचालय में जाकर एक स्थान पर साफ कागज का तौलिया या कपड़ा रखें, जो आपकी पहुँच में हो। +4. पोंछे को खोलकर, उन्हें तौलिये पर रख दें। +5. यदि कप के ढक्कन के सिरे पर स्टीकर लगा हो तो इसे न हटायें क्योंकि यह अंदर से नुकीला होता है। +6. कप के ढक्कन को हटा दें। ढक्कन को समतल दिशा में पोंछे के पास रख दें। कप या ढक्कन के अंदरुनी भाग को न छुएँ। +7. शौचालय पर जितना संभव हो पीछे बैठें तथा अपनी दोनों टांगों को फैलाएँ। एक हाथ की दो अंगुलियों का प्रयोग अपनी लेबिया को फैलाने के लिये करें। लेबिया आपकी योनि के दोनों ओर की त्वचा का मोड़ है। अपनी लेबिया को तब तक इसी प्रकार खोलकर रखें जब तक कि आप मूत्र का नमूना प्राप्त न कर लें। +8. अपने दूसरे हाथ से अपनी लेबिया को साफ करने के लिये पोंछे का उपयोग करें। +9. कप को पकड़ें। +10. थोड़ी मात्रा में शौचालय में पेशाब करें और फिर कप को अपने शरीर से कुछ इंच की दूरी पर लगायें। जब तक यह कप लगभग आधा न भर जाए तब तक पेशाब करते रहें। बहाव को रोकें। कप को सिंक के पीछे रखें। लेबिया को छोड़ दें और शौचालय में पेशाब का काम पूरा कर लें। +11. कप के ढक्कन को कसकर बंद कर दें। इस बात का ध्यान रखें कि कप या ढक्कन का अंदरुनी भाग स्पर्श न हो। +12. अपने हाथों को धोएँ। +13. अगर आप अस्पताल में हैं तो नमूने को कर्मचारी को सौंपें। अगर आप घर में हैं तो कप को प्लास्टिक की थैली में रखें। थैली को रेफ्रिजेरेटर में रख दें। निर्देशानुसार इसे परीक्षणशाला या डॉक्टर के कार्यालय में ले जाएँ। +परीक्षण का परिणाम आपके डॉक्टर को भेज दिया जाएगा। आपका डॉक्टर परीक्षण के परिणामों की जानकारी आपको देगा। +यदि आपके मन में कोई प्रश्न अथवा चिंता है तो अपने डॉक्टर अथवा नर्स से बात करें। + +मूत्र-मार्ग का संक्रमण: +मूत्र मार्ग संक्रमण, जिसे UTI भी कहा जाता है, मूत्राशय या गुर्दों का संक्रमण है। +कारण. +UTI निम्नलिखित से कीटाणुओं द्वारा हो सकता है: +आपकी देखभाल. +अपने चिकित्सक को अपने लक्षणों के बारे में बताएँ। आपके उपचार में निम्नलिखित सम्मिलित हो सकते हैं: + +यौन संचारी रोग: +यौन-संचारी रोगों (एसटीडी/STDs) को 'रतिज बीमारियाँ' भी कहा जाता है। ये उन रोगाणुओं से होते हैं जो त्वचा पर या शरीर के तरल पदार्थ जैसे वीर्य, योनिक तरल पदार्थ या खून में रहते हैं। ये रोगाणु किसी संक्रमित व्यक्ति से त्वचा, खून या शरीर के तरल पदार्थों से यौन संपर्क के माध्यम से दूसरे व्यक्ति में पहुँच जाते हैं। ये रोगाणु शरीर में योनि, मुँह, गुदा और खुले घावों या छिली हुई त्वचा से दाखिल हो सकते हैं। एसटीडी अनौपचारिक संपर्क, स्विमिंग पुल में होने से या टॉयलेट सीट पर बैठने से नहीं फैलते। +एसटीडी के लक्षण. +ये लक्षण रोग लगने के दिनों, हफ्तों या महीनों के बाद उत्पन्न हो सकते हैं। कुछ स्त्री-पुरुषों में कोई लक्षण नहीं दिखते पर उनको एसटीडी होता है और वे इसे दूसरों को लगा सकते हैं। +सामान्य लक्षणों में ये शामिल हैं: +एसटीडी के प्रकार. +एसटीडी के सबसे सामान्य प्रकार हैं: +एसटीडी रोकना. +ब्रह्मचर्य अर्थात् 'संभोग न करना' एसटीडी को फैलने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका है। यदि आप संभोग करने का फैसला करें, तो एक ही साथी रखें और हमेशा लेटैक्स कॉन्डॉम, जिन में नोनोग्ज़ीनोल - 9 हो, का उपयोग करें और साथ में शुक्राणु नष्ट करने वाली थैली का उपयोग करें। +परीक्षण. +आप को एसटीडी के लिए परीक्षण करवाना चाहिए यदिः +आप के एसटीडी के परीक्षण आपके चिकित्सक द्वारा या आपके स्थानीय स्वास्थ्य विभाग में हो सकते हैं। एसटीडी के लिए ज्यादातर परीक्षण बेनाम है। +आपकी देखभाल. +ज्यादातर एसटीडीओं का इलाज हो सकता है। कुछ को अच्छा किया जा सकता है, पर बाकी को नहीं। दवाइयाँ लक्षणों को कम करने में और बीमारी को बढने से रोकने में मदद करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं। +आपकी देखभाल के हिस्से के रूप में: + +मेमोग्राम: +मेमोग्राम आपके स्तनों का एक्स-रे है। यह स्तनों के कैंसर की पहचान का सर्वश्रेष्ठ तरीका है। 40 वर्ष की उम्र के बाद अथवा उससे भी पहले, यदि आपको स्तन कैंसर का खतरा हो, तो आपको प्रतिवर्ष मेमोग्राम कराना चाहिए। खतरे के कारणों के संबंध में अपने चिकित्सक से बात करें। +अपने परीक्षण हेतु समय पर आएँ। +परीक्षण के दौरान. +परीक्षण के परिणाम आपके चिकित्सक के पास भेजे जाएँगे। आपके चिकित्सक आपको इनके संबंध में बताएँगे। + +भारत ज्ञानकोश: +यहाँ भारत के बारे में तरह-तरह की जानकारी दी गई है- + +भारत भूमि और उसके निवासी: +Helloभारत मानव जाति के विकास का उद्गम स्थल तथा मानव बोली का जन्म स्थान है और साथ ही साथ यह देश गाथाओं एवमं् प्रचलित परंपराओं का कर्मस्थल तथा इतिहास का जनक है। केवल भारत में ही मानव इतिहास की हमारी सबसे मूल्यवान और शिक्षाप्रद सामग्री खजाने के रूप में सहेजी गई है।
+-मार्क ट्वैन +संसार की प्राचीन एवं महान सभ्यता में भारतीय संस्कृति और सभ्यता बेमिसाल है। यह उत्तर में +हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों से लेकर दक्षिण के ऊष्णकटिबंधीय सघन वनों तक, पूर्व में +उपजाऊ ब्रह्मपुत्र घाटी से लेकर पश्चिम में थार के मरूस्थल तक 32,87,2631 वर्ग कि.मी. में फैला हुआ है। +स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पिछले 62 वर्षों के दौरान हमारे देश ने सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से बहु +आयामी प्रगति की है। भारत इस समय खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर है; तथा विश्व के +औद्योगिक क्षेत्र में इसका दसवां स्थान है। जनहित के लिए प्रकृति पर विजय पाने हेतु अंतरिक्ष में जाने +वाले देशों में इसका छठा स्थान है। विश्व के इस सातवें विशालतम् देश को पर्वत तथा समुद्र शेष एशिया +से अलग करते हैं, जिससे इसका अलग भौगोलिक अस्तित्व है। इसके उत्तर में महान हिमालय पर्वत है, +जहां से यह दक्षिण में बढ़ता हुआ कर्क रेखा तक जाकर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में अरब +सागर के बीच हिंद महासागर से जा मिलता है। +यह पूर्णतया उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। इसकी मुख्य भूमि 804” और 3706” उत्तरी अक्षांश और +6807” और 97025” पूर्वी देशांतर के बीच फैली हुई है। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक 3,214 +कि.मी. और पूर्व से पश्चिम तक 2,933 कि.मी. है। इसकी भूमि सीमा लगभग 15,200 कि.मी. है। +मुख्य भूमि, लक्षद्वीप समूह और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के समुद्र-तट की कुल लंबाई 7,516.6 +कि.मी. है। +प्राकृतिक पृष्ठभूमि. +भारत के सीमावर्ती देशों में उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान और अफगानिस्तान हैं। उत्तर में चीन, नेपाल और +भूटान हैं। पूर्व में म्यांमार और पश्चिम बंगाल के पूर्व में बंगलादेश स्थित है। मन्नार की खाड़ी और पाक +जलडमरूमध्य भारत को श्रीलंका से अलग करते हैं। +प्राकृतिक संरचना. +मुख्य भूमि चार भागों में बंटी है- विस्तृत पर्वतीय प्रदेश, सिंधु और गंगा के मैदान, रेगिस्तानी क्षेत्र और दक्षिणी प्रायद्वीप। +हिमालय की तीन शृंखलाएं हैं, जो लगभग समानांतर फैली हुई हैं। इसके बीच बड़े-बड़े पठार +और घाटियां हैं, इनमें कश्मीर और कुल्लू जैसी कुछ घाटियां उपजाऊ, विस्तृत और प्राकृतिक सौंदर्य से +भरपूर हैं। संसार की सबसे ऊंची चोटियों में से कुछ इन्हीं पर्वत शृंखलाओं में हैं। अधिक ऊंचाई के +कारण आना-जाना केवल कुछ ही दर्रों से हो पाता है, जिनमें मुख्य हैं- चुंबी घाटी से होतेजड हुए मुख्य +भारत-तिब्बत व्यापार मार्ग पर जेलप-ला और नाथू-ला दर्रे, उत्तर-पूर्व दार्जिलिंग तथा कल्पा (किन्नौर) +के उत्तर-पूर्व में सतलुज घाटी में शिपकी-ला दर्रा। पर्वतीय दीवार लगभग 2,400 कि.मी. की दूरी तक +फैली है, जो 240 कि.मी. से 320 कि.मी. तक चौड़ी है। पूर्व में भारत तथा म्यांमार और भारत एवं +बंगलादेश के बीच में पहाड़ी शृंखलाओं की ऊंचाई बहुत कम है। लगभग पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई +गारो, खासी, जैंतिया और नगा पहाडि़यां उत्तर से दक्षिण तक फैली मिज़ो तथा रखाइन पहाडि़यों की +शृंखला से जा मिलती हैं। +सिंधु और गंगा के मैदान लगभग 2,400 कि.मी. लंबे और 240 से 320 कि.मी. तक चौड़े हैं। ये तीन +अलग-अलग नदी प्रणालियों-सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के थालों से बने हैं। ये संसार के विशालतम सपाट कछारी +विस्तारों और पृथ्वी पर बने सवार्धिक घने क्षेत्रों में से एक हैं। दिल्ली में यमुना नदी और बंगाल की खाड़ी के +बीच लगभग 1,600 कि.मी. की दूरी में केवल 200 मी. की ढलान है। +रेगिस्तानी क्षेत्रों को दो भागों में बांटा जा सकता है- विशाल रेगिस्तान और लघु रेगिस्तान। +विशाल रेगिस्तान कच्छ के रण के पास से उत्तर की ओर लूनी नदी तक फैला है। राजस्थान-सिंध की पूरी +सीमा रेखा इसी रेगिस्तान में है। लघु रेगिस्तान जैसलमेर और जोधपुर के बीच में लूनी नदी से शुरू होकर +उत्तरी बंजर भूमि तक फैला हुआ है। इन दोनों रेगिस्तानों के बीच बंजर भूमि क्षेत्र है, जिसमें पथरीली +भूमि है। यहां कई स्थानों पर चूने के भंडार हैं। +दक्षिणी प्रायद्वीप का पठार 460 से 1,220 मीटर तक के ऊंचे पर्वत तथा पहाडि़यों की शृंखलाओं +द्वारा सिंधु और गंगा के मैदानों से पृथक हो जाता है। इसमें प्रमुख हैं- अरावली, विंध्य, सतपुड़ा, मैकाल +और अजंता। प्रायद्वीप के एक तरफ पूर्वी घाट है, जहां औसत ऊंचाई 610 मीटर के करीब है और दूसरी +तरफ पश्चिमी घाट, जहां यह ऊंचाई साधारणतया 915 से 1,220 मीटर है, कहीं-कहीं यह 2,440 मीटर +से अधिक है। पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच समुद्र तट की एक संकरी पट्टी है, जबकि पूर्वी +घाट और बंगाल की खाड़ी के बीच चौड़ा तटीय क्षेत्र है। पठार का यह दक्षिणी भाग नीलगिरि की +पहाडि़यों से बना है, जहां पूर्वी और पश्चिमी घाट मिलते हैं। इसके पार फैली कार्डामम पहाडि़यां +पश्चिमी घाट का विस्तार मानी जाती हैं। +भू-तत्वीय संरचना. +भू-तत्वीय संरचना भी प्राकृतिक संरचना की तरह तीन भागों में बांटी जा सकती है- हिमालय तथा +उससे संबद्ध पहाड़ों का समूह, सिंधु और गंगा का मैदान तथा प्रायद्वीपीय भाग। +उत्तर में हिमालय पर्वत का क्षेत्र और पूर्व में नगा-लुशाई पहाड़, पर्वत निर्माण प्रक्रिया के क्षेत्र हैं। +इस क्षेत्र का बहुत-सा भाग, जो अब संसार में कुछ मनोरम पर्वतीय दृश्य प्रस्तुत करता है, लगभग 60 +करोड़ वर्ष पहले समुद्र था। लगभग सात करोड़ वर्ष पहले शुरू हुई पर्वत निर्माण प्रक्रिया के क्रम में +तलछट और चट्टानों के तल बहुत ऊंचे उठ गए। उन पर मौसमी और कटाव तत्वों ने काम किया, +जिससे वर्तमान उभार अस्तित्व में आए। सिंधु और गंगा के विशाल मैदान कछारी मिट्टी के भाग हैं, जो +उत्तर में हिमालय को दक्षिण के प्रायद्वीप से अलग करते हैं। +प्रायद्वीप अपेक्षाकृत स्थायी और भूकंपीय हलचलों से मुक्त क्षेत्र है। इस भाग में प्रागैतिहासिक +भारत भूमि और उसके निवासी 3 +काल की लगभग 380 करोड़ वर्ष पुरानी रूपांतरित चट्टानें हैं। शेष भाग में गोंडवाना का कोयला क्षेत्र +तथा बाद में मिट्टी के जमाव से बना भाग और दक्षिणी लावे से बनी चट्टानें हैं। +नदियाँ. +भारत की नदियां चार समूहों में वर्गीकृत की जा सकती हैं-(1) हिमालय की नदियां, (2) प्रायद्वीपीय +नदियां, (3) तटीय नदियां और (4) अंतस्थलीय प्रवाह क्षेत्र की नदियां। +हिमालय की नदियां बारहमासी +हैं, जिन्हें पानी आमतौर से बर्प पिघलने से मिलता है। इनमें वर्षभर निर्बाध प्रवाह रहता है। मानसून के +महीनों में हिमालय पर भारी वर्षा होती है, जिससे नदियों में पानी बढ़ जाने के कारण अक्सर बाढ़ आ जाती +है। दूसरी तरफ, प्रायद्वीप की नदियों में सामान्यत— वर्षा का पानी रहता है, इसलिए पानी की मात्रा घटती- +बढ़ती रहती है। अधिकांश नदियां बारहमासी नहीं हैं। तटीय नदियां, विशेषकर पश्चिमी तट की, कम लंबी +हैं और इनका जलग्रहण क्षेत्र सीमित है। इनमें से अधिकतर में एकाएक पानी भर जाता है। पश्चिमी राजस्थान +में नदियां बहुत कम हैं। इनमें से अधिकतर थोड़े दिन ही बहती हैं। +सिंधु और गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना नदियों से हिमालय की मुख्य नदी प्रणालियां बनती हैं। सिंधु नदी +विश्व की बड़ी नदियों में से एक है। तिब्बत में मानसरोवर के निकट इसका उद्गम स्थल है। यह भारत +से होती हुई पाकिस्तान जाती है और अंत में कराची के निकट अरब सागर में मिल जाती है। भारतीय क्षेत्र +में बहने वाली इसकी प्रमुख सहायक नदियों में सतलुज (जिसका उद्गम तिब्बत में होता है), व्यास, +रावी, चेनाब और झेलम हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना अन्य महत्वपूर्ण नदी प्रणाली है भागीरथी और +अलकनंदा जिसकी उप-नदी घाटियां हैं इनके देवप्रयाग में आपस में मिल जाने से गंगा उत्पन्न होती है। +यह उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल राज्यों से होती हुई बहती है। राजमहल पहाडि़यों +के नीचे, भागीरथी बहती है, जो कि पहले कभी मुख्यधारा में थी, जबकि पद्मा पूर्व की ओर बहती हुई +बंगलादेश में प्रवेश करती है। यमुना, रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, महानंदा और सोन नदियां गंगा की +प्रमुख सहायक नदियां हैं। चम्बल और बेतवा महत्त्वपूर्ण उप-सहायक नदियां हैं जो गंगा से पहले यमुना +में मिलती हैं। पद्मा और ब्रह्मपुत्र बंगलादेश के अंदर मिलती हैं और पद्मा या गंगा के रूप में बहती +रहती हैं। ब्रह्मपुत्र का उद्भव तिब्बत में होता है जहां इसे “सांगपो” के नाम से जाना जाता है और यह +लंबी दूरी तय करके भारत में अरूणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है जहां इसे दिहांग नाम मिल जाता है। +पासीघाट के निकट, दिबांग और लोहित ब्रह्मपुत्र नदी में मिल जाती हैं; फिर यह नदी असम से होती हुई +धुबरी के बाद बंगलादेश में प्रवेश कर जाती है। +भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में सुबानसिरी, जिया भरेली, धनश्री, पुथीमारी, +पगलादीया और मानस हैं। बंगलादेश में ब्रह्मपुत्र में तीस्ता आदि नदियां मिलकर अंत में गंगा में मिल +जाती हैं। मेघना की मुख्यधारा बराक नदी का उद्भव मणिपुर की पहाडि़यों में होता है। इसकी मुख्य +सहायक नदियां मक्कू, त्रांग, तुईवई, जिरी, सोनाई, रूकनी, काटाखल, धलेश्वरी, लंगाचीनी, मदुवा और +जटिंगा हैं। बराक बंगलादेश में तब तक बहती रहती है जब तक कि भैरव बाजार के निकट गंगा-ब्रह्मपुत्र +नदी में इसका विलय नहीं हो जाता। दक्कन क्षेत्र में प्रमुख नदी प्रणालियां बंगाल की खाड़ी में जाकर +मिलती हैं। बहने वाली प्रमुख अंतिम नदियों में गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी आदि हैं। नर्मदा और +ताप्ती पश्चिम की ओर बहने वाली मुख्य नदियां हैं। +सबसे बड़ा थाला दक्षिणी प्रायद्वीप में गोदावरी का है। इसमें भारत के कुल क्षेत्र का लगभग 10 +प्रतिशत भाग शामिल है। प्रायद्वीपीय भारत में दूसरा सबसे बड़ा थाला कृष्णा नदी का है और तीसरा +बड़ा थाला महानदी का है। दक्षिण की ऊपरी भूमि में नर्मदा अरब सागर की ओर बहती है और +दक्षिण में कावेरी बंगाल की खाड़ी में गिरती है, इनके थाले बराबर विस्तार के हैं, यद्यपि उनकी +विशेषताएं और आकार भिन्न-भिन्न हैं। कई तटीय नदियां हैं जो तुलनात्मक रूप से छोटी हैं। ऐसी +गिनी-चुनी नदियां पूर्वी तट के डेल्टा के निकट समुद्र में मिल जाती हैं जबकि पश्चिम तट पर ऐसी +करीब 600 नदियां हैं। +राजस्थान में कई नदियां समुद्र में नहीं मिलतीं। वे नमक की झीलों में मिलकर रेत में समा जाती +हैं क्योंकि इनका समुद्र की ओर कोई निकास नहीं है। इनके अलावा रेगिस्तानी नदियां लूनी तथा अन्य, +माछू, रूपेन, सरस्वती, बनांस तथा घग्घर हैं जो कुछ दूरी तक बहकर मरूस्थल में खो जाती हैं। +जलवायु. +भारत की जलवायु आमतौर से उष्णकटिबंधीय है। यहां चार ऋतुएं होती हैं— 1. शीत ऋतु +(जनवरी-फरवरी), 2. ग्रीष्म ऋतु (मार्च-मई), 3. वर्षा ऋतु या “दक्षिण-पश्चिमी मानसून का मौसम” +(जून-सितंबर) और 4. मानसून पश्चात् ऋतु (अक्तूबर-दिसंबर), जिसे दक्षिण प्रायद्वीप में “उत्तर-पूर्व +मानसून का मौसम” भी कहा जाता है। भारत की जलवायु पर दो प्रकार की मौसमी हवाओं का प्रभाव +पड़ता है- उत्तर-पूर्वी मानसून और दक्षिण-पश्चिमी मानसून। उत्तर-पूर्वी मानसून को आमतौर पर “शीत +मानसून” कहा जाता है। इस दौरान हवाएं स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं, जो हिंद महासागर, अरब +सागर और बंगाल की खाड़ी को पार करके आती हैं। देश में अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसून से +ही होती है। +पेड़-पौधे. +उष्ण से लेकर उत्तर धु्रव तक विविध प्रकार की जलवायु के कारण भारत में अनेक प्रकार की वनस्पतियां +पाई जाती हैं, जो समान आकार के अन्य देशों में बहुत कम मिलती हैं। भारत को आठ वनस्पति क्षेत्रों में +बांटा जा सकता है- पश्चिमी हिमालय, पूर्वी हिमालय, असम, सिंधु का मैदान, गंगा का मैदान, दक्कन, +मालाबार और अंडमान। +पश्चिमी हिमालय क्षेत्र कश्मीर से कुमाऊं तक फैला है। इस क्षेत्र के शीतोष्ण कटिबंधीय भाग में +चीड़, देवदार, शंकुधारी वृक्षों (कोनीफर्स) और चौड़ी पत्ती वाले शीतोष्ण वृक्षों के वनों का बाहुल्य है। +इससे ऊपर के क्षेत्रों में देवदार, नीली चीड़, सनोवर वृक्ष और श्वेत देवदार के जंगल हैं। अल्पाइन क्षेत्र +शीतोष्ण क्षेत्र की ऊपरी सीमा से 4,750 मीटर या इससे अधिक ऊंचाई तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में +ऊंचे स्थानों में मिलने वाले श्वेत देवदार, श्वेत भोजवृक्ष और सदाबहार वृक्ष पाए जाते हैं। पूर्वी हिमालय +क्षेत्र सिक्किम से पूर्व की ओर शुरू होता है और इसके अंतर्गत दार्जिलिंग, कुर्सियांग और उसके साथ लगे +भाग आते हैं। इस शीतोष्ण क्षेत्र में ओक, जायवृक्ष, द्विफल, बड़े फूलों वाला सदाबहार वृक्ष और छोटी +बेंत के जंगल पाए जाते हैं। असम क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र और सुरमा घाटियां आती हैं जिनमें सदाबहार जंगल +हैं और बीच-बीच में घने बांसों तथा लंबी घासों के झुरमुट हैं। सिंधु के मैदानी क्षेत्र में पंजाब, पश्चिमी +राजस्थान और उत्तरी गुजरात के मैदान शामिल हैं। यह क्षेत्र शुष्क और गर्म है और इसमें प्राकृतिक +वनस्पतियां मिलती हैं। गंगा के मैदानी क्षेत्र का अधिकतर भाग कछारी मैदान है और इनमें गेहूं, चावल +और गन्ने की खेती होती है। केवल थोड़े से भाग में विभिन्न प्रकार के जंगल हैं। दक्कन क्षेत्र में भारतीय +प्रायद्वीप की सारी पठारी भूमि शामिल है, जिसमें पतझड़ वाले वृक्षों के जंगलों से लेकर तरह-तरह की +जंगली झाडि़यों के वन हैं। मालाबार क्षेत्र के अधीन प्रायद्वीप तट के साथ-साथ लगने वाली पहाड़ी तथा +अधिक नमी वाली पट्टी है। इस क्षेत्र में घने जंगल हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण +व्यापारिक फसलें, जैसे नारियल, सुपारी, काली मिर्च, काफी, चाय, रबड़ और काजू की खेती होती है। +अंडमान क्षेत्र में सदाबहार, अर्द्ध-सदाबहार, कच्छ वनस्पति, समुद्रतटीय और अप्लावी जंगलों की +अधिकता है। कश्मीर से अरूणाचल प्रदेश तक के हिमालय क्षेत्र (नेपाल, सिक्किम, भूटान, नगालैंड) +और दक्षिण प्रायद्वीप में क्षेत्रीय पर्वतीय श्रेणियों में ऐसे देशी पेड़-पौधों की अधिकता है, जो दुनिया में +अन्यत्र कहीं नहीं मिलते। +वन संपदा की दृष्टि से भारत काफी संपन्न है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत का विश्व +में दसवां और एशिया में चौथा स्थान है। अब तक लगभग 70 प्रतिशत भू-भाग का सर्वेक्षण करने के +पश्चात् भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण संस्था ने पेड़-पौधों की 46 हजार से अधिक प्रजातियों का पता लगाया +है। वाहिनी वनस्पति के अंतर्गत 15 हजार प्रजातियां हैं। देश के पेड़-पौधों का विस्तृत अध्ययन भारतीय +सर्वेक्षण संस्था और देश के विभिन्न भागों में स्थित उसके 9 क्षेत्रीय कार्यालयों तथा कुछ विश्वविद्यालयों +और अनुसंधान संगठनों द्वारा किया जा रहा है। +वनस्पति नृजाति विज्ञान के अंतर्गत विभिन्न पौधों और उनके उत्पादों की उपयोगिता के बारे में +अध्ययन किया जाता है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण ने ऐसे पेड़ पौधों का वैज्ञानिक अध्ययन किया है। देश +के विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों में कई विस्तृत नृजाति सर्वेक्षण किए जा चुके हैं। वनस्पति नृजाति विज्ञान की +दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पौधों की 800 प्रजातियों की पहचान की गई और देश के विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों से +उन्हें इकट्ठा किया गया है। +खेती, उद्योग और नगर विकास के लिए जंगलों की कटाई के कारण कई भारतीय पौधे लुप्त हो +रहे हैं। पौधों की लगभग 1336 प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है तथा लगभग 20 प्रजातियां पिछले +60 से 100 वर्षों के दौरान दिखाई नहीं पड़ी हैं। संभावना है कि ये प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। भारतीय +वनस्पति सर्वेक्षण रेड डाटा बुक नाम से लुप्त प्राय पौधों की सूची प्रकाशित करता है। +जीव-जंतु. +भारतीय प्राणी सर्वेक्षण विभाग, जिसका मुख्यालय कोलकाता में है, देश के विभिन्न हिस्सों में अपने +16 क्षेत्रीय केंद्रों के जरिए भारत में जीव-जंतुओं की विभिन्न जातियों के सर्वेक्षण का कार्य करता है। +जलवायु और प्राकृतिक वातावरण की व्यापक भिन्नता के कारण भारत में 89 हजार से अधिक किस्म +के जीव-जंतु पाए जाते हैं। इनमें 2,577 प्रोटिस्टा (आद्यजीव), 5,070 मोलस्क प्राणी, 68,389 +एंथ्रोपोडा, 119 प्रोटोकॉर्डेटा, 2,546 किस्म की मछलियां, 209 किस्म के उभयचारी, 456 किस्म के +सरीसृप, 1,232 किस्म के पक्षी, 390 किस्म के स्तनपायी जीव और 8,329 अन्य अकशेरूकी आदि +शामिल हैं। +स्तनपायी जीवों में हिमालय की बड़े आकार वाली जंगली भेड़ें, दलदली मृग, हाथी, गौर या +भारतीय भैंसा, नील गाय, चौसिंगा मृग शामिल हैं। बिल्ली जाति के पशुओं में सिंह और शेर सर्वाधिक +भव्य दिखते हैं। इनके अलावा, हिम तेंदुए, चित्ती वाले तेंदुए तथा चितकबरे तेंदुए जैसे अन्य विशिष्ट +प्राणी भी पाए जाते हैं। स्तनपायी जीवों की कई अन्य प्रजातियां अपनी सुंदरता, रंग-बिरंगेपन, गरिमा और +विशिष्टता के लिए उल्लेखनीय हैं। बड़ी संख्या में पाए जाने वाले रंग-बिरंगे पक्षी देश की अमूल्य धरोहरों +में से एक हैं। अनेक किस्म के पक्षी, जैसे बत्तख, मैना, कबूतर, धनेश, तोते, तीतर, मुर्गियां और सुनहरे +रंग वाले पक्षी जंगलों और दलदली भूमि में पाए जाते हैं। +नदियों और झीलों में मगरमच्छ और घडि़याल पाए जाते हैं। घडि़याल सिर्प भारत में ही पाए जाते +हैं। पूर्वी तट और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में खारे पानी के मगरमच्छ पाए जाते हैं। सन् 1974 में +शुर की गई मगरमच्छ पालन योजना के जरिए मगरमच्छों की नस्ल को लुप्त होने से बचाया गया। +विशाल हिमालय शृंखला में कई अत्यंत आकर्षक जीव-जंतु पाए जाते हैं, जिनमें जंगली भेड़ और +बकरियां, मारखोर, साकिन, छछूंदर और टापिर शामिल हैं। पांडा और हिम तेंदुआ ऊंचे पहाड़ी स्थानों में +पाए जाते हैं। +कृषि और आवास के लिए भूमि के विस्तार से वन संपदा नष्ट होती जा रही है। भूमि का अधिक- +से-अधिक इस्तेमाल, प्रदूषण, कीटनाशकों के प्रयोग, सामुदायिक संरचना के असंतुलन, बाढ़, सूखा और +तू$फान आदि के प्रकोप से भी पेड़-पौधों को काफी क्षति पहुंचती है। 39 से अधिक प्रजातियों के +स्तनपायी जीवों, पक्षियों की 72, सरीसृप की 17, उभयचारी जीवों की तीन और मछलियों की दो +प्रजातियां तथा बड़ी संख्या में तितलियों, पतंगों और कीड़े-मकोड़ों के लुप्त हो जाने का खतरा है। +जनसंख्या पृष्ठभूमि. +जनगणना. +भारत में जनगणना 2001 का कार्य अपने आप में एक युगांतरकारी एवं ऐतिहासिक घटना है क्याेंकि यह +21वीं शताब्दी तथा तीसरी सहस्राब्दी में होने वाली पहली जनगणना है। इससे हमारे देश में उपलब्ध +भरपूर मानव संसाधन, उनकी आबादी, संस्कृति और आर्थिक स्वरूप के बारे में महत्त्वपूर्ण आंकड़ों का +पता चलता है। +जनगणना 2001 के लिए गणना का कार्य 9 से 28 फरवरी, 2001 के दौरान किया गया। इसके +पश्चात् एक से 5 मार्च, 2001 तक इसका संशोधनात्मक दौर चला। आबादी की गिनती के कार्य को +जिस क्षण से शुरू किया गया, उसे एक मार्च, 2001 को 00.00 बजे माना गया है। वर्ष 1991 तक +जनसंख्या की गिनती की शुरूआत एक मार्च को सूर्योदय के समय से की जाती थी। हमेशा की तरह बेघर +लोगों की गणना 28 फरवरी, 2001 की रात्रि से शुरू की गई। +जनसंख्या. +एक मार्च, 2001 को भारत की जनसंख्या एक अरब 2 करोड़ 80 लाख (532.1 करोड़ पुरूष और +496.4 करोड़ स्त्रियां) थी। भारत के पास 1357.90 लाख वर्ग कि.मी. भू-भाग है जो विश्व के कुल +भू-भाग का मात्र 2.4 प्रतिशत है फिर भी विश्व की 16.7 प्रतिशत आबादी का भार उसे वहन करना +पड़ रहा है। +बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में भारत की आबादी करीब 23 करोड़ 84 लाख थी जो बढ़कर इक्कीसवीं +शताब्दी में एक अरब 2 करोड़ 80 लाख तक पहुंच गई। भारत की जनसंख्या की गणना 1901 के पश्चात् हर +दस साल बाद होती है। इसमें 1911-21 की अवधि को छोड़कर प्रत्येक दशक में आबादी में वृद्धि दर्ज की +गई। वर्ष 1901 से जनसंख्या में हुई वृद्धि के आंकड़े सारणी 1.1 में दर्शाए गए हैं। +सारणी 1.2 में विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की जनसंख्या वृद्धि के चुने हुए आंकड़े +दर्शाए गए हैं। वर्ष 1991-2001 की जनगणना अवधि के दौरान केरल में सबसे कम 9.43 और नगालैंड +में सबसे अधिक 64.53 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई। दिल्ली में अत्यधिक 47.02 प्रतिशत, +चंडीगढ़ में 40.28 प्रतिशत और सिक्किम में 33.06 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई। इसके मुकाबले +केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में 1991-2001 के दौरान जनसंख्या वृद्धि काफी कम रही। हरियाणा, +उत्तर प्रदेश, बिहार, सिक्किम, नगालैंड, मणिपुर, गुजरात, दमन और दीव तथा नगर हवेली आदि को +छोड़कर शेष सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में वर्ष 1991-2001 के जनगणना दशक के दौरान पिछले +जनगणना दशक की तुलना में जनसंख्या वृद्धि दर कम दर्ज की गई। जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों +में जनगणना दशक के दौरान जनसंख्या के प्रतिशत में वृद्धि दर्ज की गई, यह भारत की कुल आबादी +का लगभग 32 प्रतिशत है। +जनसंख्या घनत्व +जनसंख्या की सघनता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष आबादी का घनत्व है। इसे इस रूप में परिभाषित किया +जाता है कि प्रति वर्ग कि.मी. क्षेत्र में लोगों की संख्या कितनी है। 2001 में देश में आबादी का घनत्व +324 प्रति वर्ग कि.मी. था। सन् 1991 से 2001 के बीच राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जनसंख्या के +घनत्व में वृद्धि हुई है। प्रमुख राज्यों में पश्चिम बंगाल अभी भी सबसे सघन आबादी वाला राज्य है। यहां +2001 में आबादी का घनत्व 903 था। बिहार अब दूसरे स्थान पर है जबकि आबादी के घनत्व के हिसाब +से केरल का स्थान तीसरा है। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में आबादी के घनत्व की स्थिति सारणी 1.3 +में दिखाई गई है। +स्त्री-पुरूष अनुपात. +स्त्री-पुरूष अनुपात को इस रूप में परिभाषित किया जाता है कि प्रति 1000 पुरूषों के अनुपात में स्त्रियों +की संख्या कितनी है। इससे एक निश्चित समय पर समाज में स्त्री-पुरूषों के बीच संख्यात्मक समानता +का आकलन किया जाता है। देश में स्त्री-पुरूष अनुपात हमेशा स्त्रियों के प्रतिकूल रहा है। बीसवीं +शताब्दी के आरंभ में यह अनुपात 972 था और उसके बाद 1941 तक इसमें निरंतर कमी का रूख रहा। +स्त्री-पुरूष अनुपात (1901-2001) को सारणी 1.4 में दर्शाया गया है। +साक्षरता. +जनगणना 2001 में उस व्यक्ति को “साक्षर” माना गया है जिसकी उम्र सात वर्ष या उससे अधिक है तथा +जो किसी भी भाषा मे समझकर उसे लिख-पढ़ सकता है। ऐसे व्यक्ति को साक्षर नहीं माना गया है जो +केवल पढ़ सकता है परंतु लिख नहीं सकता। वर्ष 1991 से पूर्व हुई जनगणनाओं में +5 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अनिवार्य रूप से निरक्षर माना जाता था। 2001 की जनगणना के +परिणामों से पता चलता है कि देश में साक्षरता में वृद्धि हुई है। देश में साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। +पुरूषों की साक्षरता दर 75.26 प्रतिशत तथा महिलाओं की साक्षरता दर 53.67 प्रतिशत है। साक्षरता में हो +रहे सुधार को सारणी 1.5 में दर्शाया गया है। +साक्षरता की दृष्टि से केरल सबसे ऊपर है जहां साक्षरता दर 90.86 प्रतिशत है। उसके बाद मिजोरम +में 88.80 प्रतिशत और लक्षद्वीप 86.66 प्रतिशत से दूसरे और तीसरे स्थान पर है। बिहार में साक्षरता दर सबसे +कम 47 प्रतिशत है। झारखंड में उससे अधिक 53.56 प्रतिशत और जम्मू-कश्मीर में 55.52 प्रतिशत है। केरल +में पुरूष और स्त्रियों की अलग-अलग साक्षरता भी सबसे अधिक है। इसमें 94.24 प्रतिशत पुरूष और 87.72 +प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं। इसके विपरीत सबसे कम साक्षरता दर राज्य बिहार में 59.68 प्रतिशत पुरूष और +33.12 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं। देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पुरूषों और स्त्रियों की +साक्षरता दर सारणी 1.6 में दर्शाई गई है। + +राष्ट्रीय प्रतीक: +राष्ट्रीय ध्वज. +राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में समान अनुपात में तीन क्षैतिज पट्टियां हैं— गहरा केसरिया रंग सबसे +ऊपर, सफेद बीच में और हरा रंग सबसे नीचे है। ध्वज की चौड़ाई-लंबाई का अनुपात +2—3 है। सफेद पट्टी के बीच में नीले रंग का चक्र है। इसका प्रारूप सारनाथ में अशोक के सिंह स्तंभ पर बने +चक्र से लिया गया है। इसका व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर है, और इसमें 24 तीलियां हैं। +भारत की संविधान सभा ने राष्ट्रीय ध्वज का प्रारूप 22 जुलाई, 1947 को अपनाया। +सरकार द्वारा समय-समय पर जारी गैर-सांविधिक निर्देशों के अलावा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन पर +राजचिह्नों और नामों के (दुरूपयोग की रोकथाम) अधिनियम, 1950 (1950 की संख्या 12) और राष्ट्रीय +प्रतिष्ठा के अनादर के रोकथाम संबंधी अधिनियम 1971 (1971 की संख्या 69) की व्यवस्थाएं लागू होती +हैं। भारतीय ध्वज संहिता, 2002 सभी संबंधित लोगों के मार्गदर्शन और लाभ के लिए इस प्रकार के सभी +कानूनों, परंपराओं, प्रथाओं और दिशा-निर्देशों को साथ लाने का एक प्रयास है। +26 जनवरी, 2002 से “ध्वज संहिता-भारत” का स्थान, भारतीय ध्वज संहिता, 2002 ने ले लिया है। +भारतीय ध्वज संहिता में दी गई व्यवस्था के अनुसार आम नागरिकों, निजी संस्थाओं, शिक्षण संस्थानों द्वारा +राष्ट्रीय ध्वज का प्रदर्शन करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, परंतु राजचिह्न और नामों के (दुरूपयोग की +रोकथाम) अधिनियम, 1950 और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के अनादर की रोकथाम संबंधी अधिनियम 1971 तथा +इस विषय से संबंधित अन्य कानूनों में दी गई व्यवस्थाओं का पालन करना होगा। +राजचिह्न. +भारत का राजचिह्न सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तंभ की अनुकृति है, जो सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित +है। मूल स्तंभ में शीर्ष पर चार सिंह हैं, जो एक-दूसरे की ओर पीठ किए हुए हैं। इसके नीचे घंटे के आकार +के पद्म के ऊपर एक चित्र वल्लरी में एक हाथी, चौकड़ी भरता हुआ एक घोड़ा, एक सांड तथा एक सिंह +की उभरी हुई मूर्तियां हैं, इसके बीच-बीच में चक्र बने हुए हैं। एक ही पत्थर को काटकर बनाए गए इस +सिंह स्तंभ के ऊपर “धर्मचक्र” रखा हुआ है। +भारत सरकार ने यह चिह्न 26 जनवरी, 1950 को अपनाया। इसमें केवल तीन सिंह दिखाई पड़ते +हैं, चौथा दिखाई नहीं देता। पट्टी के मध्य में उभरी हुई नक्काशी में चक्र है, जिसके दाईं ओर एक सांड +और बाईं ओर एक घोड़ा है। दाएं तथा बाएं छोरों पर अन्य चक्रों के किनारे हैं। आधार का पद्म छोड़ दिया +गया है। फलक के नीचे मुंडकोपनिषद् का सूत्र “सत्यमेव जयते” देवनागरी लिपि में अंकित है, जिसका अर्थ +है- “सत्य की ही विजय होती है”। +राष्ट्रगान. +रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा मूल रूप से बंगला में रचित और संगीतबद्ध “जन-गण-मन” के हिंदी संस्करण को +संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रगान के रूप में 24 जनवरी, 1950 को अपनाया था। यह सर्वप्रथम 27 दिसंबर, +1911 को भारतीय कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया गया था। पूरे गीत में पांच पद हैं। प्रथम पद, +राष्ट्रगान का पूरा पाठ है, जो इस प्रकार है — +जन-गण-मन अधिनायक, जय हे +भारत-भाग्य विधाता। +पंजाब-सिंध-गुजरात-मराठा- +द्राविड़ उत्कल बंग +विंध्य-हिमाचल-यमुना-गंगा +उच्छल-जलधि तरंग +तव शुभ नामे जागे, +तव शुभ आशिष मांगे, +गाहे तव जय-गाथा +जन-गण-मंगलदायक जय हे +भारत-भाग्य विधाता। +जय हे, जय हे, जय हे, +जय जय जय जय हे।। +राष्ट्रगान के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेंड है। कुछ अवसरों पर राष्ट्रगान को संक्षिप्त रूप से +गाया जाता है, जिसमें इसकी प्रथम और अंतिम पंक्तियां (गाने का समय लगभग 20 सेकेंड) होती हैं। +राष्ट्रगीत. +बंकिमचंद्र चटर्जी ने “वंदे मातरम्” गीत की रचना की, जिसे “जन-गण-मन” के समान दर्जा प्राप्त है। यह +गीत स्वतंत्रता-संग्राम में जन-जन का प्रेरणा स्रोत था। वह पहला राजनीतिक अवसर, जब यह गीत गाया +गया था, 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन था। इसका प्रथम पद इस प्रकार है — +वंदे मातरम्! +सुजलाम् सुफलाम् मलयज-शीतलाम्, +शस्यश्यामलाम् मातरम्! +शुभ्रज्योत्सना पुलकितयामिनीम् +फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् +सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम् +सुखदाम् वरदाम्, मातरम्! +राष्ट्रीय पंचांग (कैलेंडर). +ग्रिगेरियन कैलेंडर के साथ-साथ देशभर के लिए शक संवत् पर आधारित एकरूप राष्ट्रीय पंचांग, जिसका +पहला महीना चैत्र है, और सामान्य वर्ष 365 दिन का होता है, 22 मार्च, 1957 को इन सरकारी उद्देश्यों +के लिए अपनाया गया — (1) भारत का राजपत्र, (2) आकाशवाणी के समाचार प्रसारण, (3) भारत सरकार +द्वारा जारी किए गए कैलेंडर और (4) भारत सरकार द्वारा नागरिकों को संबोधित पत्र। +राष्ट्रीय पंचांग और ग्रिगेरियन कैलेंडर की तारीखों में स्थायी सादृश्य है। चैत्र का पहला दिन +सामान्यतया 22 मार्च को और अधिवर्ष में 21 मार्च को पड़ता है। +राष्ट्रीय पशु. +राष्ट्रीय पशु “बाघ” (पैंथरा टाइग्रिस-लिन्नायस), पीले रंगों और धारीदार लोमचर्म वाला एक पशु है। अपनी +शालीनता, दृढ़ता, फुर्ती और अपार शक्ति के लिए बाघ को राष्ट्रीय पशु कहलाने का गौरव हासिल है। इसकी +आठ प्रजातियों में से भारत में पाई जाने वाली प्रजाति को “रायल बंगाल टाइगर” के नाम से जाना जाता है। +उत्तर-पश्चिम भारत को छोड़कर बाकी सारे देश में यह प्रजाति पाई जाती है। भारत के अतिरिक्त यह नेपाल, +भूटान और बंगलादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी पाया जाता है। देश के बाघों की घटती हुई संख्या की प्रवृत्ति +को थामने के लिए अप्रैल 1973 में “बाघ परियोजना” शुरू की गई। बाघ परियोजना के अंतर्गत देश में अब +तक 27 बाघ अभयारण्य स्थापित किए गए हैं, जिनका क्षेत्रफल 37,761 वर्ग कि.मी. है। +राष्ट्रीय पक्षी. +भारत का राष्ट्रीय पक्षी “मयूर” (पावो क्रिस्टेटस) है। हंस के आकार के इस रंग-बिरंगे पक्षी की गर्दन लंबी, +आंख के नीचे एक सफेद निशान और सिर पर पंखे के आकार की कलगी होती है। मादा की अपेक्षा नर +मयूर अधिक सुंदर होता है। उसकी चमचमाती नीली गर्दन, वक्ष और कांस्य हरे रंग की लगभग 200 +पंखुडि़यों वाली भव्य पूंछ हमेशा से आकर्षण का केंद्र रही है। मादा मयूर का रंग भूरा होता है। वह नर +मयूर से थोड़ी छोटी होती है और उसकी पूंछ बड़ी नहीं होती। नर मयूर अपने पंखों को फैलाकर अपने +नृत्य से बड़ा ही लुभावना दृश्य पैदा करता है। +राष्ट्रीय पुष्प. +भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल (नेलंबो न्यूसिपेरा गार्टन) है। यह एक पवित्र पुष्प है तथा प्राचीन भारतीय +कला और पुराणों में इसका एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्राचीनकाल से ही इसे भारतीय संस्कृति का शुभ प्रतीक +माना जाता रहा है। +राष्ट्रीय वृक्ष. +भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद (फाइकस बेंघालेंसिस) है। यह वृक्ष घना एवं फैला हुआ होता है। इसकी +शाखाएं दूर-दूर कई एकड़ तक फैली तथा जड़ें गहरी होती हैं। इतनी गहरी जड़ें किसी और वृक्ष की नहीं +होतीं। +राष्ट्रीय फल. +आम (मेनिगिफेरा इंडिका) भारत का राष्ट्रीय फल है। ऊष्णकटिबंधीय देशों में आम बड़े पैमाने पर पैदा +होता है। भारत में, पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़ कर आम लगभग सभी स्थानों पर पैदा होता है। आम में विटामिन +ए, सी और डी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। हमारे यहां आम की सैंकड़ों किस्में हैं। ये आकार और रंगों +में अलग-अलग होते हैं। भारत में आम की फसल अति प्राचीनकाल से उगाई जाती रही है। +राष्ट्रीय जलीय जीव. +सरकार ने 05 अक्तूबर, 2009 को डाल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया है। डाल्फिन की +घ्राणशक्ति अत्यंत तीव्र होती है। शक्तिशाली घ्राणशक्ति तथा प्रतिध्वनि निर्धारण की क्षमताओं से यह अपने +शिकार का पता लगाती है। + +राजनीतिक संरचना: +राज्यों का संघ भारत एक संपूर्ण प्रभुतासंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है +जिसमें संसदीय प्रणाली की सरकार है। गणराज्य उस संविधान की व्यवस्थाओं के अनुसार प्रशासित +होता है जो 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा स्वीकृत किया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू +हुआ। +संसदीय सरकार के संविधान का ढांचा एकात्मक विशेषताओं के साथ-साथ संघात्मक भी है। भारत +के राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। संविधान का अनुच्छेद 74(1) यह निर्दिष्ट +करता है कि कार्य संचालन में राष्ट्रपति की सहायता करने तथा उन्हें परामर्श देने के लिए प्रधानमंत्री के +नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद् होगी तथा राष्ट्रपति उसके परामर्श से ही कार्य करेंगे। इस प्रकार कार्यपालिका +की वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गठित मंत्रिपरिषद् में निहित होती है। मंत्रिपरिषद् सामूहिक +रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। इसी प्रकार राज्यों में राज्यपाल की स्थिति कार्यपालिका के प्रधान +की होती है परंतु वास्तविक शक्ति मुख्यमंत्री के नेतृत्व में निहित होती है। मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से +विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। +संविधान में विधायी शक्तियां संसद एवं राज्य विधानसभाओं में विभाजित की गई हैं तथा शेष शक्तियां +संसद को प्राप्त हैं। संविधान में संशोधन का अधिकार भी संसद को ही प्राप्त है। संविधान में न्यायपालिका, +भारत के नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक, लोक सेवा आयोगों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की स्वतंत्रता +बनाए रखने के लिए प्रावधान है। +संघ और उसका क्षेत्र. +भारत में 29 राज्य और सात केंद्रशासित प्रदेश हैं। ये राज्य हैं-आंध्र प्रदेश, तेलंगाना,असम, अरूणाचल प्रदेश, बिहार, +छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य +प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, +त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल। केंद्रशासित प्रदेश हैं-अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, +चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, दिल्ली, लक्षद्वीप तथा पांडिचेरी। +नागरिकता. +संविधान में संपूर्ण भारत के लिए एक समान नागरिकता की व्यवस्था की गई है। ऐसा प्रत्येक व्यक्ति भारत +का नागरिक माना गया है जो संविधान लागू होने के दिन (26 जनवरी, 1950 को) भारत में स्थायी रूप +से रहता था, और- +नागरिकता अधिनियम, 1955 में संविधान लागू होने के पश्चात नागरिकता ग्रहण करने तथा +समाप्त करने के संबंध में प्रावधान दिए गए हैं। +मूल अधिकार. +संविधान में सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से कुछ बुनियादी स्वतंत्रताओं की +व्यवस्था की गई है। संविधान में मोटे तौर पर छह प्रकार की स्वतंत्रताओं की मूल अधिकारों के रूप +में गारंटी दी गई है, जिनकी सुरक्षा के लिए न्यायालय की शरण ली जा सकती है। संविधान के तीसरे +भाग, अनुच्छेद 12 से 35 तक, में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है। ये मूल अधिकार हैं- +(1) समानता का अधिकार — कानून के समक्ष समानता, धर्म, वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार +पर भेदभाव का निषेध और रोजगार के लिए समान अवसर; +(2) विचारों की अभिव्यक्ति — सम्मेलन +करने, संस्था या संघ बनाने, देश में सर्वत्र आने-जाने, भारत के किसी भी भाग में रहने तथा कोई वृत्ति +या व्यवसाय करने का अधिकार (इनमें से कुछ अधिकार देश की सुरक्षा, विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, +लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता के अधीन हैं); +(3) शोषण से रक्षा का अधिकार — इसके अंतर्गत +सभी प्रकार की बेगार, बालश्रम और व्यक्तियों के क्रय-विक्रय को अवैध करार दिया गया है; +(4) अंतःकरण की प्रेरणा तथा धर्म को निर्बाध रूप से मानने, उसके अनुरूप आचरण करने और उसका +प्रचार करने की स्वतंत्रता का अधिकार; +(5) नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी संस्कृति, भाषा +और लिपि को संरक्षित करने तथा अल्पसंख्यकों द्वारा पसंद की शिक्षा ग्रहण करने एवं शिक्षा संस्थानों +की स्थापना करने और उन्हें चलाने का अधिकार; और +(6) मूल अधिकारों को लागू कराने के लिए संवैधानिक उपायों का अधिकार। +मूल कर्त्तव्य. +सन 1976 में पारित संविधान में 42वें संशोधन के अंतर्गत नागरिकों के मौलिक कर्त्तव्यों का उल्लेख किया +गया है। ये कर्त्तव्य संविधान के भाग चार के अनुच्छेद 51 “क” में दिए गए हैं। इसमें अन्य बातों के अलावा +यह कहा गया है कि नागरिकों का कर्त्तव्य है कि वे संविधान का पालन करें; स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय संघर्ष +को प्रेरित करने वाले आदर्शों का अनुसरण करें; देश की रक्षा करें और कहे जाने पर राष्ट्रीय सेवा में जुट +जाएं। धर्म, भाषा और क्षेत्रीय तथा वर्ग संबंधी भिन्नताओं को भुलाकर सद्भाव और भाईचारे की भावनाओं +को बढ़ावा दें। +राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत. +संविधान में निहित राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत यद्यपि न्यायालयों द्वारा लागू नहीं कराए जा सके, तथापि +वे “देश के प्रशासन का मूलभूत आधार” हैं और “सरकार” का यह कर्त्तव्य है कि वह कानून बनाते समय +इन सिद्धांतों का पालन करे। उनमें कहा गया है-सरकार ऐसी प्रभावी सामाजिक व्यवस्था कायम करके +लोगों के कल्याण के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगी, जिससे राष्ट्रीय जीवन के सभी क्षेत्रों में सामाजिक, +आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय का पालन हो। सरकार ऐसी नीति निर्देशित करेगी जो सभी स्त्री-पुरूषों को +जीवन-यापन के लिए यथेष्ट अवसर दे, समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था करे; अपनी आर्थिक +क्षमता, विकास की सीमाओं के अनुसार सबको काम तथा शिक्षा दिलाने की प्रभावी व्यवस्था करे और +बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी और अपंगता या अन्य प्रकार की अक्षमता की स्थिति में सबको वित्तीय सहायता +दे। सरकार श्रमिकों के लिए निर्वाह-वेतन, कार्य की मानवोचित दशाओं, रहन-सहन के अच्छे स्तर तथा +उद्योगों के प्रबंधन में उनकी पूर्ण भागीदारी के लिए प्रयत्न करेगी। +आर्थिक क्षेत्र में सरकार को अपनी नीति ऐसे ढंग से लागू करनी चाहिए जिससे कि समाज के भौतिक +संसाधनों पर अधिकार और उन पर नियंत्रण का लोगों के बीच इस प्रकार वितरण हो कि वह सब लोगों +के कल्याण के लिए उपयोगी सिद्ध हो और यह सुनिश्चित हो कि आर्थिक व्यवस्था को लागू करने के +परिणामस्वरूप सर्वसाधारण के हितों के विरूद्ध धन और उत्पादन के साधन कुछ ही लोगों के पास केंद्रित +नहीं हों। +कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण निर्देशक सिद्धांत हैं-बच्चों के स्वस्थ वातावरण में विकास के लिए अवसर +तथा सुविधाएं उपलब्ध कराना; 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए नि—शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था +करना; अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के शिक्षा संबंधी और +आर्थिक हितों को बढ़ावा देना; ग्राम पंचायतों का गठन; राष्ट्रीय स्मारकों की सुरक्षा और विकास; वन और +वन्य जीवों का संरक्षण तथा अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा एवं राष्ट्रों के बीच न्यायोचित और समानतापूर्ण संबंधों +को प्रोत्साहन, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और संधियों की शर्तों का सम्मान व अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा +निपटाने को बढ़ावा देना। +संघ. +कार्यपालिका. +संघीय कार्यपालिका के अंतर्गत राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद् होती +है जो राष्ट्रपति को सलाह देती है। +राष्ट्रपति. +राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचन मंडल के सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर एकल +हस्तांतरणीय मत द्वारा करते हैं। इस निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधानसभाओं +के निर्वाचित सदस्य होते हैं। राज्यों के बीच आपस में समानता तथा राज्यों और संघ के बीच समानता बनाए +रखने के लिए प्रत्येक मत को उचित महत्त्व दिया जाता है। राष्ट्रपति को अनिवार्य रूप से भारत का नागरिक, +कम-से-कम 35 वर्ष की आयु का तथा लोकसभा का सदस्य बनने का पात्र होना चाहिए। राष्ट्रपति का +कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। वह इस पद के लिए पुन— भी चुना जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद +61 में निहित प्रक्रिया द्वारा उसे पद से हटाया जा सकता है। वह उपराष्ट्रपति को संबोधित स्व हस्तलिखित +पत्र द्वारा पद-त्याग कर सकता है। +कार्यपालिका के सभी अधिकार राष्ट्रपति में निहित हैं। वह इनका उपयोग संविधान के अनुसार +स्वयं या अपने अधीनस्थ सरकारी अधिकारियों द्वारा कराता है। रक्षा सेनाओं की सर्वोच्च कमान भी राष्ट्रपति +के पास होती है। राष्ट्रपति को संसद का अधिवेशन बुलाने, उसे स्थगित करने, उसमें भाषण देने और +उसे संदेश भेजने, लोकसभा को भंग करने, दोनों सदनों के अधिवेशन काल को छोड़कर किसी भी +समय अध्यादेश जारी करने, बजट तथा वित्त विधेयक प्रस्तुत करने की सिफारिश करने तथा विधेयकों +को स्वीकृति प्रदान करने, क्षमादान देने, दंड रोकने अथवा उसमें कमी या परिवर्तन करने या कुछ मामलों +में दंड को स्थगित करने, छूट देने या दंड को बदलने के अधिकार प्राप्त हैं। किसी राज्य में संवैधानिक +व्यवस्था के विफल हो जाने पर राष्ट्रपति उस सरकार के संपूर्ण या कोई भी अधिकार अपने हाथ में +ले सकते हैं। यदि राष्ट्रपति को इस बारे में विश्वास हो जाए कि कोई ऐसा गंभीर संकट पैदा हो गया +है जिससे देश की अथवा उसके राज्य क्षेत्र के किसी भाग की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया है +तो वह देश में आपातस्थिति की घोषणा कर सकते हैं। यह खतरा युद्ध अथवा बाह्य आक्रमण या विद्रोह +का हो सकता है। +उपराष्ट्रपति. +उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा एक निर्वाचन- +मंडल के सदस्य करते हैं। निर्वाचक-मंडल में दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। उपराष्ट्रपति को अनिवार्य रूप +से भारत का नागरिक, कम-से-कम 35 वर्ष की आयु का और राज्यसभा का सदस्य बनने का पात्र होना +चाहिए। उसका कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और वह इस पद के लिए पुनः भी चुना जा सकता है। संविधान +के अनुच्छेद 67 (ख) में निहित कार्यविधि द्वारा उसे पद से हटाया जा सकता है। +उपराष्टप्रति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। जब राष्ट्रपति बीमारी या अन्य किसी कारण से +अपना कार्य करने में असमर्थ हो या जब राष्ट्रपति की मृत्यु या पद-त्याग अथवा पद से हटाए जाने के +कारण राष्ट्रपति का पद रिक्त हो गया हो, तब छह महीने के भीतर नए राष्ट्रपति के चुने जाने तक वह +राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य नहीं +कर सकते। +मंत्रिपरिषद. +कार्य-संचालन में राष्ट्रपति की सहायता करने तथा उन्हें परामर्श देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक +मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी +राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के परामर्श से करते हैं। मंत्रिपरिषद् संयुक्त रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती +है। प्रधानमंत्री का कर्त्तव्य है कि वह भारत संघ के कार्यों के प्रशासन के संबंध में मंत्रिपरिषद् के निर्णयों, +कानून बनाने के प्रस्तावों तथा उससे संबंधित जानकारियों से राष्ट्रपति को अवगत कराते रहें। +मंत्रिपरिषद् में चार तरह के मंत्री होते हैं-वे मंत्री, जो मंत्रिमंडल के सदस्य होते हैं; राज्य मंत्री, (जो +विभाग का स्वतंत्र रूप से कार्यभार संभालते हैं), राज्य मंत्री तथा उपमंत्री। +विधायिका. +संघ की विधायिका को “संसद” कहा जाता है। इसमें राष्ट्रपति, लोकसभा तथा राज्यसभा शामिल हैं। संसद +के दोनों सदनों की बैठक पिछली बैठक के छह महीने के भीतर बुलानी होती है। कुछ मौकों पर दोनों सदनों +का संयुक्त अधिवेशन किया जाता है। +राज्यसभा. +संविधान में व्यवस्था है कि राज्यसभा के सदस्यों की संख्या 250 से अधिक नहीं होगी। इनमें से +12 सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला, समाज सेवा आदि क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्ति +होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति मनोनीत करेंगे। शेष 238 सदस्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधि होंगे। +राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष होता है; राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों का चुनाव +राज्यों की विधानसभाओं के चुने हुए सदस्यों द्वारा एकल हस्तांतरणीय मत के आधार पर आनुपातिक +प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए किया जाता है। केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों का चुनाव संसद द्वारा +निर्धारित कानून के अंतर्गत किया जाता है। राज्यसभा कभी भी भंग नहीं होती और उसके एक-तिहाई सदस्य +हर दो वर्ष के बाद अवकाश ग्रहण करते हैं। +इस समय राज्यसभा के 245 सदस्य हैं। इनमें से 233 सदस्य राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों का +प्रतिनिधित्व करते हैं और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हैं। राज्यसभा के सदस्यों के नाम, उनसे संबंधित +दल सहित परिशिष्ट में दिए गए हैं। +लोकसभा. +लोकसभा के सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर लोगों द्वारा सीधे चुने जाते हैं। संविधान में लोकसभा +की अधिकतम संख्या अब 552 है। इनमें 530 सदस्य राज्यों का और 20 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों का +प्रतिनिधित्व करते हैं। राष्ट्रपति को आंग्ल भारतीय (एंग्लो इंडियन) समुदाय के दो व्यक्तियों को उस हालत +में मनोनीत करने का अधिकार है, जब उन्हें ऐसा लगे कि सदन में इस समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं +मिला। +लोकसभा के लिए विभिन्न राज्यों की सदस्य संख्या का निर्धारण इस प्रकार किया जाता है कि राज्य +के लिए निर्धारित सीटों की संख्या और उस राज्य की जनसंख्या का अनुपात, जहां तक व्यावहारिक रूप +से संभव हो, सभी राज्यों में समान हो। इस समय लोकसभा के 545 सदस्य हैं। इनमें से 530 सदस्य राज्यों +से तथा 13 सदस्य केंद्रशासित प्रदेशों से सीधे चुने गए हैं। दो सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए गए हैं, +जो आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। 84वें संविधान संशोधन विधेयक-2001 के तहत +विभिन्न राज्यों में लोकसभा की वर्तमान सीटों की कुल संख्या का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार +पर किया गया है तथा 2026 तक इसमें कोई फेरबदल नहीं किया जाएगा। +लोकसभा का कार्यकाल, यदि उसे भंग न किया जाए, सदन की पहली बैठक की तिथि से लेकर +पांच वर्ष होता है। किंतु यदि आपातस्थिति लागू हो तो यह अवधि संसद द्वारा कानून बनाकर बढ़ाई जा +सकती है। परंतु यह वृद्धि एक समय पर एक वर्ष से अधिक नहीं हो सकती और आपातस्थिति समाप्त +होने के बाद किसी भी हालत में छह महीने से अधिक समय तक नहीं हो सकती। अब तक 14 लोकसभाएं +गठित की जा चुकी हैं। प्रत्येक लोकसभा के कार्यकाल और उसके अध्यक्षों का ब्योरा सारणी 3.1 में +दिया गया है। +दोनों सदनों में राज्यवार सीटों के निर्धारण तथा लोकसभा में विभिन्न दलों की स्थिति की जानकारी +सारणी 3.2 में उपलब्ध है। 14वीं लोकसभा के सदस्यों के नाम, उनकी पार्टी और चुनाव क्षेत्र का विवरण +परिशिष्ट में दिया गया है। +संसद का सदस्य चुने जाने के लिए भारत का नागरिक होना आवश्यक है। लोकसभा के लिए कम-से- +कम 25 वर्ष और राज्यसभा के लिए कम-से-कम 30 वर्ष उम्र होनी चाहिए। अतिरिक्त योग्यताएं संसद +कानून बनाकर निर्धारित कर सकती है। +अन्य संसदीय लोकतंत्रों की भांति भारत की संसद को भी कानून बनाने, प्रशासन की देखरेख, बजट +पारित करने, लोगों की कठिनाइयों को दूर करने और विकास योजनाएं, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों आदि राष्ट्रीय +नीतियों जैसे विषयों पर चर्चा करने का अधिकार है। संघ और राज्यों में अधिकारों के वितरण की संविधान +में जो व्यवस्था की गई है, उसके अनुसार विधायी क्षेत्र में कई तरह से संसद को उच्च स्थान दिया +गया है। अनेक विषयों पर कानून बनाने के अतिरिक्त, संसद कुछ परिस्थितियों में ऐसे विषयों के विधायी +अधिकार भी प्राप्त कर सकती है, जो अन्यथा राज्यों के लिए सुरक्षित हैं। संसद को राष्ट्रपति पर महाभियोग +चलाने, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्त और नियंत्रक +तथा महालेखा परीक्षक की संविधान की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उनके पदों से हटाने का अधिकार +प्राप्त है। +सभी विधेयकों को संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति मिलना अनिवार्य है। किंतु वित्त विधेयकों +के मामले में लोकसभा की इच्छा सर्वोपरि है। संसद प्रदत्त कानूनों की समीक्षा करती है तथा उन पर +नियंत्रण रखती है। संविधान के अंतर्गत संसद को कानून बनाने के साथ-साथ संविधान में संशोधन करने +का अधिकार है। +संसदीय समितियां. +संसद के कार्यों में विविधता तो है, साथ ही उसके पास काम की अधिकता भी रहती है। चूंकि उसके पास +समय बहुत सीमित होता है, इसलिए उसके समक्ष प्रस्तुत सभी विधायी या अन्य मामलों पर गहन विचार +नहीं हो सकता है। अत— इसका बहुत-सा कार्य समितियों द्वारा किया जाता है। +संसद के दोनों सदनों की समितियों की संरचना कुछ अपवादों को छोड़कर एक जैसी होती है। इन +समितियों में नियुकि्त, कार्यकाल, कार्य एवं कार्य संचालन की प्रक्रिया कुल मिलाकर करीब एक जैसी ही +है और यह संविधान के अनुच्छेद 118 (1) के अंतर्गत दोनों सदनों द्वारा निर्मित नियमों के तहत अधिनियमित +होती है। +सामान्यतः ये समितियां दो प्रकार की होती हैं-स्थायी समितियां और तदर्थ समितियां। स्थायी +समितियां प्रतिवर्ष या समय-समय पर निर्वाचित या नियुक्त की जाती हैं और इनका कार्य कमोबेश निरंतर +चलता रहता है। तदर्थ समितियों की नियुक्ति जरूरत पड़ने पर की जाती है तथा अपना काम पूरा कर लेने +और अपनी रिपोर्ट पेश कर देने के बाद वे समाप्त हो जाती हैं। +स्थायी समितियां — लोकसभा की स्थायी समितियों में तीन वित्तीय समितियों, यानी लोक लेखा समिति, +प्राक्कलन समिति तथा सरकारी उपक्रम समिति का विशिष्ट स्थान है और ये सरकारी खर्च और निष्पादन +पर लगातार नजर रखती हैं। लोक लेखा समिति तथा सरकारी उपक्रम समिति में राज्यसभा के सदस्य भी +होते हैं, लेकिन प्राक्कलन समिति के सभी सदस्य लोकसभा से होते हैं। +प्राक्कलन समिति यह बताती है कि प्राक्कलनों में निहित नीति के अनुरूप क्या मितव्ययिता बरती जा सकती +है तथा संगठन, कार्यकुशलता और प्रशासन में क्या-क्या सुधार किए जा सकते हैं। यह इस बात की भी जांच +करती है कि धन प्राक्कलनों में निहित नीति के अनुरूप ही व्यय किया गया है या नहीं। समिति इस बारे में +भी सुझाव देती है कि प्राक्कलन को संसद में किस रूप में पेश किया जाए। लोक लेखा समिति भारत सरकार +के विनियोग तथा वित्त लेखा और लेखा नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट की जांच करती है। यह +सुनिश्चित करती है कि सरकारी धन संसद के निर्णयों के अनुरूप ही खर्च हो। यह अपव्यय, हानि और +निरर्थक व्यय के मामलों की ओर ध्यान दिलाती है। सरकारी उपक्रम समिति नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक +की, यदि कोई रिपोर्ट हो, तो उसकी जांच करती है। वह इस बात की भी जांच करती है कि ये सरकारी उपक्रम +कुशलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं या नहीं तथा इनका प्रबंध ठोस व्यापारिक सिद्धांतों और विवेकपूर्ण वाणिज्यिक +प्रक्रियाओं के अनुसार किया जा रहा है या नहीं। +इन तीन वित्तीय समितियों के अलावा, लोकसभा की नियमों के बारे में समिति ने विभागों से संबंधित +17 स्थायी समितियां गठित करने की सिफारिश की थी। इसके अनुसार 8 अप्रैल, 1993 को इन 17 समितियों +का गठन किया गया। जुलाई 2004 में नियमों में संशोधन किया गया, ताकि ऐसी ही सात और समितियां +गठित की जा सकें। इस प्रकार से इन समितियों की संख्या 24 हो गई है। इन समितियों के निम्नलिखित +कार्य हैं — +(क) भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के अनुदानों की मांग पर विचार करना और +उसके बारे में सदन को सूचित करना; +(ख) लोकसभा के अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति द्वारा समिति +के पास भेजे गए ऐसे विधेयकों की जांच-पड़ताल करना, और जैसा भी मामला हो, उसके बारे में रिपोर्ट +तैयार करना; +(ग) मंत्रालयों और विभागों की वार्षिक रिपोर्टों पर विचार करना तथा उसकी रिपोर्ट तैयार +करना; और +(घ) सदन में प्रस्तुत नीति संबंधी दस्तावेज, यदि लोकसभा के अध्यक्ष अथवा राज्यसभा के +सभापति द्वारा समिति के पास भेजे गए हैं, उन पर विचार करना और जैसा भी हो, उसके बारे में रिपोर्ट +तैयार करना। +प्रत्येक सदन में अन्य स्थायी समितियां, उनके कार्य के अनुसार इस प्रकार विभाजित हैं- +(1) जांच समितियां-(क) याचिका समिति — विधेयकों और जनहित संबंधी मामलों पर प्रस्तुत +याचिकाओं की जांच करती है और केंद्रीय विषयों पर प्राप्त प्रतिवेदनों पर विचार करती है; और (ख) +विशेषाधिकार समिति — सदन या अध्यक्ष/सभापति द्वारा भेजे गए विशेषाधिकार के किसी भी मामले की +जांच करती है; (2) संवीक्षण समितियां- (क) सरकारी आश्वासनों से संबंधी समिति — मंत्रियों द्वारा +सदन में दिए गए आश्वासनों, वादों एवं संकल्पों पर उनके कार्यान्वित होने तक नजर रखती है; (ख) +अधीनस्थ विधि निर्माण समिति — इस बात की जांच करती है कि क्या संविधान द्वारा प्रदत्त विनियमों, +नियमों, उप-नियमों तथा प्रदत्त शक्तियों का प्राधिकारियों द्वारा उचित उपयोग किया जा रहा है; (ग) पटल +पर रखे गए पत्रों संबंधी समिति — वैधानिक अधिसूचनाओं और आदेशों के अलावा, जो कि अधीनस्थ +विधान संबंधी समिति के कार्य क्षेत्र में आते हैं, मंत्रियों द्वारा सदन के पटल पर रखे गए सभी कागजातों +की जांच करती है और देखती है कि संविधान, अधिनियम, नियम या विनियम के अंतर्गत कागजात प्रस्तुत +करते हुए उनकी व्यवस्थाओं का पालन हुआ है या नहीं; (3) सदन के दैनिक कार्य से संबंधित +समितियां-(क) कार्य मंत्रणा समिति — सदन में पेश किए जाने वाले सरकारी एवं अन्य कार्य के लिए +समय-निर्धारण की सिफारिश करती है; (ख) गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों तथा प्रस्तावों संबंधी +लोकसभा की समिति — निजी सदस्यों द्वारा पेश गैर-सरकारी विधेयकों का वर्गीकरण एवं उनके लिए +समय का निर्धारण करती है, निजी सदस्यों द्वारा पेश प्रस्तावों पर बहस के लिए समय का निर्धारण करती +है और लोकसभा में निजी सदस्यों द्वारा पेश किए जाने से पूर्व संविधान संशोधन विधेयकों की जांच +करती है। राज्यसभा में इस तरह की समिति नहीं होती। राज्यसभा की कार्यमंत्रणा समिति की गैर-सरकारी +विधेयकों एवं प्रस्तावों के चरण या चरणों में बहस के लिए समय के निर्धारण की सिफारिश करती है। +(ग) नियम समिति— सदन में कार्यविधि और कार्यवाही के संचालन से संबंधित मामलों पर विचार करती +है और नियमों में संशोधन या संयोजन की सिफारिश करती है, और (घ) सदन की बैठकों में अनुपस्थित +सदस्यों संबंधी लोकसभा की समिति — सदन के सदस्यों की बैठकों से अनुपस्थिति या छुट्टी के आवेदनों +पर विचार करती है। राज्यसभा में इस प्रकार की कोई समिति नहीं है। सदस्यों की छुट्टी या अनुपस्थिति +के आवेदनों पर सदन स्वयं विचार करता है; (4) अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों +के कल्याण की समिति — इसमें दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। यह केंद्र सरकार के कार्यक्षेत्र में आने +वाली अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी मामलों पर विचार करती है और +इस बात पर नजर रखती है कि उन्हें जो संवैधानिक संरक्षण दिए गए हैं, वे ठीक से कार्यान्वित हो रहे +हैं या नहीं, (5) सदस्यों को सुविधाएं प्रदान करने संबंधी समितियां-(क) सामान्य प्रयोजन संबंधी +समिति — सदन से संबंधित ऐसे मामलों पर विचार करती है, जो किसी अन्य संसदीय समिति के अधिकार +क्षेत्र में नहीं आते तथा अध्यक्ष/सभापति को इस बारे में सलाह देती है, और (ख) आवास समिति — +सदस्यों के लिए आवास तथा अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करती है; (6) संसद सदस्यों के वेतन +और भत्तों संबंधी संयुक्त समिति — यह संसद सदस्यों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन अधिनियम, 1954 के +अंतर्गत गठित की गई है। संसद सदस्यों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन संबंधी नियम बनाने के अतिरिक्त, +यह उनके चिकित्सा, आवास, टेलीफोन, डाक, निर्वाचन क्षेत्र एवं सचिवालय संबंधी सुविधाओं के संबंध +में नियम बनाती है; (7) लाभ के पदों संबंधी संयुक्त समिति — यह केंद्र, राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों +द्वारा नियुक्त समितियों एवं अन्य निकायों की संरचना और स्वरूप की जांच करती है, और यह सिफारिश +करती है कि कौन-कौन से पद ऐसे हों, जो संसद के किसी भी सदन की सदस्यता के लिए किसी व्यक्ति +को योग्य अथवा अयोग्य बनाते हैं; (8) पुस्तकालय समिति — इसमें दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। +यह संसद के पुस्तकालय से संबंधित मामलों पर विचार करती है, और (9) महिला अधिकारिता समिति — +29 अप्रैल, 1997 को महिलाओं के अधिकारों के बारे में दोनों सदनों के सदस्यों की एक समिति का +गठन किया गया। इसका उद्देश्य, अन्य बातों के साथ, सभी क्षेत्रों में महिलाओं को हैसियत, गरिमा और +समानता प्रदान करना है। (10) 4 मार्च, 1997 को राज्यसभा की आचार संहिता समिति गठित की गई। +लोकसभा की आचार-संहिता संबंधी समिति 16 मई, 2000 को गठित की गई। +तदर्थ समितियां — इस तरह की समितियों को मोटे रूप में दो शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता +है-(क) संसद के दोनों सदनों द्वारा किसी विचाराधीन प्रस्ताव के स्वीकृत किए जाने पर समय-समय +पर गठित समितियां अथवा अध्यक्ष/सभापति द्वारा कोई विशिष्ट विषय (उदाहरण के लिए-राष्ट्रपति के +अभिभाषण पर, कुछ सदस्यों के आचरण पर, पंचवर्षीय योजनाओं के मसौदे पर, रेलवे कनवेंशन समिति, +स्थानीय क्षेत्रों के विकास की योजना से संबद्ध सांसदों की समिति, बोफोर्स ठेके पर संयुक्त समिति, उर्वरक +मूल्य निर्धारण पर संयुक्त समिति और प्रतिभूति तथा बैंक भुगतानों में गड़बड़ी की जांच करने के लिए +संयुक्त समिति, आदि), संसदीय परिसर की सुरक्षा संबंधी संयुक्त समिति और (ख) विशेष विधेयकों +पर विचार करने एवं रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त प्रवर एवं संयुक्त समितियां। जहां तक विधेयकों से संबंधित +सवाल है, ये समितियां अन्य तदर्थ समितियों से भिन्न हैं और इनके द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया +का उल्लेख अध्यक्ष/सभापति के निर्देश तथा प्रक्रिया संबंधी नियमों में किया जाता है। +संसद में विपक्ष का नेता. +संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष के नेता की महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष +के नेताओं को वैधानिक मान्यता दी गई है। पहली नवंबर, 1977 से लागू एक पृथक कानून के अंतर्गत उन्हें +वेतन तथा कुछ अन्य उपयुक्त सुविधाएं दी जाती हैं। +संसद में सरकारी कामकाज. +संसद के दोनों सदनों में सरकारी कार्य को समन्वित करने, उसकी योजना बनाने और तत्संबंधी व्यवस्था +करने की जिम्मेदारी संसदीय कार्य मंत्री को सौंपी गई है। इस कार्य के संपादन में उनके राज्यमंत्री उनकी +सहायता करते हैं। संसदीय कार्य मंत्री दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों, विभिन्न दलों एवं समूहों के +नेताओं तथा मुख्य सचेतकों से लगातार संपर्क बनाए रखते हैं। 1 अगस्त, 2008 से 30 जून, 2009 की अवधि +के दौरान संसद के दोनों सदनों द्वारा 44 विधेयक पारित किए गए। +सलाहकार समितियां +भारत सरकार (कामकाज का आवंटन) नियम, 1961 के तहत संसदीय मामलों के मंत्रालय को आवंटित +कार्यों में से एक, विभिन्न मंत्रालयों के लिए संसद सदस्यों की सलाहकार समितियों का कार्य है। इस +कार्य को करने के लिए संसदीय मामलों का मंत्रालय इन समितियों का गठन करता है और उनकी बैठकें +आयोजित करता है। इन समितियों का उद्देश्य एक ओर संसद सदस्यों और दूसरी ओर मंत्रियों और +वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के बीच सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों और उनके क्रियान्वयन के तरीकों +के बारे में अनौपचारिक चर्चा करना है। मंत्रालय का मंत्री/प्रभारी मंत्री संबद्ध सलाहकार समिति का +अध्यक्ष होता है। +सलाहकार समिति की न्यूनतम सदस्यता 10 और अधिकतम सदस्यता 30 है। प्रत्येक लोकसभा +के भंग होने पर सलाहकार समिति भी भंग हो जाती है और नई लोकसभा के गठन के साथ सलाहकार +समितियों का पुनर्गठन कर दिया जाता है। 14वीं लोकसभा के भंग होने के समय, 32 सलाहकार +समितियां विभिन्न मंत्रालयों के साथ संबद्ध थीं। इनके अतिरिक्त 16 रेलवे क्षेत्रों की 16 अनौपचारिक +समितियां भी गठित की गई थीं। मंत्रालयों से संबद्ध सलाहकार समितियों से भिन्न, इन अनौपचारिक +समितियों की बैठकें सत्र अवधि में ही आयोजित की जाती हैं। 1 अगस्त, 2008 से 18 मई 2009 +(14वीं लोकसभा भंग होने की तिथि) की अवधि में सलाहकार समितियों की 34 बैठकें आयोजित +की गई थीं। +15 वीं लोकसभा, जो हाल ही में गठित हुई है, की सलाहकार समितियों के गठन की कार्रवाई का +सूत्रपात हो गया है। 41 सलाहकार समितियों का गठन प्रस्तावित है और सलाहकार समितियों में नामांकन +के लिए संसद सदस्यों की वरीयता को आमंत्रित किया गया है। संसद सदस्यों की वरीयता प्राप्त होने के +पश्चात, विभिन्न मंत्रालयों की सलाहकार समितियों का गठन कर दिया जाएगा और उनकी बैठकें आयोजित +की जाएंगी। +संसदीय कार्य मंत्रालय, संसद सदस्यों को भारत सरकार द्वारा विभिन्न मंत्रालयों में स्थापित समितियों, +परिषदों, बोर्डों और आयोग आदि में नामजद करता है। संवैधानिक अथवा अन्य ऐसे निकायों को छोड़कर +जो संविधान या कानून का निर्माण करते हैं, वहां संसद सदस्यों की नियुक्ति के लिए नामजदगी संबंधित +सदनों के पीठासीन अधिकारी द्वारा की जाती है या फिर उसका चयन लोकसभा या राज्यसभा करती है। +इस तरह के संगठनों में सदस्यों को उनकी विशेष दिलचस्पी और योग्यता को देखते हुए नामजद किया +जाता है। +युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और लोकतंत्र से अवगत कराने के लिए मंत्रालय विद्यालय और कॉलेज/ +विश्वविद्यालय स्तर पर युवा संसद प्रतियोगिता का आयोजन करता है। युवा संसद प्रतियोगिता आयोजित +करने की यह योजना सबसे पहले 1966-67 में दिल्ली के विद्यालयों में लागू की गई थी। बाद में 1978 +में दिल्ली और आसपास के केंद्रीय विद्यालयों में भी इस योजना को लागू किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर 1988 +में केंद्रीय विद्यालयों में एक अलग योजना के रूप में इसे शुरू किया गया। इसी तरह 1997-98 में दो नई +योजनाओं के अंतर्गत युवा संसद प्रतियोगिता लागू की गई, एक जवाहर नवोदय विद्यालय के लिए और दूसरी +विश्वविद्यालयों/कॉलेज के लिए। +वर्ष 2008-09 के दौरान दिल्ली के विद्यालयों के लिए 43वीं युवा संसद प्रतियोगिता में 33 विद्यालय +शामिल हुए। केंद्रीय विद्यालयों की 21वीं राष्ट्रीय युवा संसद प्रतियोगिता में 90 केंद्रीय विद्यालयों ने भाग +लिया। जवाहर नवोदय विद्यालय के लिए 11वीं राष्ट्रीय युवा संसद प्रतियोगिता आयोजित की गई। उसके +अलावा विश्वविद्यालयों/कॉलेजों के लिए नौवीं राष्ट्रीय युवा संसद प्रतियोगिता आयोजित की गई। +अन्य संसदीय विषय. +संसदीय कार्य मंत्रालय समय-समय पर अखिल भारतीय सचेतक सम्मेलन आयोजित करता है। ये सम्मेलन +केंद्र और राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दलों के सचेतकों के बीच उपयुक्त संपर्क स्थापित करने के लिए +किए जाते हैं। वास्तव में इन राजनीतिक दलों का कानून बनाने वाली संस्थाओं के व्यावहारिक कार्य-संचालन +से सीधा संबंध होता है। सम्मेलन में समान हित के विषयों और संसदीय लोकतंत्र की संस्थाओं को मजबूत +बनाने के लिए उच्च मानक बनाने पर विचार किया जाता है। 1952 से अब तक 14वां अखिल भारतीय +सचेतक सम्मेलन आयोजित किया जा चुका है। यह सम्मेलन 4-5 फरवरी, 2008 को मुंबई में आयोजित +किया गया था। 14वें अखिल भारतीय सचेतक सम्मेलन के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता माननीय +उपराष्ट्रपति ने की और समापन समारोह की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष ने की। +संसदीय कार्य मंत्रालय लोकसभा में कार्यविधि और कार्यवाही के संचालन संबंधी नियमों के नियम 377 +के और राज्यसभा में विशेष उल्लेख के अंतर्गत उठाए गए विषयों पर अनुवर्ती कार्रवाई करता है। संसद +के दोनों सदनों में “प्रश्नकाल” के बाद सदस्य सार्वजनिक महत्त्व के जरूरी विषय उठाते है। यद्यपि ऐसा +करना आवश्यक नहीं है। कभी-कभी मंत्री सदस्यों द्वारा उठाए गए विषयों पर अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करते +हैं। जब संबंधित मंत्री उपस्थित नहीं होते हैं, संसदीय कार्य मंत्री सदन या संबंधित सदस्य को आश्वासन +देते हैं कि उनकी भावनाएं संबंधित मंत्री तक पहुंचा दी जाएंगी। +संसदीय कार्य मंत्रालय संसद के दोनों सदनों की दैनिक कार्यवाहियों में से मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्वासनों/ +वायदों, संकल्पों आदि को छांटकर उन्हें संबंधित मंत्रालयों/विभागों को कार्यान्वयन के लिए भेजता है। +संबंधित मंत्रालयों/विभागों से आश्वासनों को लागू करने के बारे में आवश्यक विवरण एकत्र करने तथा +उसकी समुचित जांच करने के बाद संसदीय कार्य मंत्री/राज्यमंत्री द्वारा उनके कार्यान्वयन के संबंध में सरकार +द्वारा की गई कार्रवाई को दर्शाने वाले विवरण समय-समय पर सदन के पटल पर रखे जाते हैं। +भारत के राष्ट्रपति के भारत सरकार के कार्यों का आवंटन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 77 के +अंतर्गत भारत सरकार (कार्य निर्धारण) नियम, 1961 बनाए हैं। इन नियमों के अंतर्गत ही प्रधानमंत्री की +सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा भारत सरकार के मंत्रालयों/विभागों का गठन किया जाता है। इन मंत्रालयों/विभागों/ +सचिवालयों और कार्यालयों (जिनका उल्लेख “विभाग” के रूप में किया गया है) में भारत सरकार के +कार्यों का संचालन इन नियमों में निर्दिष्ट विषयों के वितरण के अनुसार होता है। प्रधानमंत्री की सलाह +पर राष्ट्रपति मंत्रियों के बीच काम का बंटवारा करते हैं। प्रत्येक विभाग आमतौर पर एक सचिव के अधीन +होता है, जो नीतिगत मामलों और सामान्य प्रशासन के बारे में मंत्री की मदद करता है। +भारत सरकार (कामकाज का आवंटन) नियम, 1961 के प्रावधानों के तहत मंत्रिमंडल सचिवालय प्रत्यक्षत— +प्रधानमंत्री के अधीन कार्य करता है। इसका प्रशासनिक प्रमुख कैबिनेट सचिव होता है जो सिविल सर्विसेज +बोर्ड का पदेन अध्यक्ष भी है। +कैबिनेट सचिव का कार्य निम्न होता है — (क) मंत्रिमंडल समितियों को सचिवालय सहयोग और +(ख) कार्य नियम। +कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार (कार्य संचालन) नियम, 1961 और भारत सरकार (कार्य +आबंटन) नियम, 1961 के प्रशासन के लिए उत्तरदायी होता है, जिसमें वह सरकार के मंत्रालयों में +इन नियमों का पालन करते हुए सुचारू रूप से कार्य संचालन की सुविधा प्रदान करता है। विभिन्न मंत्रालयों +के बीच समन्वय स्थापित करते हुए और मंत्रालयों के बीच मतभेदों को दूर करते हुए यह सचिवालय +सरकार को निर्णय लेने में मदद करता है तथा सचिवालय की स्थाई/तदर्थ समितियों के जरिए आपस +में सहमति बनाए रखता है। इस विधि से नई नीतियों की पहल को प्रोत्साहित भी किया जाता है। +कैबिनेट सचिवालय यह सुनिश्चित करता है कि सभी मंत्रालयों/विभागों की प्रमुख गतिविधियों के +बारे में हर महीने एक सारांश बनाकर राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और मंत्रियों को उससे अवगत कराया जाए। +देश में किसी बड़े संकट के समय उसका प्रबंधन करना तथा ऐसी परिस्थितियों में विभिन्न मंत्रालयों की +गतिविधियों में समन्वय स्थापित करना भी कैबिनेट सचिवालय का एक काम है। +कैबिनेट सचिव, सिविल सर्विसेज का प्रमुख भी होता है। इसलिए विभिन्न मंत्रालयों के बीच +समन्वय को बढ़ावा देने के लिए कैबिनेट सचिवालय एक उपयोगी माध्यम है। सचिव यह महसूस करते +हैं कि उनकी गतिविधियों के बारे में कैबिनेट सचिव को समय-समय पर सूचित करते रहना आवश्यक +है। कार्य नियमों के संचालन के लिए भी यह आवश्यक है कि समय-समय पर विभिन्न गतिविधियों +के बारे में, विशेषकर यदि कहीं नियमों का पालन नहीं हो रहा है तो उसके बारे में कैबिनेट सचिव +को सूचित किया जाए। +राष्ट्रीय प्राधिकरण, रासायनिक हथियार कन्वेंशन (सी डब्ल्यू सी) का गठन 5 मई, 1997 को कैबिनेट +सचिवालय के प्रस्ताव द्वारा किया गया था। इसके गठन का उद्देश्य रासायनिक हथियार कन्वेंशन में +निर्धारित दायित्वों को पूरा करना था जिस पर शुरू में 130 देशों ने 14 जनवरी, 1993 को संपन्न हुए +सम्मेलन में हस्ताक्षर किए थे। इस कन्वेंशन का लक्ष्य था किसी भी सदस्य देश द्वारा सभी रासायनिक +हथियारों के विकास, उत्पादन, क्रियान्वयन, हस्तांतरण, प्रयोग और भंडारण पर रोक लगाना था। +प्रत्येक देश को अपनी िज़म्मेदारी निभाने को एक राष्ट्रीय प्राधिकरण मनोनीत अथवा गठित करती है +जो रासायनिक हथियार प्रतिबंध संगठन (ओपीसी डब्ल्यू) के साथ प्रभावी संपर्क एवं समन्वय रखे; +इसीलिए कैबिनेट सचिवालय के प्रशासनिक नियंत्रण में राष्ट्रीय प्राधिकरण, रासायनिक हथियार कन्वेंशन +गठित किया गया है। +कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय संचालन समिति इस राष्ट्रीय प्राधिकरण के कामकाज +पर निगरानी रखेगी तथा इसके अन्य सदस्य रहेंगे सचिव (रसायन और पैट्रोरसायन), विदेश सचिव, रक्षा +अनुसंधान व विकास सचिव, रक्षा सचिव और राष्ट्रीय प्राधिकरण के अध्यक्ष। एनएसीडब्ल्यूसी इस संबंध +में, सीडब्ल्यूसी अधिनियम लागू कराने, सीडब्ल्यूसी तथा अन्य सरकारी पक्षों से तालमेल रखने, दायित्व +निर्वहन से संबंद्ध आंकड़े एकत्र करने, सुविधा समझौतों पर बातचीत करने, ओपीसी डब्ल्यू निरीक्षणों से +समन्वय रखने, राष्ट्रीय निरीक्षकों और उद्योग कर्मियों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था उपलब्ध कराने, +गोपनीय कार्यवाही सूचना की सुरक्षा सुनिश्चित करने, यह जांच करना की घोषणाएं पूरी, सही और नियमित +हैं, सीडब्ल्यूसी से संबद्ध गतिविधियों में लगी संस्थाओं का पंजीकरण कराना, आदि के दायित्व निभाएगा। +सरकार के मंत्रालय/विभाग. +सरकार में अनेक मंत्रालय/विभाग होते हैं। इनकी संख्या और इनका स्वरूप समय-समय पर इन बातों पर +निर्भर करता है कि काम कितना है तथा किसी मसले को कितना महत्त्व दिया जा रहा है। स्थितियों में +परिवर्तन और राजनीतिक औचित्य आदि भी उसमें निर्णायक भूमिका निभाते हैं। +मंत्रालय/विभागों की सूची (30 सितम्बर, 2006) +1. कृषि मंत्रालय +(क) कृषि और सहकारिता विभाग +(ख) कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग +(ग) पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग +(क) रसायन और पैट्रो-रसायन विभाग +(ख) उर्वरक विभाग +(ग) भेषज विभाग +केंद्र सरकार के स्वतंत्र विभाग. +51. परमाणु ऊर्जा विभाग +52. अंतरिक्ष विभाग +53. युवा मामले विभाग +54. खेल विभाग +55. मंत्रिमंडल सचिवालय +56. राष्ट्रपति सचिवालय +57. प्रधानमंत्री कार्यालय +प्रमुख स्वतंत्र कार्यालय. +58. नीति आयोग +सरकारी सेवाएं. +अखिल भारतीय सेवाएं. +आजादी से पूर्व भारत की शीर्ष सेवाओं में इंडियन सिविल सर्विस सर्वोच्च सेवा थी। इस सेवा के अतिरिक्त, +भारतीय पुलिस सेवा भी थी। देश के आजाद होने के बाद यह महसूस किया गया कि भले ही इंडियन सिविल +सर्विस ब्रिटिश साम्राज्य काल की देन है, फिर भी राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्थिरता को कायम रखने +के लिए अखिल भारतीय सेवा की आवश्यकता है। तदनुसार संविधान के अनुच्छेद 312 में ऐसा प्रावधान +किया गया, जिसके तहत संघ और राज्यों के लिए समान रूप से एक अथवा उससे अधिक अखिल भारतीय +सेवाओं का गठन किया जा सके। भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा संविधान के अनुच्छेद +312 के संदर्भ में संसद द्वारा गठित की गई मानी जाती हैं। संविधान लागू होने के बाद 1966 में भारतीय +वन सेवा के नाम से एक नई अखिल भारतीय सेवा गठित की गई। अखिल भारतीय सेवाओं की एक प्रमुख +विशेषता यह है कि इन सेवाओं के कर्मचारियों की भर्ती केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, परंतु इनकी सेवाएं +विभिन्न राज्यों के कैडर के तहत होती हैं और इन पर राज्यों तथा केंद्र, दोनों के मातहत काम करने की +जिम्मेदारी होती है। अखिल भारतीय सेवा का यह पहलू भारतीय संघ की एकता के स्वरूप को मजबूती +प्रदान करता है। +तीनों अखिल भारतीय सेवाओं, अर्थात भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा +(आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफएस) में से आईएएस कैडर के नियंत्रण का अधिकार +कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के पास है। तीनों सेवाओं में भर्ती संघ लोक सेवा आयोग द्वारा +की जाती है। इन अधिकारियों की भर्ती और प्रशिक्षण का काम केंद्र सरकार करती है और फिर इन्हें विभिन्न +राज्यों के कैडर में भेज दिया जाता है। +केंद्रीय सचिवालय सेवाएं. +केंद्रीय सचिवालय की तीन सेवाएं हैं, यानी-(1) केंद्रीय सचिवालय सेवा,(2) केंद्रीय सचिवालय +आशुलिपिक सेवा, और (3) केंद्रीय सचिवालय लिपिक सेवा। केंद्रीय सचिवालय सेवा के ग्रेड-1 और +सलेक्शन ग्रेड और केंद्रीय सचिवालय आशुलिपिक सेवा के वरिष्ठ प्रधान निजी सचिव और प्रधान निजी +सचिव के ग्रेड केंद्रीकृत हैं। केंद्रीय सचिवालय सेवा के अनुभाग अधिकारी ग्रेड और सहायक ग्रेड, इसी सेवा +के ग्रेड “डी”, “सी”, “ए” और “बी” (विलीनित) और एलडीसी एवं यूडीसी के पद विकेंद्रीकृत हैं। +केंद्रीय ग्रेडों में नियुक्तियां और पदोन्नतियां, कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग द्वारा अखिल सचिवालय +आधार पर की जाती हैं। विकेंद्रीकृत ग्रेडों के मामले में, कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग वरिDता कोटा में +पदोन्नति का क्षेत्र निर्धारित करता है और कोटा रिक्तियों की सीधी भर्ती के लिए विभिन्न कैडरों की समग्र +आवश्यकताओं का पता लगाता और मूल्यांकन करता है और सीधी भर्ती एवं विभागीय परीक्षा कोटा की +रिक्तियों के लिए केंद्रीकृत भर्ती के जरिए खुली प्रतियोगिता और विभागीय परीक्षा आयोजित करता है। +संघ लोक सेवा आयोग. +संविधान में केंद्र सरकार के अंतर्गत सिविल पदों पर ग्रुप “ए” और “बी” राजपत्रित पदों की भर्ती तथा विभिन्न +सेवा संबंधी मामलों में सलाह देने के लिए एक स्वतंत्र निकाय-संघ लोक सेवा आयोग की व्यवस्था है। +आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इनका कार्यकाल छह वर्ष का या +65 वर्ष की आयु तक होता है, दोनों में जो भी पहले समाप्त हो जाए। आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने +के लिए यह व्यवस्था है कि नियुक्ति के समय जो सदस्य सरकारी सेवा में हो, वह आयोग में नियुक्ति के +बाद सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त माना जाएगा। आयोग के अध्यक्ष और सदस्य सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी +पद ग्रहण करने के अधिकारी नहीं हैं। इन्हें संविधान में की गई व्यवस्था और उसमें दिए आधार के अलावा, +अपने पदों से नहीं हटाया जा सकता। +कर्मचारी चयन आयोग. +कर्मचारी चयन आयोग, जिसे शुरू में अधीनस्थ कर्मचारी सेवा आयोग कहते थे, का गठन 1 जुलाई, 1976 +को किया गया। इसे निम्नलिखित भर्ती का काम सौंप गया है-(1) भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों +तथा उनके संबद्ध और अधीनस्थ कार्यालयों के सभी ग्रुप “ख” के पद, तकनीकी और गैर तकनीकी-जिनका +अधिकतम वेतनमान 6500-10,500 रूपये हो, और (2) भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों तथा +उनसे संबद्ध और अधीनस्थ कार्यालयों में ग्रुप “ग” के सभी गैर-तकनीकी पदों-उन पदों को छोड़कर, +जिन्हें स्पष्ट रूप से कर्मचारी चयन आयोग के अधिकार-क्षेत्र से परे रखा गया है। आयोग कार्मिक और +प्रशिक्षण विभाग का संबद्ध कार्यालय है और इसमें शामिल हैं-अध्यक्ष, दो सदस्य, सचिव और परीक्षा +नियंत्रक। अध्यक्ष/सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष या 62 वर्ष की आयु प्राप्त करनेतक होता है। आयोग +का मुख्यालय और उसके उत्तरी क्षेत्र का कार्यालय नई दिल्ली में है। इसके मध्य, पश्चिम, पूर्व, पूर्वोत्तर, +दक्षिण और कर्नाटक, केरल क्षेत्र के कार्यालय क्रमश— इलाहाबाद, मुंबई, कोलकाता, गुवाहाटी, चेन्नई और +बंगलुरू में हैं। इसके मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ क्षेत्र और उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के उप-क्षेत्रीय कार्यालय रायपुर +और चंडीगढ़ में हैं। +राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय. +संघ सरकार की राजभाषा नीति के संबंध में संवैधानिक तथा विधिक प्रावधानों, राजभाषा अधिनियम, 1963 +एवं राजभाषा नियम, 1976 तथा सरकार द्वारा समय-समय पर जारी आदेशों के अनुपालन के लिए राजभाषा +विभाग एक नोडीय विभाग है। इसकी स्थापना जून, 1975 में की गई थी। यह विभाग केंद्रीय सरकार के +कार्यालयों में हिंदी के प्रगामी प्रयोग को बढ़ाने के लिए अनेक गतिविधियां चला रहा है-यथा केंद्र सरकार +के कर्मचारियों को हिंदी भाषा, हिंदी आशुलिपि, हिंदी टंकण व अनुवाद का प्रशिक्षण देना, कार्यालयों का +निरीक्षण करना, तिमाही रिपोर्ट के माध्यम से संघ के कामकाज में राजभाषा हिंदी की प्रगति पर निगरानी +रखना, राजभाषा कार्यान्वयन के प्रोत्साहन के लिए विभिन्न योजनाओं का परिचालन तथा उनकी मानिटरिंग +करना, अखिल भारतीय तथा क्षेत्रीय स्तर के राजभाषा सम्मेलन आदि करना और कार्यान्वयन के लिए विभिन्न +स्तरों पर गठित समितियों की बैठकों आदि से संबंधित कार्यों का समन्वय करना आदि शामिल हैं। यह +विभाग राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सहायक साहित्य का प्रकाशन तथा वितरण का कार्य भी +करता है। कार्यालयों में प्रयोग में आने वाले विभिन्न यांत्रिक तथा इलैक्ट्रानिक उपकरणों में देवनागरी लिपि +के माध्यम से काम करने की सुविधा बढ़ाने की दृष्टि से ऐसे उपकरणों के विकास, निर्माण तथा उपलब्धियों +में समन्वय स्थापित करने की भूमिका भी राजभाषा विभाग निभा रहा है। कम्प्यूटर पर हिंदी में कार्य करने +संबंधी जानकारी देने के लिए केंद्र सरकार के कार्यालयों के लिए पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित +कराने के अतिरिक्त विभाग सी-डेक, पुणे के माध्यम से हिंदी प्रयोग में सहायक कुछ साफ्टवेयरों (लीला, +मंत्रा, श्रुतलेखन आदि) का विकास भी कराता रहा है। +राजभाषा विभाग मूलत— राजभाषा हिंदी के प्रचार, प्रसार और प्रयोग से जुड़ी राजभाषायी गतिविधियों +तथा कार्यक्रमों के माध्यम से केंद्र सरकार के कार्यालयों में सरकारी कामकाज में अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी +के प्रयोग को लक्ष्य बनाये हुए है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राजभाषा नियम, 1976 के नियम 12 में +यह व्यवस्था है कि केंद्र सरकार के प्रत्येक कार्यालय का प्रशासनिक प्रधान यह सुनिश्चित करे कि राजभाषा +अधिनियम तथा राजभाषा नियम के उपबंधों का समुचित रूप से अनुपालन हो रहा है तथा इस प्रयोजन के +लिए उपयुक्त और प्रभावकारी जांच के लिए उपाय किए जाएं। उसका यह भी दायित्व है कि राजभाषा +विभाग द्वारा समय-समय पर राजभाषा नीति संबंधी उपबंधों के अनुपालन के लिए जारी किए गए निर्देशों +का पालन हो। इस विभाग के लक्ष्य अन्य विभागों से भिन्न प्रकार के हैं। राजभाषा विभाग ने सरकारी +कर्मचारियों को हिंदी भाषा/हिंदी टंकण व आशुलिपि का प्रशिक्षण, सरकारी सामग्री के अनुवाद कार्य, +राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार, प्रोत्साहन व कार्यान्वयन के वार्षिक लक्ष्य निर्धारित किए हुए हैं तथा उनको +पूरा करने का प्रयास किया जाता है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए राजभाषा विभाग के अंतर्गत केंद्रीय हिंदी +प्रशिक्षण संस्थान, केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो तथा देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित 8 क्षेत्रीय राजभाषा कार्यान्वयन +कार्यालय कार्यरत हैं। +राजभाषा प्रयोग से संबंधित गठित समितियां. +(क) संसदीय राजभाषा समिति-राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 4(1) के अंतर्गत वर्ष 1976 +में गठित 30 सदस्यीय (20-लोकसभा के तथा 10 राíयसभा के) संसदीय राजभाषा समिति का कार्य संघ +के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग में की गई प्रगति का पुनरावलोकन करते हुए अपनी सिफारिशें +राष्ट्रपति को प्रस्तुत करना है। समिति द्वारा अब तक राजभाषा हिंदी संबंधी विभिन्न पहलुओं पर प्रस्तुत +प्रतिवेदन के आठ खंडों पर राष्ट्रपति के आदेश पारित करवाए जा चुके हैं। +(ख) केंद्रीय हिंदी समिति-इस समिति का गठन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में भारत सरकार के मंत्रालयों/ +विभागों में हिंदी प्रचार तथा प्रगामी प्रयोग से संबंधित कार्यों में समन्वय स्थापित करने की दृष्टि से किया +गया है। यह राजभाषा नीति के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश देने वाली सर्वोच्च समिति है। इस समिति का +कार्यकाल सामान्यत— तीन वर्ष का होता है। समिति में प्रधानमंत्री के अतिरिक्त कुछ केंद्रीय मंत्री, राíयों के +मुख्यमंत्री, संसद सदस्य तथा हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वान सदस्य के रूप में शामिल होते +हैं। वर्तमान समिति की संरचना में कुल 41 सदस्य हैं। गृह मंत्री इस समिति के उपाध्यक्ष तथा सचिव, +राजभाषा विभाग इसके सदस्य सचिव हैं। +(ग) हिंदी सलाहकार समिति-केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों में राजभाषा नीति के सुचारू रूप से +कार्यान्वयन के बारे में परामर्श देने के उद्देश्य से संबंधित मंत्रालयों/विभागों के मंत्री की अध्यक्षता में 57 +केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों में हिंदी सलाहकार समितियां गठित हैं। +(घ) केंद्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति-केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों में राजभाषा अधिनियम +1963 और राजभाषा नियम, 1976 के उपबंधों के अनुसार सरकारी प्रयोजनों के लिए हिंदी के अधिकाधिक +प्रयोग, केंद्र सरकार के कर्मचारियों को हिंदी प्रशिक्षण और राजभाषा विभाग द्वारा समय-समय पर जारी +किए गए अनुदेशों के कार्यान्वयन की समीक्षा करने तथा उसके अनुपालन में पाई गई कमियों को दूर करने +उपाय सुझाने के उद्देश्य से सचिव, राजभाषा विभाग की अध्यक्षता में केंद्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति +गठित है। +(ङ) नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियां-केंद्र सरकार में राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन पर नजर +रखने के लिए देश के विभिन्न प्रमुख नगरों में नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियां गठित हैं। वर्तमान में +इनकी संख्या 268 है। +केंद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा-विभिन्न मंत्रालयों/विभागों और उनके संबद्ध कार्यालयों में फैले हिंदी +पदों को एकीकृत संवर्ग में लाने तथा उनके पदाधिकारियों को समान सेवा शर्त, वेतनमान और पदोन्नति के +अवसर दिलाने हेतु वर्ष 1981 में केंद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा का गठन केंद्रीय हिंदी समिति द्वारा वर्ष +1976 में लिए गए निर्णय के परिणामस्वरूप किया गया है। राजभाषा विभाग इसका संवर्ग नियंत्रक प्रधिकारी +है। इस सेवा में भारत सरकार के मंत्रालयों/विभागों तथा उनके संबद्ध कार्यालयों के सभी हिंदी पद कुछ वैज्ञानिक +और तकनीकी विभाग यथा सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा आदि को छोड़कर, शामिल हैं। +राजभाषा-संवैधानिक/वैधानिक प्रावधान +हिंदी, संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार, संघ की राजभाषा है। अनुच्छेद 343 (2) में शासकीय +कार्य में अंग्रेजी के उपयोग को संविधान के लागू होने के बाद से 15 वर्ष, यानी 25 जनवरी, 1965 तक +जारी रखने का प्रावधान किया गया था। अनुच्छेद 343 (3) में संसद को यह अधिकार दिया गया है कि +वह कानून बनाकर सरकारी कार्यों के लिए अंग्रेजी के निरंतर प्रयोग को 25 जनवरी, 1965 के बाद भी जारी +रख सकती है। तदनुसार राजभाषा अधिनियम, 1963 (1967 में संशोधित) की धारा 3 (2) में यह व्यवस्था +की गई है कि हिंदी के अलावा, अंग्रेजी भाषा सरकारी कामकाज के लिए 25 जनवरी, 1965 के बाद भी +जारी रहेगी। अधिनियम में यह भी व्यवस्था है कि कुछ विशेष कार्यों, जैसे-संकल्प, सामान्य आदेश नियम, +अधिसूचनाएं, प्रेस विज्ञप्तियां, प्रशासकीय और अन्य रिपोर्टें, लाइसेंस, परमिट, ठेकों आदि में हिंदी और +अंग्रेजी दोनों का उपयोग अनिवार्य होगा। +राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(4) के अंतर्गत सन् 1976 में राजभाषा नियम बनाए गए। +इनकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-(1) ये नियम केंद्र सरकार के सभी कार्यालयों पर लागू हैं, जिनमें +सरकार द्वारा नियुक्त आयोग, समिति या ट्रिब्यूनल एवं इसके नियंत्रण वाले निगम या कंपनियां भी शामिल +हैं। (2) केंद्र सरकार के कार्यालयों से क्षेत्र “क” के राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, +हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह +और दिल्ली) के बीच पत्र-व्यवहार की भाषा हिंदी होगी; (3) केंद्र सरकार के कार्यालयों से क्षेत्र “ख” +(पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और चंडीगढ़) को पत्र आदि हिंदी में भेजे जाएंगे, किंतु क्षेत्र “ख” में किसी व्यक्ति +के पास भेजे गए पत्र आदि हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में भेजे जाएंगे; (4) केंद्र सरकार और राज्य +सरकार के बीच भेजे जाने वाले पत्र “ग” क्षेत्र के लिए (जिसमें क्षेत्र “क”, “ख” के अन्य राज्य और केंद्रशासित +प्रदेश शामिल नहीं हैं,) अंग्रेजी में भेजे जाएंगे; (5) केंद्र सरकार के कार्यालयों के बीच, केंद्र सरकार के +कार्यालयों से राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के सरकारी कार्यालयों तथा व्यक्तियों आदि के बीच पत्र-व्यवहार उस +अनुपात में हिंदी में होगा, जो समय-समय पर निर्धारित किया जाएगा; (6) केंद्र सरकार के कार्यालयों से +संबंधित सभी नियमावलियां, संहिताएं तथा प्रक्रिया संबंधी अन्य साहित्य हिंदी और अंग्रेजी दोनों में तैयार +कराए जाएंगे। सभी फार्म, रजिस्टरों के प्रमुख पृष्ठ, नाम पट्टिकाएं, सूचना पट्ट तथा स्टेशनरी की वस्तुएं +हिंदी और अंग्रेजी में होंगी; (7) अधिनियम के धारा 3(3) में उल्लिखित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने +वाले का यह दायित्व होगा कि वह देखे कि ये दस्तावेज हिंदी और अंग्रेजी दोनों में जारी हों; (8) केंद्र +सरकार के प्रत्येक कार्यालय में प्रशासनिक प्रमुख का यह दायित्व होगा कि वह सुनिश्चित करे कि उप- +नियम-(2) के तहत जारी नियमों और निर्देशों तथा धारा की व्यवस्थाओं का पूरा पालन हो रहा है तथा +इस पर नजर रखने के लिए समुचित एवं कारगर चैक प्वाइंट बनाए जाएं। +नीति. +राजभाषा के संकल्प, 1968 का पालन करते हुए राजभाषा विभाग हर वर्ष एक वार्षिक कार्यक्रम तैयार करता +है, जिसमें केंद्र सरकार के कार्यालयों के लिए हिंदी में पत्र-व्यवहार, हिंदी जानने वाले कर्मचारियों की भर्ती, +हिंदी पुस्तकों की खरीद, निरीक्षण बैठकों और दस्तावेजों का हिंदी में अनुवाद कार्य आदि का लक्ष्य निर्धारित +किया जाता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के बारे में केंद्र सरकार के कार्यालयों से तिमाही प्रगति रिपोर्ट मांगी +जाती है। इस तिमाही रिपोर्ट के आधार पर वार्षिक रिपोर्ट का आकलन किया जाता है। यह वार्षिक रिपोर्ट +संसद के दोनों सदनों में रखी जाती है और इसकी प्रतियां राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के मंत्रालयों/ +विभागों में भेजी जाती हैं। +संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए बंगलुरू, कोचीन, मुंबई, कोलकाता, +गुवाहाटी, भोपाल, दिल्ली और गाजियाबाद, आठ क्षेत्रीय कार्यान्वयन कार्यालय स्थापित किए गए हैं। +समिति. +राजभाषा अधिनियम 1963 धारा 4 के निहित राजभाषा संसदीय समिति का गठन 1976 में किया गया। +इसका गठन सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग की प्रगति की समीक्षा करने और उसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति +को देने के लिए किया गया था। इसमें लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 10 सदस्य हैं। समिति ने +यह रिपोर्ट हिस्सों में देने का फैसला लिया है। समिति ने अब तक आठ खंडों में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति +को पेश की है। राष्ट्रपति ने सात खंडों पर आदेश जारी कर दिए हैं और आठवें खंड पर अभी काम +चल रहा है। +केंद्रीय हिंदी समिति का गठन सन 1967 में किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। यह +नीति निर्माण की सर्वोच्च संस्था है, जो राजभाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के बारे में दिशा निर्देश तय +करती है। +केंद्रीय हिंदी समिति के निर्देश पर विभिन्न मंत्रालयों/विभागों में संबंधित मंत्रियों की अध्यक्षता में हिंदी +सलाहकार समितियां गठित की गई हैं। ये अपने-अपने मंत्रालयों/विभागों और कार्यालयों/प्रतिष्ठानों में हिंदी +के उपयोग में हुई प्रगति की समीक्षा करती हैं और हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अपने सुझाव +देती हैं। +इसके अलावा केंद्रीय राजभाषा क्रियान्वयन समिति (जिसके अध्यक्ष राजभाषा विभाग के सचिव होते +हैं, सभी मंत्रालयों के संयुक्त सचिव (राजभाषा इंचार्ज) समिति के पदेन सदस्य होते हैं) समिति सरकारी +कामकाज में हिंदी के उपयोग की समीक्षा करती है, कर्मचारियों को हिंदी का प्रशिक्षण देने, राजभाषा विभाग +द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों का पालन करवाने, तथा इन निर्देशों के कार्यान्वयन में आने वाली कमियों/ +कठिनाइयों को दूर करने के लिए अपने सुझाव देती है। +ऐसे शहर जहां पर 10 या इससे अधिक केंद्र सरकार के कार्यालय हैं, उनमें हिंदी के उपयोग की +समीक्षा करने के लिए नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियां बनाई गई हैं। पूरे देश में अभी तक 257 नगर +राजभाषा कार्यान्वयन समितियों का गठन किया जा चुका है। +पुरस्कार योजनाएं. +इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार योजना 1986-87 से शुरू की गई है। इस योजना के अंतर्गत हिंदी के इस्तेमाल +को बढ़ावा देने की दिशा में महत्त्वपूर्ण उपलिब्धयां हासिल करने वाले मंत्रालयों/विभागों, बैंकों, वित्तीय +संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और नगर राजभाषा क्रियान्वयन समितियों को प्रत्येक वर्ष शील्ड प्रदान +की जाती है। केंद्र सरकार, बैंकों, वित्तीय संस्थानों, विश्वविद्यालयों, प्रशिक्षण संस्थानों तथा केंद्र सरकार +की स्वायत्तशासी संस्थाओं के कार्यरत/सेवानिवृत्त कर्मचारियों द्वारा हिंदी में लिखी गई पुस्तकों के लिए नकद +पुरस्कार दिए जाते हैं। +आधुनिक विज्ञान/प्रौद्योगिकी और समकालीन विषयों पर हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन को बढ़ावा +देने के लिए जो राष्ट्रीय पुरस्कार योजना थी, उसका नाम पहले “ज्ञान-विज्ञान के लिए मौलिक पुस्तक लेखन” +था, इसे अब “हिंदी में मौलिक पुस्तक लेखन के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय पुरस्कार योजना” कर दिया गया +है। यह योजना भारत के सभी नागरिकों के लिए है। +हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल करने वाले क्षेत्रीय/ +उपक्षेत्रीय कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, नगर राजभाषा क्रियान्वयन समितियों, बैंकों, वित्तीय +संस्थानों को प्रत्येक वर्ष क्षेत्रीय स्तर पर, क्षेत्रीय राजभाषा पुरस्कार दिए जाते हैं। +प्रशिक्षण. +राजभाषा विभाग द्वारा चलाई जाने वाली हिंदी शिक्षण योजना के तहत हिंदी भाषा में प्रशिक्षण देने के लिए +119 पूर्णकालिक और 49 अंशकालिक केंद्र हैं। इसी प्रकार 23 पूर्णकालिक और 38 अंशकालिक केंद्रों के +माध्यम से हिंदी आशुलिपि आैर हिंदी टंकण का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस प्रकार देश के विभिन्न हिस्सों +में हिंदी का प्रशिक्षण देने के लिए 229 केंद्र बनाए गए हैं। हिंदी शिक्षण योजना के अंतर्गत पूर्व, पश्चिम, +उत्तर-मध्य, दक्षिण तथा पूर्वोत्तर क्षेत्रों में शैक्षणिक और प्रशासनिक सहायता के लिए कोलकाता, मुंबई, +दिल्ली, चेन्नई और गुवाहाटी में पांच क्षेत्रीय कार्यालय कार्य कर रहे हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में हिंदी प्रशिक्षण की +भारी मांग को देखते हुए गुवाहाटी में एक नया क्षेत्रीय मुख्यालय खोला गया है तथा इम्फाल, आइजोल और +अगरतला में नए हिंदी प्रशिक्षण केंद्र खोले गए हैं। +हिंदी भाषा और हिंदी टंकण में पूर्णकालिक प्रशिक्षण के साथ-साथ पत्राचार के माध्यम से प्रशिक्षण +देने के लिए 31 अगस्त, 1985 को केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की गई। 1988 में मुंबई, +कोलकाता और बंगलुरू में तथा 1990 में हैदराबाद में इसके उप-कार्यालय खोले गए। देश के लगभग सभी +टाइपिंग/स्टेनोग्राफी केंद्रों में हिंदी टाइपिंग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। +केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों, कार्यालयों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों आदि +के अनुवाद कार्यों के लिए मार्च 1971 में केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो की स्थापना की गई थी। जैसे गैर-वैधानिक +साहित्य, मैन्युअल/कोड्स, फॉर्म आदि का अनुवाद करने का कार्य। ब्यूरो को अधिकारियों/कर्मचारियों को +अनुवाद कार्य से संबंधित प्रशिक्षण देने की भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रारंभिक तौर पर दिल्ली में 3 महीने +का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया। क्षेत्रीय जरूरतों को पूरा करने के लिए मुंबई, बाद में बंगलुरू, +कोलकाता में ऐसे अनुवाद प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की गई है। इसके अतिरिक्त केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो +केंद्रीय कर्मचारियों के लिए लघु-अवधि के प्रशिक्षण कोर्स भी आयोजित करता है। +तकनीकी. +मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर, विशेषकर कंप्यूटर पर राजभाषा के प्रयोग को प्रोत्साहन देने के +लिए अक्तूबर, 1983 में राजभाषा विभाग में एक तकनीकी कक्ष की स्थापना की थी। इस कक्ष की प्रमुख +गतिविधियां निम्न प्रकार से हैं-(i) भाषा विकास के आवश्यक उपकरण जुटाना, इस कार्यक्रम, “लीला +राजभाषा” के अंतर्गत बांग्ला, अंग्रेजी, कन्नड़, मलयालम, तमिल और तेलुगु माध्यम से स्वयं हिंदी सीखने +का एक पैकेज विकसित किया गया है। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के लिए एक सहायक उपकरण “मंत्र +राजभाषा” विकसित किया गया है। (ii) हिंदी में कंप्यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन — कंप्यूटर पर हिंदी +के इस्तेमाल के लिए हर साल करीब 100 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। (iii) हिंदी सॉफ्टवेयर +के इस्तेमाल को लोकप्रिय बनाने के लिए उपभोक्ताओं और निर्माताओं को आमने-सामने लाया जाता है +तथा इसके लिए द्विभाषी कंप्यूटर प्रणाली के बारे में प्रदर्शनियों और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। +प्रकाशन. +राजभाषा विभाग ने “राजभाषा भारती” त्रैमासिक पत्रिका निकाली है जिसका उद्देश्य साहित्य, तकनीकी, +सूचना-प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों में हिंदी में लेखन को बढ़ावा देना और सरकारी कार्यालयों में हिंदी में अधिक +से अधिक काम करने के लिए प्रचार-प्रसार करना है। इस पत्रिका के अभी तक 112 अंक प्रकाशित किए +जा चुके हैं। राजभाषा नीति से संबंधित वार्षिक क्रियान्वयन कार्यक्रम प्रत्येक वर्ष जारी किया जाता है। +विभिन्न मंत्रालयों, विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में हिंदी के कामकाज की समीक्षा संबंधित वार्षिक +आकलन रिपोर्ट जारी की जाती है और इसे संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाता है। राजभाषा हिंदी +के कामकाज को बढ़ावा देने से संबंधित हुए कामकाज की जानकारी देने के लिए राजभाषा मैन्युअल, +कैलेंडर, फिल्में, पोस्टर आदि जारी किए जाते हैं। +नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक. +नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। उसको पद से हटाने के लिए वही आधार +और कार्यविधि अपनाई जाती है, जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए होती है। अपना +पद छोड़ने के बाद वह संघ या किसी राज्य सरकार में कोई नौकरी नहीं कर सकता है। राष्ट्रपति नियंत्रक +तथा महालेखा परीक्षक की सलाह पर संघ और राज्य का लेखा-जोखा रखने के लिए प्रपत्र निर्धारित करते +हैं। नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक संघ और राज्यों के लेखे-जोखे की रिपोर्टें राष्ट्रपति और संबद्ध राज्यपालों +के पास भेजते हैं, जो संसद और राज्य विधानसभाओं में प्रस्तुत की जाती हैं। +अंतर्राज्यीय परिषद. +अंतर्राज्यीय परिषद सचिवालय की स्थापना वर्ष 1991 में अंतर्राज्यीय परिषद की सेवाओं के लिए की गई +थी। वर्ष 2007 में स्थापित केंद्र-राज्य संबंध आयोग की सेवाओं को भी सचिवालय को सौंपा गया है। +संघीय नीति में, संघटक इकाइयों के समान हितों और उनके बीच सम्मिलित कार्रवाइयों के लिए नीतियों +में समन्वय और उनका क्रियान्वयन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। नीतियों में परस्पर समन्वय और उनके +क्रियान्वयन को सुकर बनाने के लिए संविधान का अनुच्छेद 263 संस्थानात्मक प्रणाली की स्थापना पर +विचार करता है। +केंद्र राज्य संबंधों पर सरकारिया आयोग द्वारा दी गई सिफारिशों का अनुसरण करते हुए 28 मई, 1990 +को राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से 1990 में अंतर्राज्यीय परिषद का गठन किया गया। +आईएससी एक अनुशंसात्मक इकाई है और उसे एेसे विषयों की जांच और चर्चा के अधिकार दिए +गए हैं जिनमें कुछ या सभी राज्य अथवा संघ और एक या एक से अधिक राज्यों का समान हित जुड़ा हो, +इस विषय के संदर्भ में बेहतर नीतिगत समन्वय और कार्रवाई के लिए। यह राज्यों के समान हित के अन्य +मुद्दों पर भी विचार करता है, जिसे परिषद के अध्यक्ष द्वारा प्रेषित किया गया हो। +माननीय प्रधानमंत्री इस परिषद के अध्यक्ष होते हैं। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (जहां +विधानसभा हो) के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों (जहां विधान सभा न हो) के प्रशासक, राष्ट्रपति शासन +वाले राज्यों के राज्यपाल, मंत्रिमंडल के छह कैबिनेट स्तर के मंत्री, जिन्हें परिषद के अध्यक्ष ने नामांकित +किया हो, इस परिषद के सदस्य होते हैं। अध्यक्ष द्वारा नामांकित कैबिनेट स्तर के पांच मंत्री परिषद के स्थायी +अतिथि होते हैं। हाल ही में अंतर्राज्यीय परिषद का पुनर्गठन किया गया है। +परिषद की बैठक खुली होती है और बैठक के दौरान जिन प्रश्नों पर चर्चा की जाती है, वे सर्वसम्मति +से तय किए जाते हैं। इस पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है। संविधान के अनुच्छेद 263 के खंड (क) +में परिषद के इस दायित्व को नहीं निर्धारित किया गया है कि वह राज्यों के बीच उठे विवादों की जांच +करे और उन पर सलाह दे। +परिषद के लिए विचारणीय मुद्दों पर निरंतर विचार करने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए वर्ष 1996 +में अंतर्राज्यीय परिषद की स्थायी समिति कोगठन किया गया। माननीय गृह मंत्री को स्थायी समिति का +अध्यक्ष और पांच कैबिनेट मंत्रियों एवं नौ मुख्यमंत्रियों को इसका सदस्य बनाया गया। इसके बाद समिति +का पुनर्गठन किया गया है। +अब तक अंतर्राज्यीय परिषद की 10 बैठकें हो चुकी हैं। शुरूआती 8 बैठकों में परिषद ने केंद्र राज्य +संबंधों पर सरकारिया आयोग की 247 सिफारिशों पर ध्यान केंद्रित किया और सभी सिफारिशों पर नजर +डाली। 247 सिफारिशों में से, 179 को क्रियान्वित किया जा चुका है, 65 को अंतर्राज्यीय परिषद/प्रशासनिक +मंत्रालयों/संबंधित विभागों ने नामंजूर कर दिया है और केवल 3 सिफारिशें क्रियान्वयन के विभिन्न चरणों +में हैं। +परिषद सार्वजनिक नीति और प्रशासन के अन्य मुद्दों पर भी विचार करती है, ये इस प्रकार हैं — +(क) ठेके पर श्रम और नियुक्तियां +(ख) अच्छे प्रशासन पर कार्रवाई कार्यक्रम का ब्ल्यू प्रिंट +(ग) आपदा प्रबंधन- आपदाओं से निपटने के लिए राज्यों की तैयारी +(घ) अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों पर अत्याचार और अनुसूचित जाति/अनुसूचित +जनजाति (अत्याचार की रोकथाम)अधिनियम, 1989 के क्रियान्वयन की स्थिति +परिषद सचिवालय अंतर्राज्यीय परिषद द्वारा की गई सिफारिशों के क्रियान्वयन का निरीक्षण करता है और +स्थायी समिति/परिषद के सामने कार्रवाई रिपोर्ट (ऐक्शन टेकिंग रिपोर्ट) को विचार के लिए रखता है। +परिषद सचिवालय ने सार्वजनिक नीति और प्रशासनिक मुद्दों पर अनेक प्रकार के अध्ययनों को +अधिकृत किया है — +(क) खनिजों के संबंध में, जिनमें कोयला, हाइड्रोपावर और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस शामिल हैं, +राज्यों को संसाधनों पर मुआवजा +(ख) उप राष्ट्रीय प्रशासन +(ग) कृषिगत उत्पादों और वस्तुओं पर समान भारतीय बाजार का सृजन +(घ) शहरी फुटपाथी विक्रेताओं के लिए राष्ट्रीय नीतियां परिषद सचिवालय ने केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों और राज्य सरकारों के परामर्श से उन मुद्दों को चुनने के लिए कदम भी उठाए हैं जिन पर परिषद को विचार करना है। +अंतर्राज्यीय परिषद सचिवालय ने कनाडा के फोरम ऑफ फेडरेशंस के साथ एक ढांचागत समझौता +भी किया है। यह समझौता संघवाद के प्रस्तावों, सिद्धांतों और संभावनाओं पर संवाद को प्रोत्साहित करते +हुए प्रशासनिक सुधार और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के लिए इस फोरम के साथ एक अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी +है। यह समझौता अगले तीन वर्षों 2008-2011 के लिए पुनर्नवीनीकृत किया गया है। +नवंबर 2007 में अंतर्राज्यीय परिषद और कनाडा के फोरम ऑफ फेडरेशंस ने दिल्ली में संघवाद पर +चौथा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन सहप्रायोजित किया था। इसकी कार्यवाही को निम्नलिखित नामों से पांच अंकों +में प्रकाशित किया गया है- “बिल्डिंग ऑन एंड एकोमोडेटिंग डायवर्सिटीज”, “इमर्जिंग इश्यूज इन फिस्कल +फेडरेलिज्म”, “इंट्रैक्शन इन फेडेरेशन सिस्टम्स”, “लोकल गवर्नमेंट इन फेडरल सिस्टम्स” और “पॉलिसी +इश्यूज इन फेडरलिज्म- इंटरनेशनल पर्सपेक्टिव्स”। +सितंबर, 2008 में नेपाल के चार संसद सदस्यों के एक प्रतिनिधिामंडल के साथ एक बैठक की गई +जिसमें अंतर सरकारी संबंधों और अंतर्राज्यीय परिषद की भूमिका और गतिविधियों पर चर्चा की गई। +अंतर्राज्यीय परिषद सचिवालय ने फोरम ऑफ फेडरेशंस के साथ मिलकर 16 जनवरी, 2009 को +अंतर सरकारी संबंधों पर गोलमेज चर्चा भी की। +आईएससीएस केंद्र राज्य संबंध आयोग को सचिवालयी सहयोग प्रदान करता है। इस आयोग को +समान न्यूनतम कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) के तहत सरकार द्वारा की गई प्रतिबद्धता का पालन करते +हुए, यह विचार करते हुए कि सरकारिया आयोग द्वारा दो दशक पूर्व सौंपी गई रिपोर्ट से अब तक समाज +और अर्थव्यवस्था में अत्यधिक परिवर्तन हो गए हैं, गठित किया गया था। अध्यक्ष और सदस्यों को 27 +अप्रैल, 2007 को नियुक्त किया गया था। न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) मदन मोहन पंछी, उच्चतम न्यायालय +के पूर्व मुख्य न्यायाधीश को अध्यक्ष नियुक्त किया गया और श्री धीरेंद्र सिंह, पूर्व सचिव- भारत सरकार, +श्री विनोद कुमार दुग्गल, पूर्व सचिव-भारत सरकार और डॉ. एन.आर. माधव मेनन, पूर्व निदेशक- राष्ट्रीय +न्यायिक अकादमी, भोपाल और भारतीय राष्ट्रीय विधि विद्यालय को सदस्य नियुक्त किया गया। 17 +अक्तूबर, 2008 को श्री विजय शंकर, आईपीएस (सेवानिवृत्त) को आयोग का सदस्य बनाया गया। आयोग +की अवधि को 31 मार्च, 2010 तक बढ़ाया गया है। +प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायतें. +कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय में प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग प्रशासनिक +सुधारों और खासकर केंद्र सरकार के संगठनों तथा राज्य सरकारों से संबंधित लोक शिकायतों को दूर करने +वाली भारत सरकार की प्रमुख एजेंसी है। यह विभाग केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों को प्रबंधन सलाह +सेवा प्रदान करता है। यह विभिन्न प्रकाशनों के माध्यम से लोक शिकायतों के निवारण और प्रशासनिक +सुधारों से संबद्ध सरकार के महत्वपूर्ण कार्यकलापों के बारे में सूचनाओं का प्रचार करता है। यह विभाग +लोक सेवा सुधारों को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान और आपसी सहयोग की गतिविधियों +पर भी नज़र रखता है। +यह विभाग केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों आदि और विभिन्न राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, संगठनों +उनके सेवा क्षेत्रों में नागरिक अधिकार अधिकार-पत्रों के प्रतिपादन के प्रयासों में तालमेल रखता है। ये +अधिकार-पत्र संगठन की प्रतिबद्धता, सेवा उपलब्ध कराने के अपेक्षित मानदंडों, समय -सुबोध, शिकायत +निवारण तंत्र, उनके कार्य निष्पादन को लोगों के परीक्षण के लिए खुला रखने और जिम्मेदारी तय करने के +लिए प्रतिबद्धता का प्रचार करते हैं। +प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग ने प्रशासनिक सुधारों की समीक्षा के लिए 8 मई, 1998 +को एक आयोग बनाया जिसका उद्देश्य वर्तमान कानूनों में परिवर्तन, अंतर-क्षेत्रीय प्रभावों के बारे में नियम +और कार्यविधियां तैयार करना और पुराने हो चुके कानूनों में सुधार करना था। विभिन्न मंत्रालयों/विभागों +ने 822 धाराओं (700 विनियोग धाराओं और 27 पुनर्गठन धाराओं सहित) को बरकरार रखा है। शेष धाराएं +इस प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से गुजर रही हैं। +लोक प्रशासनिक प्रणाली को चुस्त-दुरूस्त बनाने के लिए विस्तृत रूपरेखा तैयार करने हेतु +श्री वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में, विभाग ने दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया। आयोग ने +अब तक सरकार को निम्नलिखित 15 रिपोर्टें सौंप दी हैं — +प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों को लागू किये जाने की गति की समीक्षा करने और इन +निर्णयों को लागू करने के लिए संबंधित मंत्रालयों/विभागों को मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए विदेश मंत्री +श्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में एक मंत्री दल गठित किया गया है। केंद्र और राज्य सरकारों के +अधिकारियों द्वारा लोक प्रशासन के क्षेत्र में किए जाने वाले शानदार और अनोखे कार्यों के लिए उन्हें सम्मानित +करने के वास्ते विभाग ने 2005 में “लोक प्रशासन में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार” का +भी गठन किया है। इस पुरस्कार में (i) एक पदक, (ii) एक प्रशस्ति पत्र और (iii) एक लाख रूपये नकद +पुरस्कार, शामिल हैं। यदि कई अधिकारियों के समूह को यह पुरस्कार मिलता है तो पूरे समूह को पांच +लाख रूपये नकद दिये जाएंगे, बशर्ते कि प्रति व्यक्ति पुरस्कार राशि एक लाख रूपये से अधिक नहीं होगी। +किसी भी संस्थान के लिए इस पुरस्कार राशि की अधिकतम सीमा 5 लाख रूपये रखी गई है। यह पुरस्कार, +केंद्र और राज्य सरकार के सभी अधिकारियों को व्यक्तिगत अथवा समूह के तौर पर या संस्थान के रूप +में देने पर विचार किया जा सकता है। प्रतिवर्ष 21 अप्रैल को ये पुरस्कार प्रशासनिक सेवा दिवस समारोह +के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए जाते हैं। +विभाग ने सरकारी विभागों द्वारा उत्कृष्ट सेवाएं सुलभ कराने के लिए नमूने के तौर पर एक उत्कृष्ट +सेवा मानक “सेवोत्तम” (बेंच मार्किंग एक्सलेंस् इन सर्विस डिलिवरी) तैयार किया है। इस परियोजना का +उद्देश्य नागरिकों को ध्यान में रखते हुए सेवाएं सुलभ कराने की गुणवत्ता में सुधार लाना है तथा इसे नागरिक +विशेषाधिकार, लोक शिकायत निवारण क्रिया-विधि स्तर और सेवाएं सुलभ कराने में उत्कृष्टता को कारगर +ढंग से अमल में लाकर किया जा सकता है। इस प्रयोग को केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों में +लागू किया जाना है। प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग के कार्यों में देश में उत्तम प्रशासन +प्रणालियों को प्रोत्साहन देना शामिल है। इसके भावी कार्यों और उद्देश्यों में सर्वोत्तम प्रशासन प्रणालियों +का प्रलेखन, संचयन और प्रचारण शामिल है। इसकी पूर्ति और देश में उत्तम प्रशासन प्रणालियों को बढ़ावा +देने के लिए विभाग विविध कार्य योजनाओं पर अमल कर रहा है जैसे प्रकाशन, गोिDयों, क्षेत्रीय सम्मेलनों +का आयोजन, प्रस्तुतियों, भाषण शृंखलाओं का आयोजन और वृत्तचित्र तैयार करना आदि। अपने नियमित +प्रकाशनों “मैनेजमेंट इन गवर्नमेंट-अ क्वाटर्ली जरनल” और “सिविल न्यू$ज-अ मंथली न्यू$ज लैटर” के +द्वारा विभाग उत्तम कार्य प्रणालियों के बारे में लोगों तक जानकरी पहुंचा रहा है। इसके अलावा इसने दो +पुस्तकें “आइडियाज दैट हैव वर्क्ड” और “लर्न फ्राम दैम” का प्रकाशन भी किया है। इन पुस्तकों में नूतन +प्रणालियों को अमल में लाने वालों की सफलताओं और असफलताओं का वर्णन है। विभाग ने एक डीवीडी +भी तैयार की है जिसमें 1812 से आज तक प्रशासनिक सुधारों पर आयोगों/समितियों की 73 चुनिंदा रिपोर्टें +हैं। सर्वोत्तम प्रणालियों के प्रसार और अनुसरण के उद्देश्य से विभाग ने सर्वोत्तम प्रणालियों पर एक पोर्टल +भी आरंभ किया है। +प्रशासनिक ट्रिब्यूनल. +प्रशासनिक ट्रिब्यूनल अधिनियम, 1985 का पारित होना पीडि़त सरकारी कर्मचारियों को न्याय दिलाने +की दिशा में एक नया अध्याय था। प्रशासनिक ट्रिब्यूनल्स अधिनियम का स्रोत, संविधान का अनुच्छेद +323 “क” है, जो केंद्र सरकार को संसद के अधिनियम द्वारा ऐसे ट्रिब्यूनल बनाने का अधिकार प्रदान +करता है, जो केंद्र सरकार और राज्यों के कामकाज को चलाने के लिए सार्वजनिक पदों और सेवाओं +में नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा-शर्तों आदि से संबंधित शिकायतों और विवादों पर निर्णय दे +सकें। अधिनियम 1985 के अंतर्गत स्थापित ट्रिब्यूनल, इसके अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों के सेवा +संबंधी मामलों में मूल अधिकार क्षेत्र को प्रयोग करता है। उच्चतम न्यायालय के दिनांक 18 मार्च, 1997 +के निर्णय के परिणामस्वरूप प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के फैसले के विरूद्ध संबंधित उच्च न्यायालय की खंडपीठ +में अपील की जाएगी। +प्रशासनिक ट्रिब्यूनल केवल अपने अधिकार-क्षेत्र और कार्य विधि में आने वाले कर्मचारियों के सेवा +संबंधी मामलों तक सीमित होता है। इसकी कार्यविधि कितनी सरल है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया +जा सकता है कि पीडि़त व्यक्ति इसके सामने स्वयं उपस्थित होकर अपने मामले की पैरवी कर सकता है। +सरकार अपना पक्ष अपने विभागीय अधिकारियों या वकीलों के जरिए रख सकती है। ट्रिब्यूनल का उद्देश्य +वादी को सस्ता और जल्दी न्याय दिलाना है। +अधिनियम में केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल-सीएटी) और राज्य +प्रशासनिक ट्रिब्यूनल स्थापित करने की व्यवस्था है। सीएटी-केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल पहली नवंबर, +1985 को स्थापित किया गया। आज इसकी 17 नियमित पीठ हैं, जिनमें से 15 उच्च न्यायालयों के मुख्य +स्थान पर हैं और शेष दो जयपुर और लखनऊ में हैं। ये पीठ उच्च न्यायालयों वाले अन्य स्थानों पर सुनवाई +करती हैं। संक्षेप में, ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और सदस्य होते हैं। ट्रिब्यूनल के सदस्य +न्यायिक और प्रशासनिक-दोनों क्षेत्रों से लिए जाते हैं, ताकि ट्रिब्यूनल को कानूनी और प्रशासनिक-दोनों +वर्गों की विशेषज्ञ जानकारी का लाभ मिल सके। +राज्य. +राज्यों में सरकारी व्यवस्था केंद्र से काफी मिलती-जुलती है। +कार्यपालिका. +राज्यपाल. +राज्य की कार्यपालिका के अंतर्गत राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद् होती है। राज्यपाल +की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति पांच वर्ष की अवधि के लिए करता हैं। उसका कार्यकाल राष्ट्रपति की इच्छा +पर होता है। केवल 35 वर्ष से अधिक आयु वाले भारतीय नागरिक को ही इस पद पर नियुक्त किया जा +सकता है। राज्य की कार्यपालिका के सारे अधिकार राज्यपाल में निहित होते हैं। +मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद् राज्यपाल को उनके कार्यों में सहायता-सलाह देती है-सिवाय +उन मामलों के, जहां संविधान के तहत उन्हें अपने कुछ कार्य या कोई कार्य अपने विवेक से करना होता +है। नगालैंड के मामले में संविधान के अनुच्छेद 371 “ए” के अंतर्गत राज्यपाल को कानून-व्यवस्था के बारे +में विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है। यद्यपि कानून-व्यवस्था से संबंधित मामलों में उनके लिए मंत्रिपरिषद् +से परामर्श करना जरूरी होता है, फिर भी वह कार्रवाई के बारे में अपना स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं। +इसी प्रकार अरूणाचल प्रदेश के मामले में संविधान के अनुच्छेद 371 “एच” के अधीन कानून- +व्यवस्था तथा उससे संबंधित कार्यों को निपटाने में राज्यपाल का विशेष दायित्व है। राज्यपाल मंत्रिपरिषद् +के परामर्श के बाद कार्रवाई के मामले में अपने निर्णय का इस्तेमाल करेंगे। किंतु ये सभी व्यवस्थाएं अस्थायी +हैं। यदि राष्ट्रपति राज्यपाल से प्राप्त रिपोर्ट या किसी अन्य आधार पर संतुष्ट हो जाएं कि कानून-व्यवस्था +के मामले में राज्यपाल को विशेष दायित्व सौंपना अब आवश्यक नहीं है, तो वह आदेश जारी करके ऐसे +निर्देश दे सकते हैं। +इसी प्रकार असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय इलाकों पर लागू होने वाली छठीं +अनुसूची के पैरा 20 में किए गए उल्लेख के अनुसार, जिला परिषद् और राज्य सरकार के बीच रॉयल्टी +के बंटवारे से संबंधित मामलों में राज्यपाल को अपने विवेक का इस्तेमाल करने के अधिकार दिए गए हैं। +छठी अनुसूची में मिजोरम और त्रिपुरा के राज्यपालों को दिसंबर, 1998 से लागू लगभग सभी कार्यों (कर +लगाने और जिला परिषदों द्वारा गैर-जनजातीय समुदाय के उधार धन देने वालों के मामलों को छोड़कर) +में अपना विवेक इस्तेमाल करने के अतिरिक्त अधिकार मिले हुए हैं। सिक्किम के राज्यपाल को राज्य में +शांति तथा जनता के विभिन्न वर्गों के लोगों की सामाजिक और आर्थिक उन्नति का विशेष उत्तरदायित्व सौंपा +गया है। +सभी राज्यपालों को अपने ऐसे संवैधानिक कार्य करते समय, जैसे-राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति +अथवा राज्य में संवैधानिक तंत्र की असफलता की रिपोर्ट को भेजते समय अथवा राज्य विधानमंडल द्वारा +पारित किसी भी प्रस्ताव को स्वीकृति देने से संबंधित मामलों में अपने स्वतंत्र विवेक से निर्णय लेना होता +है। +मंत्रिपरिषद्. +मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा अन्य मंत्रियों +की नियुक्ति की जाती है। मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी +होती है। +विधानमंडल. +प्रत्येक राज्य में एक विधानमंडल होता है, जिसके अंतर्गत राज्यपाल के अतिरिक्त एक या दो सदन होते +हैं। बिहार, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में विधानमंडल के दो सदन हैं, जिन्हें +विधानपरिषद् और विधानसभा कहते हैं। शेष राज्यों में विधानमंडल का केवल एक ही सदन है, जिसे +विधानसभा कहा जाता है। किसी वर्तमान विधानपरिषद् को समाप्त करने या जहां वह नहीं है, वहां उसे +बनाने के लिए यदि संबंधित विधानसभा प्रस्ताव पारित करे तो संसद कानून बनाकर ऐसी व्यवस्था कर +सकती है। +विधानपरिषद्. +प्रत्येक राज्य की विधानपरिषद् के सदस्यों की कुल संख्या राज्य के विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या +के एक-तिहाई से अधिक तथा किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं होगी (जम्मू-कश्मीर के संविधान की +धारा 50 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर विधानपरिषद् में 36 सदस्य हैं)। परिषद् के लगभग एक-तिहाई सदस्य +उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा उन व्यक्तियों में से निर्वाचित किए जाते हैं, जो विधानसभा के +सदस्य नहीं हों। एक तिहाई सदस्यों का निर्वाचन नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों और राज्य के अन्य स्थानीय +निकायों के सदस्यों के निर्वाचक-मंडल करते हैं। कुल सदस्य संख्या के 12वें भाग के बराबर सदस्यों का +निर्वाचन राज्य की माध्यमिक स्तर की शिक्षा संस्थाओं में कम-से-कम तीन वर्ष से काम कर रहे अध्यापकों +के निर्वाचक मंडल करते हैं। अन्य 12वें भाग के बराबर संख्या में सदस्यों का निर्वाचन ऐसे पंजीकृत स्नातक +करते हैं, जिन्हें उपाधि प्राप्त किए तीन वर्ष से अधिक हो गए हों। शेष सदस्यों के नाम राज्यपाल द्वारा ऐसे +व्यक्तियों में से निर्दिष्ट किए जाते हैं, जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन तथा सामाजिक +सेवा के क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त की हो। विधान परिषदें भंग नहीं होती हैं। उनके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक +दूसरे वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त हो जाते हैं। +विधानसभा. +किसी राज्य की विधानसभा में अधिक-से-अधिक 500 तथा कम-से-कम 60 सदस्य होते हैं (संविधान +के अनुच्छेद 371 “एफ” के अनुसार, सिक्किम विधानसभा में 32 सदस्य हैं)। इनका निर्वाचन उस राज्य +के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष मतदान द्वारा किया जाता है। प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन +इस ढंग से किया जाना चाहिए कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उस निर्वाचन क्षेत्र के लिए नियत +किए गए स्थानों की संख्या के बीच अनुपात, जहां तक संभव हो, संपूर्ण राज्य में समान रहे। विधानसभा +का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है, बशर्ते कि वह पहले भंग न कर दी जाए। +राज्य विधानमंडलों को संविधान की सातवीं अनुसूची-II में वर्णित विषयों पर पूर्ण अधिकार तथा उनकी +सूची-III में दिए गए विषयों पर केंद्र के साथ मिले-जुले अधिकार प्राप्त हैं। विधानमंडल की वित्तीय शक्तियों +के अंतर्गत सरकार द्वारा किया जाने वाला संपूर्ण व्यय, लगाए जाने वाला कर और ऋण प्राप्त करना शामिल +है। वित्त विधेयक केवल विधानसभा में ही पेश हो सकता है। विधान परिषद वित्त विधेयक प्राप्त होने के +14 दिनों के भीतर, उसमें आवश्यक कार्रवाई के लिए केवल सिफारिश कर सकती है, परंतु परिषद् की +सिफारिशों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के लिए विधानसभा स्वतंत्र है। +विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यपाल, भारत के राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजने से रोक सकता +है। संपत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण, उच्च न्यायालयों की शक्ति और स्थिति पर प्रभाव वाले उपाय, अंतर्राज्यीय +नदी या नदी घाटी योजनाओं में पानी या बिजली के संग्रह, वितरण और बिक्री पर कर लगाने जैसे विषयों +से संबंधित विधेयक अनिवार्यत— इस प्रकार से रोके रखे जाने चाहिए। राज्य विधानमंडल में अंतर्राज्यीय +व्यापार पर रोक लगाने का कोई विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। +राज्य विधानमंडल वित्त पर सामान्य नियंत्रण रखने के अतिरिक्त, कार्यपालिका के दिन-प्रति-दिन के कार्यों +पर निगरानी रखने के लिए प्रश्नों, चर्चाओं, वाद-विवादों, स्थगन, अविश्वास प्रस्तावों तथा संकल्पों आदि +सामान्य प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं। उनकी अपनी प्राक्कलन तथा लेखा समितियां भी होती हैं, जो यह +सुनिश्चित करती हैं कि विधानमंडल द्वारा स्वीकृत अनुदानों का उचित उपयोग किया जाए। +केंद्रशासित प्रदेश. +केंद्रशासित प्रदेशों का शासन राष्ट्रपति द्वारा चलाया जाता है और वह इस बारे में जहां तक उचित समझें, +अपने द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से कार्य करता है। अंडमान-निकोबार, दिल्ली और पांडिचेरी के +प्रशासकों को उपराज्यपाल कहा जाता है, जबकि चंडीगढ़ का प्रशासक मुख्य आयुक्त कहलाता है। इस +समय पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ का प्रशासक हैं। दादरा और नगर हवेली का प्रशासक दमन और +दीव का कार्य भी देखता है। लक्षद्वीप का अलग प्रशासक है। +राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और केंद्रशासित प्रदेश पांडिचेरी की अपनी-अपनी विधानसभाएं और +मंत्रिपरिषद् हैं। पांडिचेरी विधानसभा संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II में और III में निहित, +केंद्रशासित प्रदेशों से संबद्ध मामलों के बारे में, जहां तक के मामले केंद्रशासित क्षेत्र पर लागू होते हैं, कानून +बना सकती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधान सभा को भी संविधान की अनुसूची-II की प्रविष्टि +1, 2 और 18 को छोड़कर, ये सभी शक्तियां प्राप्त हैं। कुछ विशेष विधेयकों के लिए केंद्र सरकार की अग्रिम +स्वीकृति लेना भी अनिवार्य है। केंद्रशासित प्रदेश पांडिचेरी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की विधान +सभाओं द्वारा पारित कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ और मंजूरी देने के लिए रोक लिया जाता है। +स्थानीय प्रशासन. +नगरपालिकाएं. +भारत में स्थानीय निकायों का लंबा इतिहास है। सर्वप्रथम पूर्व-प्रेसीडेंसी शहर मद्रास में नगर निगम की +स्थापना 1688 में की गई। उसके बाद 1726 में इसी तरह के नगर निगम मुंबई और कोलकाता (तत्कालीन +मुंबई और कलकत्ता) में स्थापित किए गए। भारतीय संविधान में संसद और विधानसभाओं में लोकतंत्र की +रक्षा की विस्तृत व्यवस्थाएं की गई हैं। लेकिन, संविधान में शहरी क्षेत्रों के लिए स्थानीय शासन पर स्पष्ट +उल्लेख नहीं है। राज्य के नीति निर्देशक-सिद्धातों में गांवों में पंचायत व्यवस्था का उल्लेख है, लेकिन राज्यों +की सूची में प्रविष्टि 5 को छोड़कर, नगरपालिकाओं का कोई जिक्र नहीं किया गया है। इस प्रविष्टि में +स्थानीय स्वशासन की जिम्मेदारी राज्य सरकार को सौंपी गई है। +स्थानीय शहरी निकायों के लिए समान ढांचा तैयार करने और इन निकायों को स्वायत्तशासी सरकार +की प्रभावशाली लोकतांत्रिक इकाई के रूप में मजबूत बनाने के कार्य में मदद करने के उद्देश्य से संसद ने +1992 में (नगरपालिका एक्ट) नगरपालिकाओं से संबंधित संविधान (74वां संशोधन) अधिनियम, 1992 +पारित किया। इस अधिनियम को राष्ट्रपति ने 20 अप्रैल, 1993 को अपनी स्वीकृति प्रदान की। भारत सरकार +ने अधिसूचना जारी करके 1 जून, 1993 से इस अधिनियम को लागू कर दिया। संविधान में नगरपालिकाओं +के संबंध में एक नया खंड IX-क जोड़ दिया गया है, ताकि अन्य बातों के अलावा तीन प्रकार की +नगरपालिकाओं का गठन किया जा सके — ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में परिवर्तित हो रहे क्षेत्रों के लिए +नगर पंचायतें, छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए नगरपालिका परिषदें और बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए नगर निगम; +निर्धारित अवधि की नगरपालिकाएं, राज्य निर्वाचन आयोगों की नियुक्ति, राज्य वित्त आयोगों की नियुक्ति +और महानगर तथा जिला योजना समितियों का गठन। सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने अपने निर्वाचन +आयोगों और वित्त आयोगों का गठन कर लिया है। +पंचायतें. +संविधान के अनुच्छेद 40 में दिए गए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य +ग्राम पंचायतों के गठन के लिए कदम उठाएगा और उन्हें इस प्रकार के अधिकार प्रदान करेगा कि वे एक +स्वायत्तशासी सरकार की इकाई के रूप में काम कर सकें। +उपर्युक्त को ध्यान में रखते हुए संविधान में पंचायतों से संबंधित एक नया खंड (IX) जोड़ा गया +है, जिसमें अन्य बातों के अलावा, निम्नलिखित व्यवस्था भी की गई है-गांव अथवा गांवों के समूह में +ग्राम सभा; ग्राम और अन्य स्तरों या स्तर पर पंचायतों का गठन; ग्राम और उसके बीच के स्तर पर पंचायतों +की सभी सीटों के लिए और इन स्तरों पर पंचायतों के अध्यक्षों के लिए सीधा चुनाव; ऐसे स्तरों पर पंचायत- +सदस्यों आैर पंचायत-अध्यक्षों के पदों के लिए जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति और अनुसूचित +जनजाति के वास्ते सीटों का आरक्षण; महिलाओं के लिए कम-से-कम एक तिहाई आरक्षण, पंचायत के +लिए पांच साल के कार्यकाल का निर्धारण करना और किसी भी पंचायत की बर्खास्तगी की स्थिति में छह +महीने के भीतर उसका चुनाव कराना। +निर्वाचन आयोग. +भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव कराने तथा संसद और विधानसभाओं का चुनाव कराने के लिए +निर्देशन, नियंत्रण और मतदाता सूचियां तैयार करने का अधिकार, भारत के निर्वाचन आयोग को दिए गए हैं। +भारत का निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है। इसकी स्थापना 1950 में हुई और अक्तूबर, +1989 तक आयोग ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में एक सदस्यीय निकाय के तौर पर काम किया। नवंबरदिसंबर +, 1989 में संसद के लिए हुए आम चुनाव के मौके पर राष्ट्रपति ने 16 अक्तूबर, 1989 को दो और +निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की। लेकिन एक जनवरी, 1990 को जब इन दोनों निर्वाचन आयुक्तों के पद +समाप्त कर दिए गए तो दोनों आयुक्त अपने पदों से हट गए। एक अक्तूबर, 1993 को राष्ट्रपति ने एक बार +फिर दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की। इसके साथ ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन +आयुक्तों (सेवा शर्तें) के अधिनियम, 1991 में संशोधन किया गया तथा यह व्यवस्था की गई कि मुख्य +निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के अधिकार समान होंगे और दोनों को एक समान वेतन, भत्ते, +और वे सभी सुविधाएं मिलेंगी, जो भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को मिलती हैं। इस अधिनियम +में यह भी व्यवस्था की गई है कि यदि किसी मामले को लेकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा दो अन्य निर्वाचन +आयुक्तों के बीच कोई वैचारिक मतभेद पैदा हो जाए तो आयोग द्वारा उसका फैसला बहुमत के आधार पर +किया जाएगा। इस अधिनियम की वैधता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है और 1993 में इसका नया +नाम निर्वाचन आयोग (निर्वाचन आयुक्तों की सेवा-शर्तें तथा कार्य निष्पादन) अधिनियम, 1991 रख दिया +गया है। लेकिन उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने याचिका खारिज कर दी और +14 जुलाई, 1995 को अपने सर्वसम्मत निर्णय से उक्त कानून के प्रावधानों को बरकरार रखा। +संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के तहत विशेष प्रावधानों के जरिए निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता +तथा कार्यपालिका के हस्तक्षेप से उसकी रक्षा की गई है। इन प्रावधानों के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त +को उसके पद से नहीं हटाया जा सकता है। केवल उन्हीं परिस्थितियों में हटाया जा सकता है, जिनमें उच्चतम +न्यायालय के न्यायाधीश हटाए जा सकते हैं तथा उसकी नियुक्ति के पश्चात् मुख्य निर्वाचन आयुक्त की +सेवा-शर्तें उसके कार्य के रास्ते में बाधक नहीं होंगी। अन्य निर्वाचन आयुक्तों को केवल मुख्य निर्वाचन +आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों +का कार्यकाल उनके पद संभालने की तिथि से लेकर छह वर्ष तक अथवा 65 वर्ष की आयु तक दोनों में +जो भी पहले हो, होता है। +संशोधन. +संसद द्वारा 22 मार्च, 2003 को चुनाव कानून (संशोधन) अधिनियम, 2003 और चुनाव आचार संहिता +(संशोधन) कानून, 2003 पारित किए, जो कि 22 सितंबर, 2003 प्रभाव में आए। इन कानूनों के जरिए +अर्धसैनिक बलों के कर्मचारियों और उनके संबंधियों को प्रॉक्सी मतदान की सुविधा मिल गई। इन सेवाओं +में कार्यरत कर्मचारी जो अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहते हैं, वे एक प्रतिपत्र तैयार करके अपने +निर्वाचन क्षेत्र के मतदान अधिकारी को भेज सकते हैं। +चुनाव तथा उससे संबंधित अन्य कानून (संशोधित) विधेयक, 2003 (46वां संशोधन) संसद द्वारा +11 सितंबर, 2003 को पारित किया गया। इस संशोधन के जरिए मुख्य कानून में दो नई धाराएं 29 बी और +29 सी शामिल की गईं जिनमें प्रावधान किया गया कि किसी भी व्यक्ति, संस्था द्वारा किसी राजनीतिक दल +को 20,000 रूपये से अधिक चंदा दिए जाने की सूचना निर्वाचन आयोग को दी जाएगी और तभी उसे +आयकर कानून 1961 के तहत आयकर से रियायत दी जाएगी। मुख्य कानून के भाग-ए (धारा 78ए और +78बी) में मतदाता सूची की एक प्रति और कुछ अन्य जरूरी सामान पंजीकृत राजनीतिक दल के उम्मीदवार +को उपलब्ध कराई जाएंगी। इस कानून की धारा 77 (1) में संशोधन किया गया जिसमें उम्मीदवार द्वारा +चुनाव खर्च का लेखा-जोखा रखने, राजनीतिक दलों के कुछ विशेष नेताओं द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान +विमान से यात्रा, अन्य साधनों से की गई यात्रा में हुए खर्च को छूट दिए जाने का प्रावधान है, बशर्ते कि +वह उसे अपने चुनाव के खर्च में शामिल करता है। +संसद ने एक जनवरी, 2004 को निर्वाचन क्षेत्र सीमांकन विधेयक (संशोधित) 2003 पारित किया +जिसमें मुख्य कानून की धारा (4) में संशोधन करते हुए यह प्रावधान किया गया कि निर्वाचन क्षेत्रों का +सीमांकन 2001 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा। +संसद द्वारा 28 अगस्त, 2003 को जनप्रतिनिधि (संशोधन) कानून, 2003 पारित किया गया जिसमें +राज्यों की विधानसभा परिषदों के चुनाव के लिए खुली मतदान की प्रणाली लागू करने का प्रावधान किया +गया है। इस प्रणाली के अनुसार मतदाता अपना मतपत्र पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखा सकता है। यह +भी प्रावधान किया गया कि विधान परिषद की सीट के लिए चुनाव लड़ रहा उम्मीदवार भी आवश्यकता +पड़ने पर अपने मताधिकार का उपयोग कर सकता है। +चुनाव सुधार. +दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर 1998 की याचिका संख्या 4912 - (कुशरा भरत बनाम भारत सरकार और +अन्य) के सिलसिले में न्यायालय ने आदेश दिया है कि उम्मीदवारों की सरकारी देनदारी जैसे सरकारी +मकान, बिजली, पानी, टेलीफोन और वाहन आदि (जिसमें विमान और हेलीकॉप्टर द्वारा की गई यात्रा भी +शामिल है) और अन्य बकाया की सूचना निर्वाचन प्राधिकारियों द्वारा कम से कम दो स्थानीय समाचार- +पत्रों में मतदाताओं की सूचनार्थ प्रकाशित की जाएगी। निर्वाचन आयोग के संशोधित आदेश दिनांक 27 मार्च, +2003 के द्वारा मतदाताओं के सूचना के अधिकार को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवार की पृष्ठभूमि संबंधी +हलफनामा के पैरा 3(अ) iii में संशोधन किया गया है। आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों को भी +निर्देश जारी किए हैं कि उम्मीदवार द्वारा हलफनामे में भरी गई सूचना को समाचार-पत्रों में प्रकाशित किया +जाए ताकि मतदाताओं को उम्मीदवार के बारे में पूरी जानकारी मिल सके। +लोकसभा का कार्यकाल और उसके अध्यक्ष. +लोकसभा गठन के पश्चात भंग होने की अध्यक्ष1 का नाम से तक की प्रथम बैठक तिथि +पहली लोकसभा 13 मई, 1952 4 अप्रैल, 19572 गणेश वासुदेव मावलंकर 15 मई, 1952 27 फरवरी, 19563 +एम. अनंतशयनम आयंगर 8 मार्च, 1956 10 मई, 1957 +दूसरी लोकसभा 10 मई, 1957 31 मार्च, 19624 एम. अनंतशयनम आयंगर 11 मई, 1957 16 अप्रैल, 1962 +तीसरी लोकसभा 16 अप्रैल, 1962 3 मार्च, 19675 हुकम सिंह 17 अप्रैल, 1962 16 मार्च, 1967 +चौथी लोकसभा 16 मार्च, 1967 27 दिसंबर, 19706 नीलम संजीव रेड्डी 17 मार्च, 1967 19 जुलाई, 19697 +गुरदयाल सिंह ढिल्लों 8 अगस्त, 1969 19 मार्च, 1971 +पांचवीं लोकसभा 19 मार्च, 1971 18 जनवरी, 19778 गुरदयाल सिंह ढिल्लों 22 मार्च, 1971 1 दिसंबर, 19759 +बलिराम भगत 5 जनवरी, 1976 25 मार्च, 1977 +छठी लोकसभा 25 मार्च, 1977 22 अगस्त, 197910 नीलम संजीव रेड्डी 26 मार्च, 1977 13 जुलाई, 197711 +के.एस. हेगड़े 21 जुलाई, 1977 21 जनवरी, 1980 +सातवीं लोकसभा 21 जनवरी, 1980 31 दिसंबर, 198412 बलराम जाखड़ 22 जनवरी, 1980 15 जनवरी, 1985 +आठवीं लोकसभा 15 जनवरी, 1985 27 नवंबर, 198913 बलराम जाखड़ 16 जनवरी, 1985 18 दिसंबर, 1989 +नौवीं लोकसभा 18 दिसंबर, 1989 13 मार्च, 199114 रवि राय 19 दिसंबर, 1989 9 जुलाई, 1991 +दसवीं लोकसभा 9 जुलाई, 1991 10 मई, 1996 शिवराज वी. पाटिल 10 जुलाई, 1991 22 मई, 1996 +ग्यारहवीं लोकसभा 22 मई, 1996 4 दिसंबर, 199715 पी.ए. संगमा 23 मई, 1996 23 मार्च, 1998 (पूर्वाह्न) +बारहवीं लोकसभा 23 मार्च, 1998 26 अप्रैल, 199916 जी.एम.सी. बालयोगी 24 मार्च, 1998 20 अक्तूबर, 1999 (पूर्वाह्न) +तेरहवीं लोकसभा 20 अक्तूबर, 1999 6 फरवरी 200418 जी.एम.सी. बालयोगी 22 अक्तूबर 1999 3 मार्च 200217 +मनोहर गजानन जोशी 10 मई, 2002 2 जून, 2004 +चौदहवीं लोकसभा 2 जून, 2004 18 मई 2009 सोमनाथ चटर्जी 4 जून, 2004 18 मई 2009 +पंद्रहवीं लोकसभा 1 जून, 2009 - श्रीमती मीरा कुमार 1 जून, 2009 अब तक + +कृषि: +भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि और उससे +संबंधित क्षेत्रों का योगदान 2007-08 और 2008-09 के दौरान क्रमशः 17.8 और 17.1 प्रतिशत +रहा। हालांकि कृषि उत्पादन मानसून पर भी निर्भर करता है, क्योंकि लगभग 55.7 प्रतिशत कृषि-क्षेत्र +वर्षा पर निर्भर है। +वर्ष 2008-09 के चौथे पूर्व आकलन के अनुसार खाद्यान्न का उत्पादन 238.88 करोड़ टन होने +का अनुमान है। ये पिछले वर्ष की तुलना में 1 करोड़ 3.1 लाख टन अधिक है। चावल का उत्पादन 9 +करोड़ 91 लाख टन होने का अनुमान है जो पिछले वर्ष की तुलना में 24 लाख टन अधिक है। गेहूं का +उत्पादन 8 करोड़ 5 लाख टन होने की उम्मीद है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 20 लाख टन अधिक है। +इसी तरह मोटे अनाज का उत्पादन 3 करोड़ 94 लाख टन होने की उम्मीद है, एवं दलहन का उत्पादन +एक करोड़ 46 लाख टन से अधिक होने का अनुमान है जो वर्ष 2007-08 की तुलना में 0.99 लाख टन +अधिक है। गन्ने का उत्पादन 2712.54 लाख टन होने की उम्मीद है, जो वर्ष 2007-08 की तुलना में +769.34 लाख टन कम है। कपास का उत्पादन 231.56 लाख गांठें अनुमानित है (प्रत्येक गांठ का वजन +170 किलोग्राम) जो वर्ष 2007-08 की तुलना में 27.28 लाख गांठें अधिक है। 2008-09 के दौरान जूट +एवं मेस्टा की पैदावार 104.07 लाख गांठें (प्रत्येक गांठ का वजन 180 किलोग्राम) होने का अनुमान है, +जो वर्ष 2007-08 की तुलना में 8.04 लाख गांठ कम है। +वर्ष 2008-09 के दौरान खाद्यान्नों का फसल क्षेत्र एक करोड़ 23 लाख हेक्टेयर रखा गया है, +जबकि पिछले वर्ष यह क्षेत्र 1.24 करोड़ हेक्टेयर था। चावल का फसल क्षेत्र 453.52 लाख हेक्टेयर रखा +गया है जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 14.37 लाख हेक्टेयर अधिक है। गेहूं का फसल क्षेत्र वर्ष +2008-09 में 278.77 लाख हेक्टेयर अनुमानित है, जो वर्ष 2007-08 के गेहूं के फसल क्षेत्र से 1.62 +लाख हेक्टेयर कम है। मोटे अनाज का फसल क्षेत्र वर्ष 2008-09 में 276.17 लाख हेक्टेयर अनुमानित +है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.64 लाख हेक्टेयर कम है। +अनाजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 2008-09 में 2007-08 के मुकाबले बढ़ोतरी 8 प्रतिशत +(गेहूं) से लेकर 52.6 प्रतिशत (रागी) तक हुई। साधारण धान के मामले बढ़ोतरी 31.8 प्रतिशत, दालोमें 8.1 प्रतिशत (चना) और उड़द तथा मूंग में 42.8 प्रतिशत रही। +प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन. +प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और वर्षा सिंचित खेती प्रणाली के कार्यक्रम और योजनाएं. +भूमि पौधों और अन्य जीवों के लिए जल और अन्य पोषक तत्त्वों के भंडार के रूप में कार्य करती है। +खाद्य, ऊर्जा और अन्य मानवीय आवश्यकताओं की मांग भूमि की उत्पादकता के संरक्षण और सुधार पर +निर्भर करती है। भारत की जनसंख्या विश्व की 18' और पशुओं की 15' है, जिसके लिए भौगोलिक +क्षेत्र का 2' और 1.5' वन तथा चरागाह है। मानव और पशुओं की जनसंख्या में पिछले दशकों में हुई +वृद्धि से प्रतिव्यक्ति भूमि की उपलब्धता कम हुई है। प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1951 के 0.89 हेक्टेयर के +मुकाबले 1991 में 0.37 हेक्टेयर हो गई और यह 2035 में 0.20 हेक्टेयर हो जाएगी। जहां तक कृषि +भूमि का सवाल है, वह 1951 के 0.48 हेक्टेयर के मुकाबले 1991 में 0.16 हेक्टेयर हो गई और इसके +2035 तक गिरकर 0.08 हेक्टेयर हो जाने की संभावना है। प्रतिव्यक्ति भूमि की उपलब्धता जनसंख्या +वृद्धि के कारण कम हो रही है। +भारत के कुल 32 करोड़ 87 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र का 14 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर कृषि +योग्य है। इसका 5.7 करोड़ हेक्टेयर (40') सिंचित और 8.5 करोड़ हेक्टेयर (60') वर्षा सिंचित है। +यह क्षेत्र वायु और जलीय क्षरण और सघन कृषि उत्पादन के कारण क्षरण के विभिन्न चरणों पर निर्भर +करता है। इसलिए अधिकतम उत्पादन प्रति इकाई भूमि और प्रति इकाई जल से सुधार की जरूरत है। +वर्षा आधारित कृषि में उत्पादकता और लागत दोनों कम होती है। फसल उत्पादन साल दर साल वर्षा में +अस्थायित्व पर निर्भर करता है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में 20 करोड़ से अधिक ग्रामीण गरीब रहते हैं। +जोखिम भरे क्षेत्रों में व्यापक बदलाव और पैदावार में अस्थिरता दिखाई देती है। +देश में भूमि क्षरण का आकलन विभिन्न एजेंसियों ने किया है। क्षरित भूमि की पहचान और उनके +अंकन में अलग तरीके अपनाने से इन एजेंसियों के अनुमानों में व्यापक अंतर है जो 6.39 करोड़ हेक्टेयर +से 18.7 करोड़ हेक्टेयर तक है। भूमि क्षरण का आकलन मुख्य रूप से राष्ट्रीय कृषि आयोग (1976), +बंजर भूमि विकास संवर्धन सोसायटी (1984), राष्ट्रीय दर संवेदी एजेंसी (1985), कृषि मंत्रालय +(1985) और राष्ट्रीय भूमि सर्वे और भूमि उपयोग ब्यूरो (1984 तथा 2005) ने किया। +देश भर में भूमि क्षरण के कई रूप हैं। व्यापक और आवधिक वैज्ञानिक सर्वे न होने के कारण +अनुमान स्थानीय सर्वेक्षणों और अध्ययनों पर आधारित हैं। वर्ष 2005 में आईसीएआर के नागपुर स्थित +राष्ट्रीय भूमि सर्वे और भूमि उपयोग ने प्रकाशित किया है कि 14.68 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र विभिन्न प्रकार +के भूमि क्षरण से प्रभावित है। इसमें 9.36 करोड़ हेक्टेयर जलीय क्षरण, 94.8 लाख हेक्टेयर वायु क्षरण, +1.43 करोड़ हेक्टेयर जल क्षरण। बाढ़, 59.4 लाख हेक्टेयर खारापन। क्षारीय, 1.6 करोड़ हेक्टेयर भूमि +अम्लता और 73.8 लाख हेक्टेयर जटिल समस्या शामिल है। +भूमि विकास के लिए जलसंभरण कार्यक्रम. +विभिन्न जल संभरण विकास कार्यक्रम, यथा (i) वर्षासिंचित क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय जलसंभरण विकास +परियोजना (एनडब्लूडीपीआरए) (ii) नदी घाटी परियोजना और बाढ़ प्रवृत नदी के जलग्रहण क्षेत्र में +भूमि संरक्षण (आरवीवी और पीपी आर) (iii) क्षारीय और अम्लीय भूमि की पुनर्प्राप्ति और विकास +(आरएडीएएस) (i1) झूम खेती क्षेत्रों में जलसंभरण विकास परियोजना (डब्लूडीपीएससीए) का +कार्यान्वयन हो रहा है। +जलसंभरण विकास योजनाएं/कार्यक्रम — प्रभागवार और कार्यक्रमानुसार विवरण निम्नलिखित हैं— +एनआरएम की योजनाएं और कार्यक्रम. +देश में भूमि-क्षरण को रोकने और क्षरित भूमि की उत्पादन क्षमता बहाल करने के उद्देश्य से प्राकृतिक +संसाधन प्रबंधन केंद्र प्रायोजित तीन कार्यक्रमों और केंद्रीय क्षेत्र की तीन योजनाओं का क्रियान्वयन कर +रहा है। योजनावार कार्यक्रम/योजनाओं की विशिष्ट बातें हैं — +केंद्रीय/क्षेत्र योजना (योजना और गैर योजना) +एसएलयूएसआई — केंद्रीय क्षेत्र की योजना भारतीय भूमि एवं भूमि उपयोग सर्वे जलग्रहण। जलसंभरण +के भूमि का सर्वे करता है। संगठन जिलावार भूमि क्षरण नक्शा तैयार करने में भी लगा है। इसके 2009- +10 के प्रस्तावित लक्ष्य इस प्रकार हैं — +(अ) त्वरित गहन सर्वेक्षण (आरआरएएन)- 156.00 लाख हेक्टेयर +(ब) विस्तृत भूमि सर्वेक्षण (डीएसएस)- 1.60 लाख हेक्टेयर +(स) क्षरित भूमि का मानचित्र (एलडीएम)- 0.10 लाख हेक्टेयर +(द) भूमि संसाधन मानचित्र (एसआरएम)- 161.00 लाख हेक्टेयर +लक्ष्य पूर्ति के लिए योजना के तहत 14 करोड़ रूपए और गैर योजना के लिए 2.32 करोड़ रूपए +आवंटित किए गए है। +एससीटीसी-डीवीसी (गैर योजना) — राज्य सरकारों के तहत भूमि और जल संरक्षण के लिए कार्य +करने वाले अधिकारियों के प्रशिक्षण क्षमता निर्माण के लिए हजारीबाग स्थित दामोदर घाटी निगम में भूमि +संरक्षण प्रशिक्षण केंद्र को वित्तीय सहायता प्रदान कर गैर योजना स्कीम के रूप में क्रियान्वित किया जा +रहा है। वर्ष 2009-10 में विभिन्न अल्प और मध्यकालिक पाठ्यक्रमों के लिए 0.45 करोड़ रूपए +आवंटित किए गए हैं। +डब्लूडीपीएससीए (योजना) — पूर्वोत्तर के राज्यों में राज्य योजना को 100' विशेष केंद्रीय सहायता से +झूम खेती वाले क्षेत्रों में जलविभाजक विकास परियोजना लागू की जा रही। इस योजना के तहत दसवीं +योजना में 3.03 हेक्टेयर क्षेत्र में कार्य हो चुका है। 2009-10 में लगभग 0.40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र इसके +तहत लाया जाएगा, जिस पर लगभग 40 करोड़ रूपए व्यय होंगे। +केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम (योजना-एमएमए के तहत शामिल) आरवीपी और पीपीआर — नदी घाटी +जल ग्रहण एवं बाढ़ोन्मुख नदी क्षेत्र में भूमि संरक्षण के तहत शुरू से दसवीं योजना तक 65.27 लाख +हेक्टेयर का उपचार किया गया। 2009-10 में 290 करोड़ रूपए की लागत से 2.80 हेक्टेयर का लक्ष्य +रखा गया है। +आरएडीएएस — क्षारीय और अम्लीय भूमि सुधार और विकास कार्यक्रम क्षारीय भूमि वाले राज्यों में लागू +किया जा रहा है। शुरू से दसवीं योजना तक 0.59 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य बनाया गया। 2009-10 में +14 करोड़ रूपए की लागत से 0.25 हेक्टेयर को कृषि योग्य बनाए जाने का लक्ष्य है। +क्षरित भूमि के विकास के लिए आरएफएस प्रखंड की योजनाएं/कार्यक्रम +आरएफएस डिवीजन वर्षा सिंचित क्षेत्रों सहित क्षरित भूमि के विकास के लिए कुछ कार्यक्रम चला रहा +है। प्रमुख कार्यक्रम इस प्रकार हैं — +(अ) वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय जलसंभरण विकास परियोजना-(एनडब्लूडीपीआरए) वर्ष +1991-92 में 28 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिए एक राष्ट्रीय +जलसंभर विकास परियोजना एकीकृत जलसंभरण प्रबंधन और सतत् कृषि प्रणाली की अवधारणा +के साथ लागू की गई। शुरू से दसवीं योजना के अंत तक कार्यक्रम के तहत 94.02 लाख हेक्टेयर +भूमि विकसित की गई है। लघु जलसंभरण सहित 30 लाख हेक्टेयर विकसित करने का प्रस्ताव +है। 2009-10 में 300 करोड़ रूपए की अनुमानित लागत से 2.80 हेक्टेयर का लक्ष्य रखा गया है। +(ब) राष्ट्रीय वर्षा सिंचित प्राधिकरण (एनआरएए)-देश के वर्षा सिंचित क्षेत्रों की समस्या पर ध्यान +देने के लिए केंद्र सरकार ने 3 नवंबर, 2006 को राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण का गठन +किया है। प्राधिकरण सलाह, नीति निर्धारण और निगरानी के साथ वर्तमान परियोजनाओं में +दिशानिर्देशों की जांच के अलावा क्षेत्र में बाहरी सहायता से चलने वाली परियोजनाओं सहित नई +परियोजनाएं तैयार करता है। इसका अधिकतर क्षेत्र केवल जल संरक्षण ही नहीं, बल्कि उचित +कृषि और जीविका प्रणाली सहित वर्षा सिंचित क्षेत्रों का सतत और समग्र विकास है। यह +भूमिहीनों और सीमांत किसानों के मुद्दों पर भी ध्यान देगा क्योंकि वर्षा सिंचित क्षेत्रों में उनकी +संख्या अधिक है। +प्राधिकरण का ढांचा द्विस्तरीय है। पहला शासी निकाय है, जो कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए +उचित नेतृत्व और समन्वय का कार्य करता है। केंद्रीय कृषि मंत्री इसके अध्यक्ष और केंद्रीय ग्रामीण +विकास मंत्री सह-अध्यक्ष हैं। दूसरी कार्यकारी समिति है जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ और संबद्ध मंत्रालयों +के प्रतिनिधि हैं। कार्यकारी समिति में एक प्रमुख मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है, उसमें पांच +पूर्णकालिक तकनीकी विशेषज्ञ भी हैं। प्राधिकरण 14 मई, 2007 से कार्य करने लगा है। प्राधिकरण में +पांच में से चार तकनीकी विशेषज्ञ अतिरिक्त सचिव स्तर के हैं। कृषि/बागवानी क्षेत्र के विशेषज्ञों की +नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है। +प्राधिकरण ने जलसंभरण विकास परियोजना के साझा दिशा-निर्देश तैयार किए और शासी निकाय +की स्वीकृति के बाद उन्हें तदनुसार क्रियान्वयन के लिए सभी राज्यों को जारी कर दिया गया है। +(स) वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास कार्यक्रम (आएडीपी)-केंद्रीय वित्त मंत्री ने 2007-08 में वर्षा सिंचित +क्षेत्र विकास कार्यक्रम की घोषणा की थी। योजना आयोग ने केंद्र प्रायोजित इस योजना के +क्रियान्वयन के लिए ग्यारहवीं योजना में 3500 करोड़ रूपए की लागत से लागू करने की +सिद्धांतरूप से सहमति प्रदान कर दी है। इसके अलावा उसने एनआरएए के लिए 170 करोड़ रूपए +और 20 मार्च, 2008 को जारी किए गए। योजना आयोग और विभिन्न मंत्रालयों/विभागों/प्रखंडों +की टिप्पणियों पर आधारित संशोधित 3330 करोड़ रूपए के आवंटन के आधार पर नोट वित्त +मंत्रालय और योजना आयोग को भेजे जा चुके हैं। कार्यक्रम के तहत ग्यारहवीं योजना में 30 लाख +हेक्टेयर वर्षा सिंचित क्षेत्र शामिल किए जाने की उम्मीद है। +प्रचालन दिशा-निर्देशों का निरूपण और वितरण +राष्ट्रीय वर्षा सिंचित प्राधिकरण ने देश जलसंभरण विकास परियोजनाओं को लागू करने के लिए दिशा - +निर्देश जारी किए हैं। निर्देशों के अनुसार एनडब्लूडीपीआरए, आरवीपी एवं पीपीएम तथा आएडीएस +कार्यक्रमों के बारे में राज्यों को परिचालन संबंधी दिशा-निर्देश दिए गए हैं। झूम खेती क्षेत्र के बारे +जलसंभरण विकास कार्यक्रम के लिए भी दिशा-निर्देश राज्य सरकारों को भेजे जा चुके हैं। +वृहद् कृषि-प्रबंधन. +कृषि राज्य का विषय होने के कारण कृषि उत्पादन बढ़ाने, पैदावार बढ़ाने और इस क्षेत्र के अप्रयुक्त +क्षमता का इस्तेमाल करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। यद्यपि राज्य सरकार के प्रयासों में और +तेजी लाने के उद्देश्य से केंद्र द्वारा पोषित कई योजनाएं भी लागू की गई हैं जिससे देश के कृषि उत्पादन +और उत्पादकता में वृद्धि की जा सके और किसानों के जीवन में समृद्धि लाई जा सके। +वृहद् कृषि प्रबंधन केंद्र सरकार द्वारा पोषित एक योजना है जिसका उद्देश्य है विभिन्न राज्यों में +कृषि के विकास के लिए विशेष रूप से बल दिया जाए और इस योजना पर खर्च होने वाली केंद्रीय +सहायता का सही दिशा में उपयोग हो सके। यह योजना 2000-01 से सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों +में लागू की जा चुकी है। इस योजना में क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के आधार पर कार्यक्रमों को लागू करने +और कृषि विकास के लिए राज्य सरकारों को पर्याप्त छूट दी गई है। फलस्वरूप राज्यों ने अपनी +विकासात्मक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर क्षेत्रवार विकास के लिए खुलकर योजना को लागू किया +है। कृषि विकास योजना में यह योजना राज्यों के स्तर पर निर्णय लेने की दिशा में विकेंद्रीकरण की एक +बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है जिसका उद्देश्य राज्य सरकारों द्वारा तैयार किए गए कार्यक्रमों के जरिए +कृषि में तेजी से विकास करना है। +कृषि उत्पादन और उत्पादकता की बढ़ोतरी की दिशा में राज्यों की कार्यक्षमता में सुधार हेतु +2008-09 में वृहद कृषि प्रबंधन योजना संशोधित की गई है। अतिव्याप्ति और दोहराव रोकने के लिए +योजना की भूमिका को फिर से तय किया गया है ताकि खाद्य सुरक्षा के बुनियादी उद्देश्यों तथा ग्रामीण +जनता के जीवन स्तर को आज के कृषि परिदृश्य में अधिक प्रासंगिक बनाया जा सके। संशोधित योजना +की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं— (i) ऐतिहासिक आधार पर राज्यों केंशाप्र को आबंटित फंड प्रक्रिया +को बदलकर इसकी जगह सकल क्षेत्र तथा लघु एवं सीमांत जोतों पर आधारित आबंटन मानदंड अपनाया +गया है। राज्यों/केंशाप्र को सहायता शतप्रतिशत अनुदान के रूप में मुहैया कराई जाएगी; (ii) कृषि एवं +सहकारिता विभाग द्वारा संचालित सभी योजनाओं के तहत सब्सिडी नमूने को एक जैसा बनाने के लिए +सब्सिडी ढांचे को युक्तिसंगत बनाया गया है। संशोधित सब्सिडी शर्तें अधिकतम सहायता की अनुमति +देती हैं; (iii) मौजूदा “क्षारीय भूमि पुनरूद्धार” हिस्से सहित दो नए हिस्से शामिल किए गए हैं- +(क) तिलहन, दलहन, पाम आयल तथा मक्का एकीकृत योजना के तहत आने वाले क्षेत्रों के लिए दाल +और तिलहन फसल उत्पादन कार्यकम तथा (ख) अम्लीय भूमि पुनरूद्धार कार्यक्रम; (i1) नई पहल के +लिए अनुमोदित सीलिंग को आबंटन के 10 प्रतिशत से 20 प्रतिशत किया गया है; (1) फंड का कम +से कम 33 प्रतिशत लघु, सीमांत तथा महिला किसानों के लिए रखा गया है तथा (1i) संशोधित एमएमए +योजना के क्रियान्वयन की सुनिश्चितता के लिए पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) की सक्रिय +भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए जिसमें जिला/उपजिला स्तर पर योजना की समीक्षा, निगरानी और +मूल्यांकन शामिल है। +कृषि यंत्रीकरण. +किसानों के पुराने और बेकार हो चुके औजारों तथा मशीनों को हटाकर उनके स्थान पर नए आधुनिक यंत्र +उपलब्ध कराने के नीतिगत कार्यक्रम अपनाए गए हैं। इसके अंतर्गत उन्हें ट्रैक्टर, पावर ट्रिलर, हारवेस्टर व +अन्य मशीनें और सीमा शुल्क सेवा, मानव संसाधन विकास के लिए सहयोगी सेवाएं तथा परीक्षण, +मूल्यांकन, अनुसंधान विकास आदि सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। कृषि यंत्रों के उत्पादन के लिए +एक बुनियादी औद्योगिक ढांचा विकसित किया जा चुका है। विस्तार और प्रदर्शन के जरिए तकनीकी +दृष्टि से आधुनिक उपकरण अपनाए गए हैं और संस्थागत ऋण की व्यवस्था की गई है। किसानों ने +संसाधनों के संरक्षण के लिए भी उपकरणों को अपनाया है। +सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न योजनाओं, जैसे-खेती के लिए जल-व्यवस्था पर वृहद् कृषि +प्रबंधन, तिलहन और दलहन के लिए प्रौद्योगिकी मिशन, बागवानी पर प्रौद्योगिकी मिशन और कपास के +प्रौद्योगिकी मिशन के अंतर्गत किसानों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है, ताकि वे अपने लिए +कृषि संबंधी औजार और मशीनें खरीद सकें। +कृषि मशीनरी के बारे में प्रशिक्षण और परीक्षण संस्थान. +खेती की मशीनों से संबंधित प्रशिक्षण और परीक्षण संस्थानों (एफएमटी ऐंड टीआई) की स्थापना मध्य +प्रदेश के बुदनी, हरियाणा के हिसार, आंध्र प्रदेश के गार्लादिने और असम के विश्वनाथ चेरियाली में की +गई है। यहां प्रतिवर्ष करीब 5,600 लोगों को कृषि मशीनीकरण के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रशिक्षण +दिया जाता है। इन संस्थानों में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार ट्रेक्टर सहित अन्य कृषि +मशीनों का परीक्षण तथा कार्यदक्षता का मूल्यांकन भी किया जाता है। शुरू से 1,10,712 लोगों को +प्रशिक्षित किया जा चुका है और 31 मार्च, 2009 तक 2,584 मशीनों का परीक्षण हो चुका है। इन +संस्थाओं ने 2008-09 के दौरान 5,894 लोगों को प्रशिक्षित और 163 मशीनों का परीक्षण किया। +नवविकसित कृषि/बागवानी उपकरणों का प्रदर्शन. +कृषि-उत्पादन प्रणाली में नई प्रौद्योगिकी प्रारंभ करने के उद्देश्य से नए विकसित/उन्नत कृषि एवं +बागवानी उपकरणों के प्रदर्शन की एक योजना में मंजूर की गई थी। इसे अब केंद्रीय क्षेत्र की पुनर्गठित +योजना प्रशिक्षण, परीक्षण और प्रदर्शन के जरिए कृषि यंत्रीकरण को प्रोत्साहन एवं सुदृढ़ीकरण का एक +घटक बना दिया गया है। इस घटक के अंतर्गत कार्यान्वयन एजेंसियों को नए/उन्नत उपकरणों की खरीद +और प्रदर्शन के लिए शत-प्रतिशत सहायता-अनुदान दिया जाता है। इस योजना को राज्य/केंद्रीय सरकार +के संगठनों के माध्यम से लागू किया जा रहा है। इस घटक से किसानों को नए कृषि/बागवानी +उपकरणों को अपनाने के लिए प्रेरित करने में मदद मिली है। योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए +सहायता के लिए प्राप्त प्रस्तावों के आधार पर (आईसीएआर एवं एसपीसीआई) दो संगठनों को राशि +जारी की जाती है। वर्ष 2008-09 नए उपकरणों के 11,214 प्रदर्शन किए गए, जिससे 1,52,364 +किसानों को लाभ पहुंचा। +प्रशिक्षण की आउटसोर्सिंग (बाहरी संस्थानों में प्रशिक्षण). +यह दसवीं पंचवर्षीय योजना में केंद्रीय क्षेत्र की योजना “प्रशिक्षण, परीक्षण और प्रदर्शन के जरिए कृषि +मशीनरी का उन्नयन और सुदृढ़ीकरण” के अंतर्गत स्वीकृत घटक है। इसके अंतर्गत बड़ी संख्या में +किसानों को निकटवर्ती स्थानों पर प्रशिक्षण दिया जाता है। यह 2004-05 से प्रभावी है। प्रशिक्षण +कार्यक्रमों का आयोजन प्रत्येक राज्य के चुनिंदा संस्थानों के जरिए किया जाता है। इनमें राज्य कृषि +विश्वविद्यालय, कृषि इंजीनियरी कालेज/पॉलिटेक्निक्स आदि शामिल हैं। विभिन्न संस्थानों में प्रशिक्षण +कार्यक्रम चलाने के लिए 2008-09 में 27.20 लाख रूपए जारी किए गए। +फसलोपरांत प्रौद्योगिकी और प्रबंधन. +कृषि मंत्रालय कृषि बाजारों के सुधार और फसलोपरांत प्रौद्योगिकी पर विशेष बल दे रहा है। तदनुसार +विभाग 11वीं योजना में मार्च, 2008 से फसलोपरांत प्रौद्योगिकी प्रबंधन योजना 40 करोड़ रूपए की +लागत से क्रियान्वित कर रहा है। योजना के तहत सीएसआईआर और देश तथा विदेश की चिन्हित +संस्थाओं द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी पर बल दिया जाता है, जो अनाज, दाल, तिलहन, गन्ना, सब्जियों +और फलों और फसल उप-उत्पाद के प्रारंभिक प्रसंस्करण मूल्य संवर्धन और कम लागत वाली वैज्ञानिक +भंडारण प्रबंधन में काम आती हैं। इस योजना के तहत सरकारी सहायता से फसलोपरांत उपकरणों के +वितरण, प्रदर्शन आयोजन और फसलोपरांत प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण के लिए वर्ष के दौरान 478 करोड़ +रूपए जारी किए गए हैं। +राज्य कृषि उद्योग निगम. +केंद्र सरकार और संबद्ध राज्य सरकारों द्वारा संयुक्त क्षेत्र की कंपनियों के रूप में 17 राज्य कृषि उद्योग +निगमों की स्थापना की गई है। इन निगमों का उद्देश्य कृषि मशीनों का निर्माण और वितरण, कृषि निवेशों +का वितरण, कृषि-आधारित उद्योगों की स्थापना और संचालन को प्रोत्साहन तथा किसानों और अन्य +लोगों को तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराना तथा परामर्श देना है। 1965 से 1970 के बीच आंध्र प्रदेश, +असम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, +महाराष्ट्र, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में इनकी स्थापना हुई। +कई राज्य सरकारों ने अपनी पूंजी बढ़ा दी है। छह राज्य कृषि उद्योग निगमों- उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, +कर्नाटक, राजस्थान, गुजरात और पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी नहीं रही है। केंद्र सरकार +ने इन राज्य सरकारों के पक्ष में अपने शेयरों का विनिवेश कर दिया है। +विधायी ढांचा +खतरनाक मशीन (नियमन) अधिनियम, (1983) 14 सितंबर, 1983 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम में +खतरनाक मशीनें बनाने वाले किसी उद्योग के व्यापार, वाणिज्य और उत्पादन, तथा उत्पादों की आपूर्ति एवं +उपयोग के नियमन का प्रावधान है, ताकि ऐसी मशीनें चलाने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा +सके। इसमें ऐसी मशीनों के संचालन के समय होने वाली दुर्घटना में मृत्यु या शारीरिक अपंगता की स्थिति +में मुआवजे के भुगतान-संबंधी प्रावधान भी किए गए हैं। फसलों की गहाई (थ्रेशिंग) में प्रयुक्त पावर थ्रेशरों +को इस अधिनियम की परिधि में लाया गया है। केंद्रीय सरकार ने खतरनाक मशीन (नियमन) अधिनियम, +1985 को अधिसूचित कर पावर थ्रेशर लगाने आदि के बारे में विशेष निर्देश दिए हैं। पावर थ्रेशर के अतिरिक्त +चैफ-कटर और गन्ने के कोल्हू को भी इस अधिनियम के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। +पौध-संरक्षण. +फसल-उत्पादन के लक्ष्य हासिल करने में पौध-संरक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। पौध संरक्षण के +महत्वपूर्ण घटकों में समन्वित कीट प्रबंधन को प्रोत्साहन, फसल पैदावार को कीटों और बीमारियों के +दुष्प्रभाव से बचाने के लिए सुरक्षित और गुणवत्तायुक्त कीटनाशकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, +ज्यादा पैदावार देने वाली नई फसल प्रजातियों को तेजी से अपनाए जाने के लिए संगरोधन (क्वारन्टीन) +उपायों को सुचारू बनाना शामिल है। इसके अंतर्गत बाहरी कीटों के प्रवेश की गुंजाइश समाप्त करना और +पौध-संरक्षण कौशल में महिलाओं को अधिकारिता प्रदान करने सहित मानव संसाधन विकास पर भी +ध्यान दिया जाता है। +बागवानी. +पूर्वोत्तर राज्यों, सिक्किम, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बागवानी के +एकीकृत विकास के लिए प्रौद्योगिकी मिशन +सिक्किम सहित पूर्वोत्तर राज्यों में बागवानी की फसलों के एकीकृत विकास के लिए प्रौद्योगिकी मिशन +पर केंद्र द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम इस वर्ष के दौरान जारी रहा। इस योजना को जम्मू और कश्मीर, +हिमाचल प्रदेश और उत्तरांचल में भी लागू किया गया है। इस योजना का उद्देश्य उत्पादन, फसल के +बाद और खपत की कड़ी को जोड़ने के लिए पर्याप्त, समुचित और समय रहते ध्यान देने वाले उपाय +करना है जिससे सपाट और उर्घ्वस्थ सिंचाई के माध्यम से सरकार द्वारा चलाए गए कार्यक्रमों को सुचारू +रूप से चलाया जा सके। लघु किसान कृषि व्यापार संगठन (एसएफएसी) योजना के समन्वय में +शामिल है। +प्रौद्योगिकी मिशन बागवानी विकास के सभी पहलुओं से संबंधित अपने चार/लघु मिशनों के +माध्यम से एक सिरे से दूसरे सिरे तक विचार करता है। लघु मिशन-I में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद +द्वारा अनुसंधान का समन्वयन और कार्यान्वयन शामिल है। लघु मिशन-II में कृषि विभाग द्वारा समन्वित +उत्पादन और उत्पादक गतिविधियों में सुधार लाना और राज्य के कृषि/बागवानी विभागों द्वारा उन्हें लागू +करना शामिल है। लघु मिशन-III में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा फसल के बाद के प्रबंधन विपणन और +निर्यात में समन्वय रखा जाता है और लघु मिशन-IV में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा प्रसंस्करण +उद्योग में समन्वयन और कार्यान्वयन किया जाता है। राज्य स्तरीय लघु किसान कृषि व्यापार संगठनों को +निचले स्तर पर कार्यक्रमों के कार्यान्वयन और उन्हें लागू करने वाले अधिकतर राज्यों का निरीक्षण के +लिए गठित किया गया है। प्रौद्योगिकी मिशन के अंतर्गत वार्षिक कार्य योजनाओं/प्रस्तावों के आधार पर +राज्यों को फंड उपलब्ध कराए जाते हैं जो संबंधित राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय +संचालन समिति द्वारा स्वीकृत की जाती है। +विभिन्न बागवानी फसलों के अंतर्गत 2008-09 तक बहुत प्रगति की गई है। पूर्वोत्तर तथा हिमालय क्षेत्र +से 494343 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को इसमें शामिल किया गया है। इनमें फल 303667 हेक्टेयर, सब्जी +77882 हेक्टेयर, मसाले 61985 हेक्टेयर, पौध फसलें 10443 हेक्टेयर, औषधि 6079 हेक्टेयर, सुगंधित +पौधे 8640 हेक्टेयर, कंद मूल 1540 हेक्टेयर, फूल 24042 हेक्टेयर शामिल हैं। इसके अलावा 47 थोक +बाजार, 262 ग्रामीण प्राथमिक बाजार, 64 अपनी मंडियां, 18 ग्रेडिंग प्रयोगशालाएं, 31 रîाुमार्ग और 49 +प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की गईं। बेहतर उत्पादन के लिए मूलभूत सुविधाएं 935 नर्सरियां, 10032 +सामुदायिक जल टैंक, 11106 ट्यूबवेल, 26 ऊतक विकास इकाइयां, ग्रीन हाउस 2496025 वर्ग मीटर, +25 आधुनिक पुष्पोत्पादन केंद्र, 25 खुंब ईकाइयां, 15785 कंपोस्ट ईकाइयां, 164960 किसानों/प्रशिक्षकों +का प्रशिक्षण, 67329 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया। परंपरागत फसलों में बेहतर उत्पादन +प्रौद्योगिकी के अलावा नींबू, केला, अनन्नास, किवी, सेब, गुलाब, आर्किड, टमाटर, तरह-तरह की +मिर्चों के व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन को बढ़ावा दिया। +वर्ष 2007-08 में 323.40 करोड़ रूपए के बजट आवंटन में 321.76 करोड़ रूपए से 127850 +हेक्टेयर क्षेत्र बागवानी फसलों के अंतर्गत लाया गया (फल 82494, सब्जी 16306, मसाले 11692, पौध +फसलें 2125, औषधीय और सुगंधित पौधे-3760 हेक्टेयर आदि)। फसलों का उत्पादन और उत्पादकता +बढ़ाने के लिए ढांचागत सुविधाएं प्रदान की गईं। इनमें 165 नर्सरियां, 1877 सामुदायिक जल टैंक, 3068 +ट्यूबवेल, 350953 वर्ग मीटर ग्रीन हाउस, 1766 कंपोस्ट ईकाइयां, 37524 किसानों, 18325 महिलाओं +को प्रशिक्षण के अलावा बाजार और प्रसंस्करण ईकाइयों की स्थापना की गई जो परियोजना आधारित थी। +पिछले वित्तीय वर्ष 2008-09 में विभिन्न बागवानी फसलों के अंतर्गत 148071 हेक्टेयर क्षेत्र लाया +गया (फल 104064, सब्जी 20333, मसाले 12, पौध फसलें 1902, औषधीय और सुगंधित पौधे 3429 +हेक्टेयर आदि)। फसलों का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए 59 नर्सरियां, 838 सामुदायिक प्रति +टैंक, 2088 ट्यूब वेल, 317049 वर्ग मीटर ग्रीन हाउस, 12 आधुनिक पुष्पोत्पादन केंद्र, खुंब इकाई-एक, +2851 कंपोस्ट ईकाइयां, 27752 किसानों/प्रशिक्षकों, 14083 महिलाओं को प्रशिक्षण के अलावा बाजार +और प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की गईं। +वित्तीय स्थिति +वर्ष 2001-02 से 2008-09 तक मिशन के तहत 1538.60 करोड़ रूपए जारी किए गए जिसमें से +1122.37 करोड़ रूपए पूर्वोत्तर के तथा 415.63 करोड़ रूपए हिमालय क्षेत्र के राज्यों के लिए दिए गए। +चालू वित्तीय वर्ष 2009-10 में 349 करोड़ रूपए में से 280 करोड़ रूपए पूर्वोत्तर के तथा 69 करोड़ रूपए +हिमालय क्षेत्र के राज्यों के लिए हैं। ग्यारहवीं योजना के लिए आवंटित राशि 1500 करोड़ रूपए है लेकिन +पूर्वोत्तर और हिमालय क्षेत्र के राज्यों की आवश्यकता पूरी करने के लिए इसको 2500 करोड़ रूपए की +दर कम है। +इस योजना के अंतर्गत, महिलाओं को समान अवसर उपलब्ध कराते हुए आत्मनिर्भर बनाना भी +शामिल है ताकि महिलाएं भी मौजूदा कृषि प्रणाली से होने वाले लाभों को प्राप्त कर सकें। +स्व-सहायता समूह बनाने के लिए महिला संगठनों को पर्याप्त संगठनात्मक, तकनीकी प्रशिक्षण +और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना। मिशन के तहत बागवानी के विभिन्न पहलुओं में 2007-08 में +51262 महिला उद्यमियों को और 2008-09 में अब तक 4037 को प्रशिक्षित किया गया है। +केंद्रीय बागवानी संस्थान, मेजिफेमा, नगालैंड +पूर्वोत्तर क्षेत्र में बागवानी विकास की महत्ता को समझते हुए केंद्र सरकार ने नगालैंड में केंद्रीय बागवानी +संस्थान की स्थापना को जनवरी, 2008 में मंजूरी दी जिसे पांच वर्ष में 20 करोड़ रूपए दिए जाएंगे। 10वीं +योजना के लिए 8.35 करोड़ रूपए रखे गए हैं। संस्थान की स्थापना मेजिफेमा में 43.50 हेक्टेयर क्षेत्र में +की जा रही है। +राष्ट्रीय बांस मिशन. +देश में बांस की पैदावार बढ़ाने के लिए कृषि मंत्रालय का कृषि एवं सहकारिता विभाग देश के 27 राज्यों +में राष्ट्रीय बांस मिशन का क्रियान्वयन कर रहा है। योजना के लिए वर्ष 2006-07 से 2010-11 के लिए +568.23 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। +मिशन का उद्देश्य. +बांस क्षेत्र का क्षेत्रीय विशिष्टता के आधार पर प्रोत्साहन। क्षमता वाले, क्षेत्रों में बेहतर किस्म के बांस +लगाने को बढ़ावा देकर क्षेत्र का विस्तार। +बांस और बांस आधारित हस्तशिल्प के विपणन को प्रोत्साहन के विकास के लिए संबद्ध भागीदारों +में सहयोग बढ़ाना। +परंपरागत और आधुनिक वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी का विकास एवं प्रसार। कुशल और अकुशल लोगों +के लिए, खासकर बेरोजगार युवाओं के लिए, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना। +वित्तीय समीक्षा +वर्ष 2006-07 में 15 राज्यों के लिए 7570.60 लाख रूपए जारी किए गए। वर्ष 2007-08 में अनुसंधान +एवं विकास के लिए 359.80 लाख रूपए सहित 11439.62 लाख रूपए दिए गए। वित्तीय वर्ष 2008-09 +में अनुसंधान एवं विकास संस्थानों के लिए 123.74 लाख रूपए सहित विभिन्न राज्यों/क्रियान्वयन +संस्थानों को 8466.60 लाख रूपए जारी किए गए। +चालू वित्तीय वर्ष में 7000 लाख रूपए का बजट प्रावधान है। इसमें से अभी तक 775.30 लाख +रूपए छत्तीसगढ़, झारखंड, केरल, मिजोरम और नगालैंड को दिए जा चुके हैं। +वन और गैर-वन क्षेत्रों का 1,00,456 हेक्टेयर बांसबागान के तहत लाया गया है। वर्तमान बांसबागान के +28043 हेक्टेयर क्षेत्र का उपचार बांस उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया गया। अच्छे किस्म के पौध +उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में 996 बांस नर्सरियां स्थापित की गईं। बांस बागान +के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए 2006-07 से 2008-09 तक 29290 किसानों और 3653 कर्मियों को +प्रशिक्षण दिया गया। इसके विस्तार और आम जागरूकता पैदा करने के लिए 28 राज्य और 332 जिला +स्तरीय कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। बांस और बांस उत्पादनों की बिक्री को बढ़ावा देने के +लिए बांस के थोक खुदरा बाजारों की स्थापना की गई। +बीज. +कृषि उत्पादन तथा विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में पैदावार बढ़ाने के लिए बीज एक महत्वपूर्ण और +बुनियादी आधार है। मोटे तौर पर भारतीय बीज कार्यक्रम बीजों के बहुगुणन के लिए सीमित जनन +प्रणाली अपनाता है। इस प्रणाली में बीज की तीन पीढ़ियों-प्रजनक, आधार और प्रमाणित बीजों को +स्वीकार किया जाता है, और बीज बहुगुणन शृंखला में गुणवत्ता आश्वासन के लिए इसमें पर्याप्त सुरक्षा +व्यवस्था होती है, जिससे प्रजनक से किसानों तक बीजों के प्रवाह के दौरान प्रमाणित/किस्म की शुद्धता +बनाए रखने में मदद मिलती है। +भारतीय बीज विकास कार्यक्रम में केंद्र और राज्य सरकारों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् +(आईसीएआर), राज्य कृषि विश्वविद्यालय (एसएयू) प्रणाली, सार्वजनिक क्षेत्र, सहकारी क्षेत्र और निजी +क्षेत्र के संस्थानों का योगदान शामिल है। इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर के दो निगम राष्ट्रीय बीज निगम +(एनएससी) और भारतीय राज्य फार्म निगम (एसएफसीआई), 13 राज्य बीज निगम (एसएससी) और +निजी क्षेत्र की लगभग 100 प्रमुख बीज कंपनियां कार्यरत हैं। गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन के लिए 22 +राज्य बीज प्रमाणन एजेंसियां तथा 101 राज्य बीज परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं। बीजों के उत्पादन और +वितरण में निजी क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा है, किंतु संगठित बीज क्षेत्र में खास कर खाद्य +फसलों और अनाज के क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र का वर्चस्व बना हुआ है। +वैधानिक ढांचा और नीति +देश में बेचे जाने वाले बीजों की गुणवत्ता नियंत्रित करने के लिए बीज अधिनियम, 1966 विधायी ढांचा +उपलब्ध कराता है। अधिनियम के तहत स्थापित केंद्रीय बीज समिति और केंद्रीय बीज प्रमाणन बोर्ड +प्रमुख एजेंसियां हैं, जो इसके प्रशासन संबंधी सभी मामलों और बीजों की गुणवत्ता पर नियंत्रण के लिए +जिम्मेदार हैं। बीज विधेयक 2004, केबिनेट ने अनुमोदित कर दिया है। +किसानों के हित में बीजों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए बीज निर्यात प्रक्रिया सरल बनाई गई +है। विभिन्न फसलों के बीज “ओपन जनरल लाइसेंस” के अंतर्गत रखे गए हैं। इनमें जंगली प्रजातियां, +जनन द्रव्य, प्रजनक बीज तथा पटसन और प्याज के बीज शामिल नहीं हैं। 2002-07 के लिए सरकार +की नई आयात-निर्यात नीति के अंतर्गत इन्हें प्रतिबंधित सूची में रखा गया है। +बीज प्रभाग की योजनाएं. +(i) विभाग ने दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 159 करोड़ रूपये के परिव्यय के साथ केंद्रीय क्षेत्र की एक +योजना शुरू की है, जिसका नाम है “गुणवत्तायुक्त बीजों के उत्पादन और वितरण के लिए बुनियादी +सुविधाओं का विकास और सुदृढ़ीकरण”। इस योजना के मुख्य घटकों में बीजों के बारे में गुणवत्ता नियंत्रण +प्रबंध, पूर्वोत्तर और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में बीजों की ढुलाई के लिए परिवहन सब्सिडी, बीज बैंक की स्थापना +और रख-रखाव, बीज ग्राम योजना, बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के लिए सहायता, निजी क्षेत्र में बीज +उत्पादन के लिए सहायता, मानव संसाधन विकास, बीज निर्यात के लिए सहायता, कृषि में जैव प्रौद्योगिकी +के अनुप्रयोग का प्रचार, चावल के संकर बीजों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन तथा मूल्यांकन/समीक्षा शामिल +है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्युटीओ) के बौद्धिक संपदा अधिकरों पर व्यापार संबंधी पहलुओं (ट्रिप्स) +के अनुच्छेद 27 (3) बी के अंतर्गत बाध्यताओं को पूरा करने के लिए कृषि एवं सहयोग विभाग ने पौध +किस्मों तथा किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक कानून लागू किया है। कानून में पौध की नई किस्मों +के विकास को प्रोत्साहित करने, पौधे की किस्मों का संरक्षण, किसानों के अधिकारों और पौध प्रजनकों +के संरक्षण के लिए प्रभावी प्रणाली स्थापित करने की व्यवस्था है। उक्त कानून को आवश्यक सहायता मुहैया +कराने के नजरिए से एक केंद्रीय क्षेत्र योजना क्रियान्वित की जा रही है। योजना 11 नवंबर 2005 को स्थापित +पौध किस्मों के संरक्षण तथा किसान अधिकार प्राधिकरण (पीपीवीएंडएफआर) द्वारा लागू की गई है। +प्राधिकरण 14 चुनिंदा फसलों से संबंधित पौध किस्मों के पंजीकरण कराने की प्रक्रिया में है। 35 विभिन्न +फसलों के लिए विशिष्टता, एकरूपता और स्थिरता (डीयूएस) के लिए परीक्षण हेतु राष्ट्रीय मसौदा दिशानिदर्देश बनाए जा चुके हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य प्राधिकरण की स्थापना के लिए वित्तीय सहयोग प्रदान +करना तथा डीयूएस के लिए परीक्षण दिशानिर्देश को विकसित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने +के साथ-साथ डीयूएस केंद्रों को मजबूत और उपकरणों से लैस करना है। +11वीं योजना में इसमें 12 घटक होंगे और पीपीवी एवं एफआर अधिनियम को लागू करने के +लिए 120 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। तदनुसार प्राधिकरण की दो शाखाएं और पौध किस्मों के +संरक्षण अपीली अधिकरण (पीवीपी) के अलावा 11वीं योजनावधि के अन्य योजनाओं को लागू किया +जाएगा। +सहकारी ऋण ढांचे में सुधार. +अगस्त 2004 में केंद्र सरकार ने प्रो. ए. वैद्यनाथन की अध्यक्षता में एक कार्यदल बनाया था। इस कार्यदल +का काम सहकारी ऋण संगठनों की स्थिति में सुधार लाना था। कार्यदल ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है +जिसमें लघु अवधि सहकारी ऋण का ढांचा और लघु अवधि ग्रामीण ऋण सहकारी संगठनों के लिए +14839 करोड़ रूपये के वित्तीय पैकेज की सिफारिश की गई है। इस पैकेज के अंतर्गत होने वाला +नुकसान, बिना भुगतान गारंटी, राज्य सरकारों द्वारा शेयर पूंजी की वापसी, मानव संसाधन विकास, विशेष +ऑडिट का आयोजन और कार्यान्वयन लागत शामिल है। +राज्य सरकारों द्वारा आपसी सहमति से सरकार ने 13,596 करोड़ रूपये की वित्तीय सहायता के +साथ लघु अवधि ग्रामीण सहकारी ऋण ढांचे को फिर से सुधारने के पैकेज को मंजूरी दे दी है। पैकेज के +अंतर्गत वित्तीय सहायता के प्रावधान का संबंध सहकारी क्षेत्र में सुधार करना है। इसी कार्यदल को +दीर्घावधि सहकारी ऋण ढांचे की समस्याओं की जांच करने और उनके पुनरूत्थान के बारे में उपाय +सुझाने को कहा गया है। इस संबंध में कार्यदल की रिपोर्ट तैयार होने के बाद ही सरकार दीर्घावधि +सहकारी ऋण ढांचे में सुधार के लिए कदम उठायेगी। अब तक 25 राज्यों आंध्र प्रदेश, अरूणाचल, +असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, +महाराष्ट्र, सिक्किम, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने सरकार और नाबार्ड +के साथ समझौते के प्रारूप पर हस्ताक्षर किया है। इससे 96' पीएसीएस और 96' केंद्रीय सहकारी बैंक +इसमें आ गए हैं। दस राज्यों के 37,821 पीएसीएस के पुनर्पूंजीकरण के लिए नाबार्ड ने भारत सरकार के +हिस्से के रूप में 6170.25 करोड़ रूपए जारी किए है जबकि राज्यों ने अपनी हिस्सेदारी के रूप में +614.75 करोड़ रूपए दिए हैं। दीर्घकालिक सहकारी ऋण सोसाइटियों (एलटीसीसी) के पुनर्जीवन के +लिए केंद्र ने 3070 करोड़ रूपए मंजूर किए हैं। +सहयोग. +सहकारिता सुधार. +देश में सहकारिता आंदोलन कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों से शुरू हुआ। यह शुरूआत लोगों को थोक की +अर्थव्यवस्था का फायदा दिलाने के लिए उनके मामूली संसाधनों को इकट्ठा करने के तरीके के तौर पर +हुई। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद सहकारिता को नियोजित आर्थिक विकास की रणनीति का हिस्सा माना +गया। सहकारी संस्थाएं आज तेजी से उभर रहे आर्थिक उदारीकरण और विश्वव्यापीकरण के परिदृश्य में +अपने अस्तित्व को लेकर ऊहापोह में हैं। इन संस्थाओं को आमतौर पर संसाधनों की कमी, लचर +प्रशासन, प्रबंधन, अक्षमता और आर्थिक अव्यवहार्यता आदि समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। +इसलिए सहकारिता के भविष्य के लिए सहकारिता सुधार महत्वपूर्ण है। +राष्ट्रीय सहकारिता नीति. +राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों के परामर्श से केंद्रीय सरकार ने राष्ट्रीय सहकारिता नीति तैयार की है। इस नीति +का उद्देश्य देश में सहकारी संगठनों के चहुंमुखी विकास को बढ़ावा देना है। यह नीति सरकार द्वारा +सहकारी संस्थाओं के लिए किए जाने वाले कार्यों के बारे में निर्देशक सिद्धांतों के रूप में काम करेगी। +इस नीति के अंतर्गत सहकारी संगठनों को आवश्यक समर्थन, प्रोत्साहन और सहायता दी जाएगी तथा यह +सुनिश्चित किया जाएगा कि वे ऐसे स्वायत्तशासी, आत्मनिर्भर और लोकतांत्रिक संस्थानों के रूप में काम +कर सकें, जो अपने सदस्यों के प्रति पूर्ण रूप से जवाबदेह हों। +बहुराज्यीय सहकारी समितियां (एमएससीएस) अधिनियम, 2002 — केंद्र सरकार ने बहुराज्यीय +सहकारी समितियां अधिनियम, 1984 के स्थान पर बहुराज्यीय सहकारी समितियां अधिनियम, 2002 +पारित करके सहकारी संगठनों को अपेक्षित स्वायत्तता प्रदान की है। इसका लक्ष्य बहुराज्यीय सहकारी +समितियों को कामकाज में स्वायत्तता प्रदान करना और उनके लोकतंत्र प्रबंधन की व्यवस्था करना है। +हालांकि यह अधिनियम राष्ट्रीय स्तर की सहकारी समितियों/परिसंघों और अन्य बहुराज्यीय सहकारी +समितियों पर लागू होता है, फिर भी यह उम्मीद की जाती है कि यह राज्य सहकारी नियमों में सुधारों के +लिए आदर्श अधिनियम के रूप में काम करेगा। +बहुराज्यीय सहकारी समितियां (संशोधन) अधिनियम, 2002 — बहुराज्यीय सहकारी समितियां +अधिनियम, 1962 में संशोधन करके मौजूदा कार्यक्रमों के अतिरिक्त खाद्य पदार्थ, औद्योगिक वस्तुएं, +मवेशी और सेवाओं को कार्यक्रमों एवं गतिविधियों में शामिल किया गया। कृषि उत्पादों की परिभाषा में +संशोधन करके उनके अंतर्गत खाद्य और अखाद्य तिलहनों, मवेशी आहार, बागवानी और पशुपालन +उत्पाद, वानिकी, मुर्गी पालन, मत्स्य-पालन और कृषि-संबंधी अन्य गतिविधियों को शामिल किया गया +है। संशोधित अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक वस्तुओं और मवेशी की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए +ग्रामीण क्षेत्रों में संबंधित उद्योगों के उत्पादों तथा किसी भी हस्तशिल्प या ग्रामीण शिल्प को शामिल किया +गया। मवेशी के अंतर्गत दूध, मांस, ऊन, खाल और सह-उत्पादों के लिए पाले जाने वाले सभी पशु +शामिल होंगे। एनसीडीसी स्वयं की संतुष्टि के लिए प्रतिभूति भरने पर राज्य/केंद्र सरकार की गारंटी के +बिना सहकारी संस्थाओं को सीधे ऋण प्रदान करेगा। अभी तक जल संरक्षण, मवेशी स्वास्थ्य/देखभाल, +बीमारियों की रोकथाम, कृषि बीमा और कृषि ऋण, ग्रामीण स्वच्छता/जलनिकासी/सीवर प्रणाली आदि +गतिविधियों को अधिसूचित सेवाओं के रूप में अधिसूचित किया जा चुका है। +सहकारी संस्थाओं के संदर्भ में संविधान में संशोधन +राज्य सहकारी समिति अधिनियमों में संशोधन किए जाने के बावजूद राज्यों द्वारा सहकारी कानूनों में +सुधारों की प्रक्रिया उत्साहजनक नहीं रही है। इसलिए सहकारी संस्थाओं की लोकतांत्रिक, स्वायत्त और +व्यावसायिक कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए यह फैसला किया गया कि संविधान में संशोधन का +प्रस्ताव तैयार किया जाए। यह निर्णय 7 दिसंबर, 2004 को राज्य के सहकारिता मंत्रियों के सम्मेलन में +भलीभांति विचार-विमर्श के बाद किया गया। संविधान में प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य सहकारी +संस्थाओं के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन के +जरिए उन्हें अधिकार प्रदान करने के महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान करना है। संविधान के एक सौ छठे +संशोधन विधेयक 2006 के प्रस्ताव को लोकसभा में 22 मई, 2006 को रखा गया था। +उच्च अधिकार प्राप्त समिति का गठन +सहकारिता आंदोलन के पिछले 100 वर्षों में इस आंदोलन की उपलब्धियों और उसके समक्ष प्रस्तुत +चुनौतियों की समीक्षा करने और उनका सामना करने के तौर-तरीके सुझाने तथा आंदोलन को नई दिशा +प्रदान करने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया गया है, जो निम्नलिखित विषयों पर +विचार करेगी- +समाधान के उपाय सुझाना, ताकि बदले हुए सामाजिक-आर्थिक वातावरण के साथ आंदोलन गति +बनाए रख सके। +के लिए सहकारिता कानून में अपेक्षित संशोधनों और तत्संबंधी समुचित नीति तथा विधायी फ्रेमवर्क +के बारे में सुझाव देना। समिति ने एमएससीएस अधिनियम, 2002 और संविधान के (106वें) +संशोधन विधेयक, 2006 में संशोधन के बारे में अंतरिम रिपोर्ट दे दी है। समिति ने मई, 2009 में +रिपोर्ट दी है और उसकी सिफारिशों पर गौर किया जा रहा है। +राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन. +राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का केंद्र प्रायोजित योजना देश में 11वीं योजना के अंत तक चावल, गेहूं और +दालों का उत्पादन क्रमश— 10,8 और 2 मिलियन टन बढ़ाने के लिए शुरू की गई है। मिशन 17 राज्यों के +312 जिलों में 2007-08 के रबी फसल से लागू हो गया है। +एनएफएसएम के तहत लक्ष्योन्मुख प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप का शुरू से ही महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है +और वर्ष 2007-08 में चावल का उत्पादन 96.69 मिलियन टन रिकार्ड किया गया, जबकि 2006-07 +में 93.35 मिलियन टन था। इस प्रकार इसमें 3.34 मिलियन टन की वृद्धि हुई। तदनुसार 2008-09 +के तृतीय अग्रिम अनुमान में चावल का उत्पादन 99.37 मिलियन टन हो गया जो 2007-08 के +मुकाबले 2.68 मिलियन टन और 2006-07 के मुकाबले 6.02 मिलियन अधिक है। गेहूं के मामले +में स्थिति उत्साहजनक रही और गेहूं का उत्पादन 2007-08 में 78.57 मिलियन टन हुआ, जबकि +2006-07 में 75.81 मिलियन के मुकाबले 2.76 मिलियन टन अधिक रहा। नतीजतन 2008-09 में +तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार गेहूं का उत्पादन 77.63 मिलियन रहा, जो 2006-07 से 1.63 +मिलियन टन अधिक रहा। दालों का उत्पादन 2006-07 में 14.20 मिलियन टन रिकार्ड किया गया +था, 2007-08 में 14.76 मिलियन टन हुआ जो 0.56 मिलियन टन अधिक रहा। तीसरे अग्रिम +अनुमान के अनुसार दालों का उत्पादन 14.18 मिलयन टन होने की आशा है, जो 2006-07 की +तुलना में स्थिर रहा। +समन्वित पोषक तत्त्व प्रबंधन. +समन्वित पोषक तत्त्व प्रबंधन (आईएनएम) का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी समयबद्ध मांगों का +आकलन कर समय पर गुणवत्तायुक्त उर्वरकों की आपूर्ति करना, मिट्टी के परीक्षण के आधार पर +संतुलित मात्रा में उर्वरकों के इस्तेमाल और शहरी अपशिष्ट/कचरे से जैविक खाद्य बनाने को बढ़ावा देना +है। इसके अलावा उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 के क्रियान्वयन के जरिए जैविक कचरे से खाद्य +बनाने तथा उर्वरकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करते हुए इस बात पर जोर देना है कि जैविक और +रासायनिक खादों के जरिए पोषक तत्त्वों के सभी स्रोतों का समन्वित इस्तेमाल हो। +उर्वरकों की खपत. +चीन और अमरीका के बाद भारत विश्व में उर्वरकों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है। +हमारा देश यूरिया के मामले में शत-प्रतिशत आत्मनिर्भर है, जबकि डी.ए.पी. के मामले में इसकी +आत्मनिर्भरता 90 प्रतिशत है। पूरे देश में उर्वरकों की खपत 96.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, हालांकि +कृषि 79 +राज्यवार खपत में काफी अंतर है। पंजाब में इसकी खपत 197 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि +हरियाणा में 164 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। इसके विपरीत अरूणाचल प्रदेश, नगालैंड, सिक्किम जैसे +राज्यों में 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से भी कम है। उर्वरक खपत के असंतुलित स्वरूप को ध्यान में +रखते हुए सरकार इसके संतुलित और समन्वित प्रयोग को विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से प्रोत्साहन दे +रही है। परिणामस्वरूप, एनपी के उपयोग अनुपात 2000-01 के 7—2.7—1 से 2004-05 के दौरान +5.7—2.2—1 हो गया। +उर्वरकों के मूल्य +इस समय यूरिया उर्वरक का मूल्य सरकार द्वारा तय किया जाता है। किसानों को उचित दामों पर इसकी +आपूर्ति जारी रखने के लिए केंद्र सरकार की ओर से सब्सिडी दी जाती है। देश में यूरिया की खपत सबसे +अधिक है। इसलिए नई यूरिया मूल्य निर्धारण योजना के तहत यह रियायत दी जाती है। पी. और के. +उर्वरक नियंत्रित श्रेणी में नहीं थे। अब इसे भी आर्थिक रियायत योजना में शामिल कर लिया गया है। +विशेष भाड़ा सब्सिडी की मौजूदा नीति को पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू और कश्मीर को उर्वरक आपूर्ति के +लिए जारी रखा गया है। प्रमुख उर्वरकों के मूल्यों में 28-2-2002 से कोई बदलाव नहीं किया गया है। +मिश्रित ग्रेड उर्वरकों की कीमतें पोषण आधारित सरकारी उर्वरक की कीमतों की तरह 14 जून, 2008 से +घटा दी गई हैं जो इस प्रकार हैं — +उर्वरक उत्पाद अधिकतम खुदरा मूल्य (रूपये प्रति मीट्रिक टन में) +यूरिया 4830 +डीएपी (स्वदेशी) 9350 +मिश्रित 5121-8185 +एमओपी 4455 +एसएसपी 3400 +पी और के उर्वरकों की बफर स्टॉकिंग. +दूरदराज और दुर्लभ क्षेत्रों में अनियंत्रित उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए +डीएपी और एमओपी की सीमित मात्रा के बफर स्टॉक की एक योजना बनाई गई है जिससे इसकी +आवश्यकता पड़ने पर इसको पूरा किया जा सकेगा। यह स्टाक सचल होता है और कमी होने पर उसकी +भरपाई की जाती है। आपात जरूरतों को पूरा करने के अलावा यह स्टाक राज्यों की आवश्यकताओं को +पूरा करता है। +उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण. +सरकार आवश्यक उपभोक्ता वस्तु अधिनियम के अंतर्गत जारी उर्वरक नियंत्रण आदेश (एफसीओ) के +माध्यम से उर्वरकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करती है। इससे देश में उर्वरकों के मूल्य, व्यापार, नीति और +वितरण को नियमित बनाने में मदद मिलती है। राज्य सरकारें उर्वरक नियंत्रण आदेश के विभिन्न प्रावधानों +को लागू करने में कार्यकारी एजेंसी की भूमिका निभाती हैं। इस आदेश के जरिए ऐसे उर्वरकों के +विनिर्माण, आयात और बिक्री पर रोक लगाई जाती है, जो निर्धारित मानक पूरे न करते हों। केंद्रीय +उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण और प्रशिक्षण संस्थान फरीदाबाद में स्थित है और इसके तीन क्षेत्रीय केंद्र नवी +मुंबई, चेन्नई और कल्याणी में स्थापित किए गए हैं, जो आयातित और स्वदेशी उर्वरकों का निरीक्षण और +विश्लेषण करते हैं, तकनीकी परामर्श देते हैं, और राज्य प्रर्वतन एजेंसियों तथा विश्लेषकों को गुणवत्तानियं +त्रण का प्रशिक्षण देते हैं। संस्थान ने उर्वरकों में होने वाली मिलावट की तुरंत जांच के लिए एक +टेस्टिंग किट भी विकसित की है। +उर्वरक-नियंत्रण आदेश में हाल ही में संशोधन किया गया, ताकि इसे उपभोक्ताओं के अधिक +अनुकूल बनाया जा सके और कारगर ढंग से लागू किया जा सके। महत्वपूर्ण संशोधनों में कटे-फटे +उर्वरक-थैलों की पुन— पैकेजिंग और प्राकृतिक आपदा से क्षतिग्रस्त हुए उर्वरकों की पुन— प्रोसेसिंग तथा +अस्थायी उर्वरकों के व्यावसायिक ट्रायलों के लिए प्रावधान शामिल हैं। तदनुरूप नेशनल फर्टिलाइजर्स +लिमिटेड, इन्डो-गल्फ फर्टिलाइजर्स और श्रीराम फर्टिलाइजर्स को अनुच्छेद 20 ए के अंतर्गत नीम- +आलेपित यूरिया के वाणिज्यिक ट्रायलों के लिए विनिर्माण की अनुमति दी गई है। इसी प्रकार मेसर्ज +इफ्को को बोरोन और जिंक के साथ सुदृढ़ मिश्रित उर्वरकों के उत्पादन और मेसर्ज कोरोमंडल +फर्टिलाइजर्स लिमिटेड को बोंटोनाइट सल्फर के उत्पादन की अनुमति दी गई है। यूरिया सहित सभी +उर्वरकों पर अधिकतम खुदरा मूल्य, आयात किए गए उर्वरक का महीना और वर्ष प्रिंट करना अनिवार्य +कर दिया गया है। +इस समय देश में 67 प्रयोगशालाएं हैं। इनमें केंद्र सरकार की 4 प्रयोगशालाएं शामिल हैं। इन +प्रयोगशालाओं में वर्ष में 1.31 लाख नमूनों की जांच करने की क्षमता है। +राष्ट्रीय कार्बनिक खेती परियोजना. +अक्टूबर 2004 में दसवीं पंचवर्षीय योजना की शेष अवधि के दौरान देश में कार्बनिक खेती के उत्पादन, +प्रोत्साहन और बाजार विकास के लिए 57.05 करोड़ रूपये के परिव्यय के साथ राष्ट्रीय कार्बनिक खेती +परियोजना नामक नई योजना प्रारंभ की गई। योजना 11वीं योजना में भी जारी है, जिसके लिए 115 +करोड़ रूपए आवंटित किए गए है। जैव उर्वरकों का विकास और उपयोग की राष्ट्रीय परियोजना, जो +पहले शुरू की गई थी, इसी में मिला दी गई है। योजना के मुख्य उद्देश्य हैं— +(i) सेवा प्रदाताओं के माध्यम से क्षमता निर्माण (ii) अकार्बनिक उत्पादक इकाई जैसे फलों और +सब्जियों के कचरे के लिए कंपोस्ट इकाई जैव उर्वरक, जैवकीटनाशक और कृमिपालन उत्पत्तिशालाओं के +लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता (iii) प्रशिक्षण और प्रदर्शन से मानव संसाधन विकास (i1) +जागरूकता और बाजार विकास (1) अकार्बनिक वस्तुओं की गुणवत्ता नियंत्रण। +जैव उर्वरकों के संवर्धन की पिछली योजना के जारी रहने से देश में 169 जैव उर्वरक उत्पादन +इकाइयां है जिनकी 67 हजार मी.टन है और वार्षिक उत्पादन 28 हजार टन से अधिक जैव उर्वरक और +18800 टन से अधिक जैवकीटनाशकों सहित अन्य टीके हैं। +योजना के तहत 708 टन कृषि कचरे को कंपोस्ट, 5606 मी.ट. जैव उर्वरक और 17000 टन कृमि +और कृमिकंपोस्ट के प्रसंस्करण की क्षमता स्थापित की गई है। +योजना शुरू होने के बाद प्रमाणीकृत अकार्बनिक खेती क्षेत्र 42 हजार हेक्टेयर में 2003-04 में 20 +गुना बढ़ोतरी हुई और यह 2007-08 में 865,00 हेक्टेयर हो गई। अकार्बनिक खाद्य का उत्पादन +2006-07 के 4.09 लाख टन से बढ़कर 2007-08 में 9.02 लाख टन हो गया। +एकीकृत पोषक प्रबंधन का संवर्धन (आईएनएम) — सरकार भूमि परीक्षण आधारित रसायन उर्वरकों, +जैव उर्वरकों और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध गोबर खाद् कंपोस्ट, नाडीप कंपोस्ट, कृमि कंपोस्ट और हरी +खाद को संतुलित और उचित उपयोग को बढ़ावा दे रही है ताकि भूमि की उत्पादकता बरकरार रहे। +11वीं योजना की शेष अवधि के लिए 2008-09 में 429 करोड़ रूपए के आवंटन के साथ “भूमि और +उर्वरता प्रबंधन की राष्ट्रीय परियोजना” (एनपीएमएसएफ) को मंजूरी दी गई। दो वर्तमान योजनाओं (i) +केंद्र प्रायोजित उर्वरकों का संतुलित और एकीकृत उपयोग और (ii) केंद्रीय उर्वरक एवं गुणवत्ता नियंत्रण +तथा प्रशिक्षण संस्थानों और उसके क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं को 1 अप्रैल, 2009 से नई योजना में मिला +दिया गया है। नई योजना के घटकों में 500 भूमि परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना, वर्तमान 315 +प्रयोगशालाओं को मजबूत बनाना, भूमि परीक्षण के लिए 250 सचल प्रयोगशालाओं की स्थापना, +अकार्बनिक खाद का संवर्धन, भूमि संशोधन, सूक्ष्म पोषकों का वितरण, उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण के +लिए 20 नई प्रयोगशालाओं की स्थापना, वर्तमान 63 प्रयोगशालाओं को 11वीं योजना में मजबूत करना +शामिल है। +देश में (2007-08) 686 भूमि परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं। इनमें 500 स्थायी और 120 सचल +प्रयोगशालाएं हैं, जिनका रख-रखाव राज्य सरकारें और उर्वरक उद्योग करते हैं। इनमें सालाना 70 लाख +मिट्टी के नमूनों का विश्लेषण किया जा सकता है। वर्ष 2008-09 में एनपीएमएसएफ के तहत 42 नई +82 भारत-2010 +भूमि परीक्षण स्थायी प्रयोगशालाओं (एसटीएल) 44 सचल भूमि परीक्षण प्रयोगशालाओं, 39 वर्तमान +भूमि परीक्षण प्रयोगशाला।ओं, 2 नई उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं और 16 राज्यों में 19 वर्तमान +उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशालाओं (एफक्यूसीएल) को मजबूत बनाने के लिए 16.63 करोड़ रूपए +जारी किए गए। +सूचना प्रौद्योगिकी. +कृषि और सहकारी विभाग मुख्यालय में आईटी उपकरण. +आईसीटी पहल का जोर ई-गवर्नेंस पर है ताकि सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने वाले +किसानों को उन्नत सेवाओं का लाभ मिल सके। +कृषि और सहकारी विभाग हैदराबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्मार्ट गवर्नमेंट (एनआईएसजी) +की सहायता से कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना तैयार कर रही है। यह दो-दो चरणों में लागू होगी। +एनईजीपी का पहला चरण पूरा हो गया है और प्राथमिकता वाली सेवाओं लक्षित और प्रक्रियाओं का ई- +गवर्नेंस गतिविधियों के तहत काम पूरा हो गया है। दूसरे चरण में केंद्र और राज्य स्तर पर कृषि में ई- +गवर्नेंस लागू करने के लिए रणनीति, रूपरेखा और दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे। दूसरा चरण निजी +क्षेत्र और समाज की भूमिका को परिभाषित करेगा, जिस पर काम हो रहा है। +ई-गवर्नेंस पहल की सफलता के लिए हर स्तर पर उपकरण साफ्टवेयर और प्रशिक्षण के माध्यम +से सहयोग आवश्यक है। +क्षेत्र कार्यालयों और डीएसी निदेशालयों में आईटी उपकरण. +डैकनेट परियोजना (डीएसीएनईटी) के तहत निदेशालयों/क्षेत्र इकाइयों को मूलभूत ढांचा उपलब्ध करा +दिया गया है और वे पूरी तरह से तैयार हैं। यह फैसला लिया गया कि सभी निदेशालय/क्षेत्र कार्यालय +अपने बजट से अपना खर्च पूरा करेंगे। लेकिन नेटवर्किंग, साफ्टवेयर विकास और क्षेत्र कार्यालयों/ +निदेशालयों के प्रशिक्षण का व्यय घटक के इस मद से पूरा किया जाएगा। +कृषि संसाधन सूचना प्रणाली (एजीआरआईएस). +दसवीं योजना स्कीम के इस घटक का उद्देश्य जीआईएस और आरएस प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने +वाले प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए निर्णय प्रणाली का विकास है। दो अग्रणी जिलों +हरियाणा के रोहतक और गुजरात के बनासकांठा में काम जारी है। ग्यारहवीं योजना में स्कीम के डैकनेट +घटक में शामिल हो जाएगा और जारी पाइलट परियोजना को पूरा करने में मदद दी जाएगी। +कृषि सूचना और संचार का विकास. +इस घटक का उद्देश्य कृषि संबंधी सभी आंकड़ों और वेब आधारित उपयोग के विकास का भंडार बनाना +है। भूमि मानचित्रीकरण का अंकीकरण आंकड़ा, सीडनेट पोर्टल, डेटवेयर हाउसिंग, आरएफएस और +जनसंचार विकास के पोर्टल विकास के विभिन्न चरणों में हैं। कृषि के विभिन्न विषयों के पोर्टलों का +विकास संवर्धन एवं निरंतर प्रक्रिया है। आईएनएम बागवानी और सहकारिताओं आदि के पोर्टल बनाने +का प्रस्ताव है। +पोर्टलों की संख्या बढ़ने और विषय सामग्री का विस्तार होता जाएगा तो उसको अद्यतन बनाने के +लिए उचित ढांचे की जरूरत होगी। आशा है कि नियमित रूप से आंकड़े अद्यतन और वेब सामग्री की +डिजाइनिंग के लिए जनशक्ति की जरूरत होगी। इन कार्यों को बाहर से कराने का प्रस्ताव है। +कृषि में आईटी उपकरणों को और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में सहयोग को मजबूत बनाना (आईआरआईएस नेट). +राज्यों की आईसीटी के उपयोग उन्नत सूचनाएं किसानों तक पहुंचाने में बहुत बड़ी भूमिका है। एग्रिसनेट +को वर्तमान घटक को 11वीं योजना में जारी रखने तथा अधिक मजबूत बनाने का प्रस्ताव है। अभी तक +21 राज्यों ने एग्रिसनेट के तहत सहायता का उपयोग किया है। इन राज्यों में भी एटीएमए सीमित ई- +गवर्नेंस के प्रयोग के लिए राशि जारी की गई है। देश भर के किसानों को उन्नत सूचनाएं प्रदान करने के +लिए योजना के कई गुना विस्तार की आवश्यकता है। 10वीं योजना के अनुभवों के आधार पर और +अधिक सेवाओं को एग्रिसनेंट के अंतर्गत लाने का प्रस्ताव है। +किसान कॉल सेंटर. +देश में किसान कॉल सेंटर योजना 21 फरवरी, 2004 को शुरू की गई। इसका उद्देश्य किसानों को शुल्क +मुक्त नंबर 1880-180-1551 से ऑन लाइन सूचनाएं प्रदान करना है। इस सुविधा का प्रचार दूरदर्शन +और रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से किया जा रहा है। एक ज्ञान प्रबंधन प्रणाली स्थापित करने का प्रस्ताव +है। 11वीं योजना में इसे जारी रखने का प्रस्ताव है। +तिलहन, दलहन और मक्का प्रौद्योगिकी मिशन. +केंद्र सरकार ने तिलहन की पैदावार बढ़ाने, खाद्य तेलों का आयात घटाने और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता +प्राप्त करने के उद्देश्य से 1986 में तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन शुरू किया था। इसके बाद दलहन, आयल +पाम और मक्का को भी क्रमश— 1990-91, 1991-92 और 1995-96 में प्रौद्योगिकी मिशन के अंतर्गत +लाया गया। इसके अलावा राष्ट्रीय तिलहन और वनस्पति तेल विकास बोर्ड भी गैर-परंपरागत तिलहनों के +नए क्षेत्र खोलकर तिलहन, दलहन और मक्का प्रौद्योगिकी मिशन के प्रयासों में सहयोग देता रहा है। यह +वृक्षों से प्राप्त होने वाले तिलहनों को प्रोत्साहन दे रहा है। तिलहन, दलहन और मक्का प्रौद्योगिकी मिशन +की निम्नलिखित योजनाएं लागू की गई हैं — +(i) तिलहन उत्पादन कार्यक्रम (ओपीपी); (ii) राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना (एनपीडीपी); +(iii) त्वरित मक्का विकास कार्यक्रम (एएमडीपी); (i1) फसल कटाई के बाद की प्रौद्योगिकी +(पीएचडी); (1) आयल पाम विकास कार्यक्रम (ओपीडीपी); (1i) राष्ट्रीय तिलहन और वनस्पति तेल +विकास बोर्ड (एनओबीओडी)। +तिलहन, दलहन और मक्का के लिए समन्वित योजना. +फसलों की विविधता को प्रोत्साहन देने के कार्यक्रमों के प्रति केंद्रीभूत दृष्टिकोण अपनाने के लिए राज्यों +को क्षेत्रीय विशिष्टताओं के आधार पर उनके कार्यान्वयन में छूट देने के उद्देश्य से पहले से लागू चारों +कार्यक्रमों-ओपीपी, ओपीडीपी, एनपीडीपी और एएमडीपी का विलय अब केंद्र द्वारा प्रायोजित एक ही +योजना में कर दिया गया है, जिसे “तिलहन, दलहन आयल पाम और मक्का फसलों का समन्वित +कार्यक्रम” कहा जाता है। यह कार्यक्रम दसवीं पंचवर्षीय योजना में एक अप्रैल, 2004 से कार्यान्वित +किया जा रहा है। इसे तिलहन और दलहन की खेती करने वाले 14 प्रमुख राज्यों और मक्का के लिए 15 +राज्यों तथा पाम आयल के लिए 10 राज्यों द्वारा लागू किया जा रहा है। +“तिलहन, दलहन, आयल पाम और मक्का फसलों के समन्वित कार्यक्रम” (आईएसओपीओएम) +की विशेषताएं इस प्रकार हैं-(i) अपनी पसंद की फसलों के चुनाव और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में +धन खर्च करने के मामले में राज्यों के प्रति लचीलापन; (ii) वार्षिक कार्ययोजना राज्य सरकारों द्वारा तैयार +करके भारत सरकार की मंजूरी के लिए भेजा जाना; (iii) कुल स्वीकृत राशि का 10 प्रतिशत भाग राज्य +सरकारों की ओर से शुरू किए जाने वाले नए कार्यक्रमों और उपायों के लिए खर्च करने की छूट; (i1) +राज्य सरकारों को कुल निर्धारित वित्तीय प्रावधान का 15 प्रतिशत हिस्सा निजी क्षेत्र के सहयोग से +कार्यक्रमों के कार्यान्वयन पर खर्च किए जाने की छूट; (1) केवल बीजरहित संघटकों के मामले में 20 +प्रतिशत धनराशि के अंतर-घटक विचलन की छूट; तथा (1i) कृषि और सहकारिता विभाग की पूर्व +अनुमति के साथ बीजयुक्त से बीजरहित संघटकों के लिए धन हस्तांतरण। +तिलहन उत्पादन कार्यक्रम के क्रियान्वयन से तिलहन की पैदावार बढ़ाने में मदद मिली है। वर्ष +1985-86 में तिलहन का उत्पादन 108.30 लाख था जो 2008-09 में बढ़कर 281.57 (IV अग्रिम +अनुमान) लाख टन हो गया। देश में दलहन का उत्पादन 1989-90 में 128.60 लाख टन से बढ़कर +2008-09 में 146.62 (IV अग्रिम अनुमान) लाख टन हो गया। आयल पाम की खेती का क्षेत्र 1992- +93 के अंत तक 8585 हेक्टेयर था जो वर्ष 2008-09 तक बढ़कर 26178 हेक्टेयर हो गया है। ताजे फलों +(एफएफबी) का वास्तविक उत्पादन वर्ष 2008-09 में 355480.36 टन था जिससे करीब 59007.40 +टन कच्चे पाम आयल (सीपीओ) का उत्पादन हुआ। 1994-95 में मक्का का उत्पादन 88.84 लाख था +जो वर्ष 2008-09 में (IV अग्रिम अनुमान) बढ़कर 192.87 लाख टन हो गया। +विस्तार. +विस्तार सुधार के लिए राज्य विस्तार कार्यक्रम सहयोग. +विस्तार सुधारों को जिला स्तर पर संचालित करने के लिए यह योजना 2005-06 के दौरान शुरू की गई। +योजना का उद्देश्य एक कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के रूप में प्रौद्योगिक प्रसार के लिए +सांस्थानिक प्रबंधन के जरिए विस्तार प्रणाली को किसान सहयोगी और जवाबदेह बनाना है। एजेंसी +जिला और उसके निचले स्तर पर कार्यरत किसानों/किसान समूहों, एनजीओ, केवीके, पंचायती राज +संस्थाओं तथा अन्य अंशधारकों के साथ सक्रिय भागीदारी करेगी। जारी होने वाला फंड राज्य सरकारों +द्वारा तैयार राज्य विस्तार कार्य योजना (एसईडब्लुपी) पर आधारित है। 586 एटीएमए स्थापित किए जा +चुके हैं; 517 से अधिक राज्य विस्तार कार्य योजनाएं बनाई जा चुकी हैं तथा किसान आधारित +गतिविधियों के जरिए 17.97 लाख महिला किसानों (19.74 प्रतिशत) सहित 91 लाख किसान लाभ +उठा चुके हैं और योजना की शुरूआत से अब तक 42.060 “किसान हित समूह” (एफआईजी) सक्रिय +हो चुके हैं। इस कार्यक्रम के तहत 30 अगस्त, 2009 तक 474.62 करोड़ रूपये जारी हो चुके हैं। +कृषि के लिए मास मीडिया सहयोग. +इस योजना के तहत दो पहल के ऊपर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। पहली पहल के रूप में किसान +समुदाय को कृषि संबंधी सूचना और ज्ञान प्रदान करने के लिए दूरदर्शन का उपयोग शामिल है। जिसके +तहत क्षेत्रीय केंद्रों द्वारा सप्ताह में पांच दिन 30 मिनट के कृषि कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। राष्ट्रीय +प्रसारण के तहत सप्ताह के छह दिन कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं। शनिवार को सफलता की +कहानियां, नूतन खोज आदि की फिल्में कृषि एवं सहकारिता विभाग दूरदर्शन को मुहैया कराता है। रबी/ +खरीफ अभियान, किसान कॉल सेंटर, किसान क्रेडिट कार्ड सुविधा जैसे मौजूदा मुद्दों पर ऑडियो/ +विजुअल स्पॉट फ्री कमर्शियल टाइम (एफसीटी) पर प्रचारित किए जाते हैं तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा +मिशन (एनएफएसएम) का प्रचार अभियान भी किया गया। मास मीडिया पहल के तहत अन्य भाग के +रूप में 96 एफएम का उपयोग शामिल है। +किसान कॉल सेंटर (केसीसी). +21 जनवरी, 2004 से शुरू किसान कॉल सेंटर देश के लगभग हर क्षेत्र में 14 विभिन्न स्थानों पर कार्य +कर रहे हैं। वर्तमान में केसीसी में 144 एजेंट कार्यरत हैं जो 23 स्थानीय भाषाओं में किसानों के प्रश्नों के +जवाब दे रहे हैं। देशभर में सातों दिन सुबह 6 बजे से रात के 10 बजे तक एक ही टोल फ्री नंबर 1551 +और शुल्क मुक्त नंबर 1800-80-1551 पर डायल करके संपर्क किया जा सकता है। केसीसी की +गतिविधियों की निगरानी हेतु प्रत्येक केसीसी के लिए राज्य स्तरीय निगरानी समिति (एसएलएमसी) +बनाई गई है जिसमें सचिव (कृषि), कृषि एवं अन्य विकास विभागों के निदेशक, बीएसएनएल के +प्रतिनिधि तथा केसीसी के नोडल अधिकारी केसीसी को चलाने में मदद करे रहे हैं। मांग के अनुरूप 25 +स्थानों पर केसीसी सुविधा का विस्तार किया जा रहा है। कृषि और सहयोग विभाग ने किसान ज्ञान +प्रबंधन प्रणाली केकेएमएस के रूप में एक डाटा निर्माण विकसित करने की पहल की है। केसीसी का +प्रचार डीडी/एआईआर/डीएवीपी, सेमेटि, राज्यों/केंशाप्र के जरिए किया जा रहा है। जुलाई, 2009 तक +किसान कॉल सेंटरों में 36 लाख से अधिक कॉलें प्राप्त हुईं। +कृषि विपणन. +देशभर में कृषि जिन्सों के व्यवस्थित विपणन को प्रोत्साहित करने के लिए बाजार को नियंत्रित किया गया +था। अधिकतर राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों ने कृषि जिन्सों के विपणन को नियंत्रित करने के लिए एक +अधिनियम (एपीएमसीएक्ट) बनाया था। साप्ताहिक बाजारों में से करीब 15 प्रतिशत बाजार इस +अधिनियम के तहत कार्य करते हैं। नियंत्रित बाजारों की शुरूआत से उत्पादकों/विक्रेताओं को एक जगह +इकट्ठे होकर थोक बिक्री में काफी सहूलियत हुई है, परंतु अभी भी सामान्य साप्ताहिक ग्रामीण बाजारों +और खासकर आदिवासी बाजार इस व्यवस्था का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। +देश के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास, रोजगार बढ़ाने और आर्थिक समृद्धि के लिए कृषि क्षेत्र में +व्यवस्थित बाजार की बहुत आवश्यकता है। बाजार प्रणाली को अधिक गतिशील और कार्यकुशल बनाने +के लिए फसल के बाद के विकास में अधिक से अधिक निवेश करने और किसानों के लिए खेतों के +आस-पास ही कोल्ड स्टोरेज बनाने की आवश्यकता है। इस निवेश के लिए निजी क्षेत्र से अपेक्षा की +जाती है जिसके लिए उचित कानून और नीतियां बनाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही खेतों से या +किसानों से सीधे ही कृषि उत्पाद खरीदने को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियां बनाने की आवश्यकता है +और कृषि उत्पादों और फुटकर विक्रेताओं और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के बीच एक प्रभावी संबंध बनाने +की आवश्यकता है। देश में विपणन व्यवस्था को अनियंत्रित करने के लिए राज्य एपीएमसी कानून में +आवश्यक सुधार करने का भी सुझाव दिया गया है ताकि विपणन, मूलभूत ढांचा और सहकारिता क्षेत्र में +निवेश को प्रोत्साहन मिल सके। +कृषि मंत्रालय ने राज्य सरकारों के लिए कृषि विपणन के लिए दिशा-निर्देश बनाने और उन्हें +अपनाने के लिए एक मॉडल कानून बनाया है। इस मॉडल कानून के अंतर्गत देश में कृषि बाजार के +विकास और प्रबंधन में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने तथा कृषि +उत्पादों की सीधी बिक्री के लिए उपभोक्ताओं/किसानों, प्रत्यक्ष क्रेता केंद्रों, निजी बाजार/यार्ड को +स्थापित करना है। इस कानून के अंतर्गत ही कृषि उत्पादों की गुणवत्ता प्रमाणीकरण और मानकीकरण +और विभिन्न स्तरों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य कृषि उत्पाद विपणन मानक ब्यूरो के गठन का +प्रावधान किया गया था। इससे पूंजी निवेश, सीधी खरीद और भविष्य में कदम उठाने में काफी मदद +मिलेगी। 13 राज्यों/केंशाप्र ने अपने एपीएमसी अधिनियम में संशोधन किया है और बाकी राज्य +संशोधन कर रहे हैं। 153वें एनडीसी प्रस्ताव के अनुसरण में, कृषि मंत्रालय ने मॉडल कानून पर ही +आधारित ड्राफ्ट मॉडल रूल तैयार कर संबंधित राज्यों/केंशाप्र को भेजे हैं। 7 राज्यों ने अपने एपीएमसी +नियमों में संशोधन किया है। +मूलभूत ढांचे की आवश्यकता. +देश में बाजार, भंडारण के विकास और कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने की दिशा में बहुत अधिक निवेश +की आवश्यकता है। विपणन के मूलभूत ढांचे के विकास में निवेश को प्रेरित करने के लिए मंत्रालय ने +इन कार्यक्रमों और योजनाओं को कार्यान्वित किया है। +(i) पूंजी निवेश की सहायता योजना के लिए “ग्रामीण गोदामों का निर्माण” नामक एक योजना को +एक अप्रैल, 2001 से लागू किया गया है। इस योजना के मुख्य उद्देश्य कृषि उत्पादों के भंडारण, +प्रसंस्करण, कृषि आदानों और बाजार ऋण उपलब्ध कराने के लिए किसानों की आवश्यकताओं को पूरा +करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में नई तकनीक से युक्त भंडारण जैसी सुविधाएं स्थापित करना है। +मूल योजना के अंतर्गत परियोजना की पूंजी लागत के 25 प्रतिशत तक बैंक एडिड सब्सिडी +उपलब्ध कराई गई थी। पूर्वोत्तर राज्यों, पहाड़ी इलाकों और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उद्यमियों के +लिए परियोजना की 33.33 प्रतिशत सब्सिडी का प्रावधान था। इस परियोजना में 20 अक्तूबर, 2004 से +संशोधन कर दिया गया। नई योजना में किसानों, कृषि स्नातकों, केंद्रीय भंडारण निगमों (सेंटर +वेयरहाउसिंग कॉपरेटिव)/राज्य भंडारण निगमों को 25 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाती है। व्यक्तिगत तौर +पर चलने वाली निजी कंपनियों और सहकारी कंपनियों की अन्य सभी श्रेणियों में आने वाली कंपनियों +को परियोजना लागत की 15 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाती है। यह सब्सिडी सामान्य इलाकों में 50 +मीटर और पहाड़ी इलाकों में 25 मीटर के आकार के छोटे गोदाम बनाने के लिए किसानों की मदद के +लिए बनाई गई थी। छोटे किसानों के लिए 5 लाख टन भंडारण की क्षमता को सुरक्षित बना लिया गया +है। योजना को नाबार्ड और एनसीडीसी द्वारा लागू किया जा रहा है। नाबार्ड और एनसीडीसी द्वारा 1 +अप्रैल, 2001 से क्रियान्वित योजना में 30 जून, 2009 तक 240.87 लाख भंडारण क्षमता वाली भंडारण +परियोजनाओं को 553.80 करोड़ रूपए की सरकारी सहायता के साथ मंजूरी दी गई। +(ii) “बाजार अनुसंधान और सूचना नेटवर्क” नामक केंद्रीय योजना के अंतर्गत देश में सभी प्रमुख +कृषि बाजारों में कीमतों और बाजार संबंधी सूचनाओं के तीव्र संकलन और प्रसार के लिए देशव्यापी +सूचना नेटवर्क स्थापित किया गया है। योजना के अंतर्गत 3024 बाजार केंद्र और 175 राज्य/विपणन बोर्ड +तथा विपणन निदेशालय एवं निरीक्षण कार्यालयों को इस नेटवर्क से जोड़ा गया है, जाहां 300 वस्तुओं +और 2000 किस्मों की कीमतों की रिपोर्ट आती है। 11वीं योजना में 36 थोक बाजारों को जोड़ने की +कृषि 87 +योजना है। व्यापाक बाजार पहुंच अवसर उपलब्ध कराने और बेहतर मूल्य की जानकारी के लिए योजना +का दायरा नियमित रूप से मजबूत किया जा रहा है। +(iii) “कृषि विपणन ढांचे का विकास/सुदृढ़ीकरण ग्रेडिंग और मानकीकरण” नाम की एक और +योजना कृषि मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही है। योजना के अंतर्गत सभी राज्यों में हरेक परियोजना के लिए +विपणन की मूलभूत विकासात्मक परियोजना के लिए 25 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है जो अधिकतम 50 +लाख रूपये तक सीमित है तथा पूर्वोत्तर राज्यों, पहाड़ी इलाकों और अनुसूचित जाति एवं जनजाति के +उद्यमियों के लिए 33.3 प्रतिशत सहायता दी जाती है जो अधिकतम 60 लाख रूपये तक है। राज्य +सरकारों/राज्य स्तरीय एजेंसियों की मूलभूत परियोजनाओं के लिए योजना के अंतर्गत ऊपरी परिसीमन +नहीं रखा गया है। यह योजना उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में संशोधित करके लागू की जा रही है +जहां कृषि उत्पादन विपणन नियमन कानून के तहत निजी और सहकारी क्षेत्रों में प्रतियोगी कृषि बाजार +स्थापित करने, सीधे विपणन करने, अनुबंधित खेती का प्रावधान है। योजना के अंतर्गत, आंध्रप्रदेश, +पंजाब, केरल, तमिलनाडु, मणिपुर, सिक्किम, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, नगालैंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़, +आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, असम, त्रिपुरा, गुजरात, कर्नाटक, गोवा और +केंद्रशासित प्रदेश अंडमान और निकोबार, दमन और दीव, चंडीगढ़ और दादर एवं नागर हवेली को +सहायता मिलने के लिए अधिसूचित किया गया है। +देश 31 मार्च, 2009 तक बैंकों/नाबार्ड, एनसीडीसी के माध्यम से 3265 ढांचागत परियोजनाएं +141 करोड़ रूपए सरकारी सहायता से मंजूर की गई हैं और 748 परियोजनाओं का 9.50 करोड़ रूपए की +सरकारी सहायता से सहकारिता क्षेत्र में विकसित किया गया है। इस निदेशालय ने राज्य की एजेंसियों की +289 ढांचागत परियोजनाओं को लगभग 84 करोड़ रूपए की सरकारी सहायता के साथ स्वीकृति प्रदान +की है। अधिसूचित राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 31 मार्च, 2009 तक एनआईएएन ने 530 प्रशिक्षण और +जागरूकता कार्यक्रम चलाए हैं। +(i1) देश के सभी प्रमुख शहरी केंद्रों में फल, सब्जियों और जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के +विपणन के लिए आधुनिक टर्मिनल वाले बाजारों को प्रोत्साहित करने के लिए विभाग ने कई कदम उठाए +हैं। इन बाजारों में इलेक्ट्रॉनिक ऑक्शन, कोल्डवेन जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। यह बाजार +किसानों की पहुंच में हैं और सुविधाजनक क्षेत्रों में स्थापित हैं। टर्मिनल बाजारों को जल्दी ही नष्ट होने +वाली वस्तुओं की खरीद और बिक्री के लिए राज्य सरकारों और निजी उद्यमियों के बीच बातचीत करके +स्थापित किया गया है। टर्मिनल मार्किट माल खरीदने वाले कई केंद्रों से जुड़ा रहता है और किसानों को +उनके उत्पाद या फसल को बेचने के लिए उनकी पहुंच के अंदर रहता है। उपर्युक्त योजना के तहत +परियोजना के लिए सरकारी सहायता देने के बारे में सुधार किया गया है। परियोजना लागत की 40' +राशि सहायता के रूप में दी जाएगी जबकि निजी उद्यमियों टीएमसी की स्थापना के लिए 25' राशि दी +जाएगी। सरकारी सहायता इकाई की 150 करोड़ लागत पर प्रति टीएमसी 50 करोड़ रूपए से अधिक नहीं +होगी। किसानों के हितों की रक्षा और सेवा स्तर की गुणवत्ता के लिए उत्पादक संघों की भागीदारी का +26' इक्विटी के साथ प्रावधान किया गया है। तदनुसार प्रचालन दिशा-निर्देशों में सुधार कर जारी किया +गया है जो वेबसाइट (222.ड्डद्दद्वड्डह्म्knet.niष्.in) पर उपलब्ध है। +कृषि एवं सहकारिता विभाग के अधीन तीन संगठन हैं — (1) विपणन एवं निरीक्षण निदेशालय, +फरीदाबाद; (2) चौ. चरणसिंह राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान, जयपुर; (3) लघु किसान कृषि व्यापार +संघ, नई दिल्ली। +88 भारत-2010 +विपणन एवं निरीक्षण निदेशालय. +यह विभाग से जुड़ा संस्थान है और इसके अध्यक्ष कृषि विपणन सलाहकार होते हैं। इसका मुख्यालय +फरीदाबाद (हरियाणा) में है और शाखा कार्यालय नागपुर (महाराष्ट्र) में है। देशभर में इसके 11 क्षेत्रीय +कार्यालय, नागपुर में केंद्रीय एग्मार्क प्रयोगशाला, 26 उपकार्यालय और 16 एग्मार्क प्रयोगशालाएं हैं। +निदेशालय के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं — राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को कृषि उत्पादों के विकास +और प्रबंधन के लिए वैधानिक नियमों के अनुसार सलाह देना, कृषि उत्पादों (ग्रेडिंग और मार्किंग) +कानून 1937 के अंतर्गत कृषि और उसके सह उत्पादों के मानकीकरण और ग्रेडिंग को प्रोत्साहन देना, +बाजार अनुसंधान, सर्वेक्षण और योजना बनाना, कृषि विपणन में प्रशिक्षण देना, बाजारों का विस्तार, कृषि +विपणन सूचना नेटवर्क, ग्रामीण गोदामों का निर्माण तथा कृषि विपणन के लिए मूलभूत ढांचे का विकास। +ग्रेडिंग और मानकीकरण. +कृषि उत्पाद (ग्रेडिंग और मार्किंग) कानून 1937 सरकार द्वारा तय गुणवत्ता मानकों, जिन्हें “एग्मार्क” नाम +से जाना जाता है, को मजबूत करने के लिए बनाया गया था। अब तक 182 कृषि और उसके सहउत्पादों +की ग्रेडिंग करके अधिसूचित किया जा चुका है। खाद्य मिलावट निरोधक कानून 1954, और भारतीय +मानकीकरण ब्यूरो 1986 के अंतर्गत शुद्ध मानकों पर ध्यान दिया जाता रहा है। कोडेक्स अंतर्राष्ट्रीय मानक +संगठन द्वारा तैयार अंतर्राष्ट्रीय मानक पर भी ध्यान दिया जाता है ताकि भारतीय उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार +में अपनी पहचान बना सके। +डीएनआई एगमार्क के तहत घरेलू कृषि उत्पादों पर प्रमाणीकरण योजना लागू कर रहा है, जिनके +लिए ग्रेडिंग मानकों को अधिसूचित किया जा चुका है। डीएमआई यूरोपीय यूनियन के देशों के लिए +ताजा फलों और सब्जियों के निर्यात के लिए निरीक्षण और प्रमाणीकरण संस्था है। यह कार्य स्वैच्छिक है। +एगमार्क के तहत यूरोपीय यूनियन के देशों को अंगूर, प्याज और अंतर का प्रमाणीकरण किया जा रहा है। +वर्ष 2009-10 में (30 जून, 2009 तक) वनस्पति तेल ग्रेडिंग और मार्किंग (संशोधन) नियम 2009 की +अंतिम अधिसूचना भारत के असाधारण गजट के भाग-2, खंड-3, उप खंड (1) में 3 जून, 2009 को +उसी तिथि के आदेशानुसार प्रकाशित हो चुकी है। अकार्बनिक कृषि उत्पादों की ग्रेडिंग और मार्किंग +नियम 2009 की अंतिम अधिसूचना विधि और न्याय मंत्रालय की पुष्टि के बाद मंत्रालय को भारत के +गजट में प्रकाशन के लिए भेजी जा चुकी है। +करंजा बीज ग्रेडिंग और मार्किंग नियम 2009 की प्रारंभिक प्रारूप अधिसूचना, पुवाद बीज ग्रेडिंग +और मार्किंग नियम, 2009 की प्रारंभिक प्रारूप अधिसूचना भारत के 11 जून, 2009 के असाधारण गजट +में भाग-2, खंड-3, उप खंड (1) में 4 जून, के आदेशानुसार प्रकाशित हो चुकी है। इसी दिन के गजट +में 3 जून, 2009 के आदेश से सामान्य ग्रेडिंग और मार्किंग (संशोधन) नियम, 2009 (नौ फलों और +सब्जियों के मानकों सहित, जिसे अरोडा की स्थायी समिति ने स्वीकृति प्रदान की है) विधि और न्याय +मंत्रालय के राज भाषा ब्यूरो को हिंदी अनुवाद के लिए भेज दिया गया है। +लघु किसान कृषि व्यापार संगठन. +सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के अंतर्गत 18 जनवरी, 1994 को कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा +लघु किसान कृषि व्यापार संगठन (एसएफएसी) की स्थापना की गई थी। इसके सदस्यों में रिजर्व बैंक, +भारतीय स्टेट बैंक, आईडीबीआई, एक्सिम बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स, नाबार्ड, केनरा बैंक, +नैफेड, यूनाइटेड फासफोरस लिमिटेड हैं। +लघु किसान कृषि व्यापार संगठन कीअध्यक्षता केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा की जाती है जिसमें 20 +सदस्यों का बोर्ड रहता है। संगठन द्वारा 18 राज्य स्तरीय लघु किसान कृषि व्यापार संस्थान स्थापित किए +गए हैं। इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य कृषि परियोजनाओं में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए, +ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार अवसर बढ़ाने के लिए नए सुझावों को लागू करना है। एसएएफसी ने +समग्र कोष योगदान 21 राज्य स्तरीय एसएएफसी की स्थापना की है। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में +कृषि व्यापार में निजी निवेश बढ़ाकर केंद्रीय क्षेत्र की योजना को सरकार ने 19 जुलाई, 2005 को दसवीं +योजना की शेष अवधि में क्रियान्वयन के लिए 40 करोड़ रूपए आबंटित किए। योजना एसएफएसी +कृषि व्यापार परियोजना के लिए वेंचर केपिटल सहायता और बेहतर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट को तैयार +करने वाले किसानों/उत्पादकों के समूहों को सहायता देने वाले व्यावसायिक बैंकों के साथ मिलकर लागू +की जा रही है। इस योजना के प्रमुख उद्देश्य कृषि व्यापार परियोजना को स्थापित करने वाले निजी +निवेशकों अौर बैंकों की भागीदारी से कृषि व्यापार को सुगम बनाना है जिससे उत्पादकों को सुनिश्चित +बाजार उपलब्ध कराया जा सके, ग्रामीण आय और रोजगार के अवसर बढ़ाना, उत्पादकों के साथ कृषि +व्यापार परियोजनाओं के लिए बेहतर माहौल बनाना, किसानों और उत्पादकों को सहायता देना, +परियोजना विकास सुविधाओं के माध्यम से मूल्य कड़ी में भागीदारी बढ़ाने के लिए कृषि स्नातकों को +सहायता देना और विशेष कृषि व्यापार परियोजनाएं स्थापित करने वाले कृषि व्यापारियों को प्रशिक्षण +देना है। कृषि व्यापार परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता लघु किसान कृषि व्यापार संघ पूंजी की +भागीदारी के अनुसार करता है। वित्तीय सहायता परियोजना की लागत पर निर्भर करती है। और इसका +निम्नतम होगी- बैंक द्वारा आकलित कुल परियोजना लागत का 10 प्रतिशत, परियोजना इक्विटी का 26 +प्रतिशत, 75 लाख रूपये। +जिन परियोजनाओं को अधिक पूंजी की आवश्यकता है या जो परियोजनाएं दूरदराज और पिछड़े +इलाकों, पूर्वोत्तर राज्यों, पहाड़ी इलाकों में हैं या राज्यों की एजेंसियों द्वारा जिनकी सिफारिश की जाती है +उन्हें अधिक सहायता देने के लिए संघ द्वारा विचार किया जाता है। +राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान. +राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान 8 अगस्त, 1988 से जयपुर (राजस्थान) में कार्य कर रहा है। यह कृषि +विपणन के क्षेत्र में प्रशिक्षण, सलाहकार सेवा और शिक्षा प्रदान करता है। भारत की कृषि विपणन में +शीर्ष संस्था होने के नाते सरकार के कृषि मंत्रालय के नीति सलाहकार के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका +निभा रहा है। +इस संस्थान का प्रबंधन कृषि मंत्री की अध्यक्षता में एक सरकारी संगठन तथा कृषि एवं सहकारी +विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक कार्यकारी समिति करती है। प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य वर्तमान +कृषि विपणन कर्मियों की कुशलता को बढ़ावा। कार्यक्रम में अंतर्गत गुणवत्ता मानक, फसलोपरांत प्रबंधन, +अनुबंध खेती, कृषि विपणन सुधार, बाजारोन्मुख विस्तार एवं जोखिम प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा, सूचना +प्रौद्योगिकी, महिला सशक्तिकरण, वैज्ञानिक भंडारण, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) आदि आते हैं। +वर्ष 2008-09 में संस्थान ने 50 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए और 2009-10 में 50 प्रशिक्षण का +आयोजन करेगा। +कृषि और बागवानी विभागों कृषि उद्योग, राज्य विपणन बोर्ड, कृषि उत्पाद विपणन समितियों, +शीर्ष स्तर की सहकारी संस्थाओं, वस्तु बोर्ड, कृषि और प्रसंस्कारित खाद्य उत्पाद विकास प्राधिकरण +निर्यात संस्थाओं व्यावसायिक बैंकों और गैर सरकारी संगठनों के वरिष्ठ और मध्यम स्तर के अधिकारियों +को प्रशिक्षण देता है। +संस्थान ने कई राज्यों कृषि विपणन विकास के लिए योजनाएं बनाई हैं। यह टर्मिनल बाजारों और +कृषि आधारित परियोजनाओं के लिए परियोजना रिपोर्ट भी तैयार करता है। +संस्थान ने भूटान की शाही सरकार के लिए मास्टर विपणन योजना 2008 में पूरी की। एनआईएएम +बहुल राज्यीय कृषि स्पर्धी परियोजना (एमएसएसीपी) के तहत विश्व बैंक छूट सहायता के लिए राज्य +सरकारों को प्रस्ताव तैयार करने में सहायक शीर्ष संस्थान है। एनआईएएम ने 2008-09 में असम कृषि +स्पर्धी परियोजना के विपणन घटकों के बारे में रिपोर्ट दी है। इनके अलावा संस्थान ने भारत के कृषि +विपणन प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए यूएसएआईडी के साथ समझौते का क्रियान्वयन किया है। +संस्थान कृषि वस्तु व्यापार के विभिन्न पहलुओं के बारे में डब्लूएटीएस, नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन +करती है। +एनआईएएन अपने अध्यापकों और छात्रों के माध्यम से कृषि विपणन के विभिन्न मुद्दों पर +व्यावहारिक अनुसंधान करवाता है। संस्थान एआईसीटीई द्वारा स्वीकृत दो वर्षीय स्नातकोत्तर डिप्लोमा +कार्यक्रम चला रहा है। इसमें अखिल भारतीय केंद्रों पर एनआईएएमएटी परीक्षा के माध्यम से पाठ्यक्रम +में प्रवेश दिया जाता है। +पशुपालन. +ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन और डेयरी विकास की महत्वपूर्ण भूमिका है। ग्रामीण परिवार, खासकर +भूमिहीन और छोटे तथा सीमांत किसान पशुपालन को आय के पूरक स्रोत के रूप में अपनाते हैं। इस +व्यवसाय से अर्द्धशहरी, पर्वतीय, जनजातीय और सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को +सहायक रोजगार मिलता है, जहां केवल फसल की उपज से ही परिवार का गुजर-बसर नहीं हो सकता। +केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के अनुमान के अनुसार चालू मूल्य पर मछली और पशुपालन क्षेत्र +का कुल योगदान वर्ष 2007-08 के दौरान 2,82,779 करोड़ रूपये था (इसमें 2,40,601 करोड़ रूपये पशु +क्षेत्र के और 4, 2178 करोड़ रूपये मछली पालन क्षेत्र के थे), जो कि कृषि, पशु पालन और मछली क्षेत्र +के कुल 9,36,597 करोड़ रूपये का 30 प्रतिशत है। वर्ष 2007-08 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद में इन +क्षेत्रों का योगदान 5.21 प्रतिशत था। +विश्व में सबसे अधिक मवेशी भारत में हैं। दुनिया की कुल भैंसों का 57 प्रतिशत और गाय-बैलों +का 14 प्रतिशत भारत में है। 2003 की मवेशी गणना के अनुसार, देश में करीब 18.5 करोड़ गाय-बैल +तथा 9.8 करोड़ भैंसें हैं। +पशुपालन क्षेत्र का योगदान. +देश की लगातार बढ़ती आबादी की (पशुओं से प्राप्त होने वाली) प्रोटीन की आवश्यकताएं पूरा करने +में दूध, अंडा और मांस के रूप में खाद्य भंडार में पशुपालन क्षेत्र जबरदस्त योगदान कर रहा है। देश +में फिलहाल प्रोटीन की प्रतिव्यक्ति दैनिक उपलब्धता 10 ग्राम है, जबकि इसका विश्व औसत 25 +ग्राम है। किंतु बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए बढ़ते बच्चों और शिशुओं को दूध पिलाने वाली माताओं +के पोषण-स्तर को बनाए रखने के लिए देश में प्रोटीन की उपलब्धता में कम से कम दुगनी बढ़ोतरी +होनी चाहिए। +दूध उत्पादन — पिछली पंचवर्षीय योजनाओं में पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार ने कई प्रयास +किए हैं, जिनके सुखद नतीजे के तौर पर दूध के उत्पादन में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2007-08 में +10 करोड़ 49 लाख टन से अधिक दूध उत्पादन करने के साथ ही भारत दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में दुनिया +में पहले स्थान पर बना हुआ है। +अंडा उत्पादन — वर्ष 2007-08 के दौरान देश में 53.7 अरब अंडों का उत्पादन हुआ। +ऊन का उत्पादन — वर्ष 2007-08 के दौरान देश में ऊन उत्पादन 4 करोड़ 40 लाख किलोग्राम तक पहुंच +गया। +अन्य पशु उत्पाद — पशुपालन क्षेत्र दूध, अंडे, मांस आदि के जरिए न केवल अनिवार्य प्रोटीन और पौष्टिक +मानव भोजन उपलब्ध कराता है, बल्कि गैर-खाद्य कृषि सह-उत्पादों के उपयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका +निभाता है। पशुपालन में चमड़ा, खाल, खून, हड्डियां, चर्बी आदि कच्चा माल/सह उत्पादों की भी प्राप्ति +होती है। +विभाग द्वारा लागू योजना/कार्यक्रम. +पशु बीमा — गोवा को छोड़कर देश के सभी राज्यों में लागू की जानेवाली पशुबीमा योजना के दो प्रमुख +उद्देश्य हैं, पहला- किसानों को सुरक्षित तंत्र मुहैया कराना और पशुओं के नुकसान की भरपाई करना और +दूसरा- पशुओं और उनके उत्पादों में गुणवत्ता सुधार लाकर उसके लक्ष्य को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाना। +देशभर के चुने हुए 100 जिलों में 2005-06 और 2007-08 के दौरान पशु बीमा योजना लागू की गई। +2007-08 में इसे उन्हीं जिलों में जारी रखा गया। 20 नवंबर 2008 को स्वीकृत पशु बीमा योजना 100 नए +जिलों में नियमित आधार पर लागू की जा रही है। +2005-06 से 2007-08 तक योजना के उद्देश्यों की प्राप्ति और उसकी खामियों का पता लगाने के +ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आणंद (आईआरएमए) को अध्ययन का काम सौंपा गया। उसके आधार पर दिए +गए सुझावों और पहले के अनुभवों के आधार पर शुरू में लागू 100 जिलों सहित इसका विस्तार 300 +जिलों में करने का फैसला किया गया। +योजना में प्रारंभिक स्तर पर गाय और भैंसों की उच्च नस्लों के अधिकतम वर्तमान मूल्यों के आधार +पर बीमा किया जाता है। प्रीमियम का 50' लाभार्थी देता है, शेष केंद्र सरकार देती है। यह योजना राज्य +कार्यान्वयन एजेंसियों, जैसे राज्य पशुपालन विकास बोर्ड और जिन राज्यों में बोर्ड नहीं है और राज्य पशु +पालन विभागों द्वारा कार्यान्वित की जाती है। वर्ष 2008-09 में 17.59 करोड़ रूपए की लागत से 3.28 +लाख पशुओं का बीमा किया गया। 2008-09 12.8 में लाख पशुओं के बीमे पर 59.80 करोड़ रूपए +व्यय हुए। 18 जून, 09 तक 40,891 दावों में से 33,306 का भुगतान किया गया। +पशु जनगणना. +देश में पशुधन और मुर्गियों की संख्या बहुत अधिक है, ग्रामीण लोगों के सामाजिक-आर्थिक दशा को +सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका है। विश्व में भारत भैंसों के मामले में पहले, मवेशी और बकरियों के +मामले में दूसरे, भेड़ के मामले में तीसरे, बत्तखों के मामले में चौथे, मुर्गों के मामले में पांचवें और ऊंटों +के मामले में छठवें स्थान पर है। इनसे कृषि मजदूरों, लघु एवं सीमांत किसानों, ग्रामीण महिलाओं, कृषि +आधारित उद्योगों, दुग्ध उत्पादों, दुग्ध संयंत्रों, उर्वरक और कीटनाशकों, खाल और ऊन उत्पाद आदि में +मदद मिलती है। +राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व और उनके पुनउर्त्पादन और लघु जीवनकाल को देखते +हुए सरकार ने पशुओं की गणना करने का फैसला किया। पहली गणना 1919-20 हुई थी और बाद में +भी यह गणना हुई। 18वीं गणना 15 अक्टूबर, 2007 की संदर्भतिथि के साथ पूरी हो गई है। 18वीं पशु +गणना के तीन कार्यक्रमों का प्रचार किया गया-(1) गृह सूची कार्यक्रम (2) गांव/वार्ड (आधारभूत +ढांचा) और घर-गृहस्थी कार्यक्रम, (अ) पशुधन (ब) मुर्गीपालन (पश्चांगन/फार्म), पशु चालित कृषि +उपकरण और (द) मत्स्य सांख्यिकी। सभी राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में, कुछ राज्यों उत्तर प्रदेश, +बिहार, असम, मिजोरम और त्रिपुरा को छोड़कर, पूरा हो गया है। बिहार में अभी पूरा होना है। असम +और बिहार को छोड़कर सभी राज्यों/केंशाप्र से आंकड़े प्राप्त हो गए हैं। दोनों राज्यों में डाटा इंट्री का कार्य +चल रहा है। अगस्त 2009 तक अबंटित परिणाम आने थे। विस्तृत आंकड़ों के लिए विभिन्न राज्यों/ +केंशाप्र में डाटा इंट्री का कार्य चल रहा है। अखिल भारतीय स्तर पर घर-बार के विस्तृत परिणामों के +जुलाई, 2010 तक जारी किए जाने की आशा है। +वर्ष 2007-08 में 27.62 करोड़ रूपए विधिमान्य किए गए और 2007-08 एवं 2008-09 में +पशुगणना के लिए 203.67 करोड़ रूपए जारी किए गए। योजना के लिए बीई के तहत 2009-10 में +23.11 करोड़ रूपए दिए गए हैं। +गाय-बैल और भैंसों का विकास. +देश में देसी नस्ल के गाय-बैलों की 27 और भैंसों की 7 नस्लें उपलब्ध हैं। दूध का उत्पादन बढ़ाकर प्रति +व्यक्ति दूध की उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से गाय, बैल और भैंसों में आनुवांशिक सुधार लाने के कई +केंद्रीय और केंद्र प्रायोजित कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। इस बात के भी प्रयत्न किए जा रहे हैं कि जिन +देशी गायों, बैलों और भैंसों की प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है, उनका संरक्षण उनके +क्षेत्रों में किया जाए। भावी नस्ल में सुधार लाने के लिए उत्तम नस्ल के सांड़ और गाय पैदा करने हेतु +प्रशीतित भ्रूण उपलब्ध कराने की क्षमता के आधार पर विशिष्ट पशुओं का चयन और पंजीकरण किया +जाता है। +गाय, बैल और भैंस प्रजनन की राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत कार्यक्रम को लागू करने वाली +एजेंसियों को शत-प्रतिशत सहायता दी जाती है। इस परियोजना में 28 राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश +भाग ले रहे हैं। 2007-08 तक इन राज्यों को 398.36 करोड़ रूपए वित्तीय सहायता के रूप जारी किया +जा चुका है। वित्तीय वर्ष 2008-09 में 89.70 करोड़ रूपए के आरई के मुकाबले 87.37 करोड़ रूपए +जारी किए गए। +मवेशियों और भैंसों के श्रेष्ठ जनन द्रव्य (जर्म प्लाज्म) की पहचान और उसका पता लगाने, +बेहतर जनन द्रव्य स्टॉक के प्रचार, उसके क्रय-विक्रय के नियमन, प्रजनकों की संस्थाएं बनाने में +सहायता और देश के विभिन्न हिस्सों में बेहतर किस्म के सांडों की आपूर्ति के लिए एक केंद्रीय रेवड़ +पंजीकरण योजना भी चलाई जा रही है। सरकार ने चार प्रजनन क्षेत्रों-रोहतक, अहमदाबाद, ओंगोल +और अजमेर में केंद्रीय रेवड़ पंजीकरण इकाइयों की स्थापना की है। इन गाय प्रजातियों, जैसे-गिर +कंकरेज, हरियाणा एवं ओंगोल तथा भैंसों की प्रजातियों (जैसे-जस्फराबादी, मेहसाणी, मुर्रा और सुरती) +के पंजीकरण के लिए कुल मिलाकर 92 दुग्ध रिकार्डिंग केंद्र काम कर रहे हैं। वर्ष 2007-08 के दौरान +14711 पशुओं का प्राथमिक पंजीकरण किया गया। +देश में सात केंद्रीय पशु प्रजनन फार्म हैं। ये सूरतगढ़ (राजस्थान), चिपलीमा और सुनबेडा +(उड़ीसा), धमरोड़ (गुजरात), हैसरघट्टा (कर्नाटक), अलमाडी (तमिलनाडु) और अंदेशनगर (उत्तर +प्रदेश) में स्थित हैं, जो गाय, बैल और भैंस प्रजनन की राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत गायों, बैलों तथा +भैंसों के वैज्ञानिक प्रजनन कार्यक्रमों और उम्दा नस्ल के सांड़ों, गायों, बैलों और भैंसों के प्रजनन के लिए +ऊंची नस्ल के सांड़ और प्रशीतित वीर्य के कार्य में लगे हैं। यह फार्म किसानों और प्रजकों को प्रशिक्षण +भी देते हैं। 2008-09 के दौरान इन फार्मों ने देश के विभिन्न भागों में कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम के +अंतर्गत इस्तेमाल करने के लिए 346 बछड़े तैयार किए तथा उच्च प्रजाति के 245 सांड़ सप्लाई किए। +फार्म प्रशिक्षण प्रेक्टिस और वैज्ञानिक प्रजनन प्रदर्शन में 3711 व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया गया। डेयरी +फार्म प्रबंधन में 2912 किसानों को प्रशिक्षित किया गया। +हेस्सरगटटा (बेंगलुरू) स्थित सेंट्रल फ्रोजेन सीमेन प्रोडक्शन एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (सीएफएसपी +और टीआई) कृत्रिम गर्भाधान के लिए देसी, विदेशी संकर नस्ल के जानवरों और मुर्ग भैसों के +हिमशीतित वीर्य तैयार कर रहा है। संस्थान राज्य सरकारों के तकनीकी अधिकारियों को वीर्य प्रौद्योगिकी +में प्रशिक्षण प्रदान करने के अलावा देश में तैयार हिमशीतित वीर्य और कृत्रिम गर्भाधान के उपकरणों +(एआई) के परीक्षण केंद्र का भी कार्य करता है। संस्थान 2008-09 में 8.66 लाख खुराक तैयार करने के +अलावा 227 लोगों हिमशीतित वीर्य प्रौद्योगिकी और यंत्रों के बारे में प्रशिक्षण प्रदान किया। +मुर्गीपालन विकास. +सरकार के अनुसंधान और विकास योजनाओं और निजी क्षेत्र के संगठित बाजार प्रबंधन के कारण देश में +मुर्गीपालन में उत्तरोत्तर प्रगति हुई है। +भारत 489 मिलियन मुर्गियों तथा प्रतिवर्ष 47 बिलियन अंडा उत्पादन के आधार पर विश्व के तीन +शीर्ष अंडा उत्पादक देशों में शामिल है। ब्रोइअल उत्पादन 8-10 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रहा है +और वर्तमान में भारत 2.0 मिलियन मीट्रिक टन चिकन मांस वार्षिक पैदा करता है। वर्तमान में अंडों और +चिकन मांस की प्रति व्यिQ उपलब्धता 1970 के 10 अंडों और 146 ग्राम से बढ़कर 41 अंडे तथा 1.6 +किग्रा हो गई है। मुर्गीपालन तथा उत्पादों में भारत का विश्व में एक छोटा हिस्सा है फिर भी पिछले दशक +में देश ने निर्यात में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 1993-94 में निर्यात 11 करोड़ रूपए कम था, +मुर्गीपालन क्षेत्र लगभग 30 लाख लोगों को प्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराने के अतिरिQ +बहुत से भूमिहीन तथा सीमांत किसानों के लिए सहयोगी आमदनी पैदा करने के साथ-साथ ग्रामीण +गरीबों को पोषण सुरक्षा प्रदान करने का एक शिQशाली साधन है। भूमि हीन श्रमिक अपनी 50 प्रतिशत +आमदनी पशुधन विशेषकर मुर्गीपालन से अर्जित करते हैं। +देश को किसानों की सहायता के चार क्षेत्रवार केंद्रों का पुनर्गठन कर एकल खिड़की सुविधा प्रदान +की गई है। इन क्षेत्रीय केंद्रीय मुर्गीपालन विकास संगठन (सीपीओ) चंडीगढ़, भुवनेश्वर, मुंबई और +हेसरघट्टा में किसानों को तकनीकी कुशलता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। +गुड़गांव स्थित केंद्रीय कुक्कुट निष्पादन परीक्षण केंद्र (रेंडम सैंपल पोल्ट्री परफोर्मेंस टेसि्ंटग सेंटर +सीपीपीटीसी) को लेयर और ब्रोइलर प्रजातियों के निष्पादन परीक्षण का काम सौंपा गया है। यह केंद्र एक +लेयर दो ब्रोइलर परीक्षण एक वर्ष में करता है। +कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति ने 11वीं योजना के तीसरे वर्ष 2009-10 से मुर्गीपालन +विकास की केंद्र प्रायोजित योजना को मंजूरी दी और 150 करोड़ रूपए आबंटित किए। इसके तीन +घटक हैं, यथा राज्य मुर्गी फार्मों को सहायता (जो जारी घटक है) और दो नए घटकों में पहला “रूरल +बैकयार्ड पॉल्ट्री डेवलपमेंट” भाग किसानों को वैज्ञानिक तरीके से संगठित गतिविधियां चलाने में समर्थ +बनाएगा तथा दूसरा “पॉल्ट्री एस्टेट” है। योजना की प्रशासनिक स्वीकृत और दिशा-निर्देश जारी किए जा +रहे हैं। +राज्यों के मुर्गीपालन फार्मों को सहायता का उद्देश्य वर्तमान फार्मों को बनाना है ताकि वे ग्रामीणों +को अच्छी किस्म की मुर्गियां दे सकें। रूरल बैकयार्ड पाल्ट्री डेवलपमेंट कंपोनेंट अंतर्गत समाज के गरीबी +की रेखा के नीचे के अधिक से अधिक जरूरतमंदों को लाया जाएगा ताकि उन्हें पूरक अन्य और पोषण +प्राप्त हो सके। “पाल्ट्री एस्टेट्स” के अग्रणी घटक से शिक्षित बेरोजगार युवकों और छोटे किसानों की +उद्यम कुशलता बढ़ाई जाएगी जिससे मुर्गीपालन से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों से वैज्ञानिक और +सामूहिक दृष्टिकोण से उसे लाभकारी बना सकें। +भेड़ विकास. +2003 की मवेशी गणना के अनुसार देश में लगभग 6.147 करोड़ भेड़ और 12.436 करोड़ बकरियां हैं। +देश भर में लगभग 50 लाख परिवार भेड़, बकरी, खरगोश आदि के पालन तथा इससे संबद्ध गतिविधियों +में लगे हुए हैं। वर्ष 2006-07 में 45.1 मिलियन किलोग्राम ऊन का उत्पादन हुआ। +केंद्रीय भेड़ प्रजनन फार्म, हिसार में जलवायु के अनुकूल अच्छी नस्ल की विदेशी/संकर भेड़ें पैदा +की जा रही हैं। वर्ष 2008-09 के दौरान फार्म द्वारा 694 नर भेड़ें और 95 बतखे उपलब्ध कराई गईं। 44 +किसानों को ऊन की कटाई और 633 किसानों को भेंड़ प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया। +संकटग्रस्त नस्लों का संरक्षण. +देश में कई शुद्ध नस्लों के पशुओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। कुछ की संख्या दस हजार से +भी कम हो गई है। ऐसे पशुओं को “संकटग्रस्त नस्लों” के अंतर्गत माना जाता है। इनमें जुगाली करने वाले +पशु, अश्व जाति, सूअर और लद्द किस्म की कुछ प्रजातियां शामिल हैं। +ऐसे विलुप्तप्राय नस्लों के संरक्षण के लिए दसवीं पंचवर्षीय योजना में केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित +एक नई परियोजना शुरू की गई है। इसके लिए बजट में 15 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। +ऐसी नस्लों के पशुओं की पैदाइश के लिए संबंधित राज्यों में फार्म की स्थापना की गई है। इसके लिए +केंद्र सरकार द्वारा शत-प्रतिशत सहायता देने का प्रावधान है। संरक्षण परियोजनाएं राज्य सरकार, +विश्वविद्यालयों और गैर सरकारी संगठनों द्वारा कार्यान्वित की जा रही हैं। दसवीं योजनावधि के दौरान +27 नस्लों के लिए संरक्षण परियोजना शुरू की गई है। वर्ष 2007-08 के दौरान संकटग्रस्त नस्लों के +संरक्षण हेतु 136.06 अरब रूपये जारी किए जिसमें से गुर अंगददेव वेटोरिनरी एंड एनीमल साइंस +यूनिवर्सिटी, लुधियाना को 30 लाख रूपये, काठियावाड़ी घोड़ों के लिए गुजरात सरकार को 36.81 लाख +रूपये, मुज़फ्फरनगरी भेड़ के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को 28.25 लाख रूपये तथा योजना के मूल्यांकन +के लिए नाबार्ड कंसल्टेंसी सर्विसेज (नेबकॉस) को 9 लाख रूपये शामिल हैं। 11वीं योजना में आबंटन +16 करोड़ रूपए से बढ़ाकर 2008-09 में 45 करोड़ रूपए कर दिया गया है। 11वीं योजना में उन मुर्गियों +और बतखों की नस्लों को भी इसके अंतर्गत लाया जाएगा, जिनकी संख्या 1000 से अधिक है। +योजना के तहत 2008-09 में आबंटन 1.94 करोड़ रूपए थे, जिसके एवज में 194.95 लाख मार्च +2009 तक जारी किए गए। इसमें गुजरात को सुरती बकरियों के संरक्षण के लिए (32.25 लाख रूपए) +और ऊंटों के संरक्षण के लिए 68 लाख रूपए, केरल पशुधन विकास बोर्ड को अट्टापैडी बकरियों के +संरक्षण के लिए (27.25 लाख रूपए) और अंगामैली सूअरों के लिए (9.20 लाख रूपए), जम्मू और +कश्मीर को टट्टुओं के संरक्षण के लिए (6 लाख रूपए), अंगददेव वेटोरिनरी एंड एनीमल साइंस +यूनीवर्सिटी, लुधियाना को बीटल बकरियों के संरक्षण के लिए 30 लाख रूपये तथा योजना के मूल्यांकन +के लिए नाबार्ड कंसल्टेंसी सर्विसेज (नेबकॉस) को 2008-09 में 2.25 लाख रूपये शामिल हैं। +लघु जुगाली पशुओं और खरगोशों का एकीकृत विकास. +अप्रैल के आखिरी पखवाड़े में 2009 में 11वीं योजना के पूरक के रूप में केंद्रीय क्षेत्र की एक नई योजना +134.825 करोड़ रूपए के आबंटन के साथ स्वीकृत की गई जिसमें से 18.33 करोड़ रूपए 2009-10 की +बीई है। योजना के तहत 54 लघु जुगाली पशुओं के विकास समूह नाबार्ड की वेंचर पूंजी के अलावा +राज्य की कार्यान्वयन एजेंसी के माध्यम से ढांचागत विकास और संस्थागत पुनर्गठन किया जाएगा। +मांस उत्पादन/प्रसंस्करण और निर्यात. +कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के तहत निर्मातोन्मुख एकीकृत आधुनिक +बूचड़खाने और मांस प्रसंस्करण संयंत्र रजिस्टर किये गये हैं। कच्चा मांस (प्रशीतित) करीब 56 देशों में +निर्यात किया जा रहा है। 2007-08 में लगभग 483478 मी.ट. कच्चा मांस और 8908.72 मी.ट. भेड़। +बकरी का मांस निर्यात किया गया जिसकी कीमत क्रमश— 3547.79 करोड़ रूपए और 134.09 करोड़ +रूपए थी। अप्रैल 2008 और फरवरी 2009 तक 4859 करोड़ रूपए मूल्य का मांस और उसके उत्पाद का +निर्यात किया गया। निर्यात में रूपए के संदर्भ में 31.9190 की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। +सूअरपालन विकास. +वर्ष 2003 में मवेशी गणना के अनुसार देश में 139.19 लाख सूअर हैं जिनमें से 21.80 लाख बेहतरीन +और विदेशी नस्ल के हैं। इस समय देश में राज्य सरकारों/केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा चलाए जा +रहे करीब 158 सूअर-पालन फार्म हैं। इन फार्मों में लार्ज यार्कशायर, हैंपशायर, लैंडरेस आदि उन्नत +नस्लों के सूअर रखे जाते हैं। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान वृहद प्रबंधन योजना के तहत एकीकृत +सूअर विकास योजना शुरू करने के लिए योजना आयोग और अन्य संबंधित एजेंसियों से परामर्श किया +जा रहा है। +चारा और दाना विकास. +समुचित वैज्ञानिक पद्धतियों, पौष्टिक आहार और चारे की उपलब्धता के जरिए विशाल पशुधन का +विकास करना अत्यंत आवश्यक है। चारे के उत्पादन की वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने के उद्देश्य +से देश के विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में सात क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए गए हैं। ये केंद्र चारे के बेहतर +किस्मों के बेहतरीन बीजों के उत्पादन और वैज्ञानिक चारा उत्पादन प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण अधिकारियों/ +किसानों को प्रशिक्षण देकर नवीनतम चारा पद्धतियों के प्रदर्शन तथा किसानों के लिए मेलों के आयोजन +के माध्यम से करते हैं। वर्ष 2008-09 के दौरान इन केंद्रों में 212.50 मीट्रिक टन उच्च किस्म के चारा +बीज का उत्पादन किया गया, 6249 क्षेत्रीय प्रदर्शन आयोजित किये गये, 110 प्रशिक्षण कार्यक्रम और +116 किसान मेले आयोजित किये गये। +वर्ष 2008-09 के दौरान हैसारघट्टा (कर्नाटक) स्थित केंद्रीय चारा बीज उत्पादन फार्म ने स्थानीय +केंद्र के रूप मे कार्य करके इसी तरह का लक्ष्य हासिल किया। इस केंद्र ने 66.01 मीट्रिक टन विभिन्न +किस्मों के चारा बीजों का उत्पादन किया, 605 क्षेत्रीय प्रदर्शन, 12 प्रशिक्षण कार्यक्रम और 12 किसान +मेले आयोजित किये। राज्यों के पशुपालन निदेशालयों के माध्यम से बड़े पैमाने पर चारे की नई किस्मों +को लोकप्रिय बनाने के लिए एक केंद्रीय मिनीकिट टेस्टिंग कार्यक्रम भी लागू किया जा रहा है। 2008- +09 के दौरान राज्यों को किसानों को मुफ्त 6.34 लाख मिनीकिट वितरित करने का काम सौंपा गया। +इसके अलावा चारा मंडल (फोडर ब्लॉक) इकाइयों को स्थापित करने के लिए 2005-06 से केंद्र द्वारा +प्रायोजित चारा विकास योजना लागू की जा रही है जिसमें घास के लिए भूमि विकास, चारा बीज +उत्पादन और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान परियोजनाएं भी शामिल हैं। वर्ष 2008-09 में राज्यों को 924.91 +लाख रूपये जारी किए गए। +इसके अलावा महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल में किसानों द्वारा आत्महत्या करने वाले +जिलों के लिए विशेष पशुधन पैकेज लागू किया गया, जिसके अंतर्गत, 2008-09 में दाना और चारा +आपूर्ति कार्यक्रम और चारा ब्लाक बनाने वाले ईकाइयों की स्थापना के लिए 1382 लाख रूपए जारी किए +गए। +डेयरी विकास. +भारत डेयरी उद्योग ने आठवीं योजना अवधि से 2007-08 के अंत तक 10.48 करोड़ टन दूध का वार्षिक +उत्पादन करके उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। इससे विश्व में न केवल भारतीय डेयरी उद्योग का स्थान +पहला हो गया है, बल्कि यह अधिक दूध और दूध-उत्पाद की उपलब्धता में स्थायी विकास का भी +परिचायक है। 2008-09 में डेयरी विकास के लिए सरकार ने चार योजनाएं विकसित की हैं। +गहन डेयरी विकास कार्यक्रम. +आठवीं योजना के दौरान किये गये मूल्यांकन के आधार पर गहन +डेयरी विकास कार्यक्रम में कुछ बदलाव करके ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में इसे जारी रखा गया है। +इसके लिए 2009-10 में 32.49 करोड़ रूपये आबंटित किये गये हैं। अब तक 25 राज्यों व केंद्रशासित +प्रदेशों में 489.84 करोड़ रूपये के आबंटन के साथ ही 86 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है। 31 +मार्च, 2000 तक विभिन्न राज्य सरकारों के लिए 373.82 करोड़ रूपये की राशि जारी की गई और 207 +जिलों को इसके अंतर्गत लिया गया। इस योजना से करीब 18.79 लाख किसान परिवार लाभान्वित हुए +और 31 मार्च, 2009 तक 26,882 ग्रामीण स्तरीय डेयरी सहकारी समितियां आयोजित की गईं। +शुद्ध एवं गुणवत्तायुक्त दूध उत्पादन के लिए मूलभूत ढांचे को सुदृढ़ बनाना. +वर्ष 2003 अक्टूबर, के दौरान प्रायोजित एक नई केंद्रीय योजना प्रारंभ की गई जिसका मुख्य उद्देश्य देश में ग्राम स्तर पर +कच्चे दूध की गुणवत्ता को सुधारना था। इस योजना में दुग्ध उत्पादकों को दूध उत्पादन के प्रशिक्षण की +सहायता दी जाती है। यह योजना राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के शत-प्रतिशत अनुदान सहायता के +आधार पर कार्यान्वित की जा रही है। इसमें दुग्ध उत्पादकों को प्रशिक्षण, डिटर्जेंट, स्टेनलेस स्टील के +बर्तन और प्रयोगशालाओं को सुदृढ़ बनाना है जिसके लिए गांव स्तर पर दूध प्रशीतन सुविधाएं स्थापित +करने के लिए 75 प्रतिशत वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई है। इस योजना के अंतर्गत 31 मार्च, +2009 तक कुल 195.17 करोड़ रूपये की कुल लागत के साथ 13 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। +इसमें केंद्र का हिस्सा 159 करोड़ रूपये का है। 31 मार्च 2009 तक स्वीकृत परियोजना गतिविधियों को +लागू करने के लिए राज्य सरकारों के केंद्रीय अंश के रूप में 128.11 करोड़ रूपए जारी किए गए हैं। +31 मार्च 2009 तक 5,30,468 किसान लाभान्वित हो चुके हैं। इस दौरान उनके दुग्ध उत्पादों के +विपणन और उसकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए 21.05 लाख लीटर के दुग्ध प्रशिक्षण कूलर स्थापित +किए गए। +सहकारी संस्थाओं को दी जाने वाली सहायता. +राज्य और जिला स्तर पर नुकसान में जा रही डेयरी +सहकारिता यूनियनों को पुनर्जीवित करने के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) दुग्ध +यूनियनों, राज्य सरकारों से विचार-विमर्श कर कार्यक्रम तैयार करती है। परियोजना को कार्यान्वित करती +है और इसकेज़रिये दुग्ध यूनियनों को केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराती है। 50 करोड़ रूपये के अनंतिम +परिव्यय के साथ योजना ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान चलाई जा रही है। +1999-2000 में योजना लागू होने से अब तक विभाग द्वारा 31 मार्च 2008 तक 197.37 करोड़ +रूपये (98.68 करोड़ रूपये केंद्रीय सहायता सहित) के कुल व्यय के साथ 12 राज्यों में दुग्ध यूनियनों +के 32 पुनर्वास पुनरूत्थान प्रस्ताव मंजूर किये गये। यह राज्य हैं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, उत्तर +प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, असम, नगालैंड, पंजाब, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और तमिलनाडु, जिसके लिए +31 मार्च, 2009 तक 230.94 करोड़ रूपए जिसमें 115.66 करोड़ रूपए केंद्रीय हिस्सा है, मंजूर किए +गए। 31 मार्च 2008 तक 88.19 करोड़ रूपए जारी किए बीई 2009-10 में 9 करोड़ रूपए प्रदान किए +गए जिसमें से 155.495 लाख रूपए संबंद्ध यूनियनों को 20 अगस्त, 2008 तक जारी किए गए। +डेयरी उद्यम पूंजी कोष. +असंगठित क्षेत्र में ढांचागत परिवर्तन लाने के लिए कई कदम उठाए गए जिनमें +ग्राम स्तर पर दूध का प्रसंस्करण, कम लागत में पॉश्च्यूराइ ड दूध की बिक्री, आधुनिक उपकरणों के +माध्यम से व्यावसायिक स्तर पर पारंपरिक प्रौद्योगिकी को इस्तेमाल करना और प्रबंधन कुशलता और +ग्रामीण दूध उत्पादकों, मुर्गीपालकों/किसानों के लिए अच्छी नस्ल वाले पक्षियों के लिए प्रोत्साहन देना +शामिल हैं। इसके लिए दसवीं योजना में एक नई योजना डेयरी/पोल्ट्री उद्यम पूंजी कोष नामक केंद्रीय +योजना शुरू की गई। योजना के अंतर्गत ग्रामीण/शहरी स्तर पर बैंक परियोजनाओं के माध्यम से 50' +ब्याज मुक्त ऋण दिया जाता है। नाबार्ड द्वारा कार्यान्वित योजना के लिए केंद्र सरकार धन देती है। योजना +के तहत उद्यमी को 10' धनराशि देनी होती है और 40' स्थानीय बैंक से ऋण लेना पड़ता है। सरकार +ब्याज मुक्त 50' ऋण नाबार्ड के माध्यम से देती है। किसानों की कृषि संबंधित गतिविधियों के देय +राशि के ब्याज में भी सरकार 50' सहायता देती है, लेकिन भुगतान नियमित समय से हो। +योजना 25 करोड़ रूपये के कुल परिव्यय के साथ दिसंबर 2004 में स्वीकृत हुई थी। इस योजना +का कार्यान्वयन नाबार्ड के माध्यम से हो रहा है और नाबार्ड को फंड दिया जाता है जिसे रिवॉल्विंग फंड +के रूप में रखा जाता है। 31 मार्च 2008 तक योजना के क्रियान्वयन के लिए नाबार्ड को 112.99 करोड़ +रूपये दिए जा चुके हैं। 2009-10 के दौरान योजना के क्रियान्वयन के लिए 38 करोड़ रूपये का बजट +प्रावधान है जिसमें से 31 जुलाई 2009 तक 10 करोड़ रूपये जारी किए जा चुके हैं। +दूध और दुग्ध उत्पाद आदेश, 1992. +खाद्य सुरक्षा मानक अधिनियम 2006 पारित होने के बाद +एमएमपीओ-92 से संबंद्ध कार्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के खाद्य सुरक्षा और मानक +प्राधिकरण के तहत आ गए हैं। +राष्ट्रीय डेयरी योजना. +सरकार 2021-22 तक सालाना 18 करोड़ टन दूध उत्पादन का लक्ष्य हासिल +करने के उद्देश्य से 17000 करोड़ रूपए से अधिक की लागत से राष्ट्रीय डेयरी योजना शुरू करने की +संभावनाओं की जांच कर रही है। दूध उत्पादन अगले 15 वर्ष में 4' की दर से हर साल 50 लाख टन +बढ़ने की आशा है। योजना के तहत सरकार बड़े दूध उत्पादन क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने और वर्तमान तथा +नए संस्थागत ढांचों के माध्यम से दूध उत्पादन, प्रसंस्करण और बाजार में पहुंचाना चाहती है। योजना में +नस्ल, पशु चारा उत्पादन बाई-पास प्रोटीन और खनिज मिश्रण बढ़ाने के लिए संयंत्रों की स्थापना की बात +है। योजना में संगठित क्षेत्र में उत्पादित बचे दूध का 65' वसूली का प्रस्ताव है, जबकि अभी यह 30' +है। परियोजना के लिए विश्व बैंक से धन राशि लेने के प्रयास चल रहे हैं। +पशु स्वास्थ्य. +भारत में पशुओं के स्वास्थ्य में कई तरह से सुधार हुआ है और पशुपालन के स्तर में भी कई बदलाव +आए हैं। विश्व व्यापार संगठन से हुए समझौते से उदारीकरण की वजह से देश में बहुत सी विदेशी +बीमारियों का प्रवेश हुआ है। क्रॉस ब्रीड कार्यक्रम को व्यापक तौर पर लागू करने के लिए पशुओं की +गुणवत्ता में सुधार होने के साथ-साथ पशुओं में कई तरह की नई बीमारियां भी बढ़ी हैं। विश्व पशु +स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी मानकों के अनुसार बीमारियों से मुक्त पशुओं के लिए पशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों +की मदद से एक प्रमुख स्वास्थ्य योजना शुरू की गई है। +पशुओं में बीमारियां कम करने और उनकी जन्म दर बढ़ाने के लिए राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों, +पोलीक्लिनिक, पशुओं के अस्पतालों, डिसपेंसरियों, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और चलती-फिरती पशु +डिस्पेंसरियों द्वारा कई प्रयास किए जा रहे हैं। +राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बीमारियों का जल्दी और विश्वसनीय इलाज करने के लिए +27,562 पोली क्लीनिक, अस्पताल और डिसपेंसरियां और 25,195 पशु सहायता केंद्र खोले गए हैं। +इसके अलावा 250 रोग निदान केंद्र खोले गए हैं। पशुओं के रोगों और मुर्गियों में होने वाली बीमारियों +की कई रोगनिरोधक टीकों से रोकथाम की जा रही है। इसके लिए देश में पशु टीका उत्पादन की 27 +इकाइयों में रोग निरोधक टीकों का उत्पादन किया गया है। इन इकाइयों में 21 इकाइयां सार्वजनिक क्षेत्र +की और 6 इकाइयां निजी क्षेत्र की हैं। आवश्यकता पड़ने पर निजी एजेंसियों द्वारा रोगनिरोधक टीकों का +आयात भी किया जा सकता है। +पशु संगरोधन और प्रमाणीकरण सेवा. +इस सेवा का काम भारत में पशुओं और पशुओं से संबंधित उत्पादों के आयात से होने वाली बीमारियों के +प्रवेश को रोकना है। इसके अलावा भारत से निर्यात होने वाले पशुओं को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप +निर्यात प्रमाणीकरण करना भी है। इस सेवा के 4 केंद्र नई दिल्ली, चेन्नई, मुंबई और कोलकाता में हैं। +हैदराबाद और बेंगलुरू में दो अतिरिक्त पशु संगरोधन केंद्र की स्थापना तथा दिल्ली, मुंबई, +कोलकाता और चेन्नई के हवाई अड्डों, बंदरगाहों और अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर डिपो के प्रचालन क्षेत्र में +अतिरिQ संगरोधन इकाइयां स्थापित कर चारों संगरोधन केंद्रों को मजबूत कर पशु क्षेत्र जैव सुरक्षा मजबूत +करने का निश्चय किया गया है। समुद्री क्षेत्र में जैव सुरक्षा मजबूत करने के लिए मुंबई संगरोधन इकाई +और मुख्यालय में समन्वय इकाइयां स्थापित की जाएंगी। हैदराबाद और बेंगलुरू में संगरोधन केंद्रों के +जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया है। मुर्गीपालन के सामान, पालतू जीव, प्रयोगशाला के लिए जीव +और पशु उत्पादों का आयात हैदराबाद हवाई अड्डे से शुरू हो गया है। +राष्ट्रीय पशु जैविकी उत्पाद गुणवत्ता नियंत्रण केंद्र. +जैविकी और टीकों की गुणवत्ता के लिए नौवीं पंचवर्षीय योजना के अंत में बागपत, उत्तरप्रदेश में राष्ट्रीय +पशु चिकित्सा जैविकी गुणवत्ता नियंत्रण केंद्र स्थापित किया जा चुका है। इसके उद्देश्य हैं — +देने की सिफारिश। +कार्यालय और प्रयोगशाला की इमारतें बन गई हैं। आशा है कि संस्थान शीघ्र ही पूरी तरह से कार्य करने लगेगा। +केंद्रीय/क्षेत्रीय रोग निदान प्रयोगशालाएं. +राज्यों में पहले से मौजूद रोग निदान प्रयोगशालाओं को बेहतर बनाने के उद्देश्य से मौजूदा सुविधाओं में +इजाफा किया गया है। इसके तहत एक केंद्रीय और पांच क्षेत्रीय रोग निदान प्रयोगशालाएं खोली गई हैं। +पशु रोग अनुसंधान एवं रोग निदान केंद्र, इज्जतनगर केंद्रीय प्रयोगशाला के रूप में काम कर रहा है। यह +प्रयोगशाला भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के अंतर्गत है। डिजीज इन्वेस्टिगेशन लेबोरेटरी, +पुणे; पशु स्वास्थ्य एवं पशु चिकित्सा जैविकी संस्थान, कोलकाता; पशु चिकित्सा और जीव विज्ञान +संस्थान, बंगलौर; पशु स्वास्थ्य संस्थान, जालंधर और पशु चिकित्सा जैविकी, खानापार, गुवाहाटी पांच +प्रयोगशालाएं क्रमश— पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी और पूर्वोत्तर क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। +सीडीडीएल/आरडीडीएल के मुख्य उद्देश्य हैं — +(i) उत्कृष्टता केंद्र के रूप में कार्य करना संदर्भित-निदान सेवाएं राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों और बाद में +पड़ोसी देशों को प्रदान करना। +(ii) पशुओं में होने वाली बीमारी मुख्य रूप से बोवाइन राइनोट्रैकेटिस, नीली जुबान, जुगाली करने +वाले पशुओं में पेस्ट डेस पोटिट्स, भेड़ और बकरियों में भेड़ चेचक आदि, सुअरों में स्वाइन +बुखार, घोड़ों में ग्लैंडरर्न, इक्वीन राइनोन्यूमोनिटिस कुत्तों में कैनी पार्वोवायरस, पक्षी इन्फ्लुएंजा, +पक्षी इनसेफ्लाटिस, मुर्गियों में संक्रामक लैरिंगोट्ैकेटिस आदि की समस्याओं का अध्ययन करना। +(iii) प्रयोगशाला और क्षेत्र में बीमारी जांच अधिकारियों और क्षेत्र में कार्यरत पशुविज्ञानियों को +आधुनिक निदान तकनीकी का प्रदर्शन। +(i1) संक्रामक पशु बीमारियों के अंतर्राज्यीय संक्रमण और उपचारात्मक उपायों से जुड़ी समस्याओं का +अध्ययन। +पशु स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण +देश में पशु स्वास्थ्य से संबंधित सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लागू करने और अर्थव्यवस्था को +मजबूत बनाने वाले पशुओं के स्वास्थ्य के लिए पशु स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत +निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं — +पशु रोग नियंत्रण के लिए राज्यों को सहायता — इस कदम के अंतर्गत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों +को सहायता उपलब्ध कराई जाती है — जिसमें टीकाकरण, मौजूदा पशु चिकित्सा जैविकी उत्पादन +इकाइयों को सुदृढ़ बनाना, मौजूदा रोग निदान प्रयोगशालाओं को सुदृढ़ बनाना और पशु चिकित्सकों और +इस क्षेत्र में काम कर रहे अन्य व्यक्तियों को प्रशिक्षण देना शामिल है। +कार्यक्रम का कार्यान्वयन केंद्र और राज्य सरकारों के बीच 75 — 25 की हिस्सेदारी से लागू किया +जा रहा है, लेकिन प्रशिक्षण और संगोष्ठियों/कार्यशालाओं के केंद्र 100' सहायता देता है। इसके अलावा +सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पशुओं या मुर्गियों में होने वाली बीमारियों से संबंधित सूचनाओं को +एकत्र करना भी इस घटक में शामिल है। इन सूचनाओं को मासिक एनिमल डिजीज सर्विसलेंस बुलेटिन +में प्रकाशित करके सभी राज्यों में वितरित किया जाता है। इसे विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (ओआईई), +एनीमल प्रोडक्शन ऐंड हैल्थ कमिश्नर फॉर एशिया ऐंड पेसीफिक में भी इन सूचनाओं को भेजा जाता है। +सूचना प्रणाली को ओआईई के दिशा-निर्देशों के अनुसार समस्वरित किया गया है। +राष्ट्रीय पशु प्लेग (रिंडरपेस्ट) उन्मूलन परियोजना (एनपीआरई) — इस परियोजना का उद्देश्य देश +में पशु प्लेग (रिंड्रपेस्ट) और संक्रामक बोवाइन प्लूरो निमोनिया का उन्मूलन करना है और विश्व पशु +स्वास्थ्य संगठन (ओआईई) और पेरिस द्वारा सुझाए गए कदमों से इन बीमारियों से मुक्ति पाना। ओआईई +ने भारत को पशु प्लेग रिंडरपेस्ट और संक्रामक बोवाइन प्लूरो निमोनिया से क्रमश— 26 मई, 2006 और +26 मई, 2007 को मुक्त घोषित कर दिया। इसीलिए व्यापार और निर्यात के लिए आवश्यक है कि इन दो +बीमारियों से मुक्ति बनी रहे। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पशुपालन विभाग के कर्मचारियों द्वारा पूरे +देश में जांच जारी है ताकि इस मुक्ति के स्तर को बनाए रखा जा सके। +देश में पशु प्लेग के 25 लाख टीके छह टीका बैंकों में सुरक्षित रखे गए हैं, ताकि पशु प्लेग के +पुन— फैलने पर उनका उपयोग किया जा सके। +(ii) मुंह पका-खुर पका रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एफएमडी-सीसी) — मुंह पका-खुर पका रोग को +नियंत्रित करने के लिए देश के 54 जिलों में मुंह पका-खुर पका रोग नियंत्रण कार्यक्रम चलाया जा रहा +है। इसके लिए पशुओं को छह माह में टीका लगाया जाता है। पंजाब को छोड़कर भागीदारी करनेवाले +सभी राज्यों में इस टीकाकरण के पांच चरण पूरे हो चुके हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में नौवां दौर भी पूरा +हो चुका है। हर चरण में 2 करोड़ 80 लाख टीके लगाए जाते हैं। +(iii) पेशेवर क्षमता विकास (पीईडी) — इस योजना का उद्देश्य वेटनरी प्रैक्टिस को नियमित करना और +भारतीय पशु चिकित्सक परिषद् अधिनियम 1984 के प्रावधानों के अनुरूप पशु चिकित्सा प्रैक्टिशनरों का +रजिस्टर रखना और पशु चिकित्सा शिक्षा (सीवीई) के माध्यम से पशु चिकित्सकों को आधुनिक +तकनीकी प्रदान कर उनकी क्षमता बढ़ाना है। योजना में केंद्र में भारतीय पशु चिकित्सा परिषद् और +भारतीय पशु चिकित्सा परिषद् अधिनियम को अपनाने वाले राज्यों में राज्य पशु चिकित्सा परिषद् की +स्थापना की बात है। वर्तमान में यह जम्मू और कश्मीर को छोड़कर देश के सभी राज्यों में लागू है। +एवियन एन्फ्लूएंजा के नियंत्रण और रोकथाम करने की तैयारी — 18 फरवरी, 2006 में जब पहली +बार भारत के पश्चिमी हिस्से महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ इलाकों में एवियन एन्फ्लूएंजा का प्रकोप +फैला था। दूसरी बार यह महाराष्ट्र के जलगांव और मध्य प्रदेश बुरहनपुर जिले में मार्च-अप्रैल, 2006 में +फैला। तीसरी बार एवियन इन्फ्लूऐंजा मणिपुर के एक छोटे मुर्गीपालन केंद्र में जुलाई, 2007 में यह +फैला। देश में चौथी बार एवियन इन्फ्लूएंजा का प्रकोप पश्चिम बंगाल के बीरभूम और दक्षिण दिनाजपुर +जिलों में 15 जनवरी, 2008 को हुआ। फिर यह बीमारी राज्य के 13 जिलों-मुÌशदाबाद, माल्दा, पश्चिम +मेदिनीपुर, बांकुए, पुरूलिया, जलपाईगुड़ी और दाÌजलिंग में फैल गई। पश्चिम बंगाल के 15 जिलों के +55 ब्लाक और 2 नगरपालिकाओं में इसका प्रकोप हो गया। एवियन इन्फ्लूएंजा की आखिरी घटना का +पता 16 मई, 2008 को चला। पश्चिम बंगाल में नियंत्रण और रोक अभियान के दौरान 42.62 लाख +पक्षियों को मार दिया गया; लगभग 15.60 लाख अंडे और 89,823 किलोग्राम मांस नष्ट कर दिया गया। +एवियन इनफ्लूएंजा त्रिपुरा के घताई जिले में फैलने की जानकारी 7 अप्रैल, 2008 को मिली। +उसके बाद पश्चिम त्रिपुरा जिले के मोटनपुर और विशालगढ़ में भी यह फैल गई। पश्चिम त्रिपुरा जिनके +इन्फ्लूएंजा की आखिरी घटना की जानकारी 24 अप्रैल, 2008 को मिली। एवियन इन्फ्लूएंजा के नियंत्रण +और रोक अभियान के दौरान 0.19 मिलियन पक्षी मारे गए। सफल नियंत्रण और रोक अभियानों के बाद +4 नवंबर, 2008 को भारत एवियन इन्फ्लूएंजा से मुक्त घोषित किया गया। +मछलीपालन उद्योग. +पशुपालन, डेयरी और मत्स्य विभाग विभिन्न उत्पादनों, कच्चे माल की आपूर्ति, बुनियादी ढांचा विकास +कार्यक्रम और कल्याणोन्मुखी योजनाएं चला रहा है। इसके साथ ही यह विभाग मत्स्य-पालन क्षेत्र में +उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए समुचित नीतियां बनाने/लागू करने में लगा हुआ है। +पिछले पांच वर्षों का मछली-उत्पादन का ब्योरा नीचे सारणी में दर्शाया गया है- +वर्ष -- समुद्री मछलियां -- नदी/तालाबों की मछलियां -- कुल +1980-81 15.55 8.87 24.42 +1990-91 23.00 15.36 38.36 +1991-92 24.47 17.10 41.57 +1992-93 25.76 17.89 43.65 +1993-94 26.49 19.95 46.44 +1994-95 26.92 20.97 47.89 +1995-96 27.07 22.42 49.49 +1996-97 29.67 23.81 53.48 +1997-98 29.50 24.38 53.88 +1998-99 26.96 26.02 52.98 +1999-2000 28.52 23.23 56.75 +2000-2001 28.11 28.45 56.56 +2002-03 29.90 32.10 62.00 +2003-04 29.41 34.58 63.99 +2004-05 27.78 35.26 63.04 +2005-06 28.16 37.55 65.71 +2006-07 30.24 38.45 68.69 +2007-08 29.14 42.07 71.26 +मात्स्यिकी क्षेत्र निर्यात के जरिए विदेशी मुद्रा को अर्जित करने वाला एक प्रमुख क्षेत्र है। मछली +और मछली उत्पादों के निर्यात में कई गुना वृद्धि हुई है। इन उत्पादों का निर्यात 1961-62 में 3.92 करोड़ +मूल्य का 15700 टन था, जो 2007-08 में बढ़कर 5.41 लाख टन हो गया, जिसका मूल्य 7621 करोड़ +रूपये आंका गया। +अंतर्देशीय मात्स्यिकी जलकृषि विकास. +ताजा पानी के मछली-पालन विकास की मौजूदा योजना और समन्वित तटवर्ती मछली-पालन को +मिलाकर चार नए कार्यक्रम बनाए गए हैं। ये कार्यक्रम हैं-शीतल जल मछली-पालन विकास; जलभराव +क्षेत्र और परित्यक्त जलाशयों को जलकृषि संपदा में बदलना, जलकृषि के लिए अंतर्देशीय लवणीय/ +क्षारीय मृदा का उपयोग और जलाशयों की उत्पादकता बढ़ाने का कार्यक्रम। मोटे तौर पर इस योजना के +दो घटक हैं-जलकृषि और अंतर्देशीय नियंत्रित मछली-पालन। +ताजा पानी के मछली-पालन का विकास. +सरकार अंतर्देशीय क्षेत्र में मत्स्यपालक विकास एजेंसियों के जरिए ताजा जल में मछली-पालन का +महत्वपूर्ण कार्यक्रम चला रही है। देश में मछली उत्पादन की संभावनाओं वाले सभी जिलों में 429 +मत्स्यपालक विकास एजेंसियों के जरिए इस दिशा में काम चल रहा है। वर्ष 2007-08 के दौरान 24,752 +हेक्टेयर नए क्षेत्र में सघन मछली-पालन कार्यक्रम चलाया गया। इन एजेंसियों ने 39,000 मछली पालने +वालों को उन्नत पद्धतियों का प्रशिक्षण दिया। +खारे पानी में मछली-पालन. +इस योजना का उद्देश्य देश के खारे पानी के विशाल जल-क्षेत्र का इस्तेमाल झींगा मछली-पालने के लिए +करना है। 2007-08 तक 30,889 हेक्टेयर जल-क्षेत्र का विकास झींगा मछली-पालन के लिए किया जा +चुका है। देश के तटवर्ती समुद्री इलाकों के खारे पानी वाले क्षेत्रों में स्थापित 39 खारा पानी मत्स्यपालक +विकास एजेंसियां (बीएफडीए) इस काम में लगी हुई हैं। इन एजेंसियों ने 2007-08 तक 31,624 +किसानों को झींगा-पालन की उन्नत पद्धतियों का प्रशिक्षण दिया। फिलहाल देश से किए जाने वाले झींगा +निर्यात का 50 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से होता है। +समुद्री मात्स्यिकी विभाग. +सरकार गरीब मछुआरों को उनकी परंपरागत नौकाओं में मोटर लगाकर यांत्रिक नौकाओं में बदलने के +लिए सब्सिडी देती है। इन नौकाओं से वे अधिक बार तथा अधिक समुद्री क्षेत्र में जाकर ज्यादा मात्रा में +मछली पकड़ सकते हैं। इससे मछलियों की पैदावार और मछुआरों की आय में बढ़ोतरी होती है। अब +तक करीब 46,223 परंपरागत नौकाओं को मोटर नौकाओं में बदला जा चुका है। सरकार मछली पकड़ने +वाली 20 मीटर से कम लंबाई की नौकाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एच.एस.डी. तेल के केंद्रीय +उत्पाद-शुल्क में रियायत देने की योजना पर भी अमल कर रही है, ताकि छोटी-छोटी यांत्रिक नौकाओं +के मालिकों की परिचालन लागत में कमी लाई जा सके। +मछली पकड़ने के बंदरगाहों का विकास. +मछली पकड़ने वाले जहाजों का सुरक्षित अवतरण करने और लंगर डालने की आधारभूत सुविधाएं प्रदान +करने की एक योजना पर सरकार अमल कर रही है। इस योजना के प्रारंभ से लेकर अब तक मछली +पकड़ने वाली नौकाओं और जहाजों के लिए छह प्रमुख बंदरगाहों-कोच्चि, चेन्नई, विशाखापत्तनम, +रायचौक, पाराद्वीप और सीजन डॉक में 62 छोटे बंदरगाहों और 190 मछली अवतरण केंद्रों का निर्माण +किया गया है। +परंपरागत मछुआरों के लिए कल्याण कार्यक्रम. +परंपरागत ढंग से मछली पकड़ने वाले मछुआरों के लिए महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं-(1) कार्यरत मछुआरों +के लिए सामूहिक दुर्घटना बीमा योजना, (2) मछुआरों के लिए आदर्श ग्रामों का विकास और (3) +बचत व राहत योजना। मछुआरों को अवधि में वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। बचत व राहत योजना +के तहत 3.5 लाख मछुआरों को 2008-09 में सहायता दी गई। +विशेष संस्थान. +केंद्रीय मत्स्य-पालन और समुद्री इंजीनियरी प्रशिक्षण संस्थान (कोचीन), जिसकी एक-एक इकाई चेन्नई +और विशाखापत्तनम में है, का उद्देश्य गहरे पानी में मछली पकड़ने वाले जहाजों के लिए पर्याप्त संख्या +में परिचालक और तटवर्ती प्रतिष्ठानों हेतु तकनीशियन उपलब्ध कराना है। समन्वित मत्स्य परियोजना, +(कोच्चि), में गैर-परंपरागत मछलियों की किस्मों के परिरक्षण, उन्हें लोकप्रिय बनाने और उनकी परीक्षण +बिक्री पर जोर दिया जाता है। मात्स्यिकी हेतु तटवर्ती इंजीनियरिंग का केंद्रीय संस्थान बंगलौर, +मत्स्यपालन हेतु बंदरगाह स्थलों की तकनीकी-आर्थिक संभावनाओं का अध्ययन करता है। भारतीय +मछली सर्वेक्षण विभाग देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में समुद्री संसाधनों के सर्वेक्षण और मूल्यांकन के +लिए नोडल एजेंसी के रूप में भी कार्य करता है। +राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड. +राष्ट्रीय मत्स्य बोर्ड की स्थापना नीली क्रांति के लिए कार्य करने के लिए की गई ताकि देश में मछली का +103 लाख उत्पादन करके वर्तमान 7000 करोड़ के निर्यात को 14,000 करोड़ रूपए तक पहुंचाया जाए +और अंतर्देशीय, पानी और समुद्री क्षेत्र की गतिविधियों के कार्यान्वयन करने वाली एजेंसियों को सहायता +देकर 35 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराया जा सके। यह मत्स्य क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी +भागीदारी का मंच बनेगा, ताकि विपणन आदि के उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सके। +यह भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के पशुपालन, डेयरी और मात्स्यिकी विभाग के प्रशासनिक +नियंत्रण में स्वायत्त संस्था है। इसका पंजीयन सोसायटी अधिनियम के तहत हैदराबाद में 10 जुलाई, +2006 को किया गया। पंजीयन नंबर 2006 का 933 है बोर्ड का उद्घाटन 9 सितंबर, 2006 को किया +गया। कार्यालय की स्थापना हैदराबाद में की गई। बोर्ड के विभिन्न कार्यक्रमों को 6 वर्ष में 2006-12 में +लागू किया जाना है। बोर्ड के उद्देश्य इस प्रकार हैं — +1. मछली और समुद्री जीव उद्योग से संबधित प्रमुख गतिविधियों पर ध्यान देना और उनका व्यवसायिक +प्रबंधन। +2. केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों/विभागों और राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा मछली उद्योग +से संबंधित गतिविधियों के बीच समन्वय। +3. मछली पालन और मछली उत्पादों का उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण लाना-ले जाना और विपणन। +4. मछली स्टॉक सहित उनके स्थायी प्रबंधन और प्राकृतिक जलजीव संसाधनों के संरक्षण। +5. अधिकतम मछली उत्पादन और फार्म उत्पादकता के लिए जैव प्रौद्योगिकी सहित अनुसंधान और +विकास के आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल। +6. मछली उद्योग के लिए आधुनिक मूलभूत ढांचा उपलब्ध कराना और उसका अधिकतम उपयोग तथा +प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित करना। +7. रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना। +8. मछली उद्योग में महिलाओं को प्रशिक्षण देकर सशक्त बनाना। +9. खाद्य और पोषण सुरक्षा के प्रति मछली उद्योग के योगदान को बढ़ाना। +1. तालाबों और टैंकों में व्यापक मछली पालन। +2. जलाशय में मछलियों का उत्पादन बढ़ाना। +3. खारे पानी में तटीय समुद्री जीव पालन। +4. गहरे पानी में मछलीपालन और टूना मछली का प्रसंस्करण। +5. समुद्री जीवन पालन। +6. समुद्री जीव फार्म। +7. समुद्री वनस्पति का विकास। +8. फसल उगने के बाद उसके लिए मूलभूत सुविधाएं तैयार करना। +9. मछलियों को सौर ऊर्जा से सुखाना (सोलर ड्रांइग) और प्रसंस्करण केंद्र। +10. घरेलू बाजार। +11. अन्य गतिविधियां। +राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड के विभिन्न कार्यक्रमों के कार्यान्यवन के लिए 2006-12 तक का बजट +प्रावधान 2100 करोड़ रूपए का है लेकिन उसे घटाकर 1500 करोड़ रूपए कर दिया गया है। +बोर्ड का छह वर्ष का परियोजना व्यय 2100 करोड़ रूपए है। भारत सरकार ने बोर्ड की शुरूआत से 105 +करोड़ रूपए जारी किए हैं। इसमें से 96.33 करोड़ रूपए विभिन्न राज्य सरकारों और संगठनों को पिछले +तीन वर्ष में विभिन्न मत्स्य विकास गतिविधियों के लिए जारी किए गए। पिछले तीन वर्ष में व्यय किए +गए 96.33 करोड़ रूपए में से 65.58 करोड़ रूपए वर्ष 2008-09 से संबद्ध हैं। +कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग. +कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग कृषि, पशुपालन तथा मत्स्य-पालन के क्षेत्र +में अनुसंधान और शैक्षिक गतिविधियां संचालित करने के लिए उत्तरदायी है। इसके अलावा यह इन क्षेत्रों +तथा इनसे संबंधित क्षेत्रों में काम कर रही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के विभिन्न विभागों और +संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने में भी मदद करता है। यह विभाग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् को +सरकारी सहयोग, सेवा और संपर्क-सूत्र उपलब्ध कराता है। +भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्. +भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष स्वायत्त संस्था है, जिसका उद्देश्य कृषि अनुसंधान +के क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना और उनके बारे में शिक्षित करना है। +परिषद् प्रत्यक्ष तौर पर कृषि क्षेत्र में संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन, फसलों, पशुओं व मछली आदि +पालन से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए पारंपरिक व सीमांत क्षेत्रों में अनुसंधान की +गतिविधियों में शामिल है। कृषि क्षेत्र में नई प्रोद्योगिकी विकसित करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका +निभाती है। उसे प्रचारित और लागू करने का कार्य कृषि विज्ञान केंद्रों के व्यापक नेटवर्क से किया +जाता है। +कृषि अनुसंधान परिषद का मुख्यालय नई दिल्ली में है और देश भर में इसके 49 संस्थान और विश्वविद्यालय स्तर के 4 +राष्ट्रीय संस्थान, 6 राष्ट्रीय ब्यूरो, 17 राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र, 25 परियोजना निदेशालय और 61 अखिल +भारतीय समन्वय अनुसंधान परियोजनाएं, 17 नेटवर्क परियोजनाएं हैं। कृषि और इससे संबंधित क्षेत्रों में +उच्च शिक्षा के लिए 45 राज्य कृषि विश्वविद्यालय और इम्फाल में एक केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय है जो +कि इसके चार विश्वविद्यालयों से अलग है। +=आईसीएआर की अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार गतिविधियां. +विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार के कार्यक्रम 2008-09 में इस प्रकार रहे—- +वर्ष के दौरान 33 अभियानों में 784 जंगली प्रजातियों सहित 2203 का संग्रह किया गया। विकसित पौधों +के राष्ट्रीय हर्बोनियम के 371 नमूने, 121 बीज के नमूने और 21 आर्थिक उत्पाद शामिल किए गए। +विविध फसलों के 25,456 किस्में विभिन्न देशों से लाए गए और आईसीआरआईएएएडी जर्म प्लाज्म +सहित 15000 किस्में 19 देशों को निर्यात किए गए। +बीज 13,850 प्रजातियां नेशनल जीन बैंक में शामिल की गईं। +गेहूं की पांच, जौ की तीन और ट्रिटिकेल की एक किस्म जारी की जा चुकी है। गेहूं की सोलह +जननिक स्टाक पंजीकृत किए गए। मक्का के नौ संकर/समिश्र सेंट्रल वेरायटी रिलीज कमेटी द्वारा देश के +विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए जारी किए गए। +सोर्घुम की दो किस्में यथा खरीफ किस्म सीएसवी 23 और रबी की किस्म एसपीवी 1626, बाजरे +की दो किस्में जारी की गईं। अल्पकालिक सीजन के बीच में बुआई के लिए बाजरे की किस्म जीपीयू +48 कर्नाटक के लिए जारी की गई। +पिजनपी किस्में आजाद (एनईपीजेड), जेकेएम 189 (सीजेड), एलआरजी 30 और एलआरजी +38 (एएजेड) को देर से बुआई के उपयुक्त पाया गया। अधिक उपज देनेवाली दो किस्में मसूर, अंगूरी +(आईपीएल 406) और राजमा, अरूण (आईपीआर 98-3-1) को उत्तरी राज्यों, गुजरात, महाराष्ट्र और +छत्तीसगढ़ के लिए अधिसूचित किया गया। +डीओआर बीटी-1 बैसिलस थुरिंगिएनसिस, कुर्सटरी (एच-3ए 3बी, 3सी) को अरंडी सेमीकूपर +के प्रबंधन के लिए विकसित कर भारत सरकार के केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड के पास व्यापारिक नाम +केएनओसीके डब्लूपी से व्यवसायीकरण के लिए पंजीकृत किया गया। डीआरएसएच-1 (42-44') +तेल और हेक्टेयर में 1300-1600 कि.ग्रा. उपज देनेवाले हाइब्रिड को रबी के लिए पूरे भारत में जारी +किया गया। सैफ्लावर हाइब्रिड एनएआरआई-एच-15 जिसका उत्पादन एक हेक्टेयर में 2200 कि.ग्रा. +तक है और तेल की मात्रा 28' है, जारी की गई। प्रतिरोधक वाली किस्म जेएसएफ-99 आल्टरनेटव +मध्य प्रदेश के लिए जारी की गई। अरंडी उगाने वाले सभी क्षेत्रों के लिए डीसीएच-519 और सागरशक्ति +जारी की गई। सोयाबीन की तीन उन्नत किस्में पीएस 134 और पीआरएस-1 (उत्तरांचल) और जेएस +95-60 (मध्य प्रदेश) जारी की गईं। +बीटी कपास किस्में बीकानेरी नरमा और एनएचएच 44 बीसी कपास हाइब्रिड विकसित की गईं। +कम लागत वाली खुंव उत्पादन के लिए फफूंद एस थर्मोफिटम के उपयोग कंपोस्ट उत्पादन की विधि +विकसित की गई। +एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) की रणनीति देश भर के कपास उत्पादक नौ राज्यों के 2360 +हेक्टेयर परंपरागत कपास, 605 हेक्टेयर बीटी काटन क्षेत्र 12 प्रदर्शन केंद्रों से प्रचारित की गई। आईपीएम +की रणनीतियां किसानों को समझाने और उत्तरी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए चार केंद्र स्थापित किए +गए। +कीट प्रबंधन सूचना प्रणाली (पीएमआईएस) कीट नियंत्रण और आईपीएम रणनीतियों के बारे +कृषि 107 +में पूर्ण जानकारी सहित कंप्यूटर आधारित प्रणाली कपास, बैंगन और भिंडी के लिए विकसित की +गई है, जिसमें जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता के बारे में बताया गया है। निर्णय में सहायक साफ्टवेयर +(कीटनाशक सलाहकार) भी विकसित किया गया, जिसमें उपलब्ध कीटनाशकों के बारे में पूरी +सूचना है। +लार्जिडेइ, पिरोकोरिडेइ और खरकोपीडेइ के जीनस और प्रजातियों के लिए टैक्सोनामिक आधार +विकसित किया गया। +शहद फसल के परागण के लिए डंकहीन मधुमक्खियों, ट्रिगोना दूरीडिपेनिस के बारे में केरल कृषि +विश्वविद्यालय में अनुसंधान के फलस्वरूप कृत्रिम घोंसला सामग्री के रूप में मिट्टी के बर्तन, बांस की +खपच्चियों और पीवीसी को विकसित किया गया। +भारतीय फली (एएचडीबी-6) गोल लौकी, एएचएलएस-11 एएचएलएस-24 और एएचपी 13 गुच्छा +फली की उन्नत वंश की पहचान की गई। जीजीपीआर वंश की पहचान हुई। महुआ में कमल का +मानकीकरण। दो फसल मॉडलों की सिफारिश ट्रिरोडर्मा जैसे जैव नियंत्रण एजेंट से जैव नियंत्रण का +उपयोग कर रोग का नियंत्रण। नारियल और कोको में सुधार, जैव प्रौद्योगिक खोज ताड और कोकोआ में +बागान फसलों में उत्पादन प्रौद्योगिकी, रोग और कीटाणु का एकीकृत प्रबंधन, ताड़ और कोकोआ, ताड़ +और कोकोआ में उत्पादन तंत्र का इस्तेमाल। काजू जर्म प्लाज्म आरएपीडी। आरगेजाइम माकरिर्स जर्म +प्लाजम में विशिष्टता, छतरी प्रबंधन, उच्च घनत्व पौघ रोपड़ परीक्षण, अकार्बनिक खेती, मिट्टी और +जंकसंरक्षण, सीएसआरवी एवं टीएमवी के लिए आईपीएम टेक्नोलाजी का विकास, काजू परागण के +प्रभाव का अध्ययन कराया गया। +पीजीआर प्रबंधन, अधिक उपज की किस्में/संकर, टमाटर, बैंगन, मिर्ची और घीया के महत्वपूर्ण +गुणों के लिए आरआईएल का विकास, सीआरवाई। एसी, डीआईवी, जेडएटी-12 टी-आरईपीजीन के +उपयोग से टमाटर में ट्रांसजेनिक वंश क्रम का विकास, अकार्बनिक खेती प्रोटोकोल्स विकसित। प्रिटो में +1400 विकसित आलू, सुरक्षित रखे गए। फ्रेंच फ्राई किस्म के रूप में संकर एमपी 198-71 जारी किया +गया, जबकि संकर एमपी 198-916 एआईसीपी आईपी में लागू। इन्फोक्राप आलू के इस्तेमाल के लिए +आंकड़ा आधार तैयार। +खुम्ब की उत्पादकता और उत्पादन और खपत बढ़ाने और उसके उत्पादों पर काम जारी है। कंद +फसलों की उत्पादकता बढ़ाने की प्रौद्योगिकी, प्रति इकाई खेती लागत में कमी, कस्सावा उत्पादन प्रणाली +में भूमि की उर्वरता बनाए रखने का काम प्रगति पर है। राष्ट्रीय स्तर पर खरीफ और विकसित खरीफ +और टीएएएस सफेद प्याज, की पहचान की गई। +अधिक उपज वाली अदरक, हल्दी, काली मिर्च की किस्में विकसित की गईं। धनिया, क्यूमिन, +सौंफ, अजवाइन का अधिक उत्पादन के लिहाज से मूल्यांकन प्रगति पर है। लंबी काली मिर्च में एक नई +किस्म (एसीसी नंबर-2) की पहचान अच्छे किस्म के रूप में की गई है। एको बार्बेडेनसिस से एकोरन +निकालने के लिए नया तरीका विकसित। गुलाब की पांच नव संग्रहित किस्में वर्तमान जर्मप्लाज्म में +शामिल की गई। +ग्लैडियोलस में दो किस्में आईएआरआई नई दिल्ली एमपीकेपी पुणे से एक-एक, पीएयू से +गुलदाउदी की छह नई किस्मों का बहु स्थानीय परीक्षण चल रहा है। +प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन विभाग कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, सुधार +और सक्षम उपयोग से जुड़ी समस्याओं का हल निकालता है। भूमि सूची, प्रबंधन, पोषण प्रबंधन, जल +प्रबंधन फसल/फार्मिंग प्रणाली, जैव ईंधन और कृषि में जलवायु प्रबंधन सहित कृषि वानिकी में +अनुसंधान कार्यक्रम चल रहे हैं। +महत्वपूर्ण उपलब्धियों में भूमि सरण के मूल्यांकन और मानचित्रीकरण के लिए बहुआयामी दूर +संवेदी तकनीक शामिल है। अधिक पैदावार देने वाली बैंगन की किस्म (स्वर्ण अभिलंब) लौकी (स्पन्न +प्रभा), मटर (स्वर्ण मुक्ति) काऊपी (स्वर्ण सुफल) और फली (स्वर्ण उत्कृष्ट) पूर्वी भारत में बोने के +लिए जारी। विलायती बबूल की कांटारहित किस्म देश के शुष्क इलाकों के लिए विकसित। पौधे की +फलियां सुगंधित काफी और बिस्कुट बनाने में किया जाता है। +ड्रमस्टिक + हरा चना -सौंफ के लिए पानी की कम जरूरत होती है और वसाड, गुजरात में यह +तंबाकू की फसल से ज्यादा लाभकारी है। जलनिकासी का प्रभावी उपयोग करने के लिए फसल उगाने +की प्रौद्योगिकी निकाली गई, इसके साथ ही किनारे की ढलान पर नींबू लगाया गया। वनस्पति के +अवरोधक लगाने से सोर्घुम और सोयाबीन की पैदावार 20' बढ़ गई। नीलगिरी और उधगमंडलम क्षेत्रों +के नए बागानों में भूमि क्षरण रोकने के लिए कंदूर स्टैगर्ड ट्रेंचेज (सीएसटी) + फलियां अधिक प्रभावी +साबित हुई। +अमरूद/प्रासोपिस और सोयाबीन-गेहूं प्रणाली उत्तर पश्चिम भारत के मिट्टी के लिए चावल-गेहूं +प्रणाली से अच्छी है। रिजोक्यिम, एजोस्प्रिलम सोलुबिलाइजिंग बैसिलस मेगाटेरियन तरल जैव उर्वरक +बनाया गया। नमक प्रभावित मिट्टी को सुधारने और सोडसिटी का मूल्यांकन करने के लिए किट विकसित +किया गया। अनार के लिए मानक एकीकृत पोषण प्रबंधन पैकेज-10 कि.ग्रा. कृमि कंपोस्ट। पीवाईएम + +50' खुराक एनपीके उर्वरक प्रति पौधा, बनाया गया। +दलदल में धान की खेती के लिए एनईएच क्षेत्र के लिए धान बुआई यंत्र विकसित किया गया। +इन्हीं क्षेत्रों में ऊंची ढलानों पर मक्का नस्ल और तिलहन बोने के लिए यंत्र बनाया गया। “हर बूंद पानी के +साथ अधिक फसल और अधिक आप” कार्यक्रम जल संसाधन मंत्रालय के सहयोग से वर्षा सिंचित क्षेत्रों +में वर्षा जल के बेहतर उपयोग के लिए शुरू किया गया। आईसीएआर ने महाराष्ट्र में एबायोटिक स्ट्रेस +मैनेजमेंट राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना की है ताकि कृषि में विभिन्न प्रकार की समस्याओं (सूखा, शीत +लहरी, बाढ़, खारापन, अम्लीयता, और पोषण संबंधी गड़बडि़यों आदि) का हल निकाला जा सके। +नई दिल्ली में फरवरी 2009 में कृषि संरक्षण पर विश्व कांग्रेस का आयोजन किया गया जिसमें +क्षमता, पूंजी और पर्यावरण में सुधार के मुद्दों पर चर्चा हुई। राष्ट्रीय संसाधन प्रबंधन के जोर दिए जानेवाले +कई क्षेत्रों के बारे में किसानों के कई प्रशिक्षण एफएकडीएस/कार्यशाला का आयोजन किया गया। +कृषि उत्पादन में क्षमता बढ़ाने के लिए कई नई मशीनों और उपकरणों का विकास किया गया है। ट्रैक्टरों +के उचित चयन के लिए निर्णय में सहायक प्रणाली विकसित की गई है। खाद्य डालने के लिए ट्रैक्टर +चालित प्रसारक का विकास हुआ है। घास-फूस से भरे खेतों, नियंत्रित रोटरी स्लिट प्लांटर भी विकसित +किया गया है। हस्तचालित मक्का शेकर विकसित। महिलाओं के लिए औजार और उपकरण तीन गांवों +में दिए गए हैं, और महिलाओं की संलिप्तता का सूचकांक भी है। ट्रैक्टर चालित तीन लाइनों की घास +निकालने वाली मशीन विकसित की गई है। +सब्जियों की बुआई के लिए तीन कतारों का पौध रोपड़ा उपकरण विकसित किया गया है। चार +औजार और उपकरण, एक कतार की रोटरी वीडर, यात्रा कटाई थैम, वैभव हंसिया और नवीन हंसिया का +काम करने की दशा के अनुसार आकलन महिला मजदूरों के लिए इनकी उपयोगिता की दृष्टि से किया +गया। महिलाओं के लिए चुनिंदा उपकरणों का ईएसए धारा 25 प्रदर्शनों का आयोजन किया गया, जिसमें +500 फार्म महिलाओं ने हिस्सा लिया। बड़ी इलायची को सुखाने के लिए यंत्र विकसित किया गया है +जिसकी क्षमता प्रति बैच 400-450 कि.ग्रा. है। +जटरोपा बीज निकालने के लिए डिकोर्टीकेटर बनाया गया है। जिसकी क्षमता 100 कि.ग्रा प्रति +हेक्टेयर है। पपीता, लौकी, बैंगन, बंद और फूल गोभी से फल-सब्जी छड़ बनाए गए हैं। नाश्ते के लिए +तैयार अनाज सोर्घुम से बनाए गए हैं। केला का गुच्छा काटने, आंवला गोदने और धनिया को दो हिस्से में +बांटकर बीज के काम लायक बनाने वाला उपकरण विकसित कर परीक्षण भी किया गया। पहाड़ी मिर्च +के साथ हरी मिर्च की प्यूरी बनाने की प्रक्रिया विकसित की गई। एलोवेरा का रस निकालने वाली कम +लागत का उपकरण विकसित किया गया। +काटन बेक मैनेजर नाम का सॉफ्टवेयर विकसित किया गया है। बिनौले का आटा दो हिस्सों में +छाना गया। प्रारंभिक परीक्षण ताजा निकाले गए रेशे पर किया गया। नायलोन 6 से नौ अलग धागे +बनाए गए। जूट से गोंद के स्थानापन विकसित किए गए। जम्मू और राजस्थान से दो रंगीनी लाख +कीटों का संग्रह लाकर उनकी संख्या बढ़ाई गई और मैदानी परिस्थितियों में गर्मी में क्षमता आंकी गई। +दो क्षमता लाख के कीड़े (एलआईके 0023 और 0031) उत्पादन के अच्छे पाए गए। पौधों का संग्रह +चार राज्यों से किया गया और 12 संग्रह मैदानी जीन बैंक में रखे गए। पांच सुरक्षित रासायनिक +कीटनाशक-इंडोक्सा कार्ब; स्पिनोसैड, फिप्रोनिल, अल्फामेबनि और कार्बोसुल्फान तथा दो जैव कीटनाशक +हाल्ट और नॉक लाख के कीड़ों की रक्षा के लिए प्रभावी पाए गए। लाख के कीड़ों के नौ रंगों की +पहचान की गई। +व्यावसायिक रूप से प्राकृतिक रेसिन, गम और गम रेसिन का दस्तावेजीकरण किया गया। लाख के +वैज्ञानिक ढंग से उत्पादन के बारे में 19 प्रशिक्षण शिविरों के आयोजन से 7412 लोगों को लाभ पहुंचा। +प्रयोगशाला स्तर पर धान की भूसी से इथाइल अल्कोहल का उत्पादन किया गया। जटरोपा तेल से +निर्धारित प्रक्रिया से मोम तथा चिपचिपाहट को दूर किया गया तथा हाई स्पीड डीजल के साथ ट्रैक्टर +चलाने में उपयोग किया गया। +कुछ बायो गैस संयंत्र (क्षमता 2-6 एम3) किसानों के लिए लगाए गए। ईंधन की लकड़ी काटने +के लिए सचल प्लेटफार्म जैसा विकसित किया है। बाजार में उपलब्ध ... से उसकी क्षमता तीन गुना +अधिक है। बहुस्थलीय परीक्षण प्रगति पर एक उचित प्रणाली विकसित की गई है जिससे मक्का और +पिजन मटर की अच्छी पैदावार की जा सकती है। इनमें 20 से 40' बढ़ोत्तरी हो सकती है। +ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली के लिए साफ्टवेयर विकसित किया। रायसेन जिले के दो गांवों में +फालतू जल की निकासी के निकासी प्रणाली का मूल्यांकन किया गया। प्रशिक्षण के 58 कार्यक्रम चलाए +गए जिसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग ने पूरे देश में +1671 उपकरणों की आपूर्ति की। साल के दौरान सीधे धान की बुआई करने वाले मशीन के चार प्रदर्शन +किए गए। +क्षय और जान्स बीमारियों के टीके का उत्पादन और व्यवसायीकरण किया गया। ब्रुसेलियोस और +आईबीएम के निदान के विकसित और विधिमान्य किए गए। स्वाइन बुखार का टीका विकसित हो गया +है और उसे विधि मान्य किया जा रहा है। नीली जीभ बीमारी के लिए पेंटावैलेंट टीका विकसित किया +गया। पीपीआर टीके का परीक्षण किया गया। बकरी-चेचक टीका विकसित करके जारी किया जा रहा +है। एलपीबीई एवं इएलआईएसए 2000 नमूनों का राष्ट्रीय पीएमडी नियंत्रण कार्यक्रम में मूल्यांकन किया +गया। सेरोटाइप पीएमडी विषाणु की पूरे देश में निगरानी की गई। +सोया दूध मिलावट के लिए संवेदनशील परीक्षण विकसित भैंस के दूध से क्वार्ग किस्म का पनीर +तैयार किया गया। स्वस्थ पेय सोर्घुम और बाजरा आधारित लस्सी विकसित की गई। चन्ना, बासुंडी, +आम, लस्सी, हर्बल, घी, कुंडा, पेड़ा, बर्फी आदि विकसित। पशुओं को खिलाने के लिए क्षेत्र विशेष +खनिज मिश्रिण का व्यवसायीकरण किया गया। चारा के नए संसाधनों की पहचान और परीक्षण कर +पोषक तत्वों का पता लगाया गया। देश के विभिन्न कृषि-पारिस्थिति प्रणाली के लिए चारा और पशु +संसाधनों का जिलावार आंकड़ा तैयार किया गया। भेड़ों में सूक्ष्म पोषकों की सूक्ष्म जैव उपलब्धता का +मूल्यांकन किया गया। विभिन्न पेड़ों के पत्तों का मेथानोजेनिक रोधी गुणों के लिए बिट्रो मूल्यांकन किया +गया। खमीरीकरण के कारण मीथेन उत्सर्जन कम करने का कार्यक्रम शुरू किया। गहन चयन से अंडा +देने वाले पक्षियों और ब्रोइलर की किस्मों में और सुधार किया गया। विभिन्न अंडा देने वाले पक्षियों और +ब्रोइलरों की आपूर्ति एआईसीआरपी को की गई। रंगीन ब्रोइलर और छह सफेद वंशी को पांच सप्ताह में +वजन बढ़ाने के लिए और अधिक सुधार किया गया। इनका बहुस्थलीय परीक्षण किया गया। उन्नत +किस्म के हर साल 300 अंडे देने वाली मुर्गियों का विकास। ग्रामीण पाल्ट्री को हर साल 220 अंडे देने +वाली द्विउद्देशीय मुर्गियों का विकास किया। +गहन चयन से चोकला और मारवाड़ी नस्लों की दैनिक वजन वृद्धि 60 ग्रा. से बढ़ाकर 120 ग्राम +किया गया। ब्रोइलर और अंगोरा खरगोशों को नस्ल सुधार के लिए किसानों को उपलब्ध कराया गया। +भेड़, मिथुन याक के लिए स्थानीय तौर पर उपलब्ध संसाधनों से चारा विकसित किया गया। अच्छी +किस्म का हल्का नमदा तैयार कर घटिया स्तर के खरगोश के ऊन और संकर भेड़ों की ऊन में सुधार +किया गया। भेड़ों/दरी का ऊन/मांस की विभिन्न किस्मों का जर्मप्लाज्म उत्पादित कर किसानों में वितरित +किया गया। बरबरी और जमुना पारी बकरियों की 12वीं पीढ़ी का उत्पादन गहन चयन से कर फार्म और +मैदानी परिस्थितियों में मूल्यांकन किया गया। मेमनों के लिए खाने और जल स्थल का डिजाइन और +विकास किया गया। पशुओं के चारे की कम लागत वाला मिश्रण विकसित किया गया। +मुर्रा नस्ल के वीर्य से किसानों के पशुओं के सुधार कार्यक्रम शुरू किए। अभिजात मुर्रा सांडों के +10 वेंसेट का चयन पूरा और 11वें की शुरूआत। 5वें सेट के 15 मुर्रा सांडों का परीक्षण और वीर्य के +10,000 खुराक सुरक्षित किए गए। वीर्य की गुणवत्ता परखने और उसकी प्रजनन क्षमता के सूचक +विकसित भैंसों के खरे में बिनौला की खन्नी, सोयाबीन की खली बढ़ाने से दूध के उत्पादन में 6-10' +बढ़ोत्तरी। +आईसीएआर ने विश्व में पहला भैंस के पाड़े का क्कोन बनाकर वैज्ञानिक क्षेत्र इतिहास बनाया। +फरवरी, 2009 में पैदा हुआ पाड़ा निमोनिया से मर गया। लेकिन 6 जून, 2009 को पैदा हुआ पाड़ा स्वस्थ +है। इस प्रौद्योगिकी से मनपसंद जानवरों को पैदा किया जा सकेगा। पशमीना बकरियों की क्लोनिंग का +कार्यक्रम शुरू किया गया है। +लाक सिंधी, कृष्णा घाटी जानवर, मदुरा रेड, तिरूची ब्लैक, माराए भेड़, गोहिजवादी बकरी, +तेलीचेरी चिकन का फेनोटिपकली वर्गीकरण किया गया। डांगी चंगथांगी बकरी, जालौनी छोटा नागपुरी +भेड़ और नगामी मिथुन का जनविक वर्गीकरण पूरा हुआ। नस्ल पंजीयन प्राधिकरण मनोनीत, देसी +नस्ल पशुओं और मुर्जियों का दस्तावेजीकरण और नंबर प्रदान किए गए। भैंस जिनोमिक्स परियोजना +शुरू की गई। +पूर्वोत्तर के राज्यों से चार किस्म के सूअरों का मूल्यांकन किया जा रहा है। 50-87.5' संकर नस्लें +तैयार कर मैदानी परीक्षण किया गया। मांस में पशु की प्रजाति और लिंग का पता लगाने वाला उपकरण +विकसित किया गया। ऊंटों की तीन नस्लों में सूखा वहन क्षमता का मूल्यांकन। पनीर, विभिन्न रंगों की +कुल्फी और चीनी रहित कुल्फी बनाकर ऊंट के दूध का मूल्यवर्धन कर प्रौद्योगिकी का व्यवसायीकरण +किया गया। सैनिक फार्मों में फ्रेशवाल सांडों की संतानी के परीक्षण के लिए 40830 खुराक वीर्य का +इस्तेमाल किया गया। हरियाणा और ओंगोल नस्ल की 1920 गाएं पैदा की गईं। पशुओं की बीमारी, रोग +प्रचलन, मौसमी आंकड़ा, जमीन उपयोग आंकड़ा, पशु और मनुष्य जनसंख्या, भूमि की किस्म और +फसल उत्पादन का आंकड़ा बैंक तैयार किया गया। +सार्डीन, माकेरेल, टुना, सीयर, ऐंकोवीज, कैसनगिड्स, बांबे डक रिबन मछली की प्रजातियों और +उपकरणवार उनको मारने के बारे में आंकड़े विकसित किए गए। केरल के तटवर्ती क्षेत्रों में समुद्री +मछलियों के पकड़ने और प्रबंधन के बारे में दिशा-निर्देश विकसित और प्रकाशित किए गए। मन्नार और +पाक खाड़ी के जीपीएस मानचित्रीकरण से अंतर्जल संसाधन सर्वेक्षण किये गए। अध्ययन से पता चला +कि कड़ा मूंगा भूरे समूह-रोग, पोराइट्स अल्सर के लक्षण, सफेद चेचक लक्षण और गुलाबी रेखीय +लक्षण हैं। कारवाड़ मैंगलोर, कोच्चि, विजिंजाम और तूतीकोरन में लुजैनिडे परिवार की मछलियों की +प्रजातियों का मूल्यांकन किया जा रहा है। समुद्री मछलियों की 19 परिवारों की 70 प्रजातियों का अंतर्जल +दृश्य गणना तकनीकी से मूंगा चट्टानों में रिकार्ड तैयार किया गया। 6 परिवारों की 9 बिवाल्वस प्रजातियों +और 17 गेस्ट्रोपोड्स परिवारों की 25 प्रजातियों को रिकार्ड किया गया। सक्रिय यौगिक बनाने के लिए +मंडपम तट से समुद्री घास सर्गासम और गेलिडिएला इकट्ठा की गई। समुद्री घास आधारित प्रक्रिया/ +उत्पाद के विकास से अम्ल और अगार निकाले गया। कृत्रिम परिस्थितियों में सीबॉस का प्रजनन पूरे साल +विधिमान्य किया गया। यह पाया गया कि मछलियां 14 पीपीटी खारेपन में परिपक्व हो जाती है और 18 +पीपीटी में मछलियों के अंडे देने को रिकार्ड किया गया। सीबॉस नर्सरी के फार्म परीक्षण में हापा में +चिराला आंध्रप्रदेश में पालन में 750/हापा (एचएपीए) में 25 दिन बाद 90' जीवित बचे। दूधिया मछली +के बीज का संग्रह कर आरसीसी टैंक में पाला गया। तैयार चारे से उनमें परिपक्वता स्वाभाविक रूप से +आई। 40' मछली के चारे को पौध प्रोटीन शामिल कर शंखमीन चारा बनाकर पी.मोनोडोन को तालाबों +में खिलाया गया। शंखमीन का वजन दो महीने में 16 गुना बढ़ गया। +पश्चिम बंगाल और असम के दलदल से कुल 0.04 से 9 टन मछलियां पकड़ी गईं तथा +सालाना अनुमानित उत्पादन 0.1 से 0.4 टन प्रति हैक्टेयर है। कर्नाटक के जलाशयों में यह 8.4 टन +8.5 कि.ग्रा. सीपीआई के साथ रही। इसी अवधि में ब्रह्मपुत्र नदी में 23.62 टन मछली पकड़ी गई। +जलाशयों में भंडारण के लिए विकसित उपायों का मध्य प्रदेश में परीक्षण किया गया जिससे मछली +पकड़ने में 60' बढ़ोत्तरी हुई। भीमताल झील में बहने वाले पिंजड़े में गोल्डेन महसीर और स्नोट्राउट +को रखा गया। उनके विकास और अन्य बातों को रिकार्ड किया गया। जाड़े में पानी का तापमान कम +होने से वृद्धि दर धीमी रही। चाकलेट महसीर की वृद्धि का उत्तर-पूर्व और पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में +ताजे पानी में वृद्धि दर का आकलन किया जा रहा है। अरूणाचल प्रदेश में भूरीट्राउट के प्रजनन से +ट्राउट के 15000 बीज पैदा किए गए और उनको पालने का कार्य प्रगति पर है। महसीर हैचरी में +75000 बीज तैयार किए गए। +उत्तराखंड में ठंडे पानी में मछली पकड़ने के लिए कीमती ऐनी की लकड़ी की जगह नारियल की +लकड़ी से डोंगी बनाई गई। 6.4 मीटर लंबी गेंगी प्रयोगात्मक आधार पर मछली पकड़ने के लिए दी गई। +नवनिर्मित 26 मीटर लंबी नौका परीक्षण चल रहा है। देश के विभिन्न भागों में 100 प्रशिक्षण/जागरूकता +कार्यक्रम चलाए गए जिसमें 400 लोगों को विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी दी गई। तटीय स्व +सहायता समूह की 100 महिलाओं ने कार्यशाला में भाग लिया। +तीस से अधिक अंशकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए जिसमें 500 से अधिक लोगों +को मछली पालन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी गई। इनके अलावा मछली पकड़ने वाले +किसानों, छात्रों और अधिकारियों सहित 117 लोगों को पांच विभिन्न कार्यक्रमों में प्रशिक्षित किया गया। +सजावटी मछलियों के बारे में आंकड़े आन लाइन हैं। 60 प्रजातियों के 250 नमूने मन्नार की खाड़ी से +लाए गए। पेंगेसियस-पेंगेसियस का सफल निषेचन करवाया गया। इसमें अंडों से लार्वा निकलने की दर +क्रमश— 80 से 60 प्रतिशत रही तथा दो सप्ताह बाद 37-46 प्रतिशत मछलियां जीवित रहीं। अनाबास +टेस्ट्यूडाइनस को दीर्घावधि मल्टीपल ब्रीडिंग करवाई गई। +आईसीएआर के विकास अनुदान से देश में कृषि शिक्षा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। शिक्षा और +अनुसंधान में उत्कृष्टता के लिए आईसीएएम ने विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों में 29 उत्कृष्टता क्षेत्र में +सहायता दी। चौथे डीन समिति की प्रतिमान, स्तर, अकादमिक नियमन और स्नातक पाठ्यक्रमों के पाठ्य +विवरण के बारे में सिफारिशों को कृषि विश्वविद्यालय ने अपना लिया है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता, +स्वीकार्यता और स्नातकों को रोजगार मिलने पर अच्छा असर पड़ा है। कृषि और सहायक विज्ञानों में +स्नातकोत्तर (मास्टर्स और डाक्टोरल) कार्यक्रमों में समान अकादमिक नियमन, पाठ्यक्रम और पाठ्य +विवरण 2008-09 में पहली बार संशोधित कर आवश्यकता आधारित बनाया गया। कृषि विश्वविद्यालयों +के कामों के आधुनिकीकरण के लिए 2008-09 में एक बड़ी परियोजना शुरू की गई ताकि कृषि +विश्वविद्यालयों की अनुसंधान और शैक्षिक क्षमता बढ़ सके। 22 कृषि विश्वविद्यालयों को मान्यता प्रदान +की गई। शिक्षण के तरीके में सुधार, व्यावहारिक प्रशिक्षण पर अधिक ध्यान दिए जाने से छात्रों में जोखिम +क्षमता बढ़ी है। अनुदान से लिंग समानता, बेहतर कक्षा प्रयोगशाला सुविधा और छात्र सुविधाएं बढ़ी हैं। +सहायता का परिणाम अध्यापकों और छात्रों में ज्ञान और कौशल अर्जन/अद्यतन के रूप में निकला है और +2000 संकाय सदस्यों को हर साल नए क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जा रहा है। शिक्षण में कंप्यूटर सुविधा से +शिक्षा संसाधनों में निश्चित रूप से सुधार हुआ है। योजना में दी गई धन राशि से केंद्रीय कॉलेज +पुस्तकालयों में सुधार से शिक्षा और स्नातकोत्तर अनुसंधान बेहतर हुआ है। विश्वविद्यालयों के समग्र +विकास में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। +समुद्रपारीय फेलोशिप की शुरूआत की गई, जिससे भारतीयों को विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रयोगशालाओं +में और विदेशियों को सर्वश्रेष्ठ भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों/संस्थानों में अवसर मिले तथा उन देशों से +गुणवत्ता, अनुसंधान और अनुसंधान विकास में और सहयोग बढ़े। +फसल उत्पादन, फसल सुरक्षा और पशुधन उत्पादन तथा प्रबंधन से संबंधित 520 प्रौद्योगिकियों का 2044 +स्थानों पर 20,002 फार्म ट्रायल पर इसलिए लिया गया ताकि प्रौद्योगिकी के उपयुक्त स्थानों की पहचान +खेती की विभिन्न प्रणालियों में किया जा सके। विभिन्न फसलों के संकर किस्मों सहित 74,732 प्रदर्शन +किसानों को खेतों में उन्नत प्रौद्योगिकी की उत्पादन क्षमता का पता लगाने के लिए किया गया। इसी +अवधि में 11.53 लाख किसानों और 0.90 लाख विस्तार कर्मियों को उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी के बारे में +जानकारी और कौशल उद्यतन करने का प्रशिक्षण दिया गया। कृषि विज्ञान केंद्रों (बेवीके) द्वारा विस्तार के +अन्य कार्यक्रम चलाए गए जिससे 80.69 लाख किसानों और अन्य अधिकारियों को लाभ पहुंचा। कृषि +विज्ञान केंद्रों ने किसानों को उपलब्ध कराने के लिए 2.02 लाख कि्ंवटल बीज और 133.20 लाख +सैंपलिंग। बीज के अलावा 11.97 लाख किलो जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक और जैव एजेंट और 61.19 +लाख और अन्य पशुधन/मुर्गी का उत्पादन किया। जहां तक केवीके की नेटवर्किंग का सवाल है, कार्य +अग्रिम चरण में है और इससे 200 केवीके/क्षेत्रीय निदेशालय जुड़ जाएंगे। +अब तक 568 कृषि विज्ञान केंद्रों की स्थापना हो चुकी है, जबकि लक्ष्य 667 का है। ये फार्म +परीक्षण, विभिन्न प्रौद्योगिकियों की स्थलीय उपयोगिता का पता लगाने के अलावा किसानों के खेतों में +प्रदर्शन उपयोगिता का पता लगाने के अलावा किसानों के खेतों में प्रदर्शन कर उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी की +उत्पादन क्षमता के बारे में जानकारी देंगे। किसानों की कुशलता बढ़ाने के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। +घटक-1 (आईसीएआर को परिवर्तन के प्रबंधक के रूप में मजबूत करना) का उद्देश्य लगभग 10,000 +पीएच-डी शोध प्रबंधों को अंकीय संग्रह, स्प्रिंगर प्रकाशनों तक आन लाइन पहुंच (222.ह्यpह्म्inद्दeह्म् +द्यuष्k. ष्शद्व), वार्षिक समीक्षाओं (222.ड्डnद्वeड्डद्यह्म1ie2ह्य. शह्म्द्द), और सीएनआईआरओ (222. +pubद्यiह्यद्ध ष्शष्ह्म्श.ड्ड1), लगभग 2000 ई. पत्रिकाओं/स्रोतों और 126 एनएआरएस पुस्तकालयों से जोड़ना +है। परियोजना प्रस्ताव लेखन और रिपोर्ट देने की कुशलता लगभग 3500 लोगों में विकसित करना। +एग्रोपीडिया-ब्रोसिंग मिलनबिंदुओं और शोध उपकरणों से संकलन और सूचना की भागीदारी का +प्लेटफार्म विकसित और जारी किया गया। चार महीने में 400,000 एसएमएस संदेश भेजे गए, क्षेत्रीय +प्रौद्योगिकी प्रबंधन और व्यापार नियोजन और विकास इकाइयों की स्थापना। कृषि विज्ञान के 26 क्षेत्रों में +लगभग 500 वैज्ञानिकों को अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण और 1000 एनएआरएस वैज्ञानिकों की लगभग 80 +अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण। +घटक-2 के अंतर्गत ये (खपत प्रणाली के उत्पादन पर अनुसंधान) स्वीकृत उप परियोजनाओं में +मीठे सोर्घुम का इस्तेमाल इर्थनाल उत्पादन, बाजरा से खाद्यय उत्पादों का विकास सोर्घुम, मोतिया बाजरा +फाक्सटेल और छोटा बाजरा कपास के बहु प्रयोगों की खोज (डंठल, अच्छे धागे और कपड़े के लिए +कपास, रेशे, तेल, प्रोटीन) मछली मारने और छोटी समुद्री तथा ताजे पानी की मछलियों के प्रसंस्करण के +लिए नाव और साज-सामान शामिल हैं। +घटक-3 (धारणीय ग्रामीण आजीविका पर अनुसंधान) में 36 स्वीकृत परियोजनाओं के माध्यम से +देश के 27 राज्यों के (150 सुविधाविहीन जिलों में से) 80 सुविधाविहीन जिलों को शामिल किया गया +है। इसमें लगभग 83,000 किसानों/खेतिहर मजदूरों का लक्ष्य है। एक तिहाई भागीदार एनजीओ और शेष +एसएयू, आईसीएआर संस्थान, सामान्य विश्वविद्यालय, सीजीआईएआर संस्थान आदि शामिल हैं। +घटक-4 (मौलिक और रणनीतिक अनुसंधान) में आगामी पीढ़ी के नवीनीकरणों सहित कृषि +विज्ञान के अन्वेषित क्षेत्रों में 61 उप-परियोजनाओं को मंजूरी। इन परियोजनाओं में लगभग 50' भागीदार +आईसीएआर संस्थान, 16' एएसयू, आदि भागीदारी की विविधता के प्रतीक हैं। 61 स्वीकृत आईआईटी, +राष्ट्रीय संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय केंद्र आदि भागीदारी में विविधता के प्रतीक हैं। 61 स्वीकृत परियोजनाओं से +खाद्य शृंखला में आर्सेनिक समस्या समाधान के लिए रणनीति, हेटरोसिस निर्धारण के लिए जनन +अभियांत्रिकी, उन्नत कपास गांठ और रेशे के विकास के अनुवंशिक समाधान, भैंस के दूध का उत्पादन +बढ़ाना आदि में योगदान मिलने की आशा है। +डीएआरई/आईसीएआर मुख्यालय +छह भारतीय पेटेन्ट्स आईसीएआर को दिए गए जिसमें पशु पोषण (क्षेत्र-विशिष्ट खनिज मिश्रण) +कीटनियंत्रण और पौध पोषण (जैव कीटनाशक- जैव उर्वरक, फफूंदनाशक, कीट ट्रैप), कृषिमशीनरी +(बीज- उर्वरक ड्रिल) और रेमी रेशा (डीगमिंग) शामिल हैं। 227 वैज्ञानिकों और संबद्ध कर्मचारियोंं को +आईपीआर की बारीकियों से 5 राज्यों मेघालय, पश्चिम बंगाल, केरल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को +समाप्त 5 आईपी एवं प्रौद्योगिकी प्रबंधन पर आयोजित प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला कार्यक्रमों से अवगत +कराया गया। +2008-09 में सात पत्रिकाओं/आईसीएएम समाचार/रिपोर्टर और वार्षिक रिपोर्ट के सभी प्रकाशन +प्रकाशित हुए। इसके अलावा इंटरनेट संपर्क ढांचे की विस्तार और ई-पुस्तकालय प्रकाशन शुरू हुआ। +कृषि सूचना और प्रकाशित निदेशालय ने 2008 में रोज की खबरों की आन लाइन सूचीबद्ध करने +की प्रक्रिया के अलावा आईसीएआर रिपोर्टर और आईसीएआर यूज की आईसीएआर के वेब पर +अपकोडिंग शुरू कर दी है। +केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इंफाल +विश्वविद्यालय में सेमेस्टर प्रणाली है और दस ग्रेडिंग दी जाती है। स्नातक कार्यक्रमों के लिए आंतरिक +और बा±य परीक्षा और स्नातकोत्तर के लिए आंतरिक व्यवस्था है। विश्वविद्यालय ने आईसीएआर द्वारा +प्रस्तावित नियमन और पाठ्यक्रम को स्वीकार किया है। लेकिन क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें +बदलाव किया गया है। विश्वविद्यालय 7 स्नातक और 20 स्नातकोत्तर डिग्री कार्यक्रम चलाते हैं। स्नातक +पाठ्यक्रमों के लिए 2008 में 226 छात्रों ने प्रवेश लिया और 129 सफल रहे। विभिन्न स्नातकोत्तर +कार्यक्रमों में 57 ने प्रवेश लिया और कृषि कॉलेज से 118 छात्रों को सफलता मिली। +पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों के लिए अनुसंधान +उत्तर-पश्चिम हिमालय क्षेत्र में संस्थानों द्वारा किए गए अनुसंधान कार्यों के परिणामस्वरूप विभिन्न +जलवायु क्षेत्रों के विभिन्न फसलों की 11 किस्में/हाइब्रिड जारी की गईं। जारी की गई 47 किस्मों के कुल +21.9 टन प्रजनन बीज पैदा किए गए। गेहूं, मटर, मसूर, चना और फ्रेंचबीन के ऑर्गेनिक बीज (0.405 +टन) भी पैदा किए गए। इसके अतिरिक्त जारी 33 किस्मों के लगभग 1.2 टन न्यूक्लियस बीज भी पैदा +किए गए। +एनईएच क्षेत्र में बाढ़ के बाद कृषि के लिए 6.0 टन प्रति हेक्टेयर वाले दो चावल के जीनोटाइप के +विकास के लिए उत्तरपूर्व हिमालय क्षेत्र में स्थित संस्थान में अनुसंधान कार्य किया गया। झूम खेती के +लिए एक और चावल जीनोटाइप आरसीपीएल 1-129 को विकसित किया गया। नगालैंड से 80 +परिग्रहण भी एकादित किए गए। स्ट्रॉबेरी की विभिन्न क्षेत्रों के लिए कई किस्में जैसे-मेघालय के लिए +आफेरा तथा सिक्किम और मणिपुर के लिए स्वीट चार्ली की सिफारिश की गई। +ऊपरी क्षेत्रों में दोगुनी फसल के लिए वर्षा के मौसम में उगाई जाने वाली मक्का की फसल का +इस्तेमाल कर रबी फसल (सरसों) के लिए एक कम लागत वाली तकनीक “इन-सिटु” नमी संरक्षण +नमूने के रूप विकसित की गई। मिजोरम की डेयरी गायों में खनिज अल्पता पाई गई और डाटा +आधारित एक राज्य विशेष खनिज मिक्स्चर फीड फॉर्मूला ईजाद किया गया। ब्लड सीरम नमूने, जमीन +तथा फीडर नमूने एकत्रित कर उनके आधार पर मेक्रो और माइक्रो मिनरल के लिए अनेक विश्लेषण +किए गए। खून में कमी के आधार पर मिजोरम की गाय-भैंसों के लिए एक मिनरल मिक्स्चर +कंपोजीशन विकसित किया गया। +आइसलैंड (अंडमान और निकोबार) +विभिन्न संसाधन परिस्थितियों के तहत विकसित एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) मॉडल के हिस्सों +के विश्लेषण से पता चलता है कि पहाड़ी और ढलुआं पहाड़ी जमीनों में फसल का हिस्सा शुद्ध आमदनी +से अधिक (69 से 83 प्रतिशत) है वहीं मध्यम ऊपरी घाटी तथा निचली घाटी क्षेत्रों में पशुधन हिस्सा +(49 से 66 प्रतिशत) है। एक औसत रूप में विभिन्न संसाधन स्थितियों के तहत आईएफएस से शुद्ध +आमदनी 1.0-2.5 लाख प्रति हेक्टेयर थी। मछली-मुर्गीपालन-बतख पालन में बेक्टीरियाई लोड से +खुलासा होता है कि सैमोनेल मानसून के समय तालाब में बढ़ जाती है तथा गर्मियों में फिर बढ़ जाती है। +इससे पता चलता है कि घरेलू उद्देश्य के लिए तालाब का पानी अनुपयुक्त है। +अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में मूल्यांकन के लिए मुख्य खेतों में 50 पौधे रोपे गए। बकरियों +की दो किस्में (स्थानीय अंडमान तथा टैरेसा) पहली बार फिनोटिपिकली पहचानी गईं। +105 रिकार्ड की गई रीफ मछलियों में से डेमसेल्फिश की लगभग 15 किस्में अंडमान और +निकोबार द्वीपसमूह में पैदा की जा रही हैं। + +कला और संस्कृति: +संस्कृति मंत्रालय कला और संस्कृति के संरक्षण तथा विकास में अहम भूमिका निभाता है। इस +विभाग का उद्देश्य ऐसी पद्धति विकसित करना है जिससे कला और संस्कृति से जुडेΠ बुनियादी, +सांस्कृतिक और सौंदर्यपरक मूल्यों तथा अवधारणाअों को जनमानस में जीवंत रखा जा सके। यह +समकालीन सृजनात्मक कार्यकलापों की विभिन्न विधाओं को प्रोत्साहित करने से जुड़े कार्यक्रम भी +चलाता है। यह विभाग ऐतिहासिक घटनाओं की जयंती और महान कलाकारों की शताब्दियां मनाने वाली +प्रमुख एजेंसी भी है। +दृश्य कलाएं. +ललित कला अकादमी. +भारतीय कला के प्रति देश-विदेश में समझ बढ़ाने और प्रचार-प्रसार के लिए सरकार ने नई दिल्ली में +1954 में ललित कला अकादमी (नेशनल अकादमी ऑफ आर्ट्स) की स्थापना की थी। अकादमी के +लखनऊ, कोलकाता, चेन्नई, नई दिल्ली और भुवनेश्वर में क्षेत्रीय केंद्र हैं जिन्हें राष्ट्रीय कला केंद्र के नाम +से जाना जाता है। इन केंद्रों पर पेंटिंग, मूर्तिकला, प्रिंट-निर्माण और चीनी मिट्टी की कलाओं के विकास +के लिए कार्यशाला-सुविधाएं उपलब्ध हैं। +अकादमी अपनी स्थापना से ही हर वर्ष समसामयिक भारतीय कलाओं की प्रदर्शनियां आयोजित +करती रही है। 50-50 हजार रूपये के 15 राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किए जाते हैं। प्रत्येक तीन वर्ष पर +अकादमी समकालीन कला पर नई दिल्ली में त्रैवार्षिक अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी (त्रिनाले इंडिया) आयोजित +करती है। +अकादमी हर वर्ष जाने-माने कलाकारों और कलाक्षेत्र के इतिहासकारों को अपना फेलो चुनकर +सम्मानित करती है। विदेशों में भारतीय कला के प्रचार-प्रसार के लिए अकादमी अंतर्राष्ट्रीय द्विवार्षिकियों +और त्रिवार्षिकियों में नियमित रूप से भाग लेती है और अन्य देशों की कलाकृतियों की प्रदर्शनियां भी +आयोजित करती है। देश के कलाकारों का अन्य देशों के कलाकारों के साथ मेलमिलाप और तालमेल +बढ़ाने के उद्देश्य से अकादमी भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों और समझौतों के +अंतर्गत कलाकारों को एक-दूसरे के यहां भेजने की व्यवस्था करती है। +ललित कला अकादमी कला संस्थाओं/संगठनों को मान्यता प्रदान करती है और इन संस्थाओं के +साथ-साथ राज्यों की अकादमियों को आर्थिक सहायता देती है। यह क्षेत्रीय केंद्रों के प्रतिभावान युवा +कलाकारों को छात्रवृत्ति भी प्रदान करती है। अपने प्रकाशन कार्यक्रम के तहत अकादमी समकालीन +भारतीय कलाकारों की रचनाओं पर हिंदी और अंग्रेजी में मोनोग्राफ और समकालीन पारंपरिक तथा +जनजातीय और लोक कलाओं पर जानेमाने लेखकों और कला आलोचकों द्वारा लिखित पुस्तकें प्रकाशित +करती है। अकादमी अंग्रेजी में “ललित कला कंटेंपरेरि”, “ललित कला एंशिएंट” तथा हिंदी में +“समकालीन कला” नामक अर्द्धवार्षिक कला पत्रिकाएं भी प्रकाशित करती है। इसके अलावा अकादमी +समय-समय पर समकालीन पेंटिंग्स और ग्राफिक्स के बहुरंगी विशाल आकार के प्रतिफलक भी +निकालती है। अकादमी ने अनुसंधान और अभिलेखन का नियमित कार्यक्रम भी शुरू किया है। भारतीय +समाज और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं से संबद्ध समसामयिक लोककला संबंधी परियोजना पर काम +करने के लिए अकादमी विद्वानों को आर्थिक सहायता देती है। +मंचन कलाएं. +संगीत. +भारत में शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख विधाएं-हिंदुस्तानी और कर्नाटक-गुरू-शिष्य परंपरा का निर्वाह +करती चली आ रही हैं। इसी परंपरा ने घरानों और संप्रदायों की स्थापना की प्रेरणा दी जो बराबर आगे +बढ़ रही है। +नृत्य. +भारत में नृत्य परंपरा 2000 वर्षों से भी यादा वर्षों से निरंतर चली आ रही है। नृत्य की विषयवस्तु +धर्मग्रंथों, लोककथाओं और प्राचीन साहित्य पर आधारित रहती है। इसकी दो प्रमुख शैलियां हैं- +शास्त्रीय नृत्य और लोकनृत्य। शास्त्रीय नृत्य वास्तव में प्राचीन नृत्य परंपराओं पर आधारित है और +इनकी प्रस्तुति के नियम कठोर हैं। इनमें प्रमुख हैं-“भरतनाट्यम”, “कथकलि”, “कत्थक”, “मणिपुरी”, +“कुचिपुड़ी” और “ओडिसी”। “भरतनाट्यम” मुख्यत— तमिलनाडु का नृत्य है और अब यह अखिल +भारतीय स्वरूप ले चुका है। “कथकलि” केरल की नृत्यशैली है। “कत्थक” भारतीय संस्कृति पर मुगल +प्रभाव से विकसित नृत्य का एक अहम शास्त्रीय रूप है। “मणिपुरी” नृत्य शैली में कोमलता और +गीतात्मकता है जबकि “कुचिपुडि़” की जड़ें आंध्र प्रदेश में हैं। उड़ीसा का “ओडिसी” प्राचीनकाल में +मंदिरों में नृत्य रूप में प्रचलित था जो अब समूचे भारत में प्रचलित है। लोकनृत्य और आदिवासी नृत्य +की भी विभिन्न शैलियां प्रचलित हैं। +शास्त्रीय और लोकनृत्य दोनों को लोकप्रिय बनाने का श्रेय संगीत नाटक अकादमी, तथा अन्य प्रशिक्षण +संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों को जाता है। अकादमी सांस्कृतिक संस्थानों को आर्थिक सहायता देती +है और नृत्य तथा संगीत की विभिन्न शैलियों में विशेषतः जो दुर्लभ हैं, को बढ़ावा देने तथा उच्चशिक्षा और +प्रशिक्षण के लिए अध्ययेताओं, कलाकारों और अध्यापकों को फेलोशिप प्रदान करती है। +रंगमंच. +भारत में रंगमंच उतना ही पुराना है जितना संगीत और नृत्य। शास्त्रीय रंगमंच तो अब कहीं-कहीं जीवित +है। लोक रंगमंच को अनेक क्षेत्रीय रूपों में विभिन्न स्थानों पर देखा जा सकता है। इनके अलावा शहरों +में पेशेवर रंगमंच भी हैं। भारत में कठपुतली रंगमंच की समृद्ध परंपरा रही है जिनमें सजीव कठपुतलियां, +छडि़यों पर चलने वाली कठपुतलियां, दस्ताने वाली कठपुतलियां और चमड़े वाली कठपुतलियां +(समानांतर रंगमंच) प्रचलित हैं। अनेक अर्द्ध-व्यावसायिक और शौकिया रंगमंच समूह भी हैं जो भारतीय +भाषाओं और अंग्रेजी में नाटकों का मंचन करते हैं। +संगीत नाटक अकादमी. +संगीत नाटक अकादमी संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी है जिसे आधुनिक भारत को +निर्माण प्रक्रिया में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में याद किया जा सकता है, जिससे भारत को 1947 में +स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। कलाओं के क्षणिक गुण-स्वभाव तथा उनके संरक्षण की आवश्यकता को देखते +हुए इन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस प्रकार समाहित हो जाना चाहिए कि सामान्य व्यक्ति को इन्हें +सीखने, अभ्यास करने और आगे बढ़ाने का अवसर प्राप्त हो सके। बीसवीं सदी के शुरू के कुछ दशकों +में ही कलाओं के संरक्षण और विकास का दायित्व सरकार का समझा जाने लगा था। +इस आशय की पहली व्यापक सार्वजनिक अपील 1945 में सरकार से की गई जब बंगाल की +एशियाटिक सोसाइटी ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि एक राष्ट्रीय संस्कृति न्यास (नेशनल कल्चरल ट्रस्ट) +बनाया जाए जिसमें तीन अकादमियां-नृत्य, नाटक एवं संगीत अकादमी, साहित्य अकादमी और कला +एवं वास्तुकला अकादमी सम्मिलित हों। +इस समूचे मुद्दे पर स्वतंत्रता के पश्चात कोलकाता में 1949 में आयोजित कला सम्मेलन में तथा +नई दिल्ली में 1951 में आयोजित साहित्य सम्मेलन तथा नृत्य, नाटक व संगीत सम्मेलन में फिर से +विचार किया गया। भारत सरकार द्वारा आयोजित इन सम्मेलनों में अंततः तीन राष्ट्रीय अकादमियां +स्थापित करने की सि$फारिश की गई। इनमें से एक अकादमी नृत्य, नाटक और संगीत के लिए, एक +साहित्य के लिए और एक कला के लिए स्थापित किए जाने का प्रस्ताव किया गया। +31 मई, 1952 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के हस्ताक्षर से पारित +प्रस्ताव द्वारा सबसे पहले नृत्य, नाटक और संगीत के लिए राष्ट्रीय अकादमी के रूप में संगीत नाटक +अकादमी की स्थापना हुई। 28 जनवरी, 1953 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संगीत नाटक +अकादमी का विधिवत उद्घाटन किया। +1952 के प्रस्ताव में शामिल अकादमी के कार्यक्षेत्र और गतिविधियों में 1961 में मूलभावना के +अंतर्गत ही विस्तार किया गया और तदनुसार सरकार ने संगीत नाटक अकादमी का समिति के रूप में +पुनर्गठन किया और समिति पंजीकरण अधिनियम, 1860 (1957 में संशोधित) के अंतर्गत इसे पंजीकृत +किया गया। समिति के कार्यक्षेत्र और गतिविधियां उस नियमावली में निर्धारित किए गए हैं जो 11 +सितंबर, 1961 को इसके समिति के रूप में पंजीकरण के समय पारित की गई थी। +अकादमी अपनी स्थापना के बाद से ही भारत में संगीत, नृत्य और नाटक के उन्नयन में +सहायता के लिए एकीकृत ढांचा कायम करने में जुटी है। यह सहायता परंपरागत और आधुनिक +शैलियों तथा शहरी और ग्रामीण परिवेशों के लिए समान रूप से दिया जाता है। अकादमी द्वारा प्रस्तुत +अथवा प्रायोजित संगीत, नृत्य एवं नाटक समारोह समूचे देश में आयोजित किए जाते हैं। विभिन्न +कला-विधाओं के महान कलाकारों को अकादमी का फेलो चुनकर सम्मानित किया गया है। प्रतिवर्ष +जानेमाने कलाकारों और विद्वानों को दिए जाने वाले संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मंचन कलाओं के +क्षेत्र में सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मान माने जाते हैं। दूर-दराज क्षेत्रों सहित देश के विभिन्न भागों में +संगीत, नृत्य और रंगमंच के प्रशिक्षण और प्रोत्साहन में लगे हजारों संस्थानों को अकादमी की ओर से +आर्थिक सहायता प्राप्त हुई है और विभिन्न संबद्ध विषयों के शोधकर्ताओं, लेखकों तथा प्रकाशकों को +भी आर्थिक सहायता दी जाती है। +अकादमी द्वारा अपनी स्थापना के बाद की गई मंचन कलाओं की व्यापक रिकार्डिंग और फिल्मिंग +के आधार पर ऑडियो-वीडियो टेपों, 16 मि.मी. फिल्मों, चित्रों और ट्रांसपेरेंसियों का एक बड़ा +अभिलेखागार बन गया है जो मंचन कलाओं के बारे में शोधकर्ताओं के लिए देश का अकेला सबसे +महत्वपूर्ण स्रोत है। +अकादमी की संगीत वाद्ययंत्रों की वीथि में 600 से अधिक वाद्ययंत्र रखे हैं और इन वर्षों में बड़ी +मात्रा में प्रकाशित सामग्री का भी यह स्रोत रही है। संगीत नाटक अकादमी का पुस्तकालय भी इन विषयों +के लेखकों, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र रहा है। अकादमी 1965 से एक पत्रिका +“संगीत नाटक” नाम से निकाल रही है जो अपने क्षेत्र और विषय की सबसे ज्यादा अवधि से निकलने +वाली पत्रिका कही जा सकती है और इसमें जानेमाने लेखकों के साथ-साथ उभरते नए लेखकों की +रचनाएं भी प्रकाशित की जाती हैं। +अकादमी मंचन कलाओं के क्षेत्र में राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों और परियोजनाओं की स्थापना एवं +देखरेख भी करती है। इनमें सबसे पहला संस्थान है इंफाल की जवाहरलाल नेहरू मणिपुरी नृत्य +अकादमी जिसकी स्थापना 1954 में की गई थी। यह मणिपुरी नृत्य का अग्रणी संस्थान है। 1959 में +अकादमी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्थापना की और 1964 में कत्थक केंद्र स्थापित किया। ये दोनों +संस्थान दिल्ली में हैं। अकादमी द्वारा चलाई जा रही राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में केरल का +कुटियट्टम थिएटर है जो 1991 में शुरू हुआ था और 2001 में इसे यूनेस्को की ओर से मानवता की +उल्लेखनीय धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की गई। 1994 में उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल में +छाऊ नृत्य परियोजना आरंभ की गई। 2002 में असम के सत्रिय संगीत, नृत्य, नाटक और संबद्ध कलाओं +के लिए परियोजना समर्थन शुरू किया गया। +मंचन कलाओं की शीर्षस्थ संस्था होने के कारण अकादमी भारत सरकार को इन क्षेत्रों में नीतियां +तैयार करने और उन्हें क्रियान्वित करने में परामर्श और सहायता उपलब्ध कराती है। इसके अतिरिक्त +अकादमी भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच तथा अन्य देशों के बीच सांस्कृतिक संपर्कों के विकास और +विस्तार के लिए राज्य की जिम्मेदारियों को भी एक हद तक पूरा करती है। अकादमी ने अनेक देशों में +प्रदर्शनियों और बड़े समारोहों-उत्सवों का आयोजन किया है। अकादमी ने हांगकांग, रोम, मॉस्को, एथेंस, +वल्लाडोलिड, काहिरा और ताशकंद तथा स्पेन में प्रदर्शनियां तथा गोष्ठियां आयोजित की हैं। अकादमी ने +जापान, जर्मनी और रूस जैसे देशों के प्रमुख उत्सवों को प्रस्तुत किया है। +वर्तमान में संगीत नाटक अकादमी भारत सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत एक +स्वायत्त संस्था है और इसकी योजनाओं तथा कार्यक्रमों को लागू करने के लिए पूरी तरह से मंत्रालय द्वारा +वित्तपोषित है। +राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय. +राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दुनिया में रंगमंच का प्रशिक्षण देने वाले श्रेष्ठतम संस्थानों में से एक है तथा भारत +में यह अपनी तरह का एकमात्र संस्थान है जिसकी स्थापना संगीत नाटक अकादमी ने 1959 में की थी। +इसे 1975 में स्वायत्त संगठन का दर्जा दिया गया जिसका पूरा खर्च संस्कृति विभाग वहन करता है। +राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का उद्देश्य रंगमंच के इतिहास, प्रस्तुतिकरण, दृश्य डिजाइन, वस्त्र डिजाइन, +प्रकाश व्यवस्था और रूप-सज्जा सहित रंगमंच के सभी पहलुओं का प्रशिक्षण देना है। इस विद्यालय में +प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की अवधि तीन वर्ष है और हर वर्ष पाठ्यक्रम में 20 विद्यार्थी लिए जाते हैं। प्रवेश +पाने के इच्छुक विद्यार्थियों को दो चरणों में से गुजरना पड़ता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के डिप्लोमा को +भारतीय विद्यालय संघ की ओर से एम.ए. की डिग्री के बराबर मान्यता प्राप्त है और इसके आधार पर वे +कॉलेजों/विश्वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्त किए जा सकते हैं अथवा पीएच.-डी. (डाक्टरेट) +उपाधि के लिए पंजीकरण करा सकते हैं। +इस विद्यालय के मंचन विभाग “रेपर्टरि” की स्थापना दोहरे उद्देश्य से 1964 में की गई थी। एक +उद्देश्य था व्यावसायिक रंगमंच की स्थापना करना और दूसरा, लगातार नए प्रयोग जारी रखना। बाल +रंगमंच को बढ़ावा देने की दिशा में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का महत्वपूर्ण योगदान है। 1989 में “थिएटर +इन एजूकेशन” की स्थापना की गई। बाद में इसका नाम बदल कर “संस्कार रंग टोली” कर दिया गया। +यह बच्चों के लिए नाटक तैयार करने, दिल्ली के स्कूलों में गर्मी की छुट्टियों में कार्यशालाएं आयोजित +करने और सैटरडे क्लब के जरिए बाल रंगमंच को प्रोत्साहित करने का काम कर रहा है। 1998 से ही +यह विद्यालय बच्चों के लिए राष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव का आयोजन कर रहा है। यह महोत्सव हर वर्ष +नवंबर में “जश्ने बचपन” के नाम से आयोजित किया जाता है। भारत की आजादी की 50वीं वर्षगांठ के +अवसर पर 18 मार्च से 14 अप्रैल, 1999 तक पहले राष्ट्रीय रंगमंच महोत्सव “भारत रंग महोत्सव” का +आयोजन किया गया था। इस प्रथम “भारत रंग महोत्सव” की सफलता को देखते हुए इसे हर वर्ष मनाने +का निर्णय लिया गया है। +विभिन्न राज्यों में अनेक भाषाएं बोलने वाले और विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले हज़ारों रंगमंच +कलाकार इस विद्यालय के नियमित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तक नहीं पहुंच सकते। ऐसे में इन कलाकारों तक +पहुंचने के लिए 1978 में “विस्तार कार्यक्रम” नामक एक अल्पावधि शिक्षण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू +किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय स्थानीय थिएटर ग्रुपों/कलाकारों के सहयोग से +कार्यशालाएं चलाता है जिनमें सभी कार्यक्रम स्थानीय भाषाओं में होते हैं। इन कार्यशालाओं को मोटे तौर +पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-प्रस्तुतिकरणोन्मुख कार्यशालाएं, बच्चों के लिए प्रस्तुतिकरणोन्मुख +कार्यशालाएं और रंगमंच संबंधी शिक्षण तथा प्रशिक्षण। चार दक्षिणी राज्यों और पांडिचेरी की रंगमंच +संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से विद्यालय ने बंगलुरू में अपना क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र +भी स्थापित किया है। +विद्यालय की एक अन्य महत्वपूर्ण गतिविधि है रंगमंच के बारे में पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन करना +तथा रंगमंच से जुड़े विषयों पर महत्वपूर्ण अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद कराना। +साहित्य अकादमी. +साहित्य अकादमी विभिन्न भाषाओं की कृतियों की राष्ट्रीय अकादमी है। इसका उद्देश्य प्रकाशन, +अनुवाद, गोष्ठियां, कार्यशालाएं आयोजित करके भारतीय साहित्य के विकास को बढ़ावा देना है। इसके +तहत देशभर में सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम और साहित्य सम्मेलन भी आयोजित किए जाते हैं। +अकादमी की स्थापना 1954 में स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी और इसके लिए धन की व्यवस्था +भारत सरकार का संस्कृति विभाग करता है। अकादमी का समिति के रूप में पंजीकरण 1956 में हुआ +था। अकादमी ने 24 भाषाओं को मान्यता दे रखी है। प्रत्येक भाषा के लिए एक सलाहकार बोर्ड है जो +संबद्ध भाषा के कामकाज और प्रकाशन के बारे में सलाह देता है। अकादमी के चार क्षेत्रीय बोर्ड हैं जो +उत्तर, पश्चिम, पूर्व और दक्षिण की भाषाओं के बीच तालमेल और परस्पर आदान-प्रदान को प्रोत्साहन +देते हैं। अकादमी का मुख्यालय नई दिल्ली में है तथा कोलकाता, मुंबई, बंगलुरू और चेन्नई में भी इसके +कार्यालय हैं। अकादमी के बंगलुरू और कोलकाता में दो अनुवाद केंद्र भी हैं। मौखिक और जनजातीय +साहित्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शिलांग में अकादमी का परियोजना कार्यालय स्थित है तथा दिल्ली +में भारतीय साहित्य का अभिलेखागार है। नई दिल्ली में ही अकादमी का अनूठा बहुभाषीय पुस्तकालय +भी है जिसके क्षेत्रीय कार्यालय बंगलुरू और कोलकाता में हैं। इनमें 25 से ज्यादा भाषाओं की करीब डेढ़ +लाख पुस्तकों का संग्रह है। +साहित्य अकादमी लेखकों को सर्वोच्च सम्मान अपना “फेलो” चुनकर देती है। यह सम्मान अमर +साहित्यकारों के लिए सुरक्षित है तथा एक बार में 21 लोगों को दिया जाता है। अब तक यह सम्मान 66 +लेखकों को दिया जा चुका है। अकादमी 850 लेखकों और 283 अनुवादकों को साहित्य तथा अनुवाद के +क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित कर चुकी है और 31 भाषा सम्मान दिए जा चुके हैं +जिनका उद्देश्य क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहन देना है। साथ ही भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान +करने वाले विदेशी विद्वानों को मानद फेलोशिप प्रदान की गई है। अकादमी 24 भाषाओं में पुस्तकें +प्रकाशित करती है जिनमें पुरस्कृत कृतियों का अनुवाद, भारतीय साहित्य के महान लेखकों के मोनोग्राफ, +साहित्य का इतिहास, अनुवाद में महान भारतीय और विदेशी रचनाएं, उपन्यास, कविता और गद्य, +आत्मकथाएं, अनुवादकों का रजिस्टर, भारतीय लेखकों के बारे में जानकारी (कौन, कौन है), भारतीय +साहित्य की राष्ट्रीय संदर्भ सूची और भारतीय साहित्य का विश्वकोश शामिल हैं। अभी तक अकादमी इन +विभिन्न श्रेणियों में कुल 4000 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित कर चुकी है। अकादमी की तीन पत्रिकाएं +हैं-अंग्रेजी में द्विमासिक “इंडियन लिटरेचर”, हिंदी द्विमासिक “समकालीन भारतीय साहित्य” और +संस्कृत छमाही पत्रिका “संस्कृत प्रतिभा”। अकादमी हर वर्ष औसतन 250 से 300 पुस्तकें प्रकाशित करती +है। इसकी कई विशेष परियोजनाएं भी हैं, जैसे-प्राचीन भारतीय साहित्य, मध्यकालीन भारतीय साहित्य +और आधुनिक भारतीय साहित्य और पांच सहस्राब्दियों के दस सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ। अकादमी ने “भारतीय +काव्यशास्त्र का विश्वकोश” तैयार करने की नई परियोजना भी शुरू की है। +साहित्य अकादमी साहित्य के इतिहास एवं सौंदर्यशास्त्र जैसे विभिन्न विषयों पर हर वर्ष अनेक +क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों का आयोजन करती है। साथ ही, नियमित रूप से अनुवाद +कार्यशालाएं भी लगाई जाती हैं। +अकादमी हर वर्ष, आमतौर पर फरवरी के महीने में, सप्ताहभर का साहित्योत्सव आयोजित करती +है जिसमें पुरस्कार वितरण समारोह, संवत्सर भाषणमाला और राष्ट्रीय संगोष्ठी शामिल रहती हैं। +अकादमी ने स्वर्ण जयंती समारोहों के अंतर्गत 2004-05 में “सूर साहित्य” विषय से कार्यक्रमों की +नई शृंखला भी आरंभ की। +छात्रवृत्ति और फेलोशिप डिवीजन. +छात्रवृत्ति और फेलोशिप डिवीजन देश में सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रचार-प्रसार में लगे व्यक्तियों को +आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से चार योजनाएं चला रहा है। +विभिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों में युवा कलाकारों को छात्रवृत्तियां. +युवा कलाकारों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य, भारतीय शास्त्रीय संगीत, रंगमंच, दृश्यकला तथा लोक एवं +पारंपरिक शैली की कलाओं के क्षेत्र में छात्रवृत्तियां प्रदान की जाती हैं। इस योजना के अंतर्गत प्रतिवर्ष +कुल 400 छात्रवृत्तियां दो वर्षों की अवधि के लिए दी जाती हैं। छात्रवृत्ति में प्रतिमाह 2000 रूपये प्रदान +किए जाते हैं। इस छात्रवृत्ति के लिए 18 से 25 वर्ष के आयुवर्ग के कलाकार आवेदन के पात्र होते हैं। +छात्रवृत्ति उच्च प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए दी जाती है। +मंचन, साहित्य तथा दृश्य कलाओं के क्षेत्र में चुने हुए श्रेष्ठ कलाकारों के लिए फेलोशिप. +भारतीय शास्त्रीय नृत्य, भारतीय शास्त्रीय संगीत, रंगमंच, दृश्यकला, लोककला और पारंपरिक कला तथा +साहित्य के क्षेत्रों में उत्कृष्ट कलाकारों को फेलोशिप प्रदान की जाती है। दो वर्ष की अवधि के लिए +कुल 170 फेलोशिप दी जाती हैं। इनमें से 85 सीनियर फेलोशिप होती हैं जिनमें प्रतिमाह 12,000 रूपये +दिए जाते हैं और 85 जूनियर फेलोशिप होती हैं जिनमें प्रतिमाह 6,000 रूपये दिए जाते हैं। सीनियर +फेलोशिप के लिए 41 वर्ष या इससे ऊपर के कलाकार तथा जूनियर फेलोशिप के लिए 25 से 40 वर्ष की +आयु वाले कलाकार आवेदन कर सकते हैं। केंद्र सरकार/सरकारी उपक्रमों/सरकारी संगठनों/यूजीसी से +सहायता प्राप्त कॉलेजों में कार्य करने वाले आवेदकों को चुने जाने पर दो वर्ष की अवधि के लिए +अध्ययन अवकाश अथवा अन्य किसी प्रकार का अवकाश लेना होगा। +ये छात्रवृत्तियां भारतीय परियोजनाओं पर शोधकार्य करने के लिए दी जाती हैं। इस योजना के +तहत शैक्षिक अनुसंधान तथा निष्पादन आधारित अनुसंधान दोनों को बढ़ावा दिया जाता है और आवेदक +को इस प्रकार की परियोजना पर काम करने की अपनी क्षमता का सबूत देना होता है। ये फेलोशिप +प्रशिक्षण देने, कार्यशाला चलाने, संगोष्ठियां कराने या आत्मकथा/उपन्यास आदि लिखने के लिए नहीं दी +जाती हैं। +संस्कृति से जुड़े नए क्षेत्रों में सीनियर/जूनियर फेलोशिप. +भारत विद्या, पुरालेख शास्त्र, सांस्कृतिक समाजशास्त्र, सांस्कृतिक अर्थशास्त्र, स्मारकों की संरचना और +अभियांत्रिकी से जुड़े पहलुओं, मुद्राशास्त्र, संरक्षण के वैज्ञानिक और तकनीकी पहलुओं, कला और +सांस्कृतिक धरोहर के प्रबंधन पहलुओं तथा संस्कृति और सृजनशीलता से संबद्ध विज्ञान प्रौद्योगिकी के +प्रयोगों के अध्ययन जैसे क्षेत्रों में फेलोशिप प्रदान की जाती हैं। हर वर्ष कुल 19 फेलोशिप दी जाती हैं +जिनमें से 11 सीनियर और 8 जूनियर होती हैं। संबद्ध विषय में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त 41 वर्ष या इससे +अधिक आयु के लोग सीनियर फेलोशिप के लिए आवेदन कर सकते हैं जबकि जूनियर फेलोशिप के +लिए आयुसीमा 25 से 40 वर्ष है। सीनियर फेलोशिप में प्रतिमाह 12,000 रूपये और जूनियर फेलोशिप में +प्रतिमाह 6,000 रूपये दिए जाते हैं। +सीनियर और जूनियर फेलोशिप आधुनिक विचारों, सिद्धांतों, पद्धतियों और प्रौद्योगिकी को कला +और संस्कृति से संबद्ध मुद्दों में प्रयोग करने के उद्देश्य से नए क्षेत्रों में परियोजनाएं चलाने के लिए दी +जाती हैं। इसका उद्देश्य कला और संस्कृति से जुड़े क्षेत्रों के समसामयिक मुद्दों और समस्याओं के +समाधान में नई अनुसंधान तकनीकों, प्रौद्योगिकियों और आधुनिक प्रबंधन सिद्धांतों के विश्लेषणात्मक +प्रयोग को बढ़ावा देना है। +===सांस्कृतिक गतिविधियों में लगे स्वैच्छिक संगठनों को अनुसंधान सहयोग के लिए आर्थिक +सहायता देने की योजना=== +इस योजना के अंतर्गत ऐसे स्वैच्छिक संगठन लाभान्वित होते हैं जो सांस्कृतिक गतिविधियों में लगे हैं +और भारतीय संस्कृति की परंपरा और दर्शन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर शोधकार्य कर रहे हैं। ये संगठन +कम से कम तीन वर्षों से इन क्षेत्रों में कार्य कर रहे हों और सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम (1860 का +XXI) के अंतर्गत पंजीकृत हों। आर्थिक सहायता निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए दी जाती है — +(क) महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मुद्दों पर सम्मेलन, विचार गोष्ठियां और परिसंवाद/परिचर्चाएं आयोजित +कराने के लिए; +(ख) सर्वेक्षण कार्य करने तथा प्रायोगिक परियोजना चलाने आदि जैसी विकास गतिविधियों का खर्च +वहन करने के लिए। +विशेष परियोजनाओं के लिए सहायता राशि कुल व्यय के 75 प्रतिशत तक ही दी जाएगी जो +अधिकतम एक लाख रूपये हो सकती है जैसा कि विशेषज्ञ समिति ने सिफारिश की है। +वर्ष 2004-05 में विशेषज्ञ समिति ने स्वैच्छिक संगठनों को अनुसंधान समर्थन के लिए आर्थिक +सहायता देने के 176 प्रस्तावों का चयन किया था। +रामकृष्ण मिशन संस्कृति संस्थान, कोलकाता. +इस संस्थान की स्थापना का विचार श्री रामकृष्ण (1836-1886) की पहली जन्मशती के अवसर पर +उनका स्थाई स्मारक बनाने के रूप में 1936 में व्यक्त किया गया था। श्री रामकृष्ण द्वारा प्रतिपादित वेदांत +के संदेश के प्रसार के लिए स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के शाखा केंद्र के रूप में 29 +जनवरी, 1938 को इसकी विधिवत स्थापना की गई। श्री रामकृष्ण के मूल उपदेशों में (i) सभी धर्मों को +समान आदर देना; (ii) मनुष्य की दैवीय क्षमताओं को प्रतिपादित करना और उभारना; तथा (iii) मानव +सेवा को ईश्वर की पूजा मानना अर्थात् मानवता को नया धर्म मानना शामिल हैं। +मानव मात्र की एकता के आदर्श के प्रति समर्पित इस संस्थान ने लोगों को विश्व की संस्कृतियों के +समृद्ध मूल्यों से अवगत कराने तथा उन्हें यह समझाने के लिए सालोंसाल अथक प्रयास किए हैं कि +परस्पर एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझना, मानना और स्वीकार करना अत्यंत आवश्यक है-यही वह +दृष्टिकोण है जो वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय समझ एवं सहमति विकसित करने और देश में राष्ट्रीय +एकता की भावना को बल प्रदान करने में सर्वथा अनुकूल है। इस प्रकार, कुल मिलाकर, संस्थान का +मुख्य संदेश है आपस में एक-दूसरे के दृष्टिकोण तथा विचारों का सम्मान करना तथा स्वयं की समृद्धि +के लिए उन्हें एकजुट करना। +भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण. +भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाला एक अग्रणी अनुसंधान +संगठन है। यह अपनी स्थापना के 59 वर्ष पूरे कर चुका है और अपने गौरवपूर्ण कार्यकाल में सामान्य तौर +पर जनता के और विशेषकर “अत्यधिक कमज़ोर” कहे जाने वाले वर्गों के जैव-सांस्कृतिक पहलुओं के +क्षेत्रों में मानव विज्ञान संबंधी अनुसंधान में प्रयासरत रहा है। इनके अलावा सर्वेक्षण कई अन्य समयसंगत +गतिविधियों में लगा है जिनमें नृवंश सामग्री और प्राचीन मानव कंकाल अवशेषों को एकत्र करना, उनका +संरक्षण करना, उनकी देखरेख करना, उनके बारे में आंकड़े तथा दस्तावेज तैयार करना और उनका +अध्ययन करना शामिल हैं। इन वर्षों में सर्वेक्षण ने कोलकाता स्थित अपने मुख्यालय और सात क्षेत्रीय +केंद्रों, एक उपक्षेत्रीय केंद्र, तथा आठ अन्य क्षेत्रीय स्टेशनों और नई दिल्ली के अपने कैंप कार्यालय की +मदद से निरंतर अनुसंधान करते हुए गांव स्तर से जानकारियां एकत्र की हैं। +दसवीं योजना के दौरान राष्ट्रीय परियोजनाओं-जीवमंडल रिज़र्व में पर्यटन के सांस्कृतिक आयाम +और पर्यटकों की रूचि के स्थलों-के बारे में शोधकार्य किया जा रहा है। +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण. +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना सन् 1861 में हुई थी और यह पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के +अंतर्गत संस्कृति विभाग के संलग्न कार्यालय के रूप में कार्य करता है। इस विभाग के प्रमुख महानिदेशक +होते हैं। +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की प्रमुख गतिविधियां निम्नलिखित हैं — +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अपने 21 मंडलों और 3 मिनी मंडलों के जरिए अपने संरक्षण वाले स्मारकों का बचाव और संरक्षण करता है। +प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल व अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत भारतीय पुरातत्व +सर्वेक्षण ने देश में 3656 स्मारकों/स्थलों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया है जिनमें 21 संपत्तियां +यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। एक सौ चवालीस (144) वर्ष पहले हुई अपनी स्थापना +के बाद से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण बहुत विशाल संगठन का आकार ले चुका है और समूचे देश में +इसके कार्यालयों, शाखाओं और मंडलों का जाल फैला है। +गुजरात का पावगढ़ पार्क, मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (जो पहले विक्टोरिया टर्मिनल था) +रेलवे स्टेशन और गंगाकोंडाचोलापुरम का बृहदेश्वर तथा दारासुरम का ऐरावतेश्वरैया मंदिर (जो तंजावूर +के बृहदेश्वर मंदिर परिसर का विस्तार है और महान चोला मंदिरों के नाम से विख्यात हैं) यूनेस्को द्वारा +2004 में विश्व सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल किए गए हैं। यूनेस्को की इस सूची में सम्मिलित +कराने के उद्देश्य से विश्व धरोहर केंद्र के पास निम्नलिखित स्थलों के विवरण भेजे गए हैं — +(i) पंजाब में अमृतसर का हरमिंदर साहब (स्वर्ण मंदिर); +(ii) असम में ब्रह्मपुत्र नदी की मध्यधारा में स्थित माजुली द्वीपसमूह; +(iii) उत्तराखंड में नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान का विस्तार “फूलों की घाटी”; +(iv) दिल्ली का लाल किला; और +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कुल पांच हजार से यादा स्मारकों और ढांचों की देखरेख कर रहा है। +जलगत पुरातत्व शाखा. +देश के भीतर या सीमावर्ती सागर क्षेत्र में पानी के नीचे मौजूद सांस्कृतिक धरोहर की खोज, अध्ययन और +संरक्षण जलगत पुरातत्व शाखा के मुख्य कार्य हैं। यह शाखा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में खोज +तथा खुदाई करती है। +विज्ञान शाखा. +सर्वेक्षण की विज्ञान शाखा का मुख्यालय देहरादून में है और इसकी क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं देशभर में हैं। यह +शाखा स्मारकों, प्राचीन सामग्रियों, पांडुलिपियों, पेंटिंग्स, आदि के रासायनिक संरक्षण का दायित्व +संभालती है। +देहरादून स्थित विज्ञान शाखा की प्रयोगशालाओं ने निम्नलिखित वैज्ञानिक परियोजनाएं हाथ में ली +हैं— (i) पत्थर, टेराकोटा, और ईंट से बने ढांचों पर संरक्षणात्मक कोटिंग करने और उन्हें मजबूत बनान के +लिए नई सामग्री की खोज; (ii) प्राचीन चूना पलस्तर के संरक्षण के बारे में वैज्ञानिक अध्ययन, और (iii) +त्वरित सख्त होने वाले पलस्तर सीमेंट के विभिन्न अनुपातों में उसकी भौतिक विशेषताओं का आकलन। +बागवानी शाखा. +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की बागवानी शाखा देश के विभिन्न भागों में स्थित केंद्र सरकार के संरक्षण वाले +करीब 287 स्मारकों/स्थलों में बगीचों और उद्यानों की देखभाल करती है। यह शाखा दिल्ली, आगरा, +श्रीरंगपट्टन और भुवनेश्वर में आधार-नर्सरियां विकसित करके इन बगीचों, उद्यानों के लिए मौसमानुसार +पौधे उपलब्ध कराती है। +पुरालेख शास्त्र शाखा. +मैसूर स्थित पुरालेख शास्त्र शाखा संस्कृत और द्रविड़ भाषाओं में शोधकार्य करती है जबकि नागपुर स्थित +शाखा अरबी और फारसी में शोधकार्य करती है। +विदेशों में अभियान. +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने विदेश मंत्रालय के अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन आदान-प्रदान कार्यक्रम (आईटीईसी) +के अंतर्गत कंबोडिया में “ता प्रोह्म” के संरक्षण की परियोजना शुरू की है जिसके लिए 19 करोड़ 51 +लाख रूपये का प्रावधान किया गया है। यह संरक्षण परियोजना भारत के प्रधानमंत्री द्वारा अप्रैल और +नवंबर, 2002 में अपनी कंबोडिया यात्रा के दौरान “प्रसात ता प्रोह्म” के संरक्षण और बहाली के बारे में +वहां की सरकार के अनुरोध पर दिए आश्वासन को पूरा करने के लिए शुरू की गई है। यह संरक्षण +परियोजना दस वर्ष की है और इसे पांच चरणों में पूरा किया जाएगा। +भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यह संरक्षण परियोजना जनवरी, 2004 में शुरू कर दी थी परंतु इसे +कंबोडिया में फरवरी, 2004 में विधिवत् आरंभ किया गया। +भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार. +भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार स्वतंत्रता से पहले इंपीरियल रिकार्ड विभाग के तौर पर 11 मार्च, 1891 को +कोलकाता में स्थापित किया गया था परंतु अब यह अभिलेखागार के रूप में नई दिल्ली में काम कर रहा +है। यह भारत सरकार और उसकी पूर्ववर्ती हुकूमतों के स्थायी महत्व वाले सभी अभिलेखों का सरकारी +संरक्षक है। इसका क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल में है और भुवनेश्वर, पांडिचेरी तथा जयपुर में इसके रिकार्ड +केंद्र हैं। +अभिलेखागार की मुख्य गतिविधियां हैं- +(1) विभिन्न सरकारी एजेंसियों और शोधकर्ताओं को रिकार्ड उपलब्ध कराना, +(2) संदर्भ मीडिया तैयार करना, +(3) उक्त उद्देश्य के लिए वैज्ञानिक जांच-पड़ताल का संचालन और अभिलेखों की सार-संभाल करना, +(4) अभिलेख प्रबंधन कार्यक्रम का विकास करना, +(5) अभिलेखों के संरक्षण में लगे व्यक्तियों और संस्थानों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना, +(6) पेशेवर और उप-पेशेवर स्तर पर पांडुलिपियों, पुस्तकों और अभिलेखों के संरक्षण, प्रबंधन और प्रकाशन के क्षेत्र में प्रशिक्षण देना, और +(7) देश में विभिन्न विषयों पर प्रदर्शनियां आयोजित करके अभिलेखों के प्रति जागरूकता बढ़ाना। +राष्ट्रीय अभिलेखागार राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, स्वैच्छिक संगठनों और अन्य संस्थानों को आर्थिक +सहायता देता है ताकि अभिलेख संबंधी विरासत की हिफाजत की जा सके और अभिलेख विज्ञान का +विकास हो। +राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन. +हमारी सांस्कृतिक विरासत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं पांडुलिपियां। इनके संरक्षण के उद्देश्य से ही +सांस्कृतिक मंत्रालय ने 2 फरवरी, 2003 में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का शुभारंभ किया। यह मिशन पांच +वर्ष की महत्वाकांक्षी योजना है और इसके अंतर्गत सिर्प पुस्तक सूचियों को खोजकर भारत की +पांडुलिपियों का संरक्षण ही नहीं किया जाता बल्कि शैक्षिक उद्देश्यों के लिए उन तक आसानी से पहुंच +उपलब्ध कराने, जागरूकता बढ़ाने और बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जाता है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन +की वेबसाइट www.namami.nic.in है। +राष्ट्रीय संग्रहालय. +राष्ट्रीय संग्रहालय की स्थापना 1949 में की गई थी और 1960 के बाद से यह संस्कृति मंत्रालय के +अधीनस्थ कार्यालय के रूप में काम कर रहा है। इसमें प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक की दो +लाख साठ हजार से ज्यादा वस्तुएं संग्रहीत हैं। वर्ष 2004-05 के दौरान कुल 1,95,083 लोग इस +संग्रहालय को देखने पहुंचे थे। इसकी मुख्य गतिविधियां हैं — +प्रदर्शनियां लगाना, वीथियों का पुनर्गठन/आधुनिकीकरण, शैक्षिक गतिविधियां व आउटरीच कार्यक्रम, +जनसंपर्क, प्रकाशन, फोटो प्रलेखन, ग्रीष्मावकाश कार्यक्रम, स्मारक भाषणमालाएं, संग्रहालय कॉर्नर, फोटो +यूनिट, मॉडलिंग यूनिट, पुस्तकालय, संरक्षण प्रयोगशाला और अध्यापन कार्यशाला चलाना। +कला, संरक्षण व संग्रहालय विज्ञान के इतिहास का राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान. +कला, संरक्षण व संग्रहालय विज्ञान के इतिहास का राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान नई दिल्ली में है। यह +स्वायत्त संगठन है और इसके लिए धन का पूरा प्रबंध संस्कृति मंत्रालय करता है। 1989 में उसे +समकक्ष विश्वविद्यालय घोषित किया गया था। यह भारत का एकमात्र संग्रहालय/विश्वविद्यालय है और +इस समय इसका कार्यालय नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय के प्रथम तल पर है। इसकी नियमावली +(मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन) के अनुसार राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक इस विश्वविद्यालय के +पदेन कुलपति हैं। +(क) कला इतिहास, संरक्षण और संग्रहालय विज्ञान के क्षेत्रों में एम.ए. और पीएच.-डी. की उपाधियों +के लिए विशेषज्ञ शिक्षण व प्रशिक्षण उपलब्ध कराना। +(ख) भारतीय संस्कृति को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से यह संस्थान कुछ अल्पावधि पाठ्यक्रम चलाता +है-भारत कला व साहित्य, कला मूल्यांकन और भारतीय कलानिधि (हिंदी माध्यम)। +(ग) इन क्षेत्रों में नई संभावनाओं के विकास के लिए उपयुक्त ढंग से संगोष्ठियां/कार्यशालाएं, सम्मेलन +और विशेष व्याख्यान आयोजित करना। +राष्ट्रीय पुस्तकालय. +राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता की स्थापना 1948 में इंपीरियल लाइब्रेरी (नाम परिवर्तन) अधिनियम, +1948 पारित करके की गई थी। इस पुस्तकालय को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान का दर्जा प्राप्त है। इसकी +मुख्य गतिविधियाँ हैं — +(i) राष्ट्रीय महत्व की प्रत्येक मुद्रित सामग्री (एकदिवसीय प्रकाशनों को छोड़कर) तथा सभी +पांडुलिपियां प्राप्त करके उनका संरक्षण करना; +(ii) देश से संबंधित मुद्रित सामग्री एकत्र करना चाहे वह कहीं भी प्रकाशित की गई हो; +(iii) सामान्य एवं विशिष्ट दोनों प्रकार की सामयिक व पुरानी सामग्री के संदर्भ में गं्रथ सूची और +प्रलेखन सेवाएं उपलब्ध कराना (इसमें देश से संबद्ध विभिन्न पहलुओं पर चालू राष्ट्रीय +ग्रंथसूचियां तथा पूर्वसमय की ग्रंथसूचियां तैयार करने की जिम्मेदारी भी शामिल है।); +(iv) ग्रंथ सूची जानकारी के सभी सूत्रों के पूरी और सही जानकारी देने वाले संदर्भ केंद्र की भूमिका +निभाना और अंतर्राष्ट्रीय ग्रंथसूची निर्माण गतिविधियों में हिस्सा लेना; +(v) पुस्तकों के अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान तथा देश के भीतर पुस्तकें देने वाले केंद्र की भूमिका +निभाना। +केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय. +केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय की स्थापना वर्ष 1891 में कोलकाता में इंपीरियल सेक्रेटेरिएट लाइब्रेरी के +नाम से की गई थी और 1969 से यह नई दिल्ली के शास्त्री भवन में काम कर रहा है। इसमें सात लाख +से अधिक दस्तावेज़ों का संग्रह है जो मुख्य रूप से समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के विषयों पर हैं। यहां +भारत के सरकारी दस्तावेज तथा केंद्र सरकार के दस्तावेज़ संग्रहीत किए जाते हैं और राज्य सरकारों के +दस्तावेज़ों का भी विशाल संग्रह इसमें है। +इसके क्षेत्र अध्ययन डिवीज़न में अनूठा संग्रह है, वहां भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार पुस्तकें रखी गई +हैं। साथ ही, इसका ग्रंथ सूची संग्रह भी बहुत विशाल है और इसमें अत्यधिक दुर्लभ पुस्तकों का खासा +संग्रह है। +केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय का माइक्रोफिल्म संग्रह भी है जो माइक्रोफिल्मिंग ऑफ इंडियन +पब्लिकेशन प्रोजेक्ट के अंतर्गत काम करता है और इसमें बहुत बड़ी संख्या में माइक्रो-फिल्में संग्रहीत हैं। +केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय की मुख्य जिम्मेदारी है नीति निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए +उपयोगी सभी विषयों के सकल संग्रह एकत्र करना और उन्हें विकसित करना तथा विकासपरक साहित्य +का संग्रह एकत्र करना भी इसका दायित्व है। यह पुस्तकालय केंद्र सरकार के अधिकारियों और +कर्मचारियों तथा देशभर से आने वाले शोधार्थियों को वाचन संबंधी सभी सेवा-सुविधाएं उपलब्ध कराता +है। हाल में ही पुस्तकालय ने भारत के राजपत्र तथा समितियों और आयोगों की रिपोर्टों का डिजिटलीकरण +करके सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) आधारित उत्पादों का विकास शुरू किया है और अपने संग्रह-कार्य के +लिए ओपाक (ओपीएसी) प्रणाली भी विकसित की है। +पुस्तकालय की दो शाखाएं हैं। पहली है नई दिल्ली के बहावलपुर हाउस में स्थित क्षेत्रीय +भाषाओं की शाखा जो तुलसी सदन लाइब्रेरी के नाम से मशहूर है। इसमें हिंदी तथा संविधान में +स्वीकृत 13 अन्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं की पुस्तकें हैं। दूसरी शाखा पाठ्यपुस्तकों की है और नई +दिल्ली के रामकृष्णपुरम में स्थित है। यह केंद्र सरकार के कर्मचारियों के स्नातक-स्तर तक के बच्चों +की जरूरतों को पूरा करती है। +पुस्तकालय ने हाल ही में “इंडिया इन्फार्मेशन गेटवे” पोर्टल शुरू किया है। 21 मार्च, 2005 को +सचिव, संस्कृति मंत्रालय ने पुस्तकालय की वेबसाइट http://www.csl.nic.in का उद्घाटन किया। +सांस्कृतिक संसाधन व प्रशिक्षण केंद्र. +सांस्कृतिक संसाधन व प्रशिक्षण केंद्र संस्कृति से शिक्षा को जोड़ने के क्षेत्र में कार्यरत अग्रणी संस्थानों में +से है। इस केंद्र की स्थापना मई, 1979 में भारत सरकार द्वारा एक स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी +और अब यह भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहा है। इसका +मुख्यालय नई दिल्ली में है तथा उदयपुर और हैदराबाद में इसके दो क्षेत्रीय केंद्र हैं। +इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों में भारत की क्षेत्रीय संस्कृतियों की विविधता के प्रति समझ +और जागरूकता पैदा करके शिक्षा प्रणाली को सशक्त बनाना और इस जानकारी का शिक्षा के साथ +समन्वय स्थापित करना है। खासज़ोर शिक्षा और संस्कृति के बीच तालमेल कायम करने और विद्यार्थियों +को सभी विकास कार्यक्रमों में संस्कृति के महत्व से अवगत कराने पर है। केंद्र के प्रमुख कार्यों में देश के +विभिन्न भागों से चुने गए अध्यापकों के लिए कई प्रकार के इन सर्विस प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना भी +शामिल है। इस प्रकार दिए जाने वाले प्रशिक्षण का लाभ यह होता है कि पाठ्यक्रम पढ़ाने वालों में +भारतीय कला और साहित्य के दर्शन, सौंदर्य तथा बारीकियों की बेहतर समझ विकसित होती है और वे +इनका अधिक सार्थक आकलन कर पाते हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में संस्कृति के पहलू पर यादाज़ोर +दिया जाता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी, आवास, कृषि, खेल, आदि के क्षेत्रों में संस्कृति की भूमिका पर +भीज़ोर दिया जाता है। प्रशिक्षण एक अहम अंग है विद्यार्थियों और शिक्षकों में पर्यावरण प्रदूषण की +समस्याओं के समाधान तथा प्राकृतिक व सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण में उन्हें उनकी भूमिका से अवगत +कराना। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए केंद्र देशभर में अध्यापकों, शिक्षाविदों, प्रशासकों और विद्यार्थियों के +लिए विविध प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करता है। +सांस्कृतिक संसाधन व प्रशिक्षण केंद्र विशेष अनुरोध पर विदेशी शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के लिए +भारतीय कला और संस्कृति के बारे में शिक्षण कार्यक्रम भी चलाता है। नाटक, संगीत और अभिव्यक्ति- +प्रधान कला विधाओं से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं ताकि कलाओं +और हस्तकलाओं का व्यावहारिक ज्ञान और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा सके। इन कार्यशालाओं में +शिक्षकों को ऐसे कार्यक्रम स्वयं विकसित करने की प्रेरणा दी जाती है जिनमें कला की विधाओं का +शिक्षण पाठ्यक्रमों के लिए लाभकारी ढंग से प्रयोग किया जा सके। +सांस्कृतिक संसाधन व प्रशिक्षण केंद्र अपने विस्तार तथा सामुदायिक फीडबैक कार्यक्रमों के तहत +स्कूली छात्रों, अध्यापकों और सरकारी तथा स्वैच्छिक संगठनों के बच्चों के लिए विभिन्न शैक्षिक +गतिविधियां आयोजित करता है जिनमें ऐतिहासिक स्मारकों, संग्रहालयों, कलावीथियों, हस्तकला केंद्रों, +चिडि़याघरों और उद्यानों में शिक्षा टूर; प्राकृतिक और सांस्कृतिक संपदाओं के संरक्षण के बारे में शिविर; +स्थानीय तौर पर उपलब्ध कम लागत वाली सामग्री की मदद से हस्तकलाएं सिखाने के लिए शिविर; +कला की विभिन्न विधाओं पर जानेमाने कलाकारों व विशेषज्ञों के भाषण और प्रदर्शन तथा स्कूलों में +कलाकारों और हस्तशिल्पियों के प्रदर्शन शामिल हैं। इन शैक्षिक गतिविधियों में विद्यार्थियों के बौद्धिक +विकास और उनके सौंदर्य बोध को विकसित करने पर जोर दिया जाता है। +इन वर्षों में यह केंद्र आलेख, रंगीन स्लाइड्स, चित्र, ऑडियो और वीडियो रिकार्डिंग और फिल्मों के +रूप में संसाधन एकत्र करता रहा है। ग्रामीण भारत की कलाओं और हस्तशिल्पों को पुनर्जीवित करने और +उन्हें प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से केंद्र की डॉक्यूमेंटेशन टीम हर वर्ष देश के विभिन्न भागों में कार्यक्रम आयोजित +करती है। यह केंद्र भारतीय कला एवं संस्कृति की समझ विकसित करने के उद्देश्य से प्रकाशन भी उपलब्ध +कराता है। सांस्कृतिक संसाधन व प्रशिक्षण केंद्र के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है +सांस्कृतिक प्रतिभा खोज छात्रवृत्ति योजना को क्रियान्वित करना केंद्र का एक महत्वपूर्ण कार्य है, जिसे +संस्कृति विभाग ने 1982 में शुरू किया था। इस योजना के तहत 10 से 14 वर्ष की आयु के उन होनहार बच्चों +को छात्रवृत्तियां दी जाती हैं जो या तो मान्यताप्राप्त स्कूलों में पढ़ते हैं या पारंपरिक कलाओं में लगे परिवारों से +हैं जिससे उनकी प्रतिभा को कलाक्षेत्र में और विशेषकर दुर्लभ कलाविधाओं के क्षेत्र में विकसित किया जा +सके। ये छात्रवृत्तियां 20 वर्ष की आयु तक अथवा विश्वविद्यालय की डिग्री लेने तक चलती हैं। हर वर्ष करीब +350 छात्रवृत्तियां दी जाती हैं। +सांस्कृतिक संसाधन व प्रशिक्षण केंद्र ने सीसीआरटी शिक्षक पुरस्कार आरंभ किया है जो हर वर्ष +शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले शिक्षकों को प्रदान किया जाता है। इस +पुरस्कार में प्रशस्तिपत्र, स्मृति पट्टिका, अंगवस्त्रम और 10,000 रूपये दिए जाते हैं। +क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र. +क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना के पीछे प्रादेशिक और क्षेत्रीय सीमाओं के आरपार सांस्कृतिक +भ्रातृत्व की भावना को उभारने का उद्देश्य था। असल उद्देश्य तो स्थानीय संस्कृतियों के प्रति गहन +जागरूकता पैदा करना और यह दिखाना है कि ये संस्कृतियां किस प्रकार क्षेत्रीय पहचान से घुलमिल +जाती हैं तथा अंतत— भारत की समृद्ध विविधतापूर्ण संस्कृति में समाहित हो जाती हैं। ये केंद्र समूचे देश +में संस्कृति को बढ़ावा देने, उसका संरक्षण करने और उसका विस्तार करने वाली अग्रणी संस्था का दर्जा +अर्जित कर चुके हैं। ये मंचन कलाओं को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ साहित्य तथा दृश्य कलाओं के +संबद्ध क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान कर रहे हैं। इस योजना के अंतर्गत 1985-86 में पटियाला, +कोलकाता, तंजावुर, उदयपुर, इलाहाबाद, दीमापुर और नागपुर में सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र स्थापित +किए गए थे। इन क्षेत्रीय केंद्रों की संरचना की खास विशेषता यह है कि राज्य अपने सांस्कृतिक संपर्कों +के अनुसार एक से यादा केंद्रों में शामिल हो सकते हैं। मंत्रिमंडल की स्वीकृति से प्रत्येक क्षेत्रीय +संस्कृति केंद्र के लिए अलग-अलग सहायता (कॉर्पस) कोष स्थापित किया गया था जिसमें केंद्र सरकार +और संबद्ध राज्य सरकारें अंशदान करती हैं और इस कोष में जमा राशि पर मिलने वाले ब्याज से इन +केंद्रों की गतिविधियों का खर्च वहन किया जाता है। भारत सरकार ने प्रत्येक केंद्र को पांच करोड़ रूपये +का अनुदान दिया और संबद्ध राज्य सरकार ने एक करोड़ रूपये दिए। यदि कोई राज्य एक से ज्यादा केंद्रों +का सदस्य होगा तो उसका कुल अंशदान एक करोड़ रूपये से ज्यादा नहीं होगा। ये क्षेत्रीय संस्कृति केंद्र +1993 से हर वर्ष गणतंत्र दिवस पर होने वाले लोकनृत्य समारोह में भाग लेने के लिए अपने +लोककलाकारों को भेजते हैं। भारत के राष्ट्रपति 24/25 जनवरी को तालकटोरा इनडोर स्टेडियम में इस +समारोह का उद्घाटन करते हैं। इस समारोह के माध्यम से लोक कलाकारों को राष्ट्रीय मंच पर अपनी +कला प्रदर्शित करने का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है। गणतंत्र दिवस लोकनृत्य समारोह के साथ ही +विभिन्न क्षेत्रों में हस्तशिल्प मेला भी लगाया जाता है। इस हस्तशिल्प मेले में विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृति +केंद्रों के जानेमाने कुशल हस्तशिल्प और कारीगर भाग लेते हैं। हस्तशिल्प मेले के माध्यम से देश के +विभिन्न भागों के हस्तशिल्पियों और कारीगरों को अपने उत्पाद ग्राहकों के समक्ष प्रदर्शित करने और +उनके सामने ही इन उत्पादों की निर्माण प्रक्रिया दिखाने का अनोखा अवसर प्राप्त होता है। ये क्षेत्रीय +सांस्कृतिक केंद्र विभिन्न लोक व जनजातीय कलाओं तथा खासतौर पर दुर्लभ एवं लुप्त होती कलाविधाओं +के प्रलेख तैयार करने पर विशेष ध्यान देते हैं। राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत देश +के विभिन्न क्षेत्रों के कलाकारों, संगीतकारों और विद्वानों का आदान-प्रदान किया जाता है। इससे देश के +विभिन्न भागों में जनजातीय/लोक कला-विधाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने में बहुत ज्यादा मदद मिली है +और इस प्रकार विविधता में एकता की हमारी भावना और मजबूत हुई है। रंगमंच के कलाकारों, +विद्यार्थियों, कलाकारों, निर्देशकों और लेखकों को साझे मंच पर काम करने और परस्पर एक-दूसरे को +देखने-समझने का अवसर जुटाने के उद्देश्य से भी एक योजना चलाई जा रही है। संगीत और नृत्य के क्षेत्र +में नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए “गुरू-शिष्य परंपरा” योजना है जिसके अंतर्गत हर क्षेत्र में +गुरूओं की पहचान करके शिष्य उनके सुपुर्द कर दिए जाएंगे। इस उद्देश्य के लिए उन्हें छात्रवृत्ति भी दी +जाती है। अपने शिल्पग्रामों के माध्यम से ये केंद्र हस्तशिल्पियों को बढ़ावा देकर उन्हें हाट-सुविधाएं +उपलब्ध कराते हैं। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों ने युवा प्रतिभाओं की पहचान करके इन्हें प्रोत्साहन देने की +एक नई योजना भी शुरू की है जिसके तहत ये केंद्र अपने-अपने क्षेत्र में मंचन/लोक कलाकारों का पता +लगाएंगे और हर क्षेत्र में एक या प्रतिभाशाली कलाकारों का चुनाव करेंगे। +राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथि. +राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथि नई दिल्ली में स्थित है और इसकी स्थापना 1954 में की गई थी। इसका +मुख्य उद्देश्य समसामयिक भारतीय कला को प्रोत्साहन देना और उसका विकास करना है। इस कलावीथि +में करीब 1748 समकालीन भारतीय कलाकारों की विभिन्न विषयों पर 17858 कृतियों का संग्रह +है। इस संग्रह के लिए मुख्य रूप से कलाकृतियां खरीदी गई हैं और उपहार में प्राप्त हुई कृतियां भी +शामिल हैं। यहां के महत्वपूर्ण संग्रहों में पेंटिंग्स, मूर्तियां, लिपिविज्ञान की कृतियां, रेखाचित्र तथा चित्र +शामिल हैं। राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथि सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के तहत समय-समय पर +अपने संग्रह की प्रदर्शनियां भी आयोजित करता है। अनेक रंगीन प्रतिकृतियां भी प्रकाशित की गई हैं। इस +कला वीथि का असल उद्देश्य लोगों में आधुनिक कला के कार्यों के प्रति बेहतर समझ और अनुभूति +विकसित करना है। इसे ध्यान में रखते हुए 1996 में मुंबई की राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथि का उद्घाटन +किया गया था और एक नई कला वीथि बंगलुरू में बनाई जा रही है। +इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र. +इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र देश में कला और संस्कृति से जुड़ी जानकारी एकत्र करने और इनके साथ +ज्ञान और जीवन के अन्य विभिन्न विषयों का संबंध जानने की दिशा में प्रयासशील प्रमुख राष्ट्रीय संस्थान +है। इसकी स्थापना दिवंगत प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की स्मृति में 1985 में की गई थी। इसकी +बहुआयामी गतिविधियों में अनुसंधान, प्रकाशन, प्रशिक्षण, प्रलेखन, वितरण और नेटवर्किंग शामिल हैं। +यह भारत में कलाओं से संबद्ध जानकारी का विशाल भंडार बनने वाला है। यह विभिन्न कलाओं के +बीच, कलाओं और विज्ञानों के बीच, कलाओं और पारंपरिक तथा वर्तमान प्रणालियों के बीच रचनात्मक +और विश्लेषणात्मक आदान-प्रदान का मंच उपलब्ध करा कर प्राकृतिक व मानवीय परिवेश के भीतर ही +कलाओं को समाहित करना चाहता है। यह केंद्र विविध समुदायों, क्षेत्रों, सामाजिक वर्गों तथा भारत और +विश्व के अन्य भागों में परस्पर आदान-प्रदान तथा आपसी सूझबूझ बढ़ाता है। +इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को कला, मानव-विज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर का राष्ट्रीय डाटा +बैंक स्थापित करने वाली केंद्रीय मूल एजेंसी का दर्जा दिया गया। इसकी एक बड़ी पहल है सांस्कृतिक +आसूचना प्रयोगशाला की स्थापना जो मल्टीमीडिया और डिजिटल टेक्नोलॉजी के माध्यम से कला से +संबद्ध सभी क्षेत्रों के बारे में विविध माध्यमों तक पहुंचने के तरीके निकालने के लिए समन्वित पद्धति +अपना रही है। मोटे तौर पर इस प्रयोगशाला की प्रमुख गतिविधियों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता +है-डिजिटलीकरण, वेब-आधारित डिजिटल पुस्तकालय और सीड्रॉम/डीवीड्रॉम परियोजना। +सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला. +1976 में स्थापित सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला संस्कृति विभाग का +अधीनस्थ कार्यालय है और विज्ञान व प्रौद्योगिक विभाग द्वारा इसे भारत सरकार के वैज्ञानिक संस्थान के +रूप में मान्यता प्राप्त है। इस प्रयोगशाला का उद्देश्य और लक्ष्य है देश में सांस्कृतिक संपदा का संरक्षण +करना। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए यह प्रयोगशाला संग्रहालयों, अभिलेखागारों, पुरातत्व विभागों और +इसी प्रकार के अन्य संस्थानों को संरक्षण सेवाएं तथा तकनीकी परामर्श उपलब्ध कराती है; संरक्षण के +विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षण देती है; संरक्षण के तरीकों और सामग्री के बारे में अनुसंधान करती है; +संरक्षण संबंधी जानकारी का प्रचार-प्रसार करती है और देश में संरक्षण से जुड़े विषयों पर पुस्तकालय +सेवाएं मुहैया कराती है। इस राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला का मुख्यालय लखनऊ में है तथा दक्षिण राज्यों +में भी संरक्षण के बारे में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से मैसूर में राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशाला के +क्षेत्रीय केंद्र के रूप में क्षेत्रीय संरक्षण प्रयोगशाला काम कर रही है। अधिक जानकारी के लिए राष्ट्रीय +अनुसंधान प्रयोगशाला की वेबसाइट http://www/nrlccp.org देखें। + +रक्षा: +21वीं शताब्दी के प्रथम दशक में इस बात के साक्ष्य उत्तरोत्तर बढ़ते रहे हैं कि सीमाएं इन सुरक्षा +खतरों को रोक सकने में अक्षम रही हैं। भारत का हर पड़ोसी एक संक्रमण से गुज़र रहा है जिससे +विभिन्न राजनीतिक अनुभवों एवं प्रयोगों की उत्पत्ति हो रही है। आतंकवाद और हथियार, ड्रग्स एवं +आणविक तकनीक का विस्तार $खतरे उत्पन्न कर रहा है जिस पर ध्यान दिए जाने कीज़रूरत है। +वर्ष 2008 के विकासों ने, विशेषकर वैश्विक आर्थिक प्रणाली की चुनौतियों ने वैश्विक पर्यावरण +की सुरक्षा में अपूर्व तनावों को उत्पन्न किया है। +उग्रवादी और आतंकी संगठनों के साथ पाकिस्तान के सम्मिलन ने महानतम जटिलताओं और खतरों +को उत्पन्न किया है जिससे हमें दो चार होना पड़ रहा है। इसलिए आंतरिक और सीमाओं दोनों स्तरों पर +हमारे सुरक्षा उपकरणों की मजबूती सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता है। +चीन के सुदूर जल में अभियानों के संचालन के लिए समुद्री बेड़े और सामरिक मिसाइल तथा +आकाशीय प्रक्षेपास्त्रों का विस्तार, साथ ही साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में क्रमिक ढांचागत विकास, गहन सर्वेक्षण +और निगरानी। चौकसी, त्वरित प्रतिक्रिया और अभियानात्मक क्षमताओं की बढ़ोत्तरी के अपने श्वेतपत्र में +घोषित उद्देश्यों के, भारत की रक्षा-सुरक्षा पर निकट भविष्य में पड़ने वाले प्रभावों के मद्देनजर, सजग जांच- +पड़ताल कीज़रूरत है। वैसे ही पाकिस्तान के साथ इसका सहयोग और इसकी सैन्य सहायता, जिसमें जम्मू- +कश्मीर राज्य के अवैध पाकिस्तानी कब्जे वाले भू-भाग के जरिये पाकिस्तान से संपर्क बढ़ाए जाने की +संभावना भी शामिल है, का भारत पर सीधा सैन्य-प्रभाव पड़ेगा। +भारत की विश्वसनीय न्यूनतम भयकारी/ हतोत्साहन की नीति का क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में +महत्वपूर्ण योगदान है। न्यूनतम हतोत्साहन की स्थिति रखते हुए भारत ने “प्रथम-प्रयोग-नहीं” की नीति एवं +गैर-परमाणु हथियार वाले देशों के लिए “प्रयोग-नहीं” की नीति की घोषणा की है। साथ ही, भारत स्वैक्षिक +रूप से आणविक परीक्षण के एकपक्षीय विलंबन/स्थगन की स्थिति भी बनाए रखता है। +आवर्धित समुद्री सुरक्षा को लंबी तटरेखा की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए जो पश्चिम में अरब +सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी एवं दक्षिण में विशाल हिंद महासागर से लगी हुई है। +हाल के कुछ वर्षों में, जहाजरानी मुद्दे जैसे-समुद्री-पथों की सुरक्षा, गहरे समुद्र में लूट-पाट, उर्जा- +सुरक्षा, डब्ल्युएमडी, आतंकवाद आदि भारत की सुरक्षा में महत्वपूर्ण तत्व बन गए हैं। भारतीय नौ-सेना +ने हिंद महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्री लूट-पाट के नियंत्रण में अहम भूमिका निभाई है। मुंबई के आतंकी +हमलों ने एक बार फिर भारत की सुरक्षा में जहाजरानी-आयाम की महत्ता को विशिष्टता प्रदान की है। +संगठन. +रक्षा मंत्रालय का प्रमुख काम है रक्षा और सुरक्षा संबंधी सभी मामलों पर सरकार से निर्देश प्राप्त करना +और सशस्त्र बलों के मुख्यालयों, अंतर-सेना संगठनों, रक्षा उत्पादन प्रतिष्ठानों और अनुसंधान एवं विकास +संगठनों तक कार्यान्वयन के लिए उन्हें पहुंचाना। सरकार के नीति-निर्देशों को प्रभावी ढंग से तथा +आवंटित संसाधनों का ध्यान रखकर उन्हें कार्यान्वित करना भी उसका काम है। विभाग के प्रमुख कार्य +इस प्रकार हैं- +(i) रक्षा विभाग एकीकृत रक्षा स्टाफ और तीनों सेनाओं तथा विभिन्न अंतर-सेवा संगठनों की +जिम्मेदारियों का वहन करता है। रक्षा बजट, स्थापना कार्य, रक्षा नीति, संसद से जुड़े मुद्दे, बाहरी देशों +के साथ रक्षा सहयोग तथा समस्त क्रियाकलापों का समन्वय इसी विभाग के दायित्व हैं। +(ii) रक्षा उत्पादन विभाग का प्रमुख सचिव इसका प्रमुख होता है और यह रक्षा उत्पादन, आयातित +भंडार के स्वदेशीकरण, उपकरणों और अतिरिक्त कलपुर्जों तथा हथियार कारखाना बोर्ड और सार्वजनिक +क्षेत्र के रक्षा उद्यमों की विभागीय उत्पादन इकाइयों के नियंत्रण संबंधी कार्यों को निपटाता है। +(iii) रक्षा, शोध तथा विकास विभाग का प्रमुख सचिव होता है जो रक्षा मंत्री का सलाहकार भी होता +है। इसका काम सैनिक साजो-सामान के वैज्ञानिक पक्ष, संचालन तथा सेना द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले +उपकरणों से संबंधित शोध, डिजाइन और विकास योजनाएं बनाना है। +(iii) भूतपूर्व सैनिक/रक्षाकर्मी कल्याण विभाग का प्रमुख एक अतिरिक्त सचिव होता है इसके जिम्मे +पेंशनयाफ्ता भूतपूर्व सैनिकों, भूतपूर्व कर्मचारी स्वास्थ्य योजना, पुन—नियोजन और केंद्रीय सैनिक बोर्ड +महानिदेशालय तथा तीनों रक्षा सेवाओं के पेंशन नियमों से जुड़े मुद्दों का निष्पादन है। +करगिल समिति की रिपोर्ट के आधार पर मंत्रियों के समूह द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार 1 अक्टूबर, +2001 को इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) की स्थापना की गई। आईडीएस के लिए स्टाफ तीन सेनाओं, +एमईए, डीआरडीओ, सशक्त सेना मुख्यालय, सिविल सेवाओं तथा रक्षा विभाग से मुहैया कराया गया है। +वर्तमान में इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ सीओएससी के सलाहकार के रूप में कार्यरत है। वर्तमान में आईएसडी +अध्यक्ष सीओएससी के सलाहाकार स्टाफ के रूप में कार्य कर रहा है। +तीनों सेनाओं के मुख्यालय-यानी थल सेना मुख्यालय, नौसेना मुख्यालय और वायु सेना मुख्यालय +थल सेना प्रमुख (सीओएएस) नौसेना प्रमुख (सीएनएस) और वायुसेना प्रमुख (सीएएस) के अधीन काम +करते हैं। इनकी सहायता के लिए प्रधान स्टाफ अधिकार (पीएसओ) होते हैं। चिकित्सा सहायता, जन संपर्क +और रक्षा मुख्यालय में सिविलियन स्टाफ के कार्मिक प्रबंधन जैसे तीनों सेनाओं से संबद्ध कार्यों के लिए +रक्षा मंत्रालय के अधीन एक अंतर-सेवा संगठन है। +रक्षामंत्री को रक्षा संबंधी गतिविधियों में मदद देने के लिए अनेक समितियां होती हैं। स्टाफ समिति +का प्रमुख एक ऐसा मंच होता है जो तीनों सेनाओं की गतिविधियों से संबद्ध मामलों पर विचार का स्थान +होता है और यह मंत्रालय को सलाह देता है। स्टाफ समिति प्रमुख का पद सबसे लंबी सेवा वाले सेना प्रमुख +को दिया जाता है और यह तीनों सेना प्रमुखों के बीच बारी-बारी से आता है। +रक्षा मंत्रालय का वित्त विभाग वित्तीय मामलों से जुड़े सभी मुद्दों पर विचार करता है। रक्षा सेवाओं +का रक्षा सलाहकार इसका प्रमुख होता है तथा यह रक्षा मंत्रालय से पूर्णत— संबद्ध होता है और सलाहकार +की भूमिका निभाता है। +थल सेना. +भारतीय थल सेना सीमा पर चौकस रहती है-चौकन्नी, किसी भी बलिदान के लिए तैयार - ताकि देश +के लोग शांति व सम्मान के साथ जी सकें। +उच्च तकनीक आधारित सटीक हथियारों को शामिल किए जाने से आगामी युद्धों की मारक क्षमता +कई गुणा बढ़ गई है। $खतरों का वर्णक्रम पारंपरिक से आणविक तथा विषम तक फैला है, साथ ही +आतंकवाद एक हाइड्रा के सिर वाले राक्षस के रूप में उभर रहा हैं। जलवायु की कठिनता जैसे- हिम +खंडों की ऊंचाई एवं अत्यधिक ठंड, सघन पहाड़ी जंगल तथा मरूभूमि की गर्मी एवं उमस आदि का भी +सामना करना पड़ता है। +लंबी अवधि के परिप्रेक्ष्य में थलसेना का आकार, आकृति एवं भूमिका का व्यावहारिक दृष्टिकोण +थलसेना की आधुनिकीकरण प्रक्रिया को गतिशील/ओसस्वी बनाता है तथा प्रौद्योगिकी प्रक्रिया इसे एक भय- +सह-क्षमता आधारित ताकत बनने की तरफ अग्रसर करती है। भारतीय थल सेना को विभिन्न वर्णक्रम उन्मुख +परिवर्त्तनों के लिए एवं भविष्य की चुनौतियों के लिए एक “तैयार व प्रासंगिक थलसेना” के रूप में तैयार +किया जाना है। +भारतीय सेना बहुबल के अर्थ में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी थल सेना है। थल सेना का प्रमुख +उत्तरदायित्व बाहरी खतरों से देश की रक्षा करना है। इसके अतरिक्त थल सेना आंतरिक सुरक्षा गड़बडि़यों +के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सिविल प्रशासन की मदद भी करती है। थल सेना बाढ़, भूकंप, +तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्य भी करती है तथा आवश्यक सेवाओं की बहाली में +मदद करती है। +भारतीय थल सेना विश्व की उत्कृष्ट थल सेनाओं में से एक है। वर्तमान तथा भविष्य की चुनौतियों +से निपटने के लिए थल सेना का निरंतर आधुनिकीकरण तथा उन्नयन किया जाता है। यह पंचवर्षीय योजना +पर आधारित है। आधुनिकीकरण के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं- +(i) गोलीबारी क्षमता में सुधार तथा गश्त में वृद्धि +(ii) सभी मौसमों में युद्ध क्षेत्र निगरानी क्षमता +(iii) रात्रि युद्ध की क्षमता +(iv) विशिष्ट बलों की क्षमता में बढ़ोत्तरी +(v) नेटवर्क आधारित युद्ध की क्षमता +(vi) एनबीसी संरक्षण +आर्टिलरी का मुख्य जोर बेहतर गोलीबारी क्षमता रेंज में सुधार के लिए भारी कैलबिर बंदूकों की +खरीद करना है। रात्रि निगरानी उपकरणों तथा अतिरिक्त मानवरहित विमानों की खरीद से आर्टिलरी की +निगरानी तथा लक्ष्यबेधन क्षमता में वृद्धि होगी। +निगरानी क्षमता, गोलीबारी क्षमता, संरक्षण, संचार तथा गश्त में कई गुना वृद्धि कर राष्ट्रीय राइफल +तथा पैदल सेना की युद्ध क्षमता में व्यापक बदलाव लाया जा रहा है। आधुनिकीकरण के तहत पैदल सेना +की टुकडि़यों को अधिक मारक क्षमता तथा रेंज वाले हथियार, T-90 टैंक, ब्र±मोस शस्त्र प्रणाली, मिसाइल +और राकेट प्रणाली, थर्मल इमेजिंग उपकरण, बुलेट तथा माइन प्रूफ गाडि़यां तथा सुरक्षित रेडियो संचार +उपलब्ध कराया गया है। +नौसेना. +अपनी क्षमता, रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय महासागरों में अपनी मुखर उपस्थिति के कारण नौसेना भारतीय +महासगरीय क्षेत्र में शांति, स्थिरता तथा प्रशांति की उत्प्रेरक है। इसने अन्य समुद्रीवर्ती देशों से मित्रता तथा +सहयोग कायम किया है। हमारे पड़ोस के छोटे मुल्क तथा वे देश जो अपने व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के +लिए भारत के महासागरों पर निर्भर हैं, उनके लिए नौसेना भारत के समुद्री क्षेत्र में प्रशांति तथा स्थिरता के +उपाय सुनिश्चित करती है। इस काम को पूरा करने के लिए भारतीय नौसेना अपनी क्षमता तथा क्षेत्रीय और +क्षेत्र के बाहर की नौसेनाओं के साथ सहयोग और अंतः क्षमता बढ़ा रही है। जहाज, पनडुब्बियां, देश में +और बाहर निर्मित की जा रही हैं। कोचि में देसी एयरक्राफ्ट केरियर भी निर्माणाधीन है। बीवीआर डर्बो +मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया है। 6 यूएच 3 एच हेलीकाप्टर शामिल किए गए हैं। इसके लिए +आईएफटीयू स्थापित की गई है। यह यूनिट 23 मार्च, 2009 को भारतीय नौसेना वायु स्क्वाड्रन +(आईएनएएस) के रूप में शुरू की गई। +लैंडिंग शिप टैंक आईएनएस शार्दूल 4 जनवरी, 2007 को नेवल बेस, कारवार में नियुक्त किया गया। +अमरीकी नौसेना से खरीदे गए आईएनएस जलाशव को 22 जून, 2007 को नोरफोक (अमरीका) में तैनात +किया गया। इसने भारतीय नौसेना में एक नया आयाम जोड़ा है। यह जहाज भारतीय नौसेना में पहला लैंडिग +प्लेटफार्म डॉक (एलपीडी) है। +भारतीय नौसेना के जहाजों की विदेशों में तैनाती देश की विदेश नीति में सहायक है। इस प्रकार के +मिशन विदेशी मित्र देशों के साथ संबंधों की बेहतरी तथा विदेशी सहयोग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण हैं। वर्ष +2007 में हुई महत्वपूर्ण विदेशी तैनातियों में पर्सियन खाड़ी, उत्तरी अरब सागर, भू-मध्य सागर, लाल सागर, +चीन सागर तथा उत्तरी-पश्चिमी प्रशांत महासागर में की गई जहाजों की तैनाती शामिल है। +तटरक्षक. +समुद्री क्षेत्र में भारत के राष्ट्रीय हित की संरक्षा के लिए तटरक्षक कानून 1978 लागू होने के साथ ही 18 +अगस्त, 1978 को भारतीय तटरक्षक (आईसीजी) की स्थापना हुई थी। तटरक्षक का दायित्व भारत की +सीमाओं में जलीय क्षेत्र तथा विशिष्ट आर्थिक जोन की नियमित निगरानी करना है, ताकि चोरी और तस्करी +जैसी अवैध गतिविधियों को रोका जा सके। इसके अतिरिक्त तटरक्षक बल के कार्यों में खोज और बचाव +कार्य तथा समुद्री वातावरण को प्रदूषण से बचाना भी शामिल है। +तटरक्षक की कमान और नियंत्रण तटरक्षक महानिदेशक में निहित है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली +है। इसके तीन क्षेत्रीय मुख्यालय मुंबई, चेन्नई और पोर्ट ब्लेयर में हैं। अपने 11 तटरक्षक जिलों और 6 +तटरक्षक स्टेशनों के जरिए ये क्षेत्रीय मुख्यालय संगठन की कमान संभालते हैं। +तटरक्षक बल अधिनियम के अनुसार इसके बुनियादी कार्य इस प्रकार हैं-(क) कृत्रिम द्वीपो ंऔर +समुद्री प्रतिष्ठानों की रक्षा, (ख) मछुआरों को सुरक्षा प्रदान करना, (ग) समुद्री प्रदूषण सहित समुद्री +पर्यावरण का संरक्षण करना और लुप्तप्राय नस्लों की रक्षा करना, (घ) तटकर और अन्य अधिकारियों की +तस्करी विरोधी अभियानों में सहायता करना, (æ) भारत के समुद्री कानूनों को लागू कराना, (च) समुद्र +में जान-माल की सुरक्षा करना और भारत सरकार द्वारा निर्दिष्ट अन्य कर्त्तव्य (छ) युद्ध के समय नौसेना +की सहायता करना। +वायु सेना. +भारतीय सेना बदलाव के दौर में है। यह बदलाव बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण और नए उपकरण शामिल +करने तक सीमित नहीं बल्कि प्रभावी रोजगार में सैद्धांतिक बदलाव का भी है। +वायु सेना आज एक पीढ़ी आगे है और इसने आधुनिक युद्ध क्षमताएं हासिल कर ली हैं। इस बीच +देश और देश से बाहर बहुत से अंतर्राष्ट्रीय अभ्यासों और मिशन दोनों में सर्वोच्य प्रदर्शनों से अपनी पेशेवर +धाक बढ़ाना जारी रखा है। +भारतीय वायु सेना ने अति आधुनिक एसयू-30 एमकेआई एयरक्राफ्ट शामिल किया है। 20 हॉक +एजेटी एयरक्राफ्ट भी शामिल किए गए हैं। विशेष अभियानों के लिए सी-130 जे-30 एयरक्राफ्ट प्राप्त करने +के लिए यूएस सरकार के साथ निविदा पर हस्ताक्षर किए गए हैं। आक्रमण और रक्षा दोनों में प्रभावी बढ़ोत्तरी +के लिए हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली (अवाक्स) प्राप्त की जा रही है। इसके शामिल होन से सामने +आने वाली परिस्थितियों में बल प्रलंबता क्षमताओं में भी बढ़ोत्तरी होगी। +मिग-29 को बीच में अपग्रेड करने और संपूर्ण तकनीकी जीवन के विस्तार के लिए रूस के आरएसी +मिग के साथ करार पर हस्ताक्षर हुए हैं। अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने के लिए वायु सेना मिराज 2000, +जगुआर एयरक्राफ्ट तथा एमआई-17 हेलिकॉप्टरों को अपग्रेड करने की प्रक्रिया भी शुरू कर रहा है। डीओ- +228 एयरक्राफ्ट को आधुनिक तकनीक से लैस रखने के लिए सभी मौजूदा एयरक्राफ्टों को इलेक्ट्रॉनिक +उपकरणों से सुसिîात किया जा रहा है। मरम्मत के लिए पुर्जों का देश में ही निर्माण एक सतत प्रक्रिया +है। वायु सेना की विभिन्न टुकडि़यों के लिए 80,000 से अधिक पुर्जे बेस रिपेयर डिपो (बीआरडी) द्वारा +इस्तेमाल किए गए हैं। सभी आयातित बेरियरों की जगह देसी बेरियर लगाने की एक दीर्घकालीन योजना +बनाई गई है। +इलेक्ट्रॉनिक निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए बढ़ी संख्या में ग्राउंड आधारित रडार शामिल किए जा +रहे हैं। इन रडारों से एयरस्पेस प्रबंधन में खासा सुधार होगा। +वायु सेना सभी क्षेत्रों के लिए आधुनिकतम संचार उपकरण हासिल कर रही है। इनमें शामिल +सेटकॉम, एचएफ तथा वी/यूएचएफ सेट शामिल हैं। इसके अथावा सभी कमांड, नियंत्रण और युद्ध तत्वों +के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद एनक्रिप्शन उपकरणों को भी हासिल किया जा रहा है। +कमीशंड रैंक. +तीनों सेनाओं में कमीशंड रैंक का विवरण और उनके समान पद नीचे चार्ट में दिए गए हैं — +भारतीय वायु सेना में भर्ती. +गैर-संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से अधिकारियों की भर्ती — भारतीय वायु सेना में कमीशन +अधिकारियों की भर्ती मुख्यत— संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से होती है। तकनीकी शाखाओं, महिला +विशेष भर्ती स्कीम, एनसीसी विशेष भर्ती स्कीम, सेवा भर्तियों के लिए चयन भारतीय वायु सेना मुख्यालय +के माध्यम से किया जाता है। +सेवा चयन बोर्डो के माध्यम से भर्ती. +इसके जरिए फलाइंग (पायलट), एयरो नॉटिकल इंजीनियरिंग +(इलेक्टॉनिक्स, यांत्रिकी), शिक्षा, प्रशासन, लॉजिस्टिक्स, अकाउंट तथा अंतरिक्ष विज्ञान शाखाओं के लिए +भर्ती की जाती है। +विश्वविद्यालय प्रवेश स्कीम. +इसके तहत तकनीकी शाखाओं में स्थाई कमीशन अधिकारियों के रूप +में शामिल होने के लिए इंजीनियरिंग के अंतिम/प्री- अंतिम वर्ष के छात्र योग्य होते हैं। +महिला अधिकारियों की भर्ती. +फ्लाइंग, एयरो नॉटिकल इंजीनियरिंग (इलेक्ट्रॉनिक्स, मेकेनिकल) शिक्षा, +प्रशासन, लॉजिस्टिक, अकाउंट तथा अंतरिक्ष विज्ञान शाखाओं में लघु सेवा कमीशन अधिकारियों के रूप +में योग्य महिलाओं की भर्ती की जाती है +एनसीसी के जरिये भर्ती. +एनसीसी “सी” (बी ग्रेड) प्रमाणपत्र तथा 50 प्रतिशत अंक वाले स्नातक सेवा +चयन बोर्डों के माध्यम से नियमित कमीशन अधिकारियों के रूप शामिल किए जाते हैं। +अधिकारी रेंक से नीचे के कार्मिकों की भर्ती — नई दिल्ली में स्थित केंद्रीय वायुसैनिक चयन बोर्ड द्वारा +राष्ट्रीय स्तर पर एक केंद्रीकृत चयन प्रणाली के जरिए वायुसैनिकों का चयन किया जाता है। इसमें देशभर +में फैले 14 चयन केंद्रों की सहायता ली जाती है। +थल सेना में भर्ती. +संघ लोकसेवा आयोग के अतिरिक्त सेना में निम्नलिखित तरीकों से भी कमीशंड अधिकारियों की भर्ती की +जाती है। +विश्वविद्यालय भर्ती योजना (यूईएस). +अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के फाइनल और प्री- +फाइनल के विद्यार्थी इस योजना के तहत सेना की तकनीकी शाखा में कमीशंड अधिकारी के रूप +में स्थायी कमीशन के लिए आवेदन करने के पात्र हैं। सेना मुख्यालय द्वारा नियुक्त एक स्क्रीनिंग +दल कैंपस साक्षात्कार के माध्यम से योग्य उम्मीदवारों का चयन करता है। इन उम्मीदवारों को +एसएसबी तथा मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होना पड़ता है। +तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम (टीजीसी). +अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के स्नातक/स्नाकोत्तर +विद्यार्थी इसके माध्यम से स्थाई कमीशन के लिए आवेदन के पात्र हैं। एसएसबी और मेडिकल बोर्ड +के बाद अंतिम रूप से चुने गए उम्मीदवारों को भारतीय सेना अकादमी, देहरादून में एक वर्ष का +प्री-कमीशन प्रशिक्षण पूरा करना होता है। +शॉर्ट सर्विस कमीशन (तकनीकी). +अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के इंजीनियरिंग स्नातक/ +स्नातकोत्तर विद्यार्थी शार्ट सर्विस कमीशन (तकनीकी) प्रवेश के जरिए तकनीकी शाखा में शार्ट +सर्विस कमीशन के लिए आवेदन के पात्र हैं। चुने गए उम्मीदवारों को एसएसबी और मेडिकल बोर्ड +के बाद 11 महीने के प्री-कमीशन प्रशिक्षण के लिए ओटीए, चेन्नई जाना पड़ता है। +10+2 तकनीकी योजना (टीईएस). +10+2 सीबीएसई/आईसीएसई/राज्य बोर्ड के ऐसे विद्यार्थी +जिन्होंने भौतिकी, रसायन तथा गणित विषयों में कुल मिलाकर 70 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हों, इस +योजना में आवेदन के पात्र हैं। +महिला अधिकारियों के लिए विशेष प्रवेश योजना (डब्ल्युएसईएस-ओ). +इस योजना के जरिए सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशंड अधिकारियों के लिए योग्य महिला उम्मीदवारों का चयन किया जाता +है। इन्हें इलक्ट्रानिक तथा मेकेनिकल इंजीनियरी, सिग्नल, सेना शिक्षा, सेना आर्डिनेंस, आपूर्ति, सेना +गुप्तचर दलों, जज एडवोकेट जनरल ब्रांच तथा सेना वायु रक्षा में कमीशंड किया जाता है। +एनसीसी (विशेष) प्रवेश योजना. +कम से कम “बी” ग्रेड के साथ एनसीसी का “सी” +सर्टिफिकेट रखने वाले और स्नातक परीक्षा में 50 प्रतिशत अंक पाने वाले विद्यार्थी इस योजना के +माध्यम से शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिए आवेदन करने के पात्र हैं। इन्हे संघ लोकसेवा आयोग द्वारा +आयोजित लिखित परीक्षा से छूट मिलती है तथा इनका चुनाव सीधे एसएसबी बोर्ड के साक्षात्कार +तथा मेडिकल बोर्ड द्वारा किया जाता है। +न्यायाधीश वकील सामान्य प्रवेश. +न्यायाधीश वकील सामान्य शाखा के लिए 21 से 27 वर्ष +आयु के लोग आवेदन कर सकते हैं। जिन्होंने एलएलबी में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक प्राप्त किए +हों। योग्य उम्मीदवारों को सीधे साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है। उसके बाद चिकित्सा +परीक्षण। यह लघु सेवा कमीशन प्रवेश है जिसमें उम्मीदवार स्थाई कमीशन का विकल्प दे सकता +है। +अधिकारी स्तर से नीचे कार्मिकों की भर्ती (पीबीओआर). +सेना में पीबीओआर की भर्ती खुली +रैलियों द्वारा होती है। रैली स्थल पर उम्मीदवारों की प्राथमिक स्क्रीनिंग के बाद उनके दस्तावेजों की जांच +तथा शरीरिक क्षमता की परीक्षा होती है। वहीं पर चिकित्सा अधिकारी द्वारा मेडिकल जांच भी की जाती +है। इसके बाद शारीरिक रूप से सक्षम अभ्यार्थियों को एक लिखित परीक्षा भी देनी पड़ती है। सफल +उम्मीदवारों को प्रशिक्षण के लिए संबद्ध प्रशिक्षण केंद्रों में भेज दिया जाता है। +47 रेजीमेंटल केंद्रों के अलावा ग्यारह जोनल भर्ती कार्यालय, दो गोरखा भर्ती डिपो तथा एक स्वतंत्र +भर्ती कार्यालय अपने संबंधित क्षेत्रों में आयोजित रैलियों के जरिए भर्ती करते हैं। +भारतीय नौसेना में भर्ती. +अधिकारियों की भर्ती — नौसेना की निम्नलिखित शाखाओं/कॉडरों में संघ लोकसेवा आयोग के अलावा +अन्य तरीकों से भर्ती की जाती है। +(i) कार्यकारी — वायु परिवहन नियंत्रण/विधि/लॉजिस्टिक/नेवल अर्मामेंट इंस्पेक्टरेट (एनएआई)/ +हाइड्रो कॉडर के लिए शार्ट सर्विस कमीशन तथा विधि/एनएआई कॉडरों के लिए स्थाई कमीशन। +(ii) इंजीनियरिंग (नेवल वास्तुकार सहित) — विश्वविद्यालय प्रवेश योजना (यूईएस), विशेष नेवल +वास्तुकार प्रवेश योजना तथा एसएससी (ई) योजना के जरिए शार्ट सर्विस कमीशन। 10+2 +(तकनीकी) योजना के जरिए स्थाई कमीशन। +(iii) इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग — यूईएस तथा एसएससी (एल) योजना के जरिए शार्ट सर्विस कमीशन +में भर्ती। 10+2 (तकनीकी) योजना के जरिए स्थाई कमीशन। +(iv) शिक्षा शाखा — इस शाखा के लिए स्थाई तथा शार्ट सर्विस कमीशन योजनाएं विद्यमान हैं। +(v) 10+2 (तकनीकी) योजना — यह योजना भारतीय नौसेना की इंजीनियरिंग तथा इलेक्ट्रिकल +शाखाओं में स्थाई कमीशन के लिए है। इस योजना के तहत एसएसबी द्वारा 10+2 पास चयनित +अभ्यार्थियों को नेवल संचालन पाठ्यक्रमों के लिए नौसेना अकादमी में भेजा जाता है। इसके पश्चात +उन्हें आईएनएस शिवाजी/वालसुरा पर चार वर्षीय इंजीनियरिंग कोर्स करना पड़ता है। +(vi) विश्वविद्यालय प्रवेश योजना (यूईएस) — इस योजना को शार्ट सर्विस कमीशन योजना के रूप +में अगस्त, 2005 में पुन— शुरू किया गया है। नौसेना की तकनीकी शाखाओं/ कॉडरों में इंजीनियरिंग +के फाइनल तथा प्री-फाइनल विद्यार्थी आवेदन के पात्र हैं। +(vii) महिला अधिकारी — महिलाएं नौसेना की शिक्षा शाखा तथा कार्यकारी (एटीसी, विधि तथा +लॉजिस्टिक कैडरों) में शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों के रूप में शामिल हो रही हैं। +(viii) एसएससी अधिकारियों के लिए स्थाई कमीशन (महिला एवं पुरूष) — जनवरी, 2009 से इसमें +शामिल होने वाले बैचों के लिए शिक्षा, एक्स/विधि तथा ई/नौसेना प्रशिक्षक कैडर के लिए स्थाई +कमीशन दिया जाएगा। +(ix) एनसीसी के जरिए भर्ती — स्नातक परीक्षा में “बी” ग्रेड तथा 50 प्रतिशत अंक पाने वाले एनसीसी +“सी” प्रमाणपत्रधारी स्नातक विद्यार्थी नौसेना में नियमित कमीशंड अधिकारी के लिए आवेदन के पात्र +हैं। इन स्नातकों को सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा में शामिल होने से छूट मिलती है तथा इनका चयन +सीधे एसएसबी साक्षात्कार द्वारा होता है। +(x) विशेष नेवल वास्तुकार प्रवेश योजना — आईआईटी खड़गपुर, आईआईटी चेन्नई, कोचीन विज्ञान +तथा प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय तथा आंध्र विश्वविद्यालय में बी.टेक. (नेवल वास्तुकार) कोर्स कराए +जाते हैं। नौसेना का एक दल यहां कैंपस साक्षात्कारों के जरिए अभ्यार्थियों का चयन करता है। समीप +के सेना अस्पताल में इन अभ्यार्थियों की मेडिकल जांच की जाती है तथा अंतिम रूप से चयनित +अभ्यार्थियों को प्रशिक्षण के लिए भेज दिया जाता है। +नाविकों की भर्ती — नौसेना में नाविकों की भर्ती लिखित परीक्षा, शारीरिक क्षमता परीक्षा तथा +मेडिकल परीक्षा की प्रक्रिया के जरिए की जाती है। नाविकों की भर्ती के लिए विभिन्न प्रवेश योजनाएं इस +प्रकार हैं- +(ii) सीधा प्रवेश (डिप्लोमा धारक) [डीई(डीएच)]-मैकेनिकल/इलेक्ट्रिकल / इलेक्ट्रॉनिक्स / +उत्पादन/एयरोनॉटिकल/मैटलर्जी/पोत निर्माण में डिप्लोमा। +(iii) मैट्रिक प्रवेश भर्ती-मैट्रीकुलेशन +(iv) नान-मैट्रिक प्रवेश भर्ती-मैट्रिक से नीचे +(v) सीधी भर्ती पैटी अधिकारी-उत्कृष्ट खिलाड़ी +भारतीय वायुसेना में भर्ती. +भारतीय वायुसेना में अधिकारियों का चयन — भारतीय वायुसेना में संघ लोकसेवा आयोग द्वारा प्रवेश +केवल फ्लाइंग शाखा के लिए होता है। तकनीकी तथा गैर तकनीकी शाखाओं में भर्ती वायुसेना मुख्यालय +द्वारा की जाती है। +विभिन्न वायुसेना स्टेशनों पर महिला तथा पुरूष इंजीनियरिंग स्नातकों के लिए इंजीनियरिंग नॉलेज +टेस्ट का आयोजन किया जाता है। इसके पश्चात वायुसेना चयन बोर्ड द्वारा चयन परीक्षा ली जाती है। 74 +हफ्तों के सफल प्रशिक्षण के बाद इन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स तथा मैकेनिकल शाखा में भेजा जाता है। विश्वविद्यालय +प्रवेश योजना (यूईएस) के माध्यम से अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के फाइनल तथा प्री-फाइनल +विद्यार्थी आवेदन के पात्र होते हैं। +गैर-तकनीकी शाखाओं में भर्ती के लिए स्नातक तथा स्नातकोत्तर महिला और पुरूष उम्मीदवारों के +लिए विभिन्न वायुसेना स्टेशनों पर वर्ष में दो बार संयुक्त प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है, इसके +बाद वायुसेना चयन बोर्ड द्वारा आयोजित चयन परीक्षा देनी पड़ती है। +वायुकर्मियों की भर्ती — नई दिल्ली स्थित केंद्रीय वायुकर्मी चयन बोर्ड पूरे देश में फैले अपने 14 चयन +केंद्रों की सहायता से एक केंद्रीकृत चयन प्रणाली के जरिए अखिल भारतीय स्तर पर वायुकर्मी के तौर पर +भर्ती के लिए योग्य उम्मीदवारों का चयन करता है। +राष्ट्रीय कैडेट कोर. +राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) की स्थापना एनसीसी अधिनियम, 1948 के तहत की गई। इसने स्थापना +के 59 वर्ष पूरे कर लिए हैं। एनसीसी देश के युवा वर्ग को उनके सम्पूर्ण विकास के अवसर उपलब्ध कराता +है। उनमें प्रतिबद्धता, समर्पण, आत्मानुशासन और नैतिक मूल्यों के विकास के लिए काम करता है ताकि +वे अच्छे नेता और उपयोगी नागरिक बन सकें तथा राष्ट्र की सेवा में उचित भूमिका निबाह सकें। एनसीसी +कैडिटों की कुल अनुमोदित संख्या 13 लाख है। देश के लगभग 606 जिलों के 8454 स्कूलों तथा 5377 +कॉलेजों में एनसीसी की उपस्थिति महसूस की जा सकती है। +नई दिल्ली स्थित एनसीसी महानिदेशालय देशभर में फैले सोलह एनसीसी निदेशालयों के जरिए +विभिन्न गतिविधियों का संचालन और नियंत्रण करता है। समस्त नीति-निर्देशों के लिए एक केंद्रीय +सलाहकार समिति है। एनसीसी में सेवाकर्मी, पूर्णकालिक महिला अधिकारी, शिक्षक, प्रोफेसर और नागरिक +हैं। प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में एक लेक्चरर/शिक्षक की नियुक्ति एसोशिएट एनसीसी अधिकारी के रूप +में होती है। +प्रादेशिक सेना. +प्रादेशिक सेना एक स्वैच्छिक और अंशकालिक नागरिक सेना है। प्रादेशिक सेना के पीछे यह अवधारणा +काम करती है कि युद्ध के समय तैनाती के लिए इनका उपयोग हो सकेगा और शांति काल में कम- +से-कम खर्च में इनका रख-रखाव होगा। नियमित सेना के संसाधनों के पूरक के रूप में जीवन के हर +क्षेत्र से इच्छुक, अनुशासित और समर्पित नागरिकों को लेकर कम लागत वाली इस सेना की तैयारी होती +है। प्रादेशिक सेना में शामिल होने वाले नागरिकों को थोड़े समय के लिए कड़ा प्रशिक्षण पूरा करना होता +है, जो उन्हें एक सक्षम सैनिक के रूप में तैयार करता है। इसके बाद इस प्रशिक्षण को बरकरार रखने +के लिए वे प्रत्येक वर्ष दो महीनों के लिए अपनी-अपनी इकाइयों में जाते हैं। +इस सेना के गठन से ही विभिन्न व्यावहारिक अभियानों के लिए इनके साथ पैदल बटालियन को +जोड़ा गया है। प्रादेशिक सेना की इकाइयों की सभी युद्धों में नियमित सेना के साथ भागीदारी रही है। हाल +के समय में अधिकतम बाईस इकाइयों को ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन पराक्रम में शामिल +किया गया था। पूर्वोत्तर तथा जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की रोकथाम के लिए भी पैदल बटालियन को +तैनात किया गया है। इसके अलावा रेलवे, तेल आपूर्ति, आपातकाल के दौरान चिकित्सा, चिकित्सा सुविधा +जैसी आवश्यक सेवाएं बनाए रखने में भी इनका उपयोग किया गया है। कुछ इकाइयों को पर्यावरण तथा +वनीकरण जैसे राष्ट्रीय विकास कार्यों में भी लगाया गया है। +प्रशिक्षण संस्थान. +रक्षा क्षेत्र में अनेक प्रशिक्षण संस्थान एक-दूसरे के सहयोग से कार्य कर रहे हैं। इनका विस्तृत ब्योरा आगे +के पैरा में दिया गया है। +सैनिक स्कूल. +सैनिक स्कूल केंद्रीय और राज्य सरकारों के संयुक्त उद्यम हैं। ये सैनिक स्कूल सोसाइटी के अधीन कार्य +करते हैं। वर्तमान में 24 सैनिक विद्यालय सैनिक स्कूल सोसाइटी के द्वारा चलाए जा रहे हैं। रेवाड़ी में सैनिक +स्कूल अप्रैल, 2009 से शुरू हुआ। +सैनिक स्कूलों के उद्देश्यों में आम आदमी तक ऊंची पब्लिक स्कूल शिक्षा की पहुंच बनाना, बच्चे +के व्यक्तित्व का समग्र विकास करना एवं सशस्त्र सेनाओं के अधिकारी संवर्ग में क्षेत्रीय असंतुलन को +दूर करना शामिल है। यह स्कूल लड़कों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की मार्पत सशस्त्र सेनाओं में शामिल +होने के लिए शैक्षिक, शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करते हैं। +मिलिट्री स्कूल. +देश में पांच मिलिट्री स्कूल अजमेर, बंगलुरू, बेलगांव, चायल और धौलपुर में हैं, जो सीबीएससी से +मान्यता प्राप्त हैं। यह मिलिट्री स्कूल अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा के आधार पर लड़कों को कक्षा 6 में +प्रवेश देते हैं। इनमें से 67 प्रतिशत सीटें जे सी ओ/ओ आर के बच्चों के लिए आरक्षित होती है, उन्हें +“अधिकृत श्रेणी” कहते हैं। शेष 33 प्रतिशत सीटों में से 20 प्रतिशत सीटें सर्विस अधिकारियों के बच्चों के +लिए आरक्षित हैं। +राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज. +भारतीय सशस्त्र बल में अधिकारी बनने के इच्छुक तथा भारत में जन्मे या रहने वाले लड़कों को आवश्यक +प्राथमिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज (आरआईएमसी), +देहरादून की स्थापना 13 मार्च, 1922 को की गई। आरआईएमसी इस समय देश के प्रमुख शिक्षा संस्थानों +में से एक है। इस कॉलेज के लिए चयन एक परीक्षा तथा वायवा द्वारा होता है। यह संस्थान आज राष्ट्रीय +रक्षा अकादमी, खडगवासला, पुणे के एक सहयोगी संस्थान के रूप में काम कर रहा है। +राष्ट्रीय रक्षा अकादमी. +राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), खडगवासला एक प्रमुख अंतर-सेवा प्रशिक्षण सस्ंथान है, जहां सशस्त्र +बलों के भावी ऑफिसर्स को प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण तीन वर्षों का होता है। इसके बाद +कैडिट्स अपनी संबंधित सेवा अकादमियों में जाते हैं, जैसे-इंडियन मिलिट्री अकादमी, नेवल अकादमी +या वायुसेना अकादमी। +इंडियन मिलिट्री अकादमी. +इंडियन मिलिट्री अकादमी (आईएमए), देहरादून युवाओं को साहसी, ऊर्जावान और प्रतिभा संपन्न +अधिकारी बनाता है, जो युद्ध की विभीषिकाओं का मुकाबला कर सकें और देश की सीमाओं की सुरक्षा +करते हुए हर कठिनाई का सामना कर सकें। 1932 में स्थापित आईएमए सेना में कमीशन के लिए कैडेट्स +को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करता है। +ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी. +21 सितंबर, 1992 से थलसेना में महिलाओं की भर्ती शुरू होने से अब तक प्रत्येक वर्ष लगभग सौ महिला +अधिकारियों को कमीशन किया गया है। अकादमी में शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिए केडेट को प्रशिक्षण +दिया जाता है। इन अधिकारियों को एजुकेशन कार्पआर्मी सर्विस कार्प, जज एडवोकट जनरल विभाग, +इंजिनियर्स, सिग्नल आदि में नियुक्ति दी जाती है। +डिफेंस सर्विसेज स्टॉफ कॉलेज. +डिफेंस सर्विसेज स्टॉफ कॉलेज (डीएसएससी), वेलिंगटन एक प्रमुख सेवा प्रशिक्षण संस्थान है, जिसकी +स्थापना का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र सेनाओं की तीनों शाखाओं, बाहरी मित्र देशों तथा भारतीय सिविल +सर्विसेज के मध्यक्रम के अधिकारी (मेजर तथा समकक्ष) को आवश्यक प्रशिक्षण देना है। +रक्षा प्रबंधन कॉलेज. +रक्षा प्रबंधन कॉलेज तीन दशक से त्रि-सेवा ेAब वर्ग प्रशिक्षण संस्थान है। सशस्त्र बलों के वरिष्ठ नेतृत्व +में सामायिक प्रबंधन विचारों, सिद्धांतों और व्यवहार को उत्तरदायित्व के साथ समाहित करने का कार्य कर +रहा है। सीडीएम के कोर पाठ्यक्रमों जैसे प्रबंधन अध्ययन में मास्टर डिग्री के लिए उस्मानिया विश्वविद्यालय +ने मान्यता दी है। +कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग. +मिलिट्री अभियांत्रिकी महाविद्यालय (सीएमई), पुणे एक प्रमुख तकनीकी संस्थान है। यहां इंजीनियरिंग +कोर, अन्य सशस्त्र सेवाओं, नौसेना, वायुसेना, अर्द्धसैनिक बल, पुलिस तथा सिविलियन को प्रशिक्षण दिया +जाता है। इसके अलावा मित्र राष्ट्रों के कर्मियों को भी यहां प्रशिक्षण दिया जाता है। सीएमई जवाहर लाल +नेहरू विश्वविद्यालय से बीटेक और एमटेक डिग्री प्रदान करने के लिए मान्यता प्राप्त है। +नेशनल डिफेंस कॉलेज. +राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (एनडीसी) देश का एकमात्र संस्थान है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा तथा रणनीति के प्रत्येक +पहलू के बारे में ज्ञान प्रदान करता है। एनडीसी वरिष्ठ रक्षा तथा सिविल सेवा के अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा +और रणनीति पर सैंतालीस सप्ताह का एक व्यापक कार्यक्रम चलाता है। +उत्पादन. +रक्षा उत्पादन विभाग निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र दोनों में रक्षा उपकरणों के स्वदेशीकरण, विकास तथा +उत्पादन हेतु कार्य करता है। इसमें 39 आयुध कारखाने तथा आठ रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम शामिल हैं। +इन आयुध कारखानों में विमानों और हेलीकाप्टरों के लिए मूल सुविधाएं और युद्धपोतों, पनडुब्बियों, भारी +वाहनों, मिसाइलों आदि के लिए तरह-तरह के इलेक्ट्रानिक उपकरण और कल पुर्जे और विशेष काम आने +वाला इस्पात और धातु मिश्रण तैयार किए जाते हैं। आत्मनिर्भरता के उद्देश्य के साथ आजादी के बाद रक्षा +उत्पादन क्षेत्र सतत विकसित हुआ है। +आयुध-कारखाने. +आयुध निर्माणी संगठन देश का विभागीय रूप से संचालित सबसे बड़ा संगठन है और यह सशस्त्र सेनाओं +के लिए रक्षा सामग्री तैयार करता है। आयुध कारखानों की स्थापना रक्षा उपकरणों के उत्पादन में +आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से हुई थी। +आयुध कारखाने पुरानी तथा आधुनिक तकनीकों से सिîात कारखानों का बेहतरीन संगम +हैं। 1801 में कोलकाता के निकट काशीपोर में पहला आयुध कारखाना लगाया गया था। पूरे देश में +24 स्थानों पर 39 आयुध कारखाने हैं। नालंदा तथा कोरबा के आयुध कारखाने परियोजना के स्तर +पर हैं। +आजादी पूर्व के कारखानों की, सिविल क्षेत्र में औद्योगिक ढांचे के अपर्याप्त होने के कारण +बुनियादी तथा इंटरमीडिएट सामग्री उत्पादन क्षमता थी। आजादी बाद सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के +क्रमिक विकास के चलते अपनी जरूरतों को आरूटसोर्स करना शुरू कर दिया है। रक्षा बलों की बढ़ती +आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कारखाने निर्माण प्रौद्योगिकियों को अपग्रेड करते रहे हैं। गैर-रक्षा +ग्राहकों तथा निर्यात और रक्षा बलों के उपयोग के लिए अधिकतम क्षमता हासिल करने की नीति पर जोर +दिया जा रहा है। +रक्षा उपक्रम. +हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल). +यह रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र का एक “नवरत्न” उपक्रम है। एयरोस्पेस क्षेत्र में रणनीतिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने +तथा रक्षा सेवाओं को पूरा सहयोग प्रदान करने के लिए कंपनी प्रतिबंद्ध है। इसके कोर व्यवसाय में शामिल +हैं- डिजाइन, फिक्स विंग एयरक्राफ्ट तथा हेलीकाप्टर (लड़ाकू, प्रशिक्षक तथा परिवहन) का विकास और +उत्पादन, उनकी सहायक सामग्रियां, लाइफसाइकल ग्राहक सेवा, एयरोस्पेस उत्पादों की मरम्मत तथा ढांचे +का निर्माण तथा स्पेस लांच व्हीकल और सेटेलाइट के लिए एकीकृत प्रणाली का उत्पादन। कंपनी ने 11 +एयरक्राफ्ट इन हाउस तथा 14 प्रकार के लाइसेंस के तहत उत्पादित किए हैं। देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भी +कंपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। +भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल). +बेल रडार तथा सोनार, संचार उपकरण, ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, टेंक इलेक्ट्रॉनिक्स तथा +रणनीतिक भागों के क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति के साथ बहु-प्रौद्योगिक, बहु-उत्पाद कंपनी है। यह कंपनी +सुरक्षा बलों सहित आल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन, बीएसएनएल, एमटीएनएल वीएसएनएल. एयरपोर्ट +अथॉरिटी ऑफ इंडिया जैसे सरकारी संस्थानों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की आपूर्ति करती है। +भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएललि). +यह कंपनी खनन और निर्माण उपकरणों, रक्षा उत्पादों, रेलवे तथा मेट्रो उत्पादों की डिजाइन, निर्माण, +विपणन तथा विक्री बाद सहयोग के क्षेत्र में सक्रिय है। कंपनी अपने व्यापार विभाग के जरिए तथा +अंतर्राष्ट्रीय बाजारों के लिए अपनी प्रौद्योगिकी तथा गैर-कंपनी उत्पादों, हिस्सों, एकत्रीकरण तथा +कमोडिटियों के माध्यम से ई-इंजीनियरिंग समाधान मुहैया कराती है। बीईएमएल टाट्रा आधारित उच्च +सचल ट्रकों, आर्मर्ड रिकवरी वाहनों, टेंक परिवहन ट्रेलरों, मिल रेल वैगन तथा कोचों, क्रेश फायर टेंडरों, +एयरक्राफ्ट टोइंग ट्रेक्टरों, एयरक्राफ्ट वीपन लोडिंग ट्रॉली, बीएमपी कंबेट वाहनों के लिए ट्रांसमीशन +प्रणालियों सहित युद्ध टेंकों के लिए सस्पेंशन प्रणाली के निर्माण और ग्राउंड सपोर्ट उपकरण तैयार करती +है। कंपनी डीजीबीआर तथा सेना, सीमा सड़क निर्माण/देखरेख के लिए बुलडोजरों और मोटर-ग्रेडरों की +आपूर्ति भी करती है। +मजगांव डॉक लिमिटेड (एमडीएल). +एमडीएल देश का प्रमुख शिप निर्माता है। जिसकी 6800 टन तक स्थांतरण क्षमता के युद्धपोत तथा 27000 +डीडब्ल्युटी मर्चेंट पोत निर्माण की क्षमता है। यह तटों के फेब्रिकेशन, तेल निकालने तथा भारी इंजीनियरिंग +कार्यों को यार्ड में पूरा करती है। कंपनी ने भारतीय नौ सेना को लिएंडर श्रेणी के 6 फ्रिगेट, गोदावरी श्रेणी के +3 फ्रिगेट, एक कैडेट प्रशिक्षण जहाज, 3 मिसाइल कर्वेट्स, 4 मिसाइल नाव 3 डेस्ट्रोयर्स तथा 2 पनडुब्बियां +बनाकर सौंपी हैं। +गोवा शिपयार्ड (जीएसएल). +गोवा शिपयार्ड लि. भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक दल तथा अन्य के लिए मध्यम आकार की उच्च +विकसित नौका निर्माण का अग्रणी शिपयार्ड है। 29 सितंबर, 1967 से निदेशकों के अपने बोर्ड के साथ इसने +अपना कार्य प्रारंभ किया। मार्च, 2007 में भारत सरकार ने इसे I- श्रेणी के मिनी रत्न का दर्जा दिया। यह +आईएसओ-9001 प्रमाणित कंपनी है। +गृह मंत्रालय के आदेशों के अनुपालन में कंपनी ने बिल्डिंग ग्लास री-इनफोर्सड प्लास्टिक +(जीआरसी) में प्रमुख कार्य शुरू किया है। उड्डयन विशेषज्ञता के लिए जीएसएल तट आधारित परीक्षण +सुविधा (एसबीटीएफ) के निर्माण में भी कदम रख रहा है। +गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई). +जीआरएसई का भारत के समुद्रीय हितों के विस्तार के साथ कदम बढ़ाना जारी है और अब पूर्वी भारत में +एक अग्रणी शिप निर्माण यार्ड तथा उच्च मूल्य, उच्च प्रौद्योगिकी, जटिल इंजीनीयरिंग आइटमों के निर्माता +के रूप में पहचाना जाता है। कंपनी को श्रेणी- 1 के मिनी रत्न का दर्जा प्रदान किया गया है। कंपनी की +मुख्य व्यावसायिक गतिविधि भारतीय नौसेना तथा तट रक्षक के लिए शिप निर्माण तथा शिप मरम्मत करना +है। +भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल). +निर्धारित लक्ष्यभेदी मिसाइलों के निमार्ण के लिए इसकी स्थापना 1970 में हुई। यह सार्वजनिक क्षेत्र के +गिने-चुने युद्ध संबंधी उद्योगों में एक है और अति उन्नत गाइडेड मिसाइल प्रणाली के निर्माण की क्षमता +रखता है। पी-II मिसाइल प्रणाली के स्वदेशी विकास के अतिरिक्त बीडीएल रूस के सहयोग से कांकर्स- +एम तथा इनवार (3 यूबीके-20) मिसाइलों के निर्माण से भी जुड़ा है। बीडीएल तकनीकी अधिकृत/ +समावेश के लिए डीआरडीओ से भी निकट से संबद्ध है। यह आकाश, नाग, आर्टिकल के-15, अग्नि +के प्रतिरूप (ए 1, ए 2 तथा ए 3) जैसी मिसाइलों के परिक्षण के लिए डीआरडीओ को मिसाइल उप- +प्रणाली इंटिग्रेटेड मिसाइल उपलब्ध कराता है। +मिश्र धातु निगम लिमिटेड (मिधानि). +रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग की देखरेख में 1973 में इसका निगमीकरण किया गया। इसका उद्देश्य +सुपरअलाय, टिटेनियम अलॉय और वैमानिकी, अंतरिक्ष, अस्त्र-शस्त्र, परमाणु ऊर्जा और नौसेना जैसे +रणनीतिक महत्व के कामों में इस्तेमाल के लिए विशेष प्रकार के इस्पात के उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त +करना था। मिधानि के उत्पादों में विशेष उत्पाद जैसे मालिबिडनम कॉयर तथा प्लेट, टाइटेनिटम तथा स्टेनलेस +स्टील टयूब्स, इलेक्ट्रिक तथा इलेक्ट्रानिक के लिए अलॉय, साफ्ट मेगनेटिक अलॉय, कंट्रोल्ड एक्सपेंशन +अलॉय और रजिस्टेंस अलॉय शामिल हैं। +रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन. +रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन रक्षा मंत्रालय की आर एंड डी विंग है जिसका विजन रक्षा +प्रौद्योगिकियों में भारत का सशक्तिकरण करना है। इसका मिशन स्वदेशीकरण तथा नवाचार द्वारा +समालोचनात्मक (ष्टह्म्itiष्ड्डद्य) रक्षा प्रौद्योगिकियों तथा प्रणालियों में स्वावलंबन प्राप्त करना है। साथ ही +सशस्त्र सेनाओं को अति आधुनिक शस्त्र प्रणालियों तथा उपकरणों से सिîात करना है। डीआरडीओ +का गठन 1958 में किया गया। इसे सेना के तकनीकी विकास स्थापना तथा रक्षा विज्ञान संगठन सहित +तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय का विलय कर स्थापित किया गया। डीआरडीओ का प्रमुख +रक्षा मंत्री का वैज्ञानिक सलाहकार होता है जो रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग का सचिव तथा +अनुसंधान एवं विकास महानिदेशक भी होता है। इस संगठन के पहले प्रमुख मशहूर वैज्ञानिक तथा +शिक्षा विद डा.डी.एस. कोठारी थे। रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार की सहायता के लिए आठ मुख्य +नियंत्रक होते हैं। डीआरडीओ का कॉरपोरेट मुख्यालय नई दिल्ली के राजाजी मार्ग स्थित डीआरडीओ +बिल्डिंग में है। +संगठन का ढांचा द्विस्तरीय है, अर्थात नई दिल्ली में कॉरपोरेट मुख्यालय; तथा देशभर में +प्रयोगशालाएं/स्थापनाएं, क्षेत्रीय केंद्र, फील्ड स्टेशन इत्यादि स्थित हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग +के अंतर्गत डीआरडीओ मुख्यालय के अधीन दो निदेशालय है अर्थात कॉरपोरेट निदेशालय तथा तकनीकी +निदेशालय। अपनी कोर क्षमता के आधार पर प्रयोगशालाएं आठ छोटे समूहों में वर्गीकृत हैं। सरकार से +नई परियोजनाओं के अनुमोदन, ढांचागत सुधार, नई सुविधाएं जुटाने, जारी परियोजनाओं की निगरानी +और समीक्षा में सहायता करने तथा अन्य प्रयोगशालाओं को संबंधित तकनीकी निदेशालयों जैसे- +एयरोनॉटिक्स, अर्मामेंट्स, कंबेट व्हीकल्स एवं इंजीनियंरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंप्यूटर साइंसेज, सामग्रियां, +मिसाइल, नौसेना अनुसंधान एवं विकास तथा जीवन विज्ञान का सहयोग प्राप्त होता है। ये निदेशालय +प्रयोगशालाओं के लिए आर एंड डी मुख्यालय तथा भारत सरकार से “सिंगल विंडो” के रूप में कार्य करते +हैं। व्यवसाय, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, प्रौद्योगिकी अर्जन, सार्वजनिक कार्य तथा संपदा सेवाओं सहित +प्रौद्योगिकी विस्तार केंद्र तथा परस्पर संवाद निदेशालय और तकनीकी परीक्षण सैल सभी प्रमुख, वायुसेना +प्रमुख नौसेना प्रमुख तथा एकीकृत रक्षा उप प्रमुख के वैज्ञानिक सलाहकार अपने-अपने प्रमुखों को +तकनीकी निदेशकों के रूप में भी सेवाएं प्रदान करते हैं। +कॉरपोरेट निदेशालय जैसे बजट वित्त एवं लेखा निदेशालय, एक्स्ट्राम्युरल अनुसंधान एवं बौद्धिक +संपदा अधिकार, मानव संसाधन विकास, प्रबंधन सेवाएं, सामग्री प्रबंधन, कार्मिक, योजना और समन्वय, +पब्लिक इंटरफेस, राजभाषा और ओएम, निगरानी और सुरक्षा निदेशालय संसाधनों की योजना और उनका +प्रबंधन करते हैं और अन्य सरकारी मंत्रालयों तथा विभाग के बीच कड़ी का कार्य करते हैं। वे मानव +शक्ति, प्रशिक्षण तथा कैरियर विकास सहित वित्तीय प्रबंधन, चालू परियोजनाओं की योजना और +समन्वय, संसदीय प्रश्नों, बड़े पैमाने पर जनता के साथ-साथ मीडिया, शिक्षाविदों तथा छात्रों को +डीआरडीओ के कार्यक्रमों/नीतियों/निष्पादनों से संबंधित सूचना प्रदान करने जैसी इमेज निर्माण गतिविधियों +में केंद्र (आरएसी) विभिन्न स्तरों पर वैज्ञानिकों की नई भर्तियां करता है तथा आवधिक आधार पर +वैज्ञानिकों के प्रमोशन के लिए आकलन करता है। कार्मिक प्रतिभा प्रबंधन (सीईपीटीएएम) संगठन के +लिए “तकनीकी तथा अन्य स्टाफ” की भर्ती तथा प्रशिक्षण के लिए उत्तरदायी है। डीआरडीओ की +निम्नलिखित जिम्मेदारियां हैं — +और सहयोगी उपकरण (स्ट्रेटेजिक उपकरण, टेक्टिकल प्रणालियां, ड्यूअल यूज टेक्नोलॉजी) +स्तर संवारना विशेषकर कठिन वातावरण में। +डीआरडीओ राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान डिजाइन और विकास के +कार्यक्रमों को बनाता और क्रियान्वित करता है। यह राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों, पीएसयू तथा निजी +एजेंसियों के साथ मिलकर प्रमुख रक्षा संबंधी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए नोडल एजेंसी के +रूप में भी कार्य करता है। तीनों सेवाओं द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं के अनुरूप इसने विश्वस्तरीय +शस्त्र प्रणालियां और उपकरणों के उत्पादन में मार्गदर्शन किया है। इसके अतिरिक्त, डीआरडीओ +स्टाफ जरूरतें, हासिल किए जाने वाली प्रणालियों का मूल्यांकन, अग्नि तथा विस्फोटक सुरक्षा, +संचालन समस्याओं इत्यादि के गणितीय/सांख्यिकीय विश्लेषणों जैसे मामलों पर तकनीकी सलाह +देकर सेना सेवाओं की सहायता करता है। +निम्नलिखित तथ्य डीआरडीओ के ढांचे तथा आयाम की झलक देते हैं— +ठोस रूप में डीआरडीओ ने रणनीतिक तथा व्यावहारिक शस्त्र प्रणालियों की विशाल शृंखला तथा +ऐसी प्रणालियों से जुड़ी जटिल प्रौद्योगिकियों को विकसित किया है। डीआरडीओ द्वारा विकसित प्रणालियों +के लिए अब तक 35,000 करोड़ रूपये तक के ऑर्डर हैं। यद्धपि, डीआरडीओ उत्पादों का उत्पादन मूल्य +राष्ट्र की रक्षा क्षमताओं पर इन विकास के प्रभाव का पैमाना नहीं है। इनमें से कई प्रणालियां, गतिरोधों और +प्रौद्योगिकी देने से मना करने के युग में किसी अन्य देश के साथ न तो मांगी जा सकती हैं। और ना ही +संयुक्त रूप में विकसित की जा सकती हैं। आधुनिक सेना प्रौद्योगिकियों से लैस विकसित देश उन प्रणालियों +के लाइसेंसयुक्त उत्पादों का प्रस्ताव देते हैं जो उनके लिए पुरानी हो चुकी हैं और जिनमें मुशिकल से ही +प्रौद्योगिकी हस्तांतरण होता है। अग्नि तथा पृथ्वी शृंखला की मिसाइलों, पनडुब्बी सहित बैलेस्टिक मिसाइल +इत्यादि जैसी रणनीतिक प्रणालियों और प्लेटफार्मों के सफलतापूर्वक देसी विकास तथा उत्पादन ने भारत +की सैनिक शक्ति को लंबी छलांग लगाने में सहायता की है। इससे प्रभावी रोधक पैदा करने और निर्णायक +क्षमता प्रदान करने तथा ऐसी प्रौद्योगिकी रखने वाले इलीट क्लब में भारत का प्रवेश संभव हुआ है। +विकसित उत्पाद और प्रणालियां/स्वीकृत/समाहित, विकसित प्रौद्योगिकियों और स्थापित ढांचागत +सुविधाओं के रूप में डीआरडीओ के प्रत्येक समूह के प्रमुख योगदान — +समूह उत्पाद और प्रणालियां विकसित/स्वीकृत/समाहित प्रौद्योगिकियां विकसित तथा ढांचागत +सुविधाएं स्थापित +एयरो एलसीए-तेजस भारत का पहला देसी डिजाइन विकसित उच्च जटिल प्रौद्योगिकी की विशाल शृंखला +प्रणालियां तथा निर्मित मल्टी रोल लाइट कंबेट एयरक्राफ्ट (सात) तैयार की जा चुकी है और एलसीए-तेजस, +ने 1150 उड़ाने भरी हैं। 2010-11 में 20 एलसीए के इसकी उप-प्रणालियों तथा गैस टर्बाइन इंजन- +पहले दस्ते का शामिल होना। 2010 तक ही नौसेना के कावेरी के विकास की प्रक्रिया में विशाल +लिए एलसीए का निर्माण। अन्य सफलता की कहानियां ढांचा खड़ा किया गया है। +हैं- पायलट रहित लक्ष्य एयरक्राफ्ट, निशांत अनाम अस्थिर एयरोडायनामिक्स, अस्थिर, रूप रेखा +एरियल व्हीकल, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर स्युट, उच्च सटीक एयरक्राफ्ट, फ्लाइ-बाइ-वायर डिजिटल +दिशा सूचक चेतावनी रिसीवर (एचएडीएफ) आर फ्लाइट नियंत्रण प्रणाली, ओपन आर्किटेक्चर +डब्ल्यूआर, कई लड़ाकू जहाजों के लिए मिशन कंप्यूटर मिशन एवियोनिक्स, विकसित मिश्रित ढांचा, +तथा उड्डयन अपग्रेडेशन, मिसाइल अप्रोच चेतावनी अनुकरण के लिए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर +प्रणाली तथा लेजर चेतावनी प्रणाली विकसित की गई +है और विभिन्न सैनिक जहाजों और हेलीकॉप्टरों पर +लगाई जा रही हैं। बड़े लाभ सहित पनडुब्बी को चलाने +के लिए कावेरी इंजन के कई प्रकार विकसित किए जा +रहे हैं। +सशस्त्र डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और विकसित अर्मामेंट की हाइड्रो-न्यूमेटिक सस्पेंसन, राकेट मोटर थर्मल +डी सैन्य बड़ी संख्या शस्त्र बलों में शामिल की गई हैं। जब तक प्रोटेक्शन कंपोजिट प्रोपलेंट प्री-फ्रेगमेंट, +प्रणालियां असॉल्ट राइफलों और एलएमजी के फिक्स और फोल्ड इंसेडियरी एंड बमलेट वार हेड इलेक्ट्रिक +होने वाले बट वर्जन में 5.56 एमएमआईएनएसएएस और इलेक्ट्रो-हाइड्रॉलिक लांचर +(भारतीय लघु शस्त्र प्रणाली) राष्ट्रफल उपलब्ध नहीं हुई +तब तक डीआरडीओ द्वारा दस लाख से अधिक 7.62 +एमएम ईशापोर सेल्फ लोडिंग राइफल (एसएलआर) +बनाई गईं। सभी में एक तरह का गोला-बारूद इस्तेमाल +होता है और लगभग 70 प्रतिशत पुर्जे भी समान ही हैं। +युद्ध प्रथम आर्मोरेड रेजीमेंट (45 टैंक) के लिए 45 सहित इंजन परीक्षण सुविधा, पारेषण परीक्षण सुविधा, +वाहन 50 से अधिक मुख्य युद्ध टैंक-अर्जुन तथा एक्सप्लोसिव फुल इंजेक्शन पंप परीक्षण रिंग, वेरिएब्ल +और रिएक्टिव आर्मर (ईआरए) सिîात 645 कंबेट इम्प्रूव्ड स्पीड ड्राइव परीक्षण सुविधा, रोड व्हील +रक्षा 235 +इंजीनि- अजय टैंक, ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस), परीक्षण रिंग, एयर क्लीनर परीक्षण रिग, +यरिंग इंटीग्रेटड फायर डिटेक्शन एंड सुप्रेशन प्रणाली (आई- सस्पेंशन परीक्षण सुविधा, हाइड्रोलिक परीक्षण +एफडीएसएस) तथा रीकनफीगर्ड स्मोक ग्रेनेड डिस्चार्जर बैंच, सार्वभौमिक गीयर परीक्षण, अल्ट्रासॉनिक +(एसजीडी) बनाए गए हैं। अन्य प्रमुख उपलब्धियां हैं — फ्लॉडिटेक्टर एयरक्राफ्ट गीयर बॉक्स परीक्षण +भीम-76 स्वचालित 155 एमएनगन, अतिआधुनिक एमबी सुविधाएं, निम्न ताप चैंबर सहित पर्यावरणीय +टी अर्जुन शस्त्र प्रणाली, ब्रिज लेयर अर्जुन टैंक (कुछ ही परीक्षण सुविधाएं, ड्राइविंग रेन चैंबर, जल +घंटो में अर्जुन टैंक से बीएलटी में परिवर्तित होने की इमर्शन चैंबर, डस्ट चैंबर, साल्ट स्प्रे चैंबर, +क्षमता), ब्रिज लेयर टैंक टी-72, सर्वत्र मोबाइल ब्रिज शॉक परीक्षण मशीन, तथा बंप परीक्षण मशीन, +लेइंग प्रणाली, साकव 46 एम सिंगल स्पेन ब्रिज प्रणाली, परीक्षण ट्रेक सुविधा, इलेक्ट्रॉनिक तथा +एमएलसी 70 तथा एमएलसी 40 मोड्युलर ब्रिज, केरियर इलेक्ट्रिकल उपकरणों के प्रदर्शन और +कमांड पोस्ट ट्रेक्ड, बीएमपी-II एनबीसी प्रोटेक्टड संरचनात्मक इंटीग्रिटी के मूल्यांकन के लिए +इंटीग्रेटड फील्ड शेल्टर, रिमोट चालित वाहन (दक्ष), ड्राइहीट चैंबर तथा डेंप हीट। रेपिड प्रोटोटाइपिंग +आईईडी क्षमता वाला रोबोटिक वाहन, दंगा नियंत्रण तथा प्रोटोटाइप निर्माण सुविधाएं। वीआरडीई +वाहन, मानवरहित ग्राउंड वाहन (यूजीवी), सशस्त्र में रक्षा और नागरिक वाहनों की आधुनिक +अंबुलेंस बीएमपी-II, बीएमपी-II पर, केरियर मोर्टार ईएमसी परीक्षण सुविधा के साथ अति +ट्रेक्ड, कंटेनराइज्ड आपरेशन बिएटर कांप्लेक्स ऑन आधुनिक उपकरणों से लैस एक राष्ट्रीय +व्हील्स, विभिन्न देसी स्ट्रेटेजिक एंड टेक्टिकल मिसाइलों ऑटोमोटिव परीक्षण केंद्र तैयार किया है जो +के लिए जीएसवी, निशांत लांचर,टी-72 टैंक पर काउंटर विश्व स्तरीय है। +माइनफ्लेल (सीएमएफ), स्नो गैलरी, स्नो प्रेशर के प्रभावी +स्थानांतरण के लिए माइक्रो पाइल फाउंडेशन। +इलेक्ट्रॉ- आर्टिलरी कंबेट कमांड कंट्रोल सिस्टम (एसीसीसी) उच्च परिशुद्धता दिशा खोजी प्रौद्योगिकी, उच्च +निक और भारतीय डॉप्लर रडार इंद्र-I और II, मल्टीफंक्शन फेज्ड शक्ति जैमिंग, वॉयस रिकग्नीशन और वॉयस +कंप्यूटर अरे रडार-राजेंद्र, सुपरविजन मेरिटाइम पेट्रोल रडार प्रिंट एनालिसिस डेटा/इमेज फ्यूजन, जैम- +प्रणालियां (एसवी-2000 एमपीएआर), अवेलेंची विक्टिम डिटेक्टर रेजिस्टेंट डेंटा लिंक सी 1 प्रणालियां, +(एवीडी), बेटलफील्ड और पेरीमीटर सर्वेलांस-बी एफ मल्टीफंक्शन इलेक्ट्रॉनिक स्केनिंग रडार, पैरेलल +एसआर, का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया गया है। प्रोसेसिंग, 1-4 सीएमओएस फेब्रिकेशन +इलैक्ट्रॉनिक वारफेयर प्रणालियां समुक्ता और संग्रह सेना प्रौद्योगिकी जीएएस क्रिस्टल ग्रोथ सुविधा, +तथा नौसेना के लिए, 3डी-सीएआर मध्यम दूरी का पूर्व मॉल्युकुलर बीम एपिटेक्सी सिस्टम, इयोनच +ेतावनी सेंसर-रेवती नौसेना के लिए, शस्त्र दिशा सूचक इंप्लांटेशन प्रणाली, इलेक्ट्रॉन बीम माइक्रो +रडार इथोन-51 इलेक्ट्रो-ऑप्टिक फायर कंट्रोल प्रणाली, लिथोग्राफी प्रणाली, एम ओसीवीडी प्रणाली, +ब्रीफकेस सेटकॉम टर्मिनल, सेक्टेल (सुरक्षित टेलीफोन), मास्क फेब्रिकेशन सुविधा, एमएमआईसी के +कंपेक्ट कम्युनिकेशन इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर स्यूट-सुजव, फेब्रिकेशन के लिए फेब लाइन, यूएचवी. +इंटीग्रेटड वीपन सिस्टम सिम्युलेशन, आई सेफ लेजर्स, प्रोसेसिंग स्टेशन, प्रोसिजन मशीनी सुविधा, +लेजर डेजिग्नेटर, लेजर चेतावनी सेंसर, पामटॉप ग्रीन सिंगल पॉइंट डाइमंड टर्निंग (एसपीडीटी) +माइक्रो चिप लेजर मॉड्यूल, ईओसीएम-क्लास लेजर माइक्रो-मशीनी सुविधा। +लेजर प्रणाली तथा एस-बैंड 130 केडब्ल्यु (पल्सड) +कपल्ड-केविटी टीडब्ल्यु टी। +जीवन थल सेना, नौसेना और वायु सेना कर्मियों के लिए जीवन जीवन रक्षक प्रौद्योगिकियां, एनबीसी रक्षा +विज्ञान रक्षक प्रणालियां, 30,000 फीटएनबीसी केनिस्टर से फ्री प्रौद्योगिकियां मिलिट्री न्यूट्रीशन (ताजा और +प्रणालियां फाल की कठिन परिस्थितियों में कार्य करने वाली फ्री परिवर्धित खाद्य प्रौद्योगिकी), मिलिट्री मनो- +236 भारत-2010 +फाल प्रणाली, जल विष खोजी किट, पोर्टेबल विज्ञान और कार्मिक चयन, मेन-मशीन +डिकंटेमिनेशन उपकरण, एनबीसी फिल्टर/वेंटिलेशन इंटरफेस, पानी से फ्लोराइड अलग करने की +प्रणालियां, सीडब्ल्यू टाइप ए/बी डिकंटेमिनेशन किट/ प्रौद्योगिकी, पानी से आर्सोनिक आयरन अलग +सॉल्युशन, हर्बल एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट, हाईएल्टीट्यूड करने की प्रौद्योगिकी शीतकाल में आलू स्टोर +अडेप्टड एंड फास्ट ग्रोइंग बॉइलर शीप, बायोडीजल करने की प्रौद्योगिकी। +उत्पादन, ठंड बर्दाशत करने वाली सब्जियां, हाइपर +बेरिक ऑक्सीजन थैरेपी चैंबर (समुद्रसुता), कड़ाके की +ठंड के लिए गर्म दस्ताने और मौजे, 65° ष्ट पर लंबी +अवधि तक तैयार डिब्बाबंद भोजन को रखने और गर्म +करने की प्रणाली, कड़ाके की सर्दी के लिए मानव +अपव्यय के परिशोधन के लिए बायो-डाइजेस्टर जिसे +रेलवे लाइन पर गंदगी रोकने के लिए रेलवे कोच में भी +लागू किया जा रहा है। मल्टी-इंसेक्ट रिपेलेंट डीईपीए +कंप्यूटरीकृत पायलट चुनाव प्रणाली (सीपीएसएस), +एनबीसी और हाई एल्टीट्यूड चिकित्सा उत्पाद। +सामग्रियां नौसेना अनुप्रयोग के लिए एबी श्रेणी का इस्पात, कंपोजिट आर्मर संबंधी प्रौद्योगिकी, नौसेना +टाइटेनियम स्पंज, एनबीसी संरक्षित वस्त्र/भेद्य सूट, के लिए विशेष इस्पात, गैस टर्बाइन के लिए +कड़ाके की ठंड में पहने जाने वाले वस्त्र, विस्फोटक कास्ट एयरफॉइल, टाइटेनियम अलॉय, रेयरअर्थ +संरक्षित सूट, सिंथेटिक लाइफ जैकेट, दंगारोधी पॉली धातु आधारित उच्च ऊर्जा वाली चुंबकें, लड़ाकू +कार्बोनेट शील्ड, दंगारोधी हेल्मेट, विमान के लिए वाहनों के लिए आर्मर, एनबीसी रक्षा, डिजर्ट +ब्रेकपैड, भारीधातु पेनिट्रेटर रॉड, जैकाल आर्मर, कंचन प्रणालियां और रेडिएशन इंस्ट्रमेंटेशन। +आर्मर, पनडुब्बी अनुप्रयोगों के लिए हाइड्रॉलिक पाइप- +लाइन, टर्बाइन कंपोनेंट की इनवेस्टमेंट कास्टिंग आदि। +मिसाइल जमीन से जमीन वाली मिसाइल प्रणालियां-अग्नि I (700 देश में विकसित की जाने वाली प्रौद्योगिकियां, +प्रणालियां किमी), अग्नि-II (2000 किमी) तथा अग्नि III फाइबर ऑप्टिक गाइरो का परीक्षण तथा +(3000 किमी) तथा पृथ्वी शृंखला। सेना और नौसेना उत्पादन, रिंग लेजर गाइरो, एक्सीलटो-मीटर, +के लिए सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल-ब्र±मोस धनुष-शिप इनार्शियल/ऑटोनॉमस नेविगेशन प्रणालियां, +लांच्ड एसएस मिसाइल, मल्टी-डाइरेक्शनल, आकाश मेम्स तथा मेम्स आधारित सेंसर, डाइरेक्ट +मल्टी टार्गेट सेम एरिया डिफेंस वीपन सिस्टम-आकाश, एक्शन ट्रेजेक्टरी तथा एल्टीट्यूड नियंत्रण +थर्ड जेनरेशन एंटी टैंक मिसाइल। 2000 किमी तक की प्रणाली, लंबी दूरी के ठोस राकेट मोटर, प्री- +बैलेस्टिक मिसाइल का मुकाबला करने वाली एयर फ्रेग्मेंटड और सबम्युनीशन वार हेड, कमांड +डिफेंस प्रणाली लंबी दूरी की मिसाइल और एयरक्राफ्टों गाइडेंस के लिए प्रौद्योगिकियां, रैम राकेट +के लिए रिन्स-टिंग लेजर गाइरो आधारित आईएनएस- प्रोपल्शन, मल्टी टार्गेट एंगेजमेंट मूविंग शिप +जीपीएस-ग्लोनेस, मिलीमीटर वेव सीकर, मिंग्स-मेम्स के लिए लांच प्लेटफार्म का ट्विन-इंजन +आधारित हाइब्रिड नेविगेशन सिस्टम, सेना तथा वायु लिक्विड प्रोपल्शन स्टेबिलाइजेशन मल्टी +सेना के लिए कंप्यूटरीकृत बार गेम। ब्रांड रडार सीकर परीक्षण सुविधा, इलेक्ट्रो- +मैग्नेटिक पल्स सुविधा, इलेक्ट्रो-हाइड्रॉलिक +सर्वो वाल्स लि. उत्पादन सुविधा, ठोस प्रोपलेंट +प्रोसेसिंग सुविधा। +नौसेना शिप-बोर्न सोनार हमसा, एयर बोर्न डंकिंग सोनार मिहिर, तैरती प्रयोगशाला-आईएनएस-सागर ध्वनि, +प्रणालियां सब मेरीन-सोनार 3 शूस, टॉरपीडो एडवांस्ड लाइट अंडरवाटर अकॉस्टिक्स अनुसंधान सुविधा, +(टीएएल), टॉरपीडो फायर नियंत्रण प्रणाली, अंडरवाटर हाइड्रोडायमिक परीक्षण सुविधाएं, शॉक नॉइज +टेलीफोन (यूडब्ल्यूटी), टेडपोल, स्व-नियंत्रित कार्बन और वाइब्रेशन परीक्षण सुविधाएं, टॉरपीडो +डाइआक्साइड प्रणाली, पॉली-लिस्ट डॉकब्लॉक। इंजीनियंरिंग केंद्र, मेट्स सुविधाएं, दर्पण को +सिस्टम लेवल सिम्युलेशन प्रदान करने के +लिए कल्स्टर कंप्यूटिंग सुविधा। प्रोटोटाइप +निर्माण सुविधा। +डीआरडी का सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान शैक्षणिक/अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के साथ +भागीदारी बढ़ाकर अतिआधुनिक विकास के लिए प्रेरक एक प्रणाली का सृजन है। इसके अलावा बुनियादी +ढांचा-संगठन के भीतर और सहयोगी संस्थानों दोनों में खड़ा करना; उत्कृष्टता संस्थान और उच्च गुणवत्ता +के मानव संसाधन का सृजन भी शामिल है। आज डीआरडीओ के पास कोर क्षमताओं का विशाल फलक +है जिसमें शामिल हैं- सिस्टम डिजाइन और जटिल सेंसरों का एकीकरण शस्त्र प्रणालियां और प्लेटफार्म, +कांप्लेक्स हाई-एंड सॉफ्टवेयर पैकेज, कार्यकारी सामग्रियां, परीक्षण और मूल्यांकन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण +तथा अवशोषण इत्यादि। इसके अतिरिक्त, संबंधित क्षेत्रों में बुनियादी/अनुप्रयुक्त अनुसंधान के लिए +विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचा खड़ा किया गया है। डीआरडीओ द्वारा तैयार ढांचागत सुविधाएं राष्ट्रीय +परिसंपत्ति हैं और इसमें एकीकृत यांत्रिक फ्लाइट परीक्षण रेंज, एयरक्राफ्टों के लिए संरचनात्मक डायनामिक्स +और कंपन परीक्षण सुविधा, ईडब्ल्यु परीक्षण रेंज, प्रपल्सन और बैलेस्टिक परीक्षण सुविधाएं, ईएमआई/ +ईएमसी परीक्षण रिंग, ईएमपी/प्रकाश करना, एंटेनी परीक्षण रेंज, यांत्रिक शिप, अकॉस्टि अनुसंधान शिप, +पानी के नीचे शस्त्र परीक्षण रेंज, लैंड प्रणाली के लिए परीक्षण ट्रेक इत्यादि। अन्य अमूर्त लाभ हैं- सैन्य +कौशलता और अग्रणी प्रौद्योगिकियों की विशाल शृंखला में सक्षमता, कंपोनेंट की सतत आपूर्ति की +सुनिश्चितता, बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में स्पेयर्स तथा आत्मनिर्भरता वाले रक्षा और आर एंड डी बेस +को विकसित करना। +हमारे राष्ट्र निर्माण उद्यमों के प्रमुख भागीदारी की प्रयोक्ता सेवाओं की तीन शाखाएं हैं - रक्षा, +सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां, निजी उद्योग, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा अकादमिक/अनुसंधान कर्ता। रक्षा +सहयोग पर लगभग 35 देशों के साथ अंतर-सरकारी समझौते/एमओयू लागू हैं। उच्च प्रौद्योगिकी रक्षा +संस्थान (मानद विश्वविद्यालय) पुणे में विकासशील देशों के वैज्ञानिकों/इंजीनियरिंग कार्मिकों को विशेष +रक्षा प्रौद्योगिकी संबंधी क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाता है। डीआरडीओ रक्षा उत्पादन में भारतीय उद्योगों की +भागीदारी को सक्रियता से बढ़ावा दे रहा है। परिणामस्वरूप, पीएसयू और निजी क्षेत्रों दोनों उद्योगों में +पर्याप्त बढ़ोतरी हुई है। डीआरडीओ एकीकृत रक्षा स्टाफ और सेवा मुख्यालय के माध्यम से प्रयुक्त +सेवाओं के बीच सक्रिय है। देश के भीतर स्थापित किए जाने वाले उत्पादों तथा सूक्ष्म प्रौद्योगिकी की +पहचान के लिए एस एंड टी रोड मेप्स और तीनों सेवाएं अध्ययन कराती हैं। प्रौद्योगिकियों को “खरीदो”, +“बनाओ” तथा “खरीदो और बनाओ” श्रेणियों में बांटा गया है। रणनीति इन्हें देश में निम्नलिखित में से +किसी एक मार्ग द्वारा स्थापित करने की है- डीआरडीओ में ही विकास, राष्ट्रीय एस एंड टी लेबों और +अकादमिया के जरिए संयुक्त विकास, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के जरिए विकास, ऑफसेट बाध्यताओं के +माध्यम से समृद्ध प्रौद्योगिकियों का अधिग्रहण। 33 देशों के साथ इस क्षेत्र में समझौते हैं। प्रमुख विदेशी +भागीदार हैं-रूस, सूएसए, फ्रांस, इजराइल, जर्मनी, यूके, सिंगापुर कजाकिस्तान। डीआरडीओ के अपने +प्रमुख विदेशी भागीदारों के साथ सहयोग के लिए संयुक्त कार्य समूह भी हैं। ऐसे तीन समूह हैं-भारतयूएस +संयुक्त प्रौद्योगिकी समूह, भारत-रूस आर एंड डी उप समूह तथा भारत-इजराइल प्रबंध समिति। +वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान 7,694 करोड़ रूपये का रक्षा अनुसंधान व्यय देश के कुल 1,14,600.28 +करोड़ रूपयों के रक्षा सेवा व्यय का मात्र 6.67 प्रतिशत है। इसमें 77 प्रतिशत से अधिक अनुसंधान +गतिविधियों तथा इनके लिए ढांचागत सुविधाएं तैयार करने पर था। चालू वित्त वर्ष (2009-10) के लिए +रक्षा अनुसंधान और विकास बजट 8481 करोड़ रूपये है। रक्षा सेवा बजट 1,41,703 करोड़ रूपये का 5.98 +प्रतिशत होने के नाते बजट का 44 प्रतिशत केपिटल हेड के तहत है। रक्षा अनुसंधान बजट का पर्याप्त हिस्सा +लेते हुए रणनीतिक प्रणालियां प्राथमिकता पर हैं। +ज्ञान आधारित संगठन होने के नाते, डीआरडीओ अपनी संस्कृति के रूप में बौद्धिक संपदा अधिकारों +को पैदा और उनकी रक्षा कर रहा है। डीआरडीओ ने अब तक 416 से अधिक भारतीय तथा 45 विदेशी +पेटेंट/डिजाइन/कॉपीराइट लिए हैं जबकि 459 भारतीय और 110 विदेशी पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रियाधीन +हैं। हमारे वैज्ञानिकों द्वारा काफी संख्या में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पेपर प्रकाशित किए जा रहे हैं। +डीआरडीओ में अकेले डीआरडीएस श्रेणी में 640 से अधिक पीएचडी हैं। राष्ट्र और विशाल बौद्धिक संपदा +के मालिक के लिए यह सही मायने में एक “नॉलेज बैंक” है। डीआरडीओ अपने कामचारियों को संचालन, +स्वायत्तता, वित्तीय तथा प्रबंधकीय जिम्मेदारियां, उच्च प्रशिक्षण और कैरियर के मामलों में पर्याप्त +व्यावसायिक मौके प्रदान करता है। वैज्ञानिकों की स्व-विकास आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जाता है। +संगठन के कर्मचारी अपूर्व प्रकृति की दैनिक ड्यूटी निभाते हैं। कई परियोजनाएं मिशन मोड की और फील्ड +आधारित हैं। रेतीले और ऊंचे ठंडे क्षेत्रों जैसी कठिन परिस्थितियों के अंदर महीनों तक फील्ड ट्रायलों को +अंजाम देने के अलावा, डीआरडीओ के वैज्ञानिक अक्सर लेह, तेजपुर आदि कठिन केंद्रों पर भी तैनात किए +जाते हैं। वैज्ञानिकों से अपनी परियोजना जिम्मेदारियों के रूप में सघन वायु और समुद्री सेवाओं संबंधी ट्रायल +करने की अपेक्षा की जाती है। +डीआरडीओ कैरियर विकल्प के रूप में रक्षा एस एंड टी को लेने के लिए युवा छात्रों को आकर्षित +करता है। डीआरडीओ में विभिन्न स्कीमों के माध्यम से सक्षम मानव शक्ति शामिल की जाती है। ये स्कीमें +हैं- अखिल भारतीय डीआरडीओ वैज्ञानिक प्रवेश परीक्षा (सेट), वार्षिक कैंपस प्रति का खोज, रोसा स्कीम +के तहत हाल ही में पीएचडी पूरी करने वाले उम्मीदवारों का बतौर वैज्ञानिक चयन, एनआरआई के लिए +ऑन लाइन चयन तथा पाशिर्वक प्रवेश स्कीम के अंतर्गत वैज्ञानिकों का चयन। +“बलस्य मूलम विज्ञानम” अर्थात “बल का स्रोत विज्ञान है।” डीआरडीओ की टेगलाइन है। विज्ञान +और प्रौद्योगिकी के संदर्भ में खासकर सैन्य प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में राष्ट्र को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने +के लिए डीआरडीओ कृत संकल्प है। +पूर्व सैनिकों का पुनर्वास. +भूतपूर्व सैनिकों के पुनर्वास की योजनाएं पूर्व सैनिक कल्याण विभाग बनाता है। इस विभाग में दो प्रभाग +हैं-पुनर्वास प्रभाग और पेंशन प्रभाग। इनकी सहायता के लिए दो अंतर्सेना संगठन हैं-अर्थात पुनर्वास +महानिदेशालय और केंद्रीय सैनिक बोर्ड (केएसबी)। रक्षा मंत्री केंद्रीय सैनिक बोर्ड के प्रमुख और इस बोर्ड +के पदेन अध्यक्ष होते हैं। वह भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवार के लोगों के पुनर्वास की नीति निर्धारित +करते हैं और कल्याण कोष के प्रशासन की दिशा भी तय करते हैं। पुनर्वास महानिदेशालय सरकार की +विभिन्न नीतियों/योजनाओं/कार्यक्रमों को कार्यान्वित करता है। +केंद्रीय सैनिक बोर्ड/पुनर्वास महानिदेशालय की विभिन्न राज्यों के सैनिक बोर्ड/जिला सैनिक बोर्ड +सहायता करते हैं। ये राज्य सरकारों के प्रशासनिक नियंत्रण में होते हैं। राज्य सैनिक बोर्डों पर होने वाले +खर्च का 50 प्रतिशत भार केंद्र वहन करता है। शेष 50 प्रतिशत संबद्ध राज्य द्वारा वहन किया जाता है क्योंकि +भूतपूर्व सैनिकों का पुनर्वास राज्य और केंद्र का संयुक्त दायित्व है। +पुनर्वास महानिदेशालय, केंद्रीय सैनिक बोर्ड और राज्य सैनिक बोर्डों और जिला सैनिक बोर्डों के +मिले-जुले प्रयासों का मुख्य जोर इस बात पर होता है कि पूर्व सैनिकों को सम्मानपूर्वक फिर से रोजगार +दिया जा सके और उन्हें रोजगार के विभिन्न अवसर उपलब्ध कराए जाएं। प्रत्येक वर्ष लगभग साठ हजार +कार्मिक सेना से सेवानिवृत होते हैं या सक्रिय सेवा से हटाए जाते है; उनमें से अधिकतर की आयु 3545 +वर्ष होती है। इन्हें राष्ट्रीय निर्माण के कार्य में लगाने की जरूरत है। पूर्व सैनिकों को फिर से काम धंधे +से लगाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार निम्नलिखित प्रकार के उपाय करती है—(क) ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम +जिनके जरिए सेवानिवृत्त रक्षा कार्मिकों को काम धंधे में लगाया जा सके। (ख) सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र +के प्रतिष्ठानों में रोजगार के अवसर देने के उद्देश्य से पदों का आरक्षण तथा कारपोरेट सेक्टर में काम पाने +में उनकी मदद करना। (ग) स्वरोजगार की योजनाएं और (घ) उद्यमिता और लघु उद्योग शुरू करने में +सहायता। +अधिकारी प्रशिक्षण. +पुनर्वास महानिदेशालय अधिकारियों के लिए भी रोजगार उन्मुख प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है। एक +से तीन महीने के व्यावसायिक पाठ्यक्रम से लेकर छह माह तक के कार्यक्रम शामिल हैं। +जूनियर कमीशंड अधिकारियों (जेसीओ) अन्य रैंक (ओआर) समकक्ष +जूनियर कमीशंड अधिकारी। अन्य रैंक तथा इनके समकक्ष अन्य सेवाओं के लिए पूरे देश में फैले सरकारी, +अर्ध-सरकारी तथा निजी संस्थानों में छह माह के पुनर्वास प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। +पूर्व सैनिक (ईएसएम) प्रशिक्षण. +इस योजना के तहत राज्य सैनिक बोर्डों को संबद्ध राज्यों में ईएसएम के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम +आयोजित करने के वास्ते धनराशि मुहैया कराई जाती है। प्रारंभ में यह योजना उन ईएसएम के लिए बनाई +गई थी जो सेवाकाल के दौरान पुनर्वास प्रशिक्षण सुविधा का लाभ नहीं उठा पाते। +भूतपूर्व कर्मियों को पुन— रोजगार. +केंद्र और राज्य सरकार भूतपूर्व कर्मियों को केंद्रीय और राज्य सरकार के अधीन पदों पर पुन— रोजगार के +लिए कई रियायतें देती है। इनमें पदों में आरक्षण, उम्र सीमा, शैक्षणिक योग्यता में छूट तथा आवेदन और +परीक्षा शुल्क में छूट शामिल है। विकलांग भूतपूर्व सैनिकों और मारे गए सैनिकों के आश्रितों को अनुग्रह +के आधार पर रोजगार में प्राथमिकता दी जाती है। +सरकारी नौकरियों में भूतपूर्व सैनिकों के लिए आरक्षण. +केंद्र सरकार ने ग्रुप-सी के दस प्रतिशत और ग्रुप-डी के बीस प्रतिशत पद भूतपूर्व कर्मियों के लिए आरक्षित +किए हैं, जबकि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान और राष्ट्रीयकृत बैंकों में उन्हें ग्रुप-सी के पदों में 14.5 +प्रतिशत और ग्रुप-डी के पदों में 24.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। अर्द्धसैनिक बलों में असिस्टेंट कमांडेंट +के दस प्रतिशत पद भी भूतपूर्व कर्मियों के लिए आरक्षित हैं। सुरक्षा कोर में शतप्रतिशत पद भूतपूर्व सैनिकों +के लिए आरक्षित हैं। +पुनर्वास महानिदेशालय द्वारा रोजगार. +सुरक्षा एजेंसियां. +पुनर्वास महानिदेशालय विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिDान तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों में सुरक्षा गार्ड +उपलब्ध कराने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को निबंधित करती है। इस योजना के तहत अवकाश प्राप्त +अधिकारियों तथा ऑफिसर रैंक से नीचे के पूर्व स्टॉफ को उन क्षेत्रों में स्व-रोजगार के अच्छे अवसर प्राप्त +होते हैं, जिनकी पर्याप्त विशेषज्ञता उन्हें हासिल है। बैंकों की सुरक्षा भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को निर्देश +दिया है कि वे बैंकों की सुरक्षा के लिए महानिदेशालय द्वारा पंजीकृत सुरक्षा एजेंसियों/कंपनियों/कारपॉरेशन +की सेवाएं लें। +स्व-रोजगार योजनाएं. +सरकार ने भूतपूर्व सैनिकों तथा उनके परिवारों के पुनर्वास के लिए अनेक स्वरोजगार योजनाएं तैयार की +हैं। इनका विस्तृत ब्योरा इस प्रकार है- +सेना के फालतू वाहनों का आबंटन- भूतपूर्व सैनिक तथा सेवा के दौरान मारे गए सैनिकों की विधवाएं +सेना के V-B क्षेणी के फालतू वाहनों के लिए आवेदन कर सकती हैं। +कोयला परिवहन योजना - यह योजना पिछले 27 वर्षों से चल रही है। वर्ष 2007 में कोल इंडिया +लिमिटेड के लिए सात ई एस एम कोल कंपनियां स्पांसर की गई। +उद्यमी योजनाएं. +इस समय ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्र में सेमफेक्स-II तथा सेमफेक्स-III योजनाएं चल +रही हैं। प्रमुख संस्थान राष्ट्रीकृत बैंक, कोपरेटिव बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक आदि हैं। इन योजनाओं के लिए +25-30 प्रतिशत तक की सब्सिडी उपलब्ध है। भूतपूर्व सैनिक ऋण के लिए संबद्ध जिला सैनिक बोर्ड के +जरिए बैंक को सीधे आवेदन कर सकते हैं। +सेमफेक्स-II योजना. +ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्र में उद्यम शुरू करने के लिए नाबार्ड के सहयोग से 1988 में +यह योजना शुरू की गई। इसमें परियोजना लागत की 25 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है। योजना शुरू होने +से अब तक 7580 भूतपूर्व सैनिकों को 5706 लाख रूपये का ऋण इस योजना के तहत उपलब्ध कराया +जा चुका है। +सेमफेक्स-III योजना. +ग्रामीण क्षेत्रों में टेक्सटाइल, ग्रामीण, कुटीर, लघु तथा छोटे उद्योगों की स्थापना के लिए खादी तथा ग्रामीण +उद्योग आयोग की सहायता से 1992 में यह योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत 25 लाख रूपये +तक का ऋण तथा 30 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है। +प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति योजना +इस योजना का उद्देश्य भूतपूर्व सैनिकों तथा सैनिकों की विधवाओं के बच्चों को उच्च शिक्षा तथा +व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहन देना है। इसके तहत पूरे पाठ्यक्रम के दौरान छात्र को +1250 रूपये तथा छात्रा को 15 हजार रूपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। +तेल उत्पादन एजेंसी का आबंटन. +पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एलपीजी वितरण, पेट्रोल पंप श्रेष्ठ केरोसिन तेल वितरण इत्यादि +तेल उत्पादों की एजेंसी के लिए वारटाइम/पीस टाइम विधवाओं तथा शारीकिक रूप से अक्षम सैनिकों को +रक्षा श्रेणी के आवेदनों में आठ प्रतिशत आरक्षण देता हैं। +मदर डेयरी दुग्ध बूथ तथा फल-सब्जी (सफल) दुकानें. +ईएसएमपी बीओआर के लिए यह एक जांचा-परखा अच्छी आमदनी वाला स्वरोजगार है। मदर डेयरी से +विचार-विमर्श के बाद यह स्कीम अब न केवल एनसीआर अर्थात गुड़गांव, नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा बल्कि +अन्य राज्यों में भी बढ़ाई जा रही है। जयपुर को मार्च, 2009 में इसमें शामिल किया गया है। + +शिक्षा: +सन् 1976से पूर्व शिक्षा पूर्ण रूप से राज्यों का उत्तरदायित्व था। संविधान द्वारा 1976 में +किए गए जिस संशोधन से शिक्षा को समवर्ती सूची में डाला गया, उस के दूरगामी परिणाम हुए। +आधारभूत, वित्तीय एवं प्रशासनिक उपायों को राज्यों एवं केंद्र सरकार के बीच नई जिम्मेदारियों को बांटने +की आवश्यकता हुई। जहां एक ओर शिक्षा के क्षेत्र में राज्यों की भूमिका एवं उनके उत्तरदायित्व में कोई +बड़ा बदलाव नहीं हुआ, वहीं केंद्र सरकार ने शिक्षा के राष्ट्रीय एवं एकीकृत स्वरूप को सुदृढ़ करने का +गुरूतर भार भी स्वीकारा। इसके अंतर्गत सभी स्तरों पर शिक्षकों की योग्यता एवं स्तर को बनाए रखने एवं +देश की शैक्षिक जरूरतों का आकलन एवं रखरखाव शामिल है। +केंद्र सरकार ने अपनी अगुवाई में शैक्षिक नीतियों एवं कार्यक्रम बनाने और उनके क्रियान्वयन पर +नजर रखने के कार्य को जारी रखा है। इन नीतियों में सन् 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा-नीति (एनपीई) तथा +वह कार्यवाही कार्यक्रम (पीओए) शामिल है, जिसे सन् 1992 में अद्यतन किया गया। संशोधित नीति में +एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली तैयार करने का प्रावधान है जिसके अंतर्गत शिक्षा में एकरूपता लाने, प्रौढ़शिक्षा +कार्यक्रम को जनांदोलन बनाने, सभी को शिक्षा सुलभ कराने, बुनियादी (प्राथमिक) शिक्षा की गुणवत्ता बनाए +रखने, बालिका शिक्षा पर विशेष जोर देने, देश के प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालय जैसे आधुनिक विद्यालयों +की स्थापना करने, माध्यमिक शिक्षा को व्यवसायपरक बनाने, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विविध प्रकार की +जानकारी देने और अंतर अनुशासनिक अनुसंधान करने, राज्यों में नए मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना करने, +अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद को सुदृढ़ करने तथा खेलकूद, शारीरिक शिक्षा, योग को बढ़ावा +देने एवं एक सक्षम मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाने के प्रयास शामिल हैं। इसके अलावा शिक्षा में अधिकाधिक +लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु एक विकेंद्रीकृत प्रबंधन ढांचे का भी सुझाव दिया गया है। इन +कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में लगी एजेंसियों के लिए विभिन्न नीतिगत मानकों को तैयार करने हेतु एक विस्तृत +रणनीति का भी पीओए में प्रावधान किया गया है। +एनपीई द्वारा निर्धारित राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली एक ऐसे राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे पर आधारित है, +जिसमें अन्य लचीले एवं क्षेत्र विशेष के लिए तैयार घटकों के साथ ही एक समान पाठ्यक्रम रखने का +प्रावधान है। जहां एक ओर शिक्षा नीति लोगों के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराए जाने पर जोर +देती है, वहीं वह उच्च एवं तकनीकी शिक्षा की वर्तमान प्रणाली को मजबूत बनाने का आuन भी +करती है। शिक्षा नीति शिक्षा के क्षेत्र में कुल राष्ट्रीय आय का कम से कम 6 प्रतिशत धन लगाने पर +भी जोर देती है। +केंद्रीय शिक्षा परामर्शदाता बोर्ड (सीएबीई) शिक्षा के क्षेत्र में केंद्रीय और राज्य सरकारों को परामर्श +देने के लिए गठित सर्वोच्च संस्था है। इसका गठन 1920 में किया गया था और 1923 में व्यय में कमी +लाने के लिए इसे भंग कर दिया गया। 1935 में इसे पुन— गठित किया गया और यह बोर्ड 1994 तक अस्तित्व +में रहा। इस तथ्य के बावजूद कि विगत में सीएबीई के परामर्श पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं और शैक्षिक +एवं सांस्कृतिक विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श एवं परीक्षण हेतु इसने एक मंच उपलब्ध कराया है, +दुर्भाग्यवश मार्च, 1994 में बोर्ड के बढ़े हुए कार्यकाल की समाप्ति के बाद इसका पुनर्गठन नहीं किया गया। +देश में हो रहे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा की वर्तमान जरूरतों को +देखते हुए सीएबीई की भूमिका और भी बढ़ जाती है। अत— यह महत्व का विषय है कि केंद्र और राज्य +सरकारें, शिक्षाविद एवं समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधि आपसी विचार-विमर्श बढ़ाएं और शिक्षा के क्षेत्र +में निर्णय लेने की ऐसी सहभागी प्रक्रिया (प्रणाली) तैयार करें, जिससे संघीय ढांचे की हमारी नीति को +मजबूती मिले। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 (जैसा कि 1992 में संशोधित किया गया) में भी यह प्रावधान +है कि शैक्षिक विकास की समीक्षा करने तथा व्यवस्था एवं कार्यक्रमों पर नजर रखने के लिए आवश्यक +परिवर्तनों का निर्धारण करने में भी सीएबीई की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यह मानव संसाधन विकास के +विभिन्न क्षेत्रों में आपसी तालमेल एवं परस्पर संपर्क सुनिश्चित करने के लिए तैयार की गई उपयुक्त प्रणाली +के माध्यम से अपना कार्य करेगा। तदनुसार ही सरकार ने जुलाई, 2004 में सीएबीई का पुनर्गठन किया और +पुनर्गठित सीएबीई की पहली बैठक 10 एवं 11 अगस्त, 2004 को आयोजित की गई। विभिन्न विषयों के +विद्वानों के अलावा लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्यगण, केंद्र, राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासनों +के प्रतिनिधि इस बोर्ड के सदस्य होते हैं। +पुनर्गठित सीएबीई की 10 एवं 11 अगस्त, 2004 को हुई बैठक में कुछ ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर +विशेष विचार-विमर्श करने की आवश्यकता महसूस की गई। तदनुसार निम्नलिखित विषयों के लिए +सीएबीई की सात समितियां बनाई गईं- +निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक तथा प्राथमिक शिक्षा से जुड़े अन्य मामले, बालिका शिक्षा +तथा एक समान स्कूल प्रणाली, एक समान माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता, स्कूल +पाठ्यक्रम में सांस्कृतिक शिक्षा का एकीकरण, सरकार-संचालित प्रणाली के बाहर चल रहे स्कूलों के +लिए पाठ्य पुस्तकों एवं समानांतर पाठ्य पुस्तकों के लिए नियामक व्यवस्था तथा उच्च एवं तकनीकी +शिक्षा को वित्तीय सहायता देना। +उपर्युक्त हेतु समितियों का गठन सितंबर, 2004 में किया गया। इनसे मिली रिपोर्टों पर 14-15 +जुलाई, 2005 को नई दिल्ली में हुई सीएबीई की 53वीं बैठक में विचार-विमर्श किया गया। इन सभी +प्राप्त रिपोर्टों से उभरे कार्य-बिंदुओं की पहचान करने तथा उन पर एक निश्चित कार्यावधि में अमल +करने के लिए कार्य-योजना तैयार करने के आवश्यक उपाय किए जा रहे हैं। इसके साथ ही सीएबीई की +तीन स्थायी समितियां बनाए जाने का निर्णय किया गया है- +(i) नई शिक्षा नीति को लागू कराने की विशेष आवश्यकता सहित बच्चों एवं युवाओं के लिए +सन्निहित शिक्षा हेतु स्थायी समिति, +(ii) राष्ट्रीय साक्षरता मिशन को निर्देश देने के लिए साक्षरता और प्रौढ़ शिक्षा पर स्थायी समिति, +(iii) बच्चे की शिक्षा, बाल विकास, पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न योजनाओं को ध्यान में +रखते हुए बाल विकास प्रयासों के समन्वयन और एकीकरण मामलों के लिए एक स्थायी समिति। +सीएबीई की 6-7 सितंबर 2005 को हुई बैठक की सिफारिश के आधार पर एनसीईआरटी द्वारा +पाठ्य पुस्तकों के पाठ्यक्रम तैयार करने के प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए एक निगरानी समिति गठित +की गई है। प्रत्यापित और संबद्ध करने वाली संस्थाओं में नेट लाइन के माध्यम से आवेदन स्वीकार कर +उस पर कार्यवाही करने और अन्य मामलों में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से इनकी कार्यप्रणाली में सुधार +के लिए कदम उठाए गए हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नए विचारों के समावेश और सुधार प्रक्रिया पर +निगरानी के लिए राष्ट्रीय उच्च शिक्षा आयोग के गठन पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है। +शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन हेतु भारत एवं विदेशों +से प्राप्त होने वाली छोटी से छोटी सहायता (दान) राशि की सुगमता से प्राप्ति के लिए सरकार ने समिति +पंजीयन अधिनियम, 1860 के अंतर्गत एक पंजीकृत सोसायटी के तौर पर “भारत सहायता कोष” का गठन +किया है। 09 जनवरी, 2003 को “प्रवासी भारतीय दिवस” के अवसर पर आयोजित समारोह में विधिवत +प्रारंभ किया गया यह कोष शिक्षा के क्षेत्र से संबंधित सभी गतिविधियों एवं क्रियाकलापों के लिए निजी +संगठनों, व्यक्तियों, कारपोरेट (उद्योग) जगत, केंद्र एवं राज्य सरकारों, प्रवासी भारतीयों एवं भारतीय मूल +के लोगों से दान/अंशदान तथा सहायता राशि प्राप्त कर सकेगा। +व्यय. +शिक्षा के लिए और अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता के अनुपालन में पिछले वर्षों के दौरान +किए जाने वाले आवंटन में भारी वृद्धि हुई है। शिक्षा के लिए निर्धारित योजना परिव्यय पहली पंचवर्षीय +योजना के 151.20 करोड़ रूपये से बढ़कर दसवीं योजना (2002-2007) में 43,825 करोड़ रूपये हो +गया। सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की तुलना में शिक्षा पर किया जाने वाला व्यय वर्ष 1951-52 के +0.64 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2003-04 (बजट अनुमानों के अनुसार) में 3.74 प्रतिशत हो गया। +दसवीं पंचवर्षीय योजना के लिए निर्धारित 43,825 करोड़ रूपये का योजना परिव्यय नौवीं +पंचवर्षीय योजना के 24,908.38 करोड़ रूपये से 1.76 गुना अधिक है। इसमें से प्राथमिक शिक्षा एवं +साक्षरता विभाग को 30,000 करोड़ रूपये एवं माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग को 13,825 करोड़ रूपये +दिए गए हैं। वर्ष 2005-06 के दौरान प्राथमिक शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के लिए योजना परिव्यय +12,531.76 करोड़ रूपये तथा माध्यमिक शिक्षा विभाग के लिए योजना परिव्यय 2712.00 करोड़ रूपये +रहा। योजनावधि में शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों पर हुआ व्यय तालिका 10.1 में दिया गया है। +प्राथमिक शिक्षा. +सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए). +एक राष्ट्रीय योजना के रूप में सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए) की योजना देश के सभी जिलों में लागू +की जा रही है। एसएसए का उद्देश्य 2010 तक 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग वाले सभी बच्चों को उपयोगी +और प्रासंगिक प्राथमिक शिक्षा उपलबध कराना है। एसएसए के लक्ष्य इस प्रकार हैं — +(i) 2005 तक सभी स्कूलों, शिक्षा गारंटी योजना केंद्रों/ब्रिज पाठ्यक्रमों में 6-14 वर्ष के आयु वर्ग के समस्त बच्चे। +(ii) सभी प्रकार के लैंगिक एवं सामाजिक भेदभाव प्राथमिक शिक्षा के स्तर वर्ष 2007 तक तथा 2010 तक +बुनियादी शिक्षा स्तर पर समाप्त करना। +(iii) 2010 तक सभी के लिए शिक्षा। जीवन हेतु शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हुए संतोषप्रद गुणवत्ता की प्राथमिक शिक्षा पर जोर। +एसएसए कार्यक्रम के अंतर्गत नौवीं योजना में केंद्र और राज्य सरकारों के मध्य 85—15 की +सहभागिता प्रबंध के आधार पर सहायता दी गई, 10वीं योजना के दौरान सहभागिता प्रबंध 75—25 है तथा +इसके बाद यह 50—50 के आधार पर दी जाएगी। इसमें 8 उत्तर पूर्वी राज्य शामिल नहीं हैं जिनकी 15 +प्रतिशत सहायता राशि दो वर्षों (2005-06 और 2006-07) के लिए डीओएनईआर मंत्रालय मुहैया +कराएगा। +यह कार्यक्रम पूरे देश में लागू किया जाएगा तथा इसमें बालिकाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति के +छात्रों तथा कठिन परिस्थितियों में रह रहे छात्रों की शैक्षिक आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। +इस कार्यक्रम के अंतर्गत जिन आबादी क्षेत्रों में अभी तक स्कूल नहीं हैं, वहां नए स्कूल खोलना तथा +अतिरिक्त कक्षाओं हेतु नए कमरे, शौचालय, पेयजल, रखरखाव एवं स्कूल सुधार अनुदान के माध्यम से +नए स्कूल खोलना और उनमें सुधार लाना शामिल है। सर्वशिक्षा अभियान की शुरूआत से दिसंबर 2006 +तक लगभग 1.81 लाख नए विद्यालय खोले जा चुके हैं। 1,49,683 लाख नई विद्यालय इमारतें तथा +6,50,442 लाख अतिरिक्त कमरे या तो पूरे हो चुके हैं या पूरे होने वाले हैं और 31.3.2007 तक +एसएसए के अंतर्गत 8.14 लाख नए शिक्षक नियुक्त किए जा चुके हैं। सरकार ने एसएसए के लिए +ग्यारहवीं योजना में 576.45 करोड़ रूपये मुहैया कराए थे। +सर्वशिक्षा अभियान के तहत स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में भारी कमी लाने में सफलता +प्राप्त हुई है। 2001-02 में स्कूल छोड़ने वाले 3.20 करोड़ बच्चों के मुकाबले मार्च, 2007 में यह संख्या +लगभग 70 लाख रही। इसी अवधि के दौरान प्राथमिक स्तर पर लड़कियों के नामांकन में 19.2 प्रतिशत +की तथा उच्च प्राथमिक स्तर पर 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वर्तमान में 67 लाख बच्चे उन वैकल्पिक +स्कूलों में नामांकित हैं जो छोटे और दूर-दराज की रिहायशों में खोले गए हैं और कामकाजी बच्चों, +परिवारों के साथ दूसरी जगहों से आए बच्चे और शहरी वंचित बच्चों को शिक्षा मुहैया कराते हैं। एसएसए +में बालिकाओं एवं समाज के कमजोर वर्गों के बच्चों पर विशेष ध्यान देने का प्रावधान है। इसके तहत +ऐसे बच्चों के लिए नि—शुल्क पाठ्य पुस्तकों की व्यवस्था सहित कई अन्य कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। +शिक्षा के अंतर को समाप्त करने के लिए एसएसए के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों तक में कंप्यूटर शिक्षा दिलाने +का भी प्रावधान है। +शिक्षा गारंटी योजना तथा वैकल्पिक एवं अनूठी शिक्षा. +शिक्षा गारंटी योजना तथा वैकल्पिक एवं अनूठी शिक्षा (ईजीएस तथा एआईई) स्कूल नहीं जा रहे बच्चों +को बुनियादी शिक्षा कार्यक्रम के तहत लाने का सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए) का एक महत्वपूर्ण घटक +है। इस योजना में स्कूली शिक्षा से अभी तक छूट गए प्रत्येक बच्चे के लिए अलग से योजना बनाने का +प्रावधान है। +ईजीएस में ऐसे दुर्गम आबादी-क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है, जहां एक किलोमीटर के घेरे में कोई +औपचारिक स्कूल नहीं हो और स्कूल नहीं जाने वाले 6-14 वर्ष के आयु वर्ग के कम से कम 15-25 +बच्चे वहां मौजूद हों। पर्वतीय क्षेत्रों के दुर्गम क्षेत्रों जैसे अपवादों में 10 बच्चों पर भी एक ईजीएस स्कूल +खोला जा सकता है। +वैकल्पिक शिक्षा की शुरूआत समाज के वंचित वर्ग के बच्चों-बाल श्रमिक, सड़कों पर +जीवनयापन करने वाले बच्चे, प्रवासी बच्चे, कठिन परिस्थिति में रहने वाले बच्चे और 9 वर्ष से अधिक +आयु के बच्चों के लिए बनाई गई है। ईजीएस और एआईई में देश-भर में किशोरावस्था की बालिकाओं +पर विशेष ध्यान दिया जाता है। +उन आबादी क्षेत्रों (रिहायशी क्षेत्रों) में जहां स्कूल तो हैं, किंतु या तो उनमें बच्चों ने प्रवेश ही नहीं +लिया या भर्ती होने के बाद बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी, ऐसे बच्चे संभवतया पारंपरिक स्कूली प्रणाली से +सामंजस्य नहीं बिठा पाते। ऐसे बच्चों को स्कूल में वापस लाने हेतु स्कूल वापसी शिविरों का आयोजन +और सेतु (ब्रिज) पाठ्यक्रम की नीतियां लागू की गई हैं। सेतु पाठ्यक्रम और स्कूल वापसी शिविर बच्चों +की जरूरतों के अनुसार आवासीय और गैर आवासीय हो सकते हैं। +मध्याह्न भोजन योजना. +नामांकन बढ़ाने, उन्हें बनाए रखने और उपस्थिति के साथ-साथ बच्चों के बीच पोषण स्तर सुधारने के +दृष्टिकोण के साथ प्राथमिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पोषण सहयोग कार्यक्रम 15 अगस्त, 1995 से शुरू +किया गया। केंद्र द्वारा प्रायोजित इस योजना को पहले देश के 2408 ब्लॉकों में शुरू किया गया। वर्ष +1997-98 के अंत तक एनपी-एनएसपीई कोदेश के सभी ब्लॉकों में लागू कर दिया गया। 2002 में +इसे बढ़ाकर न केवल सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और स्थानीय निकायों के स्कूलों के कक्षा एक +से पांच तक के बच्चों तक किया गया बल्कि ईजीएस और एआईई केंद्रों में पढ़ रहे बच्चों को भी +इसके अंतर्गत शामिल कर लिया गया। इस योजना के अंतर्गत शामिल है — प्रत्येक स्कूल दिवस प्रति +बालक 100 ग्राम खाद्यान्न तथा खाद्यान्न सामग्री को लाने-ले जाने के लिए प्रति कुंतल 50 रूपये की +अनुदान सहायता सितंबर 2004 में, इस योजना में संशोधन कर सरकारी, सहायता प्राप्त स्कूलों और ईजीएस/एआईई +केंद्रों में पढ़ाई कर रहे कक्षा एक से पांच तक के सभी बच्चों को 300 कैलोरी और 8-10 ग्राम प्रोटीन +वाला पका हुआ मध्याह्न भोजन प्रदान करने की व्यवस्था की गई। नि—शुल्क अनाज देने के अतिरिक्त इस +संशोधित योजना के तहत दी जाने वाली केंद्रीय सहायता इस प्रकार है — +(क) प्रति स्कूल दिवस प्रति +बालक एक रूपया भोजन पकाने की लागत, (ख) विशेष वर्गीकृत राज्यों के लिए परिवहन अनुदान पहले +के 50 रूपये प्रति कुंतल से बढ़ाकर 100 रूपये प्रतिकुंतल तक किया गया, (ग) अनाज, परिवहन अनुदान +और रसोई सहायता को दो प्रतिशत की दर से प्रबंधन, निगरानी और मूल्यांकन लागत सहायता, (घ) +सूखा प्रभावित क्षेत्रों में गर्मियों की छुट्टी के दौरान मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराने का प्रावधान। जुलाई, +2006 में रसोई लागत में सहायता देने के लिए फिर इस योजना में संशोधन किया गया जो इस प्रकार है +(क) उत्तर पूर्व क्षेत्र के राज्यों के लिए प्रति बालक/स्कूल दिवस की दर से, एनईआर राज्यों का +योगदान 1.80 रूपये प्रति बालक/स्कूल दिवस, और (ख) अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के लिए +1.50 रूपये प्रति बालक/स्कूल दिवस तथा बाकी .50 रूपये प्रति बालक/स्कूल दिवस। ये राज्य और +केंद्रशासित प्रदेश मुहैया कराएंगे। +उद्देश्य. +मध्याह्न भोजन योजना के उद्देश्य हैं — +(i) सरकारी, स्थानीय निकाय तथा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों, और ईजीएस तथा एआईई केंद्रों में +कक्षा एक से पांचवीं तक पढ़ने वाले बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार। +(ii) सुविधाहीन वर्ग के गरीब बच्चों को कक्षाओं में नियमित उपस्थित रहने तथा कक्षाओं की +गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करना। +(iii) गर्मियों की छुट्टियों के दौरान सूखा प्रभावित क्षेत्रों में प्राथमिक स्तर के बच्चों को पोषण सहायता +उपलब्ध कराना। +कार्यक्रम मध्यस्थता और कवरेज. +उपर्युक्त उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सारणी के कॉलम 3 में दर्शाई गई मात्रा में पोषक तत्वों से +भरपूर पका हुआ मध्याह्न भोजन कक्षा एक से पांच तक पढ़ने वाले सभी बच्चों को उपलब्ध कराया +जाएगा— +पोषण सामग्री एनपी-एनएसपीई, 2004 एन पी- एनएसपीई, 2006 के +के मुताबिक नियम संशोधित नियम +कैलोरी 300 450 +प्रोटीन 8-12 12 +सूक्ष्म आहार निर्धारित नहीं आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन-ए +इत्यादि सूक्ष्म आहारों की पर्याप्त मात्रा +संशोधित योजना के भाग. +संशोधित योजना निम्नलिखित भागों को मुहैया कराती है — +(i) नजदीकी एफसीआई गोदाम से प्रति स्कूल प्रति बालक 100 ग्राम खाद्यान (गेहूं/चावल) की +निशुल्क आपूर्ति; +(ii) एफसीआई गोदाम से स्कूल तक खाद्यान्न ले जाने के लिए हुए वास्तविक परिवहन व्यय की +प्रतिपूर्ति जो अधिकतम इस प्रकार है— (क) 11 विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 100 रूपये प्रति +कुंतल। ये राज्य हैं — अरूणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, +सिक्किम, जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड और (ख) अन्य राज्यों और केंद्र +शासित प्रदेशों के लिए 75 रूपये प्रति कुंतल। +(iii) रसोई लागत के लिए निम्नलिखित दर से सहायता का प्रावधान —- +(क) उत्तरपूर्वी राज्यों — प्रति स्कूल प्रति बालक 1.80 रूपये की दर से राज्य +के लिए की सहायता 20 पैसे प्रति बालक। +(ख) अन्य राज्यों और — प्रति बालक प्रति स्कूल 1.50 रूपये की सहायता, राज्य/ +केंद्र शासित प्रदेशों केंद्र शासित प्रदेशों का योगदान 50 पैसे प्रति बालक। +के लिए +उपर्युक्त बढ़ी हुई केंद्रीय सहायता पात्रता के लिए राज्य सरकारों/केंद्रशासित प्रशासनों को न्यूनतम +सहायता उपलब्ध कराना आवश्यक है। +(iv) राज्य सरकारों द्वारा घोषित सूखा प्रभावित क्षेत्रों में गर्मियों की छुट्टियों में पका हुआ भोजन उपलब्ध +कराने के लिए सहायता का प्रावधान। +(v) चरणबद्ध तरीके से रसोई-सह-भंडार निर्माण के लिए प्रति इकाई 60 हजार रूपये तक सहायता का +प्रावधान। हालांकि अगले 2-3 वर्षों में सभी स्कूलों के लिए रसोई-सह-भंडार के निर्माण के लिए +एमडीएमएस के अंतर्गत आवंटन पर्याप्त नहीं लगता। अत— इस उद्देश्य के लिए अन्य विकास कार्यों +के साथ राज्य सरकारों से सकारात्मक सहयोग की अपेक्षा है। (कृपया पैरा 2.5 भी देखें) +(vi) 5000 रूपये प्रति स्कूल की सामान्य लागत पर भोजन सामग्री तथा रसोई उपकरण बदलने के लिए +चरणबद्ध तरीके से सहायता का प्रावधान। स्कूलों की वास्तविक आवश्यकताओं (राज्य/कें.शा.प्र. +के लिए कुल सामान्य सहायता प्रति स्कूल 5000 रूपये ही रहेगी) के आधार पर नीचे दी गई +वस्तुओं पर खर्च में लचीलापन राज्य/कें.शा.प्र. रख सकते हैं। +(ख) खाद्यान्न तथा अन्य सामग्री के भंडारण के लिए कंटेनर +(ग) खाना पकाने और खिलाने के लिए बर्तन +(vii) (क) मुफ्त खाद्यान्न, (ख) परिवहन लागत और (ग) खाना बनाने की लागत पर कुल सहायता का +1.8 प्रतिशत की दर से प्रबंधन, निगरानी और मूल्यांकन (एमएमई) के लिए राज्यों/कें.शा.प्र. को +सहायता का प्रावधान। उपर्युक्त राशि का अन्य 0.2 प्रतिशत प्रबंधन, निगरानी और मूल्यांकन के +लिए केंद्र सरकार द्वारा उपयोग में लाया जाएगा। +निगरानी पद्धति. +मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्राथमिक शिक्षा और साक्षरता विभाग ने मध्याह्न भोजन योजना की +निगरानी और निरीक्षण के लिए एक विस्तृत पद्धति निर्धारित की है। इसमें शामिल है— +ग्राम पंचायत ग्राम सभा प्रतिनिधि वीईसी, पीटीए, एस डी एमसी के साथ-साथ मदर्स समिति के सदस्य +भी प्रतिनिधि के हिसाब से निगरानी व्यवस्था इस प्रकार देख सकेंगे। (i) बच्चों को परोसे जाने वाले +मध्याह्न भोजन की निरंतरता और समग्रता (ii) मध्याह्न भोजन को पकाने और परोसने में स्वच्छता (iii) +अच्छी गुणवत्ता वाले सामान तथा ईंधन की समय पर खरीद (i1) विविध मेन्यु (प्रकार) के खाने की +उपलब्धता (1) सामाजिक और लैंगिक समानता। +पारदर्शिता और जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिए उन सभी स्कूलों और केंद्रों से, जहां यह कार्यक्रम +लागू किया जा रहा है स्व विवेक के आधार पर सूचना प्रदर्शन के लिए कहा जाता है। इस सूचना में +सम्मिलित है — +(i) प्राप्त खाद्यान्न की मात्रा, प्राप्ति की तारीख +(ii) उपयोग किए खाद्यान्न की मात्रा +(iii) अन्य खरीदे गए, उपयोग में लाए गए अंश +(iv) मध्याह्न भोजन पाने वाले बच्चों की संख्या +(v) दैनिक मेन्यु +(vi) कार्यक्रम में शामिल सामुदायिक सदस्यों का रोस्टर +राजस्व विभाग, ग्रामीण विकास, शिक्षा और महिला और बाल विकास, खाद्य, स्वास्थ्य जैसे अन्य +संबंधित क्षेत्रों के राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारियों से जिन स्कूलों में कार्यक्रम लागू किया जा रहा +है वहां निरीक्षण के लिए कहा जाता है। प्रत्येक तिमाही में 25 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों/ईजीएस और +एआईई केंद्रों के निरीक्षण की सिफारिश की गई है। +एफसीआई के डिपो में पर्याप्त खाद्यान्न निरंतर उपलब्ध रहे इसकी जिम्मेदारी एफसीआई की है +(उत्तरपूर्वी राज्यों के मामले में खाद्यान्न मुख्य वितरण केंद्रों पर उपलब्ध रहना चाहिए)। यहां किसी +महीने/तिमाही के लिए एक महीने पहले ही खाद्यान्न उठाने की अनुमति है ताकि खाद्यान्नों की आपूर्ति +निर्बाध बनी रहे। +एनपी-एनएसपीई, 2006 के लिए, एफसीआई को उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता के खाद्यान्न जारी +करने का आदेश है जो किसी भी हालत में कम से कम फेयर एवरेज क्वालिटी (एफएक्यू) का होगा। +एमडीएम कार्यक्रम के अंतर्गत खाद्यान्नों की आपूर्ति में आने वाली विभिन्न परेशानियों से निपटने +के लिए एफसीआई प्रत्येक राज्य में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करता है। जिलाअधिकारी/जिला +पंचायत प्रमुख सुनिश्चित करते हैं कि खाद्यान्न कम से कम एफएक्यू का है तथा एफसीआई और +जिलाधिकारी तथा/या जिला पंचायत प्रमुख द्वारा नामित व्यक्तियों की संयुक्त टीम के निरीक्षण के बाद ही +जारी किया जाता है। +भारत सरकार के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा राज्य सरकार/कें.शा.प्र. को (i) बच्चों और +संस्थानों के कवरेज, (ii) खाना पकाने की लागत, परिवहन, किचन शैड का निर्माण और किचन के +सामानों की प्राप्ति पर आवधिक सूचना दाखिल करने के लिए कहा जाता है। +सामाजिक विज्ञान शोध संस्थानों द्वारा निगरानी +सर्वशिक्षा अभियान की निगरानी के लिए चिह्नित 41 सामाजिक विज्ञान शोध संस्थानों को मध्याह्न भोजन +योजना की निगरानी का काम भी सौंपा गया है। +राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कहा गया है कि जन शिकायतों के निवारण के लिए एक समुचित +पद्धति विकसित करें जिसका बड़े पैमाने पर प्रचार होना चाहिए और आसान पहुंच में हो। +केंद्रीय बजट 2007-08 में वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि मध्याह्न भोजन योजना 2007-08 में 3427 +शैक्षिक रूप से पिछड़े ब्लॉकों (ईबीबी) में उच्च प्राथमिक कक्षाओं के बच्चों को कवर करने के लिए +बढ़ाई जाएगी। इसके लिए 7324 करोड़ रूपये का बजट प्रावधान रखा गया है जो 2006-07 के बजट के +मुकाबले 37 प्रतिशत अधिक है। +जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी). +केंद्र द्वारा प्रायोजित जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी) 1994 में शुरू किया गया था। इसका +उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में फिर से जान फूंकना और प्राथमिक शिक्षा के सावर्गीकरण का लक्ष्य पूरा +करना था। +कार्यक्रम मानदंडों के अनुसार 5-7 वर्ष की अवधि के लिए प्रति जिला निवेश सीमा 40 करोड़ +रूपये हैं। इसमें निर्माण कार्यों पर 33.3 प्रतिशत और प्रबंधन मद में व्यय सीमा 06 प्रतिशत है। शेष राशि +गुणवत्ता सुधार कार्यक्रमों के लिए है। +डीपीईपी बाहरी सहायता से चलने वाला कार्यकम है। परियोजना व्यय का 85 प्रतिशत केंद्र +सरकार द्वारा एवं शेष 15 प्रतिशत संबंधित राज्य सरकारों द्वारा वहन किया जाता है। केंद्र सरकार का +हिस्सा विदेशों से प्राप्त सहायता के माध्यम से आता है। वर्तमान में विदेशी सहायता लगभग 6938 करोड़ +रूपये हैं, जिसमें से 5137 करोड़ रूपये अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (आईडीए) से ऋण रूप में तथा शेष +1801 करोड़ रूपये अनुदान के रूप में है। +इस समय डीपीईपी नौ राज्यों के 123 जिलों में चल रहा है। अपने सर्वोच्च स्तर पर डीपीईपी +किसी समय 18 राज्यों के 273 जिलों में चल रहा था। धीरे-धीरे इसमें कमी आने के साथ ही अब यह +मात्र 123 जिलों में लागू है। +डीपीईपी की प्रमुख उपलब्धियां. +(i) डीपीईपी ने अभी तक 1,60,000 से अधिक स्कूल खोले हैं, जिसमें लगभग 84,000 वैकल्पिक +शिक्षण केंद्र (एएस) हैं। इन वैकल्पिक शिक्षण केंद्रों में 35 लाख बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जबकि +अन्य दो लाख बच्चे विभिन्न प्रकार के सेतु (ब्रिज) पाठ्यक्रमों का लाभ उठा रहे हैं। (ii) डीपीईपी के +अंतर्गत तैयार किया गया स्कूली ढांचा उल्लेखनीय है। 52,758 स्कूली भवनों; 58,604 अतिरिक्त +कक्षाओं; 16,619 संसाधन केंद्रों; 29,307 मरम्मत कार्यों; 64,592 शौचालयों और 24,909 पेयजल +सुविधाओं के निर्माण का कार्य या तो पूरा हो चुका है या प्रगति पर है। (iii) पिछले तीन वर्षों के +दौरान चरण-I के राज्यों में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 93 से 95 प्रतिशत रहा है। +वैकल्पिक स्कूलों/शिक्षा गारंटी केंद्रों में दाखिले का समायोजन करने के बाद वर्ष 2001-02 में +जीईआर 100 प्रतिशत से भी अधिक आता है। जो जिले डीपीईपी के अंतर्गत आते हैं और जहां +डीपीईपी अलग-अलग चरणों में लागू है, वहां वैकल्पिक स्कूलों/शिक्षा गारंटी स्कूलों (एएस/ईजीएस) +सहित सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 85 प्रतिशत से अधिक है। (i1) बालिकाओं के नामांकन +(दाखिले) में अच्छा खासा सुधार हुआ है। डीपीईपी चरण-I के जिलों में हुए कुल नामांकनों की +तुलना में बालिकाओं के नामांकन में 48 से 49 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि डीपीईपी जिलों में +विभिन्न चरणों में यह वृद्धि 46 से 47 प्रतिशत है। (1) वर्तमान में नामांकन किए हुए कुल विभिन्न +प्रकार के सक्षम बच्चों की कुल संख्या 4,20,203 है, जो डीपीईपी राज्यों में विभिन्न प्रकार के सक्षम +बच्चों की कुल संख्या 5,53,844 का लगभग 76 प्रतिशत है। (1i) सभी परियोजना गांवों/रिहाइशी +इलाकों/स्कूलों में ग्राम शिक्षा समितियों/स्कूल प्रबंधन समितियों का गठन किया गया है। (1ii) अंशकालिक +शिक्षकों, शिक्षाकर्मियों सहित लगभग 1,77,000 अध्यापकों की नियुक्ति की गई है। (1iii) शिक्षा +संबंधी सहायता और शिक्षण प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रखंड (ब्लॉक) स्तर पर +3380 संसाधन केंद्र और समूह स्तर पर 29,725 केंद्रों की स्थापना की गई है। +महिला समाख्या योजना. +महिला समाख्या योजना ग्रामीण क्षेत्रों खासकर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछडेΠ समूहों की +महिलाओं की शिक्षा तथा उनके सशक्तिकरण के लिए 1989 में शुरू की गई। एनपीई, 1986 के उद्देश्यों +के अनुरूप लक्ष्य हासिल करने के लिए एक ठोस कार्यक्रम के रूप में इसकी शुरूआत हुई। समानता +हासिल करने में महिलाओं को शिक्षित बनाने में एमएस योजना को पहचाना जाता है। महिला संघ गांव +स्तर पर महिलाओं को मिलने, सवाल करने और अपने विचार रखने तथा अपनी आवश्यकताओं को +व्यक्त करने के अलावा अपनी इच्छाओं को जाहिर करने का स्थान मुहैया कराते हैं। +महिला संघों ने ग्रामीण महिलाओं के दृष्टिकोण में विभिन्न कार्यक्रमों और जागरूकता अभियानों +के माध्यम से बदलाव ला दिया है जिसका प्रभाव अब घर, परिवार में, सामुदायिक तथा ब्लॉक और +पंचायत स्तर पर देखा जा सकता है। कार्यक्रम में बच्चों खासकर लड़कियों की शिक्षा की आवश्यकता पर +जागरूकता पैदा करने पर भी केंद्रित होता है। ताकि लड़कियों को भी बराबर का दर्जा और अवसर मिल +सके। इसके परिणाम स्कूलों में लड़कियों के नामांकन में वृद्धि और स्कूल न छोड़ने के रूप में सामने +आए हैं। +महिला समाख्या योजना वर्तमान में नौ राज्यों के 83 जिलों में 21,000 गांवों में चलाई जा रही है। +ये नौ राज्य हैं — आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, झारखंड, कर्नाटक, केरल, गुजरात, उत्तर प्रदेश और +उत्तराखंड। वित्त वर्ष 2007-08 से इस योजना को दो और राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बढ़ाया +गया है। वित्त वर्ष 2007-08 में इस योजना के लिए 34 करोड़ का बजटीय प्रावधान रखा गया। +अध्यापक शिक्षा योजना. +केंद्र द्वारा प्रायोजित अध्यापक शिक्षा योजना निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ 1987-88 में शुरू की गई +थी — +(1) जहां संभव हो मौजूदा प्रारंभिक अध्यापक शिक्षण संस्थानों (ईटीईआई) का स्तर बढ़ाकर और +जहां आवश्यक हो नए डीआईईटी की स्थापना कर जिला शिक्षण और प्रशिक्षण संस्थान +(डीआईईटी) की स्थापना। +(2) चयनित द्वितीयक अध्यापक शिक्षण संस्थानों (एसटीईआई) का में स्तर बढ़ाना— +(3) राज्य शैक्षिक शोध और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) को मजबूती प्रदान करना। +योजना 2003 में संशोधित की गई और जनवरी 2004 में संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए गए। +अध्यापक शिक्षा योजना के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं — +(1) डीआईईटी/सीटीई/आईएएसई/एससीईआरटी की उन परियोजनाओं को तेजी से पूरा करना जो नौवीं +पंचवर्षीय योजना के दौरान मंजूर की गई थीं लेकिन समय से पूरी नहीं हो सकीं। +(2) नौवीं पंचवर्षीय योजना अवधि तक के डीआईईटी, सीटीई/आईएएसई को स्वीकृति प्रदान करना +और एससीईआरटी को सुदृढ़ बनाना तथा उन्हें संचालन योग्य बनाना। +(3) आवश्यकतानुसार डीआईईटी/सीटीई/आईएएसई/एससीईआरटी की नई परियोजनाओं को मंजूरी +देना और उन्हें लागू करना। +(4) डीआईईटी के सेवाकालीन और सेवा पूर्ण प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रमों की गुणवत्ता में सुधार करना +ताकि वे अपने-अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में +केंद्रीय भूमिका निभा सकें और अपेक्षित स्तर की उपलब्धि हासिल कर सकें। +डीआईईटी/जिला संसाधान केंद्र (डीआरसी) स्थापित करने के मानदंड. +1. कम से कम 2500 अध्यापकों वाले प्रत्येक जिले के लिए एक डीआईईटी, यदि जिले में पहले +से सरकारी ईटीईआई है तो इसे डीआईईटी ग्रेड तक बढ़ाया जाएगा। यदि कोई ईटीईआई मौजूदा नहीं तो +जिले में नया डीआइईटी स्थापित किया जाएगा। +2. 2500 अध्यापकों वाले जिलों में जिला संसाधन केंद्रों की स्थापना यदि जिले में सरकारी +ईटीईआई मौजूद है तो इसे डीआरसी स्तर तक बढ़ाया जाएगा अन्यथा नया डीआरसी स्थापित किया +जाएगा। ऐसे मामले में ये केंद्र पूर्व-सेवा पाठ्यक्रम संचालित नहीं करेगा। +3. यदि किसी जिले में 2500 से अधिक अध्यापक हैं तो राज्य सरकार डीआईईटी की अपेक्षा +डीआरसी स्थापित करने को प्राथमिकता देगी। +अध्यापक शिक्षा के लिए 11वीं योजना के प्रस्तावों के लिए एनसीईआरटी के निदेशक की अध्यक्षता +में एक उप-समूह गठित किया गया था। उप-समूह की सिफारिशों के आधार पर, योजना के वर्तमान +प्रावधानों को सुदृढ़ करने के अतिरिक्त 11वीं योजना के दौरान कुछ नई योजनाओं को शामिल करने का +प्रस्ताव है। +1. अनु.जा./ज.जा. तथा अल्पसंख्यक क्षेत्रों (ब्लॉक अध्यापक शिक्षण संस्थान) में अध्यापक शिक्षण +क्षमता बढ़ाना। +2. सेवारत प्राथमिक और द्वितीयक अध्यापकों का व्यावसायिक विकास +3. अध्यपक शिक्षकों का व्यावसायिक विकास +4. एनजीओ को सहयोग +5. उत्तरपूर्व के लिए विशेष कार्यक्रम +6. अध्यापक शिक्षा में प्रौद्योगिकी +7. उच्च शिक्षा के साथ एकीकृत प्राथमिक अध्यापक शिक्षा +चालू वित्त वर्ष अर्थात 2007-08 के दौरान अध्यापक शिक्षा योजना के लिए 500 करोड़ रूपये का +प्रावधान किया गया है। इनमें से 50 करोड़ रूपये उत्तर पूर्व क्षेत्र के लिए निर्धारित किए गए हैं। +राष्ट्रीय बाल भवन. +राष्ट्रीय बाल भवन, मानव संसाधन और विकास मंत्रालय द्वारा पूर्ण रूप से वित्त पोषित एक स्वायत्तशासी +संस्था है जो स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के तहत कार्य करती है। 1956 में इसके गठन से ही बाल +भवन ने देशभर में उत्तरोत्तर प्रगति की है। वर्तमान में राष्ट्रीय बाल भवन से संबद्ध 68 राज्य बाल भवन +तथा 10 बाल केंद्र हैं। संबद्ध बाल भवनों और बाल केंद्रों के माध्यम से बाल भवन की स्कूल छोड़ने +वाले बच्चे, सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चे, गलियों के बच्चे तथा विशेष बच्चों तक +पहुंच है। दिल्ली के कई स्कूलों ने राष्ट्रीय बाल भवन की सदस्यता ली है और औपचारिक तथा +अनौपचारिक संस्थानों के इस साझा प्रयासों से ही बच्चों की रचनात्मक अभिवृद्धि में बड़ी सफलता प्राप्त +हुई है। +राष्ट्रीय बाल भवन बच्चों को उनके लिंग, जाति, धर्म, रंग आदि भेदभाव के बिना तनावमुक्त +वातावरण में विभिन्न गतिविधियों में शामिल कर उनके समग्र विकास के लिए कार्यरत है। इनमें कुछ +प्रमुख गतिविधियां हैं— क्ले मॉडलिंग, पेपर मैची, संगीत, नृत्य, नाटक, पेंटिंग, क्राफ्ट, म्यूजियम गतिविधि, +फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंडोर-आउटडोर खेल, गृह प्रबंधन, पारंपरिक कला तथा क्राफ्ट, शैक्षिक और +इन्नोवेटिव खेल/चेस, विज्ञान रोचक है इत्यादि। राष्ट्रीय बाल भवन के कुछ विशेष आकर्षण हैं— मिनी +ट्रेन, मिनीज़ू, फिश कॉर्नर, साइंस पार्क, फनी मिरर, कल्चर क्राफ्ट विलेज। राष्ट्रीय बाल भवन में राष्ट्रीय +प्रशिक्षण संसाधन केंद्र (एनटीआरसी) है जो विभिन्न गतिविधियों में अध्यापकों को प्रशिक्षित करता है। +इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य और ध्यान बच्चों के सर्वांगीण विकास और व्यक्तित्व विकास में अध्यापकों को +प्रशिक्षित करना है क्योंकि अध्यापक समुदाय बच्चों की सामाजिक आर्थिक, भावुक, बौद्धिक और +मनोवैज्ञानिक जरूरतों को समझने में कुशल होते हैं। एनटीआरसी का उद्देश्य अध्यापकों और छात्रों दोनों +के लिए अध्यापन और सीखने को एक सुखद अनुभव बनाना भी है। +राष्ट्रीय बाल भवन ने उन रचनाशील बच्चों को उनके सामाजिक-आर्थिक स्तर में भेद किए बिना +पहचान, सम्मान और देखभाल के लिए एक योजना भी शुरू की है। “द बालश्री स्कीम” योजना के पीछे +मकसद यही है कि रचनात्मकता मानवीय संभावना है जिसका सीधा संबंध स्व-अभिव्यक्ति और स्वविक +ास से होता है। इस योजना के तहत चार रचनात्मक क्षेत्रों अर्थात सृजनात्मक कला, सृजनात्मक +प्रदर्शन, सृजनात्मक वैज्ञानिक खोज, सृजनात्मक लेखन में 9-16 वर्ष के आयु वर्ग की रचनात्मकता वाले +बच्चों की पहचान करना है। यह योजना 1995 से चालू है और तब से बच्चों को उनके रचनात्मक क्षेत्रों +में उत्कृष्टता के लिए पहचान कर उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। ये सम्मान उनको या तो राष्ट्रपति या +उनकी पत्नी से राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक रंगारंग कार्यक्रम में दिए गए हैं। +इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय बाल भवन कुछ स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसे- +कार्यशालाएं, ट्रेकिंग कार्यक्रम, टाक शो, केंप, आयोजित करता है। इसके अलावा पृथ्वी दिवस, +पर्यावरण- दिवस इत्यादि भी मनाता है। अंतर्राष्ट्रीय बाल सभा, युवा पर्यावरणविद सम्मेलन, सभी के +लिए शिक्षा तथा अध्यक्षों और निदेशकों का अखिल भारतीय सम्मेलन मानव संसाधन और विकास +मंत्रालय की देखरेख में आयोजित करता है। इन सब के अतिरिक्त राष्ट्रीय बाल भवन देश के विभिन्न +भागों से अपने बच्चों को सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न देशों में भेजता है और ये +बच्चे उप-महाद्वीप की सामाजिक सांस्कृतिक विशिष्टता के युवा राजदूत के रूप में कार्य करते हैं। इसके +साथ-साथ राष्ट्रीय बाल भवन के सदस्य बच्चे, देशभर में संबद्ध बाल भवनों के बच्चे और राष्ट्रीय बाल +भवन के सदस्य स्कूल/संस्थान भी वैश्विक समस्याओं के थीम पर अंतर्राष्ट्रीय पेंटिंग प्रतियोगिता में +हिस्सा लेते हैं। +राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्. +राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (एनसीटीई) की स्थापना अगस्त, 1995 में इस लक्ष्य के साथ की गई थी +कि पूरे देश में अध्यापक शिक्षा प्रणाली का नियोजित एवं समन्वित विकास किए जाने के साथ ही जरूरी +नियम बनाने और अध्यापक शिक्षा के मानकों एवं स्तरों का उचित संरक्षण किया जा सके। एनसीटीई के +कुछ प्रमुख कार्य विभिन्न अध्यापक शिक्षा कार्यक्रमों के लिए स्तरों का निर्धारण करना, अध्यापक शिक्षा +संस्थानों को मान्यता प्रदान करना, अध्यापकों की नियुक्ति के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यताओं हेतु +दिशा-निर्देश तैयार करना, सर्वेक्षण और अध्ययन करना, अनुसंधान एवं नवीन तरीके अपनाना तथा शिक्षा +के व्यावसायीकरण पर रोक लगाना इत्यादि हैं। +परिषद् की चार क्षेत्रीय समितियां जयपुर, बंगलुरू, भुवनेश्वर तथा भोपाल में गठित की गई हैं जो +क्रमश— उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी एवं पश्चिमी क्षेत्र के लिए हैं। ये क्षेत्रीय समितियां अपने-अपने क्षेत्र में +अध्यापक-शिक्षण संस्थानों को मान्यता देने का कार्य करती हैं। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् अधिनियम +के प्रावधानों के अंतर्गत इन्हें अध्यापक शिक्षण पाठ्यक्रम चलाने के लिए ऐसी संस्थाओं को अनुमति देने +का अधिकार है। +एक जनवरी, 2007 तक एनसीटीई ने 9045 पाठ्यक्रमों के माध्यम से 7.72 लाख प्रशिक्षु +अध्यापकों को प्रशिक्षण देने हेतु 7461 अध्यापक प्रशिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रदान की। एनसीटीई ने +सी.एड, डी.एæ, बी.एड, डीपी.एड और एमपी.एड जैसे विभिन्न अध्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए +नए नियम और मानक जारी किए हैं। नए नियम अध्यापक कार्यक्रमों की गुणवत्ता सुधारने और अध्यापक +शिक्षण संस्थानों में अन्य सुविधाओं के अलावा बुनियादी मजबूती के लिए बनाए गए हैं। +शिक्षा का अधिकार. +दिसंबर 2002 में बने संविधान (86वें संशोधन) अधिनियम, 2002 के भाग-III (मूलभूतअधिकार) में +एक नई धारा 21-ए जोड़कर 6-14 आयुवर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मूलभूत +अधिकार बनाने की बात करता है। संविधान की धारा 21ए कहती है — +मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा।”” +सरकार एक ऐसे उपयुक्त कानून के अधिनियन को वचनबद्ध है जो संविधान की आवश्यकतानुसार +शिक्षा को मूलभूत अधिकार बनाने के अहसास को मजबूत बनाए। संविधान की धारा 21ए के तहत +विचारित उपयुक्त कानून के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। +प्रारंभिक शिक्षा कोश. +बुनियादी शिक्षा की गुणवत्ता हेतु सरकार की वित्तीय सहायता के लिए वित्त (नं.2) अधिनियम, 2004 के +जरिए सभी प्रमुख केंद्रीय करों पर दो प्रतिशत शिक्षा अधिकार लगाया गया था। इस शिक्षा अधिकार को +एकत्रित कर प्राप्त करने के लिए सरकार द्वारा 6.10.2005 को सार्वजनिक खाते में एक निष्क्रिय फंड +प्रारंभिक शिक्षा कोश (पीएसके) स्वीकृत किया गया था। पीएसके बनाने का औपचारिक आदेश +14.11.2005 को जारी किया। +28.2.2006 को केंद्रीय बजट (2006-07) की प्रस्तुति के बाद पीएसके एक अलग मद बन गया। +शिक्षा अधिकार की अनुमानित प्राप्ति को ध्यान में रखकर केंद्रीय बजट 2006-07 में पीएएस के खाते में +8746 करोड़ रूपये प्रारंभ में स्थानांतरित करने का प्रावधान किया गया। बाद में, अनुदान के लिए तीसरी +पूरक मांग के बैच में 2006-07 के दौरान 2 प्रतिशत शिक्षा अधिकार के अतिरिक्त अनुमानों पर आधारित +पीएसके में 189 करोड़ रूपये अतिरिक्त स्थानांतरित किए गए। पीएसके के तहत उपलब्ध फंड का +उपयोग विशेष रूप से सर्वशिक्षा अभियान एसएसए और प्राथमिक शिक्षा के पोषण सहयोग के लिए +राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए ही किया गया। शिक्षा अधिकार प्राथमिक शिक्षा के लिए निश्चित फंड उपलब्ध +कराने की दिशा में एक ठोस कदम है। +राष्ट्रीय साक्षरता मिशन. +राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना मई 1988 में की गई थी। इसका उद्देश्य 2007 तक 15 से 35 वर्ष +तक के आयु वर्ग के उत्पादक और पुनरोत्पादक समूह के निरक्षर लोगों को व्यावहारिक साक्षरता प्रदान +करते हुए 75 प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य हासिल करना है। व्यावहारिक साक्षरता के अंतर्गत पठन, लेखन +गणना-बोध के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता पर्यावरण संरक्षण, नारी समानता और सीमित परिवार के सिद्धांत +और मूल्य निहित हैं। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में निहित साक्षरता की अवधारणा मात्र साक्षरता तक सीमित +नहीं है बल्कि उपरिलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अधिगमोन्मुख समाज के निर्माण का एक कारगर +शस्त्र है। जीवन की गुणवत्ता में एक निश्चित सुधार और सशक्तिकरण ही व्यावहारिक साक्षरता की प्रमुख +उपलब्धि है। +निरक्षरता उन्मूलन के लिए संपूर्ण साक्षरता अभियान ही राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की मुख्य अवधारणा +है। ये अभियान समयबद्ध, विशिष्ट क्षेत्र, सहभागिता, किफायती, उपलब्धिपरक हैं, इन्हें जिला साक्षरता- +समितियां (जिला स्तर की साक्षरता समिति) स्वतंत्र और स्वायत्तशासी संस्था के रूप में क्रियान्वित करती +हैं, इनमें समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होता है। व्यावहारिक साक्षरता देने के अतिरिक्त संपूर्ण +साक्षरता अभियान (टीएलसी) सामाजिक जरूरत के महत्वपूर्ण संदेशों का प्रचार-प्रसार भी करता है +जिनमें बच्चों का स्कूलों में दाखिला और उनकी शिक्षा, टीकाकरण, परिवार सीमित रखने के उपायों का +प्रचार, महिला समानता और सशक्तिकरण, शांति और सद्भाव आदि शामिल हैं। इन साक्षरता अभियानों +ने प्राथमिक शिक्षा की मांग भी पैदा की है। जिन लाखों निरक्षर लोगों ने व्यावहारिक शिक्षा की दक्षता +हासिल की है वे बेहद नाजुक स्थिति में होते हैं यदि ऐसे नवसाक्षर लोगों को साक्षरता की प्रक्रिया से +जोड़े रखने और उनकी शिक्षा का स्तर बनाए रखने के प्रयास नहीं किए गए तो इनके फिर से निरक्षर हो +जाने की संभावना बनी रहती है। मूल साक्षरता का पहला चरण निर्देशों पर आधारित है जबकि दूसरे +चरण में सुदृढ़ीकरण और निदान शामिल हैं। अब कौशल उन्नतिकरण को एक स्थिति से दूसरी स्थिति में +पहुंचने के लिए निरंतरता, दक्षता और अभिमुखता सुनिश्चित करने में एक समन्वित परियोजना के रूप में +देखा जाता है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन का उद्देश्य यह है कि संपूर्ण साक्षरता अभियान और साक्षरता के +बाद के कार्यक्रम सफलतापूर्वक अनवरत शिक्षा-प्रक्रिया के रूप में जारी रहें और जीवनपर्यन्त साक्षरता के +अवसर उपलब्ध कराते रहें। इस समय संपूर्ण साक्षरता अभियान 101 जिलों में लागू है जबकि साक्षरता +पश्चात कार्यक्रम 168 जिलों में क्रियान्वित है। +सतत शिक्षा योजना देश में संपूर्ण साक्षरता और साक्षरता पश्चात कार्यक्रमों के लक्ष्य हासिल करने +के प्रयासों को सतत अधिगम प्रदान करता है। नव साक्षर लोगों को आगे अधिगम के अवसर उपलब्ध +कराने के लिए अनवरत शिक्षा केंद्रों की स्थापना पर मुख्य जोर दिया जाता है। ये केंद्र मूल साक्षरता, +साक्षरता कौशल में सुधार, वैकल्पिक शिक्षा कार्यक्रमों और व्यावसायिक कौशल की खोज तथा +सामाजिक और पेशागत विकास के प्रोत्साहन के लिए क्षेत्रीय मांग और जरूरत के मुताबिक अवसर +उपलब्ध कराते हैं। इस योजना के अंतर्गत अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम चलाए जाते हैं जैसे-प्रतिभागियों में +व्यावसायिक कौशल बढ़ाने, आय उत्पादक गतिविधियां शुरू करने में सहयोग प्रदान करने वाला +समतुल्यता कार्यक्रम, जीवन गुणवत्ता कार्यक्रम जिसके माध्यम से नौसिखिए और समुदाय अपना जीवन +स्तर ऊंचा उठाने के लिए जरूरी ज्ञान, दृष्टिकोण, मूल्य और कौशल हासिल कर सकें और व्यक्तिगत +अभिरूचि प्रोत्साहन कार्यक्रम जिसके तहत कोई भी नौसिखिया व्यक्तिगत रूप से सामाजिक स्वास्थ्य, +शारीरिक, सांस्कृतिक और कलात्मक अभिरूचियों के अनुसार अवसर हासिल कर सकता है। +भौगोलिक दृष्टि से दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ +महिलाओं तथा वहां के लोगों की जरूरत को पूरा करने के लिए अवशेष साक्षरता कार्यक्रम चलाए जा रहे +हैं। सतत शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत अब तक 328 जिले शामिल किए जा चुके हैं। +गैर सरकारी संगठन — राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (एनएलएम) अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए स्वयंसेवी +संगठनों की अपार क्षमताओं को मान्यता देता है। इसने स्वयंसेवी संगठनों के साथ साझेदारी मजबूत बनाने के +लिए कई उपाय किए हैं। इसके साथ ही साक्षरता आंदोलन में स्वयंसेवी संगठनों को सक्रिय उत्साहवर्धक +भूमिका सौंपी गई है। साक्षरता उपलब्ध कराने के अलावा स्वयंसेवी संगठन प्रयोगात्मक और नवोन्मुख +कार्यक्रमों के माध्यम से शैक्षिक और तकनीकी विशेषज्ञों की सेवाएं भी उपलब्ध कराता है। स्वयंसेवी संगठनों +की ओर से संचालित राज्य संसाधन केंद्रों से प्रशिक्षण सामग्री, विस्तारगत विधियां नवोन्मुख परियोजनाएं, +अनुसंधान अध्ययन और मूल्यांकन सामग्री के रूप में अकादमिक और तकनीकी संसाधन सहयोग उपलब्ध +कराया जाता है। इस समय कुल 26 राज्य संसाधन केंद्र कार्यरत हैं। +महिला साक्षरता के लिए विशेष हस्तक्षेप - 2001 की जनगणना के अनुसार देश के 47 +जिलों में महिला साक्षरता दर 30 प्रतिशत से नीचे है इसलिए राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के लिए इतनी कम +महिला साक्षरता दर एक चिंता का विषय है। इस बात को ध्यान में रखते हुए 47 जिलों में नीची महिला +साक्षरता दर में सुधार का लक्ष्य निर्धारित किया गया। इनमें से अधिकांश जिले उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा +और झारखंड जैसे राज्यों में हैं। इन जिलों में महिला साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रवर्तित +कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में यह कार्यक्रम पूरा हो चुका है और इसका +मूल्यांकन भी किया जा चुका है। +उड़ीसा में नौ जिलों में महिला साक्षरता दर काफी कम है इन जिलों को एक विशेष परियोजना के +तहत त्वरित महिला साक्षरता कार्यक्रम में शामिल किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत 15 से 35 वर्ष +आयु वर्ग के करीब 10,43,000 महिलाओं को साक्षर बनाने का कार्य 117 स्वयंसेवी संगठनों के नेटवर्क +को सौंपा गया। इस कार्यक्रम का बाह्य मूल्यांकन एजेंसियों द्वारा मूल्यांकन किया जा रहा है। +विशिष्ट महिला साक्षरता कार्यक्रम झारखंड के उन पांच जिलों में भी लागू किया जा रहा है जहां +महिला साक्षरता दर बहुत कम है। इन जिलों की 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग की करीब पांच लाख +महिलाओं को इस कार्यक्रम में शामिल किया गया। यह कार्यक्रम भी लगभग पूरा हो चुका है केवल दो +जिलों में बाह्य मूल्यांकन का काम बाकी है। +अवशेष निरक्षरता की परियोजनाएं. +यद्यपि संपूर्ण साक्षरता अभियान पूरे देश में एक जन आंदोलन के रूप में चलाया गया लेकिन कई इलाकों +में यह प्राकृतिक आपदाओं तथा राजनीतिक इच्छा शक्ति में कमी के कारण पूरा नहीं हो सका। साक्षरता +में सफलता के बावजूद अभी भी कुछ इलाकों में नीची महिला साक्षरता दर और अवशेष निरक्षरता मौजूद +है। इस समस्या के निदान के लिए अवशेष निरक्षरता परियोजनाएं आरंभ की गईं। इसके तहत राजस्थान +के 9 जिलों के करीब 6.6 लाख, आंध्र प्रदेश के 10 जिलों में 22.81 लाख, बिहार के सात जिलों में +12.54 लाख, झारखंड के तीन जिलों में 3.01 लाख, कर्नाटक के 14 जिलों में 27.35 लाख, मध्य प्रदेश +के 12 जिलों में सात लाख और त्रिपुरा के तीन जिलों में एक लाख अड़तीस हजार तथा पश्चिम बंगाल +के आठ जिलों में 29 लाख 54 हजार, उत्तर प्रदेश के 18 जिलों में 36.11 लाख और मिजोरम के चार +जिलों में 0.45 लाख नव साक्षरों को शामिल किया गया। +विशेष साक्षरता अभियान. +एनएलएमए परिषद की अप्रैल 2005 में हुई बैठक में देशभर से ऐसे +150 जिलों की पहचान की गई जिनमें साक्षरता दर सबसे कम थी। इन जिलों की क्षेत्रीय, सामाजिक और +सामुदायिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप से अल्पसंख्यक समूह, अनुसूचित जाति/ +अनुसूचित जनजाति, महिलाएं और अन्य पिछड़े वर्ग के लिए विशेष साक्षरता अभियान की रणनीति तय +की गई। अब तक राज्यों के कुल 134 जिलों को विशेष साक्षरता मिशन में शामिल किया जा चुका है। +इनमें अरूणाचल प्रदेश में (7), आंध्र प्रदेश (8), बिहार (31), छत्तीसगढ़ (2), जम्मू-कश्मीर (8), +राजस्थान (10), झारखंड (12), कनार्टक (2), मध्य प्रदेश (9), मेघालय (3), नागालैंड (2), +उड़ीसा (8), पंजाब (1), उत्तर प्रदेश (27) और पश्चिम बंगाल के (4) जिले शामिल हैं। +जनशिक्षण संस्थान - जनशिक्षण संस्थान का लक्ष्य सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े तथा +शहरी/ग्रामीण क्षेत्रों के शैक्षिक रूप से वंचित वर्गों विशेषकर नवसाक्षरों - अर्ध शिक्षितों अनुसूचित जाति/ +जनजातियां, महिलाओं तथा बालिकाओं, मलिन बस्ती निवासियों और प्रवासी श्रमिकों का शैक्षिक और +व्यावसायिक विकास करना है। +जनशिक्षण संस्थान. +विभिन्न दस्तकारी के अलग-अलग अवधि के कई व्यावसायिक पाठ्यक्रम +चलता है। इस समय देश में कुल 172 जनशिक्षण संस्थान हैं। इन संस्थानों के जरिए ढाई सौ से अधिक +प्रकार के पाठ्यक्रमों और गतिविधियों का संचालन होता है। जिन कार्यों और पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण +दिया जाता है उनमें सिलाई-कटाई, डे्रस तैयार करना, बुनाई और कढ़ाई, सौंदर्य तथा स्वास्थ्य देखभाल, +दस्तकारी, कला, चित्रकला, बिजली के सामानें की मरम्मत, मोटर वाइंडिंग, रेडियो और टीवी मरम्मत, +कंप्यूटर प्रशिक्षण शामिल हैं। 2004-05 के दौरान 13.91 लाख लाभार्थियों को विभिन्न विषयों और +पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण दिए गए और जनशिक्षण संस्थान गतिविधियों में शामिल किए गए। इनमें से 65 +प्रतिशत महिलाएं थीं। +जनशिक्षण संस्थान की ओर से संचालित नवीन कार्यक्रम और गतिविधियां इस प्रकार हैं — +प्रशिक्षण दिया गया। +आयोजित किया गया। +के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। +के चयनित उम्मीदवारों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया। +व्यावसायिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। +और साक्षरता से जुड़ा व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया और उसके बाद उत्पादक +इकाइयां स्थापित कीं तथा स्वयं इन उत्पादों का विपणन किया। +इलेक्ट्रॉनिक्स इकाइयों की स्थापना की, जहां घरेलू साज सामान की मरम्मत की जाती है। +पाठ्यक्रम आयोजित किए गए। +प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय. +केंद्रीय प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में शैक्षिक और तकनीकी संसाधन का सहयोग देता +है। यह संसाधन सहयोग का नेटवर्क विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है विशेष रूप से +यह आदर्श शिक्षण/अधिगम सामग्री, मीडया सॉफ्टवेयर के उत्पादन तथा राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के लक्ष्यों +की प्राप्ति के लिए सभी तरह के मीडिया का सहयोग हासिल कराता है। +40वां अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस. +नई दिल्ली में विज्ञान भवन में 8 सितंबर, 2006 को आयोजित +किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि तत्कालीन उप राष्ट्रपति भैंरो सिंह शेखावत थे। हर वर्ष +एनएलएम-यूनेस्को पुरस्कार कुछ चुनिंदा राज्य संसाधन केंद्रों, जन शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय, +प्रौढ़, सतत शिक्षा और प्रौढ़ तथा साक्षरता कार्यक्रमों के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए दिए जाते हैं। इस +बार के पुरस्कार विजेता थे — 1. राज्य संसाधन केंद्र, कोलकाता 2. जन शिक्षण संस्थान औरंगाबाद और 3. +सतत शिक्षा और एक्स्टेंशन विभाग, एस.वी. विश्वविद्यालय, तिरूपति। +साक्षरता कार्यक्रमों में बेहतरीन प्रदर्शन और उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए चुनिंदा टीएलसी/ +पीएलपी/सीई को हर वर्ष सत्येन मित्रा मेमोरियल पुरस्कार दिया जाता है। 2006 के पुरस्कार पाने वाले हैं +— चांगलांग, अरूणाचल प्रदेश (टीएलसी), हनुमानगढ़, राजस्थान (पीएलपी), कडप्पा, आंध्र प्रदेश +(सीईपी), कोल्लम, केरल (सीईपी) तूथुकुडी, तमिलनाडु (सीईपी)। +यूनेस्को का साक्षरता के लिए दिया जाने वाला कन्फ्यूशियस पुरस्कार राजस्थान सरकार के साक्षरता +और सतत शिक्षा निदेशालय को राजस्थान में साक्षरता और सतत शिक्षा कार्यक्रम के जरिए उपयोगी शिक्षा +के लिए दिया गया है। पुरस्कार में 20,000 यूएस डालर नकद और प्रशस्ति पत्र दिया जाता है। इस वर्ष +के पुरस्कार के लिए थीम थी टिकाऊ विकास के लिए साक्षरता राजस्थान के साक्षरता और सतत शिक्षा +निदेशालय को अपने निरक्षर महिलाओं को लक्षित विशेष कार्यक्रम के लिए यह पुरस्कार मिला। +राजस्थ्ाान ने विशेष पहल की है जिसके तहत निरक्षर महिलाओं को आईपीसीएफ वर्णमाला की पुस्तक +पढ़ाई गईं और सीई पर वर्णमाला-III को पूरी करने के बाद सभी जिलों में 15 दिनों के विशेष व्यावसायिक +प्रशिक्षण कैंप आयोजित किए गए तथा उनके द्वारा निर्मित सामानों के विपणन के लिए व्यवस्था की गई। इसका +उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था। लगभग 10 लाख निरक्षरों के लाभार्थ राज्य के +30 जिलों में बाकी बची निरक्षरता को समाप्त करने के लिए एक परियोजना भी शुरू की गई। +प्रकाशन. +प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय की प्रकाशन इकाई ने 2006-07 के दौरान साक्षरता और प्रौढ़ शिक्षा संबंधी विभिन्न +प्रकार के प्रकाशन निकाले। प्रकाशित पुस्तकें विभिन्न भाषाओं में थीं जो इस प्रकार हैं— नव साक्षरों के +लिए; नव साक्षरों के लिए साक्षरता कार्यक्रमों (बुनियादी साक्षरता, उत्तर साक्षरता और सतत शिक्षा) के +विभिन्न पहलुओं पर दिशा-निर्देश; नीति दिशा-निर्देश, वार्षिक रिपोर्ट, सांख्यिकी डाटा पुस्तकें इत्यादि। +शिक्षाविदों और समाज विज्ञान शोधकर्ताओं के लिए; अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस तथा राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय +स्तर की कार्यशालाओं इत्यादि महत्वपूर्ण अवसरों के लिए विशेष प्रकाशन। +वर्षभर काफी संख्या में प्रकाशन सामने आए और फोटो-प्रलेखन, प्रकाशनों के डिजाइन आर्टवर्क +तैयार करना और मुद्रित सामग्री के प्रेषण जैसे अन्य संबद्ध कार्य भी किए गए। बहुत-सी प्रकाशित सामग्री +देश में विभिन्न स्तर के उपयोगकर्ताओं को नि—शुल्क वितरित की गई। +8 सितंबर, 2006 अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर भारत के उप राष्ट्रपति ने एक विशेष +पुस्तक-“इनोवेशन इन लिटरेसी” जारी की और इसी अवसर पर उप राष्ट्रपति को नव-साक्षरों के लिए 8 +पुस्तकों का एक सेट भेंट किया गया। +मूल्यांकन. +संपूर्ण साक्षरता अभियान के कुल 393 और साक्षरता पश्चात कार्यक्रम के कुल 172 जिलों का बाहरी +मूल्यांकन संस्थाओं द्वारा मूल्यांकन किया गया। अनवरत शिक्षा कार्यक्रम के सात जिलों-मंडी (हिमाचल +प्रदेश), अजमेर (राजस्थान) और इड्डुकी केसरगढ़ और कोल्लम केरल तथा देवागाल (कर्नाटक) का +भी मूल्यांकन बाहरी मूल्यांकन ऐजेंसियों द्वारा किया गया। इसी प्रकार 106 जनशिक्षण संस्थानों की +गतिविधियों का भी मूल्यांकन हुआ। इन कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने वाली संस्थाओं में भारतीय प्रबंधन +संस्थान, बंगलुरू, एक्सएलआरआई, जमशेदपुर, प्रबंधन विकास संस्थान, गुणगांव, टाटा परामर्श सेवा, +मुंबई और मीडिया अनुसंधान समूह, नई दिल्ली शामिल हैं। +उपलब्धियां. +इस तरह एक दशक के दौरान साक्षरता दर में 12.63 प्रतिशत अंकों की वृद्धि दर्ज की गई। +घटकर 21.60 प्रतिशत रह गया। +तक पहुंच गई है। इसी तरह पुरूष साक्षरता में 11.13 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जो एक दशक +में 64.13 प्रतिशत से बढ़कर 75.26 प्रतिशत हो गई। +प्रतिभागी और लाभार्थी महिलाएं हैं। +17 करोड़ 16 लाख की वृद्धि हुई। जबकि इसी अवधि में 20 करोड़ 36 लाख लोग साक्षर बने। +दर में वृद्धि की है। +में साक्षरता दर सबसे अधिक 90.92 प्रतिशत है। जबकि बिहार की साक्षरता दर सबसे कम +47.53 प्रतिशत है। +करोड़ 88 लाख 80 हजार थी जो 2001 में घट कर 30 करोड़ 40 लाख हो गई। +में शामिल किया गया। +अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की शिक्षा. +संवैधानिक प्रावधान — संविधान के अनुच्छेद 46 के अनुसार- +अनुच्छेद 330, 332, 335, 338 से 342 तथा संविधान के पांचवीं और छठवीं अनुसूची अनुच्छेद 46 में +दिए गए लक्ष्य हेतु विशेष प्रावधानों के संबंध में कार्य करते हैं। समाज के कमजोर वर्ग के लाभार्थ इन +प्रावधानों का पूर्ण उपयोग किए जाने की आवश्यकता है। +स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के व्यक्तियों के शैक्षणिक आधार +को सुदृढ़ करने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 एवं कार्ययोजना (पी.ओ.ए.) 1992 +के अनुपालन में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए प्राथमिक शिक्षा, साक्षरता एवं माध्यमिक और +उच्च शिक्षा विभाग की वर्तमान योजनाओं में निम्नलिखित विशेष प्रावधान किए गए हैं- +(क) अब 300 की जनसंख्या के स्थान पर 200 की जनसंख्या हेतु एक कि.मी. की चलने योग्य दूरी के +भीतर प्राथमिक स्कूल खोला जा सकेगा। +(ख) उच्च प्राथमिक स्तर पर सभी राज्यों के सरकारी प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा शुल्क की समाप्ति। +वस्तुत— अधिकतर राज्यों ने अनुसूचित जाति/जनजातियों के छात्रों के लिए माध्यमिक स्तर तक +शिक्षा-शुल्क समाप्त कर दिया है। +(ग) इन वर्गों के छात्रों के लिए नि—शुल्क पुस्तकें, वर्दी, स्टेशनरी, स्कूल बैग इत्यादि के रूप में प्रोत्साहन। +(घ) संविधान का 86वां संशोधन विधेयक — 13 दिसंबर, 2002 को अधिसूचित इस विधेयक में 6-14 +वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य एवं नि—शुल्क शिक्षा का प्रावधान किया गया है। +सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए). +प्राथमिक शिक्षा के सार्वत्रीकरण के बहुप्रतीक्षित उद्देश्य को निर्धारित समय सीमा में प्राप्ति की दिशा में +यह ऐतिहासिक पहल है। यह कार्यक्रम राज्यों के सहयोग से चलाया जाएगा, जिसके अंतर्गत देश के +प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र की चुनौतियों का सामना करने, संकल्प, वर्ष 2010 तक 6-14 आयुवर्ग के सभी +बच्चों को उपयोगी एवं स्तरीय शिक्षा उपलब्ध कराना शामिल है। कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं इस +प्रकार हैं- +(i) बालिकाओं पर विशेषत— अनुसूचित जाति/जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग की बालिकाओं पर ध्यान, +(ii) विद्यालय छोड़कर जा चुकी बालिकाओं को वापिस लाने हेतु अभियान चलाना, +(iii) लड़कियों के लिए नि—शुल्क पाठ्यपुस्तकें, +(iv) बालिकाओं हेतु विशेष प्रशिक्षण (कोचिंग) और तैयारी-कक्षाओं का आयोजन और सीखने के +लिए सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाना, +(v) शिक्षा के समान अवसर को बढ़ावा देने हेतु शिक्षक जागरूकता कार्यक्रम, +(vi) बालिका शिक्षा से संबंधित प्रयोगात्मक परियोजनाओं पर विशेष ध्यान, +(vii) 50 प्रतिशत महिला शिक्षकों की नियुक्ति। +जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी). +इस योजना का प्रमुख जोर बालिकाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति कामकाजी बच्चों, शहरी वंचित बच्चों, +विकलांगों आदि की शिक्षा के लिए विशेष सहयोग उपलब्ध कराना है। बालिकाओं एवं अनुसूचित जाति/ +जनजाति के लिए विशेष रणनीतियां हैं, तथापि इन समूहों को शामिल करने के लिए समेकित रूप में +वास्तविक लक्ष्य भी निर्धारित किए गए हैं। एनआईईपीए द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार +डीपीईपी जिलों के स्कूलों में 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे अनुसूचित जाति/जनजाति के हैं। +महिला समाख्या (एमएस). +महिला समाख्या शैक्षिक पहुंच एवं उपलब्धि के क्षेत्र में लैंगिक अंतर का निराकरण करती है। इसमें +महिलाओं (विशेषत— सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़ी एवं वंचित) को ऐसे सशक्तिकरण के योग्य +बनाना शामिल है, ताकि वे अलग-थलग पड़ने और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं से जूझ +सकें और दमनकारी सामाजिक रीति-रिवाजों के विरूद्ध खड़े होकर अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए +संघर्ष कर सकें। +प्राथमिक स्तर पर बालिका शिक्षा हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीईजीईएल). +सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) की वर्तमान योजना के अधीन एनपीईजीईएल प्राथमिक स्तर पर +सहायताप्राप्ति से वंचित/पिछड़ी बालिकाओं हेतु अतिरिक्त संसाधन मुहैया कराता है। यह कार्यक्रम +शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े उन विकास खंडों में चलाया जा रहा है, जहां ग्रामीण महिला साक्षरता की दर +राष्ट्रीय औसत से कम है और लैंगिक भेदभाव राष्ट्रीय औसत से अधिक है। साथ ही यह कार्यक्रम ऐसे +जिलों के विकास खंडों में भी चलाया जा रहा है, जहां कम से कम 5 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित +जाति/जनजाति की है और जहां अनुसूचित जाति/जनजाति महिला साक्षरता की दर 1991 के आधार पर +राष्ट्रीय औसत से 10 प्रतिशत कम है। +शिक्षाकर्मी कार्यक्रम (एसकेपी). +एसकेपी का लक्ष्य बालिका शिक्षा पर प्रमुख रूप से ध्यान देने के अतिरिक्त राजस्थान के दूर-दराज के +अर्धशुष्क एवं सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा के सार्वत्रीकरण एवं गुणवत्ता में +सुधार लाना है। यह उल्लेखनीय है कि शिक्षाकर्मी स्कूलों में अधिकतर बच्चे अनुसूचित जाति/जनजाति +एवं अन्य पिछड़े वर्गों के हैं। +कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय. +कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना के अंतर्गत मुख्य रूप से प्राथमिक स्तर पर अनुसूचित जाति/ +अनुसूचित जन जाति, अन्य पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों की बालिकाओं के लिए दुर्गम क्षेत्रों में +आवासीय सुविधाओं के साथ 750 विद्यालय खोले जा रहे हैं। यह योजना शैक्षिक रूप से पिछड़े +(ईबीबी) केवल ऐसे विकास खंडों में लागू की जाएगी, जहां वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार +महिला साक्षरता की दर राष्ट्रीय औसत से कम और लैंगिक भेदभाव का स्तर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। +ऐसे विकास खंडों में कम महिला साक्षरता वाले तथा/अथवा स्कूल न जाने वाली अधिकतर बालिकाओं +वाले जनजातीय क्षेत्रों में विद्यालय खोले जाएंगे। +जनशिक्षण संस्थान (जेएसएस). +जेएसएस अथवा जनता की शिक्षा का संस्थान एक ऐसा बहुआयामी अथवा बहुमुखी वयस्क शिक्षा +कार्यक्रम है, जिसका लक्ष्य लाभान्वित होने वाले लोगों के व्यावसायिक हुनर और निपुणता में सुधार +लाना है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य सामाजिक आर्थिक-रूप से पिछड़े तथा शहरी/ग्रामीण क्षेत्रों के +शैक्षिक रूप से वंचित वर्गों, विशेषकर नवसाक्षरों, अर्ध-शिक्षितों, अनुसूचित जाति/जनजातियों, महिलाओं +तथा बालिकाओं, मलिन बस्ती निवासियों, प्रवासी श्रमिकों इत्यादि का शैक्षिक, व्यावसायिक विकास +करना है। +साक्षरता अभियान का अन्य सामाजिक क्षेत्रों पर भी व्यापक असर हुआ है। इसने समाज में +सामाजिक न्याय और समानता के कारणों को मजबूती प्रदान की है। इससे भारत की महान मिली जुली +संस्कृति तथा विविधता में एकता के बोध के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूती मिली है। +दोपहर भोजन योजना — दोपहर भोजन योजना एक सफल प्रेरणादय कार्यक्रम है। इसमें देश के सरकारी, +स्थानीय निकाय और सरकार से मान्यता प्राप्त स्कूलों के प्राथमिक स्तर के बच्चों को शामिल किया जाता +है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य स्कूलों में विद्यार्थियों का नामांकन और उपस्थिति है। इसके अलावा +बच्चों में पोषण तत्वों की उपयुkta मात्रा निश्चित करना है। +केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल). +केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर की एक योजना जनजातीय भाषाओं सहित आधुनिक भारतीय +भाषाओं में अनुसंधान, इनमें निपुण व्यक्तियों का विकास तथा इस हेतु उन्नत पाठ्य सामग्री तैयार करना +है। संस्थान ने 90 से अधिक जनजातीय भाषाओं के क्षेत्र में कार्य किया है। +केंद्रीय विद्यालय (केवी). +इसमें नए छात्रों के दाखिले में क्रमश— 15 प्रतिशत एवं 7.5 प्रतिशत सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति +के छात्रों के लिए आरक्षित हैं। इन वर्गों के छात्रों से 12वीं कक्षा तक किसी भी प्रकार का शिक्षण शुल्क +नहीं लिया जाता। +नवोदय विद्यालय (एनवी). +अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के पक्ष में आरक्षण संबंधित जिलों में उनकी आबादी के हिसाब +से इस प्रकार दिया जाता है कि वह 22.5 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत (15 प्रतिशत अजा के लिए एवं 7.5 +प्रतिशत अजजा के लिए) से किसी भी प्रकार कम न हो और अधिकतम दोनों वर्गों (अजा एवं अजजा) +को मिलाकर 50 प्रतिशत से अधिक न हो। ये आरक्षण परस्पर परिवर्तनीय हैं तथा सामान्य दक्षता सूची से +आने वाले छात्रों से अतिरिक्त हैं। +राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय संस्थान (एनआईओएस). +माध्यमिक पाठ्यक्रमों के लिए एससी/एसटी छात्रों को प्रवेश शुल्क में 450 रूपये तक तथा उच्च +माध्यमिक पाठ्यक्रमों के लिए 525 रूपये तक प्रवेश शुल्क में छूट प्रदान की जाती है। +एससी/एसटी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजना +अनुसूचित जाति और जनजाति के उन मेधावी छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उनकी पहचान +करने, उन्हें प्रोत्साहन देने और उनकी सहायता करने के विचार से 1992 में सामाजिक न्याय और +आधिकारिता मंत्रालय के तहत स्थापित डा. अंबेडकर फाउंडेशन मेधावी छात्रों को डा. अंबेडकर राष्ट्रीय +छात्रवृत्ति प्रदान करता है। इसके तहत शिक्षा बोर्ड/काउंसिल द्वारा आयोजित नियमित कक्षा दसवीं स्तर की +परीक्षा में सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन छात्रों को नकद पुरस्कार दिया जाता है। यह एससी/एसटी के +लिए अलग होगा। यदि इन तीन छात्रों में कोई लड़की नहीं होती तो सर्वाधिक अंक पाने वाली लड़की +को विशेष पुरस्कार दिया जाता है। जब भी समाज कल्याण और न्याय मंत्रालय इस योजना के तहत नाम +मांगता है तो एनआईओएस पात्र छात्रों के नाम भेजता है। +माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों की छात्राओं के लिए बोर्डिंग और छात्रावास सुविधाओं में +वृद्धि करने की योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली एवं कमजोर वर्ग की किशोरियों को इन +छात्रावासों में प्रवेश हेतु प्रेरित करने के लिए स्वैच्छिक संगठनों को शत प्रतिशत वित्तीय सहायता दी जाती +है। इनमें शैक्षणिक रूप से पिछड़े जिलों को प्राथमिकता दी जाती है। विशेष रूप से वहां, जहां अनुसूचित +जाति/जनजातियों के लोगों और शैक्षणिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यकों की बहुलता है। +माध्यमिक स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिभावान बच्चों को दी जाने वाली 43,000 छात्रवृत्तियों में से +13,000 छात्रवृत्तियां कुछ शर्तों पर विशेष रूप से अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित हैं। +राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी). +एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों, अभ्यास पुस्तिकाओं, अध्यापक निर्देशिकाओं, सहायक पठन सामग्री के +विकास, पाठ्यपुस्तकों के मूल्यांकन, व्यावसायिक शिक्षा, शैक्षिक तकनीकी, परीक्षा सुधारों, सर्व शिक्षा +अभियान को समर्थन, शैक्षिक रूप से वंचित वर्गों की शिक्षा पर ध्यान देती है। एनसीईआरटी विज्ञान और +सामाजिक विज्ञान के क्षेत्रों में शोधस्तर तक शिक्षा हेतु और चिकित्सा और इंजीनियरी जैसे व्यावसायिक +पाठ्यक्रमों में द्वितीय-डिग्री स्तर तक की पढ़ाई हेतु कुछ शर्तों के पूरा करने पर राष्ट्रीय प्रतिभा खोज +योजना का संचालन करती है। कुल 1000 छात्रवृत्तियों में से 150 छात्रवृत्तियां अनुसूचित जाति एवं 75 +अनुसूचित जनजातियों के छात्रों के लिए हैं। +राष्ट्रीय शैक्षिक नियोजन एवं प्रशासन संस्थान (एनआईईपीए). +अनुसूचित जाति और जनजाति का शैक्षिक विकास करना एनआईईपीए का एक प्रमुख कार्यक्षेत्र है। यह +अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए चल रहे शैक्षिक कार्यक्रमों एवं योजनाओं का अध्ययन करता +है। यह अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के शैक्षिक विकास और उनसे संबद्ध शैक्षिक संस्थाओं +के लिए सामग्री भी तैयार करता है। +विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी). +यूजीसी अनुसूचित जाति/जनजाति के वर्गों के लिए आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सभी +विश्वविद्यालयों/विश्वविद्यालय के रूप में मान्य संस्थानों में अनुसूचित जाति/जनजाति एकक की स्थापना +के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है। अभी इस आयोग ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों समेत 113 +विश्वविद्यालयों में अजा/अजजा एककों का गठन किया है। अजा/अजजा पर बनी स्थायी समिति +विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों द्वारा इस क्षेत्र में किए गए कार्य पर नजर रखती है और उनकी समीक्षा +करती है। +आरक्षण नीति के अंतर्गत आयोग ने केंद्र सरकार के अधीन सभी विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में +सभी शिक्षण एवं गैर शिक्षण पदों में भर्ती, प्रवेश, छात्रावास इत्यादि में अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए +क्रमश— 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया है। राज्यों के विश्वविद्यालय संबंधित राज्य +द्वारा बनाई गई आरक्षण नीति का पालन करते हैं। आयोग भारत सरकार की आरक्षण नीति को लागू करने +के लिए समय-समय पर दिशा निर्देश/नीति निर्देश/आदेश जारी करता रहता है। आरक्षणों के अलावा अजा/ +अजजा छात्रों के प्रवेश के लिए निर्धारित न्यूनतम अर्हता अंकों में छूट दिए जाने का भी प्रावधान है। यूजीसी +यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी स्नातकों, जिनमें अजा/अजजा स्नातक शामिल हैं, के पास सामान्य +रूप से नौकरी क्षेत्र एवं विशेष रूप से स्वरोजगार करने के लिए आवश्यक ज्ञान, निपुणता एवं रूझान है। +आयोग अजा/अजजा छात्रों को प्रतिविधि कोचिंग के लिए वित्तीय सहायता देता है। यह यूजीजी/ +सीएसआईआर द्वारा आयोजित कराई जाने वाली राष्ट्रीय अर्हता परीक्षा (एनईटी) के लिए अजा/अजजा के +छात्रों को योग्य बनाने के लिए वर्तमान कोचिंग केंद्रों को वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराता है। आयोग +विस्तार (प्रसार) गतिविधियों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति/ +जनजाति समेत समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाता है। सामाजिक समानता के कार्य में सहयोग +देने और समाज के सुविधाओं से वंचित वर्ग की सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता बढ़ाने हेतु यूजीसी ने अवर +स्नातक/स्नातकोत्तर स्तर पर प्रतिविधि कोचिंग योजना शुरू की है। योजना के प्रमुख उद्देश्य हैं-(i) विभिन्न +क्षेत्रों में छात्रों की शैक्षिक निपुणता एवं भाषाई कुशलता को सुधारना, (ii) मूलभूत विषयों में समझ का स्तर +बढ़ाना, ताकि उच्च शिक्षा के लिए एक सुदृढ़ आधार मिल सके, (iii) ऐसे छात्रों के ज्ञान, निपुणता एवं रूझान +को ऐसे विषयों में बढ़ाना, जिनमें गुणात्मक प्रविधियां एवं प्रयोगशाला संबंधी कार्य किया जाता है, (i1) +परीक्षाओं में ऐसे छात्रों का सकल प्रदर्शन सुधारना। +आयोग ने अनुसूचित जाति/जनजाति के योग्य छात्रों के लिए एक केंद्रीय डाटाबेस पूल तैयार किया +है। वह विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षक पदों के लिए निर्धारित आरक्षित पदों को भरने के लिए उनका +नाम भी प्रस्तावित करता है तथा केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षण नीति के कार्यान्वयन की समीक्षा करने +के लिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों की समय-समय पर बैठकों का आयोजन कराता है। +वर्तमान एककों के कार्यों की समीक्षा के लिए एक विशेष निगरानी एकक भी है। +सामुदायिक पॉलीटेकनीक. +सामुदायिक पॉलीटेकनीक की योजना के अंतर्गत क्षेत्र विशेष में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके +ग्रामीण/सामुदायिक विकास गतिविधियां चलाई जाती हैं। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र के लोगों/स्थानीय +समुदायों को उनके उपयुक्त एवं अनुरूप प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने के लिए मंच उपलब्ध कराया जाता +है। प्रशिक्षण देने में ग्रामीण युवकों, अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्यों, महिलाओं, स्कूल बीच ही में +छोड़ चुके व्यक्तियों तथा अन्य वंचित वर्गों को वरीयता दी जाती है और आवश्यकतानुसार रोजगार प्राप्त +करने में सहायता दी जाती है। सामुदायिक पॉलीटेकनीकों की योजना चुनिंदा डिप्लोमास्तरीय संस्थाओं में +1978-79 से लागू है। इसमें निपुणता-उन्मुख अनौपचारिक प्रशिक्षण, तकनीकी हस्तांतरण तथा प्रौद्योगिक +समर्थन सेवाओं के माध्यम से विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्रयोग होता है। +इंजीनियरी कॉलेज. +केंद्र सरकार द्वारा संचालित उच्च शिक्षा संस्थान, जिनमें आईआईटी, आईआईएम तथा राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी +संस्थान शामिल हैं, में अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों को क्रमश— 15 प्रतिशत एवं 7.5 प्रतिशत +आरक्षण दिया जाता है। आरक्षण के अलावा इनमें अजा/अजजा छात्रों के लिए न्यूनतम अर्हता अंकों में भी +छूट दिए जाने का प्रावधान है। छात्रावासों में भी सीटें आरक्षित हैं, तथापि राज्य सरकारों द्वारा संचालित +संस्थाओं में संबंधित राज्य सरकारों की नीति के अनुसार आरक्षण दिया जाता है। +विशेष घटक योजना (एससीपी) तथा जनजातीय उप-योजना (टीएसपी) +प्राथमिक शिक्षा एवं साक्षरता तथा माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभागों के आवंटित बजट में क्रमश— +16.20 प्रतिशत तथा 8 प्रतिशत अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए विशेष घटक योजना +(एससीपी) और जनजातीय उपयोजना (टीएसपी) के अंतर्गत आवंटित है। माध्यमिक और उच्च शिक्षा +विभाग ने वर्ष 2004-05 की वार्षिक योजना के 2225 करोड़ रूपये के योजना परिव्यय में से एससीपी +और टीएसपी के लिए क्रमश— 333.75 करोड़ रूपये एवं 166.88 करोड़ रूपये आवंटित किए हैं। +प्राथमिक शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने वर्ष 2004-05 की वार्षिक योजना के लिए 6000 करोड़ रूपये +के योजना परिव्यय में से एससीपी और टीएसपी के लिए क्रमश— 900 करोड़ रूपये एवं 450 करोड़ +रूपये आवंटित किए हैं। +साक्षरता दर. +राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की वयस्क साक्षरता योजनाएं देश के लगभग सभी जिलों में लागू की जा रही हैं। +अल्प महिला साक्षरता वाले जिलों (45) में जिला साक्षरता समितियों, गैर सरकारी संगठनों, महिला +स्वयंसेवी अध्यापकों तथा पंचायतीराज कर्मियों के माध्यम से केंद्रीकृत प्रयास के रूप में विशेष योजनाएं +शुरू की गई हैं। आजीवन चलने वाले शिक्षा अवसरों के प्रावधान, व्यावसायिक निपुणता प्रदान करने तथा +देश के 272 जिलों में चल रहे सतत शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से नव साक्षरों के लिए आय में वृद्धि पर +भी विशेष जोर दिया जा रहा है। +अनुसूचित जाति और जनजाति की साक्षरता में प्राप्त उपलब्धियां भी वर्ष 1991 की जनगणना के +आंकड़ों, अर्थात 37.41 प्रतिशत एवं 29.41 प्रतिशत की तुलना में उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा +अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति में महिला साक्षरता की दर भी पुरूष साक्षरता दर की तुलना में +कहीं अधिक है। +स्कूलों में गुणवत्ता सुधार. +दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान “स्कूलों में गुणवत्ता सुधार” की केंद्र द्वारा प्रायोजित एक ऐसी +मिलीजुली योजना शुरू करने का निर्णय लिया गया, जिसमें निम्नलिखित घटकों को भी शामिल किया +गया था- +(i) राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा परियोजना, +(ii) स्कूली शिक्षा को पर्यावरणोन्मुखी बनाना, +(iii) स्कूलों में विज्ञान शिक्षा में सुधार करना, +(iv) स्कूलों में योग शिक्षा को बढ़ावा देना, +(v) अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान ओलंपियाड। +राज्यों को स्थानांतरित स्कूलों में, विज्ञान शिक्षा के सुधारों को छोड़कर अप्रैल, 2006 से उपर्युक्त +चारों घटकों को एनसीईआरटी को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया। +दसवीं पंचवर्षीय योजना में इसके लिए 115 करोड़ रूपये का योजना खर्च रखा गया है। 2006-07 +में इसके लिए 7 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया जिसमें चार भाग एनसीईआरटी को स्थानांतरित +किए गए हैं। +राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा परियोजना. +राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा परियोजना देश की जनसंख्या और विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए स्कूली +शिक्षा और अध्यापक शिक्षा प्रणाली में जनसंख्या शिक्षा को शामिल करने के उद्देश्य से अप्रैल 1980 में शुरू +की गई। 2002 तक यह पूरी तरह संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या फंड (यूएनएफपीए) से एक बाहरी सहायता +प्राप्त परियोजना के रूप में लागू की जा रही थी। यह परियोजना विश्वविद्यालय शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा क्षेत्र +में भी चलाई जा रही थी। परियोजना की उपलब्धियों और महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने इसे दसवीं +पंचवर्षीय योजना में जारी रखने का निर्णय लिया है जिसमें स्कूली पाठ्यक्रम में जनसंख्या शिक्षा को पुन— +परिकल्पित ढांचे के साथ और केंद्रित उद्देश्यों के साथ एकीकृत किया जाएगा। +इससे अधिक, यूएनएफपीए ने 2004 से किशोर प्रजनन और सेक्सुअल हेल्थ (एआरएसएच) पर +केंद्रित एक सहगामी परियोजना की सहायता देने का निर्णय लिया है। इसके लिए 2004-2007 की +अवधि के लिए 7.29 करोड़ रूपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। 2006-07 के दौरान, एनपीईपी +किशोर शिक्षा कार्यक्रम के एक अभिन्न भाग के रूप में लागू किया गया था जिसे राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण +संगठन (नाको) के सहयोग से मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2005 में शुरू किया गया। +स्कूली शिक्षा को पर्यावरणोन्मुखी बनाना. +राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई), 1986 में यह व्यवस्था की गई है कि पर्यावरण संरक्षण एक ऐसा विषय है +जो अन्य मानकों के साथ शिक्षा के सभी स्तरों पर पाठ्यक्रम का एक अभिन्न अंग बनना चाहिए। इस +पुनीत लक्ष्य को कार्यरूप दिए जाने के लिए छात्रों के मन एवं प्रतिभा को प्रकृति का पर्यावरण संतुलन +बिगाड़ने वाले तत्वों के खतरों के प्रति संवेदनशील बनाना आवश्यक होगा। इस चरण के अंतर्गत छात्रों +को पर्यावरण-संख्या से संबंद्ध मूलभूत अवधारणाओं के प्रति जागरूक बनाना एवं उन्हें उनका सम्मान +करना सिखाया जाएगा। +इस हेतु वर्ष 1988-89 में केंद्र द्वारा प्रायोजित “स्कूली शिक्षा को पर्यावरणोन्मुख बनाने” की योजना +शुरू की गई। इस योजना में स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों को स्कूलों के शैक्षिक कार्यक्रमों से जोड़ने +को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रायोगिक एवं परीक्षणात्मक कार्यक्रम चलाने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को +सहायता देने का प्रावधान है। वर्ष 2006-07 के दौरान पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में प्रायोगिक एवं +परीक्षणात्मक परियोजनाएं चलाने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं को 90 लाख रूपये की वित्तीय सहायता +प्रदान की गई। +स्कूलों में विज्ञान शिक्षा का सुधार. +राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के प्रावधानों के अनुसार विज्ञान शिक्षा के स्तर में सुधार लाने और वैज्ञानिक +सोच को बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्र द्वारा प्रायोजित एक योजना “स्कूलों में विज्ञान शिक्षा का सुधार” वर्ष +1987-88 में प्रारंभ की गई। इस योजना के अंतर्गत राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों और स्वयंसेवी संगठनों को +वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई। जहां स्वयंसेवी संस्थानों को यह सहायता प्रयोगात्मक एवं +परीक्षणात्मक कार्यक्रमों के लिए मिली, वहीं केंद्रशासित प्रदेशों/राज्य सरकारों को उच्च प्राथमिक +विद्यालयों में विज्ञान उपकरण किट मुहैया कराने, माध्यमिक/उच्च माध्यमिक विद्यालयों में प्रयोगशालाओं +की स्थापना/वर्तमान प्रयोगशालाओं का उच्चीकरण करने, माध्यमिक/उच्च माध्यमिक विद्यालयों में +पुस्तकालय सुविधाएं मुहैया कराने तथा विज्ञान और गणित के अध्यापकों के प्रशिक्षण कार्यों हेतु यह +सहायता प्रदान की गई। +इस योजना का एक महत्वपूर्ण अंग भारतीय छात्रों को स्कूल स्तर पर आयोजित किए जाने वाले +अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान ओलंपियाडों अर्थात— अंतर्राष्ट्रीय गणित ओलंपियाड (1989 से), अंतर्राष्ट्रीय भौतिकी +ओलंपियाड (1998 से), अंतर्राष्ट्रीय रासायनिकी ओलंपियाड (1999 से) तथा अंतर्राष्ट्रीय जीवविज्ञान +ओलंपियाड (2000 से) में भागीदारी करना है। +स्कूलों में योग शिक्षा की शुरूआत. +स्कूलों में योग की शुरूआत 1989-90 के दौरान एक केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में राज्यों/केंद्र शासित +प्रदेशों/गैर-सरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता देने के लिए की गई। इसका उद्देश्य प्रशिक्षण और शोध +के लिए वित्तीय सहायता, पुस्तकालयों को अद्यतन बनाने और योग शिक्षकों के लिए छात्रावासों का +निर्माण/विस्तार करना है। यह योजना राज्यों/कें.शा.प्र. के संबंधित शिक्षा विभागों के माध्यम से लागू की +जा रही है। अप्रैल 2007 से इसे एनसीईआरटी को दे दिया गया। एनसीईआरटी ने इस योजना की नेशनल +करीकुलम फ्रेमवर्क 2005 के नजरिए से समीक्षा करने की पहल की है। +2006-07 के दौरान गैर-सरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता (योजना और गैर-दोनों) प्रदान की +गई। प्रशिक्षण और पुस्तकालय संबंधी गतिविधियों को संचालित करने के लिए एजेंसी को गैर-योजना के +रूप में 65 लाख की तथा 13 एजेंसियों को 26,38,000 रूपये की सहायता प्रदान की गई। +अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान ओलंपियाड. +गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और जीव-विज्ञान विषयों की प्रतिभाओं की पहचान और उन्हें +बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष अंतर्राष्ट्रीय भौतिक िfद्यज्ञान ओलंपियाड, अंतर्राष्ट्रीय रसायन विज्ञान +ओलंपियाड और अंतर्राष्ट्रीय जीव विज्ञान ओलंपियाड का आयोजन किया जाता है। भारत इन ओलंपियाड +में क्रमश— 1989, 1998, 1999 और 2000 से भाग ले रहा है। इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले +प्रत्येक देश को अंतर्राष्ट्रीय गणित ओलंपियाड के लिए 6 सेकेंड्री विद्यार्थी, भौतिकी ओलंपियाड के लिए +5, रसायन शास्त्र ओलंपियाड के लिए 4 और जीव विज्ञान ओलंपियाड के लिए 6 विद्यार्थी भेजने होते +हैं। इनके साथ एक दल का नेता और एक उप नेता भी होता है। वर्ष 2002 से भारतीय विद्यार्थियों +की टीम अंतर्राष्ट्रीय इंफार्मेटिक्स ओलंपियाड में भी भाग ले रही है। +मौजूदा वित्तीय प्रबंध के तहत ओलंपियाड आयोजित करने वाले देश को प्रतियोगिता में शामिल +होने वाली टीमों के ठहरने, खाने-पीने और स्थानीय यातायात का व्यय वहन करना पड़ता है। +अंतर्राष्ट्रीय यात्रा का खर्च प्रतियोगिता में भाग लेने वाले देश को वहन करना पड़ता है। पिछले +ओलंपियाड में भारतीय टीम का खर्च संयुक्त रूप से माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग और +एनबीएचएम/होमी भाभा विज्ञान केंद्र (एचबीसीएसई/विज्ञान शिक्षा संघ बंगलौर) बीएएसई/भारतीय +संगणना विज्ञान अनुसंधान संघ (आईएआरसीएस) और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएससी) +ने प्रायोजित किया था। अंतर्राष्ट्रीय आवागमन व्यय माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग वहन करता है +तथा विद्यार्थियों के चयन, आंतरिक यातायात और अन्य आकस्मिक खर्च एनबीएचएम/एचबीसीएसई/ +आईएआरसी द्वारा वहन किया जाता है। +2005 में ताइवान के ताइपेई में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय रसायन ओलंपियाड (आईसीएच.ओ-2005) +में भारतीय टीम ने तीन रजत और एक कांस्य पदक जीता था। जुलाई 2005 में स्पेन के सलवांसा में +आयोजित आईपीएचओ-2005 में भारतीय टीम को दो स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक प्राप्त हुए +थे। चीन के बीजिंग में आयोजित आईबीओ 2005 में भारतीय टीम ने एक स्वर्ण और तीन कांस्य पदक +जीते। जुलाई, 2005 में मैक्सिको के मेरिडा में आयोजित आईएमओ 2005 में भारतीय टीम को एक +रजत, एक कांस्य पदक प्राप्त हुआ था तथा तीन में उन्हें उल्लेखनीय सम्मान मिले। भारत ने अगस्त, +2005 में पोलेंड के नॉवे सेज में आयोजित (आईओआई-2005) में भी हिस्सा लिया। +नवोदय विद्यालय समिति. +राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में देश के हर जिले में एक मॉडल (आदर्श) विद्यालय खोलने का प्रावधान +किया गया था। तदनुसार एक योजना बनाई गई, जिसके अंतर्गत सहशिक्षा आवासीय विद्यालय (अब +जवाहर नवोदय विद्यालय) खोलने का निर्णय लिया गया। +नवोदय विद्यालय माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्रदान करने वाले पूर्ण आवासीय सह-शिक्षा +विद्यालय हैं। वर्ष 1985-86 में मात्र दो विद्यालयों के साथ प्रायोगिक रूप से शुरू की गई इस योजना के +अंतर्गत देश के 34 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में अब तक (31 मार्च, 2007 तक) इनकी संख्या बढ़कर +565 हो चुकी है और 31 मार्च 2007 तक इन विद्यालयों में एक लाख 93 हजार छात्र पढ़ रहे थे। +प्रतिवर्ष 30,000 से अधिक छात्र इन विद्यालयों में प्रवेश लेते हैं। इन विद्यालयों में मुख्यत— ग्रामीण क्षेत्रों +के ऐसे प्रतिभावान, प्रखर एवं मेधावी छात्रों का चयन (पहचान) कर विकास करने का प्रावधान है, +जिन्हें इन विद्यालयों के अभाव में अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों से वंचित रहना पड़ता। यह +सुनिश्चित करने के प्रयास किए जाते हैं कि प्रवेश पाने वाले छात्रों में कम से कम एक तिहाई (33 +प्रतिशत) बालिकाएं हों। +छात्रों का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाकर शिक्षा लेना (शैक्षिक प्रवास) नवोदय विद्यालयों की एक +विशिष्टता है। इसके अंतर्गत देश के हिंदीभाषी क्षेत्र में स्थित किसी एक नवोदय विद्यालय की नौवीं कक्षा +में पढ़ रहे छात्रों के 30 प्रतिशत विद्यार्थी किसी अहिंदीभाषी क्षेत्र के विद्यालय में एक सत्र की पढ़ाई करते +हैं। इसी तरह अहिंदीभाषी स्कूल के छात्र हिंदी भाषी इलाके के विद्यालय में जाकर एक सत्र तक पढ़ते +हैं। इस योजना का उद्देश्य देश के नागरिकों की भाषा एवं संस्कृति की विविधता एवं बहुलता की समझ +के माध्यम से राष्ट्रीय अखंडता (एकता) को बढ़ावा देना है। +केंद्रीय विद्यालय संगठन. +केंद्र सरकार ने द्वितीय वेतन आयोग की सिफारिश के आधार पर 1962 में “केंद्रीय विद्यालय संगठन” की +योजना को मंजूरी दी। शुरू में विभिन्न राज्यों में स्थित 20 सेना रेजिमेंटों के 20 स्कूलों का सेंट्रल स्कूलों +के रूप में अधिग्रहण किया गया था। 1965 में केंद्रीय विद्यालय संगठन के रूप में एक स्वायत्तशासी +निकाय का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य था रक्षाकर्मियों एवं अर्ध सैनिक बलों के कर्मचारियों सहित +अखिल भारतीय सेवाओं और देश भर में स्थानांतरित होने वाले केंद्रीय कर्मचारियों के बच्चों की एक +समान शिक्षा की आवश्यकता पूरी करने के लिए केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना करना और उसके काम +पर नजर रखना। इस समय (17 जून 2005 तक) देश में 931 केंद्रीय विद्यालय हैं, जिनमें से तीन विदेश +(अर्थात काठमांडू, मास्को एवं तेहरान) में स्थित हैं। सभी केंद्रीय विद्यालयों में एक जैसे पाठ्यक्रम हैं। +विकलांग बच्चों के लिए समेकित शिक्षा. +केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित विकलांग बच्चों के लिए समेकित शिक्षा योजना वर्ष 1974 में समाज कल्याण +विभाग की ओर से शुरू की गई थी। बाद में 1982-83 में यह योजना शिक्षा विभाग को हस्तान्तरित कर +दी गई। यह योजना अंतिम बार 1992 में संशोधित की गई थी। यह योजना विकलांग बच्चों को शिक्षा के +अवसर उपलब्ध कराती है ताकि वे सामान्य स्कूलों में टिक कर अध्ययन करते हुए अपने आप को योग्य +बना सकें। +आईईडीसी के तहत सामान्य स्कूलों में बहुत कम विकलांगता वाले बच्चों को शत प्रतिशत शिक्षा +सहायता प्रदान की जाती है। जिन रूपों में शिक्षा सहायता उपलब्ध करायी जाती है वे इस प्रकार है — +सहयोगी उपकरण, विशेष अध्यापकों के लिए वेतन और विकलांग छात्रों के लिए अनुदान शामिल हैं। +2005 के अंत तक 85 हजार स्कूलों के दो लाख विकलांग विद्यार्थियों को इस योजना का लाभ +मिला। दसवीं पंचवर्षीय योजना में इसके लिए कुल 200 करोड़ का बजट रखा गया है तथा 2005-06 में +इस योजना के लिए 45 करोड़ रूपये आबंटित किए गए। +राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और विकास परिषद् (एनसीईआरटी). +राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और विकास परिषद् (एनसीईआरटी) स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी +संसाधन सहायता प्रदान करने वाली शीर्ष संस्था है। एनसीईआरटी के घोषणा पत्र में स्कूली पाठ्यक्रम +तैयार करने के कार्य को विशेष स्थान दिया गया है। एनसीईआरटी से यह अपेक्षा रहती है कि वह शिक्षा +का सर्वोच्च स्तर बनाए रखने के लिए और इसे सुनिश्चित करने हेतु स्कूली पाठ्यक्रम की समीक्षा +नियमित रूप से समय-समय पर करता रहे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) 1986 और कार्य योजना +(पीओए) 1992 ने एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा बनाने और उसे प्रोत्साहन देने हेतु एनसीईआरटी को +विशेष भूमिका प्रदान की है। एनपीई इस तरह के ढांचे को भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित कुछ प्रमुख +मानदंडों एवं परिवर्तनकारी लक्षणों को पूरा करने वाली राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली तैयार करने के साधन के +रूप में देखता है। +राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा. +राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा (एनसीए$फ) 2005 व्यापक विचार विमर्श एवं परिश्रम का परिणाम था। इस हेतु +लब्धप्रतिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय संचालन समिति का गठन किया गया +था। समिति के 35 सदस्यों में विभिन्न विषयों के विद्वान, प्रधानाचार्य एवं अध्यापक, जाने माने गैर +सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि तथा एनसीईआरटी के सदस्य शामिल थे। पाठ्यक्रम, राष्ट्रीय विषयों तथा +व्यवस्थित विषयों को देखने वाले 21 राष्ट्रीय फोकस गु्रपों ने इसके कार्यों का समर्थन किया था। इस +विषय पर पूरे देश में व्यापक विचार-विमर्श किया गया। इसके अलावा एनसीईआरटी ने ग्रामीण +अध्यापकों, राज्यों के शिक्षा सचिवों तथा निजी विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के साथ विचार-विमर्श किया। +अजमेर, भोपाल, भुवनेश्वर, मैसूर तथा शिलांग के क्षेत्रीय शिक्षा संस्थानों में क्षेत्रीय सेमिनार आयोजित +किए गए। +भाषाओं का विकास. +भाषाएं परस्पर संवाद एवं शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं कार्ययोजना +में इनके विकास का महत्वपूर्ण स्थान है। अत— हिंदी और संविधान में अधिसूचित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं +के संवर्धन और विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। +हिंदी. +अहिंदीभाषी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में त्रिभाषा फार्मूले के प्रभावी कार्यान्वयन में सहायता देने के लिए +केंद्र प्रायोजित एक योजना के अंतर्गत इन अहिंदीभाषी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में हिंदी शिक्षण के +लिए अध्यापक नियुक्त करने हेतु वित्तीय सहायता दी जाती है। गैर सरकारी संस्थाओं को भी हिंदी +शिक्षण कक्षाएं चलाने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। अहिंदीभाषी छात्रों को हिंदी पढ़ाने के +लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान के माध्यम से सरकार परिष्कृत तरीकों के विकास को बढ़ावा देती है। +संस्थान विदेशी नागरिकों को हिंदी पढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष नियमित आधार पर एक विशेष पाठ्यक्रम +चलाता है। +केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा हिंदीभाषी राज्यों एवं विदेश स्थित भारतीय दूतावासों में नि—शुल्क +वितरण के लिए पुस्तकों की खरीद एवं प्रकाशन संबंधी कार्यक्रम चलाए जाते हैं। यह हिंदी के विकास +एवं संवर्धन में लगे गैर सरकारी संगठनों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता है। +वैज्ञानिक एवं तकनीकी पारिभाषिक शब्दावली आयोग (नई दिल्ली) हिंदी एवं अन्य भाषाओं के +विभिन्न विषयों के पारिभाषिक शब्दकोशों एवं शब्दावलियों का निर्माण एवं प्रकाशन करता है। +आधुनिक भारतीय भाषाएं. +आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास करने के लिए भाषाई, साक्षरता, वैचारिक, सामाजिक, नृशास्त्रीय +एवं सांस्कृतिक विषयों पर मौलिक लेखन, पुरानी पांडुलिपियों के समालोचनात्मक संस्करणों-विश्वकोशों, +शब्दकोशों, ज्ञानवर्धक पुस्तकों के प्रकाशन हेतु स्वयंसेवी संगठनों एवं व्यक्तियों को वित्तीय सहायता +प्रदान की जाती है। राज्यों को क्षेत्रीय भाषाओं में विश्वविद्यालय स्तर की पुस्तकें तैयार करने के लिए +विशेष सहायता प्रदान की जाती है। राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद (एनसीपीयूएल) एक स्वायत्तशासी +निकाय के रूप में 1996 से उर्दू एवं अरबी तथा फारसी भाषा के संवर्धन के लिए कार्य कर रही है। +उर्दूभाषी जनसंख्या को उत्पादक मानव संसाधन के रूप में बदलना तथा वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी के युग +का एक अंग बनाना और अल्पसंख्यक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर कंप्यूटर शिक्षा को प्रवेश +दिलवाना एन.सी.पी.यू.एल. के कार्यों का एक उल्लेखनीय अंग है। सरकार ने सिंधी भाषा के विकास हेतु +भी एक राष्ट्रीय परिषद का गठन किया है। +सरकार सभी भारतीय भाषाओं के अध्ययन हेतु भी वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इस हेतु +मैसूर स्थित केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल) द्वारा भाषा विश्लेषण, भाषा शिक्षा शास्त्र, +भाषा प्रौद्योगिकी एवं प्रयोग के क्षेत्रों में शोध किया जाता है। त्रिभाषा सूत्र को लागू करने के लिए +शिक्षकों के प्रशिक्षण की आवश्यकता को पूरा करने हेतु यह संस्थान क्षेत्रीय भाषा केंद्रों का संचालन +करता है। क्षेत्रीय भाषा केंद्र विभिन्न स्तरों पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में मातृभाषा अध्यापकों के +लिए प्रशिक्षण भी देते हैं। +अंग्रेजी तथा विभिन्न विदेशी भाषाएं. +हैदराबाद स्थित केंद्रीय अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा संस्थान (सीआईईएफएल) इस मंत्रालय के अधीन +विश्वविद्यालय के समकक्ष उच्च शिक्षा देने वाला एक ऐसा स्वायत्तशासी निकाय है, जहां माध्यमिक स्तर +पर अंग्रेजी पढ़ाने वाले शिक्षकों की व्यावसायिक क्षमता में सुधार लाने के लिए अध्यापक शिक्षण +कार्यक्रम चलाए जाते हैं। यह अंग्रेजी शिक्षण में स्नातकोत्तर एवं डिप्लोमा जैसे कई पाठ्यक्रम और दूरवर्ती +शिक्षा (एवं पत्राचार) के माध्यम से शोध पाठ्यक्रम चलाता है। यह अरबी, जर्मन, जापानी, रूसी, +स्पेनिश आदि कई प्रमुख विदेशी भाषाओं के शिक्षण पाठ्यक्रम भी चलाता है। शिलांग और लखनऊ में +इसके क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र हैं। यह देश में अंग्रेजी शिक्षण/अध्ययन के क्षेत्र में आधारभूत सुधार लाने के +उद्देश्य से भारत सरकार की दो योजनाओं-अंग्रेजी भाषा शिक्षण संस्थान (ईएलटीआई) तथा (डिस्ट्रिक्ट +सेंटर्स फार इंगलिश) को भी लागू करता है और इसके लिए सीआईईएफएल द्वारा राज्य सरकारों को +अनुदान भी दिया जाता है। +शिक्षा में सांस्कृतिक एवं मूल्य पक्ष को मजबूत बनाना. +राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 (1992 में संशोधित) तथा कार्ययोजना 1992 में सामाजिक एवं चारित्रिक +मूल्यों का विकास करने के लिए शिक्षा को एक प्रभावपूर्ण उपकरण बनाने की आवश्यकता को उजागर +करके मूल्य-आधारित शिक्षा पर पर्याप्त जोर दिया गया है। +राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्य पूरे करने के उद्देश्यों से शिक्षा में सांस्कृतिक एवं नैतिक मूल्यों का +सर्वधन करने के लिए सहायता देने की एक केंद्रीय योजना चलाई जा रही है। इस योजना के अंतर्गत +प्रौद्योगिक एवं प्रबंधन शिक्षा सहित पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्रणाली से उच्च शिक्षा स्तर तक सांस्कृतिक एवं +नैतिक (चारित्रिक) शिक्षा के उन्नयन हेतु सरकारी और गैर सरकारी विभागों, पंचायतीराज संस्थाओं को +शत प्रतिशत अनुदान सहायता दी जाती है और इस सहायता की सीमा 10 लाख रूपये हैं। +संस्कृत विभाग. +संस्कृत ने सभी भारतीय भाषाओं के विकास एवं देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में एक जीवंत +भूमिका निभाई है। भारत सरकार राज्य सरकारों के माध्यम से (क) निर्धनता की स्थिति में जी रहे +लब्धप्रतिष्ठ संस्कृत विद्वानों की सहायता, (ख) संस्कृत पाठशालाओं का आधुनिकीकरण करने, (ग) +उच्च/उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में संस्कृत शिक्षण हेतु सुविधा प्रदान करने, (घ) उच्च/उच्चतर +माध्यमिक विद्यालयों में संस्कृत पढ़ रहे छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करने, (æ) संस्कृत को प्रोत्साहित +करने की विभिन्न योजनाएं लागू करने, तथा (च) स्कूलों, संस्कृत महाविद्यालयों/विद्यापीठों को संस्कृत +पढ़ाने के तरीकों में सुधार लाने हेतु शत-प्रतिशत वित्तीय सहायता प्रदान करती है। वर्तमान में इस योजना +में संशोधन किया जा रहा है। +संस्कृत, पाली, अरबी तथा फारसी भाषा के लब्धप्रतिष्ठत विद्वानों को इन भाषाओं के संवर्धन करने +के क्षेत्र में जीवन भर किए गए उनके श्रम एवं योगदान को मान्यता देते हुए प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस के +अवसर पर राष्ट्रपति पुरस्कार एवं मानपत्र से सम्मानित किया जाता है। तीस से चालीस वर्ष के आयु वर्ग +के उन युवा विद्वानों को, जिन्होंने संस्कृत अथवा प्राचीन भारतीय मनीषा को आधुनिकता एवं परंपरा के +समन्वयन की प्रक्रिया से जोड़ने के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की हो, के लिए महर्षि +बादरायण व्यास सम्मान भी प्रारंभ किया गया है। +महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान (उज्जैन) एक स्वायत्तशासी निकाय है जो (क) +वैदिक अध्ययनों की वाचिक परंपरा को नष्ट होने से बचाने, संरक्षण एवं विकास, (ख) पाठशालाओं के +साथ-साथ अन्य माध्यमों एवं संस्थाओं से वेदों के अध्ययन, (ग) शोध सुविधाओं के निर्माण एवं +संवर्धन, (घ) सूचनाओं के संग्रहण तथा इनके अनुरूप जानकारी के एकत्रीकरण हेतु आधारभूत ढांचे +तथा अन्य लाभकारी परिस्थितियों के निर्माण को बढ़ावा देता है। +राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (नई दिल्ली) भारत सरकार द्वारा 1970 में स्थापित एक स्वायत्तशासी +संस्थान है। यह देश में संस्कृत शिक्षा के प्रसार, संवर्धन एवं विकास में संलग्न प्रमुख एजेंसी है। भारत +सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग द्वारा इसे शत-प्रतिशत +वित्तीय सहायता दी जाती है। इस संस्थान को मानद विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है। +राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (तिरूपति) में इंटरमीडिएट से लेकर विद्यावारिधी (पीएच.डी.) तक +के पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। विद्यापीठ ने अपने भाषा-शिक्षण विभाग को उच्चीकृत करके उसे आधुनिक +शिक्षा अध्ययन संस्थान (आईएएसई) बना दिया है। +श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (नई दिल्ली) में शास्त्री से विद्यावाचस्पति +(डी.लिट.) स्तर तक के पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं। वर्ष 1997-98 से विद्यापीठ ने वैदिक एवं रिफ्रेशर +पाठ्यक्रमों में डिप्लोमा पाठ्यक्रम प्रारंभ किया है। ये उपाधियां-विद्यावारिधी (पीएच.डी.) तथा मानद +उपाधि (मानद डी.लिट.) भी संस्थान द्वारा प्रदान की जाती हैं। +छात्रवृत्तियाँ. +मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के माध्यम से “राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति योजना” +नाम से केंद्र द्वारा एक प्रायोजित योजना चलाई जाती है, जिसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों के कक्षा 9 और 10 +के प्रतिभावान छात्रों को शत-प्रतिशत वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों के +छात्रों सहित राज्य योग्यता सूची में शामिल प्रतिभाशाली छात्रों को 10वीं कक्षा के बाद स्नातकोत्तर स्तर तक +के अध्ययन के लिए छात्रवृत्तियां भी प्रदान की जाती हैं। छात्रवृत्तियों की राशि पाठ्यक्रम के अनुसार 250 +रूपये से 750 रूपये तक है। अहिंदीभाषी राज्यों के छात्रों के लिए हिंदी में 10वीं कक्षा के बाद से स्नातकोत्तर +स्तर तक अध्ययन हेतु छात्रवृत्ति की दर 300 रूपये से 1000 रूपये प्रतिमाह है। +भारत सरकार विभिन्न सांस्कृतिक/शैक्षिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अंतर्गत विदेशी सरकारों से +प्राप्त प्रस्तावों के आधार पर विदेशों में स्नातकोत्तर/शोध/शोध पश्चात अध्ययनों के लिए भारतीय छात्रों को +छात्रवृत्ति प्रदान करती है। इन प्रस्तावों के लिए आवेदन पत्र मंगाते समय इन प्रस्तावों के विवरण और +शर्तों का प्रकाशन सभी प्रमुख समाचार पत्रों में किया जाता है तथा ये विभाग की वेबसाइट पर भी उपलब्ध हैं। विदेशी सरकारों द्वारा दी जाने वाली धनराशि एवं सुविधाएं प्रत्येक देश के लिए समय-समय पर बदलती रहती हैं। +पूर्वोत्तर क्षेत्र में शैक्षिक विकास. +पूर्वोत्तर क्षेत्र में उच्च साक्षरता दर वाले समृद्ध जातीय सांस्कृतिक विरासत और भाषाई विभिन्नता वाले +आठ राज्य आते हैं। तथापि पूरे क्षेत्र में शिक्षा के आधारभूत ढांचे और सुविधाओं का अभाव है और इस +क्षेत्र में दी जा रही शिक्षा के स्तर को सुधारने की आवश्यकता है। पूर्वोत्तर राज्यों को अपनी आधारभूत +सुविधाओं में सुधार लाने के लिए समाप्त न होने वाले संसाधनों के केंद्रीय पूल (एनएलसीपीआर) से +अनुदान सहायता दी जाती है। एनएलसीपीआर को लागू करने वाली उच्चाधिकार समिति ने 1998-99 में +अपनी स्थापना के बाद से पूर्वोत्तर क्षेत्र में शैक्षिक आधारभूत ढांचे के विकास हेतु 480.68 करोड़ रूपये +के प्रस्तावों को स्वीकृति दी है। 30 नवंबर, 2005 तक 392.81 करोड़ रूपये की राशि जारी की गई थी। +इसमें से वर्ष 2005-06 में 14.84 करोड़ रूपये जारी किए गए। +केंद्रीय क्षेत्र में आने वाले प्रस्ताव मुख्यतः केंद्रीय संस्थानों के आधारभूत ढांचे के विकास, अर्थात +पूर्वोत्तर में पांच केंद्रीय विश्वविद्यालय, जिनमें कर्मचारी आवासों, शैक्षणिक भवनों, पुस्तकालय भवनों, +प्रशासनिक भवनों के निर्माण तथा प्रयोगशालाओं हेतु उपकरणों और पुस्तकों की खरीद इत्यादि से +संबंधित हैं। ये परियोजनाएं विभिन्न चरणों में लागू की जा रही हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में महत्वपूर्ण केंद्रीय +संस्थान इस प्रकार हैं — आईआईटी, गुवाहाटी; एनईआरआईएसटी, ईटानगर; एनआईटी, सिल्चर; इग्नू के +क्षेत्रीय केंद्र, असम, तेजपुर, मिजोरम, नगालैंड और एनईएचयू के केंद्रीय विश्वविद्यालय। एनएलसीपीआर +के अंतर्गत जारी किए गए आवंटनों के अलावा माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग ने वर्ष 2003-04 के +दौरान अपने बजट से एनएलसीपीआर के अंतर्गत दिए गए आश्वासनों को पूरा करने के मद के अधीन +असम विश्वविद्यालय, तेजपुर; एनईएचयू तथा जेएनयू (एनईआर छात्रों के छात्रावास हेतु) में आधारभूत +संरचनाएं तैयार करने की परियोजनाओं के लिए 40.42 करोड़ रूपये जारी किए। +बजट अनुमान 2005-06 में पूर्वोत्तर क्षेत्र में माध्यमिक और उच्च शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा और +साक्षरता के लिए क्रमश— 261.05 करोड़ और 1053 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। इनमें से +जनवरी 2006 तक माध्यमिक और उच्च शिक्षा विभाग तथा प्राथमिक शिक्षा और साक्षरता विभाग की +विभिन्न योजनाओं के लिए क्रमश— 187.57 करोड़ और 501.60 करोड़ रूपये का व्यय प्रभावित किया जा +चुका है। +केंद्रीय विद्यालय संगठन पूर्वोत्तर क्षेत्र में 86 विद्यालयों का संचालन कर रहा है। +नवोदय विद्यालय समिति पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों के प्रत्येक जिले (78) में से प्रत्येक में एक +नवोदय विद्यालय खोलने के अपने लक्ष्य को पाने का प्रयास कर रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए 76 जनवि +स्वीकृत हो चुका है। +वर्ष 2003-04 के दौरान माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा विभाग पूर्वोत्तर राज्यों में अपने संशोधित बजट +अनुमानों का 10 प्रतिशत से अधिक खर्च करने में सफल रहा। +276 भारत-2010 +विश्वविद्यालय एवं उच्च शिक्षा. +भारत में विश्वविद्यालयों एवं विश्वविद्यालय स्तर की संस्थाओं में 20 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 215 राज्य +विश्वविद्यालय, 100 समकक्ष विश्वविद्यालय, राज्य अधिनियम के अंतर्गत गठित 5 संस्थाएं तथा 13 +राष्ट्रीय महत्व के संस्थान शामिल हैं। ये संस्थान 1800 महिला महाविद्यालयों सहित 17000 महाविद्यालयों +के अतिरिक्त हैं। +विश्वविद्यालय अनुदान आयोग. +विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 28 दिसंबर, 1953 को अस्तित्व में आया। संसद के एक अधिनियम द्वारा +1956 में इसे एक वैधानिक निकाय बना दिया गया। यह विश्वविद्यालय शिक्षा हेतु समन्वय, मानदंडों के +निर्धारण और अनुरक्षण करने वाली राष्ट्रीय संस्था है। यह केंद्र एवं राज्य सरकारों तथा उच्च शिक्षा प्रदान +करने वाली संस्थाओं के बीच समन्वयक संस्था के रूप में कार्य करता है। यह उच्च शिक्षा से जुड़े मामलों +पर इन सरकारों और संस्थाओं की परामर्शदात्री संस्था के रूप में भी कार्य करता है। +यूजीसी अधिनियम के खंड 12 में यह प्रावधान है कि आयोग विश्वविद्यालय शिक्षा के संवर्द्धन +और समन्वयन हेतु तथा शिक्षण, परीक्षा एवं शोधन के क्षेत्र में संबंधित विश्वविद्यालयों के साथ विचार +विमर्श करके जो कार्यवाही उचित समझे, कर सकता है। शिक्षण और अनुसंधान के साथ प्रसार को +आयोग द्वारा शिक्षा के तीसरे आयाम के रूप में जोड़ा गया था। अपने कार्य को चलाने के उद्देश्य से +आयोग अपने कोष से महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों को रखरखाव एवं विकास हेतु अनुदान आवंटन +एवं वितरण करने, विश्वविद्यालय शिक्षा उन्नयन हेतु आवश्यक उपायों के लिए केंद्र सरकार, राज्य +सरकारों तथा उच्च शिक्षा के संस्थानों को परामर्श देने और अधिनियम के अनुरूप नियम एवं प्रक्रिया +निर्धारण करने का कार्य कर सकता है। +आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा भारत सरकार द्वारा नियुक्त 10 अन्य सदस्य होते हैं। सचिव +इसके कार्यकारी अध्यक्ष होते हैं। +आयोग के क्षेत्रीय कार्यालय हैदराबाद, पुणे, भोपाल, कोलकाता, गुवाहाटी तथा बंगलुरू में हैं। +अभी तक गाजियाबाद में स्थित उत्तर क्षेत्रीय कार्यालय अब यूजीसी मुख्यालय से उत्तर क्षेत्रीय महाविद्यालय +ब्यूरो (एनआरसीबी) के रूप में कार्य कर रहा है। +विश्वविद्यालय अनुदान आयेाग ने कुछ नए कदम उठाए हैं। जिनमें, उद्यमशीलता और ज्ञान +आधारित उद्यमों को बढ़ावा देना, बौद्धिक संपदा अधिकारों का संरक्षण, भारतीय उच्च शिक्षा का संवर्द्धन, +विदेशों में शिक्षा प्रशासकों के लिए प्रशिक्षण और विकास तथा व्यापक कंप्यूटरीकरण संबंधी उपाय +शामिल हैं। +स्वायत्तशासी अनुसंधान संस्थान. +वर्ष 1972 में गठित भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद् (आईसीएचआर) ऐतिहासिक शोध कार्यों की +समीक्षा करती है और इतिहास के वैज्ञानिक लेखन को बढ़ावा देती है। नई दिल्ली स्थित यह परिषद शोध +परियोजनाओं का संचालन, निजी शोधार्थियों द्वारा किए जा रहे शोध कार्यों को वित्तीय सहायता देना, +फेलोशिप प्रदान करना, पुस्तक प्रकाशन एवं अनुवाद कार्य आदि का कार्य करती है। +भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् (आईसीपीआर) अपने लखनऊ और नई दिल्ली स्थित +कार्यालयों से वर्ष 1977 से कार्यरत है और दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में अनुसंधान कार्यक्रमों और परियोजनाओं +की प्रगति की समीक्षा, उनका प्रायोजन और उनमें सहायता करने के साथ ही दर्शनशास्त्र और इससे +संबद्ध विषयों में शोध हेतु निजी शोधार्थियों एवं संस्थाओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। +भारतीय उच्चतर अनुसंधान परिषद् (आईआईएएस) की स्थापना 1965 में शिमला में हुई थी। यह +मानविकी, समाज विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में उच्चतर शोध के लिए आवासीय सुविधायुक्त +केंद्र है। यह ज्ञान के क्षेत्र से संलग्न विद्वानों का ऐसा समूह है, जो समकालीन प्रासंगिक प्रश्नों के +वैचारिक विकास और उसके अंतरविषयी दृष्टिकोण पर दृष्टि रखते हैं। +नई दिल्ली स्थित भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीएसएसआर) एक स्वायत्तशासी +निकाय है जो सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान के उन्नयन और समन्वयन का कार्य करता है। इसका प्रमुख +कार्य समाज विज्ञान में शोध (अनुसंधान) की प्रगति की समीक्षा करना, सरकार या अन्य संगठनों/ +व्यक्तियों को शोध संबंधी परामर्श देना, शोध कार्यक्रमों का प्रायोजन और समाज विज्ञान में अनुसंधान हेतु +संस्थाओं और व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। +राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद् (एनसीआरआई) की स्थापना 1995 में केंद्र सरकार द्वारा पूर्ण +रूप से वित्तपोषित स्वायत्तशायी संगठन के रूप में की गई थी। इसका कार्य महात्मा गांधी के +क्रांतिकारी विचारों के अनुरूप ग्रामीण उच्चतर शिक्षा को बढ़ावा देना, गांधीवादी दर्शन के अनुसार +शैक्षणिक संस्थानों और स्वायत्त एजेंसियों को सामाजिक एवं ग्रामीण विकास के उपकरण के रूप में +बढ़ावा देना है। +इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू). +इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना सितंबर, 1985 में हुई थी। इसका दायित्व +देश की शिक्षा व्यवस्था में मुक्त विश्वविद्यालयों को बढ़ावा देना एवं सुदूर शिक्षा प्रणाली प्रारंभ +करने के साथ ही ऐसी प्रणाली में समन्वयन और मानकों का निर्धारण करना है। विश्वविद्यालय +का प्रमुख उद्देश्य जनसंख्या के एक बड़े भाग तक उच्च शिक्षा की पहुंच का विस्तार करना, +सतत् शिक्षा के कार्यक्रम आयोजित करना और विशेष लक्षित समूहों, जैसे-महिलाओं, शारीरिक +रूप से विकलांग लोगों तथा पूर्वोत्तर और उड़ीसा के पिछड़े जिलों जैसे पिछड़े एवं पर्वतीय क्षेत्रों +के निवासियों, मुख्यत— अनुसूचित जाति एवं जनजातीय बहुल क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विशेष कार्यक्रम +प्रारंभ करना है। +इग्नू तृतीयक शिक्षा और प्रशिक्षण हेतु एक परीक्षणात्मक प्रणाली चलाता है। वह प्रणाली शिक्षा के +तौर तरीकों तथा गति पाठ्यक्रमों को जोड़ने, पंजीकरण हेतु योग्यता प्रवेश की आयु और मूल्यांकन के तौर +तरीकों के मामले में लचीली और खुली है। विश्वविद्यालय ने एकीकृत बहुमाध्यमी (मल्टीमीडिया) +निर्देशन रणनीति अपनाई है, जिसमें प्रकाशित सामग्री, श्रव्य दृश्य पाठ्य सहायक सामग्री, शैक्षिक रेडियो +तथा टेलीविजन, टेली कांफ्रेंसिंग और वीडियो कांफें्रसिंग शामिल हैं। यह देशभर में फैले अध्ययन केंद्रों +के नेटवर्क के आमने सामने के परामर्श के माध्यम से होती है। यह समयबद्ध निरंतर मूल्यांकन के साथ- +साथ सत्र के अंत में परीक्षाओं का आयोजन भी करता है। +इग्नू ने अपने कार्यक्रम 1987 में प्रारंभ किए और अभी तक 117 कार्यक्रम चलाए हैं, जिनमें +पीएच.डी., स्नातकोत्तर, उच्च्तर/स्नातकोत्तर डिप्लोमा, डिप्लोमा कार्यक्रम तथा प्रमाण पत्र कार्यक्रम जैसे +900 कार्यक्रम शामिल हैं। वर्ष 2005 के दौरान 4.60 लाख से अधिक छात्रों का पंजीकरण विभिन्न +अध्ययन कार्यक्रमों में किया गया। +विश्वविद्यालय ने देश के विभिन्न भागों में 60 क्षेत्रीय केंद्र, 7 उपक्षेत्रीय केंद्र एवं 1298 अध्ययन +केंद्रों वाला एक व्यापक छात्र सहायता सेवाओं का नेटवर्क स्थापित किया है। इग्नू ने महिलाओं, +अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए 269 अध्ययन +केंद्रों की स्थापना की है। इग्नू ने 26 जनवरी, 2001 को एक शैक्षिक चैनल ज्ञानदर्शन की शुरूआत की +थी, जो अब 24 घंटे का चैनल है तथा छह लगातार प्रसारण करने की इसकी क्षमता है। इग्नू ने नवंबर, +2001 में छात्रों को अतिरिक्त सुविधाएं देने के लिए एफ.एम. रेडियो नेटवर्क शुरू किया। इस समय 17 +एफ. एम. रेडियो नेटवर्क चालू हालत में हैं जो कुछ समय बाद बढ़कर 40 हो जाएंगे। शिक्षित भारत +बनाने हेतु दूरवर्ती शिक्षा के उन्नयन और विकास को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष शैक्षिक चैनल +एजुसेट की शुरूआत एक ऐतिहासिक अवसर है, जो लोगों को अच्छी शिक्षा देकर उनका सशक्तिकरण +करेगा और जनाकांक्षाएं पूरी करेगा। वर्ष 2005 में विश्वविद्यालय ने देशभर में स्थित अपने क्षेत्रीय +अध्ययन केंद्रों में एसआईटी के साथ 100 एजुसेट स्थापित किए। विश्वविद्यालय द्वारा एक वैधानिक +निकाय के रूप में गठित दूरशिक्षा परिषद देश की दूरशिक्षा के समन्वयन और मानकों के निर्धारण करने +वाली शीर्ष संस्था है। +अल्पसंख्यक शिक्षा. +राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 (1992 में संशोधित) में समानता और सामाजिक न्याय के हित में शैक्षिक रूप +से पिछड़े अल्पसंख्यकों की शिक्षा पर विशेष बात कही गई है। संशोधित कार्ययोजना, 1992 के आधार +पर केंद्र द्वारा प्रायोजित दो नई योजनाएं (1) शैक्षिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यकों के लिए गहन क्षेत्रीय +कार्यक्रम, तथा (2) मदरसा शिक्षा आधुनिकीकरण वित्तीय सहायता योजना 1993-94 के दौरान प्रारंभ +की गईं। +समय के साथ यह अनुभव किया गया कि इन सभी योजनाओं को एकीकृत रूप में क्रियान्वित +करने की आवश्यकता है, जिससे इनका क्षेत्र व्यापक बन सके तथा अल्पसंख्यक शिक्षा कार्यक्रम अधिक +प्रभावी एवं स्पष्ट रूप से लागू हो सके। दसवीं पंचवर्षीय योजना में इन दोनों योजनाओं को मिलाकर +गहन क्षेत्रीय एवं मदरसा आधुनिकीकरण कार्यक्रम बना दिया गया। +राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्था आयोग 2004 का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया +गया और जिसके तहत अल्पसंख्यक संस्थाएं अनुसूचित विश्वविद्यालय से स्वयं को संबद्ध कर सकती +हैं। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय, पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, असम विश्वविद्यालय, नगालैंड +विश्वविद्यालय एवं मिजोरम विश्वविद्यालय इस सूची में आते हैं। +तकनीकी शिक्षा. +देश में प्रौद्योगिक (तकनीकी) शिक्षा प्रणाली के दायरे में अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग), प्रौद्योगिकी, +प्रबंधन, वस्तु विज्ञान (आर्किटेक्चर), फार्मेसी इत्यादि आते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय स्नातक- +पूर्व, स्नातकोत्तर और अनुसंधान (शोध) स्तर के कार्यक्रम चलाता है। केंद्रीय स्तर पर प्रौद्योगिक शिक्षा +प्रणाली के अंग हैं — (अ) अखिल भारतीय प्रौद्योगिक (तकनीकी) शिक्षा विकास परिषद् (एआईसीटीई)- +तकनीकी शिक्षा में उचित नियोजन और समन्वित विकास की देखरेख करने वाला निकाय, (ब) सात +भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), (स) छह भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), (द) +भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बंगलौर, (च) भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन संस्थान +(आईआईआईटीएम) ग्वालियर, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईआईटी) इलाहाबाद तथा +इसका अमेठी स्थित विस्तार परिसर, एवं भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजायन तथा निर्माण संस्थान, +(आईआईआईडीएम) जबलपुर, (छ) 18 राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान 100 प्रतिशत सहायता पश्चात +रीजनल इंजिनियरिंग कालेजों में परिवर्तित। +देश में भौतिक विज्ञान की शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए नए कदम उठाए गए हैं। +आईआईएस, बंगलुरू में प्रयोगशाला सहित अन्य ढांचागत सुविधाओं के सुधार के लिए इसे 100 करोड़ +रूपये का विशेष अनुदान मंजूर किया गया। प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद की सिफारिश पर +कोलकाता और पुणे में दो भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों की स्थापना को मंजूरी प्रदान +की गई है। इन संस्थानों में स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर विश्व स्तरीय अनुसंधान सुविधाओं के साथ +भौतिक विज्ञान की शिक्षा दी जाएगी। +विज्ञान और प्रौद्योगिकी शिक्षा में शोधात्मक उत्पादकता बढ़ाने तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार +के लिए सभी प्रौद्योगिकी संस्थानों को इलेक्ट्रॉनिक जर्नल्स और डाटाबेस सुलभ कराया जा रहा है। +कम लागत के उद्देश्य से एआईसीटीई और भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी डाटा लाइब्रेरी +(आईएनडीईएसटी) ने एक साथ मिलकर संयुक्त एआईसीटीई-आईएनडीईएसटी संकाय स्थापित करने +के लिए कदम उठाया है। +दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान तकनीकी संस्थानों और कुल विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि +हुई है। 10वीं योजना में माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा के लिए निर्धारित 13,825 करोड़ रूपये के +योजना परिव्यय में से 4700 करोड़ रूपये का प्रावधान तकनीकी संस्थानों के 16 कार्यक्रमों के लिए +किया गया। +इसमें से सबसे बड़ा हिस्सा 900 करोड़ रूपये विश्व बैंक सहायता प्राप्त-तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता +सुधार कार्यक्रम (टीईक्यूआईपी) के लिए दिया जाता है। एआईसीटीई के लिए 600 करोड़ और +आई.आई.टी. के लिए 612 करोड़ रूपये का खर्च निर्धारित है। 2004-05 में तकनीकी शिक्षा के लिए +वार्षिक योजना परिव्यय 750 करोड़ रूपये का था जिसमें से खर्च 615.85 करोड़ रूपये हुए। +यूनेस्को के साथ सहयोग के लिए भारतीय आयोग (आईएनसीसीयू) +भारत 1946 से संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) का सदस्य रहा है। +सरकार ने यूनेस्को के साथ सहयोग के लिए 1949 में एक अंतरिम भारतीय राष्ट्रीय आयोग (आईएनसीसीयू) +का गठन किया, जिसे 1951 में स्थायी स्वरूप दिया गया। आयोग में शिक्षा, प्राकृतिक विज्ञान, समाज +विज्ञान, संस्कृति एवं संचार से संबंधित पांच उप-आयोग हैं। +आयोग का प्रमुख उद्देश्य यूनेस्को के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषयों पर सरकार को परामर्श +देना एवं यूनेस्को के कार्यों, विशेषकर कार्यक्रमों की तैयारी और इनमें क्रियान्वयन में भूमिका निभाना है। +मानव संसाधन विकास मंत्री इस आयोग के अध्यक्ष होते हैं तथा केंद्र सरकार में माध्यमिक तथा उच्च +शिक्षा विभाग का सचिव इस आयोग का महासचिव होता है। आयोग की सदस्यता दो प्रकार की होती +है-(1) व्यक्तिगत और (2) सांस्थानिक। ये पांच उप-आयोगों में बंटे होते हैं। +राष्ट्रीय आयोग यूनेस्को के कार्यक्षेत्र में आने वाले सभी मामलों में राष्ट्रीय स्तर पर सलाहकार +संयोजक और संपर्क एजेंसी के रूप में कार्य करता है। यह क्षेत्र के राष्ट्रीय आयोगों और यूनेस्को के +क्षेत्रीय आयोगों से शिक्षा, विज्ञान, संस्कृति और सूचना के क्षेत्र में क्षेत्रीय, उप-क्षेत्रीय और द्विपक्षीय +सहयोग बढ़ाने के लिए समझौते भी करता है। +पुस्तक प्रोत्साहन. +नेशनल बुक ट्रस्ट, (भारत) मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी संगठन है +जिसकी स्थापना 1957 में हुई थी। इसका कार्य (i) प्रकाशन, (ii) पुस्तक और पुस्तक पठन को प्रोत्साहन +(iii) विदेशों में भारतीय पुस्तकों को प्रोत्साहन, (i1) लेखकों और प्रकाशकों को सहायता, तथा (1) बाल +साहित्य को बढ़ावा देना है। यह विभिन्न शृंखलाओं के अंतर्गत हिंदी, अंग्रेजी तथा अन्य प्रमुख भारतीय +भाषाओं तथा ब्रेल लिपि में पुस्तकें प्रकाशित करता है। यह हर दूसरे वर्ष नई दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले +का आयोजन करता है, जो एशिया और अफ्रीका का सबसे बड़ा पुस्तक मेला है। ट्रस्ट हर वर्ष 14 से 20 +नवंबर तक “राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह” भी मनाता है। +17वां नई दिल्ली पुस्तक मेला 27 जनवरी से 4 फरवरी 2006 तक आयोजित किया गया। 18 देशों +के 37 प्रकाशकों सहित कुल 1300 प्रतिभागियों ने इसमें हिस्सा लिया। भाग लेने वालों में अंतर्राष्ट्रीय श्रम +संगठन (आई.एल.ओ.), विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) और यूरोपीय संघ (ई.यू.) भी +शामिल थे। +कॉपीराइट. +कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की निगरानी का उत्तरदायित्व मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास है। +यह कानून देश में बौद्धिक अधिकार संपदा (आईपीआर) से जुड़े कई अधिनियमों में से एक है। +कॉपीराइट कार्यालय की स्थापना जनवरी 1958 में विभिन्न रचनात्मक कार्यों के वर्गों के पंजीकरण हेतु +की गई थी। कॉपीराइट अधिनियम के अनुच्छेद 33 के अनुसार, कॉपीराइट संबंधी कार्य करने के लिए +सरकार द्वारा कॉपीराइट समितियों का गठन भी किया जाता है। प्रौद्योगिकीय बदलावों को ध्यान में रखते +हुए भारतीय कॉपीराइट अधिनियम 1957 में 1994 में व्यापक संशोधन किए गए। संशोधित अधिनियम +10 मई 1995 से लागू हुआ। सन 1999 में इस अधिनियम में आगे भी संशोधन किया गया और यह नए +रूप में 15 जनवरी 2000 से प्रभावी हुआ। कॉपीराइट अधिनियम 1957 की धारा 11 के प्रावधानों के +अंतर्गत भारत सरकार ने एक बोर्ड का गठन किया है, जिसे कॉपीराइट बोर्ड कहा गया है। यह बोर्ड एक +अर्द्ध न्यायिक निकाय है, जिसमें एक अध्यक्ष के अतिरिक्त कम से कम दो एवं अधिकतम 14 सदस्य +होते हैं। अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति पांच वर्षों के लिए की जाती है। कॉपीराइट बोर्ड 22 फरवरी +2001 से पांच वर्षों के लिए पुनगर्ठित किया गया है। यह बोर्ड कॉपीराइट पंजीकरण में सुधार, कॉपीराइट +प्रदान करने से जुड़े विवादों और जनता से वापस ली गई रचनाओं को लाइसेंस प्रदान करने से संबंधित +मामलों की सुनवाई करता है। +भारत में कॉपीराइट प्रवर्तन. +भारतीय कॉपीराइट अधिनियम 1957 में कॉपीराइट कानून का उल्लंघन करने के लिए दंड का +प्रावधान है और यह पुलिस को आवश्यक कार्रवाई करने हेतु प्राधिकृत करता है। वस्तुत— इस कानून +को लागू करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में अनधिकृत प्रतियां +बनाने (पाइरेसी) पर रोक लगाने के लिए कॉपीराइट कानून में सुधार लाने हेतु केंद्र सरकार ने कई +कदम उठाए हैं। इन कदमों में कॉपीराइट प्रवर्तन सलाहकार परिषद (सीईएसी) का गठन भी शामिल +है, जिसमें सभी संबंधित विभागों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को सदस्य बनाया जाता है। यह +परिषद कॉपीराइट कानून के पालन और नकल को रोकने से संबंधित प्रावधानों की समीक्षा करती +है। केंद्र सरकार ने इस संबंध में कई कदम उठाए हैं और राज्य सरकारों को (1) कॉपीराइट कानून +लागू कराने के लिए राज्य प्रशासन में विशेष सेल का गठन, (2) उद्योग जगत और कानून लागू +कराने वाली एजेंसियों के बीच समन्वय को बढ़ावा देने के लिए राज्यों में नोडल अधिकारियों की +नियुक्ति, (3) कॉपीराइट कानून के बारे में जनता को जागरूक बनाने के लिए सेमिनार/कार्यशाला +आदि का आयोजन, (4) कॉपीराइट समितियों द्वारा सामूहिक प्रशासन तथा भारत सरकार के नियम +(कार्य आवंटन) 1961 में ताजा संशोधन के अनुसार डब्ल्यूआईपीओ के साथ समन्वय का काम +वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के औद्योगिक नीति और प्रोत्साहन विभाग को हस्तांतरित कर दिया +गया है। +डब्ल्यूआईपीओ के साथ सहयोग. +भारत विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) का सदस्य है, जो इस क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ की +विशिष्ट एजेंसी है। यह एजेंसी कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा अधिकार के मामलों का निपटान करती है +एवं संबंधित विचार-विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम +1961 में किये गये संशोधन के अनुसार इस संगठन को वाणिíय और उद्योग के औद्योगिक नीति और +संवर्धन विभाग को दे दिया गया है। +सेवाओं के व्यवसाय पर आम समझौता (जीएटीएस). +शुल्क एवं व्यापार पर आम समझौता (जीएटीएस) के अंतिम दौर के बाद 1994 में विश्व व्यापार +संगठन (डब्ल्यूटीओ) के अंतर्गत व्यापार से संबंधित अनेक बहुपक्षीय समझौते किए गए। डब्ल्यूटीओ +पहली जनवरी 1995 को अस्तित्व में आया। उससे पहले सेवाओं पर किसी तरह का बहुपक्षीय +समझौता नहीं होता था। वर्ष 1996 में अगले दौर की वार्ताओं के बाद सेवाओं के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार +पर एक व्यापक समझौता हुआ। इस समझौते का उद्देश्य सेवाओं के व्यापार का प्रगतिशील उदारीकरण +है। इसके अंतर्गत सेवाओं के क्षेत्र में अधिक खुला बाजार बनाना था, ठीक उसी तरह जिस तरह गैट +ने वस्तुओं के व्यापार के क्षेत्र में किया था। शिक्षा उन बारह सेवाओं में से एक है, जिन पर सेवाओं के +व्यापार पर आम समझौता (जीएटीएस) के तहत समझौता किया जाना है। समझौता वार्ता के उद्देश्य +से शिक्षा को पांच क्षेणियों-उच्च शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा, वयस्क शिक्षा एवं अन्य +शिक्षा में बांटा गया। जीएटीएस शिक्षा सेवा समेत सेवाओं के व्यापार के क्षेत्र में चार तरह के प्रस्ताव +करता है-(क) सीमापार आपूर्ति सेवा में दूर शिक्षा अथवा इंटरनेट के माध्यम से उपलब्ध कराया +जाने वाला किसी भी प्रकार का पाठ्यक्रम, किसी भी प्रकार की परीक्षण सेवा तथा शैक्षणिक सामग्री, +जो राष्ट्रीय सीमाओं के पार जा सके, (ख) विदेशों में खपत सेवा में मुख्यत— विदेश जाने वाले छात्र +शामिल हैं और यह शैक्षणिक सेवाओं के व्यापार का सामान्य उदाहरण है, (ग) व्यावसायिक उपस्थिति +का आशय किसी मेजबान देश में विदेशी निवेशकों की वास्तविक उपस्थिति है। इसमें वे विदेशी +विश्वविद्यालय शामिल हैं, जो दूसरे देश में पाठ्यक्रम उपलब्ध कराते हैं या संस्थान की स्थापना कर +देते हैं, तथा (घ) ऐसे सक्षम व्यक्तियों की उपस्थिति, जो शैक्षिक सेवाएं प्रदान करने के लिए दूसरे +देशों की यात्रा करने में समर्थ हैं। +शिक्षा सेवाओं के तहत भारतीय संशोधित प्रस्तावों में उच्च शिक्षा क्षेत्र के लिए कई शर्तें रखी गई +हैं। इनके अनुसार उच्च शिक्षा संस्थान को सक्षम अधिकार के माध्यम से शुल्क निर्धारित करने की +अनुमति है लेकिन यह शुल्क कैपिटेशन शुल्क की तरह मुनाफे पर आधारित नहीं होना चाहिए। इसके +अलावा सभी उच्च शिक्षा सेवाएं ऐसे नए नियमों तथा पहले से मौजूद नियमों के अनुपालन के लिए बाध्य +होंगी। + +दो शहरों की एक कथा: +यह चार्ल्स डिकेन्स द्वारा लिखित "अ टेल ऑफ़ टू सिटीज़" का हिंदी में भाषांतरण (ट्रांसलेशन) है। यह कहानी कई विद्यालयों के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा है, इसका हिंदी अनुवाद भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। +यह कहानी तीन पुस्तकों में फैली है और हर पुस्तक अध्यायों में बांटें गएँ हैं। +पहली पुस्तक ː जीवन को याद किया. +अवधि. +वह सबसे अच्छा समय था, वह सबसे बुरा वक्त था, वह विवेक का ज़माना था, वह मूर्खता का ज़माना था, वह भरोसे का युग था, वह अविश्वास का युग था, वह प्रकाश का मौसम था, वह अन्धकार का मौसम था, वह आशा की बसन्त थी, वह निराशा की शीत थी, हमारे सामने सबकुछ था, हमारे सामने कुछ ना था, हम सब सीधे स्वर्ग की ओर जा रहे थे, हम सब सीधे दूसरी ओर जा रहे थे - संक्षेप मे, अवधि कुछ वर्तमान जैसी थी जहाँ इसके कुछ सबसे बक्की अधिकारी, अच्छे या बुरे किसी के लिये भी सर्वोत्र दर्जे का इस्तेमाल करने के लिये जोर देते थे। + +हिन्दी-अंग्रेजी लघु शब्दकोश: +चढ़ना"' -- to go up, to climb, to rise, to mount -- -- Verb—मुझे ऊँचाइयों पर चढ़ना पसंद है। +टुकड़ा"' -- piece, fragment, part—Masculine—Noun—मुझे जमीन का टुकड़ा बेचना है। + +सामान्य ज्ञान भास्कर/विज्ञान: +यहाँ विज्ञान से संबंधित प्रश्न एवं उनके उत्तर दिए गए हैं। + +पारिभाषिक शब्दावली: +आज जब हम विशेष रूप से नगरों के शैक्षणिक संस्थानों पर दृष्टिपात करते हैं तो हमें नहीं लगता कि हम भारत देश के नागरिक हैं। छोटे छोटे बालकों को अंग्रेजी इस तरह पढ़ाई जाती है जैसे वह इंगलैण्ड या अमेरिका के निवासी हों। अपनी मातृभाषा त्याग कर अंग्रेजी पढ़ना उनकी विवशता है क्योंकि अंग्रेजी पढ़कर ही उनकी जीविका का पथ प्रशस्त होगा। आज अंग्रेजी भाषा का समुचित ज्ञान ही उच्च शिक्षा की कसौटी मानी जाती है। यदि आज से ५० वर्ष पीछे लौट जायें तब स्थिति इतनी दयनीय नहीं थी उच्च माध्यमिक कक्षाओं तक और यहाँ तक इंटरमीडिएट तक विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र आदि लगभग सभी विषयों को हिन्दी भाषा के माध्यम में पढ़ाया जाता था। हाँ अंग्रेजी अवश्य अंग्रेजी में पढ़ाई जाती थी। भारत का स्वतंत्रता संग्राम हिन्दी माध्यम में लड़ा गया था और स्वतंत्रता सेनानियों ने दृढ़ निश्चय किया था कि भारत के स्वतंत्र होने पर देश के राज काज की भाषा हिन्दी होगी और ऐसा हुआ भी परन्तु अंग्रेजी के विशेष समर्थक तत्कालीन प्रधान मंत्री महोदय के इस कथन ने कि ‘हिन्दी को अभी और अधिक विकसित किया जाय' हिन्दी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। तत्पश्चात सरकारी तंत्र ने राजभाषा हिन्दी के स्थान पर अंग्रेजी को प्रथम स्थान दिया और हिन्दी को दूसरे स्थान पर सहायिका का रूप दिया। बस उसी समय से हिन्दी की अवनति प्रारंभ हो गई। +महात्मा गांधीजी जीवन पर्यन्त हिन्दी की वकालत करते रहे परंतु उनके साथियों के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी। यद्यपि इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है कि देश के कर्णधार हिन्दी की महत्ता और अंतर्निहित शक्ति से परिचित नहीं हैं, उदाहरणार्थ देश का हर प्रधानमंत्री १५ अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश वासियों को हिन्दी में संबोधित करता है क्योंकि वह जानता है कि यही वह भाषा है जो देश के विशाल जनसमुदाय को समझ में आयेगी और उसकी कुर्सी को संबल मिलेगा। यही नहीं वरन शीर्ष नेता जब बड़ी बड़ी रैलियों में जनता को सम्बोधित करते हैं तब भी अधिकांश लोग हिन्दी में बोलते हैं परंतु संसद में इनका रंग बदल जाता है। वहाँ यह अधिकतर अंग्रेजी बोलते हैं और अंग्रेजी के पोषक और पक्षधर भी हो जाते हैं। हमारे शीर्ष नेताओं के यह दोहरे मानदण्ड आज हमारी नियति बन चुके हैं। कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। मनोरंजन जगत भी हिन्दी की शक्ति से भली भाँति परिचित है। यहाँ तक कि विदेशी चैनल जैसें ‘डिस्कवरी', ‘नेशनल ज्योग्राफिक' तथा ‘हिस्ट्री' आदि हिन्दी माध्यम में अपने कार्यक्रम टीवी पर प्रस्तुत करते हैं ताकि वह देश की विशाल जनसंख्या के बीच अपनी पहुँच बना सकें लेकिन हमारा यह दुर्भाग्य है कि हमारे भाग्य विधाता स्वतंत्र भारत के विशाल जनसमुदाय को उस भाषा से वंचित रखना चाहते हैं जो इस देश की आत्मा है, जो इस देश की मिट्टी से उपजी है, जो हमारे संस्कारों से जुड़ी है, जिसे हमने अपनी माँ से सीखा है और जिसे ७० प्रतिशत से भी अधिक देश की जनसंख्या समझती है। +आज़ाद भारत के प्रारंभिक काल में हिन्दी के उत्थान के लिये विशेष उपक्रम किये गये। यही वह समय था जब वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन हुआ और इसके अंतर्गत विज्ञान चिकित्साशास्त्र, अभियांत्रिकी आदि अनेक विषयों के अंग्रेजी तकनीकी शब्दों के हिन्दी समतुल्य शब्द गढ़ने का काम किया गया। जिसके फलस्वरूप ‘बृहत पारिभाषिक शब्द संग्रह' के नाम से शब्दकोशों की रचना की गई। विज्ञान संबंधी विषयों पर दो खण्डों में उक्त शब्दकोश उपलब्ध हैं। इस दिशा में फादर कामिल बुल्के ने सराहनीय कार्य किया और उन्होंने अपने अंग्रेजी-हिन्दी कोश में अनेक वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दों का समावेश किया है जिससे अच्छी सहायता मिलती है। हिन्दी भाषा को प्रयोजन मूलक बनाने की दिशा में अनेक ठोस कदम उस समय उठाये गये थे परंतु देश के कर्णधारों के रवैये से राष्ट्रीय भावना के दहकते अंगारे शनैः शनैः ठंडे पड़ने लगे अब तो यत्र तत्र चिंगारियाँ ही शेष हैं। इन्ही चिंगारियों में से एक ‘भूविज्ञान परिषद, वड़ोदरा' है जो तेल एवं प्राकृतिक गैस अन्वेषण से संबंधित लगभग सभी विषयों को हिन्दी में प्रस्तुत करने का भागीरथी प्रयत्न कर रही है। प्रायः भूविज्ञान के विषयों पर लिखने वाले लेखकों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी टर्म्स के हिन्दी समतुल्य शब्द आसानी से न मिलने के कारण बड़ी कठिनाई का अनुभव होता है अतः विशेष उपयोगी पारिभाषिक शब्दों को निम्न पंक्तियों में संग्रहीत किया गया है ताकि लेखकगण उससे लाभान्वित हो सकें। + +आयुर्वेद तथा योग से सम्बन्धित सूक्तियाँ: +आयुर्वेद की परिभाषा. +"अर्थात् जिसके द्वारा आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।" +अर्थात् जो आयु का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहा जाता है। +’भावप्रकाश’ के टीकाकार भी ’आयुर्वेद’ शब्द का इस प्रकार विशदीकरण करते हैं: +"अर्थात् हितायु, अहितायु, सुखायु एवं दुःखायु; इस प्रकार चतुर्विध जो आयु है उस आयु के हित तथा अहित अर्थात् पथ्य और अपथ्य आयु का प्रमाण एवं उस आयु का स्वरूप जिसमें कहा गया हो, वह आर्युवेद कहा जाता है।" +आयुर्वेद के पर्यायवाचक शब्द :. +आयुर्वेद, शाखा, विद्या, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण, तंत्र (सन्दर्भ: च. सू. ३०/३१) +आयुर्वेद का प्रयोजन :. +"इस आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है।" +इस संदर्भ में आयुर्वेद का प्रयोजन सिद्ध करते हुए कहा गया है- +आयु. +आयुर्वेद का अर्थ प्राचीन आचार्यों की व्याख्या और इसमें आए हुए 'आयु' और 'वेद' इन दो शब्दों के अर्थों के अनुसार बहुत व्यापक है। आयुर्वेद के अनुसार आयु चार प्रकार की होती है- हितायुः, अहितायुः, सुखायुः, दुःखायु। महर्षि चरक के ही अनुसार- इन्द्रिय, शरीर, मन और आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं। धारि, जीवित, नित्यग, अनुबंध और चेतना-शक्ति का होना ये आयु के पर्याय हैं। +प्राचीन ऋषि मनीषियों ने आयुर्वेद को ‘शाश्वत’ कहा है और अपने इस कथन के समर्थन में तीन अकाट्य युक्तियां दी हैं यथा- +अर्थात् यह आयुर्वेद अनादि होने से, अपने लक्षण के स्वभावत: सिद्ध होने से, और भावों के स्वभाव के नित्य होने से शाश्वत यानी अनादि अनन्त है। +आरोग्य तथा रोग :. +धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल (जड़) उत्तम आरोग्य ही है। अर्थात् इन चारों की प्राप्ति हमें आरोग्य के बिना नहीं सम्भव है। +कविकुलगुरु कालिदास ने भी इसी विचार को प्रकट करने के लिए कहा है कि +अर्थात् धर्म की सिद्धि में सर्वप्रथम, सर्वप्रमुख साधन (स्वस्थ) शरीर ही है। अर्थात् कुछ भी करना हो तो स्वस्थ शरीर पहली आवश्यकता है। +रोग का कारण :. +अर्थात् धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति (स्मरण शक्ति) के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इन अशुभ कर्मों को 'प्रज्ञापराध' कहा जाता है। जो प्रज्ञापराध करेगा उसके शरीर और स्वास्थ्य की हानि होगी और वह रोगग्रस्त हो ही जाएगा। +वैद्य :. +जो अर्थ तथा कामना के लिए नहीं, वरन् भूतदया अर्थात् प्राणिमात्र पर दया की दृष्टि से चिकित्सा में प्रवृत्त होता है, वह सब पर विजय प्राप्त करता है। +अर्थात् जो वैद्य धन या किसी विशिष्ट कामना को ध्यान में न रखकर, केवल प्राणिमात्र (रोगी) के प्रति दया-भाव रख कर ही कार्य करता है, वही वैद्य सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक होता है। +वैद्य के गुण :. +ठीक प्रकार से शास्त्र पढ़ा हुआ, ठीक प्रकार से शास्त्र का अर्थ समझा हुआ, छेदन स्नेहन आदि कर्मों को देखा एवं स्वयं किया हुआ, छेदन आदि शस्त्र-कर्मों में दक्ष हाथ वाला, बाहर एवं अन्दर से पवित्र (रज-तम रहित), शूर (विषाद रहित) , अग्रोपहरणीय अध्याय में वर्णित साज-सामान सहित, प्रत्युत्पन्नमति (उत्तम प्रतिभा-सूझ वाला), बुद्धिमान, व्यवसायी (उत्साहसम्पन्न), विशारद (पण्डित), सत्यनिष्ट, धर्मपरायण होना - ये सब वैद्य के लक्षण हैं। +भेषज के गुण :. +उत्तम देश में उत्पन्न, प्रशस्त दिन में उखाड़ी गई, युक्तप्रमाण (युक्त मात्रा में), मन को प्रिय, गन्ध वर्ण रस से युक्त, दोषों को नष्ट करने वाली, ग्लानि न उत्पन्न करने वाली, विपरीत पड़ने पर भी स्वल्प विकार उत्पन्न करने वाली या विकार न करने वाली, देशकाल आदि की विवेचना करके रोगी को समय पर दी गई औषध गुणकारी होती है। +आयुर्वेद मतानुसार स्वास्थ्य. +An individual/person who is in a state of equilibrium of body’s; +and whose Aatma (soul), Indriya (senses) and Mana (Mind); all are happy, is considered as a Healthy individual. +This definition of Health closely resembles to that given by World Health Organization (WHO). Thus Ayurveda has said thousands of years ago what WHO (World Health Organization) admits today. +Ayurveda has emphasized all parameters like; anatomical, physiological, mental and spiritual well being. Means Ayurveda says the person is healthy who’s body, mind and soul are in normal state and all physiological actions are proper, not the person who is physically healthy but mentally and spiritually not in proper state. +चरक कहते हैं, ‘‘मन, आत्मा और शरीर ऐसे तीन स्तंभ हैं जिन पर न केवल मानव जाति का बल्कि विश्व का अस्तित्व टिका हुआ है।’’ +(स्वस्थ) शरीर के तीन स्तम्भ :. +शरीररुपी मकान को धारण करनेवाले तीन स्तंभ हैं: आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य (गृहस्थाश्रम में सम्यक् कामभोग)। +सुख की नींद. +सत्य बोलनेवाला, मर्यादित व्यय करनेवाला, हितकारक पदार्थ आवश्यक प्रमाण मे खानेवाला, तथा जिसने इन्द्रियों पर विजय पाया है , वह चैन की नींद सोता है। +शरीर और मन :. +रोगोत्पत्ति में शरीर और मन के पारस्परिक सम्बन्ध को स्थापित करते हुए कहा है कि जैसा मन होगा वैसा शरीर तथा जैसा शरीर होगा वैसा मन। +इस शरीर में पंच ज्ञानेन्द्रिय एवं पंच कर्मेन्द्रियों को कार्यरत करने वाले मन की भी तीन प्रकृतियाँ होती हैं—सात्विक, राजस और तामस। इनमें सात्विक श्रेष्ठ है और राजस एवं तामस विकारयुक्त मानी गयी हैं। इसीलिए अष्टांग हृदय में कहा गया है- +आहार :. +लेकिन आरोग्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को प्रतिदिन हितकारी आहार का सेवन करना नितान्त आवाश्यक है। साथ ही दिनचर्या भी नियमित होनी चाहिए जो व्यक्ति समस्त क्रियाओं को विचारपूर्वक करता है, इन्द्रियों के विषयों में लिप्त नहीं होता, हमेशा दूसरों को ही देने की भावना रखता है, दानशील होता है, सभी में समान भाव रखता है, सत्यवादी और क्षमावान तथा अपने पूज्य व्यक्तियों के वचनों का पालन करता है, वह प्रायः रोगों से दूर रह सकता है। इसी सन्दर्भ में कहा गया है +व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार आहार भी सात्विक, राजस और तामस तीन प्रकार का निर्दिष्ट किया गया है। जो व्यक्ति जिस प्रकार का होता है वह तदनुरूप आहार ग्रहण करता है। इस सन्दर्भ में गीता में कहा गया है। +आयुर्वेद में यह भी कहा गया है- +रस :. +रस अपनी तीन मौलिक विशेषताओं के कारण चिकित्सा सर्वोत्तम हैं। +स्पष्ट है कि किसी औषध का काढ़ा एक सो दो छटांक तक की मात्रा में दिया जाय जब कहीं लाभ होता है, परन्तु रस औषधि एक-दो रत्ती की खुराक से ही पूरा लाभ हो जाता है। चूर्ण, चटनी अवहेल आदि अन्य सभी औषधें लाभ पाने के लिए अधिक मात्रा में खानी पड़ती हैं। केवल रस में ही यह अद्वितीय विशेषता है कि वह अल्पमात्रा में पूरा प्रभाव करता है। +रोग-परीक्षा :. +चरक संहिता के कर्ता महर्षि अग्निवेश के सहाध्यायी महर्षि भेड़ ने कहा हैः- +यहाँ स्वर परीक्षा का तात्पर्य सभी प्रकार के यथा-नासा वाणी, फुस्फुस, हृदय, अन्त्र आदि में स्वतः उत्पन्न की गयी ध्वनियों से है। स्वर नासिका से निकली वायु को भी कहते हैं। यदि वह शीतल हो तो रोगी की स्थिति संकटापन्न होती है यदि स्वाभाविक उष्ण है तो निराकार होती है। दाहिने-बायें स्वर के प्रभाव पर भी अध्ययन अपेक्षित है। +इसके अतिरिक्त चरक में, सुश्रुत में और सभी आर्ष संहिताओं में जगह-जगह हृद्ग्रह, हृदत्स और हृद्द्रव आदि शब्द प्राप्त होते हैं जो वस्तुतः हृदय अथवा नाड़ी-परीक्षा द्वारा ही जाने जा सकते हैं। चरक संहिता की परम्परा के प्रवर्त्तक महर्षि भारद्वाज ने तो स्पष्ट कहा हैः- +अर्थात् चिकित्सा के पूर्व परीक्षा अत्यन्त आवश्यक है। परीक्षा की जहां तक बात आती है तो परीक्षा रोगी की भी होती है और रोग की भी। रोग-रोगी दोनों की परीक्षा करके उनका बलाबल ज्ञान करके ही सफल चिकित्सा की जा सकती है। +मधुमेह या डायबिटीज मेलीटस :. +मधुमेग रोग के बारे में सदियों पहले भी लोगों को जानकारी थी। आयुर्वेद में इसका विवरण ‘मधुमेह’ या ‘मीठा पेशाब’ के नाम से मिलता है। आयुर्वेदिक चिकित्सकों को इसका ज्ञान 3000 वर्ष पहले से ही था। भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सकों-सुश्रुत एवं चरक- ने इस रोग के बारे में एवं इसके प्रकारों के बारे में लिखा है- +हरीतकी (हरड). +हरीतकी को वैद्यों ने चिकित्सा साहित्य में अत्यधिक सम्मान देते हुए उसे अमृतोपम औषधि कहा है। राज बल्लभ निघण्टु के अनुसार- +अर्थात् जिसकी माता घर में नहीं है उसकी माता हरीतकी है। माता तो कभी-कभी कुपित भी हो जाती है, परन्तु उदर स्थिति अर्थात् खायी हुई हरड़ कभी भी कुपित (अपकारी) नहीं होती। +पैदल चलना :. +मंद गति से सौ कदम चलें शतपावली के संदर्भ में शास्त्र कहता है - +अर्थात् भोजन के बाद सौ कदम चलन चाहिए। +इस विषय में आयुर्वेद में यह श्लोक दिया गया है - +अर्थात् भोजन करने के पश्चात एक ही जगह बैठे रहने से स्थूलत्व आता है। जो व्यक्ति भोजन के बाद चलता है उसक आयु में वृद्धि होती है और जो भागता या दौड़ लगाता है उसकी मृत्यु समीप आती है। +पंच तत्त्वों में से एक प्रमुख तत्त्व वायु हमारे शरीर को जीवित रखती है और वात के रूप में शरीर के तीन दोषों में से एक दोष है, जो श्वास के रूप में हमारा प्राण है। +पित्त, कफ, देह की अन्य धातुएँ तथा मल-ये सब पंगु हैं, अर्थात् ये सभी शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वयं नहीं जा सकते। इन्हें वायु ही जहाँ-तहाँ ले जाता है, जैसे आकाश में वायु बादलों को इधर-उधर ले जाता है। अतएव इन तीनों दोषों-वात, पित्त एवं कफ में वात (वायु) ही बलवान् है; क्योंकि वह सब धातु, मल आदि का विभाग करनेवाला और रजोगुण से युक्त सूक्ष्म, अर्थात् समस्त शरीर के सूक्ष्म छिद्रों में प्रवेश करनेवाला, शीतवीर्य, रूखा, हल्का और चंचल है। + +हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन: +पत्रकार सौरभ मालवीय ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पीएच.डी. शोध के अंतर्गत ”हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति” का अध्ययन प्रस्तुत कर दिया है। उस शोध का सारांश पत्रकारिता के छात्रों के लिए खास तौर पर प्रकाशित किया जा रहा है। +निष्कर्ष. +शोध का निष्कर्ष यह है कि जिस मात्रा में पाठक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित पाठ्य सामग्री और विषयवस्तु को पढ़ना चाहते हैं, पत्र-पत्रिकाओं में अपेक्षात्या काफी कम संख्या में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से संबंधित समाचार, विश्लेषण, लेख, चित्र संपादकीय व संपादक के नाम पत्र प्रकाशित होते हैं। यह असंतुलन इस शोध में बार-बार उभर कर सामने आया है। पत्रकारिता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में एक अन्योन्याश्रित संबंध है। ऊपर किए गए विश्लेषण से भी यह साफ हो जाता है कि राष्ट्रवाद वास्तव में सांस्कृतिक ही होता है। राष्ट्र का आधार संस्कृति ही होती है और पत्रकारिता का उद्देश्य ही राष्ट्र के विभिन्न घटकों के बीच संवाद स्थापित करना होता है। देश में चले स्वाधीनता संग्राम के दौरान ही भारतीय पत्रकारिता का सही स्वरूप विकसित हुआ था और हम देख सकते हैं कि व्यावसायिक पत्रकारिता की तुलना में राष्ट्रवादी पत्रकारिता ही उस समय मुख्यधारा की पत्रकारिता थी। स्वाधीनता के बाद धीरे-धीरे इसमें विकृति आनी शुरू हो गई। पत्रकारिता का व्यवसायीकरण बढ़ने लगा। देश के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में भी काफी बदलाव आ रहा था। स्वाभाविक ही था कि पत्रकारिता उससे अछूती नहीं रह सकती थी। फिर देश में संचार क्रांति आई और पहले दूरदर्शन और फिर बाद में इलेक्ट्रानिक चैनलों पदार्पण हुआ। इसने जहां पत्रकारिता जगत को नई ऊंचाइयां दीं, वहीं दूसरी ओर उसे उसके मूल उद्देश्य से भी भटका दिया। धीरे-धीरे विचारों के स्थान पर समाचारों को प्रमुखता दी जाने लगी, फिर समाचारों में सनसनी हावी होने लगी और आज समाचार के नाम पर केवल और केवल सनसनी ही बच गई है। भाषा और तथ्यों की बजाय बाजार और समीकरणों पर जोर बढ़ गया है। ऐसे में यदि पत्रकारिता में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उपेक्षा हो रही है तो यह कोई हैरानी का विषय नहीं है। +जैसा कि ऊपर किए गए अध्ययन में हम देख सकते हैं कि देश के प्रमुख मीडिया संस्थान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति उदासीन बने हुए हैं। कई मीडिया संस्थान तो विरोध में ही कमर कसे बैठे रहते हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब कुछ पाठकों को पसंद हो। ऊपर प्रस्तुत सर्वेक्षण के परिणामों में हमने देखा है कि पाठकों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति पर्याप्त रूचि है लेकिन वे न केवल विवश हैं, बल्कि आज के बाजार केंद्रित पत्रकारिता जगत में उनकी बहुत सुनवाई भी नहीं है। एक समय था जब पाठकों की सुनी जाती थी। यह बहुत पुरानी बात भी नहीं है। 15-16 वर्ष पूर्व ही इंडिया टूडे द्वारा अश्लील चित्रों के प्रकाशन पर पाठकों द्वारा आपत्ति प्रकट किए जाने पर उन चित्रों का प्रकाशन बंद करना पड़ा था। परंतु इन 15-16 वर्षाें में परिस्थितियां काफी बदली हैं। आज पाठकों की वैसी चिंता शायद ही कोई मीडिया संस्थान करता हो।बहरहाल एक ओर हम जहां यह पाते हैं कि आज के मीडिया जगत में काफी गिरावट आई है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का स्वर कमजोर पड़ा है तो दूसरी ओर आशा की नई किरणें भी उभरती दिखती हैं। आशा की ये किरणें भी इस संचार क्रांति से ही फूट रही हैं। +आज मीडिया जगत इलेक्ट्रानिक चैनलों से आगे बढ़ कर अब वेब पत्रकारिता की ओर बढ़ गया है। वेब पत्रकारिता के कई स्वरूप आज विकसित हुए हैं, जैसे ब्लाग, वेबसाइट, न्यूज पोर्टल आदि। इनके माध्यम से एक बार फिर देश की मीडिया में नए खून का संचार होने लगा है। इस नए माध्यम का तौर-तरीका, कार्यशैली और चलन सब कुछ परंपरागत मीडिया से बिल्कुल अलग और अनोखा है। जैसे, यहां कोई भी व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत पत्रकारिता कर सकता है। वह ब्लाग बना सकता है और वेबसाइट भी। हालांकि इन नए माध्यमों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रभाव का अध्ययन किया जाना अभी बाकी है लेकिन अभी तक जो रूझान दिखता है, उससे कुछ आशा बंधती है। पत्रकारिता की इस नई विधा को परंपरागत पत्रकारिता में भी स्थान मिलने लगा है और इसकी स्वीकार्यता बढ़ने लगी है। परिवर्तन तो परंपरागत मीडिया में भी होना प्रारंभ हो गया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रभाव समाचाराें और विचारों में झलकने लगा है। नई-नई पत्र-पत्रिकाएं इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए शुरू हो रही हैं। स्थापित पत्र-पत्रिकाएं में भी ऐसे स्तंभ और स्तंभकारों को स्थान मिलने लगा है। आशा यही की जा सकती है कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी जड़ों से कट कर नहीं रह सकता, वैसे ही पत्रकारिता भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से कट कर नहीं रह पाएगी और शीघ्र ही वह स्वाधीनता से पहले के अपने तेवर में आ जाएगी। आज पत्रकारिता एक अत्यंत प्रबल माध्यम बन चुका है। विश्व में कोई भी समाज इसको दुर्लक्षित नहीं कर सकता। हम यदि इस अत्यंत सबल माध्यम में भारत का चिरन्तन तत्व भर सकें तो भारत की मृत्युंजयता साकार हो उठेगी। साथ ही साथ हम राष्ट्र ऋण से भी स्वयं को उऋण करने का प्रयास कर सकते हैं। +अपनी भावी पीढ़ी को हम यदि गौरवशाली अतीत का भारत बतायेंगे तो वही पीढ़ी भविष्य के सर्वसत्ता सम्पन्न भारत का निर्माण करेगी और हमारी भारतमाता परमवैभव के सिंहासन साधिकार विराजमान होगी। जगद्गुरूओं का देश भारत फिर मानवता को जाज्वल्यमान आलोक देगा इसी में जन-जन का कल्याण सन्निहित है क्योंकि जो संस्कृति अभी तक दुर्जेय सी बनी है, जिसका विशाल मन्दिर आदर्श का धनी है। उसकी विजय ध्वजा ले हम विश्व में चलेंगे।" + +सुशासन और भारतीय चिन्तन: +बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के द्वारा वर्ष 2011 और 2012 में देश में दो प्रमुख आंदोलन चलाए गए। पहली दृष्टि में देखा जाए तो दोनों आंदोलन देश की शासन तंत्र की विफलता के विरूद्ध शुरू हुए थे। हालांकि इस शासन तंत्र की विफलता को देश काफी लंबे समय से अनुभव करता रहा है और इसके विरूद्ध कई बड़े आंदोलन भी खड़े हुए परन्तु दुर्भाग्यवश वे न केवल स्वयं दिशाभ्रम के शिकार हुए, बल्कि उनका वास्तविक कारण और उद्देश्य भी ठीक से नहीं समझा जा सका। उदाहरण के लिए जयप्रकाश नारायण द्वारा संचालित 1977 में चलाए गए आंदोलन को देखें तो बात साफ हो जाएगी। यह आंदोलन भी शुरूआत में शासन में बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के विरूद्ध ही था परन्तु यह तात्कालिक मुद्दा गंभीर तब बन गया जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। लेकिन समस्या यह थी कि जेपी जिन लोगों के दम पर यह आंदोलन कर रहे थे, उनमें से किसी को भी न तो समस्या की और न ही इस आंदोलन की गंभीरता की समझ थी। वे इस समस्या को केवल और केवल कांग्रेस व इंदिरा गाँधी से जोड़ कर देखते थे और समझते थे कि इन दोनों के हट जाने से या फिर बलपूर्वक इन दोनों को सत्ताच्यूत कर देने से समस्या ठीक हो जाएगी। जेपी तो समस्या के मूल को समझते थे परन्तु दुर्भाग्यवश वे भीष्म मानसिकता से ग्रस्त थे यानी कि शासन में सुधार तो चाहते थे लेकिन स्वयं उसमें शामिल नहीं होने की प्रतिज्ञा किए बैठे थे। इसलिए उनके सामने एक ही उपाय था कि वे दूसरे लोगों को इसके लिए तैयार करें। दूसरे लोग तैयार तो हुए परन्तु उनकी मंशा कुछ और ही थी। इसी प्रकार हम और भी कई आंदोलनों को देख सकते हैं जो पैदा तो हुए परन्तु शासन की विफलता के कारण वे शासन तंत्र पर न तो कोई प्रश्न चिह्न ही खड़ा कर पाए और न ही कोई विकल्प ही प्रस्तुत कर सके। +सवाल है कि फिर समाधान क्या है? क्या लोकपाल और कालेधन की समस्या सुलझ जाने से समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या यह समस्या वाकई इतनी ही छोटी है? ध्यान से देखा जाए तो यह समस्या का एक छोटा अंश भर ही है। समस्या शासन में बैठे लोगों की विफलता का नहीं, बल्कि शासन की ही असफलता का है। यह तो अब साफ हो चुका है कि शासन अपने सभी उद्देश्यों में असफल हो चुका है। जो उद्देश्य उसने घोषित किए थे, उनमें भी और जो उद्देश्य एक शासन तंत्र के होते हैं उनमें भी। वैसे शासन तंत्र के जो उद्देश्य होने चाहिए, इस व्यवस्था ने उसे पहले से ही गौण बना रखा था और रही सही कसर इसके संचालकों के भ्रष्टाचार ने पूरी कर दी। सवाल है कि एक शासन तंत्र के उद्देश्य क्या होते हैं या फिर क्या होने चाहिए जिन पर खरा न उतरने के कारण इस शासन तंत्र को ही असफल माना जा रहा है? क्या भारत में इससे पहले कोई शासन व्यवस्था रही है जो इससे बेहतर शासन दे सकती हो या फिर देती रही हो? क्या भारत में इससे अधिक सफल और बेहतर शासन प्रणाली को कोई उदाहरण मिलता है? क्या आज के लोकतंत्र का कोई सार्थक विकल्प हमारे पास उपस्थित है? +पहले तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि देश में चल रही संसदीय प्रजातंत्र की व्यवस्था भारत को गुलाम बनाने वाले इंग्लैंड की व्यवस्था की नकल है। दूसरी बात यह जानने की है कि इस संसदीय प्रजातंत्र के बारे में देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के विचार क्या थे? यह जानकर हमें हैरानी हो सकती है कि महात्मा गाँधी ने इस व्यवस्था को सिरे से ही खारिज कर दिया था। उनका साफ-साफ मानना था कि यह व्यवस्था एकदम ही बेकार की है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज में वे लिखते हैं, +भारत में अंग्रेजों की सरकार 1760 में स्थापित हुई थी। हालांकि वो कंपनी की सरकार थी, अंग्रेजों की सरकार नहीं थी, लेकिन छोटे-मोटे कानून उन्होंने उसी समय से बनाना शुरू कर दिया था और उस समय से लेकर 1947 तक अंग्रेजों ने लगभग 34735 कानून बनाये थे। उन्होंने हमें गुलाम बनाने के लिए ये जो व्यवस्थाएं और कानून बनाये थे, दुर्भाग्य से आज भी हमारे देश में सब के सब कानून, सब की सब व्यवस्थाएं वैसे के वैसे ही चल रहीं हैं जैसे अंग्रेजों के समय चला करती थीं। +जब हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था तो सभी क्रान्तिकारियों का मानना था कि भारत की गरीबी, भुखमरी और बेकारी तभी ख़त्म होगी जब अंग्रेज यहाँ से जायेंगे और हम अपनी व्यवस्था लायेंगे। उनका संकल्प था कि उन सब तंत्रों को उखाड़ फेकेंगे जिससे गरीबी, बेकारी, भुखमरी पैदा हो रही है। लेकिन हुआ क्या? हमारे देश में आज भी वही व्यवस्था चल रही है जो अंग्रेजों ने गरीबी, बेकारी और भुखमरी पैदा करने के लिए चलाया था। +देश की वर्तमान शासन व्यवस्था की विफलता का एक बड़ा उदाहरण है 1952 से शुरू हुई पंचवार्षिक योजनाएं जो औसतन 10 लाख करोड़ की होती हैं। अभी तक हमारे देश में ग्यारह पंचवार्षिक योजनायें लागू हो चुकी हैं, मतलब अभी तक हमारी सरकार 110 लाख करोड़ रूपये खर्च कर चुकी हैं और गरीबी, बेकारी, भुखमरी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। अंग्रेज जब थे तो ऐसी कोई योजना नहीं थी क्योंकि वो विकास पर कुछ भी खर्च नहीं करते थे और तब हमारी गरीबी नियंत्रण में थी लेकिन जब से हमने पंचवार्षिक योजना शुरू की, हमारी गरीबी भयंकर रूप से बढऩे लगी और बढ़ती ही जा रही है, कहीं रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। +वास्तव में आज की शासन व्यवस्था स्वयं को कल्याणकारी राज्य के रूप में घोषित करती है और इस लिए वह शिक्षा और स्वास्थ्य से लेकर व्यापार करना, उत्पादन करना, होटल चलाना और यहां तक कि नालियां बनवाना, सड़कों पर झाड़ू लगवाना जैसे काम भी स्वयं करना चाहती है। इसके लिए उसे सरकारी कर्मचारियों की बड़ी फौज खड़ी करनी पड़ती है और इसके लिए जनता पर करों का भारी भरकम बोझ लादना पड़ता है। इन सारे उपक्रमों के बाद भी सारी चीजें बदहाल ही बनी रहती हैं। करों के बोझ के कारण मंहगाई व गरीबी और बढ़ती जाती है। करों से काम न चलने के कारण सरकार विदेशों से कर्ज लेती रहती है और अंततरू हम आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ते जाते हैं। +यह सारी गड़बड़ केवल एक कारण से हो रही है और वह है राज्य यानी कि शासन व्यवस्था के स्वरूप, उद्देश्यों तथा कर्तव्यों को नहीं समझना। राज्य के स्वरूप, उद्देश्यों तथा कर्तव्यों को समझना हो तो हमें पहले यह समझना पड़ेगा कि दुनिया में शासन व्यवस्था की शुरूआत क्यों और कैसे हुई थी? +राज्य की शुरूआत और उसके कर्तव्य. +वैसे तो पाश्चात्य चिंतन में भी राज्य व्यवस्था की शुरूआत की अनेक कल्पनाएं की जाती हैं, परंतु अपने देश में महाभारत में इसका बड़ा ही स्पष्ट वर्णन आता है। महाभारत के शांतिपर्व का एक अत्यंत ही प्रसिद्ध श्लोक है : +इसका अर्थ है प्रारंभ में न तो कोई राजा था, न राज्य, न कोई दंड व्यवस्था थी और न कोई दंड देनेवाला। सभी लोग परस्पर धर्मपूर्वक व्यवहार करते हुए एक दूसरे के हितों की रक्षा किया करते थे। +सामान्यतः समझा जाता है कि यह महाभारतकार ने समाज की आदर्श व्यवस्था का चित्र खीचा है, परंतु वास्तव में यह समाज की प्रारंभिक अवस्था का वर्णन है। प्रारंभ में मानव समाज ऐसा ही था। उसमें लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईर्ष्या, चोरी, लूट जैसे अवगुण नहीं थे। अपने परिश्रम से अर्जित संपत्ति से वे संतुष्ट थे क्योंकि वे यजुर्वेद के निर्देश मा गृधः कस्यस्विद्धनम् का पालन करते थे। परंतु महाभारतकार के अनुसार धीरे-धीरे लोगों में लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईर्ष्या आदि बढऩे लगे और परिणामस्वरूप समाज में अव्यवस्था फैलने लगी। गम्यागम्य, वाच्य-अवाच्य, भक्ष्य-अभक्ष्य और दोष-अदोष कोई भी बात उनकी दृष्टि में त्याज्य न रही। इस प्रकार मानव समाज में धर्मविपव हो जाने से वेद भी लुप्त होने लगा और वेद का लोप होने से धर्म मर्यादा ही नष्ट हो गयी। इससे देवताओं को बड़ा त्रास हुआ और वे ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्माजी से उन्होंने हाथ जोड़कर कहा भगवन्! मनुष्य लोक में जो सनातन वेद था, उसको लोभ मोह आदि दूषित भावों ने नष्ट कर डाला है, इसमें हमें बडा भय हो रहा है। वेद का नाश होने से धर्म भी नष्ट हो गया है। मनुष्यों ने यज्ञ यागादि सभी शुभकर्म छोड़ दिये हैं इसलिए हम बडे संशय में पड़ गये हैं। आप हमारे लिए जो हितकर हो ऐसा कोई उपाय सोचिये। तब ब्रह्मा ने एक नीतिशास्त्र रचा। उसमें अर्थ, धर्म काम-इन त्रिवर्ग का वर्णन था। वह ग्रन्थ त्रिवर्ग नाम से विख्यात हुआ। +महाभारत में ही इसके बाद बताया गया है कि कालांतर में उसी त्रिवर्ग शास्त्र को सरल करके धर्मशास्त्र की रचना की गई और उसके अनुसार व्यवस्था को लागू करने के लिए एक राजा भी नियुक्त किया गया। इसप्रकार पहला राजा हुआ अनंग। राजा अनंग के बेटे अतिबल को भी राजा बनाया गया जोकि उससे कमजोर प्रशासक सिद्ध हुआ और उसका बेटा वेन बिल्कुल ही विलासी और देवताओं को कष्ट पहुंचाने वाला हो गया। प्रसिद्ध विचारक वैद्य गुरूदत्त अपनी पुस्तक प्रजातंत्र और वर्ण-व्यवस्था में लिखते हैं – वेन तो न केवल सुख भोग करता रहा वरन् अपने अधिकार से देव जनों को कष्ट भी देने लगा। इसके अत्याचार को देखकर तत्कालीन ऋषि एकत्रित हुए और उन्होंने मंत्र पूत कुशों द्वारा ("मन्त्रपूतैः कुशैर्जध्नुऋषयो ब्रह्मवादिनः") वेन को मार डाला। उसका अभिप्राय यह कि मन्त्र अर्थात शुभ सम्मति देकर कुशों अर्थात प्रजा जनों को प्ररेणा देकर प्रजा से वेन राजा की हत्या करवा दी। वेन के कई पुत्र थे। उनमें से पृथु को ऋषियों ने राजा बनने के लिए निर्वाचित किय और कुछ शर्तों पर उसे राज्य गद्दी पर बिठा दिया गया। शर्तों में मुख्य यह थी : +इस प्रकार पृथु से उक्त प्रतिज्ञाएँ कराकर अन्त में यह प्रतिज्ञा करायी- +जब पुथु ने इन सब बातों को स्वीकार किया तो इसका राज्याभिषेक कर दिया गया। पृथु ने बहुत वर्ष तक राज्य किया। +इस प्रकार हम पाते हैं कि राजा और राज्य व्यवस्था का निर्माण समाज में एक व्यवस्था लागू करने के लिए हुआ था। लोगों में लोभ-मोह-इर्ष्या आदि के कारण होने वाले झगड़ों को समाप्त करने के लिए राजा नियुक्त किया गया था। राजा का काम था विद्वान और निस्स्वार्थी ऋषियों द्वारा समाजहित में बनाए गए धर्म या नियमों के अनुसार समाज के लोगों को चलाना। उसका उल्लंघन करने वाले लोगों को दंडित करना। यही कारण है कि बाद के स्मृतिकारों ने राजा को दंड की संज्ञा दी। यदि आज की भाषा में कहा जाए तो राजा यानी कि सरकार का कार्य है सुरक्षा कानून-व्यवस्था और न्याय। लंबे समय से व्यवस्था परिवर्तन पर काम कर रहे रामानुजगंज के बंजरंग मुनि कहते हैं – +मनुस्मृति में कहा गया है कि स राजा पुरूषो दंडरू, स नेता शासिता च सरू अर्थात् जो दंड है, वही पुरूष राजा, नेता (न्याय का प्रचारक), और सबका शासनकर्ता है और वही चारों वर्णों व आश्रमों के धर्म का रक्षक व जिम्मेदार है। भारतीय चिंतन में राजा को दंड के रूप में देखा गया है। दुष्टों का नियंत्रित करके सज्जनों को सुख पहुंचाना ही राजा का प्रथम कर्तव्य कहा गया है। +छांदग्योपनिषद में राजा अश्वपति की कथा आती है। उसमें राजा अश्वपति अपने राज्य के बारे में एक घोषणा करते हैं। इस घोषणा से राजा के कर्तव्य और जिम्मेदारियां स्पष्ट होती हैं। राजा अश्वपति कहते हैं कि मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है, न कंजूस, न मद्यप यानी कि नशा करने वाला, न अग्निहोत्र से हीन और अविद्वान है। कोई व्यभिचारी पुरूष नहीं है तो व्यभिचारिणी स्त्री कहां से होगी? यह एक आदर्श राज्य का वर्णन है। एक आदर्श यानी कि सुशासित राज्य में चोर, कंजूस यानी कि केवल अपने स्वार्थ में लीन, नशा करने वाला, व्यभिचारी, यज्ञ न करने वाला और अविद्वान नहीं होना चाहिए। इसमें चरित्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और संस्कृति आदि सारे आयाम आ गए हैं। आज देश का कोई एक भी कोना ऐसा नहीं है, जहां के प्रशासक ऐसी घोषणा कर सकें। +राजा और राजनीति की भरपूर चर्चा भारतीय शास्त्रों में पाई जाती हैं, परंतु वहां राजा के कर्तव्यों, जिम्मेदारियों, उनके निर्वहन के तरीकों, राजा और उसके सहयोगियों के गुण, स्वभाव व चरित्र आदि की चर्चा है। उसमें कहीं भी राजा को चुने जाने की प्रक्रिया पर चर्चा नहीं पाई जाती। वास्तव में भारतीय ऋषि जानते थे कि चुनने की प्रक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण बात है राजा का धर्मानुसार आचरण और यही कारण था कि वे राजा के चरित्र, प्रजा के लिए प्रतिबद्धता और धर्मशास्त्र पर निष्ठा पर अधिक जोर देते थे। साथ ही धर्मशास्त्र की व्यवस्था कभी राजा के अधीन नहीं रही। राजा का काम धर्मशास्त्र यानी कि बनाए गए कानूनों का पालन करवाना था, कानून बनाना नहीं। कानून बनाना ऋषियों यानी कि निस्स्वार्थ विद्वानों का काम था। उसका उल्लंघन करने पर राजा को भी दंडनीय माना गया था। यदि हम आज के लोकतंत्र से इसकी तुलना करें तो आज का शासन तंत्र काफी निरंकुश और कमजोर प्रतीत होगा। आज चुनने की प्रक्रिया पर अधिक जोर है परंतु सांसदों व विधायकों रूपी राजा के चरित्र और कानून के प्रति निष्ठा पर नहीं। आज कानून का पालन करवाने के लिए जिम्मेदार संसद को ही कानून बनाने का भी अधिकार दे दिया गया है, जिससे वह निरंकुश हो गई है। +राजा को निरंकुश होने से रोकने के लिए भारतीय चिंतन में धर्मसभा की व्यवस्था थी। धर्मसभा का काम था समाज के लिए उचित धर्म की व्याख्या करना जिसे हम आज की भाषा में कानून बनाना कह सकते हैं। राजा का काम केवल उसे लागू करना और उसका उल्लंघन करने वालों को दंडित करना मात्र था। इससे राजा के ऊपर धर्मसभा का अंकुश हुआ करता था। इसके अतिरिक्त भारतीय चिंतन और व्यवस्था में विद्वानों की महत्ता सदैव राजा से अधिक मानी गई। इसलिए राजा को ब्राह्मणों यानी कि विद्वानों का संरक्षक घोषित किया गया। अथर्व वेद में तीन प्रकार की सभा और उनके द्वारा शासन के संचालन का वर्णन आता है। ये तीनों सभाएं एक दूसरे के नियमन का कार्य करें, वहां ऐसी अपेक्षा की गई है और तीनों सभाओं पर प्रजा की निगरानी हो, यह भी कहा गया है। मनु राजा के लिए कठोरतम दंड की व्यवस्था करते हैं। मनु कहते हैं कि समान अपराध के लिए राजपुरूष को साधारण मनुष्य की तुलना में हजार गुणा अधिक दंड होना चाहिए। राजपुरूष से मनु का अभिप्राय राजा और उसके सहयोगियों समेत सभी राज कर्मचारियों से है। भीष्म, याज्ञवल्क्य, आचार्य चाणक्य जैसे अन्य भारतीय राजनीतिक विचारकों ने भी अधर्माचरण करने पर राजा व राजपुरूषों के लिए कठोर दंड की व्यवस्था दी है। +भारतीय मनीषियों ने राजधर्म में दंड को सर्वाधिक महत्ता ही है। यही कारण है कि लगभग सभी धर्मशास्त्रों में अपराधों के लिए कठोर दंडों का विधान किया गया है। परंतु इस दंड विधान में कठोरता के साथ-साथ समझदारी का भी पूरा समावेश किया गया है। मनु दंडों का विधान करने में अपराधी की पृष्ठभूमि का भी पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं। वे कहते हैं- +अर्थ : जो कुछ जानकार (आज की भाषा में पढ़ा-लिखा कह सकते हैं) होकर चोरी करे तो उस शूद्र को चोरी से (सामान्य शूद्र को चोरी के लिए दिए जाने वाले दंड से) आठ गुणा अधिक, वैश्य को सोलह गुणा अधिक, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा अधिक और ब्राह्मण को चौंसठ गुणा या सौ गुणा या फिर एक सौ अट्ठाइस गुणा (जितना अधिक विद्वान उतना अधिक दंड) अधिक दंड देना चाहिए। +स्पष्ट है कि मनु वर्णानुसार दंड व्यवस्था तो करते हैं परंतु जो जितना ज्ञानवान वर्ण है उसे उतना अधिक दंड देने का विधान करते हैं। इस समझदारी का यदि आज की व्यवस्था जिसमें अज्ञानता को अपराध का कारण नहीं बताया जा सकता, से तुलना करें तो ध्यान में आता है प्राचीन दंड व्यवस्था में कठोरता होते हुए भी एक प्रकार की मानवीयता है। अज्ञानी को निर्दोष के समान माना गया है और अधिक ज्ञानवान और जिम्मेदार होने को अपराध की गंभीरता से जोड़ा गया है। +इस प्रकार हम पाते हैं कि निरंकुश समझे जाने वाले राजतत्र में भी एसी उदात्त और तर्क सगंत व्यवस्थाएं रही हैं जो हमारे आज के लोकतंत्र में भी नहीं हैं। इसलिए अपने लोकतंत्र पर अनावश्यक अभिमान को त्याग कर भारतीय राजनीतिक परंपरा के इन सिद्धांतों को अपनी व्यवस्था में शामिल करना ही वर्तमान राजनीतिक संकट का एकमात्र समाधान है। + +गोरक्ष उपनिषत्: +श्रीराम ॥
+अथ गोरक्ष उपनिषत् ॥
+श्री नाथ परमानन्द है विश्वगुरु है निरञ्जन है
+विश्वव्यापक है महासिद्धन के लक्ष्य है तिन प्रति हमारे आदेश
+होहु॥ इहां आगे अवतरन॥ एक समै विमला नाम महादेवी किंचितु
+विस्मय जुक्त भ/ईश्रीमन्महा गोरक्षनाथ तिनसौंपूछतु है।
+ताको विस्मय दूर करिबै मैं तात्पर्य है लोकन को मोक्ष करिबै हेतु
+कृपालु तासौं महाजोग विद्या प्रगट करिबे को तिन के एसे श्री नाथ
+स्वमुख सौं उपनिषद् प्रगट अरै है। गो कहियै इन्द्रिय तिनकी
+अन्तर्यामियासों रक्षा करे है भव भूतन की, तासों गोरक्षनाथ
+नाम है। अरु जोग को ज्ञान करावै है या वास्तै उपनिषद् नाम है।
+यातैं ही गोरक्षोपनिषद् महासिद्धनमें प्रसिद्ध हैं। इहां आगै
+विमला उवाच॥ मूलको अर्थ॥ जासमै महाशुन्य था आकाशादि
+महापंचभूत अरु तिनही पञ्चभूतनमय ईश्वर अरु जीवादि को/ई
+प्रकार न थे तब या सृष्टि कौ करता कौन था। तात्पर्य ए है
+कि नाना प्रकार की सृष्टि होय वै मै प्रथम कर्ता महाभूत है
+अरु वैही शुद्ध सत्वांशले के ईश्वर भए वैही मलिन सत्व करि
+जीव भये तौएतौ साक्षात् कर्त्ता न भय तब जिससमै ए न थे तब
+कोई अनिर्वचनीय पदार्थ था॥ सो कर्त्ता सो कर्त्ता सो कर्त्ता कौन
+भयो एसे प्रश्न पर। श्री महागोरक्षनाथ उत्तर करै है श्री
+गोरक्षनाथ उवाच। आदि अनादि महानन्दरूप निराकार साकार
+वर्जित अचिन्त्य कोई पदार्थ था तांकु हे देवि मुख्य कर्ता जानियै
+क्यों कि निराकार कर्ता होय तौ आकार इच्छा धारिबे मैं विरुद्ध
+आवे है। साकार करता होय तौ साकार को व्यापकता नहीं है
+यह विरुद्ध आवै है। तातैं करता ओही है जो द्वैताद्वैत रहित
+अनिर्वचनीय नथा सदानन्द स्वरूप सोही आजे कुं वक्ष्यमाण है।
+इह मार्ग मै देवता कोन है यह आशंका वारनै कहै है। अद्वैतो
+परि म्महानन्द देवता। अद्वैत ऊपर भयो तब द्वैत ऊपर तौ
+स्वत्ः भयो॥ इह प्रकार अहं कर्त्ता सिद्ध तूं जान ञ्छह करता
+अपनी इच्छा शक्ति प्रगट करी। ताकरि पीछे पिण्ड ब्रह्माण्ड
+प्रगट भए तिनमै अव्यक्त निर्गुन स्वरूप सों व्यापक भयो। व्यक्त
+आनन्द विग्रह स्वरूप सों विहार करत भयौ पीछै ज्यौही मैं एक
+स्वरूप सों नव स्वरूप होतु भयौ \\-\\- तैं सत्यनाथ, अनन्तर
+सन्तोषनाथ विचित्र विश्व के गुन तिन सों असंग रहत भयौ, यातैं
+संतोषनाथ भयौ। आगे कूर्मनाथ आकाश रूप श्री आदिनाथ।
+कूर्मशब्द तै पाताल तरै अधोभूमि तकौ नाम कूर्मनाथ। बीच के
+सर्वनाथ पृथ्वीमण्डल के नाथ औरप्रकार सप्तनाथ भए।
+अनन्तर मत्स्येन्द्रनाथ के पुनह पुत्र श्री \\-\\- जगत की उत्पत्ति के हेत
+लाये माया कौ लावण्य तांसौ असंग जोगधर्म \\-\\- द्रष्टा रमण
+कियौ है आत्मरूप सौं सर्व जीवन मैं। तत् शिष्य गोरखनाथ।
+रक्षा करै\\, {\\र्म् ’’}क्ष\" कहियै क्षय करि रहित अक्षय ब्रह्म
+एसे श्रीगोरक्षनाथ चतुर्थरूप भयो और प्रकार नव स्वरूप
+भयो तामे एक निरन्तरनाथ कुं किह मार्ग करि पायौ जातु। ताकौ
+कारन कहतु हैं। दोय मार्ग विश्व मै प्रगट कियो है कुल अरु अकुल।
+कुल मार्ग शक्ति मार्ग्ः, अकुल मार्ग अखण्डनाथ चैतन्य मार्ग
+तन्त्र अंस जोग तिनमै किंचित प्रपञ्च की॥ एवं॥ या रीत मै
+द्वैताद्वैत रहित नाथ स्वरूप तै व्यवहार के हेतु अद्वैत
+निर्गुणनाथ भयौ अद्वैत तै द्वैत रूप आनन्द विग्रहात्म नाथ
+भयौ तामै ही मो एक तैं मैं विशेष व्यवहार के हेतु नव
+स्वरूप भयौ तिन नव स्वरूप कौ निरूपण। श्री कहियै अखण्ड
+शोभा संजुक्त गुरु कहिये सर्वोपदेष्टा आदि कहियै इन वक्ष्यमाण
+नव स्वरूप मैं प्रथम नाथ {\\र्म् ’’} ना\" करि नाद ब्रह्म को
+बोध करावे, {\\र्म् ’’} थ\" करि थापन किए है त्रय जगत जित एसो
+श्री आदिनाथ स्वरूप। अनन्तर मत्स्येन्द्र नाथ। ता पाछ तत् पुत्र
+तत् शिष्य उदयनाथ श्री आदिनाथ तैं जोग शास्त्र प्रगट कियौ
+द्वहै। योग कौ उदय जाहरि महासिद्ध निकरि बहुत भयो आतैं
+उदयनाथ नाम प्रसिद्ध भयो। अनन्तर दण्डनाथ ताही जोग के
+उपदेश तै खण्डन कियो है। काल दण्डलोकनि कौ य्यातै
+दण्डनाथ भयौ॥
+अगै मत्स्यनाथ असत्य माया स्वरूपमय काल ताको खंडन
+कर महासत्य तैं शोभत भयौ आण निर्गुणातीत ब्रह्मनाथ ताकुं
+जानैयातै आदि ब्राह्मण सूक्ष्मवेदी। ब्राह्मण वेद पाठी होतु है
+ऋग यजु साम इत्यादि कर इनके सूक्ष्म वेदी खेचरी मुद्रा अन्तरीय
+खेचरी मुद्रा बाह्यवेषरी कर्ण मुद्रा मुद्राशक्ति की निशक्ति
+करबी सिद्धसिद्धान्त पद्धति के लेख प्रमाण। अनन्त मठ मन्दिर
+शिव शक्ति नाथ अरु ईच्छा शिव तन्तुरियं जज्ञोपवीत शिव तं तु
+आत्मा तं तु जज्ञ जोग जग्य उपवीत शयाम उर्णिमासूत्र। ब्रह्म
+पदाचरणं ब्रह्मचर्य शान्ति संग्रहणं गृहस्थाश्रमं
+अध्यात्म वासं वानप्रस्थं स सर्वेच्छा विन्यासं संन्यासं आदि
+ब्राह्मण कहिवे मै चतुर वर्ण कौ गुरु भयौ अरु इहां च्यारों आश्रम
+कौ समावेस जामै होय है य्यातै ही अत्याश्रमी आश्रमन कोहु गुरु
+भयौ। सो विशेष करि शिष्य पद्धति मै कह्यो ही है। तात्पर्य
+भेदाभेद रहित अचिन्त्य वासना जुक्त जीव होय ते तौ कुल मार्ग
+करियौ मै आवतु है अरु समस्त वासना रहित भए है अन्तह्करण
+जिनके, ऐसै जीव जोग भजन मै आवतु है ऐसो मार्गन मै अकुल मार्ग
+है। और शास्त्र वाक् जालकर उपदेश करतु है। मैरो संकेत
+शास्त्र है प्तो शुन्य कहिये नाथ सोही संकेत है इह मार्ग में
+देवता कोन है यह आशंका वारन कहै है ईश्वर संतान।
+संतान दोय प्रकार कौ नाद रूप विन्दु, विन्दु नाद रूप। शिष्य
+विन्दु रूप, पूत्र नाथ रूप नाद शक्तिरूप विन्दु नादरूप करि भए।
+शिष्य सौ प्रथम कहै नवनाथ स्वरूप शक्ति विन्दु रूप पर शिव
+सोही ईश्वर नाम कर मैरो संतान है। ता करि विश्व की प्रवृत्ति
+करतु है। जोग मत अष्टाश्ण्ग जोग मुख्य कर षंडग जोग अकुल कहनै
+सो अवधूत जोग जोग मत सौं साधन अष्टाश्ण्ग जोग। आदि ब्राह्मणा
+ब्राह्मण क्षत्री वैश्व शूद्रच्यार वर्ण करि पृथ्वी भरी है
+तिनमै ब्राह्मण वर्ण मुख्य है। ब्राह्मण किसको कहियै ब्राह्मंकू
+सगुण ब्रह्म द्वारे निर्गुण ब्रह्म करिजानै सो ब्राह्मण ए जोगीश्वर
+सगुणनाथ गम्य पदार्थ। आनन्द विग्रहात्मनाथ उपदेष्टा उपास्य
+रूप अत्याश्रमी गुरु अवधूत जोग साधन मुमुक्षु अधिकारी बन्ध
+मोक्ष रहित कोइक अनिर्वचनीय मोक्ष मोक्ष ऐसो आ ग्रन्थ मै निरूपण
+है सो जो कोई पढे पढावै जाको अनन्त अचिन्त्य फल है। + +भूमंडलीकरण: +वस्तुएं जिन्हें हम अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं। भले ही वे आवश्यक हों जैसे भोजन, कपड़े, फर्नीचर, बिजली का सामान या दवाइया अथवा आराम और मनोरंजन की वस्तुएँ आदि। इनमें से कई भूमंडलीय आकार के नेटवर्क से हम तक पहुचती हैं। कच्चा माल किसी एक देश से निकाला गया हो सकता है। इस कच्चे माल पर प्रक्रिया करने का ज्ञान किसी दूसरे देश के पास हो सकता है और इस पर वास्तविक प्रक्रिया किसी अन्य स्थान पर हो सकती है, और हो सकता है कि उत्पादन के लिए पैसा एक बिल्कुल अलग देश से आया हो, ध्यान दीजिए कि विश्व के विभिन्न भागों में बसे लोग किस प्रकार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। उनकी परस्पर निर्भरता केवल वस्तुओं के उत्पादन और वितरण तक ही सीमित नहीं है। वे एक दूसरे से शिक्षा, कला और साहित्य के क्षेत्र में भी प्रभावित होते हैं। देशों और लोगों के बीच व्यापार, निवेश, यात्रा, लोक संस्कॄति और अन्य प्रकार के नियमों से अंतर्क्रिया भूमंडलीकरण की दिशा में एक कदम है। +भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में देश एक दूसरे पर परस्पर निर्भर हो जाते हैं और लोगों के बीच की दूरिया घट जाती हैं। एक देश अपने विकास के लिए दूसरे देशों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए सूती कपड़े के उद्योग में महत्त्वपूर्ण नामों में से एक, जापान, भारत या अन्य देशों में पैदा हुई कपास पर निर्भर करता है। काजू के अंतर्राष्टरीय बाजार में प्रमुख, भारत, अफ़्रीकी देशों में पैदा हुए कच्चे काजू पर निर्भर करता है। हम सब जानते हैं कि अमरीका का सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग किस सीमा तक भारत और अन्य विकासशील देशों के इंजीनियरों पर निर्भर करता है। भूमंडलीकरण में केवल वस्तुओं और पूजी का ही संचलन नहीं होता अपितु लोगों का भी संचलन होता है। +भूमंडलीकरण के प्रारंभिक रूप भूमंडलीकरण कोई नई चीज नहीं है। लगभग 200 ई- पूर्व से 1000 ई- तक पारस्परिक क्रिया और लंबी दूरी तक व्यापार सिल्क रूट के माध्यम से हुआ। सिल्क रूट मध्य और दक्षिण-पश्चिम एशिया में लगभग 6000 कि-मी तक फैला हुआ था और चीन को भारत, पश्चिमी एशिया और भूमईोय क्षेत्र से जोड़ता था। सिल्क रूट के साथ वस्तुओं, लोगों और विचारों ने चीन, भारत और यूरोप के बीच हजारों कि-मी की यात्रा की। 1000 ई- से 1500 ई- तक एशिया में लंबी-लंबी यात्राओं द्वारा लोगों में वैचारिक आदान-प्रदान होता रहा। इसी दौरान हिंद महासागर में समुद्रीय व्यवस्था को महत्त्व मिला। +दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के बीच समुद्री मार्ग का विस्तार हुआ। केवल वस्तुओं और लोगों ने ही नहीं अपितु प्रौद्योगिकी ने भी विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा की। इस अवधि में भारत न केवल शिक्षा एवं अध्यात्म का केंद्र था अपितु यहाँ धन-दौलत का भी अपार भंडार था। इसे ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था जिससे आकर्षित होकर विश्व के अन्य भागों से व्यापारी और यात्री यहाँ आए। चीन में मंगोल शासन के दौरान कई चीनी आविष्कार जैसे बारूद, छपाई, धमन भट्‌टी, रेशम की मशीनें, कागज की मुद्रा और ताश यूरोप में पहुचे। वास्तव में इन्हीं व्यापारिक संबंधों ने आधुनिक भूमंडलीकरण का बीजारोपण किया। +आज के भूमंडलीकरण की एक विशेषता ‘प्रतिभा पलायन’ अथवा प्रतिभा संपन्न लोगों का पूर्व से पश्चिम की ओर भागना है। चौदहवीं सदी का विश्व इसी प्रकार की घटना का साक्षी है परंतु तब बहाव विपरीत अर्थात पश्चिम से पूर्व को था। भूमंडलीकरण के प्रारंभिक रूपों में भारत का कपड़ा, इंडोनेशिया और पूर्वी अफ़्रीका के मसाले, मलाया का टिन और सोना, जावा का बाटिक और गलीचे, जिंबाबवे का सोना तथा चीन के रेशम, पोर्सलीन और चाय ने यूरोप में प्रवेश पाया। यूरोप के लोगों की अपने स्रोतों को ढूढ़ने की उत्सुकता ने यूरोप में अन्वेषण के युग का प्रारंभ किया। अत: पश्चिम के तत्त्वावधान में आधुनिक भूमंडलीकरण मुख्यत: अतीत में भारतीयों, अरबों और चीनियों द्वारा स्थापित ढाचे के कारण ही संभव हुआ है। आधुनिक भूमंडलीकरण की ओर कदम प्रौद्योगिक परिवर्तनों ने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अंतर्राष्टरीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्टर, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन की स्थापना इस प्रक्रिया में सहयोग देने वाला एक अन्य कारक है। इससे बढ़कर निजी कंपनियों को अपने देश से बाहर बाजार मिलने और उपभोक्तावाद ने विश्व के विभिन्न भागों को भूमंडलीकरण के विस्तार की ओर प्रेरित किया। +भूमंडलीकरण दो क्षेत्रों पर बल देता है — उदारीकरण और निजीकरण। उदारीकरण का अर्थ है औद्योगिक और सेवा क्षेत्र की विभिन्न गतिविधयों से संबंधत नियमों में ढील देना और विदेशी कंपनियों को घरेलू क्षेत्र में व्यापारिक और उत्पादन इकाइया लगाने हेतु प्रोत्साहित करना। निजीकरण के माध्यम से निजी क्षेत्र की कंपनियों को उन वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की अनुमति प्रदान की जाती है, जिनकी पहले अनुमति नहीं थी। इसमें सरकारी क्षेत्र की कंपनियों की संपत्ति को निजी क्षेत्र के हाथों बेचना भी सम्मिलित है। भूमंडलीकरण के आधुनिक रूपों का प्रारंभ दूसरे विश्व युद्ध से हुआ है परंतु इसकी ओर अधिक ध्यान गत 20 वषों में गया है। आधुनिक भूमंडलीकरण मुख्यत: विकसित देशों के इर्द-गिर्द केंद्रित है। ये देश विश्व के प्राकॄतिक संसाधनों का मुख्य भाग खर्च करते हैं। इन देशों के लोग विश्व जनसंख्या का 20 प्रतिशत हैं परंतु वे पृथ्वी के प्राकॄतिक संसाधनों के 80 प्रतिशत से अधिक भाग का उपभोग करते हैं। उनका नवीनतम प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण है। विकासशील देश प्रौद्योगिकी, पूजी, कौशल और हथियारों के लिए इन देशों पर निर्भर हैं। +भूमंडलीकरण कई देशों में सरकार के स्थान पर बहुराष्टरीय कंपनियों को मुख्य भूमिका निभाने की छूट देता है। उनके पास संसाधन एवं प्रौद्योगिकी है और उनकी गतिविधयों को सरकार का सहयोग उपलब्ध है। कई बहुराष्टरीय कंपनिया अपनी फैक्टिरयों को एक देश से दूसरे देश में ले जाती हैं। इस प्रक्रिया में सूचना प्रौद्योगिकी उन्हें उत्पादन और वितरण को भंग कर विश्व में कहीं भी जाने योग्य बनाती है। कल और आज के भूमंडलीकरण में क्या अंतर है ? आज न केवल वस्तुए ही एक देश से दूसरे देशों को जा रही हैं अपितु बड़ी संख्या में लोग भी जा रहे हैं। पहले केवल तैयार की गई वस्तुए ही जाती थीं, अब इनमें कच्चा माल, प्रौद्योगिकी और लोग भी सम्मिलित हैं। पहले पूर्व के देशों की ही अंतर्राष्टरीय व्यापार में प्रमुखता थी और उनकी वस्तुओं की मांग, उंचे दाम और सम्मान था। अब स्थिति विपरीत है। अब पश्चिम की वस्तुओं का सम्मान अधिक है। कई कंपनिया विकासशील देशों में वस्तुओं का उत्पादन करके और विकसित देशों में उन पर अपना लेबल लगा कर पूरे विश्व बाजार में विकसित देशों के उत्पाद के रूप में उन्हें बेच रही हैं। +भूमंडलीकरण के प्रभाव +भूमंडलीकरण प्रत्येक देश को भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभावित करता है। इसका प्रभाव एक देश से दूसरे देश में भी बदल जाता है। भूमंडलीकरण का विकसित देशों पर प्रभाव विकासशील देशों से अलग होगा। विकसित देशों में भूमंडलीकरण से नौकरिया कम हुई हैं क्योंकि कई कंपनिया उत्पादन खर्च को कम करने के लिए उत्पादन इकाइयों को विकासशील देशों में ले जाती हैं। यूरोप के कई देशों में बेरोजगारी एक सामान्य बात हो गई है। विकासशील देशों में भूमंडलीकरण खाद्यान्नों एवं अन्य कई निर्मित वस्तुओं के उत्पादकों को प्रभावित करता है। भूमंडलीकरण ने कई विकासशील देशों के लिए दूसरे देशों से कुछ मात्रा में वस्तुए खरीदना अनिवार्य बना दिया है, भले ही उन वस्तुओं का उनके अपने देश में ही उत्पादन क्यों न हो रहा हो। बाहर के देशों की निर्मित वस्तुओं के प्रवेश से स्थानीय उद्योगो को खतरा बढ़ जाता है। विकासशील देशों की दृष्टि से भूमंडलीकरण के कुछ अन्य प्रभाव निम्नलिखित हैं– +आर्थिक प्रभाव : भूमंडलीकरण से अन्य देशों से पूजी, नवीनतम प्रौद्योगिकी और मशीनों का आगमन होता है। उदाहरण के लिए, भारत का सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग विकसित देशों में प्रयोग किए जाने वाले कंप्यूटरों और दूर संचार यंत्रों के प्रयोग करता है। लगभग 15 वर्ष पहले यह अकल्पनीय था। भारत के कुछ संस्थानों के इंजीनियर स्नातकों की अमरीका और यूरोप के कई देशों में बहुत माग है। कई देशों में सरकारों के पास प्राकॄतिक संसाधनों का स्वामित्व होता है और वे पूरी दक्षता से जन-हित में उनका उपयोग करती हैं और लोगों को विभिन्न सेवाए उपलब्ध कराती हैं। भूमंडलीकरण सरकारों को संसाधनों का निजीकरण करने के लिए प्रोत्साहित करता है जिससे लाभ कमाने की दृष्टि से संसाधनों का शोषण होता है और कुछ लोगों के हाथों में पैसा इकट्‌ठा हो जाता है। निजीकरण उन लोगों को भी वंचित रखता है जो इन संसाधनों का उपभोग करने के लिए खर्च करने की क्षमता नहीं रखते। +राजनीतिक प्रभाव : भूमंडलीकरण सभी प्रकार की गतिविधयों को नियमित करने की शक्ति सरकार के स्थान पर अंतर्राष्टरीय संस्थानों को देता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से बहुराष्टरीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित होते हैं। उदाहरण के लिए, जब एक देश किसी अन्य देश की व्यापारिक गतिविधयों के साथ जुड़ा होता है तो उस देश की सरकार उन देशों के साथ अलग-अलग समझौते करती है। यह समझौते अलग-अलग देशों के साथ अलग-अलग होते हैं। अब अंतर्राष्टरीय संगठन जैसे विश्व व्यापार संगठन सभी देशों के लिए नियमावली बनाता है और सभी सरकारों को ये नियम अपने-अपने देश में लागू करने होते हैं। इसके साथ ही भूमंडलीकरण कई सरकारों को निजी क्षेत्र की सुविधा प्रदान करने हेतु कई विधायी कानूनों और संविधान बदलने के लिए विवश करता है। प्राय: सरकारें कामगारों के अधिकारों की सुरक्षा करने वाले और पर्यावरण संबंधी कुछ नियमों को हटाने पर विवश हो जाती हैं। +सामाजिक-सांस्कॄतिक प्रभाव: भूमंडलीकरण पारिवारिक संरचना को भी बदलता है। अतीत में संयुक्त परिवार का चलन था। अब इसका स्थान एकाकी परिवार ने ले लिया है। हमारी खान-पान की आदतें, त्योहार, समारोह भी काफी बदल गए हैं। जन्मदिन, महिला दिवस, मई दिवस समारोह, फास्ट-फूड रेस्तरांओं की बढ़ती संख्या और कई अंतर्राष्टरीय त्योहार भूमंडलीकरण के प्रतीक हैं। भूमंडलीकरण का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे पहनावे में देखा जा सकता है। समुदायों के अपने संस्कार, परंपराए और मूल्य भी परिवर्तित हो रहे हैं। Anil Pancholy 9982302554 +भूमंडलीकरण : भारतीय परिदृश्य. +स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति को चुना जिसके अंतर्गत सरकार ने विकास का मार्ग अपनाया। इसने कई बड़े उद्योग स्थापित किए और धीरे-धीरे निजी क्षेत्र को विकसित होने दिया। बरसों तक भारत अपने निधार्रित लक्ष्य पाने में सक्षम नहीं हो सका। कल्याणकारी कार्यो के लिए भारत ने अन्य देशों से ऋण लिया। कुछ स्थितियों में सरकार ने लोगों के पैसे को भी मुक्तहस्त से खर्च किया। 1991 में भारत ऐसी स्थिति में पहुच गया जिससे वह बाहर के अन्य देशों से ऋण लेने की विश्वसनीयता खो बैठा। कई अन्य समस्याओं जैसे बढ़ती कीमतें, पर्याप्त पूजी की कमी, धीमा विकास और प्रौद्योगिकी के पिछड़ेपन ने संकट को बढ़ा दिया। सरकारी खर्च आय से कहीं अधिक हो गया। इसने भारत को भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को तेज करने तथा दो अंतर्राष्टरीय संस्थाओं, विश्व बैंक और अंतर्राष्टरीय मुद्रा कोष के सुझाव के अनुसार अपने बाजार खोलने को विवश किया। सरकार द्वारा अपनाई गई रणनीति को नई आर्थिक नीति कहा जाता है। इस नीति के अंतर्गत कई गतिविधयों को, जो सरकारी क्षेत्र द्वारा ही की जाती थीं, निजी क्षेत्र के लिए भी खोल दिया गया। निजी क्षेत्र को कई प्रतिबंध से भी मुक्त कर दिया गया। उन्हें उद्योग प्रारंभ करने तथा व्यापारिक गतिविधया चलाने के लिए कई प्रकार की रियायतें भी दी गई। देश के बाहर से उद्योगपतियों एवं व्यापारियों को उत्पादन करने तथा अपना माल और सेवाए भारत में बेचने के लिए आमंत्रित किया गया। कई विदेशी वस्तुओं को, जिन्हें पहले भारत में बेचने की अनुमति नहीं थी, अब अनुमति दी जा रही है। +भारत में भूमंडलीकरण के अंतर्गत विगत एक दशक में कई विदेशी कंपनियों द्वारा मोटर गाड़ियों, सूचना प्रौद्योगिकी, इलैक्टरॉनिक्स, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के क्षेत्र में उत्पादन इकाइया लगाई गई हैं। इससे भी बढ़कर कई उपभोक्ता वस्तुओं विशेषत: इलैक्ट्रानिक्स उद्योग में जैसे रेडियो, टेलीविजन और अन्य घरेलू उपकरणों की कीमतें घटी हैं। दूरसंचार क्षेत्र ने असाधारण प्रगति की है। अतीत में जहा हम टेलीविजन पर एक या दो चैनल देख पाते थे उसके स्थान पर अब हम अनेक चैनल देख सकते हैं। हमारे यहाँ सेल्यूलर फोन प्रयोग करने वालों की संख्या लगभग दो करोड़ हो गई है, कंप्यूटर और अन्य आधुनिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग खूब बढ़ा है। जब विकासशील देशों को व्यापार के लिए विकसित देशों से सौदेबाजी करनी होती है तो भारत एक नेता के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक क्षेत्र जिसमें भूमंडलीकरण भारत के लिए उपयोगी नहीं है वह है – रोजगार पैदा करना। यद्यपि इसने कुछ अत्यधक कुशल कारीगरों को अधिक कमाई के अवसर प्रदान किए परंतु भूमंडलीकरण व्यापक स्तर पर रोजगार पैदा करने में असफल रहा। अभी कॄषि को, जो भारत की रीढ़ की हड्‌डी है, भूमंडलीकरण का लाभ मिलना शेष है। भारत के अनेक भू-भागों को विश्व के अन्य भागों में उपलब्ध भिन्न प्रकार की प्रौद्योगिकी का कुशलता से प्रयोग कर सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है। विकसित देशों में खेती के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों को अपनाने के लिए भारतीय कॄषको शिक्षित करना है। यहाँ अस्पतालों को अधिक आधुनिक उपकरणों की आवश्यकता है। भूमंडलीकरण द्वारा अभी भारत के लाखों घरों में सस्ती दर पर बिजली उपलब्ध करवानी है। +अत: भूमंडलीकरण एक अनुत्क्रिमणीय प्रक्रिया है। इसका प्रभाव विश्व में सर्वत्र देखा जा सकता है। विश्व के एक भाग के लोग अन्य भाग के लोगों के साथ अंतर्क्रिया कर रहे हैं। नि:संदेह इस प्रकार के व्यवहार की अपनी समस्याए होती हैं। लेकिन हमें इसके उज्ज्वल पक्ष की ओर देखना चाहिए और हमें अपने लोगों के हित में काम करना चाहिए। + +भारतीय इतिहास का विकृतीकरण: +भारत  का इतिहास, जिसे हमें हमारे स्कूलों में पढ़ाया जाता था और अभी भी हमारे स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है, Atul और जो पाठ हम पढ़ रहे हैं वे विकृत हैं । Atul Parashar +भारतीय इतिहास में अधिकांश विरूपण ब्रिटिशों द्वारा किया गया था। और कांग्रेस शासन के दौरान, कम्युनिस्टों, वामपंथी बौद्धिक वर्ग, जो हमेशा से भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति शत्रुतापूर्ण रहे हैं, वे हिंदुओं के मूल्यों और हितों को नष्ट करने के लिए एक साथ आए । +भारतीय इतिहास के औपनिवेशिक संस्करण की प्रक्रिया को कम्युनिस्टों और वामपंथियों ने जारी रखा, मुगल काल की महिमा वर्णित की और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक चयनात्मक तस्वीर पेश की। +स्वामी विवेकानंद ने एक सदी पहले भारतीय इतिहास के विरूपण और गलत बयानों पर अपने विचार और चिंताओं को व्यक्त किया था: +“अंग्रेजी और पश्चिमी लेखकों द्वारा लिखे गए हमारे देश के विकृत इतिहास, हमारे विवेक और बुद्धिमत्ता को कमजोर नहीं कर सकते, क्या वे  विदेशी जो केवल हमारे पतन की बात करते हैं , जो हमारे शिष्टाचार और रीति-रिवाजों, या धर्म और दर्शन के बहुत कम समझते हैं, भारत के वफादार और निष्पक्ष इतिहास लिख सकते हैं? स्वाभाविक रूप से, बहुत से गलत धारणाएं और गलत सम्बोधन उन्हें उनके रास्ते में मिल गए हैं। +फिर भी उन्होंने हमें दिखाया है कि कैसे हमारे प्राचीन इतिहास में शोध करने के लिए आगे बढ़ना है। अब यह हमारे लिए है कि हम खुद के लिए ऐतिहासिक अनुसंधान का एक स्वतंत्र मार्ग, वेद और पुराण, और भारत के प्राचीन इतिहास का अध्ययन करने के लिए, और उनसे अपने जीवन की साधना को सटीक और आत्मा को प्रेरणादायक इतिहास लिखने के लिए बनायें । यह भूमि भारतीयों को भारतीय इतिहास लिखने के लिए है। “ +आर्यन आक्रमण सिद्धांत: एक मिथक +ऋग्वेद के अनुसार, आर्य शब्द को एक अच्छे योग्य व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है जो अपने देश की परंपराओं का सम्मान करता है, जो सामाजिक और व्यावहारिक तौर पर श्रेस्ठ है और विधिवत यज्ञ का संस्कार करता है । एक धार्मिक व्यक्ति  है। +जबकि ऋग्वेद में दस्यु एक अशिष्ट व्यक्ति के रूप में वर्णित है । +कभी कोई आर्यन आक्रमण नहीं हुआ था । आर्य धार्मिक ऋग्वेदिक लोग थे । +वैदिक ग्रंथों में अंग्रेजों का अविश्वास : +ब्रिटिश इतिहासकारों ने वेद, रामायण, महाभारत और पुराण जैसे भारतीय ग्रंथों पर ध्यान नहीं दिया । वे विदेशी आगंतुक के खातों पर भरोसा करते थे और भारतीय इतिहास पूरी तरह से विकृत होता गया । +कांग्रेस शासन के दौरान साम्यवादी और वामपंथी इतिहासकार औपनिवेशिक इतिहास के साथ जारी रहे: +स्वतंत्र भारत के पिछले 70 वर्षों के दौरान, कांग्रेस लगभग 60 वर्षों के लिए सबसे अधिक शासन में रही है । और कांग्रेस शासन के दौरान, कम्युनिस्ट और वामपंथी, जो हमेशा हिंदू और वैदिक ग्रंथों के प्रति शत्रुतापूर्ण रहे हैं, केवल मुगलों और कांग्रेस की महिमा वर्णित करते रहे हैं । +जबकि मुगल शासन 170 साल तक रहा जो बाबर से शुरू हुआ था और औरंगजेब तक रहा था, और यह केवल उत्तर भारत के कुछ हिस्सों तक ही सीमित था । इसके विपरीत, विजयनगर साम्राज्य 300 से अधिक वर्षों के लिए अस्तित्व में रहा था, कृष्ण देव राय, विजयनगर साम्राज्य का सम्राट प्राचीन भारत के बेहतरीन शासकों में से एक था । विजयनगर साम्राज्य, 14 वीं शताब्दी के मध्य से 17 वीं शताब्दी तक अस्तित्व में था । लेकिन हमारे स्कूल की इतिहास की पाठ्यपुस्तक में, इसे महत्व नहीं दिया गया क्योंकि हमारे साम्यवादी इतिहासकार हिंदू धर्म के प्रति शत्रु थे और मुगलों के इतिहास से प्रभावित थे। +मराठा साम्राज्य: +मुगलों के समकालीन  मराठा साम्राज्य को भी  पक्षपाती कम्युनिस्ट और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा महत्व नहीं दिया गया । मराठा साम्राज्य महान शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित किया गया था । मराठों ने पश्चिमी भारत के सभी हिस्सों को, पूर्व में कटक और दक्षिण भारत से कर्नाटक तक और मध्य प्रदेश पर शासन किया । यह एक विशाल साम्राज्य था और औरंगजेब के बाद मुगल शासक मराठों के हाथों की कठपुतलियां थे और वे मराठा  पेंशन पर जीवित रहते थे। +सिख साम्राज्य: +सिख साम्राज्य 18 वीं सदी के भारत के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था । सिख साम्राज्य ; पूर्व पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर के हिस्सों में फैला था । महाराजा रणजीत सिंह, हरि सिंह नलवा जैसे सिख साम्राज्य के महान शासकों को भी कम्युनिस्ट लेखकों ने नजरअंदाज कर दिया था । +खर्वेला साम्राज्य: +एनसीईआरटी पुस्तकों में सबसे बड़ी कमी महामेघवाहन वंश के सम्राट खारवैल के बारे में है । भुवनेश्वर के बाहरी इलाके कलिंगनगर, खर्वेला साम्राज्य की राजधानी थी । उनका शिलालेख भारत की अवधारणा को वर्णित करता है- आर्यव्रत सहस्राब्दी से ही अस्तित्व में था और कैसे उन्होंने आर्यव्रत पर विजय प्राप्त की और सम्राट बन गया । +कम्युनिस्ट और वामपंथी द्वारा लिखे गए हमारे स्कूल की पाठ्यपुस्तकों ने जानबूझकर नरसंहार और बड़े पैमाने पर धर्मांतरण और मंदिरों के विध्वंस को छिपा दिया है । +हमारे बच्चों को भ्रमित किया जा रहा है कि क्रूर मुगल शासक हिंदुओं के लिए उदार थे और लाखों हिंदुओं की नरसंहार और उत्पीड़न को छिपा दिया है ।  यह दुनिया की सबसे बड़ा विध्वंसकारी त्रासदी  है जो कभी हुआ था। और हमारे कम्युनिस्ट और हिंदूविरोधी इतिहासकारों ने बहुत सुन्दरता से इसे छिपा दिया है। और इस तरह के भयानक शासकों की महिमा वर्णित करते रहे – जो वास्तव में मानवता पर एक धब्बा हैं । + +भारत का आधुनिक रूप में लिखित इतिहास: +लौटें, भारतीय इतिहास का विकृतीकरण +भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने की परम्परा देश में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन की स्थापना के साथ-साथ ही शुरू हो गई थी। कम्पनी के शासन काल में देश के राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, शैक्षिक, आर्थिक आदि क्षेत्रों में पाश्चात्य ढंग की नई-नई खोजें, व्याख्याएं और +प्रक्रियाएं चालू हो गई थीं। इनमें से भारतवासियों के लिए कुछ यदि लाभकर रहीं, तो काफी कुछ हानिकर भी। फिर भी वे चलाई गईं और उन्हें मान्यता भी मिली क्योंकि वारेन हेस्टिंग्स के समय तक सत्ता की बागडोर अंग्रेजों के हाथों में पूरी तरह से पहुँच चुकी थी और देश में सभी कार्य उनकी ही इच्छाओं और +आकांक्षाओं के अनुरूप होने लगे थे। +इतिहास-लेखन का श्रीगणेश. +इतिहास-लेखन का श्रीगणेश जहाँ तक उस समय देश में इतिहास-लेखन के क्षेत्र का सम्बन्ध था, उसमें भी अन्य क्षेत्रों की भाँति ही नए ढंग से अनुसंधान और लेखन के प्रयास शुरू किए गए। इस दृष्टि से यद्यपि सर विलियम जोन्स, कोलब्रुक, जॉर्ज टर्नर, जेम्स प्रिंसेप, पार्जिटर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं तथापि इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य कलकत्ता उच्च न्यायालय में कार्यरत तत्कालीन न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने किया। उन्होंने भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने के लिए नए ढंग से शोधकार्य करने का सिलसिला शुरू किया। इस कार्य में उन्हें कम्पनी के तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स का पूरा-पूरा सहयोग मिला। फलतः एक व्यापारिक कम्पनी भारत मंे एक सशक्त राजशक्ति बन गई। +1757 ई. में हुए प्लासी के युद्ध के परिणामों से प्रोत्साहित होकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत पर अंग्रेजी राज्य की स्थापना का जो स्वप्न सजाया गया था, उसे सार्थक करने के लिए न केवल भारत में कार्यरत कम्पनी के लोगों ने ही वरन इंग्लैण्ड के सत्ताधीशों ने भी पूरा-पूरा प्रयास किया। इस संदर्भ में मैकाले द्वारा अपने एक मित्र राउस को लिखे गए पत्र की यह पंक्ति उल्लेखनीय है- +इतिहास-लेखन के लिए अंग्रेजों के प्रयास. +भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में अर्थात अपनी इच्छानुसार लिख सकें अथवा लिखवा सकें, इसके लिए कम्पनी सरकार ने अंग्रेज इतिहासकारों के माध्यम से सघन प्रयास कराए जिन्होंने भारत की प्राचीन सामग्री, यथा- ग्रन्थ, शिलालेख आदि, जिसे पराधीन रहने के कारण भारतीय भूल चुके थे, खोज-खोज कर निकाली। साथ ही भारत आने वाले विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों का अनुवाद अंग्रेजी में करवाया और उनका अध्ययन किया किन्तु भारतीय सामग्री में से ऐसी सामग्री बहुत कम मात्रा में मिली जो उनके काम आ सकी। अतः उन्होंने उसे अनुपयुक्त समझकर अप्रामाणिक करार दे दिया। +मनगढ़न्त सिद्धान्तों का निर्धारण. +बाद में स्व-विवेक के आधार पर उन्होंने भारत का इतिहास लिखने की दृष्टि से अनेक मनगढ़न्त निष्कर्ष निर्धारित कर लिए और सत्ता के बल पर उनको बड़े जोरदार ढंग से प्रचारित करना/करवाना शुरू कर दिया। कतिपय उल्लेखनीय निष्कर्ष इस रूप में रहे - +उक्त निष्कर्षों को प्रचारित करके उन्होंने भारत के समस्त प्राचीन साहित्य को तो नकार ही दिया, साथ ही भारतीय पुराणों, धार्मिक ग्रन्थों और प्राचीन वाङ्मय में सुलभ सभी ऐतिहासिक तथ्यों और कथ्यों को भी अप्रामाणिक और अविश्वसनीय करार दे दिया। +विलियम जोन्स द्वारा निर्धारित मानदण्ड. +ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सर विलियम जोन्स के माध्यम से इस देश के इतिहास को नए ढंग से लिखवाने की शुरूआत की। जोन्स ने भारत का इतिहास लिखने की दृष्टि से यूनानी लेखकों की पुस्तकों के आधार पर 3 मानदण्ड स्थापित किए- +(१) आधार तिथि-भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय अर्थात 327-328 ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य विद्यमान था और उसके राज्यारोहण की तिथि 320 ई. पू. थी। इसी तिथि को आधार तिथि मानकर भारत के सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास के तिथिक्रम की गणना की जाएक्योंकि इससे पूर्व की ऐसी कोई भी तिथि नहीं मिलती जिसे भारत का इतिहास लिखने के लिए आधार तिथि बनाया जा सके। +(२) सम्राट का नाम- यूनानी लेखकों द्वारा वर्णित सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्त मौर्य था और सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात वही भारत का सम्राट बना था। +(३) राजधानी का नाम- यूनानी लेखकों द्वारा वर्णित पालीबोथ्रा ही पाटलिपुत्र था और यही नगर चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी था। +इतिहास-लेखन में धींगामुस्ती. +इतिहास-लेखन के कार्य में उस समय कम्पनी में कार्यरत जहाँ हर अंग्रेज ने पूरा-पूरा सहयोग दिया, वहीं कम्पनी ने भी ऐसे लोगों को सहयोग और प्रोत्साहन दिया, जिन्होंने भारतीय इतिहास से सम्बंधित कथ्यों और तथ्यों को अप्रामाणिक, अवास्तविक, अत्युक्तिपूर्ण और सारहीन सिद्ध करने का प्रयास किया। पाश्चात्य विद्वानों के भारतीय इतिहास-लेखन के संदर्भ में उक्त निष्कर्षों और मानदण्डों को आधार बनाकर तत्कालीन सत्ता ने आधुनिक रूप में भारत का इतिहास-लेखन कराया। +भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने के लिए पाश्चात्य विद्वानों द्वारा जो सघन प्रयास किए गए, वे इसलिए तो प्रशंसनीय रहे कि विगत एक हजार वर्ष से अधिक के कालखण्ड में इस दिशा में स्वयं भारतवासियों द्वारा ‘राजतरंगिणी‘ की रचना को छोड़कर कोई भी उल्लेखनीय कार्य नहीं किया गया था किन्तु इतने परिश्रम के बाद भारत का जो इतिहास उन्होंने तैयार किया, उसमें भारत के ऐतिहासिक घटनाक्रम और तिथिक्रम को इस ढंग से प्रस्तुत किया गया कि आज अनेक भारतीय विद्वानों के लिए उसकी वास्तविकता सन्देहास्पद बन गई। फिर यही नहीं, इस क्षेत्र में जो धींगामुस्ती अंग्रेज 200 वर्षों में नहीं कर पाए, वह पाश्चात्योन्मुखी भारतीय इतिहासकारों ने स्वाधीन भारत के 50 वर्षों में कर दिखाई। वस्तुतः इतिहास किसी भी देश अथवा जाति की विभिन्न परम्पराओं, मान्यताओं तथा महापुरुषों की गौरव गाथाओं और संघर्षों के उस सामूहिक लेखे-जोखे को कहा जाता है जिससे उस देश अथवा जाति की भावी पीढ़ी प्रेरणा ले सके। जबकि भारत का इतिहास आज जिस रूप में सुलभ है उस पर इस दृष्टि से विचार करने पर निराशा ही हाथ लगती है क्योंकि उससे वह प्रेरणा मिलती ही नहीं जिससे भावी पीढ़ी का कोई मार्गदर्शन हो सके। उससे तो मात्र यही जानकारी मिल पाती है कि इस देश में किसी का कभी भी अपना कुछ रहा ही नहीं। यहाँ तो एक के बाद एक आक्रान्ताआते रहे और पिछले आक्रान्ताओं को पददलित करके अपना वर्चस्व स्थापित करते रहे। यह देश, देश नहीं, मात्र एक धर्मशाला रही है, जिसमें जिसका भी और जब भी जी चाहा, घुस आया और कब्जा जमाकर मालिक बनकर बैठ गया। + +भारत के इतिहास में विकृतियाँ की गईं, क्यों?: +लौटें, भारतीय इतिहास का विकृतीकरण +भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने या लिखवाने के लिए अंग्रेजों ने जो धींगामुस्ती की थी उससे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि उन्होंने यह इतिहास भारतीयों के ज्ञानवर्धन के लिए नहीं वरन अपने उद्देश्य विशेष की पूर्ति हेतु लिखवाया था। +इतिहास लेखन का निमित्त उद्देश्य विशेष की प्राप्ति. +जब भारत पर अंग्रेजों ने छल से, बल से और कूटनीति से पूरी तरह से कब्जा कर लिया तो उन्हें उस कब्जे को स्थाई बनाने की चिन्ता हुई। भारत में अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए उन्हें तलवार के बल की अपेक्षा यह मार्ग सरल लगा कि इस देश का इतिहास, भाषा और धर्म बदल दिया जाए। उनका दृढ़ विश्वास था कि संस्कृति के बदले हुए परिवेश में जन्मे, पले और शिक्षित भारतीय कभी भी अपने देश और अपनी संस्कृति की गौरव-गरिमा के प्रति इतने निष्ठावान, अपनी सभ्यता की प्राचीनता के प्रति इतने आस्थावान और अपने साहित्य की श्रेष्ठता के प्रति इतने आश्वस्त नहीं रह सकेंगे। इसीलिए उन्होंने अधिकांशतः तो जान-बूझकर और कुछ मात्रा में अज्ञान और असावधानी के कारण भारत के इतिहास की प्राचीन घटनाओं, नामों और तिथियों को तोड़-मरोड़कर अपनी इच्छानुसार प्रस्तुत करके उन्हें अपने उद्देश्य की पूर्ति में सहायक बनाया। +उद्देश्य-प्राप्ति के लिए योजना. +कम्पनी सरकार ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के निमित्त एक बहुमुखी योजना बनाई। इस योजना के अन्तर्गत पाश्चात्य चिन्तकों और वैज्ञानिकों ने, इतिहासकारों और शिक्षा-शास्त्रियों ने, लेखकों और अनुवादकों ने, अंग्रेज प्रशासकों और ईसाई धर्म प्रचारकों ने भारत की प्राचीनता, व्यापकता, अविच्छिन्नता और एकात्मता को ही नहीं, समाज में ब्राह्मणों यानीविद्वानों के महत्त्व और प्रतिष्ठा को नष्ट करने के उद्देश्य से एक सम्मिलित अभियान चलाया। इस अभियान के अन्तर्गत ही यह प्रचारित किया गया कि भारतीय सभ्यता इतनी प्राचीन नहीं है जितनी कि वह बताईजाती है, रामायण और महाभारत की घटनाएँ कपोल-कल्पित हैं - वे कभी घटी ही नहीं, आदि-आदि। सत्ता में रहने के कारण उन्हें इस प्रचार का उचित लाभ भी मिला। अंग्रेजी सत्ता से प्रभावित अनेक भारतीय, जिनमें वेतनभोगी तथा धन और प्रतिष्ठा के लोलुप संस्कृत के कतिपय विद्वान भी सम्मिलित थे, ‘हिज मास्टर्स वॉयस‘ के अनुरूप जमूरों की तरह नाचने लगे। अंग्रेजों के शासनकाल में सत्ता से व्यक्तिगत स्तर पर पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, धन-सम्पदा आदि की दृष्टि से लाभ उठाने के लिए भारत के एक विशिष्ट वर्ग द्वारा उनकी चाटुकारिता के लिए किए गए प्रयासों की तो बात ही क्या स्वाधीनता के बाद भी भारत में गुलामी की मानसिकता वाले लोगों की कमी नहीं रही, न तो प्रशासनिक स्तर पर, न शिक्षा के स्तर पर, न लेखन के स्तर पर और न ही चिन्तन या दर्शन के स्तर पर। देशभर में बड़े पैमाने पर व्याप्त इस मानसिकता को अनुचित मानते हुए भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं आधुनिक भारत के प्रसिद्ध दार्शनिक डॉ. राधाकृष्णन ने पराधीनता की मानसिकता को धिक्कारते हुए एक स्थान पर लिखा है - +“The Policy inaugurated by Macaulay, with all its cultural value, is loaded on one side. While it is so careful as not to make us forget the force and validity of western culture, it has not helped us to love our own culture and refine it where necessary. In some cases, Macaulay’s wish is fulfilled and we have educated Indians who are ‘more English than English themselves’ to quote his well known words. Naturally some of these are not behind the hostile foreign critic in their estimate of the History of Indian culture. They look upon India’s cultural evolution as one dreary scene of discord, folly and superstition. They are eager to imitate the material achievements of Western States and tear up the roots of ancient civilisation, so as to make room for the novelities imported from the West. One of their members recently declared that if India is to thrive and flourish, England must be her ‘spiritual mother’ and Greece her ‘spiritual grand mother’ +(‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता‘, पृ. 28 पर उद्धृत) +योजना का आभास. +भारत का इतिहास, धर्म और भाषा बदलकर उसे ईसाई देश बनाने की कम्पनी सरकार की योजना बहुत ही गुप्त थी। इसका निर्माण कब, कहाँ और कैसे हुआ, इसके सम्बन्ध में कोई निश्चित जानकारी उस समय किसी को भी नहीं मिल सकी। यह तो बाद में उन्हींके लोगों द्वारा जब लिखित रूप में माना गया, +तभी पता चला। इस संदर्भ में इंग्लैण्ड के लॉर्ड मैकालेतथा मोनियर विलियम्स और जर्मन विद्वान मैक्समूलर के निम्नलिखित विचार उल्लेखनीय हैं- +लॉर्ड टी.वी. मैकाले -1834 ई. में भारत के शिक्षा प्रमुख बने लार्ड मैकाले ने भारतीयों को शिक्षा देने के लिए बनाई अपनी नई नीति के संदर्भ में अपने पिता को लिखा था- +से उसकी धार्मिक स्वतंत्रता कायम रखते हुए भी हमारा उद्दिष्ट सफल होगा।‘‘ +-- (डॉ. लीना रस्तोगी कृत, ‘विश्वव्यापिनी संस्कृति‘, पृ. 90 पर उद्धृत) +मोनियर विलियम्स- विलियम्स ने ‘मॉडर्न इण्डिया एण्ड दी इण्डियन्स‘, के तीसरे संस्करण, 1879 के पृष्ठ 261 पर लिखा था: +encircled, undermined and finally stormed by the soldiers of the cross, the victory of christiannity must be signal and complete. +-- (पं. भगवद्दत्त कृत ‘भारतवर्ष का बृहद इतिहास‘, भाग-1, पृ. 43 पर उद्धृत) +फ्रैडरिक मैक्समूलर - इनका वास्तविक मन्तव्य इनके पत्रों से, जो इनकी पत्नी ने1902 ई. में छपवाए थे, ज्ञात होता है - +पत्नी को: ‘‘वेद का अनुवाद और मेरा (सायण-भाष्य सहित ऋग्वेद का) यह संस्करण उत्तर काल में भारत के भाग्य पर दूर तक प्रभाव डालेगा। यह उनकेधर्म का मूल है और मैं निश्चय से अनुभव करता हूँ कि उन्हें यह दिखाना कि मूल कैसा है, गत तीन सहस्रवर्ष में उससे उपजी सब बातों के उखाड़ने का एकमात्र उपाय है। +-- (पं. भगवद्दत्त कृत ‘भारतवर्ष का बृहद इतिहास‘, भाग-1, पृष्ठ 41 पर उद्धृत) +भारत सचिव (डयूक ऑफ आर्गाइल) को : ‘भारत का प्राचीन धर्म नष्टप्राय है और यदि ईसाई धर्म उसका स्थान नहीं लेता तो यह किसका दोष होगा ?‘ +-- (‘विश्वव्यापिनी संस्कृति‘, पृ. 92 पर उद्धृत) +योजना को सफल बनाने में सहयोग. +भारत में अंग्रेजी राज्य को स्थाइत्त्व प्रदान कराने के लिए कम्पनी सरकार ने भारत के इतिहास, धर्म और भाषा को बदलने की जो योजना बनाई थी उसमें जोन्स के साथ-साथ वारेन हेस्टिंग्ज का तो सहयोग था ही, उसे आगे बढ़ाने में मैक्समूलर, वैबर, विल्सन, विंटर्निट्स, मैकाले, मिल, फ्लीट बुहलर आदि का भी पूर्ण योगदान रहा है। जोन्स, मिल, विंटर्निट्जने जहाँ भारत के इतिहास को परिवर्तित रूप प्रदान करने में अग्रणी भूमिका निभाई, वहीं पाश्चात्य पादरीगण ईसाई धर्म को अधिक से अधिक व्यापक और विस्तृत परिवेश दिलाने में किसी से पीछे नहीं रहे। मैकाले ने जहाँ शिक्षा के माध्यमों को बदल कर संस्कृत और भारतीय भाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी का वर्चस्व स्थापित कराने में मदद की वहीं मैक्समूलर, वेबर, विल्सन आदि ने भारतीय ग्रन्थों का भ्रष्ट अनुवाद औरगलत व्याख्याएँ प्रस्तुत करके तथाकथित शिक्षित लोगों के मनों में धर्म के प्रति अनास्था और भाषा के प्रति अरुचि पैदा करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। +फ्लीट और बुहलर सरीखे पुरातात्त्विक भी इस दृष्टि से किसी से पीछे नहीं रहे। +अंग्रेजी सत्ता भारत में ईसाइयत फैलाने के लिए कितनीउत्सुक थी, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण निम्नलिखित उद्धरणों से प्राप्त होता है - +लॉर्ड पामर्स्टन, इंग्लैण्ड का प्रधानमंत्री (1859 ई) +मि मेंगल्स, अध्यक्ष, बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स, ईस्ट इण्डिया कम्पनी- +--(इंग्लैण्ड की पार्लियामेन्ट में दिया गया भाषण) +(‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता‘, पृ. 27-28पर उद्धृत) +विकृतीकरण की स्वीकारोक्ति. +यह ठीक है कि भारत के इतिहास को बिगाड़ने के लिए अंग्रेजों ने अनथक और अविरल प्रयास किए किन्तु किसी ने भी इस बात को इतने स्पष्ट रूप में नहीं स्वीकारा है, जितना कि एडवर्ड थौमसन नाम के एक अंग्रेज इतिहासकार ने। इसने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है - +-- (भजनसिंह कृत, ‘‘आर्यों का आदि निवास मध्य हिमालय‘‘, पृ. 19 पर उद्धृत) + +भारत के इतिहास में विकृतियाँ कीं, किसने?: +लौटें, भारतीय इतिहास का विकृतीकरण +परतंत्रता की स्थिति चाहे व्यक्ति की हो या परिवार अथवा राष्ट्र की, सभी के लिए दुःखदायी होती है। पराधीन व्यक्ति/परिवार/राष्ट्र अपनी गौरव-गरिमा और महत्ता, सभी कुछ भूल जाता है या भूल जाने को बाध्य कर दिया जाता है। भारत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 1000 वर्ष की पराधीनता के काल में वह अपना स्वत्व और स्वाभिमान ही नहीं अपना महत्त्व भी भूल गया था। +परकीय सत्ताओं का इतिहास-लेखन में दखल. +परतंत्रता के काल में परकीय सत्ताओं द्वारा सदा ही अपने अधीनस्थ देश का चाहे व्यक्ति हो या समाज, धर्म हो या संस्कृति, साहित्य हो या इतिहास,ज्ञान हो या विज्ञान, सभी में तरह-तरह की विकृतियाँ, विसंगतियाँ, विषमताएँ, दुर्बलताएँ और कमियाँ पैदा कर दी जाती हैं या करा दी जाती हैं। भारत में आईं परकीय सत्ताएँ भी इसमें अपवाद नहीं रहीं। मुसलमानों ने अपने शासनकाल में यहाँ ऐसी अनेक +नीतियाँ, रीतियाँ और परम्पराएँ चलाईं जिनके कारण देश में उस समय प्रचलित पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं की ही नहीं, यहाँ के साहित्य और इतिहास की भी दिशाएँ बदल गईं। अंग्रेजी सत्ता द्वारा भी अपना वर्चस्व स्थापित हो जाने के बाद मुस्लिम सत्ता की भाँति देश की शिक्षा पद्धति +में बदलाव लाया गया। शिक्षा में लाए गए बदलाव के फलस्वरूप संस्कृत भाषा के विकास में रुकावटें आती गईं। फलतः उसमें साहित्य-निर्माण और विविध प्रकार के वैज्ञानिक आदि विषयों में लेखन की अविच्छिन्न धारा अवरुद्ध होती गई। परिणामस्वरूप भारत की शिक्षा, साहित्य, इतिहास, ज्ञान-विज्ञान आदि के लेखन +में ह्रास की प्रक्रिया शुरू हो गईं और कालान्तर में इन विषयों के विद्वानों की संख्या भी न्यून से न्यूनतर होती चली गई। ऐसी स्थिति में इतिहास विषय के महत्त्वको समझने और समझाने वालों का लोप हो जाना कोई विशेष आश्चर्य की बात नहीं रही। यही कारण रहा कि उस काल में कल्हण विरचित ‘राजतरंगिणी‘ जैसी उत्कृष्ट ऐतिहासिक रचना भी भारत में वह महत्त्व न पा सकी, जिसकी वह अधिकारिणी थी। +जर्मन और अंग्रेज लेखकों में भारत के संदर्भ में लिखने की होड़. +अंग्रेजी सत्ता द्वारा पोषित आधुनिक रूप में भारत के प्राचीन साहित्य, समाज और संस्कृति के इतिहास-लेखन की प्रक्रिया में मुख्य रूप से जर्मन और अंग्रेज विद्वानों ने आगे बढ़कर अपने-अपने लक्ष्यों और अपने-अपने दृष्टिकोणों से प्रभावित रहकर इस क्षेत्र में योगदान किया। किसी ने संस्कृत साहित्य का इतिहास लिखा, किसी ने संस्कृत भाषा का इतिहास लिखा, किसी ने भारत का इतिहास लिखा, किसी ने +भारतीय संस्कृति का इतिहास लिखा और किसी ने भारतीय रचनाओं का अनुवाद किया। इन आधुनिक पाश्चात्य लेखकों के द्वारा लिखे गए साहित्य के परिमाणको देखने से ऐसा लगता है कि उस समय जर्मनी और इंग्लैण्ड के विद्वानों में भारत के संदर्भ में लिखने की होड़ सी लग गई थी किन्तु उनके ग्रन्थों को देखने से ऐसा लगता है कि उनमें से अधिकांश ने इस क्षेत्र में हल्दी की एक-एक गांठ लेकर पंसारी बनने का ही प्रयास किया है। कारण उनको भारतीय जीवन की विविधता, भारतीय साहित्य की गहनता और भारतीय इतिहास की व्यापकता का पूर्ण तो क्या सामान्य परिचय भी नहीं था। यही कारण रहा कि उस काल में रचित पाश्चात्य विद्वानों की रचनाओं में, चाहेवे संस्कृत भाषा के इतिहास की हों या साहित्य के इतिहास की अथवा भारतीय समाज या सभ्यता के इतिहास की,किसी में भी विषय का सही मूल्यांकन प्रस्तुत नहीं किया जा सका। +संस्कृत साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रचार से ईसाई पादरियों में बौखलाहट. +यूरोप के विभिन्न विद्वान जैसे-जैसे संस्कृत भाषा और उसके साहित्य के सम्पर्क में आते गए वे न केवल इनके वरन भारतीय संस्कृति के महत्त्व, गरिमा और महत्ता से परिचित होते गए फलतः वे इनकी ओर बड़ी उत्सुकता तथा तेजी से बढ़े। धीरे-धीरे यूरोप में संस्कृत भाषा, संस्कृत साहित्य और भारतीय संस्कृति की ज्ञान गरिमा का प्रकाश फैलने लगा। प्रारम्भ में तो यह बात वहाँ के यहूदी और ईसाई समुदायों ने अच्छे रूप में ली किन्तु जैसे-जैसे इनका प्रचार अधिक मात्रा में होने लगा तो वहाँ के ईसाई पादरियों के कान खड़े होते गए। उन्हें अपने पैरों के नीचे से जमीन खिसकती दिखाई दी क्योंकि ईसाई पादरियों ने सत्ता के बल पर धर्म आदि के संदर्भ में यूरोप में तरह-तरह की झूठी बातों को सत्य का जामा पहना कर बड़े जोर-शोर से प्रचारित किया हुआ था, यथा- ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण 4004 ई. पू. में किया था और इससे पूर्व कहीं भी कुछ भी नहीं था, बाइबिल में व्यक्त विचार ही सर्वश्रेष्ठ हैं, आदि-आदि। यही नहीं, ईसाई धर्म वालों ने यह भी प्रचारित किया हुआ था कि सृष्टि निर्माण के काल की बात को झूठा मानने +वालों को सजा दी जाएगी और सजा मौत भी हो सकती थी। जबकि संस्कृत साहित्य सृष्टि के निर्माण को लाखों-लाखों वर्ष पूर्व ले जा रहा था और इससे उनकी बातें झूठी सिद्ध हो रही थीं। इसीलिए संस्कृत साहित्य और भारतीय संस्कृति तथा इतिहास की पुरातनताकी बात उन्हें बहुत खलने लगी। +इतिहास को विकृत करने वाले जर्मनी और इंग्लैण्ड के लेखक. +यूरोप में संस्कृत भाषा और उसके साहित्य तथा भारतीय संस्कृति का अधिक मात्रा में प्रचार हो जाने से वहाँ के ईसाई धर्म के प्रचारकों में खलबलीमच गई और उन्होंने इसके प्रतिकार के लिए सारे यूरोप में ही, विशेषकर जर्मनी और इंग्लैण्ड में, अनेक लेखक तैयार किए। इनमें से जर्मनी के फ्रैडरिक मैक्समूलर, रुडाल्फ रॉथ, अल्वर्ट वेबर, एम. विंटर्निट्स, फ्लीट, ए स्टेन तथा इंग्लैण्ड के विलियम जोन्स, मैकाले, मिल, मैलकम, विल्फोर्ड, वेंटले, विल्सन, एल्फिन्सटन, कीथ, मैक्डानल अधिक उल्लेखनीय रहे। इन सभी ने अपने-अपने ढंग से भारत के इतिहास, संस्कृति और साहित्य को बिगाड़ने का प्रयास किया और खूब किया। इन लोगों ने भारतीय तर्कों को कुतर्कों में, ज्ञान को अज्ञान में, सत्य को असत्य में, प्रमाणों को कुप्रमाणों में बदल दिया और हर प्रकार से सब के मन में यही बात बैठाने का प्रयास किया कि प्राचीन काल में भारत में कुछ भी नहीं था। यहाँ के निवासी परस्पर लड़ते-झगड़ते रहते थे और वे ज्ञान-विज्ञान विहीन थे। +उक्त लेखकों के अलावा भी प्रिंसेप, जेम्स लीगे, डॉ.यूले, लॉसन, मैकालिफ आदि अन्य अनेक लेखक भी आगे आए, जिन्होंने अपनी-अपनी रचनाओं केमाध्यम से भारत के इतिहास और साहित्य के क्षेत्रों में घुसपैठ करके उसे अधिक से अधिक भ्रष्ट करके अप्रामाणिक, अविश्वसनीय और अतिरंजित की कोटि में डालने का प्रयास किया। +इतिहास के विकृतीकरण में धन-लोलुप संस्कृतज्ञ भी पीछे नहीं रहे. +अंग्रेजी सत्ता यह भली प्रकार से जान चुकी थी कि जर्मनीअथवा इंग्लैण्ड के लोग चाहे जितनी मात्रा में सत्ता-समर्थक बातें कहते रहें, वे भारतीयोंके गले में तब तक नहीं उतरेंगी, जब तक यहीं के लोग वैसा नहीं कहेंगे। अतः उन्होंने यहीं के अनेक धन-पद लोलुप संस्कृत के विद्वानों को धन, पद और प्रतिष्ठा का लालच दिखाकर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा कही गई बातों को ही उनके अपने लेखन में दोहरवाकर अपनी बातों की पुष्टि कराने के लिए तैयार कर लिया और वे प्रसन्नतापूर्वक ऐसा करने लगे। इनमें मिराशी, कपिल देव, सुधाकर द्विवेदी, विश्वबन्धु, शिवशंकर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे, डॉ. लक्ष्मण स्वरूप, डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी भी इस दृष्टि से किसी तरह से पीछे नहीं रहे। +संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत का इतिहास बिगाड़ने में मात्र जर्मनी और इंग्लैण्ड के विदेशी विद्वानों का ही नहीं, भारत के अपने विद्वानों, विशेषकर संस्कृत के, का भी योगदान रहा है। + +भारत के इतिहास में विकृतियाँ की गईं, कहाँ?: +वो समयकाल था ईसा के बाद की ग्यारहवीं सदी..भारत अपनी पश्चिमोत्तर सीमा पर अभी-अभी ही राजा जयपाल की पराजय हुई थी ...इस पराजय के तुरंत पश्चात का अफगानिस्तान के एक शहर... गजनी का एक बाज़ार..! +ऊंचे से एक चबूतरे पर खड़ी कम उम्र की सैंकड़ों हिन्दु स्त्रियों की भीड .. जिनके सामने हज़ारों वहशी से दीखते बदसूरत किस्म के लोगों की भीड़ लगी हुई थी.. जिनमें अधिकतर अधेड़ या उम्र के उससे अगले दौर में थे.. ! +कम उम्र की उन स्त्रियों की स्थिति देखने से ही अत्यंत दयनीय प्रतीत हो रही थी.. उनमें अधिकाँश के गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें खिंची हुई थी.. मानो आसुओं को स्याही बना कर हाल ही में उनके द्वारा झेले गए भीषण दौर की कथा प्रारब्ध ने उनके कोमल गालों पर लिखने का प्रयास किया हो.. ! +एक बात जो उन सबमें समान थी... किसी के भी शरीर पर वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा नाम को भी नहीं था.. सभी सम्पूर्ण निर्वसना . सभी के पैरों में छाले थे.. मानो सैंकड़ों मील की दूरी पैदल तय की हो.. ! +सामने खड़े वहशियों की भीड़ अपनी वासनामयी आँखों से उनके अंगों की नाप-जोख कर रही थी.. ! कुछ मनबढ़ आंखों के स्थान पर हाथों का प्रयोग भी कर रहे थे.. सूनी आँखों से अजनबी शहर और अनजान लोगों की भीड़ को निहारती उन स्त्रियों के समक्ष हाथ में चाबुक लिए क्रूर चेहरे वाला घिनौने व्यक्तित्व का एक गंजा व्यक्ति खड़ा था.. मूंछ सफाचट.. बेतरतीब दाढ़ी उसकी प्रकृतिजन्य कुटिलता को चार चाँद लगा रही थी.. ! +दो दीनार... दो दीनार... दो दीनार...हिन्दुओं की खूबसूरत औरतें.. शाही लडकियां.. कीमत सिर्फ दो दीनार.. ले जाओ.. ले जाओ.. बांदी बनाओ... एक लौंडी... सिर्फ दो दीनार.. दुख्तरे हिन्दोस्तां.. दो दीनार.. !भारत की बेटी.. मोल सिर्फ दो दीनार.. ! +उस स्थान पर इस मतान्ध सोच वालों ने एक मीनार बना रखी है.. जिस पर लिखा है- 'दुख्तरे हिन्दोस्तान.. नीलामे दो दीनार..' अर्थात ये वो स्थान है... जहां हिन्दु औरतें दो-दो दीनार में नीलाम हुईं ! महमूद गजनवी हिन्दुओं को अपमानित करने व अपने मतान्ध विचारधारा को पूर्ण करने के लिए अपने सत्रह हमलों में लगभग चार लाख हिन्दु स्त्रियों को पकड़ कर गजनी उठा ले गया.. घोड़ों के पीछे.. रस्सी से बांध कर..! +महमूद गजनवी जब इन औरतों को गजनी ले जा रहा था.. तो वे अपने पिता.. भाई और पतियों से बुला-बुला कर बिलख-बिलख कर रो रही थीं.. अपनी रक्षा के लिए पुकार कर रही थी..! लेकिन करोडो हिन्दुओं के बीच से.. उनकी आँखों के सामने..वो निरीह स्त्रियाँ मुठ्ठी भर क्रूर सैनिकों द्वारा घसीट कर भेड़ बकरियों की तरह ले जाई गई ! रोती बिलखती इन लाखों हिन्दु नारियों को बचाने न उनके पिता बढे.. न पति उठे.. न भाई और न ही इस विशाल भारत के करोड़ो समान्य लोग... +महमूद गजनी ने इन हिन्दु लड़कियों और औरतों को ले जा कर गजनवी के बाजार में समान की तरह बेच ड़ाला ! विश्व के किसी धर्म के साथ ऐसा अपमान नही हुआ जैसा हिन्दुओं के साथ ! और ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि ये बंटे रहे कभी क्षेत्रवाद तो कभी जातिवाद की सोच में , कुछ तो हमेशा ही खुद न लड़ कर भगवान भरोसे बैठे रहे ! अधिकांश तो मुट्ठी भर लड़ रही हिन्दू सेना और ग़ज़नवी की सेना को देख कर तमाशा देख रहे थे कि इसमें से जो जीते हम उसकी गुलामी करें जैसे आज कश्मीर में खुलेआम भारत विरोधी नारे लगाते और बन्दूक उठाये आक्रांताओं से लड़ रहे हमारे कुछ सैनिक और बाकी केवल तमाशबीन हैं..सवाल ये है कि क्या ये फिर से नही दोहराया जाएगा , ?कौन लेगा इसकी गारंटी ? +रणवीर एक राजपू"तिरछे अक्षरtext" +ग़ज़नवी जिसके घोड़ो को हर वक़्त जीन पहने रहने की आदत हो चुकी थी, और हर वक़्त दौड़ लगाने के लिए आतुर रहते, वह जानते थे कि सालार की बेशतर जिंदगी आलीशान खेमो और महलों में नही बल्कि घोड़े की पीठ +नोट : उक्त लेख इतिहास की सत्य घटनाओ पर आधारित है, किसी की धार्मिक अथवा किसी भी प्रकार की भावनाओं को ठेस पहुँचाना कदापि मकसद नहीं है, लेख के माध्यम से सच्चाई को उजागर करने का प्रयास है। +प्राचीन ग्रन्थों/अभिलेखों में. +पाश्चात्य विद्वानों/इतिहासज्ञों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भारतीय ग्रन्थों के मूल पाठों में कहीं अक्षरों में, कहीं शब्दों में और कहीं-कहीं वाक्यावली में अपनी मनमर्जी के परिवर्तन किए या करवाए। यही नहीं, वाक्यावली में परिवर्तन के साथ-साथ कहीं-कहीं प्रक्षिप्त अंश जोड़ दिए तो कहीं-कहीं मूल अंश लुप्त भी करा दिए, यथा- +(क) अक्षर परिवर्तन +विष्णु पुराण - इस पुराण में मौर्य वंश का राज्यकाल 337 वर्ष दियागया था किन्तु सम्बंधित श्लोक ‘त्र्यब्दशतंसप्तत्रिंशदुत्तरम्‘ में ‘त्र्य‘ को बदल कर ‘अ‘ अक्षर करके अर्थात ‘त्र्यब्द‘ को ‘अब्द‘ बनाकर 300 की जगह 100 करके वह काल 137 वर्ष का करवा दिया गया। +-- (पं. कोटावेंकटचलम, ‘दि प्लाट इन इण्डियन क्रोनोलोजी‘, पृ. 76) +आज के अधिकतर विद्वान 137 वर्ष को ही सही मानते हैं किन्तु कलिंग नरेश खारबेल के ‘हाथी गुम्फा‘ अभिलेख में मौर्य वंश के संदर्भ में ‘165वें वर्ष‘ का स्पष्ट उल्लेख होने से मौर्य वंश के राज्यकाल को 137 वर्षों में समेट पाना कठिन है। विशेषकर उस स्थिति में जबकि ‘हाथी गुम्फा‘ अभिलेख ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणिक माना जा चुका है। +‘मत्स्य पुराण‘, ‘एइहोल अभिलेख‘ आदि में भी ऐसाही किया गया है। +(ख) शब्द परिवर्तन +पंचसिद्धान्तिका - प्रख्यात खगोल शास्त्री वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धान्तिका‘ में एक पद इस प्रकार से आया है - +अर्थात 427 शक काल के चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा कोसौम्य दिवस अर्थात सोम का पुत्र बुध-बुधवार-था, जबकि यवनपुर में अर्द्ध सूर्यास्त हो रहा था। उक्त पद में यद्यपि स्पष्ट रूप से सौम्य अर्थात सोम के पुत्र ‘बुध‘ का उल्लेख है किन्तु गणना करने पर जब ज्ञात हुआ कि इस तिथि को बुधवार नहीं वरन् मंगलवार था तो कतिपय विद्वानों ने मूल पाठमें परिवर्तन करके ‘सौम्य‘ को ‘भौम‘ बनाकर काम चलाया। ‘भौम‘ का अर्थ भूमि का पुत्र मंगल होता है किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं रहा क्योंकि उक्त पद में उल्लिखित शक काल वर्तमान में प्रचलित शालिवाहन शक कावाचक नहीं है। वस्तुतः वह विक्रम पूर्व आरम्भ हुए शक सम्वत (शकनृपतिकाल) का वाचक है। इन दो शक कालोें में यथास्थान सही अन्तर न +करने से बहुत सी घटनाओं के 500 से अधिक वर्ष पीछेहो जाने पर कालगणना में भ्रम का पर्दा पड़ गया है। +ऐसे ही परिवर्तन ‘चान्द्रव्याकरण‘, ‘खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख‘ आदि में भी किए गए हैं। +(ग) अर्थ परिवर्तन +अलबेरूनी का यात्रा वृत्तान्त - अलबेरूनी ने अपने यात्रा वृत्तान्त में गुप्त सम्वत के प्रारम्भ होने के काल का उल्लेख करते हुए लिखा है कि गुप्त शासकों केसमाप्त हो जाने पर 241 शक में उनकी स्मृति में गुप्त सम्वत प्रचलित हुआ था। इसका अंग्रेजी अनुवाद ठीक यही भाव प्रकट करता था किन्तु फ्लीट के मन्तव्य को यह अनुवाद पूरा नहीं करता था। अतः उसने बार-बार एक-एक शब्द का अनुवाद कराया। उसे वही अनुवाद चाहिए था जो उसके उद्देश्य की पूर्ति कर सके। +(घ) पाठ परिवर्तन +पं. कोटावेंकटचलम के अनुसार सुधाकर द्विवेदी ने आर्यभट्ट के ग्रन्थ 'आर्यभटीयम्‘ के पद में छापते समय टी. एस. नारायण स्वामी के मना करने पर भी पाठ में परिवर्तन कर दिया, जो कि अवांछित था। +--(‘भारतीय इतिहास पर दासता की कालिमा‘, पृ. 38) +(ङ) प्रक्षिप्त अंश जोड़ना +पार्जिटर तो स्वरचित एक पद पुराणों में घुसाना चाहते थे जबकि वे इसके अधिकारी नहीं थे। +--(‘दि प्लाट इन इण्डियन क्रोनोलोजी‘, पृ. 89) +(च) पाठ विलुप्त करना +वेबर ने 1855 ई. में ‘शतपथ ब्राह्मण‘ का भाष्य, जिसके साथ हरिस्वामी का भाष्य और द्विवेदी का गंगा भाष्य भी था, वर्लिन से प्रकाशित कराया था किन्तु उसमें वे श्लोक विलुप्त हैं जिनमें विक्रमादित्य की प्रशंसा की गई है जबकि वैंकटेश्वर प्रेस, बम्बई द्वारा 1940 ई. में प्रकाशित इसी भाष्य में वे श्लोक विद्यमान हैं। यह पाठ जानबूझ कर विलुप्त कराए गए हैं क्योंकि विक्रमादित्य को भारत के इतिहास में दिखाना ही नहीं था। +-- (‘पं. कोटावेंकटचलम कृत क्रोनोलोजी ऑफ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘, पृ. 203-208) +प्राचीन राजाओं तथा राजवंशों की संख्याओं तथा राज्यकालों में. +भारत की प्राचीनता को कम करके आंकने की दृष्टि से पाश्चात्य इतिहासकारों ने न केवल भारतीय इतिहास में प्राचीन राजाओं की आयु को कम करके उनके राज्यकालों को ही कम करके आंका वरन अनेक राजवंशों के राजाओं की संख्या तथा राज्यकालों को भी पीछे धकेल दिया। सैंकड़ों-हजारों वर्ष पूर्व हुए राजाओं की संख्या और राज्यकालों को बिनाठोस आधार के आज मात्र कलम की नोक से कम +कर देना या काट देना उचित नहीं कहा जा सकता। +मगध राजवंशावली मगध राजवंशावली - मगध साम्राज्य के विभिन्न राजवंशों और राजाओं की संख्या तथा राज्यकालों के लिए विलियम जोन्स ने अलग-अलग आधारों पर कई सूचियाँ तैयार कीं किन्तु सभी का ब्योरा अलग-अलग ही रहा। उसमें से किसी से भी उसकी सन्तुष्टि नहीं हुई। बार-बार सूचियों के परिवर्तन का +मुख्य कारण ‘येनकेन प्रकारेण‘ भारतीय इतिहास की प्राचीनता को कम करके आंकने का रहा। +पहली सूची में जोन्स द्वारा निर्धारित और भारतीय पुराणों के आधार पर निर्मित विभिन्न राजवंशों के राजाओं की संख्या और उनके राज्यकालों की तुलनात्मक स्थिति इस प्रकार रही - +राजवंश राजाओं की संख्या राज्यकाल +जोन्स -- पुराण ग्रन्थ -- जोन्स -- पुराण ग्रन्थ +बार्हद्रथ 20 22 1000 1006 +प्रद्योत 5 5 138 138 +शिशुनाग 10 10 360 360 +नन्द 1 9 100 100 +मौर्य 10 12 137 316 +शुंग 10 10 112 300 +कण्व 4 4 345 85 +आन्ध्र 30 32 456 506 +दूसरी और तीसरी सूचियों में जो तुलनात्मक स्थिति बनी, वह तो और भी अधिक भ्रामक रही। स्मिथ ने विभिन्न राजवंशों का राज्यकाल इस रूप में निर्धारित किया- +राजवंश -- राज्यकाल� +नन्द 45 (100) +मौर्य 137 (316) +शुंग 112 (300) +कण्व 45 (85) +आन्ध्र 289 (506) +गुप्त 149 (245) +�राम साठे कृत, ‘डेट्स ऑफ बुद्धा‘, पृ. 69 के आधार पर। +कोष्ठकों में दी गई संख्याएँ पुराणों के अनुसार हैं। +कश्मीर और नेपाल की राजवंशावलियाँ +पाश्चात्य इतिहासकारों ने ऐसा उलट फेर भारत के मगध साम्राज्य के राजाओं के संदर्भ में ही नहीं, कश्मीर और नेपाल राज्यों की राजवंशावलियों में भी किया है। +ताकि वे भी भारत की प्राचीनता को सिद्ध कर सकने में असमर्थ हो जाएँ। +प्राचीन सम्वतों में. +अपनी कल्पित कालगणना को सही सिद्ध करने की दृष्टि से पाश्चात्य इतिहासकारों ने भारतीय सम्वतों को पूरी तरह से नकार कर उन्हें महत्त्वहीन तो बनाया ही, साथ ही प्राचीन काल से चलते आ रहे विभिन्न सम्वतों को अप्रामाणिक सिद्ध करने के लिए उनमें तरह-तरह की गड़बड़ियाँ भी कीं। इसके लिए उन्होंने तीन मार्ग अपनाए, यथा- +(क) प्राचीन सम्वतों में से युधिष्ठिर, कलि, सप्तर्षि और शूद्रक सम्वतों को अप्रामाणिक मानकर इनका कहीं भी प्रयोग न करके इन्हें नकार दिया जबकि प्राचीन काल में भारत में इनका प्रयोग सभी कार्यों में किया जाता रहा था। +(ख) प्राचीन सम्वतों में से मालवगण, शकनृपतिकाल और श्रीहर्ष सम्वतों की व्याख्या अपने ही ढंग से करके इन्हें तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया। +(ग) गुप्त-वल्लभी तथा गुप्त, विक्रमी तथा मालवगण औरशालिवाहन तथा शक सम्वतों का नाम बदल कर एक को दूसरे सम्वतों में मिलाकर नई विकृतियों को जन्म दिया। +यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सम्वतों में की गई इन गड़बड़ियों के कारण भारतीय कालगणना में बहुत बड़ी मात्रा में बिगाड़ तो आया ही साथ ही इनके कारण अनेक ऐतिहासिक भ्रान्तियाँ भी पैदा हो गईं। +उक्त सम्वतों के अतिरिक्त भी भारत में पारद सम्वत, कल्चुरी सम्वत, भोज सम्वत, गांगेय सम्वत आदि आदि छोटे-छोटे अन्य अनेक सम्वत रहे हैं। आचार्यरामदेव ने ऐसे 43 सम्वतों की सूची दी हैं जिनका प्रयोग क्षेत्रीय स्तरों पर किया जाता था। +-- (‘भारतवर्ष का इतिहास‘, तृतीय खण्ड, प्रथम भाग, पृष्ठ 14-16) +इन सभी सम्वतों के साथ अनेक ऐतिहासिक व्यक्तित्व, घटनाएँ और परम्पराएँ जुड़ी हुई हैं। यदि इनका ठीक प्रकार से अध्ययन करके भारत का इतिहास लिखा जाता तो बहुत सी ऐसी ऐतिहासिक घुण्डियाँ खुल जातीं और विभिन्न ऐसी भ्रान्तियों का निर्माण ही न होता, जिनके लिए पाश्चात्य विद्वानों को बहुत सी मिथ्या कहानियों की कल्पना करनी पड़ी तथा जिनके कारण पूरा इतिहास ही बिगड़ गया। यह ठीक है कि थोड़ी बहुत अस्पष्टता इन सम्वतों में भी रही होगी किन्तु ज्यादा गड़बड़ियाँ तो पाश्चात्य विद्वानों द्वारा कुछ तो स्थिति की अज्ञानता और अस्पष्टता के कारणऔर कुछ जान-बूझकर पैदा की गईं ताकि इन्हें प्रामाणिक बनाया जा सके। +पुरातात्त्विक सामग्रियों के निष्कर्षों में. +प्राचीन इतिहास को जानने का एक प्रमुख आधार किसी भी स्थान विशेष से उत्खनन में प्राप्त पुरातात्त्विक सामग्री, यथा- ताम्रपत्र तथा अन्य प्रकार के अभिलेख, सिक्के, मोहरें तथा प्राचीन नगरों, किलों, मकानों, मृद्भाण्डों, मन्दिरों, मूर्तियों, स्तम्भों आदि के अवशेषों, को माना जाता है। ऐतिहासिक महत्त्व के क्रम +की दृष्टि से इसमें से प्रथम स्थान ताम्रपत्रों एवं अन्य प्रकार के अभिलेखों तथा सिक्कों और मोहरों को और दूसरा स्थान पुरातन सामग्री के अवशेषों को दिया जाता है। +पुरातत्त्व-शास्त्र विज्ञान सम्मत है। इस शास्त्र के आधारपर किए गए अनुसंधानों से अनेक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य उजागर होते रहे हैं किन्तु इस शास्त्र के आधार पर निष्कर्ष निकालने वाले विद्वान जब कुछ अधिक स्वतंत्रता से काम ले लेते हैं और उसके परिणामस्वरूप जो निष्कर्ष निकालते हैं, वे बड़े ही अस्वाभाविक, असहज और विचित्र होते हैं। भारतवर्ष के प्राचीन ऐतिहासिक परिदृश्य के संदर्भ में एक दो नहीं अनेक ऐसे निष्कर्ष निकाले गए हैं जो इस शास्त्र की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं। प्रायः देखने में आता है कि किसी एक ही विषय के कोई से भी दो विद्वान कभी भी उस विषय के संदर्भ में निकाले गए पुरातात्त्विक निष्कर्षोंपर एकमत नहीं हो पाते जिससे सही स्थिति को जानने का प्रयास करने पर निराशा ही हाथ लगती है। स्पष्ट है कि पुरातात्त्विक विद्वानों के निष्कर्षों में निश्चयात्मकता की कमी रहती आई है। यह कमी कभी-कभी तो भूलचूक के कारण होती रही है और कभी स्वार्थ-सिद्धि के निमित्त जानबूझ कर भी पैदा की जाती रही है। +पुरातात्त्विक सामग्रियों के वैज्ञानिक विश्लेषणों से निकले निष्कर्षों में विकृतियाँ. +जहाँ तक पुरातात्त्विक सामग्री का सम्बन्ध है, उससे भी भारत की प्राचीनता सिद्ध हो सकती थी और कुछ मात्रा में हुई भी किन्तु अधिकांश सामग्री की वास्तविक प्राचीनताको पुरातात्त्विक सामग्री के वैज्ञानिक विश्लेषणों से निकले निष्कर्षों को भ्रमपूर्ण बनाकर नकार दिया। भारत के संदर्भ में मिले प्राचीन अभिलेखों पर पुरातात्त्विक विद्वानों द्वारा जो निष्कर्ष निकाले गए हैं उन्हें निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है- +(1). कई प्रामाणिक अभिलेखों को जबरदस्ती अप्रामाणिकसिद्ध करने का प्रयास किया गया। इसके लिए 3 मार्ग अपनाए गए- +(2). कई अप्रामाणिक अभिलेखों को जबरदस्ती प्रामाणिकसिद्ध करने का प्रयास किया गया, यथा- मन्दसौर अभिलेख सं. 164 और 165, जो यशोधर्मन नाम के सम्राट से सम्बंधित बताए गए हैं। यह सम्राट भारत के इतिहास में आंधी की तरह आया और तूफान की तरह चला गया। न इसके माता-पिता का पता और न इसकी सन्तान का। लगता है इसका माँ-बाप, पुत्र, सभी फ्लीट ही रहा है। + +भारत के इतिहास में विकृतियाँ की गईं, कैसे?: +लौटें, भारतीय इतिहास का विकृतीकरण +भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने की प्रक्रिया में पाश्चात्य विद्वानों ने इतिहास को इतना बदल या बिगाड़ दिया कि वह अपने मूल रूप को ही खो बैठा। इसके लिए जहाँ कम्पनी सरकार का राजनीतिक स्वार्थ बहुत अंशों तक उत्तरदायी रहा, वहीं भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने के प्रारम्भिक दौर के पाश्चात्य लेखकों की शिक्षा-दीक्षा,रहन-सहन, खान-पान आदि का भारतीय परिवेश से एकदम भिन्न होना भी एक प्रमुख कारण रहा। उनके मन और मस्तिष्क पर अपने-अपने देश की मान्यताओं, धर्म की आस्थाओं और समाज की भावनाओं का प्रभाव पूरी तरह से छाया हुआ था। उनकी सोच एक निश्चित दिशा लिए हुए थी, जो कि भारतीय जीवन की मान्यताओं, भावनाओं, आस्थाओं और विश्वासों से एकदम अलग थी। व्यक्ति का लेखन-कार्य उसकेविचारों का मूर्तरूप होता है। अतः भारतीय इतिहास का लेखन करते समय पाश्चात्य इतिहास लेखकों/विद्वानों की मान्यताएँ, भावनाएँ और आस्थाएँ उनके लेखन में पूर्णतः प्रतिबिम्बित हुई हैं। +पाश्चात्य विद्वानों को उनकी राजनीतिक दृष्टि से विजयी जाति के दर्प ने, सामाजिक दृष्टि से श्रेष्ठता की सोच ने, धार्मिक दृष्टि से ईसाइयत के सिद्धान्तों के समर्थन ने और सभ्यता तथा संस्कृति की दृष्टि से उच्चता के गर्व ने एक क्षण को भी अपनी मान्यताओं तथा भावनाओं से हटकर यह सोचने की स्थिति में नहीं आने दिया कि वे जिस देश, समाज औरसभ्यता का इतिहास लिखने जा रहे हैं, वह उनसे एकदम भिन्न है। उसकी मान्यताएँ और भावनाएँ, उसके विचार और दर्शन, उनकी आस्थाएँ और विश्वास तथा उसके तौर-तरीके, उनके अपने देशों से मात्र भिन्न ही नहीं, कोसों-कोसों दूर भी हैं। +इस दृष्टि से यह भी उल्लेखनीय है कि पाश्चात्य जगत सेआए सभी विद्वान ईसाई मत के अनुयायी थे। अपनी धार्मिक मान्यताओं और विश्वासोंतथा अपने देश और समाज के परिवेश के अनुसार हर बात को सोचना और तदनुसार लिखना उनकी अनिवार्यता थी। ईसाई धर्म की इस मान्यता के होते हुए कि ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण ईसा से 4004 वर्ष पूर्वकिया था, उनके लिए यह विश्वास कर पाना कि भारतवर्ष का इतिहास लाखांे-लाखों वर्ष प्राचीन होसकता है, कठिन था, उनके पूर्वज ईसा पूर्व के वर्षोंमें जंगलों में पेड़ों की छाल पहनकर रहते थे तो वे कैसे मान सकते थे कि भारत में लाखों-लाखों वर्ष पूर्व मनुष्य अत्यन्त विकसित स्थिति में रहता था ? वे मांसाहारी थे, अतः उनके लिए वह मान लेना कि आदिमानव मांसाहारी ही रहा होगा, स्वाभाविक ही था। इस स्थिति में वे यह कैसे मान सकते थे कि प्रारम्भिक मानव निरामिषभोजी रहा होगा ? कहने का भाव है कि भारतीय इतिहास की हर घटना, हर तथ्य और हर कथ्य को वे अपनी ही विचार-कसौटी पर कसकर उसके पक्ष में और विपक्ष में निर्णय लेने के लिए प्रतिबद्ध थे। +वस्तुतः पाश्चात्य विद्वानों का मानसिक क्षितिज एक विशिष्ट प्रकार के सांचे में ढला हुआ था, जिसके फलस्वरूप उनकी समस्त सोच और शोध का दायरा एकसंकीर्ण सीमा में आबद्ध हो गया था। परिणामतः उनके चिन्तन की दिशा और कल्पना की उड़ान उस दायरे से आगे बढ़ ही नहीं सकी और वे लोग एक प्रकार की मानसिक जड़ता से ग्रस्त हो गए। इसीलिए उनका शोध कार्य विविधता पूर्ण होते हुए भी अपने मूल में संकुचित और विकृत रहा। फलतः उन्होंने भारत के ऐतिहासिक कथ्यों को अमान्य करके उसके इतिहास-लेखन के क्षेत्र के चारों ओर अपनी-अपनी मान्यताओं, भावनाओं और आस्थाओं के साथ-साथ अपने निष्कर्षों का एक ऐसा चक्रब्यूह बना दिया कि उससे निकल पाना आगे आने वाले विद्वानों के लिए संभव ही नहीं हो सका, जो उसमें एक बार फंसावह अभिमन्यु की तरह फंसकर ही रह गया। अधिकांश भारतीय इतिहासकार, पुरातत्त्ववेत्ता, भाषाविद्, साहित्यकार, चिन्तक और विवेचक भी इसी के शिकार हो गए। जबकि यह एक वास्तविकता है कि भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखते समय पाश्चात्य लेखकों ने पुष्ट से पुष्ट भारतीय तथ्यों कोतो अपने बेबुनियाद तर्कों द्वारा काटा है किन्तु अपनी और अपनों के द्वारा कही गई हर अपुष्ट से अपुष्ट, अनर्गल से अनर्गल और अस्वाभाविक से अस्वाभाविक बात को भी सही सिद्ध करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया है। इसके लिए उन्होंने विज्ञानवाद, विकासवाद आदि न जाने कितने मिथ्या सिद्धान्तों और वादों की दुहाई दी है। इसके परिणामस्वरूप भारत के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति में जो बिगाड़ पैदा हुआ, उसकी उन्होंने रत्ती भर भी चिन्ता नहीं की। उक्त आधारों पर भारत के इतिहास को कैसे-कैसे बिगाड़ा गया, इसके कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं - +भारत के प्राचीन विद्वानों को कालगणना-ज्ञान से अनभिज्ञ मानकर. +ज्ञान से अनभिज्ञमानकर भारत के प्राचीन विद्वानों को कालगणना-ज्ञान से अनभिज्ञमानकर भारत के प्राचीन विद्वानों को कालगणना-ज्ञान से अनभिज्ञमानकर पाश्चात्य इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की प्राचीन तिथियों का निर्धारण करते समय यह बात बार-बार दुहराई है कि प्राचीन काल में भारतीय विद्वानों के पास तिथिक्रम निर्धारित करने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। कई पाश्चात्य विद्वानों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि प्राचीन काल में भारतीयों का इतिहास-ज्ञान ही ‘शून्य‘ था। उन्हें तिथिक्रम का व्यवस्थित हिसाब रखना आता ही नहीं था। इसीलिए उन्हें सिकन्दर के भारत पर आक्रमण से पूर्व की विभिन्न घटनाओं के लिए भारतीय स्रोतों के आधार पर बनने वाली तिथियों को नकारना पड़ा किन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं है। कारण ऐसा तो उन्होंने जानबूझकर किया था क्योंकि, उन्हें अपनी काल्पनिक काल-गणना को मान्यता जो दिलानी थी। +यदि भारत के प्राचीन विद्वान इतिहास-ज्ञान से शून्य होते तो प्राचीन काल से सम्बंधित जो ताम्रपत्र या शिलालेख आज मिलते हैं, वे तैयार ही नहीं कराए जाते। ऐसे अभिलेखों की उपस्थिति में भारत के प्राचीन विद्वानों पर पाश्चात्य विद्वानों का कालगणना-ज्ञानया तिथिक्रम की गणना से अनभिज्ञ होने के कारण उसका व्यवस्थित हिसाब न रख पाने का दोषारोपण बड़ा ही हास्यस्पद लगता है। विशेषकर इसलिए भी कि भारत में तो कालमान का एक शास्त्र ही पृथक सेहैं, जिसमें एक सैकिंड के 30375वें भाग से कालगणना की व्यवस्था है। नक्षत्रों की गतियों के आधार पर निर्धारित भारतीय कालमान में परिवर्तन और अन्तर की बहुत ही कम संभावना रहती है। विभिन्न प्राचीनग्रन्थों यथा- अथर्ववेद, विभिन्न पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत आदि में काल-विभाजन और उसके गणनाक्रम पर बड़े विस्तार से विचार प्रकट किए गए हैं। कुछ के उदाहरण इस प्रकार हैं - +श्रीमद्भागवत- इसके 3.11.3 से 3.11.14 तक के श्लोकों में कालगणना पर विचार किया गया है, जिसके अनुसार भारतीय कालगणना में सबसे छोटी इकाई ‘परमाणु‘ है। सूर्य की रश्मि परमाणु के भेदन में जितना समय लेती है, उसका नाम परमाणु है। परमाणु काल से आगे का काल-विभाजन इस प्रकार है - 2 परमाणु = 1 अणु, 3 अणु = 1 त्रसरेणु, 3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि, 100 त्रुटि = 1 वेध, 3 वेध = 1 लव, 3 लव = 1 निमेष, 3 निमेष = 1 क्षण (एक क्षणमें 1.6 सेकेंड अथवा 48600 परमाणु होते हैं), 5 क्षण = 1 काष्ठा, 15 काष्ठा = 1 लघु, 15 लघु = 1 नाड़िका (दण्ड), 2 नाड़िका = 1 मुहूर्त, 3 मुहूर्त = 1 प्रहर, 8 प्रहर = दिन-रात +इसी प्रकार से दिन, पक्ष, मास, वर्ष आदि का ज्ञान भी उस समय पूरी तरह से था। +महाभारत- इसके वन पर्व के 188वें अध्याय के 67वें श्लोक में सृष्टि-निर्माण, सृष्टि-प्रलय, युगों की वर्ष संख्या अर्थात कालगणना के संदर्भ में विचार किया गया है। इसमें लिखा है कि एक कल्प या एक हजार चतुर्युगी की समाप्ति पर आने वाले कलियुग के अन्त में सात सूर्य एक साथ उदित हो जाते हैं और तब ऊष्मा इतनी बढ़ जाती है कि पृथ्वी का सब जल सूख जाता है, आदि-आदि। +विभिन्न पुराण- पौराणिक कालगणना काल की भाँति अनन्त है। यह बहुत ही व्यापक है। इसके अनुसार कालगणना को दिन, रात, मास, वर्ष, युग, चतुर्युग, मन्वन्तर, कल्प, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की आयु आदि में विभाजित किया गया है। यही नहीं, इसमें मानव के दिन, मास आदि देवताओं के दिन, मास आदि तथा ब्रह्मा के दिन, मास आदि से भिन्न बताए गए हैं। एक कल्प में एक हजार चतुर्युगी होती हैं। एक हजार चतुर्युगियों में 14 मन्वन्तर, यथा- (1) स्वायंभुव, (2) स्वारोचिष, (3) उत्तम (4) तामस (5) रैवत (6) चाक्षुष (7) वैवस्वत (8) सार्वणिक (9) दक्षसावर्णिक (10) ब्रह्मसावर्णिक (11) धर्मसावर्णिक (12) रुद्रसावर्णिक (13) देवसावर्णिक (14) इन्द्रसावर्णिक होते हैं। हर मन्वन्तर में 71 चतुर्युगी होती हैं। एक चतुर्युगी (सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग) में 12 हजार दिव्य या देव वर्ष होते हैं। दिव्य वर्षों के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत के 3.11.18 में ‘दिव्यैर्द्वादशभिर्वर्षैः‘, मनुस्मृति के 1.71में ‘एतद् द्वादशसाहस्रं देवानां युगम्‘, सूर्य सिद्धान्त के 1.13 में ‘मनुष्यों का वर्ष देवताओं का दिन-रात होता है‘ उल्लेखनीय हैं। कई भारतीय विद्वान भी दिव्य या देव वर्ष की गणना को उचित नहीं ठहराते। वे युगों के वर्षों की गणना को सामान्य वर्ष गणना के रूप में लेते हैं किन्तु यह ठीक नहीं जान पड़ता क्योंकि यदि ऐसा होता तो आज कलि सम्वत 5109 कैसे हो सकता था ? क्योंकि कलि की आयु तो 1200 वर्ष की ही बताई गईहै। निश्चित ही यह (1200) दिव्य या देव वर्ष हैं। +उक्त ग्रन्थों के अतिरिक्त सूर्य सिद्धान्त, मुहूर्त चिन्तामणि, शतपथ ब्राह्मण आदि में भी कालगणना पर विस्तार में विचार किया गया है। यही नहीं, पाराशर संहिता, कश्यप संहिता, भृगु संहिता, मय संहिता, पालकाप्य महापाठ, वायुपुराण, दिव्यावदान, समरांगण सूत्रधार, अर्थशास्त्र, (कौटिल्य), सुश्रुत और विष्णु धर्मोत्तरपुराण भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इन ग्रन्थों के अतिरिक्त भी अनेक ग्रन्थों में कालगणना के संदर्भ में चर्चा की गई है। +वस्तुतः भारत की कालगणना का विभाजन अत्यन्त प्राचीन काल में ही चालू हो चुका था। हड़प्पा के उत्खनन में प्राप्त ईंटों पर चित्रित चिन्हों के आधार पर रूस के विद्वानों ने निष्कर्ष निकाला है कि हड़प्पा सभ्यता के समय में भारतीय पंचांग-पद्धति पूर्ण विकसित रूप में थी। +जिस देश में अत्यन्त प्राचीन काल से ही कालगणना-ज्ञान के सम्बन्ध में इतने अधिक विस्तार में जाकर विचार किया जाता रहा हो, वहाँ के विद्वानों के लिए यह कह देना कि वे कालगणना-ज्ञान से अपरिचित रहे, से अधिक हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है ? पं. भगवद्दत्त का स्पष्ट रूप में मानना है कि भारत की युगगणना को सही रूप में न समझ सकने के कारण ही यूरोपीय विद्वानों द्वारा अनेक भूलें हुई हैं। (‘भारतवर्ष का बृहद् इतिहास‘, भाग 1, पृ.209) फलतः इतिहास में तिथियों के संदर्भ में अनेक विसंगतियाँ आ गई हैं। +माइथोलॉजी की कल्पना कर. +आज के विद्वान प्राचीन काल की उन बातों को, जिनकी पुष्टि के लिए उन्हें पुरातात्त्विक आदि प्रमाण नहीं मिलते, मात्र ‘माइथोलॉजी‘ कहकर शान्त हो जाते हैं। वे उस बात की वास्तविकता को समझने के लिए उसकी गहराई में जाने का कष्ट नहीं करते। अंग्रेजी का ‘माइथोलॉजी‘ शब्द ‘मिथ‘ से बना है। मिथ का अर्थ है - जो घटना वास्तविक न हो अर्थात कल्पित या मनगढ़ंत ऐसा कथानक जिसमें लोकोत्तर व्यक्तियों, घटनाओं और कर्मों का सम्मिश्रण हो। +अंग्रेजों ने भारत की प्राचीन ज्ञान-राशि, जिसमें पुराण, रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं, को ‘मिथ‘ कहा है अर्थात उनकी दृष्टि में इन ग्रन्थोंमें जो कुछ लिखा है, वह सब कुछ कल्पित है, जबकि अनेक भारतीय विद्वानों का मानना है कि वे इन ग्रन्थोंको सही ढंग से समझने में असमर्थ रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी कठिनाई यही थी कि उनका संस्कृत ज्ञान सतही था जबकि भारत का सम्पूर्ण प्राचीन वाङ्मय संस्कृत में था और जिसे पढ़ने तथा समझने के लिए संस्कृत भाषा का उच्चस्तरीय ज्ञान अपेक्षित था। अधकचरे ज्ञान पर आधारित अध्ययन कभी भी पूर्णता की ओर नहीं ले जा सकता। वास्तव में तो पाश्चात्य विद्वानों ने ‘मिथ‘ के अन्तर्गत वह सभी भारतीय ज्ञान-राशि सम्मिलित कर दी, जिसे समझने में वे असमर्थ रहे। इसके लिए निम्नलिखित उदाहरण ही पर्याप्त होगा - +भारत के प्राचीन इतिहास में जलप्लावन की एक घटना का वर्णन आता है। इसमें बताया गया है कि इस जल प्रलय के समय ‘मनु‘ ने अगली सृष्टि के निर्माणके लिए ऋषियों सहित धान्य, ओषधि आदि आवश्यक सामग्री एक नाव में रखकर उसे एक ऊँचे स्थान परले जाकर प्रलय में नष्ट होने से बचा लिया था। यह प्रसंग बहुत कुछ इसी रूप में मिस्र, यूनान, दक्षिण-अमेरिका के कुछ देशों के प्राचीन साहित्य में भी मिलता है। अन्तर मात्र यह है कि भारत का ‘मनु‘ मिस्रमें ‘मेनस‘ और यूनान में ‘नूह‘ हो गया किन्तु पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा इस ऐतिहासिक ‘मनु‘ को ‘मिथ‘ बना दिया गया। ऐसा कर देना उचित नहीं रहा। +इसी प्रकार के ‘मिथों‘ के कारण भी भारतीय इतिहासके अनेक पृष्ठ आज खुलकर सामने आने से तो रह ही गए, साथ ही उसमें अनेक विकृतियाँ भी आ गईं। +विदेशी-साहित्य को अनावश्यक मान्यता देकर. +पाश्चात्य इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखते समय यूनान, चीन, अरब आदि देशों के साहित्यिक ग्रन्थों, यात्रा-विवरणों, जनश्रुतियों आदि का पर्याप्त सहयोग लिया है, इनमें से यहाँ यूनान देश के साहित्य आदि पर ही विचार किया जा रहा है, कारण सर विलियम जोन्स ने भारतीय इतिहास-लेखन की प्रेरणा देते समय जिन तीन मानदण्डों का निर्धारण किया था, वे मुख्यतः यूनानी साहित्य पर आधारित थे। +यूनान से समय-समय पर अनेक विद्वान भारत आते रहे हैं और उन्होंने भारत के संदर्भ में अपने-अपने ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा है किन्तु भारत के इतिहास को लिखते समय सर्वाधिक सहयोग मेगस्थनीज के ग्रन्थ से लिया गया है। चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए मेगस्थनीज ने भारत और अपने समय के भारतीय समाज के बारे में अपने संस्मरण ‘इण्डिका‘ नामक एक ग्रन्थ में लिखे थे किन्तु उसके दो या तीन शताब्दी बाद ही हुए यूनानी लेखकों, यथा- स्ट्रेबो ;ैजतंइवद्ध और एरियन ;।ततपंदद्धको न तो ‘इण्डिका‘ और न ही भारत के संदर्भ में किन्हीं अन्य प्राचीन लेखकों द्वारा लिखी पुस्तकें ही सुलभ हो सकी थीं। उन्हें यदि कुछ मिला था तो वह विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित वृत्तान्तों में उनके वे उद्धरण मात्र थे जो उन्हें भी पूर्व पुस्तकों के बचे हुए अंशों से ही सुलभ हो सके थे। +विभिन्न यूनानी लेखकों की पुस्तकों के वर्तमान में सुलभ विवरणों में से ऐसे कुछ विशेष उद्धरणों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है, जिनमें से कई को भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखते समय विभिन्न-विद्वानों द्वारा प्रयोग में लाया गया है किन्तु यूनानी विवरण चाहे भौगोलिक हो या जीव-जन्तुओं के, तत्कालीन निवासियों की कुछ विशेष जातियों के हों या कुछ विशिष्ट व्यक्तियों, स्थानों आदि, यथा- सिकन्दर, सेंड्रोकोट्टस, पाटलिपुत्र आदि के ब्योरों के, यूनानियों द्वारा लड़े गए युद्धों के वर्णन हों या अन्य, उन्हें पढ़कर ऐसा नहीं लगता कि उनमें सत्यता है और वे गम्भीरतापूर्वक लिखे गए हैं। सभी वर्णन अविश्वसनीय लगते हैं किन्तु आश्चर्य तो इस बात का है किजिन विद्वानों को भारतीय पुराणों के वर्णन अविश्वसनीय लगे, उन्हें वे वर्णन प्रामाणिक कैसे लगे ? अतः उनकी निष्पक्षता विचारणीय है। +यूनानी ग्रन्थों के कतिपय उल्लेखनीय ब्योरे मैकक्रिण्डलेकी अंग्रेजी पुस्तक के हिन्दी अनुवाद ‘मेगस्थनीज का भारत विवरण‘ (अनुवादक-बाबू अवध बिहारीशरण) के आधार पर इस प्रकार हैं, यथा - +(क) भारत की लम्बाई-चौड़ाई - हर विद्वान की माप पृथक-पृथक हैं - +लम्बाई - मेगस्थनीज-16 हजार स्टेडिया, प्लिनी-22,800 स्टेडिया, डायोडोरस-28 हजार स्टेडिया, +डायाइसेकस-कहीं 20 हजार और कहीं 30 हजार स्टेडिया, टालमी 16,800 स्टेडिया आदि और +चौड़ाई - मेगस्थनीज और ऐरेस्टनीज-16000 स्टेडिया, पैट्रोक्लीज-15,000 स्टेडिया, टीशियस - भारत एशिया के अवशिष्ट भाग से छोटा नहीं, ओनेसीक्राईटस- भारत संसार के तृतीयांश के तुल्य है आदि। +(ख) भारत के जीव-जन्तु +�* बन्दर कुत्तों से बड़े होते हैं, वे उजले रंग के होते हैं किन्तु मुँह काला होता है। वे बड़े सीधे होते हैं। +(ग) भारत के तत्कालीन निवासियों के ब्योरे - यहाँ के मनुष्य अपने कानों में सोते हैं, मनुष्यों के मुख नहीं होते, मनुष्यों की नाक नहीं होती, मनुष्यों की एक ही आँख होती है, मनुष्यों के बड़े लम्बे पैर होते हैं, मनुष्यों के अंगूठे पीछे की ओर फिरेरहते हैं आदि। +(घ) युद्धों के वर्णन - एक ही युद्ध के वर्णन अलग-अलग यूनानी लेखकों द्वारा पृथक-पृथक रूप में किए गए हैं, यथा- +�* एरियन ने लिखा है कि ‘‘इस युद्ध में भारतीयों के 20,000 से कुछ न्यून पदाति और 300 अश्वारोही मरे तथा सिकन्दर के 80 पदाति, 10 अश्वारोही धनुर्धारी, 20 संरक्षक अश्वारोही और लगभग 200 दूसरे अश्वारोही गिरे।‘‘ � +वीरेन्द्र कुमार गुप्त ‘विष्णुगुप्त चाणक्य‘ की भूमिका के पृष्ठ 11 पर बताते हैं कि- कहा जाता है कि पुरु युद्ध में पराजित हुआ था और बन्दी बनाकर सिकन्दर के समक्ष पेश किया गया था। लेकिन इस संदर्भ में भी यूनानी लेखकों केभिन्न-भिन्न मत हैं - +�* जस्टिन और प्लुटार्क के अनुसार पुरु बन्दी बना लिया गया था। +�* डायोडोरस का कहना है कि घायल पुरु सिकन्दर के कब्जे में आ गया था और उसने उपचार के लिए उसे भारतीयों को लौटा दिया था। +�* कर्टियस का मत है कि घायल पुरु की वीरता से प्रभावित होकर सिकन्दर ने सन्धि का प्रस्ताव रखा। +�* एरियन ने लिखा है कि घायल पुरु के साहस को देखकर सिकन्दर ने शान्ति दूत भेजा। +�* कुछ विद्वानों का मत है कि युद्ध अनिर्णीत रहा और पुरु के दबाव के सामने सिकन्दर ने सन्धि का मार्ग उचित समझा। +पुरु के संदर्भ में उक्त मत सिकन्दर के मेसीडोनिया से झेलम तक की यात्रा तक के इतिहास से मेल नहीं खाते। इससे पूर्व उसने कहीं भी ऐसी उदारतानहीं दिखाई थी। उसने तो अपने अनेक सहयोगियों को उनकी छोटी सी भूल से रुष्ट होकर तड़पा-तड़पा कर मारा था। इस दृष्टि से उसका योद्धा बेसस, उसकी अपनी धाय का भाई क्लीटोस, पर्मीनियन आदि उल्लेखनीय हैं। वह एक अत्यन्त ही क्रूर, नृशंस और अत्याचारी विजेता था। नगरों को जलाना, पराजितों को मौत के घाट उतारना, सैनिकों को रक्षा का वचन देकर धोखे से मरवा देना उसके स्वाभाविक कृत्य थे। ऐसा सिकन्दर पुरु के साथ अचानक ही इतना उदार कैसे बन गया कि जंजीरों में जकड़े पुरु को न केवल उसने छोड़ दिया वरन उसे बराबर बैठाकर राज्य वापस कर दिया, यह समझ में नहीं आता। ऐसा लगता है कि हारे हुए सिकन्दर का सम्मान और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए यूनानी लेखकों ने यह सारा वाक्जाल रचा है। वास्तव में पुरु की हस्थि सेना ने यूनानियों का जिस भयंकर रूप से संहार किया था, उससे सिकन्दर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे। यूनानी सेना का ऐसा विनाश उसके अस्तित्व के लिए चुनौती था। अतः उसने बाध्य होकर सन्धि की होगी। +पुरु के साथ हुए सिकन्दर के युद्ध के यूनानी लेखकों ने जिस प्रकार के वर्णन किए हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि यूनानी लेखक अपने गुण गाने में ज्यादा विश्वास रखते थे और उसमें माहिर भी ज्यादा थे। +उक्त विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि यूनानियों नेअपनी पुस्तकों में विवरण लिखने में अतिशयोक्ति से काम लिया है। हर बात को बढ़ा-चढ़ा करलिखा है। स्ट्रेबो, श्वानबेक आदि विदेशी विद्वानों ने तो कई स्थानों पर इस बात के संकेत दिएहैं कि मेगस्थनीज आदि प्राचीन यूनानी लेखकों के विवरण झूठे हैं, सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है और अतिरंजित हैं। ऐसे विवरणों को अपनाने के कारण भी भारत के इतिहास में विकृतियाँ आई हैं। +विदेशी पर्यटकों के विवरणों को प्रामाणिक समझकर. +भारतीय संस्कृति की विशिष्टताओं से प्रभावित होकर, भारतीय साहित्य की श्रेष्ठताओं से मोहित होकर और भारत की प्राचीन कला, यथा- मन्दिरों, मूर्तियों, चित्रों आदि से आकर्षित होकर समय-समय पर भारत की यात्रा के लिए आने वाले विदेशी पर्यटकों के यात्रा वृतान्तों पर भारत के इतिहास के संदर्भ में आधुनिक विदेशी और देशी इतिहासकारों ने भारत में विभिन्न स्रोतों से सुलभ सामग्री की तुलना में अधिक विश्वास किया है। जबकि यह बात जगजाहिर है कि मध्य काल में जो-जो भी विदेशी पर्यटक यहाँ आते रहे हैं, वे अपने एक उद्देश्य विशेष को लेकर ही आते रहे हैं और अपनी यात्रा पर्यन्त वे उसी की पूर्ति में लगे भी रहे हैं। हाँ, इस दौरान भारतीय इतिहास औरपरम्पराओं के विषय में इधर-उधर से उन्हें जो कुछ भी मिला, उसे अपनी स्मृति में संजो लिया और यात्रा-विवरण लिखते समय स्थान-स्थान पर उसे उल्लिखित कर दिया है। +इन विदेशी यात्रियों के वर्णनों के संदर्भ में विदेशी विद्वान ए. कनिंघम का यह कथन उल्लेखनीय है- +-- (‘एनशिएन्ट ज्योग्रेफी ऑफ इण्डिया‘ (1924) पृ. 371 - पं. कोटावेंकटचलम कृत ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘ पृ. 20 पर उद्धत) +वैसे तो भारत-भ्रमण के लिए अनेक देशों से यात्री आते रहे हैं। फिर भी भारत के इतिहास को आधुनिक रूप से लिखते समय मुख्यतः यूनानी और चीनी-यात्रियों के यात्रा-विवरणों को अधिक प्रमुखता दी गई है। उनके सम्बन्ध में स्थिति इस प्रकार है- +यूनानी यात्री +यूनान देश से आने वालों में अधिकतर तो सिकन्दर केआक्रमण के समय उसकी फौज के साथ आए थे या बाद में भारतीय राजाओं के दरबार में राजदूत के रूप में नियुक्त होकर आए थे। इनमें से मेगस्थनीज और डेमाकस ही अधिक प्रसिद्ध रहे। मेगस्थनीज की मूल पुस्तक ‘इण्डिका‘ ही नहीं वरन उसके समकालीन अन्य इतिहासकारों की रचनाएँ भी काफी समय पूर्व ही नष्ट हो चुकी थीं। उनकी फटी-पुरानी पुस्तकों से और अन्य लेखकों की रचनाओं से लिए गए उद्धरणों और जनता की स्मृति में शेष कथनों को लेकर जर्मन विद्वान श्वानबेक द्वारा लिखित पुस्तक के अनुवाद में दिए गए ब्योरों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि वे किसी जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा गम्भीरता से लिखे गए हैं। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं- +आचार्य रामदेव ने अपने ग्रन्थ ‘भारतवर्ष का इतिहास‘ के तृतीय खण्ड के अध्याय 5 में मेगस्थनीज के लेखन के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओरध्यान दिलाया है। उनका कहना है कि मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में यूनानी राजदूत के रूप में भारत आया था अतः उसका परिचय आचार्य चाणक्य से अवश्य ही रहा होगा क्योंकि वे सम्राटचन्द्रगुप्त के गुरु और महामंत्री, दोनों ही थे। ऐतिहासिक दृष्टि से दोनों की समसामयिकता को देखतेहुए ऐसा सोच लेना भी स्वाभाविक ही है कि तत्कालीन भारतवर्ष के सम्बन्ध में इन दोनों विद्वानों ने जो कुछ भी लिखा होगा, उसके ब्योरों में समानता होगी किन्तु मेगस्थनीज के विवरण चाणक्य के ‘अर्थ शास्त्र‘ से भिन्न ही नहीं विपरीत भी है। यही नहीं, मेगस्थनीज के विवरणों में चाणक्य का नाम कहीं भी नहीं दिया गया है। +चीनी यात्री +भारत आने वाले चीनी यात्रियों की संख्या वैसे तो 100मानी जाती है किन्तु भारतीय इतिहास-लेखन में तीन, यथा- फाह्यान, ह्वेनसांग औरइत्सिंग का ही सहयोग प्रमुख रूप से लिया गया है। इनके यात्रा विवरणों के अनुवाद हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में सुलभ हैं। इन अनुवादों में ऐसे अनेक वर्णन मिलते हैं जो लेखकों के समय के भारत के इतिहास की दृष्टि से बड़े उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण हैं। आधुनिक रूप में भारत का इतिहास लिखने वालों ने इन तीनों यात्रियों द्वारा वर्णित अधिकांश बातों को सत्य मानकर उनके आधार पर भारत की विभिन्न ऐतिहासिकघटनाओं के विवरण लिखे हैं किन्तु उनके वर्णनों में सभी कुछ सही और सत्य हैं, ऐसा नहीं है। उनके वर्णनों में ऐसी भी बातें मिलती हैं, जो अविश्वसनीय लगती हैं। ऐसा लगता है कि वे सब असावधानीमें लिखी गई हैं। तीनों के विवरणों की स्थिति इस प्रकार है- +फाह्यान - यह भारत में जितने समय भी रहा, घूमता ही रहा। चीन लौटने पर इसने अपनी यात्रा के वर्णन लिपि-बद्ध कर दिए। श्री जगन्मोहन वर्मा द्वाराचीनी से हिन्दी में अनूदित पुस्तक में, जिसे नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया है, कई जगह पर लिखा मिलता है कि ‘‘यह सुनी हुई बात पर आधारित है‘‘ आखिर यह ‘सुनना‘ किस भाषा में हुआथा ? क्या स्थानीय भाषाओं का उसका ज्ञान इतना पुष्ट था कि सामान्य लोगों की बातों को उसने समझ लिया था ? किसी भी विदेशी के लिए इतनी जल्दी भारत जैसे बहुभाषी देश की विभिन्न भाषाओं कोज्ञान प्राप्त कर लेना एक असंभव कार्य था जबकि उसके द्वारा लिखे गए विवरणों में विभिन्न स्थानों के अलग-अलग लोगों की स्थिति का उल्लेख मिलता है। यदि ऐसा नहीं था तो उसने जो कुछ लिखा है क्या वह काल्पनिक नहीं है ? संभव है इसीलिए इन विवरणों के सम्बन्ध में कनिंघम को सन्देह हुआ है। +ह्वेनसांग- यह हर्षवर्धन के समय में भारत में बौद्ध धर्म के साहित्य का अध्ययन करने आया था और यहाँ 14 वर्ष तक रहा था। उसने भारत में दूर-दूर तक भ्रमण किया था। उसने भारत के बारे में चीनी भाषा में बहुत कुछ लिखा था। बील द्वारा किए गएउसके अंग्रेजी अनुवाद से ज्ञात होता है कि उसने अपनी भाषा में भारत के समस्त प्रान्तों की स्थिति, रीति-रिवाज और सभ्यता, व्यवहार, नगरों और नदियों की लम्बाई-चौड़ाई तथा अनेक महापुरुषों के सम्बन्ध में विचार प्रकट किए हैं लेकिन यहाँ भी वही प्रश्न उठता है कि उसने विभिन्न भारतीय भाषाओं का ज्ञान कब, कहाँ और कैसे पाया ? यह उल्लेख तो अवश्य मिलता है कि उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में रहकर संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया था किन्तु सामान्य लोगों से उसका वार्तालाप संस्कृत में तो हुआ नहीं होगा, तबवह उनके रीति-रिवाजों के बारे में इतनी बातें कैसे जान पाया होगा ? +भारत के आधुनिक रूप में लिखित इतिहास में अनेक ब्योरे और निष्कर्ष ह्वेनसांग के वर्णनों को प्रमाणिक मानकर उनके आधार पर दिए गए हैं। इसके लेखों के बारे में कनिंघम का कहना है कि यह मानना होगा कि ह्वेनसांग के लेखों में बहुत सी बातें इधर-उधर की कही गई बातों के आधार पर कल्पित हैं। इसलिए वे गलत और असम्बद्ध हैं। अतः उसने जो कुछ लिखा है, उसे एकदम सत्य और प्रामाणिक मान लेना उचित नहीं है। इसीलिए कनिंघम ने यह सलाह दीहै कि इतिहास लिखते समय हमें उसमें उचित संशोधन करने होंगे। (पं. कोटावेंकटचलम कृत ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘, पृ. 20 पर उद्धृत) +इत्सिंग - इत्सिंग ने नालन्दा में 675 से 685 ई. तक रहकर लगभग दस वर्ष तक अध्ययन किया था। इस अवधि में उसने 400 ग्रन्थों का संकलन भी किया था। 685 ई. में उसने अपनी वापसी यात्रा शुरू की। मार्ग में रुकता हुआ वह 689 ई. के सातवें मास मेंकंग-फूं पहुँचा। इत्सिंग ने अपने यात्रा विवरण पर एक ग्रन्थ लिखा था, जिसे 692 ई. में ‘श्रीभोज‘ (सुमात्रा में पलम्बंग) से एक भिक्षुक के हाथ चीन भेज दिया था। जबकि वह स्वयं 695 ई. के ग्रीष्म काल में ही चीन वापस पहुँचा था। +अपने यात्रा-विवरण में उसने भी बहुत सी ऐसी बातें लिखी हैं जो इतिहास की कसौटी पर कसने पर सही नहीं लगतीं। इत्सिंग ने प्रसिद्ध विद्वान भर्तृहरि को अपने भारत पहुँचने से 40 वर्ष पूर्व हुआ माना है। जबकि ‘वाक्यपदीय‘ के लेखक भर्तृहरि काफी समय पहलेहुए हैं। इसी प्रकार उसके द्वारा उल्लिखित कई बौद्ध विद्वानों की तिथियों में भी अन्तर मिलता है। इन अन्तरों के संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इत्सिंग द्वारा 691-92 ई. में चीन भेजी गई सामग्री 280 वर्ष तक तो हस्तलिखित रूप में ही वहाँ पड़ी रही। 972 ई. तक वह मुद्रित नहीं हुई। फिर जो पुस्तक छपी उसमें और मूल सामग्री, जो इत्सिंग ने भेजी थी, में अन्तर रहा। (‘इत्सिंग की भारत यात्रा‘, अनुवादक सन्तराम बी. ए. पृ. ज्ञ-30) ऐसा भी कहा जाता है कि इत्सिंग ने स्वयं अपनी मूल प्रति में चीन पहुँचने पर संशोधन कर दिए थे। जो पुस्तक स्वयं में ही प्रामाणिक नहीं रही उसके विवरण भारत के इतिहास-लेखन के लिए कितने प्रामाणिक हो सकते हैं, यह विचारणीय है। +अनुवादों के प्रमाण पर. +पाश्चात्य इतिहासकारों तथा अन्य विधाओं के विद्वानोंने भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखे जाने से पूर्व ही उसके संदर्भ में विभिन्न निष्कर्ष निकाल कर उन पर कार्रवाई करने के लिए यथावश्यक निर्णय कर लिए थे। बाद में तो उन्होंने पूर्व निर्धारित निष्कर्षों को सही सिद्ध करने के उद्देश्य से अधिकतर ऐसे विदेशियों द्वारा लिखित पुस्तकों केअंग्रेजी अनुवादों को अपने लेखन का आधार बनाया जिनसे उनके निष्कर्षों की पुष्टि होती हो। जहाँ तक विदेशी पुस्तकों के अनुवादों को अपने लेखन का आधार बनाने की बात है, वहाँ तक तो बात ठीक है किन्तु मुख्य प्रश्न तो यह है कि क्या वे अनुवाद सही हैं ? क्या वे लेखक के मूल भावों को ठीक प्रकार से अभिव्यक्त करने में समर्थ रहे हैं ? क्योंकि आज यह बड़ी मात्रा में देखने में आ रहा है कि अनुवादकों नेअनेक स्थानों पर मूल लेखकों की भावनाओं के साथ न्याय नहीं किया है। संभव है कि वे अनुवादक अंग्रेजोंकी तत्कालीन सत्ता के भारत के इतिहास को बदलने की योजना में सम्मिलित रहे हों और उन्होंने अनुवाद भी उसी दृष्टि से किया हो। अलबेरूनी के ‘भारत के इतिहास‘ के गुप्त सम्वत से सम्बन्धित अंश का डॉ. फ्लीट द्वारा तीन-तीन बार अनुवाद मांगना यही प्रमाणित करता है कि उसको वही अनुवाद चाहिए था जो उसकी इच्छाओं को व्यक्त करने वाला हो। इस संदर्भ में श्री के. टी. तेलंग का कहना था कि भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में अंग्रेजों ने पूर्व निर्धारित मतों को सही सिद्ध करने के लिए हर प्रकार के प्रयास करके किलिंग्बर्थ की भाषा में "They dream what they desire and believe their own dreams" - वे स्वैच्छिक स्वप्न ही देखते थे और उन्हीं पर विश्वास करते थे‘‘ को सिद्ध किया है। +भारत के इतिहास-लेखन में यूनानी, चीनी, अरबी, फारसी, संस्कृत, पाली, तिब्बती आदि भाषाओं में लिखी गई पुस्तकों के अंग्रेजी में हुए अनुवादों का बड़ी मात्रा में उपयोग किया गया है। उनमें से कुछ के उदाहरण देकर यहाँ स्थिति स्पष्ट की जा रही है। +यूनानी भाषा -इसके संदर्भ में पूर्व पृष्ठों में विचार किया जा चुका है। +चीनी भाषा - चीनी भाषा से अंग्रेजी भाषा में किए गए अनुवादों से जिस-जिस प्रकार की गड़बड़ियाँ हुईं, उसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं - एस. बील ने ह्वेनसांग की पुस्तक का अनुवाद करते हुए फुटनोट 33 का चीनी भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद इस प्रकार से किया है - +बील के उक्त अनुवाद के आधार पर डॉ. बुहलर ने, जिसेभारत के साहित्यिक ग्रन्थ, ऐतिहासिक साक्ष्य, भाषायी प्रमाण आदि सब झूठे लगे हैं, अपने लालबुझक्कड़ी तर्कों के आधार पर अंशुवर्मन को 3000 कलि या 101 ई. पू. के स्थान पर ईसा की सातवीं शताब्दी में लाकर बिठा दिया। उक्त अनुवाद के संदर्भ में पं. कोटावेंकटचलनम का उक्त पुस्तक के पृष्ठ 29 पर कहना है - +"--- When Heun - Tsang visited Nepal he found frequently on the lips of the people the memorable name ...’ he noted and recorded that there had been a great king of the name Amsuvarman and that he ... but he never stated that Amsuvarman mentioned was the contemporary or was reigning at the time of his visit." +यह गलती चीनी शब्द के अंग्रेजी अनुवाद ‘लेटली‘ (lately) के कारण हुई है। यदि लेटली की जगह फॉरमरली (formerly) होता तो यह गलती न होती। ‘फॉरमली‘ का अर्थ है - ‘इन फारमर टाइम्स‘ अर्थात पूर्व काल में या पहले, जबकि ‘लेटली‘ का अर्थ है - ‘हाल में‘। इन दोनों शब्दों के अर्थ में समय का अन्तराल स्वयं ही स्पष्ट हो जाता है। +'चीनी यात्री फाह्यान का यात्रा-विवरण' के अनुवाद में श्रीजगन्मोहन वर्मा ने पुस्तक की भूमिका के पृष्ठ 3 पर लिखा है कि ‘‘इस अनुवाद में अंग्रेजी अनुवाद से बहुत अन्तर देख पड़ेगा, क्योंकि मैंने अनुवाद को चीनी भाषा के मूल के अनुसार ही, जहाँ तकहो सका है, करने की चेष्टा की है‘‘ अर्थात इन्हें अंग्रेजी का जो अनुवाद हुआ है, वह ठीक नहीं लगा। यदिउसमें गड़बड़ी नहीं होती तो वर्मा जी को ऐसा लिखने की आवश्यकता ही नहीं थी। उन्होंने पुस्तक के अन्दर एक दो नहीं, कई स्थानों पर शब्दों के अनुवाद का अन्तर तो बताया ही है, एक दो स्थानों पर ऐसे उल्लेख भी बताए हैं जो मूल लेख में थे ही नहीं और अनुवादक ने डाल दिए थे। +संस्कृत भाषा- यूनानी या चीनी भाषाओं से ही नहीं, संस्कृत से भीअंग्रेजी में अनुवाद करने में भारी भूलें होती रही हैं, यथा- +कौरव-पाण्डवों का युद्ध टालने के लिए श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से पाण्डवों के लिए 5 ग्राम ही दे देने को कहा था। पाँच ग्रामों में से इन्द्रप्रस्थ, वृकप्रस्थ, जयन्त और वारणाव्रत इन चार ग्रामों के तो नाम उन्होंने गिना दिए थे और पाँचवां कोई सा भी अन्य गांव देने को कहा था। संस्कृत शब्द ‘कंचिदेक‘ का अर्थ ‘कोई सा भी एक‘ होता है। मोनियर ने इन्द्रप्रस्थ आदि नामों को देखकर इसे भी एक ग्राम का नाम मान लिया है। +उक्त विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि अनुवाद करते समयछोटी-छोटी गलतियों के कारण इतिहास में भयंकर भूलें हो जाती हैं और भारतीय इतिहास में ऐसा हुआ है। +विकासवाद के अनुसरण पर. +आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि सृष्टि के आरम्भ मेंसभी प्राणी और वस्तुएँ अपनी प्रारम्भिक स्थिति में थीं। धीरे-धीरे ही उनका विकास हुआ है।यह बात सुनने में बड़ी सही, स्वाभाविक और वास्तविक लगती है लेकिन जब यह सिद्धान्त मानव के विकास पर लागू करके यह कहा जाता है कि मानव का पूर्वज वनमानुष था और उसका पूर्वज बन्दर था और इस प्रकार से जब आगे और आगे बढ़कर कीड़े-मकौड़े ही नहीं ‘लिजलिजी‘ झिल्ली तक पहुँचा जाता है तो यह कल्पनाबड़ी अटपटी सी लगती है। चार्ल्स डार्विन ने 1871 ई. में अपने ‘दि डिसैण्ड ऑफ मैन‘ नामक ग्रन्थ में ‘अमीबा‘ नाम से अति सूक्ष्म सजीव प्राणी से मनुष्य तक की योनियों के शरीर की समानता को देखकर एक जाति से दूसरी जाति के उद्भव की कल्पना कर डाली। जबकि ध्यान से देखने पर यह बात सही नहीं लगती क्योंकि भारतीय दृष्टि से सृष्टि चार प्रकार की होती है - अण्डज, पिण्डज (जरायुज), उद्भिज और स्वेदज- तथा हर प्रकार की सृष्टि का निर्माण और विकास उसके अपने-अपने जातीय बीजों में विभिन्न अणुओं के क्रम और उनके स्वतः स्वभाव के अनुसार होता है। एक प्रकार की सृष्टि का दूसरे प्रकार की सृष्टिमें कोई दखल नहीं होता। इसे इस प्रकार से भी समझा जा सकता है कि एक गौ से दूसरी गौ और एक अश्व से दूसरा अश्व तो हो सकता है किन्तु गौ और अश्व के मेल से सन्तति उत्पन्न नहीं हो सकती। हाँ, अश्व और गधे अथवा अश्व और जेबरा, जो कि एक जातीय तत्त्व के हैं, के मेल से सन्तति हो सकती है, अर्थात कीट से कीट, पतंगे से पतंगे, पक्षी से पक्षी, पशु से पशु और मानव से मानव की ही उत्पत्ति होती है। कीट, वानर या वनमानुष से मनुष्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती क्योंकि इनके परस्पर जातीय तत्त्व अथवा बीजों के अणुओं के क्रम अलग-अलग हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि एक जाति केबीजों में विभिन्न अणुओं का एक निश्चित क्रम रहता है। यह क्रम बीज के स्वतः स्वभाव से अन्यत्त्व को प्राप्त नहीं होता। +विकासवाद के मत को स्वीकार कर लेने पर ही मनुष्य के अन्दर ज्ञान की उत्पत्ति के लिए भी एक क्रम की कल्पना की गई। तदनुसार यह मानने को बाध्य होना पड़ा कि प्रारम्भिक स्थिति में मानव बड़ा जंगली, बर्बर और ज्ञानविहीन था। उसे न रहना आता था और न भोजन करना। वह जंगलों में नदियों के किनारे रहता था और पशुओं को मारकर खाता था। अपनी सुरक्षा के लिए पत्थर के हथियारों का प्रयोग करता था। बाद में धीरे-धीरे धातुओं का प्रयोग करते-करते आगे बढ़कर ही वह आज की स्थिति में आया है। +दूसरी ओर भारत में यह मान्यता चली आ रही है कि सृष्टि के आरम्भ में ही ईश्वर ने विद्वान ऋषियों के हृदय में ईश्वरीय ज्ञान उत्पन्न किया और उसी ज्ञान को ऋषियों द्वारा वेदों के रूप में प्रकट/संकलित किया गया अर्थात प्रारम्भिक ऋषि बड़े ही ज्ञानवान थे। वर्तमान वैज्ञानिकों में प्रारम्भिक मानव के अज्ञानी होने की बात आई ही इसलिए कि उनको मानव जाति के पूरे इतिहास (जो कि भारत के अलावा कहीं और सुलभ ही नहीं है) का पूर्ण ज्ञान ही नहीं है और न ही वे उस ज्ञान को प्राप्त करने में कोई रुचि ही रखते हैं। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि आज के अधिकांश वैज्ञानिक यूरोप के हैं और उन्होंने वहाँ की स्थिति के अनुरूप मानव-विकास की कल्पना की है। जबकि मानव सृष्टि का आरम्भ वहाँ हुआ ही नहीं है। उसका प्रारम्भ तो भारत में हुआ हैएवं भारत की परम्परा के अनुसार यहाँ प्रारम्भिक काल में ही ऋषियों को ईश्वरीय ज्ञान मिला था। यह बात प्राचीन मिस्री और यूनानी साहित्य में भी मिलती है अर्थात इस सम्बन्ध में अकेले भारत का ही ऐसा मत नहींहै, अन्य देशों की भी प्राचीन काल में यही अवधारणा रही है। पं. भगवद्दत्त का मत है कि जिस प्रकार प्राणियों की उत्पत्ति के विषय में विकासवाद का मत निराधार है, उसी प्रकार मानव के ज्ञान की दिन-प्रतिदिन उन्नति होने का मत भी निस्सार है। उनके अनुसार तो स्थिति इसके उलट है क्योंकि सत्यता, धर्मपालन, आयु, स्वास्थ्य, शक्ति, बुद्धि, स्मृति, आर्थिक स्थिति, सुख, राज्य व्यवस्था, भूमि की उर्वरा शक्ति तथा सस्यों का रस-वीर्य दिन-प्रतिदिन बढ़ने के स्थान पर न्यून हुए हैं। वर्तमान युग में पचास वर्ष के पश्चात जिस प्रकार मनुष्य निर्बल होना आरम्भ हो जाता है तथा उसकी मस्तिष्क-शक्ति किंचित-किंचित ह्रासोन्मुख होती जाती है, ठीक उसी प्रकार सत्युग के दीर्घकाल के पश्चात पृथ्वी से बने सब प्राणियों मेंह्रास का युग आरम्भ हो जाता है। प्राणियों के अतिरिक्त अन्य पदार्थों में भी ह्रास हो रहा है। +विकासवाद के इस सिद्धान्त के कारण भारत के प्राचीन इतिहास को आधुनिक रूप में लिखते समय अनेक भ्रान्तियाँ पैदा करके उसे विकृत किया गया है। +पुरातात्त्विक सामग्री की भ्रामक समीक्षा को स्वीकार कर. +प्राचीन इतिहास को जानने का एक प्रमुख आधार किसी भी स्थान विशेष से उत्खनन में प्राप्त पुरातात्त्विक सामग्री, यथा- ताम्रपत्र तथा अन्य प्रकार के अभिलेख, सिक्के, मोहरें और प्राचीन नगरों, किलों, मकानों, मृदभाण्डों, मन्दिरों, स्तम्भों आदि के अवशेष भी हैं। +उत्खननों से प्राप्त उक्त सामग्री के आधार पर पुरातात्त्विक लोग अपने शास्त्रीय विवेचन से उस स्थान से सम्बन्धित सभ्यता की प्राचीनता का आकलन करते हैं। उसी से पता चलता है कि वह सभ्यता कब पनपी थी, कहाँ-कहाँ फैली थी और किस स्तर की थीतथा उस कालखण्ड विशेष में समाज की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि स्थितियाँ क्या और कैसी थीं ? भारत में 1920 ई. के बाद से निरन्तर होती आ रही पुरातात्त्विक खोजों में प्राप्त हुई सामग्रियों का ही यह परिणाम है कि आज भारत के प्राचीन इतिहास के अनेक ऐसे अज्ञात पृष्ठ, जिनके बारेमें सामान्यतः आज लोगों को कुछ पता ही नहीं था, खुलकर सामने आते जा रहे हैं। +अब तक कुल 1400 स्थानों (971 भारत में, 428 पाक में और एक अफगानिस्तान) पर पुरातात्त्विक खुदाई हो चुकी है। उत्खननों से प्राप्त सामग्री के आधार पर स्थिति इस प्रकार ही है - +सिन्धु नद उपत्यका के उत्खनन - लाहौर और मुल्तान के बीच रावी नदी की एक पुरानी धारा के तट पर बसे हड़प्पा (जो प्राचीन भारत के मद्रदेश काभाग था) तथा सिन्ध प्रान्त (जिसका प्राचीन नाम सौवीर था) के लरकाना जिले के मोयां-जा-दड़ों अर्थात मरे हुओं की ढेरी या टीले में हुए उत्खननों से भारत की प्राचीनता और उसके मौलिक स्वरूप का विलक्षणप्रमाण मिला है। उत्खननों में मिले प्रमाणों के आधार पर ही वे इतिहासकार, जो भारत के सम्पूर्ण इतिहास की प्राचीनतम सीमा को 2500 ई. पू. तक की सीमा में बांध रहे थे, यह मानने को बाध्य हुए कि भारतीय सभ्यता निश्चय ही उससे कहीं अधिक प्राचीन है जितनी कि भारतीय इतिहास को आधुनिक रूप से लिखने वाले इतिहासकार मानते आ रहे हैं। +हड़प्पा सभ्यता, जिसे नगर सभ्यता माना गया और जिसका प्रारम्भिक काल 3250-2750 ई. पू. निश्चित किया गया था, के अवशेषों को देखकर इतिहासकारों को यह सोचने के लिए भी बाध्य होना पड़ा कि यह सभ्यता एकाएक तो पैदा हो नहीं गई होगी, कहींन कहीं और किसी न किसी जगह ऐसा केन्द्र अवश्य रहा होगा जहाँ यह विकसित हुई होगी और जहाँ से आगे जाकर लोगों ने बस्तियों का निर्माण किया होगा। +हड़प्पा-पूर्व सभ्यता की खोज- इस दृष्टि से पाकिस्तान स्थित क्वेटाघाटी के किलीगुज मुहम्मद, रानी घुंडई, आम्री वस्ती, कोट दीजी और भारत में गंगा की घाटी में आलमगीरपुर, गुजरात में लोथल, रंगपुर, मोतीपीपली आदि, राजस्थान में कालीवंगन, पंजाब-हरियाणा में रोपड़ तथा मध्यप्रदेश में क ई स्थानों की खुदाइयों में मिली सामग्री हड़प्पा पूर्व की ओर ले जा रही है। धोलावीरा की खुदाई में तोएक पूरा विकसित नगर मिला है, जिसमें पानी की उपलब्धी के लिए बांध आदि की तथा जल-निकासी के लिए नालियों की सुन्दर व्यवस्था के साथ भवन आदि बहुत हीपरिष्कृत रूप में वैज्ञानिक ढंग से बने हुए मिले हैं। एक अभिलेख भी मिला है जो पढ़ा नहीं जा सका है। यही नहीं, वहाँ ऐसे चिह्न भी मिले हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि वहाँ का व्यापार उन्नत स्तर का रहा है। +सिन्धु घाटी सभ्यता सरस्वती नदी की घाटी में पनपी वैदिक सभ्यता का ही अंग है - भारत और पाकिस्तान के विभिन्न भागों में जैसे-जैसे नए उत्खननों में पुरानी सामग्री मिलती जा रही है, उसके आधार पर भारत के आधुनिक इतिहासकारों द्वारानिर्धारित भारतीय सभ्यता की प्राचीनता की सीमा 4500-5000 वर्ष से बढ़ते-बढ़ते 10,000 वर्ष तक पहुँच गई है। अब तो भारतीय इतिहास के आधुनिक लेखकों को भी यह मानना पड़ रहा है कि वह सभ्यता जिसे एक समय सीमित क्षेत्र में केन्द्रित मानकर सिन्धु घाटी सभ्यता का नाम दिया गया था, वास्तव में बिलोचिस्तान, सिन्ध, पूरा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात अर्थात लगभग पूरे भारत में ही फैली हुई थी। +पुरातत्त्व विज्ञान का कार्यक्षेत्र आलोच्य विषय पर विश्वसनीय सिद्धान्तों को बताकर सही निष्कर्ष निकालने के मार्ग को प्रशस्त करने तक ही है। यह नहीं कि वह उस विषय पर सिद्धान्तों की आड़ लेकर तरह-तरह की हैरानी, परेशानी या उलझनें पैदा करे। जबकि भारत के प्राचीन इतिहास के काल-निर्धारण के संदर्भ में ज्यादातर मामलों में ऐसा ही देखा गयाहै कि पुरातात्त्विकों द्वारा प्राचीन सामग्री का विश्लेषण करते समय एक से एक हैरानी परेशानी भरे उलझनपूर्ण निष्कर्ष निकाले गए। इसीलिए जब उन्हें भारतीय कालगणना के आधार पर कसा जाता है तो वे सही नहीं लगते। उनमें बहुत बड़े परिमाण में अन्तर आता है। +तिथ्यांकन प्रणाली की भ्रामक समीक्षा को मानकर. +आजकल पुरातात्त्विक साक्ष्यों की प्राचीनता का आकलन करने के लिए कार्बन तिथ्यांकन प्रणाली (Radio Carbon Dating Technique) का काफी उपयोग किया गया है। डॉ. सांकलिया आदि भारतीय पुरातात्त्विकों को इस प्रणाली पर बड़ा विश्वास है। इस प्रणाली की खोज 1949 ई. में शिकागो विश्वविद्यालय के डॉ. विल्फोर्ड एफ. लिब्बी और उसके दोसहयोगियों ने की थी। इसके आविष्कर्ताओं ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि यह प्रणाली अभी (1952 ई. में) प्रयोगात्मक अवस्था में है और उसमें सुधार की संभावना हो सकती है। (सर मोर्टियर व्हीलर कृत ‘आर्कियोलोजी फ्रॉम दि अर्थ‘ के हिन्दी अनुवाद ‘पृथ्वी से पुरातत्व‘ पृ. 44-45 अनुवादक डॉ. हरिहर त्रिवेदी) +डॉ. रिचर्ड एडोंगेन्फेल्टोव ने 1963 ई. में रिवाइविल ऑफ ज्योफिजिक्स (जरनल) वाल्यूम-1, पृ. 51 पर डॉ. लिब्बी के इस प्रणाली से सम्बन्धित विचारोंको बड़ा त्रुटिपूर्ण बताया है। +पुरातत्त्व संस्थान, लन्दन विश्वविद्यालय के सर मोर्टियर व्हीलर के अनुसार भी इस प्रणाली के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष असत्य हो सकते हैं। +भारतीय विद्वान डॉ. किरन कुमार थपलियाल ने भी इस प्रणाली को दोषपूर्ण माना है। +डॉ. रिचर्ड आदि के आक्षेप तो पुराने हो गए हैं परन्तु बाद के अनुसंधानों से भी यह प्रणाली दोषयुक्त सिद्ध होती है। श्री शशांक भूषण राय ने ‘डेट ऑफ महाभारत वेटिल‘ के पृ. 5-6 पर इस प्रणाली के भारतीय विशेषज्ञ डी. पी. अग्रवाल के प्रमाण से लिखा है कि उत्खनन में प्राप्त एक द्रव्य की आयु जाँचने के लिए उसको तीन विभिन्न प्रयोगशालाओं में भेजा गया, जिनसे नौ अलग-अलग परिणामों में 2737 ई. पू. से 2058 ई. पू. तक का समय निर्धारित किया गया अर्थात कुल मिलाकर उस द्रव्य के काल निर्धारण के निष्कर्ष में 679 वर्ष का बड़ा अन्तर आ गया। एक ही द्रव्य के काल में इतने बड़े अन्तर को देखकर कार्बन-14 तिथ्यांकन प्रणाली को कितना प्रमाणिक माना जा सकताहै, यह विचारणीय है। +श्री थपलियाल एवं श्री शुक्ला ने भी ‘सिन्धु सभ्यता‘ के पृष्ठ 312 पर इस प्रणाली की प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त किया है। उनका कहना है कि एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि अब विद्वज्जन कार्बन 14 विधि के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी इसे इतनी निश्चित रूप से सही तिथि बताने वाली विधि नहीं मानते जितनी कि शुरू-शुरू में, जब इस विधि की खोज हुई थी। विदेशों में अब वृक्ष कालानुक्रमणिका (डेन्डोक्रोनोलॉजी) विधि से प्राप्त और अपुवर्ण मृत्तिका (Clay carve) परीक्षण से प्राप्त तिथियाँ और कार्बन 14 विधि में प्राप्त तिथियों में पर्याप्त अन्तर पाया गया है। मिस्र और मेसोपोटामिया की मध्य युग की अनेक सिद्ध ऐतिहासिक तिथियों का जब कार्बन 14 विधि में परीक्षण किया गया तो वे काफी समय बाद की निकलीं। कार्बन 14 विधि के अनुसार तृतीय राजवंश के जोसोर ;क्रवेमतद्ध की जो तिथि निकली वह इसके उत्तराधिकारी हुनी ;भ्नदपद्ध की लगभग निश्चित तिथि के 800 वर्ष बाद की रही। बहुत संभव है कि इन्हीं बातों को देखकर व्हीलर का यह मत बना हो कि ‘‘हो सकता है कि सिन्धु सभ्यता की कार्बन तिथ्यांकन प्रणाली के आधार पर निकाली गई तिथियों के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ हो।‘‘ +प्रो. लाल ने भी अयोध्या में किए गए पूर्व उत्खननसे प्राप्त सामग्री का इसी विधि से परीक्षण करके श्रीराम को श्रीकृष्ण के बाद में हुआ बताया था किन्तु 2003 में किए गए उत्खनन में मिली सामग्री के विश्लेषणों ने पूर्व निर्धारित तथ्यों को बदल दिया है। अब श्रीराम को श्रीकृष्ण से पूर्व हुआ माना गया है। +इस प्रकार हम देखते हैं कि कार्बन 14 तिथ्यांकन प्रणालीस्वयं में ही सन्देह के घेरे में बनी हुई है। ऐसी विधि के आधारों पर निकाले गए उक्त निष्कर्षों से सहमत कैसे हुआ जा सकता है ? अतः भारतीय इतिहास के संदर्भ में भी जो तिथियाँ कार्बनतिथ्यांकन प्रणाली से निकाली गई हैं वे और उनके आधार पर निकाले गए ऐतिहासिक निर्णय कहाँ तक माने जाने योग्य हैं, यह एक विचारणीय प्रश्न है। +पाश्चात्य विद्वानों के संस्कृत के अधकचरे ज्ञान की श्रेष्ठतापर विश्वास कर. +भारतीय संस्कृति का मूल आधार उसका प्राचीन वाङ्मय, जिसमें वेद, पुराण, शास्त्र, रामायण, महाभारत आदि सद्ग्रन्थ सम्मिलित हैं, संस्कृत भाषा में ही सुलभ हैं। देश में अनेक बार उथल-पुथल हुई, भाषाओं के कितने ही रूपान्तर हुए, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक परिवर्तन भी हुए, फिर भी यह (संस्कृत) उसी रूप में विद्यमान रही। संस्कृत भाषा के कारण ही भारत के लोग प्राचीनतम काल से चली आ रही अपनी संस्कृति से अनन्य रूप से जुड़े रहे। देश की जनता को एकसूत्र में बांधने में संस्कृत भाषा का जो योगदान रहा है, उसे भुलाया नहीं जा सकता। +अंग्रेजों ने भी भारत की सत्ता की बागडोर संभालनेके समय ही देश, धर्म और समाज में संस्कृत भाषा के प्रभाव को परिलक्षित करके संस्कृत को भाषा के रूप में महत्त्व दिया और उसके पठन-पाठन पर ध्यान दिया किन्तु कोई भी, चाहे कितना भी योग्य क्यों न हो, विदेशी भाषा में उतना पारंगत नहीं हो पाता, जितना कि अपनी भाषा में। फिर यूरोप में तो ऐसे ही लोगों ने, जिनका संस्कृत का ज्ञान अधिक परिपक्व नहीं था, संस्कृत की पुस्तकें लिखीं तथा उन्हीं पुस्तकों के आधार पर वहाँ के लोग संस्कृत में शिक्षित हुए। अधकचरे ज्ञान पर आधारित ग्रन्थों के माध्यम से पढ़े हुए व्यक्ति अपेक्षाकृत कम ही दक्ष रहते हैं और अदक्ष व्यक्ति लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक पहुँचा सकता है। यही यूरोप के संस्कृत के विद्वानों ने किया। फिर चाहे वह मैक्समूलर हो या कर्नल टॉड, विंटर्निट्स हो या वेबर, रॉथ हो या कीथ सभी ने भारत के संस्कृत वाङ्मय को पूरी तरह से न समझ सकने के कारण अर्थ का अनर्थ ही किया। भारतीय इतिहास के संदर्भ में पाश्चात्य विद्वानों के ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिन्होंने अपने अधकचरे ज्ञान के कारण न केवल संस्कृत के प्राचीन साहित्य के अमूल्य रत्नों को हीनष्ट किया है, वरन् भारतीय इतिहास की रचना में अपने भ्रष्ट उल्लेखों द्वारा बिगाड़ भी पैदा किया है। उदाहरण के लिए - +मैक्समूलर. +कात्यायन कृत ‘ऋक्सर्वानुक्रमणी‘ की वृत्ति की भूमिका में षड्गुरु शिष्य का एक श्लोकार्द्ध इस रूप में मिलता है - +मैक्समूलर ने इसका अर्थ "The slokas of the smriti"' करके अपने नोट में लिखा कि - ‘‘भ्राजमान पद समझ मेंनहीं आता, यह पार्षद हो सकता है।‘‘ जबकि वास्तविकता यह है कि वह इसका अर्थ ही नहीं समझ सका। इसका अर्थ है - ‘‘कात्यायन, स्मृति का और भ्राज नामक श्लोकों का कर्ता था‘‘। +मैक्समूलर के संस्कृत ज्ञान के संदर्भ में महर्षि दयानन्दजी ने सत्यार्थप्रकाश में कहा है कि उनका संस्कृत ज्ञान कितना और कैसा था यह इस मंत्र के उनके अर्थ से पता चलता है - +मैक्समूलर ने इस मंत्र का अर्थ ‘घोड़ा‘ किया है। परन्तु इसका ठीक अर्थ ‘परमात्मा‘ है। +कर्नल टॉड. +इनके संस्कृत ज्ञान के बारे में पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने ‘राजस्थान‘ के पृष्ठ 26-27 में लिखा है कि - ‘‘राजस्थान में रहने के कारण यहाँ की भाषा से तो वे परिचित हो गए थे परन्तु संस्कृत का ज्ञान अधिक न होने से संस्कृत पुस्तक, लेख और ताम्रपत्रों का सारांश तैयार करने में उनको अपने गुरु यति ज्ञानचन्द्र पर भरोसा रखना पड़ता था। ज्ञानचन्द्र कविता के प्रेमी थे। अतः वे कविता की भाषा के तो ज्ञाता थे परन्तु प्राचीन लेखों को भलीभाँति नहीं पढ़ सकते थे। पं. ज्ञानचन्द्र जी के संस्कृत ज्ञान पर आधारित रहने से टॉड साहब के लेखन में बहुत सी अशुद्धियाँ रह गईं। उन्होंने जहाँ कई शब्दों के मनमाने अर्थ किए हैं, वहीं कई प्राचीन स्थानों के प्राचीन नाम कल्पित धर दिए हैं, जैसे- ‘शील‘ का अर्थ ‘पर्वत‘, ‘कुकुत्थ‘ का अर्थ ‘कुश सम्बंधी‘, ‘बृहस्पति‘ का अर्थ‘बैल का मालिक‘ किया है तथा ‘मंडोर‘ को ‘मंदोदरी‘, ‘जालोर‘ को ‘जालीन्द्र‘, ‘नरवर‘ को ‘निस्सिद्‘ बता दिया है। +स्पष्ट है कि पाश्चात्य विद्वानों के संस्कृत के अधकचरे ज्ञान के कारण भी भारतीय इतिहास में अनेक विकृतियाँ पैदा हुई हैं। + +भारत के इतिहास में विकृतियाँ की गईं, क्या-क्या?: +लौटें, भारतीय इतिहास का विकृतीकरण +ईसा की 16वीं - 17वीं शताब्दी में व्यापारी बनकर आएअंग्रेज 18वीं शताब्दी के अन्त तक आते-आते 200 वर्ष के कालखण्ड में छल से, बल से औरकूटनीति से भारतीय नरेशों की सत्ताएँ हथिया कर देश की प्रमुख राजशक्ति ही नहीं बन गए वरन वे देश की बागडोर संभालने में भी सफल हो गए। अपनी सत्ता को ऐतिहासिक दृष्टि से उचित ठहराने के लिएतत्कालीन कम्पनी सरकार ने भारत के इतिहास में विकृतियाँ लाने के लिए विभिन्न प्रकार की भ्रान्तियों का निर्माण कराकर उनको विभिन्न स्थानों पर विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विभिन्न प्रकार से प्रचारित कराया। यहाँ कुछ विकृतियों का उल्लेख 4 खण्डों, यथा- ऐतिहासिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक और विविध में वर्गीकृत करके किया जा रहा है- +ऐतिहासिक. +आर्य लोग भारत में बाहर से आए. +हाल ही में उत्तर प्रदेश के सिनौली से खुदाई में मिले महाभारत कालीन रथ व कंकाल को भारतीय पुरातत्व विभाग की टीम ने जब जांचा तो पाया कि यह रथ व कंकाल 5000 साल पुराने हैं यानी 3000 ई०पू० के हैं। जिससे साफ पता चलता है कि अज्ञानी मैक्समूलर द्वारा दी गयी थ्योरी बिल्कुल आधारहीन है कि आर्य लोग बाहर से भारत में आये,और हंटर कमीशन व अन्य कुटिल अंग्रेजों ने किस तरह से भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथो में मिलावट करवायी। +अंग्रेजों ने भारत में विदेश से आकर की गई अपनी सत्ता की स्थापना को सही ठहराने के उद्देश्य से ही आर्यों के सम्बन्ध में, जो कि यहाँ केमूल निवासी थे, यह प्रचारित कराना शुरू कर दिया कि वे लोग भारत में बाहर से आए थे और उन्होंने भी बाहर से ही आकर यहाँ अपनी राज्यसत्ता स्थापित की थी। फिर उन्होंने आर्यों को ही नहीं, उनसे पूर्वआई नीग्रीटो, प्रोटो आस्ट्रोलायड, मंगोलाभ, द्रविड़ आदि विभिन्न जातियों को भी भारत के बाहर से आने वालीबताया। +यह ठीक है कि पाश्चात्य विद्वान और उनके अनुसरण में चलने वाले भारतीय इतिहासकार ‘आर्यों‘ को भारत में बाहर से आने वाला भले ही मानते हों किन्तु भारत के किसी भी स्रोत से इस बात की पुष्टि नहीं होती। अनेक भारतीय विद्वान इसे मात्र एक भ्रान्ति से अधिक कुछ नहीं मानते। भारत के अधिकांश वैदिक विद्वान इस बात पर एकमत हैं कि यहाँ की किसी भी प्राचीन साहित्यिक या अन्य प्रकार की रचना में कोई भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता, जिससे यह सिद्ध होता हो कि आर्यों ने बाहर से आकर यहाँ राज्य सत्ता स्थापित की थी। +आर्यों के आदि देश, आर्य भाषा, आर्य सभ्यता औरसंस्कृति के सम्बन्ध में सबसे प्राचीन और प्रामाणिक साक्ष्य ऋग्वेद है। यह आर्यों का ही नहीं विश्वका सबसे प्राचीन ग्रन्थ माना जाता है किन्तु इसमें जितना भी भौगोलिक या सांस्कृतिक उल्लेख आता है वहसब इसी देश के परिवेश का है। ‘ऋग्वेद‘ के नदी सूक्त में एक भी ऐसी नदी का नाम नहीं मिलता जो भारत के बाहर की हो। इसमें गंगा, सिन्धु, सरस्वती आदि का ही उल्लेख आता है। अतः इन नदियों सेघिरी भूमि ही आर्यों का देश है और आर्य लोग यहीं के मूल निवासी हैं। यदि आर्य कहीं बाहर से आए होते तो कहीं तो उस भूमि अथवा परिवेश का कोई तो उल्लेख ऋग्वेद में मिलता। +इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि आर्यों ने भारतको ही अपनी मातृभूमि, धर्मभूमि और कर्मभूमि मानकर जिस रूप में अपनाया है वैसा किसी भी पराए देश का निवासी उसको नहीं अपना सकता था। यहाँ यह भी बात ध्यान देने योग्य है कि आर्यों ने सप्तसिन्धु के बाहर के निवासियों को बहुत ही घृणापूर्वक ‘म्लेच्छ‘ कहकर पुकारा है - ‘म्लेच्छ देश ततः परः।‘ (मनु.) क्या ऐसा कहने वाले स्वयं म्लेच्छ देश से आने वाले हो सकते हैं, ऐसा नहीं हो सकता। +दूसरी ओर भारत के इतिहास लेखन के क्षेत्र में 18वीं और 19वीं शताब्दी में आने वाले पाश्चात्य विद्वानों ने अपने तर्कों के सामने, भले ही वे अनर्गल ही क्यों न रहे हों, इन बातों पर ध्यान नहीं दिया। उल्टे अपने कथ्यों से सभी को इस प्रकार का विश्वास दिलाने का पूरा प्रयास किया कि आर्य लोग भारत में बाहर से ही आए थे जबकि भारत के संदर्भ में विश्व केभिन्न-भिन्न देशों में मिल रहे प्राचीन ऐतिहासिक एवं साहित्यिक ब्योरों तथा उत्खननों में मिल रही पुरातात्विक सामग्रियों का जैसे-जैसे गहन अध्ययन होता जा रहा है, वैसे-वैसे विद्वान लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे हैं कि भारत ही आर्यों का मूल स्थान है और यहीं से आर्य बाहर गए थे। वे लोग बाहर से यहाँनहीं आए थे। +इस दृष्टि से विदेशी विद्वानों में से यूनान के मेगस्थनीज, फ्राँस के लुई जैकालियट, इंग्लैण्ड के कर्जन, मुरो, एल्फिन्सटन आदि तथा देशी विद्वानों में से स्वामी विवेकानन्द, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. सम्पूर्णानन्द, डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा हैकि आर्य भारत में विदेशी नहीं थे। दूसरी ओर मैक्समूलर, पोकॉक, जोन्स, कुक टेलर, नारायण पावगी, भजनसिंह आदि अनेक विदेशी और देशी विद्वानों का तो यह मानना रहा है कि आर्य विदेशों से भारत में नहीं आए वरन भारत से ही विदेशों में गए हैं। +जिस समय यूरोप के अधिकांश विद्वान और भारत के भी अनेक इतिहासकार यह मान रहे थे कि आर्य भारत में बाहर से आए, तभी 1900 ई. में पेरिससम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द जी ने यह सिंह गर्जना की थी कि यह एक मूर्खतापूर्ण प्रलाप मात्र है कि भारत में आर्य बाहर से आए हैं - +आर्यों के भारत से विदेशों में जाने की दृष्टि से जब प्राचीन भारतीय वाङ्मय का अध्ययन किया जाता है तो ज्ञात होता है कि अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत के लोग एक-दो बार नहीं वरन बार-बार विदेश जाते रहे हैं। इनका प्रव्रजन कभी राजनीतिक कारणों से, यथा- ऋग्वेद और जेन्द अवेस्ता के अनुसार देवयुग में इन्द्र की सत्ता के भय से त्वष्टा का और विष्णुपुराण के अनुसार महाराजा सगर से युद्ध में हार जाने पर व्रात्य बना दिए जाने से शक, काम्बोज,पारद आदि क्षत्रिय राजाओं का और कभी सामाजिक कारणों, यथा- ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार विश्वामित्र के 50 पुत्रों के निष्कासन आदि से हुआ है। महाभारत युद्ध में मृत्यु के भय या हार जाने पर अपमानित महसूस करने पर आत्मग्लानी के और श्रीकृष्ण जी के स्वर्गारोहण से पूर्व हुए यादवी संघर्ष के फलस्वरूप भी बहुत से लोग भागकर देश के बाहर गए थे। यही नहीं, कभी-कभी स्वेच्छा से व्यापार, भ्रमण, धर्म प्रसार और उपनिवेश-निर्माण के हेतु भी भारतीयों ने प्रव्रजन किया है। +आर्यों ने भारत के मूल निवासियों को युद्धों में हराकर दास या दस्यु बनाया. +अंग्रेजों द्वारा अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ‘बांटों और राज्य करो‘ की नीति के अनुसार फैलाई गई विभिन्न भ्रान्तियों में से ही यह भी एक थी। सर्वप्रथम यह विचार ‘कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इण्डिया‘ में प्रतिपादित किया गया था कि आर्य लोगों ने विदेशों से आकर भारत पर आक्रमण करके यहाँ के मूल निवासी द्रविड़, कोल, भील, सन्थाल आदि को अपनी शक्ति के बल पर पराजित करके जीता और अपमानित करके उन्हें दास या दस्यु बनाया। +आर्यों द्वारा बाहर से आकर स्थानीय जातियों को जीतने के प्रश्न पर भारत के प्रसिद्ध विधिवेत्ता डॉ. अम्बेडकर ने लिखा है कि ऋग्वेद में ‘दास‘ और ‘दस्यु‘ को आर्यों का शत्रु अवश्य बताया गया है और उसमें ऐसे मंत्र भी आए हैं, जिसमें वैदिक ऋषियों ने अपने देवताओं से उनको मारने और नष्ट करने की प्रार्थनाएँ भी की हैं किन्तु इससे भारत में आर्यों के आक्रमण के पक्ष में निर्णय नहीं किया जा सकता। उन्होंने ऋग्वेद के आधार पर इस सम्बन्ध में तीन तर्क प्रस्तुत किए हैं- +डॉ. अम्बेडकर ने अपने मत की पुष्टि में ऋग्वेद के मंत्र सं. 10.22.8 को विशेष रूप से उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है - +डॉ. साहब का कहना है कि ऐसे मंत्रों के सामने दासों या दस्युओं को आर्यों द्वारा विजित करने के सिद्धान्त को किसी प्रकार से नहीं माना जा सकता। अपने कथन की पुष्टि में डॉक्टर साहब ने श्री पी. टी. आयंगर के लेख का एक उद्धरण दिया है- +दास या दस्यु कौन थे, इस संदर्भ में कुल्लूक नाम के एक विद्वान का यह कथन, जो उसने मनुस्मृति की टीका में लिखा है, उल्लेखनीय है- ‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र जाति में, जो क्रियाहीनता के कारण जातिच्युत हुए हैं, वे चाहे म्लेच्छभाषी होंया आर्यभाषी, सभी दस्यु कहलाते हैं। +ऋग्वेद का यह मंत्र - +कर्महीन, मननहीन, विरुद्धव्रती और मनुष्यता से हीन व्यक्तिको दस्यु बताकर उसके वध की आज्ञा देता है और ‘दास‘ तथा ‘दस्यु‘ को अभिन्नार्थी बताता है। यदि दस्यु का अर्थ आज की भाँति दास या सेवक होता तो ऐसी आज्ञा कभी नहीं दी जाती। +ऐतरेय ब्राह्मण में एक स्थान पर कहा गया है - ‘‘तुम्हारे वंशधर भ्रष्ट होंगे। यही (भ्रष्ट या संस्कार विहीन) आन्ध्र, पुण्ड्र, शवर आदि उत्तर दिक् वासी अनेकजातियाँ हैं‘‘ दूसरे शब्दों में सभ्यता और संस्कार विहीन लोगों की वंश परम्पराएँ चलीं और स्वतः ही अलग-अलग जातियाँ बन गईं, इन्हें किसी ने बनाया नहीं। आज की जरायमपेशा जातियों में ब्राह्मण भी हैं और राजपूत भी। +श्रीरामदास गौड़ कृत ‘हिन्दुत्व‘ के पृष्ठ 772 पर दिए गएउक्त उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि दस्यु या दास कैसे बने ? अतः आर्यों द्वारा भारत केमूल निवासियों को हराकर उन्हें दास या दस्यु बनाने की बात एक भ्रम के अतिरिक्त कुछ नहीं। +भारत के मूल निवासी द्रविड़. +अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत में यह कोई जानताही नहीं था कि द्रविड़ और आर्य दो अलग-अलग जातियाँ हैं। यह बात तो देश में अंग्रेजों के आने के बाद ही सामने लाई गई। अंग्रेजों को यह कहना भी इसलिए पड़ा क्योंकि वे आर्यों को भारत में हमलावर बनाकर लाए थे। हमलावर के लिए कोई हमला सहने वाला भी तो चाहिए था। बस, यहीं से मूल निवासी की कथा चलाई गई और इसे सही सिद्ध करने के उद्देश्य से ‘द्रविड़‘ की कल्पना की गई। अन्यथाभारत के किसी भी साहित्यिक, धार्मिक या अन्य प्रकार के ग्रन्थ में इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता कि द्रविड़ और आर्य कहीं बाहर से आए थे। यदि थोड़ी देर के लिए इस बात को मान भी लियाजाए कि आर्यों ने विदेशों से आकर यहाँ के मूल निवासियों को युद्धों में हराया था तो पहले यह बताना होगा कि उन मूल निवासियों के समय इस देश का नाम क्या था ? क्योंकि जो भी व्यक्ति जहाँ रहते हैं, वे उस स्थान का नाम अवश्य रखते हैं। जबकि किसी भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थ या तथाकथित मूल निवासियों की किसी परम्परा या मान्यता में ऐसे किसी भी नाम का उल्लेख नहीं मिलता। +‘संस्कृति के चार अध्याय‘ ग्रन्थ के पृष्ठ 25 पर रामधारीसिंह ‘दिनकर‘ का कहना है कि जाति या रेस (race) का सिद्धान्त भारत में अंग्रेजों के आने के बाद ही प्रचलित हुआ, इससे पूर्व इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि द्रविड़ और आर्य जाति के लोग एक दूसरे को विजातीय समझते थे। वस्तुतः द्रविड़ आर्यों के ही वंशज हैं। मैथिल, गौड़, कान्यकुब्ज आदि की तरह द्रविड़ शब्द भी यहाँ भौगोलिक अर्थ देने वाला है। उल्लेखनीय बात तो यह है कि आर्यों के बाहरसे आने वाली बात को प्रचारित करने वालों में मि. म्यूर, जो सबके अगुआ थे, को भी अन्त में निराश होकर यह स्वीकार करना पड़ा है कि - ‘‘किसी भी प्राचीन पुस्तक या प्राचीन गाथा से यह बात सिद्ध नहीं की जा सकती कि आर्य किसी अन्य देश से यहाँ आए।‘‘ (‘म्यूर संस्कृत टेक्स्ट बुक‘ भाग-2, पृष्ठ 523) +इस संदर्भ में टामस बरो नाम के प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता का ‘क्लारानडन प्रेस, ऑक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित और ए. एल. भाषम द्वारा सम्पादित ‘कल्चरल हिस्ट्री ऑफ इण्डिया‘ में छपे ‘दि अर्ली आर्यन्स‘ में उद्धृत यह कथन उल्लेखनीय है कि- ‘‘आर्यों के भारत पर आक्रमण का न कहीं इतिहास में उल्लेख मिलता है और न इसे पुरातात्त्विक आधारों पर सिद्ध किया जा सकता है‘‘ (‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता‘, पृष्ठ-126 पर उद्धृत) +इस संदर्भ में रोमिला थापर का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि ‘‘आर्यों के संदर्भ में बनी हमारी धारणाएँ कुछ भी क्यों न हों, पुरातात्त्विक साक्ष्यों से बड़े पैमाने पर किसी आक्रमण या आव्रजन का कोई संकेत नहीं मिलता ... गंगा की उपत्यका के पुरातात्त्विक साक्ष्यों से यह प्रकट नहीं होता कि यहाँ के पुराने निवासियों को कभी भागना या पराजित होना पड़ा था।‘‘ (‘आर्यों का आदि देश और उनकी सभ्यता‘, पृ. 113 पर उद्धृत) +अंग्रेजों ने इस बात को भी बड़े जोर से उछाला है कि ‘आक्रान्ता आर्यों‘ ने द्रविड़ों के पूर्वजों पर नृशंस अत्याचार किए थे। वाशम, नीलकंठ शास्त्री आदि विद्वान यद्यपि अनेक बार यह लिख चुके हैं कि ‘आर्य‘ और ‘द्रविड़‘ शब्द नस्लवाद नहीं है फिर भी संस्कृत के अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर बने लेखक, साम्राज्यवादी प्रचारक और राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धिको सर्वोपरि मानने वाले नेता इस विवाद को आँख मींच कर बढ़ावा देते रहे हैं। पाश्चात्य विद्वानोंने द्रविड़ों की सभ्यता को आर्यों की सभ्यता से अलग बताने के लिए ‘हड़प्पा कालीन सभ्यता‘ को एक बड़े सशक्तहथियार के रूप में लिया था। पहले तो उन्होंने हड़प्पाकालीन सभ्यता को द्रविड़ सभ्यता बताया किन्तु जब विभिन्न विद्वानों की नई खोजों से उनका यह कथन असत्य हो गया तो वे कहने लगे कि हड़प्पा के लोग वर्तमान ‘द्रविड़‘ नहीं, वे तो भूमध्य सागरीय ‘द्रविड़‘ थे - अर्थात वे कुछ भी थे किन्तु आर्य नहीं थे। इस प्रकार की भ्रान्तियाँ जान-बूझकर फैलाई गई थीं। जबकि सत्य तो यह है कि हड़प्पा की सभ्यता भी आर्य सभ्यता का ही अंश थी और आर्य सभ्यता वस्तुतः इससे भी हजारों-हजारों वर्ष पुरानी है। +इससे यही सिद्ध होता है कि आर्य और द्रविड़ अलग नहीं थे। जब अलग थे ही नहीं तो यह कहना कि भारत के मूल निवासी आर्य नहीं द्रविड़ थे, ठीक नहीं है। अब समय आ गया है कि आर्यों के आक्रमण और आर्य-द्रविड़ भिन्नता वाली इस मान्यता को विभिन्न नई पुरातात्विक खोजों और शोधपरक अध्ययनों के प्रकाश में मात्र राजनीतिक ‘मिथ‘ मानकर त्याग दिया जाना चाहिए। +दासों या दस्युओं को आर्यों ने अनार्य बनाकर शूद्रकी कोटि में डाला. +भारतीय समाज को जाति, मत, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर बांटकर उसकी एकात्मता छिन्न-भिन्न करने के लिए ही अंग्रेजी सत्ता ने यह भ्रान्ति फैलाई थी कि आर्यों ने बाहर से आकर यहाँ पर पहले से रह रहीं जातियों को युद्धों में हराकर दास या दस्यु बनाकर बाद में अपनी संस्कृति में दीक्षित कर उन्हें शूद्र की कोटि में डाल दिया। इस संदर्भ मेंकई प्रश्न उठते हैं कि क्या दास या दस्यु आर्येतर जातियाँ थीं, यदि नहीं, तो इन्हें अनार्य घोषित करने के पीछे अभिप्राय क्या था और क्या शूद्र कोटि भारतीय समाज में उस समय घृणित या अस्पृश्य अथवा छोटी मानी जाती थी ? इन प्रश्नों पर पृथक-पृथक विचार करना होगा। +क्या दास या दस्यु आर्येतर जातियाँ थीं? - दास या दस्यु आर्येतर जातियाँ थीं या नहीं, यह जानने के लिए पहले यह देखना होगा कि आर्य वाङ्मय में दास या दस्यु शब्द का प्रयोग किस-किस अर्थ में अथवा किस अभिप्राय से किया गया है। आर्यों के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद के मंत्र संख्या 1. 5. 19 तथा 9. 41. 2 में दास या दस्यु शब्द का प्रयोग अयाज्ञिकऔर अव्रतों के लिए और मंत्र संख्या 1. 51. 8 में इसका प्रयोग शत्रु, चोर, डाकू अथवा धार्मिक क्रियाओंका विनाश करने वालों के लिए किया गया है। मनुस्मृति के 10.4 में कम्बोज आदि जातियों के पतित हो जाने वाले लोगों को दास या दस्यु कहा गया है। महाभारत के भीष्म पर्व में निष्क्रिय व्यक्तियों को दास या दस्यु शब्द से अभिहित किया गया है। स्पष्ट है कि इन शब्दों का प्रयोग सभी जगह कुछ विशिष्ट प्रकार के लोगों के लिए ही किया गया है, किसी जाति विशेष के रूप में नहीं। +इनको अनार्य बनाने के पीछे क्या अभिप्राय रहा? -आर्य वाङ्मय में स्थान-स्थान पर ‘अनार्य‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। वाल्मीकि रामायणके 2. 18. 31 में दशरथ की पत्नी कैकेई के लिए ‘अनार्या‘ शब्द का प्रयोग किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में ‘‘अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन‘‘ के माध्यम से अकीर्तिकर कार्यों के लिए ‘अनार्यजुष्ट‘ जैसे शब्दोंका प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद के मंत्र संख्या 7. 6. 3 के अनुसार अव्रतियों, अयाज्ञिकों, दंभिओं, अपूज्यों और दूषित भाषा का प्रयोग करने वालों के लिए ‘मृघ्रवाच‘ शब्द का प्रयोग किया गया है अर्थात किसी भी आर्य ग्रन्थ में ‘अनार्य‘ शब्द जातिवाचक के रूप में प्रयुक्त नहीं हुआ है। स्पष्ट है कि ऋग्वेद आदि में स्थान-स्थान पर आए अनार्य, दस्यु, कृष्णगर्भा, मृघ्रवाच आदि शब्द आर्यों से भिन्न जातियों के लिए न होकर आर्य कर्मों से च्युत व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त हुए हैं अर्थात ‘अनार्य‘ शब्द जातिवाचक रूप में कहीं भी प्रयोगमें नहीं लाया गया। +क्या शूद्र कोटि भारतीय समाज में उस समय घृणित या अस्पृश्य अथवा छोटी मानी जाती थी? - प्राचीन काल में भारतीय समाज के चारों वर्ण यथा- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र परस्पर सहयोगी थे। एक वर्ण दूसरे में जा सकता था। उस समय वर्ण नहीं समाज में उसकी उपयोगिता कर्म की प्रमुखता से थी। भारत के किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में कहीं भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता, जहाँ कहा गया हो कि शूद्र घृणित या अस्पृश्य या छोटा होता है या उच्च वर्ग बड़े होते हैं। समाज में सभी का समान महत्त्व था। +चारों वर्णों को समाज रूपी शरीर के चार प्रमुख अंग माना गया था, यथा- ब्राह्मण-सिर, क्षत्रिय-बाहु, वैश्य-उदर और शूद्र-चरण। चारों वर्णों की समान रूप से अपनी-अपनी उपयोगिता होते हुए भी शूद्र की उपयोगिता समाज के लिए सर्वाधिक रही है।समाज रूपी शरीर को चलाने, उसे गतिशील बनाने और सभी कार्य व्यवहार सम्पन्न कराने का सम्पूर्ण भार वहन करने का कार्य पैरों का होता है। भारतीय समाज में शूद्रों के साथ छुआछूत या भेदभाव का व्यवहार, जैसा कि आजकल प्रचारित किया जाता है, प्राचीन काल में नहीं था। वैदिक साहित्य से तो यहभी प्रमाणित होता है कि ‘शूद्र‘ मंत्रद्रष्टा ऋषि भी बन सकते थे। ‘कवष ऐलुषु‘ दासीपुत्र अर्थात शूद्र थे किन्तु उनकी विद्वत्ता को परख कर ऋषियों ने उन्हें अपने में समा लिया था। वे ऋग्वेद की कई ऋचाओं के द्रष्टा थे। सत्यकाम जाबालि शूद्र होते हुए भी यजुर्वेद की एक शाखा के प्रवर्तक थे। (छान्दोगय 4.4) इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ‘‘शूद्रो को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है‘‘, ऐसा कहने वाले झूठे हैं। कारण शूद्रों द्वारा वेद-पाठ की तो बात ही क्या वे तो वेद के मंत्र द्रष्टा भी थे। सामाजिक दृष्टि से यह भेदभाव तो मुख्यतः मुसलमानों और अंग्रेजों द्वारा अपने-अपने राज्यकालों में इस देश के समाज को तोड़ने के लिए पैदा किया गया था। +वस्तुतः वर्ण व्यवस्था समाज में अनुशासन लाने के लिए,उसकी उन्नति के लिए और उसके आर्थिक विकास के लिए बनाई गई थी। +डॉ. अम्बेडकर ने अपनी रचना ‘शूद्र पूर्वी कोण होते‘ के पृष्ठ 66 और 74-75 पर बड़े प्रबल प्रमाणों से सिद्ध किया है कि शूद्र वर्ण समाज से भिन्न नहीं है अपितु क्षत्रियों का ही एक भेद है। संस्कृत साहित्य में सदाचरण या असदाचरण के आधार पर ही ‘आर्य‘, ‘अनार्य‘, ‘दस्यु‘, ‘दास‘ आदि संज्ञाओं का प्रयोग किया गया है। वास्तव में ‘आर्य‘ शब्द को सुसंस्कारों से सम्पन्न धर्माचरण करने वाले व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया गया है। +अतः यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय समाज को तोड़ने के लिए फैलाई गई एक भ्रान्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। +यूरोपवासी आर्यवंशी. +अंग्रेजी सत्ता के उद्देश्य की पूर्ति में लगे न केवल अंग्रेज विद्वान ही वरन उनसे प्रभावित और उनकी योजना में सहयोगी बने अन्य पाश्चात्य विद्वान, यथा- मैक्समूलर, वेबर, विंटर्निट्ज आदि भी शुरू-शुरू में भारत के इतिहास और साहित्य तथा सभ्यता और संस्कृति की प्राचीनता, महानता और श्रेष्ठता को नकारते ही रहे तथा भारत के प्रति बड़ी अनादर और तिरस्कार की भावना भी दिखाते रहे किन्तु जब उन्होंने देखा कि यूरोप के ही काउन्ट जार्नस्टर्जना, जैकालियट, हम्बोल्ट आदि विद्वानों ने भारतीय साहित्य, सभ्यता और संस्कृति की प्रभावी रूप में सराहना करनी शुरू कर दी है तो इन लेखकों ने इस डर से कि कहीं उनको दुराग्रही न मान लिया जाए, भारत की सराहनाकरनी शुरू कर दी। इन्होंने यह भी सोचा कि यदि हम यूँ ही भारतीय ज्ञान-भण्डार का निरादर करते रहेतो विश्व समाज में हमें अज्ञानी माना जाने लगेगा अतः इन्होंने भी भारत के गौरव, ज्ञान और गरिमा का बखान करना शुरू कर दिया। कारण यह रहा हो या अन्य कुछ, विचार परिवर्तन की दृष्टि से पाश्चात्य विद्वानों के लेखन में क्रमशः आने वाला अन्तर एकदम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है - +पहली स्थिति में इन विद्वानों ने भारत की निन्दा की, दूसरी स्थिति में सराहना की और बाद में तीसरी स्थिति में गुण-ग्राहकता दिखाई। इनके विचार किस प्रकार बदले हैं, यह बात निम्नलिखित उद्धरणों से अधिक स्पष्ट हो जाती है - +पहली स्थिति: तिरस्कार और निन्दा +(1) "India has been conquered once but India must be conquered again and the second conquest should be attained by education." .. भारत को एक बार जीता जा चुका है, अवश्य ही इसे पुनः जीतना होगा, किन्तु इस बार शिक्षा के माध्यम से।‘‘ +दूसरी स्थिति: सराहना : ‘‘जिसने बर्कले का दर्शन, उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्रोंका समान रूप से अध्ययन किया है वह विश्वास के साथ कहेगा कि उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्रोंके सामने वर्कले का दर्शन नितान्त अधूरा और बौना है।‘‘ +तीसरी स्थिति: गुणग्राहकता +(1) ‘‘यूरोपीय राष्ट्रों के विचार, वाङ्मय और संस्कृति के स्रोत तीन ही रहे हैं- ग्रीस, रोम तथा इज्राइल। अतः उनका आध्यात्मिक जीवन अधूरा है, संकीर्णहै। यदि उसे परिपूर्ण, भव्य, दिव्य और मानवीय बनाना है तो मेरे विचार में भाग्यशाली भरतखण्ड का ही आधार लेना पड़ेगा।‘‘ +(2) ‘‘आचार्य (शंकर) भाष्य का जब तक किसी यूरोपीय भाषा में सुचारु अनुवाद नहीं हो जाता तब तक दर्शन का इतिहास पूरा हो ही नहीं सकता। भाष्य की महिमा गाते हुए साक्षात सरस्वती भी थक जाएगी। +किन्तु इस तीसरी स्थिति के बावजूद भी यूरोपीय लेखकयह स्वीकार करने में असमर्थ रहे कि यूरोप वाले आर्यों (भारतीयों) से निचले स्तर पर रहे थे। अतः उन्होंने संस्कृत और लैटिन आदि भाषाओं के शब्दों की समानता को लेकर ‘‘एक ही भाषा के बोलनेवाले एक ही स्थान पर रहे होंगे‘‘ के सिद्धान्त की स्थापना की और इस प्रकार आर्यों से यूरोप वालों का रक्त सम्बन्ध स्थापित कर दिया। मैक्समूलर आदि अनेक पाश्चात्य विद्वानों ने पहले तो आर्यों को एक जाति विशेष बनाया और धीरे-धीरे एक के बाद एक कई ऐसे यूरोपीय विद्वान आए जिन्होंने आर्यों के गुणों से आकृष्ट होकर यूरोपीय लोगों को इस जाति विशेष से ही जोड़ दिया। इस संदर्भ में मैक्समूलर का कहना है कि- +मैक्समूलर ने यह भी कहा है कि - +कर्जन तो स्पष्ट रूप से कहता है कि- ‘‘गोरी जाति वालों का उद्गम स्थान भारत ही है।‘‘ (जनरल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी‘, खण्ड 16, पृ.172-200) +भारतीय मनीषी तो चाहे प्राचीन काल के रहे हों या अर्वाचीन काल के, यही मानते हैं कि आर्य कोई जाति विशेष नहीं है। +उक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि वेदों सहित समस्त प्राचीन भारतीय साहित्य में जहाँ भी ‘आर्य‘ शब्द का प्रयोग किया गया है, वहाँ ‘श्रेष्ठ व्यक्ति‘ के लिए ही किया गया है। इस श्रेष्ठत्त्व से भारतवासी ही आवेष्टित क्यों हों यूरोप वाले क्यों नहीं, अतः उन्होंने इस श्रेष्ठत्त्व से यूरोपवालों को महिमामंडित करने का सुअवसर हाथ से खोना नहीं चाहा और उन्हें भी आर्यवंशी बना दिया। +इस संदर्भ में जार्ज ग्रियर्सन का अपनी रिपोर्ट ‘ऑन दिलिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया‘ में उल्लिखित यह कथन दर्शनीय है - ‘‘भारतीय मानव स्कन्ध में उत्पन्न भारत-तूरानी अपने को वास्तविक अर्थ में साधिकार ‘आर्य‘ कह सकते हैं किन्तु हम अंग्रेजों को अपने को ‘आर्य‘ कहने का अधिकार नहीं हैं। +भारत की सभ्यता विश्व में सर्वाधिक प्राचीन नहीं. +भारत के पुराण तथा अन्य पुरातन साहित्य में स्थान-स्थान पर ऐसे उल्लेख मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि भारत में मानव सभ्यता का जन्म सृष्टि-निर्माण के लगभग साथ-साथ ही हो चुका था और धीरे-धीरे उसका विस्तार विश्व के अन्य क्षेत्रों में भीहोता रहा अर्थात भारतीय सभ्यता विश्व में सर्वाधिक प्राचीन तो है ही वह विश्वव्यापिनी भी रही है किन्तु आज का इतिहासकार इस तथ्य से सहमत नहीं है। वह तो इसे 2500 से 3000 वर्ष ई. पू. के बीच की मानता रहा है। साथ ही वह भारतीयों को घर घुस्सु और ज्ञान-विज्ञान से विहीन भी मानता रहा है किन्तु भारत मेंऔर उसकी वर्तमान सीमाओं के बाहर विभिन्न स्थानों पर हो रहे उत्खननों में मिली सामग्री के पुरातात्त्विक विज्ञान के आधार पर निकाले गए निष्कर्ष उसे प्राचीन से प्राचीनतर बनाते जा रहे हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खोजों से वह 4000 ई. पू. तक पहुँ च ही चुकी थी। मोतीहारी (मध्यप्रदेश) लोथल और रंगपुर (गुजरात) बहादुराबाद और आलमगीरपुर (उत्तरप्रदेश) आदि में हुए उत्खननों में मिली सामग्रीउसे 5000 ई. पू. से पुरानी घोषित कर रही है। तिथ्यांकन की कार्बन और दूसरी प्रणालियाँ इस काल सीमाको आगे से आगे ले जा रही हैं। इस संदर्भ में बिलोचिस्तान के मेहरगढ़ तथा भारत के धौलावीरा आदि की खुराइयाँ भी उल्लेखनीय हैं, जो भारतीय सभ्यता को 10000 ई. पूर्व की सिद्ध कर रही है। गुजरात के पास खम्भात की खाड़ी में पानी के नीचे मिले नगर के अवशेष इसे 10000 ई. पू. से भी प्राचीन बताने जा रहे हैं। +दूसरी ओर प्रो. डब्ल्यु ड्रेपर के कथन के अनुसार स्काटलैण्ड में 1.40 लाख वर्ष पूर्व के प्राचीन हाथियों आदि जानवरों के अवशेषों के साथ मानव की हड्डियाँ भी मिली हैं। केन्या के संग्रहालय के डॉ.लीके ने 1.70 लाख वर्ष पूर्व विद्यमान मानव का अस्थि पिंजर खोज निकाला है। अमेरिका के येल विद्यालय के प्रो. इ. एल. साइमन्स ने ऐसे मनुष्य के जबड़े की अस्थियों का पता लगाया है जो 1.40 करोड़ वर्ष पुरानी हैं। +ईसाई धर्म के अनुसार यह भले ही माना जा रहा हो किमानव सृष्टि का निर्माण कुछ हजार वर्ष पूर्व ही हुआ है किन्तु आज की नई-नई वैज्ञानिक खोजें इस काल को लाखों-लाखों वर्ष पूर्व तक ले जा रही हैं। पाश्चात्य जगत के एक-दो नहीं, अनेक विद्वानों का मानना है कि सृष्टि का प्रथम मानव भारत में ही पैदा हुआ है कारण वहाँ की जलवायु ही मानव की उत्पत्ति के लिए सर्वाधिक अनुकूल रही है। भारतीय पुरातन साहित्य में उल्लिखित इस तथ्य की कि भारतीय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता है, पुष्टि यहाँ पुरातत्त्व विज्ञान द्वारा की जा रही है। +आदि मानव जंगली और मांसाहारी. +मानव जाति का इतिहास लिखते समय आधुनिक इतिहासकारों, विशेषकर पाश्चात्यों के सामने जहाँ डार्बिन जैसे वैज्ञानिकों का मानव जीवन के विकास को दर्शाने वाले ‘विकासवाद‘ का सिद्धान्त था, जिसके अनुसार मानव का पूर्वज वनमानुष था और उसका पूर्वज बन्दर था और इस प्रकार पूर्वजों की गाथा को आगे बढ़ाकर कीड़े-मकौड़े ही नहीं एक लिजलिजी झिल्ली तक पहुँचा दिया जाता है, वहीं उनके सामने इंग्लैण्ड आदि देशों के पूर्वजों के जीवनयापन का ढंगभी था, जिसमें वे लोग जंगलों में रहते थे, पेड़ों पर सोते थे, पशुओं का शिकार करते थे और उनके मांस आदि का आहार करते थे। ऐसी स्थिति में उनके द्वारा यह मान लिया जाना अत्यन्त स्वाभाविक था कि आदि काल में मानव अत्यन्त ही अविकसित स्थिति में था। उसे न तो ठीक प्रकार से रहना आता था और न हीखाना-पीना। वह खुले आकाश के नीचे नदियों के किनारे अथवा पहाड़ों की गुफाओं में रहता था और आखेट में मारे पशु-पक्षियों के मांस से वह अपने जीवन का निर्वाह करता था। दूसरे शब्दों में इन इतिहासकारों की दृष्टि में आदि मानव जंगली और मांसाहारी था। +वस्तुतः उक्त निष्कर्ष को निकालते समय पाश्चात्य इतिहासकारों के समक्ष यूरोप के विभिन्न देशों के प्रारम्भिक मानवों के जीवन का चित्र था। जबकि मानव सृष्टि का प्रारम्भ इस क्षेत्र में हुआ ही नहीं था। आज विश्व के बड़े-बड़े विद्वान इस बात पर सहमत हो चुकेहैं कि आदि काल में मानव का सर्वप्रथम प्रादुर्भाव भारत में ही हुआ था। इस संदर्भ में फ्राँस के क्रूजर और जैकालिट, अमेरिका के डॉ. डान, इंग्लैण्ड के सर वाल्टर रेले के साथ-साथ इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड, भू-वैज्ञानिक, मेडलीकट, ब्लम्फर्ड आदि के कथन भी उल्लेखनीय हैं। +इस विषय पर प्राचीन वाङ्मय, चाहे वह भारत का हो या विदेशों का, जब अध्ययन किया जाता है तो आदि मानव के मांसाहारी होने की बात की पुष्टिनहीं हो पाती क्योंकि उसमें प्रारम्भिक मानव के भोजन के सम्बन्ध में जो तथ्य दिए गए हैं, उनसे यह बात बहुत ही स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है कि उस काल में मानव विशुद्ध निरामिष भोजी था। +प्राचीन भारतीय वाङ्मय. +भारत के प्राचीन वाङ्मय में वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, पुराण, चरकसंहिता आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनमें इस संदर्भ में आए ब्योरे इस प्रकार हैं - +ऋग्वेद - इस वेद में यज्ञ के संदर्भ में जितने भी शब्दों का प्रयोग किया गया है, उनमें से किसी के भी अर्थ का पशुवध या हिंसा से दूर तक का भी सम्बन्ध नहीं है। प्रत्युत ‘अध्वर‘ जैसे शब्दों से अहिंसा की ध्वनि निकलती है। यज्ञों में ‘अध्वर्यू‘ की नियुक्ति अहिंसा के उद्देश्य से ही की जाती है। वह इस बात का ध्यान रखता है कि यज्ञ में कायिक, वाचिक और मानसिककिसी भी प्रकार की हिंसा न हो। यही नहीं, ऋग्वेद के मंत्र 10.87.16 में तो मांसभक्षी का सर कुचल देने की बात भी कही गई है। +यजुर्वेद - इस वेद में पशु हत्या का निषेध करते हुए उनके पालन पर जोर दिया गया है। जब उनकी हत्या ही वर्जित है तो उनको खाने के लिए कैसे स्वीकारा जा सकता है ? +अथर्ववेद - इस वेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मांसाहारी, शराबी और व्यभिचारी एक समान ही मार डालने योग्य हैं। इसी वेद के मंत्र सं. 9.6.9 में तो और भी स्पष्ट रूप में कहा गया है - ‘गाय का दूध, दही, घी खाने योग्य है मांस नहीं।‘ +उक्त विवरण से स्पष्ट है कि वेदों में पशुओं को मारने और मांस खाने के लिए मना किया गया है अर्थात वैदिक आर्य लोग न तो मांस खाते थे और न ही पशुओं को मारते थे। दूसरे शब्दों में आदि कालीन मानव मांसाहारी नहीं था। +चरक संहिता - ‘चरक संहिता‘ के चिकित्सा स्थान 19.4 में लिखा हुआ है कि आदिकाल में यज्ञों में पशुओं का स्पर्श मात्र होता था। वे आलम्भ थे यानि उनका वध नहीं किया जाता था। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आदिकाल में पशुओं को मार कर खा जाना तो दूर यज्ञों में भी पशुओं का वध नहीं किया जाता था। +महाभारत के अनुशासन पर्व और मत्स्य पुराण में भी इस प्रकार के तथ्यों के उल्लेख आए हैं। ‘‘वाशिष्ट धर्मसूत्र‘‘ का अध्याय 21 भी इस दृष्टि से दर्शनीय है। इसके अनुसार उस काल में भी वृथा मांस भक्षण निषिद्ध था। +प्राचीन विदेशी वाङ्मय. +यहूदी और यवन - आर्यों की भाँति ही यहूदी और यवन लोग भी कालमान में चतुर्युगी में विश्वास करते थे। उनके यहाँ प्राचीन ग्रन्थों में लिखा मिलता है कि सुवर्ण युग (सत्युग) में मनुष्य निरामिष भोजी था। पं. भगवद्दत्त ने इन संदर्भ में एक उदाहरण दियाहै जिसमें बताया गया है कि- +हेरोडोटस- प्रसिद्ध इतिहासकार हेरोडोटस ने अपने ग्रन्थ के भाग-1 के पृष्ठ 173 पर लिखा है कि मिस्र के पुरोहितों का यह धार्मिक सिद्धान्त था कि वे यज्ञ के अतिरिक्त किसी जीवित पशु को नहीं मारते थे। स्पष्ट है कि यज्ञ के अलावा पशु हत्या वहाँ भी नहीं होती थी। +मेगस्थनीज- मेगस्थनीज के अनुसार आदिकाल में मानव पृथ्वी से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न आहार पर निर्भर था। (फ्रेग्मेन्ट्स, पृष्ठ 34) +भारतीय और विदेशी वाङ्मय के आधार पर दिए गए उक्त विवरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आदिकालीन मानव मांसाहारी नहीं वरन निरामिष भोजी था। +वेदों का संरचना काल 1500 से 1200 ईसापूर्व तक. +भारत की प्राचीन परम्परा के अनुसार वेदों के संकलन कासृष्टि निर्माण से बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध रहा है। कारण, उसका मानना है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जीने सृष्टि का निर्माण करके उसके संचालन के लिए जो विधान दिया है, वह वेद ही है। भारतीय कालगणना के अनुसार वर्तमान सृष्टि को प्रारम्भ हुए 1.97 अरब वर्ष से अधिक हो गए हैं, जबकि बाइबिल के आधारपर पाश्चात्य विद्वानों का मानना है कि वर्तमान सृष्टि को बने 6000 वर्ष से अधिक नहीं हुए हैं अर्थात इससे पूर्व कहीं भी कुछ भी नहीं था। इस संदर्भ में पाश्चात्य विद्वान एच. जी. वेल्स का ‘आउटलाइन ऑफ वर्ड हिस्ट्री (1934 ई.) के पृष्ठ 15 पर लिखा निम्नलिखित कथन उल्लेखनीय है- +आज भारत के ही नहीं, विश्व के अनेक देशों के विद्वान यह मानने लगे हैं कि मानव सभ्यता का इतिहास लाखों-लाखों वर्ष पुराना है और वह भारतसे ही प्रारम्भ होता है। विगत दो शताब्दियों में अनेक स्थानों पर हुए भू-उत्खननों में जो पुरानी से पुरानी सामग्री मिली है, उससे भी यही स्पष्ट होता है कि मानव सभ्यता लाखों-लाखों वर्ष पुरानी है। इसकी पुष्टि स्काटलैण्ड में मिली 1.40 लाख वर्ष पुरानी और अमेरिका में मिली 2 लाख वर्ष पुरानी मानव-हड्डियाँ कर रही हैं। अन्य अनेक स्थलों पर इनसे भी और अधिक प्राचीन सामग्री मिली है। जहाँ तक भारत में ही सृष्टि के प्रारम्भ होने की बात है तो इस विषय में प्राणी शास्त्र के ज्ञाता मेडलीकट और ब्लम्फर्ड, इतिहास विषय के विद्वान थोर्टन, कर्नल टॉड और सर वाल्टर रेले, भूगर्भशास्त्री डॉ. डान (अमेरिका) तथा जेकालियट, रोम्यांरोलां, रैनेग्वानां जैसे अन्य विद्वानों का भी मानना है कि सृष्टि का प्रारम्भ भारत में ही हुआ था क्योंकि मानव के जन्म और विकास के लिए आवश्यक समशीतोषण तापमान के चिह्न प्राचीनकाल में भारत में ही मिलते हैं। इन प्रमाणों के समक्ष पाश्चात्य जगत के उन विद्वानों के निष्कर्ष, जो 17वीं से19वीं शताब्दी के बीच विश्व के विभिन्न देशों में गए हैं और जिन्हें किसी भी देश का इतिहास तीन से पाँच हजार वर्ष पूर्व से अधिक नहीं लगा, कहाँ ठहरेंगे ? +आज यह सर्वमान्य तथ्य है कि ऋग्वेद भारत का ही नहीं विश्व का सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की रचना के लिए पाश्चात्य विद्वानों, यथा- मैक्समूलर, मैक्डोनल आदि ने 1500-1000 ई. पू. का काल निर्धारित किया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि पाश्चात्य विद्वानों ने विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थ की रचना का काल आज से मात्र 3000-3500 वर्ष पूर्वही निर्धारित किया है। यदि ऐसा है तो क्या लाखों वर्ष पूर्व से चलती आई मानव सभ्यता के पास अपना कोई लिखित साहित्य 3500 वर्ष से पूर्व था ही नहीं ? यह बात प्रामाणिक नहीं लगती, विशेषकर उस स्थिति में जबकि भारतीय कालगणना के अनुसार वर्तमान सृष्टि का निर्माण हुए एक अरब 97 करोड़ 29 लाख से अधिक वर्ष हो गए हैं और आज के वैज्ञानिकों द्वारा भी पृथ्वी की आयु 2 अरब वर्ष या इससे अधिक की निश्चित की जा रही है। यदि भारत के सृष्टि सम्वत, वैवस्वत मनु सम्वत आदि की बात छोड़ भी दें तो भी कल्याण के ‘हिन्दू संस्कृति‘ अंक के पृष्ठ 755 पर दी गई विदेशी सम्वतों की जानकारी के अनुसार चीनी सम्वत 9 करोड़ 60 लाख वर्ष से ऊपर का है, खताई सम्वत 8 करोड़ 88 लाख वर्ष से ऊपर का है, पारसी सम्वत एक लाख 89 हजार वर्ष से ऊपर का है, मिस्री सम्वत (इस सभ्यता को आज के विद्वान सर्वाधिक प्राचीन मानते हैं) 27 हजार वर्ष से ऊपर का है, तुर्की और आदम सम्वत 7-7 हजार वर्ष से ऊपर के हैं, ईरानी और यहूदी सम्वत क्रमशः 6 हजार और 5 हजार वर्ष से ऊपर के हैं। इतने दीर्घकाल में क्या किसी भी देश में कुछ भी नहीं लिखा गया? +यह ठीक है कि मैक्समूलर ने वेदों की संरचना के लिए जो काल निर्धारित किया था, उसे पाश्चात्य विद्वानों ने तो मान्यता दी ही, भारत के भी अनेक विद्वानों ने थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ उसे ही मान्यता प्रदान कर दी किन्तु ऐसे विदेशी और देशी विद्वानों की संख्या भी काफी रही है और अब निरन्तर बढ़ती जा रही है, जो 1500 ई. पू. में वेदों की रचना हुई है, ऐसा मान लेने को तैयार नहीं हैं। अलग-अलग विद्वानों ने वेदों के संकलन के लिए अलग-अलग काल निर्धारण किया है। कुछ विद्वानों का काल निर्धारण इस प्रकार है - +@ नवीनतम शोधों के अनुसार 3500 ई. पू. से आगे की मानी जा रही है +@@बिलोचिस्तान में बोलन दर्रे के निकट मेहरगढ़ की खुदाई में मिली सामग्री के लिए दी गई 7500-8000 ई. पू. की तिथि के आधार पर +@@@सरस्वती-नदी के आधार पर जिसके किनारों पर वेदों कासंकलन हुआ था। +इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जैसे-जैसे नए-नए पुरातात्त्विक उत्खनन होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे भारतीय सभ्यता प्राचीन से प्राचीनतर सिद्ध होती जा रही है और वैसे-वैसे ही विश्व के सर्वप्रथम लिखित ग्रन्थ वेद की प्राचीनता भी बढ़ती जा रही है क्योंकि यह भारत का सर्वप्रथम ग्रन्थ है। +भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियों की हेरा-फेरी. +भारतीय इतिहास का आधुनिक रूप में लेखन करने वाले पाश्चात्य विद्वानों ने इतिहास लिखते समय भारतीय वाङ्मय के स्थान पर भारत के सम्बन्ध में विदेशियों द्वारा लिखे गए ग्रन्थों को मुख्य रूप में आधार बनाया है। ऐसा करके उन्होंने अपने लेखन के क्षेत्र के आधार को सीमित करके उसे एकांगी बना लिया। भारतीय ग्रन्थों को उन्होंने या तो पढ़ा ही नहीं, यदि पढ़ा भी तो उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया और गहराई में जाए बिना ही उन्हें अप्रामाणिकता की कोटि में डाल दिया। इसी कारण भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियों में तरह-तरह की भ्रान्तियाँ पैदा हो गईं। उन भ्रान्तियों के निराकरण के लिए अर्थात अपने असत्य को सत्य सिद्ध करने के लिए उन लोगों को जबरन नई-नई और विचित्र कल्पनाएँ करनी पड़ीं, जो स्थिति का सही तौर पर निदान प्रस्तुत करने के स्थान पर उसे और अधिक उलझाने में ही सहायक हुईं। +भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियाँ- भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियों में अशुद्धता, मुख्यतः विंटर्निट्ज जैसे पाश्चात्य लेखकों केस्पष्ट रूप में यह मान लेने पर कि भारत के इतिहास के संदर्भ में भारतीयों द्वारा बताई गईं तिथियों की तुलना में चीनियों द्वारा बताई गई तिथियाँ आश्चर्यजनक रूप से उपयुक्त एवं विश्वसनीय है, अर्थात भारतीय आधारों का निरादर करके उनके स्थान पर चीन, यूनान, आदि देशों के लेखकों द्वारा भारत के संदर्भ में लिखे गए ग्रन्थों में उल्लिखित अप्रामाणिक तिथियों के अपनाने से आई हैं। इसी कारण जोन्स आदि को भारत के ऐतिहासिक तिथिक्रम में ऐसी कोई तिथि नहीं मिली, जिसके आधार पर वे भारत के प्राचीनइतिहास के तिथिक्रम का निर्धारण कर पाते। यह आश्चर्य की बात ही है कि भारतीय पुराणों में उल्लिखित एक ठोस तिथिक्रम के होते हुए भी जोन्स ने यूनानी साहित्य के आधार पर 327 ई. पू. में सेंड्रोकोट्टस के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य को जीवित मानकर 320 ई. पू. में उसके राज्यारोहण की कल्पना कर डाली और इसी तिथि को आधार बनाकर भारत का एक ऐसा पूरा ऐतिहासिक तिथिक्रम निर्धारित कर दिया जो कि भारतीय स्रोतों के आधार पर कहीं टिक ही नहीं पाता। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि एक देश विशेष का इतिहास लिखते समय विदेशी साहित्य का सहयोग लेना तो उचित माना जा सकता है किन्तु उसके आधार पर उस देश का ऐतिहासिक तिथिक्रम तैयार करना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। 320 ई. पू. के आधार पर भारत के ऐतिहासिक तिथिक्रम का निर्धारण करके और वह भी भारतीय स्रोतों को न केवल नकार कर वरन उसे कपोल-कल्पित तथा अप्रामाणिक बताकर पाश्चात्य लेखकों ने भारत की भावी संतति के साथ अन्याय ही नहीं किया, वरन विश्वासघात भी किया है। +विदेशी आधारों पर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भारतीयइतिहास की घटनाओं की जो तिथियाँ निर्धारित की गईं, उनकी पुष्टि किसी भी भारतीय स्रोत के आधार पर नहीं हो पाती। कुछ महत्त्वपूर्ण तिथियाँ इस प्रकार हैं - +आज की तथाकथित शुद्ध ऐतिहासिक परम्परा में यदि किसीघटना से सम्बंधित तिथि ही गलत हो तो अन्य विवरणों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। जबकि भारत के इतिहास में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा एक-दो नहीं अनेक स्थानों पर ऐसा किया गया है। ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने से ही नहीं उनके अशुद्ध काल-निर्धारण करने के कारण भी अनेक स्थानों पर घटनाओं की श्रृंखलाएँ टूट गई हैं। टूटी हुई श्रृंखलाओं को मिलाने के लिए आधुनिक इतिहासकारों को बे-सिर-पैर की विचित्र-विचित्र कल्पनाएँ करनी पड़ीं, जिससे स्थिति बड़ी ही हास्यास्पद बन गई, यथा- भारतीय इतिहास के कई लेखकों को भिन्न-भिन्न कालों में हुए दो-दो और कई कोतीन-तीन कालीदासों की कल्पना करनी पड़़ी है। इसी प्रकार से कई विद्वानों को दो-दो भास्कराचार्य ही नहीं प्रभाकर भी दो-दो मानने पड़े हैं। श्री चन्द्रकान्त बाली ने तो एक शूद्रक की जगह तीन-तीन शूद्रक बना दिएहैं (सरस्वती, मई 1973)। स्व. बालकृष्ण दीक्षित ने अपने ग्रन्थ ‘भारतीय ज्योतिष‘ के पृष्ठ 294पर दो बराहमिहिर हुए माने हैं। यही नहीं, कुछ विद्वानों ने शौनक ऋषि के समकालीन आश्वलायन को बुद्धका समकालीन आस्सलायन बता दिया है। इसी प्रकार प्रद्योत वंश के संस्थापक को अवन्ती का चण्ड प्रद्योत समझ लिया है। ऐसी कल्पनाओं के फलस्वरूप भारतीय इतिहास में विद्यमान भ्रान्तियों की लम्बी सूची दी जा सकती है। ये भ्रान्तियाँ इस बात की स्पष्ट प्रमाण हैं कि अशुद्ध और अप्रामाणिक तिथियों के आधार पर लिखा गया किसी देश का इतिहास कितनी मात्रा में विकृत हो जाता है। +साहित्यिक. +भारत में ऐतिहासिक सामग्री का अभाव. +भारतीय दृष्टि से इतिहास एक विद्या विशेष है। विद्या केरूप में इतिहास का उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में किया गया है। अथर्ववेद सृष्टि निर्माता ब्रह्मा जी की देन है, ऐसा माना जाता है। अतः भारत में ऐतिहासिक सामग्री की प्राचीनता असंदिग्ध है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि भारत में ऐतिहासिक सामग्री का अभाव था, वास्तविकता को जानबूझकर नकारने के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। व्यास शिष्य लोमहर्षण के अनुसार प्रत्येक राजा को अपने समय का काफी बड़ा भाग इतिहास के अध्ययन में लगाना चाहिए और राजमंत्री को तो इतिहास तत्त्व का विद्वान होना ही चाहिए। राजा के लिए प्रतिदिन इतिहास सुनना एक अनिवार्य कार्य था। यदि प्राचीन काल में ऐतिहासिक सामग्री नहीं थी तो वे लोग क्या सुनते थे? +भारत के इतिहास का आधुनिक रूप में लेखन करते समय मुख्य बात तो यह रही कि सत्ताधारी और उनके समर्थक इतिहासकार भारत की प्राचीन सामग्री को सही रूप से प्रकाश में लाना ही नहीं चाहते थे। इसीलिए उसको प्रकाश में लाने के लिए जितने श्रम और लगन से खोज करने की आवश्यकता थी, वह नहीं की गई। इस संदर्भ में कर्नल टॉड का ‘राजस्थान‘ नामक ग्रन्थ की भूमिका में यह कहना सर्वथा उपयुक्त लगता है कि- +जहाँ तक भारत में ऐतिहासिक ग्रन्थों का प्रश्न है, इस दृष्टि से निराशा की इतनी बात नहीं है, जितनी कि पाश्चात्य इतिहासकारों ने दर्शाई है। मूल ऐतिहासिक ग्रन्थों के अभाव के इस युग में भी एक दो नहीं अनेक ऐसे ग्रन्थ उपलब्ध हैं, जिनमें बड़ी मात्रा में भारत की ऐतिहासिक सामग्री सुलभ है। मुख्य प्रश्न तो संस्कृत आदि भाषाओं के ग्रन्थों में इतस्ततः बिखरी सामग्री को खोजकर निकालने और उसे सही परिप्रेक्ष्य में तथा उचित ढंग से सामने लाने का था, जो कि सही रूप में नहीं किया गया। +संस्कृत वाङ्मय. +संस्कृत वाङ्मय में से वैदिक और ललित साहित्य के कुछ ऐसे ग्रन्थों के नामों के साथ ज्योतिष, आयुर्वेद तथा व्याकरण के कुछ ग्रन्थों का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है, जिनमें महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उल्लेख सुलभ हैं। +वैदिक साहित्य - विभिन्न संहिताओं, उपसद्, ऐतरेय, जैमनीय, गोपथ, शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थों, विभिन्न आरण्यकों, उपनिषदों, वेदांग साहित्य, कल्पसूत्र, ग्रह्य सूत्र, स्मृति ग्रन्थों आदि में महाभारत काल से लाखों-लाखों वर्ष पूर्व की प्राचीन ऐतिहासिक घटनाएँ यथा- इन्द्र द्वारा किए गए विभिन्न युद्धों के वर्णन, इन्द्र-त्वष्टा संघर्ष, विश्वामित्र-वसिष्ठ की शत्रुता, इन्द्र द्वारा नहुष और दिवोदास को बल प्रदान करने जैसी विविध कथाएँ तथा अन्य विविध ऐतिहासिक सामग्री सुलभ है। +ललित साहित्य - महाकाव्य/काव्य ग्रन्थों, यथा- विभिन्न रामायणों, महाभारत, रघुवंश, जानकीहरण, शिशुपाल वध, दशावतार चरित आदि, विभिन्न ऐतिहासिक नाटकों, यथा- अमृतमन्थन समवकार, लक्ष्मी स्वयंवर, वैणीसंहार, स्वप्नवासवदत्ता आदि, विविध कथा ग्रन्थों, यथा- बन्धुमति, भैमरथी, सुमनोत्तरा, बृहदकथा, शूद्रककथा, तरंगवती, त्रैलोक्यसुन्दरी, चारुमति, मनोवती, विलासमती, अवन्तिसुन्दरी, कादम्बरी आदि के साथ क्षेमेन्द्र की बृहदकथामंजरी, सोमदेव का कथासरित्सागर तथा चरित ग्रन्थों, यथा- प्राचीन काल के पुरुरवा चरित, ययाति चरित, देवर्षि चरित और बाद के बुद्ध चरित, शूद्रक चरित, साहसांकचरित, हर्षचरित, विक्रमांकचरित, पृथ्वीराज रासो आदि में पर्याप्त मात्रा में ऐतिहासिक सामग्री सुलभ है। +ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ग्रन्थ - कश्यप, वशिष्ठ, पराशर, देवल आदि तथा इनसे पूर्व के ज्योतिष से सम्बंधित विद्वानों की रचनाएँ ऐतिहासिक काल निर्धारण के संदर्भ में बड़े महत्व की हैं। गर्ग संहिता, चरक संहिता में भी अनेक ऐतिहासिक सूत्र विद्यमान हैं। +अर्थ शास्त्र - कौटिल्य के ‘अर्थ शास्त्र‘ में चार स्थानों पर, यथा- अध्याय 6, 13, 20 और 95 में प्राचीन आर्य राजाओं के संदर्भ में बहुत सी उपयोगी बातें लिखी हैं जिनसे भारत के प्राचीन इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। +व्याकरण ग्रन्थ - ये ग्रन्थ केवल भाषा निर्माण के सिद्धान्तों तक ही सीमित नहीं रहे हैं, उनमें तत्कालीन ही नहीं, उससे पूर्व के समय के भी धर्म, दर्शन, राजनीति शास्त्र, राजनीतिक संस्थाओं आदि के ऐतिहासिक विकास पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है, जिससेवे इतिहास विषय पर लेखन करने वालों के लिए परम उपयोगी बन गए हैं। पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी‘, पतंजलि का महाभाष्य इस दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थ हैं। उत्तरवर्ती वैयाकरणों में ‘चान्द्रव्याकरण‘ और पं. युधिष्ठिर मीमांसक का ‘संस्कृत व्याकरण-शास्त्र का इतिहास‘, भी इस दृष्टि से उल्लेखनीयहै। +उक्त वैदिक और ललित साहित्य तथा ज्योतिष, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, व्याकरण आदि के ग्रन्थों के अलावा भी संस्कृत भाषा के बहुत से उल्लेखनीय ग्रन्थ हमारे यहाँ आज भी इतनी बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं कि उन सबका ब्योरा यहाँ दे पाना कठिन ही नहीं, असंभवहै। +ऐतिहासिक ग्रन्थ. +(अ) राजतरंगिणी - कश्मीरी कवि कल्हण कृत ‘राजतरंगिणी‘ में कश्मीर के राजवंशों का इतिहास दिया गया है। इसकी रचना 1148 ई. में हुई थी। विल्सन, स्मिथ आदि कई पाश्चात्य लेखकों ने भी इस पुस्तक में वर्णित विषय की बड़ी प्रशंसा की है। +‘राजतरंगिणी‘ में कश्मीर राज्य का इतिहास महाभारत युद्ध (3138 ई.पू.) से 312 वर्ष पूर्व से दिया गया है। इसमें 3450 ई. पू. से 1148 ई. (‘राजतरंगिणी‘ के रचनाकाल) तक का इतिहास सुलभ है। इसमें उल्लिखित विवरणों से भारत के प्राचीन इतिहास की अनेक घटनाओं और व्यक्तियों पर काफी प्रकाश पड़ता है। पं. कोटावेंकटचलम ने ‘क्रोनोलोजी ऑफ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सटक्टेड‘ में बताया है कि इसमें महाभारत से पूर्व हुए मथुरा के श्रीकृष्ण-जरासंघ युद्ध, महाभारत-युद्ध और महाभारत के बाद की कश्मीर की ही नहीं भारत की विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं, यथा- परीक्षितकी कश्मीर विजय, परीक्षित की मृत्यु, गौतम बुद्ध की मृत्यु, कनिष्क का राज्यारोहण आदि का उल्लेख भी मिलता है। ‘राजतरंगिणी‘ में दिए गए अनेक ब्योरों की पुष्टि भारतीय पुराणों में उल्लिखित ब्योरों सेहो जाती है, किन्तु भारत के इतिहास-लेखन में इस पुस्तक का कोई भी सहयोग नहीं लिया गया। उलटे फ्लीट आदि के द्वारा इसमें उल्लिखित तथ्यों को हर प्रकार से अप्रामाणिक सिद्ध करने का प्रयास किया गया। +(आ) नेपाल राजवंशावली- नेपाल की राजवंशावली में वहाँ के राजाओं का लगभग 5 हजार वर्षों का ब्योरा सुलभ है। पं. कोटावेंकटचलम ने इसवंशावली पर काफी कार्य किया है और उन्होंने मगध, कश्मीर तथा नेपाल राज्यों के विभिन्न राजवंशों के क्रमानुसार राजाओं का पूरा ब्योरा ‘क्रोनोलोजी ऑफ नेपाल हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘ के परिशिष्ट - 1 (पृ. 89 से 100) में दिया है। इसमें नेपाल के 104 राजाओं के 4957 वर्षों के राज्यकाल की जो सूची दी गई है, उसमें कलियुग के 3899वर्षों के साथ-साथ द्वापर के अन्तिम 1058 वर्षों का ब्योरा भी दिया गया है। इस वंशावली से भारतीय इतिहास के भी कई अस्पष्ट पन्नों, यथा- आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी के जन्म और विक्रम सम्वत के प्रवर्तक उज्जैन के महाराजा विक्रमादित्य के ऐतिहासिक व्यक्तित्व होने जैसे विषयों, को स्पष्ट करने में सहयोग मिल जाता है। +बौद्ध साहित्य. +बौद्धों का सबसे प्राचीन ग्रन्थ त्रिपिटक है। इसमें तीन पिटक, यथा- सुत्त, विनय और अभिधम्म हैं। इनसे उस समय के भारत के सामाजिक और धार्मिक जीवन पर बहुत प्रकाश पड़ता है। इनके अतिरिक्त विभिन्न राजाओं के समय में अनेक लेखकों द्वारा भी तरह-तरह के ग्रन्थों की रचना की गई, जिनमें तत्कालीन स्थिति का निरूपण व्यापक स्तर पर किया गया है। बौद्ध ग्रन्थ महाबग्ग, महापरिनिब्बान सुत्त, दिग्ध निकाय, निरयावली सुत्त, पेतवत्थु अट्ठकथा, सुमंगल विलासनी संयुत्त निकाय, विप्रा निकाय, सुत्त निपात, विमानवत्थु अट्ठकथा, थेरीगाथा, धम्मपदअट्ठकथा, मंझिम निकाय, अंगुत्तर निकाय आदि ग्रन्थों में बिम्बिसार, अजातशत्रु, दर्शक, उदायि आदि राजाओं के सम्बन्ध में बड़ी जानकारी है। ‘मिलिन्द पन्ह‘ में यूनानी राजा मिनांडर और बौद्ध भिक्षु नागसेन की जीवनी है। इसमें ईसा पूर्व पहली दो शताब्दियों के उत्तर-पश्चिमी भारत के जन-जीवन की झांकी मिलती है। ‘दिव्यावदान‘ में अनेक राजाओं की कथाएँ हैं। ‘मंजुश्रीमूलकल्प‘ भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय ग्रन्थ है। +जैन साहित्य. +बौद्ध साहित्य की तुलना में जैन साहित्य ऐतिहासिक दृष्टि से अधिक सशक्त है। यह सही है कि जैन साहित्य का संकलन काफी समय बाद में शुरू किया गया था। फिर भी अनेक राजाओं से सम्बंधित घटनाएँ, सम्वत तथा विभिन्न ऐतिहासिक घटनाएँ जैन साहित्य में विस्तार से मिलती हैं। इस दृष्टि से ‘उत्तराध्ययन‘ नामक ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं। विक्रम की चौथी और पाँचवीं शताब्दियों से लेकर नौवीं-दसवीं शताब्दियों तक जैनाचार्य जिनसेन, हरिभद्रसूरी, हेमचन्द्र आदि विद्वानों ने जैन मत की टूटी हुई प्राचीन परम्परा को पुनः जोड़ा और इतिहास का संग्रह किया। जैन रचनाओं के आधार पर भी प्राचीन भारत के इतिहास के अनेक टूटे हुए सूत्र जोड़े जा सकते हैं। इस दृष्टि से ई. पू. छठी शतादी में आचार्य यतिवृषभ द्वारा लिखित ग्रन्थ ‘तिलोयपण्णत्ति‘ सहित समय-समय पर लिखित अन्य अनेक ग्रन्थ, यथा- ‘उपासमदसाओं‘, ‘राजावलिकथा‘, ‘विविध तीर्थ कल्प‘, ‘जम्बुद्वीप प्रज्ञप्ति‘, ‘बृहत् कल्पसूत्र‘, ‘निर्युक्ति गाथा‘, ‘ज्ञाताधर्म कथा‘, ‘ओमवार्तिक सूत्र‘, ‘निशीथचूर्णि‘ आदि उल्लेखनीय है। +अन्य क्षेत्रीय ग्रन्थ. +सम्राट हर्षवर्धन के पश्चात देश में केन्द्रीय सत्ता समाप्त हो जाने पर देश छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। पंजाब, हिमाचल, गुजरात, राजस्थान आदि क्षेत्रों में स्थापित स्वतंत्र राज्यों में अपने-अपने राज्यानुसार ऐतिहासिक विवरण तैयार कराए गए। इन राज्यों में मिले कई विवरण प्राचीन इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। पंजाब और हिमाचल राज्यों में मिली राजवंशावलियोंमें कई प्राचीन ऐतिहासिक तथ्य मिलते हैं। +इसी प्रकार से गुजरात के राजवंशों के सम्बन्ध में भीकई ऐतिहासिक ग्रन्थ सुलभ हो चुके हैं। राजस्थान के विभिन्न राजवंशों के संदर्भ में वहाँ के ही राजकीय संग्रहालयों में अनेक रचनाएँ विद्यमान हैं जिनके संदर्भ में कर्नल टॉड ने अपने ग्रन्थ ‘राजस्थान‘ में संकेत दिए हैं। +इतनी सामग्री के होते हुए भी भारत में ऐतिहासिक सामग्री के अभाव की बात करनी कहाँ तक न्यायसंगत है, यह विचारणीय है। +भारत का प्राचीन साहित्य, यथा- रामायण, महाभारत, पुराण आदि 'मिथ'. +भारत में अंग्रेजों के आगमन से पूर्व सभी भारतीयों को अपने प्राचीन साहित्य में, चाहे वह रामायण हो या महाभारत, पुराण हो या अन्य ग्रन्थ, पूर्ण निष्ठा थी। इसके संदर्भ में ‘मिथ‘ की मिथ्या धारणा अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा ही फैलाई गई क्योंकि अपने उद्देश्य की प्राप्ति की दृष्टि से उनके लिए ऐसा करना एक अनिवार्यता थी। बिना ऐसा किए इन ग्रन्थों में उल्लिखित ऐतिहासिक तथ्यों की सच्चाई से बच पाना उनके लिए कठिन था। जबकि भारतीय ग्रन्थ यथा- रामायण, महाभारत, पुराण आदि भारत के सच्चे इतिहास के दर्पण हैं। इनके तथ्यों को यदि मान लिया जाता तो अंग्रेज लोग भारत के इतिहास-लेखन में मनमानी कर ही नहीं सकते थे। अपनी मनमानी करने के लिएही उन लोगों ने भारत के प्राचीन ग्रन्थों के लिए ‘मिथ‘, ‘अप्रामाणिक‘, ‘अतिरंजित‘, ‘अविश्वसनीय‘ जैसे शब्दों का न केवल प्रयोग ही किया वरन अपने अनर्गल वर्णनों को हर स्तर पर मान्यता भी दी और दिलवाई। फलतः आज भारत के ही अनेक विद्वान उक्त ग्रन्थों के लिए ऐसी ही भावना रखने लगे जबकि ये सभी ग्रन्थ ऐतिहासिक तथ्यों से परिपूर्ण हैं। +रामायण. +वाल्मीकि ने श्रीराम की कथा के माध्यम से उनसे पूर्व के लाखों-लाखों वर्षों के भारत के इतिहास को सामने रखते हुए भारत के स्वर्णिम अतीतका ज्ञान बड़े ही व्यापक रूप में वर्णित किया है। रामायण की कथा की ऐतिहासिकता के संदर्भ में महर्षिव्यास का महाभारत में यह कथन सबसे बड़ा प्रमाण है, जो उन्होंने वन पर्व में श्रीराम की कथा का उल्लेखकरते हुए कहा है - ‘राजन ! पुरातन काल के इतिहास में जो कुछ घटित हुआ है अब वह सुनो‘। यहाँ‘पुरातन‘ और ‘इतिहास‘, दोनों ही शब्द रामायण की कथा की प्राचीनता और ऐतिहासिकता प्रकट कर रहे हैं। यही नहीं, श्रीराम की कथा की ऐतिहासिकता का सबसे प्रबल आधुनिक युग का वैज्ञानिक प्रमाण अमेरिकाकी ‘नासा‘ संस्था द्वारा 1966 में और भारत द्वारा 1992 में छोड़े गए अन्तरिक्ष उपग्रहों ने श्रीराम द्वारा लंका जाने के लिए निर्मित कराए गए सेतु के समुद्र में डूबे हुए अवशेषों के चित्र खींचकर प्रस्तुतकर दिया है। +इस कथा की ऐतिहासिकता का ज्ञान इस बात से भी हो जाता है कि वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड के नवम् सर्ग के श्लोक 5 में बताया गया है कि जब हनुमान जी सीता जी की खोज के लिए लंका में रावण के भवन के पास से निकले तो उन्होंने वहाँतीन और चार दाँतों वाले हाथी देखे। श्री पी. एन. ओक के अनुसार आधुनिक प्राणी शास्त्रियों का मानना है कि ऐसे हाथी पृथ्वी पर थे तो अवश्य किन्तु उनकी नस्ल को समाप्त हुए 10 लाख वर्ष से अधिक समय हो गया। दूसरे शब्दों में श्रीराम की कथा दस लाख वर्ष से अधिक प्राचीन तो है ही साथ ही ऐतिहासिक भी है। +महाभारत. +यह महर्षि वेदव्यास की महाभारत युद्ध के तुरन्त बाद ही लिखी गई एक कालजयी कृति है। इसे उनकी ही आज्ञा से सर्पसत्र के समय उनके शिष्य वैषम्पायन ने राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय को सुनाया था, जिसका राज्यकाल कलि की प्रथम शताब्दी में रहा था अर्थात इसकी रचना को 5000 साल बीत गए हैं। यद्यपि इसकी कथा में एक परिवार के परस्पर संघर्ष का उल्लेख किया गया है परन्तु उसकी चपेट में सम्पूर्ण भारत ही नहीं अन्य अनेक देश भी आए हैं। फिर भी सारी कथा श्रीकृष्ण के चारों ओर ही घूमती रही है। यह ठीक है कि आज अनेकलेखक श्रीकृष्ण के भू-अवतरण को काल्पनिक मान रहे हैं किन्तु वे भारत के एक ऐतिहासिक पुरुष हैं, इसका प्रमाण भारत का साहित्य ही नहीं आधुनिक विज्ञान भी प्रस्तुत कर रहा है। +समुद्र में तेल खोजते समय भारतीय अन्वेषकों को 5000 वर्ष पूर्व समुद्र में डुबी श्रीकृष्ण जी की द्वारिका के कुछ अवशेष दीखे। खोज हुई और खोज में वहाँ मिली सामग्री के संदर्भ में 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मंत्री द्वारा लोकसभा में दिए गएएक प्रश्न के उत्तर में बताया गया था कि वहाँ मिली सामग्री में 3 छिद्रित लंगर, मोहरें, उत्कीर्णित जार, मिट्टी के बर्तन, फ्लेग पोस्ट के साथ-साथ एक जेटी (घाट) आदि उल्लेखनीय हैं। महाभारत युद्ध का कालभारतीय पौराणिक कालगणना के अनुसार आज से 5144-45 वर्ष पूर्व का है। द्वारिका की खोज ने भारतीय पुरातन साहित्य में उल्लिखित श्रीकृष्ण और द्वारिका के साथ-साथ महाभारत की कथा को ‘मिथ‘ की कोटि से निकाल कर इसे इतिहास भी सिद्ध कर दिया है। +पुराण. +पुराण भारतीय जन-जीवन के ज्ञान के प्राचीनतम स्रोतों में से हैं। इन्हें भारतीय समाज में पूर्ण सम्मान दिया जाता रहा है। पुराणों को श्रुति अर्थात वेदों के समान महत्त्व दिया गया है - ‘‘श्रुति-स्मृति उभेनेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम्‘‘ अर्थातश्रुति और स्मृति दोनों ही नेत्र हैं तथा पुराण हृदय। मनुस्मृति में श्राद्ध के अवसर पर पितरों को वेद और धर्मशास्त्र के साथ-साथ इतिहास और पुराणों को सुनाने के लिए कहा गया है। पुराणों की कथाओं का विस्तार आज से करोड़ों-करोड़ों वर्ष पूर्व तक माना जाता है। इनके अनुसार सृष्टि का निर्माण आज से 197 करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व हुआ था। पहले इस बात को कपोल-कल्पित कहकर टाला जाता रहा है किन्तु आज तोविज्ञान भी यह बात स्पष्ट रूप में कह रहा है कि पृथ्वी का निर्माण दो अरब वर्ष से अधिक पूर्व में हुआ था। दूसरे शब्दों में पुराणों में कही गई बात विज्ञान की कसौटी पर सही पाई गई है। अतः इनकी प्रामाणिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है। पुराणों से सृष्टि रचना, प्राणी की उत्पत्ति, भारतीय समाज के पूर्व पुरुषों के कार्य की दिशा, प्रयास और मन्तव्य के ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न मानव जातियों की उत्पत्ति, ज्ञान-विज्ञान, जगत के भिन्न-भिन्न विभागों के पृथक-पृथक नियमों आदि का भी पता चलता है। इनमें देवताओं और पितरों की नामावली के साथ-साथ अयोध्या, हस्तिनापुर आदि के राजवंशों का महाभारत युद्ध के 1504 वर्ष के बाद तक का वर्णन मिलता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि पुराणों की रचना महाभारत के 1500 वर्षों के बाद हुई है। विभिन्न भारतीय विद्वानों का कहना है कि पुराण तो प्राचीन हैं किन्तु उनमें राजवंशों के प्रकरण समय-समय पर संशोधित किए जाते रहे हैं। यही कारण है कि अलग-अलग पुराणों में एक ही वंश के राजाओं की संख्या में अन्तर मिल जाता है, क्योंकि यह वंश के प्रसिद्ध राजाओं की नामावली है वंशावली नहीं। उदाहरण के लिए- सूर्यवंश के राजाओं की संख्याविष्णु पुराण में 92, भविष्य में 91, भागवत में 87 और वायु में 82 दी गई है। लगता है संशोधनों केही समय इनमें कुछ बातें ऐसी भी समाविष्ट हो गई हैं जिनके कारण इनकी कुछ बातों की सत्यता पर ऊँगली उठा दी जाती है। +राजाओं और राजवंशों के वर्णन अतिरंजित एवं अवास्तविक. +महाभारत युद्ध के 200-250 वर्ष के पश्चात ही भारत की केन्द्रीय सत्ता हस्तिनापुर से निकल कर मगध राज्य में चली गई और मगध की गद्दी पर एक के पश्चात दूसरे वंश का अधिकार होता चला गया। इन सभी वंशों के राजाओं की सूचियाँ ‘वायु‘, ‘ब्रह्माण्ड‘, ‘मत्स्य‘, ‘विष्णु‘, ‘श्रीमद्भागवत्‘ आदि पुराणों में मिलती हैं। साथ ही ‘कलियुग राज वृत्तान्त‘ और ‘अवन्तिसुन्दरीकथा‘ में भी इन राजवंशावलियों का उल्लेख किया गया है। इन सभी ग्रन्थों में वर्णित राजाओं के नामों तथा उनकी आयु और राज्यकालों में कहीं-कहीं परस्पर अन्तर मिलता है किन्तु यह अन्तर ऐसा नहीं है जिसेठीक न किया जा सके। जबकि जोन्स आदि ने उनके सम्बन्ध में पूर्ण विवेचन किए बिना ही निम्नलिखित कारणों से उन्हें अतिरंजित, अविश्वसनीय और अवास्तविक कहकर नकार दिया- +सभी राजवंशों का अन्त लगभग समान रूप में हुआ है. +महाभारत के बाद मगध के प्रथम राजवंश बार्हद्रथ के पुत्र-विहीन अन्तिम नरेश रिपुंजय जो 50 वर्ष तक अशक्त रहकर राज्य चलाता रहा था, को उसके मंत्री ने मारकर राजगद्दी अपने पुत्र को दे दी। दूसरे राजवंश प्रद्योत के अन्तिम राजा नन्दिवर्धन को काशी के नरेश शिशुनाग ने मारकर गद्दी हथिया ली। नन्दवंश के अन्तिम राजा को चाणक्य ने मरवाकर चन्द्रगुप्त मौर्य को गद्दी दिला दी। मौर्य वंश के अन्तिम सम्राट वृहद्रथ जो 87 वर्ष तक राज्य करते रहने के कारण अत्यन्त अशक्त, दुर्बल और अकुशल हो चुका था, को उसके सेनापति पुष्यमित्र ने मारकर गद्दी पर अधिकार कर लिया। पुष्यमित्र के वंश के श्रीविहीन अन्तिम राजा देवभूति को उसके मंत्री ने मारकर कण्व वंश का शासन स्थापित किया। इस वंश केअन्तिम राजा सुशर्मा को उसके सेवक श्रीमुख ने मारकर राज्य संभाल लिया। आन्ध्र वंश के अन्तिम राजा चन्द्रश्री को और बाद में उसके पुत्र को मारकर आन्ध्रभृत्य वंश अर्थात गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त प्रथमने सत्ता संभाल ली। इसमें सन्देह नहीं कि उक्त सभी राजवंशों का अन्त अन्तिम राजा को मारकर ही किया गया है किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं हो सकता कि ये सब वृत्त झूठे हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि एक दो को छोड़कर अधिकांश राजाओं की मृत्यु का कारण उनकी दुर्बलता और निष्क्रियता रहा है, जो कि राजाओं के लिए विनाशकारी होती ही है। +एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं. +एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं- भारत के प्राचीन राजवंशों के कई राजाओं के नाम अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग मिलते हैं। इससे सन्देह होता है सही नाम कौन सा है और वह व्यक्ति हुआ भी है या नहीं। नामों में अन्तर कई कारणों से हुआ है, यथा- +राजाओं की आयु और राजवंशों की राज्यावधि बहुत अधिक दिखाई गई है. +इस संदर्भ में सबसे मुख्य बात तो यह है कि उस समय सामान्य लोगों कीआयु ही अधिक होती थी। फिर राजाओं की, जिन्हें सब प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं, अधिक आयुहोना अस्वाभाविक नहीं था। वैसे जितना ज्यादा शोर आयु और शासनकाल की अधिकता का मचाया गया है उतना है कुछ नहीं। बार्हद्रथ वंश से आन्ध्रवंश तक 8 वंशों के 97 राजाओं की कुल राज्यावधि 2811 वर्षके हिसाब से प्रति राजा के शासन की औसत 29 वर्ष बनती है। इनमें से 50 या अधिक वर्षों तक राज्य करने वाले केवल 17 राजा हुए हैं, जिनमें से 10 तो अकेले बार्हद्रथ वंश के ही हैं। इस स्थिति में यह औसत ठीक ही है। यह भी उल्लेखनीय है कि बार्हद्रथ और शुंग वंशों के राजाओं को छोड़कर अन्य वंशों में जिन राजाओं की आयु अधिक रही है, उनसे पहले और बाद वाले राजा की आयु कम रही है। स्पष्ट है कि पहले वाला राजा जल्दी मर गया और उसके कम आयु वाले पुत्र को गद्दी जल्दी मिल गई और वह ज्यादा समय तक राज्य करता रहा तो उसके पुत्र को शासन करने के लिए कम समय मिला। इंग्लैण्ड में विक्टोरिया को गद्दी छोटी आयु में मिल जाने से और अधिक वर्षों तक जीवित रहने के कारण उसके पुत्र एडवर्डअष्टम को राज्य करने के लिए केवल 7-8 वर्ष ही मिले थे। +इस प्रकार कहा जा सकता है कि राजाओं की आयु और शासन अवधि की अधिकता के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं है कि पूरी की पूरी सूचियों को अतिरंजित, अस्वाभाविक और अप्रामाणिक करार दे दिया जाए। +सिकन्दर का भारत पर आक्रमण 327 ई.पू. में हुआ और सेंड्रोकोट्टस (चन्द्रगुप्त मौर्य) 320 ईसापूर्व भारत का सम्राट बना. +भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने की दृष्टि से कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने यद्यपि आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए पहले भारतीय ग्रन्थों की ओर ध्यान दिया तो अवश्य किन्तु लक्ष्य भिन्न होने से वे ग्रन्थ उन्हें अपनी योजना में सहायक प्रतीतनहीं हुए। अतः उन्होंने भारत के संदर्भ में विदेशियों द्वारा लिखे गए ऐसे साहित्य पर निगाह डालनी प्रारम्भ कीजो उनके उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग दे सके। इस प्रयास में उन्हें यूनानी साहित्य में कुछ ऐसे तथ्य मिल गए जो उनके लिए उपयोगी हो सकते थे किन्तु वे तथ्य अपूर्ण, अस्पष्ट और अप्रामाणिक थे। अतः पहले तो उन्होंने सारा जोर उन्हें पूर्ण रूप से सत्य, स्पष्ट और प्रामाणिक सिद्ध करने में लगाया। अपनी बातों की युक्तिसंगत बनाने के लिए उन्हें कई प्रकार की नई-नई कल्पित कथाएँ बनानी पड़ीं। यह कल्पना भी उन्हीं में से एक है। +पाश्चात्य इतिहासकारों की इस कल्पना की पुष्टि न तो पुराणों सहित भारतीय साहित्य या अन्य स्रोतों से ही होती है और न ही यूनानी साहित्य कोछोड़कर भारत से इतर देशों के साहित्य या अन्य स्रोतों से होती है। स्वयं यूनानी साहित्य में भी ऐसे अनेक समसामयिक उल्लेखों का, जो कि होने ही चाहिए थे, अभाव है, जिनसे आक्रमण की पुष्टि हो सकती थी। यूनानी विवरणों के अनुसार ईसा की चौथी शताब्दी में यूनान का राजा सिकन्दर विश्व-विजय की आकांक्षा से एक बड़ी फौज लेकर यूनान से निकला और ईरान आदि को जीतता हुआ वह भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र केपास आ पहुँचा। यहाँ उसने छोटी-छोटी जातियों और राज्यों पर विजय पाई। इन विजयों से प्रोत्साहित होकर वह भारत की ओर बढ़ा, जहाँ उसकी पहली मुठभेड़ झेलम और चिनाव के बीच के छोटे से प्रदेश के शासक पुरु से हुई। उसमें यद्यपि वह जीत गया किन्तु विजय पाने के लिए उसे जो कुछ करना पड़ा, उससे तथा अपने सैनिकों के विद्रोह के कारण उसका साहस टूट गया और उसे विश्व-विजय के अपने स्वप्न को छोड़कर स्वदेश वापस लौट जाना पड़ा। +यूनानी इतिहासकारों ने इस घटना को जहाँ बहुत बढ़ा-चढ़ा कर चित्रित किया है वहीं भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा भी इसे इतना महत्वपूर्ण मान लिया गया कि इसके आधार पर 327 ई. पू. में सिकन्दर के आक्रमण के समय सेंड्रोकोट्टस के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य को जीवित मानकर आक्रमण के पश्चात 320 ई. पू. को उसके राज्यारोहण की तिथि घोषित करके उसके भारत सम्राट बनने की भी बात कर दी। यही नहीं, इस तिथि के आधार पर भारत के सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास के तिथिक्रम की भी कल्पना कर डाली किन्तु यह युद्ध हुआ भी है या नहीं, इस विषय में विभिन्न विद्वानों के मत अलग-अलग हैं। यदि यह युद्ध हुआ ही नहींतो 320 ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य का भारत सम्राट बनना कैसे संभव हो सकता है? +इस आक्रमण की स्थिति भारत तथा भारतेतर देशों केसाक्ष्यों से इस प्रकार बनती है- +भारतीय साक्ष्य. +ऐतिहासिक - भारत के इतिहास का जो ब्योरा विभिन्न पुराणों तथा संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के अनेक ग्रन्थों में दिया हुआ है उसमें इस आक्रमण का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अतः भारत के इतिहास की दृष्टि से इसे प्रामाणिक मानना कठिन है। +साहित्यिक- भारत की तत्कालीन साहित्यिक रचनाएँ, यथा- वररुचि की कविताएँ, ययाति की कथाएँ, यवकृति पियंगु, सुमनोत्तरा, वासवदत्ता आदि, इस विषय पर मौन हैं। अतः इस प्रश्न पर वे भी प्रकाश डालने में असमर्थ हैं। यही नहीं, पुरु नाम के किसी राजा का भारतीय साहित्य की किसी भी प्राचीन रचना में कोई भी उल्लेख कहीं भी नहीं मिलता और मेगस्थनीज का तो दूर-दूर तक पता नहीं है। हाँ, हिन्दी तथा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं के कतिपय अर्वाचीन नाटकों में अवश्य ही इस घटना का चित्रण मिलता है। +साहित्येतर ग्रन्थ - साहित्यिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य विभिन्न विषयों, यथा- आयुर्वेद, ज्योतिष, राजनीति, समाजनीति आदि के ग्रन्थों में भी, जिनमें भारत के अनेक ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं, इसका उल्लेख नहीं मिलता। चाणक्य का अर्थशास्त्र, पतंजलि का महाभाष्य आदि ग्रन्थ भी इस विषय पर मौन हैं। +भारतेतर देशों के साक्ष्य. +साहित्यिक. +पड़ोसी देशों का साहित्य पड़ोसी देशों का साहित्य - उस समय के भारतवर्ष के वाङ्मय में ही नहीं, तत्कालीन त्रिबिष्टक (तिब्बत), सीलोन (श्रीलंका) तथा नेपाल के ग्रन्थों मेंभी भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के बारे में ही नहीं स्वयं तथाकथित विश्व-विजय के आकांक्षी सिकन्दर के बारेमें भी कोई उल्लेख नहीं मिलता। +यूनानी साहित्य - विभिन्न यूनानी ग्रन्थों में उपलब्ध मेगस्थनीज के कथनों के अंशों में तथा टाल्मी, प्लिनी, प्लूटार्क, एरियन आदि विभिन्न यूनानी लेखकों की रचनाओं में सिकन्दर के आक्रमण के बारे में विविध उल्लेख मिलते हैं। इन्हीं में सेंड्रोकोट्टस का वर्णन भी मिलता है किन्तु वह चन्द्रगुप्त मौर्य है, इस सम्बन्ध में किसी भी ग्रन्थ में कोई उल्लेख नहीं हुआ है। यह तो भारतीय इतिहास के अंग्रेज लेखकों की कल्पना है। यदि वास्तव में ही सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य होता और उसके समय में ही यूनानी साहित्य लिखा गया होता तो उसमें अन्य अनेक समसामयिक तथ्य भीहोने चाहिए थे, जो कि उसमें नहीं हैं। इससे चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में आक्रमण हुआ था, इस पर प्रश्नचिन्ह् लग जाता है। इस दृष्टि से निम्नलिखित तथ्य विचारणीय हैं- +उक्त समसामयिक तथ्यों का यूनानी साहित्य में उल्लेख न होने से यह सन्देह होता है कि क्या ये वर्णन चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बंधित हैं? यदि सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य था तो चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बंधित इन महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख यूनानी साहित्य में क्यों नहीं किया गया ? +इस प्रकार न तो भारतीय साक्ष्य और न ही यूनानी साहित्य सहित अन्य भारतेतर देशों के साक्ष्य यह सिद्ध करने में समर्थ हैं कि विश्व-विजय के स्वप्नद्रष्टासिकन्दर ने चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में भारत पर आक्रमण किया था और सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य था, विशेषकर इसलिए कि भारतीय पौराणिक आधार पर चन्द्रगुप्त मौर्य 320 ई. पू. से काफी समय पूर्व अर्थात 1534 ई. पू. में मगध की गद्दी पर बैठा था और वही भारत का सम्राट बना था। दूसरे शब्दों में किसी भी आधार पर न तो सिकन्दर के 327 ई. पू. में हुए आक्रमण की और न ही चन्द्रगुप्त मौर्य के 320 ई. पू. में भारत का सम्राट बनने की बात की पुष्टि होती है। अतः यह भी मात्र एक भ्रान्त धारणा ही सिद्ध होती है किन्तु भारत के इतिहास को विकृत करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है। +यूनानी साहित्य में वर्णित सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्तमौर्य. +यूनानी साहित्य में बताया गया है कि सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय यहाँ सेंड्रोकोट्टस नाम का एक बहुत वीर, योग्य और कुशल व्यक्ति था, जो सिकन्दर के भारत से चले जाने के बाद 320 ई.पू. में प्रस्सी की गद्दी पर बैठा था और भारत का सम्राट बना था। जोन्स ने उसे ही चन्द्रगुप्त मौर्य मानकर 28 फरवरी, 1793 को सगर्व यह घोषणा कर डाली कि उसने चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में सेंड्रोकोट्टस को पाकर भारत के इतिहास की सबसे बड़ी, सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे कठिन समस्या का निदान पा लिया। +इस प्रश्न पर कि क्या सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्त मौर्य है, विचार करने के लिए यह जान लेना उचित होगा कि सेंड्रोकोट्टस के सम्बन्ध में प्राचीन यूनानी साहित्य में जो कुछ लिखा मिलता है, क्या वह सब चन्द्रगुप्त मौर्य पर घटता है ? यूनानी साहित्य में सेंड्रोकोट्टस के संदर्भ में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें लिखी हुई मिलती हैं- +उक्त बातों को भारतीय स्रोतों, यथा- पुराणों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य के संदर्भ में आए उल्लेखों से मिलान करने पर पाते हैं कि उसके सम्बन्ध में ये बातें तथ्यों से परे हैं, क्योंकि- +चन्द्रगुप्त मौर्य के विदेशी कन्या के विवाह के सम्बन्ध में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सिकन्दर का आक्रमण 327 ई. पू. में हुआ था और उस समय चन्द्रगुप्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। यदि उस समय चन्द्रगुप्त 24-25 वर्ष का भी रहाहोगा तो 320 ई. पू. में गद्दी पर बैठने के समय वह 31-32 वर्ष का अवश्य हो गया होगा। सिकन्दर के आक्रमण के 25 वर्ष बाद सेल्युकस ने भारत पर आक्रमण किया था। युद्ध में हारने के पश्चात यदि उसनेअपनी पुत्री की शादी चन्द्रगुप्त से की होगी तो उस समय उसकी आयु 57-58 वर्ष की अवश्य रही होगी। सामान्यः यह आयु नए विवाह करने की नहीं होती। इसके लिए कुछ विद्वानों का यह कहना है कि राजनीतिक विवाह में आयु का प्रश्न नहीं होता। +दूसरी ओर कुछ नाटकों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्युकस की पुत्री हेलन या कार्नेलिया की सिकन्दर के आक्रमण के समय यूनानी शिविर में प्रणय चर्चा का उल्लेख किया गया है किन्तु क्या यहाँ से जाने के 25 वर्ष बाद तक वह चन्द्रगुप्त के लिए प्रेम संजोए अविवाहित बैठी रही होगी ? यह बात असंभव न होते हुए भी जमती नहीं। +इस संदर्भ में भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार द्वारा ‘प्राचीन भारत‘ के पृष्ठ 84 पर कहे गए ये शब्द भी उल्लेखनीय हैं कि- ‘‘चन्द्रगुप्त सेल्युकस की लड़ाई का विस्तृत वर्णन यवन लेखकों ने नहीं किया है। फलतः कुछ लोगों ने तो यह भी सन्देह प्रकट किया है कि उन दोनों में कोई युद्ध हुआ भी था ?‘‘ यदि युद्ध हुआ ही नहीं तो सेल्युकस की लड़की से विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता। +ऐतिहासिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि उक्त बातों का मौर्य वंश के पश्चात मगध साम्राज्य पर आने वाले चौथे राजवंश ‘गुप्त वंश‘ के राजाओं के साथ कुछ-कुछ मेल हो जाता है। जैसे, जहाँ तक बड़ी सेना लेकर भारत-विजय करने और विदेशी राजा की पुत्री से विवाह करने की बात है, तो यह दोनों बातें गुप्त राजवंश के दूसरे राजासमुद्रगुप्त से मेल खाती हैं। समुद्रगुप्त ने विशाल सेना के बल पर भारत विजय करके अश्वमेध यज्ञ किया था। उसके सम्बन्ध में हरिषेण द्वारा इलाहाबाद में स्थापित स्तम्भ पर खुदवाए विवरण से उसकी विजय आदि के अलावा यह भी ज्ञात होता है कि पश्चिमोत्तर क्षेत्र में युद्ध-विजय के पश्चात उसे किसी विदेशी राजा नेअपनी कन्या उपहार में दी थी। +जहाँ तक मगध के सम्राट को मारकर राज्य हथियाने की बात है तो यह बात तो गुप्त वंश के प्रथम पुरुष ‘चन्द्रगुप्त‘ से मेल खाती है। उसने ही पहले आन्ध्र वंश के अन्तिम राजा चन्द्रश्री या चन्द्रमस को और बाद में उसके पुत्र को मारकर गद्दी हथियाई थी। +नाम के साथ उपनाम जोड़ने की जहाँ तक बात है तो यहप्रथा भी गुप्त वंश के राजाओं में थी, जैसे- +क्र.सं. -- राजा का नाम -- उपनाम +1. चन्द्रगुप्त प्रथम—विजयादित्य +2. समुद्रगुप्त -- अशोकादित्य +3. चन्द्रगुप्त द्वितीय -- विक्रमादिव्य +4. कुमारगुप्त प्रथम—महेन्द्रादित्य आदि +सूची से स्पष्ट हो जाता है कि इस वंश के हर राजा ने अपने नाम के साथ उपनाम ‘आदित्य‘ जोड़ा है। गुप्त वंश के राजा सूर्यवंशी थे। उनमें सूर्य के लिए ‘आदित्य‘ शब्द उपनाम में जोड़ने की परम्परा थी अर्थात नाम के साथ उपनाम जोड़ने की बात भी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मेल नहीं खाती। +स्पष्ट है कि सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य नहीं है, जिसे जोन्स ने जबरदस्ती बनाया है। +पालीबोथ्रा ही पाटलिपुत्र. +यूनानी साहित्य के अनुसार पालीबोथ्रा चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र ही था। इस पर भी भारतीय दृष्टिकोण से विचार किया जाना आवश्यक हैकिन्तु पहले यह जान लेना उचित होगा कि पालीबोथ्रा को पाटलिपुत्र मानने की दृष्टि से मेगस्थनीज तथा अन्य यूनानी लेखकों की विभिन्न रचनाओं में क्या-क्या कहा गया है- +यूनानियों द्वारा कथित उक्त आधारों पर विचार करने के उपरान्त इनमें से किसी आधार पर भी यह नहीं माना जा सकता कि पालीबोथ्रा पाटलिपुत्र था, क्योंकि- +उक्त सभी तथ्यों और अन्य बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि मेगस्थनीज या अन्य यूनानी लेखक भारत की सही भौगोलिक स्थिति को समझ पाने में असमर्थ रहे हैं। +पाटलिपुत्र मौर्य साम्राज्य की राजधानी कभी भी नहीं रहा. +यूनानी इतिहासकार भले ही पाटलिपुत्र को मौर्य साम्राज्य की राजधानी मानते रहे हों किन्तु भारतीय पुराणों के अनुसार वह कभी भी मौर्यों की राजधानी नहीं रहा। पुराणों के अनुसार जब से मगध राज्य की स्थापना हुई थी तभी से अर्थात जरासन्ध के पिता बृहद्रथ के समय के पूर्व से ही मगध साम्राज्य की राजधानी गिरिब्रज (वर्तमान राजगृह) रही है। महाभारत युद्ध के पश्चात मगध साम्राज्य से सम्बंधित बार्हद्रथ, प्रद्योत, शिशुनाग, नन्द, मौर्य, शुंग, कण्व, आन्ध्र-आठों वंशों के समय में इसकी राजधानीगिरिब्रज ही रही है। पाटलिपुत्र की स्थापना तो शिशुनाग वंश के अजातशत्रु ने कराई थी और वह भीमात्र सैनिक दृष्टि से सुरक्षा के लिए। +वैज्ञानिक. +भारतीय कालगणना अतिरंजित और अवैज्ञानिक. +संसार में कालगणना की कई पद्धतियाँ प्रचलित हैं किन्तु उनमें से भारतीय कालगणना की ही एकमात्र पद्धति ऐसी है जिसका सम्बन्ध वास्तविक रूप में काल से जुड़ा है और जो सृष्टि के प्रारम्भ से ही एक ठोस वैज्ञानिक आधार पर निर्मित होकर चलती आ रही है। कारण, वह आकाश में स्थित नक्षत्रों, यथा- सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि की गति पर आधारित है। प्राचीनभारतीय साहित्य में भारतीय कालगणना के मुख्य अंग युग, मन्वन्तर, कल्प आदि, की जो वर्ष गणना दी गईहै, वह नक्षत्रों की गति पर आधारित होने से पूर्णतः विज्ञान सम्मत है। +भारतीय कालगणना. +ग्रहगतियों के आधार पर भारतीय ग्रन्थों में नौ प्रकार के कालमानों का निरूपण किया गया है। इनके नाम हैं- ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, बार्हस्पत्य, सौर, सावन, चान्द्र और नाक्षत्र। इन नवों कालमानों में नाक्षत्रमान सबसे छोटा है। पृथ्वी जितने समय में अपनी धुरी का एक चक्र पूरा करती है, उतने समय को एक नाक्षत्र दिन कहा जाता है। यही दिन या वार ही पक्षों में, पक्ष ही मासों में, मास ही वर्षों में, वर्ष ही युगों में, युग ही महायुगों में, महायुग ही मन्वन्तरों और मन्वन्तर ही कल्पों में बदलते जाते हैं। +भारत की उक्त कालगणना नक्षत्रों की गति की गणना पर निर्भर करती है और गति की गणना गणित के माध्यम से की जाती है। अर्थात भारतीय कालगणना पूर्ण रूप से अंकगणित पर आधारित है। इसकी पुष्टि ज्योतिष शास्त्र के साथ-साथ ऐतिहासिक, साहित्यिक और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टियों से भी होती है, यथा- +अंकगणित - भारतीय कालगणना के प्रत्येक अंग अर्थात दिन, पक्ष, मास, वर्ष, युग, चतुर्युगी, मन्वन्तर, कल्प आदि के संदर्भ में जो गणनाएँ दी गई हैं, उनके पीछे पौराणिक आंकड़ों का एक पुष्ट आधार है। अंकगणित पर आधारित होने से इन पौराणिक आंकड़ों में युक्ति है, तर्क है, सत्यता है और पूर्णता है। ऐसी पूर्णता आधुनिक विज्ञान द्वारा निर्धारित आंकड़ों में नहीं हैक्योंकि वे वास्तविक नहीं मात्र कल्पना और अनुमान पर आधारित हैं। मन्वन्तर सिद्धान्त के अनुसार एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगी या महायुग होते हैं। एक चतुर्युगी या महायुग में 1, 2, 3 और 4 के आनुपातिक क्रम से एक-एक बार कलियुग (4.32 लाख वर्ष), द्वापर (8.64 लाख वर्ष), त्रेता (12.96 लाख वर्ष) और सत्युग (17.28 लाख वर्ष) आते हैं अर्थात एक चतुर्युगी में 43.20 लाख वर्ष या दस कलिमान होते हैं। प्रत्येक मन्वन्तर के पश्चात सत्युग की अवधि के बराबर का सन्धि काल आता है। वर्तमान पृथ्वी के निर्माण के आरम्भ से अब तक 6 मन्वन्तर बीत चुके हैं और सातवें मन्वन्तर के अट्ठाइसवें महायुग के कलियुग के अब तक 5109 वर्ष बीते हैं। अंकगणित पर आधारित होने के कारण ही इस भारतीय कालगणना के अनुसार आज यह बताया जा सकता है कि वर्तमान सृष्टि को प्रारम्भ हुए आज 1,97,29,49,109 वर्ष हो चुके हैं तथा एक कल्प में 4,32,00,00,000 वर्ष होते हैं। +ज्योतिष शास्त्र' - इतनी लम्बी कालगणना को विभिन्न पाश्चात्य ही नहीं अपितु अनेक आधुनिक भारतीय विद्वान भी मानने को तैयार भले ही न हों किन्तु इसकीपुष्टि ज्योतिष के ग्रन्थ ‘सूर्य सिद्धान्त‘ से हो जाती है। सूर्य सिद्धान्त के अध्याय 1 में कहा गया है कि - एक चतुर्युगी में सूर्य, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र और शनि 43,20,000 भगण (राशि चक्र) परिवर्तन करते हैं। यही संख्या प्राचीन भारतीय साहित्य में चतुर्युगी के वर्षों की बताई गई है। +सूर्य सिद्धान्त में यह भी कहा गया है कि - सत्युग के अन्त में या त्रेता के प्रारम्भ में ‘पाद‘ और ‘मन्दोच्च‘ को छोड़कर सभी ग्रहों का मध्य स्थान मेषराशि में था। दूसरे शब्दों में उस समय 5वें कलियुग का प्रारम्भ था अर्थात हर 4.32 लाख वर्ष के बाद सात ग्रह एक युति में आ जाते हैं। (सूर्य सिद्धान्त 1.57) भारतीय कालगणना के उक्त वर्षों की पुष्टि ज्योतिष शास्त्र के ‘अयन दोलन‘ सिद्धान्त से भी हो जाती हैं। +ऐतिहासिक - ज्योतिष के आधार पर पुष्ट हो जाने पर भी भारतीय कालगणना की करोड़ों-करोड़ों वर्षों की संख्या पर फ्लीट सरीखे कई पाश्चात्य विद्वान ही नहीं अनेक भारतीय विद्वान भी यह कहकर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं कि कालगणना का यह प्रकार आर्य भट्ट से पूर्व था ही नहीं। इस संदर्भ में दो बातें उल्लेखनीय हैं, एक तो यह कि इस कालगणना को भारत में ही माना जाता रहा है, ऐसा नहीं है, इसे बेबिलोनिया, ईरान, स्कैण्डेनेविया आदि देशों में भी मान्यता प्राप्त रही है। ऐतिहासिक दृष्टि से बेबिलोनिया की सभ्यता ई. पू. तीसरी सहस्राब्दी में फूली-फली थी और उस समय तक आर्य भट्ट अवतरित नहीं हुए थे। दूसरे ये संख्याएँ वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थोंमें आए ब्योरों से भी पुष्ट होती हैं, जो निश्चितही आर्य भट्ट से पूर्व के ही है। +साहित्यिक - प्राचीन साहित्य चाहे ईरान और बेबिलोनिया का हो याभारत का सभी में कालगणना के संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं - +चारों युगों के नामों के संदर्भ में यजुर्वेद के 30.18 की शरण में जाया जा सकता है, यथा- +इस मंत्र में कृत्युग (सत्युग) त्रेता, द्वापर और आस्कन्द (कलियुग) चारों युगों के नामों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। +कालगणना के संदर्भ में विभिन्न भारतीय ग्रन्थों मेंयह तो बताया ही गया है कि कौन सा युग किस मास की कौन सी तिथि से प्रारम्भ होता है। महाभारत के वन पर्व के 118.67 में यह भी बताया गया है कि कलि प्रारम्भ में सात ग्रह एक युति में आ जाते हैं। +कहने का भाव है कि नक्षत्रों की गति पर आधारित भारतीय कालगणना के कालमानों की पुष्टि ईरान, बेबिलोनिया, स्कैण्डेविया आदि देशों के प्राचीन ग्रन्थों में आए उल्लेखों से ही नहीं भारत के वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, पुराण आदि ग्रन्थों में वर्णित कालमान के ब्योरों से भी होती है, अतः उसकी मान्यतापर प्रश्नचिन्ह् लगाना न्यायसंगत नहीं है। यह भ्रान्ति भी जानबूझ कर अंग्रेजी सत्ता द्वारा फैलाई गई थी। +प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा. +किसी भी देश, भाषा, साहित्य या संस्कृति के इतिहास लेखन का एक महत्वपूर्ण तत्त्व उसका काल-निर्धारण होता है, क्योंकि काल विशेष में परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार आए बदलाव का विश्लेषण करके लेखक इनके उत्कर्ष-अपकर्ष, विकास-ह्रास, वैभव-पराभव का निष्कर्ष निकालकर इन पर विचार प्रकट करता है। भारतवर्ष में ऐतिहासिक दृष्टि से काल-निर्धारण की वैज्ञानिक आधारों पर एक सुदीर्घ और पुष्ट परम्परा विद्यमान रही है किन्तु पाश्चात्य विद्वानों ने पुरातन काल से चलते आ रहे काल-निर्धारण के सिद्धान्त को अर्थात भारतीय कालगणनाको अतिरंजित एवं अस्वाभाविक मानकर उसे अस्वीकार करके उसके स्थान पर अपनी काल-निर्धारण की पद्धति, जो मात्र कल्पना प्रसूत होने के कारण अत्यन्त ही अपुष्ट और अवैज्ञानिक थी, को मान्यता दी और उसके आधार पर भारतीय इतिहास में प्रागैतिहासिक काल की अवधारणा की। जबकि भारत के इतिहास में इस नाम का कोई काल है ही नहीं क्योंकि यहाँ तो सृष्टि-प्रारम्भ से ही उसके विकास का इतिहास सुलभ है। +‘प्रागैतिहासिकता‘ का शाब्दिक अर्थ इतिहास से पूर्व केकाल की स्थिति से है। ‘इतिहास से पूर्व काल की स्थिति से‘ आधुनिक इतिहासकारों का अभिप्रायआदिमानव के भू-अवतरण और उसके बाद के उस प्रारम्भिक काल की स्थिति से है, जिसके सम्बन्ध में जानने, परखने और समझने के लिए आज उनके पास वह सब सामग्री, यथा- सिक्के, मोहरें, अभिलेख, पुरातन अवशेष आदि जो इतिहास जानने के प्रमुख साधन माने जाते हैं, सुलभ नहीं है किन्तु यह सब सामग्री उनको मानव जीवन की केवल भौतिक प्रगति की स्थिति का ही परिचय दे सकती है, उसकी धार्मिक और अध् यात्मिक प्रगति का नहीं। इस प्रगति के परिचय के लिए प्राचीन साहित्य चाहिए, जो भारतवर्ष के अलावा अन्य किसी भी देश में आज सुलभ नहीं है किन्तु उस साहित्य को आज के इतिहासकार ‘मिथ‘ कहते आ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आदि मानव के भू-अवतरण काल और उसके बाद के जिस काल के साहित्य को ‘मिथ‘ की कोटि में डाला जा रहा है उसको ही प्रागैतिहासिक काल का नाम दिया गया है। जबकि भारत के इतिहास में ऐसा कोई काल रहा ही नहीे क्योंकि यहाँ तो उस समय से इतिहास सुलभहै, जबकि सृष्टि के आरम्भ में भारत के ‘आत्म-भू‘ और ‘यूनानियों के आदम‘ अर्थात आदि मानव अथवा ब्रह्मा का आविर्भाव हुआ था। ‘शतपथ ब्राह्मण‘ तथा ‘पद्म‘ आदि पुराणों में सृष्टि निर्माण की चर्चा के संदर्भ में लिखा है कि पहले पृथ्वी एक द्वीपा थी, बाद में चतुर्द्वीपा हुई और उसके बाद में सप्तद्वीपा हो गई। आज इसी बात को ‘कान्टीनेन्टल ड्रिफ्टिंग थ्यॉरी‘ (महाद्वीपीय विचलन सिद्धान्त) कहा जाता है। पुराणों के अनुसार द्वीपों का विचलन शंकर के ताण्डव से जुड़ा है। शंकर के नृत्य करते समय पैरों की धमक से ही द्वीपों का विचलन होता है। +यही नहीं, भारत के प्राचीन साहित्य में तो इस सृष्टि से पूर्व की सृष्टि का उल्लेख भी मिलता है। सृष्टि का विलय प्रलय के काल में ही होता है। भारतीय साहित्य में प्रलय भी कई प्रकार की बताई गई है। कभी नैमित्तिक प्रलय होती है तो कभी प्राकृत प्रलय और कभी आत्यंतिक प्रलय। प्राकृत प्रलय की स्थिति में न सत रहता है न असत, न भूमि रहती है न पाताल, न अन्तरिक्ष रहता है न स्वर्ग, न रात का ज्ञान रहता है और न दिन का। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उस समय ब्रह्म की सत्ता के अलावा कुछ भी विद्यमान नहीं रहता। प्रलय काल में सब कुछ नष्ट हो जाने पर एक निश्चित कालावधि के बाद नई सृष्टि का निर्माण होता है, उसका सम्बंध पूर्व सृष्टि से अवश्यरहता है। पूर्व सृष्टि का ज्ञान हमें ऋग्वेद के मंत्र 10.190.1-2 से होता है- ‘‘तब प्रलय हो गई। ... तदनन्तर ईश्वर ने सम्पूर्ण विश्व (सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि) को पहले की तरह फिर से बनाया।‘‘ +भारतीय दृष्टि से काल की कोई सीमा नहीं है, वह अनन्तहै। जिस भारतवर्ष में सृष्टि के प्रलय और निर्माण के सम्बन्ध में इतनी सूक्षमता, गहनता औरगम्भीरता से विचार किया गया हो और जहाँ इस सृष्टि के निर्माण काल से ही नहीं पिछली सृष्टि का विवरण भी रखा गया हो, वहाँ के इतिहास में प्रागैतिहासिकता की अवधारणा करने का प्रश्न ही नहीं उठता। +वैज्ञानिकता के नाम पर ऐतिहासिक तथ्यों की उलट-फेर. +भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने की प्रक्रिया में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा वैज्ञानिकता के नाम पर भारतीय इतिहास, संस्कृति, सभ्यता, धर्म-दर्शन और साहित्य की श्रेष्ठता और प्राचीनता को कम से कम करके आंकने के भी घनघोर प्रयास किए गए। इन प्रयासों के अन्तर्गत बड़े-बड़े इतिहासकारों और पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ऐसे अनेक मिथ्या तर्क दिए हैं, अनेक मिथ्या आधारों की स्थापनाएँ कीं और अनेक मिथ्या कल्पनाएँ तथा विवेचनाएँ कीं, जो नितान्त बाल बुद्धि जैसी लगती हैं। +भारत के प्रसिद्ध पुरातात्त्विक श्री बी. बी. लाल ने वैज्ञानिक आधार पर भारत के प्राचीन इतिहास का काल-निर्धारण करते हुए महाभारत युद्ध को 836 ई. पू. में हुआ माना है। महाभारत युद्ध के लिए इस काल को निर्धारित करने की प्रक्रिया का ब्योरा प्रस्तुत करते हुए श्री लाल ने कहा है कि भारतीय इतिहास के मुस्लिम काल में दिल्ली में कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर बहादुरशाह जफर तक 47 मुस्लिम बादशाह हुए हैं और उन्होंने कुल 652 वर्ष राज्य किया है। इस हिसाब से प्रति राजा का औसत राज्यकाल 13.9 अर्थात 14 वर्ष बनता है। इसी आधार पर परीक्षित से लेकर उदयनतक हुए 24 राजाओं का राज्यकाल उन्होंने 24 ग 14 त्र 336 वर्ष माना है। उदयन का समय उन्होंने 500 ई. पू. कल्पित किया है क्योंकि बौद्ध ग्रन्थों में उदयन को गौतमबुद्ध का लगभग समकालीन माना गया है। अतः500 ई. पू. में 336 वर्ष जोड़कर 836 ई. पू. वर्ष बनाकर इसे महाभारत का काल माना है। जबकि वास्तव में महाभारत का युद्ध उस समय से बहुत पहले हुआ था। +डॉ. के. एम. मुन्शी के निरीक्षण में और डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार के प्रधान सम्पादकत्व में तैयार ‘दि हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ इण्डियन प्यूपिल‘ ने तो वैज्ञानिकता के नाम पर भारत के इतिहास के संदर्भ में और भी खिलवाड़ किया है। इस ग्रन्थ में जो कुछ लिखा गया है वह उससे बहुत भिन्न नहीं है जो पाश्चात्य इतिहासकारों ने लिखा है। +जहाँ तक महाभारत युद्ध का काल जानने के लिए उसे हजारों-हजारों वर्ष बाद पैदा हुए मुसलमान बादशाहों के औसत राज्यकाल को आधार बनाने का प्रश्न है तो इसका उत्तर तो श्री लाल ही जानें किन्तु यहाँ यह प्रश्न उठता ही है कि उनके मस्तिष्क में यह बात क्यों नहीं आई कि प्राचीन काल में दीर्घ जीवन भारत की एक विशिष्टता रही है। उस काल का औसत भारतीय राजा काफी समय बाद के औसत मुसलमानी बादशाह से काफी अधिक काल तक जीवित रहा होगा। भारत के लोगों के दीर्घ जीवन के बारे में मेगस्थनीज आदि यूनानी विद्वानों के निम्नलिखित विचार उल्लेखनीय हैं- +यदि आज से 2300 वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज निरोग रहकर 200 वर्ष तक जीवित रहते थे तो 5000 या 6000 वर्ष पूर्व तो वे और भी अच्छी तरह से तथा और भी लम्बी आयु तक जीवित रहते होंगे। अतः मुसलमानी काल की इस प्रकार की औसत निकालकर प्राचीन भारतीय राजाओं के राज्यकाल को निकालना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। इस संदर्भमें यह भी उल्लेखनीय है कि विजयनगर का ‘रामराजा‘ 96 वर्ष की आयु में तालिकोट की युद्धभूमि पर गया था और पंवार वंश के राजा गंगासिंह ने मोहम्मद गोरी के विरुद्ध पृथ्वीराज को युद्ध में 90 वर्ष की आयु में सहयोग दिया था। यही नहीं, महाभारत के युद्ध के समय आचार्य द्रोण और महाराजा द्रोपद की आयु लगभग 300 वर्ष, पितामह भीष्म की आयु 170-180 वर्ष तथा श्रीकृष्ण और अर्जुन की आयु 88 वर्ष मानी जाती है। +अर्वाचीन और प्राचीन काल में कतिपय भारतीयों के आयु मान के उक्त उदाहरणों के समक्ष 14 वर्ष की औसत से उस समय के राजाओं की आयु निकालने की वैज्ञानिकता सामान्यतः बुद्धिगम्य नहीं हो पाती। लगता है यह सब कुछ भारतीय इतिहास को विकृत करने की दृष्टि से किया/कराया गया है। +विविध. +ऐतिहासिक महापुरुषों की तिथियाँ. +पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भारतीय इतिहास के लिए निर्धारित तिथिक्रम के आधार पर किसी भी ऐतिहासिक महापुरुष की जन्मतिथि और महान सम्राट के राज्यारोहण की तिथि पर विचार किया जाता है तो वह असंगत लगती है। इस खण्ड में कतिपय ऐसे ही ऐतिहासिक महापुरुषों कीजन्मतिथियों और सम्राटों के राज्यारोहण की तिथियों के विषय में विचार किया जा रहा है - +(क) गौतम बुद्ध का आविर्भाव 563 ईपू. में हुआ - गौतम बुद्ध का आविर्भाव भारतीय इतिहास की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है किन्तु यह खेद का ही विषय है कि उनकी जन्म और महानिर्वाण की तिथियों के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी भारतवर्ष में सुलभ नहीं है। हाँ, यह जानकारी तो विभिन्न स्रोतोंसे अवश्य मिल जाती है कि वे 80 वर्ष तक जीवित रहे थे। देश-विदेश में प्रचलित बौद्ध परम्पराओं से भी उनके जन्म और महानिर्वाण के सम्बंध में प्रामाणिक तिथियाँ नहीं मिल पाई हैं। हर जगह ये तिथियाँ अलग-अलग ही बताई जाती हैं। +पाश्चात्य इतिहासकारों ने गौतम बुद्ध का जन्म वर्ष निकालने के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण के लिए कल्पित तिथि 320 ई. पू. में से उसके और उसके पुत्र बिन्दुसार के राज्यकालों के वर्षों को घटाकर अशोक का राज्यारोहण वर्ष 265 ई. पू. निकाला है। इस 265 ई. पू. में 218 वर्ष जोड़कर गौतम बुद्ध के महानिर्वाण का वर्ष 265 + 218 = 483 ई. पू. निश्चित किया है क्योंकि सीलोन के क्रोनिकल महावंश में लिखा हुआ है कि गौतम बुद्ध के महानिर्वाण के 218 वर्ष बाद अशोक का राज्यारोहण हुआ था। इसी को आधार मानकर 483 ई. पू. में गौतम बुद्ध की पूर्ण आयु के 80 वर्ष मिलाकर 483 + 80 = 563 ई. पू. को उनके जन्म का वर्ष माना गया है। जबकि ऐसे अनेक विद्वान हैं जो इस तिथि को सही नहीं मानते। विगत दो शताब्दियों से लगातार प्रयासों के बावजूद गौतम बुद्ध के जन्म की तिथि निश्चित नहीं हो सकी है। +19वीं शताब्दी में पाश्चात्य विद्वानों ने बुद्ध के काल-निर्धारण के संदर्भ में 25वीं शताब्दी ई. पू. से 5वीं शताब्दी ई. पू. तक की अनेक तिथियाँ एकत्रित की थीं, जिनका डॉ. विल्सन ने विश्लेषण किया था। श्रीराम साठे ने ‘डेट्स ऑफ बुद्धा‘ के पृष्ठ 2 से 4 तक डॉ. विल्सन की तिथियों के साथ प्रिन्सेप तथा कुछ अन्य लोगों द्वारा दी गई तिथियाँ भी दी हैं। उनसे ज्ञात होता है कि- +संदर्भित तिथियों को महानिर्वाण की तिथियाँ मानकरउनमें 80 वर्ष (बुद्ध का जीवन काल) जोड़ने पर जो तिथियाँ बनती हैं वे भी वर्तमान में प्रचलित भारत के इतिहास में बुद्ध के जन्मकाल के लिए दी गई 563 ई. पू. से मेल नहीं खातीं। +भारतीय पुराणों से मिली विभिन्न राजवंशों के राजाओं के राज्यारोहण की तिथियों के आधार पर जो जानकारी मिलती है, उसके हिसाब से गौतम बुद्ध का जन्म 1886-87 ई. पू. में बैठता है। वे महाभारत युद्ध के पश्चात मगध की गद्दी पर बैठने वाले तीसरे राजवंश-शिशुनाग वंश के चौथे, पाँचवें और छठे राजाओं के राज्यकाल में, यथा- 1892 से 1787 ई. पू.के बीच में हुए थे। +ऐसा भी कहा जाता है कि गौतम बुद्ध का महाप्रस्थान अजातशत्रु के राज्यारोहण के 8 वर्ष बाद हुआ था अर्थात 1814 - 8 = 1806 ई. पू. में हुआ था। श्रीलंका में सुलभ विवरणों से भी ऐसी ही जानकारी मिलती है कि बुद्ध का महानिर्वाण अजातशत्रु के राज्यारोहण के 8 वर्ष बाद हुआ था। इस विषय में तो सभी एकमत हैं कि गौतम बुद्ध 80 वर्ष तक जिए थे। अतः उनका जन्म 1806 + 80 = 1886 (1887) ई. पू. में हुआ होगा। यह समय क्षेत्रज के राज्यकाल का था जोकि शिशुनाग वंश का चौथा राजा था। जबकि वर्तमान इतिहासज्ञों द्वारा जो तिथि गौतम बुद्ध के जन्मकाल की दी गई है, वह 563 ई. पू. है। +उक्त भारतीय विवरणों के आधारों पर बुद्ध के जन्म के लिए बनी तिथियों और प्रचलित तिथि (563 ई. पू.) में भी काफी (लगभग 1300 वर्षों का) अन्तर आता है। +(ख) आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य 788 ई में अवतरित हुए - आचार्य शंकर के जन्मकाल में भी लगभग 1300 वर्ष का ही अन्तर पाश्चात्य और भारतीय आधारों से आता है। पाश्चात्य विद्वानों ने यूँ तो आचार्य शंकर के जन्म के सम्बन्ध में बहुत सारी तिथियाँ दी हैं किन्तु अधिकतर विद्वान 788 ई. पर सहमत हैं। (इस संदर्भमें विस्तृत जानकारी के लिए सूर्य भारती प्रकाशन, नई सड़क, दिल्ली-6 द्वारा प्रकाशित लेखक की पुस्तक ‘भारतीय एकात्मता के अग्रदूत आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य‘ देखें) जबकि भारतीय (शंकर मठ)परम्परा के अनुसार उनका जन्मकाल 509 ई. पू. बनता है। द्वारका और कांची कामकोटि पीठ के पीठाधिपतियों की सूचियों में प्रत्येक आचार्य का नाम, गद्दी पर बैठने का वर्ष और कितने वर्ष वे गद्दी पर रहे, इन सबका पूरा वर्णन दिया गया है। आचार्य शंकर की जन्मतिथि की दृष्टि से वे सूचियाँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। +अन्तर्साक्ष्य अर्थात आचार्य जी की अपनी रचनाओं के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपनी किसी भी रचना में न तो अपने सम्बन्ध में और नही किसी रचना विशेष के रचनाकाल के सम्बन्ध में ही कुछ लिखा है। आचार्य शंकर के सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपने समस्त साहित्य में कहीं भी यवनों के आक्रमण और भारत में उनके निवासके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं लिखा है जबकि अनेक विद्वानों द्वारा आचार्य जी का आविर्भाव काल ईसा की आठवीं शताब्दी से लेकर नौवीं शताब्दी तक माना गया है। यदि आचार्य जी इस अवधि में अवतरित हुए होतेतो उनकी किसी न किसी रचना में किसी न किसी रूप में मुसलमानों का उल्लेख अवश्य रहा होता क्योंकि मुसलमानों के सिन्ध प्रदेश पर आक्रमण ईसा का 7वीं शताब्दी के अन्त में होने शुरू हो गए थे एवं आक्रमण के पश्चात काफी मुसलमान वहीं रहने भी लगे थे। कोई भी विचारक या लेखक अपनी समकालीन स्थितियों से आँख मूंदकर नहीं रह सकता। उसकी रचनाओं में तत्कालीन स्थिति का उल्लेख किसी न किसी रूप में आ ही जाता है। अतः यह तो निश्चित है कि आचार्य जी का जन्म छठी शताब्दी से पूर्व ही हुआ है।यदि ऐसा है तो स्वामी चिद्सुखाचार्य जी की रचना, मठों की आचार्य-सूचियाँ, पौराणिक तिथिक्रम आदि पुष्ट आधारों पर निर्मित 509 ई. पू. को ही शंकराचार्य जी की जन्म तिथि मानना उचित होगा। इस तिथि की पुष्टि ‘नेपाल राजवंशावली‘ से भी होती है। +(ग) अशोक ने 265 ई.पू. में शासन संभाला- सम्राट अशोक को भारत के इतिहास में ही नहीं विश्व के इतिहास में जो महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है, वह सर्वविदित है। आज अशोक का नाम संसार केमहानतम व्यक्तियों में गिना जाता है। इसकी प्रसिद्धि का मुख्य कारण उसके द्वारा चट्टानों और प्रस्तरस्तम्भों पर लिखवाए गए वे अजर-अमर शिलालेख हैं, जो सम्पूर्ण राज्य में इतस्ततः विद्यमान रहे हैं किन्तु उनसे उसके व्यक्तिगत जीवन अर्थात जन्म, मरण, माता-पिता के नाम, शासनकाल आदि के सम्बन्ध में कोई विशेष जानकारी सुलभ नहीं हो पाती। यह भी उल्लेखनीय है कि उन शिलालेखों में सेअशोक का नाम केवल एक ही छोटे शिलालेख में मिलता है। शेष पर तो ‘देवानांप्रिय‘ शब्द ही आया है। अतः इससे यह पता नहीं चल पाता कि यह नाम वास्तव में कौन से अशोक का है क्योंकि भारत में भिन्न-भिन्न कालों में अशोक नाम के चार राजा हुए हैं, यथा- +बौद्ध ग्रन्थों में यद्यपि अशोक के सम्बन्ध में बड़े विस्तार से चर्चा की गई है किन्तु उनके वर्णन एक-दूसरे से भिन्न हैं। इस संदर्भ में आचार्य रामदेव का कहना है कि बौद्ध लेखकों ने अशोकादित्य (समुद्रगुप्त) और गोनन्दी अशोक (कश्मीर) दोनों कोमिलाकर एक चक्रवर्ती अशोक की कल्पना कर ली है। +-- (‘भारतवर्ष का इतिहास‘, तृतीय खण्ड, प्रथम भाग, पृ.41) +इस स्थिति में यह निष्कर्ष निकाल पाना कि इनमें से बौद्ध धर्म-प्रचारक देवानांप्रिय अशोक कौन सा है, कठिन है। जहाँ तक अशोक के 265 ई. पू. में गद्दी पर बैठने की बात है, इस सम्बन्ध में भी अनेक मत हैं - +यहाँ उल्लेखनीय है कि पौराणिक कालगणना के अनुसार अशोक मौर्य के राज्य के लिए निकले 1472 से 1436 ई. पू. के काल में और ‘राजतरंगिणी‘ के आधार पर धर्माशोक के लिए निकले राज्यकाल 1448 से 1400 ई. पू. में कुछ-कुछ समानता है। जबकिभारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले इतिहासकारों द्वारा निकाले गए 265 ई. पू. के कालसे कोई समानता ही नहीं है। उक्त विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान इतिहासकारों द्वारा अशोक के सम्बन्ध में निर्धारित काल-निर्णय भी बहुत उलझा हुआ है। अतः 265 ई. पू. में वह गद्दी पर बैठा ही था, यह निश्चित रूप से नहीं माना जा सकता। जहाँ तक आधुनिकरूप में भारत का इतिहास लिखने वालों और भारतीय पौराणिक आधार पर कालगणना करने वालों की अशोक के राज्यारोहण की तिथि का प्रश्न है, दोनों में लगभग 1200 वर्ष का अन्तर आ जाता है। +(घ) कनिष्क का राज्यारोहण 78 ई. में हुआ - कनिष्क के राज्यारोहण के सम्बन्ध में भी पाश्चात्य औरभारतीय आधारों पर निकाले गए कालखण्डों में गौतम बुद्ध आदि की तरह लगभग 1300 वर्ष का ही अन्तर आता है। पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि 78 ई. निश्चित कीगई है जबकि पं. कोटावेंकटचलम द्वारा ‘क्रोनोलोजी ऑफ कश्मीर हिस्ट्री रिकन्सट्रक्टेड‘ में दिएगए ‘राजतरंगिणी‘ के ब्योरों के अनुसार कनिष्क ने कश्मीर में 1254 ई. पू. के आसपास राज्य किया था। +यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य तिथियों की भ्रान्ति के लिए तो कोई न कोई कारण आज का इतिहासकार दे भी रहा है किन्तु कनिष्क के सम्बन्ध में तिथि की भ्रान्ति का कोई निश्चित उत्तर उसके पास नहीं है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार का कहना है - +चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक और कनिष्क की जोन्स आदि पाश्चात्य विद्वानों द्वारा निर्धारित तिथियों के संदर्भ में श्री ए. बी. त्यागराज अय्यर की ‘इण्डियन आर्कीटेक्चर‘ का निम्नलिखित उद्धरण भी ध्यान देने योग्य है - +दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कनिष्क के राज्यारोहण के संदर्भ में दी गई तिथि भी मात्र एक भ्रान्ति ही है। भारतीय इतिहास की महानतम विभूतियों की तिथियों में यह अन्तर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा जान-बूझकर डाला गया है ताकि उनके द्वारा पूर्व निर्धारितकालगणना सही सिद्ध हो जाए। +(ङ) विक्रम सम्वत के प्रवर्तक उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं - भारतवर्ष में श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतम बुद्ध और आचार्यशंकर के पश्चात यदि किसी का व्यक्तित्व सर्वाधिक विख्यात रहा है तो वह उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का रहा है किन्तु आश्चर्य तो इस बात का है कि जिस राजा की इतनी प्रसिद्धि रही हो उसे कल्पना जगतका वासी मानकर पाश्चात्य विद्वानों ने उसके ऐतिहासिक व्यक्तित्व को ही नकार दिया है। +उज्जैनी के महाराजा विक्रमादित्य के ऐतिहासिक व्यक्तित्व को नकारने से पूर्व निम्नलिखित तथ्यों पर विचार कर लिया जाना अपेक्षित था, यथा- +इस सम्वत के प्रवर्तन की पुष्टि ‘ज्योतिर्विदाभरण‘ ग्रन्थ से होती है। जो कि 3068 कलि अर्थात 34 ई. पू. में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने3044 कलि अर्थात 57 ई. पू. में विक्रम सम्वत चलाया था। +‘नेपाल राजवंशावली‘ में भी नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय (ईसा पूर्व पहली शताब्दी) में उज्जैनी के विक्रमादित्य के नेपाल आने का उल्लेख किया गया है। ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि विक्रमादित्य ने नेपाल के राजा को अपने अधीन सामन्त का पद स्वीकार करने के लिए कहा था। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि विक्रमादित्य ने विक्रम सम्वत की स्थापना नेपाल में ही की थी। +बाबू वृन्दावनदास ‘प्राचीन भारत में हिन्दू राज्य‘ में लिखते हैं कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने ही विक्रम सम्वत की स्थापना 57 ई. पू. में की थी। उनका यह भी कहना है कि- +यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यदि पाश्चात्योन्मुखी आधुनिक भारतीय इतिहासकारों की यह बात मान ली जाती है कि ईसा पूर्व और ईसा बाद की पहली शताब्दियों में कोई विक्रमादित्य नहीं हुआ तो अरब देश के उस कवि की कविता का क्या उत्तर होगा जिसे उसनेमोहम्मद साहब के जन्म से 165 वर्ष पूर्व लिखा था। उस कविता का हिन्दी अनुवाद जो विक्रम सम्वत के 2000 वर्षों के पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 1946 ई. में मनाए गए उत्सव के स्मृति अंक में दिया गयाथा, इस प्रकार है- +यह कविता मूल रूप में सुलतान सलीम के काल (1742 ई.) में तैयार ‘सैरउलओकुन‘ नाम के अरबी काव्य संग्रह से ली गई है। +कहने का अभिप्राय यह है कि पाश्चात्य विद्वानों ने जिस विक्रमादित्य के व्यक्तित्त्व को ही नकार दिया है उसके विषय में भविष्य पुराण, ज्योतिर्विदाभरण, सिद्धान्त शिरोमणि (भास्काराचार्य), नेपाल राजवंशावली, राजतरंगिणी, महावंश, शतपथ ब्राह्मण की विभिन्न टीकाएँ, बौद्ध ग्रन्थ, जैन ग्रन्थ तथा अनुश्रुतियाँ आदि भारतीय ऐतिहासिक स्रोत एकमत हैं। अतः लगता है कि यह स्थिति भारत के इतिहास को विकृत करने के लिए जान बूझकर लाई गई है। +सरस्वती नदी का कोई अस्तित्व नहीं. +भारत के पुरातन साहित्य में, यथा- वेदों, पुराणोंआदि में ही नहीं रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत् सरीखे ग्रन्थों में भी सरस्वती का स्मरण बड़ी गरिमा के साथ किया गया है। भारत भू के न केवल धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक ही वरन् ऐतिहासिक आदि परिवेशों में भी सरस्वती का बड़ा महत्त्व दर्शाया गया है। इस नदी के साथ भारतवासियों के अनेक सुखद और आधारभूत सम्बन्ध रहे हैं। इसके पावन तट पर भारतीय जीवन पद्धति के विविध आयामों का विकास हुआ है। इसके सान्निध्य में वेदों का संकलन हुआ है। ऋग्वेद के 2.41.16 में इसका उल्लेख मातृशक्तियों में सर्वोत्तम माता, नदियों में श्रेष्ठतम नदी और देवियों में सर्वाधिक महीयशी देवी के रूप में हुआ है- +यह 6 नदियों की माता सप्तमी नदी रही है। यह ‘स्वयं पयसा‘ (अपने ही जल से भरपूर) और विशाल रही है। यह आदि मानव के नेत्रोन्मीलन से पूर्व-काल में न जाने कब से बहती आ रही थी। वास्तव में सरस्वती नदी का अस्तित्व ऋग्वेद की ऋचाओं के संकलन से बहुत पहले का है। ऐसी महत्वपूर्ण नदी के आज भारत में दर्शन न हो पाने के कारण आधुनिकविद्वान इसके अस्तित्व को ही मानने से इन्कार करते आ रहे हैं किन्तु इस नदी के अस्तित्व का विश्वास तो तब हुआ जब एक अमेरिकन उपग्रह ने भूमि के अन्दर दबी इस नदी के चित्र खींचकर पृथ्वी पर भेजे। अहमदाबाद के रिसर्च सेन्टर ने उन चित्रों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि शिमला के निकट शिवालिक पहाड़ों से कच्छ की खाड़ी तक भूमि के अन्दर एक सूखी हुई नदी का तल विद्यमान है, जिसकी चौड़ाई कहीं-कहीं 6 कि.मी. है। उनका यह भी कहना है कि उस समय सतलुज और यमुना नदी इसी नदी में मिलती थी। सेटेलाइट द्वारा भेजे गए चित्रों से पूर्व भी बहुत से विद्वान इसी प्रकार के निष्कर्षों पर पहुँच चुके थे। राजस्थान सरकार के एक अधिकारी एन. एन. गोडबोले ने इस नदी के क्षेत्र में विविध कुओं के जल का रासायनिक परीक्षण करने पर पाया था कि सभी के जल में रसायन एक जैसा ही है। जबकि इस नदी के क्षेत्र के कुओं से कुछ फर्लांग दूर स्थित कुओं के जलों का रासायनिक विश्लेषण दूसरे प्रकार का निकला। अनुसंधान कर्ताओं ने यह भी पाया कि राजस्थान के रेत के नीचे बाढ़ की मिट्टी की मोटी तह है, जो इस बात की प्रतीक है कि यहाँ कोई बड़ी नदी वर्षानुवर्ष तक बहती रही है एवं उसी के कारण यह बाढ़ की मिट्टी यहाँ इकट्ठी हुई है। कुछ दिन पूर्व ही केन्द्रीय जल बोर्ड के वैज्ञानिकों को हरियाणाऔर पंजाब के साथ-साथ राजस्थान के जैसलमेर जिले में सरस्वती नदी की मौजूदगी के ठोस सबूत मिले हैं। (‘दैनिक जागरण‘, 10.1.2002) +ऐसी स्थिति में यह मान लिया जाना कि सरस्वती नदी का कोई अस्तित्त्व नहीं है उचित नहीं है। निश्चित ही यह भी एक भ्रान्ति ही है, जो भारत के इतिहास को ‘विकृत‘ करने की दृष्टि से जान बूझकर फैलाई गई है। +भारत का शासन समग्र रूप में एक केन्द्रीय सत्ता के अन्तर्गत केवल अंग्रेजों के शासनकाल में आया, उससे पूर्व वह कभी भी एक राष्ट्र के रूप में नहीं रहा. +भारतवर्ष के संदर्भ में केन्द्रीय सत्ता का उल्लेख वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, पुराणों आदि में मिलता है और यह स्वाभाविक बात है कि ग्रन्थों में उल्लेख उसीबात का होता है जिसका अस्तित्त्व या तो ग्रन्थों के लेखन के समय में हो या उससे पूर्व रहा हो। यद्यपि यह भी सही है कि आधुनिक मानदण्डों के अनुसार सत्ता का एक राजनीतिक केन्द्र समूचे देश में कदाचित नहीं रहा किन्तु अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों और पुराणों म ें विभिन्न साम्राज्यों के लिए सार्वभौम या समुद्रपर्यन्त जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है। इस बात के उल्लेख भी प्राचीन ग्रन्थों में मिलते हैं कि अनेक चक्रवर्ती सम्राटों ने अश्वमेध, राजसूय या वाजपेय आदि यज्ञ करके देश में अपनी प्रभुसत्ताएँ स्थापित की थीं। इसीप्रकार से कितने ही सम्राटों ने दिग्विजय करके सार्वभौम सत्ताओं का निर्माण भी किया था। ऐसे सम्राटों में प्राचीन काल के यौवनाश्व अश्वपति, हरिश्चन्द्र, अम्बरीश, ययाति, भरत, मान्धाता, सगर, रघु, युधिष्ठिर आदि और अर्वाचीन काल के महापद्मनन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं। +यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक मानदण्डों के अनुसार केवल वे ही शासक चक्रवर्ती सम्राट की पदवी पाते थे और वे ही अश्वमेध आदि यज्ञ करने के अधिकारी होते थे, जिनका प्रभुत्व उस समय के ज्ञात कुल क्षेत्र पर स्थापित हो जाता था। प्रकारान्तर से यह प्राचीन भारतीय परिवेश और मानदण्डों के अनुसार केन्द्रीय सार्वभौम सत्ता का ही द्योतक है अतः पाश्चात्यों की उपरोक्त मान्यता तत्त्वतः सही नहीं है। +सांस्कृतिक दृष्टि से तो प्रारम्भ से ही भारत एक राष्ट्र के रूप में रहा है। यहाँ के अवतारी पुरुष, यहाँ के महापुरुष, यहाँ का इतिहास, यहाँ की भाषाएँ,यहाँ के त्यौहार, यहाँ के मठ-मन्दिर, यहाँ की सामाजिक मान्यताएँ, यहाँ के मानबिन्दु आदि देश के सभी भागों, सभी राज्यों और सभी क्षेत्रों के निवासियों को जहाँ एक संगठित और समान समाज के अंग बनाने में सहायक रहे हैं वहीं उनमें यह भावना भी भरते रहे हैं कि वे सब एक ही मातृभूमि या पितृभूमि की सन्तान हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि राष्ट्र एक सांस्कृतिक अवधारणा है। इस दृष्टि से विचार करने पर पाश्चात्यों तथा उनके परिवेश में ढले-पले भारतीय विद्वानों द्वारा प्रस्तुत यह विचार कि भारत राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है या यह देश प्रशासनिक दृष्टि से कभी एक केन्द्रीय सत्ता के अधीन नहीं रहा, न केवल भ्रामक सिद्ध होता है अपितु इस राष्ट्र के तेजोभंग करने के उद्देश्य से गढ़ा गया प्रतीत होता है। राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक किसी भी दृष्टि से क्यों न हो गहराई से विचार करने पर यह स्वार्थवश और जानबूझ कर फैलाया गया मात्र एक भ्रम लगता है क्योंकि भारत के प्राचीन ग्रन्थ अथर्ववेद में कहा गया है - ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः‘ (अ. 12.1.12) अर्थात यह भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं। अथर्ववेद के 4.2.5 के अनुसार हिमालय से समुद्र पर्यन्त फैला हुआ क्षेत्र भारत का ही था। विष्णुपुराण के 2.3.1 में कहा गया है- हिमालय के दक्षिण और समुद्र के उत्तर का भाग भारत है और उसकी सन्तान भारतीय हैं। +महाभारत के भीष्म पर्व के अध्याय 9 में भारत भूमि के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए उसे एक राष्ट्र के रूप में ही चित्रित किया गया है। तमिल काव्य संग्रह ‘पाडिट्रूप्पट्ट‘ में दी गई विभिन्न कविताएँ भी इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं जिनमें देश का वर्णन कन्याकुमारी से हिमालय तक कहकर किया गया है। +सदियों से ऋषि-महर्षि, साधु-सन्यासी, योगी-परिव्राजक, दार्शनिक-चिन्तक, कवि-लेखक आदि सबने इस देश को सदा-सर्वदा ही एक देश माना है। दक्षिण में पैदा हुए शंकराचार्य कश्मीर और असम क्यों गए और उन्होंने देश के चार कोनों में चार धाम क्यों स्थापित किए ? क्या इसीलिए नहीं कि वे इस देश को एक मानते थे ? असम के सन्त शंकरदेव और माधवदेव ने भी भारतवर्ष की बात की है - +इससे यह निष्कर्ष सहज ही में निकल आता है कि कन्याकुमारी से हिमालय तक फैले समस्त क्षेत्र में रहने वालों के लिए सदा से ही भारतवर्ष जन्मभूमि, कर्मभूमि और पुण्यभूमि रहा है और उनके लिए इस देश का कण-कण पावन, पूज्य और पवित्र रहा है फिर चाहे वह कण भारत के उन्नत ललाट हिमगिरि के धवल हिम शिखरों का हो या कन्याकुमारी पर भारत माँ के चरण प्रक्षालन करते हुए अनन्त सागर की उत्ताल तरंगों का। +भारत की इस समग्रता को और यहाँ के रहने वालों की इस समस्त भूमि के प्रति इस भावना को देखते हुए यह विचार कि भारत का शासन अंग्रेजों के आने से पूर्व समग्र रूप में कभी भी एक केन्द्रीय सत्ता के अधीन नहीं रहा और भारत कभी एक राष्ट्र के रूप में नहीं रहा, वह तो राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है, मात्र एक भ्रान्ति ही है जो जान बूझकर फैलाई गई है और आज भी फैलाई जा रही है। + +विकृतीकरण का निष्कर्ष: +लौटें, भारतीय इतिहास का विकृतीकरण +पूर्व पृष्ठों में किए गए विवेचन से भारत और उसके इतिहास के संदर्भ में पाश्चात्यों विशेषकर अंग्रेजों की मानसिकता का पूरा-पूरा परिचय मिल जाता है। यही नहीं, तत्कालीन सत्ता द्वारा इस देश में सप्रयास पैदा किए गए उनके समर्थकों ने अपने तात्कालिक लाभ के लिए स्वार्थवश भारत और भारतीयता (देश, धर्म, समाज, इतिहास और संस्कृति) के साथ कैसा व्यवहार किया, इसका भी ज्ञान हो जाता है। ऐसा करने वालों में कोई एक वर्ग विशेष ही नहीं, शासक, रक्षक, शिक्षक, पोषक, संस्कृतज्ञ, इतिहासज्ञ, साहित्यकार आदि सभी वर्ग सम्मिलित रहे हैं। सभी ने अपने-अपने ढंग से भारतीय इतिहास को बिगाड़ने में सत्ता का पूरा-पूरा सहयोग दिया किन्तु गहराई मेंजाने पर पता चलता है कि सबके पीछे मूल कारण देश की पराधीनता ही रही है। +पराधीनता एक अभिशाप. +पराधीन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र अपना स्वत्त्व और स्वाभिमान ही नहीं अपना गौरव और महत्त्व भी भूल जाते हैं। भारत ने भी परतंत्रता काल में अपनी उन सभी विशिष्टताओं और श्रेष्ठताओं को विस्मृति के अन्धकार में विलीन कर दिया था, जिनके बल पर वह विश्वगुरु कहलाया था। यहाँ पहले मुस्लिम राज्य आया और फिर अंग्रेजी सत्ता, दोनों ने ही अपने-अपने ढंग से देश पर अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया। दोनों ने ही भारत के हर कथ्य और तथ्य को अत्यन्त हेय दृष्टि से देखकर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का अपमूल्यांकन करकेउसे कम से कम करके आंका। +अंग्रेजों की दृष्टि में भारतवासियों का मूल्यांकन. +भारत में अंग्रेजी सत्ता के आने पर हर अंग्रेज अपने को भारत का राजा समझने लगा था। वह हर भारतवासी को एक गुलाम से अधिक कुछ भी नहीं समझता था, फिर चाहे वह भारत में प्रशासन से सम्बंधित हो या इंग्लैण्ड में सत्ता से अथवा इंग्लैण्ड के साधारण परिवार से। उस समय भारतीयों के बारे में अंग्रेजों के विचार सामान्य रूप में बहुत ही घटिया स्तरके थे। वे भारतीयों को बड़ी तिरस्कृत, घृणास्पद, उपेक्षित और तुच्छ दृष्टि से देखते थे। +ऐसी मानसिकता वाले लोगों की छत्रछाया में पोषित और प्रेरित विद्वानों द्वारा आधुनिक ढंग से लिखा गया भारत का इतिहास, उस भारत को, जो अपनी आन, बान और शान के लिए, अपनी योग्यता, गरिमा और महिमा के लिए, अपने गुरुत्व, गाम्भीर्य और गौरव के लिए प्राचीन काल से ही विश्व के रंगमंच पर विख्यात रहा था, एक ऐसी धर्मशाला के रूप में प्रस्तुत करता है कि जिसमें, जिसने, जब और जहाँ से भी चाहा घुस आया, यहाँ कब्जा जमाया और मालिक बनकरबैठ गया तो बहुत आश्चर्य की बात नहीं लगती। +भारत का आधुनिक रूप में लिखित इतिहास विजित जाति का इतिहास. +भारत का आधुनिक रूप में लिखित इतिहास विजित जाति का इतिहास भारत का आधुनिक रूप में लिखित इतिहास विजित जाति का इतिहास भारत का आधुनिक रूप में लिखित इतिहास विजित जाति का इतिहास वर्तमान में सुलभ भारत का इतिहास अंग्रेजों के शासनमें अंग्रेजों के द्वारा या उनके आश्रय में पलने वाले अथवा उनके द्वारा लिखित इतिहासों को पढ़कर इतिहासज्ञ बने लोगों के द्वारा रचा गया है। जब भी विजेता जातियों द्वारा पराधीन जातियों का इतिहास लिखा या लिखवाया गया है तो उसमें विजित जातियों को सदा ही स्वत्त्वहीन, पौरुषविहीन, विखण्डित और पतित रूप में चित्रित करवाने का प्रयास किया गया है क्योंकि ऐसा करवाने में विजयी जातियों का स्वार्थ रहा है। वे विजित जाति की भाषा, इतिहास और मानबिन्दुओं के सम्बन्ध में भ्रम उत्पन्न करवाते रहे हैं अथवा उन्हें गलत ढंग से प्रस्तुत करवाते रहेे हैं क्योंकि भाषा, साहित्य, इतिहास और संस्कृति विहीन जाति का अपना कोई अस्तित्व ही नहीं होता। अतः पराधीनता के काल में अंग्रेजों द्वारा लिखा या लिखवाया गया भारत का इतिहास इस प्रवृत्ति से भिन्न हो ही नहीं सकता था। +भारत का वास्तविक इतिहास तो मानव जाति का इतिहास. +भारत के पुराणों तथा अन्य प्राचीन ग्रन्थों में सुलभ विवरणों के आधार पर ही नहीं, पाश्चात्य जगत के आज के अनेक प्राणीशास्त्र के ज्ञाताओं, भूगर्भवैज्ञानिकों, भूगोल के विशेषज्ञों, समाजशास्त्रियोंऔर इतिहासकारों के मतानुसार भी सम्पूर्ण सृष्टि में भारत ही मात्र वह देश है जहाँ मानव ने प्रकृति-परमेश्वर के अद्भुत, अनुपम और अद्वितीय करिश्मों को निहारने के लिए सर्वप्रथम नेत्रोन्मेष किया था, जहाँ जन्मे हर व्यक्ति ने कंकर-कंकर में शंकर के साक्षात दर्शन किए थे, जहाँ के निवासियों ने सर्वभूतों के हित में रत रहने की दृष्टि से प्राणी मात्र के कल्याण के लिए ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः‘, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘, ‘आत्मवत सर्वभूतेषु‘ जैसे महान सिद्धान्तों का मात्र निर्माण ही नहीं किया, सहस्रानुसहस्र वर्षों तक उनपर आचरण भी किया और जहाँ के साहित्य-मनीषियों ने वेदों, ब्राह्मणों, आरण्यकों उपनिषदों जैसे आध्यात्मिक ग्रन्थों, पुराणों, रामायणों और महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रन्थों और गीता जैसे चिन्तन प्रधान ग्रन्थों के रूपमें पर्याप्त मात्रा में श्रेष्ठतम ऐसा साहित्य दिया, जिसमें सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर आज तक का पूरा इतिहास सुलभ है, जिसमें मानव के उद्भव और विकास के क्रम कीविभिन्न सीढ़ियों के साथ-साथ उसके आज की विकसित स्थिति तक पहुँचने का पूरा ब्योरा सुलभ है अर्थात उनमें पूरी मानवता का इतिहास विद्यमान है। यही कारण है कि विश्व के किसी भी क्षेत्र के साहित्य या वहाँ की सभ्यता को लें तो उस पर किसी न किसी रूप में भारत की छाप अवश्य ही मिलेगी। इसीलिए तोभारत के इतिहास को मानव जाति का इतिहास कहा जाता है। +भारतीय परम्पराओं और तथ्यों के विपरीत लिखा गया इतिहास भारत का इतिहास नही. +भारतीय परम्पराओं और तथ्यों के विपरीत लिखा गया इतिहास भारत का इतिहास नही भारतीय परम्पराओं और तथ्यों के विपरीत लिखा गया इतिहास भारत का इतिहास नही भारतीय परम्पराओं और तथ्यों के विपरीत लिखा गया इतिहास भारत का इतिहास नहीं किसी भी देश विशेष का इतिहास उस देश से सम्बंधितऔर उस देश में सुलभ साक्ष्यों के आधार पर ही लिखा जाना चाहिए और ऐसा होने पर ही वह इतिहास उस देश की माटी से जुड़ पाता है। तभी उस देश के लोग उस पर गर्व कर पाते हैं किन्तु भारतवर्ष का आधुनिक रूप में लिखा गया जो इतिहास आज सुलभ है वह भारत के आधारों को पूर्णतः नकारकर और उसके प्राचीन साक्ष्यों को बिगाड़ कर, यथा- कथ्यों की मनमानी व्याख्या कर, उसकी पुरातात्विक सामग्री के वैज्ञानिक विश्लेषणों से निकले निष्कर्षों के मनचाहे अर्थ निकालकर, मनवांछित विदेशीआधारों को अपनाकर लिखा गया है। इसीलिए उसमें ऐसे तत्त्वों का नितान्त अभाव है, जिन पर सम्पूर्ण देश के लोग एक साथ सामूहिक रूप में गर्व कर सके। +आज भारत स्वतंत्र है। यहाँ के नागरिक ही देश के शासकहैं। अतः यह अत्यन्त आवश्यक है कि देश के हर नागरिक के मन में भारतीयता की शुद्ध भावना जागृत हो। भारतीयता की शुद्ध और सुदृढ़ भावना के अभाव में ही आज देश को विकट परिस्थितियों में से गुजरना पड़ रहा है। कम से कम आज भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह ज्ञान तो हो ही जाना चाहिए कि वह इसी भारत का मूल नागरिक है, उसके पूर्वज घुमन्तु, लुटेरे और आक्रान्ता नहीं थे। वह उन पूर्वजों का वंशज है जिन्होंने मानव के लिए अत्यन्त उपयोगी संस्कृति का निर्माण ही नहीं किया, विश्व को उदात्त ज्ञान और ध्यान भी दिया है और उसके पूर्वजों ने विश्व की सभी सभ्यताओं का नेतृत्व किया है। साथ ही उन्होंने अखिल विश्व को अपने-अपने चारित्र्य सीख लेने की प्रेरणा भी दी है - +इतिहास घटित होता है निर्देशित नहीं, जबकि भारत के मामले में इतिहास निर्देशित है। इसलिए आधुनिक ढंग से लिखा हुआ भारत का इतिहास, इतिहास की उस शास्त्रीय परिभाषा के अनुसार, जो भारतीय ऋषियों ने दी थी, इतिहास है ही नहीं। अतः आज आधुनिक रूप में लिखित भारत के इतिहास पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है और वह भी भारतीय साक्ष्यों के आधार पर क्योंकि वर्तमान में सुलभ इतिहास निश्चित ही भारत का और उस भारत का, जो एक समय विश्वगुरु था, जो सोने की चिड़िया कहलाता था और जिसकी संस्कृति विश्व-व्यापिनी थी, हरगिज नहीं है। + +निवेश शिक्षा: +इक्विटी शेयर क्या है? +इक्विटी शेयर को साधारण भाषा में आर्डिनरी शेयर भी कहा जाता है। इससे किसी कंपनी में अमुक अंश की हिस्सेदारी व्यक्त होती है। इक्विटी शेयरधारक कंपनी की लाभ हानि में, अपने शेयरों की संख्या के अनुपात में व्यवसायिक हिस्सेदार होता है। इसे कंपनी के सदस्य का दर्जा प्राप्त होने के साथ कंपनी के प्रस्तावों पर अपना विचार व्यक्त करने तथा मत देने का अधिकार प्राप्त है। +राइट इश्यु/राइट शेयर किसे कहते है? +जब कोई कंपनी अपने मौजूदा शेयरधारकों को उनकी अंशधरिता के अनुपात में नयी सिक्युरिटीज प्रस्तावित करती है तो इसे राइट इश्यु या राइट शेयर कहा जाता है। शेयरधारकों को राइट शेयर खरीदने का अधिकार मिलता है परंतु यह उसकी इच्छा पर निर्भर है कि वह इसका उपयोग करे या न करे। +इक्विटी शेयर धारकों के अधिकार क्या हैं? +इक्विटी शेयरधारक कंपनी के हिस्सेदार ही कहलाते हैं इसलिए इन्हें कंपनी का वित्तीय कार्य परिणाम तथा आर्थिक व्यवहार जानने का अधिकार है। इसके लिए उसे प्रतिवर्ष सम्पूर्ण विवरण सहित बेलेंसशीट एवं वार्षिक रिपोर्ट प्राप्त करने का अधिकार है। कंपनी के अपने मुख्य कारोबार के दैनिक कामकाज के विवरण को छोडकर, किसी भी पॉलिसी में परिवर्तन करने, नए शेयर जारी करने तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए शेयरधारकों की अनुमति लेनी पडती है। इसके लिए वर्ष में कम से कम एक बार वार्षिक सभा करनी आवश्यक है जिसमें निवेशक मंडल की बैठकों में पारित प्रस्ताव रखने पड़ते हैं। वार्षिक सभा की सूचना के साथ इन प्रस्तावों की प्रति भी शेयरधारकों को इस तरह भेजनी होती है ताकि वह उन्हें वार्षिक सभा से पहले मिल जाए। शेयरधारकों को इन प्रस्तावों के पक्ष में अथवा इनके विरूद्ध अपने विचार रखने का अधिकार है। कंपनी की लेखा पुस्तकों या अन्य जरूरी दस्तावेजों को जांचने का अधिकार भी शेयरधारकों को है। +बोनस शेयर अर्थात क्या? +कंपनी अपने वार्षिक लाभ को सम्पूर्ण रूप से लाभांश के रूप में वितरित नहीं करती है। इसका कुछ हिस्सा वह संचय खाते में जमा करती जाती है जो कुछ वर्षो में एक बड़ी राशि बन जाती है। कंपनी अपनी भावी विकास योजना या अन्य योजनाओं के लिए इस राशि को पूंजी खाते में हस्तांतरित करने के लिए इतनी ही राशि के शेयर बतौर बोनस अपने मौजूदा अंशधारकों को अनुपातिक आधार पर दे देती है। इन शेयरों का शेयरधारकों से कोई मूल्य नहीं लिया जाता। +प्रेफरेंस शेयर किसे कहते हैं? +इस प्रकार के शेयरधारकों को प्रतिवर्ष पूर्व निर्धारित दर से लाभांश दिया जाता है। यह लाभांश कंपनी के लाभ में से दिया जाता है परंतु इसका भुगतान इक्विटी शेयरधारकों को लाभांश देने से पहले किया जाता है। यदि कंपनी का दिवाला निकलता है तो प्रेफरेंस शेयरधारक को उसका हिस्सा इक्विटी शेयरधारकों से पहले परंतु बॉण्ड होल्डरों, डिबेंचरधारकों आदि लेनदारों को चुकाने के बाद, मिलने का अधिकार है। +क्युम्युलेटिव प्रेफरेंस शेयर क्या है? +ऐसे शेयरधारकों को पूर्व निर्धारित दर पर प्रतिवर्ष लाभांश नहीं दिया जाता बल्कि यह कंपनी के पास जमा होता रहता है। जब कभी भी कंपनी अपने इक्विटी शेयरधारकों को लाभांश देती है तो उससे पहले क्युम्युलेटिव प्रेफरंस शेयरधारकों को लाभांश दिया जाता है। ऐसी स्थिति में इनको उक्त अवधि तक का पूरा संचित लाभांश दिया जाता है। +क्युम्युलेटिव कन्वर्टिबल प्रेफरेंस शेयर किसे कहते हैं? +यह एक प्रकार का प्रेफरेंस शेयर ही है जिसमें निर्धारित दर पर लाभांश संचित होते हुए एक साथ ही चुकाया जाता है परंतु इसमें एक निर्धारित अवधि भी होती है जिसके पूरा होने पर उन्हें संचित लाभांश का भुगतान तो कर ही दिया जाता है साथ ही ये शेयर स्वतः इक्विटी शेयर में रूपांतरित हो जाते है। +मैं इक्विटी शेयर कैसे प्राप्त कर सकता हूं? +आप प्राइमरी मार्केट से सार्वजनिक निर्गम के दौरान आवेदन करके या फिर शेयर बाजार के मान्यता प्राप्त ब्रोकर के माध्यम से सेकेन्ड्री मार्केट में शेयर खरीद सकते हैं। +प्राइमरी मार्केट अर्थात क्या? +कोई कंपनी जब अपनी परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिए सार्वजनिक निर्गम जारी करती है तो इस निर्गम के माध्यम से आवेदन करके शेयर पाने तथा कंपनी द्वारा शेयर आबंटित करके उनको सूचीबद्ध कराने तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया/व्यवहार `प्राइमरी मार्केट' के कार्यक्षेत्र में आता है। +सेकेन्ड्री मार्केट किसे कहते हैं? +कंपनी सार्वजनिक निर्गम द्वारा आवेदकों को शेयर आबंटित करने के बाद उन्हें पंजीकृत शेयर बाजार में सूचीबद्ध करवाती है। सूचीबद्धता के बाद सार्वजनिक निर्गम के जरिए प्राइमरी मार्केट में आबंटित किए गये शेयरों की खरीद बिक्री की जा सकती है और इसी व्यवहार/कारोबार को सेकेन्ड्री मार्केट में सम्मलित किया गया है। साधारण भाषा में जब कोई व्यक्ति आवेदन करके कंपनी से सीधे शेयर लेता है तो यह प्राइमरी मार्केट का व्यवहार कहलाता है परंतु जब यही शेयर वह अन्य किसी शेयरधारक से खरीदता है या अन्य को बेचता है तो यह व्यवहार सेकेन्ड्री मार्केट का कहलाता है। +सेकंडरी मार्केट. +सेकंडरी मार्केट का आशय क्या है? +प्राइमरी मार्केट में प्रारंभ में, निवेशकों को सिक्युरिटीज आफर की जाती है और स्टॉक एक्सचेंज में उसे सूचीबद्ध कराने के बाद उसकी ट्रेडिंग सेकंडरी मार्केट में होती है। सेकंडरी मार्केट के दो भाग हैः इक्विटी और डेब्ट मार्केट। सामान्य निवेशकों के लिए सेकंडरी मार्केट सिक्युरिटीज की ट्रेडिंग के लिए प्रभावशाली मंच देता है। +प्राइमरी और सेकंडरी मार्केट के बीच क्या अंतर है? +प्राइमरी मार्केट में धन जुटाने के लिए लोगों को निर्गम द्वारा सिक्युरिटीज का आफर किया जाता है। सेकंडरी मार्केट इक्विटी ट्रेडिंग का ऐसा मार्ग है, जिसमें अस्तित्ववाली पहले जारी की गई सिक्युरिटीज की ट्रेडिंग होती है। सेकंडरी मार्केट आक्शन या डीलर मार्केट हो सकता है। स्टॉक एक्सचेंज आक्शन बाजार का हिस्सा है, जबकि ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) डीलर बाजार का हिस्सा है। +सेकंडरी मार्केट में किस प्रोडक्ट्स की ट्रेडिंग होती है? +सेकंडरी मार्केट में मुख्यतः इक्विटी शेयरों, राइट शेयरों, बोनस शेयर्स, प्रेफरंस शेयर्स, क्युम्युलेटिव प्रेफरेंस शेयर्स, क्युम्युलेटिव कन्वर्टिबल प्रेफरेंस शेयर्स, पार्टिसिपेंट प्रेफरेंस शेयर्स, सिक्युरिटीज रिसिप्ट, सरकारी प्रतिभूतियों (गवर्नमेन्ट सिक्युरिटीज), डिबेंचर्स, बांड्स, जीरो कूपन बांड्स, कन्वर्टिबल बांड्स, कामर्शियल पेपर्स, ट्रेजरी बिल्स आदि सिक्युरिटीज की ट्रेडिंग होती है। +शेयर बाजार में सौदा करने के लिए किससे संपर्क करना चाहिए? +पंजीकृत ब्रोकर अथवा सब-ब्रोकर से संपर्क करना चाहिए। +ब्रोकर का क्या मतलब है? +मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज का सदस्य हो और जिसे विभिन स्टाक एक्सचेंज की स्क्रीन आधारित ट्रेडिंग सिस्टम पर सौदा करने का अधिकार हो उसे ब्रोकर कहा जाता है। +सब-ब्रोकर किसे कहा जाए? +सेबी में दर्ज हो और मान्यता प्राप्त एक्सचेंज के सदस्य के साथ संलग्न व्यक्ति को सब-ब्रोकर कहा जाता है। +सब-ब्रोकर रजिस्टर्ड है या नहीं, इसका पता कैसे लगाएं? +सेबी द्वारा जारी की गई रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जांच कर आप विश्वास कर सकते हैं। ब्रोकर का रजिस्ट्रेशन नंबर `आईएनबी' से शुरू होता है। जबकि सब-ब्रोकर का नंबर `आईएनएस' से शुरू होता है और इस सेगमेंट में उप दलाल नहीं होता। +क्या ब्रोकर या सब-ब्रोकर के साथ हमें करार करना होता है? +शेयरों का सौदा करने के लिए आप को ब्रोकर के साथ एक करार `मेंबर क्लायंट एग्रीमेंट' करना पडता है। सीधे ब्रोकर के बदले सब-ब्रोकर के मार्फत काम करने को इच्छुक हों तो आपको त्रिपक्षीय करार-ब्रोकर-सब-ब्रोकर और निवेशक करार करना पडता है। यह करार नान-ज्युडिशियल स्टेम्प पेपर पर करना होता है। +यूनिक क्लायंट कोड का आशय क्या है? +ग्राहकों के डेटाबेस का रखरखाव करने के लिए सभी दलालों को यूनिक क्लायंट कोड का उपयोग करना लाजिमी है। इस क्लायंट कोड से ग्राहक की विशिष्ट पहचान बनी रहती है। +रिस्क डिस्क्लोजर डाक्युमेन्ट क्या है? +निवेशकों को स्टॉक मार्केट की ट्रेडिंग की विभिन जोखिमों से अवगत कराने के लिए एक्सचेंज के सदस्यों को अपने ग्राहकों के साथ रिस्क डिस्क्लोजर डाक्युमेंट पर सही करना पडता है। इस डाक्युमेंट में बाजार की घटबढ़, प्रवाहिता, नई घोषणाएं, अफवाह आदि संबंधित जोखिमों को दर्शाया जाता है। +मेरे सौदे का आर्डर दिया गया है या नहीं, यह कैसे जानें? +स्टॉक एक्सचेंज प्रत्येक सौदे को यूनिक आर्डर कोड नंबर देता है, जिसकी जानकारी ब्रोकर द्वारा ग्राहक को दी जाती है कि सौदा किया गया है। आर्डर कोड नंबर कांट्रेक्ट नोट में छपा रहता है। ब्रोकर आर्डर देता है तो उसका समय भी दर्ज होता है। +सौदा होने के बाद ब्रोकर से कौन सा दस्तावेज लेना चाहिए? +आप को एक्सचेंज में सौदा करने के बाद निम्नांकित दस्तावेज ब्रोकर से लेना चाहिए। फार्म ए में कांट्रेक्ट नोट। यदि कांट्रेक्ट नोट कम्प्यूटर सर्जित हो तो वह हस्ताक्षर युक्त हो, यह देखना चाहिए। ब्रोकर से कांट्रेक्ट नोट लेने का आग्रह करें, क्योंकि व्यापार के कराराधीन हक और दायित्व की पुष्टि उससे होती है। सौदे में विवाद खड़ा हो तो आर्बिट्रेशन के माध्यम से निपटान करने की व्यवस्था का लाभ लेने का प्रावधान भी कांट्रेक्ट नोट में है। सिर्फ ब्रोकर कांट्रेक्ट नोट जारी कर सकता है। +एसटीटी क्या है? +सिक्युरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (एसटीटी) स्टॉक एक्सचेंज में किये गये सभी सौदे पर लिया जाता है। यह केन्द्रीय कर है। +रोलिंग सेटलमेंट का क्या मतलब है? +रोलिंग सेटलमेंट में जिस दिन सौदा हुआ हो उसका वास्तविक लेनदेन उसी दिन बराबर करना होता है। फिलहाल रोलिंग सेटलमेंट टी + 2 के अनुसार होता है। यहां टी अर्थात सौदे का दिन। सोमवार को सौदा किया हो तो बुधवार को उसे सेटल करना होता है। +पे-इन डे और पे-आउट डे का क्या आशय है? +पे-इन डे यह वह दिन है जब दलालों को अपने सौदे की सिक्युरिटीज की डिलीवरी या भुगतान करना होता है। रोलिंग सेटलमेंट साइकिल टी + 2 है। पे-आउट के दिन ब्रोकरों को बेचे गए शेयरों का धन और खरीदे गए शेयरों की +डिलीवरी मिलती है। एक्सचेंज को इसका ध्यान रखना पड़ता है कि पे-आउट के 24 घंटे के भीतर ग्राहक को भुगतान या सिक्युरिटीज की डिलीवरी हो जाए। +मेरे खाते में तुरंत शेयर्स की डिलीवरी आ जाए ऐसा कोई रास्ता है क्या? +ऐसा प्रावधान है। इसके लिए आप को अपने खाता और डीपी का डीपी-आईडी का ब्यौरा और डिलीवरी लेने के लिए स्थाई सूचना अपने डीपी को देनी पडती है। यह ब्यौरा देने पर क्लीयरिंग हाउस पे-आउट का आदेश डीपाजिटरी को भेजेगा इससे सिक्युरिटीज की डिलीवरी या भुगतान सीधे आप के खाते में होगा। +मार्जिन ट्रेडिंग फेसिलिटी (सुविधा) क्या है? +मार्जिन ट्रेडिंग उधार लिए गए धन/सिक्युरिटीज द्वारा की जाने वाली ट्रेडिंग है। यह ऐसी व्यवस्था है कि जिसमें निवेशक अपने संसाधनों द्वारा जो जोखिम उठा सकता है उससे अधिक जोखिम वे ले सकते हैं। सेबी ने मार्जिन ट्रेडिंग फेसिलिटी (सुविधा) की पात्रता और प्रक्रिया का नियम बनाया है। कम से कम तीन करोड़ रू. की नेटवर्थ वाले कार्पोरेट ब्रोकर मार्जिन फेसिलिटी अपने क्लायंट को आफर कर सकते हैं। ग्राहक को यह फेसिलिटी लेने के वास्ते सेबी द्वारा निर्धारित की गई फार्मेट में ब्रोकर के साथ करार करना होता है। ग्राहकों को ऐसा आश्वासन देना पड़ता है कि वह इस सुविधा को एक समय में एक से अधिक ब्रोकर से नहीं लेगा। +सेबी की रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम क्या है? +सेबी का कार्य बाजार में विभिन जोखिमों को दूर करने पर केन्द्रित है। इसके लिए शेयर बाजार सेबी के साथ तालमेल रखकर उसकी नीतियों की पुनर्समीक्षा और रिस्क मैनेजमेंट नीतियां बनाता रहता है। इसे रिस्क मैनेजमेंट कहा जाता है। इन नीतियों के तहत भिन भिन मार्जिन और नियंत्रण अस्तित्व में है, जिसमें से मुख्य इस प्रकार हैंः प्रवाहिता और भाव के घटबढ़ की मात्रानुसार स्क्रिप्स का वर्गीकरण और तद्नुसार मार्जिन, वैल्यू एट रिस्क (वीएआर) मार्जिन, मार्क टू मार्केट मार्जिन और अन्य विभिन प्रकार की मार्जिन तय करने और वसूलने, मार्जिन के भुगतान की समय सीमा निर्धारित करने, मार्जिन वसूलना आदि। +यदि मेरा शेयर या धन परिपक्वता की तारीख को नहीं मिले तो क्या करना चाहिए? +यदि ब्रोकर सिक्यिरिटीज की डिलीवरी अथवा समय पर भुगतान करने में विफल हो तो आप संबंधित एक्सचेंज में ब्रोकर के विरूद्ध शिकायत दर्ज करा सकते हैं। एक्सचेंज सभी शिकायतें दूर करेगा। विवाद के समाधान के लिए निवेशक आर्बिट्रेशन का सहारा ले सकता है। +बीएसई इन्डोनेक्स्ट क्या है? +पिछले कुछ वर्षों में प्रादेशिक स्टॉक एक्सचेंज (आरएसई) में कामकाज अत्यंत घट गया है इसलिए छोटी और मध्यम वर्ग की कंपनियां नया संसाधन जुटाने में कठिनाई का अनुभव करती हैं, क्योंकि सेकंडरी बाजार में इन कंपनियों की सिक्युरिटीज में सौदा नहीं होता। परिणाम स्वरूप निवेशक ऐसी कंपनियों के शेयरों में किए गए पूंजी निवेश से बाहर नहीं निकल सकते। बीएसई इन्डोनेक्स्ट की रचना ऐसी छोटी और मध्यम वर्ग की कंपनियों, इन कंपनियों के निवेशक और पूंजी बाजार के लाभ के लिए की गई है। बीएसई आनलाइन ट्रेडिंग सिस्टम (बोल्ट) के तहत बीएसई और फेडरेशन ऑफ इंडियन स्टॉक एक्सचेंज (एफआईएसई) द्वारा बीएसई इन्डोनेक्स्ट की रचना की गई है। 18 प्रादेशिक एक्सचेंज उसके सदस्य हैं। +डेरिवेटिव्स मार्केट. +निवेशकों के मन में डेरिवेटिव्स के विषय में जो सर्व सामान्य प्रश्न उठते हैं उसकी सूची और उत्तर हम प्रस्तुत करते हैं। +डेरिवेटिव्स मार्केट अर्थात क्या? +डेरिवेटिव्स शब्द डिराइव्स शब्द से आया है। डिराइव्स अर्थात किसी एक वस्तु आदि के आधार पर तैयार हुआ कोई मूल्य। शेयर बाजार में किसी भी शेयर स्टाक या इंडेक्स के आधार पर इसमें सौदा होने से इस मार्केट को डेरिवेटिव्स मार्केट कहा जाता है। यह एक तरह से वायदा ही है। +डेरिवेटिव्स मार्केट में सौदा कैसे होता है? +इसमें शेयर बाजार द्वारा तय किए गए और रखे गए शेयरों का पूर्व निर्धारित लाट में शेयर का एक, दो या तीन माह का कांट्रेक्ट जारी किया जाता है। यह कांट्रेक्ट इस्यूकर्ता के रूप में शेयर बाजार द्वारा नियुक्त किए गए कुछ दलाल होते हैं, जिसे कांट्रेक्ट राइटर कहा जाता है, जो बाजार में कांट्रेक्ट की मांग के आधार पर कांट्रेक्ट का भाव और प्रीमियम आफर करते हैं। +यह कांट्रेक्ट कितने प्रकार का होता है? +बीएसई पर दो तरह के कांट्रेक्ट इस्यू (जारी) किए जाते है। जिसमें से एक है प्युचर्स और दूसरा आप्श्न्स कांट्रेक्ट । प्युचर्स तथा आप्शन्स दोनों में पुनः दो तरह के कांट्रेक्ट जारी किए जाते हैं। प्युचर्स मार्केट में सेंसेक्स प्युचर्स और स्टाक प्युचर्स होते है। इसी तरह आप्शन्स मार्केट में भी सेंसेक्स आप्शन्स और स्टाक आप्शन्स होते हैं। +प्युचर्स कांट्रेक्ट किसे कहा जाता है? +प्युचर्स कांट्रेक्ट का अर्थ भविष्य में एक निर्दिष्ट तारीख को निश्चित सिक्युरिटीज (अंडरलाइंग सिक्युरिटीज) के क्रय-विक्रय करने का कांट्रेक्ट। अवधि पूरी होने पर इस सिक्युरिटीज के तत्कालीन भाव तथा कांट्रेक्ट में निर्धारित भाव के बीच के फर्क का भुगतान करके इसका निपटान किया जा सकता है। +आप्शन कांट्रेक्ट किसे कहा जाता है? +आप्शन कांट्रेक्ट, कांट्रेक्ट खरीदनेवाले/रखनेवाले को अंडरलाइंग एसेट एक निर्धारित समयावधि के अन्त में अथवा पूर्वनिर्धारति भाव पर खरीदने या बेचने का अधिकार दिलाता है, परन्तु वह उसकी जवाबदारी नही बन जाती। आप्शन कांट्रेक्ट को खरीदनेवाला या धारक कांट्रेक्ट राइटर से सिर्फ मूल्य का फर्क पाने का हकदार माना जाता है जिसके लिए उस कांट्रेक्ट राइटर को प्रीमियम चुकाना पडता है। जब खरीदनेवाला इस कांट्रेक्ट के तहत उसे प्राप्त करने के अधिकार का उपयोग करें तब कांट्रेक्ट की शर्त पूर्ण करने का दायित्व आप्शन राइटर का होता हैं। +सेंसेक्स प्युचर्स क्या हैं? +सेंसेक्स प्युचर्स, भविष्य की निश्चित तारीख को सेंसेक्स खरीदने या बेचने का कांट्रेक्ट है। आपके सेंसेक्स के शेयरों के पोर्टफोलियों की हेजिंग के लिए तथा बाजार के बारे में अपना मंतव्य व्यक्त करने के लिए भी यह साधन अत्यंत उपयोगी बन रहा है। +एक्सचेेंज में इसका सौदा कैसे होता हैं? +बीएसई में सेंसेक्स प्युचर्स में 50 सेंसेक्स का लाट होता है। यह कांट्रेक्ट एक से तीन महिने का होता है। उसकी टीक साइज 0.01 पाइंट रखी जाती है। सेंसेक्स का भाव सेंसेक्स का ही वैल्यू होता है। कांट्रेक्ट का अंतिम दिन महिने का अंतिम गुरूवार (यदि उस दिन छुट्टी हो तो अगले कामकाज के दिन) होता है एवं इस अंतिम दिन ही निपटान होता है। +स्टाक प्युचर्स किसे कहा जाता हैं? +स्टाक प्युचर्स एक ऐसा वित्तीय डेरिवेटिव्स प्रोडक्ट है जिसमें आपको किसी एक शेयर को आगे की तारीख में बाजार द्वारा कांट्रेक्ट तैयार करते समय ही निर्धारित किये गये भाव पर खरीदने या बेचने की सुविधा मिलती है। +एक्सचेंज पर स्टाक प्युचर्स का सौदा कैसे होता हैं? +इसमें कैश मार्केट से संबंधित शेयरों का अंडरलाइंग स्टाक के रूप में कांट्रेक्ट होता है। इसमें प्रत्येक शेयर के बारे में अलग अलग लाट हो सकता है। कांट्रेक्ट कम से कम दो लाख रू. या एक्सचेंज अथवा सेबी द्वारा निर्दिष्ट किसी निश्चित रकम से कम न रहे, उस ढ़ंग से यह लाट तय किया जाता हैं। इसमें कांट्रेक्ट एक, दो या तीन माह का भी हो सकता है। टीकसाइज कम से कम एक पैसा का हो सकता है। इसलिए कि कम से कम एक पैसे के फर्क पर भी कांट्रेक्ट के शेयर का सौदा हो सकता हैं। इसमें शेयर का वैल्यू उसके प्रति शेयर वैल्यू के समान ही होता है। इसमें भी कांट्रेक्ट का अंतिम दिन महिने का अंतिम गुरूवार (यदि उस दिन छुट्टी हो तो उसके अगले कामकाज का दिन) होता है और इस अंतिम दिन ही निपटान होता है। +सेंसेक्स आप्शन किसे कहा जाता है? +सेंसेक्स आप्शन्स में बाजार के घटकों द्वारा निर्धारित किया गया प्रीमियम चुका कर अंडरलाइंग शेयरों में कॉल या पुट आप्शन्स (जिसका भविष्य की तारीख पर अमल किया जा सके) खरीदने अथवा बेचने की सुविधा मिलती है। +एक्सचेंज पर इसका सौदा कैसे होता हैं? +इसमें अंडरलाइंग एसेट सेंसेक्स होता है और उसका लाट 50 सेंसेक्स का होता हैं तथा वैल्यू भी सेंसेक्स की प्रचलित वैल्यू ही मानी जाती है। इसमें भी टीकसाइज 0.01 सेंसेक्स पाइंट होती है और उसका कांट्रेक्ट के अंतिम दिन अर्थात महिने के अंतिम गुरूवार को नगद में निपटान किया जाता है। +स्टाक आप्शन्स क्या हैं? +स्टाक आप्शन्स में बाजार घटकों द्वारा तय शुद्ध प्रीमियम पर अंडरलाइंग स्टाक पर कॉल या पुट आप्शन्स की खरीदी या बिक्री करने का अधिकार मिलता है। इसमें अंडरलाइंग स्टाक एक्सचेंज द्वारा तय किए शेयर होते हैं। उसका लाट भी एक्सचेंज या मार्केट रेग्युलेटर द्वारा निर्दिष्ट न्यूनतम कांट्रेक्ट अनुसार प्रत्येक शेयर का अलग अलग होता है। यह कांट्रेक्ट एक, दो या तीन महिने का भी हो सकता है। इसमें प्रति शेयर रूपए में ही प्रीमियम बोला जाता है। इसमें भी टीकसाइज 0.01 का ही होता है। सेटलमेंट वैल्यू बीएसई के कैश सेगमेंट से संबंधित शेयरों के बन्द भाव के मुताबिक होती है। इसमें कांट्रेक्ट पूर्ण होने के अंतिम दिन महिने के अंतिम गुरूवार (यदि उस दिन छुट्टी हो तो उसके अगले कामकाज का दिन होता हैं) के ही उसका निपटान होता हैं। इसमें कांट्रेक्ट पूरा होने की तारीख को या उसके अमल की तारीख को उस दिन के कैश मार्केट के बंद भाव और कांट्रेक्ट वैल्यू के बीच के फर्क का निपटान करना होता है। +कॉल आप्शन्स और पुट आप्शन्स क्या हैं? +कोई अंडरलाइंग एसेट्स भविष्य में खरीदने के लिए जो कांट्रेक्ट प्राप्त किया गया हो उसे काल आप्शन्स कहा जाता है। जब कोई अंडरलाइंग एसेट्स भविष्य में बेचने के लिए जो कांट्रेक्ट प्राप्त किया गया हो उसे पुट आप्शन्स कहा जाता है। +फारवर्ड कांट्रेक्ट क्या हैं? +फारवर्ड कांट्रेक्ट अर्थात ऐसा करार कि जिसमें दो पार्टियां आज तय हुए भाव पर भविष्य की निश्चित तारीख को कांट्रेक्ट का सेटलमेंट करने को सहमत हों। +टीक साइज क्या है? +टीक साइज `0.01' रखी गयी है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि प्युचर के वाल्यूम में न्यूनतम भाव का अंतर 0.01 तक रहेगा तो रूपए के मूल्य में यह भाव फर्क न्यूनतम 0.50 रू. में रूपांतरित होता है। (टीक साइज गुणा कांट्रेक्ट मल्टिप्लायर बराबर 0.01 गुणा 50 रू.) +सेटलमेन्ट का अंतिम भाव कैसे तय होता है? +टीक साइज `0.01' रखी गयी है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि प्युचर के वाल्यूम में न्यूनतम भाव का अंतर 0.01 तक रहेगा तो रूपए के मूल्य में यह भाव फर्क न्यूनतम 0.50 रू. में रूपांतरित होता है। (टीक साइज गुणा कांट्रेक्ट मल्टिप्लायर बराबर 0.01 गुणा 50 रू.) +मार्जिन मनी क्या है? +यदि कोई पार्टी डिफाल्टर हो जाए तो ऐसे अवसरों के लिए जोखिम की मात्रा कम करने के लिए मार्जिन मनी ली जाती है। खड़े सौदों का अगले दिन निपटान करने के लिए, भाव में होने वाली घट-बढ़ की जोखिम को मर्यादित करने के लिए मार्जिन राशि का भुगतान, सुरक्षा प्रदान करता है। मार्जिन मनी भविष्य में होने वाली हानि अथवा सिक्युरिटीज डिपाजिट के रूप में बीमा की भूमिका निभाती है। +मार्जिन मनी के अलग अलग प्रकार क्या हैं? +य्मार्जिन के तीन अलग अलग प्रकार हैं। शुरूआत का मार्जिन, वेरिएशन मार्जिन (मार्क टू मार्केट अथवा एम टू एम), एक्सपोजर मार्जिन अथवा अतिरिक्त मार्जिन। +निवेश पूर्व जरूरी बातें. +पूंजीनिवेश करने से पूर्व आप को उसमें संबंधित संपूर्ण जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। जानकारी हासिल करने के बाद ही आप भावी नुकसान से बच सकेंगे। हमने कुछ ऐसे प्रश्नों की सूची तैयार की है, जो आपको पूंजी निवेश करने से पूर्व अपने शेयर दलाल अथवा म्युच्युअल फंड एजेंट से पूछना चाहिए। अच्छा दलाल अथवा एजेंट आप के प्रश्नों का स्वागत करेगा क्योंकि वे जानते हैं कि शिक्षित-जागृत निवेशक ही उसकी संपत्ति है +सिक्युरिटीज में निवेश करने से पूर्व आप स्वयं से पूछिए. +उसके संचालक कितने अनुभवी हैं? +म्युच्युअल फंड. +म्युच्युअल फंड में निवेश करने के इच्छुक निवेशकों को म्युच्युअल फंड और उसके कामकाज के विषय में जो सामान्य प्रश्न उठते हैं उसकी सूची हम यहां प्रस्तुत करते हैं। +म्युच्युअल फंड क्या है? +म्युच्युअल फंड ऐसा तंत्र है जिसमे म्युच्युअल फंड कंपनियां निवेशकों को यूनिट जारी करके धन जुटाती हैं और फिर उस धन का आफर डाक्युमेंट में उल्लेखित नियमों के अनुसार विभिन सिक्युरिटीज में निवेश किया जाता हैं। विविध उद्योगों की सिक्युरिटीज में निवेश होने से जोखिम घटता है। म्युच्युअल फंड में निवेशकर्ताओं को यूनिट होल्डर कहा जाता है। +म्युच्युअल फंड का गठन कैसे किया जाता है? +म्युच्युअल फंड का गठन एक ट्रस्ट के रूप में किया जाता है जो स्पांसर (प्रायोजक), ट्रस्टी, एसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) और कस्टोडियन के अधीन होता है। ट्रस्ट की स्थापना एक या उससे अधिक स्पांसर द्वारा की जाती है। कंपनी में जिस तरह प्रमोटर होते हैं उसी तरह म्युच्युअल फंड में प्रायोजक होते हैं। म्युच्युअल फंड के ट्रस्टी लोग निवेशकों के लाभार्थ फंड की प्रापर्टी धारण कर रखते हैं। सेबी द्वारा मान्यता प्राप्त एसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) विभिन सिक्युरिटीज में पूंजी निवेश द्वारा धन का प्रशासन करती है। सेबी द्वारा मान्य कस्टोडियन विविध स्कीमों की सिक्युरिटीज अपने कब्जे में रखता है। एएमसी पर सर्वसामान्य देखरेख और नियंत्रण की सत्ता ट्रस्टियों की होती है। वे फंड के कार्य का संचालन करते हैं और सेबी के नियमों का पालन हो, यह देखते हैं। सेबी के नियमानुसार ट्रस्टी कंपनी के डाइरेक्टर अथवा ट्रस्टी मंडल के दो तिहाई सदस्य स्वतंत्र होने चाहिए ताकि वे स्पांसर के साथ जुडे न हों। इसके अलावा एएमसी के 50 प्रतिशत डाइरेक्टर स्वतंत्र होने चाहिए। सभी म्युच्युअल फंडो को कोई भी स्कीम खोलने से पहले सेबी का रजिस्ट्रेशन प्राप्त करना पडता है। +योजना की नेट एसेट वैल्यू का आशय क्या है? +स्कीम के कामकाज का संकेत एनएवी द्वारा मिलता है। सरल शब्दों में कहें तो एनएवी अर्थात स्कीम द्वारा धारण की गई सिक्युरिटीज का प्रति यूनिट बाजार मूल्य। बाजार भाव रोजाना बदलता रहता है। इसलिए एनएवी भी रोजाना बदलती रहती है। एनएवी अर्थात स्कीम की सिक्युरिटीज के कुल बाजार मूल्य में कुल यूनिटों की संख्या का भाग देने पर प्राप्त राशि। म्युच्युअल फंड दैनिक या साप्ताहिक आधार पर एनएवी घोषित करता है। +म्युच्युअल फंड योजनाएं कितने प्रकार की होती हैं? +म्युच्युअल फंड योजनाओं को मुख्यतः दो प्रकारों में बांटा जा सकता है। ओपन एंडेड फंड स्कीम और क्लोज एंडेड स्कीम। ओपन एंडेड फंड ऐसी योजना है कि जिसमें सबस्क्रिप्शन भर कर पेश हो सकती हैं और उसकी लगातार पुनः खरीदी भी की जा सकती है। जबकि क्लोज एंडेड स्कीम पांच या सात वर्ष की निर्धारित योजना होती है। यह फंड खुलने के बाद निर्धारित अवधि तक सबस्क्रिप्शन के लिए खुला रहता है और उसके बाद निवेशकों को इस यूनिट की खरीदी या बिक्री शेयर बाजार से करनी होती है। निवेशकों को स्कीम में से निकल जाने का विकल्प देने के वास्ते कुछ क्लोज एंडेड फंड समय-समय पर एनएवी आधारित मूल्य पर पुनः खरीदी करते हैं। ये म्युच्युअल फंड सामान्यतः साप्ताहिक आधार पर एनएवी घोषित करते हैं। इसके अलावा निवेश उद्देश्य के आधार पर म्युच्युअल फंड योजनाएं निम्नानुसार प्रकार की होती हैं। +ग्रोथ इक्विटी स्कीम. +ग्रोथ फंड का उद्देश्य मध्यम से दीर्घ काल की पूंजी वृद्धि का होता है। ऐसे फंड तुलनात्मक ढ़ंग से ऊँचे जोखिम वाले होते हैं। यह योजना निवेशक को डिविडंड या पूंजी वृद्धि का विकल्प देती हैं। निवेशक को आवेदन पत्र में अपनी पसंद का विकल्प दर्शाना होता है। निवेशक बाद में उस विकल्प को बदल भी सकता है। दीर्घकालीन पूंजी निवेश के लिए यह योजना बहेतर हैं। +इन्कम/डेट स्कीम. +इन्कम फंड का उद्देश्य निवेशकों को नियमित और स्थिर आय उपलब्ध कराना है। यह स्कीम सामान्यतः बांड्स, कंपनी के डीबेंचर्स और सरकारी प्रतिभूति जैसी स्थिर आय दिलाने वाली सिक्युरिटीज में निवेश करती है। इसमें इक्विटी स्कीम की तुलना में जोखिम कम होती है परन्तु लाभ भी सीमित रहता है। +बैलेंस फंड. +इस फंड का उद्देश्य निवेशकों की पूंजी वृद्धि और स्थिर आय दिलाने का है। आफर डाक्युमेंट में बताए अनुसार डेब्ट और इक्विटी में सामान्यतः 40ः60 के अनुपात में निवेश किया जाता है। +मनीमार्केट या लिक्विड फंड. +यह फंड भी इन्कम फंड है। यह फंड प्रवाहिता, पूंजी की रक्षा और मध्यम आय दिलाता है। यह स्कीम अल्पावधि के धन साधनों जैसे कि ट्रेजरी बिल्स, सर्टिफिकेट आफ डीपाजिट, कामर्शियल पेपर्स और कॉलमनी, सरकारी प्रतिभूति आदि में निवेश करते हैं। +गिल्ट फंड. +यह फंड सिर्फ सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करता है। सरकारी प्रतिभूतियों में डीफाल्ट की जोखिम नहीं होती। +इंडेक्स फंड. +इंडेक्स फंड प्रमुख शेयर सूचकांक जैसे कि सेंसेक्स, निप्टी में समाविष्ट शेयरों में निवेश करते हैं। इंडेक्स में शेयरों का जितना वेटेज होता है उतना ही वेटेजवाला पोर्टफोलियों वे तैयार करते हैं। परिणाम स्वरूप इंडेक्स के घटने या बढ़ने के साथ इस फंड की एनएवी भी घटती या बढ़ती है। +5 टैक्स सेविंग स्कीम क्या हैं? +टैक्स सेविंग स्कीम में निवेशकों को आयकर अधिनियम 1961 के प्रावधानों के तहत कर लाभ मिलता है। उदाहरणार्थ इक्विटी लिन्क सेविंग स्कीम और म्युच्युअल फंड द्वारा खुली पैंशन स्कीम। इस योजना का उद्देश्य एनएवी बढ़ाना है और मुख्यतः इक्विटी में निवेश करते हैं। +लोड या नो-लोड फंड अर्थात क्या? +लोड फंड अर्थात जिस फंड में निवेशक को प्रवेश करने या उससे बाहर आने के लिए एनएवी आधारित चार्ज चुकाना पड़ता है जबकि नो लोड फंड में इस तरह का चार्ज चुकाने की जरूरत नहीं पडती। +एस्योर्ड रिटर्न (भरोसेमंद प्रतिफल) स्कीम क्या है? +इस प्रकार के फंड में युनिट धारक को फंड के वितीय कार्य परिणाम से प्रभावित हुए बिना एक निश्चित प्रतिफल देने का विश्वास दिया जाता है। इसमें स्पांसर या एएमसी को इस बात की सम्पूर्ण गारंटी देनी होती है और इसका उल्लेख डाक्युमेंट आफ ऑफर में करना होता है। +ऑफर डाक्युमेंट में निवेशकों को क्या देखना चाहिए? +ऑफर डाक्युमेंट को ध्यान से पढ़ना चाहिए इसमें स्कीम की मुख्य विशेषताएं, जोखिम तत्त्व, प्रारंभिक खर्च, स्कीम के अन्य खर्च, प्रवेश या निकास लोड, स्पांसर का कार्य परिणाम, ट्रेक रिकार्ड, शैक्षणिक योग्यताएं, फंड मैनेजरों सहित मुख्य व्यक्तियों के अनुभव आदि का समावेश होता है। निवेशक को ये सारी बातें जाननी चाहिए। +म्युच्युअल फंड में निवेश के बाद निवेशक को सर्टिफिकेट अथवा स्टेटमेंट कब मिलेगा? +क्लोज एन्डेड स्कीम के मामले में प्रारंभिक जमा बंद होने के छः सप्ताह के भीतर तथा ओपन एन्डेड स्कीम के मामले में 30 दिनों के भीतर। +म्युच्युअल फंड आफर डाक्युमेंट में दर्शायी गई स्कीम का रूप बदल सकता हैं? +हां, लेकिन इसके लिए युनिट होल्डर को लिखित जानकारी देनी जरूरी है और यदि युनिट होल्डर को बदलाव पसंद न हो तो उसे एक्जिट लोड चुकाए बिना योजना से हट जाने का अधिकार है। +म्युच्युअल फंड का कार्य परिणाम कैसे जाना जाए? +योजना के वित्तीय परिणाम का प्रतिबिम्ब नेट एसेट वेल्यू (एनएवी) में प्रतिबिम्बित होता है जिसे ओपन एन्डेड योजनाओं के मामलों में दैनिक तथा क्लोज एन्डेड योजनाओं में साप्ताहिक अवधि पर समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाता है। म्युच्युअल फंड की वेबसाइट पर भी यह जानकारी उपलब्ध होती है। एसोसिएशन आफ म्युच्युअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) की वेबसाइट पर तमाम फंडों की एनएवी उपलब्ध कराना जरूरी है। इस तरह निवेशकों को एक ही स्थान पर अनेकों फंडों की एनएवी मिल जाती है। +म्युच्युअल फंड ने निवेशकों का धन कहां लगाया है इसका कैसे पता लगाया जाए? +म्युच्युअल फंड को अपनी स्कीम के पोर्टफोलियो की सूची हर छठे महिने समाचार पत्रों में प्रकाशित करनी होती है। इसके अलावा उन्हें अपने त्रिमासिक न्यूजलेटर में इसे प्रकाशित करना होता है। +यदि एक ही प्रकार की दो फंड योजनाएं हो तो इसमें से कम एनएवी वाली स्कीम में निवेश करना चाहिए? +ऐसा नहीं करना चाहिए। निवेशक को फंड के भूत काल के कार्य परिणाम, सर्विस के स्तर, व्यवसायिक संचालन आदि के आधार पर फंड का चुनाव करना चाहिए। ऊंची एनएवी वाला फंड, कम प्रतिफल दे, ऐसी स्थिति भी हो सकती है। +नाम से म्युच्युअल बेनिफिट शब्दोंवाली कंपनियां म्युच्युअल फंड है क्या? +नहीं। +स्पांसर की नेटवर्थ ऊँची होने पर अच्छा लाभ मिलेगा? +ऐसा कतई नहीं है। +म्युच्युअल फंड स्कीम समेट ली जाए तो निवेशक के धन का क्या होगा? +स्कीम समेट लिए जाने की स्थिति में म्युच्युअल फंड वर्तमान एनएवी आधारित रकम में से खर्चे की राशि काट कर बची हुई राशि निवेशकों को दे देते हैं। +निवेशक की शिकायत का समाधान कैसे होगा? +किसी भी प्रश्न या शिकायत की स्थिति में निवेशकों को ऑफर डाक्युमेंट में उल्लेखित व्यक्तियों से सम्पर्क करना चाहिए। म्युच्युअल फंड का संचालन ट्रस्टी करते हैं। एसेट मेनेजमेंट कंपनी और ट्रस्टियों का नाम ऑफर डाक्युमेंट में होता है। निवेशक शिकायतों के निपटान के लिए सेबी से भी सम्पर्क कर सकते हैं। निवेशक की शिकायत मिलने के बाद सेबी म्युच्युअलफंड के समक्ष शिकायत रखकर उसे दूर करती है। निवेशक नीचे लिखे पते पर अपनी शिकायतें भेज सकते हैं। +करन्सी प्युचर्स. +रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने भारतीय बाजार में एक्सचेंज ट्रेडेड करेंसी प्यूचर शुरू करने के लिए संयुक्त रूप से विश्वभर के करेंसी फारवर्ड एंड प्यूचर मार्केट का विश्लेषण करके मार्गदर्शिका बनाने के लिए एक स्थाई तकनीकी समिति का गठन किया था। कमेटी ने 29 मई 2008 को एक्सचेंज ट्रेडेड प्यूचर्स पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस संदर्भ में आरबीआई और सेबी ने भी 6 अगस्त 2008 में एक परिपत्र जारी किया है। +वर्तमान समय में भारत के ओटीसी मार्केट में 34 अरब यूएस डॉलर का कारोबार होता है, जिसमें यूएस डॉलर, यूरो, येन, पाउंड, स्विस फ्रेंक आदि का समावेश है। इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग और प्रभावशाली जोखिम प्रबंधन प्रणाली की सहायता से एक्सचेंज ट्रेडेड करेंसी प्यूचर में पारदर्शिता के साथ मूल्य निर्धारण, काउंटर पार्टी क्रेडिट रिस्क, सभी प्रकार के बाजार भागीदारों का प्रवेश, मानकीकृत उत्पाद और पारदर्शी प्लेटफार्म उपलब्ध होगा। बैंक भी एक्सचेंज के इस सेंगमेंट में सदस्य बन सकेंगें, जिससे उन्हें इस बाजार में नये अवसर प्राप्त होंगे। +बीएसई अपने करेंसी डेरीवेटिव्स सेगमेंट के जरिए बीएसई -सीडीएक्स नाम से (वर्तमान में यूएस डॉलर - इंडियन रूपी) सेवा पेश करती है। +बीएसई - सीडीएक्स क्या है? +बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज लि. के करन्सी प्यूचर ट्रेडिंग सिस्टम को बीएसई - सीडीएक्स (बीएसई करन्सी डेरिवेटिव एक्सचेंज) कहा जाता है। +करन्सी प्यूचर्स क्या है? +बीएसई - सीडीएक्स पर ट्रेड किये जाने वाले करन्सी प्यूचर्स निर्धारित मात्रा के मानक कांट्रेक्ट एक मुद्रा का विनिमय दूसरी मुद्रा से भविष्य की निर्धारित तिथि, जिसे सेटलमेंट डेट कहा जाता है खरीद के दिन निर्धारित भाव प्यूचर्स प्राइस पर कहा जाता है +करन्सी प्यूचर में कारोबार क्यों? +करन्सी प्यूचर निवेशकों को दूसरी विदेशी मुद्राओं की तुलना में भारतीय रूपये के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव पर अपना दृष्टिकोण निर्धारित करने की अनुमति देता है। +बीएसई- सीडीएक्स पर ट्रेड किये जाने वाले दूसरे करन्सी डेरिवेटिव क्या हैं? +वर्तमान में सेबी द्वारा सिर्फ करन्सी प्यूचर्स के कारोबार (ट्रेडिंग) की अनुमति दी गई है। +करन्सी फारवर्ड का क्या अर्थ है? +करन्सी फारवर्ड कांट्रेक्ट का कारोबार ओवर-द-काउंट मार्केट में किया जाता जो सामान्यतः दो वित्तीय संस्थाओं अथवा किसी वित्तीय संस्था और उसके ग्राहक के बीच संपन होता है। +भारतीय विदेशी मुद्रा (फोरेक्स) बाजार किस तरह कार्य करता है? +विदेशी मुद्रा बाजार का नियमन विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) द्वारा किया जाता है। भारतीय विदेशी मुद्रा बाजार की नियामक संस्था रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) है। एक्सचेंज द्वारा ट्रेड किये जाने वाले करन्सी प्यूचर्स मार्केट का नियमन सेबी द्वारा, मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेजों के माध्यम से किया जाता है। +आरबीआई द्वारा अनुज्ञापत्र (लाइसेंस) प्राप्त अधिकृत डीलर विदेशी मुद्रा बाजार में सीधे तौर पर भाग ले सकते हैं। ये डीलर सामान्यतः अनुसूचित व्यावसायिक बैंक होते हैं। भागीदारों के समूह को फुल प्लेज्ड मनीचेंजर्स के रूप में लाइसेंस प्राप्त है जो सामान्य जनता के साथ मुद्रा विनिमय का कार्य करते हैं। +मुद्रा के अधिमूल्यन तथा मूल्य ह्रास का अर्थ क्या है? +मान लीजिए वर्तमान में एक अमेरिकी डॉलर की दर 43 भारतीय रूपये है। जब हम कहते हैं कि रूपये के मूल्य में डॉलर के मुकाबले वृद्धि हो रही है तो रूपये का मूल्य 42 रू. प्रति अमेरिकी डॉलर अथवा 43 रू. प्रति अमेरिकी डालर से कम कुछ भी हो सकता है। इसका अर्थ है कि अब हम 4300 रू. की जगह 4200 रू. में ही 100 अमेरिकी डॉलर की ख]रीद कर सकते है। इस तरह हमें कम भुगतान करना होता है। +अब हम मान लेते हैं कि वर्तमान दर 43 रू. प्रति अमेरिकी डॉलर है। अब जब हम कहते हैं कि रू. का मूल्य अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिर रहा है तो रूपये का मूल्य 44 रू. प्रति अमेरिकी डॉलर अथवा 43 रू. प्रति अमेरिकी डॉलर से अधिक कुछ भी हो सकती है। +इसका अर्थ है अब हमें 100 अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए 4300 रू. की जगह 4400 रू. चुकाने होते हैं, इस तरह हमें अधिक भुगतान करना होता है। +भारतीय फारेक्स बाजार में किस तरह की चंचलता रही है? +1993 में शुरू होने वाली अवधि निम्न मुद्रा चंचलता की अवधि थी। उसके बाद एशियाई संकट के समय उच्च मुद्रा चंचलता की अवधि आई इसके बाद फिर निम्न चंचलता की अवधि आई फिर पुनः उच्च चंचलता की अवधि आई। +काउंटर पार्टी अथवा क्रेडिट रिस्क क्या है? +बांबे स्टॉक एक्सचेंज का क्लियरिंग कार्पोरेशन, करन्सी डेरिवेटिव सेगमेंट में सभी क्लियरिंग मेंबरों के नेट सेटलमेंट आब्लीगेशनों की बिना शर्त गारंटी देता है। अतः क्लियरिंग मेंबर द्वारा उत्तरदायित्व से मुकरने की स्थिति में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज लि. का क्लियरिंग कार्पोरेशन नेट सेटलमेंट आब्लीगेशनों के लिए काउंटर पार्टी (प्रति पक्ष) के रूप में काम करता है तथा दूसरे बाजार भागीदार इससे अप्रभावित रहते हैं। +ट्रेडिंग कौन कर सकता है? +विदेशी संस्थागत निवेशकों तथा आनिवासी भारतीयों को छोड़कर कोई भी व्यक्ति, कंपनी, संस्था तथा बैंक ट्रेडिंग के लिए अधिकृत है। +बीएसई - सीडीएक्स में किन मुद्राओं की ट्रेडिंग की अनुमति है? +प्रारंभ में भारतीय रूपये के सामने अमेरिकी डॉलर के प्यूचर्स कारोबार की अनुमति दी गई है। उदाहरण के लिए सितंबर माह से संबंधित कांट्रेक्ट को यूएसडी सेप 2008 कहा जायेगा। +बीएसई - सीडीएक्स में कारोबारी समयावधि क्या है? +वर्तमान में करन्सी प्यूचर्स की ट्रेडिंग सोमवार से शुक्रवार तक सवेरे 9 बजे से सांय 5 बजे के बीच की जा सकती है। +बीएसई-सीडीएक्स में कारोबार (ट्रेडिंग) के लिए कितने कांट्रेक्ट उपलब्ध हैं? +वर्तमान में हर कॉम्बीनेशन (समिश्रण) के लिए स्प्रेड कांट्रेक्ट के साथ ट्रेडिंग के लिए 12 नीयर कैलेंडर मंथ कांट्रेक्ट उपलब्ध है। +स्प्रेड कांट्रेक्ट क्या है? +स्प्रेड कांट्रेक्ट ऐसी पोजीशन है जिसमें कोई ट्रेडर एक ही ऑर्डर के माध्यम से एक महीने में एक लांग/ बाई पोजीशन लेता है तथा दूसरे महीने में शार्ट/ सेल पोजीशन लेता है। +बीएसई - सीडीएक्स में यूएडी / आईएनआर के भाव का निर्धारण तथा ट्रेडिंग कैसे होगी? +बीएसई - सीडीएक्स में भारतीय मुद्रा तथा विदेशी मुद्रा की एक इकाई के बीच की विनिमय दर अंडरलाइंग वैल्यू (समाविष्ट मूल्य) होती है। +उदाहरण - यदि आखिरी ऑर्डर 42.1525 तो अगला ऑर्डर या तो 42.1550 अथवा 42.1500 होगा। +बीएसई - सीडीएक्स में लॉट साइज/कांट्रेक्ट साइज क्या है? +बीएसई-सीडीएक्स में निम्नतम लॉट साइज/ कांट्रेक्ट साइज की निम्नतम सीमा 1000 अमेरिकी डॉलर और 1000 अमरिकी डॉलर के गुणांक है। +बीएसई-सीडीएक्स प्यूचर्स की ट्रेडिंग कैसे की जाती है? +इक्विटी तथा इक्विटी डेरिवेटिव्स - सेगमेंट के समान ही बीएसई - सीडीएक्स में भी सिर्फ करन्सी डेरिवेटिव सेगमेंट में पंजीकृत ब्रोकर मेंबर के माध्यम से ही करन्सी ट्रेडिंग की जा सकती है। इसके साथ ही बीएसई के मेंबर द्वारा उपलब्ध करवाये गये इंटरनेट ट्रेडिंग प्लेटफार्म के माध्यम से भी ट्रेडिंग की जा सकती है। +स्वामित्व हासिल होने के पहले प्यूचर्स कांट्रेक्ट की बिक्री कैसे संभव है? +प्यूचर्स कांट्रेक्ट करते वक्त आपके पास अंडर लाइंग करन्सी हो यह आवश्यक नहीं है। इस तरह का कांट्रेक्ट निर्धारित समाप्ति तिथि पर संपत्ति की बिक्री अथवा खरीद की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करता है। +सेटलमेंट (निपटान) +क्या सभी प्यूचर्स कांट्रेक्टों में डिलीवरी की जाती है? +बीएसई - सीडीएक्स में करन्सी प्यूचर्स का नकद सेटलमेंट होता है। +सेटलमेंट प्राइस क्या होगी? +समाप्ति तिथि को रिजर्व बैंक की रिफरेंश रेट सेटलमेंट प्राइस होगी। +कौन सा दिन सेटलमेंट डे होगा? +करन्सी प्यूचर्स कांट्रेक्ट (शनिवार तथा एफईडीएआई अवकाशों को छोड़कर) हर माह के आखि]री कार्य दिवस को एक्सपायर (समाप्त) होगा। +जोखिम प्रबंधन +किस तरह के मार्जिनों का आरोपण किया जायेगा? +सेबी द्वारा स्वीकृत चार तरह के मार्जिन हैं - प्रारंभिक मार्जिन, एक्सट्रिम लॉस मार्जिन, कैलेंडर स्प्रेड मार्जिन तथा मार्क टू मार्केट मार्जिन। +इनीशियल मार्जिन कितना होगा? +करन्सी प्यूचर ट्रेडिंग के पहले दिन इनीशियल मार्जिन की दर 1.75 प्रतिशत होगी, उसके बाद यह 1 प्रतिशत की दर से लगेगी। +एक्सट्रीम लॉस मार्जिन की दर क्या होगी? +एक्सट्रीम लॉस मार्जिन ग्रॉस ओपेन पोजीशिन के मार्क-टू-मार्केट वैल्यू पर 1 प्रतिशत होती है। +कैलेंडर स्प्रेड मार्जिन कितना होगा? +कैलेंडर स्प्रेड, स्प्रेड के सभी महीनों के लिए 250 रू. होगा। कैलेंंडर स्प्रेड के लिए मिलने वाला लाभ नियर मंथ कांट्रेक्ट की समाप्ति तक मिलता रहेगा। +मार्क - टू - मार्केट मार्जिन क्या है? +बाजार में सदस्य के आउटस्टैंडिंग पोजीशन की माकि¥ग से प्राप्त दैनिक नफा या नुकसान को मार्कट - टू - मार्केट मार्जिन कहते हैं। +पोजीशन लिमिट +ग्राहक, टे्रेडिंग मेंबर तथा क्लियरिंग मेंबर के स्तर पर पोजीशन लिमिट क्या है? +ट्रेडिंग मेंबर स्तर - सभी कांट्रेक्टों में ट्रेडिंग मेंबर की ग्रॉस ओपेन पोजीशन कुल ओपेने इंटरनेट के 15 प्रतिशत अथवा 25 मिलियन डॉलर (इनमें से जो अधिक हो) से अधिक नहीं होनी चाहिए। किसी बैंक के ट्रेडिंग मेंबर होने की स्थिति में उसका ग्रॉस ओपने पोजीशन सभी कांट्रेक्टों में कुल ओपेने पोजीशन का 15 प्रतिशत अथवा 100 मिलियन डॉलर (इनमें से जो अधिक हो) से अधिक नहीं होना चाहिए। +ग्राहक - सभी कांट्रेक्टों में ग्राहक की ग्रॉस ओपने पोजीशन कुल ओपेन इंटररेस्ट का 6 प्रतिशत अथवा 5 मिलियन डॉलर (इनमें से जो अधिक हो) से अधिक नहीं होनी चाहिए। ग्राहक के ग्रॉस ओपने पोजीशन के कुल ओपेन इंटरेस्ट के 3 प्रतिशत से अधिक होने पर एक्सचेंज पिछले दिन की ट्रेडिंग के समाप्ति में चेतावनी जारी करेगी। +क्लियरिंग मेंबर - क्लियरिंग मेंबर के लिए किसी पृथक पोजीशन लिमिट का निर्धारण नहीं किया गया है। +डेब्ट मार्केट. +डेब्ट मार्केट के विषय में निवेशकों के मन में सामान्यत: जो प्रश्न उठते हैं उसकी सूची और उत्तर हम यहां प्रस्तुत करते हैं । +डेब्ट मार्केट क्या है ? +डेब्ट मार्केट ऐसा बाजार है कि जिसमें स्थिर आयवाली विभिन प्रकार की सिक्युरिटीज का क्रय-विक्रय होता है। यह सिक्युरिटीज अधिकांशत: केन्द्र और राज्य सरकारें, महानगर पालिकाएं, सरकारी संस्थाएं, व्यापारी संस्थाएं जैसे कि वित्त संस्थाएं, बैंकें, सार्वजनिक इकाईयां पब्लिक लि. कंपनियां जारी करती हैं । +मनी मार्केट क्या है ? +मनी मार्केट मूलतः अल्पावधि का सिक्युरिटीज मार्केट है । इस बाजार में सामान्यतः ट्रेजरी बिल्स, सर्टिफिकेट आफ डिपॉजिट (सीडी), कमर्शियल पेपर, बिल्स आफ एक्सचेंज और अन्य साधनों का समावेश होता है । इन साधनों की मूल अवधि एक वर्ष से अधिक नहीं होती । +व्यक्ति को स्थिर आय वाली सिक्युरिटीज में क्यों निवेश करना चाहिए ? +स्थिर आय वाली सिक्युरिटीज के मामले में परिपक्वता अवधि पर कितना लाभ मिलेगा इसका पहले से पता रहता है । डेब्ट सिक्युरिटीज पात्रता योग्य संस्थाओं द्वारा जारी की जाती हैं । ये संस्थाएं डेब्ट इंस्ट¦मेंट्स जारी करके धन जुटाती हैं । वे इन साधनों पर निर्धारित दर पर ब्याज देती हैैं और इस निवेश की उचित सुरक्षा भी होती है । स्थिर आय सिक्युरिटीज में निवेश की गई पूंजी सुरक्षित रहती है और इस में वृद्धि होती है साथ ही ब्याज की निश्चित आय भी होती है । निवेशक सरकारी प्रतिभूति में निवेश करके भुगतान की जोखिम से बच सकता है, क्योंकि सरकारी प्रतिभूति सार्वभौम गारंटी वाली होती है । ये प्रतिभूतियां सामान्यत: जोखिम मुक्त प्रतिभूतियां मानी जाती हैं । डेब्ट सिक्युरिटीज की कीमत अन्य सिक्युरिटीज की तुलना में कम चंचल होती है तथा अन्य पूंजी निवेश की अपेक्षा अधिक सुरक्षित होती है । डेब्ट सिक्युरिटीज में पर्याप्त विविधता है और इसमें निवेश के जोखिम को कम किया जा सकता है । +गवर्नमेंट सिक्युरिटीज (जी-सेक) में निवेश करने का क्या लाभ है? +सरकारी प्रतिभूतियों में भुगतान की जोखिम शून्य होती है, यह एक बडा लाभ है । (जी-सेक) के अन्य लाभ इस प्रकार हैं- +स्थिर आय की सिक्युरिटीज कौन जारी कर सकता है ? +केन्द्र और राज्य सरकार, सार्वजनिक संस्थाएं, विशेष कानून के तहत गठित निगम और कार्पोरेट बाडीज जैसी किसी भी वैद्यानिक संस्था द्वारा फिकस्ड इन्कम सिक्युरिटीज इश्यू हो सकती है । +विभिन प्रकार के इंस्ट्रुमेंट्स कौन से हैं ? +केन्द्र सरकार द्वारा जारी की जाने वाली सिक्युरिटीज में जीरो कूपन बांड्स, कूपन वाला बांड्स, ट्रेजरी बिल्स और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों द्वारा जारी बांड्स, डीबेंचर्स, राज्य सरकारों द्वारा जारी किया जाने वाला कूपन बियरिंग बांड्स, निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा जारी किया जाने वाला डीबेंचर्स, कमर्शियल पेपर्स, प्लोटिंग रेट बांड्स, जीरो कूपन बांड्स, इंटर कार्पोरेट डिपजिट सर्टिफिकेट्स, डिबेंचर्स, बैंकों द्वारा जारी सर्टिफिकेट्स आफ डिपाजिट, डिबेंचर्स, बांड्स और वित्तीय संस्थाओं द्वारा जारी किया जाने वाला बांड्स और डिबेंचर्स का समावेश है। +अर्थतंत्र में डेब्ट-मार्केट का क्या महत्त्व है ? +प्रभावशाली डेब्ट मार्केट से अर्थतंत्र में संसाधनों का सर्जन और आबंटन का कार्यकुशलता पूर्वक कामकाज होता है । विकास कार्यों के लिए सरकार को धन प्राप्त होता है । वित्तनीति को अमलीजामा पहनाने के संकेत मिलते हें । अल्प और दीर्धावधि के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए जरूरी प्रवाहिता उपलब्ध होती है । सरकारी प्रतिभूतियां सरकार की अल्प और दीर्धकालीन अवधि की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आन्तरिक ऋण, वित्तीय प्रशासन और अल्पावधि प्रवाहिता की योजना सुचारू रूप से हो सकती है । सरकारी प्रतिभूतियों पर मिलते लाभ को दिशानिर्देशक माना जाता है और अन्य सिक्युरिटीज की कीमतों का आधार उसी पर रहता है । +वित्त व्यवस्था और अर्थतंत्र के लिए कार्यकुशल डेब्ट मार्केट का क्या महत्त्व है ? +सरकार का कर्ज खर्च घटता है और वह उचित मूल्य पर संसाधनों को जुटा सकती है । सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के प्रोजेक्ट्स को ऋण के कई विकल्प मिलते हैं और संस्थागत ऋण पर दबाव घटता है । सोने में किए गए पूंजीनिवेश जैसे अप्रवाही पूंजी निवेश को निकाल कर अतिरिक्त संसाधन जुटाए जा सकते है । बाजार में +खिलाæडियों के लिए विविधता विकसित होती है । विश्वसनीय यील्ड कर्व का और ब्याज दर के ढांचे का विकास होता है । +डेब्ट सिक्युरिटीज संबंधित विभिन जोखिम क्या हैं ? +डेब्ट सिक्युरिटीज के साथ विभिन जोखिम इस प्रकार है- +पुन: निवेश का जोखिम : ब्याज दर घटने पर यह जोखिम खड़ा होता है । ऐसे समय में नियमित ऊंची ब्याज दर मिले ऐसे पूंजीनिवेश के विकल्प में कमी होती है । +डिपाजिटरी. +डिपाजिटरी के विषय में निवेशकों को जो सर्वसामान्य प्रश्न है उसकी सूची एवं उत्तर यहां प्रस्तुत है। +डिपाजिटरी का क्या आशय है ? +डिपाजिटरी अर्थात् शेयर / सिक्युरिटिज को इलेक्ट्रानिक रूप में सुरक्षित रखने की एक सुविधा, जिसमें सिक्युरिटीज का व्यवहार बुक एंट्री द्वारा पूर्ण किया जा सकता है ताकि वह मात्र इलेक्ट्रानिक रेकार्ड के रूप में रह सके। भारत ने डीमटीरियलाइजेशन का मार्ग पसंद किया है । भार में डिपाजिटरीी ऐसी संस्था है जो निवेशकों (बेनिफिसियल ओनर) की सिक्युरिटीज को इलेक्ट्रोनिक रूप में रजिस्टर्ड डिपाजिटरीी पर्टिसिपेन्ट (डीपी) के माध्यम से रखता है । +डिपाजिटरी की कार्यवाही कुछ हद तक बैंक जैसी है । डिपाजिटरीी द्वारा दी जाने वाली सेवाओं का लाभ उठाने के लिए निवेशकों को रजिस्टर्ड डिपी के माध्यम से खाता खोलना जरूरी है। +डीमेटीरियलाइजेशन क्या है ? +डीमटीरियलाइजेशन यह ऐसी प्रक्रिया है, जिससे फिजिकल शेयर सर्टिफिकेट्स इलेक्ट्रोनिक रूप में रूपान्तर किया जाता है । +बेनिफिसियल ओनर कौन होता है ? +बेनिफिसियल ओनर अर्थात वह व्यक्ति जो इलेक्ट्रोनिक रूप में सिक्युरिटीज रखने के लिए डिपाजिटरी पार्टिसिपेन्ट (डीपी) के साथ अपने नाम का एकाउंट खुलवाता है और जिसका नाम डिपाजिटरी में दर्ज रहता है। +डिपाजिटरी पार्टिसिपेन्ट कौन होता है ? +डिपाजिटरीी पार्टिसिपेंट यह डिपाजिटरीी का प्रतिनिधि होता है, जो यह सेवा निरेशकों को आफर करता है । वित्तीय संस्थाएं, बैंकें, कस्टोडियन और शेयर दलाल जैसी हस्तियां सेबी / डिपाजिटरी की निर्दिष्ट शर्तों के आधीन डीपी के रूपमें रजिस्टर्ड हो सकते है । +इस्यूअर अर्थात क्या ? +इस्यूअर अर्थात सिक्युरिटीज इस्यू करनेवाली कोई भी कंपनी । +आईएसआईएन अर्थात् क्या ? +आईएसआईएन (इन्टरनेशनल सिक्युरिटीज आइडेन्टिफिकेशन नम्बर) यह ऐसा परिचय क्रमांक है जो डिपाजिटरीी यन्त्र में सिक्युरिटीज दाखिल करते समय इस्यूअर की सिक्युरिटीज को आबंदित किया जाता है । +इस्यूअर द्वारा जारी की जाने वाली विभिन सिक्युरिटीज को एक ही ईएसआईएन नंबर दिया जाता है ? +नहीं, एक ही इस्यूअर द्वारा विभिन प्रकार की सिक्युरिटीज इस्यू की जाती हो तो भी उसका आईएसआईएन अलग अलग होता है । +डीपी द्वारा कौनसी सेवाए अर्पित की जाती है ? +डीपी द्वारा निम्नांकित सेवाएं दी जाती है- +डीमेट खाता खुलवाने से क्या लाभ होता है ? +डीमेट खाता खुलवाने से निविशकों को निम्नानुसार लाभ होता है । सेबी ने प्राय: प्रत्येक लिस्टेड शेयरों में निपटान डीमेट के रूप में करना आवश्यक बना दिया है । +500 शेयरों तक के शेयरों का निपटान फिजिकल रूप में हो सकता है फिर भी हस्ताक्षर नहीं मिलने, गलत हस्ताक्षर करने या जाली सार्र्टिफिकेट आदि कारणों से उत्पन होने वाली बैड डीलिवरी की दहशत से फिजिकल रूप में सौदे का निपटान लगभग नहीं होता । +फिजिकल स्वरूप की तुलना में सिक्युरिटीज रखने के लिए यह एक सुविधा जनक और सुरक्षित मार्ग है । +डीमेटवाली सिक्युरिटीज के ट्रांसफर पर कोई स्टैम्प डîाूटी नहीं भरनी पडती। +सिक्युरिटीज तत्काल ट्रांसफर होने से उसकी प्रवाहिता में वृद्धि होती है । +इससे विलम्ब, चोरी, डीलिवरी में गड़बड़ और उसके सर्टिफिकेट का संभावित दुरूपयोग टाला जा सकता है । +विभिन कंपनियों को अलग अलग सूचना देने की अपेक्षा डीपी को सिर्फ एक सूचना देकर पते में हेरफेर, पावर आफ एटार्नी की पंजीकरण और मृतक का नाम रद्द करना आदि हो सकता है । +सौदे के उद्देश्य से मार्केट लाट एक शेयर का होने से ऑड लाट की समस्या ही नहीं रहती। +एकही डीलिवरी आर्डर से चाहे जितनी संख्या में सिक्युरिटीज ट्रांसफर की जा सकती है । +कम मार्जिन और कम ब्याज पर सिक्युरिटीज के विरूद्द कर्ज लिया जा सकता है। +निवेशकों को डीपी के पास खाता खुलवाने के वास्ते क्या करना चाहिए ? +डीपी के माध्यम से डीमेट खाता खुलवाना काफी सरल और आसान है । यह प्रक्रिया बौंक एकाउंट खोलने जैसा ही है । इसके अलावा निवेशक को अपनी पहचान और पता का प्रमाण जैसे कि पेन (पर्मानेंट एकान्ट नंबर) कार्ड, पासपोर्ट, राशनकार्ड आदी डीपी के समक्ष पेश करना पड़ता है । +डीमेट खाता खुलवाने से पूर्व निवेशक को डीपी के साथ स्टैम्प पेपर पर करार करना होता है । जिसमें निवेशको तथा डीपी के अधिकार और दायित्व की जानकारी दी जाती है । +खाता खुलवाने के बाद एक विशिष्ट बीओ आईडी/ बेनिफिशियल ओनर आइडेन्टिफिकेश) क्रमांक दिया जाता है, जो भविष्य के प्रत्येक व्यवहार में होता है। +डीमेट खाता नामिनेशन की सुविधा प्रदान करता है ? +हां, प्रत्येक व्यक्तिगत बीओ डीमेट खाता के तहत नामिनेशन की सुविधा ली जा सकती है। +निवेशक मार्गदर्शन. +सिक्युरिटीज में सौदा करने वाले निवेशकों के हितों की रक्षा करना एक्सचेंज का मुख्य उद्देश्य हैं। इस उद्देश्य को हासिल करने के वास्ते इन्वेस्ट्र्स सर्विसेस सेल (आई एस सी) का गठन किया गया है। एक्सचेंज की सूची में शामिल कंपनियों के विरूद्ध शिकायत दूर करने तथा उसके सदस्यों एवं निवेशकों के बीच पंचाट प्रक्रिया में भी एक्सचेंज सहायता करता है। पूंजी बाजार का विकास तभी हो सकता है जब निवेशकों को कैपिटल मार्केट में निवेश करना सुरक्षित लगे और उन्हें विश्वास हो कि मार्केट का नियमन न्यायपूर्ण और सभी खिलाडि़यों के लिए तटस्थ है। एक्सचेंज पारदर्शी सौदे की कार्यवाही के अलावा निवेशकों के हितों की रक्षा करने और अपनी वेबसाइट के माध्यम से निवेशकों को जानकारी से अवगत कराने में भी सहायक सिद्ध होता है। गैर सदस्यों और सदस्यों के बीच मतभेद और विवादों का त्वरित और प्रभावशाली तरीके से निपटान और उसके पंचाट की प्रक्रिया एक्सचेंज ने निर्धारित की है। यह प्रक्रिया एक्सचेंज के नियम, उपनियम और नियमन में समाहित कर ली गई है, जो भारत सरकार/सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) द्वारा मान्यता प्राप्त है। +अधिकार. +मुंबई शेयर बाजार प्रत्येक निवेशक को कुछ निर्बाध अधिकार देता है जिसका निवेशक लाभ उठा सकते हैं। +1. कंपनी से जानकारी प्राप्त करना। +2. कंपनी की तरफ से कंपनी में होल्डिंग का ट्रांसफर , विभाजन और एकत्रीकरण जैसी जानकारी प्राप्त करना। +3. कंपनी द्वारा राइट निर्गम जारी करने पर शेयरधारकों के अधिकार जानना । +4. कांट्रेक्ट भाव के 2.5 प्रतिशत से अधिक दलाली शेयर दलाल नहीं ले सकते। +5. शेयर दलाल से निर्दिष्ट स्वरूप में प्राप्त कोंट्रेक्ट नोट में सौदे का भाव और शेयर दलाली अलग से दर्शानी पडती है। +6. निवेशकों को निपटान अवधि के बाद अधिक में अधिक तीसरे दिन ही उसे खरीदे शेयरों की डीलीवरी अथवा बेचे गए शेयरों की कीमत प्राप्त हो जानी चाहिए। +7. शेयर दलाल के साथ विवाद के मामले में एक्सचेंज की आर्बिट्रेशन सुविधा प्राप्त करना। +8. लिस्टेड कंपनियों/शेयर दलालों के विरूद्ध शिकायत के लिए इन्वेस्टर सर्विस सेल, बोम्बे स्टाक एक्सचेंज लि., पी. जे. टावर्स, दलाल स्ट्रीट, फोर्ट, मुंबई-400001 से संपर्क किया जा सकता है। +निवेशकों की सुरक्षा. +सिक्युरिटीज का सौदा करते समय निवेशकों की सामान्य सुरक्षा बरकरार रखने का भी बीएसई का उद्देश्य रहता है। इस विषय में बीएसई निवेशक वर्ग को हमेशा जानकारी और मार्गदर्शन प्रदान करता है। +दलाल/उपदलाल का चयन. +पूर्णरूपेण विश्वास प्राप्त कर और नियमों का पालन करने के बाद सिर्फ सेबी के साथ रजिस्टर्ड दलाल/उपदलाल के साथ काम करें। एक्सचेंज की वेबसाइट पर और एक्सचेंज द्वारा प्रकाशित की गई सदस्यों की सूची में से शेयर दलाल का चयन किया जा सकता है। +करार करना. +शेयर दलाल/उप-दलाल-क्लायंट एग्रीमेंट करें। अपने शेयर दलाल/सब ब्रोकर के साथ एक क्लायंट रजिस्ट्रेशन फार्म फाइल करें +सौदा करते समय. +अपने दलाल/उपदलाल तथा जिस पर सौदा हुआ हो उस संबंध में स्टाक एक्सचेंज का अलग एकाउंट तैयार करें। अपने दलाल से एक वैद्य कांट्रेक्ट नोट या सब ब्रोकर से कन्फर्मेशन (पुष्टिकरण) मेमो सौदा करने के 24 घंटे के भीतर लें लें। +कांट्रैक्ट नोट-फार्म-ए +यह कांट्रैक्ट नोट तब जारी किया जाता है जब एक दलाल एक ब्रोकर या एजेंट के बतौर कार्य करता है। +कांट्रैक्ट नोट-फार्म-बी +जब एक मुख्य दलाल स्वयं एक प्रिंसिपल के रूप में काम करे तब यह कांट्रैक्ट नोट जारी किया जाता है। +कांट्रैक्ट नोट-फार्म-सी +जब एक दलाल सब-ब्रोकर के रूप में उसके ग्राहक /इन्स्टिट्îाूट के लिए काम करता हो तब सब-ब्रोकर द्वारा यह कांट्रैक्ट जारी किया जाता है। +इस कांट्रेक्ट नोट/कंफर्मेशन मेमो में आर्डर नं., सौदे का नं., सौदे का समय, शेयरों की संख्या, भाव, दलाली आदि लिखी गई है या नहीं तथा उस पर अधिकृत व्यक्ति का हस्ताक्षर है या नहीं, उसकी जांच कर लें । +निपटान का भरोसा +आपने जो शेयर खरीदा है उस संदर्भ में शेयरों की डीलिवरी तथा बेचा हो तो उसका भुगतान आप को पे-आउट के दो दिन के भीतर हुआ है या नहीं उसकी सच्चाई का पता लगा लें। पे-आउट के बाद एक्सचेंज तत्काल अखबारी सूची घोषित करता है। +डीमेट शेयर की ही खरीदी और बिक्री पसन्द करें। +डीमेट खाता खुलवा कर रखें। +पे-आऊट के बाद दलाल के पूल एकाउंट में से अपने एकाउंट में तत्काल शेयर ट्रांसफर करा लें। +यदि आपको वास्तविक स्वरूप में डीलिवरी प्राप्त हुई हो तो वह सेबी की गुड/बैड डीलिवरी मार्गदर्शिका के अनुसार प्राप्त हुई है या नहीं इसकी जांच कर लें। +वास्तविक स्वरूप में शेयरों के स्वामित्व के लिए शेयरों का रजिस्ट्रेशन एक वैद्य, सम्पूर्ण भरे गए और स्टैम्प लगाए गए ट्रांसफर डीड के साथ प्रस्तुत करना होगा। +बैड डीलिवरी के मामले में एक्सचेंज तंत्र के माध्यम से इसे तत्काल सुलझााना होगा। +क्या करें - क्या न करें. +निवेश करने से पहले कृपया जांच लें। +बढ़ते कारोबार के कारण अधिकाधिक निवेशक शेयर बाजार सूचकांक में निवेश/कारोबार कर रहे हैं। इसलिए निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे शेयर बाजार में कारोबार करने के "क्या करें" और "क्या न करें" वाले पहलू जान लें, क्योंकि इसमें जोखिम भी है. शेयर बाजार से ताल्लुक रखने वाले निवेशकों के लिए नीचे "क्या करें" और "क्या न करें" की सूची दी गई है। +क्या करें? +1. हमेशा सेबी/एक्सचेंज में पंजीकृत बाजार/संस्थाओं के साथ संबंध रखें। +2. अपने ब्रोकर/एजेंट/डिपॉजीटरी पार्टिसिपेंट को स्पष्ट और सटीक निर्देश दें। +3. हमेशा अपने ब्रोकर से अनुबंध (कांट्रेक्ट) कागजात ले लें। सौदों के बारे में संदेह होने पर, एक्सचेंज की वेबसाइट पर उसकी वास्तविकता की पुष्टि करें। +4. बाजार मध्यस्थियों के बकाया भुगतान हमेशा सामान्य बैंकिंग माध्यमों से करें। +5. बाजार मध्यस्थियों को कोई आदेश जारी करने से पहले कंपनी, उसके प्रबंधन, फंडामेंटल्स और उनके द्वारा की गई हालिया घोषणाओं, विभिन्न नियमों के तहत किये गये विभिन्न खुलासों की जांच परख कर लें।जानकारी के ðाोत हैं : एक्सचेंज एवं कंपनियों के वेबसाइट और व्यवसायिक पत्रिकाएं आदि। +6. कारोबार/निवेश नीतियां अपनाते समय जोखिम उठाने की अपनी क्षमता का खयाल रखें क्योंकि सभी निवेशों में जोखिम रहती है, उसकी मात्रा अलग अलग होती है जो अपनाई गई निवेश नीति पर निर्भर करती है। +7. किसी भी मध्यस्थी का ग्राहक बनने से पूर्व पूरी सावधानी बरतें।इसके अलावा निवेशकों से अनुरोध किया जाता है कि वह 'रिस्क डिस्क्लोजर डाक्यूमेंट' यानी जोखिम का खुलासा करने वाला दस्तावेज ध्यान से पढ़ें, जो शेयर बाजार में ब्रोकर के जरिये कारोबार करने वाले निवेशकों की आधारभूत आवश्यकताओं का एक हिस्सा है। +8. उन शेयरों के प्रति सावधानी भरा रूख अपनाएं, जिनकी कीमत या कारोबार में अचानक उछाल आये, खासकर कम कीमत वाले स्टॉक के प्रति। +9. कृपया यह जान लें कि शेयर बाजार में निवेश पर कोई गारंटीशुदा रिटर्न/ प्रतिफल नहीं होता। +क्या न करें? +1. गैर पंजीकृत ब्रोकर/सब ब्रोकर/बिचौलिये से कारोबार न करें। +2. `अफवाहों', जिन्हें आम तौर पर 'टिप्स' कहा जाता है, के आधार पर कारोबार न करें। +3. गारंटीशुदा रिटर्न के वायदों के बहकावे में न आएं। +4. सरकारी संस्थाओं से मंजूरी/पंजीकरण दर्शाने वाली कंपनियों द्वारा गुमराह न हों क्योंकि मंजूरियां अन्य उद्देश्यों के लिए हो सकती हैं, उन प्रतिभूतियों के लिए नहीं जो आप खरीद रहे हैं। +5. किसी मध्यस्थी के हाथ में अपने डीमैट कारोबार की रसीद बुक न दें। +6. प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन के बारे में विज्ञापन बाजी के बहकावे में न आएं। +7. कार्पोरेट गतिविधियों पर मीडिया की खबरों पर आंखें मूंदकर विश्वास न करें, क्योंकि वह गुमराह करने वाली भी हो सकती हैं। +8. निवेश का फैसला लेते समय आंखें मूंदकर उन अन्य निवेशकों की नकल न करें, जिन्होंने अपने निवेश से मुनाफा कमाया हो। +निवेशकों के लाभ के लिए, एक्सचेंज ने टॉल प्री लाइन 1800 22 6663 लगाई है, जहां वह किसी भी स्क्रिप में अवांछनीय कारोबारी गतिविधि या किसी भी बाजार विसंगति के बारे में सूचना या संकेत दे सकते हैं. निवेशकों से अनुरोध किया जाता है कि अपने संदेश वे अंग्रेजी या हिंदी में रिकार्ड करवाएं। निवेशक की पहचान गुप्त रखी जाएगी। +इन्वेस्टर्स प्रोटेक्शन फंड. +स्थापना. +केन्द्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देश के अनुसार बीएसई ने डिफाल्टर सदस्यों के विरूद्ध निवेशकों के दावों का भुगतान करने के लिए इन्वेस्टर्स प्रोटेक्शन फंड का गठन 10 जुलाई, 1987 को किया था। +संचालन. +इस फंड का संचालन एक्सचेंज द्वारा नियुक्त किए गए ट्रस्टियों द्वारा किया जाता है। +धन का श्रोत. +सदस्य लोग फिलहाल अपने कारोबार के प्रति एक लाख रू. पर 0.15 रू. इस खाते में देते हैं। स्टाक एक्सचेंज की तिमाही आधार पर लिस्टिंग फीस का ढाई प्रतिशत इस फंड में जमा किया जाता है। कंपनियों द्वारा पब्लिक/राइट निर्गम के समय एक्सचेंज में रखी गई एक प्रतिशत की सिक्युरिटी डीपाजिट पर ब्याज की जो आय होती है वह इस फंड में जमा की जाती है। कुछ मामलों में भाव की कृत्रिम घटबढ़ करने की आशंका होने पर, ऐसे मामलों में नीलामी से मिली रकम को सेबी के आदेशानुसार जप्त कर लिया जाता है और इस फंड में ट्रांसफर कर दिया जाता है। एक्सचेंज की देनदारी का भुगतान करने के बाद डिफाल्टर के खाते में यदि बचत रहे तो उसका पांच प्रतिशत इस फंड में ट्रांसफर किया जाता है। +निवेशकों के दावों का भुगतान. +एक्सचेंज का डिफाल्टर घोषित हुआ सदस्य यदि भुगतान में विफल हो जाए तो ऐसे मामले में इस फंड में से फिलहाल निवेशक को ज्यादा से ज्यादा 10 लाख रू. का भुगतान किया जाता है जो देश के शेयर बाजारों में सर्वाधिक रकम है। डिफाल्टर विरूद्ध निवेशक विवाद का फैसला मिले, इसकी जांच एक्सचेंज द्वारा गठित स्टैंडिंग कमिटी-डिफाल्टर कमिटी द्वारा की जाती है। डिफाल्टर कमिटी को निवेशक के दावे की सत्यता का भरोसा होने के बाद दावे की रकम अथवा 10 लाख रू. इन दोनों में से जो राशि कम हो, उसकी सिफारिश ट्रस्टियों द्वारा की जाती है। +शेयर बाजार की कार्यपद्धति. +शेयर बाजार शेयर-सिक्योरिटीज में सौदे करने का मंच उपलब्ध कराता है। जिसमें सम्पूर्ण प्रणाली और व्यापक यंत्रणा का समावेश है। बीएसई ने शेयर बाजार में ऐसी टेक्नोलॉजी का उपयोग किया है ताकि सभी कारोबारियों को समान सुविधाएं मिलने के साथ सौदों में अंतर्राष्ट्रीय मापदण्डों के अनुरूप प्रणाली अपनाकर बीएसई निवेशकों के हितार्थ कार्यरत रहे। बीएसई अपनी प्रणाली के अनुसार निवेशकों के शेयर सौदों का मिलान कराता है और यहां शेयर दलालों के माध्यम से निवेशकवर्ग को सौदे करने की सुविधा उपलब्ध है। +शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए समुचित श्रेष्ठ प्रणाली के अलावा सेटलमेंट के लिए निर्धारित दिशा-निर्देश हैं। जिससे न केवल बाजार सुरक्षित रहता है बल्कि कारोबारियों को सुविधा भी रहती हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि बीएसई का सर्वेलन्स (निगरानी) विभाग बाजार की समस्त क्रिया-कलापों पर नजर रखता है और शेयरों के भाव तथा सौदों की मात्रा में अचानक भारी परिवर्तन आने पर इसे अपने संदेह के घेरे में लेे लेता है। कृत्रिम भाववृद्धि, प्राइस मेनीप्युलेशन या इसी प्रकार की किसी गैर व्यवहारिक गतिविधियों की स्थिति में बीएसई का सर्वेलन्स विभाग एक्सचेंज को तुरंत चेतावनी दे देता हैं। बाजार में निवेशकों के हितों के विपरीत किसी भी प्रकार की शंकास्पद घटना पर अपना ध्यान केंद्रित करके तुरंत इसकी जांच में लग जाता है और नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही करता है। इन सारे कार्यो में बीएसई की Þोष्ठ टेक्नोलॉजी भरपूर सहायक है। इतना ही नहीं परिस्थितीनुसार एवं आवश्यकतानुसार बीएसई अपनी टेक्नोलॉजी और प्रणाली में यथोचित सुधार करता रहता है। +बीएसई के सर्वेलन्स विभाग को अपने कार्य में तत्परता एवं सक्रियता के कारण अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणपत्र मिला है। आज बाजार की कार्य पद्धति और सुरक्षा व्यवस्था काफी सुदृढ़ है जो निवेशकों एवं बाजार के सदस्यों में विश्वास प्रगाढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। +टेक्नोलॉजी. +अंतर्राष्ट्रीय शेयर बाजारों मे अपना विशिष्ठ स्थान स्थापित कर चुका बाम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) अब अपने कारोबार को और अधिक सुरक्षित, गतिमान, सरल तथा पारदर्शी बनाने के लिए सूचना प्रद्योगिकी (इन्फ्रोमेशन टेक्नोलोजी) को अत्यधिक महत्त्व दे रहा है। बीएसई का सूचना व्यवस्था विभाग, हार्ड वेअर, साप्ट वेअर और नेटवर्किंग की आधुनिकतम तकनीक अपनाकर इसे विश्व स्तर पर श्रेष्ठ बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील है। सोदों की सुगमता के लिए इसने शोर शराबे भरी प्रणाली के स्थान पर सम्पूर्ण बीएसई आन लाईन ट्रेडिंग (बोल्ट) प्रणाली अपनायी। बीएसई को 7799 के अनुरूप होने के बदले डीएनबी की तरफ से बोल्ट-प्रमाण पत्र हासिल हुआ है। ऐसा प्रमाण पत्र प्राप्त करनेवाला बीएसई विश्व का दूसरा शेयर बाजार है। यह प्रमाण पत्र उच्चतम गुणवक्ता का प्रतीक है। +बीएसई विश्व का सर्व प्रथम एक्सचेंज है जिसने एक्सचेंज आधारित इंटरनेट पर सौदा करने की सुविधा उपलब्ध कराने वाली प्रणाली `बीएसई वेबेक्स' भी शुरू की है। इस सुविधा के कारण निवेशक किसी भी स्थान से इंटरनेट के माध्यम से बीएसई प्लेटफार्म से काम काज कर सकता है। +बीएसई में डेरीवेटिव्स ट्रेडिंग एंड सेटलमेंट सिस्टम (डीटीएसएस), इलेक्ट्रोनिक कान्ट्रेक्ट नोट्स (ईसीएन), स्ट्रेट थ्रू प्रोसेस (एसटीपी), यूनिक क्लाइंट कोड (यूसीसी), रीयल टाइम जानकरी की प्रसार-व्यवस्था-सीडीबी/आईडी बी/ बुक बिल्डींग सिस्टम (बीबीएस) और रिवर्स बुक बिल्डींग सिस्टम (आरबीबीएस) इत्यादि सुविधाओं का समावेश है। +बीएसई की वेबसाईट शेयर बाजार संबंधी सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है। बीएसई ने चेनई, राजकोट, जयपुर और बैंग्लोर में प्रादेशिक टेक्नोलॉजी हब्स भी शुरू किये हैं। +बीएसई ऑनलाईन सर्वेलन्स सिस्टम (बोस) के रूप में प्रचलित ऑनलाईन रीयल टाईम सिस्टम के जरिए सौदों की कार्यवाही पर सतत नजर रखती है। इस व्यवस्था से बाजार में गैर व्यवहारिक तरीके से होने वाले कारोबार की जोखिम कम करने तथा स्व-नियमन कार्य पद्धति को सुदृढ बनाने में सहायता मिलती है। +बाजार की सुरक्षा. +एक्सचेंज के विभिन उद्देश्यों में से एक मूल उद्देश्य सिक्युरिटीज के कामकाज में सौदे की उचित एवं न्यायपूर्ण प्रथा को प्रोत्साहित करने, विकसित करने और कुरीतियों को दूर करना है। +सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडि़या (सेबी) (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोड़&) के निर्देशानुसार बीएसई ने शेयरों के भाव के घटबढ़ पर नजर रखने, भाव कृत्रिम घटबढ़ न हो, तथा ऐसी कोई प्रवृत्ति हुई हो तो उसे खोज निकालने, भाव में असाधारण वृद्धि और वाल्यूम पर नजर रखने के लिए, धन के भुगतान में कोई डिफाल्ट न हो उसकी निगरानी करने, दलाल सदस्यों की पोजिशन पर नजर रखने के लिए एक महाप्रबंधक (जनरल मैनेजर) के नेतृत्व में सर्वेलंस डिपार्टमेंट का गठन किया है। इस विभाग को सीधे मैनेजिंग ड़ायरेक्टर के पास रिपोर्ट देना होता है । +सर्वेलंस विभाग नियमित रूप से सदस्यों की सीमा पर और शेयरों के भाव एवं वाल्यूम पर भी नजर रखता है। बीएसई ने एक सक्षम सर्किट फिल्टर की सीमा की व्यवस्था तैयार की है। जिससे इस बात की निगरानी की जाती हैं कि शेयरों के भाव प्रतिदिन तय सीमा से अधिक न बढ़े अथवा न घटे । शेयरों के भाव में असाधारण घटबढ़ और वाल्यूम पर लगातार नजर रखी जाती है। यदि ऐसी कोई प्रवृत्ति दिखाई दे तो एक्सचेंज द्वारा सर्किट फिल्टर के माध्यम से भाव पर नियंत्रण लगाया जाता है। भाव में कृत्रिम वृद्धि करने की आशंका होने पर वैसे मामले में शेयरों पर एक्सचेंज द्वारा विशेष मार्जिन लादी जाती है, फिर भी ऐसी प्रवृत्ति जारी रही तो स्क्रिप को ट्रेड़-टू-ट्रेड़ सेगमेंट में ट्रांसफर कर दिया जाता है। जिसमें इस शेयर में नेटिंग या स्क्वेयर आफ की सुविधा सुलभ नहीं होती और आवश्यक रूप से उसी दिन डीलिवरी देनी पड़ती है। इसके बाद भी यदि असाधारण घटबढ़ जारी रही तो एक्सचेंज द्वारा उस शेयर को सस्पेंड़ (स्थगित) करने का भी कदम उठाया जाता है। ऐसी प्रवृत्ति करनेवालों के विरूद्ध जांच भी शुरू की जाती है और दोषियों के विरूद्ध अनुशासन भंग करने की कारवाई की जाती है। +एक्सचेंज ने आनलाइन रीयल टाइम (ओएलआरटी) सर्वेलंस प्रणाली भी विकसित की हैं। जिसके तहत शेयरों के भाव में घटबढ़, वित्तीय स्थिति, जरूरत से ज्यादा पोजिशन लेना अथवा निश्चित शेयरों में जरूरत से ज्यादा पोजिसन खड़ा किया गया हो तो कुछ मापदंड़ो के आधार पर रीयल टाइम आनलाइन सिस्टम द्वारा एलर्ट भी घोषित किया जाता हैं। उसमें सघन जांच पड़ताल कर सुधार का कदम भी उठाया जाता है। +सौदा ओर निपटान. +सौदा +बीएसई आनलाइन ट्रेडिंग सिस्टम (बोल्ट) के माध्यम से सोमवार से शुक्रवार तक सुबह 9.55 से अपराÚ 3.30 बजे के बीच सौदे होते हैं। एक्सचेंज पर लिस्टेड सिक्युरिटीज को ए, बी1, बी2, टी, टीएस, सीएफजी और जैड ग्रुप की सिक्युरिटीज में वर्गीकरण किया गया है जो निर्धारित गुणवत्ता तथा एक्सचेंज पर होनेवाले सौदे की मात्रा आदि के आधार पर किया जाता है। +इसमें एक ग्रुप में फिक्स्ड इनकम सिक्युरिटी का समावेश है। टी ग्रुप में सर्वेलंस के कदम के रूप में ट्रेड-टू-ट्रेड के आधार पर जिसका निपटान करना हो उस स्क्रिप्स का समावेश होता है। एस ग्रुप बीएसई-इन्डोनेक्स्ट सेगमेंट का एक हिस्सा है, इसमें भी ट्रेड-टू-ट्रेड के आधार पर ही निपटान होता है। +रिटेल ट्रेडर सरकारी सिक्युरिटीज में सौदा कर सकें, इसके लिए `जी' ग्रुप की रचना की गई है। +जो कंपनियां एक्सचेंज के किसी भी नियम का पालन करने में या निवेशकों की शिकायतों का निवारण करने में विफल हुई हो या फिर डीपाजिटरी-एनएसडीएल या सीडीएसएल के साथ करार करने में विफल हुई हों तो उन कंपनियों के शेयरों को जैड कैटेगरी में डाल दिया जाता है। +31 दिसम्बर, 2001 से प्रभावी, एक्सचेंज पर लिस्टेड प्रत्येक सिक्युरिटीज के लिए आवश्यक रोलिंग सेटलमेंट लागू किया गया है। डीमेट सिक्युरिटीज में एक शेयर का लाट होता है, परन्तु जिन कंपनियों के शेयर अभी फिजिकल स्वरूप में हैं तो उसका मार्केट लाट सामान्यतः 50 या 100 का होता है। +लिस्टेड सिक्युरिटीज +एक्सचेंज के साथ लिस्टिंग करार (अनुबंध) करनेवाली और जिनके शेयर बीएसई पर लिस्टेड हों उसे लिस्टेड सिक्युरिटीज कहा जाता है। +टीक साइज +टीक साइज अर्थात् किसी एक निश्चित शेयर में खरीदी या बिक्री के लिए एक ही समय में यदि दो आर्डर दिए गए हों तब वह दो भाव के बीच अपेक्षित न्यूनतम भाव फर्क। एक्सचेंज पर लिस्टेड शेयरों में यह टीक साइज पांच पैसे की होती है हालांकि म्युच्युअल फंड के यूनिट के लिए, महीने के अन्त में 15 रू. से नीचे बंद हुए शेयर के लिए और ए ग्रुप की सिक्युरिटीज के लिए यह टीक साइज पांच पैसे से घटा कर एक पैसा कर दी जाती है। महीने के प्रारंभ में यह फेरबदल करने के बाद संपूर्ण महीने में उसमें कोई फेरबदल नहीं किया जाता। +शेयरों के बंद भाव की गणना +एक्सचेंज द्वारा शेयरों के बंद भाव की गणना संबंधित शेयरों के अंतिम आधे घंटे में हुए प्रत्येक सौदे का वेटेड औसत भाव के आधार पर किया जाता है और उसे अधिकृत बंद भाव के रूप में घोषित किया जाता है। +रोलिंग सेटलमेंट +सेबी के आदेशानुसार प्रत्येक ग्रुप की सिक्युरिटीज का टी-प्लस-2 के आधार पर सेटलमेंट (निपटान) किया जाता है ताकि एक्सचेंज पर जिस तारीख को सौदा हुआ हो उस दिन से दूसरे कामकाज के दिन (शनिवार और एक्सचेंज के छुट्टी के दिन को छोड़कर) उन सौदों के नेट बेसिस पर निपटान किया जा सके । यद्यपि टी ग्रुप और टीएस ग्रुप में प्रत्येक सौदे का अलग निपटान करना होता है। इसमें नेटिंग की अर्थात् एक ही दिन में सौदा बराबर कर सिर्फ अंतर की राशि चुकाने की सुविधा नहीं मिलती। +निपटान +रोलिंग सेटलमेंट में एक ही दिन में धन और सिक्युरिटीज दोनों का पे-इन और पे-आउट होता है, इस निपटान के दिन प्रत्येक सिक्युरिटीज की डीलिवरी और धन का भुगतान बोल्ट/एक्सचेंज के सदस्यों द्वारा करना पड़ता है। +डीमेट पे-इन +सदस्य, दोनो डीपाजिटरी में से किसी भी डीपाजिटरी के माध्यम से क्लियरिंग हाउस में डीमेट सिक्युरिटीज का पे-इन कर सकता है। सदस्य डीपाजिटरी के माध्यम से अपने ग्राहक के बेनिफिसियरी खातों में से भी सीधे पे-इन कर सकते हैं। +ब्रोकर्स कंटिजेन्सी फंड +जो शेयरदलाल समय पर अपनी वित्तीय जवाबदारी पूरा करने में असमर्थ हो तो एक्सचेंज ने उनके लिए कामचलाऊ वित्तीय व्यवस्था करने और निवेशकों के हित को क्षति न पहुंचे इसके लिए एक ब्रोकर्स कंटिजेन्सी पँड (बीसीएफ) की रचना भी की है। +कमी (शार्टेज) +धन की तरह कुछ दलाल सिक्युरिटीज की डीलिवरी देने में विफल हो जाएं तो ऐसे मामले में निपटान के समय क्लियरिंग हाउस में कमी आती है। यह जो कमी होती है उसकी एक्सचेंज द्वारा नीलामी से डीलिवरी हासिल की जाती है। इस कमी और नीलाम की रकम को एक्सचेंज के उस संबंधित सदस्य से वसूल किया जाता है जो डीलिवरी देने में विफल रहा हो । +नीलाम +सौदों के निपटान के दूसरे दिन अर्थात् टी-प्लस-3 दिन जो सदस्य डीलिवरी देने में विफल हुआ हो उसके नाम की प्रत्येक सदस्य को जानकारी दी जाती है और बोल्ट के नीलामी सत्र में कम पड़ी सिक्युरिटीज की नीलामी होती है। नीलाम के दूसरे दिन अर्थात् टी-प्लस-4 को नीलाम के शेयरों की डीलिवरी और धन का निपटान किया जाता है। +क्लोज आउट +जब नीलाम में भी किसी शेयर का आफर न आए तब वैसे मामले में सौदा क्लोज आउट कर दिया जाता है अर्थात् वह बराबर कर दिया जाता है। ए, बी1, बी2, एस और एफ ग्रुप के लिए नीलाम के दिन के अगले दिन के बन्द भाव से 20 प्रतिशत अधिक भाव पर क्लोज आउट कर दिया जाता है। +यह रकम डीलिवरी देने में विफल हुए सदस्य के खाते से निकाली जाती है और जिसने वह शेयर खरीदा है उनके खाते में जमा कर दी जाती है। +बास्केट ट्रेडिंग सिस्टम +बास्केट ट्रेडिंग सिस्टम में निवेशक सेन्सेक्स में शामिल हर एक स्क्रिप्स को उसके वेटेज के अनुसार एक ही साथ खरीद सकते हैं। उसे सेन्सेक्स की स्क्रिप की मात्रा की गणना नहीं करनी होती। निवेशक सेन्सेक्स की 30 किस्मों में से अपनी पसंदगी के अनुसार पोर्टफोलियो भी तैयार कर सकते हैं और अपनी मर्जी के मुताबिक किसी भी स्क्रिप का वेटेज बढ़ा या घटा सकते हैं। +निवेशकों को सिर्फ इतना ही बताना होता है कि कितने सेन्सेक्स की बास्केट खरीदनी या बेचनी है। सेन्सेक्स की मौजूदा वैल्यु की अपेक्षा 50 गुनी रकम एक बास्केट की वैल्यू मानी जाती है अर्थात् सेन्सेक्स के एक सूचकांक का 50 रू. के हिसाब से संपूर्ण बास्केट का मूल्य तय किया जाता है। मानलो सेन्सेक्स 10,000 हो तो एक बास्केट का मूल्य 10,000 गुणे 50 बराबर 5 लाख रू. होता है। +निवेशक हालांकि प्रत्येक आर्डर के लिए न्यूनतम 50,000 रू. की कीमत के साथ सेन्सेक्स पोर्टफोलियो खरीदने या बेचने का आर्डर भी दे सकता है। +निगरानी. +सर्वेलंस (निगरानी) का मुख्य उद्देश्य बाजार की अखंडिता को बरकरार रखना है। यह कार्य दो तरह से किया जाता है। एक, भाव और कामकाज की मात्रा (वाल्यूम) की घट-बढ़ पर नजर रखकर एवं दूसरा भुगतान संकट को दूर करने के लिए समयानुकूल आवश्यक कदम उठा कर। कैश और डेरिवेटिव्स बाजार में किसी सार्थक जानकारी के अभाव में स्क्रिप/सिरीज का भाव/वाल्यूम की विसंगतियों को प्रारंभिक चरण में ही ढ़ूंढ़ कर बाजार के खिलाडि़यों की भाव पर असर ड़ालने की क्षमता में कमी लाने का कदम उठाया जाता हैं। कैश और प्युचर-आप्शन्स बाजार के इक्विटी संबंधी सभी इंस्ट¦मेंट की ट्रेडि़ंग सर्वेलंस के तहत आती है। +सर्वेलंस के कामकाज के मुख्यतः तीन भाग हैं : भाव पर देखरेख, सदस्यों के सौदों (पोजिशन) पर निगरानी और जांच पड़ताल, भाव/वाल्यूम में असामान्य घटबढ़, कृत्रिम सौदे; गलत अथवा अनुचित व्यवहार तथा इन्साइडर ट्रेडिंग। इन सभी अनियमितताओं को यह विभाग दूर करता है। बीएसई की प्रणाली में ऐसी सुव्यवस्था है कि कही भी अनियमितता की शुरूआत हो तो तत्काल उसकी चेतावनी आनलाइन मिल जाती है। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे मामलों में जांच शुरू की जाती है। इसके अतिरिक्त यह विभाग आफलाइन सर्वेलंस भी करता है जो अलग अलग मापदंडों के अनुसार, की गई जांच की रिपोर्ट के आधार पर अनियमितताओं का पता लगा लेते हैं। यह मापदंड निश्चित अवधि में भाव में हुए हेरफेर, शायद ही ट्रेडि़ंग होती हो वैसे शेयरों में हुई ट्रेडिंग, नया ऊँचा या नीचा भाव, अफवाहों के कारण बढ़ा शेयर इत्यादि हो सकते हैं। +जिस स्क्रिप के ट्रेडि़ंग वाल्यूम या भाव में असाधारण घट-बढ़ प्रतीत हो उस पर स्पेशल मार्जिन लादी जाती है। यह मार्जिन केस टू केस 25 या 50 या विभिन प्रतिशत हो सकती है तथा वह ग्राहक की खरीदी या बिक्री के खड़े सौदों पर लगाई जाती है। +सर्वेलंस विभाग अपने कार्य के एक भाग के रूप में उचित परिस्थिती में स्क्रिप्स को ट्रेड टू ट्रेड सूची में ट्रांसफर करता है। यह ऐसे शेयरों की सूची है जिसमें बा¿ाकारी कुल क्रय-विक्रय (लेवाली-बिकवाली) का लेना/देना करना पड़ता है एवं दिवस में या निपटान के अन्त में सौदा बराबर करने नहीं दिया जाता। जेड़ ग्रुप के शेयरों के व्यापार का निपटान आवश्यक रूप से ट्रेड टू ट्रेड के आधार पर करना होता है। इसके अलावा सर्वेलंस डिपार्टमेंट भाव की असाधारण घट-बढ़ या असामान्य वाल्यूम को नियंत्रण में रखने के लिये समय समय पर विभिन शेयरों को इस सूची में डालता रहता है। सर्वेलंस के भागरूप में अपवाद स्वरूप मामले में कुछ शेयरों में ट्रेडिंग निलंबित भी कर दी जाती है। ये ऐसे शेयर होते हैं जिन कंपनियों के विरूद्ध मामले की जांच बाकी रहती है। +यदि किसी शेयर में कुरीति की आशंका हो तो सर्वेलंस विभाग सदस्यों को मौखिक/लिखित चेतावनी भी देता है। बाजार का अनुचित लाभ उठाने की जांच में जिस सदस्य/सदस्यों को दोषी ठहराया गया हो उनके टर्मिनलों को सेबी के आदेशानुसार निष्क्रिय कर दिया जाता है या दंड़ लगाया जाता है। बारबार दोषी होने वाले विरूद्ध अनुशासन भंग करने का कदम भी उठाया जाता है। +अनेकों बार शेयरों के भाव को प्रभावित करने वाली अफवाहें जंगल की आग की तरह फैलती रहती हैं। तब सर्वेलंस विभाग संबंधित कंपनी से संपर्क कर उसकी सही हकीकत की जानकारी हासिल करता है और निर्वेशकों को उसकी जानकारी देता है। जो कंपनी तत्काल जवाब नहीं देती उन्हें शो-काज (कारण बताओ) नोटिस भेजी जाती है। +शेयरों के भाव और कामकाज में असाधारण घटबढ़, अनुचित सौदा, गलत और अनुचित व्यवहार प्रवृत्ति, इन्साइडर ट्रेडिंग आदि जैसे कामकाज और शेयर बाजार के नियमोलंघन करनेवालों पर नजर रखने के लिए एक्सचेंज भाव और खड़े सौदों पर सतत नजर रखता है तथा जरूरी जांच भी करता है। इसके लिए एक्सचेंज का सर्वेलंस विभाग निम्नांकित पहलुओं का अनुसरण करता है। + +बैंकिंग संबंधी मामलों पर बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न: +देशी जमाराशियां. +चालू खाते को छोड़कर अन्य खातों में बैंक ब्याजमुक्त जमाराशियां स्वीकार नहीं कर सकते +बैंक तिमाही या अधिक अंतरालों पर बचत बैंक खातों पर ब्याज अदा कर सकते हैं +मीयादी जमाराशियों पर तिमाही या अधिक अंतरालों पर ब्याज देय होता है प्रोद्भूत तिमाही ब्याज को बट्टा करके बैंक मासिक ब्याज अदा कर सकते हैं +15 लाख रूपये और अधिक की एक जमाराशि पर विभेदक दर पर ब्याज अदा किया जा सकता है अलग-अलग जमाराशियों का जोड़ 15 लाख रूपये से अधिक होने पर ऐसा नहीं किया जा सकता +मीयादी जमाराशि बैंक और ग्राहक के बीच निश्चित अवधि की संविदा है तथा बैंक के विकल्प पर इसे अवधि से पहले नहीं चुकाया जा सकता ग्राहक के अनुरोध पर ही मीयादी जमाराशि की अवधिपूर्व चुकौती की जा सकती है +बैंकों को जमाराशिकी विनिर्दिष्ट अवधि समाप्त होने की तारीख तथा अगले कार्य-दिवस में जमाराशियों की आगाम राशियों की अदयगी की तारीख के बीच आने वाले छुट्टी के दिनों/रविवार/गैर-कारोबारी कार्य-दिवसों के लिए जमाराशि पर मूलतः संविदा की गयी दर पर ब्याज अदा करना चाहिए +(क) बैंक मीयादी जमाराशियों के अवधिपूर्व आहरण से इन्कार नहीं कर सकते +(ख) बैंक मीयादी जमाराशियों के अवधिपूर्व आहरण के लिए अपनी स्वयं की दण्डस्वरूप ब्याज दर निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र हैं +नहीं बच्चें (नाबालिग सहित) बैंक के स्टाफ-सदस्य/सेवानिवृत्त स्टाफ-सदस्य को स्वीकार्य अतिरिक्त ब्याज के लिए पात्र नहीं हैं +नहीं चूंकि राशि नाबालिग बच्चे से संबंधित होती है, न कि बैंक के स्टाफ से; अतः अतिरिक्त ब्याज अदा नहीं किया जा सकता +अनुबंध में उल्लिखित सरकारी संगठनों/एजेंसियों की जमाराशियों को छोड़कर सरकारी विभागों/सरकारी योजनाओं के नाम में बचत बैंक खाते नहीं खोले जा सकते +मृत जमाकर्ता के नाम पर रहने वाली मीयादी जमाराशि के मामले में निम्नलिखित रूप में ब्याज अदा किया जा सकता हैः +जीवित जमाकर्ता के नाम में रहने वाली अतिदेय जमाराशियां नवीकृत करने या न करने का विवेकाधिकार बैंक को है यदि बैंक अतिदेय जमाराशि को नहीकृत करने का निर्णय लेता है, तो परिपक्वता की तारीख से भविष्य की तारीख तक उसका नवीकरण उस दर पर किया जाना है, जो दर परिपक्वता की तारीख को, जितनी अवधि के लिए जमाराशि का नवीकरण किया जाना है उतनी अवधि कि लिए, लागू हो यदि पुनर्निवेश योजना या साधारण सावधि जमाराशि के अंतर्गत जीवित जमाकर्ता के नाम में रहनेवाली अतिदेय जमाराशि का नवीकरण जमाकर्ता के विशिष्ट अनुरोध पर बैंक द्वारा पुनर्निवेश योजना के अंतर्गत किया जा रहा हो तो चक्रवृद्वि दर पर ब्याज अदा करने की अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते चक्रवृद्वि की संकल्पना उस समय प्रचलन में रही हो +अनिवासी भारतीय जमाराशियां. +अपने मूल ऋण दर के संदर्भ के बिना जमाकर्ताओं को विदेशी मुद्रा अनिवासी (बी) जमाराशियों की जमानत पर दिये गये ऋणों और अग्रिमों पर प्रभार्य ब्याज दर निर्धारित करने की स्वतंत्रता बैंकों को रहती है चाहे चुकैती रूपयों में की गयी हो या विदेश मुद्रा में +नहीं बैंक विदेशी मुद्रा अनिवासी (बी) योजना के अंतर्गत आवर्ती जमाराशियां स्वीकार नहीं कर सकते +बैंकों के निदेशक मंडलों को ये शक्तियां प्रदान की गयी हैं कि वे जमाराशियों एवं अग्रिमों पर ब्याज दरें निर्धारित करने के लिए आस्ति-देयता प्रबंधन समिति को प्राधिकृत करें +हाँ, बैंकों को 15 लाख रूपये और अधिक की देशी मीयादी जमाराशियों की ही तरह अनिवासी विदेश मीयादी जमाराशियों पर ब्याज की विभेदक दरों की पेशकश करने की अनुमति है जहाँ तक विदेशी मुद्रा अनिवासी (बी) जमाराशियों का संबंध है, बैंक निर्धारित समग्र अधिकतम सीमा की शर्त पर मुद्रावार न्यूनतम मात्रा, जिस पर विभेदक दर पर ब्याज की पेशकश की जा सकती है, के बारे में निर्णय लेने के लिए अब स्वतंत्र हैं +हां बैंकों को अनिवासी अप्रत्यावर्तनीय (एन आर एन आर) जमाराशियों पर विभेदम ब्याज दर की पेशकश करने की अनुमति है +पुनर्निवेश जामाराशिसे ऐसी जाराशियां अभिप्रेत हैं, जिनमें ब्याज (जब देय हो) का पुनर्निवेश उसी संविदाकृत दर पर अवधिपूर्णता तक किया जाता है तथा जिसका आहरण अवधिपूर्णता की तारीख को मूलधन सहित किया जा सके देश जमाराशियों पर भी यह लागू है +बैंक, अपने विवेक पर, अतिदेय अनिवासी विदेशी/विदेश मुद्रा अनिवासी (बी) जमाराशि या उसके एक अंश का नवीकरण कर सकता है, बशर्ते परिपक्वता की तारीख से नवकिरण की तारीख तक (दोनों दिन शामिल अतिदेय अवधि 14 दिनों से अधिक न हो और इस प्रकार नवीकृत जमाराशि पर देय ब्याज की दर अवधिपूर्णता की तारीख को अथवा जमाकर्ता द्वारा जब नवीकरण की मांग की जाती हो उस तारीख को, जो भी कम हो, नवीकरण की अवधि के लिए लागू उपयुक्त ब्याज दर होगी यदि अतिदेय जमाराशियों के मामले में अतिदेय अवधि 14 दिनों से अधिक की हो तो जमाराशि का नवीकरण उस दिन लागू ब्याज दर पर किया जा सकता है, जिस दिन नवीकरण की मांग की गयी हो यदि जमाकर्ता समग्र अतिदेय जमाराशि अथवा उसका एक भाग नये अनिवासी विदेशी/विदेशी मुद्रा अनिवासी (बी) जमाराशि के रूप में रखता हो, तो बैंक नयी मीयादी जमाराशि के रूप में इस प्रकार रखी गयी राशि पर अतिदेय अवधि के लिए अपनी ब्याज दरें निर्धारित कर सकते हैं नवीकरण के बाद योजना के अंतर्गत न्यूनतम निर्धारित अवधि पूरी हो के पूर्व जमाराशि निकाले जाने पर बैंक अतिदेय अवधि के लिए इस प्रकार दिये गये ब्याज की वसूली के लिए स्वतंत्र हैं +नहीं विदेशी मुद्रा अनिवासी (बी) योजना के अंतर्गत रूपयों में अंकित ऋणों पर लागू ब्याज दर संबंधी शर्ते विदेशी मुद्रा में अंकित ऋणों पर, जो विदेशी मुद्रा नियंत्रण विभाग द्वारा जारी अनुदेशों द्वारा शसित होते हैं, जागू नहीं होतीं +(क) बैंक के स्टाफ-सदस्य या सेवानिवृत्त स्टाफ-सदस्य के नाम में, अकेले अथवा उसके परिवार के किसी सदस्य या किन्हीं सदस्यों के साथ संयुक्त रूप में, या +(ख) बैंक के मृत स्टाफ-सदस्य के पति/पत्नी के नाम में स्वीकृत जमाराशि के संबंध में बैंक, अपने विवेक पर, निर्धारित ब्याज दर से एक प्रतिशत वार्षिक से अनधिक दर पर अतिरिक्त ब्याज अदा करने की अनुमति दे सकते हैं बशर्ते - +स्पष्टीकरणः "परिवार" शब्द से बैंक के स्टाफ-सदस्य/सेवानिवृत्त स्टाफ-सदस्य का पति/पत्नी, उस रा निर्भर उसके बच्चे, माता-पिता, भाई और बहन अभिप्रेत हैं और शामिल हैं; परन्तु इसमें विधिक रूप से अलग हुए पति/पत्नी शामिल नहीं हैं +नहीं ब्याज अर्जित करने के लिए जमाराशि न्यूनतम निर्धारित अवधि तक रखी जानी चाहिए, जो वर्तमान में विदेशी मुद्रा अनिवासी (बी) के लिए एक वर्ष और अनिवासी विदेशी जमाराशियों के लिए छः माह है +हां जब भी नियत तारीखें शनिवार/रविवार/गैर-कारोबारी कार्य-दिवस/छुट्टी के दिन पड़ती हों, बैंकों को नियत तारीख तथा अदायगी की तारीख के बीच की अवधि के लिए मूल रूप से संविदा की गयी दर पर अनिवासी विदेश एवं विदेशी मुद्रा अनिवासी (बी) जमाराशियों पर ब्याज अदा करने की अनुमति है, ताकि जमाकर्ताओं को ब्याज का कोई नुकसान न हो +अग्रिम. +बैंक अपने संबंधित बोड़ के अनुमोदन से 2 लाख रूपये से अधिक की ऋण सीमाओं के लिए मूल ऋण दर निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र हैं, जो ऐसी ऋण सीमाओं के लिए उनके द्वारा लगायी जाने वाली न्यूनतम दर होनी चाहिए मूल ऋण दर धेषित की जानी चाहिए तथा उसे सभी शाखाओं में एक समान रूप से लागू किया जाना है बैंक अपनी आस्ति-देयता प्रबंधन समिति को इस बात के लिए अधिकृत कर सकते हैं कि वह जमाराशियों और अग्रिमों पर ब्याज दरें निर्धारित करे बशर्ते वे उसके बाद तत्काल उसे बोड़ को सूचित करें बैंकों को उपभोक्ता ऋण से इतर सभी अग्रिमों के लिए आस्ति-देयता प्रबंधन समिति/बोड़ के अनुमोदन से मुल ऋण दर पर अधिकतम अंतर (स्प्रेड) भी निर्धारित करना चाहिए +मध्यवर्ती एजेंसियों की उदाहरणस्वरूप सूची निम्नानुसार हैः +@ प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र के तहत `कमजोर वर्ग' में निम्नलिखित शामिल हैं +हां निम्नलिखित श्रेणियों के मामले में बैंकों को मूल ऋण दर के संदर्भ के बिना ब्याज दर लगाने की स्वतंत्रता हैः +बैंक निम्नलिखित श्रेणियों के लिए मूल ऋण दर के संदर्भ के बिना ब्याज दरें निर्धारित करने के लिए भी स्वतंत्र हैंः +(क) उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं की खरीद के लिए ऋण +(ख) शेयरों और डिबेंचरांें/बांडों की जमानत पर अलग-अलग व्यक्तियों को ऋण +(ग) गैर-प्राथमिकताप्राप्त क्षेत्र के अन्य व्यक्तिगत ऋण +तथापि, ऐसे ऋणों के मामले में किसी रियायत की अनुमति देने का इरादा नहीं है, अतः बैंकों को मूल ऋण दर से कम दरों पर ब्याज नहीं लगाना चाहिए, चाहे ऋण की राशि का आकार कुछ भी क्यों न हो +हाँ बैंक विभिन्न अवधिपूर्णताओं के लिए 2 लाख रूपये से अधिक की ऋण सीमाओं के लिए अलग-अलग मूल ऋण दर धोषित कर सकते हैं, बशर्ते मूल रूप से परिकल्पित पारदर्शिता और प्रयोग की एकरूपता को बनाये रखा जाये जो बैंक अवधि संबंद्व मूल ऋण दर धोषित करने लगे है, उन्हें हमेशा वह विनिर्दिष्ट अवधि दर्शानी चाहिए जिसके लिए धोषित मूल ऋण दर लागू है बैंक तीन वर्ष और अधिक के मीयादी ऋणों के लिए अलग मूल मीयादी ऋण दर धोषित कर सकते हैं बैंक ऋण धटक तथा नकदी ऋण धटक के लिए अलग मूल दर तथा मूल ऋण दरों पर अंतर (स्प्रेड) भी निर्धारित कर सकते हैं +बैंक निश्चित अथवा अस्थिर दरों पर सभी प्रकार के ऋणों की पेशकश करने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते वे आस्ति देयता प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुरूप हों तथापि, उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मूल ऋण दर के संदर्भ में जो भी शर्ते लागू हों, उनका अनुपालन किया जाये मूल ऋण दर के साथ संबद्वता का स्वरूप, अर्थात् ऐसा स्वीकृति के समय या ऋण के वितरण के समय किया गया है, ऋण की स्वीकृति के समय स्पष्ट किया जाना चाहिए तथापि, 2 लाख रूपये तक के छोटे ऋणों के लिए `मूल ऋण दर से अधिक नही' (सुसंगत अवधिपूर्णता के लिए) की शर्त लागू होगी +हाँ बैंको को मीयादी ऋणों सहित् सभी अग्रिमों के संदर्भ में ऋण करारों में निम्नलिखित परन्तुक अनिवार्य रूप से शामिल करना चाहिए, जिसमें बैंकों को इस बात के लिए समर्थ बनाया गया हो कि वे नियत दर ऋणों को छोड़कर अन्य मामलों में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी निदेशों के अनुरूप ब्याज दर लागू कर सकें +"परन्तु यह कि ऋणकर्ता द्वारा देय ब्याज समय-समय पर रिज़र्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में किये गये परिवर्तनों के अधीन होगा" +नहीं जहाँ बैंक ने निश्चित दर पर ऋण देने की संविदा न की हो, वहाँ किसी भी समय किसी भी ऋणकर्ता से लागू मूल ऋण दर से कम दर पर ब्याज लेना हमारे निदेशों का उल्लंधन माना जायेगा ऐसी कोई छूट देना नियमानुसार नहीं होगा, जिसके फलस्वरूप किसी ऋणकर्ता से वसूली जानेवाली वास्त्विक ब्याज दर मूल ऋण दर से कम हो जाये तथापी, जहाँ तक प्रभावी ब्याज दर मूल ऋण दर से कम न हो, वहाँ तक छूट की अनुमति देने में कोई आपत्ति नहीं है अपनी आस्ति-देयता प्रबंध समिति/बोड़ के अनूमोदन से मूल ऋण दर धोषित करने के लिए बैंकों को सलाह देने के पीछे यह भावना निहित थी कि इसे सभी शाखाओं में समान रूप से लागू किया जाये तथा ऋण दरों के मामले में पारदर्शिता लायी आये +नहीं, सहायता संधीय व्यवस्था के अंतर्गत भी बैंकों का एकसमान ब्याज दर नहीं लगानी चाहिए प्रत्येक सदस्य बैंक को उसके द्वारा ऋणकर्ताओं को दी गयी ऋण सीमाओं के अंश पर अपनी मूल ऋण दर की शर्त के अधीन ब्याज दर लगानी चाहिए +चूक की स्थिति में बैंक ऋण खातों में दंडस्वरूप ब्याज लगा सकते हैं बैंकों द्वारा लगाया जानेवाला समग्र दंडस्वरूप/अतिरिक्त ब्याज संबंधित ऋणकर्ताओं पर लागू/रामान्यतः लगायी जानेवाली ब्याज दर के ऊपर 2 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए दंडस्वरूप ब्याज नियमित ब्याज दर से स्वतंत्र है तदर्थ सीमाओं पर दंडस्वरूप ब्याज नहीं लगाया जाना चाहिए क्योंकि उक्त सीमाएं सामान्यतः ऋण की नियमित मंजूरी होने तक प्रदान की जाती हैं और उन पर ब्याज दर मूल ऋण दर के उपर अधिकतम अंतर (स्प्रेड) की शर्त के अधीन होनी चाहिए +अलग-अलग व्यक्तियों को दिये गये ग्रामीण/अर्ध शहरी क्षेत्र में 5 लाख रूपये तक और शहरी/महानगरीय क्षेत्र में 10 लाख रूपये तक के प्रत्यक्ष आवास ऋणों तथा अलग-अलग व्यक्तियों को क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत कराने के लिए दिये गये 50,000 रूपये तक के ऋणों को प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के अग्रिमों के रूप में माना जाना चाहिए ब्याज दर का निर्धारण ऋणसीमा की मात्रा के अनुसार किया जायेगा इस प्रकार 2 लाख रूपये तक के ऋणों पर सीमा के आकार के अनुसार ब्याज लगाया जाना चाहिए अर्थात् मूल ऋण दर से अधिक नहींं ग्रामीण/अर्ध शहरी क्षेत्र में 2 लाख रूपये से अधिक और 5 लाख रूपये तक के ऋणों या शहरी/महानगरीय क्षेत्र कें 10 लाख रूपये के ऋणों पर मूल ऋण दर तथा संबंधित बैंक द्वारा धोषित अंतर (स्प्रेड) के अधीन ब्याज लगाया जाना चाहिए ग्रामीण/अर्ध शहरी क्षेत्र में 5 लाख रूपये से अधिक और शहरी/मानगरीय क्षेत्र में 10 लाख रूपये से अधिक के ऋण `अन्य गैर-प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के वैयक्तिक ऋण' क्षेणी के अधीन आयेंगे, जिनके मामले में बैंक मूल ऋण दर को ध्यान में लिये बिना ब्याज दरें निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र हैं +जहां तक निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम की गारंटी फीस का संबंध है, बैंकों को यह विवेकाधिकार है कि वे कमजट्रोर वर्गो को दिये गये अग्रिमों का छोड़कर 25,000 रूपये तक के अग्रिमों और कमज़ोर वर्गो को दिये गये सभी अग्रिमों के संदर्भ में निक्षेप बिमा और प्रत्यय गारंटी निगम की गारंटी फीस वहन करनी चाहिए +बैंको को यह स्वतंत्रता है कि वे गैर बैंकिंग वित्त कंपनियों को उपभोक्ता ऋणों के लिए आगे ऋण देने के लिए दिये गये अग्रिमों पर धेषित अंतर (स्प्रेड) से अधिक ब्याज दर लगायें +ऋणों और अग्रिमों पर ब्याज दरें तिमाही या अधिक अंतरालों में लगायी जानी चाहिए अतः, मासिक अंतरालों पर ब्याज लगाना ठीक नहीं होगा +बैंक अग्रिमों के संबंध में ब्याज दर संबंधी निदेश किसी अनुसूचित बैंक द्वारा, अन्य बातों के साथ-साथ, अपने स्वयं के कर्मचारियों को दिये गये या प्रदत्त या नवीकृत ऋणों या अग्रिमों या अन्य वित्तीय सहायता पर लागू नहीं होंगे जहां बैंक के स्टाफ सदस्यों द्वारा गठित सहकारी ऋण समितियों को उनके ग्राहकों (अर्थात् बैंक के स्टाफ) को ऋण देने के लिए बैंक द्वारा अग्रिम प्रदान किये जाते हैं वहां ऐसे अग्रिमों पर रिजट्रर्व बैंक के ब्याज दर संबंधी निदेश लागू नहीं होंगे +नहीं +नहीं +हां, चूंकि उक्त निवेश ऋण निधियों के संबंध में हैंए इसलिए वे पिछले वर्ष की 5 प्रतिशत वृध्दिशील जमाराशियों के दायरे के बाहर है +बैंक अपनी सहायक कंपनियों में निवेश कर सकते हैं परंतु ये निवेश बैंककारी विनियमन धिनियम, 1949 की धारा 19 के अनुपालन की शर्त पर पिछले वर्ष की 5 प्रतिशत वृध्दिशील जमाराशियों के दायरे के बाहर होंगे +बैंको द्वारा बिजली प्रभारों के भुगतान, सीमा-शुल्क, किराया खरीद/पट्टा किराया किस्तों, प्रतिभूतियों की बिक्री और अन्य वित्तीय सहायता से संबंधित बिल बट्टाकृत नहीं किये जाने चाहिए +नहीं +गैर बैंकिंग गैर वित्तीय कंपनियों में उनकी सार्वजनिक जमा योजना में अपनी निधियां लगाने पर बैंकों पर कोई पाबंदी नहीं है परंतु सार्वजनिक जमा योजना में किये गये बैंकों द्वारा ऐसे निवेशों को अपने तुलन पत्रों, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 के अंतर्गत विवरणियों में और अनुसूचित वाणिज्य बैंकों द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत पाक्षिक विवरणियों में ऋणों/अग्रिमों के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए +बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बांडों के संबंध में आबंटन पत्र निम्नलिखित शर्तोपर क्रय कर सकते हैं +ऐसे लेनदेन करने के लिए बैंक को अपने निदेशक मंडल के अनुमोदन से अपने आंतरिक दिशा-निर्देश बनाने चाहिए +जब शेयर/डिबेंचर/बांड अग्रिमों की जमानत के रूप में जमा किये जायें तब उनका मूल्यांकन प्रचलित बाज़ार मूल्यों पर किया जाना चाहिए +हां,बैंक सूचना प्रौद्योगिकी के लिए बनायी गयी समर्पित जोखिम पूंजी निधियों में निवेश कर सकते हैं 5 प्रतिशत की समग्र उच्चतम सीमा सूचना प्रौद्योगिकी के लिए बनायी गयी समर्पित जोखिम निधि में बैंक के निवेश की सीमा तक स्वतः बढ़ जायेगी +हां, एक वर्ष से अनधिक अवधि के लिए अपेक्षित ईक्विटी प्रवाह/निर्गमों की जमानत पर तथा अपनिवर्तनीय डिबेंचरो की अपेक्षित आगम राशियों, बाह् य वाणिज्यिक उधारों, सार्वभौमिक जमा रसीदों और/या विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के स्वरूप की निधियों की जमानत पर, बशर्ते बैंक इस बात से संतुष्ट हो कि ऋण लेनेवाली कंपनी ने उक्त संसाधन/निधियां जुटाने के लिए ठोस व्यवस्थाएं की हैं ऐसे ऋण पिछले वर्ष की वृध्दिशील जमाराशियों की 5 पेतिशत की उच्चतम सीमा के भीतर रखना अपेक्षित है +अलग-अलग व्यक्तियों को भौतिक रूप में रखे जानेवाले शेयरों, डिबेंचरों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बांडों की जमानत पर दिये जानेवाले ऋण प्रति ऋणकर्ता 10 लाख रूपये की सीमा से अधिक नहीं होने चाहिए तथा यदि उक्त प्रतिभूतियां अभौतिक रूप में हों तो उक्त ऋण 20 लाख रूपये से अधिक नहीं हो चाहिए +यदि शेयर और डिबेंचर भौतिक रूप में हों तो निर्दिष्ट न्यूनतम मार्जिन ईक्विटी शेयरों/परिवर्तनीय डिबेंचरों के बाजार मूल्य का 50 प्रतिशत है तथा यदि शेयर और डिबेंचर अभौतिक रूप में रखे जायें तो निर्दिष्ट न्यूनतम मार्जिन 25 प्रतिशत है +दान. +हां, लाभ कमानेवाले बैंक किसी वित्तीय वर्ष के दौरान पिछले वर्ष के लिए बैंक के प्रकाशित लाभ के कुल एक प्रतिशत तक दान दे सकते हैं, इसमें छूट प्राप्त श्रेणी के अंतर्गत पहले किये गये दान तथा राष्ट्रीय निधियों और अन्य निधियों में किये गये दान शामिल हैं बैंकों को ऊपर उल्लिखित एक प्रतिशत की निर्धारित उच्चतम सीमा से अधिक दान नहीं देना चाहिए किसी वर्ष में अनुमत सीमा की अप्रयुक्त राशि को दान देने के प्रयोजन के लिए अगले वर्ष में आगे नहीं ले जाया जाना चाहिए +हां, हानि उठानेवाले बैंक किसी वित्तीय वर्ष में कुल 5 लाख रूपये दान दे सकते हैं +हां, बैंको की विदेश स्थित शखाएं विदेश में दान दे सकती हैं, बशर्ते बैंक पिछले वर्ष के अपने प्रकाशित लाभ के एक प्रतिशत की निर्धारित उच्चतम सीमा से अधिक राशि न दें + +बैंकिंग लोकपाल योजना, 2006: +बैंकिंग लोकपाल योजना, 2006 +अक्सर पूछे जानेवाले प्रश्नों को निम्नलिखित कोटियों में बाँटा गया है +परिचय. +बैंकिंग लोकपाल योजना, 2006 बैंकों द्वारा दी जा रही कतिपय सेवाओं से संबंधित बैंक ग्राहकों की शिकायतों के समाधान पर कार्रवाई करती है +यह योजना 1 जनवरी 2006 से लागू है +बैंकिंग लोकपाल भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा नियुक्त वह व्यक्ति है जो बैंकिंग सेवाओं में कतिपय कमियों के संबंध में ग्राहकों की शिकायतों का समाधान करता है +बैंकिंग लोकपाल अद्र्ध न्यायिक प्राधिकारी है विचार-विमर्श के माध्यम से शिकायतों के समाधान को सुविधाजनक बनाने के लिए इसे दोनों पक्षों-बैंक और ग्राहक को बुलाने का अधिकार है +आज की तारीख तक 15 बैंकिंग लोकपालों की नियुक्ति की गई है जिनके कार्यालय अधिकांशतः राज्यों की राजधानियों में स्थित हैं बैंकिंग लोकपाल कार्यालयों के पते भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं +इस योजना के अंतर्गत सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक,क्षेत्रीय ग्रमीण बैंक और अनुसूचित प्राथमिक सहकारी बैंक शामिल हैं +नई योजना का विस्तार और क्षेत्र 2002 की पूर्व योजना से व्यापक है नई योजना में शिकायतों का ऑनलाइन प्रस्तुतीकरण भी उपलब्ध है नई योजना लोकपाल द्वारा पारित अधिनिर्णय के विरूद्ध अपील हेतु बैंक तथा शिकायतकर्ता दोनों के लिए अतिरिक्त रूप से `अपीलीय प्राधिकार' नामक एक संस्था भी उपलब्ध कराती है +बैंकिंग लोकपाल के समक्ष शिकायतों के प्रकार. +बैंकिंग लोकपाल बैंकिंग सेवाओं में निम्नलिखित कमियों के संबंध में किसी भी शिकायत को प्राप्त कर सकता है और विचार कर सकता है +हाँ, बैंकिंग लोकपाल भारत में अपना खाता रखनेवाले अनिवासी भारतीयों से विदेश से उनके विप्रेषणों,जमाराशियों और बैंक-संबंधी अन्य मामलों के संबंध में प्राप्त शिकायतों पर विचार कर सकता है +बैंकिंग लोकपाल को आवेदन करना. +वह बैंकिंग लोकपाल के समक्ष तभी शिकायत दर्ज करा सकता है यदि संबंधित बैंक द्वारा उसका अभ्यावेदन प्राप्त करने के बाद बैंक से उसे एक महीने के भीतर जवाब नहीं प्राप्त हुआ है या बैंक ने शिकायत खारिज़ कर दी हे या बैंक द्वारा दिये गये जवाब से शिकायतकर्ता संतुष्ट नहीं है +बैंकिंग लोकपाल के समक्ष शिकायत दर्ज कराने हेतु शिकायतकर्ता के लिए यह आवश्यक है कि पहले वह शिकायत में नामित बैंक को एक लिखित अभ्यावेदन प्रस्तुत करते हुए सीधे बैंक से एक संतोषप्रद समाधान प्राप्त करने का प्रयास करे तथापि, कार्रवाई आरंभ किए जाने के कारणों के बाद एक वर्ष की अवधि के भीतर शिकायत दर्ज की जाए +नहीं उसी विषय वस्तु पर शिकायत नहीं की जा सकती जिसका निपटान किन्हीं पूर्ववर्ती कार्यवाहियों में बैंकिंग लोकपाल के कार्यालय द्वारा किया गया हो +नहीं +कोई शिकायतकर्ता केवल सादे कागज पर लिखकर बैंकिंग लोकपाल के पास शिकायत दर्ज करा सकता है वह बैंकिंग लोकपाल को ैैै.ंaहव्iहुदस्ंल््ेस्aह.ींi.दीु.iह पर ऑनलाइन अथवा इ-मेल भेजकर भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है शिकायत दर्ज कराने के लिए एक निर्धारित फॉर्म भी है जो बैंकों की सभी शाखाओं में उपलब्ध है तथापि, यह आवश्यक नहीं है कि इसी फॉर्मेट का उपयोग किया जाए फिर भी, शिकायतकर्ता को सभी अपेक्षित सूचना शामिल करनी चाहिए +हॉ शिकायतकर्ता अपने किसी प्राधिकृत प्रतिनिधि (किसी वकील के अलावा) शिकायत दर्ज करा सकता है +नहीं बैंकिंग लोकपाल ग्राहकों की शिकायतों का समाधान करने के लिए कोई शुल्क प्रभारित नहीं करता है +शिकायत में शिकायतकर्ता के नाम और पते, उस बैंक की शाखा अथवा कार्यालय का नाम और पता जिसके विरूद्ध शिकायत की गई है, शिकायत के कारण के लिए तथ्य और उसके समर्थन में दस्तावेज़, यदि कोई हो, शिकायतकर्ता को हुई हानि का स्वरूप और सीमा, बैंकिंग लोकपाल से माँगी गई राहत और उन शर्तो के अनुपाल के बारे में एक धोषणा जो शिकायतकर्ता द्वारा अनुपालन के लिए अपेक्षित है +बैंकिंग लोकपाल के समक्ष कार्रवाईयाँ. +बैंकिंग लोकपाल शिकायतकर्ता और शिकायत में नामित बैंक के बीच करार द्वारा समाधान अथवा विचार-विमर्श के माध्यम से एक निपटान कराने हेतु प्रयत्न करता है +यदि समझाौते की शर्ते (बैंक द्वारा प्रस्तुत की गई) शिकायतकर्ता को पूरी तरह और अपनी शिकायत के अंतिम समझाौते के रूप में स्वीकार्य हैं तो बैंकिंग लोकपाल समझाौते की शर्तो के अनुसार एक आदेश पारित करेगा जो बैंक तथा शिकायतकर्ता दोनों पर बाध्यकारी होगा +यदि कोई शिकायत किसी करार द्वारा एक महीने की अवधि के भीतर नहीं निपटाई जाती है तो बैंकिंग लोकपाल कोई अधिनिर्णय पारित करने की कार्रवाई करता है कोई अधिनिर्णय पारित करने के पहले बैंकिंग लोकपाल शिकायतकर्ता और बैंक दोनों को अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए उचित अवसर उपलब्ध कराता है +कोई अधिनिर्णय पारित करने के लिए बैंकिंग लोकपाल पक्षों द्वारा उसके समक्ष प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ी साक्ष्य, बैंकिंग विधि और व्यवहार के सिद्धांत, दिशानिर्देशों, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किए गए अनुदेशों और मार्गदर्शी सिद्धांतों तथा ऐसे अन्य कारकों द्वारा निर्देशित होता है जो उसकी राय में न्याय के हित में आवश्यक है +बैंकिंग लोकपाल द्वारा दिया गया अधिनिर्णय. +कोई अधिनिर्णय पारित किए जाने के बाद उसकी प्रति शिकायतकर्ता और शिकायत में नामित बैंक को भेजी जाती है शिकायतकर्ता के लिए यह खुला विकल्प है कि वह अपनी शिकायत के पूर्ण और अंतिम समझाौते के रूप में इस अधिनिर्णय को स्वीकार करे अथवा अस्वीकार कर दे +यदि शिकायतकर्ता को अधिनिर्णय स्वीकार्य है तो उससे यह अपेक्षित है कि वह अपने अधिनिर्णय की प्रति की प्राप्ति की तारीख से पंद्रह दिनों के भीतर अपनी शिकायत के पूर्ण और अंतिम समझाौते के रूप में स्वीकार्यता का एक पत्र संबंधित बैंक को भेजे +हाँ, कोई शिकायतकर्ता बैंकिंग लोकपाल को ऐसे समय-विस्तार माँगने के कारणों सहित एक लिखित अनुरोध कर सकता है +यदि बैंकिंग लोकपाल शिकायतकर्ता द्वारा समय-विस्तार (अधिनिर्णय की स्वीकार्यता का अपना पत्र भेजने हेतु) के अपने अनुरोधपत्र में बताए गए कारणों से संतुष्ट है तो वह ऐसे अनुपालन के लिए पंद्रह दिनों तक के और समय-विस्तार की स्वीकृति दे सकता है +यदि बैंक अधिनिर्णय से संतुष्ट है तो एक महीने के अवधि के भीतर (इस मामले में अपने दावे के पूर्ण और अंतिम समझाौते के रूप में इस अधिनिर्णय के शिकायतकर्ता से स्वीकार्यता का पत्र प्राप्त करने की तारीख से) बैंक से अपेक्षित है कि वह इस अधिनिर्णय का अनुपालन करे और इस अनुपालन की सूचना बेंकिंग लोकपाल को दें +यदि शिकायतकर्ता, बैंकिंग लोकपाल द्वारा पारित अधिनिर्णय से संतुष्ट नहीं है तो वह बैंकिंग लोकपाल के निर्णय के विरूद्ध अपीलीय प्राधिकारी से संपर्क कर सकता है +शिकायतकर्ता द्वारा किसी अधिनिर्णय की अस्वीकृति विधि के अनुसार उसे उपलब्ध अन्य उपाय और / अथवा समाधानों को प्रभावित नहीं करती है +बैंक के पास यह विकल्प है कि वह इस योजना के अंतर्गत अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष कोई अपील दर्ज करे +अधिनिर्णय के विरूद्ध अपील. +अपीलीय प्राधिकारी भारतीय रिज़र्व बैंक में उप गवर्नर हैं +इस अधिनिर्णय से पीडि़त दोनों पक्ष इस अधिनिर्णय की प्राप्ति की तारीख से तीस दिनों के भीतर अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष इस अधिनिर्णय के विरूद्ध अपील कर सकते है अपीलीय अधिकारी यदि वह इस बात से संतुष्ट है कि समय के भीतर अपील हेतु आवेदन करने के लिए आवेदनकर्ता के पास पर्याप्त कारण है तो वह तीस दिनों तक की एक और अवधि की अनुमति दे सकता है +बैंक अपने अध्यक्ष अथवा उनकी अनुपस्थिति में प्रबंध निदेशक अथवा कार्यपालक निदेशक अथवा मुख्य कार्यपालक अधिकारी अथवा समान श्रेणी के किसी अन्य अधिकारी की पूर्व संस्वीकृति के साथ अपील कर सकते है +अपीलीय प्राधिकारी +अन्य. +हाँ. बैंकिंग लोकपाल किसी शिकायत को किसी भी स्तर पर अस्वीकार कर सकता है यदि उसे ऐसा प्रतीत हो कि उसके पास की गई शिकायत: +लंबित शिकायतों का न्यायनिर्णयन तथा अधिनिर्णय का कार्यान्वयन (बैंकिंग लोकपाल योजना 2006 के परिचालन में आने से पहले ही पारित) पूर्व की बैंकिंग लोकपाल योजनाएं 1995 और 2002 के प्रावधानों द्वारा अभिशासित किया जाता रहेगा +भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बैंकिंग लोकपाल योजना का गठन बैंकों के ग्राहकों को एक शीध्र शिकायत निवारण व्यवस्था उपलब्ध कराने के लिए किया गया है यह बैंकिंग सेवाओं से संबंधित शिकायतों तथा इस योजना में यथा निर्दिष्ट अन्य मामलों के समाधान हेतु एक सांस्थिक और विधिक ढाँचा उपलब्ध कराता है यह योजना भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1949 की धारा 35क के अनुसार रिज़र्व बैंक द्वारा जारी निदेशक के माध्यम से लागू की गई है रिज़र्व बैंक अपने सेवारत वरिष्ठ अधिकारियों को भी बैंकिंग लोकपाल के रूप में नियुक्त करेगा और बेहतर प्रभाव के लिए इसे पूर्ण रूप से निधि भी प्रदान करेगा +बैंकिंग लोकपाल योजना पहली बार वर्ष 1995 में लागू की गई और इसे वर्ष 2002 में संशोधित किया गया विगत पाँच वर्षो के दौरान बैंकिंग लोकपालों द्वारा लगभग 36,000 शिकायतों पर कार्रवाई की गई है + +भारत में सरकारी प्रतिभूति बाजार का परिचय: +अस्वीकरण. +इस प्रवेशिका की विषयवस्तु केवल सामान्य जानकारी और मार्गदर्शन के प्रयोजनार्थ है इस प्रवेशिका के आधार पर की गई कार्रवाई/लिए गए निर्णयों के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक उत्तरदायी नहीं है पाठकों को सूचित किया जाता है कि वे समय-समय पर रिज़र्व बैंक द्वारा विशिष्ट परिपत्रों का संदर्भ लें हालांकि इस दस्तावेज में दी गई जानकारी सही रूप में प्रस्तुत करने का हर संभव प्रयास किया गया है, तथापि भारतीय रिज़र्व बैंक इस दस्तावेज में दी गई सूचना के किसी भाग अथवा पूर्ण विषय वस्तु पर किसी भी की गई कार्रवाई, विश्वसनीयता अथवा इस दस्तावेज में किसी गलती अथवा छूट के लिए कोई दायित्व स्वीकार नहीं करता. +प्रस्तावना. +भारत में सरकारी प्रतिभूति बाजार में पिछले दशक में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं इलैक्ट्रॉनिक क्रीन आधारित कारोबार प्रणाली लागू करना, अमूर्त धारिता, सीधा प्रसंस्करण, तयशुदा समायोजन के लिए केद्रीय प्रतिरूप (सीसीपी) के रूप में भारतीय समाशोधन निगम लिमि. (सीसीआइएल) की स्थापना, नई लिखतों तथा कानूनी परिवेश में परिवर्तन कुछ ऐसी महत्वपूर्ण गतिविधियाँ हैं जिन्होने इस बाजार को तेजी से विकसित होने में सहयोग दिया है +ऐतिहासिक रूप से सरकारी प्रतिभूति बाजार में प्रमुख सहभागी बड़े संस्थागत निवेशक रहे हैं विकास हेतु विभिन्न उपायों के साथ बाजार में सहकारी बैंकों, छोटे पेंशन तथा अन्य निधियों इत्यादि जैसी अपेक्षाकृत छोटी संस्थाओं का प्रवेश भी हुआ है इन संस्थाओं को संबंधित विनियमों के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने का आदेश है तथापि, इन नए प्रवेशकों में से कुछ संस्थाओं के समक्ष सरकारी प्रतिभूति बाजार के विभिन्न पहलुओं को समझाने और आँकने में कठिनाई आई है अतः भारतीय रिज़र्व बैंक ने इन छोटे निवेशकों के बीच सरकारी प्रतिभूति बाजार के बारे में जागरूकता लाने के लिए कई कदम उठाए हैं इनमें स्थायी आय प्रतिभूतियों/बॉण्डों यथा सरकारी प्रतिभूतियों, वर्तमान कारोबारी और निवेश प्रक्रियाओं, संबंधित विनियामक पहलुओं और दिशानिर्देशों से संबंधित मूल पहलुओं पर कार्यशालाएँ आयोजित करना सम्मिलित है +यह प्रवेशिका, छोटे संस्थागत सहभागियों के साथ-साथ जनता के बीच सरकारी प्रतिभूति बाजार से संबंधित सूचना के प्रसार हेतु एक अन्य पहल है इस प्रवेशिका में बाजार के बारे में व्यापक ब्योरा प्रस्तुत करने के साथ-साथ विभिन्न प्रक्रियाओं और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से संबंधित विभिन्न प्रक्रियागत और परिचालनगत पहलुओं को आसान और प्रश्न-उत्तर के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है इस प्रवेशिका में, अनुबंध के रूप में, प्राथमिक व्यापारियों (पीडी) की सूची, उपयोगी एक्सेल कार्य तथा महत्वपूर्ण बाजार शब्दावली दी गई है मुझो आशा है कि संस्थागत निवेशकों विशेष रूप से छोटे संस्थागत निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने का निर्णय लेने में ³en he´JesfMekee उपयोगी सिद्ध होगी भारतीय रिज़र्व बैंक इस प्रवेशिका को और अधिक उपयोगी बनाने में आपके सुझाावों का स्वागत करेगा +श्रीमती एस. गोपीनाथ +उप गवर्नर +1.1. सरकारी प्रतिभूति एक व्यापारयोग्य लिखत है जो केद्र सरकार अथवा राज्य सरकारों द्वारा जारी किए जाते हैं ये सरकार का ऋण दायित्व दर्शाते हैं यह प्रतिभूतियाँ अल्पावधि (सामान्यतः इन्हें खजाना बिल कहा जाता है, जिनकी मूल परिपक्वता 1 वर्ष से कम होती है) अथवा दीर्धावधि (सामान्यतः इन्हें सरकारी बॉण्ड अथवा दिनांकित प्रतिभूतियाँ कहा जाता है, जिनकी मूल परिपक्वता एक वर्ष अथवा अधिक होती है) होती हैं भारत में केद्र सरकार, खजाना बिल तथा बॉण्ड अथवा दिनांकित प्रतिभूतियाँ जारी करती है जबकि राज्य सरकारें केवल बॉण्ड अथवा दिनांकित प्रतिभूतियाँ जारी करती हैं जिन्हें राज्य विकास ऋण (एसडीएल) कहा जाता है सरकारी प्रतिभूतियों में, व्यावहारिक रूप से, चूक का कोई जोखिम नहीं होता है, तथा इस प्रकार इन्हें जोखिम मुक्त अथवा श्रेष्ठ प्रतिभूतियाँ कहा जाता है भारत सरकार बचत लिखत (बचत बॉण्ड, राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (एनएससी), इत्यादि) अथवा विशेष प्रतिभूतियाँ (तेल बॉण्ड, भारतीय खाद्य निगम बॉण्ड, उर्वरक बॉण्ड, ऊर्जा बॉण्ड इत्यादि) भी जारी करती है ये पूर्णतया व्यापार योग्य नहीं होते हैं, अतः सांविधिक चलनिधि अनुपात (एसएलआर) प्रतिभूतियों के लिए पात्र नहीं होते हैं +1.2. खजाना बिल अथवा टी बिल्स, जो मुद्रा बाजार लिखत हैं, भारत सरकार द्वारा जारी अल्पावधि ऋण लिखत हैं तथा वर्तमान में तीन प्रकार के यथा 91 दिवसीय, 182 दिवसीय और 364 दिवसीय रूप में जारी किए जाते हैं खजाना बिल शून्य कूपन प्रतिभूतियाँ हैं तथा इन पर ब्याज का भुगतान नहीं किया जाता वे बट्टे पर जारी किए जाते हैं तथा परिपक्वता पर इनका मोचन अंकित मूल्य पर किया जाता है उदाहरणार्थ, 100 रू. (अंकित मूल्य) का 91 दिवसीय खजाना बिल यदि 98.20 रू. पर जारी किया जाता है, जो 1.80 रू. के बट्टे पर है, उसका मोचन 100 रू. के अंकित मूल्य पर किया जाएगा निवेशकों को परिपक्वता मूल्य अथवा अंकित मूल्य (अर्थात 100 रू.) तथा जारी मूल्य के बीच अंतर आय के रूप में प्राप्त होगा (खजाना बिलों पर आय की गणना के लिए कृपया प्रश्न सं.26 का उत्तर देखें) रिज़र्व बैंक खजाना बिल जारी करने के लिए प्रत्येक बुधवार को नीलामी करता है खरीदे गए खजाना बिलों के लिए भुगतान आगामी शुक्रवार को किया जाता है 91 दिवसीय खजाना बिलों की नीलामी प्रत्येक बुधवार को की जाती है 182 दिवसीय तथा 364 दिवसीय खजाना बिलों की नीलामी वैकल्पिक बुधवार को होती है 364 दिवसीय अवधि वाले खजाना बिलों की नीलामी रिपो\टग शुक्रवार के पिछले बुधवार को होती है जबकि 182 दिवसीय खजाना बिलों की नीलामी गैर रिपो\टग शुक्रवार से पहले बुधवार को होती है रिज़र्व बैंक द्वारा वित्तीय वर्ष के लिए खजाना बिल जारी करने का वार्षिक कैलेंडर पिछले वित्तीय वर्ष के मार्च के अंतिम सप्ताह में जारी किया जाता है भारतीय रिज़र्व बैंक खजाना बिल जारी करने का ब्योरा प्रत्येक सप्ताह में प्रैस विज्ञप्ति के माध्यम से करता है +(ख) दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियाँ +1.3. दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियाँ दीर्धावधि प्रतिभूतियाँ होती हैं और उन पर स्थायी अथवा अस्थायी कूपन (ब्याज दर) दिया जाता है जो एक निश्चित अवधि (सामान्यतया छमाही) पर अंकित मूल्य पर देय होता है दिनांकित प्रतिभूतियों की अवधि 30 वर्ष तक हो सकती है +रिज़र्व बैंक का लोक ऋण कार्यालय सरकारी प्रतिभूतियों की रजिस्ट्री/निक्षेपागार का कार्य करता है तथा उन्हें जारी करने, ब्याज अदा करने तथा परिपक्वता मूलधन की चुकौती संबंधी कार्य करता है अधिकांश दिनांकित प्रतिभूतियाँ स्थायी कूपन प्रतिभूतियाँ हैं +प्रतीकात्मक दिनांकित नियत कूपन सरकारी प्रतिभूतियों की नाम पद्धति में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं - कूपन, जारीकर्ता का नाम, परिपक्वता और अंकित मूल्य उदाहरणार्थ : 7.49% जीएस 2017 का अर्थ होगा :- +कूपन +7.49% अंकित मूल्य पर भुगतान +जारीकर्ता का नाम +भारत सरकार +जारी करने की तारीख 16 अप्रैल 2007 +परिपक्वता 16 अप्रैल 2017 +कूपन भुगतान की तारीख छमाही (16 अक्तूबर और 16 अप्रैल) प्रत्येक वर्ष +जारी/बिक्री की न्यूनतम राशि 10,000 रू. +यदि एकसमान कूपन की दो प्रतिभूतियाँ हैं और एक ही वर्ष में परिपक्व हो रही हैं, तो एक प्रतिभूति के नाम में माह जुड़ जाएगा उदाहरणार्थ : 6.05% जीएस 2019 फरवरी का अर्थ होगा कि 6.05% कूपन वाली सरकारी प्रतिभूति, उसी कूपन वाली अन्य प्रतिभूति, जिसका नाम 6.05% 2019 है और जो जून 2019 को परिपक्व हो रही है, के साथ फरवरी 2019 को परिपक्व होगी +यदि कूपन भुगतान की तारीख रविवार अथवा छुट्टी के दिन है, तो कूपन भुगतान अगले कार्य दिवस को किया जाता है तथापि, यदि परिपक्वता की तारीख रविवार अथवा छुट्टी के दिन होती है तो शोधन की आय का भुगतान पिछले कार्य दिवस को किया जाता है +1.4. भारत सरकार द्वारा जारी सभी दिनांकित प्रतिभूतियों का ब्योरा भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट प्ूूज्://ैैै.ींi.दीु.iह/एम्ीiज्ूे/िiहaहम्iaत्स्aीवूेैaूम्प्.aेज्x . पर उपलब्ध हैं खजाना बिलों के समानही, भारत सरकार और राज्य सरकारों, दोनों की दिनांकित प्रतिभूतियाँ रिज़र्व बैंक के माध्यम से नीलामी द्वारा जारी कि जाती हैं रिज़र्व बैंक नीलामी की धोषणा प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से एक सप्ताह पहले करता है सरकारी प्रतिभूति की नीलामी की धोषणा प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों के माध्यम से विज्ञापनों द्वारा भी की जाती है इस प्रकार निवेशों को ऐसी नीलामी के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदने की योजना बनाने के लिए पर्याप्त समय दिया जाता है +दिनांकित प्रतिभूति का नमूना परिशिष्ट 1 में दिया गया है +1.5. लिखत +(i) स्थायी दर बॉण्ड - इन बॉण्डों पर बाँण्ड की पूरी अवधि के लिए कूपन दर स्थायी होती है अधिकांश सरकारी बॉण्ड स्थायी दर बॉण्डों के रूप में जारी किए जाते हैं +उदाहरण - 8.24 प्रतिशत जीएस 2018 दस वर्ष के अवधि के लिए 22 अप्रैल 2008 को जारी किया गया जिसकी परिपक्वता 22 अप्रैल 2018 को है इस प्रतिभूति पर कूपन प्रत्येक वर्ष छःमाही आधार पर 4.12 प्रतिशत की दर से अंकित मूल्य पर 22 अक्तूबर और 22 अप्रैल को अदा किया जाएगा +(ii) अस्थायी दर बॉण्ड - अस्थायी दर बॉण्ड वे प्रतिभूतियाँ हैं जिनकी कूपन दर स्थायी नहीं होती इनका कूपन, आधार दर पर स्पैड जमा करके पहले से धोषित अंतरालों पर (छःमाह/एक वर्ष) दुबारा निर्धारित किया जाता है अब तक भारत सरकार द्वारा जारी अधिकांश अस्थायी दर बॉण्डों के मामले में स्पैड नीलामी के दौरान निर्धारित किया जाता है जबकि आधार पर पिछले कूपन पुनःनिर्धारित करने की तारीख के पिछले तीन 364 दिवसीय खजाना बिलों की नीलामी की निर्धारित दर की भारित औसत होगी भारत में पहले अस्थायी दर बॉण्ड सितंबर 1995 में जारी किए गए थे +उदाहरणार्थ : एक अस्थायी दर बॉण्ड 15 वर्ष की अवधि के लिए 2 जुलाई 2002 को जारी किया गया जो 2 जुलाई 2017 को परिपक्व होगा कूपन भुगतान के लिए बॉण्ड पर आधार दर 6.50 प्रतिशत निर्धारित की गयी जो पिछली छः नीलामियों के दौरान 364 दिवसीय खजाना बिलों पर अंतर्निहित आय की भारित औसत दर थी बॉण्ड नीलामी में 34 आधार पाइंट (0.34%) का निर्दिष्ट अंतराल (चिन्हित दर से अधिक मूल्य) निर्धारित किया गया अतः पहले छःमाह के लिए कूपन 6.84% पर निर्धारित किया गया +(iii) शून्य कूपन बॉण्ड - शून्य कूपन बॉण्ड वे कूपन बॉण्ड हैं जिन पर कोई कूपन भुगतान नहीं किया जाता खजाना बिलों के समान ये अंकित मूल्य पर बट्टे पर जारी किए जाते हैं भारत सरकार ने ऐसी प्रतिभूतियाँ 90 के दशक में जारी की थी उसके बाद शून्य कूपन बॉण्ड जारी नहीं किए गए +(iv) पूंजी सूचकांक बॉण्ड - ये बॉण्ड, जिनका मूल धन मुद्रास्फीति के स्वीकार्य सूचकांक से सहलग्न हैं, मुद्रास्फीति से धारक का बचाव करता हैं पूंजी सूचकांक बॉण्ड, जिसके मूलधन की प्रतिरक्षा मुद्रास्फीति से की गयी थी, दिसंबर 1997 में जारी किए गए थे ये बॉण्ड 2002 में परिपक्व हो गये थे सरकार मुद्रस्फीति सूचकांक बॉण्डों के निर्गम पर कार्य कर रही है जिनमें बॉण्डों पर कूपन और मूलधन, दोनों, मुद्रस्फीति सूचकांक (थोक मूल्य सूचकांक) से सहलग्न होंगे +(v) मांग/विक्रय विकल्प वाले बाँण्ड - विकल्प की विशेषताओं वाले बॉण्ड भी जारी किये जा सकते हैं जहाँ जारीकर्ता के पास बाय बैक (मांग/विकल्प) का विकल्प होगा अथवा निवेशक के पास यह विकल्प होगा कि वह बॉण्ड की अवधि के दौरान जारीकर्ता को बॉण्ड बेच (विक्रय विकल्प) सकते हैं 6.72% जीएस 2012, 18 जुलाई 2002 को जारी किए गए थे जिनकी परिपक्वता अवधि दस वर्ष की है तथा परिपक्वता की तारीख 18 जुलाई 2012 है बॉण्ड पर विकल्प का प्रयोग उसके बाद आने वाली किसी कूपन तारीख को जारी करने की तारीख से 5 वर्ष की अवधि पूरा होने के बाद किया जा सकता है सरकार को सममूल्य पर (अंकित मूल्य के बराबर) बॉण्ड बाय बैक (मांग/विकल्प) करने का अधिकार है जब कि निवेशक को 18 जुलाई 2007 से आरंभ होने वाली किसी भी छमाही कूपन तारीखों में सममूल्य पर सरकार को बेचने का अधिकार होगा +(vi) विशेष प्रतिभूतियाँ - बाजार उधार के कार्यक्रम के अंतर्गत खजाना बिल और दिनांकित प्रतिभूतियाँ जारी करने के साथ-साथ समय-समय पर तेल विपणन कंपनियों, उर्वरक कंपनियों, भारतीय खाद्य निगम इत्यादि को नकदी सब्सिडी के स्थान पर प्रतिपूर्ति के रूप में विशेष प्रतिभूतियाँ जारी करती हैं ये प्रतिभूतियाँ सामान्यतः लंबित अवधि की होती है जिन पर तुलनात्मक परिपक्वता की दिनांकित प्रतिभूतियों के आय पर लगभग 20-25 आधार पाइंट का स्प्रैड होता है तथापि ये प्रतिभूतियाँ एसएलआर प्रतिभूतियों के लिए पात्र नहीं होती हैं लेकिन बाजार रिपो लेन-देनों के लिए संपाश्दिवक के रूप में पात्र होती हैं हिताधिकारी तेल विपणन कंपनियाँ इन प्रतिभूतियों को द्वितीय बाजार में बैंकों, बीमा कंपनियों/प्राथमिक व्यापारियों इत्यादि को नकदी जुटाने के लिए बेच सकती हैं +(vii) स्ट्रिप्स (प्रतिभूतियों के पंजीकृत ब्याज और मूलधन का पृथक कारोबार) जैसे नये स्वरूप के लिखत लागू करने के उपाय किये गए हैं स्ट्रिप्स वे लिखत हैं जिनमें स्थायी कूपन प्रतिभूति का प्रत्येक नकदी प्रवाह पृथक कारोबार योग्य शून्य कूपन बॉण्ड में परिवर्तित हो जाता है तथा उस पर कारोबार किया जाता है उदाहरणार्थ : जब 100 रू. के 8.24% जीएस 2018 को स्ट्रिप किया जाता है, तो कूपन (4.12 रू. प्रत्येक छमाही) स्ट्रिप का प्रत्येक नकदी प्रवाह कूपन स्ट्रिप बन जाता है तथा मूल भुगतान (परिपक्वता पर 100 रू.) मूल स्ट्रिप बन जाएगा द्वितीयक बाजार में इन नकदी प्रवाहों के संबंध में अलग प्रतिभूतियों के रूप में कारोबार होता है +1.6. राज्य सरकारें भी बाजार से ऋण जुटाती हैं एसडीएल दिनांकित प्रतिभूतियाँ होती हैं जो केद्र सरकार द्वारा दिनांकित प्रतिभूतियों के लिए की जाने वाली नीलामियों के समान नीलामी के माध्यम से जारी की जाती हैं (नीचे प्रश्न सं.3 देखें) ब्याज का भुगतान छमाही आधार पर किया जाता है तथा मूल की चुकौती परिपक्वता तारीख को होती है केद्र सरकार द्वारा जारी दिनांकित प्रतिभूतियों के समान राज्य सरकारों द्वारा जारी एसडीएल सांविधिक चलनिधि अनुपात के लिए गिनी जाएंगी ये बाजार रिपो के माध्यम से उधार के लिए संपाश्दिवक के रूप में तथा चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत भारतीय रिज़र्व बैंक से पात्र संस्थाओं द्वारा उधार लेने के लिए पात्र होंगी +2. सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश क्यों करना चाहिए ? +2.1. बैंक द्वारा अपनी दैनिक आवश्यकताओं से अधिक नकदी रखने से उसे कुछ लाभ नहीं होता सोने में निवेश से बहुत सी समस्याएँ होती हैं जैसे उसकी शुद्धता, मूल्यांकन, सुरक्षित अभिरक्षा इत्यादि सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के निम्नलिखित लाभ हैं :- +2.2. बैंककारी विनियमन अधिनियम 1949 की धारा 24 (जैसा कि वह सहकारी समितियों पर लागू है) में प्रावधान है कि प्रत्येक प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंक किसी भी दिन की समाप्ति पर, अपनी मांग और मीयादी देयताओं के 25% से अनधिक तरल आस्तियों का अनुरक्षण करेगा (न्यूनतम नकदी प्रारक्षित अपेक्षाओं के अतिरिक्त) ये तरल आस्तियाँ नकदी, सोने अथवा भाररहित सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों के रूप में होनी चाहिए इन्हें सामान्यतया सांविधिक चलनिधि अनुपात (एसएलआर) अपेक्षा कहा जाता है +2.3. सभी प्राथमिक (शहरी) सहकारी बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी एसएलआर धारिताओं का कुछ न्यूनतम स्तर सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में निम्नानुसार निवेश करें :- +(क) अनुसूचित शहरी सहकारी बैंकों को अपनी एसएलआर अपेक्षा का 25 प्रतिशत सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में धारण करना चाहिए +(ख) गैर अनुसूचित शहरी सहकारी बैंकों को, जिनकी मांग और मीयादी देयताएँ 25 करोड रू. से अधिक हैं, अपनी एसएलआर अपेक्षाओं का 15% सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में धारण करना चाहिए +(ग) गैर अनुसूचित शहरी सहकारी बैंकों को, जिनकी मांग और मीयादी देयताएँ 25 करोड़ रू. से कम हैं, अपनी एसएलआर अपेक्षाओं का 10% सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में धारण करना चाहिए +(ख) ग्रामीण सहकारी बैंक +2.4. बैंककारी विनियमन अधिनियम 1949 की धारा 24 के अनुसार राज्य सहकारी बैंकों और जिला केद्रीय सहकारी बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वे एसएलआर अपेक्षा के भाग के रूप में नकदी, सोने अथवा भाररहित प्रतिभूतियों में धारित करें जिनका मूल्य वर्तमान बाजार मूल्य से अधिक न हो, अपनी मांग और मीयादी देयताओं के 25% से कम न हो डीसीसीबी को अनुमति है कि वे अपने संबंधित शहरी सहकारी बैंक में एसएलआर की अपेक्षा को पूरा करने के लिए नकदी शेष का अनुरक्षण कर सकता है +(ग) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक +2.5. अप्रैल 2002 से सभी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी सारी एसएलआर का अनुरक्षण सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में करें वर्तमान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के लिए एसएलआर अपेक्षा उनकी मांग और मीयादी देयताओं का 25% है +2.6 वर्तमान में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को अपनी एसएलआर प्रतिभूतियों के संबंध में उनके दैनिक बाजार cetu³e से छूट प्रदान की गई है तदनुसार, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को "परिपक्वता तक धारित" के अंतर्गत अपने पूरे निवेश संविभाग को वर्गीकृत करने तथा उन्हें उनके बही मूल्य पर मूल्यांकित करने की छूट दे दी गई है +(ध) भविष्य निधि और अन्य संस्थाएँ +2.7. केद्र सरकार की अपेक्षा के अनुसार गैर सरकारी भविष्य निधियों, पेंशन तथा उपदान निधियों को 24 जनवरी 2005 से अपनी क्रमिक आय का 40% केद्र और राज्य सरकार की प्रतिभूतियों तथा/अथवा भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बौर्ड (सेबी) द्वारा विनियमित गिल्ट निधि की यूनिटों तथा केद्र/राज्य सरकारों द्वारा पूर्णतया तथा बिना किसी शर्त के अन्य परक्राम्य लिखत में निवेश करना अपेक्षित है तथापि, किसी एक गिल्ट निधि में न्यास का जोखिम किसी भी समय उसके कुल संविभाग के पाँच प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए गैर सरकारी भविष्य निधियों के लिए निवेश दिशानिर्देशों में हाल ही में सुधार किया गया है जिसके अनुसार अप्रैल 2009 से निवेशयोग्य निधि के 55% तक निवेश केद्र सरकार की प्रतिभूतियों, राज्य सरकार की प्रतिभूतियों तथा गिल्ट निधि की यूनिटों में निवेश करने की अनुमति है +3.1. सरकारी प्रतिभूतियाँ भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा आयोजित नीलामियों के माध्यम से जारी की जाती हैं नीलामियाँ एनडीएस नीलामी मंच नामक इलैक्ट्रॉनिक मंच पर की जाती हैं वाणिज्य बैंक, अनुसूचित शहरी सहकारी बैंक, प्राथमिक व्यापारी (प्राथमिक व्यापारियों की सूची उनके संपर्क ब्योरे सहित परिशिष्ट 2 में दी गई है), बीमा कंपनियाँ और भविष्य निधियाँ जो भारतीय रिज़र्व बैंक के पास निधि खातों (चालू खातों) और प्रतिभूति खातों का अनुरक्षण करते हैं, इस इलैक्ट्रॉनिक मंच के सदस्य हैं पीडीओ-एनडीएस के सभी सदस्य इस इलैक्ट्रॉनिक मंच के माध्यम से अपनी बोलियाँ लगा सकते हैं सभी गैर एनडीएस सदस्य, गैर अनुसूचित शहरी सहकारी बैंकों सहित, अनुसूचित वाणिज्य बैंकों और प्राथमिक व्यापारियों के माध्यम से प्राथमिक नीलामी में भाग ले सकते हैं इस प्रयोजन के लिए शहरी सहकारी बैंकों को किसी बैंक/प्राथमिक व्यापारी के पास प्रतिभूति खाता खोलने की आवश्यकता है - ऐसे खाते को गिल्ट खाता कहा जाता है गिल्ट खाता किसी अनुसूचित वाणिज्य बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी द्वारा अपने ग्राहक (उदा. गैर अनुसूचित शहरी बैंक) के लिए अनुरक्षित किया जाता है जिसे डीमेट खाता कहते हैं +3.2. भारतीय रिज़र्व बैंक, भारत सरकार के परामर्श से सांकेतिक छमाही कैलेंडर जारी करता है जिसमें उधार की राशि, प्रतिभूति की अवधि और वह अवधि जिसमें नीलामी हो सकती है इत्यादि संबंधी जानकारी होती है नीलामी की वास्तविक तारीख से लगभग एक सप्ताह पहले एक अधिसूचना और प्रेस विज्ञप्ति जारी की जाती है यथा नाम, राशि, निर्गम का स्वरूप और नीलामी की प्रक्रिया भारत सरकार द्वारा जारी की जाती है भारतीय रिज़र्व बैंक अपनी वेबसाइट (ैैै.ींi.दीु.iह) पर एक अधिसूचना और प्रेस विज्ञप्ति जारी करने के साथ-साथ अंग्रेजी और हिंदी के प्रमुख समाचारपत्रों में विज्ञापन भी देता है सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों की चयनित शाखाओं तथा प्राथमिक व्यापारियों के पास भी नीलामी की जानकारी उपलब्ध होती है +नीलामियों के निर्गम जारी करने के तरीके के रूप में लागू करने से पहले सरकार द्वारा ब्याज दरें प्रशासनिक रूप से निर्धारित किए जाते थे नीलामी शुरू करने के साथ ब्याज दरें (कूपन दरें) बाजार आधारित मूल्य निर्धारण प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित किए जाते हैं +4.1. नीलामी आय आधारित अथवा मूल्य आधारित हो सकती है +(i) आय आधारित नीलामी : आय आधारित नीलामी सामान्यतया नई सरकारी प्रतिभूति जारी करने के समय आयोजित की जाती है निवेशक Dee³e kes Deôegmeej दो दशमलव स्थान तक बोली लगाते हैं (उदाहरणार्थ : 8.19 प्रतिशत, 8.20 प्रतिशत इत्यादि) बोलियाँ ऊध्र्वगामी रूप में व्यवस्थित की जाती हैं तथा नीलामी की अधिसूचित राशि के अनुरूप आय पर पहुँचने पर रोक दी जाती है इस (कट-ऑफ) आय को प्रतिभूति की कूपन दर के रूप में लिया जाता है सफल बोलीकर्ता वे होते हैं जिन्होंने "कट ऑफ" आय पर या उससे से नीचे बोली लगाई है इससे उच्चतर बोलियों को अस्वीकार कर दिया जाता है आय आधारित नीलामी का एक उदाहरण नीचे प्रस्तुत है :- +नई प्रतिभूति की आय आधारित बोली +नई प्रतिभूति की आय आधारित बोली + +परिपक्वता की तारीख : 8 सितंबर 2018 + +कूपन : यह नीलामी में निर्धारित किया जाता है (8.22% जैसा कि नीचे उदाहरण में दर्शाया गया है) + नीलामी की तारीख : 5 सितंबर 2008 + नीलामी निपटान की तारीख : 8 सितंबर 2008* + अधिसूचित राशि : 1000 करोड़ रू. +बोली आय के बढ़ते हुए क्रम से प्राप्त बोलियों का ब्योरा +बोली सं. +बोली आय +बोली की राशि (रू.करोड़) +संचयी राशि (रू. करोड़) +8.22% के रूप में कूपन सहित मूल्य* +1. +8.79% +300 +300 +100.19 +2. +8.20% +200 +500 +100.14 +3. +8.20% +250 +750 +100.13 +4. +8.21% +150 +900 +100.09 +5. +8.22% +100 +1000 +100 +6. +8.22% +100 +1100 +100 +7. +8.23% +150 +1250 +99.93 +8. +8.24% +100 +1350 +99.87 +जारीकर्ता को क्रम सं.5 तक बोलियाँ स्वीकार करके अधिसूचित राशि प्राप्त होगी चूंकि बोली सं.6 की आय भी वही है, बोली सं.5 और 6 को यथानुपाती आबंटन प्राप्त होगा ताकि अधिसूचित राशि का अधिक न हो उपर्युक्त मामले में प्रत्येक को 50 करोड़ रू. मिलेंगे बोली सं.7 और 8 अस्वीकृत हो जाएंगी क्योंकि उनकी आय "कट ऑफ" आय से अधिक है +(ii) मूल्य आधारित नीलामी : भारत सरकार द्वारा पहले से जारी प्रतिभूतियों को दुबारा जारी करने पर मूल्य आधारित नीलामी की जाती है बोली लगाने वाले प्रतिभूति के अंकित मूल्य के प्रत्येक 100 रू. के लिए मूल्य के रूप में बोली लगाते हैं 102 रू., 101 रू., 100 रू., 99 रू. इत्यादि) बोलियाँ अधोगामी स्वरूप में व्यवस्थित की जाती हैं और सफल बोलीकर्ता वे होते हैं जिनकी बोली "कट ऑफ" मूल्य पर अथवा उससे अधिक होती है "कट ऑफ" मूल्य से नीचे की बोलियाँ अस्वीकृत हो जाती हैं मूल्य आधारित नीलामी का उदाहरण नीचे प्रस्तुत है : +वर्तमान प्रतिभूति 8.24% जीएस 2018 की मूल्य आधारित नीलामी + परिपक्वता की तारीख : 22 अप्रैल 2018 + +कूपन : 8.24% + नीलामी की तारीख : 5 सितंबर 2008 + नीलामी निपटान की तारीख : 8 सितंबर 2008* + अधिसूचित राशि : 1000 करोड़ रू. +बोली मूल्य के धटते हुए क्रम से प्राप्त बोलियों का ब्योरा +बोली सं. +बोली का मूल्य +बोली की राशि (रू.करोड़) +अंतर्निहित आय +संचयी राशि +1. +100.31 +300 +8.1912% +300 +2. +100.26 +200 +8.1987% +500 +3. +100.25 +250 +8.2002% +750 +4. +100.21 +150 +8.2062% +900 +5. +100.20 +100 +8.2077% +1000 +6. +100.20 +100 +8.2077% +1100 +7. +100.16 +150 +8.2136% +1250 +8. +100.15 +100 +8.2151% +1350 +जारीकर्ता को क्रम सं.5 तक बोलियाँ स्वीकार करके अधिसूचित राशि प्राप्त होगी चूंकि बोली सं.6 का मूल्य भी वही है, बोली सं.5 और 6 को अनुपात में आबंटन प्राप्त होगा ताकि अधिसूचित राशि अधिक न हो उपर्युक्त मामले में प्रत्येक को 50 करोड़ रू. मिलेंगे बोली सं.7 और 8 अस्वीकृत हो जाएंगी क्योंकि उनकी मूल्य "कट ऑफ" आय से कम है +4.2. सफल बोलीकर्ताओं को आबंटन के तरीके के आधार पर नीलामी को एक समान मूल्य आधारित और बहुमुखी मूल्य आधारित के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है एकसमान मूल्य नीलामी में सभी सफल बोलीकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे एक ही दर पर प्रतिभूतियों की आबंटित मात्रा के लिए भुगतान करें अर्थात नीलामी की "कट ऑफ" दर, चाहे उन्होंने कोई भी दर उध्दृत की हो दूसरी ओर, बहुमुखी मूल्य नीलामी में सफल बोलीकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे, उन्हें प्रतिभूतियों की आबंटित मात्रा के लिए, भुगतान करें जिस मूल्य/आय के लिए उन्होंने बोली लगाई है ऊपर दिये गये उदाहरण ii में, यदि नीलामी एकसमान मूल्य आधारित होती, तो सभी बोलीकर्ताओं को "कट ऑफ" मूल्य अर्थात 100.20 रू. पर आबंटन किया जाएगा दूसरी ओर, यदि नीलामी बहुमुखी मूल्य आधारित होती तो प्रत्येक बोलीकर्ता को उसी मूल्य पर आबंटन मिलता जिसकी उसने बोली लगाई है अर्थात बोलीकर्ता 1 को 100.31 रू., बोलीकर्ता 2 को 100.26 रू. पर तथा इसी प्रकार +4.3. कोई निवेशक नीलामी में निम्नलिखित में से किसी भी श्रेणी में बोली लगा सकता है :- +(i) स्पर्धी बोली : स्पर्धी बोली में, निवेशक एक विशिष्ट मूल्य/आय पर बोली लगाता है और उध्दृत मूल्य कट-ऑफ मूल्य/आय के भीतर होने पर उसे प्रतिभूतियाँ आबंटित की जाती हैं स्पर्धी बोलियाँ जानकर निवेशकों द्वारा लगाई जाती हैं यथा बैंक, वित्तीय संस्थाएँ, प्राथमिक व्यापारी, पारस्परिक निधियाँ और बीमा कंपनियाँ न्यूनतम बोली की राशि 10,000 रू. और उसके बाद 10,000 रू. के गुणजों में होती है बहुमुखी बोली की भी अनुमति है अर्थात कोई निवेशक विभिन्न मूल्यों/आय स्तरों पर कई बोलियाँ लगा सकता है +(ii) गैर स्पर्धी बोली : खुदरा निवेशकों को, जिन्हें नीलामी में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने की जानकारी नहीं है, नीलामी प्रक्रिया में भाग लेने के लिए एक अवसर देते हुए, जनवरी 2002 में दिनांकित प्रतिभूतियों में गैर स्पर्धी बोली लगाने की योजना लागू की गयी थी गैर स्पर्धी बोली आम जनता, हिन्दु अविभक्त परिवारों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों, सहकारी बैंकों, फर्मो, कंपनियों, कार्पोरेट निकायों, संस्थाओं, भविष्य निधियों और न्यासों के लिए खुली है इस योजना के अंतर्गत, पात्र निवेशक विशिष्ट मूल्य/आय निर्दिष्ट किए बिना किसी राशि की प्रतिभूतियों के लिए आवेदन कर सकता है ऐसे बोलीकर्ताओं को नीलामी की भारित औसत मूल्य/आय पर प्रतिभूतियाँ आबंटित की जाती हैं ऊपर 4.1(ii) में दिए उदाहरण में, अधिसूचित राशि चूंकि 1000 करोड़ रू. है, गैर स्पर्धी बोली के लिए आरक्षित निधि 50 करोड़ रू. होगी (नीचे निर्दिष्ट किए अनुसार अधिसूचित राशि का 5 प्रतिशत) गैर स्पर्धी बोलीकर्ताओं को भारित औसत मूल्य पर आबंटित किया जाएगा जो उद्धरण में 100.26 रू.. है तथापि, गैर स्पर्धी बोली के भागीदारों से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी के पास गिल्ट खाता रखें जिन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों तथा सहकारी बैंकों का एसजीएल और चालू खाता भारतीय रिज़र्व बैंक के पास है, वे भी बिना गिल्ट खाता रखे गैर स्पर्धी बोली की योजना के अंतर्गत भाग ले सकते हैं +4.4. दिनांकित प्रतिभूतियों की प्रत्येक नीलामी में, ऐसी गैर स्पर्धी बोलियों के लिए अधिकतम पांच प्रतिशत की अधिसूचित राशि प्रारक्षित की जाती है खजाना बिलों के लिए नीलामी के मामले में, गैर स्पर्धी बोलियों के लिए स्वीकार्य राशि अधिसूचित राशि को छोड़कर होती है और उसकी कोई सीमा नहीं है तथापि, खजाना बिलों में गैर स्पर्धी बोली केवल राज्य सरकारों और अन्य चयनित संस्थाओं को उपलब्ध है तथा सहकारी बैंकों के लिए उपलब्ध नहीं है किसी भी निवेशक को एक ही बोली किसी बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी के माध्यम से देने की अनुमति है योजना के अंतर्गत बोली लगाने के लिए निवेशक को किसी बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी के माध्यम से प्रतिभूतियों के आबंटन के लिए आवेदन के साथ वचनपत्र देना होगा दिनांकि प्रतिभूतियों की नीलामी के मामले में एक बोली के लिए न्यूनतम और अधिकतम राशि क्रमशः 10,000 रू. तथा 2 करोड़ रू. है बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी अपनी सेवाएँ देने के लिए प्रति 100 रू. की आवेदन राशि के लिए अधिकतम 6 पैसे कमीशन के रूप में प्रभारित कर सकता है यदि गैर स्पर्धी बोली के लिए प्राप्त कुल आवेदनों की बोली दिनांकित प्रतिभूतियों की नीलामी की अधिसूचित राशि के 5 प्रतिशत से अधिक होती हैं तो बोली लगाने वालों को यथानुपाती आधार पर प्रतिभूतियाँ आबंटित की जाएंगी +4.5. राज्य सरकार की प्रतिभूतियों में गैर स्पर्धी बोली योजना अगस्त 2009 से शुरू हुई है एसडीएल में इस प्रयोजन हेतु आरक्षित कुल राशि अधिसूचित राशि का 10% (1000 करोड़ रू. की अधिसूचित राशि पर 100 करोड़ रू.) है तथा किसी निवेशक द्वारा प्रत्येक नीलामी में 1% की बोली लगाई जा सकती है (केद्र सरकार की प्रतिभूतियों में 2 करोड़ रू. की तुलना में) बोली लगाने और आबंटन की प्रक्रिया केद्र सरकार की प्रतिभूतियों के समान है +5. खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) क्या हैं ? +खुले बाजार के परिचालन बाजार के वे परिचालन हैं जो भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा बाजार से/को सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद/बिक्री के लिए आयोजित किए जाते हैं ताकि लम्बी अवधि के लिए बाजार में रूपये की तरलता स्थितियों को समायोजित किया जा सके जब भारतीय रिज़र्व बैंक यह महसूस करता है कि बाजार में अधिक चलनिधि है तो यह प्रतिभूतियों की बिक्री दर्ज करता है तथा रूपये की चलनिधि को खींच लेता है इसी प्रकार जब चलनिधि की स्थिति कठोर है, भारतीय रिज़र्व बैंक बाजार से प्रतिभूतियाँ खरीद लेता है तथा बाजार में चलनिधि भेज देता है +चलनिधि समायोजन सुविधा (एलएएफ) अनुसूचित वाणिज्य बैंकों (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर) को और प्राथमिक व्यापारियों को दी जाने वाली एक ऐसी सुविधा है जिसमें वे आवश्यकता पड़ने पर चलनिधि का उपयोग कर सकते हैं अथवा अधिक चलनिधि होने पर भारतीय रिज़र्व बैंक के पास राज्य सरकार की प्रतिभूतियों सहित सरकारी प्रतिभूतियों को संपाश्दिवक के रूप में एक दिन के लिए रख सकते हैं मूल रूप से चलनिधि समायोजन सुविधा दैनंदिन आधार पर चलनिधि प्रबंधन उपलब्ध कराता है एलएएफ का परिचालन बैंक के साथ पुनर्खरीद (रिपो और रिवर्स रिपो - कृपया प्रश्न सं.30 के अंतर्गत ब्योरे के लिए 30.4 से 30.8 देखें) करके, सभी लेन-देनों में भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ प्रति-पार्टी बन कर किए जा सकते हैं एलएएफ के अंतर्गत रिज़र्व बैंक द्वारा ब्याज दरें समय-समय पर निर्धारित की जाती हैं वर्तमान में, एलएएफ के अंतर्गत रिपो पर ब्याज दर (भागीदारों द्वारा उधार लिए जाने पर) 4.75% है और रिवर्स रिपो (भारतीय रिज़र्व बैंक के पास निधि रखने के लिए) 3.25% है एलएएफ मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण उपकरण है तथा बाजार को ब्याज दर संकेत भेजने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक को समर्थ बनाता है +7.1. भारतीय रिज़र्व बैंक, मुंबई का लोक ऋण कार्यालय सरकारी प्रतिभूतियों के लिए रजिस्ट्री और केद्रीय निक्षेपागार का कार्य करता है निवेशकों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियाँ या तो भौतिक रूप में अथवा डीमैट रूप में रखी जाती हैं भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित सभी संस्थाओं के लिए 20 मई 2002 से सरकारी प्रतिभूतियों को केवल डीमैट (एसजीएल) रूप में रखना आवश्यक हो गया है तदनुसार, शहरी सरकारी बेंकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियाँ डीमैट रूप में रखना आवश्यक हो गया है +(क) भौतिक रूप में : सरकारी प्रतिभूतियों को स्टॉक प्रमाणपत्र के रूप में रखा जा सकता है स्टॉक प्रमाणपत्र को लोक ऋण कार्यालय की बहियों में पंजीकृत किया जाता है स्टॉक प्रमाणपत्रों में स्वामित्व का अंतरण परांकन और सुपुर्दगी के रूप में अंतरित नहीं किया जा सकता उन्हें स्वामित्व के रूप में अंतरण फार्म निष्पादित करके अंतरित किया जा सकता है तथा अंतरण का ब्योरा लोक ऋण कार्यालय की बहियों में दर्ज किया जाता है स्टॉक प्रमाणपत्र का अंतरण लोक ऋण कार्यालय की बहियों में पंजीकरण के बाद ही अंतिम और वैध होगा +(ख) डीमैट रूप में : सरकारी प्रतिभूतियों को डीमैट रूप में अथवा क्रिप रहित रूप में रखना सबसे अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक विकल्प है क्योंकि इससे सुरक्षित रूप से रखने की समस्याएँ यथा प्रतिभूति का गुम होना इत्यादि समाप्त हो जाती हैं साथ ही, इलैक्ट्रॉनिक रूप में अंतरण और सर्विसिंग परेशानी रहित होती है धारक अपनी प्रतिभूतियों को डीमैट रूप में दो प्रकार से रख सकता है : +(i) एसजीएल खाता : भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा सहायक सामान्य लेजर खाते की सुविधा कुछ चयनित संस्थाओं को उपलब्ध कराई जाती है जो अपनी प्रतिभूतियाँ भारतीय रिज़र्व बैंक के लोक ऋण कार्यालय में एसजीएल खातों में अनुरक्षित कर सकते हैं +(ii) गिल्ट खाता : चूंकि भारतीय रिज़र्व बैंक के पास एसजीएल खाता खोलने और उसे अनुरक्षित करने की सुविधा प्रतिबंधित है, किसी भी निवेशक के पास किसी बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी के पास गिल्ट खाता खोलने का विकल्प है जो भारतीय रिज़र्व बैंक के पास ग्राहक का सहायक सामान्य लेजर खाता (सीएसजीएल खाता) खोल सकता है इस व्यवस्था में बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी, गिल्ट खाता धारक के अभिरक्षक के रूप में अपने ग्राहक की धारिताओं को भारतीय रिज़र्व बैंक के पास सीएसजीएल खाते में रखेगा (जो एसजीएल II खाते के नाम से भी जाना जाता है) गिल्ट खाते में रखी प्रतिभूतियों की सर्विसिंग इलैक्टॉनिक रूप में की जाती है, बाधारहित व्यापार और प्रतिभूतियों का रखरखाव किया जाता है परिपक्वता आय और आवधिक ब्याज भी तेजी से आता है तथा भारतीय रिज़र्व बैंक के पास प्राथमिक व्यापारी/ अभिरक्षक (सीएसजीएल खाताधारक) के चालू खाते में जमा हो जाती है तथा तत्काल अभिरक्षक द्वारा गिल्ट खाता धारकों के खाते में जमा कर दी जाती है +7.2. निवेशकों के पास सरकारी प्रतिभूतियाँ निक्षेपागार (एनएसडीएल/सीडीएसएल इत्यादि) के पास डीमैट खाते में रखने का विकल्प रहता है इससे स्टॉक एक्सचेंजों में सरकारी प्रतिभूतियों का कारोबार सुविधाजनक होता है +8.1. सरकारी प्रतिभूतियों में एक सक्रिय द्वितीयक बाजार है द्वितीय बाजार में प्रतिभूतियों की खरीद/बिक्री (i) काउंटर पर (ओटीसी) अथवा (ii) तयशुदा लेन-देन प्रणाली (एनडीएस) अथवा (iii) तयशुदा लेन-देन प्रणाली - आदेश मैंचिंग (एनडीएस-ओएम) पर की जा सकती है +(i) काउंटर पर (ओटीसी)/टेलीफोन बाजार +8.2. इस बाजार में, कोई सहभागी, जो सरकारी प्रतिभूति खरीदने अथवा बेचने का इच्छुक है, किसी बैंक/प्राथमिक व्यापारी/वित्तीय संस्थान से सीधे ही अथवा सेबी के पास पंजीकृत किसी ब्रोकर से संपर्क करके किसी मूल्य पर एक विशेष प्रतिभूति की किसी राशि तक मोल-भाव कर सकता है ये मोलभाव अधिकांशतः फोन पर होते हैं और किसी दर पर दोनों पक्षों के तैयार होने पर सौदा तय हो जाता है क्रेता के मामले में, यथा एक शहरी सहकारी बैंक प्रतिभूति खरीदना चाहता है तो बैंक का व्यापारी (जे बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों के लेन-देन के लिए प्राधिकृत है) अन्य बाजार सहभागियों से फोन पर संपर्क करेगा तथा दरें प्राप्त करेगा यदि कोई सौदा तय होता हे तो बैंक इस व्यापार का ब्योरा सौदा पर्ची में दर्ज करेगा (नमूना परिशिष्ट 3 में दिया गया है ) तथा प्रतिपक्ष को व्यापार की पुष्टि करेगा व्यापारी को उद्धृत मूल्य के संबंध में उपलब्ध ñाोतों से मूल्य की पुष्टि करनी चाहिए (सरकारी प्रतिभूतियों का मूल्य सुनिश्चित करने के संबंध में प्रश्न सं.14 देखें) ओटीसी बाजार में किए गए सभी कारोबार एनडीएस के द्वितीयक बाजार मॉडîाूल में रिपोर्ट किए जाते हैं जिनका ब्योरा प्रश्न सं.15 में दिया गया है +(ii) तयशुदा लेन-देन प्रणाली +8.3. इलैक्ट्रॉनिक कारोबार तथा सरकारी प्रतिभूतियों में लेन-देन की रिपो\टग के लिए तयशुदा लेन-देन प्रणाली (एनडीएस) फरवरी 2002 में लागू हुई थी नीलामी होने पर इससे सदस्यों को अपनी बोली इलैक्ट्रानिक रूप से प्रस्तुत करने अथवा सरकारी प्रतिभूतियों के प्राथमिक निर्गम के लिए बोलियाँ अथवा आवेदन करने में सुविधा होती है एनडीएस से लोक ऋण कार्यालय, भारतीय रिज़र्व बैंक, मुंबई की प्रतिभूति समायोजन प्रणाली के समक्ष आकर द्वितीयक बाजार में आयोजित सरकारी प्रतिभूतियों (दोनों सीधे और रिपो) में लेन-देन के समायोजन को सुविधाजनक बनाता है एनडीएस की सदस्यता केवल उन सदस्यों तक सीमित है जिनके एसजीएल तथा/अथवा चालू खाते भारतीय रिज़र्व बैंक, मुंबई में हैं +8.4. अगस्त 2005 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने एनडीएस मॉडîाूल में "ऑर्डर मैचिंग" आधारित नामरहित क्रीन लागू की जिसका नाम एनडीएस-ओएम है यह एक आदेश से चलने वाली इलैक्ट्रॉनिक प्रणाली है जहाँ सहभागी बिना नाम बताए सिस्टम पर आदेश दे सकते हैं अथवा अन्य सहभागियों के आदेश स्वीकार कर सकते हैं एनडीएस-ओएम का परिचालन भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से भारतीय समाशोधन निगम लिमि. (सीसीआइएल) द्वारा किया जाता है (कृपया सीसीआइएल के बारे में प्रश्न सं.19 का उत्तर देखें) वर्तमान में एनडीएस-ओएम प्रणाली तक केवल चयनित वित्तीय संस्थाओं की पहुँच है, यथा वाणिज्य बैंक, प्राथमिक व्यापारी, बीमा कंपनियाँ, पारस्परिक निधियाँ इत्यादि अन्य सहभागी अपने अभिरक्षक, अर्थात जिसके पास उनका गिल्ट खाता है, के माध्यम से इस प्रणाली तक पहुँच सकते हैं अभिरक्षक अपने ग्राहकों, जैसे शहरी सहकारी बैंकों की ओर से आदेश दे सकते हैं एनडीएस-ओएम का लाभ मूल्य पारदर्शिता के साथ-साथ बेहतर मूल्य मिलना है +8.5. गिल्ट खाता धारकों को अपने अभिरक्षक संस्थान के माध्यम से एनडीएस तक अप्रत्यक्ष पहुँच प्रदान की गई है कोई सदस्य (जिसकी सीधी पहुँच है) एनडीएस पर सरकारी प्रतिभूतियों में गिल्ट खाताधारक के लेन-देन रिपोर्ट कर सकता है इसी प्रकार, गिल्ट खाताधारकों को एनडीएस-ओएम तक अप्रत्यक्ष रूप से पहुँच उनके अभिरक्षकों के माध्यम से दी गई है तथापि, एक ही अभिरक्षक के दो गिल्ट खाताधारकों को आपस में रिपो लेन-देन की अनुमति नहीं हैं +(iii) स्टॉक एक्सचेंज +8.6. सरकारी प्रतिभूतियों में कारोबार की सुविधा स्टॉक एक्सचेंजों (एनएसई और बीएसई) में भी उपलब्ध है जो खुदरा निवेशकों की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं +सरकारी प्रतिभूति बाजार के प्रमुख सहभागी वाणिज्य बैंक और प्राथमिक व्यापारियों के साथ-साथ संस्थागत निवेशक यथा बीमा कंपनियाँ हैं सरकारी प्रतिभूति बाजार में प्राथमिक व्यापारियों की भूमिका बाजार को संतुलित करने की है अन्य सहभागियों में सहकारी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, पारस्परिक निधियाँ, भविष्य और पेंशन निधियाँ शामिल हैं विदेशी संस्थागत निवेशकों को समय-समय पर निर्धारित मात्रात्मक सीमाओं में सरकारी प्रतिभूति बाजार में भाग लेने की अनुमति है कंपनियाँ भी अपने समग्र संविभाग जोखिम के प्रबंधन के लिए सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद/बिक्री करती हैं +प्रतिभूतियों का लेन-देन करते समय शहरी सहकारी बैंकों को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए शहरी सहकारी बैंकों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों में लेन-देन पर दिशनिर्देशों को 1 जुलाई 2009 के मास्टर परिपत्र यूबीडी.बीपीडी(पीसीबी).एमसी.सं.12/16.20.000/2009-10 में कूटबद्ध किया गया है जिसे समय-समय पर अद्यतन किया जाता है यह परिपत्र भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट में "अधिसूचनाएँ" के अंतर्गत मास्टर परिपत्र खण्ड में (प्ूूज्://ींi.दीु.iह/ेम्ीiज्ूे/ँएण्iीम्ल्त्aीIहxDiेज्त्aब्.aेज्z?I्=3686) में देखा जा सकता है शहरी सहकारी बैंकों द्वारा ध्यान में रखे जाने वाले दिशानिर्देशों में उनके निदेशक मंडल द्वारा विधिवत अनुमोदित एक निवेश नीति तैयार करने से संबंधित है जिसमें नीति के उद्देश्य, प्राधिकरण और सौदों के लिए प्रक्रिया, ब्रोकरों के माध्यम से लेन-देन, ब्रोकरों का पैनल तैयार करना तथा वार्षिक आधार पर उसकी समीक्षा तथा प्रत्येक ब्रोकर के माध्यम से लेन-देन के लिए विवेकपूर्ण सीमा निर्धारण इत्यादि को परिभाषित किया गया हो +करने योग्य अथवा न करने योग्य महत्वूपर्ण बातें नीचे बाक्स 1 में प्रस्तुत हैं +बॉक्स 1 +सरकारी प्रतिभूतियों में कारोबार के लिए करने योग्य तथा न करने योग्य बातें करने योग्य बातें +न करने योग्य बातें +11.1. कारोबारी डेस्क द्वारा किए गए प्रत्येक लेन-देन के लिए एक "डील स्लिप" का सृजन किया जाना चाहिए जिसमें डील के स्वरूप, प्रतिपक्ष का नाम, क्या ये सीधे डील की गई अथवा ब्रोकर द्वारा (ब्रोकर द्वारा होने पर ब्रोकर का नाम), प्रतिभूति का ब्योरा, राशि, मूल्य, संविदा की तारीख और समय तथा समायोजन की तारीख दी जाए डील स्लिपों को क्रम सं. दी जाए तथा यह सुनिश्चित करने के लिए सत्यापन किया जाए कि प्रत्येक डील स्लिप की गणना की गई है एक बार डील हो जाने पर डील स्लिप तुरंत ही बैक आफिस को (यह प्रंट ऑफिस से अलग होना चाहिए) रिकार्ड और प्रक्रिया के लिए भेज देनी चाहिए प्रत्येक डील के लिए प्रति पक्ष को पुष्टि करनी चाहिए प्रति पक्ष द्वारा अपेक्षित लिखित पुष्टि की रसीद की, जिसमें संविदा का आवश्यक ब्योरा दिया हो, बैक ऑफिस द्वारा निगरानी की जाए एनडीएस-ओएम पर मैच की गई डील की प्रति पक्ष पुष्टि की आवश्यकता नहीं है क्योंकि एनडीएस-ओएम बेनाम स्वचलित ऑर्डर मैचिंग प्रक्रिया है तथापि, जिन कारोबारों को ओटीसी बाज़ार में अंतिम रूप दिया जाता है और एनडीएस पर रिपोर्ट किया जाता है, सिस्टम अर्थात एनडीएस में प्रतिपक्षों द्वारा पुष्टि भेजी जानी होती है कृपया प्रश्न सं.15 भी देखें +11.2. यदि कोई डील ब्रोकर के माध्यम से होती है, ब्रोकर द्वारा काउंटर पार्टी का स्थानापन्न नहीं होना चाहिए इसी प्रकार, किसी भी स्थिति में किसी डील में बेची/खरीदी गई प्रतिभूति को किसी अन्य प्रतिभूति से बदलना नहीं चाहिए किसी व्यक्ति द्वारा अपराध रोकने के लिए एक "मेकर-चैकर" ढाँचा लागू किया जाना चाहिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रणाली में मेकर (जो डेटा निविष्टियाँ करता है) और चैकर (जो सत्यापित करके आँकड़े प्राधिकृत करता है) का काम एक ही व्यक्ति न करे +11.3 बैक ऑफिस द्वारा पारित वाउचरों के आधार पर (जो ब्रोकर/प्रतिपक्ष से प्राप्त वास्तविक संविदा नोट के सत्यापन और प्रतिपक्ष द्वारा डील की पुष्टि के बाद करना चाहिए) लेखा बहियाँ स्वतंत्र रूप से बनानी चाहिए +प्रतिभूति की खरीद में निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए :- +(i) किस प्रतिभूति में निवेश किया जाए - यह परिपक्वता और कूपन पर निर्भर करता है परिपक्वता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह निर्धारित करता है कि कोई शहरी सहकारी बैंक जैसे निवेशक को कितना जोखिम है - परिपक्वता उच्चतर होने पर ब्याज दर जोखिम अथवा बाजार जोखिम अधिक होगा यदि निवेश सांविधिक अपेक्षा को पूरा करने के लिए है तो अनावश्यक बाजार जोखिम न लेने तथा कम अवधि वाली प्रतिभूतियाँ खरीदने का परामर्श दिया जाता है न्यूनतर परिपक्वता अवधि में (5-10 वर्ष) ऐसी प्रतिभूतियाँ खरीदनी सुरक्षित होंगी जो तरल हैं अर्थात जिनका बाजार में अपेक्षाकृत बड़ी राशि में लेन-देन होता है ऐसी प्रतिभूतियों की जानकारी सीसीआइएल की वेबसाइट (प्ूूज्://ैैै.म्म्iत्iह्ia.म्दस्/ध्श्श्ेंण्उ.aेज्x) से प्राप्त की जा सकती है, जो एनडीएस-ओएम पर तुरंत द्वितीयक बाजार के व्यापार आँकड़े प्रदान करता है चूंकि तरल प्रतिभूतियों में मूल्यन अधिक पारदर्शी है, इन प्रतिभूतियों का मूल्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है जिससे इन मामलों में मूल्य के बारे में गलत जानकारी के अवसर कम हो जाते हैं प्रतिभूति की कूपन दर भी निवेशक के लिए उसी प्रकार महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रतिभूति से कुल वापसी को प्रभावित करती है यह निर्णय लेने के लिए कि कौन सी प्रतिभूति खरीदी जाए, निवेशक को प्रतिभूति की परिपक्वता पर आय (वाइटीएम) भी देखना चाहिए (वाइटीएम पर विस्तृत चर्चा के लिए पैरा 24.4 के अंतर्गत बॉक्स III देखें) अतः एक बार परिपक्वता और आय का निर्णय होने पर शहरी सहकारी बैंक एनडीएस-ओएम पर व्यापारित प्रतिभूति की मूल्य/आय संबंधी जानकारी देखने के बाद अथवा बैंक अथवा प्राथमिक व्यापारी अथवा ब्रोकर से मोल भाव करके प्रतिभूति का चयन करें +(ii) कहाँ से और किससे खरीदें - पारदर्शी मूल्यन के अनुसार एनडीएस-ओएम सबसे अधिक सुरक्षित है क्यों कि यह गतिशील और बेनामी मंच है जहाँ कारोबार का प्रसार होता है तथा व्यापार के प्रति-पक्ष सामने नहीं आते यदि ये व्यापार टेलीफोन बाजार पर आयोजित किए जाते हैं तो किसी बैंक अथवा पीडी से सीधे व्यापार करना सुरक्षित है यदि ब्रोकर का उपयोग करते हैं तो यह सुनिश्चित करने के लिए सावधानी बरतनी पड़ेगी कि ब्रोकर एनएसई, बीएसई अथवा भारत की ओटीसी एक्सचेंज में पंजीकृत है सामान्यतया सक्रिय ऋण बाजार ब्रोकर उन सौदों के इच्छुक नहीं होंगे जो बाजार के हिस्से से कम होंगे (सामान्यतया 5 करोड़) अतः किसी बैंक, पीडी अथवा एनडीएस-ओएम पर सौदा करना बेहतर होगा जिसमें विषम मात्रा के लिए भी क्रीन उपलब्ध है जहाँ भी ब्रोकर का उपयोग किया जाता है, वहाँ ब्रोकर के माध्यम से निपटान नहीं किया जाना चाहिए किसी बैंक, पीडी अथवा वित्तीय संस्था को छोड़कर किसी अन्य पार्टी से कारोबार नहीं किया जाना चाहिए ताकि विपरीत मूल्य के जोखिम से बचा जा सके +(iii) सही मूल्यन कैसे सुनिश्चित किया जाए - चूंकि शहरी सहकारी बैंक जैसे छोटे निवेशकों की अपेक्षाएँ कम होती हैं, उन्हें वह मूल्य मिल सकता है जो मानक बाजार माँग से खराब हो मूल्य की सुनिश्चितता देखते हुए खरीदने के लिए केवल तरल प्रतिभूतियों का चयन किया जाए कम अपेक्षा वाले निवेशकों के लिए सुरक्षित विकल्प गैर स्पर्धी मार्ग के माध्यम से भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा आयोजित प्राथमिक नीलामी में खरीदना होगा चूंकि बॉण्ड नीलामी प्रत्येक माह में दो बार होती है, खरीद को नीलामी के साथ जोड़ा जा सकता है कृपया सरकारी प्रतिभूतियों के मूल्य सुनिश्चित करने पर ब्योरे के लिए प्रश्न सं.14 देखें +सरकारी प्रतिभूति का मूल्य, अन्य वित्तीय लिखतों के समान, द्वितीयक बाजार में परिवर्तित होता रहता है यह मूल्य प्रतिभूतियों की मांग और आपूर्ति पर निर्भर करता है विशेष रूप से सरकारी प्रतिभूतियों का मूल्य अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों के स्तर और परिवर्तनों से प्रभावित होता है यथा मुद्रास्फीति अनुमानित दर, बाजार में चलनिधि की स्थिति इत्यादि अन्य बाजारों जैसे, मुद्रा, विदेशी मुद्रा, ऋण और पूंजी बाजारों की गतिविधियों से भी सरकारी प्रतिभूति का मूल्य प्रभावित होता है साथ ही, अन्तर्राष्ट्रीय बॉण्ड बाजारों, विशेष रूप से अमरीकी खजाने से भारत में सरकारी प्रतिभूतियों के मूल्य प्रभावित होते हैं भारतीय रिज़र्व बैंक की नीति संबंधी कार्रवाई (यथा रिपो दर, नकदी प्रारक्षित अनुपात, खुले बाजार के परिचालन इत्यादि जैसे नीतिगत ब्याज दरों में परिवर्तन से संबंधित धोषणाओं से) से भी सरकारी प्रतिभूतियों का मूल्य प्रभावित होता है +14.1. किसी प्रतिभूति पर प्रतिफल दो धटकों का मिश्रण है (i) कूपन आय - अर्थात प्रतिभूति पर अर्जित ब्याज तथा (ii) मूल्य परिवर्तित होने प्रतिभूति पर लाभ/हानि तथा पुनःनिवेश लाभ अथवा हानि +14.2. सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदने और बेचने के इच्छुक किसी निवेशक के लिए मूल्य सूचना महत्वपूर्ण है प्रतिभूतियों के व्यापारित मूल्य संबंधी सूचना भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट प्ूूज्://ैैै.ींi.दीु.iह के तहत प्दस → इiहaहम्iaत् श्aीवू ेंaूम्प् → उदvाीहसहू एाम्ल्ीiूiो श्aीवू → NDए में उपलब्ध है इस तालिका में बाजार में किए गए अद्यतन व्यापार तथा मूल्य निहित है साथ ही, व्यापार संबंधी सूचना सीसीआइएल की वेबसाइट प्ूूज्://ैैै.म्म्iत्iह्ia.म्दस्/ध्श्प्दस.aेज्x पर देखी जा सकती है इस पेज को भारतीय रिज़र्व बैंक की साइट में उपलब्ध लिंक के माध्यम से भी देखा जा सकता है इस पेज में, प्रतिभूतियों की सूची और व्यापार का सारांश दर्शाया गया है उस दिन की कुल व्यापारित राशि (टीटीए) प्रत्येक प्रतिभूति के सामने दर्शायी गई है अधिकतम टीटीए वाली प्रतिभूतियों को तरल प्रतिभूतियाँ कहते हैं इन प्रतिभूतियों का मूल्यन सक्षम है तथा इस प्रकार शहरी सहकारी बैंक अपने लेन-देनों में इन प्रतिभूतियों का चयन कर सकते हैं चूंकि मूल्य क्रीन पर उपलब्ध हैं, वे अपने अभिरक्षक के माध्यम से चालू मूल्यों पर इन प्रतिभूतियों में निवेश कर सकते हैं इस प्रकार सहभागी व्यापारित मूल्यों पर तत्काल जानकारी प्राप्त कर सकते हैं तथा सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदते/बेचते समय सही निर्णय ले सकते हैं उक्त वेबसाइटों के क्रीनशॉट्स नीचे दिए गए है :- +एनडीएस बाजार +एनडीएस-ओएम बाजार +स्थायी आय, मुद्रा बाजार और डेरिवेटिव संध (फिमडा) की वेबसाइट (ैैै.िiस्स््a.दीु) भी मूल्य सूचना, विशेष रूप से उन प्रतिभूतियों पर, जिन पर लगातार व्यापार नहीं किया जाता का ñाोत है +15.1. बाजार सहभागियों के बीच ओटीसी/टेलीफोन बाजार में हुए लेन-देनों से संबंधित सूचना टेलीफोन पर सौदा होने के 15 बाद एनडीएस मंच को देनी होती है यह अपेक्षित है कि सभी ओटीसी व्यापार समायोजन के लिए एनडीएस के द्वितीयक बाजार मॉडîाूल में आवश्यक रूप से सूचित किए जाने चाहिए एनडीएस पर रिपो\टग चार चरणों में की जाने वाली प्रक्रिया है जिसमें प्रतिभूति के विक्रेता द्वारा पुष्टि किए जाने पर क्रेता द्वारा रिपो\टग करनी होती है इसके पश्चात विक्रेता के बैक ऑफिस द्वारा प्रणाली पर पुष्टि जारी करने के बाद अंतिम चरण में सौदे की पुष्टि क्रेता के बैक ऑफिस द्वारा किए जानेपर पूरी होगी प्रणाली का ढाँचा "मेकर-चैकर" मॉडल से बना है जिससे व्यक्ति की गलतियों के साथ-साथ अपराधों को रोका जा सके +15.2. अभिरक्षकों के पास गिल्ट खाते रखने वाली संस्थाओं की ओर से रिपो\टग संबंधित अभिरक्षक द्वारा उसी प्रकार की जाती है जैसे कि वे अपने व्यापारों अर्थात मालिकाना व्यापारों के लिए करते हैं इन व्यापारों का प्रतिभूति चरण अभिरक्षक के सीएसजीएल खाते में समायोजित किया जाता है एक बार रिपो\टग पूरी होने पर एनडीएस प्रणाली व्यापार को स्वीकार कर लेती है इस प्रकार सभी सफल व्यापारों संबंधी सूचना समाशोधन गृह अर्थात सीसीआइएल को भेजी जाती है +15.3. एनडीएस-ओएम के संबंध में सहभागी प्रणाली पर आदेश (मूल्य और मात्रा) देते हैं सहभागी अपना आदेश संशोधित/निरस्त कर सकते हैं यह आदेश खरीद के लिए बोली अथवा बिक्री के लिए ऑफर हो सकता है इसके बाद प्रणाली आदेशों को मूल्य और समय की प्राथमिकता से मैच करेगी अर्थात यह बोली और उसी मूल्य के ऑफर को समय की प्राथमिकता से मैच करेगी एनडीएस-ओएम प्रणाली में केद्र सरकार, राज्य सरकार और खजाना बिलों के कारोबार के लिए अलग क्रीन है साथ ही, छोटे सहभागियों को व्यापार में सुविधा देने के लिए 5 करोड़ रू. (अर्थात मानक बाजार लॉट) से कम राशि के व्यापार की सुविधा भी है एनडीएस-ओएम मंच एक ऐसा मंच है जिसमें सहभागियों को कारोबार के प्रतिपक्ष की जानकारी नहीं होती है एक बार आदेश मैच होने पर डील टिकट स्वतः ही सृजित हो जाती है और कारोबार का ब्योरा सीसीआइएल को चला जाता है प्रणाली द्वारा नाम न बताए जाने के कारण मूल्य पर सहभागी के आकार और साख का प्रभाव नहीं पड़ता है +प्राथमिक बाजार +16.1. प्राथमिक नीलामी में एक बार आबंटन प्रक्रिया पूरी होने पर सफल सहभागियों को सरकार को अदा करने के लिए निमित्त राशि सूचित की जाती है जो उन्हें समायोजन के दिन देनी होती है दिनांकित प्रतिभूति नीलामी के लिए समायोजन चक्र टी+1 है जबकि खजाना बिलों के लिए टी+2 है समायोजन के दिन सहभागियों के निधि खाते उनकी निमित्त राशि से नामे डाले जाते हैं तथा उन्हें आबंटित की गई प्रतिभूतियों की राशि उनके प्रतिभूति खाते (एसजीएल खाते) में जमा कर दी जाती है +द्वितीयक बाजार +16.2. सरकारी प्रतिभूतियों से संबंधित लेन-देन भारतीय रिज़र्व बैंक के पास अनुरक्षित सदस्य के प्रतिभूति/चालू खातों के माध्यम से प्रतिभूतियों की सुपुर्दगी और भुगतान निवल आधार पर किया जाता है भारतीय समाशोधन निगम लिमि. (सीसीआइएल) निपटान की तारीख को दायित्व नवीयन की प्रक्रिया से प्रत्येक कारोबार के लिए केद्रीय प्रति पक्ष बन कर कारोबार का समायोजन करता है अर्थात वह क्रेता के लिए विक्रेता और विक्रेता के लिए क्रेता बन जाता है +16.3 सरकारी प्रतिभूतियों में प्रत्यक्ष रूप से द्वितीयक बाजार लेन-देन टी+1 आधार पर समायोजित किए जाते हैं तथापि सरकारी प्रतिभूतियों में रिपो लेन-देन के संबंध में बाजार सहभागियों के पास पहला चरण टी+0 अथवा टी+1 पर, उनकी आवश्यकता के अनुसार, समायोजित करने का विकल्प रहेगा +"कामबंदी अवधि" का तात्पर्य उस अवधि से है जब प्रतिभूतियों की सुपुर्दगी नहीं होती इस अवधि के दौरान उन प्रतिभूतियों के समायोजन/सुपुर्दगी की अनुमति नहीं होगी जो "कामबंदी" में है कामबंदी अवधि का मुख्य प्रयोजन प्रतिभूतियों की सर्विसिंग करना है जैसे कूपन के भुगतान और शोधन आय को अंतिम रूप देना तथा इस प्रक्रिया के दौरान प्रतिभूतियों के स्वामित्व में किसी परिवर्तन को रोकना है वर्तमान में एसजीएल में धारित प्रतिभूतियों के लिए कामबंदी अवधि एक दिन है उदाहरणार्थ प्रतिभूति 6.49% जीएस 2015 के लिए कूपन भुगतान की तारीख प्रत्येक वर्ष 8 जून और 8 दिसंबर है इस प्रतिभूति के संबंध में कामबंदी अवधि 7 जून और 7 दिसंबर होगी तथा इस प्रतिभूति के संबंध में समायोजन के लिए कारोबार की इन दो तारीखों को अनुमति नहीं होगी +प्रतिभूतियों के समायोजन का स्वरूप सुपुर्दगी बनाम भुगतान (Dvझ) है, जहाँ प्रतिभूतियों और निधि का अंतरण साथ-साथ होता है इससे यह सुनिश्चित होता है कि जब तक भुगतान नहीं होता, प्रतिभूतियों की सुपुर्दगी नहीं होती तथा यह इसके विपरित भी लागू होता है Dvझ समायोजन से लेन-देन में समायोजन जोखिम समाप्त हो जाता है तीन प्रकार के Dvझ समायोजन हैं, यथा Dvझ I, II और III जो नीचे स्पष्ट किए गए हैं :- +(i) Dvझ I - प्रतिभूतियों और लेन-देन के चरण का समायोजन सकल आधार पर होता है, अर्थात समायोजन एक-एक लेन-देन पर, सहभागियों के भुगतान योग्य और प्राप्य राशि की नेटिंग किए बिना, होता है +(ii) Dvझ II - इस तरीके में प्रतिभूतियों का समायोजन सकल आधार पर होता है जबकि निधि का समायोजन नेट आधार पर होता है अर्थात किसी पार्टी के सभी देय और प्राप्य लेन-देनों की नेटिंग करके भुगतान अथवा प्राप्त करने की स्थिति पर पहुँच कर समायोजन किया जाता है +(iii) Dvझ III - इस तरीके में प्रतिभूतियों और निधि, दोनों चरणों को नेट आधार पर समायोजित किया जाता है तथा किसी सहभागी द्वारा किए गए सभी लेन-देनों की अंतिम निवल स्थिति पर ही समायोजन किया जाता है +सकल प्रणाली में तरलता अपेक्षा निवल प्रणाली से अधिक होती है क्योंकि निवल प्रणाली में देय और प्राप्य राशि एक दूसरे के साथ समायोजित हो जाती है +परिशिष्ट - 2. +प्राथमिक व्यापारियों की सूची +बैंक पीडी फोन नं. +1. सिटि बैंक एनए., मुंबई शाखा (022) 40015453/40015378 +2. स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक (022) 622303/22652875/22683695 +3. बैंक ऑफ अमरीका एन.ए. (022) 66323040/3140/3192 +4. जे.पी. मॉरगन चेज़ बैंक एन.ए. (022) 6639 3084/66392944 +5. एचएसबीसी बैंक (022) 22623329/22681031/34/33 +6. बैंक ऑफ बड़ौदा (022) 66363682/83 +7. केनरा बैंक (022) 22800101-105/22661348 +8. कोटक महिद्रा बैंक लिमि. (022) 67836107 & 66596235/ 6454 +9. कार्पोरेशन बैंक (022) 22832429/22022796/ 22871054 +10. एचडीएफसी बैंक (022) 66521372/9892975232 +11. एबीएन अमरो बैंक एन.वी. (022) 66386132/128 +(ख) स्वतंत्र पीडी +1. आडीबीआइ गिल्ट्स (022) 66177900/911 +2. आसीआसीआइ सिक्यू. पीडी लिमि. (022) 66377421/22882460/70 +3. पीएनबी गिल्ट्स लिमि. (022) 22693315/17 +4. एसबीआइ डीएफएचआइ लिमि. (022) 22610490/66364696 +5. एसटीसीआइपीडी लिमि. (022) 66202261/2200 +6. डîाूश सिक्यूरिटीज़ (इं.) प्रा. लिमि. (022) 67063068/3066/67063115 +7. मॉरगन स्टेनले प्राइमरी डीलर प्रा. लिमि. (022) 22096600 +8. नोमुरा फिक्स्ड इंकम सिक्यूरिटीज़ प्रा. लिमि. (022) 67855111/ 67855118 +भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट +प्ूूज्://ैैै.ींi.दीु.iह/म्दस्स्दहस्aह/हिंुत्iेप्/एम्ीiज्ूे/झीiस्aीब्अaतीे.aेज्x पर प्राथमिक व्यापारियें की अद्यतनसूची उपलब्ध है +परिशिष्ट - 3. +5 +परिशिष्ट - 4. +बॉण्ड संबंधी गणना के लिए महत्वपूर्ण एक्सेल कार्य +कार्य +रचनाक्रम +1. वर्तमान मूल्य +पीवी (रेट एनपीईआर, पीएमटी, एफवी, टाइप) +यह फंक्शन बट्टे की दी हुई दर से भविष्य में किए जाने वाले भुगतानों की श्रृंखला के वर्तमान मूल्य जानने के लिए प्रयोग में लाया जाता है +रेट - प्रत्येक अवधि की ब्याज दर है +एनपीईआर - एक वर्ष में भुगतान अवधियों की कुल संख्या है +पीएमटी - प्रत्येक अवधि में किया गया भुगतान है तथा वार्षिकी की अवधि में परिवर्तित नहीं हो सकती +एफवी - भविष्य में होने वाला मूल्य है अथवा अंतिम भुगतान के बाद आप नकदी शेष लेना चाहें यदि एफवी को हटा दिया जाए तो उसे 0 माना जाएगा (उदाहरणार्थ किसी ऋण का भविष्य में होने वाला मूल्य 0 है) +टाइप - 0 अथवा 1 संख्या है और ये निर्दिष्ट करते हैं कि भुगतान कब देय है +टाइप का अर्थ +यदि भुगतान देय है +0 अथवा छोड़ दिया +अवधि के अंत में +1 +अवधि के आरंभ में +उदाहरण - तीन वर्ष के लिए प्रत्येक वर्ष के बाद 100 रू. के वर्तमान मूल्य को 9% की ब्याज दर से, इसका मूल्य निम्नानुसार होगा +रेट - 9% अथवा 0.09; एनपीईआर-3 (3 वर्ष); पीएमटी-100; एफवी-0 क्योंकि तीन वर्ष के बाद शेष शून्य होगा ; टाइप-0 (अवधिके अंत में) उत्तर - 253.13 होगा +2. भविष्य में होने वाला मूल्य +एफवी (रेट, एनपीईआर, पीएमटी, पीवी, टाइप) +इस फंक्शन का प्रयोग दी गई ब्याज दर पर किए गए निवेशों की श्रृंखला के भविष्य में मूल्य की गणना के लिए किया जाता है +दर - प्रत्येक अवधिक के लिए ब्याज दर है +एनपीईआर - एक वर्ष में भुगतान अवधियों की कुल संख्या है +पीएमटी - प्रत्येक अवधि में किया गया भुगतान है तथा वार्षिकी की अवधि में परिवर्तित नहीं हो सकती विष्टि रूप से पीएमटी में मूलधन और ब्याज होता है पर अन्य कोई शुल्क या कर नहीं होते यदि पीएमटी को हटा दिया जाए तो पीवी तर्क को शामिल किया जाना चाहिए +पीवी - वर्तमान मूल्य है या एकमुश्त राशि है अर्थात अभी भविष्य में किए जाने वाले भुगतानों की श्रृंखला यदि पीवी को हटा दिया जाए तो उसे 0 माना जाएगा(जीरो) और पीएमटी तर्क को शामिल किया जाना चाहिए +टाइप - 0 अथवा 1 संख्या है और ये निर्दिष्ट करते हैं कि भुगतान कब देय है यदि टाइप हटा दिया जाए तो यह 0 माना जाए +उदाहरण - प्रत्येक वर्ष अदा किए गए 100 रू. के भविष्य मूल्य की तीन वर्ष के लिए 9% की ब्याज दर गणना करने पर मूल्य निम्नानुसार होगा : +दर - 9% अथव 0.09, एनपीईआर-3 (3 वर्ष); पीएमटी-100; पीवी-0; क्योंकि शुरू में कोई एकमुश्त भुगतान नही है; टाइप-1 (अवधि के शुरू होने पर) उत्तर 357.31 होगा +3. कूपन दिवस +ण्ध्UझDAभ्ँए (समायोजन, परिपक्वता, अवधिकता, आधार) +यह फंक्शन कूपन अवधि के शुरू से अंत तक दिनों की संख्या की गणना के लिए प्रयोग किया जाता है, जिसमें समायोजन तारीख होती है +समायोजन प्रतिभूति की समायोजन तारीख होती है प्रतिभूति समायोजन तारीख, जारी की तारीख के बाद की तारीख होती है जब प्रतिभूति क्रेता को बेची जाती है +परिपक्वता प्रतिभूति की परिपक्वता की तारीख होती है परिपक्वता तारीख वह होती है जिस दिन प्रतिभूति की अवधि समाप्त होती है +आवधिकता का अर्थ प्रति वर्ष कूपन भुगतानों की संख्या है वार्षिक भुगतान के लिए आवधिकता=1; अर्धवार्षिकी के लिए, आवधिकता=2; तिमाही के लिए आवधिकता=4 +आधार प्रयोग के लिए गणना के आधार पर दिनों की गिनती होगा दिवस की गणना की परंपरा नीचे दर्शाए अनुसार उपलब्ध कराई जाए +आधार +दिनों की गिनती का आधार +आधार +दिनों की गिनती का आधार +0 अथवा हटाया गया +यूएस (एनएएसडी) 30/360 +3 +वास्तविक 365 +1 +वास्तविक/वास्तविक +4 +यूरोपियन 30/360 +2 +वास्तविक/360 +उदाहरण - 2 फरवरी 2019 को परिपक्व होने वाली प्रतिभूति जिसकी समायोजन तारीख 27 मई 2009; फार्मूला मूल्य निम्नानुसार होगा : +परिपपक्वता 2/2/2019; समायोजन-25/5/2009/आवधिकता-2 (छमाही कूपन) और आधार 4 (दिन गिनने की परंपरा 30/360) +परिणाम 180 होगा (कूपन अवधि में कूपन दिनें की सं.) +4. ईयरप्रैक +ईयरप्रैक (आरंभ-तारीख, समाप्ति-तारीख, आधार) (अवशेष परिपक्वता प्राप्त करने के लिए) +इस फंक्शन का प्रयोग प्रतिभूति की अवशिष्ट परिपक्वता वर्षो में जाने के लिए किया जाता है +आरंभ - तारीख वह तारीख हे जो आरंभ की तारीख बताती है +समाप्ति - तारी वह तारीख है जो अंत की तारीख बताती है +आधार प्रयोग के आधार पर दिनों की संख्या का स्वरूप है +उदाहरण - 6 फरवरी 2019 को परिपक्व होने वाली प्रतिभूति के लिए 27 मई 2009 को वर्षो में अवशिष्ट परिपक्वता की गणना निम्नानुसार होगी : +आरंभ की तारीख - 27 मई 2009, अंत की तारीख 2/2/2019, आधार-4 +परिणाम 9.68 वर्ष होगा +5. मूल्य +मूल्य (समायोजन, परिपक्वता, दर, प्रतिप्ल, शोधन, आवधिकता, आधार) +इस फंक्शन का प्रयोग आवधिक ब्याज देने वाली प्रतिभूति का मूल्य जानने के लिए किया जाता है +समायोजन प्रतिभूति की समायोजन तारीख है प्रतिभूति समायोजन की तारीख वह तारीख होती है जिस तारीख को निधि और प्रतिभूति का आदान-प्रदान होता है +परिपक्वता प्रतिभूति की परिपक्वता की तारीख है परिपक्वता तारीख वह तारीख है जब प्रतिभूति की अवधि समाप्त होती है +दर प्रतिभूति की वार्षिक कूपन दर है +प्रतिपÌल प्रतिभूति की वार्षिक प्रतिप्ल है +शोधन प्रत्येक 100 रू. के अंकित मूल्य पर प्रतिभूति का शोधन मूल्य है +आवधिकता का अर्थ प्रति वर्ष कूपन भुगतानों की संख्या है वार्षिक भुगतान के लिए आवधिकता=1; अर्धवार्षिकी के लिए, आवधिकता=2; तिमाही के लिए आवधिकता=4 +आधार प्रयोग के आधार पर दिन गिनने का स्वरूप है +उदाहरण - 6.05% 2019, 2 फरवरी 2019 को परिपक्व होने वाली प्रतिभूति है 1 जून 2009 को द्वितीयक बाजार में इसकी प्रतिप्ल 6.68% है समायोजन तारीख 2 जून 2009 है मूल्य फार्मूला में इसका मूल्य निम्नानुसार होगा +समायोजन - 2/6/2009; परिपक्वता-2/2/2009; दर 6.05%; प्रतिप्ल-6.68%; शोधन-100 (अंकित मूल्य); आवधिकता - 2 (छमाही कूपन); आधार-4 +परिणाम 95.55 प्रतिशत होगा +6. प्रतिप्ल +प्रतिप्ल (समायोजन, परिपक्वता, दर, पीआर, शोधन, आवधिकता, आधार) +इस फंक्शन का प्रयोग प्रतिभूति का मूल्य दिए जाने पर प्रतिभूति की परिपक्वता पर प्रतिप्ल निकालने के लिए किया जाता है +समायोजन - प्रतिभूति की समायोजन तारीख है प्रतिभूति समायोजन की तारीख वह तारीख होती है जिस तारीख को निधि और प्रतिभूति का अदान-प्रदान होता है +परिपक्वता - प्रतिभूति की परिपक्वता की तारीख है परिपक्वता तारीख वह तारीख है जब प्रतिभूति की अवधि समाप्त होती है +दर - प्रतिभूति की वार्षिक कूपन दर है +पीआर - प्रति 100 रू. के अंकित मूल्य का प्रतिभूति मूल्य +शोधन - प्रत्येक 100 रू. के अंकित मूल्य पर प्रतिभूति का शोधन मूल्य है +आवधिकता का अर्थ प्रति वर्ष कूपन भुगतानों की संख्या है वार्षिक भुगतान के लिए आवधिकता=1; अर्धवार्षिकी के लिए, आवधिकता=2; तिमाही के लिए आवधिकता=4 +आधार - प्रयोग के आधार पर दिन गिनने का स्वरूप है +ऊपर दिए गए उसी उदाहरण को लेते हुए तथा 95.55 रू. के मूल्य पर प्रतिप्ल का परिणाम 6.68% होगा +7. अवधि +अवधि (समायोजन, परिपक्वता, कूपन, प्रतिप्ल, आवधिकता, आधार) +इस फंक्शन का प्रयोग प्रतिभूति की अवधि वर्षो की संख्या में जानने के लिए किया जाता है +समायोजन प्रतिभूति की समायोजन तारीख है प्रतिभूति समायोजन की तारीख वह तारीख होती है जिस तारीख को निधि और प्रतिभूति का अदान-प्रदान होता है +परिपक्वता - प्रतिभूति की परिपक्वता की तारीख है परिपक्वता तारीख वह तारीख है जब प्रतिभूति की अवधि समाप्त होती है +कूपन - प्रतिभूति की वार्षिक कूपन दर है +प्रतिप्ल - प्रतिभूति की वार्षिक प्रतिप्ल है +आवधिकता का अर्थ प्रति वर्ष कूपन भुगतानों की संख्या है वार्षिक भुगतान के लिए आवधिकता=1; अर्धवार्षिकी के लिए, आवधिकता=2; तिमाही के लिए आवधिकता=4 +आधार प्रयोग के आधार पर दिन गिनने का स्वरूप है +उदाहरण - 6.05% 2019, 2 फरवरी 2019 को परिपक्व होने वाली प्रतिभूति है 1 जून 2009 को द्वितीयक बाजार में इसकी प्रतिप्ल 6.68% है समायोजन तारीख 2 जून 2009 है अवधि फार्मूला में मूल्य निम्नानुसार होगा समायोजन-2-6-2009; परिपक्वता-2-2-2019; दर-6.05%; प्रतिप्ल-6.68%; आवधिकता-2 (छमाही कूपन); आधार-4 +परिणाम 7.25 वर्ष होगा +8. संशोधित अवधि +संशोधित अवधि (समायोजन, परिपक्वता, कूपन, प्रतिप्ल, आवधिकता, आधार) +इस प्ंक्शन का प्रयोग प्रतिभूति की संशोधित अवधि जानने के लिए किया जाता है +समायोजन - प्रतिभूति की समायोजन तारीख है प्रतिभूति समायोजन की तारीख वह तारीख होती है जिस तारीख को निधि और प्रतिभूति का अदान-प्रदान होता है +परिपक्वता - प्रतिभूति की परिपक्वता की तारीख है परिपक्वता तारीख वह तारीख है जब प्रतिभूति की अवधि समाप्त होती है +कूपन - प्रतिभूति की वार्षिक कूपन दर है +प्रतिप्ल - प्रतिभूति की वार्षिक प्रतिप्ल है +आवधिकता का अर्थ प्रति वर्ष कूपन भुगतानों की संख्या है वार्षिक भुगतान के लिए आवधिकता=1; अर्धवार्षिकी के लिए, आवधिकता=2; तिमाही के लिए आवधिकता=4 +आधार - प्रयोग के आधार पर दिन गिनने का स्वरूप है +ऊपर दिए अनुसार वही उदाहरण लेते हुए एक्सेल फंक्शन में उक्त अवधि और मूल्य देते हुए फार्मूले का परिणाम 7.01 होगा +परिशिष्ट-5. +महत्वपूर्ण शब्दावली और सामान्यतया प्रयोग होने वाली बाजार शब्दावली +उपचित ब्याज +बॉण्ड पर उपचित ब्याज, ब्याज की वह राशि है जो पिछले कूपन भुगतान के बाद संचित हुई है ब्याज अर्जित किया गया है पर चूंकि कूपन का भुगतान केवल कूपन तारीखों को किया जाता है, अतः निवेशक को अभी धन का लाभ नहीं मिला है भारत में सरकारी प्रतिभूतियों की दिन गिनने की परंपरा 30/360 है +बोली मूल्य/प्रतिप्ल +प्रतिभूति के लिए संभाव्य क्रेता द्वारा लगाया जाने वाला मूल्य/प्रतिप्ल +विनिमय दर के पहले तीन अंक (बिग फिगर) +जब मूल्य 102.35 लगाया गया है, दशमलव से इतर भाग (102) को बिग फिगर कहते हैं +स्पर्धी बोली +नीलामी में बोलीकर्ता द्वारा लगाए गए मूल्य को स्पर्धी बोली कहा जाता है +कूपन +प्रतिभूति के अंकित मूल्य के आधार पर गणना किए गए अनुसार ऋण प्रतिभूति पर अदा की गई ब्याज की दर +कूपन अंतराल +ऋण प्रतिभूति की अवधि में लगातार नियमित अंतरालों पर किया गया कूपन भुगतान जो तिमाही, अध्र वार्षिक (वर्ष में दो बार) अथवा वार्षिक भुगतान हो सकता है +बट्टा +जब प्रतिभूति का मूल्य सम मूल्य से कम होता है, तो यह माना जाता है कि उसमें बट्टे पर कारोबार हो रहा है अंकित मूल्य और मूल्य के बीच का अंतर बट्टे का मूल्य कहलाता है उदाहरण के लिए यदि किसी प्रतिभूति पर 99 रू. में कारोबार हो रहा है तो बट्टा 1 रू. होगा +अवधि (मैकाले अवधि) +बॉण्ड की अवधि, बॉण्ड के आरंभिक निवेश की वसूली के लिए वर्षो की संख्या है इसकी गणना, नकदी प्रवाह प्राप्त करने के लिए वर्षो की भारित औसत संख्या, के रूप में की जाती है जिसमें नकदी प्रवाह के वर्तमान मूल्य को वर्षो से गुणा किया जाता है ऐसे मूल्य के जोड़ को, अवधि निकालने के लिए, प्रतिभूति के मूल्य से भाग किया जाता है प्रश्न सं.27 का बॉक्स IV देखें +अंकित मूल्य +प्रतिभूति की परिपक्वता की तारीख को किसी निवेशक को अदा किया जाने वाला अंकित मूल्य कहलाता है ऋण प्रतिभूतियाँ अलग-अलग अंकित मूल्य पर जारी की जाती है; तथापि भारत में, इन का अंकित मूल्य विशिष्ट रूप से 100 रू. होता है अंकित मूल्य को चुकौती राशि भी कहा जाता है इस राशि का शोधन मूल्य, मूल मूल्य (अथवा मूलधन), परिपक्वता मूल्य अथवा सम मूल्य भी कहा जाता है +अस्थायी दर बॉण्ड +वे बॉण्ड जिनकी कूपन दर पूर्व निर्धारित अंतरालों पर रिसेट की जाती है तथा पूर्व निर्धारित बाज़ार आधारित ब्याज दर है +गिल्ट/सरकारी प्रतिभूतियाँ +सरकारी प्रतिभूतियों को गिल्ट अथवा गिल्ट एज्ड प्रतिभूतियाँ कहा जाता है "सरकारी प्रतिभूति" का अर्थ है वह प्रतिभूति जो सरकार द्वारा लोक ऋण जुटाने अथवा सरकार के कार्यालयीन बजट में सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य किसी प्रयोजन हेतु तथा सरकारी प्रतिभूति अधिनियम 2006 में निर्दिष्ट रूप में से किसी एक रूप में सृजित और जारी की जा रही है +मार्केट लॉट +मार्केट लॉट का अर्थ उन व्यापारों के मानक मूल्य से है जो बाजार में किए जाते हैं सरकारी प्रतिभूति बाजार में मानक मार्केट लॉट 5 करोड़ रू. अंकित मूल्य के हैं +परिपक्वता तारीख +वह तारीख जब मूलधन (अंकित मूल्य) लोटाया जाता है ऋण प्रतिभूति का अंतिम कूपन और अंकित मूल्य निवेशक को परिपकवता की तारीख को लौटाया जाता है अवधि की सीमा अल्पावधि (1 वर्ष) से दीर्धावति (30 वर्ष) तक अलग-अलग होता है +गैर स्पर्धी बोली +गैर स्पर्धी बोली का अर्थ है कि बोलीकर्ता, मूल्य की बोली लगाए बिन, दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियों की बोली में भाग ले सकता है गैर स्पर्धी धटक का आबंटन उस भारित औसत दर पर होगा जो स्पर्धी बोली के आधार पर नीलामी में आएगा यह एक आबंटन सुविधा है जिसमें कुल प्रतिभूतियों का एक भाग सफल स्पर्धी बोली के भारित औसत मूल्य पर बोलीकर्ताओ को आबंटित किया जता है (कृपया प्रश्न सं.4 के अंतर्गत पैराग्राफ 4.3 भी देखें) +विषम मात्रा (ऑड लॉट) +5 करोड़ रू. के मानक बाजार लॉट आकार के इतर अन्य किसी मूल्य के लेन-देनों को विषम मात्रा (ऑड लॉट) कहा जाता है सामान्यतया मूल्य 10,000 रू. के न्यूनतम मूल्य सहित 5 करोड़ रू. से कम होता है विषम मात्रा के लेन-देन सामान्यतया खुदरा और छोटे सहभागियों द्वारा किया जाता है +सममूल्य पर +प्रतिभूति का अंकित मूल्य ही सममूल्य हे जो सरकारी प्रतिभूतियों के लिए 100 रू. है जब प्रतिभूति का मूल्य उसके अंकित मूल्य के बराबर होता है प्रतिभूति को सममूल्य पर कहा जाता है +अधिमूल्य (प्रीमियम) +जब प्रतिभूति का मूल्य सममूल्य से अधिक होता हे तो कहा जाता हे कि प्रतिभूति पर कारोबार अधिमूल्य पर है प्रीमियम का मूल्य, अंकित मूल्य ओर मूल्य के बीच का अंतर है उदाहरण के लिए यदि किसी प्रतिभूति का कारोबार 102 रू. पर हो रहा है तो प्रीमियम 2 रू. है +मूल्य +100 रू. के अंकित मूल्य के लिए उद्धृत किया गया मूल्य किसी वित्तीय लिखत का मूल्य भविष्य में होने वाले नकदी प्रवाह के वर्तमान मूल्य के बराबर है ऋण प्रतिभूति के लिए दिया गया मूल्य कई कारकों पर आधारित है नई जारी की गई ऋण प्रतिभूतियाँ सामान्य तौर पर उनके अंकित मूल्य अथवा उनके आस-पास के मूल्य पर बेची जाती हैं द्वितीयक बाजार में जहाँ निवेशकों के बीच पहले से जारी ऋण प्रतिभूतियाँ खरीदी और बेची जाती हैं, बाँण्ड के लिए दिए जाने वाले मूल्य में बाजार ब्याज दरें, अर्जित ब्याज, आपूर्ति और मांग, ऋण गुणवत्ता, परिपक्वता की तारीख, जारी करने का तरीका, बाजार धटनाएँ तथा लेन-देन का आकार प्रभावित करने वाली मदों पर निभ्रर होता है +प्राथमिक व्यापारी +सरकारी उधार की आवश्यकताओं को यथासंभव सस्ते और सक्षम रूप से पूरा करने के उद्देश्य से विशेषकृत वित्तीय फर्मो/बैंकों के एक समूह को सरकारी प्रतिभूति बाजार और जारीकर्ता के बीच विशेषीकृत मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए नियुक्त किया जाता है इन संस्थाओं को सामान्यतया प्राथमिक व्यापारी अथवा मार्केट मेकर कहा जाता है लगातार बोली लगाने तथा विपणन योग्य बाजार प्रतिभूतियों में मूल्य लगाने अथवा नीलामी में बोली लगाने जैसे कार्यो के बदले में इन फर्मो को प्राथमिक/द्वितीयक बाजार में कुछ लाभ मिलते हैं +तत्काल सकल निपटान प्रणाली (आरटीजीएस) +आरटीजीएस प्रणाली एक बैंक से दूसरे को "तत्काल" और "सकल" आधार पर मुद्रा अंतरण करने का निधि अंतरण तंत्र है बैंकिंग चैनल के माध्यम से यह सबसे तेज मुद्रा अंतरण प्रणाली है "तत्काल" निपटान का अर्थ बिना किसी प्रतीक्षा अवधि के भुगतान निपटान प्रक्रिया होने पर लेन-देन तत्काल कर दिए जाते हैं "सकल निपटान" का अर्थ है कि लेन-देन एक पर एक आधार पर किए जाते हैं, इन्हें दूसरे लेन-देनों से जोड़ा नहीं जाता है चूंकि मुद्रा अंतरण रिज़र्व बैंक की बहियों में किया जाता है, भुगतान को अंतिम और अविकल्पी मान लिया जाता है +रिपो रेट +रिपो लेन-देन पर अर्जित राशि रिपो रेट है जिसे वार्षिक ब्याज दर के रूप में बताया गया है +रिपो/रिवर्स रिपो +रेपो, निधियों की प्राप्ति के लिए प्रतिभूतियों को इस करार के साथ बेचने के लिए एक प्रकार का लिखत है, जिसमें उक्त प्रतिभूतियों को आपस में सहमत तारीख और मूल्य पर पुनर्खरीद करनी पड़ती है जिसमें उधार ली गई निधियों पर ब्याज शामिल है +रेपो (पुनः खरीद) लेनदेन का विपरीत लेनदेन `रिवज़õ रेपो' (प्रति पुनर्खरीद) कहलाता है जिसमें प्रतिभूतियों की खरीदारी करके उधार दिया जाता है, जिसके लिए तय मूल्य पर पारस्परिक रूप से निर्धारित भावी तारीख को उक्त प्रतिभूतियों की पुनःबेचने का करार किया जाता है +अवशिष्ट परिपक्वता +प्रतिभूति की परिपकवता अवधि तक शेष अवधि उसकी अवशिष्ट परिपक्वता है उदाहरण के लिए 10 वर्ष की परिपकवता की मूल अवधि के लिए जारी प्रतिभूति की 2 वर्ष बाद अवशिष्ट परिपक्वता 8 वर्ष होगी +द्वितीयक बाजार +एक बाजार जिसमें बकाया प्रतिभूतियों का कारोबार किया जाता है ये प्राथमिक, अथवा प्रारंभिक बाजार से भिन्न है, जहां प्रतिभूतियाँ पहली बार बेची जाती हैं द्वितीयक बाजार का अर्थ है प्रतिभूतियों की आरंभिक साव्रजनिक ब्रिकी के बाद होने वाला क्रय और विक्रय +निरंतर बिक्री +निरंतर बिक्री के अंतर्गत कुछ राशि की प्रतिभूतियाँ सृजित की जाती हैं और बिक्री के लिए उपलबध होती है, सामान्यतया ये न्यूनतम मूल्य पर होती हैं तथा बाजार में बोली आने पर बेची जाती हैं ये प्रतिभूतियाँ दिन अथवा सप्ताहों तक बेची जा सकती है तथा मांग अधिक होने पर प्राधिकरण इसका मूल्य बढ़ाने (न्यूनतम) अथवा मांग कमजोर होने पर कम करने का लचीलापक अपना सकती हैं निरंतर बिक्री और (टैप सेल) लगभग एक समान है, तथापि टैपसेल में ऋण प्रबंधक को निरंतर बिक्री के लिए उपलब्धता और निर्देशक मूल्य के संबंध में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होती है निरंतर बिक्री आवश्यक रूप से बाजार की पहल पर होती है +खजाना बिल +सरकार की उधार देयताएँ जिनकी अवधि समाप्ति 1 वर्ष अथवा कम होती है सामान्यतया खजाना बिल अथवा टी बिल कहलाते हैं खजाना बिल, खजाने/सरकार की अल्पावधि देयताएँ होती हैं ये अंकित मूल्य पर बट्टे पर जारी लिखत हैं और मुद्रा बाजार का महत्वपूर्ण भाग हैं +हामीदारी +वह व्यवस्था जिसके द्वारा निवेश बैंकर प्रतिभूति के प्राथमिक निर्गम के उस अंश का अभिग्रहण करते हैं जिसके लिए अंशदान नहीं दिया गया +भारित औसत मूल्य/प्रतिप्ल +यह मूल्य/प्रतिप्ल का भारित औसत हिस्सा है जहाँ मूल्य/प्रतिप्ल पर प्रयोग की गई राशि भार है गैर स्पर्धी धारक को आबंटन भारित औसत मूल्य/प्रतिप्ल पर होगा जो स्पर्धी बोली के आधार पर नीलामी से उभर कर आएगा +प्रतिप्ल +किसी प्रतिभूति पर वार्षिक प्रतिशतता दर पर अर्जित प्रतिप्ल प्रतिप्ल प्रतिभूति के खरीद मूल्य तथा कूपन ब्याज दर का कार्य है प्रतिप्ल वैश्विक बाजारों तथा अर्थव्यवस्था सहित विभिन्न कारणों से धटता-बढ़ता रहता है +परिपक्वता पर प्रतिप्ल (वाइटीएम) +परिपक्वता पर प्रतिप्ल वह प्रतिप्ल है जिसकी कोई व्यक्ति परिपक्वता तक प्रतिभूति रखने पर आशा करता है परिपक्वता पर प्रतिप्ल आवश्यक रूप से वह बट्टा दर हे जिस पर भविष्य के भुगतानों का वर्तमान मूल्य प्रतिभूति के मूल्य के बराबर होता है (निवेश प्रतिप्ल मूलधन पर प्रतिप्ल) +प्रतिप्ल वक्र +विभिन्न परिपक्वता अवधि तथा उसी ऋण गुणवत्ता के बॉण्डों के बीच प्रतिप्ल और परिपक्वता के बीच संबंध दर्शाने वाला ग्राफिक संबंध यह रेखा ब्याज दरों का अवधि ढाँचा दर्शाती है इससे निवेशक ऋण प्रतिभूतियों का विभिन्न परिपक्वता तथा कूपन से तुलना कर सकता है +सीसीआइएल सरकारी प्रतिभूतियों के लिए समाशोधन एजेंसी है सरकारी प्रतिभूतियों में होनेवाले समस्त लेनदेनों के लिए यह एक केंद्रीय प्रति पक्ष (सीसीपी) के रूप में कार्य करता हैं जो वह स्वयं को दो प्रतिपक्षों के बीच स्थापित करते हुए संपन्न करता है परिणामतः, निपटान के दौरान, सीसीपी वास्तविक लेनदेन के क्रेता के लिए विक्रेता और विक्रेता के लिए क्रेता बन जाता है ओटीसी मार्केट में तथा एनडीएस-ओएम प्लैटफार्म पर किए जानेवाले सभी एकमुश्त लेनदेनों को सीसीआइएल के जटिए समायोजिता किया जाता है एक बार सीसीआइएल के पास लेनदेन की सूचना पहुंच जाने पर वह प्रतिभूतियों तथा निधियों, इन दोनों पक्षों पर सहभागीवार निवल दायित्वों का हिसाब लगाता है ग्राहकों (गिल्ट खाता धारी) की देय/प्राप्य स्थिति उनके संबंधित अभिरक्षकों के सामने प्रदर्शित होती है सीसीआईएल सहभागियों की निवल स्थिति के साथ निपटान फाइल रिज़र्व बैंक को भेज देता है जहां "सुपुर्दगी बनाम भुगतान" प्रणाली के तहत निधियों एवं प्रतिभूतियों के साथ साथ अंतरण द्वारा निपटान संपन्न होता है सीसीआइएल सरकारी प्रतिभूतियों में किए जानेवाले सभी लेनदेनों के निपटान की भी गारंटी देता है अर्थात निपटान प्रक्रिया के दौरान यदि कोई सहभागी निधियां/प्रतिभूतियां उपलब्ध कराने में चूक जाता है तो सीसीआइएल उन्हें अपने स्वयं के संसाधनों में से उपलब्ध करायेगा इस प्रयोजन के लिए सीसीआइएल सभी सहभागियों से मार्जिन वसूल करता है और "निपटान गारंटी निधि" रखता है +`यदा जारी' `जब, जैसे ही तथा यदि जारी किया जाए' का संक्षेप है जो जारी करने (निर्गम) के लिए अधिसूचित की गई परंतु अभी वास्तव में जारी न की गई किसी प्रतिभूति के सशर्त लेनदेन को इंगित करता है समस्त `यदा जारी' लेनदेन `यदि' आधारित लेनदेन होते हैं, जिन्हे यदि और जब प्रतिभूति वास्तव में जारी की जाती है तब निपटाया जाना होता है केंद्रीय सरकार की प्रतिभूतियों में `यदा जारी' लेनदेन करने की अनुमति सभी एनडीएस-ओएम सदस्यों को है और इन्हें केवल एनडीएस-ओएम प्लैटफार्म पर ही किया जाना होता है `यदा जारी' बाजार नीलामी की जानेवाली प्रतिभूति के मूल्य अन्वेषण तथा नीलाम की जानेवाली प्रतिभूति के बेहतर संवितरण में सहायक होता है शहरी सहकारी बैंकों के लिए 1 जुलाई 2009 के रिज़र्व बैंक मास्टर परिपत्र यूबीडी.बीपीडी (पीसीबी) एमसी सं.12/16.20.000/2009-10 में विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए गए है +वर्तमान मूल्य (पीवी), भावी मूल्य (एफवी) आदि की गणना से संबंधित `मुद्रा' का समय मूल्य बांड बाजार से संबंधित महत्वपूर्ण गणितीय संकल्पनाएं हैं इसकी उदाहरण सहित रूपरेखा नीचे दिए गए बॉक्स II में दी गई है +बॉक्स II +मुद्रा का समय मूल्य +धन का सामयिक मूल्य होता है क्योंकि आज के दिन का एक रूपया एक वर्ष बाद की अपेक्षा अधिक मूल्यवान तथा उपयोगी होता है +`मुद्रा के समय मूल्य' की संकल्पना उस ज्ीास्iेा पर आधारित हे कि एक निवेशकर्ता (भविष्य में कभी उसी राशि के भुगतान की बजाए), आज किसी निर्धारित राशि का भुगतान प्राप्त करने को वरीयता देता हैं शेष सभी बातें समान ही होती हैं विशेष रूप से, यदि किसी को आज ही भुगतान प्राप्त हो जाए तो वह निर्दिष्ट भावी तारीख तक उस धन पर ब्याज अर्जित कर सकता है साथ ही, किसी स्फीतिकारी परिवेश में आज के दिन एक रूपए की क्रय शक्ति एक वर्ष बाद की अपेक्षा काóफी अधिक होती है +किसी भावी राशि का वर्तमान मूल्य +वर्तमान मूल्य प्ार्मूला मुद्रा के अवधि मूल्य का एकमात्र प्ार्मूला है +वर्तमान मूल्य (पीवी) फाम्र्यूला के चार परिवर्ती होते हैं जिनमें से एक-एक को निम्नानुसार हल किया जा सकता है +वर्तमान मूल्य (पीवी)(झV) अर्थात् समय = 0 पर मूल्य +भावी मूल्य (एफवी) (इV) अर्थात समय = एन पर मूल्य +`आइ' ('i')वह दर है जिस पर राशि को हर अविध में चक्रवृद्धि किया जाएगा +`एन' ('ह') है अवधियों की संख्या +भावी नकदी प्रवाहों के संचयी वर्तमान मूल्य की गणना एफवी के अंशदान अर्थात् समय पर नकदी प्रवाह का मूल्य `टी' को जोड़कर की जा सकती है +उदाहरण +नकदी प्रवाह निम्नानुसार होने पर +अवधि (वर्षो में) +1 +2 +3 +राशि +100 +100 +100 +माना कि ब्याज दर 10% वार्षिक की है; हर वर्ष के लिए बट्टे की गणना 1/(1+ब्याज दर)^ वर्ष (संख्या में) के रूप में की जा सकती है +वर्तमान मूल्य का हिसाब राशि बट्टा धटक के रूप में लगाया जा सकता है +निम्न अवधि के बाद 100 रूपए का पीवी होगाः +वर्ष +राशि +बट्टा धटक +पीवी +1 +100 +0.9091 +90.91 +2 +100 +0.8264 +82.64 +3 +100 +0.7513 +75.13 +संचयी वर्तमान मूल्य = 90.91+82.64+75.13=रू.248.69 +निवल वर्तमान मूल्य (एनपीवी) +निवल वर्तमान मूल्य (एनपीवी) या निवल वर्तमान संपत्ति (एनपीडब्ल्य) को निवल नकदी प्रवाह के वर्तमान मूल्य के रूप में परिभाषित किया गया है यह एक दीर्धावधिक परियोजनाओं का मूल्यांकन करने के लिए धन के समय मूल्य को प्रयुक्त करने संबंधी मानक पद्धति है पूंजी बजटीकरण के लिए प्रयुक्त तथा अर्थशाॉा में व्यापक रूप में प्रयुक्त होनेवाली इस पद्धति में नकदी प्रवाहों की अधिकता एवं कमी को, एक बार वित्तपोषण प्रभारों की पूर्ति हो जाने के बाद वर्तमान मूल्य (पीवी) के रूप में नापा जाता है इसमें उन्नत वित्तीय कैलक्युलेटरों का प्रयोग होता है +5 +वर्तमान मूल्य के अधीन ऊपर किए गए उदाहरण में, यदि रू.240 की जमा राशि पर तीनों नकदी प्रवाह उपचित हो जाते हैं तो उस निवेश का एनपीवी 248.69-240= रू.8.69 है +22. किसी बांड के मूल्य का हिसाब किस प्रकार लगाया जाता है? किसी लेनदेन का कुल प्रतिफल क्या होगा और उपचित ब्याज क्या होता है? +उपचित ब्याज बांड का मूल्य बांड के समस्त भावी नकदी प्रवाहों का वर्तमान मूल्य ही है नकदी प्रवाहों को बट्टा देने के लिए प्रयुक्त ब्याज दर है बाँड की परिपक्वता पर आय (प्रश्न 24 में विस्तार से स्पष्ट किया गया है) इस मूल्य की गणना एक्सेल के `मूल्य' फंक्शन का प्रयोग करते हुए की जा सकती है (कृपया अनुबंध 4, क्रम सं. 5 देखें) +उपचित ब्याज पिछले कूपन दिवस से लेनदेन के दिवस के निपटान से एक दिन पूर्व तक की खंडित अवधि के लिए दिया जानेवाला ब्याज होता है चूंकि प्रतिभूतिधारी लेनदेन के निपटान की तारीख से एक दिन पूर्व तक की अवधि के लिए प्रतिभूति धारित करता है, अतः, वह उक्त धारित अवधि के लिए कूपन पाने का पात्र होता है लेनदेन के निपटान के दौरान प्रतिभूति का खरीदार सहमत मूल्य के अतिरिक्त उक्त उपचित ब्याज अदा करता है और `प्रतिफल राशि' का भुगतान करता है +नीचे उदाहरण दिया गया है - +6.49 प्रतिशत 2015 की प्रतिभूति के 5 करोड़ रूपये (अंकित मूल्य) के रू.96.95 के मूल्य पर 26 अगस्त 2009 की निपटान तारीख के लेनदेन के लिए प्रतिभूति के विक्रेता को देय प्रतिफल राशि का हिसाब निम्नानुसार किया गया है; +यहां लगाए गए मूल्य को `क्लीन मूल्य' कहा जाता है, क्योंकि उसमें उपचित ब्याज जुड़ा नहीं होता है +उपचित ब्याजः +78 दिनों के लिए रू.100 के अंकित = 6.49 X (78/360) +मूल्य पर उपचित ब्याज = रू.1.4062 +इस उपचित ब्याज धटक को `क्लीन मूल्य' में जोड़ने पर मिलनेवाले परिणाम मूल्य को `डर्टी मूल्य' कहा जाता है उक्त उदाहरण में यह है 96.95+1.4062 =रू.98.3562 +कुल प्रतिफल राशि = लेनदेन का अंकित मूल्य डर्टी मूल्य +23. किसी बॉण्ड की आय और मूल्य के बीच क्या संबंध है ? +यदि ब्याज दरें या बाजार आय बढ़ जाती है तो बांड के मूल्य में गिरावट आती है इस के विपरीत, यदि ब्याज दरें या बाजार आय में गिरावट आती है तो बांड का मूल्य बढ़ जाता है दूसरे शब्दों में, बांड की आय उसके अपने मूल्य से उलटे क्रम में संबंधित होती है +बॉण्ड की परिपक्वता पर आय और कूपन दर के बीच के संबंध को निम्नानुसार देखा जाए : +● यदि बॉण्ड का बाजार मूल्य अंकित मूल्य से कम है अर्थात् बॉण्ड एक बट्टे पर बिकता है, तो वाईटीएम > चालू आय > कूपन आय +● यदि बॉण्ड का बाजार मूल्य अंकित मूल्य से अधिक है अर्थात् बांड प्रीमियम पर बिकता है, तो कूपन आय > चालू आय > वाइटीएम +● यदि बॉण्ड का बाजार मूल्य अंकित मूल्य के समान है अर्थात् बांड सममूल्य पर बिकता है, तो वाईटीएम=चालू आय= कूपन आय +24. किसी बॉण्ड की आय की गणना किस प्रकार की जाती है ? +24.1. बॉण्ड खरीदनेवाला निवेशक निम्नलिखित एक या उससे अधिक ñाोतों से प्रतिलाभ पा सकता है +● जारीकर्ता द्वारा किए जानेवाला कूपन ब्याज भुगतान; +● बॉण्ड बेचे जाने पर मिलनेवाला किसी प्रकार का पूंजीगत लाभ (या पूंजी हानि); और +● उक्त ब्याज भुगतानों के पुनर्निवेश से होनेवाली आय अर्थात् ब्याज-पर-ब्याज +निवेशकों द्वारा किसी बांड में निवेश करने पर मिलनेवाले संभाव्य प्रतिलाभ को नापने के लिए आम तौर पर प्रयुक्त उक्त तीन आय मापनों को संक्षेप में निम्नानुसार वर्णित किया जाता है +(i) कूपन आय +24.2 कूपन आय अंकित मूल्य के प्रतिशत के रूप में कूपन भुगतान होता है कूपन आय से तात्पर्य सरकारी प्रतिभूति जैसी किसी निर्धारित आय प्रतिभूति पर देय सांकेतिक ब्याज है यह निवेशक को सरकार (अर्थात् जारीकर्ता) का एक निश्चित प्रतिलाभ अदा करने का वायदा है इस प्रकार, कूपन आय से सरकार द्वारा अदा किये जानेवाले सांकेतिक ब्याज पर ब्याज दर धट-बढ या मुद्रा स्प्ातिक होने वाले प्रभाव का पता नहीं चलता है +कूपन आय = कूपन भुगतान/अंकित मूल्य +उदाहरणः +कूपन भुगतान : 8.24 +अंकित मूल्य : रू.100 +बाजार मूल्य : रू.103.00 +कूपन आय : 8.24/100 = 8.24% +(ii) चालू आय +24.3. चालू आय बांड के खरीद मूल्य के प्रतिशत के रूप में मात्र एक कूपन भुगतान होता है; दूसरे शब्दों में, यह बांडधारक को उसके खरीद मूल्य पर मिलनेवाला प्रतिलाभ है जो कमोबेश अंकित मूल्य या सममूल्य होता है चालू आय में आवधिक रूप से प्राप्त होनेवाली ब्याज आय के पुनर्निवेश को हिसाब में नहीं लिया जाता है +चालू आय = (वार्षिक कूपन दर/खरीद मूल्य) X 100 +उदाहरण : +प्रति रू.100 के सम मूल्य पर रू.103.00 के लिए बेचे जानेवाले 10 वर्षीय 8.24% कूपन बांड के लिए चालू आय का हिसाब नीचे दिया गया है +वार्षिक कूपन ब्याज = 8.24% X रू.100=रू.8.24 +चालू आय = (8.24/103)X100=8.00% चालू आय में केवल कूपन ब्याज पर विचार किया जाता है और निवेशक के प्रतिलाभ को प्रभावित करनेवाले प्रतिलाभ के अन्य ñाोतों को अनदेखा किया जाता है +(iii) परिपक्वता पर आय +24.4. परिपक्वता पर आय किसी बांड को उसकी परिपक्वता तक धारित रखने पर मिलनेवाले प्रतिलाभ की प्रत्याशित दर होती है बॉण्ड का मूल्य उसके शेष समस्त नकदी प्रवाहों के वर्तमान मूल्य का जोड़ मात्र होता है वर्तमान मूल्य की गणना हर नकदी प्रवाह को किसी दर पर बट्टा देते हुए की जाती है; यह दर होती है वाइटीएम इस प्रकार, वाइटीएम वह बट्टा दर होती है जो किसी बांड से मिलनवाले भावी नकदी प्रवाहों के वर्तमान मूल्य को उसके चालू बाजार मूल्य तक समीकृत कर देती है दूसरे शब्दों में यह बांड पर मिलनेवाली आंतरिक प्रतिलाभ दर होती है वाइटीएम की गणना में परख तथा चूक विधि शामिल है किसी बांड की परिपक्वता आय आसानी से प्राप्त करने के लिए एक कैलक्यूलेटर या सॉपÌटवेयर का प्रयोग किया जा सकता है ( कृपया बॉक्स III देखें) +बॉक्स III +वाइटीएम गणना +वाइटीएम की गणना मैन्युअल तथा एमएस एक्सेल जैसे किसी मानक स्प्रेडशीट के फंक्शन का प्रयोग करते हुए की जा सकती है +मैन्युअल (परख एवं चूक) पद्धति +मैन्युअल या परख एवं चूक पद्धति से हिसाब करना जटिल हो जाता है, क्योंकि सरकारी प्रतिभूतियों में भावी काल तक चलनेवाली कई सारी नकदी निहित होती है इसे एक उदाहरण द्वारा नीचे स्पष्ट करते हैं :- +एक 8% के कूपनवाली प्रति रू.100 के अंकित मूल्य के रू.102 के मूल्य वाली दो वर्षीय प्रतिभूति ली जाए; नीचे `आर' के लिए हल करते हुए वाइटीएम की गणना की जा सकती है विशिष्टतया, इस में `आर' के लिए एक मूल्य मान लिया गया है तथा इस समीकरण का हल निकालने में परख एवं भूल शामिल है, इसी में यह भी मान लिया गया है कि यदि दायी और की राशि 102 से अधिक हो तो `आर' के लिए एक उच्चस्तर का मूल्य दिया जाए तथा पुनः हल निकाला जाए लीनीयर इंटरपोलेशन तकनीक का भी एक बार `आर' के लिए `दो' मूल्य लेने पर सही `आर' का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि एक के लिए मूल्य कीमत 102 से अधिक और दूसरे मूल्य कीमत के लिए 102 से कम रहे +102=4/(1+ी/2)1 +4/(1+ी+2)2 +4/(1+ी/2)3 +104/(1+ी/2)4 +एमएस एक्सेल के प्रयोग के साथ स्प्रेड शीट पद्धति +एमएस एक्सेल प्रोग्राम में आवधिक रूप में कूपन भुगतान करनेवाली प्रतिभूतियों की आय का हिसाब लगाने के लिए निम्नलिखित फंक्शन प्रयोग में लाया जाए +आय (निपटान, परिपक्वता, दर, मूल्य,प्रति देय, बारंबारती, आधार) +जिसमें कि +निपटान - प्रतिभूति के निपटान की तारीख है प्रतिभूति निपटान तारीख-प्रतिभूति और निधियों को परस्पर विनिमय करने की तारीख है +परिपक्वता - प्रतिभूति की परिपक्वता की तारीख है परिपक्वता तारीख प्रतिभूति की अवधि समाप्ति की तारीख है +दर - प्रतिभूति की वार्षिक कूपन दर है +कीमत - प्रति रू..100 के अंकित मूल्य के लिए प्रतिभूति मूल्य है +प्रतिदेय - प्रति रू.100 के अंकित मूल्य के लिए प्रतिभूति का प्रतिदेय मूल्य है +बारंबारता - प्रति वर्ष के कूपन भुगतानों की संख्या है (भारत में सरकारी बाण्डों के लिए 2) +आधार - प्रयुक्त किये जानेवाली दिन गणना का प्रकार है (भारत में सरकारी बांडों के लिए 4 जिसमें 30/360 आधार का प्रयोग होता है +25. किसी बांड की आय में प्रयोग की जानेवाली दिन गिनने की परंपरा क्या है ? +दैनिक गणना परिपाटी का तात्पर्य उपचित ब्याज की गणना करने के लिए किसी बाण्ड की धारण समयावधि (दिनों की संख्या) प्राप्त करने के लिए अपनाई गई विधि से है चूंकि भिन्न-भिन्न प्रकार की दैनिक गणना परिपाटी के प्रयोग से उपचित ब्याज की राशि में अंतर हो सकता है अतः यह उचित होता है कि बाजार के सभी प्रतिभागी एक समान दैनिक गणना परिपाटी का अनुसरण करें +उदाहरण के लिए - भारतीय बाजारों में अपनायी जाने वाली परिपाटी निम्नानुसार है : +बाण्ड बाजर - इसमें 30/360 की परिपाटी अपनायी जाती है, जिसका अर्थ यह है कि महीने वास्तविक दिनों की संख्या को ध्यान में न लेते हुए महीने में 30 दिनों की ही गणना की जाती है और एक वर्ष में 360 दिन ही गिने जाते हैं +मुद्रा बाजार - इसमें वास्तविक/365 की परिपाटी अपनायी जाती है अर्थात् दिनों की संख्या के लिए वास्तविक दिनों की संख्या (अंश के रूप में) ली जाती है जबकि वर्ष में दिनों की संख्या के रूप में 365 दिनों की गणना की जाती है इस प्रकार, खज़ाना बिलों के मामले में, जो मुद्रा बाजार की लिखत हैं, मुद्रा बाजार में प्रचलित परिपाटी अपनायी जाती है +26. खज़ाना बिल की प्रतिप्ल की गणना किस प्रकार की जाती है ? +8 +उल्लेखनीय है कि खज़ाना बिल की शेष परिपक्वता समयावधि 50 दिन की है (91-41) +27. डîाूरेशन (समयावधि) क्या होती है ? +27.1. किसी बाण्ड की समयावधि (जिसे मैकाले समयावधि भी कहा जात है) वर्तमान कीमत के रूप में प्रारंभिक निवेश की वसूली में लगने वाले समय को नापने का पैमाना है सरल शब्दों में समयावधि का तात्पर्य किसी बाण्ड के ब्रेक इवेन पर पहूंचने में लगने वाली चुकौती समयावधि होती है अर्थात् किसी बाण्ड द्वारा अपना खरीद मूल्य अदा करने में लगने वाला समय होता है समयावधि को वर्षो की संख्या के रूप में निरूपित किया जाता है समयावधि निकालने के लिए अपनायी जाने वाली क्रमिक प्रक्रिया नीचे बॉक्स IV में दी गयी है +बॉक्स IV +समयावधि के लिए गणना करना +सर्वप्रथम - प्रत्येक समयावधि के लिए भविष्य के प्रत्येक नकद प्रवाह को इसकी तत्संबंधी वर्तमान कीमत से धटाना होगा चूंकि कूपन प्रत्येक छह माह की समयावधि में दिए जाते हैं अतः एक चक्र छह माह के बराबर होगा और दो वर्ष की परिपक्वता वाले बाण्ड में 4 चक्र होंगे +दूसरे - भविष्य के नकद प्रवाहों की वर्तमान कीमतों को उनकी संगत समयावधियों (इन्हें भार कहा जाता है) से गुणा करना होगा अर्थात्, पहले कूपन की वर्तमान कीमत (पीवी) को 1 से गुणा करना होगा और दूसरे कूपन की पीवी को 2 से और इसी प्रकार आगे भी +तीसरे - अभी नकद प्रवाहों की उक्त भारित पीवी (वर्तमान कीमतो) को जोड़ा जाता है और प्राप्त जोड़ को बाण्ड की वर्तमान कीमत (पहले चरण में दर्शायी गयी वर्तमान कीमतों को जोड़) से भाग दिया जाता है परिणामी कीमत चक्रों की संख्या में समयावधि होती है चूंकि एक चक्र छह माह के बराबर होता है अतः वर्षो की संख्या में समयावधि प्राप्त करने के लिए इसे दो से भाग दिया जाता है यह वह समयावधि होती है जिसके भीतर, ऐसी आशा की जाती है कि बाण्ड अपनी मूल कीमत लौटा देगा, यदि इसे परिपक्वता तक रखा जाए +उदाहरण - +10% कूपन दर पर 2 वर्ष की परिपक्वता वाला बाण्ड लेने पर और जिसकी वर्तमान कीमत 103/- रू. है, उसका नकद प्रवाह निम्नानुसार होगा (मौजूदा 2 वर्ष की प्रतिप्ल दर 9% पर - +समय समयावधि (वर्ष में) +1 +2 +3 +4 +जोड़ +अंतर्वाह (करोड़ रू. में) +5 +5 +5 +105 +9% के प्रतिप्ल पर पीवी +4.78 +4.58 +4.38 +88.05 +101.79 +पीवी* समय +4.78 +9.16 +13.14 +352.20 +379.28 +चक्रों की संख्या में समयावधि = 379.28/101.79=3.73 +वर्षो में समयावधि = 3.73/2=1.86 वर्ष +औपचारिक रूप में, समयावधि का तात्पर्य है - +(क) किसी बाण्ड के नकद प्रवाहों की भारित औसत समयावधि (इस समय से भुगतान तक की समयावधि) या संपृक्त नकद प्रवाहों की कोई श्रृंखला +(ग) समयावधि बाण्ड की समग्र परिपक्वता से हमेशा कम या उसके समतुल्य होती है +(ध) केवल शून्य कूपन (कूपन रहित बाण्ड) बाण्ड की समयावधि उसकी परिपक्वता के बराबर होती है +(ý) बाण्ड की कीमत ब्याज दर (अर्थात् प्रतिप्ल के प्रति संवेदनशील है +समयावधि, ब्याज दर परिचालनों (अर्थात् प्रतिप्ल) के प्रति बाण्ड की बाजार कीमत की संवेदनशीलता नापने के रूप में प्राथमिक रूप से उपयोगी होती है यह प्रतिप्ल में आए किसी परिवर्तन हेतु कीमत में आए प्रतिशत परिवर्तन के लगभग समतुल्य होती है उदाहरण के लिए ब्याज दरों में हुए छोटे परिवर्तनों के लिए समयावधि लगभग वह प्रतिशत है जिससे बाण्ड की कीमत बाजार ब्याज दर में 1 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के लिए गिर जाएगी अतः ब्याज दरों में 1% वार्षिक की वृद्धि होने पर 7 वर्ष की समयवावधि वाले 15 वर्षीय बाण्ड की कीमत लगभग 7% गिर जाएगी दूसरे अर्थो में ब्याज दरों के संबंध में समयावधि बाण्ड की कीमत का लचीलापन है +संशोधित समयावधि क्या है ? +27.2. संशोधित समयावधि मैकाले समयावधि का संशोधित रूप है यह ब्याज दर (प्रतिप्ल) में हुए एक प्रतिशत परिवर्तन के प्रति प्रतिभूति की कीमत में आए अंतर को प्रदर्शित करती है इसका सूत्र इस प्रकार है - +5 +उदाहरण - +बॉक्स IV में दिए गए उदाहरण में, संशोधित समयावधि = 1.86/(1+0.09/2)=1.78 +पीवी 01 क्या है ? +27.3. पीवी 01 प्रतिप्ल में आए एक आधार बिंदु (एक प्रतिशत बिंदु के एक सौवें भाग के समतुल्या) के परिवर्तन के कारण बाण्ड की कीमत में हुआ वास्तविक परिवर्तन दर्शाता है यह ब्याज दर में हुए 1 आधार बिंदु (0.01%) के परिचालन के कारण कीमत पर पडने वाले वर्तमान प्रभाव को दर्शाता है इसे अक्सर समयावधि (समय मापन) के बजाय मूल्य विकल्प के रूप में प्रयुक्त किया जाता है पीवी 01 जितनी अधिक होगी उतार-चढ़ाव भी उतना ही अधिक होगा (प्रतिप्ल में परिवर्तन होने पर कीमत में संवेदनशीलता) +उदाहरण - +संशोधित समयावधि से (जो उदाहरण 27.2 में दिया गया है) हम यह जानते हैं कि प्रतिप्ल में 100 आधार बिंदुओं (1%) के परिवर्तन से प्रतिभूति की कीमत में 1.78 प्रतिशत का परिवर्तन होगा कीमत के रूप में जो 1.78*(102/100)=1.81 रू. है +अतः पीवी 01=1.81/100=0.018 रू. होगी जो 1.8 पैसे है इस प्रकार 1.78 वर्षो की संशोधित समयावधि वाले किसी बाण्ड का प्रतिप्ल 9% से 9.05% (5 आधार बिंदुओं) में परिवर्तित होता है तो बाण्ड की कीमत 102 रू. से 101.91 रू. में परिवर्तित होती है (9 पैसे की गिरावट अर्थात् 5 X 1.8 पैसे) +27.4. समयावधि के आधार पर प्रतिप्ल में परिवर्तन के लिए कीमत में परिवर्तन की गणना केवल कीमत में आए छोटे परिवर्तनों के लिए कारगर होती है क्योंकि बाण्ड मूल्य और प्रतिप्ल के आपसी संबंध निश्चित रूप से सरल रेखीय नहीं हैं अर्थात् बाण्ड की कीमत में हुआ एक यूनिट का परिवर्तन प्रतिप्ल में हुए एक यूनिट परिवर्तन के समानुपातिक नहीं है कीमत में हुए भारी उतार-चढ़ाव का संबंध वक्ररेखीय है अर्थात् बाण्ड की कीमत में परिवर्तन, प्रतिप्ल में हुए परिवर्तन के समानुपात की तुलना में या तो कम होगा अथवा अधिक होगा इसे कान्वेक्सिटी नामक विचार से नापा जाता है जो बाण्ड के प्रतिप्ल में प्रति यूनिट परिवर्तन के लिए बाण्ड की समयावधि में परिवर्तन होता है +28.1. +सहकारी बैंकों के लिए "परिपक्वता तक धारणीय" के तहत वर्गीकृत निवेशों के बाजार मूल्यों को बही में अंकित करना आवश्यक नहीं है और उन्हें अधिग्रहण लागत पर अग्रेषित करना चाहिए जब तक कि यह अंकित मूल्य से अधिक न हो यदि ऐसा है तो प्रीमियम को परिपक्वता की शेष समयावधि के लिए परिशोधित करना चाहिए सहकारी बैंकों की बहियों में "बिक्री के लिए उपलब्ध" श्रेणी में व्यक्तिगत क्रिप के बाजार मूल्यों को वर्ष के अंत में या और कम अंतरालों पर अंकित करना चाहिए "व्यापार के लिए धारणीय" श्रेणी में उपलब्ध व्यक्तिगत क्रिप के बाजार मूल्यों को माह के अंत में या और कम अंतरालों पर बहियों में अंकित करना चाहिए "बिक्री के लिए उपलब्ध" और "व्यापार के लिए उपलब्ध" श्रेणियों में व्यक्तिगत प्रतिभूतियों को बाजार मूल्यों पर बही में अंकित करने के बाद उनके बही मूल्यों के कोई परिवर्तन नहीं होगा +28.2 केंद्रीय सरकार की प्रतिभूतियों की कीमतों का निर्धारण निर्धारित आय मुद्रा बाजार और डेरिवेटिव्ज संध (प्मिडा) और भारतीय प्राथमिक व्यापारी संध द्वारा संयुक्त रूप से प्मिडा की वेबसाइट पर दी गई कीमतों/प्रतिप्लों को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए केंद्रीय सरकारी की सभी प्रतिभूतियों की कीमत प्रतिदिन दी जाती है जबकि मूल्यांकन के लिए कीमतों और प्रतिप्लों का वक्र प्रत्येक माह के अंत में दिया जाता है उदाहरण के लिए केंद्रीय सरकार की एक प्रतिभूति 7.46% 2007 का प्मिडा मूल्यांकन 31 मार्च 2009 को 101.69 रू. था यदि कोई सहकारी बैंक इसी प्रतिभूति को "बिक्री के लिए उपलब्ध" या "व्यापार के लिए उपलब्ध" श्रेणी के तहत 102 रू. के बही मूल्य पर रख रहा था तो बैंक के लिए यह अपेक्षित होगा कि प्रत्येक 100 रू. के अंकित मूल्य के लिए 0.31 रू. का बही में मूल्यहास नोट करे यदि कुल धारिता 1 करोड़ रू. की थी तो अंकित किया जाने वाला मुल मूल्यहास 31,000/- रू. होगा +28.3 राज्य सरकार और अन्य प्रतिभूतियों का मूल्यांन केंद्रीय सरकार की प्रतिभूति की तदनुरूपी शेष परिपक्वता समयावधि के प्रतिप्ल पर कीमत-लागत अंतर को जोड़कर करना चाहिए इस समय राज्य सरकार की प्रतिभूतियों का मूल्यांकन करते समय 25 आधार अंकों (0.25%) का कीमत-लागत अंतर जोड़ा जाता है जबकि विशेष प्रतिभूतियों (तेल बाण्ड, उर्वरक बाण्ड, एसबीआई बाण्डों आदि) के कार्पोरेट बाण्डों के लिए प्मिडा द्वारा दिया गया कीमत-लागत अंतर जोड़ा जाता है राज्य सरकार के एक बाण्ड को ध्यान में रखते हुए मूल्यांकन का एक उदाहरण नीचे बॉक्स V में दिया गया है +बॉक्स V +प्रतिभूतियों का मूल्यांकन +राज्य सरकार के बाण्डों के लिए मूल्याकन +प्रतिभूति - 7.32% एपीएसडीएल 2014 +जारी करने की तारीख - 10 दिसंबर 2004 +परिपक्वता तिथि - 14 दिसंबर 2014 +कूपन - 7.32% +मूल्यांकन की तारीख - 31 मार्च 2008 +प्रक्रिया +उक्त बाण्ड के मूल्यांकन में निम्नलिखित स्तर शामिल हैं - +(1) मूल्यांकित बाण्ड की शेष परिपक्वता का पता लगाना +(2) उक्त शेष परिपक्वता के लिए केंद्रीय सरकार प्रतिभूति के प्रतिप्ल का पता लगाना +(3) प्रतिभूति के प्रतिप्ल का पता लगाने के लिए उक्त प्रतिप्ल में उचित कीमत-लागत अंतर जोड़ना +(4) उपर्युक्त प्राप्त प्रतिप्ल का प्रयोग करते हुए प्रतिभूति की कीमत की गणना करना +स्तर - 1 +चूंकि मूल्यांकन 31 मार्च 2008 को किया जा रहा है अतः हमें इस तारीख से प्रतिभूति की परिपक्वता का तारीख अर्थात् 10 दिसंबर 2014 तक के बीच के वर्षो की संख्या का पता लगाना है ताकि प्रतिभूति की शेष परिपक्वता का पता लगाया जा सके इसे ceeôeJer³e रूप से वर्ष, महीने और दिन की गणना कर निकाला जा सकता है तथापि, इसके लिए का आसान तरीका एमएस एक्सेल में "इअरप्रैक" ("भaीिीaम्") प्रणाली से निकाला जा सकता है जिसमें दो तारीखे और आधार प्रदान करना होता है (अधिक जानकारी के लिए एक्सल प्ंक्शन पर अनुबंध 4 का संदर्भ लें) इस प्रतिभूति के लिए, यह 6.69 वर्षो की अवशेष परिपक्वता देता है +स्तर - 2 +6.69 वर्षो के लिए केंद्रीय सरकारी प्रतिभूति प्रतिप्ल का पता लगाने के लिए हम 6 वर्ष और 7 वर्ष के बीच के प्रतिप्लों को आपस में संबद्ध करेंगे, ये प्रतिप्ल पिÌमडा द्वारा दिए गये हैं 31 मार्च 2008 की स्थिति के अनुसार, 6 और 7 वर्षो के लिए पिÌमडा द्वारा दिए गये प्रतिप्ल क्रमशः 7.73% और 7.77% हैं निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग करते हुए 6.69 वर्षो के लिए प्रतिप्ल निकाला गया है +0.0773+ड (6.69-6)X(0.0777-0.0773) ] = 0.077577=7.7577% या 7.76% +यहा हम 0.69 वर्षो के लिए प्रतिप्ल के अंतर का पता लगाकर और उसे 6 वर्षो के लिए लागू प्रतिप्ल में जोडते हैं ताकि 6.69 वर्षो के लिए प्रतिप्ल का पता लगाया जा सकें यह भी नोट करना हैं कि प्रतिप्ल का उपयोग दशमलव रूप में करना है (उदाहरण के लिए 7.73 प्रतिशत, 7.73/100 के बराबर है जिसका अर्थ है 0.0773) +स्तर - 3 +विशिष्ठ अवशेष परिपक्वता के लिए केंद्रीय सरकार प्रतिप्ल का पता लगाने के बाद हमें उचित स्प्रेड को लोड करना है ताकि मूल्यांकन की जाने वाली प्रतिभूति के लिए प्रतिप्ल प्राप्त किया जा सके चूंकि प्रतिभूति राज्य सरकार की प्रतिभूति है अतः लागू स्प्रेड 25 आधार बिंदु है (0.25 प्रतिशत) अतः प्रतिप्ल 7.76%+0.25%=8.01% होगा +स्तर - 4 +प्रतिभूति की कीमत गणना एमएस एक्सेल "कीमत" ("झRIण्िं") का उपयोग करके की जाएगी (विवरण के लिए कृपया अनुबंध 4 देखें) यहां हम मूल्यांकन की तारीख 31 मार्च 2008 डालेंगे, परिपक्वता की तारीख 10 दिसंबर 2014 है, दर 7.32% है जो की कूपन दर है, प्रतिप्ल के रूप में 8.01% है और परिपक्वता के रूप में 100 जो की अंकित मूल्य है, कूपन भुगतान की फ्रीक्वेन्सी के रूप में 2 और आधार के रूप में 4 उपयोग करेंगे (कृपया अनुबंध 4 में दिया गया उदाहरण 3 देखें) met°e के द्वारा हमें 96.47 रूपये की कीमत प्राप्त होती है जो प्रतिभूति की कीमत है +यदि बैंक अपने पोर्टप्ाटलियों में 10 करोड रूपये की इस प्रकार की प्रतिभूति भारीत करता है तो कुल कीमत 10*(96.47/100)=9.647 करोड रूपये होगी +28.4. कार्पोरेट बाण्डों के मामले में, मूल्यांकन की प्रक्रिया उपर्युक्त बॉक्स 5 में दिए गए उदाहरण के समान ही है इसमें केवल केंद्रीय सरकार की प्रतिभूति पर आने वाले तदनुरूपी प्रतिप्ल में जोड़े जाने वाले स्प्रेड का भेद राज्य सरकार की प्रतिभूतियों के लिए निश्चित 25 आधार अंको के बजाय है जो समय-समय पर प्मिडा द्वारा प्रकाशित स्प्रेड से अधिक होगी प्मिडा विभिन्न प्रकार की रेटिंग वाले कार्पोरेट बाण्डों के लिए स्प्रेड पर सूचना देता रहता है बाण्ड का मूल्यांकन करते समय केंद्रीय सरकार की प्रतिभूति के तदनुरूपी प्रतिप्ल में उचित स्प्रेड जोड़ी जानी चाहिए और बाण्ड का मूल्यांकन मानक "कीमत" सूत्र का प्रयोग करते हुए करना चाहिए +उदाहरण के लिए, यह मानते हुए कि "एएए" रेटिंग के किसी कार्पोरेट बाण्ड की परिपक्वता उतनी ही है जितनी कि बॉक्स 5 में दिए गए राज्य सरकार के बाण्ड की, इस स्थिति में मूल्यांकन के लिए लागू प्रतिप्ल 7.73+2.09% (प्मिडा द्वारा दिया गया स्प्रेड) होगा जो 9.82% है बॉक्स 5 में दिए गए मानदंडों को ही लागू करते हुए बाण्ड की कीमत 87.92 रू. बैठती है +29. सरकारी प्रतिभूतियां धारण करने में क्या जोखिम हैं ? +इस प्रकार के जोखिमों को कम करने के क्या उपाय हैं ? +सामान्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों को जोखिम रहित लिखतें माना जाता है क्योंकि सरकार से अपने भुगतान में चूक अपेक्षित नहीं हैं तथापि, जैसा कि किसी भी वित्तीय लिखत के मामले में होता है वैसा ही जोखिम सरकारी प्रतिभूतियों के साथ भी होता है अतः इस प्रकार के जोखिमों की पहचान करना और उन्हें समझाना और उनको दूर करने के लिए उचित उपाय करना आवश्यक है सरकारी प्रतिभूतियों की धारिता के साथ निम्नलिखित प्रमुख जोखिम जुड़े होते हैं - +29.1. बाजार जोखिम - ब्याज दरों में परिवर्तन होने के कारण किसी निवेशक द्वारा धारित प्रतिभूतियों के मूल्यों में विपरीत परिचालन होने से बाजार जोखिम उत्पन्न होता है इसके परिणाम स्वरूप बाजार मूल्यों पर इसे बही में अंकित करने पर हानि उठानी पड़ेगी या प्रतिभूतियों को विपरीत मूल्या पर बेचने से धाटा उठाना पड़ सकता है कुछ हद तक छोटे निवेशक बाण्ड की परिपक्वता तक उसे धारण कर बाजार जोखिम को कम कर सकते हैं ताकि वे वह प्रतिप्ल प्राप्त कर सकें जिस पर उन्होनें प्रतिभूतियां वास्तव में खरीदी थी +29.2. पुनर्निवेश जोखिम - सरकारी प्रतिभूति के नकदी-प्रवाह में प्रत्येक छमाही में मीयादी कूपन और परिपक्वता पर मूलधन की वापसी शामिल होती है इन नकदी प्रवाहों को नकद प्राप्ति के पश्चात पुनर्निवेश करना होता है अतः यह जोखिम होता है ब्याज दर परिदृश्यों में बदलाव के कारण निवेशक इन प्राप्त राशियों को लाभकारी दरों पर पुनर्निवेश न कर पाए +29.3. चलनिधि जोखिम : चलनिधि जोखिम का आशय होता है कि जब निवेशक किसी प्रतिभूति के लिए खरीददार की अनुपलब्धता के कारण अपनी प्रतिभूति को बेच नहीं पाता है, अर्थात् उस विशेष प्रतिभूति में किसी भी प्रकार की खरीद बिक्री का न होना सामान्यतः, जब नियत परिपक्वता का अर्थसुलभ बांड खरीदा जाता है, तो समय के साथ इसके परिपक्वता की अवधि में कमी आती है उदाहरण के लिए, 10 वर्षीय एक प्रतिभूति 2 वर्षो के बाद 8 वर्ष क ा प्रतिभूति रह जाती है जिसके कारण उसे उस समय विशेष पर तरलता में कमी हो सकती है उस समय विशेष पर तरलता में कमी के कारण, निवेशक को निधियों की तत्काल आवश्यकता होने पर कम मूल्य पर प्रतिभूतियों बेचना पड़ सकता है हालांकि, ऐसे मामलों में, पात्र निवेशक बाजार रेपो में भाग ले सकता है और प्रतिभूतियों को संपार्श्विक के रूप में रखकर नकदी उधार ले सकता है +29.4. जोखिम कम करना : परिपक्वता तक प्रतिभूति को नहीं बेचना एक रणनीति हो सकती है जिसके द्वारा बाज़ार जोखिम से बचा जा सकता है जब प्रतिभूतियां अल्पावधि हो जाती हैं तो उन्हें बेच कर और दीर्धावधि की नई प्रतिभूतियां खरीद कर पोर्टफोलियो जोखिम को कम करने के लिए पोर्टफोलियो को पुनःप्रबंधित कर सकते हैं हालांकि पुनःप्रबंधन में लेन-देन से संबंधित तथा अन्य लागत शामिल होती हैं अतः विवेकपूर्ण ढंग से इसका प्रयोग किया जाना चाहिए बाज़ार जोखिम और पुनर्निवेश जोखिम को नकदी प्रवाहों के साथ देयताओं का मिलान कर परिसंपत्ति और देयता प्रबंधन (एएलएम) के माध्यम से कम किया जा सकता है एएलएम को नकदी प्रवाह के अंतराल का मिलान कर भी किया जा सकता है +उन्नत जोखिम प्रबंधन तकनीकों में ब्याज दर स्वॉप (आइआरएस) जैसे व्युत्पन्नियों का प्रयोग शामिल है जहाँ नकदी प्रवाह की प्रकृति में बदलाव किया जा सकता है हालांकि, ये जटिल साधन हैं जिसे समझाने के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की आवश्यकता पड़ती है अतः व्युत्पन्नी लेन-देन के वक्त पर्याप्त सावधानी बरतनी चाहिए और ऐसे लेन-देन इससे संबंधित जोखिमों और जटिलताओं की पूरी जानकारी के बाद ही किया जाना चाहिए +30.1. यद्यपि सरकारी प्रतिभूति बाज़ार सामान्यतः दीर्धावधि निवेश करनेवाले निवेशकों के लिए है, परन्तु मुद्रा बाज़ार अल्पावधि के लिए निवेश का विकल्प उपलब्ध करता है मुद्रा बाज़ार लेन-देन सामान्यतः सरकारी प्रतिभूति बाज़ार और अल्पावधि चलनिधि असंतुलन को ठीक करने सहित अन्य बाजारों में लेन-देनों के निधीयन के लिए प्रयुक्त होता है परिभाषा के अनुसार, मुद्रा बाज़ार अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए होता है एक वर्ष के भीतर अवधि के आधार पर मुद्रा बाज़ार को निम्नलिखित रूप से वर्गीकृत किया जा सकता है +(i) एक दिवसीय बाज़ार ः लेन-देन की अवधि एक कार्य-दिवस होता है +(ii) नोटिस मुद्रा बाज़ारः लेन-देन की अवधि 2 दिन से 14 दिन तक होती है +(iii) मीयादी मुद्रा बाज़ार - लेन-देन की अवधि 15 दिन से एक वर्ष तक होती है +विभिन्न मुद्रा बाज़ार लिखत कौन-कौन से हैं ? +30.2. मुद्रा बाज़ार लिखतों में, मांग-मुद्रा, रेपो, खजाना बिल, वाणिज्यिक पत्र, जमा-प्रमाणपत्र और संपार्श्विकृत उधार और ऋणदायी बाध्यत (सीबीएलओ) शामिल है +मांग-मुद्रा बाज़ार : +30.3. मांग-मुद्रा बाज़ार निधियों के असंपार्श्विकृत उधार देने और उधार लेने के लिए बाज़ार है यह बाज़ार मुख्यतः एक दिवसीय होता है ओर इसमें केवल अनुसूचित बैंक और प्राथमिक व्यापारी भाग लेते हैं +रेपो या तैयार वायदा संविदा : +30.4. रेपो, निधियों की प्राप्ति के लिए प्रतिभूतियों को इस करार के साथ बेचने के लिए एक प्रकार का लिखत है, जिसमें उक्त प्रतिभूतियों को आपस में सहमत तारीख और मूल्य पर पुनर्खरीद करनी पड़ती है जिसमें उधार ली गई निधियों पर ब्याज शामिल है +30.5. रेपो (पुनः खरीद) लेनदेन का विपरीत लेनदेन `रिवज़õ रेपो' (प्रति पुनर्खरीद) कहलाता है जिसमें प्रतिभूतियों की खरीदारी करके उधार दिया जाता है, जिसके लिए तय मूल्य पर पारस्परिक रूप से निर्धारित भावी तारीख को उक्त प्रतिभूतियों की पुनःबेचने का करार किया जाता है +30.6.उक्त परिभाषा से यह मालूम पड़ता है कि रेपो/रिवज़õ रेपो के एक ही लेनदेन में दो चरण होते हैं दोनों चरणों के बीच की अवधि को `रेपो अवधि' कही जाती है मोटे तौर पर रेपो को ओवर नाइट आधार पर अंजाम दिया जाता है अर्थात् एक दिवसीय आधार पर रेपो लेनदेनों का निपटान सरकारी प्रतिभूतियों में एकमुश्त सौदा के साथ किया जाता है +30.7. प्रतिभूति के विक्रेता द्वारा उधार ली गई राशि रेपो लेनदेनों के पहले चरण में प्रतिफल राशि होती है तयशुदा `रेपो दर' पर ब्याज का परिकलन किया जाता है तथा उधारकर्ता द्वारा प्रतिभूति वापस खरीदते समय उसे लेनदेन के दूसरे चरण की प्रतिफल राशि के साथ-साथ लौटाया जाता है रेपो लेनदेन की समग्र परिणति सरकारी प्रतिभूतियों के समर्थन में उधारस्वरूप प्राप्त निधि में होती है +30.8. मुद्रा बाज़ार को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित किया जाता है मुद्रा बाज़ार संबंधी उपर्युक्त लेनदेनों की रिपोर्ट इलक्ट्रॉनिक व्यवस्था, जिसे तयशुदा लेनदेन प्रणाली (एनडीएस) के नाम से जाना जाता है, के माध्यम से भेजनी चाहिए +संपाश्र्वीकृत उधार और ऋणदायी बाध्यता (सीबीएलओ) +30.9. सीबीएलओ ऐसी संस्थाओं के लाभार्थ भारतीय समाशोधन निगम लिमिटेड (सीसीआईएल) द्वारा संचालित एक अन्य मुद्रा बाज़ार की लिखत है जिनकी अंतर बैंक-मांग-मुद्रा-बाज़ार तक कोई पहुंच नहीं हो या जिनकी पहुंच मांग उधार लेने और देने से संबंधित लेनदेनों पर उच्चतम सीमा के चलते अवरूद्ध हुई हो सीबीएलओ इलक्ट्रॉनिक बही प्रविष्टि रूप में उपलब्ध एक बट्टागत लिखत है जिसकी परिपक्वता अवधि एक दिन से नब्बे दिनों (रिज़र्व बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुसार एक वर्ष तक) तक होती है बाज़ार के सहभागियों को निधि के उधार लेने और देने में सक्षम बनाने की दृष्टि से सीसीआईएल भारतीय वित्तीय नेटवर्क (आईएनएफआईएनईटी), जोकि सीमित उपयोगकर्ता समूह है, के माध्यम से रिज़र्व बैंक के पास चालू खाता रखने वाले तयशुदा लेनदेन प्रणाली (एनडीएस) के सदस्यों को तयशुदा प्रणाली उपलब्ध कराता है जबकि जिन सदस्यों का रिज़र्व बैंक के पास चालू खाता न हो उन्हें इंटरनेट के माध्यम से उक्त प्रणाली मुहैया कराता है +30.10. रिज़र्व बैंक-एनडीएस सदस्यों, यथा- राष्ट्रीयकृत बैंकों, निजी बैंकों, विदेशी बैंकों, सहकारी बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, बीमा कंपनियों, म्यूचुअल फंडों, प्राथमिक व्यापारियों आदि को सीबीएलओ खंड की सदस्यता उपलब्ध कराई जाती है जो संस्थाएं रिज़र्व बैंक-एनडीएस की सदस्य नहीं हैं, यथा- सहकारी बैंक, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियां, एनबीएफसी, कार्पोरेट, भविष्य/पेंशन निधि आदि, उन्हें सीबीएलओ खंड की सह-सदस्यता उपलब्ध कराई जाती है +30.11. सीसीआईएल सदस्य सीबीएलओ बाज़ार में शामिल होकर पात्र प्रतिभूतियों की संपार्श्विकता पर निधि उधारस्वरूप ले सकते हैं या दे सकते हैं पात्र प्रतिभूतियों के अंतर्गत खज़ाना बिल सहित केंद्र सरकारी प्रतिभूतियां तथा समय-समय पर सीसीआईएल द्वारा विनिर्दिष्ट अन्य प्रतिभूतियां शामिल हैं सीबीएलओ में उधारकर्ताओं को सीसीआईएल के पास पात्र प्रतिभूतियों की अपेक्षित राशि जमा करनी होती है जिसके आधार पर सीसीआईएल उधार की सीमा का निर्धारण करता है सीसीआईएल सदस्यों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले उधार देने व लेने के आदेशों का मिलान करता है और उन्हें अधिसूचित करता है संपार्श्विक रूप से धारित प्रतिभूतियों को सीसीआईएल की अभिरक्षा में रखा जाता है तथा प्रतिभूतियों पर उधार देने वाले के लाभकारी हित की मान्यता समुचित प्रलेखन के माध्यम से दी जाती है +वाणिज्यिक पत्र (सीपी) +30.12. वाणिज्यिक पत्र (सीपी) एक प्रतिभूति-रहित मुद्रा बाज़ार की लिखत है जिसे प्रामिसरी नोट के रूप में जारी किया जाता है भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित अंब्रेला सीमा के अंतर्गत अल्पावधिक संसाधनों को जुटाने हेतु अनुमति प्राप्त कार्पोरेट, प्राथमिक व्यापार (पीडी) तथा अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाएं (एफआई) वाणिज्यिक पत्र जारी करने की पात्रता रखती हैं वाणिज्यिक पत्रों को उसकी निर्गम-तारीख से न्यूनतम 7 दिनों से अधिकतम एक वर्ष तक की अवधि के लिए जारी किया जा सकता है +जमा प्रमाण-पत्र +30.13. जमा प्रमाण-पत्र (सीडी) एक परक्राम्य मुद्रा बाज़ार की लिखत है जिसे किसी बैंक में या अन्य पात्र वित्तीय संस्था में जमा की गई निधियों के लिए इलेक्ट्रानिक रूप में या मीयादी वचन-पत्र के रूप में निश्चित अवधि के लिए जारी किया जाता है बैंक 7 दिनों से एक वर्ष की परिपक्वता अवधि के लिए जमा प्रमाण-पत्र जारी कर सकते हैं, जबकि पात्र वित्तीय संस्थाएं 1 वर्ष से 3 वर्ष की परिपक्वता अवधि के लिए इसे जारी कर सकती हैं +31. प्मिडा की क्या भूमिका और कार्य-पद्धति है ? +31.1. द फिक्स्ड इन्कम मनी मार्किट एंड डेरिवेटिव्ज़ असोसिएशन ऑफ इंडिया (प्मिडा), जोकि अधिसूचित वाणिज्य बैंकों, सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं, प्राथमिक व्यापारियों और बीमा कंपनियों का एक संध है, को 3 जून 1998 को कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत एक कंपनी के रूप में निगमित किया गया प्मिडा बांड, मुद्रा और डेरिवेटिव बाज़ारों का एक स्वैच्छिक बाज़ार निकाय है प्मिडा के ऐसे सदस्य हैं, जो बाज़ार के समूचे प्रमुख संस्थागत खंडों का प्रतिनिधित्व करते हैं इसकी सदस्यता के अंतर्गत राष्ट्रीयकृत बैंक जैसे भारतीय स्टेट बैंक, उसके सहयोगी बैंक और अन्य राष्ट्रीयकृत बैंक; निजी क्षेत्र के बैंक जैसे आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक, आईडीबीआई बैंक; विदेशी बैंक जैसे बैंक ऑफ अमेरिका, एबीएन एम्रो, सिटी बैंक; वित्तीय संस्थाएं जैसे आईडीएफसी, एक्जि़म बैंक, नाबार्ड; बीमा कंपनियां जैसे भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी), आईसीआईसीआई प्रूडेन्शियल लाइफ इन्श्यूरेंस कंपनी, बिड़ला सन लाइफ इन्श्यूरेंस कंपनी और अन्य सभी प्राथमिक व्यापारी शामिल हैं +31.2. प्मिडा बाज़ार के सहभागियों का प्रतिनिधित्व करता है तथा बांड, मुद्रा और डेरिवेटिव बाज़ारों के विकासार्थ सहायता प्रदान करता है यह इन बाज़ारों के कार्य-संचालन को प्रभावित करने वाले विभिन्न मुद्दों के संबंध में विनियामकों के साथ विचारों का आदान-प्रदान कराके एक सेतु का कार्य करता है विकास की दिशा में भी यह कई कार्य करता है, जैसे बेंचमार्क दरों और नई डेरिवेटिव लिखतों आदि की पहल करना प्मिडा मूल्यांकन की दृष्टि से बाज़ार के सहभागियों द्वारा प्रयुक्त विभिन्न सरकारी प्रतिभूतियों की दरें जारी करता है प्मिडा अपने सदस्यों के लिए सर्वोत्तम बाज़ार प्रथा के विकास में भी एक सकारात्मक भूमिका अदा करता है ताकि बाज़ार का संचालन पूर्णतः पारदर्शी रूप से हो, साथ ही साथ प्रभावशाली हो +32.1. भारतीय रिज़र्व बैंक वित्तीय बाज़ार निगरानी - प्ूूज्://ैैै.ींi.दीु.iह/एम्ीiज्ूे/ िiहaहम्iaत्स्aीवूेैaूम्प्.aेज्x +इस साइट में एनडीएस (ओटीसी बाज़ार) में सरकारी प्रतिभूतियों के मूल्य, एनडीएस-ओएम, मुद्रा बाज़ार संबंधी कई लिंक और सरकारी प्रतिभूतियों से संबंधित अन्य जानकारी जैसे अशोधित स्टाक आदि, उपलब्ध कराई गई है +5 +32.2. एनडीएस-ओएम बाज़ार निगरानी http://www.ccilindia.com/OMHome.aspx +इस साइट में सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-फरोख्त का मूल्य और साथ ही निर्दिष्ट मूल्य के संबंध में तात्कालिक जानकारी उपलब्ध कराई जाती है इसके अलावा, यदा जारी (डब्ल्यूआई) (जब भी सौदा होता हो) वाला खंड भी मुहैया कराया जाता है +6 +32.3. एनडीएस बाज़ार निगरानी - http://www.rbi.org.in/Scripts/NdsUserXsl.aspx +इस साइट में ओटीसी बाज़ार में सरकारी प्रतिभूतियों के मूल्यों संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जाती है इसमें निश्चित तारीखों के बीच की अवधि में विशिष्टि प्रतिभूतियों के मूल्यों की खोज करने की भी सुविधा है +8 +32.4. प्मिडा - http://www.fimmda.org/ +इस साइट में सरकारी प्रतिभूतियों सहित सभी नियत आय वाली प्रतिभूतियों संबंधी बाज़ार प्रथा की ढेर सारी जानकारी मुहैया कराई जाती है इस साइट में प्मिडा द्वारा अंगीकृत विभिन्न मूल्य-निर्धारण मॉडलों के ब्योरे दिए जाते हैं साथ ही, इस साइट के माध्यम से प्मिडा सरकारी प्रतिभूतियों, कार्पोरेट बांड स्प्रेडों आद के दैनिक, मासिक और वार्षिक के बंद भाव के ब्योरे मुहैया कराता है इस साइट में प्रवेश करके जानकारी प्राप्त करने के लिए वैध लॉग-इन और पासवर्ड ज़रूरी है, जिन्हें प्मिडा पात्र संस्थाओं को उपलब्ध कराता है + +गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC): +परिभाषा. +गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी उस कंपनी को कहते हैं जो ए) कंपनी अधिनियम, 1956 के अंतर्गत पंजीकृत हो, बी) इसका मुख्य कारोबार उधार देना, विभिन्न प्रकार के शेयरों/स्टॉक/ बांड्स/ डिबेंचरों/प्रतिभूतियों, पट्टा कारोबार, किराया-खरीद(हायर-पर्चेज), बीमा कारोबार, चिट संबंधी कारोबार में निवेश करना, तथा सी) इसका मुख्य कारोबार किसी योजना अथवा व्यवस्था के अंतर्गत एकमुश्त रूप से अथवा किस्तों में जमाराशियां प्राप्त करना है। किंतु, किसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी में ऐसी कोई संस्था शामिल नहीं है जिसका मुख्य कारोबार कृषि, औद्योगिक, व्यापार संबंधी गतिविधियां हैं अथवा अचल संपत्ति का विक्रय/क्रय/निर्माण करना है। ड भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45 आइ(सी) ] एक महत्वपूर्ण पहलू जो ध्यान में रखा जाना है, यह है कि धारा 45 आइ(सी) में किए गए उल्लेख के अनुसार ऋण/अग्रिमों से संबंधित गतिविधियां स्वयं की गतिविधि से इतर की गतिविधियां हों। यदि यह प्रावधान न होता तो समस्त कंपनियां गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां होतीं। +जिन गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की परिसंपत्तियों का आकार पिछले लेखापरीक्षा किए गए तुलनपत्र के अनुसार 100 करोड़ रुपए या उससे अधिक हो उन्हें प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां माना जाता है। इस प्रकार से वर्गीकरण किए जाने के लिए तर्क यह है कि इन गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की गतिविधियों का हमारे देश की वित्तीय स्थिरता पर प्रभाव पड़ेगा। +भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित संस्थाएं. +नहीं। कुछेक वित्तीय कारोबार के लिए विशेष विनियामक हैं जिनकी स्थापना क़ानून द्वारा, उन्हें विनियमित एवं उनका पर्यवेक्षण करने के लिए की गई है, जैसे- बीमा कपनियों के लिए इरडा(आइआरडीए), मर्चेंट बैंकिंग कंपनी, वेंचर कैपिटल कंपनी,स्टॉक ब्रोकिंग कंपनी तथा म्युचुअल फंडों के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड(सेबी), आवास वित्त कपंनियों के लिए राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी) निधि कंपनियों के लिए कंपनी कार्य विभाग(डीसीए) और चिट फंड कंपनियों के लिए राज्य सरकारें। ऐसी कंपनियां जो वित्तीय कारोबार करती हैं किंतु उनका विनियमन अन्य विनियामकों द्वारा किया जाता है, उन्हें रिज़र्व बैंक ने कई प्रकार की विनियामक अपेक्षाओं से विशेष छूट प्रदान की है जैसे – पंजीकरण, चलनिधि परिसंपत्तियां बनाए रखना, सांविधिक आरक्षित निधि आदि। नीचे दिए गए चार्ट में गतिविधियों के स्वरूप एवं संबंधित विनियामकों की जानकारी दी गई है। +भारतीय रिज़र्व बैंक ऐसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का विनियमन एवं पर्यवेक्षण करता है जो (i) उधार देने, (ii) शेयरों, स्टाक, बांडों को प्राप्त करने आदि, अथवा (iii) वित्तीय रूप से पट्टा कार्य या किराया खरीद करने का कारोबार कर रही हैं। रिज़र्व बैंक उन कंपनियों के विनियमन का कार्य भी करता है जिनका मुख्य कार्य जमाराशियां लेना है (भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45 आई(सी). +भारतीय रिज़र्व बैंक को भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत ऐसी कंपनियों के बारे में जो मुख्य कारोबार के 50-50 मानदंडों को पूरा करती हैं, को पंजीकृत करने, नीति-निर्धारण करने, निर्देश देने, निरीक्षण करने, विनियमित करने, पर्यवेक्षण करने तथा उन पर निगरानी रखने की शक्तियां प्रदान की गई हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को रिज़र्व बैंक अधिनियम के प्रावधानों, एवं अधिनियम के अंतर्गत जारी निदेशों अथवा आदेशों का उल्लंघन करने पर दंडित कर सकता है। दंड के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी को जारी पंजीकरण प्रमाणपत्र निरस्त कर सकता है, उसे जमाराशियां लेने से मना कर सकता है तथा उनकी आस्तियों के स्वत्वाधिकार का अंतरण कर सकता है अथवा उसे बंद करने के लिए याचिका दायर कर सकता है। +Mr. ONKAR PRASAD +संस्थाएं जिनका विनियमन भारतीय रिज़र्व बैंक नहीं करता है. +इन कंपनियों को भारतीय रिज़र्व बैंक के पास पंजीकृत करने एवं उसके द्वारा विनियमित किए जाने से छूट प्रदान की गई है ताकि उनका दुहरा विनियमन न हो क्योंकि उनका विनियमन वित्तीय क्षेत्र के अन्य विनियामकों द्वारा किया जाता है। +यह इस बात पर निर्भर करता है कि छूट कितनी दी गई है। उदाहरण के लिए आवास वित्त कंपनियों को भारतीय रिज़र्व बैंक के विनियमन से छूट प्राप्त है। अन्य संस्थाएं जैसे- चिट फंड, निधि कंपनियां, म्युचुअल लाभ कंपनियां, बीमा कंपनियां, मर्चेंट बैंकिंग कंपनियां, स्टाक ब्रोकिंग कंपनियां आदि को पंजीकरण, चलनिधि आस्तियों एवं सांविधिक आरक्षित चलनिधि की अपेक्षाओं से छूट प्रदान की गई है। भारतीय रिज़र्व बैंक कोई निर्देश इसलिए नहीं जारी करता है ताकि अन्य वित्तीय विनियामकों द्वारा जारी निर्देशों के साथ उनका कोई संघर्ष न हो, अन्य वित्तीय विनियामक इस प्रकार हैं जैसे - आवास वित्त कंपनियों का विनियमन राष्ट्रीय आवास बैंक द्वारा, बीमा कंपनियों का इरडा द्वारा, स्टाक ब्रोर्किंग, मर्चेंट बैंकिंग कंपनियों, वेंचर कैपिटल कंपनियों तथा सामूहिक निवेश योजना चलाने वाली कंपनियों एवं म्युचुअल फंडों का विनियमन सेबी द्वारा, निधि कंपनियों का विनियमन कंपनी कार्य मंत्रालय द्वारा और चिट फंड कंपनियां संबंधित राज्य सरकारों के विनियामक दायरे के अंतर्गत आती हैं। +रिज़र्व बैंक उन कंपनियों का विनियमन व पर्यवेक्षण करता है जो अपने मुख्य व्यवसाय के रूप में वित्तीय गतिविधियों से जुड़ी हैं। अत: वैसी कंपनियाँ जो प्रमुख व्यवसाय के रूप में कृषि प्रचालन, औद्योगिक गतिविधि, माल की खरीद और बिक्री, सेवाएँ प्रदान करने या अचल सम्पत्तियों की बिक्री या निर्माण से जुड़ी हैं और छोटे स्तर पर कोई वित्तीय व्यवसाय कर रही हैं तो वे रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित नहीं की जाएंगी। +वह कंपनी जिसके पास उसकी कुल आस्तियों के 50% से अधिक की वित्तीय आस्तियां नहीं हैं और इन आस्तियों से होने वाली आमदनी कुल आमदनी के 50% से कम है, तो उसे एनबीएफसी नहीं कहा जाएगा। इसका प्रमुख व्यवसाय गैर –वित्तीय गतिविधि जैसे कृषि प्रचालन, औद्योगिक गतिविधि, माल की खरीद और बिक्री, या अचल सम्पत्तियों की बिक्री /निर्माण होगा और इन्हें गैर-बैंकिंग गैर –वित्तीय कंपनी माना जाएगा। एक गैर-बैंकिंग गैर वित्तीय कंपनी द्वारा जमा राशियाँ ग्रहण करना ’ कंपनी जमाराशियाँ स्वीकृति नियम, 1975’ द्वारा शासित है। राज्य सरकारों में कंपनियों के रजिस्ट्रार इन योजनाओं का प्रबंधन करते है। +प्रमुख व्यवसाय के मानदंड ( पी बी सी). +वित्तीय गतिविधि को ‘प्रमुख व्यवसाय’ का दर्जा तभी मिलेगा, जब कंपनी की वित्तीय आस्तियां कुल आस्तियों की 50 प्रतिशत से अधिक हों और वित्तीय आस्तियों से होने वाली आय कुल आय के 50 प्रतिशत से अधिक हो। वह कंपनी जो ये दोनों मानदंड पूरा करती है, भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा एनबीएफसी के रूप में पंजीकृत की जाएगी। 'प्रमुख व्यवसाय' शब्द को भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम द्वारा परिभाषित नहीं किया गया है। रिज़र्व बैंक ने इसे इसलिए स्पष्ट किया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल उन्हीं कंपनियों का उसके पास पंजीकरण, विनियमन और पर्यवेक्षण हो जो मुख्य रूप से वित्तीय गतिविधि से जुड़ी हैं और दूसरी ट्रेडिंग, मैन्यूफैक्चरिंग या इंड्स्ट्रियल कंपनीज् उसके विनियमन अधिकारक्षेत्र के दायरे में न लाई जाएं। दिलचस्प बात यह है कि, इस परीक्षण को आमतौर पर 50-50 परीक्षण के रूप में जाना जाता है और इसका प्रयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कंपनी वित्तीय व्यवसाय में है या नहीं। +अवशिष्ट गैर-बैंकिंग कंपनियाँ (आरएनबीसी). +अवशिष्ट गैर-बैंकिंग कंपनी एनबीएफसी की एक श्रेणी है जिसका 'प्रमुख व्यवसाय ' किसी भी योजना, व्यवस्था या किसी अन्य तरीके से जमा राशियाँ प्राप्त करना है। ये कंपनियाँ निवेश , आस्ति वित्तपोषण या ऋण देने का कार्य नहीं करती। जमाराशियों के संग्रहण की पद्धति और जमाकर्ताओं की निधियों के विनियोजन के मामले में इन कंपनियों की कार्य प्रणाली एनबीएफसी से भिन्न है। इन कंपनियों को , हालांकि रिज़र्व बैंक द्वारा अब निर्देश दिया गया है कि कोई जमाराशि स्वीकार न करें और आरएनबीसी के रूप में अपना व्यवसाय बंद कर दें। +यह सच है कि आरएनबीसी द्वारा जमाराशियाँ जुटाने की कोई उच्चतम सीमा नहीं है। फिर भी, प्रत्येक आरएनबीसी को यह सुनिश्चित करना है कि उसके पास जमा की गई राशियों का निवेश पूरी तरह से अनुमोदित निवेशों में किया जाए। दूसरे शब्दों में , जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए, ऐसी कंपनियों से यह अपेक्षित है कि वे अपनी जमा देयता का 100 प्रतिशत अत्यधिक तरल और सुरक्षित लिखतों उदाहरणार्थ केंद्रीय /राज्य सरकार की प्रतिभूतियों, अनुसूचित वाणिज्यक बैंकों(एण्ँ) की सावधि जमाओं, अनुसूचित वाणिज्यक बैंकों / वित्तीय संस्थानों के जमा प्रमाणपत्रों, म्युचुअल फण्ड्स की यूनिटों इत्यादि में निवेश करें। +नहीं, अवशिष्ट गैर-बैंकिंग कंपनी जमाकर्ताओं द्वारा जमा की गई कोई राशि या कोई ब्याज, प्रीमियम, बोनस या उस पर अर्जित किसी भी लाभ को ज़ब्त नहीं कर सकती। +एक आरएनबीसी को एकमुश्त में या मासिक अथवा लंबे अंतरालों पर जमा की गई जमाराशियों पर न्यूनतम 5% ब्याज(वार्षिक रूप से चक्रवृद्धि) का भुगतान करना चाहिए; तथा दैनिक जमा योजना के अंतर्गत जमा की गई राशियों पर न्यूनतम 3.5% ब्याज का भुगतान करना चाहिए। ब्याज में प्रीमियम, बोनस या अन्य कोई लाभ शामिल है, जोकि आरएनबीसी जमाकर्ताओं को रिटर्न के रूप में चुकाने का वादा करती है। आरएनबीसी ऐसी जमाराशियों की प्राप्ति की तिथि कम से कम 12 महीनों तथा अधिकतम 84 महीनों की अवधि हेतु जमाराशियाँ स्वीकार कर सकती हैं। वे मांग पर चुकौती योग्य जमाराशियां स्वीकार नहीं कर सकतीं। हालांकि, वर्तमान में, मौजूदा दो आरएनबीसी (पियरलेस तथा सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन लि.) को रिज़र्व बैंक द्वारा यह निर्देश दिया गया है कि वे जमाराशियां लेना बंद कर दें, जमाकर्ताओं को जमाराशियों की चुकौती करें और अपने आरएनबीसी व्यवसाय को समाप्त करें क्योंकि उनका व्यवसाय मॉडल स्वाभाविक रूप से अव्यवहार्य है। +इ. जमाराशियों की परिभाषा, जमाराशियां स्वीकार करने योग्य /अयोग्य संस्थाएं और उनसे संबंधित मामले +किसी भी तरह से जमा किया गया पैसा जमा राशि होता है सिवाय शेयर पूंजी, भागीदारी कंपनी के शेयरों के लिए भागीदार से लिया गया अंशदान, प्रतिभूति जमा, बयाना जमा, माल की खरीद, सेवाएं या निर्माण हेतु अग्रिम, बैंको, वित्तीय संस्थाओ और साहूकारों से लिया गया ऋण, चिट फंडो के लिए दिया अभिदान। उपर्युक्त तरीकों को छोड़कर किसी तरह से जमा किए गए पैसे को जमाराशि कह सकते है। +सहकारी बैंकों सहित सभी बैंक जमाराशियां स्वीकार कर सकते हैं। गैर- बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ, जिन्हें रिज़र्व बैंक द्वारा जमाराशियाँ स्वीकार करने के विशिष्ट लाइसेंस के साथ पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी किया गया है, जनता से जमाराशियाँ स्वीकार करने के लिए पात्र हैं। दूसरे शब्दों में, रिज़र्व बैंक के पास पंजीकृत सभी एनबीएफसीज़् जमाराशियाँ स्वीकार करने के लिए पात्र नहीं है, केवल वही एनबीएफसीज़् जमाराशियाँ स्वीकार करने के लिए पात्र हैं जिनके पास जमाराशि ग्रहण करने का पंजीकरण प्रमाणपत्र है। साथ ही, ये केवल अनुमत सीमा तक ही जमाराशियाँ स्वीकार कर सकती हैं। आवास वित्त कंपनियां जिन्हें जमाराशियां जुटाने हेतु दुबारा विशेष रूप से अधिकृत किया गया है और वे कंपनियाँ जिन्हें कारपोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा केंद्र सरकार द्वारा कंपनी अधिनियम के अधीन बनाए गए ‘कंपनी जमा ग्रहण नियम’ के तहत जमाराशियाँ स्वीकार करने हेतु अधिकृत किया गया है, भी एक निश्चित सीमा तक जमाराशियाँ स्वीकार कर सकती हैं। सहकारी साख समितियाँ अपने सदस्यों से जमाराशियां स्वीकार कर सकती है किंतु आम जनता से नहीं। भारतीय रिजर्व बैंक केवल बैंको, सहकारी बैंको और एनबीएफसी द्वारा स्वीकार की गई जमाराशियों को विनियमित करता है। +अन्य संस्थाओं को सार्वजनिक जमाराशियां स्वीकार करने की वैधानिक अनुमति नहीं है। अनिगमित निकायों यथा व्यक्ति, भागीदारी कंपनियाँ और व्यक्तियों के अन्य समूहों को उनके प्रमुख व्यवसाय के रूप में जनता से जमाराशियां स्वीकार करने की मनाही है। ऐसे अनिगमित निकाय अगर वित्तीय व्यवसाय चलाते भी हों तो भी उन्हें जमाराशियां स्वीकार करने की अनुमति नहीं है। +नहीं। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि रिज़र्व बैंक के पास पंजीकृत होने मात्र से किसी एनबीएफसी को जमाराशियाँ स्वीकार करने की स्वत: अनुमति नहीं मिल जाती। भारतीय रिजर्व बैंक एनबीएफसी को जमाराशियां स्वीकार करने के लिए विशेष रूप से प्राधिकृत करता है। यह अनुमति पंजीकृत एनबीएफसी के तीन वर्षों के कार्यनिष्पादन की जाँच के पश्चात दी जाती है। एनबीएफसी को जनता से जमाराशियाँ स्वीकार करने की अनुमति है इसका पंजीकरण प्रमाणपत्र में विशेष रूप से उल्लेख किया जाता है। वस्तुत:, एक लोक नीति के तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक ने निर्णय लिया है कि केवल बैंको को ही जनता से जमाराशियां स्वीकार करने के लिए प्राधिकृत किया जाए और तदनुसार 1997 से किसी भी नई एनबीएफसी को जनता से जमाराशियाँ स्वीकार करने हेतु पंजीकरण प्रमाणपत्र (सीओआर) जारी नहीं किया है। +भारतीय रिजर्व बैंक किसी भी वित्तीय संस्था के पर्यवेक्षण में जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा को अत्यंत महत्व देता है। कोई निवेशक किसी कंपनी में निवेश इस आशय के साथ करता है कि वह प्रवर्तकों के साथ जोखिम और लाभ को शेयर करेगा जबकि एक जमाकर्ता किसी भी संस्था में अपनी जमाराशि केवल विश्वास के आधार पर जमा करता है। अतएव, वित्तीय विनियम में जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। बैंक अत्यधिक विनियमित वित्तीय संस्थाए होती हैं। बैंको के विफल होने की स्थिति में निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम जमाराशियों पर एक लाख रूपये तक की बीमा राशि का भुगतान करता है। +भारतीय रिजर्व बैंक अपनी वेब साइट ैैै.ींi.दीु.iह → साइट मैप → एनबीएफसी की सूची → जमा राशियां स्वीकार करने के लिए प्रधिकृत एनबीएफसी, पर उन एनबीएफसीज़् के नामों की सूची प्रकाशित करता है जिनके पास जमाराशियां स्वीकार करने का वैध पंजीकरण प्रमाणपत्र है। कभी- कभी कुछ कंपनियों को अस्थायी तौर पर जनता से जमाराशियाँ स्वीकार करने हेतु प्रतिबंधित कर दिया जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जमाराशियाँ स्वीकार करने हेतु अस्थायी तौर पर प्रतिबन्धित की गई ऐसी एनबीएफसीज़् की सूची अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित की जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक इन दोनों सूचियों को अद्यतन रखता है। आम जनता को सूचित किया जाता है कि वे एनबीएफसीज़् के पास जमाराशियां रखने के पहले वे इन सूचियों की जांच कर लें। +नहीं। को-ऑप. क्रेडिट सोसायटी जनता से जमाराशियां स्वीकार नहीं कर सकती। वह अपने उप नियमों के तहत निर्धारित सीमा तक ही अपने सदस्यों से जमाराशियां स्वीकार कर सकती हैं। +नहीं। इन समितियों का गठन वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए होता है और वे केवल अपने सदस्यों से ही जमाराशियां स्वीकार कर सकती है, न कि जनता। +भारतीय रिजर्व बैंक को मुख्यत: जनता से प्राप्त शिकायतों, उद्योग जगत से प्राप्त खबरों और कंपनियों के सांविधिक लेखा परीक्षकों की अपवाद रिपोर्टों से यह पता चलता है कि कोई एनबीएफसी उसके प्राधिकार के बगैर अनधिकृत रूप से जमाराशियां स्वीकार कर रही है अथवा उधार या निवेश की गतिविधियों में लिप्त है। भारतीय रिजर्व बैंक को समाचार पत्रों से प्राप्त मार्केट इंटेलीजेंस या अपने क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा एकत्रित सूचना अथवा अन्य स्रोतों के जरिए इसकी जानकारी मिलती है। +इसके अतिरिक्त, भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपने सभी क्षेत्रीय कार्यालयों में वित्तीय क्षेत्रों के विनियामकों के मध्य समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से राज्य स्तरीय समन्वय समिति(एसएलसीसी) के रूप में एक संस्थागत पद्धति विकसित की है। राज्य स्तरीय समन्वय समिति के सदस्यों में राज्य सरकार के गृह और विधि विभागों के अधिकारी, कंपनी रजिस्ट्रार, कंपनी कार्य मंत्रालय के क्षेत्रीय निदेशालय के अधिकारी, राष्ट्रीय आवास बैंक, सेबी, रजिस्ट्रार ऑफ चिटस् और आईसीएआई के अधिकारी शामिल होते हैं। वित्तीय संस्थाओं की ऐसी अनधिकृत गतिविधियों की जानकारी साझा करने के लिए एसएलसीसी की बैठक प्रत्येक छ्ह माह में होती है। +नहीं। प्रोप्राइटरशिप/भागीदारी कंपनियाँ अनिगमित निकाय हैं। अतएव उन्हें भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत जनता से जमाराशियां स्वीकार करने से प्रतिबंधित किया है। +यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या पैसा भविष्य में आभूषणों की आपूर्ति के लिए बतौर अग्रिम लिया जा रहा है या पैसा ब्याज के साथ वापस करने के वादे के साथ लिया गया है। ज्वैलरी शॉप द्वारा करार की अवधि के अंत में आभूषणों की आपूर्ति के लिए किस्तों में पैसा लेना जमाराशि लेना नहीं है। उसे जमाराशियां तभी माना जायेगा यदि ज्वैलरी शॉप द्वारा प्राप्त पैसे की वापसी के समय मूलधन के साथ-साथ ब्याज देने का वादा भी किया गया हो। +ऐसे अनिगमित निकाय, यदि जनता से जमाराशियां लेते हुए पाए जाते है तो उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा एनबीएफसी के किसी भी अनिगमित निकाय से संबद्ध होने को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। यदि एनबीएफसी भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम का उल्लंघन करते हुए जमाराशियां स्वीकार करने वाली किसी प्रोप्राइटरशिप / भागीदारी फर्म से जुड़ाव रखती है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कानून या जमाकर्ता हित संरक्षण (वित्तीय संस्थाओं में) अधिनियम, यदि राज्य सरकार द्वारा पारित हो, के तहत अभियोग चलाया जा सकता है। +यदि ऐसी कंपनियाँ जिन्हें एनबीएफसी के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक के पास पंजीकृत होना अनिवार्य है, पंजीकरण प्रमाणपत्र लिए बगैर प्रमुख व्यवसाय के तौर पर गैर बैंकिंग वित्तीय गतिविधियां (जैसे उधार देना, निवेश करना या जमाराशियाँ स्वीकार करना) करती पाई जाती हैं तो भारतीय रिजर्व बैंक उन पर दंड या जुर्माना लगा सकता है या न्यायाधिकरण में उन पर अभियोग चला सकता है। यदि जनता को ऐसी किसी संस्था के बारे में पता चलता है जो गैर बैंकिंग वित्तीय गतिविधियां चला रही है किंतु भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर प्रदर्शित प्राधिकृत एनबीएफसी की सूची में शामिल नहीं है तो इस बारे में रिज़र्व बैंक के निकटतम क्षेत्रीय कार्यालय को सूचित किया जाना चाहिए ताकि भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए उनके विरुद्ध समुचित कार्रवाई की जा सके। +भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय संस्थाओं (एनबीएफसी- माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशन को छोड़कर) द्वारा उधारकर्ताओं से वसूल की जाने वाली ब्याजदर को नियंत्रण-मुक्त कर दिया है। कंपनी द्वारा प्रभारित ब्याज दर उधारकर्ता और एनबीएफसी के बीच हुए ऋण- करार की शर्तों से विनियमित (गवर्न) होती है। तथापि एनबीएफसी को पारदर्शी होना चाहिए और ब्याज दर एवं विभिन्न श्रेणियों के उधारकर्ताओं हेतु ब्याजदर तय करने के तरीके का उल्लेख उधारकर्ता अथवा ग्राहक के ऋण आवेदन पत्र में दर्शाया जाना चाहिए और ऋण मंजूरी पत्र आदि में इसके बारे में स्पष्ट रुप से इसे अवगत कराया जाना चाहिए। +भारतीय रिज़र्व बैंक से विनियमित होने का झूठा/गलत दावा कर किसी वित्तीय संस्था या अनिगमित निकाय द्वारा जनता को गुमराह करके जमाराशि स्वीकार करना गैर कानूनी है तथा भारतीय दण्ड संहिता के तहत उन पर दण्डात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इस संबंध में सूचना भारतीय रिज़र्व बैंक के निकटतम कार्यालय तथा पुलिस को दी जा सकती है। +भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 1934 के तहत जमाराशियों को ‘धन स्वीकार करने’ के रूप में परिभाषित किया गया है बशर्ते यह शेयर कैपिटल के रूप में जुटाया गया धन, बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त राशि, प्रतिभूति जमा के रूप में प्राप्त राशि, बयाना राशि, वस्तु तथा सेवाओं के सापेक्ष अग्रिम और चिट्स का अभिदान नहीं हो। अन्य सभी राशियां जो चाहे ऋण के रूप में अथवा किसी अन्य रूप में प्राप्त की गई हों उन्हें जमाराशि माना जाएगा। चिट फंड गतिविधि में सदस्यों द्वारा किस्तों में चिट में अंशदान किया जाता है और बारी-बारी से चिट के प्रत्येक सदस्य को चिट की राशि प्राप्त होती है। चिट्स में किए गए अंशदान को विशिष्ट रूप से जमा राशि की परिभाषा से बाहर रखा गया है और इसे जमाराशि नहीं माना जा सकता। हालांकि चिट फंड्स उपर्युक्त अभिदान संग्रहीत कर सकते हैं किंतु अगस्त 2009 से भारतीय रिज़र्व बैंक ने जमाराशियाँ स्वीकार करने से प्रतिबंधित कर दिया है। +जमाराशि ग्रहण न करने वाली एनबीएफसीज़् जो वैध पंजीकरण प्रमाण पत्र धारित करती हैं तथा जिन्हें ऋण देने और निवेश करने की अनुमति है, की सूची, भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट ैैै.ींi.दीु.iह → साइट मैप→ एनबीएफसी सूची → जनता की जमाराशियाँ ग्रहण न करने वाली एनबीएफसीज़् की सूची, पर उपलब्ध है। +जमाकर्ता संरक्षण संबंधी मामले. +जो जमाकर्ता एनबीएफसी में पैसा जमा करना चाहते हैं उन्हें पैसा जमा करने के पहले निम्नलिखित की जाँच कर लेनी चाहिए: +अधिक ब्याजदर की पेशकश वाली योजनाओं में निवेश करने के पहले निवेशक यह जाँच लें कि ऐसे रिटर्न की पेशकश करने वाली कंपनी वित्तीय क्षेत्र के किसी नियामक के पास पंजीकृत हो और जमाराशि या अन्य रूप में धन स्वीकार करने के लिए अधिकृत हो। यदि निवेश पर पेश की जाने वाली ब्याजदर/रिटर्न की दर अधिक हो तो निवेशकों को प्राय: इस मामले में चौकस हो जाना चाहिए। जब तक धन ग्रहण करने वाली कंपनी वादा किए गए रिटर्न से अधिक कमा पाने में सक्षम नहीं होगी, वह निवेशक को वादा किया गया रिटर्न नहीं दे सकेगी। अधिक रिटर्न पाने के लिए कंपनी को अपने निवेश पर अधिक जोखिम उठाना होगा। यदि जोखिम अधिक होगा तो निवेश पर प्रत्याशित रिटर्न अटकलों पर आधारित होगा और ऐसे में कंपनी के लिए वादा किया गया रिटर्न चुका पाना संभव नहीं होगा। अतएव, जनता पहले से ही सतर्क रहे कि अधिक ब्याजदर की पेशकश वाली योजनाओं में पैसा डूबने की संभावना अधिक होती है। +नहीं। रिज़र्व बैंक एनबीएफसी द्वारा स्वीकार की गई जमाराशियों की अदायगी की गारंटी नहीं देता, भले ही एनबीएफसी को जमाराशियाँ ग्रहण करने की अनुमति दी गई हो। अतएव, एनबीएफसी में पैसा जमा करते वक्त निवेशक और जमाकर्ता खूब सोच समझकर निर्णय लें। +यदि रिज़र्व बैंक के पास पंजीकृत कोई एनबीएफसी जमाकर्ता का धन लौटाने में असफल रहती है तो जमाकर्ता को उस एनबीएफसी के विरूद्ध रिज़र्व बैंक के नज़दीकी क्षेत्रीय कार्यालय में शिकायत दर्ज करानी चाहिए। अपने धन की उगाही के लिए जमाकर्ता कंपनी अधिनियम 1956 के तहत गठित कंपनी लॉ बोर्ड या सिविल कोर्ट अथवा उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में जा सकता है। प्रभावित लोग राज्य पुलिस प्राधिकारियों अथवा राज्य पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में भी शिकायत कर सकते हैं। कुछ राज्यों ने जमाकर्ताओं के हितों का संरक्षण (वित्तीय संस्थानों में) अधिनियम पारित किया है जिसके फलस्वरूप राज्य सरकार को अधिकार है कि वह ऐसी कंपनियों की परिसंपत्तियों की कुर्की कर ले और उसकी बिक्री से अर्जित आय को जमाकर्ताओं के मध्य वितरित कर दे। +नहीं। ऐसी एनबीएफसीस् जिन्हें रिज़र्व बैंक के प्रावधानों अथवा दिशानिर्देशों से छूट प्राप्त है, वे जनता से जमाराशियाँ न तो ग्रहण कर सकतीं और न ही रख सकतीं हैं क्योंकि उन्हें ऐसी छूट मिलने की एक शर्त जमाराशि ग्रहण न करना/न रखना ही है। तथापि, गृह वित्त कंपनियाँ राष्ट्रीय आवास बैंक द्वारा अनुमत सीमा तक जमाराशियाँ ग्रहण कर सकती हैं। +एनबीफसीस् ठोस मानकों पर काम करें, इसके लिए रिज़र्व बैंक ने जमा ग्रहण करने के संबंध में विस्तृत विनियम जारी किए हैं जिसमें ग्रहण की जाने वाली जमाराशि का परिमाण, अनिवार्य क्रेडिट रेटिंग, जमाकर्ताओं के धन की अदायगी हेतु पर्याप्त तरलता की व्यवस्था, जमा-बहियों के रखरखाव का तरीका, पर्याप्त पूँजी की व्यवस्था सहित अन्य विवेकपूर्ण मानदण्ड, निवेश की सीमाएं और एनबीएफसीस् का निरीक्षण आदि शामिल है। यदि बैंक को अपने निरीक्षणों या लेखा परीक्षा अथवा शिकायत या मार्केट इंटेलीजेंस के जरिए यह पता चलता है कि कोई एनबीएफसी रिज़र्व बैंक के दिशानिर्देशों का अनुपालन नहीं कर रही है तो वह एनबीएफसी को आगे जमाराशियाँ ग्रहण करने से रोक कर सकता है और उसे परिसंपतियाँ बेचने से निषिद्ध कर सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि जमाकर्ता ने कंपनी लॉ बोर्ड के समक्ष शिकायत की है और कंपनी लॉ बोर्ड ने संबंधित एनबीएफसी को धन चुकाने का आदेश दिया है, ऐसे में एनबीएफसी द्वारा धन चुकाने संबंधी कंपनी लॉ बोर्ड के आदेश का अनुपालन न करने पर रिज़र्व बैंक एनबीएफसी पर अभियोग चला सकता है और दण्डात्मक कार्रवाही सहित कंपनी का समापन भी कर सकता है। +महत्वपूर्ण बात यह है कि रिज़र्व बैंक को मार्केट इंटेलीजेंस रिपोर्ट्स, शिकायतों, कंपनी के सांविधिक लेखापरीक्षकों की अपवादात्मक रिपोर्टों, एसएलसीसी की बैठकों आदि के जरिए जैसे ही यह खबर लगती है कि कंपनी रिज़र्व बैंक के अनुदेशों/मानकों का उल्लंघन कर रही है, तो वह जुर्माना लगाने और कानूनी कार्रवाई जैसे कई त्वरित कदम उठाता है। इसके अतिरिक्त रिज़र्व बैंक राज्य स्तरीय समन्वय समिति की बैठकों में ऐसी जानकारी को वित्तीय क्षेत्र के सभी नियामकों एवं प्रवर्तन एजेंसियों के मध्य बांटता है। +एक प्रमुख नीति-निर्माता संस्थान के तौर पर एवं अपने जनोपयोगी नीतिगत उपायों के अंग के रूप में भारतीय रिज़र्व बैंक समय-समय पर ऐसे कई उपाय करने में आगे रहा है जिससे कि आम जनता को अपनी गाढ़ी कमाई निवेश करते समय सतर्कता बरतने की आवश्यकता के बारे में जागरूक किया जा सके। इन उपायों में प्रिंट मीडिया में चेतावनी सूचना जारी करना और सूचनापरक एवं शिक्षाप्रद ब्रोशर्स/पैम्पलेट्स का वितरण, जागरूकता/आउटरीच एवं टाउन हाल कार्यक्रमों में जनता से सीधे संपर्क, राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित व्यापार मेलों में सहभागिता एवं प्रदर्शनियाँ शामिल हैं। कई बार वह व्यापक सर्कूलेशन वाले समाचार पत्रों (अंग्रेजी और स्थानीय भाषा) से यह अनुरोध भी करता है कि वे जमा ग्रहण करने वाले अनिगमित निकायों से विज्ञापन लेने में परहेज करें। +यह कानून लागू करने का उद्देश्य जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना है। रिज़र्व बैंक अधिनियम के प्रावधानों का मकसद रिज़र्व बैंक को विवेकपूर्ण विनियमन जारी करने हेतु सक्षम बनाना है ताकि वित्तीय संस्थान ठोस मानकों पर काम करें। रिज़र्व बैंक एक नागरिक निकाय(ण्iviत् ँद्ब्) है और रिज़र्व बैंक अधिनियम एक नागरिक अधिनियम(ण्iviत् Aम्ू) है। दोनों में ऐसा विशेष प्रावधान नहीं है जिससे कि चूककर्ता कंपनियों, निकायों अथवा उनके अधिकारियों की परिसंपत्ति की कुर्की अथवा बिक्री के जरिए वसूली की जा सके। इसे राज्य सरकार प्रभावी रूप से कर सकती है। वित्तीय संस्थानों में जमाकर्ताओं के हितों का संरक्षण अधिनियम राज्य सरकार को पर्याप्त शक्तियाँ देता है जिससे कि वे चूककर्ता कंपनियों, निकायों अथवा उनके अधिकारियों की परिसंपत्ति की कुर्की अथवा बिक्री कर सकें। +हाँ, काफी हद तक। अधिनियम के तहत किसी संस्था, फर्म या कंपनी द्वारा अनधिकृत रूप से जमाराशियाँ स्वीकार करना एक संज्ञेय अपराध माना गया है और जो संस्थाएं अनधिकृत रूप से जमाराशियाँ स्वीकार करती हैं अथवा गैर-कानूनी वित्तीय गतिविधियों में शामिल हैं, को तत्काल गिरफ्तार किया जा सकता है और उन पर अभियोग चलाया जा सकता है। इस अधिनियम के अधीन विशेष न्यायालय के आदेश पर राज्य सरकार को इन संस्थाओं की परिसंपत्ति की कुर्की व बिक्री करने और उससे प्राप्त आय को जमाकर्ताओं के मध्य वितरित करने की व्यापाक शक्तियाँ प्राप्त हैं। राज्य सरकार/राज्य पुलिस का व्यापक तंत्र दोषियों के विरूद्ध त्वरित कार्रवाई करने में बखूबी सक्षम है। अतएव, रिज़र्व बैंक सभी राज्य सरकारों से यह अनुरोध करता रहा है कि वे अपने यहाँ ‘वित्तीय संस्थानों में जमाकर्ताओं के हितों का संरक्षण अधिनियम’ पारित कराएं। आज की तारीख में जिन राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में यह कानून लागू हैं, वे हैं: आन्ध्र प्रदेश, असम, बिहार, गोवा, गुज़रात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मिज़ोरम, नई दिल्ली, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तराखण्ड, सिक्किम, मेघालय, जम्मू एवं कश्मीर, और चण्डीगढ़ प्रशासन। कुछ राज्य सरकारों ने जमाकर्ताओं के हितों के संरक्षण हेतु इस अधिनियम को प्रभावी तरीके से लागू किया है। +यदि एनबीएफसी के खिलाफ शिकायत या शिकायतें भारतीय रिज़र्व बैंक के नज़दीकी कार्यालय में प्रस्तुत की जाती हैं, तो उस शिकायत/शिकायतों के समाधान हेतु संबंधित एनबीएफसी से संपर्क किया जाता है। +रिज़र्व बैंक विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों में अपने मार्केट इंटेलीजेंस व्यवस्था को मजबूत बना रहा है और उन कंपनियों की वित्तीय सूचनाओं की निरंतर जांच कर रहा है जिनके बारे में मार्केट इंटेलीजेंस या शिकायतों के जरिए जानकारी/संदर्भ प्राप्त हुए हैं। इस संदर्भ में, जनता सतर्क रहकर महान योगदान दे सकती और यदि उन्हें य़ह पता चलता है कि कोई वित्तीय संस्था भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम का उल्लंघन कर रही है तो वह तुरंत शिकायत दर्ज कराकर महान योगदान दे सकती है। उदाहरण के लिए, यदि वे अनधिकृत रूप से जमाराशि स्वीकार कर रहे हैं और / भारतीय रिज़र्व बैंक से अनुमति लिए बगैर एनबीएफसी गतिविधियां चला रहे हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि जनता बुद्धिमानी से निवेश करे तो ये संस्थाएं चल ही नहीं पाएंगी। जनता को यह भी जानना चाहिए कि निवेश पर ऊँचे रिटर्न में जोखिम भी काफी अधिक रहता है। और अटकल आधारित गतिविधियों में कोई निश्चित रिटर्न नहीं होता। निवेश करने से पहले आम आदमी के लिए यह अनिवार्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि जिस संस्था में वह निवेश कर रहा है वह वित्तीय क्षेत्र के नियामकों में से किसी भी नियामक द्वारा विनियमित संस्था हो। +सामूहिक निवेश योजनाएं (सीआईएस) और चिट फंड. +नहीं। सीआईएस ऐसी योजनाएं है जिसमें धन को इकाइयों में बदला जाता है, भले ही वह रिसोर्ट में भागीदारी हो, लकड़ी की बिक्री से प्राप्त लाभ अथवा किसी विकसित वाणिज्यिक भूखंड या भवन से प्राप्त लाभ के रूप में हो। सामूहिक निवेश योजनाएं (सीआईएस) भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा विनियमित नहीं होतीं। +सामूहिक निवेश योजनाओं (सीआईएस) का विनियामक सेबी है। ऐसी योजनाओं के बारे में जानकारी तथा प्रवर्तकों के विरूद्ध शिकायत सेबी और राज्य सरकार के पुलिस विभाग/ आर्थिक अपराध शाखा को तत्काल भेजनी चाहिए। +चिट फंड कारोबार, चिट फंड अधिनियम 1982 के तहत शासित है जो एक केंद्रीय अधिनियम है और जिसका क्रियान्वयन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। ऐसे चिट फंड जो इस अधिनियम के तहत पंजीकृत है, विधिक रूप से चिट फंड कारोबार कर सकते हैं। +चिट फंड कंपनियों को चिट फंड अधिनियम 1982 के तहत विनियमित किया जाता है जो एक केंद्रीय अधिनियम है तथा इसका क्रियान्वयन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने 2009 में चिट फंड कंपनियों को जनता से जमाराशियाँ ग्रहण करने पर पाबंदी लगा दी है। यदि कोई चिट फंड जनता से जमाराशियाँ ग्रहण करता है तो भारतीय रिज़र्व बैंक ऐसे चिट फंडों पर अभियोग चला सकता है। +मनी सर्कुलेशन/ बहुस्तरीय विपणन (एमएलएम) / पोन्जी स्कीम/ अनिगमित निकाय (यूआईबी). +मनी सर्कुलेशन, बहुस्तरीय विपणन(एमएलएम)/श्रृंखलाबद्ध विपणन या पोन्जी स्कीम ऐसी योजनाएं हैं जो सदस्यों को नामांकित होने पर आसान या त्वरित धन का वादा करती हैं। बहु स्तरीय विपणन या पिरामिड आकार की योजनाओं में उत्पादों की बिक्री से उतनी आमदनी नहीं होती जितनी कि नामांकित सदस्यों से भारी सदस्यता शुल्क लेने से। सभी सदस्यों पर अधिक से अधिक सदस्य नामांकित करने का दायित्व होता है क्योंकि संग्रहीत सदस्यता राशि को पिरामिड के उच्चक्रम से सदस्यों के मध्य वितरित किया जा सके। इस श्रृंखला के टूटने से पिरामिड टूट जाता है और इससे पिरामिड से जुड़ा सबसे निचला सदस्य अधिकतम प्रभावित होता है। पोन्जी योजनाएं वे योजनाएं हैं जो जनता से अत्यधिक लाभ का वादा कर धन एकत्रित करती हैं। इनमे आस्तियों का निर्माण न होने के कारण जमाकर्ताओं से संग्रहीत राशि को अन्य जमाकर्ताओं को प्रतिलाभ के रूप में बांट दिया जाता है। चूकि इन योजनाओं में कोई ऐसी अन्य गतिविधि नहीं होती जिससे कि रिटर्न आ सके, अतएव योजना अलाभकारी हो जाती है और योजनाओं के प्रवर्तकों के लिए वादा किया गया रिटर्न एवं एकत्रित की गई मूलराशि को लौटा पाना असंभव हो जाता है। ऐसी योजनाएं अनिवार्य रूप से विफल हो जाती है तथा अपराधकर्ता धन लेकर भाग जाते हैं। +नहीं। मनी सर्कुलेशन/बहु स्तरीय विपणन/पिरामिड आकार की योजनाओं के तहत धन स्वीकार करने की अनुमति नहीं है। इन योजनाओं के तहत धन स्वीकार किया जाना प्राइज चिट और मनी सर्कुलेशन(प्रतिबंधित) अधिनियम 1978 के तहत संज्ञेय अपराध है। +नहीं। प्राइज चिट और मनी सर्कुलेशन(प्रतिबंधित) अधिनियम 1978 के तहत प्राइज चिट और मनी सर्कुलेशन योजनाएं प्रतिबंधित हैं। इस अधिनियम के क्रियान्वयन में भारतीय रिज़र्व बैंक की कोई भूमिका नहीं है। इस अधिनियम के अंतर्गत नियमों को बनाने में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्र सरकार को सहयोग एवं परामर्श प्रदान करता है। +मनी सर्कुलेशन/बहु स्तरीय विपणन/पिरामिड आकार की योजनाएं, प्राइज चिट और मनी सर्कुलेशन(प्रतिबंधित) अधिनियम 1978 के तहत अपराध हैं। यह अधिनियम किसी व्यक्ति या निकाय को किसी प्राइज़ चिट या मनी सर्कुलेशन स्कीम को प्रवर्तित करने अथवा इन योजनाओं में किसी को सदस्य के रूप में नामित करने या ऐसी चिट या योजना के अनुसरण में धन प्राप्ति/प्रेषण के द्वारा किसी को सहभागी बनाने से रोकता है। इस अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन पर निगरानी और आवश्यक कार्रवाई राज्य सरकारों द्वारा की जाती है। +ऐसी योजनाओं के बारे में कोई जानकारी/शिकायत संबद्ध राज्य सरकार की पुलिस/आर्थिक अपराध शाखा(ईओडब्लू) अथवा कार्पोरेट कार्य मंत्रालय के पास भेजी जानी चाहिए। यदि रिज़र्व बैंक के संज्ञान में ऐसी जानकारी आती है तो वह राज्य सरकार के संबंधित प्राधिकारियों को उसकी सूचना देगा। +अनुलग्नक I एवं II के रूप में दिए गये दो चार्ट यह दर्शाते हैं कि कौन सा विनियामक कौन सी गतिविधि देख रहा है। तदनुसार शिकायत को संबद्ध विनियामक को संबोधित किया जाए। यदि गतिविधि वर्जित कार्य के अंतर्गत आती है तो भुक्तभोगी राज्य पुलिस/ राज्य पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा के पास समुचित शिकायत दर्ज करा सकता है। +भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की धारा 45 टी के तहत भारतीय रिज़र्व बैंक और राज्य सरकार के पास संयुक्त अधिकार हैं। अपराधकर्ता के विरूद्ध तत्काल कार्रवाई करने के लिए, राज्य पुलिस अथवा संबंधित राज्य की आर्थिक अपराध शाखा के पास जानकारी तुरंत पहुँचानी चाहिए, जिससे वे समुचित कार्रवाई कर सकें। चूंकि राज्य सरकार का तंत्र व्यापक है और भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 1934 के प्रावधानों के तहत राज्य सरकार को कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है अतएव जमाग्रहण करनेवाली ऐसी कंपनियों के बारे में किसी भी जानकारी को संबंधित राज्य सरकार के पुलिस विभाग/आर्थिक अपराध शाखा को तत्काल उपलब्ध कराई जानी चाहिए। +कई राज्य सरकारों ने वित्तीय संस्थानों में जमाकर्ता हित संरक्षण अधिनियम को लागू किया है, जिससे राज्य सरकार को समय से और समुचित कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त होता है। +भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 1934 की धारा 45एस में अनिगमित निकायों जैसे व्यक्तियों, फर्म और व्यक्तियों के अनिगमित संगठन को, यदि वे वित्तीय गतिविधियाँ करते हैं अथवा उनके मूल कारोबार के लिए जमाराशियां ग्रहण करते है, तो उन्हें सार्वजनिक जमाराशियां स्वीकार करने के लिए विशेष रूप से निषेध किया गया है। +भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम 1934 के तहत रिज़र्व बैंक और राज्य सरकार को संयुक्त रूप से न्यायालय से सर्च वारंट प्राप्त करने का अधिकार है जिससे ऐसी अनिगमित इकाइयों द्वारा जमाराशिययाँ ग्रहण करने के मामलों की जाँच की जा सके। +रिज़र्व बैंक अथवा राज्य सरकार से प्राधिकृत कोई अधिकारी अनिगमित निकायों और संबंधित व्यक्तियों के विरूद्ध न्यायाधिकरण में अपराध के लिए शिकायत दर्ज कर सकता है। + +मध्य आय वर्ग के लिए वित्तीय शिक्षा: +परिचय. +हर परिवार के लिए वित्तीय नियोजन बहुत आवश्यक है। वित्तीय नियोजन केवल बचत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक उद्देश्य के साथ एक निवेश है। यह बचत करने और भावी आय को खर्च करने की एक योजना है। इसका बजट ध्यानपूर्वक तैयार करना चाहिए। वित्तीय नियोजन आपके धन का उचित प्रबंधन कर आपके जीवन के लक्ष्यों को हासिल करने की एक प्रक्रिया है। जीवन के लक्ष्यों में एक मकान खरीदना, बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बचत या सेवानिवृत्ति के लिए योजना आदि को शामिल किया जा सकता है। +आज आप लोगों को अपनी हैसियत से अधिक सुविधाओं के साथ जीवन जीते देखते हैं। उनके पास क्रेडिट कार्ड है, वे जोखिम भरा निवेश करते हैं और ऐसी चीजें करते हैं जो गैर जिम्मेदाराना है और वित्तीय नियोजन के सिद्धांतों के खिलाफ है। नए और अक्सर जटिल वित्तीय उत्पादों का प्रसार अधिक वित्तीय विशेशज्ञता की मांग करते हैं। साथ ही अस्त-व्यस्त स्थितियां और बदलते कर कानून पर्याप्त वित्तीय नियोजन की जरूरत बढा देते हैं। इसलिए हम सभी के लिए वित्तीय नियोजन और वित्तीय उत्पादों को समझना अपरिहार्य हो गया है। +वित्तीय नियोजन के अंतर्गत अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक दोनों ही तरह की बचतें आती हैं। बचत का एक हिस्सा कुछ निश्चित संपत्तियों में निवेश किया जाता है। परिसंपत्ति के रूप में कई तरह के निवेश विकल्प उपलब्ध हैं मसलन बैंक जमा, सरकारी बचत योजनाएं, शेयर, म्यूचुअल फंड, बीमा, जिंस, बांड, डिबेंचर, कंपनी सावधि जमा आदि। वित्तीय नियोजन खुद ब बखुद होने वाली कोई चीज नहीं है, बल्कि इसमें ध्यान देने और अनुशासन की जरूरत पडती है। यह छह चरण की प्रक्रिया है जिससे आपको एक व्यापक तस्वीर देखने में मदद मिलती है और वह तस्वीर यह है कि आप कहां हैं और वित्तीय तौर पर आप कहां होना चाहते हैं। +बचत एवं निवेश की बुनियादी बातें. +आपके माता पिता सही कहते हैं रुपये और पैसे पेड पर नहीं उगते, बल्कि वास्तव में पैसे से पैसा बनता है। पैसे में एक अनोखी क्षमता है और वह है और पैसा बनाने की। अच्छी बात यह है कि इसके लिए बहुत पैसे की जरूरत नहीं होती। +बचत वह धन है जिसे लोग छोटी अवधि के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जमा करते हैं। एक बचत खाता में आपका धन काफी सुरक्षित है और आमतौर पर इसपर काफी छोटी मात्रा में ब्याज मिलता है। जरूरत पडने पर आपके लिए इसे पाना भी आसान है। +निवेश का मतलब है कि आप दीर्घकालीन लक्ष्यों के लिए अपना धन अलग रख रहे हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जो धन आप निवेश करते हैं वह बढेगा। वास्तविकता में आने वाले समय में मूल्य में उतार-चढ़ाव निवेशकों के लिए सामान्य बात होती है। लेकिन लंबी अवधि में निवेशक बचत खाता की तुलना में ज्यादा कमाई कर सकता है। +आपके वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में बचत और निवेश की महत्ता इस संदर्भ में ज्यादा होती है कि वह आपकी खर्च करने की प्रवृत्ति को कम करती है। लेकिन इसका अच्छा तर्क यह है कि आप अपने पैसों को खर्च करके दरअसल अपने पैसों की बचत करते हैं। कोई भी ब्याज या निवेश लाभ आपको आपके वित्तीय लक्ष्य के नजदीक ले जाता है। और इसके लिए आपको कुछ करना नहीं पड़ा। +जल्दी बचत करना शुरू करें तो जब आपको इसकी जरूरत पडेगी आप तैयार होंगे, चाहे आप एक मकान के लिए बचत कर रहे हों, बच्चे की शिक्षा के लिए या फिर अपनी सेवानिवृत्ति के लिए। अगर आप 20 साल की उम्र से बचत करना शुरू कर देते हैं तो यह एक बेहतर शुरूआत होगी। अगर आप बचत करना शुरू नहीं करते तो बाकी जिंदगी चीजों के पीछे भागते गुजार देंगे। युवाओं के पास एक खास चीज है जो उम्रदराज लोगों पास नहीं है और वह है समय। जब वे इस अवधारणा को समझ जाते हैं और समय का अपने पक्ष में उपयोग करते हैं तो उनके पास अपने सपनों को साकार करने और अपने वित्तीय लक्ष्यों को हासिल करने का बेहतर मौका होता है। +टालमटोल की कीमत क्या आप जानते हैं कि अधिक पैसा कमाने के लिए अधिक समय निवेश करना होता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी सही है। निवेश के लिए इंतजार कर आप अवसर लागत का भुगतान कर रहे हैं। यह कहना आसान है कि बचत शुरू करने और अभी निवेश के लिए आपके पास पर्याप्त धन नहीं है। जब तक मेरे पास और पैसा नहीं आ जाता, मैं इंतजार करना पसंद करूंगा। लेकिन यह निर्णय आप पर उससे अधिक भारी पडता है जितना आप सोचते हैं क्योंकि कार्यों को संयोजित करने की ताकत दोनों तरह से काम करती है। यह इसलिए भी आप पर भारी पडती है क्योंकि इंतजार करने का मतलब है महज एक छोटी मात्रा में धन पर चक्रवृद्धि ब्याज कमाने का अवसर गंवाना। +क्या आप अभी जितना खर्च करते हैं उससे 10 प्रतिशत कम खर्च करते हुए मौज के साथ जीवन जी सकते हैं और उस बचाए गए पैसे को अपने भविष्य के लिए अलग रख सकते हैं। अगर आप भावी लक्ष्यों के लिए अपनी आय का 10 प्रतिशत बचा सकते हैं तो आपके क्या लक्ष्य होंगे। अपने जीवन में आप क्या हासिल करना चाहते हैं इसके लिए भाग्य से अधिक भी किसी चीज की जरूरत होती है। +लोगों को यह जानने की जरूरत है कि ‘पहले खुद त्याग कर’ बचत को प्राथमिकता बनाकर वे भविष्य में क्या चाहते हैं इसका महज सपना देखने से अधिक कर सकते हैं। चाहे किसी की आमदनी कम हो ज्यादा, इसका कुछ हिस्सा निवेश के लिए अलग रखने के लिए आत्म अनुशासन की जरूरत पडती है। कुछ ऐसी चीजें जिसे आप अपने पास चाहते हैं, अनुशासित रहते हुए उनकी खरीदारी टालकर और बचत एवं निवेश कर आप दीर्घकालीन लाभ का आनंद उठा सकते हैं। +बजट बनाना. +आपके वित्तीय नियोजना में सबसे पहला कदम बजट बनाना है। आय की आवाजाही पर नजर रखने, योजना बनाने और इस पर नियंत्रण रखने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया बजट कहलाती है। इसमें आय के सभी स्रोतों की पहचान करना और सभी चालू एवं भावी खर्चों को ध्यान में रखते हुए वित्तीय लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास करना है। बजट बनाने वाले व्यक्ति का प्राथमिक लक्ष्य खर्च के लिए धन आबंटित करने के बाद बचत सुनिश्चित करना है। +पहला कदम - अपनी आय की गणना करें : पे-चेक और किसी निवेश से ब्याज सहित इसमें सभी स्रोतों से आय को शामिल किया जाना चाहिए। +दूसरा कदम -आवश्यक चीजों के लिए अपने खर्च तय करें: अपने आवश्यक खर्चों की सूची बनाएं जिसमें किराया, राशन, कपडे, टेलीफोन एवं बिजली के बिल, ईंधन एवं वाहन का रखरखाव जैसे खर्चों को शामिल किया जा सकता है। प्रत्येक मद पर खर्च होने वाली रकम की गणना करें। +तीसरा कदम . ब्याज भुगतान समेत अपने कुल ऋणों को नोट करें। +चौथ कदम - अनावश्यक चीजों के लिए अपने खर्च तय करें: अनावश्यक चीजों की सूची में छुट्टी पर सैर, उपहार एवं रेस्तरां में खाने के खर्चों को शामिल किया जा सकता है। प्रत्येक मद पर खर्च होने वाली रकम की गणना करें। +पांचवां कदम - अपनी बचत की गणना करें: इसे पहले कदम से दूसरे, तीसरे और चौथे कदम को घटाकर निकाला जा सकता है। इस बात का एहसास रहे कि जीवन में गैर अपेक्षित चीजें आती रहती हैं जिससे आपको अपना बजट प्लान तोडना पड सकता है। हालांकि किल्लत दूर करने के लिए कर्ज लेने से परहेज करें और जहां तक संभव हो सके अपने बजट पर टिके रहें। +निवेश पर महंगाई का असर. +जब आप अपने निवेश की योजना बना रहे हों तो अपने निवेश पर महंगाई के असर को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। आसान शब्दों में समझें तो महंगाई कीमतों में बढोतरी है। बीतते समय के साथ वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमत बढती है जिससे रुपये का मूल्य घटता जाता है क्योंकि उतने रुपये में आप उतनी चीजें नहीं खरीद पाते जितना पिछले महीने या पिछले साल खरीद सकते थे।ण् कैसे महंगाई आपके निवेश संबंधी निर्णय को प्रभावित कर सकती है?पांच साल पहले वडा पाव दो रुपये में मिलता था लेकिन अब यह 7 रुपये में मिलता है। वडा पाव की कीमत उसकी मात्रा बढ गई या उसकी गुणवत्ता बेहतर होने के चलते नहीं बढी, बल्कि वडा पाव बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री महंगी होने से इसकी कीमत बढी है। +मुद्रास्फीति निवेशकों को बहुत डराती है क्योंकि यह आपके निवेश का मूल्य खा जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर आप 1,000 रुपये एक साल के लिए सावधि जमा में निवेश करते हैं जिस पर आपको सालाना 5 प्रतिशत ब्याज मिलता है तो आप एक साल में 1,050 रुपये पाने के लिए अभी 1,000 रुपये दे रहे हैं। अगर इस एक साल के दौरान मुद्रास्फीति की दर 6 प्रतिशत रहती है तो आपका खर्च जो पिछले साल 1,000 रुपये थी साल के अंत में बढकर 1,060 रुपये पहुंच जाएगी। इस तरह से आप एक साल तक अपना धन निवेश करके रखने के बाद भी पिछले साल के मुकाबले बुरी स्थिति में हैं क्योंकि निवेश पर आपको मिला रिटर्न मुद्रास्फीति की दर से कम रहा। +मुद्रास्फीति के दुश्प्रभावों से बचने के लिए एक निवेश कौन कौन से कदम उठा सकता है? +अपने ऐसे ‘रिटर्न की वास्तविक दर’ निकालने की कोषिश करें जिसे मुद्रास्फीति के प्रभावों को आंकने के बाद आप हासिल करने की उम्मीद कर सकते हैं। मुद्रास्फीति की वर्तमान दर को ध्यान में रखने के अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि विशेषज्ञ मुद्रास्फीति कितनी रहने का अनुमान जता रहे हैं। भविष्य में मुद्रास्फीति का रूख कैसा होगा, इस आधार पर वर्तमान निवेश के मूल्य एवं भावी निवेश के आकर्शण में बदलाव देखने को मिलता है। यह भी याद रखें कि नियत आय वाले निवेश, मुद्रास्फीति के प्रभावों से मुकाबला करने में बहुत कारगर नहीं होते। अगर आप एक नियत ब्याज दर में कैद हैं और मुद्रास्फीति बढती है, तो आपकी आमदनी उतनी नहीं बढेगी और इस तरह से आपको नकारात्मक रिटर्न मिलेगा। +जोखिम और रिटर्न. +जोखिम और निवेश का चोली दामन का साथ है। जोखिम को इस तरह से परिभाशित किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति अपना पूरा धन या उसका हिस्सा निवेश में गंवाने को तैयार है। इसमें अच्छी बात यह है कि जोखिम भरा निवेश अधिक रिटर्न का रिवार्ड दिलाता है जिससे पूरी प्रक्रिया सार्थक बन जाती है। +जोखिम के बारे में ध्यान रखने लायक मूल बात यह है कि रिटर्न की संभावना बढने के साथ जोखिम बढता है। लाजिमी है कि जोखिम जितना अधिक होगा, रिटर्न मिलने की संभावना भी उतनी अधिक होगी। (इन शब्दों को न भूलें - संभावना फायदेमंद होती है। रिटर्न की कोई गारंटी नहीं) +‘बिना जोखिम’ वाले उत्पादों जैसे बचत खाता और सरकारी बांड में भी मुद्रास्फीति दर के मुकाबले कम आय का जोखिम है। अगर मुद्रास्फीति की दर के मुकाबले रिटर्न कम है तो निवेश वास्तव में निरर्थक हो गया है क्योंकि आपकी आय विभिन्न तरीकों से निवेश के जरिए जितनी बढनी चाहिए, उतनी नहीं बढ रही है। +आप निवेश में बने रहें, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि आप अपने जोखिम का प्रबंधन करने के लिए आवश्यक उपाय करें। एक बार आप किसी खास संपत्ति में निवेश करते हैं तो अपने निवेश पर नजर रखें और किसी मुसीबत से बचने के लिए बाजार में घट रही विभिन्न घटनाओं के बारे में दुरूस्त जानकारी रखें। जब असामान्य रिटर्न की पेशकश की जा रही हो तो ऐसे निवेश में निहित संभावित जोखिम का पता लगाएं। +चक्रवृद्धि की शक्ति. +वित्तीय नियोजन के समय सुरक्षित एवं निश्चित तौर पर धन सृजन के लिए चक्रवृद्धि की जादूई ताकत सबसे महत्वपूर्ण औजार है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक समय कहा था- ‘ब्रह्मांड में सबसे शक्तिशाली बल चक्रवृद्धि ब्याज है।’ चक्रवृद्धि एक सरल अवधारणा है जो यादगार रिटर्न की पेशकश करता है। अगर आप अपना धन एक निश्चित रिटर्न के लिए निवेश करते हैं और रिटर्न मिलने पर फिर इस आय को पुनरू निवेश करते हैं तो आने वाले समय में यह तेजी से बढेगा। साधारण ब्याज के साथ आप केवल मूलधन पर ब्याज कमाते हैं, जबकि चक्रवृद्धि में आप मूल और ब्याज पर ब्याज कमाते हैं। +आइए देखते हैं कि 9 प्रतिशत रिटर्न की पेशकश करने वाली 12,000 रुपये की वार्षिक निवेश स्कीम पर चक्रवृद्धि की शक्ति किस तरह से काम करती है। यह स्कीम 30 वर्ष के लिए है जिसमें 3.6 लाख रुपये मूलधन 17.83 लाख रुपये हो जाता है। चक्रवृद्धि का रिवार्ड निवेश को अनुशाशित करता है और लंबी अवधि में उत्कृश्ट साबित होता है। उपरोक्त उदाहरण में पहले 20 वर्ष महज 6.69 लाख रुपये का लाभ होता है, जबकि अंतिम 10 वर्ष में इसमें चक्रवृद्धि की शक्ति नजर आती है और धन तेजी से बढने लगता है। जितना अधिक लंबे समय तक आप अपने पैसे को हाथ नहीं लगाते उतनी तेजी से यह बढता है। मसलन, उक्त निवेश में 40 साल बने रहने पर आपको 44.20 लाख रुपये मिलेगा। +इस प्रकार, चक्रवृद्धि एक चमत्कारी औजार है जिससे आप भारी मात्रा में धन एकत्र करने के लिए लंबे समय के लिए छोटे निवेश कर सकते हैं। अगर आप काफी पहले निवेश करना शुरू कर दें और इस धन को हाथ न लगाएं तो यह निवेश सबसे अच्छा काम करेगा। अभी निवेश शुरू करने के लिए वास्तव में चक्रवृद्धि आपके लिए एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण कारण है। इसमें लगा हर दिन का पैसा यह सुनिश्चित करता है कि आपका पैसा आपके लिए काम कर रहा है, जिससे वित्तीय तौर पर सुरक्षित एवं स्थायी भविष्य सुनिश्चित हो रहा है। +उदाहरण - चक्रवृद्धि की शक्ति +संतोश और सुनील दोस्त हैं सालाना 10 प्रतिशत ब्याज दर पर एक लाख रुपये निवेश करना चाहते हैं। लेकिन संतोश को 10 प्रतिशत की दर से चक्रवृद्धि ब्याज मिलेगा, जबकि सुनील को उसके निवेश पर 10 प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज मिलेगा। अब चक्रवृद्धि की ताकत कमाल देखे- +1. एक साल बाद दोनों को समान रकम मिलेगी मसलन 1,10,000 +2. पांच साल बाद संतोश को 1,61,051 रुपये मिलेगा, जबकि सुनील को 1,50,000 रुपये मिलेगा +3. 30 साल बाद संतोश को 17,44,940 रुपये मिलेगा और सुनील को 4,00,000 रुपये मिलेगा। +30 साल में 13.4 लाख रुपये का अंतर +72 का नियम +अब आप चक्रवृद्धि की अवधारणा का अर्थ है जान चुके हैं कि इसमें पैसे से पैसा बनता है तब भी जब आप सो रहे होते हैं। यह कितना शक्तिशाली हो सकता है इसे आप दूसरे तरीके से भी जान सकते हैं। यह तरीका 72 का नियम कहलाता है। गणितज्ञ कहते हैं कि आपको अपना धन दोगुना करने में कितना समय लगेगा, यह जानने के लिए आप 72 को ब्याज दर से भाग दें। मान लें कि आपके दादा दादी जन्म दिन के लिए आपको 200 रुपये देते हैं और आप इसे निवेश करने की योजना बनाते हैं। अगर आप इसे एक ऐसे खाते में जमा करते हैं जहां सालाना 6 प्रतिशत की दर से ब्याज मिलता है तो इसे बढकर 400 रुपये होने में कितना समय लगेगा। +इसलिए 12 वर्ष में आपका धन दोगुना होकर 400 रुपये हो जाएगा। लेकिन अगर आपके पिता एक ऐसे खाते के बारे में आपको बताते हैं जहां सालाना 9 प्रतिशत ब्याज मिलता है तो क्या होगा। +अब केवल आठ वर्ष में ही आपके पास 400 रुपये होंगे। थोडा अधिक ब्याज लेकर आप धन दोगुना होने में लगने वाला समय चार साल घटा लेते हैं। और इसके लिए कोई अतिरिक्त धन भी नहीं लगाना पडता। +लेकिन अगर आठ वर्ष भी इंतजार के लिए बहुत लंबा समय लगता है और आप चार साल में इसे दोगुना करना चाहते हैं तो 72 का नियम आपको वह ब्याज दर भी बात सकता है जिसके जरिए आप चार साल में धन दोगुना कर सकते हैं। +अब आप देख सकते हैं कि ब्याज दर में एक छोटा अंतर धन में कितनी तेजी के साथ बढोतरी कर सकता है आपको आने वाले समय में अधिक धन दिलाता है। +बीतते समय के साथ पैसों की कीमत. +समय बीतने पर आपको एहसास होगा कि 10 साल पहले आप 10 रुपये में पेटभर एक समय का भोजन कर सकते थे, लेकिन आज आपको इतने पैसे में थोडी बहुत सब्जियां ही मिल पाती हैं। इसका मतलब कि पांच साल बाद हजार रुपये के नोट का मूल्य आज की तुलना में कम होगा। भले ही नोट वही है, आने वाले समय के मुकाबले आज आप उससे बहुत कुछ कर सकते हैं क्योंकि मुद्रास्फीति की वजह से 1,000 रुपये का मूल्य घट जाएगा। +निवेश के विकल्पों का सही चुनाव. +सर्वोत्तम निवेश विकल्प व्यक्तिगत परिस्थितियों एवं सामान्य बाजार स्थितियों पर निर्भर करेगा। यह जरूरी नहीं है कि एक व्यक्ति के उद्देश्य के लिए एक निवेश दूसरे व्यक्ति की जरूरत पूरी करे। सही निवेश तीन चीजों का एक संतुलन है। ये चीजें हैंरू तरलता, सुरक्षा और रिटर्न। +तरलता. +इसमें ऐसे निवेश शामिल हैं जिन्हें जरूरत पडने पर नकदी में बदला जा सकता है। आपात स्थितियों से निपटने के लिए कुछ तरल निवेश की जरूरत पडती है। +सुरक्षा. +यह निवेश के जोखिम कारक के बारे में है। सबसे बुरी स्थिति वह है जब निवेश किया गया पूरा धन डूब जाए। +रिटर्न. +निवेश से हुई आमदनी एक ऐसा कारक है जिस पर विचार किया जाता है। सुरक्षित निवेश स्थिर या नियमित रिटर्न की पेशकश करता है लेकिन यह रिटर्न कम होता है, जबकि जोखिम भरा निवेश अधिक रिटर्न की पेशकश करता है या इस पर बिल्कुल भी रिटर्न नहीं मिलता। बाजार में छोटी अवधि और लंबी अवधि के कई वित्तीय निवेश विकल्प मौजूद हैं जिनमें से कुछ आगे बताए जा रहे हैं। +संपत्ति के आबंटन की सही रणनीति. +संपत्ति के प्रत्येक वर्ग में खुद के जोखिम और रिटर्न हैं। शेयर में निवेश जोखिम भरा माना जाता है क्योंकि इसमें लगायी गई पूरी पूंजी डूब सकती है, जबकि सरकारी बांड जोखिमरहित माने जाते हैं और आप यह भरोसा कर सकते हैं कि सरकार ब्याज भुगतान करने से नहीं चूकेगी। ऐसे में संपत्ति आबंटन यानी कितना पैसा कहां लगाएं यह महत्वपूर्ण हो जाता है। संपत्ति आबंटन संपत्तियों के विभिन्न वर्ग में धन निवेश करने की एक तकनीकी है जिसे आप अपनी आय की इच्छा और जोखिम उठाने की क्षमता के मुताबिक निवेश के लिए अपनाते हैं। +संपत्ति आबंटन में तीन महत्वपूर्ण चीजों को शामिल किया जाता है- +उम्र, जीवनशैली और परिवार के लिए प्रतिबद्धता के आधार पर आपका वित्तीय लक्ष्य अलग हो सकता है। विभिन्न संपत्तियों में धन लगाते समय यह देखना महत्वपूर्ण है कि विविधकरण से लाभ उठाने के लिए विभिन्न संपत्तियों में धन लगाएं। आमतौर पर एक उम्र आधारित संपत्ति आबंटन में निवेशक की उम्र के आधार पर शेयरों में धन लगाया जाता है। इस माडल के इस्तेमाल का तर्क यह है कि ‘जैसे जैसे निवेशक की उम्र बढती है उसका पोर्टफोलियो रूढीवादी होना चाहिए।‘ +हालांकि यह महज एक व्यवहारिक नियम है और एक निवेश अपनी क्षमता के बेहतर ढंग से आंक सकता है। +स्वयं की तस्वीर उतारना. +वास्तव में आप खुद को वित्तीय रूप में कहां पाते हैं, यह जानने के लिए वित्तीय ब्यौरा तैयार करना सबसे बेहतर तरीकों में से एक हो सकता है। संपत्तियों एवं देनदारियों का एक विस्तृत एवं संपूर्ण लेखाजोखा वित्तीय ब्यौरे का एक प्रमुख घटक है। +लक्ष्यों की पहचान करना. +वित्तीय नियोजन में सबसे महत्वपूर्ण कदम यह समझना और पहचानना है कि आप क्या हासिल करना चाहते हैं। पैसा आपकी इच्छाओं को पूरा करने में महज एक टूल का काम करता है। यह समझकर कि वास्तव में आप क्या चाहते हैं, लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आपको कितने धन की जरूरत है, इसकी योजना बनाना आपके लिए बहुत आसान हो जाता है। +संपत्तियों की पहचान करना. +एक बार जब आपके लक्ष्यों की पहचान हो जाती है तो यह आकलन करने की बारी आती है कि लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कौन सी संपत्तियां उपलब्ध हैं। इन संपत्तियों को उनकी तरलता और दीर्घकालीन मूल्य की स्थिरता के मुताबिक वर्गों में बांटने में जरूरत पडती है। संपत्तियों की पहचान करने और उनका वर्गीकरण करने के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि वे कब और कितनी नकदी पैदा करते हैं। आप अपनी सभी संपत्तियों की एक सूची बनाएं जिसमें अपने मकान, शेयरों, म्यूचुअल फंडों और सावधि जमाओं में निवेश, बचत खाते में पडे धन आदि को शामिल करें। +देनदारियों की पहचान करें. +देनदारियों की पहचान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि उपलब्ध संपत्तियों की पहचान करना। आदर्श स्थिति में संपत्तियां देनदारियों से अधिक होनी चाहिए। अन्यथा देनदारियों को निपटाने और आय अर्जित करने व निवेश उद्देश्यों के लिए कुछ संपत्तियां अपने पास रखने के लिए संपत्तियों में निवेश की योजना की जरूरत पडती है। +भविष्य में आय की संभावना. +भावी आय का अनुमान लगाते समय आपको कुछ धारणा बनाने की जरूरत पडती है। कुछ धारणाएं निम्नलिखित हो सकती हैं। +अगर आप वेतनभोगी कर्मचारी हैं तो यह पूर्वानुमान लगाना सुरक्षित है कि आपकी वेतन आय सेवानिवृत्ति तक सालाना 8 प्रतिशत की दर से बढेगी। +ऋण प्रतिभूतियों पर रिटर्न की दर सालाना 7 प्रतिशत और शेयर सूचकांक पर रिटर्न की दर सालाना 12 प्रतिशत मानी जा सकती है। उपरोक्त कथन केवल सांकेतिक रिटर्न हैं। वास्तविक रिटर्न बाजार परिस्थितियों के मुताबिक भिन्न हो सकते हैं। +भविष्य में खर्च की संभावना. +यहां फिर आपको धारणा बनाने की जरूरत पडती है मसलन लंबी अवधि में सालाना 5 प्रतिशत की मुद्रास्फीति की दर घरेलू और व्यक्तिगत रहन सहन के खर्च (मनोरंजन, शिक्षा, शादी ब्याह आदि पर खर्च) सालाना 8 प्रतिशत दर से बढते हैं (मुद्रास्फीति की दर से 3 प्रतिशत अधिक) +योजना बनाना. +संपत्तियों से नकदी की आवक और देनदारियों के लिए नकदी के भुगतान के बीच तालमेल बिठाना वित्तीय नियोजन का मर्म है। वित्तीय नियोजन में लक्ष्य को देनदारियां माना जाता है क्योंकि आमतौर पर इसे हासिल करने के लिए धन खर्च करने की जरूरत पडती है। यह एक बहुआयामी दृश्टिकोण है। +उदाहरण. +मान लें कि आपका लक्ष्य अपने बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त धन बचाना है। +पहला कदम - यह तय करें कि कितने वर्ष बाद आपके बच्चे को उच्च शिक्षा की जरूरत पडेगी। +दूसरा कदम - आज शिक्षा पर आ रहे खर्च का निर्धारण करें। इसकी गणना में आमतौर पर एक प्रोफेशनल कोर्स के लिए मौजूदा खर्च को मुद्रास्फीति की अनुमानित वार्षिक दर से गुणा कर शामिल कर सकते हैं। +तीसरा कदम - मान लें कि एक प्रोफेशनल खर्च पर आज 1,00,000 रुपये का खर्च आता है तो 5 प्रतिशत मुद्रास्फीति की दर के साथ 12 वर्ष बाद यह खर्च 1,79,585 रुपये हो जाएगा। +चौथा कदम - अगला कदम भविष्य में खर्च की जाने वाली रकम का वर्तमान मूल्य निकालना है। यह करने के लिए आप धन के भावी मूल्य को लें और इसे अपने रिटर्न की अनुमानित दर से भाग दें। मान लें कि 1,00,000 रुपये का भावी मूल्य 1,79,585 रुपये के बराबर है। 12 वर्ष के लिए 8 प्रतिशत की अनुमानित वार्षिक दर के साथ उस भावी मूल्य का वर्तमान मूल्य है 1,79,585/1.0812 जो 71,315 रुपये के बराबर है। इसलिए आपको आज 71,315 रुपये एक ऐसी संपत्ति में लगाने की जरूरत है जहां आपको सालाना औसतन 8 प्रतिशत रिटर्न मिले ताकि आप 12 साल में अपने बच्चे की शिक्षा का खर्च उठा सकें। +पांचवा कदम - भविष्य में होने वाले अनुमानित प्रत्येक खर्च के लिए आपको वर्तमान में हो रहे खर्च की गणना करने और एक ऐसी संपत्ति का पता लगाने लगाने की जरूरत है जिसका इस्तेमाल भविष्य में खर्चों की पूर्ति के लिए किया जा सकता है। यह प्रक्रिया आपके सभी भावी लक्ष्यों के लिए दोहराने की जरूरत है। अपने भावी खर्चों की गणना करें और इसके लिए आज भी बचत करना शुरू करें ताकि आप उन सभी खर्चों को पूरा करने की स्थिति में हों। +बचत एवं निवेश से जुड़े उत्पाद. +बैंक. +बैंक जमाएं सुरक्षित निवेश हैं क्योंकि अधिकतम 1,00,000 रुपये तक तक की बैंक जमाएं भारतीय जमा बीमा एवं क्रेडिट गारंटी स्कीम के तहत बीमित हैं। बैंकों का नियमन भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है। बैंक ग्राहकों की जरूरत के आधार पर विभिन्न किस्म की जमाओं की पेशकश करते हैं। बैंक जमाओं को इसलिए भी अधिक तरजीह दी जाती है क्योंकि उनमें तरलता एवं सुरक्षा निहित होती है, भले ही उन पर रिटर्न अपेक्षाकृत थोडा कम होता है। सावधि जमा की रसीद के आधार पर जमा राशि का 75 से 90 प्रतिशत तक ऋण प्राप्त करना संभव है। +जमाओं के प्रकार एवं उनकी प्रमुख विशेशताएं- +बचत बैंक खाता +बैंक सावधि जमा (बैंक एफडी) +आवर्ती जमा खाता +विशेष बैंक सावधि जमा योजना +सरकारी योजनाएँ. +कर बचाने वाली स्कीमें +भारत सरकार ने आयकर बचत स्कीमें पेश की हैं जिनमें निम्न शामिलहैं: +इनके अलावा, म्यूचुअल फंडों द्वारा पेश इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) और वित्तीय संस्थानों एवं बैंकों द्वारा जारी ढांचागत बांड भी कर लाभ की पेशकश करते हैं। +इनमें निवेश से हुई आय करमुक्त है और इन स्कीमों में निवेश करयोग्य आय से एक निश्चित सीमा तक कटौती योग्य है। +राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र (एनएससी) +लोक भविष्य निधि (पीपीएफ) +डाक घर योजना (पीओएस) +ढांचागत बांड या इंफ्रास्ट्रक्चर बांड +किसान विकास पत्र (केवीपी) +बांड. +बांड एक ऋण है जिसे जारी करने वाला व्यक्ति लेता है और इस प्रतिभूति को खरीदने वाला व्यक्ति देता है और इस पर ब्याज प्राप्त करता है। बांडों को कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और यहां तक कि सरकार द्वारा जारी किया जा सकता है। इसे खरीदने वाला व्यक्ति जारीकर्ता से ब्याज लेता है। परिपक्वता की तिथि पर खरीदार द्वारा बांड का अधिमूल्य प्राप्त किया जाता है जो पूर्व निर्धारित होता है। +बांड के प्रकार +कर बचाने वाले बांड +कर बचाने वाले बांड कर बचत करने वाले बांड निवेश की एक निश्चित राशि तक कर छूट की पेशकश करते हैं जो सरकार द्वारा अधिसूचित स्कीम पर निर्भर है। मसलन +नियमित आय वाले बांड +रेगुलर इनकम बांड एक नियमित, पूर्व निर्धारित अंतराल में आय का एक स्थायी स्रोत उपलब्ध कराते हैं इनमें निम्न बांड शामिल हैं - +प्रमुख विशेशताएँ +डिबेंचर. +प्रमुख विशेशताएँ +डिबेंचर के प्रकार बाजार में कई तरह के डिबेंचर हैं जिनकी पेशकश कंपनियों द्वारा की जाती है। ये निम्न हैं +कंपनी सावधि जमा. +प्रमुख विशेशताएँ +म्यूचुअल फंड. +म्यूचुअल फंड कई निवेशकों से धन इकट्ठा कर उसे शेयरों, बांडों, अल्पावधि मुद्रा बाजार की प्रतिभूतियों, अन्य प्रतिभूतियों या संपत्तियों या इनके मिले जुले रूप में निवेश करता है। म्यूचुअल फंड की इस सम्मिलित हिस्सेदारी को पोर्टफोलियो के तौर पर जाना जाता है। प्रत्येक यूनिट म्यूचुअल फंड की इस सम्मिलित हिस्सेदारी और इससे होने वाली आय में एक निवेशक के आनुपातिक स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करता है। +म्यूचुअल फंडों की प्रमुख विशेशताएँ +म्यूचुअल फंड के प्रकार +प्रत्येक फंड का पूर्व निधार्रित निवेश उद्देश्य होता है जो फंड की संपत्तियों, निवेश के क्षेत्रों और निवेश की रणनीति के मुताबिक पोर्टफोलियो बनाता है। मौलिक आधार पर तीन प्रकार के म्यूचुअल फंड हैं- +सभी म्यूचुअल फंड इन तीन संपत्ति वर्गों के रूपांतरण हैं। उदहारण के तौर पर जहां तेजी से बढ रही कंपनियों में निवेश करने वाले इक्विटी फंड ग्रोथ फंड के तौर पर जाने जाते हैं, एक ही क्षेत्र की कंपनियों में निवेश करने वाले इक्विटी फंड स्पेशियलिटी फंड के तौर पर जाने जाते हैं। +म्यूचुअल फंडों को ओपेन एंडेड या क्लोज एंडेड के तौर पर वर्गीकृत किया जा सकता है जो फंड की परिपक्वता तिथि पर निर्भर होते हैं। +ओपेन एंडेड फंड +क्लोज एंडेड फंड +मनी मार्केट फंड +बांड/इनकम फंड +बैलेंस्ड फंड +इक्विटी फंड +विदेश/अंतरराष्ट्रीय फंड +सेक्टर फंड +इनका लक्ष्य अर्थव्यवस्था के विशेष क्षेत्र पर होता है मसलन वित्तीय, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य आदि। +इंडेक्स फंड +इक्विटी. +साधारण या तरजीही शेयर खरीदकर एक कंपनी में स्वामित्व हित रखना। एक शेयर बाजार कंपनी के शेयरों का कारोबार करने के लिए एक सार्वजनिक बाजार है जहां सम्मत मूल्य पर स्टॉक एक्सचेंज में प्रतिभूतियों की खरीद फरोख्त होती है। ये शेयर सूचीबद्ध होते हैं और स्टॉक एक्सचेंज में इनका कारोबार होता है। एक्सचेंज शेयरों की खरीद फरोख्त की सुविधा मुहैया कराते हैं। भारत में प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) हैं। एक स्टॉक एक्सचेंज का उद्देश्य खरीदार और विक्रेता के बीच प्रतिभूतियों की ट्रेडिंग की सुविधा उपलब्ध कराना है। शेयरों में निवेश अधिक जोखिम भरा है और निश्चित तौर पर यह अन्य निवेश की तुलना में अधिक समय की मांग करता है। +दो तरह से शेयरों में निवेश किया जा सकता है- +वित्तीय नियोजन का पिरामिड. +निवेश विकल्प चुनने में जोखिमध्रिवार्ड भरे सौदों पर ध्यान देकर यह देखना कि आपके कौन से निवेश सही हैं, जरूरी है क्योंकि ज्यादातर लोगों की अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के बारे में अलग अलग विचार होते हैं। कुछ लोग रूढीवादी होते हैं और अपना पैसा सुरक्षित जगह रखना चाहते हैं जैसे बचत खाता। अन्य लोग अधिक आक्रामक होते हैं और शेयर बाजार जैसे अधिक जोखिम वाले स्थान में निवेश के इच्छुक होते हैं। अंततरू आपको यह निर्णय करना है कि कीमतों में उतार चढाव वाले निवेश के साथ आप कितना आराम महसूस करेंगे। बेशक जोखिम लेने के लिए रिवार्ड निवेश पर आपका रिटर्न है। यह रिवार्ड ब्याज या लाभांश (जिसे आप एक शेयरधारक के तौर पर लाभ के हिस्से के रूप में प्राप्त करते हैं) के रूप में लिया जा सकता है। रिटर्न शेयर की कीमतें बढने से पूंजीगत लाभ के रूप में भी आ सकता है। अगर एक निवेशक एक शेयर खरीदता है और बाद में उसे अधिक कीमत पर बेचता है तो शेयर के खरीद और बिक्री मूल्य के बीच अंतर पूंजीगत लाभ कहलाता है। इसलिए अगर आप वर्ष 2000 में एक शेयर 10 रुपये में खरीदते हैं और 2005 में इसे 25 रुपये में बेच देते हैं तो आपका लाभ या पूंजीगत लाभ 15 रुपये प्रति शेयर है। अगर एक निवेशक खरीद मूल्य से कम पर शेयर बेचता है तो खरीद मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच का अंतर पूंजीगत हानि कहलाती है। रिटर्न के बारे में बात करते समय लोग आमतौर पर निवेश के रिटर्न की दर या ब्याज दर का हवाला देते हैं जो एक निवेश पर वार्षिक प्रतिशत रिटर्न है। संक्षेप में यह आपको बताता है कि कितनी तेजी से आपका पैसा बढता है। +पोंजी स्कीम. +पोंजी स्कीम पोंजी स्कीम एक फर्जी निवेश परिचालन है जो निवेशकों को कम जोखिम पर अधिक रिटर्न का झांसा देता है। इस स्कीम के तहत पुराने निवेशकों के लिए उन्हीं के पैसे या बाद के निवेशकों के पैसे से रिटर्न पैदा किया जाता है। पोंजी स्कीम चलाने वाले लोग विज्ञापन में जो रिटर्न देने का दावा करते हैं, उसका भुगतान करने और स्कीम को चलाते रहने के लिए उन्हें निवेशकों से सतत धन लेने की जरूरत पडती है और लगातार नए निवेशक बनाने होते हैं। अगर पोंजी स्कीम चलाने वाले व्यक्ति को निवेशकों को किए जाने वाले भुगतान से कम आय होती है तो यह स्कीम ढहना निश्चित है। आमतौर पर पोंजी स्कीम के ढहने से पहले ही कानूनी प्राधिकरणों द्वारा इसे रोक दिया जाता है क्योंकि एक पोंजी स्कीम संदिग्ध होती है या प्रवर्तक गैर पंजीकृत प्रतिभूतियों को बेच रहा होता है। इस स्कीम में बडी संख्या में निवेशकों के शामिल होने से इस स्कीम पर कानूनी अधिकारियों की नजर पडने की संभावना बढ जाती है। +कैसे पता लगाएं कि अमुक स्कीम पोंजी स्कीम है +पोंजी स्कीम के तहत प्रायः ऐसे रिटर्न की पेशकश की जाती है जिसकी गारंटी अन्य निवेश स्कीमें नहीं दे सकतीं। कम समय में असामान्य रूप से अधिक या लगातार रिटर्न मिलने की गारंटी देकर नए निवेशकों को लुभाया जाता है। अन्य शब्दों में यह इतना अच्छा लगता है कि इस पर विश्वास नहीं होता। +पोंजी स्कीम अंततरू उजागर हो जाती है जैसा कि +डिपजिटरी सिस्टम. +शेयरों में निवेश के लिए ‘डीमैटेरियलाइजेशन ऑफ शेयर्स’ का अर्थ समझना आवश्यक है क्योंकि लगभग सभी शेयर अब ‘‘डीमैट’’ रूप में हैं। पहले कागज में शेयर प्रमाण पत्र जारी किए जाते थे जिन्हें अब इलेक्ट्रॉनिक रूप में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिए डिपॉजिटरी सिस्टम को समझना आवश्यक है। एक डिपॉजिटरी एक ऐसा संगठन है जो निवेशकों के अनुरोध पर एक पंजीकृत डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट के जरिए निवेशकों की प्रतिभूतियों (जैसे शेयर, डिबेंचर, बांड, सरकारी प्रतिभूतियां, म्यूचुअल फंड आदि) को इलेक्ट्रॉनिक रूप में अपने पास रखता है। यह प्रतिभूतियों के लेनदेन से जुडी सेवाएं भी उपलब्ध कराता है। इसकी तुलना एक बैंक से की जा सकती है जो जमाकर्ताओं के लिए कोष अपने पास रखता है। वर्तमान में दो डिपॉजिटरी- नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (एनएसडीएल) और सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (सीडीएसएल) हैं जो सेबी में पंजीकृत हैं। +एक डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट (डीपी) डिपॉजिटरी का एक एजेंट है जिसके जरिए वह निवेशकों को डिपॉजिटरी सेवाएं उपलब्ध कराता है। सार्वजनिक वित्तीय संस्थान, अधिसूचित वाणिज्यिक बैंक, भारत में परिचालन कर रहे विदेशी बैंक, राज्य वित्त निगम, कस्टोडियन, शेयर ब्रोकर, क्लियरिंग कॉरपोरेशनध्क्लियरिंग हाउस, नबीएफसी और एक इश्यू का रजिस्ट्रार या सेबी के नियमों को पूरा करने वाला शेयर ट्रांसफर एजेंट डीपी के तौर पर पंजीकृत हो सकता है। बैंकिंग सेवाएं एक शाखा के जरिए ली जा सकती है, जबकि डिपॉजिटरी सेवाएं एक डीपी के जरिए ली जा सकती हैं। स्टॉक एक्सचेंज में कारोबार करने या पब्लिक इश्यू के लिए आवेदन के लिए अब हर निवेशक के लिए एक बेनीफेशियल ओनर (बीओ) खाता खुलाना अनिवार्य है। इसलिए नीचे सूचीबद्ध सुविधाओं को देखते हुए एक बेनीफिशियल ओनर खाता खुलवाने की सलाह दी जाती है। +हालांकि, छोटे निवेशकों (न्यूनतम 500 शेयर रखने वाले, चाहे उनका मूल्य जो भी हो) को भौतिक रूप में शेयरों की ट्रेडिंग की सुविधा के लिए स्टॉक एक्सचेंज एक अतिरिक्त ट्रेडिंग विंडों उपलब्ध कराते हैं। ये ट्रेडिंग विंडों छोटे निवेशकों को भौतिक रूप में शेयर बेचने के लिए एक बार सुविधा देते हैं जिसका डीमैट लिस्ट में होना अनिवार्य है। इन शेयरों को खरीदने वाले व्यक्ति को उन्हें आगे बेचने के लिए ऐसे शेयरों को डीमैट रूप में तब्दील कराना होता है। +डिपॉजिटरी सेवाओं से होने वाले लाभों में नीचे दिए गए लाभ शामिल हैं- +याद रखने योग्य बातें +निवेश के तत्व ज्ञान +सुरक्षा से जुड़े उत्पाद. +बीमा पालिसियां. +बीमा, जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है भविष्य में नुकसान से बचाव के लिए एक बीमा है। हालांकि, जहां जीवन बीमा आम है, अन्य स्कीमें भी बाजार में मौजूद हैं जो नियमित आय के साथ ही अन्य किस्म के नुकसान को कवर प्रदान करती हैं। +जीवन बीमा. +जीवन बीमा एक ऐसा अनुबंध है जिसमें बीमित व्यक्ति या उसके द्वारा नामित व्यक्ति को कोई घटना घटित होने पर एकमुश्त राशि का भुगतान किया जाता है। मृत्यु की दशा में यह आपके परिवार की वित्तीय रूप से रक्षा करने के लिए एक बढिया तरीका है। +मियादी जीवन बीमा +एंडोमेंट पॉलिसियां +एन्युटी/पेंशन पॉलिसियां/फंड +यूनिट लिंक्ड बीमा पालिसी (यूलिप) +न्यू पेंशन स्कीम, 2009 +स्वास्थ्य बीमा. +स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां विभिन्न बीमारियों से आपको कवर प्रदान करती हैं और जब भी आपको इलाज की जरूरत पडे वित्तीय रूप से सुरक्षित बने रहने की गारंटी देती हैं। ये आपकी मानसिक शांति की रक्षा करती हैं और इलाज खर्च के बारे में आपकी सभी चिंताएं दूर करती हैं जिससे आप अन्य महत्वपूर्ण चीजों पर अपना ध्यान केंद्रित करें। भारत में कई स्वास्थ्य बीमा या मेडिकल बीमा योजनाएं मौजूद हैं जिन्हें जोखिम कवर के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है। +व्यापक स्वास्थ्य बीमा कवरेज: ये पॉलिसियां आपको अस्पताल में भर्ती होने पर संपूर्ण हेल्थकेयर कवरेज उपलब्ध कराती हैं। इसके साथ ही ये एक स्वास्थ्य कोष का सृजन करती हैं ताकि अन्य स्वास्थ्य संबंधी खर्चे पूरे किए जा सकें। +हॉस्पिटलाइजेशन प्लान: ये स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां आपके खर्चों के लिए तब बीमा कवर उपलब्ध कराती हैं जब आपको अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पडे। इस वर्ग में पॉलिसियों में भुगतान के अलग अलग ढांचे होते हैं और विभिन्न खर्चों के लिए सीमाएं होती हैं। अस्पताल में भर्ती होने पर इलाज खर्च का भुगतान कर उसे बाद में बीमा कंपनी से लिया जा सकता है। ऐसी पॉलिसियों का लक्ष्य बार बार अस्पताल जाने वाले लोगों के इलाज खर्चों के प्रति कवर प्रदान करना है। +गंभीर बीमारियों के लिए पॉलिसियां: ये हेल्थ इंश्योरेंस प्लान आपको दिल का दौरा, अंग प्रत्यारोपड, घात या किडनी खराब होने जैसी गंभीर बीमारियों के प्रति कवर प्रदान करते हैं। इन पॉलिसियों का लक्ष्य उन लोगों को कवर प्रदान करना है जो कभी कभार अस्पताल जाते हैं, लेकिन उन्हें महंगे इलाज की जरूरत पड सकती है। +विशेष परिस्थिति में कवरेज: इस तरह के प्लान में मधुमेह या कैंसर के चलते पैदा होने वाली जटिलताओं के प्रति स्वास्थ्य बीमा की पेशकश की जाती है। इनमें रोग प्रबंधन कार्यक्रम जैसी विशेशताएं शामिल हो सकती हैं। +उधारी से जुडे उत्पाद. +आज के इस दौर में ठाठ बाठ से रहने के लिए कर्ज एक आम चीज हो गई है। बहुत से लोग पर्सनल लोन, कार लोन, मार्गेज लोन या दूसरे तरह के लोन के लिए आवेदन करते हैं। ऐसा लगता है कि हर चीज के लिए लोन उपलब्ध है। अक्सर जरूरत से अधिक ऋण लेने पर वित्तीय संकट शुरू हो जाता है। +बाजार में विभिन्न किस्म के लोन उपलब्ध हैं +पर्सनल लोन. +पर्सनल लोन आमतौर पर तब लिए जाते हैं जब एक व्यक्ति को आकस्मिक जरूरतों को पूरा करना होता है जो उसके तात्कालिक वित्तीय संसाधन से परे होता है। महज अतिरिक्त धन के लिए या विलासिता की वस्तुएं खरीदने के लिए पर्सनल लोन लेकर लोग अक्सर वित्तीय संकट में फंस जाते हैं और उनके लिए मासिक किस्त का भुगतान करना मुश्किल हो जाता है। +प्रमुख विशेशताएँ +हाउसिंग लोन (आवास ऋण). +होम लोन एक ऐसा लोन है जिसे आप अपना घर गिरवी रखकर लेते हैं। अगर आप पहला मकान खरीद रहे हैं तो इस लोन के नफा नुकसान के बारे में समझना महत्वपूर्ण है। अर्थव्यवस्था के मुताबिक कई तरह के बदलाव आते हैं और बाजार में क्या चल रहा है, यह आपके होम लोन पर लागू होने वाली चीजों को निर्धारित करता है। +प्रमुख विशेशताएं +रिवर्स मॉर्गेज. +रिवर्स मॉर्गेज का संपूर्ण विचार रेगुलर मॉर्गेज प्रक्रिया के बिल्कुल उलट है जहां एक व्यक्ति गिरवी रखी संपत्ति छुडाने के लिए बैंक को ऋण का पुनर्भुगतान करता है। यह अवधारणा खासकर पश्चिमी देशों में लोकप्रिय है। +प्रमुख विशेशताएं +प्रतिभूतियों के बदले ऋण. +शेयरों के बदले ऋण लेने का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत जरूरतों का ख्याल रखने के अलावा निवेश का संरक्षण करना है। लोग आपात स्थिति से निपटने और बिना शेयर बेचे नकदी हासिल करने के लिए भी इस तरह का ऋण ले लेते हैं। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे प्रतिभूतियों के बदले ऋण तभी लें जब उन्हें एक समय बाद कुछ निश्चित आय होने की उम्मीद हो और बीच में कुछ धन की जरूरत हो। +प्रमुख विशेशताएँ +कृपया प्रत्येक ऋण के लिए नवीनतम दिशानिर्देश/प्रावधान देखें। +क्रेडिट कार्ड ऋण. +जब पर्सनल लोन सहित ऋण के सभी अन्य विकल्प खत्म हो जाते हैं तो लोग आमतौर पर क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर ऋण ले लेते हैं। क्रेडिट कार्ड ऋण असुरक्षित है, इसलिए इस पर बहुत अधिक दर पर ब्याज लिया जाता है। एक क्रेडिट कार्ड आपको तब भी खर्च करने का अधिकार देता है जब आपके पास बिल्कुल पैसा नहीं होता। बहुत से युवा लोग इसका इस्तेमाल कर फिजूल की चीजें खरीद लेते हैं। क्रेडिट कार्ड ऋण से दूर ही रहें। क्रेडिट कार्ड ऋण को लेकर बहुत से लोगों को दिक्कतों का सामना करना पडता है। मामूली चीजों के लिए भारी कीमत चुकानी पडती है और आप लंबे समय के लिए ऋण के बोझ से दब जाते हैं। स्थायी रूप से जितना अधिक हो सके ऋण का पुनर्भुगतान करने की कोषिश करें और राहत महसूस करें। +प्रमुख विशेशताए +अत्यधिक ऋण से बचने के उपाय. +ऋण की सीमा तय करें +यह तय करें कि ऋण का कितना बोझ आप उठा सकते हैं। फिर यह सुनिश्चित करें कि आपका कुल ऋण इस सीमा से कम हो। +आप यह सीमा भी तय कर सकते हैं कि हर महीने होने वाली आमदनी में से कितनी रकम आप इस ऋण पर खर्च करना चाहेंगे। आप अपनी ऋण सीमा न लांघें यह सुनिश्चित करने में इस तरह की सीमा काफी उपयोगी हो सकती है। +ऋण के लिए सावधानीपूर्वक जांच परख करें +लाभ के झांसे में न आए +अपने बिलों के स्वतः भुगतान वाली प्रणाली अपनाएँ +कई बैंक और नियोक्ता आपको अपने वेतन से कुछ पैसा स्वतरू कटने वाली प्रणाली अपनाने की सुविधा देते हैं। आपके बिल का सही समय पर भुगतान हो जाए यह सुनिश्चित करने के लिए यह एक बेहतर रास्ता हो सकता है। साथ ही चूंकि आपको यह पैसा देखने को भी नहीं मिलेगा, इसलिए आपको हाथ से पैसा निकलने का अफसोस भी नहीं होगा। +वित्तीय शिक्षा के लाभ. +वित्तीय शिक्षा पर आवश्यक जोर दो क्षेत्रों से दी जाती है पहला व्यक्तिगत धन में कमी आना है। आज युवा लोग अपनी हैसियत से अधिक जीवन जीवने पर उतारू हैं जिसके लिए वे क्रेडिट कार्ड लेते हैं और जोखिम भरा निवेश करते हैं। दूसरा नया एवं प्रायरू जटिल वित्तीय उत्पादों का प्रसार जिसमें उपभोक्ताओं से अधिक वित्तीय दक्षता की उम्मीद की जाती है। संकटग्रस्त बाजार की स्थितियां और कर कानूनों में बदलाव बेहतर वित्तीय शिक्षा की जरूरत बढा देते हैं। यहां तक कि सरकारी कर्मचारी भी पूर्व की स्कीमों से अब निर्धारित अंशदान व्यवस्था की ओर रूख कर रहे हैं जिसमें सेवानिवृत्ति पर लाभ परिभाशित है। इसलिए सेवानिवृत्ति की योजना बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। +वित्तीय शिक्षा के कुछ लाभ हैं: + +वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति: +प्रहसन +नांदी +दोहा - बहु बकरा बलि हित कटैं, जाके। बिना प्रमान। +सो हरि की माया करै, सब जग को कल्यान।। +सूत्रधार और नटी आती हैं, +सूत्रधार : अहा हा! आज की संध्या की कैसी शोभा है। सब दिशा ऐसा लाल हो रही है, मानो किसी ने बलिदान किया है और पशु के रक्त से पृथ्वी लाल हो गई है। +नटी : कहिए आज भी कोई लीला कीजिएगा? +सूत्रधार : बलिहारी! अच्छी याद दिखाई, हाँ जो लोग मांसलीला करते हैं उनकी लीला करैंगे। +नेपथ्य में, अरे शैलूषाधम! तू मेरी लीला क्या करैगा। चल भाग जा, नहीं तो तुझे भी खा जायेंगे। +दोनो संभय, अरे हमारी बात गृध्रराज ने सुन ली, अब भागना चाहिए नहीं तो बड़ा अनर्थ करैगा। +दोनो जाते हैं, +इति प्रतावना +प्रथम अंक +नेपथ्य में, बढ़े जाइयो! कोटिन लवा बटेर के नाशक, वेद धर्म प्रकाशक, मंत्र से शुद्ध करके बकरा खाने वाले, दूसरे के माँस से अपना माँस बढ़ाने वाले, सहित सकल समाज श्री गृध्रराज महाराजाधिराज! +गृध्रराज, चोबदार, पुरोहित और मंत्री आते हैं, +राजा : बैठकर, आज की मछली कैसी स्वादिष्ट बनी थी। +पुरोहित : सत्य है। मानो अमृत में डुबोई थी और ऐसा कहा भी है- +केचित् बदन्त्यमृतमस्ति सुरालयेषु केचित् वदन्ति वनिताधरपल्लवेषु। ब्रूमो वयं सकलशास्त्रविचारदक्षाः जंबीरनीरपरिपूरितमत्स्यखण्डे।। +राजा : क्या तुम ब्राह्मण होकर ऐसा कहते हो? ऐं तुम साक्षात् ऋषि के वंश में होकर ऐसा कहते हो! +पुरोहित : हाँ हाँ! हम कहते हैं और वेद, शास्त्र, पुराण, तंत्र सब कहते हैं। ”जीवो जीवस्य जीवनम्“ +राजा : ठीक है इसमें कुछ संदेह नहीं है। +पुरोहित : संदेह होता तो शास्त्र में क्यों लिखा जाता। हाँ, बिना देवी अथवा भैरव के समर्पण किए कुछ होता हो तो हो भी। +मंत्री : सो भी क्यों होने लगा भागवत में लिखा है। +”लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्ति जन्तोर्नहि तत्र चोदना।“ +पुरोहित : सच है और देवी पूजा नित्य करना इसमें कुछ सन्देह नहीं है, और जब देवी की पूजा भई तो माँस भक्षण आ ही गया। बलि बिना पूजा होगी नहीं और जब बलि दिया तब उसका प्रसाद अवश्य ही लेना चाहिए। अजी भागवत में बलि देना लिखा है, जो वैष्णवों का परम पुरुषार्थ है। +‘धूपोपहारबलिभिस्सर्वकामवरेश्वरीं’ +मंत्री : और ‘पंचपंचनखा भक्ष्याः’ यह सब वाक्य बराबर से शास्त्रों में कहते ही आते हैं। +पुरोहित : हाँ हाँ, जी, इसमें भी कुछ पूछना है अभी साक्षात् मनु जी कहते हैं- +‘न मांस भक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने’ +और जो मनुजी ने लिखा है कि- +‘स्वमांसं परमांसेन यो बर्द्धयितुमिच्छति’ +सो वही लिखते हैं। +‘अनभ्यच्र्य पितृन् देवान्’ +इससे जो खाली मांस भक्षण करते हैं उनको दोष है। महाभारत में लिखा है कि ब्राह्मण गोमाँस खा गये पर पितरों को समर्पित था इससे उन्हें कुछ भी पाप न हुआ। +मंत्री : जो सच पूछो तो दोष कुछ भी नहीं है चाहे पूजा करके खाओ चाहे वैसे खाओ। +पुरोहित : हाँ जी यह सब मिथ्या एक प्रपंच है, खूब मजे में माँस कचर-कचर के खाना और चैन करना। एक दिन तो आखिर मरना ही है, किस जीवन के वास्ते शरीर का व्यर्थ वैष्णवों की तरह क्लेश देना, इससे क्या होता है। +राजा : तो कल हम बड़ी पूजा करैंगे एक लाख बकरा और बहुत से पक्षी मँगवा रखना। +चोबदार : जो आज्ञा। +पुरोहित : उठकर के नाचने लगा, अहा-हा! बड़ा आनंद भया, कल खूब पेट भरैगा। +ख्राग कान्हरा ताल चर्चरी, +धन्य वे लोग जो माँस खाते। +मच्छ बकरा लवा समक हरना चिड़ा भेड़ इत्यादि नित चाभ जाते।। +प्रथम भोजन बहुरि होई पूजा सुनित अतिही सुखमा भरे दिवस जाते। +स्वर्ग को वास यह लोक में है तिन्हैं नित्य एहि रीति दिन जे बिताते।। +नेपथ्य में वैतालिक, +राग सोरठ। +सुनिए चित्त धरि यह बात। +बिना भक्षण माँस के सब व्यर्थ जीवन जात। +जिन न खायो मच्छ जिन नहिं कियो मदिरा पान। +कछु कियो नहिं तिन जगत मैं यह सु निहचै जान।। +जिन न चूम्यौ अधर सुंदर और गोल कपोल। +जिन न परस्यौ कुंभ कुच नहिं लखी नासा लोल।। +एकहू निसि जिन न कीना भोग नहिं रस लीन। +जानिए निहचै ते पशु हैं तिन कछू नहिं कीन।। +दोहा: एहि असार संसार में, चार वस्तु है सार। +जूआ मदिरा माँस अरु, नारी संग बिहार।। +क्योंकि- +”माँस एव परो धर्मो मांस एव परा गतिः। +मांस एव परो योगी मांस एव परं तपः ।।“ +हे परम प्रचण्ड भुजदण्ड के बल से अनेक पाखण्ड के खष्ड को खण्डन करने वाले, नित्य एक अजापुत्र के भक्षण की सामथ्र्य आप में बढ़ती जाय और अस्थि माला धारण करने वाले शिवजी आप का कल्याण करैं आप बिना ऐसी पूजा और कौन करे। आकर बैठता है, +पुरोहित : वाह वाह! सच है सच है। +नेपथ्य में, +पतीहीना तु या नारी पत्नीहीनस्तु नः पुमान्। +उभाभ्यां षण्डरण्डाभ्यान्न दोषो मनुरब्रबीत।। +सब चकित होकर, +ऐसा मालूम होता है कि कोई पुनर्विवाह का स्थापन करने वाला बंगाली आता है। +बड़ी धोती पहिने बंगाली आता है, +बंगाली : अक्षर जिसके सब बे मेल, शब्द सब बे अर्थ न छंद वृत्ति, न कुछ, ऐसे भी मंत्र जिसके मुँह से निकलने से सब काय्र्यों के सिद्ध करने वाले हैं ऐसी भवानी और उनके उपदेष्टा शिवजी इस स्वतंत्र राजा का कल्याण करैं। +राजा दण्डवत् करके बैठता है, +राजा : क्यों जी भट्टाचार्य जी पुनर्विवाह करना या नहीं। +बंगाली : पुनर्विवाह का करना क्या! पुनर्विवाह अवश्य करना। सब शास्त्र को यही आज्ञा है, और पुनर्विवाह के न होने से बड़ा लोकसान होता है, धर्म का नाश होता है, ललनागन पुंश्चली हो जाती है जो विचार कर देखिए तो विधवागन का विवाह कर देना उनको नरक से निकाल लेना है और शास्त्र की भी आज्ञा है। +”नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ। पंचस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ।। +ब्राह्मणों ब्राह्मणों गच्छेद्यती गच्छेत्तपस्विनी। +अस्त्री को विधवां, गच्छेन्न दोषो मनुरब्रवीत् ।।“ +राजा : यह वचन कहाँ का है? +बंगाली : यह वचन श्रीपराशर भगवान् का है जो इस युग के धर्मवक्ता हैं। +यथा - ‘कलौ पाराशरी स्मृतिः’ +राजा : क्यों पुरोहित जी, आप इसमें क्या कहते हैं? +पुरोहित : कितने साधारण धर्म ऐसे हैं कि जिनके न करने से कुछ पाप नहीं होता, जैसा-”मध्याद्दे भोजनं कुर्यात्“ तो इसमें न करने से कुछ पाप नहीं है, वरन व्रत करने से पुण्य होता है। इसी तरह पुनर्विवाह भी है इसके करने से कुछ पाप नहीं होता और जो न करै तो पुण्य होता है। इसमें प्रमाण श्रीपाराशरीय स्मृति में- +"मृते भर्तरि या नारी ब्रह्मचय्र्यव्रते स्थिता। +सा नारी लभते स्वर्गं यावच्चंद्रदिवाकरौ ।।" +इस वचन से, और भी बहुत जगह शास्त्र में आज्ञा है, सो जो विधवा विवाह करती हैं उनको पाप तो नहीं होता पर जो नहीं करतीं उनको पुण्य अवश्य होता है, और व्यभिचारिणी होने का जो कहो सो तो विवाह होने पर भी जिस को व्यभिचार करना होगा सो करै ही गी जो आप ने पूछा वह हमारे समझ में तो यों आता है परन्तु सच पूछिए तो स्त्री तो जो चाहे सो करै इन को तो दोष ही नहीं है- +‘न स्त्री जारेण दुष्यति’। ‘स्त्रीमुखं तु सदा शुचि’। +‘स्त्रियस्समस्ताः सकला जगत्सु’। ‘व्यभिचारादृतौ शुद्धिः’। +इनके हेतु तो कोई विधि निषेध है ही नहीं जो चाहैं करैं, चाहै जितना विवाह करैं, यह तो केवल एक बखेड़ा मात्र है। +सब एक मुख होकर, सत्य है, वाह वे क्यों न हो यथार्थ है। +चोबदार : सन्ध्या भई महाराज! +राजा : सभा समाप्त करो। +इति प्रथमांक +द्वितीय अंक +राजा, मंत्री, पुरोहित और उक्त भट्टाचाय्र्य आते हंै और अपने-अपने स्थान पर बैठते हैं।, +चोबदार : आकर, श्रीमच्छंकराचाय्र्यमतानुयायी कोई वेदांती आया है। +राजा : आदरपूर्वक ले आओ। +विदूषक आया, +विदूषक : हे भगवान् इस बकवादी राजा का नित्य कल्याण हो जिससे हमारा नित्य पेट भरता है। हे ब्राह्मण लोगो! तुम्हारे मुख में सरस्वती हंस सहित वास करै और उसकी पूंछ मुख में न अटवै। हे पुरोहित नित्य देवी के सामने मराया करो और प्रसाद खाया करो। +बीच में चूतर फेर-कर बैठ गया, +राजा : अरे मूर्ख फिर के बैठ। +विदूषक : ब्राह्मण को मूर्ख कहते हो फिर हम नहीं जानते जो कुछ तुम्हें दंड मिलै, हाँ! +राजा : चल मुझ उद्दंड को कौन दंड देने वाला है। +विदूषक : हाँ फिर मालूम होगा। +ख्वेदांती आए, +राजा : बैठिए। +वेदांती : अद्वैतमत के प्रकाश करने वाले भगवान् शंकराचार्य इस मायाकल्पित मिथ्या संसार से तुझको मुक्त करैं। +विदूषक : क्यों वेदांती जी, आप माँस खाते हैं कि नहीं? +वेदांती : तुमको इससे कुछ प्रयोजन है? +विदूषक : नहीं, कुछ प्रयोजन तो नहीं है। हमने इस वास्ते पूछा कि आप वेदांती अर्थात् बिना दाँत के हैं सो आप भक्षण कैसे करते होंगे। +ख्वेदांती टेढ़ी दृष्टि से देखकर चुप रह गया। सब लोग हँस पड़े, +विदूषक : बंगाली से, तुम क्या देखते हो? तुम्हें तो चैन है। बंगाली मात्र मच्छ भोजन करते हैं। +बंगाली : हम तो बंगालियों में वैष्णव हैं। नित्यानंद महाप्रभु के संप्रदाय में हैं और मांसभक्षण कदापि नहीं करते और मच्छ तो कुछ माँसभक्षण में नहीं। +वेदांती : इसमें प्रमाण क्या? +बंगाली : इसमें यह प्रमाण कि मत्स्य की उत्पत्ति वीर्य और रज से नहीं है। इनकी उत्पत्ति जल से है। इस हेतु जो फलादिक भक्ष्य हैं तो ये भी भक्ष्य हैं। +पुरोहित : साधु-सधु! क्यों न हो। सत्य है। +वेदांती : क्या तुम वैष्णव बनते हो? किस संप्रदाय के वैष्णव हो? +बंगाली : हम नित्यानंद महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय में हैं और श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु श्रीकृष्ण ही हैं, इसमें प्रमाण श्रीभागवत में- +कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं सांगोपांगास्त्रपार्षदैः। +यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति ह्यणुमेधसा।। +वेदांती : वैष्णवों के आचाय्र्य तो चार हैं। तो तुम इन चारों से विलक्षण कहाँ से आए? +अतः कलौ भविष्यन्ति चत्वारः सम्प्रदायिनः। +राजा : जाने दो, इस कोरी बकवाद का क्या फल है? +ख्नेपथ्य में, +उमासहायं परमेश्वरं विभुं त्रिलोचनं नीलकंठं दयालुम्। +पुनः, गोविन्द नारायण माधवेति। +पुरोहित : कोई वैष्णव और शैव आते हैं। +राजा : चोबदार, जा करके अन्दर से ले आओ। ख्चोबदार बाहर गया, वैष्णव और शैव को लेकर फिर आया, +ख्राजा ने उठकर दोनों को बैठाया, +दोनों-शंख कपाल लिए कर मैं, कर दूसरे चक्र त्रिशूल सुधारे। +माल बनी मणि अस्थि की कंठ मैं, तेज दसो दिसि माँझ पसारे।। +राधिका पारवती दिसि बाम, सबैं जगनाशन पालनवारे। +चंदन भस्म को लेप किए हरि ईश, हरैं सब दुःख तुम्हारे।। +बंगाली : महाराज, शैव और वैष्णव ये दोनों मत वेद के बाहर हैं। +सर्वे शाक्त द्विजाः प्रोक्ता न शैवा न च वैष्णवाः। +आदिदेवीमुपासन्ते गायत्रीं वेदमातरम्।। +तथा : तस्मन्माहेश्वरी प्रजा। +इस युग का शास्त्र तंत्र है। +कृते श्रुत्युक्तमार्गाश्च त्रेतायां स्मृतिभाषिताः। +द्वापरे वै पुराणोक्ताः कलावागमसंभवाः।। +और कंठी रुद्राक्ष तुलसी की माला तिलक यह सब अप्रमाण है। +शैव : मुंह सम्हाल के बोला करो, इस श्लोक का अर्थ सुनो, सर्वे शाक्ता द्विजाः प्रोक्ताः परंतु, शैवा वैष्णवा न शाक्ताः प्रोक्ताः। जो केवल गायत्री की उपासना करते हैं वे शाक्त हैं। ‘पुराणे हरिणा प्रोक्तौ मार्गो द्वौ शैववैष्णवौ’। और वेदों करके वेद्य शिव ही हैं। +बंगाली : भवव्रतधारा ये च ये च तान्समनुव्रताः। +पाखण्डिनश्च ते सव्र्वे सच्छास्त्रपरिपन्थिनः।। +इस वाक्य में क्या कहते हैं? +शैव : इस वाक्य में ठीक कहते हैं। इसके आगे वाले वाक्यों से इसको मिलाओ। यह दोनों तांत्रिकों ही के वास्ते लिखते हैं। वह शैव कैसे कि- +‘नष्टशौचा मूढ़धियो जटा भस्मास्थिधारिणः। +विशन्तु शिवदीक्षायां यत्र दैवं सुरासवम् ।।’ +तो जहाँ दैव सुरा और आसव यही है अर्थात् तांत्रिक शैव, कुछ हम लोग शुद्ध शैव नहीं। +राजा : भला वैष्णव और शैव माँस खाते हैं कि नहीं? +शैव : महाराज, वैष्णव तो नहीं खाते और शैवों को भी न खाना चाहिए परंतु अब के नष्ट बुद्धि शैव खाते हैं। +पुरोहित : महाराज, वैष्णवों का मत तो जैनमत की एक शाखा है और महाराज दयानंद स्वामी ने इन सबका खूब खण्डन किया है, पर वह तो देवी की मूर्ति भी तोड़ने को कहते हैं। यह नहीं हो सकता क्योंकि फिर बलिदान किसके सामने होगा? +ख्नेपथ्य में, नारायण +राजा : कोई साधु आता है। +ख्धूर्तशिरोमणि गंडकीदास का प्रवेश, +राजा : आइए गंडकीदास जी। +पुरोहित : गंडकीदासजी हमारे बडे़ मित्र हैं। यह और वैष्णवों की तरह जंजाल में नहीं फँसे हैं। यह आनंद से संसार का सुख भोग करते हैं। +गंडकीदास : ख्धीरे से पुरोहित से, अजी, इस सभा में हमारी प्रतिष्ठा मत बिगाड़ो। वह तो एकांत की बात है। +पुरोहित : वाह जी, इसमें चोरी की कौन बात है? +गंडकी : ख्धीरे से, यहाँ वह वैष्णव और शैव बैठे हैं। +पुरोहित : वैष्णव तुम्हारा क्या कर लेगा! क्या किसी की डर पड़ी है? +विदूषक : महाराज, गंडकीदास जी का नाम तो रंडादासजी होता तो अच्छा होता। +राजा : क्यों? +विदूषक : यह तो रंडा ही के दास हैं। +आशङ्खचक्रातबाहुदण्डा गृहे समालिगितघालरण्डाः। +अथच-भण्डा भविष्यन्ति कलौ प्रचण्डाः। +रण्डामण्डलमण्डनेषु पटवो धूर्ताः कलौ वैष्णवाः। +शैव, वैष्णव और वेदांती: अब हम लोग आज्ञा लेते हैं। इस सभा में रहने का हमारा धर्म नहीं। +विदूषक : दंडवत्, दंडवत् जाइए भी किसी तरह। +सब जाते हैं, +विदूषक : महाराज, अच्छा हुआ यह सब चले गए। अब आप भी चलें। पूजा का समय हुआ। +राजा : ठीक है। +जवनिका गिरती है, +तृतीय अंक +पुरोहित गले में माला पहिने टीका दिए बोतल लिए उन्मत्त सा आता है, +पुरोहित : ख्घूमकर, वाह भगवान करै ऐसी पूजा नित्य हो, अहा! राजा धन्य है कि ऐसा धर्मनिष्ठ है, आज तो मेरा घर माँस मदिरा से भर गया। अहा! और आज की पूजा की कैसी शोभा थी, एक ओर ब्राह्मणों का वेद पढ़ना, दूसरी ओर बलिदान वालों का कूद-कूदकर बकरा काटना ‘वाचं ते शुंधामि’, तीसरी ओर बकरों का तड़पना और चिल्लाना, चैथी ओर मदिरा के घड़ों की शोभा और बीच में होम का कुंड, उसमें माँस का चटचटाकर जलना अैर उसमें से चिर्राहिन की सुगंध का निकलना, वैसा ही लोहू का चारों ओर फैलना और मदिरा की छलक, तथा ब्राह्मणों का मद्य पीकर पागल होना, चारों ओर घी और चरबी का बहना, मानो इस मंत्र की पुकार सत्य होती थी। +‘घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः’ +अहा! वैसी ही कुमारियों की पूजा- +‘इमं ते उपस्थं मधुना सृजामि प्रजापतेर्मुखमेतद्द्वितीयं तस्या योनिं परिपश्यंति घीराः।’ +अहा हा! कुछ कहने की बात नहीं है। सब बातें उपस्थित थीं। +‘मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः’ +ऐसे ही मदिरा की नदी बहती थी। कुछ ठहर कर, जो कुछ हो मेरा तो कल्याण हो गया, अब इस धर्म के आगे तो सब धर्म तुच्छ हैं और जो मांस न खाय वह तो हिन्दू नहीं जैन है। वेद में सब स्थानों पर बलि देना लिखा है। ऐसा कौन सा यज्ञ है जो बिना बलिदान का है और ऐसा कौन देवता है जो मांस बिना ही प्रसन्न हो जाता है, और जाने दीजिए इस काल में ऐसा कौन है जो मांस नहीं खाता? क्या छिपा के क्या खुले खुले, अँगोछे में मांस और पोथी के चोंगे में मद्य छिपाई जाती है। उसमें जिन हिंदुओं ने थोड़ी भी अंगरेजी पढ़ी है वा जिनके घर में मुसलमानी स्त्री है उनकी तो कुछ बात ही नहीं, आजाद है। ख्सिर पकड़ कर, हैं माथा क्यों घूमता है? अरे मदिरा ने तो जोर किया। उठकर गाता है,। +जोर किया जोर किया जोर किया रे, आज तो मैंने नशा जोरे किया रे। +साँझहि से हम पीने बैठे पीते पीते भोर किया रे।। आज तो मैंने. +ख्गिरता पड़ता नाचता है, +रामरस पीओ रे भाई, जो पीए सो अमर होय जाई +चैके भीतर मुरदा पाकैं जवेलै नहाय कै ऐसेन जनम जर जाई।। +रामरस पीओ रे भाई +अरे जो बकरी पत्ती खात है ताकि काढ़ी खाल। +अरे जो नर बकरी खात है तिनको कौन हवाल।। +रामरस पीओ रे भाई +यह माया हरि की कलवारिन मद पियाय राखा बौराई। +एक पड़ा भुइँया में लोटै दूसर कहै चोखी दे माई।। +रामरस पीओ रे भाई +अरे चढ़ी है सो चढ़ी नहिं उतरन को नाम। +भर रही खुमारी तब क्या रे किसी से है काम।। +रामरस पीओ रे भाई +मीन काट जल धोइए खाए अधिक पियास। +अरे तुलसीप्रीत सराहिए मुए मीत की आस।। +रामरस पीओ रे भाई +अरे मीन पीन पाठीन पुराना भरि भरि भार कंहारन आना। +महिष खाइ करि मदिरा पाना अरे गरजा रे कुंभकरन बलवाना।। +रामरस पीओ रे भाई +ऐसा है कोई हरिजन मोदी तन की तपन बुझावैगा। +पूरन प्याला पिये हरी का फेर जनम नहिं पावैगा।। +रामरस पीओ रे भाई +अरे भक्तों ने रसोईं की तो मरजाद ही खोई। +कलिए की जगह पकने लगी रामतरोई रे।। +रामरस पीओ रे भाई +भगतजी गदहा क्यों न भयो। +जब से छोड़ो माँस-मछरिया सत्यानाश भयो।। +रामरस पीओ रे भाई +अरे एकादशी के मछली खाई। +अरे कबौं मरे बैवुं$ठै जाई।। +रामरस पीओ रे भाई +अरे तिल भर मछरी खाइबो कोटि गऊ को दान। +ते नर सीधे जात है सुरपुर बैठि बिमान।। +रामरस पीओ रे भाई +कंठी तोड़ो माला तोड़ो गंगा देहु बहाई। +अरे मदिरा पीयो खाइ कै मछरी बकरा जाहु चबाई।। +रामरस पीओ रे भाई +ऐसी गाढ़ी पीजिए ज्यौं मोरी की कीच। +घर के जाने मर गए आप नशे के बीच।। +रामरस पीओ रे भाई +नाचता नाचता गिर के अचेत हो जाता है, +ख्मतवाले बने हुए राजा और मंत्री आते हैं, +राजा : मंत्री, पुरोहित जी बेसुध पड़े हैं। +मंत्री : महाराज, पुरोहित जी आनंद में हैं। ऐसे ही लोगों को मोक्ष मिलता है। +राजा : सच है। कहा भी है- +पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा पतित्वा धरणीतले। +उत्थाय च पुनः पीत्वा नरो मुक्तिमवाप्नुयात्।। +मंत्री : महाराज, संसार के सार मदिरा और माँस ही हैं। +‘मकाराः पझ् दुल्र्लभाः।’ +राजा : इसमें क्या संदेह। +वेद वेद सबही कहैं, भेद न पायो कोय। +बिन मदिरा के पान सो, मुक्ति कहो क्यों होय।। +मंत्री : महाराज, ईश्वर ने बकरा इसी हेतु बनाया ही है, नहीं और बकरा बनाने का काम क्या था? बकरे केवल यज्ञार्थ बने हैं और मद्य पानार्थ। +राजा : यज्ञो वै विष्णुः, यज्ञेन यज्ञमयजंति देवाः, ज्ञाद्भवति पज्र्जन्यः, इत्यादि श्रुतिस्मृति में यज्ञ की कैसी स्तुति की है और ”जीवो जीवस्य जीवन“ जीव इसी के हेतु हैं क्योंकि-”माँस भात को छोड़िकै का नर खैहैं घास?“ +मंत्री : और फिर महाराज, यदि पाप होता भी हो तो मूर्खों को होता होगा। जो वेदांती अपनी आत्मा में रमण करने वाले ब्रह्मस्वरूप ज्ञानी हैं उनको क्यों होने लगा? कहा है न- +यावद्धतोस्मि हंतास्मीत्यात्मानं मन्यतेऽस्वदृक्। +तावदेवाभिमानज्ञो बाध्यबाधकतामियात्।। +गतासूनगतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः।। +नैनं छिदंति शस्त्रणि नैनं दहति पावकः।। +अच्छेद्योयामदह्योयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।। +न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। +इससे हमारे आप से ज्ञानियों को तो कोई बंधन ही नहीं है। और सुनिए, मदिरा को अब लोग कमेटी करके उठाना चाहते हैं वाह बे वाह! +राजा : छिः अजी मद्यपान गीता में लिखा है ”मद्याजी माँ नमस्कुरु।“ +मंत्री : और फिर इस संसार में माँस और मद्य से बढ़कर कोई वस्तु है भी तो नहीं। +राजा : अहा! मदिरा की समता कौन करेगा जिसके हेतु लोग अपना धर्म छोड़ देते हैं। देखो- +मदिरा ही के पान हित, हिंदू धर्महि छोड़ि। +बहुत लोग ब्राह्मो बनत, निज कुल सों मुख मोड़ि।। +ब्रांडी को अरु ब्राह्म को, पहिलो अक्षर एक। +तासों ब्राह्मो धर्म में, यामें दोस न नेक।। +मंत्री : महाराज, ब्राह्मो को कौन कहे हम लोग तो वैदिक धर्म मानकर सौत्रमणि यज्ञ करके मदिरा पी सकते हैं। +राजा : सच है, देखो न- +मदिरा को तो अंत अरु आदि राम को नाम। +तासों तामैं दोष कछू नहिं यह बुद्धि ललाम।। +तिष्ठ तिष्ठ क्षण मद्य हम पियैं न जब लौं नीच। +यह कहि देवी क्रोंध सों हत्यौ शंुभ रन बीच।। +मद पी विधि जग को करत, पालत हरि करि पान। +मद्यहि पी के नाश सब करत शंभु भगवान।। +विष्णु वारुनी, पोर्ट पुरुषोत्तम मद्य मुरारि। +शांपिन शिव, गौड़ी गिरिश, ब्रांडी ब्रह्म विचारि।। +मंत्री : और फिर महाराज, ऐसा कौन है जो मद्य नहीं पीता, इससे तो हमीं लोग न अच्छे जो विधिपूर्वक वेद की रीति से पान करते हैं और यों छिपके इस समय में कौन नहीं करता। +ब्राह्मण क्षत्री वैश्य अरु सैयद सेख पठान। +दै बताई मोहि कौन जो करत न मदिरा पान।। +पियत भट्ट के ठट्ट अरु गुजरातिन के वृंद। +गौतम पियत अनंद सों पियत अग्र के नंद।। +ब्राह्मण सब छिपि छिपि पियत जामैं जानि न जाय। +पोथी के चोंगान भरि बोतल बगल छिपाय।। +वैष्णव लोग कहावही कंठी मुद्रा धारि। +छिपि छिपि कैं मदिरा पियहिं, यह जिय मांझि विचारि।। +होटल में मदिरा पियैं, चोट लगे नहिं लाज। +लोट लए ठाढ़े रत टोटल देवै काज।। +राजा राजकुमार मिलि बाबू लीने संग। +बार-बधुन लै बाग में पीअत भरे उमंग।। +राजा : सच है, इसमें क्या संदेह है? +मंत्री : महाराज, मेरा सिर घूमता है और ऐसी इच्छा होती है कि कुछ नाचूं और गाऊं, +राजा : ठीक है मैं भी नाचूं-गाऊंगा, तुम प्रारंभ करो। +मंत्री उठकर राजा का हाथ पकड़कर गिरता-पड़ता नाचता और गाता है, +पीले अवधू के मतवाले प्याला प्रेम हरी रस का रे। +तननुं तननुं तननुं में गाने का है चसका रे।। +निनि धध पप मम गग गिरि सासा भरले सुर अपने बस का रे। +धिधिकट धिधिकट धिधिकट धाधा बजे मृदंग थाप कस कारे।। +तीले अवधू के.। +भट्टी नहिं सिल लोढ़ा नहीं घोरधार। +पलकन की फेरन में चढ़त धुआंधार।। +पीले अवधू के.। +कलवारिन मदमाती काम कलोल। +भरि भरि देत पियलवा महा ठठोल।। +पीले अवधू के.। +अरी गुलाबी गाल को लिए गुलाबी हाथ। +मोहि दिखाव मद की झलक छलक पियालो साथ।। +पीले अवधू के.। +बहार आई है भर दे बादए गुलगूँ से पैमाना। +रहै लाखों बरस साकी तेरा आबाद मैखाना।। +सम्हल बैठो अरे मस्तो जरा हुशियार हो जाओ। +कि साकी हाथ में मै का लिए पैमाना आता है।। +उड़ाता खाक सिर पर झूमता मस्ताना आता है। +पीले अवधू के.-अहाँ अहाँ अहाँ।। +यह अठरंग है लोग चतुरंग ही गाते हैं। +न जाय न जाय मो सों मदवा भरीलो न जाय +तब फिर कहाँ से- +ड्रिंक डीप आॅर टेस्ट नाॅट द पीयरियन स्प्रिंग +क्तपदा कममच वत जंेजम दवज जीम चपमतपंदेचतपदहण् +पीले अवधू के मतवाले प्याला प्रेम हरा रस का रे। +एक दूसरे के सिर पर धौल मारकर ताल देकर नाचते हैं। फिर एक पुरोहित का सिर पकड़ता है दूसरा पैर और उसको लेकर नाचते हैं, +जवनिका गिरती है। +चतुर्थ अंक +यमराज बैठे हैं, और चित्रगुप्त पास खड़े हैं, +१ दूत : ख्राजा के सिर में धौल मारकर, चल बे चल, अब यहाँ तेरा राज नहीं है कि छत्र-चंवर होगा, फूल से पैर रखता है, चल भगवान् यम के सामने और अपने पाप का फल भुगत, बहुत कूद-कूद के हिंसा की और मदिरा पी, सौ सोनार की न एक लोहार की। +ख्दो धौल और लगाता है, +२ दूत : पुरोहित को घसीटकर, चलिए पुरोहित जी, दक्षिणा लीजिये, वहाँ आपने चक्र-पूजन किया था, यहाँ चक्र में आप मे चलिए, देखिए बलिदान का कैसा बदला लिया जाता है। +३ दूत : मंत्री की नाक पकड़कर, चल बे चल, राज के प्रबन्ध के दिन गये, जूती खाने के दिन आये, चल अपने किये का फल ले। +४ दूत : ख्गंडकीदास का कान पकड़कर झोंका देकर, चल रे पाखंडी चल, यहाँ लंबा टीका काम न आवेगा। देख वह सामने पाखंडियों का मार्ग देखने वाले सर्प मुंह खोले बैठे हैं। +सब यमराज के सामने जाते हैं, +यम. : वैष्णव और शैव से, आप लोग यहाँ आकर मेरे पास बैठिए। +वै. और शै. : जो आज्ञा। यमराज के पास बैठ जाते हैं, +यम : चित्रगुप्त देखो तो इस राजा ने कौन-कौन कर्म किये हैं। +चित्र. : बही देखकर, महाराज, सुनिये, यह राजा जन्म से पाप में रत रहा, इसने धर्म को अधर्म माना और अधर्म को धर्म माना जो जी चाहा किया और उसकी व्यवस्था पण्डितों से ले ली, लाखों जीव का इसने नाश किया और हजारों घड़े मदिरा के पी गया पर आड़ सर्वदा धर्म की रखी, अहिंसा, सत्य, शौच, दया, शांति और तप आदि सच्चे धर्म इसने एक न किये, जो कुछ किया वह केवल वितंडा कर्म-जाल किया, जिसमें मांस भक्षण और मदिरा पीने को मिलै, और परमेश्वर-प्रीत्यर्थ इसने एक कौड़ी भी नहीं व्यय की, जो कुछ व्यय किया सब नाम और प्रतिष्ठा पाने के हेतु। +यम : प्रतिष्ठा कैसी, धर्म और प्रतिष्ठा से क्या सम्बन्ध? +चित्र. : महाराज सरकार अंगरेज के राज्य में जो उन लोगों के चित्तानुसार उदारता करता है उसको ”स्टार आफ इंडिया“ की पदवी मिलती है। +यम. : अच्छा! तो बड़ा ही नीच है, क्या हुआ मैं तो उपस्थित ही हूँ। +”अंतःप्रच्छन्न पापानां शास्ता वैवस्वतो यमः“ +भला पुरोहित के कर्म तो सुनाओ। +चित्र. : महाराज यह शुद्ध नास्तिक है, केवल दंभ से यज्ञोपवीत पहने है, यह तो इसी श्लोक के अनुरूप है- +अंतः शाक्ता बहिःशैवाः सभामध्ये च वैष्णवाः। +नानारूपधराः कौला विचरन्ति महीतले।। +इसने शुद्ध चित्त से ईश्वर पर कभी विश्वास नहीं किया, जो-जो पक्ष राजा ने उठाये उसका समर्थन करता रहा और टके-टके पर धर्म छोड़ कर इसने मनमानी व्यवस्था दी। दक्षिणा मात्र दे दीजिए फिर जो कहिए उसी में पंडितजी की सम्मति है, केवल इधर-उधर कमंडलाचार करते इसका जन्म बीता और राजा के संग से माँस-मद्य का भी बहुत सेवन किया, सैकड़ों जीव अपने हाथ से वध कर डाले। +यम. : अरे यह तो बड़ा दुष्ट है, क्या हुआ मुझसे काम पड़ा है, यह बचा जी तो ऐसे ठीक होंगे जैसा चाहिए। अब तुम मंत्री जी के चरित्र कहो। +चित्र. : महाराज, मंत्रीजी की कुछ न पूछिए। इसने कभी स्वामी का भला नहीं किया, केवल चुटकी बजाकर हां में हां मिलाया, मुंह पर स्तुति पीछे निंदा, अपना घर बनाने से काम, स्वामी चाहे चूल्हे में पड़े, घूस लेते जनम बीता, मांस और मद्य के बिना इसने न और धर्म जाने न कर्म जाने-यह मंत्री की व्यवस्था है, प्रजा पर कर लगाने में तो पहले सम्मति दी पर प्रजा के सुख का उपाय एक भी न किया। +यम. : भला ये श्रीगंडकीदासजी आये हैं इनका पवित्र चरित्र पढ़ो कि सुनकर कृतार्थ हों, देखने में तो बड़े लम्बे-लम्बे तिलक दिये हैं। +चित्र. : महाराज ये गुरु लोग हैं, इनके चरित्र कुछ न पूछिये, केवल दंभार्थ इनका तिलक मुद्रा और केवल ठगने के अर्थ इनकी पूजा, कभी भक्ति से मूर्ति को दंडवत् न किया होगा पर मंदिर में जो स्त्रियाँ आईं उनको सर्वदा तकते रहे; महाराज, इन्होंने अनेकों को कृतार्थ किया है और समय तो मैं श्रीरामचंद्रजी का श्रीकृष्ण का दास हूँ पर जब स्त्री सामने आवे तो उससे कहेंगे मैं राम तुम जानकी, मैं कृष्ण तुम गोपी और स्त्रियाँ भी ऐसी मूर्ख कि फिर इन लोगों के पास जाती हैं, हा! महाराज, ऐसे पापी धर्मवंचकों को आप किस नरक में भेजियेगा। +ख्नेपथ्य में बड़ा कलकल होता है, +यम. : कोई दूत जाकर देखो यह क्या उपद्रव है। +१ दूत : जो आज्ञा। ख्बाहर जाकर फिर आता है, महाराज, संयमनीपुरी की प्रजा बड़ी दुखी है, पुकार करती है कि ऐसे आज कौन पापी नरक में आए हैं जिनके अंग के वायु से हम लोगों का सिर घूमा जाता है और अंग जलता है। इनको तो महाराज शीघ्र ही नरक में भेजें नहीं तो हम लोगों के प्राण निकल जायंगे! +यम : सच है, ये ऐसे ही पापी हैं, अभी मैं इनका दंड करता हूँ, कह दो घबड़ायंे न। +१ दूत : जो आज्ञा। ख्बाहर जाकर फिर आता है, +यम : ख्राजा से, तुझ पर जो दोष ठहराए गए हैं बोल उनका क्या उत्तर देता है। +राजा : हाथ जोड़कर, महाराज, मैंने तो अपने जान सब धर्म ही किया कोई पाप नहीं किया, जो मांस खाया वह देवता-पितर को चढ़ाकर खाया और देखिए महाभारत में लिखा है कि ब्राह्मणों ने भूख के मारे गोवध करके खा लिया पर श्राद्ध कर लिया था इससे कुछ नहीं हुआ। +यम. : कुछ नहीं हुआ, लगें इसको कोड़े। +२ दूत : जो आज्ञा। कोड़े मारता है, +राजा : हाथ से बचा-बचाकर, हाय-हाय, दुहाई-दुहाई, सुन लीजिए- +सप्तव्याधा दशार्णेषु मृगाः कालंजरे गिरौ। +चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे।। +तेपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः। +प्रस्थिता दीर्घमध्वानं यूयं किमवसीदथ।। +यह वाक्य लोग श्राद्ध के पहिले श्राद्ध शुद्ध होने को पढ़ते हैं फिर मैंने क्या पाप किया। अब देखिए, अंगरेजों के राज्य में इतनी गोहिंसा होती है सब हिंदू बीफ खाते हैं उन्हें आप नहीं दंड देते और हाय हमसे धार्मिक की यह दशा, दुहाई वेदों की दुहाई धर्म शास्त्र की, दुहाई व्यासजी की, हाय रे, मैं इनके भरोसे मारा गया। +यम. : बस चुप रहो, कोई है? यह अंधतामिस्र नामक नरक में जायगा। अभी इसको अलग रखो। +१ दूत : जो आज्ञा महाराज। पकड़-खींचकर एक ओर खड़ा करता है, +यम. : पुरोहित से, बोल बे ब्राह्मणधम! तू अपने अपराधों का क्या उत्तर देता है। +पुरो. : हाथ जोड़कर, महाराज, मैं क्या उत्तर दूंगा, वेद-पुराण सब उत्तर देते हैं। +यम. : लगें कोड़े, दुष्ट वेद-पुराण का नाम लेता है। +२ दूत : जो आज्ञा। कोड़े मारता है, +पुरो. : दुहाई-दुहाई, मेरी बात तो सुन लीजिए। यदि मांस खाना बुरा है तो दूध क्यों पीते हैं, दूध भी तो मांस ही है और अन्न क्यों खाते हैं अन्न में भी तो जीव हैं और वैसे ही सुरापान बुरा है तो वेद में सोमपान क्यों लिखा है और महाराज, मैंने तो जो बकरे खाए वह जगदंबा के सामने बलि देकर खाए, अपने हेतु कभी हत्या नहीं की और न अपने राजा साहब की भाँति मृगया की। दुहाई, ब्राह्मण व्यर्थ पीसा जाता है। और महाराज, मैं अपनी गवाही के हेतु बाबू राजेंद्रलाल के दोनों लेख देता हूँ, उन्होंने वाक्य और दलीलों से सिद्ध कर दिया है कि मांस की कौन कहे गोमांस खाना और मद्य पीना कोई दोष नहीं, आगे के हिंदू सब खाते-पीते थे। आप चाहिए एशियाटिक सोसाइटी का जर्नल मंगा के देख लीजिए। +यम. : बस चुप, दुष्ट! जगदंगा कहता है और फिर उसी के सामने उसी जगत् के बकरे को अर्थात् उसके पुत्र ही को बलि देता है। अरे दुुष्ट, अपनी अंबा कह, जगदंबा क्यों कहता है, क्या बकरा जगत् के बाहर है? चांडाल सिंह को बलि नहीं देता-‘अजापुत्रं बलिं दद्याद्दैवोदुर्बलघातकः’ कोई है? इसको सूचीमुख नामक नरक में डालो। दुष्ट कहीं का, वेद-पुराण का नाम लेता है। मांस-मदिरा खाना-पीना है तो यों ही खाने में किसने रोका है धर्म को बीच में क्यों डालता है, बाँधो। +२ दूत : जो आज्ञा महाराज। बाँध कर एक ओर खड़ा करता है,। +यम. : मंत्री से, बोल बे, तू अपने अपराधों का क्या उत्तर देता है? +मंत्री : आप ही आप, मैं क्या उत्तर दूँ, यहाँ तो सब बात बेरंग है। इन भयावनी मूर्तियों को देखकर प्राण सूखे जाते हैं उत्तर क्या दूं। हाय-हाय, इनके ऐसे बड़े-बडे दाँत हैं कि मुझे तो एक ही कवर कर जायंगे। +यम. : बोल जल्दी। +३ दूत : एक कोड़ा मारकर, बोलता है कि नहीं। +मंत्री : हाथ जोड़कर, महाराज, अभी सोचकर उत्तर देता हूँ। कुछ सोचकर, चित्रगुप्त से, आप मुझे एक बेर राज्य पर भेज दीजिए, मैंने जितना धन बड़ी-बड़ी कठिनाई और बड़े-बड़े अधर्म से एकत्र किया है सब आपको भेंट करूंगा और मैं निरपराधी कुटुंबी हूँ मुझे छोड़ दीजिये। +चित्र : क्रोध से, अरे दुष्ट, यह भी क्या मृत्युलोक की कचहरी है कि तू हमें घूस देता है और क्या हम लोग वहाँ के न्यायकत्र्ताओं की भांति जंगल से पकड़ कर आए हैं कि तुम दुष्टों के व्यवहार नहीं जानते। जहाँ तू आया है और जो गति तेरी है वही घूस लेने वालों की भी होगी। +यम. : क्रो ध से, क्या यह दुष्ट द्रव्य दिखाता है? भला रे दुष्ट! कोई है इसको पकड़कर कुंभीपाक में डालो। +३ दूत : जो आज्ञा महाराज। पकड़कर खींचता है,। +यम. : अब आप बोलिए बाबाजी, आप अपने पापों का क्या उत्तर देते हैं? +गंडकी. : मैं क्या उत्तर दूँगा। पाप पुण्य जो करता है, ईश्वर करता है इसमें मनुष्य का क्या दोष है? +ईश्वरः सर्व भूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति। +भ्रामयन् सव्र्वभूतानि यंत्ररूढ़ानि मायया।। +मैं तो आज तक सव्र्वदा अच्छा ही करता रहा। +यम. : कोई है? लगें कोड़े दुष्ट को, अब ईश्वर फल भी भुगतैगा। हाय हाय, ये दुष्ट दूसरों की स्त्रियों को माँ और बेटी कहते हैं और लंबा लंबा टीका लगाकर लागों को ठगते हैं। +४ दूत : महाराज यह किस नरक में जायगा! कोड़े मारता है।, +गंडकी : हाय-हाय दुहाई, अरे कंठी-टीका कुछ काम न आया। अरे कोई नहीं है जो इस समय बचावै। +यम. : यह दुष्ट रौरव नरक में जायगा जहाँ इसको ऐसे ही अनेक धर्मवंचक मिलेंगे। ले जाओ सबको। +ख्चारों दूत चारों को पकड़कर घसीटते और मारते हैं और चारों चिल्लाते हैं, +चारों : अरे ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति।’ +हाय रे ‘अग्निष्टोमे पशुमालभेत्।’ +अरे बाप रे ”सौत्रमण्यां सुरां पिबेत्।“ +भैया रे ”श्रोत्रं ते शुंधामि।“ +यही कहकर चिल्लाते हैं और दूत लोग उसको घसीटकर मारते-मारते ले जाते हैं, +यम. : शैव और वैष्णव से, आप लोगों की अकृत्रिम भक्ति से ईश्वर ने आपको कैलास और बैकुंठ वास की आज्ञा दी है सो आ लोग जाइए और अपने सुकृत का फल भोगिए। आप लोगों ने इस धर्म वंचकों की दशा तो देखी ही है, देखिए पापियों की यह गति होती है और आप से सुकृतियों को ईश्वर प्रसन्न होकर सामीप्य मुक्ति देता है, सो लीजिए, आप लोगों को परम पद मिला। बधाई है, कहिए इससे भी विशेष कोई आपका हित हो तो मैं पूर्ण करूं। +शै. और वै. : हाथ जोड़कर, भगवन् इससे बढ़कर और हम लोगों का क्या हित होगा। तथापि यह नाटकाचाय्र्य भरतऋषि का वाक्य सफल हो। +निज स्वारथ को धरम-दूर या जग सों होई। +ईश्वर पद मैं भक्ति करैं छल बिनु सब कोई।। +खल के विष-बैनन सों मत सज्जन दुख पावैं। +छुटै राजकर मेघ समय पै जल बरसावैं।। +कजरी ठुमरिन सों मोड़ि मुख सत कविता सब कोइ कहैं। +यह कवि बानी बुध-बदन में रवि ससि लौं प्रगटित रहै।। +सब जाते हैं, +-जवनिका गिरती है।- +इति चतुर्थो। +समाप्तं प्रहसनं। + +पुस्तपालन एवं लेखांकन की मुख्य बातें: +पुस्तपालन का अर्थ समझने के लिए पहले हम अंग्रेजी भाषा के Book-Keeping शब्द पर विचार करें। ‘Book- Keeping’ दो शब्दों (i) Book, तथा (ii) Keeping के योग से बना है। Book शब्द का अर्थ ‘पुस्तक’ तथा Keeping शब्द का अर्थ ‘रखना’ या ‘पालन’ होता है। पुस्तपालन या बुक-कीपिंग वह कला व विज्ञान है जिसके अनुसार समस्त व्यापारिक लेन -देनों का लेखा नियमानुसार स्पष्ट तथा नियमित रूप से उचित पुस्तकों में किया जाता है। इसे बहीखाता भी कहा जाता है। + +हिन्दी-प्रसार आन्दोलन: +उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में भावनात्मक संदर्भ की क्रांति शुरू हुई। उस समय देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति अत्यन्त दयनीय हो चुकी थी। देश में होने वाले आन्दोलनों से जन-जीवन प्रभावित हो रहा था। भारत की राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए एक भाषा की आवश्यकता सामने आई। इस आवश्यकता के संदर्भ में डॉ॰ अम्बा शंकर नागर का मन्तव्य उद्धरणीय है-facebook.com पर अधिक जानकारी जाने Kanchan Ghode is inviting you to a scheduled for the first time in the Hindi subject on facebook.com💝💝 +उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में समाजिक, धार्मिक ही नहीं, राजनीतिक आंदोलनों में हिंदी मुख्य भाषा सिद्ध हुईं इस प्रकार हिन्दी को व्यापक जनाधार मिला। राष्ट्रीय भावना जगाने हेतु हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग किया गया। विभिन्न व्यक्तियों और संस्थानों द्वारा हिंन्दी-प्रयोग हेतु आन्दोलन के रूप में कार्य किया गया। बिहार ने सबसे पहले अपनाई थी हिंदी को, बनाई थी राज्य की अधिकारिक भाषा बिहार देश का पहला ऐसा राज्य है, जिसने सबसे पहले हिंदी को अपनी अधिकारिक भाषा माना है। जिसके प्रमुख क्षेत्र है। दक्षिण बिहार हिंदी प्रदेश से होने के बावजूद बिहारी एक टोन बन गया है. बोलने के क्रम में किसी भी बिहारी से र और ड़ का उच्‍चारण करवा लीजिए. स और श का उच्‍चारण करवा लीजिए। बोलने के क्रम में एक बार भी बिहारी टोन में नहीं बोले तो क्‍या बोले। < +प्रमुख व्यक्तियों के योगदान. +लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक. +लोकमान्य तिलक प्रारंभ में परम विनम्र नेता थे। परिस्थितियों ने उन्हें ओजस्वी नेता बना दिया। ”स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है“ का नारा देने वाले तिलक ‘स्वदेशी’ के प्रबल समर्थक थे। उनकी मान्यता थी कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो राष्ट्रभाषा की पदाधिकारी है। उन्होंने हिंदी विषय में कहा था-968o8 +लोकमान्य तिलक देवनागरी को ‘राष्ट्रलिपि’ और हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ मानते थे। उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के दिसम्बर, 1905 के अधिवेशन में कहा था- +उन्होंने जनसामान्य तक अपने विचार पहुँचाने के लिए ‘हिन्दी केसरी’ साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। हिन्दी का यह पत्र पर्याप्त लोकप्रिय हुआ। लोकमान्य तिलक जीवन भर हिंन्दी के प्रचार-प्रसार में लगे हुए थे। उन्होने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने के लिए बार-बार आग्रह किया था। +निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देना छोड़कर हिंन्दी सीखी और हिन्दी के प्रबल समर्थक बन गए थे, यह उनका हिन्दी और देश-प्रेम ही था। +लाला लाजपतराय. +पंजाब केसरी लाला लाजपतराय प्रबल आर्य समाजी देशभक्त थे। वे महान-प्रेमी और ओजस्वी वक्ता थे। स्वदेशी वस्तुओं के समर्थक और विदेशी वस्तुओं के विरोधी थे। उन्होंने अंग्रेजी और पंजाबी पत्र के साथ ‘वन्देमातरम्’ दैनिक उर्दू पत्र का प्रकाशन किया। उन दिनों पंजाब में हिन्दी-उर्दू का विवाद चल रहा था। पंजाब में हिन्दी प्रचार-प्रसार में लाला लाजपतराय की बलवती भूमिका थी। उन्होंने सन् 1911 में पंजाब शिक्षा संघ की स्थापना की। शिक्षा में हिन्दी को समुचित स्थान दिलाने का सराहनीय प्रयास किया। सन् 1886 में लाहौर में दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक कॉलेज की स्थापना की गई। इससे हिन्दी प्रसार का सुदृढ़ आधार मिला। इस कॉलेज में सभी विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ने की अनिवार्यता थी। लाला लाजपतराय के प्रयास से पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी को सम्मानीय स्थान मिला। उन्हीं का प्रयास था कि पंजाब विश्वविद्यालय में रत्न और प्रभाकर के माध्यम से हिन्दी को पाठ्यक्रम में स्थान मिला। हरियाणा के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इन परिक्षाओं का सू़त्रपात भी वहीं से हुआ। +लाला लाजपतराय विशेष उग्र और क्रान्तिकारी नेता थे। उनके द्वारा हिन्दी में भाषण देने से जनसामान्य विशेष रूप से आन्दोलित होते थे। वे हिन्दी भाषा के माध्यम से भारत को एक सू़त्र में बाँधना चाहते थे। निश्चय ही लाला लातपतराय महान हिन्दी-प्रेमी और हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रबल समर्थक थे। +पं॰ मदन मोहन मालवीय. +मालवीय जी महान् राष्ट्रीय नेता थे। उन्हें तीन बार हिन्दु महासभा के अध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित कियागया था। वे सन् 1884 से राष्ट्रीय कार्यों में समर्पित होकर लग गए थे। वे अपने क्रियाकलापों में हिन्दी का प्रयोग करते हुए औरों में भी हिन्दी-प्रेम जगाते रहे हैं। सन् 1886 के अधिवेशन में मालवीय जी के व्याख्यान से प्रभावित होकर काला कांकर के राजा ने इन्हें ‘हिन्दुस्तान’ दैनिक पत्र का संपादक बनाया था। यहीं से उनकी हिन्दी-सेवा का अनुप्रेरक रूप सामने आया है। उन्होंने 1907 ई॰ में साप्ताहिक हिन्दी ‘अभ्युदय’ का प्रारम्भ किया। यह पत्र सन् 1915 में दैनिक समाचार-पत्र बना। मालवीय जी ने हिन्दी प्रचार-प्रसार को गति देने के लिए सन् 1910 में प्रयोग (इलाहाबाद) से ‘मर्यादा’ हिंदी मासिक पत्रिका और 20 जुलाई, 1933 ‘सनातन धर्म’ हिंदी पत्र का प्रकाशन शुरू किया है। मालवीय जी हिन्दी के महान् प्रेमी थे। इनकी प्रेरणा से ‘भारत’, ‘हिन्दुस्तान’ और ‘विश्वबन्धु’ जैसे चर्चित पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ है। +मालवीय जी के मन में हिन्दी के लिए विशेष आदर भाव था, इसलिए उन्होंने शिक्षा में हिन्दी की अनिवार्यता पर बल दिया। सन् 1917 में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय की स्थापना की दृष्टि से हुई है। यहाँ के सभी विद्यार्थियों के लिए हिन्दी शिक्षा अनिवार्य थी। उन्होंने हिन्दी भाषा के विषय में स्पष्ट रूप से कहा था- +नागरी प्रचारिणी सभा, काशी की स्थापना सन् 1893 में हुई। इसकी स्थापना में मालवीय जी की विशेष भूमिका रही है। हिन्दी प्रचार के अग्रणी नेता मालवीय जी 10 अक्तूबर, 1910 को सम्पन्न हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष थे। उनकी प्रेरणा से देश में हिन्दी के प्रति प्रबल अनुराग और राष्ट्रीयता का भाव जगा है। +महात्मा गाँधी. +स्वतंत्रता आन्दोलन में महात्मा गाँधी सजग, साहसी और आदर्श नेता के रूप में सामने आये। भारतीय आदर्शों को समाज में पल्लवित कराने में गाँधी जी ने अपने जीवन का हर पल लगाया। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद हिन्दी और हिन्दुस्तान को जगाने में लग गये। सन् 1917 में गुजरात प्रदेश के भड़ौच गुजरात शिक्षा परिषद् के अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा बनाने के विरोध किया और हिन्दी के महत्त्व पर मुक्तकंठ से चर्चा की थी- +महात्मा गाँधी ने सन् 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर के अधिवेशन में हिन्दी-प्रेम प्रकट करते हुए आह्नान किया था : +भारत वर्ष में शिक्षा के माध्यम पर दो-टूक चर्चा करते हए गाँधी जी ने 2 सितम्बर, 1921 को कहा था- +गाँधी जी की दृष्टि में हिन्दी ही भारत की संपर्क भाषा के रूप में आदर्श भूमिका निभा सकती है। उन्होंने विभिन्न व्यक्तियों, पत्र-पत्रिकाओं और संस्थाओं को हिन्दी-प्रयोग की अनूठी प्रेरणा दी है। वे हिन्दी को राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता की प्राप्ति और सांस्कृतिक उत्कर्ष मानते थे। उन्होंने हिन्दी को साधन और साध्य दोनों रूपों में अपनाया था। महात्मा गाँधी के हिन्दी-प्रेम और प्रचार-प्रसार के विषय में डॉ॰ रामविलास शर्मा का कथन विशेष रूप में उल्लेखनीय है- +गाँधी जी हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने हिन्दी प्रचार-प्रसार को गति देने के लिए विभिन्न संस्थाओं का विशेष सहयोग लिया था। गाँधी सेवा संघ, चर्खा संघ, हरिजन सेवक संघर्ष आदि का सारा कामकाज हिन्दी में होता रहा है। निश्चय ही हिन्दी-प्रसार के प्रयत्न में गाँधी जी की भूमिका अग्रगण्य रही है। +राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन. +राष्ट्रभाषा हिन्दी को संघ की राजभाषा बनाने का जो प्रयास राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया है, वह सदा याद किया जाता रहेगा। पं॰ मदनमोहन मालवीय के दर्शाये गए मार्ग पर चल कर इन्होंने हिन्दी की अनुपमेय सेवा की है। इनके द्वारा हिन्दी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से की गई हिन्दी की सेवा अनपमेय रही है। टण्डन जी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संस्थापकों में से थे। इन्हीं की प्रेरणा से महात्मा गाँधी जी भी हिन्दी साहित्य सम्मेलन से जुड़े हैं। ये लाला लाजपतराय के साथ मिलकर भी हिन्दी के प्रसार में लगे रहे। लाला जी की मृत्यु के पश्चात् टण्डन जी ‘लोकसेवा मण्डल’ के सभापति बन कर हिन्दी प्रसार में लगे रहे। इसका कार्यालय लाहौर में था। इसलिए टण्डन जी ने वहाँ की संस्थाओं के माध्यम से हिन्दी का अनुप्रेरम प्रसार किया। ये हिन्दी के प्रबल समर्थक थे, गाँधी जी हिन्दुस्तानी के समर्थक थे। +टण्डन जी की प्ररेणा से हिन्दी साहित्य सम्मेलन आज भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में लगा है। यह टण्डन जी की ही देन है। +डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद. +डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद पर महात्मा गाँधी का विशेष प्रभाव पड़ा है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में इनकी भूमिका विशेष उल्लेखनीय रही है। उन्होंने भारतीय भाषाओं को महत्त्व देते हुए कहा है- +निश्चय ही डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद की हिन्दी-सेवा सदा ही याद की जाएगी। भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में हिन्दी को सम्मानीय स्थान दिलाने का श्रेय डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद को है। राष्ट्रपति के रूप में हिन्दी और भारतीय भाषाओं को सम्मानजनक स्थान दिलाने का सराहनीय प्रयास किया। +काका कालेलकर. +हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अहिंदी भाषियों का नाम गौरव से लिया जाता है। ऐसे हिन्दी-प्रेमियों में काका कालेलकर का नाम विशेष श्रद्धा से लिया जाता है। इन्होंने हिन्दी के प्रसार में समर्पित होकर कार्य किया हैं उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से जुड़कर और गुजरात में रहकर हिन्दी-प्रसार को नई दिशा प्रदान की है। उन्होंने कभी अंग्रेजी का विरोध नहीं किया, किन्तु प्रादेशिक भाषाओं और हिन्दुस्तानी के प्रबल हिमायती थे। यह निर्विवाद सत्य है कि काका कालेलकर ‘हिन्दुस्तानी’ के समर्थक थे। उस समय हिन्दुस्तानी का अर्थ था - हिंदी और उर्दू का मिश्रित रूप। अंग्रेजों के शासन और अंग्रेजी के शासन और अंग्रेजी के प्रभाव में ‘हिन्दुस्तान’ के प्रसार से हिंदी को ही लाभ हुआ है। इससे जन सामान्य में हिंदी के प्रति अनुराग विकसित हुआ है। गाँधी जी के अनुयायी काका कालेलकर का नाम हिंदी-आंदोलन के संदर्भ में सदा याद किया जाएगा। +सेठ गोविन्ददास. +हिंदी के प्रसार के साथ इसे राजभाषा के प्रतिष्ठित पद पर सुशोभित करवाने में सेठ गोविन्ददास की अविस्मरणीय भूमिका रही है। ये उच्चकोटि के साहित्यकार हैं। आपकी नाट्यकृतियों से हिंदी साहित्य मोहक रूप में समृद्ध हुआ है। उन्होंने जबलपुर से शारदा, लोकमत तथा जयहिन्द पत्रों की शुरूआत कर जन-मन में हिंदी के प्रति प्रेम जगाने और साहित्यिक परिवेश बनाने का अनुप्रेरक प्रयास किया है। +उन्होंने सवतंत्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया और हिंदी के लिए सतत प्रयास किया। भारतीय संविधान सभा में हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर उठे विवाद को शांत करने में सेठ गोविन्ददास का विशेष महत्त्व रहा है। देश के मान्य सांसद और हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में हिंदी के लिए जो प्रेरक कार्य आपने किया है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। +हिंदी प्रसार के आन्दोलनों में हिंदी-प्रेमियों की लम्बी नामावली है। जिनके सतत प्रयास से देश में राष्ट्रीयता का भाव विकसित हुआ, देश स्वतंत्र हुआ और हिंदी को सम्मानजनक स्थान मिला। इनमें स्वामी दयानन्द, श्रद्धानन्द, विनोबा भावे आदि के नाम श्रद्धा से लेने योग्य हैं। +प्रमुख संस्थाओं का योगदान. +भारतवर्ष में स्वाधीनता संग्राम के साथ हिंदी का आन्दोलन भी चलाया जा रहा था। वास्तव में हिंदी का यह आन्दोलन अंग्रेजी के विरोध में किया गया था। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय हिंदी या हिन्दुस्तानी ही देश की संपर्क भाषा थी। प्रत्येक आन्दोलनकारी ‘वन्देमातरम्’ या ‘जिन्दाबाद’ के नारे लगाता था। इस प्रकार भारत देश की राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही थी। हिंदी को राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने का आन्दोलन चलाया गया है। इस आन्दोलन की सफलता पर ही 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी राजभाषा पद पर प्रतिष्ठित किया गया है। इस आन्दोलन से हिंदी का सुन्दर परिवेश बना है, इसलिए इस आन्दोलन को ‘राष्ट्रभाषा हिंदी’ या ‘राजभाषा हिंदी’ से जोड़ सकते हैं। +हिंदी-प्रसार आंदोलन में धर्मगुरुओं, महात्माओं, राजनेताओं और हिंदी-प्रेमियों के साथ अनेक संस्थाओं की भी सराहनीय भूमिका रही हैं भारत धर्मप्रधान देश है। इसलिए हिंदी-प्रसार आन्दोलन में साहित्यिक संस्थाओं के साथ धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं का विशेष योगदान रहा है। +धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएँ. +उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन की आँच में भारतवासी तप रहे थे। ईसाई पादरियों को ईसाई धर्म-प्रचार के लिए छूट मिल चुकी थी। उनके द्वारा हिन्दु धर्म को हेय दृष्टि से देखा जाता और निन्दा की जाती थी। भारतीयों को लालच देकर धर्म-परिवर्तन कराया जाता रहा है। यह सच है कि उस समय तक भारत में जाति-पाँति, छूआ-छूत, पर्दा-प्रथा, वाल-विवाह और अनमेल विवाह आदि विकृतियाँ फैल चुकी थीं। विवश और निरीह हिन्दु विजातीय धर्म स्वीकार कर रहे थे। इस विषम क्रियाकलाप की प्रतिक्रिया पर विविध सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों का सू़त्रपात हुआ है। एक ओर सामाजिक और धार्मिक विकृतियों को रोकने का प्रयास शुरू हुआ, तो नैतिक मूल्यों को अनुकूलन आधार मिला। इस दिशा में ब्रह्म समाज, आर्य समाज, सनातन धर्म सभा, प्रार्थना सभा, थियोसोफिकल सोसाइटी आदि संस्थाओं की भूमिका से समाज में आशा की किरण जगमगाई है। इन संस्थाओं के द्वारा राष्ट्रीय भाव जगाने के लिए हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में अपनाया गया। +ब्रह्म समाज. +भारतीय आदर्श और संस्कृति के पुजारी राजा राममोहन राय ने सन् 1828 में कलकत्ते में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की। उन्होंने जब ईसाई धर्म-प्रचार से भारतीयों की मानसिकता पर पड़ने वाले प्रभाव को देखा और वे धर्म-परिवर्तन की प्रक्रिया से आन्दोलित हुए तब उन्होंने पुनर्जागरण के लिए ‘ब्रह्म समाज’ को चिन्तन का केन्द्र बनाया। +देश में राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक चेतना जगाने में ब्रह्म समाज की अनूठी भूमिका रही है। ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने युगीन संदर्भ में आधुनिक विचार-चिन्तन को स्वीकार किया। उनके व्यक्तित्त्व में पूर्व और पश्चिम का अनुपम समन्वय था। वे अंग्रेजी को एक महत्त्वपूर्ण भाषा के रूप में सम्मान देते थे, किन्तु राष्ट्रीय संदर्भ में हिंदी के सबल समर्थक थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि भारतवर्ष में राष्ट्रीयता के भाव से सम्पन्न अखिल भारतीय भाषा बनने की क्षमता मात्र हिंदी में है। उनकी विद्वता और राष्ट्रीयता का स्पष्ट बोध इससे होता है कि उन्होंने ‘बंगदूत’ नामक पत्र कलकत्ता से प्रकाशित किया। इसके पत्र में हिंदी, बंगला, अंग्रेजी और फारसी के पृष्ठ हुआ करते थे। वे स्वयं हिंदी में लिखते तथा हिंदी में लिखने के लिए दूसरों को भी प्रोत्साहित करते रहते थे। अहिंदी भाषा क्षेत्र बंगाल में ‘ब्रह्म समाज’ की भूमिका विशेष सराहनीय रही है। समाज-सुधार और हिंदी-प्रचार में अनेक विद्वान नेता-तन-मन से लग गए थे। इस संदर्भ में महर्षि देवेन्द्र नाथ, केशव चन्द्र सेन, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर और नवीन चन्द्र राय के नाम श्रद्धा से लेते हैं। इस समाज द्वारा अधिकांश पुस्तक हिंदी में प्रकाशित की गई। इस संस्था के सभी सदस्यों से िंहंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का आह्नान किया गया। नवीन चन्द्र राय ने पंजाब पहुँचकर 1867 में ‘ज्ञानप्रदायिनी’ पत्रिका निकाल कर हिंदी-आन्दोलन को गति दी। भूदेव मुखर्जी ने बिहार की शिक्षा में हिंदी को प्रतिष्ठित किया और वहाँ के न्यायालयों में हिंदी और नागरी लिपि के प्रयोग का मार्ग खोला। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘आचार-प्रबन्ध’ में हिंदी को सर्व उपयोगी गुणसम्पन्न देश की संपर्क भाषा के रूप में अपनाने का आह्नान किया। +केशव चन्द्र सेन की प्रेरणा से स्वामी दयानन्द ने हिंदी में व्याख्यान देना शुरू किया। उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हिंदी में की। सेन ने सन् 1875 में ‘सुलभ समाचार’ निकालकर उस आन्दोलन को अधिक मुखर रूप प्रदान किया। उनकी मान्यता थी कि हिंदी देश की सर्वाधिक प्रचलित भाषा है, इसलिए यह भाषा ही राष्ट्रीय एकता का आधार बन सकती है। हिंदी-प्रसार में ‘ब्रह्म समाज’ की भूमिका सर्वोपरि है। +आर्य समाज. +भारतवर्ष के सामाजिक और धार्मिक आन्दोलनों में आर्य समाज का स्थान सर्वोपरि है। आर्य समाज की स्थापना 1875 ई. में, बम्बई में स्वामी दयानन्द द्वारा समाजोत्थान के लिए की गई थी। आर्य समाज द्वारा पूरे देश में स्वराज, धर्म और हिंदी भाषा के लिए आन्दोलन किया गया। आर्य समाज के आन्दोलनकारी हिंदी को ‘आर्यभाषा’ नाम से संबोधित कर अपना सारा कार्य इसमें ही करते थे। आर्य समाज के 28 नियमों में पाँचवां नियम हिंदी पढ़ना था। आर्य समाज के बढ़ते कदम लाहौर पहुँचे और 24 जनवरी, 1877 को लाहौर में आर्य समाज की स्थापना हुई। आर्य समाज का सत्संग और सम्मेलन हिंदी में ही होता था। इसलिए हिंदी-प्रसार को सुन्दर आधार मिला। आर्य समाज द्वारा गुरूकुलों, कन्या-पाठशालाओं और महिला-विद्यालयों की स्थापना की, जिनमें हिंदी की अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था थी। गुरूकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम विज्ञान की शिक्षा हिंदी में देने की सफल व्यवस्था की गई। इस विषय में श्री इन्द्रविद्यावाचस्पति का कथन उद्धरणीय है, ‘‘भारत में पहला शिक्षणालय, जिसमें राष्ट्रभाषा के माध्यम द्वारा समपूर्ण ज्ञान की शिक्षा का सफल परीक्षण किया गया, गुरूकुल काँगड़ी था।’’ +आर्य समाज के द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष के लिए हिंदी में अनेक साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाएँ प्रकाशित की गई। भारत की जनता स्वामी दयानन्द के विचार पढ़ना चाहती थी। इन पत्र-पत्रिकाओं में ऐसे विचार प्रकाशन से हिंदी पर्याप्त लोकप्रिय बनी। स्वामी जी पहले संस्कृत में व्याख्यान देते थे, किन्तु कलकत्ता के ब्रह्म समाज के नेता केशव सेन के आग्रह पर उन्होंने हिंदी को अपनाया है। इस प्रकार हिंदी-प्रसार को लोकप्रिय आधार मिला है। स्वामी जी के परम सहयोगी इन्द्रविद्यावाचस्पति ने स्वामी जी के हिंदी-प्रेम के महत्त्व के विषय में लिखा है- +गुजराती भाषा-भाषा स्वामी जी के हिंदी-प्रेम से उनके अनुयायियों में अनुकरणीय हिंदी प्रेम जगा। श्री राम गोपाल के शब्दों में, ‘‘उनके अनुयायियों के धर्म-प्रचार से जो अधिक उत्तम चीज राष्ट्रीय जीवन को प्राप्त हुई, वह थी राष्ट्रभाषा का प्रचार।’’ आर्य समाज के माध्यम से हिंदी का प्रचार भारत से बाहर मॉरिशस, फिजी, गयाना, सूरीनाम, ट्रिनीडाड-टुबैगो, युगांडा और लंदन में हुआ। +आर्य समाज ने जैसा प्रेरक कार्य सामाजिक, धार्मिक क्षेत्रों में किया, इसी प्रकार हिंदी-प्रसार में सर्वोतम कार्य किया। +सनातन धर्म सभा. +ब्रह्म समाज और आर्य समाज के द्वारा मूर्तिपूजा और बहुदेवतावाद के प्रबल विरोध की प्रतिक्रिया में सन् 1973 में ‘सनातन धर्म-रक्षिणी सभा’ की स्थापना हरिद्वार और दिल्ली में की। सन् 1900 में पं. मदन मोहन मालवीय आदि ने सभा को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। सभा का मुख्य उद्देश्य था - हिन्दु धर्म की स्मृतियों और पुराण आदि का शास्त्रों के आधार पर सुधार कार्य। सनातन धर्म की हजारों शाखाएँ भारत वर्ष के विभिन्न प्रान्तों में खुलीं। इस सभा का अधिकांश कार्य संस्कृत और हिंदी-प्रसार को बल मिला। +सनातन धर्म सभा के माध्यम से देश के विभिन्न प्रदेशों में शिक्षण संस्थाएँ शुरू हो गई। इनमें हिन्दी को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। उत्तर भारत क्षेत्र में इस को आशातीत सफलता मिली। पं. मदन मोहन मालवीय के प्रिय शिष्य गास्वामी गणेश दत्त इस सभा के कर्णधार थे। इनका जन्म पंजाब के लायलपुर (पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने सर्वप्रथम लायलपुर में एक गुरूकुल की स्थापना की। इसमें संस्कृत-हिंदी अध्ययन-अध्यापन व्यवस्था थी। इसके पश्चात् सैंकड़ों संस्थाएँ खुली। इससे पंजाब में हिंदी का व्यापक प्रचार हुआ। गोस्वामी जी ने सन् 1940 में ‘विश्वबन्धु’ दैनिक समाचार-पत्र का श्रीगणेश किया। भारत-विभाजन के बाद इन्होंने अपना कार्यक्षेत्र हरिद्वार बनाया। सन् 1947 में दिल्ली में ‘अमर भारत’ हिंदी दैनिक का प्रकाशन किया। +गोस्वामी गणेश दत्त के साथ हिंदी-प्रसार में योगदान देने वालों में श्रद्धाराम फिल्लौरी का नाम विशेष आदर से लिया जाता है। सनातन धर्म सभा के सतत प्रयास से भारत में मुख्यतः उत्तर भारत में हिंदी जन-मानस की भाषा बनी। +प्रार्थना समाज. +भारत वर्ष में सामाजिक, धार्मिक और शिक्षा में सुधार के लिए महाराष्ट्र में ‘परमहंस सभा’ की स्थापना सन् 1849 में हुई। ब्रह्म समाज के नेता श्री केशव चन्द्र सेन के बम्बई आगमन पर सन् 1867 में इस सभा को नया रूप देकर ‘प्रार्थना समाज’ के आधार पर प्रभावी कार्य शुरू किया गया। इस संस्था द्वारा समाज में व्याप्त जाति-पाँति, अछूत और नारी-समस्याओं को दूर करने का सतत् प्रयास किया गया। इस समाज का अधिकांश कार्य हिंदी में किया जाता था। साप्ताहिक प्रवचनों हिंदी-प्रयोग से महाराष्ट्र में हिंदी का प्रेरक परिवेश बना है। +इस समाज के सक्रिय नेताओं में न्यायाधीश महादेव गोविंद रानाडे और आर. जी. भण्डारकर के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। गोविंद रानाडे ने हिंदी और नागरी लिपि के प्रयोग और प्रसार का सतत् प्रयास किया है। निश्चय ही हिंदी-प्रसार आन्दोलन में प्रार्थना समाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। +थियोसोफिकल सोसाइटी. +इस सोसाइटी की स्थापना भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रभाव से ‘विश्व-बन्धुत्व’ भाव जगाने हेतु सन् 1875 में अमेरिका में हुई। इसके संस्थापक मदाम ब्लावत्स्की और कर्नल आलकोट थे। सन् 1897 में इसका मुख्य कार्यालय मुम्बई में स्थापित किया गया। इस संस्था पर आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द का विशेष प्रभाव पड़ा। इस संस्था ने स्वामी जी को अध्यात्म गुरु भी माना है। इसके उद्देश्य ब्रह्म समाज और आर्य समाज से बहुत कुछ मेल खाते हैं। सन् 1893 में श्रीमति एनी बेसेंट ने इस संस्था का नेतृत्व अपने हाथों में लिया। उन्होंने सन् 1898 में काशी में सेंट्रल हिंदू कॉलेज और हिंदू कन्या विद्यालय की स्थापना की। इसके साथ ही देश के विभिन्न प्रांतों में शिक्षण संस्थाएँ खोलीं। इन विद्यालयों और महाविद्यालयों में भारतीय संस्कृति की शिक्षा हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में दी जाती थी। इस सोसाइटी पर अंग्रेजी का भी प्रभाव दिखाई देता है, किन्तु इनकी जो भी प्रचारादि सामग्री छपती, वह अंग्रेजी के साथ हिन्दी में भी होती थी। इस प्रकार हिन्दी-प्रसार को सुअवसर मिला। स्वाधीनता संग्राम के प्रति विशेष लगाव होने के कारण सन् 1918 से सन् 1921 तक इन्होंने दक्षिणी भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार किया था। उन्होंने हिन्दी का महत्त्व अपनी पुस्तक ‘नेशन बिल्डिंग’ में लिखा है- +श्रीमति एनी बेसेंट ने सन् 1928 में मद्रास (चेन्नई) में हुए हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में हिन्दी-संदर्भ में प्रेरक वक्तव्य दिया था- +इस प्रकार के विचारों और गतिविधियों से हिन्दी-प्रसार को अनुकूल दिशा मिली है। +साहित्यिक संस्थाएँ. +भारतवर्ष एक लम्बे समय तक दासता की बेड़ी में जकड़ा रहा। हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु समय-समय पर अनेक साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना होती रहती है। राष्ट्रीय भाव जगाने और हिंदी के प्रचार-प्रसार में इन संस्थाओं का विशेष योगदान रहा है। इनमें कुछ संस्थाओं का उल्लेख किया जा रहा है। +भारतेन्दु मण्डल. +आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता भारतेन्दु हरिशचन्ट्ठद्र ने साहित्यकारों का एक मण्डल बनाया था। यह मण्डल हिन्दी साहित्य के माध्यम से सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन का अभिलाषी था। मण्डल के सदस्यों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं पर महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने हिन्दी पर व्याख्यान देते हुए कहा था- +भारतेन्दु मण्डल की गतिविधियों से सामाजिक क्षेत्र में जागरण का परिवेश बना, तो स्वदेशी आंदोलन को प्रभावी आधार मिला है। हिन्दी-प्रेम के कारण जन-सामान्य में हिन्दी लोकप्रिय हुई। भारतेन्दु हरीशचन्द्र के साथ इस मंडल के सक्रिय सदस्य थे- पं. प्रताप नारायण मिश्र, पं. बालकृष्ण भट्ट, बदरी नारायण चौधरी, श्रीनिवास दास, बालमुकुंद गुप्त, रमाशंकर व्यास और तोताराम आदि। +नागरी प्रचारिणी सभा, काशी. +इस सभा की स्थापना 10 मार्च, 1893 में हुई। इस संस्था को संरक्षक के रूप में बाबू श्यामसुन्दर दास, श्री गोपाल प्रसाद खत्री और पं. राम नारायण मिश्र आदि का आशीर्वाद मिला। इस संस्था से अन्य जुड़ने वाले गणमान्य विद्वानों में महामना मदन मोहन मालवीय, श्रीधर पाठक, श्री अम्बिका दत्त व्यास, श्री राधाचरण गोस्वामी और बदरी नारायण चौधरी आदि प्रमुख हैं। कोश-रचना, हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन, हस्तलिखित गं्रथों की खोज और संगोष्ठी आयोजन में यह संस्था देश में शीर्ष स्थान पर है। +कामता प्रसाद गुरु रचित ‘हिन्दी व्याकरण’ पं. किशोरी वाजपेयी कृत ‘हिन्दी शब्दानुशासन’ के अतिरिक्त ‘हिन्दी शब्दसागर’, ‘हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास’ आदि के दुर्लभ और महत्वपूर्ण प्रकाशन से इस संस्था को हिन्दी-विकास में विशेष महत्व मिला है। ‘नागरी प्रचारिणी’ शोध-पत्रिका का लगभग सौ वर्षों का गरिमामय इतिहास इस संस्था की गौरव गाथा का स्वरूप है। +इस संस्था ने नागरी लिपि के सुधार, आशुलिपि (शार्टहैंड) और टंकण (टाइप) संदर्भ में अनुकरणीय पहल की है। नागरी प्रचारणी सभा का लगभग सौ वर्षों का इतिहास हिन्दी प्रचार-प्रसार के श्रेष्ठ और प्रेरक संदर्भ को प्रस्तुत करता है। यह सभा आज भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार के साथ हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में लगी है। +हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग. +सम्मेलन हिन्दी प्रचार-प्रसार की सर्वप्रमुख साहित्यिक संस्था है। सन् 1910 में सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन महामना मदनमोहन मालवीय की अध्यक्षता में हुआ। राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन ने इसी समय न्यायालय में हिन्दी और देवनागरी प्रयोग पर बल दिया। +सम्मेलन द्वारा हिन्दी प्रचार-प्रसार और हिन्दी-विकास के लिए नियम बनाए गए। इनमें प्रमुख थे- राष्ट्रभाषा हिन्दी और राष्ट्रलिपि देवनागरी का प्रचार, हिन्दी भाषी प्रदेशों की शिक्षण संस्थाओं के साथ न्यायालयों में हिन्दी का प्रयोग, देवनागरी में छपाई की समुचित व्यवस्था, हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं का विकास, हिन्दी विद्वानों और साहित्यकारों का सम्मान और हिन्दी प्रचार-प्रसार हेतु हिन्दी की उच्च परीक्षाओं का आयोजन। +सम्मेलन द्वारा उक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सतत् प्रयत्न किया जाता रहा है। सम्मेलन के चतुर्थ अधिवेशन अर्थात् सन् 1913 से हिन्दी के व्यापक प्रचार हेतु प्रथमा, मध्यमा और उत्तमा आदि परीक्षाओं का आयोजन शुरू हुआ। +सम्मेलन की त्रौमासिक ‘सम्मेलन पत्रिका’ शोधपरक और गन्वेषणात्मक आलेखों के आधार पर सतत् प्रकाशित होती रही है। ‘राष्ट्रभाषा संदेश’ पत्र भी हिन्दी प्रचार-प्रसार की आकर्षक भूमिका में है। हिन्दी का चर्चित शब्दकोश ‘मानक हिन्दीकरण’ पाँच खण्डों में प्रकाशित करना गरिमा का विषय है। सन् 1963 में भारत सरकार के द्वारा लोक सभा में एक विशेष स्वीकृति कर ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ को राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था के रूप में मान्यता दी गई है। +इस प्रकार हिन्दी प्रचार-प्रसार में सम्मेलन का सर्वोपरि महत्व है। +दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास. +महात्मा गाँधी ने हिन्दी सम्मेलन के सन् 1918 के इन्दौर के अधिवेशन में दक्षिण में हिन्दी प्रचार की योजना बनाई। उनके पुत्री श्री देवदास गाँधी दक्षिण भारत में प्रथम हिन्दी प्रचारक के रूप में गए। दक्षिण भारत में प्रचारार्थ श्री सत्यदेव परिव्राजक आदि वहाँ पहुँचे। वहाँ प्रारंभ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से प्रचार हुआ। सन् 1927 में इसे दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास नाम दिया गया। इसके संस्थापकों में चक्रवर्ती राजगोपालचारी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। +सभा के द्वारा दक्षिण के प्रांतों में हिन्दी का प्रेरक प्रचार किया गया। हिन्दी भाषा के प्रचारार्थ प्रवेशिका विशारद्, पूर्वार्द्ध, विशारद् उत्तरार्द्ध, प्रवीण तथा हिन्दी प्रचारक आदि परीक्षाओं का संचालन किया जाता है। सभा की प्रवेशिका, विशारद् और प्रवणी परीक्षाओं को केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा मान्यता मिली है। यहाँ से मासिक ‘हिन्दी प्रचार समाचार’ और ‘दक्षिणी भारत’ द्विमासिक पत्रिका का प्रकाशन होता है। केन्द्र सरकार ने सभा को श्रेष्ठ हिन्दी प्रचारक मानकर राष्ट्रीय महत्व प्रदान किया है। +राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा. +हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 25वाँ अधिवेशन सन् 1936 में नागपुर में हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सम्मेलन के अध्यक्ष थे। श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन के प्रस्तावानुसार दक्षिण में हिन्दी प्रचारार्थ ‘हिन्दी प्रचार समिति’ का गठन किया गया। इसका प्रथम अधिवेशन सन् 1936 में वर्धा में हुआ। काका कालेलकर के सुझाव पर इसका नाम बदल कर ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ रखा गया। इस समिति का मुख्य उद्देश्य हिन्दी-प्रचार था और इसी आधार पर समिति मानती थी ‘एक हृदय हो भारत जननी’ समिति ने हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिए सन् 1938 से अपनी परीक्षाओं का संचालन शुरू किया समिति ने जुलाई 1943 से ‘राष्ट्रभाषा’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसके पश्चात् ‘राष्ट्रभारती’ पत्रिका का प्रकाशन किया गया। इस समिति के देश से बाहर लंका, स्याम, सुमात्र, मॉरिशस, इंग्लैंड आदि देशों में केन्द्र हैं। +समिति सम्मान और पुरस्कार से भी हिन्दी प्रचार-प्रसार को दिशा प्रदान करती है। इस समिति की गतिविधियों से हिन्दी को विशेष बल मिला है। +इनके अतिरिक्त हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, वर्धा; गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद; हिन्दी विद्यापीठ, मुम्बई; मातृभाषा उन्नयन संस्थान, इंदौर, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पूना और बिहार राष्ट्रभाषा, पटना आदि की हिन्दी प्रचार-प्रसार भूमिका उल्लेखनीय है। + +हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली की निर्माण प्रक्रिया: +हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली प्रयोजनमूलक हिन्दी का महत्वपूर्ण अंग है। इस शब्दावली ने हिन्दी को ज्ञान, विज्ञान प्रषासन, वाणिज्य और जनसंसार की भाषा बनने का गौरव प्रदान किया है। साहित्यिक भाषा से राजभाषा बनने की यह यात्रा अनेक सोपान पार कर यहाँ तक पहुँची है। पारिभाषिक शब्दों का निर्माण, निर्माण के आधार, शब्दावली का महत्व इस प्रक्रिया द्वारा समझा जा सकता है। यह शब्दावली हिन्दी की सम्मान वृद्धि में सहायक सिद्ध हुई है। यह हमारी गौरवशाली उपलब्धि है। +विषय परिचय. +हिन्दी भाषा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। ग्रामीण हों या शहरी, पढे लिखे हों या अनपढ़, व्यवसायी, अध्यापक, डॉक्टर या वकील हों, हिन्दी भाषा के बिना किसी का काम नहीं चलता है। यह भाषा इस देश की धडकन है। सामान्य व्यवहारों की भाषा से साहित्यिक भाषा तक हिन्दी ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। सन् 1950 में हिन्दी को राजभाषा का स्थान प्राप्त हुआ। हिन्दी अब सरकारी कामकाज की भाषा बन गई। स्वतंत्रता से पूर्व शासकीय कार्य अंग्रेजी भाषा में सम्पन्न किए जाते थे। अंग्रेजी से पूर्व राजभाषा फारसी थी। ‘‘ जैसे-जैसे राजतंत्री परम्पराएँ बिखरती गई अनेक देशों में जनतांत्रिक व्यवस्थाएँ उभरकर सामने आई तो उन्होंने अपने-अपने यहाँ बोली तथा समझी जाने वाली प्रमुख जनभाषा को राजभाषा को पद प्रदान किया।1 इसी क्रम में स्वाधीन भारत के संविधान के अनुसार केन्द्र सरकार के कामकाज के लिए देवनागरी में लिखित हिन्दी को 26 जनवरी 1950 को भारत की राजभाषा घोषित किया गया। +राजभाषा का उत्तरदायित्त्व ग्रहण करते ही हिन्दी भाषा साहित्य से इतर, न्याय, विज्ञान, वाणिज्य, प्रशासन, जनसंचार, विज्ञापन, अनुवाद एवं रोजगार की भाषा बन गई। कार्यालयीन, कामकाजी और व्यावहारिक भाषा के रूप में हिन्दी की नयी पहचान बनी। इसे हिन्दी का प्रयोजनीय पक्ष कहा गया। तब से आज तक हिन्दी की प्रयोजनीयता पर कार्य हो रहे हैं। अथक प्रयासों से हिन्दी अपने सभी पक्षों, सभी क्षेत्रों में सफल हो रही है। सबसे पहले तो उसे ऐसी शब्दावली विकसित करनी पडी जो न्याय, जनसंचार, पत्रकारिता, मीडिया, विज्ञान और विज्ञापन की आवश्यकता को पूर्ण कर सके। यही शब्दावली पारिभाषिक शब्दावली कही जाती है। +पारिभाषिक शब्दावली : आशय. +शब्द से आशय वर्गों के सार्थक समूह से है। ‘‘मनुष्य जगत के व्यवहार, चिन्तन-मनन और भावन की सभी स्थूल-सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ शब्द के अर्थाभाव से चरितार्थ होती है। तत्त्वत : शब्द और अर्थ अभिन्न है। इसलिए महाकवि तुलसीदास कहते हैं- गिरा अरथ जल बीच सम कहियत भिन्न न भिन्न।’2 परम्परा, परिस्थिति और प्रयोग से शब्द और उनका अर्थ जीवित रहता है। शास्त्र, विशिष्ट विषय अथवा सिद्धान्त के सम्प्रेषण के लिए सामान्य शब्दों के स्थान पर विषिष्ट शब्दावली की आवश्यकता होती है। यही शब्दावली पारिभाषिक शब्दावली कहलाती है। कुछ विद्वान इसे तकनीकी शब्दावली कहते हैं। +डॉ. माधव सोनटक्के इसे ‘ज्ञान विज्ञान की असीम परिधि को व्यक्त करने वाली शब्दावली’3 कहते हैं वहीं डॉ. सत्यव्रत दैनिक जीवन में नए विचार और वस्तुओं के लिए नए शब्दों के आगमन को पारिभाषिक शब्द मानते हैं। पारिभाषिक शब्द का अर्थ है- जिसकी परिभाषा दी जा सके। परिभाषा किसी विषय, वस्तु या विचार को एक निश्चित स्वरूप में बाँधती है। सामान्य शब्द दैनिक व्यवहार में, बोलचाल में प्रयुक्त होते है। जैसे दाल, चावल, कमरा, घर, यात्रा, नदी पहाड़ आदि। पारिभाषिक शब्द विषय विषेष में प्रयुक्त होते हैं। जैसे- खाता, लेखाकर्म, वाणिज्य, प्रबन्ध, लिपिक, वेतन, सचिव, गोपनीय आदि। ये शब्द वाणिज्य और प्रशासन के पारिभाषिक शब्द हैं। प्रशासन शब्दकोश में लिखा है- ‘‘पारिभाषिक शब्द का एक सुनिश्चित और स्पष्ट अर्थ होता है। किसी विषेष संकल्पना या वस्तु के लिए एक ही शब्द होता है, विषय विषेष या संदर्भ में उससे हटकर उसका कोई भिन्न अर्थ नहीं होता।’’4 +डॉ. भोलानाथ तिवारी ने लिखा है-‘‘ पारिभाषिक शब्द ऐसे शब्दों को कहते हैं जो रसायन, भौतिक, दर्शन, राजनीति आदि विभिन्न विज्ञानों या शास्त्रों के शब्द होते हैं तथा जो अपने अपने क्षेत्र में विशिष्ट अर्थ में सुनिश्चित रूप से परिभाषित होते हैं। अर्थ और प्रयोग की दृष्टि से निश्चित रूप से पारिभाषित होने के कारण ही ये शब्द पारिभाषिक कहे जाते है।’’5 कमलकुमार बोस ने पारिभाषिक शब्द को इस प्रकार समझाया है-‘‘ पारिभाषिक शब्द से तात्पर्य उन सारी शब्दाभिव्यक्तियों से है जो नव्य शास्त्र, प्रशासन, विज्ञान और व्यवहार में विशिष्ट अर्थ के लिए प्रयुक्त होती है।’’6 इस प्रकार विषय विशेष में प्रयुक्त होने वाला विशिष्ट शब्द पारिभाषिक शब्द कहलाता है। +पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण. +पारिभाषिक शब्दावली पारिभाषिक शब्दों का समूह है। ये पारिभाषिक शब्द-विद्वान मंडली द्वारा बनाए जाते हैं। हिन्दी की पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी शब्दों का संकलन नहीं है। यह अंग्रेजी शब्दों के पर्याय के रूप में निर्मित की गई है क्योंकि जब कोई भाषा-समाज स्वयं ज्ञान विकसित करने के बजाय किसी भाषा-समाज से तकनीकी ज्ञान ग्रहण करता है तो उसे उस भाषा-समाज की शब्दावली भी ग्रहण करनी पड़ती है। इस शब्दावली के आधार पर फिर वह अपनी भाषा में पर्यायों का निर्माण करता है। इस प्रकार पर्याय निर्माण की संकल्पना में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अनुवाद प्रक्रिया निहित है क्योंकि मौलिक विषेषज्ञ ज्ञान और अनुवाद पर्याय के बीच एक मध्यस्थ शब्दावली की स्थिति रहती है, जैसे भारत के संदर्भ में अंग्र्रेजी शब्दावली मध्यस्थ शब्दावली की भूमिका निभा रही है।’’7 इस प्रकार शब्दावली का निर्माण सरल-प्रक्रिया नहीं है। अनेक मत, सिद्धान्त, प्रयोग और उपयोगिता का आधार लेकर पारिभाषिक शब्दावली निर्मित की गई। दो अलग-अलग संस्कृति में शब्दों के पर्याय निश्चित करना अत्यंत कठिन कार्य रहा है किन्तु आधुनिक ज्ञान और विज्ञान के संप्रेषण के लिए सांस्कृतिक परम्परा का त्याग भी करना पड़ता है। भारतीय संविधान में राजभाषा के रूप में हिन्दी की स्वीकृति के पश्चात् यह तय किया गया कि अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी की ज्ञान विज्ञान तथा प्रषासन की शब्दावली तैयार की जाए जिससे प्रशासनिक कार्यों, शिक्षा तथा न्याय के लिए विदशी भाषा के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग किया जा सके। +पारिभाषिक शब्दों का निर्माण सृजन, ग्रहण, संचयन एवं अनुकूलन जैसी चार प्रक्रियाओं से गुजर कर हुआ है। डॉ. रघुवीर ने प्रत्येक अंग्रेजी शब्द के लिए संस्कृत व्याकरण के अनुसार शब्द गढ़े। उन्होंने अरबी, फारसी, देशज शब्दों के स्थान पर संस्कृत का आधार लेकर नए शब्दों का निर्माण किया। उन्होंने समनुमोदन, वज्रचूर्ण,कठोराकिनी, समरूपण, जैसे शब्द बनाए।8 अफीम के लिए अहिफेन और सीमेंट के लिए वज्रधातु जैसे शब्द प्रचलन में नहीं आ पाए। डॉ. माई दयाल जैन ने डॉ. रघुवीर द्वारा बनाए शब्दों के सम्बन्ध में लिखा है- +ग्रहण. +पारिभाषिक शब्द बनाते समय यह भी स्मरण रखा गया कि यदि तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी शब्द पहले से किसी धारणा का व्यक्त करने में सक्षम हों तो नया शब्द गढ़ने के स्थान पर उस शब्द को ही स्वीकार कर लिया जाए। अंग्रेजी के मोटर, स्टेशन, टिकट, सल्फर, पोटेशियम, नाइट्रोजन, मीटर, ग्राम, टेलीफोन, इंजेक्शन, ब्यूरो, कमीशन, ट्रेक्टर, प्रोटीन, रेफरी, हॉकी, कैरम, क्रिकेट, आउट, फॉलोआन, कम्प्यूटर, माउस, कीबोर्ड, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर जैसे अनेक शब्दों को स्वीकार कर लिया गया। +अरबी, फारसी शब्दों को भी प्रचलन, संप्रेषण और प्रयोग की सुविधा के आधार पर स्वीकार किया गया। फरार, गालीगलौज, हिसाब, हवाई-सर्वेक्षण करारनामा, हमलावर, मकान-किराया, वकालत, गैर जमानती वारंट जैसे शब्द प्रशासनिक शब्दावली में स्वीकृत हुए। पारिभाषिक शब्दावली में निर्माण के साथ-साथ ‘ग्रहण’ की प्रक्रिया को भी पूरा महत्त्व दिया गया। ‘ग्रहण’ करते समय अंग्रेजी का प्रत्येक शब्द स्वीकार नहीं किया गया। कम्प्यूटर शब्द यथावत ले लिया गया। किन्तु कम्प्यूटराइजेशन नहीं। इसके लिए कम्प्यूटरीकरण शब्द गढ़ा गया। इस तरह हिन्दी और भारतीय भाषाओं की पारिभाषिक शब्दावली को दो स्रोतों से शब्द ग्रहण करने पडे़ है। विज्ञान-तकनीकी क्षेत्र में अंग्रेजी से लेकिन कानून, प्रशासन, राजनीति से संबंधित कई शब्द अब हिन्दी के ही बन गए हैं।10 +संचयन. +संचयन से आशय उस प्रक्रिया से है जिसके अन्तर्गत भारतीय भाषाओं उपभाषाओं तथा बोलियों के उपयुक्त शब्दों का संचय पारिभाषिक शब्द के रूप में किया जाता है। इसमें चयन, निश्चयन तथा प्रयोग द्वारा संकलन की प्रक्रिया अपेक्षित है। अपनी भाषा की बोली, उपभाषा तथा प्रान्तीय भाषाओं में प्रचलित शब्दों में से आवश्यकतानुरूप शब्दों का चयन किया जा सकता है। ...’’विद्वानों ने संचयन के माध्यम से अनेक शब्दों में से एक सही शब्द चुनकर पारिभाषिक शब्दावली को समृद्ध किया है। डॉ. रघुवीर के बाद शब्दावली आयोग, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, राजभाषा आयोग और राज्यों के हिन्दी मंडल ने पारिभाषिक शब्द निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इन्होंने समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया और हिन्दी भाषा को गति प्रदान की इन सबने माना कि ‘‘हमारी पूरी शब्दावली अन्तर्मुखी होनी चाहिए न कि वह हिन्दी के नाम से हो या विदशी शब्दावली हो। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि भारत की प्राचीन, मध्यकालीन आधुनिक भाषाओं और विदेशी भाषाओं के शब्द आवश्यकतानुसार अपनाती हुई हिन्दी अपनी ही भीतर से विकसित हो। हिन्दी की वही वृद्धि और उन्नति स्थायी प्राकृतिक और स्वाभाविक होगी दूसरी सभी प्रकार की वृद्धि और उन्नति अप्राकृतिक और बनावटी होगी।11 संचयन की प्रक्रिया समाज-विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण मानी गई है। +अनुकूलन. +पारिभाषिक शब्द निर्माण में ग्रहण, संचयन के साथ-साथ अनुकूलन भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अनुकूलन से आषय है पूर्व प्रचलित शब्दों को पारिभाषिक शब्द के रूप में अनुकूलन। नए, किलिष्ट, संस्कृतनिष्ठ शब्दों के स्थान पर पूर्व प्रचलित शब्द को पारिभाषिक शब्द के रूप में शब्दानुकूलन भी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। जैसे एंजिन, लैन्टर्न, एकेडमी, ट्रेजेडी क्रमशः इंजन, लालटैन, अकादमी, त्रासदी में बदल गए। दो भाषाओं के मध्य संधि अथवा समासीकरण भी अनुकूलन ही है। कम्प्यूटरीकरण, अपीलीय, कलैंडर वर्ष आदि शब्द इसी अनुकूलन की प्रक्रिया के अर्न्तगत बने है। हिन्दी और अंग्रेजी में संस्कृति और जीवन में साम्य नहीं है किन्तु हिन्दी ने अनेक अंग्रेजी शब्दों को समाहित कर लिया है उन्हें परिवर्तन, सशोधन के पश्चात् स्वीकार करना व्यावहारिक होगा। कॉलेज, पुलिस, सुनामी शब्द का स्वीकार्य इसी अनुकूलन प्रक्रिया का परिणाम है। +शब्द-संग्रह. +हिन्दी भाषा जनभाषा है। साहित्यिक भाषा के पूर्व ही यह दैनिक व्यवहार और बोलचाल की भाषा बन चुकी थी। पारिभाषिक शब्द निर्माण में शब्द-संग्रह भी महत्त्वपूर्ण हैं नए शब्द बनाने में अनावश्यक धन, श्रम और समय नष्ट करने के स्थान पर जन-सामान्य के बीच में प्रचलित शब्दों का संग्रह किया जाना भी महत्त्वपूर्ण है। ’’हमारी शब्दावली न तो लोह-जाकट के समान कस देने वाली होनी चाहिए और न उसमें इतनी स्थिरता होनी चाहिए कि वह भविष्य में ठहरे हुए पानी के समान सड़ जाए या सूखकर मर जाए। किसी एक दृष्टिकोण के आधार पर बनी शब्दावली अधूरी और लंगड़ी होगी।12 +इस दिशा में भी बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ है। भरपाई, भुगतान, भूलचूक जोड़ना, वसूली, पतालेखी, दाखिला, लाभ, फायदा, हवाई अड्डा, जोत, भत्ता, छूट, कहासुनी, शौकिया, गोला-बारूद, चिढ़, खीज, अनाम, गुमनाम, अर्जी, मनमाना, बकाया, आमद, तोपखाना, पारखी, बट्टे पर, कुर्की, नीलामी, पिछड़ा वर्ग, बिल्ला, सौदा, तहखाना, धमाका, झाँसा, छाप, ठप, टूटफूट ब्यौरा, पताका, हथकड़ी, पक्के नियम, बटोरन जैसे अनेक शब्द जनभाषा से संग्रह कर पारिभाषिक बनाए हैं। ‘‘इस जन-भाषा में उत्तर भारत में पुराने काल से चले आनेवाले सभी उद्योगों और व्यवसायों के पारिभाषिक शब्द न केवल भरे पडे़े हैं, वरन् उनमें समय-समय पर नयी-नयी परिस्थितियों और प्रभावों के कारण नए-नए शब्द भी बनते रहे हैं। ... भाषा विज्ञान की दृष्टि से उनमें कोई दोष नहीं है। इन शब्दों का स्थान न तो अन्तर्राष्ट्रीय शब्द ले सकते हैं और न संस्कृत निष्ठ शब्द। ये शब्द देश की अनमोल सम्पत्ति हैं और किसी भी कारण से इनकी उपेक्षा करना अपनी भाषा को हानि पहुँचाना है।’13 +निष्कर्ष. +नए शब्दों के प्रयोग से हिन्दी के व्यावहारिक, कामकाजी और प्रशासनिक क्षेत्र में प्रगति हुई है। हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने में पारिभाषिक शब्दावली का महत्व पूर्ण योगदान है। इसी शब्दावली की सहायता से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हिन्दी में कार्य करना संभव बनाया है। ये शब्द एकार्थी सुनिश्चित, सरल और प्रभावी होते है। +कृत्रिम निर्माण, अनुकूलन, एकरूपता स्पष्ट अर्थवत्ता तथा स्वीकरण के द्वारा ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं के लिए लगभग 08 लाख शब्द गढ़े गए हैं। विधि शब्दावली, मीडियाशब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, अन्तरिक्ष शब्दावली, मानविकी एवं समाज विज्ञान की पारिभाषिक, शब्दावली प्रकाशित एवं प्रचलित हो चुकी हैं। आयोग द्वारा कृषि, पशु-चिकित्सा कम्प्यूटर-विज्ञान, धातु-कर्म, नृ-विज्ञान, ऊर्जा, खनन, इंजीनियरी, मुद्रण-इंजीनियरी, रसायन इंजीनियरी, इलेक्ट्रानिकी, वानिकी, लोक-प्रशासन, अर्थ-शास्त्र, डाक-तार, रेलवे, गृह-विज्ञान आदि विषयों के शब्द भी बनाए हैं। निरन्तर प्रयोग से इनकी अर्थवत्ता सिद्ध हो चुकी है। पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी के प्रयोजनीय पक्ष के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। +संदर्भ. +1. प्रयोजनमूलक हिन्दी : रघुनंदन प्रसाद शर्मा, भूमिका से उद्धृत +2. प्रयोजनमूलक हिन्दी : कमल कुमार बोस, पृ.05. +3. प्रयोजन मूलक हिन्दी : माधव सोनटके पृ.01. +4. प्रशासन शब्दकोष : म.प्र. का प्रकाशन 1986 पृष्ठ भूमिका से उद्धृत +5. प्रयोजन मूलक हिन्दी : डॉ. माधव सोनटके पृ.02. +6. वही पृष्ठ 2 से उद्धृत +7. वृहत् प्रशासन शब्दावली 2001 पृष्ठ-VI +8. प्रशासनिक शब्दावली 2002 भूमिका से उद्धृत +9. हिन्दी शब्द-रचना : माईदयाल जैन पृष्ठ-216 +10. वाणिज्य शब्दाकोष, उद्धृत हिन्दी शब्द रचना पृष्ठ-221 +11. प्रयोजन मूलक हिन्दी : माधव सोनटक्के पृष्ठ-12 +12. हिन्दी शब्द रचनाः माईदयाल जैन पृष्ठ 244 +13. प्रयोजन मूलक हिन्दी डॉ. देवेन्द्र नाथ शर्मा के विचार पृ. 13 + +हिंदी साहित्य का विधागत इतिहास/पत्र-पत्रिकाओं का इतिहास: +भारत की स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व का युग राष्ट्रीयता औरराष्ट्रीय चेतना की अनुभूति के विकास का युग था। इस युग का उद्देश्य स्वाधीनता की प्राप्ति था। आरंभिक पत्र-पत्रिकाओं की सुरुआत भी इसी उद्देस्य के लिए हुई। +भारतेंदु के आगमन से पूर्व ही पत्रकारिता का आरंभ हो चुका था। हिंदी भाषा का प्रथम समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई, 1826 को कानपुर निवासी पं॰ युगल किशोर शुक्ल ने निकाला। सुखद आश्चर्य की बात यह थी कि यह पत्र बंगाल से निकला और बंगाल में ही हिंदी पत्रकारिता के बीज प्रस्पुफटित हुए। ‘उदन्त मार्तण्ड’ का मुख्य उद्देश्य भारतीयों को जागृत करना तथा भारतीयों के हितों की रक्षा करना था। यह बात इसके मुख पृष्ठ पर छपी पंक्ति से ही ज्ञात होती है: +यह उदन्त मार्तण्ड अब पहले पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया ...। +समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का मूल उद्देश्य सदैव जनता की जागृति और जनता तक विचारों का सही संप्रेषण करना रहा है। महात्मा गांधी की पंक्तियाँ हैं : समाचार पत्र का पहला उद्देश्य जनता की इच्छाओं, विचारों को समझना और उन्हें व्यक्त करना है। दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाओं को जागृत करना है। तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को निर्भयतापूर्वक प्रकट करना है। +समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने इन उद्देश्यों को अपनाते हुए आरंभ से ही भारतीयों के हित के लिए विचार को जागृत करने का कार्य किया। बंगाल से निकलने वाला ‘उदन्त मार्तण्ड’ जहाँ हिंदी भाषी शब्दावली का प्रयोग करके भाषा-निर्माण का प्रयास कर रहा था वहीं काशी से निकलने वाला प्रथम साप्ताहिक पत्र ‘बनारस अखबार’ पूर्णतया उर्दू और फारसीनिष्ठ रहा। भारतेंदु युग से पूर्व ही हिंदी काप्रथम समाचार-पत्र (दैनिक) ‘समाचार सुधावर्षण’ और आगरा से ‘प्रजाहितैषी’ का प्रकाशन हो चुका था। अर्जुन तिवारी पत्रकारिता के विकास को निम्नलिखित कालखण्डों में बाँटते हैं: +1. उद्भव काल (उद्बोधन काल) - 1826-1884 ई॰ +2. विकासकाल +3. वर्तमान काल (बहुउद्देशीय काल) 1975 ... +भारतेंदु ने अपने युग धर्म को पहचाना और युग को दिशा प्रदान की। भारतेंदु ने पत्र-पत्रिकाओं को पूर्णतया जागरण और स्वाधीनता की चेतना से जोड़ते हुए 1867 में ‘कवि वचन सुधा’ का प्रकाशन किया जिसका मूल वाक्य था : 'अपधर्म छूटै, सत्व निज भारत गहै' भारत द्वारा सत्व ग्रहण करने के उद्देश्य को लेकर भारतेंदु ने हिंदी पत्रकारिता का विकास किया और आने वालेपत्रकारों के लिए दिशा-निर्माण किया। भारतेंदु ने कवि वचन सुधा,हरिश्चंद्र मैगशीन, बाला बोधिनी नामक पत्र निकाले। ‘कवि वचन सुधा’ को 1875 में साप्ताहिक किया गया जबकि अनेकानेक समस्याओं के कारण 1885 ई॰ में इसे बंद कर दिया गया। 1873 में भारतेंदु ने ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ का प्रकाशन किया जिसका नाम 1874 में बदलकर ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ कर दिया गया। देश के प्रति सजगता, समाज सुधार, राष्ट्रीय चेतना, मानवीयता, स्वाधीन होने की चाह इनके पत्रों की मूल विषयवस्तु थी। स्त्रियों को गृहस्थ धर्म और जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए भारतेंदु ने ‘बाला बोधिनी’ पत्रिका निकाली जिसका उद्देश्य महिलाओं के हित की बात करना था। +भारतेंदु से प्रेरणा पाकर भारतेंदु मण्डल के अन्य पत्रकारों ने भी पत्रों का प्रकाशन किया। पं॰ बालकृष्ण भट्ट का ‘हिंदी प्रदीप’ इस दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रयास था। इस पत्र की शैली व्यंग्य और विनोद का सम्मिश्रण थी और व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग करते हुए जन जागृति का प्रयास करना इनका उद्देश्य था। इस पत्र का उद्घाटन करते हुए भारतेंदु ने लिखा : +सूझे विवेक विचार उन्नति, कुमति सब यामैं जरै। +हिन्दी प्रदीप प्रकाशि मुरखतादि भारत तम हरै। +1857 के संग्राम से प्रेरणा लेकर भारतवासियों की जागृति का यह प्रयास चल ही रहा था कि 14 मार्च 1878 को 'वर्नाकुलर प्रेस एक्ट' लागू कर दिया गया। लार्ड लिटन द्वारा लागू इस कानून का उद्देश्य पत्र-पत्रिकाओं की अभिव्यक्ति को दबाना और उनके स्वातंत्रय का हनन करना था। ‘हिंदी प्रदीप’ ने इस एक्ट की न केवल भर्त्सना की बल्कि उद्बोधनपरक लेख भी लिखे। +1881 में पं॰ बद्रीनारायण उपाध्याय ने ‘आनन्द कादम्बिनी’ नामक पत्र निकाला और पं॰ प्रतापनारायण मिश्र ने कानपुर से ‘ब्राह्मण’ का प्रकाशन किया। ‘आनन्द- कादम्बिनी’ ने जहाँ साहित्यिक पत्रकारिता में योगदान दिया वहीं ‘ब्राह्मण’ ने अत्यंत धनाभाव में भी सर्वसाधारण तक जानकारी पहुँचाने का कार्य पूर्ण किया। ‘ब्राह्मण’ का योगदान साधारण व सरल गद्य के संदर्भ में भी महत्त्वपूर्ण है। +1890 में ‘हिंदी बंगवासी’ ने कांग्रेस परव्यंग्य की बौछार की वहीं 1891 में ‘बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन’ ने ‘नागरी नीरद’ का प्रकाशन किया। राष्ट्र को चैतन्य करना व अंग्रेशों की काली करतूतों का पर्दाफाश करना इस पत्र का उद्देश्य था। भारतेंदु युग से निकलने वाले पत्रों की मूल विषयवस्तु भारतीयों को जागृत करना तथा सत्य, न्याय और कर्त्तव्यनिष्ठा का प्रसार करना तथा जनता को एकता की भावना का पाठ पढ़ाना था। +यह युग राष्ट्रीय चेतना के प्रसार का युग था। पत्रकारों का उद्देश्य किसी भी प्रकार की व्यावसायिक पत्रकारिता को प्रश्रय देना नहीं था। वह पत्रकारिता का सही दिशा में सदुपयोग करते हुए आम जन के भीतर वह जोश एवं उमंग भरना चाहते थे जिसके द्वारा वह स्वयं खड़े होने का साहसकर सके। इसी राष्ट्रीयता का विस्तार था - सरकार की नीतियों का पर्दाफाश करना। ब्रिटिश सरकार की अनीतियों पर चढ़े नीतिगत मुलम्में को उतार कर उनके वास्तविक चेहरे का उद्घाटन करना इस काल के पत्रकारों का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था। बालमुकुन्द गुप्त ने ‘शिवशम्भु के चिट्ठे’ में ब्राह्मण शिवशम्भु शर्मा के छद्म नाम सेलॉर्ड कर्जन की नीतियों पर व्यंग्य किया। +इस समय की दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ थीं : 1. 1878 का वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, 2. 1905 का बंग विभाजन। 1878के इस एक्ट द्वारा प्रेस कीआशादी पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया गया। ब्रिटिश सरकार अपने खिलाफ स्वतंत्रता के स्वर उठाने वाले पत्रों का दमन करना चाहती थी और इसीलिए उन्होंने 1878 में प्रेस एक्ट लागू किया। 1879 में ‘सारसुधानिधि’ पत्र निकला। इसने न केवल इस एक्ट का विरोध किया बल्कि अपनी ‘भाषा’ हिंदी की समृद्धि के लिए व्याख्यान भी लिखे। अपने प्रयोजन की ओर संकेत करते हुए इन्होंने लिखा - ...यथार्थ हिंदी भाषा का प्रचार करना और हिंदी लिखने वालों की संख्या में वृद्धि करना सार सुधानिधि का दूसरा प्रयोजन है। राष्ट्रीय चेतना के साथ-साथ भाषा की महत्ता स्थापित करने का प्रयास इस युग के सभी पत्रकारों का उद्देश्य था। यदि कहा जाए कि भाषा का प्रश्न राष्ट्रीयता का ही प्रश्न थाऋ तो गलत नहीं होगा। सर्वसाधारण की जन-भाषा और हृदय को छू लेने वाली हिंदी का प्रयोग करना और करने के लिए तैयार करना इनका प्रमुख उद्देश्य था। सबसे बड़ी बात यह थी कि इन्होंने कहीं भी भाषा को प्रबुद्धजन से ही जोड़ने का आग्रह नहीं दिखाया, सामान्य जन की ही शब्दावली काप्रयोग करते हुए उन्हें सचेतन करने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए सारसुधानिधि में ‘हिंदी भाषा’ नाम से छपे लेख की भाषा द्रष्टव्य है : +इस दिशा में सबसे बड़ा योगदान ‘भारतेंदु’ का है। भारतेंदु ने 1873 में कहा : ‘हिंदी नयी चाल में ढली’ - यह नयी चाल भाषा की राह को सुगम बनाने का प्रयास थी जिसके लिए भारतेंदु ने सर्वाधिक प्रयास किया। +इस युग की पत्रकारिता के उद्देश्य बहुआयामी थे। एक ओर राष्ट्रीयता की चेतना के साथ-साथ राजनीति की कलई खोलना तो दूसरी ओरसामाजिक चेतना को जागृत करना, सामाजिक कुरीतियों और दुष्प्रभावों का परिणाम दर्शाना, स्त्रियों की दीन-हीन दशा में सुधार और स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा देनाऋ पत्रकारों के प्रमुख उद्देश्य थे। भारतेंदु इस कार्य के लिए युग द्रष्टा और युग स्रष्टा के रूप में आए। उनके योगदान के लिए ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल उन्हें विशेष स्थान प्रदान करते हैं। हिंदी साहित्य का दिशा-निर्देश करने वाली पत्रिका ‘सरस्वती’ का प्रकाशन जनवरी 1900 को हुआ जिसके संपादक मण्डल में जगन्नाथदास रत्नाकर, राधाकृष्णदास, श्यामसुंदर दास जैसे सुप्रसिद्ध विद्वज्जन थे। 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसका कार्यभार संभाला। एक ओर भाषा के स्तर पर और दूसरी ओर प्रेरक बनकर मार्गदर्शन का कार्य संभालकर द्विवेदी जी ने साहित्यिकऔर राष्ट्रीय चेतना को स्वर प्रदान किया। द्विवेदी जी ने भाषा की समृद्धि करके नवीन साहित्यकारों को राह दिखाई। उनका वक्तव्य है : हमारी भाषा हिंदी है। उसके प्रचार के लिए गवर्नमेंट जो कुछ कर रही है, सो तो कर ही रही है, हमें चाहिए कि हम अपने घरों का अज्ञान तिमिर दूर करने और अपना ज्ञानबल बढ़ाने के लिए इस पुण्यकार्य में लग जाएं। महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से ज्ञानवर्धन करने के साथ-साथ नए रचनाकारों को भाषा का महत्त्व समझाया व गद्य और पद्य के लिए राह निर्मित की। महावीर प्रसाद द्विवेदी की यह पत्रिका मूलतः साहित्यिक थी और हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त से लेकर कहीं-न-कहीं निराला के निर्माण में इसी पत्रिका का योगदान था परंतु साहित्य के निर्माण के साथ राष्ट्रीयता का प्रसार करना भी इनका उद्देश्य था। भाषा का निर्माण करना साथ ही गद्य-पद्य के लिए खड़ी बोली को ही प्रोत्साहन देना इनका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था। +1901 में प्रकाशित होने वाले पत्रों में चंद्रधर शर्मा गुलेरी का ‘समालोचक’ महत्त्वपूर्ण है। इस पत्र का दृष्टिकोण आलोचनात्मक था और इसी दृष्टिकोण के कारण यह पत्र चर्चित भी रहा। +1905 में काशी से ‘भारतेंदु’ पत्र का प्रकाशन हुआ। यह पत्र भारतेंदु हरिश्चंद्र की स्मृति में निकाला गया। ‘जगमंगल करै’ के उद्घोष के साथ इस पत्र ने संसार की भलाई करने का महत् उद्देश्य अपने सामने रखा परंतु लंबे समय तक इसका प्रकाशन नहीं हो सका। +1907 का वर्ष समाचार पत्रों की दृष्टि सेमहत्त्वपूर्ण रहा। महामना मालवीय ने ‘अभ्युदय’ का प्रकाशन किया वहीं बाल गंगाधर तिलक के ‘केसरी’ की तर्ज पर माधवराव सप्रे ने ‘हिंदी केसरी’ का प्रकाशन किया। ‘मराठी केसरी’ के महत्त्वपूर्ण अंशों और राष्ट्रीय चेतना का उद्बोधन करने वालेअवतरणों का हिंदी अनुवाद करके ‘हिंदी केसरी’ ने उसे जन-साधारण तक पहुँचाया।महावीर प्रसाद द्विवेदी ने बाल गंगाधर तिलक की प्रशंसा करते हुए और माधवराव सप्रे के भाषा संबंधी प्रयास को सराहते हुए लिखा : ... आशा है इससे वही काम होगा जो तिलक महाशय के केसरी से हो रहा है। इसके निकालने का पूरा श्रेय पं॰ माधवरावसप्रे बी.ए. को है। महाराष्ट्री होकर हिंदी भाषा पर आपके अखण्ड और अकृत्रिम प्रेम को देखकर उन लोगों को लज्जित होना चाहिए जिनकी जन्मभाषा हिंदी है पर जो हिंदी में एक सतर भी लिख नहीं सकते या लिखना नहीं चाहते। +1910 में गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ का प्रकाशन किया। यह पत्र उग्र एवं क्रांतिकारी विचारधारा का पोषक था। उग्र नीतियों के समर्थक इस पत्र ने उत्साह एवं क्रांति के पोषण में अपनामहत्त्वपूर्ण योगदान दिया। +इन पत्रों का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना एवं भाषा नीति का प्रसार करना था। उग्र एवं क्रांतिकारी विचारधारा के पोषण पत्र स्वाधीनता के प्रसार के लिए प्रयास कर ही रहे थे, साथ ही साथ साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने अनेक लेख लिखकर जनता की सुप्त भावनाओं का दिशा-निर्देशन किया। +छायावाद काल में पत्रिकाओं का प्रकाशन अधिक हुआ। इस काल की प्रमुख पत्रिकाओं में इन्दु, प्रभा, चाँद, माधुरी एवं शारदा, मतवाला थी। सभी साहित्यकारों : जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, निराला, महादेवी वर्मा ने पत्रिकाएँ निकालीं। इन साहित्यकारों ने अपने लेखों के माध्यम से जनजागृति का कार्य किया। 1909 में जयशंकर प्रसाद ने ‘इन्दु’ पत्रिका का प्रकाशन किया। हिंदी काव्यधारा में छायावाद का आरंभ इसी पत्रिका से ही हुआ। +‘प्रभा’ का प्रकाशन सन् 1913 में हुआ। इसके संपादक कालूराम गंगराडे थे। इस पत्रिका ने ही माखनलाल चतुर्वेदी जैसे राष्ट्रीय चेतना के कवि को जगत् के समक्ष प्रस्तुत एवं स्थापित किया। माखनलाल चतुर्वेदी ने इस पत्र को उग्र एवं सशक्त स्वर जागरण का माध्यम बनाया। उनके शब्दों में : "हमारा अनुरोध है कि तुम अन्यायों, अत्याचारों और भूलों के संबंध में जो कुछ लिखना हो, वहदबकर नहीं, खुलकर लिखो। तुम्हारे पत्रों के संपादकों का विद्वता का ज्वर तभी शायद उतरेगा।" ‘चाँद’ का प्रकाशन सन् 1920में हुआ। आरंभ में यह साप्ताहिक पत्र था बाद में मासिक हो गया। इस पत्रिका में अनेक सामाजिक, धाख्रमक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर लेख प्रकाशित किए जाते थे। +‘माधुरी’ का प्रकाशन 1921 से हुआ। यह छायावाद की प्रमुख पत्रिका थी परंतु अनेक अस्थिर नीतियों का इसे भी सामना करना पड़ा तथापि यह छायावाद की सबसे लोकप्रिय पत्रिका रही। श्री विष्णुनारायण भार्गव इस पत्रिका के संस्थापक थे। ‘माधुरी’ के मुख पृष्ठ पर दुलारे लाल भार्गव का लिखा दोहा प्रकाशित होता था : +सिता, मधुर मधु, सुधा तिय अधर माधुरी धन्य। +पै नव रस साहित्य की यह माधुरी अनन्य। +1922 में रामकृष्ण मिशन से जुड़े स्वामी माधवानन्द के संपादनमें ‘समन्वय’ का प्रकाशन हुआ। यह मासिक पत्र था। निराला की सूझ-बूझ और उनके पाण्डित्य का उत्कृष्ट उदाहरण यह पत्र है। आचार्य शिवपूजन सहाय और निराला ने विभिन्न उत्कृष्ट सामाजिक धाख्रमक लेखों द्वारा इस पत्र के माध्यम से सर्वसाधारण तक अपना स्थान बनाया। +निराला ने हिंदी भाषा सीखने के लिए ‘सरस्वती’ पत्रिका को आधार बनाया। वह इस पत्रिका के प्रति अपना धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहते हैं : "जिसकी हिंदी के प्रकाश के परिचय के समक्ष मैं आँख नहीं मिला सका, लजा कर हिंदी शिक्षा के संकल्प से कुछ दिनों बाद देश से विदेश, पिता के पास चला गया था और उस हिंदी हीन प्रांत में बिना शिक्षक के ‘सरस्वती’ की प्रतियां लेकर पदसाधना की और हिंदी सीखी।" 1923 में निकलने वाला ‘मतवाला’ निराला के गुणों से प्रदीप्त, अपने स्वरूप में भी निराला ही था। यद्यपि इसके संस्थापक महादेव प्रसाद सेठ थे तथापि इस पत्र की पूर्ण जिम्मेदारी शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ व पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की ही थी। हास्य, व्यंग्य एवं विनोद का प्रयोग करके नई चेतना जगाने वाले इस पत्र के मुखपृष्ठ पर छपने वाली पंक्तियाँ थी। : +अमिय गरल, शशि सीकर रविकर +राग विराग भरा प्याला +पीते हैं जो साधक उनका +प्यारा है यह ‘मतवाला’। +मतवाले अंदाज के लिए मशहूर पत्र ‘निराला’ के निराले अंदाज का सूचक था। ‘निराला’ को यह उपनाम इसी पत्र द्वारा ही प्राप्त हुआ था। ‘मतवाला’ साहित्यिक योजनाओं को शीर्ष पर पहुँचाने का उत्कृष्ट माध्यम था। अपने युग के प्रति जागरूक रहने के साथ-साथ साहित्य की नवीन शैली का प्रादुर्भाव करने का श्रेय इस पत्र को है। +‘सुधा’ का संपादन 1927 में श्री दुलारे लाल भार्गव व पं॰ रूपनारायण पाण्डेय ने किया। इस पत्रिका का मूल उद्देश्य बेहतर साहित्य उत्पन्न करना, नए लेखकों को प्रोत्साहन देना, कृतियों को पुरस्कृत करना व विविध विषयों पर लेख छापना था। ‘निराला’ के आगमन से ‘सुधा’ को एक नई दिशा मिली। इस पत्रिका के प्रमुख विषयों में समाज सुधार, विज्ञान से लेकर साहित्य औरगृहविज्ञान की सामग्री भी प्रकाशित होती थी। +छायावाद की पत्रकारिता इस दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थी कि भाषा का एक नया संस्कार और भाषा में कोमलता-प्रांजलता लाने का श्रेय इस युग की पत्रिकाओं को था। +एक ओर इन पत्रिकाओं के माध्यम से स्वच्छंदतावाद की स्थापना हुई वहीं सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं को स्वर मिला। अनेक सुंदर कविताओं का प्रकाशन इस युग की पत्रिकाओं में हुआ। ‘जूही की कली’, ‘सरोज स्मृति’ , ‘बादल राग’ जैसी निराला की उत्कृष्ट कविताएँ ‘मतवाला’ में प्रकाशित हुईं। ‘जूही की कली’ को मुक्त छंद के प्रवर्तन का श्रेय दिया जाता है। +‘चाँद’ पत्रिका में ही महादेवी वर्मा का अधिकांश साहित्य छपा। ‘छायावाद’ के प्रसिद्ध रचनाकारों में से सुमित्रानंदन पंत जी ने ‘रूपाभ’ का प्रकाशन किया। +प्रेमचंद ने 1932 में ‘जागरण’ और 1936 में ‘हंस’ का प्रकाशन किया। ‘हंस’ का उद्देश्य समाज का आह्नान करना था। ‘हंस’ साहित्यिक पत्रिका थी जिसमें साहित्य की विविध विधाओं का प्रकाशन किया जाता था। महात्मा गांधी की अहिंसा को साहित्य के माध्यम से स्थापित करने वाले प्रेमचंद ने‘हंस’ में भी इसी आदर्श को स्वर दिया। स्वतंत्रता के प्रति महात्मा गांधी के निरंतर प्रयास को महसूस करते हुए ‘हंस’ ने लिखा : भारत के कर्णधार महात्मा गांधी ने इस विचार की सृष्टि कर दी। अब वह बढ़ेगा, फूले फलेगा। ... हमारा यह धर्म है कि उस दिन को जल्द से जल्द लाने के लिए तपस्या करते रहें। यही हंस का ध्येय होगा और इसी ध्येय के अनुवूफल उसकी नीति होगी। +गांधी की नीतियों का समर्थन, स्वराज्य स्थापना के लिए जागरण का प्रयास और साहित्यिक विधाओं का विकास ही ‘हंस’ का लक्ष्य था। प्रेमचंद के पश्चात् शिवरानी देवी, विष्णुराव पराड़कर, जैनेन्द्र, शिवदान सिंह चौहान, अमृतराय ने इस पत्रिका का संपादन किया। ‘हंस’ अब एक नए रूप में और नए आदर्श-यथार्थ को समन्वित करके नए ज्वलंत प्रश्नों को उभारते हुए राजेन्द्र यादव द्वारा निकाली जारही है। अब इसका प्रमुख स्वर -किसान और स्त्री एवं दलित पीड़ा का है। इन तीनों वर्गों की सशक्त उपस्थिति इसमें देखी जा सकती है। शोषित वर्ग की आवाश ‘हंस’ में प्रमुखता से स्थान प्राप्त कर रही है। +स्वतंत्रता से पूर्व अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं ने दोहरे कार्य को लेकर उसे पूर्ण करने का प्रयास किया : +1. राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार +2. साहित्य की विविध विधाओं का विकास +इसी के साथ भाषा के विविधवर्णी रंगों की खोज और साहित्यके दोनों पक्षों : गद्य एवं पद्य की स्थापना करनाभी इनका लक्ष्य था जिसे कवि-हृदय पत्रकारों ने पूर्ण किया। +1947 में मिली स्वतंत्रता के पश्चात् भारत को लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने और इसकी संप्रभुता की रक्षा करने का संकल्प प्रत्येक भारतवासी ने किया। अपनी भाषा की समृद्धि और उसका विकास करने की चाह सभी के हृदय में विद्यमान थी परंतु धीरे-धीरे राजभाषा विधेयकों के माध्यम सेहिंदी की उपेक्षा करके अंग्रेजी को उसके माथे पर बिठाने की तैयारी की योजनाएँ बनने लगीं। 12 मई, 1963 को ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में बांके बिहारी भटनागर ने हिंदी के समर्थन में लिखा : "भारत के सुदर्शनधारियों आँखें खोलकर देखो, अंग्रेजी का दुःशासन आज राष्ट्रभाषा का चीर हरने की हठधर्मी ठाने खड़ा है। सब भाषाओं को मिलकर राष्ट्रभाषा का चीर बढ़ाना होगा।" स्वतंत्रता के पश्चात् पत्रकारिता के समक्षअनेक आदर्श थे। उन्हें आशादी की सौंधी सुगंध से लेकर आने वाली पंचवर्षीय योजनाओं के स्वरूप से जनता को परिचित कराना था, विकास-काल की स्वर्णिम योजनाओं पर प्रकाश डालना था और साथ ही युगीन शमीनी सच्चाइयों को भी अनावृत्त करना था। इसी के साथ-साथ पाठक की चेतना में प्रवेश करके उसकी रुचि को संस्कारित करना भी पत्रकारिता का ही दायित्व था। +स्वतंत्रता के साथ ही भारत के विभाजन का दंश सभी को पीड़ित कर गया। 1951 में होने वाले आम चुनाव में पंचशील के सिद्धान्तों को भारतीय नीति का प्रमुख तत्त्व माना गया पर 1962 के चीनी आक्रमण ने इन सिद्धान्तों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। 1962 के आक्रमण के समय पत्र-पत्रिकाओं ने निरंतर बलिदान का आह्नान करके अपनी सशक्त भूमिका का निर्वाह किया। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी टिप्पणियाँ किसी भी सुप्त हृदय को भी जगाने में सक्षम थीं। ... +देशवासियो आओ, आज हम अपने छोटे-छोटे मतभेदों को भुलाकर वृहतर राष्ट्र की रक्षा के लिए पूर्णरूप से संगठित हो जाएँ और अपनी एकता की दहाड़ से शत्रु का कलेजा दहला दें... +सन् 64 में नेहरू की मृत्यु 1965 में पाकिस्तान से युद्ध ताशकंद समझौते के बाद लालबहादुर शास्त्री जी की मृत्यु, 71 में पाकिस्तान से पुनः युद्ध आदि घटनाओं के समय पत्र-पत्रिकाएँ अपनी जिम्मेदारी पूर्ण निष्ठा के साथ निभाती रहीं। +समाचार-पत्रों के लिए सबसे अधिक संकट की घड़ी आपात्काल की थी जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन किया गया और सृजन पर रोक लगा दी गई। यह पत्रकारों के लिए अंधेरी सुरंग में से गुज़रने जैसा कठोर यातनादायक अनुभव था। धीरे-धीरे पत्रों पर भी व्यावसायिकता हावीहोने लगी। पत्रों को स्थापित होने के लिए अर्थ की आवश्यकता हुई और अर्थ की सत्ता उद्योगपतियों के हाथों में होने के कारण इनके द्वारा ही पत्रों को प्रश्रय प्राप्त हुआ। ऐसे में उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रखना पत्रों का कर्त्तव्य हो गया। पूंजीपतियों के हाथ में होने वाले पत्रों में बौद्धिकता का स्तर गिरने लगा और वह मुक्तिबोध के शब्दों में : ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास’ बन कर रह गया। अर्जुन तिवारी अपनी पुस्तक ‘हिंदी पत्रकारिता का वृहद इतिहास’ में बालेश्वर अग्रवाल के शब्दों को उद्धृत करते हैं, उनके ये वाक्य आज की व्यावसायिकता को सही रूप में व्यक्त करने में समर्थ हैं : यह बात बिल्कुल सही है कि अब पत्रकारिता स्पष्टतः एक व्यापार बन गई है जो पाठकों को सही जानकारी देने तथा जनता की आवाश बनने के बजाय आख्रथक लाभ-हानि को ज्यादा महत्त्व देती है। जिस तरह दूसरे व्यापारों में लागत और लाभांश का महत्त्व और हिसाब होता है। उसी तरह पत्रकारिता में भी होने लगा है जिससे यह स्वाभाविक है कि अलग-अलग स्तरों के दबाव से बहुत से समझौते करने पड़ते हैं जो प्रायः पाठक को सही खोजपूर्ण जानकारी देने के उद्देश्य को पूरा करने नहीं देते। +इसके बावजूद पत्र-पत्रिकाएँ आज भी किसी सीमा तक अपने दायित्व को पूर्ण कर रही हैं। आज मुख्य रूप से पत्र-पत्रिकाएँ तीन कार्यों को निभा रही हैं : +1. साहित्यिक अभिरुचि का विकास +2. राजनीतिक सूचनाओं में अभिवृद्धि +3. सांस्कृतिक एवं मनोरजंक सूचनाएँ +इसके अतिरिक्त खेल, शिक्षा और कैरियर संबंधी दिशाएँ सुझाने का कार्य भी पत्रों द्वारा किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त पत्रों द्वारा ‘अतिरिक्तांक’ या ‘विशेषांक’ भी निकाले जाते हैं जिनमें : साहित्य, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, खेल, कृषि, जनसंख्या, समसामयिकी आदि विषयों पर पूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। +इसके अतिरिक्त आजकल प्रत्येक दिन पत्र के साथ कोई विशेष अंक भी आता है जिसमें अलग-अलग दिन अलग-अलग विषयों के लिए निर्धारित रहते हैं। अनेक उत्कृष्ट साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत धर्मयुग, उत्कर्ष, ज्ञानोदय, नये पत्ते, पाटल, प्रतीक, निकष से हुई जो अब तक कादम्बिनी, नया ज्ञानोदय, सरिता, आलोचना, इतिहास बोध, हंस, आजकल तक विकसित हो रही है। यद्यपि अनेक पत्रिकाएँ प्रसिद्ध व स्थापित नामों को महत्त्व देती हैं पर नवीन उभरती पत्रिकाएँ नए नामों और नए विचारों को भी प्रोत्साहन दे रही हैं। कथन, कथादेश,स्त्री मुक्ति, अनभै सांचा आदि अन्य महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ हैं। +पत्र-पत्रिकाओं में नवीन विचारों और मान्यताओं को प्रश्रय मिलने के कारण भाषा व शिल्प में भी लचीलापन आयाहै। कविताओं में छंदबद्धता के प्रति आग्रह टूटा है। नित नई कहानी व कविता प्रतियोगिता आयोजित की जाती हैं और उनसे जुड़े रचनाकारों को सम्मानित भी किया जाता है। +अनेक पत्रिकाएँ तो किसी विशेष विधा को केंद्र में रखकर ही कार्य कर रही हैं। इससे उस विधा विशेष का तो विकास होता ही है साथ ही पाठकों को भी रुचि के अनुरूप चयन की सुविधा मिल जाती है यथा : +‘रंग प्रसंग’ (नेशनल स्वूफल ऑफ ड्रामा) राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा निकाली जाती है। इसके प्रत्येक नए अंक में एक नएनाटक को प्रस्तुत किया जाता है। इसके अतिरिक्त नाट्य एवं रंगकर्मियों के अनुभवों से जनता को रू-ब-रू कराया जाता है। ‘नटरंग’ भी नाट्य जगत् की सुप्रसिद्ध पत्रिका है जिसका प्रकाशन अभी तक नेमिचंद जैन जी द्वारा किया जाता रहा। नाटक के विविध रंगों की छटा उकेरती यह पत्रिका अपने आप में अनुपम है। +‘अखण्ड ज्योति’ जहाँ धर्म और अध्यात्मको स्थान देती है।‘अखण्ड ज्योति’ एकमात्र ऐसी पत्रिका है, जो अपने शुरूआती दिनों से आज तक बिना किसी तरह के विज्ञापन के प्रकाशित हो रही है। इसके पाठकों की विशेषता यह है कि वे साल भर की सदस्यता पहले लेते हैं। यह पत्रिका किसी स्टाॅल पर या बुक स्टोर पर नहीं मिलती है। इसके बाद भी इसकी प्रसार संख्या लाखों में है। आज यह पाठकों को उनके द्वारा बताये गये पते पर भेजी जाती है। धर्म-अध्यात्म और विज्ञान का इसमें संगम मिलता है। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद को आत्मसात करनेवाली यह पत्रिका आज के युवाओं के बीच उनके तर्कों की कसौटी पर पूरी तरह खरी साबित हो रही है। +इसके अतिरिक्त अनेक समस्याओं जैसे : +1. अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन +2. अधिकांश समाचारों के अनुवाद की समस्या का भी हिंदी पत्रों को सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद पत्र-पत्रिकाएँ निरंतर प्रगति कर रही हैं और इसे देखते हुए पत्रकारिता के बेहतर भविष्य की उम्मीद की जा सकती है। +स्वतंत्रता के बाद के पत्र-पत्रिकाओं का विश्लेषण अलग-अलग करना उचित होगा। +आजकल के महत्त्वपूर्ण समाचार पत्रों में ‘हिंदुस्तान’ का नाम एवं स्थान अग्रणी है। मृणाल पाण्डे के संपादनमें यह पत्र एच.टी. मीडियालिमिटेड के द्वारा कस्तूरबा गांधी मार्ग से प्रकाशित होता है। इस पत्र का प्रकाशन 1936से हो रहा है। इसके प्रथम संपादक सत्यदेव विद्यालंकार थे। इस पत्र में राजनीतिक, सामाजिक, आख्रथक सूचनाओं के साथ-साथ साहित्य संबंधी सामग्री, पुस्तक समीक्षा विशेष रूप से प्रकाशित की जाती है। +मृणाल पाण्डे साहित्य क्षेत्र से एक लंबे समय से जुड़ी रही हैं तथा बाल- पत्रिकाओं जैसे ‘नंदन’ से लेकर साहित्य जगत् की ‘कादम्बिनी’ का भी वह संपादन करती रही हैं। ऐसे में ‘हिंदुस्तान’ के संपादक के रूप में उनके आने से इसे एक नया रूप तो मिला ही है साथ ही साहित्य काभी अधिक उत्कृष्ट और नवीन रूप पत्र में दिखाई देने लगा है। भाषा में भी सरलता आई है तथा व्यंग्य और फीचर का मेल अधिक दिखाई दे रहा है। +हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन द्वारा ही ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘नंदन’ और ‘कादम्बिनी’ का प्रकाशन किया गया। +‘नन्दन’ का प्रकाशन 1964 से हुआ और इसके संपादक थे - राजेन्द्र अवस्थी। ‘तेनालीराम’ की सूझ-बूझ का प्रदर्शन ज्ञान पहेली, वर्ग पहेली इसके मुख्य आकर्षण थे। बालकों के ज्ञान में वृद्धि और स्वस्थ मनोरंजन को प्रोत्साहन देना इसका लक्ष्य रहा। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ का प्रकाशन 1950 सेहुआ। इस पत्र ने हिंदी भाषा की स्थापना के लिए चल रहे प्रयासों को अत्यंत उत्कृष्टता से स्वर प्रदान किया साथ ही युद्ध के समय जनता को बलिदान के लिए प्रेरित भी किया। +‘बेनेट कोलमेन’ कम्पनी लिमिटेड द्वारा1947 में आरंभ किए गए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रथम संपादक हरिशंकर द्विवेदी थे। आगे चलकर‘अज्ञेय’ ने भी इस पत्र का संपादन किया। इस पत्र का प्रकाशन बहादुरशाह जफर मार्ग से होता है। ‘नवभारत टाइम्स’ का ही सांध्य संस्करण ‘सांध्य टाइम्स’ के नाम से निकलता है। देश-विदेश के समाचारों के साथ संस्कृति, खेल, पिफल्म और महानगर की गतिविधियाँ इसमें विशेष रूप से शामिल की जाती हैं। यह पत्र भाषाके स्तर पर नए-नए शब्दों के प्रयोग के लिए विशेष प्रसिद्ध है। नए विषयों औरसाज-सज्जा में परिवर्तन भी इसकी प्रमुख विशेषता है। +धर्मयुग, दिनमान, पराग व सारिका जैसी उत्कृष्ट पत्रिकाओं का प्रकाशन भी बेनेट कोलमेन एण्ड कम्पनी लिमिटेड द्वारा हुआ। ‘धर्मयुग’ एक उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका थी जिसे निकालने में इलाचंद्र जोशी, सत्यदेव विद्यालंकार और सबसे बढ़कर डॉ॰ धर्मवीर भारती की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इसमें जनता की रुचि को परिष्कृत रूप देने के लिए उच्चकोटि का साहित्य प्रकाशित किया जाता था। +‘राष्ट्रीय सहारा’ के नाम से इसकी भूमिका का ज्ञान हो जाता है। राष्ट्रीय चेतना, अखण्डता को आधार बनाकर 15 अगस्त, 1991 से प्रकाशित होने वाला यह पत्र सहारा इण्डिया समूह द्वारा प्रकाशित किया जाता है। उत्तर प्रदेश में यह पत्र विशेष रूप से पठनीय है। इसका लखनउफ संस्करण अत्यंत उत्कृष्ट व लोकप्रिय है। इसका परिशिष्ट ‘हस्तक्षेप’ नाम से प्रकाशित होता है। +दैनिक समाचार-पत्रों में ‘अमर उजाला’ का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह पत्र 1948 से प्रकाशित हो रहा है। यह पत्र भी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से लोकप्रिय है। इसके लोकप्रिय स्तंभों में -संपादकीय पत्र, आपका भविष्य, आज का आयोजन, स्वास्थ्य चर्चा तथा बच्चों का कोना प्रमुख है। +‘वीर अर्जुन’ का प्रकाशन 1954 से आरंभहुआ। राष्ट्रीयता, कर्त्तव्य परायणता व ओजस्विता को आधार बनाकर चलने वाले इसपत्र में गंभीर साहित्यिक पत्रकारिता के भी दर्शन होते हैं। इस पत्र का प्रकाशन नई दिल्ली से किया जाता है। सहारा ग्रुप द्वारा प्रकाशित सप्ताह में एक बार आने वाला पत्र ‘सहारा समय’ विविध विषयों से पूर्ण है। साहित्यिक, राजनीतिक, पिफल्मी मनोरंजन, व्यापार आदि अनेकानेक विषयों पर प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करने के साथ-साथ बेहतर स्तर के विषय व शिल्प की विविधता इस पत्र की प्रमुख विशेषता है। यह पत्र सप्ताह में एक बार आकर भी पूरे सप्ताह के लिए सामग्रीप्रस्तुत करने में सक्षम है। +आज के प्रतियोगी माहौल में विविध अवसरों की खोज और उनके विषय में जानने की इच्छा प्रत्येक युवा में पाई जातीहै। एक ही साथ अनेक अवसरों, अनेक नवीन विषयों, प्रतियोगी परीक्षाओं, परीक्षा की तिथियों की जानकारी के साथ नवीन अवसरों और दिशाओं की जानकारी ‘रोजगारसमाचार’ के माध्यम सेप्राप्त होती है। यह पत्र कुल 64 पृष्ठों में ‘सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय’ से प्रकाशित किया जाता है। आजकल इसके संपादक राजेन्द्र चौधरी हैं। +कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ इस प्रकार हैं - +‘हंस’ : प्रेमचंद द्वारा आरंभ एवं स्थापित की गई यह पत्रिका अब राजेन्द्र यादव द्वारा निकाली जा रही है। स्त्री एवं दलित वर्ग की अभिव्यक्ति को आधार देती यह पत्रिका विविध लेखों और कहानियों के साथ अपने विवादास्पद मुद्दों को नए सिरे से उठाती संपादकीय लेखनी के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। +हिंदुस्तान टाइम्स समूह द्वारा प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका है : कादम्बिनी। इसका प्रकाशन 1960 से आरंभ हुआ। इसके प्रथम संपादक बालकृष्ण राव थे। आजकल यह पत्रिका मृणाल पाण्डे, राजेन्द्र अवस्थी के संपादन में प्रकाशित होती है। विविध उत्कृष्ट विषयों से युक्त यह पत्रिका प्रत्येक बार किसी विशेष विषय को आधार बनाकर अपना मत प्रकट करती है। कभी तो यह विषय पूर्णतया साहित्यिक होता है जैसे कमलेश्वर विशेषांक तो कभी विज्ञान, आयुर्वेद पर आधारित जैसे वैकल्पिक चिकित्सा। इसके स्थायी स्तंभ हैं : लोकमत, यांत्रिक, दृष्टिकोण, उपभोक्ता सरोकार, ग्रह नक्षत्र, कला दीर्घा, कसौटी, क्लब समाचार, विधि, सांस्कृतिक डायरी, हंसते-हंसाते आदि। इन स्तंभों के नाम से ही ज्ञात हो जाता है कि पत्रिका विविध विषयों को लेकर समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान बना चुकी है। +पहले ज्ञानोदय के नाम से निकलने वाली प्रसिद्ध पत्रिका अब ‘नया ज्ञानोदय’ के नाम से प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादन में प्रकाशित होती है। विविध कथाओं के अनुवाद करने और भाषाओं को समानांतर स्तर पर लाने के संदर्भ में इस पत्रिका का विशिष्ट योगदान है। इसके स्थायी स्तंभों में हस्तक्षेप, कहानी, भाषांतर, कविता, साक्षात्कार, यात्रा वृत्तांत, पुस्तक समीक्षा हैं। नई पुस्तकों से परिचित कराने व भाषाओं को जोड़ने में इनका विशेष योगदान है। +भारतीय-अमरीकी मित्रों के सहयोग से आरंभ की गई पत्रिका ‘अन्यथा’ कृष्ण किशोर के संपादन में संयुक्तराज्य अमरीका से निकाली जाती है। स्त्री की पीड़ा को आधार बनाती यह पत्रिका प्रवासी भारतीयों को जोड़ने का प्रयास है। समाज, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिनेमा, समीक्षा, सामयिकी और परिवेश को आधार बनाती यह पत्रिका भारत और अमरीका में लोकप्रिय हो रही है। +‘कसौटी’ के कुल 15 अंक ही प्रकाशित हुए। वित्तीय कारणों से इस पत्रिका को बंद करना पड़ा अन्यथा यह भी सत्य है कि नंदकिशोर नवल ने इस पत्रिका के अत्यंत उच्च साहित्यिक स्तर को सदैव बनाए रखा। कविता, उपन्यास, नाटक, इतिहास, आलोचना को बेहतर तरीके सेप्रकाशित करते हुए इस पत्रिका ने सभी अंकों को बेहतर रूप से प्रदख्रशत किया। +साहित्य के क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती पत्रिका ‘वागर्थ’ आज की समस्याओं : विशेषकर महानगरीय उपभोक्ता संस्कृति को दर्शाती इस पत्रिका ने अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। बाशारवाद, उपभोक्तावाद और विश्ववाद से लेकर कहानी, यात्रा, संवाद व मीडिया के क्षेत्र में अत्यंत उत्कृष्ट लेख इसमें प्रकाशित हो रहे हैं। इसके प्रकाशक हैं : परमानन्द चूड़ीवाल। +वित्तीय संकटों के बावजूद बेहतर पत्रिका का नमूना प्रस्तुत करती पत्रिका ‘इतिहास बोध’ लाल बहादुर वर्मा के संपादनमें इलाहाबाद से प्रकाशित की जाती है। साहित्य के साथ-साथ मीडिया, इतिहास, विश्व, संस्कृति और समसामयिकी को केंद्र बनाती यह पत्रिका धीरे-धीरे बाशार में अपना स्थान बना रही है। +दैनिक भास्कर समूह द्वाराप्रकाशित पत्रिका ‘अहा! जिन्दगी’ साहित्य के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्तियों के जीवन को जानने का प्रयास करती है। भविष्य की दुनिया के कयास लगाती इस पत्रिका के संपादक यशवंतव्यास हैं। भाषा व विषय के स्तर पर यह पत्रिका अत्यंत सरल पर उत्कृष्ट है। +‘भाषा’ पत्रिका भारतीय भाषाओं एवं साहित्य की महत्त्वपूर्ण पत्रिका है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, माध्यमिक शिक्षा और उच्चतर शिक्षा विभाग मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका डॉ॰ शशि भारद्वाज के संपादन में प्रकाशित की जाती है। भाषा और अनुवाद, भाषा और कम्प्यूटरीकरण, भाषा और भाषा प्रौद्योगिकी, सूचना और साहित्य, साहित्य एवं विज्ञान जैसे मुद्दों पर विचार करना इनका महत्त्वपूर्ण कार्य है। +‘योजना’ विकास योजनाओं को समख्रपत पत्रिका है। कुल 72 पृष्ठों में सजी इस पत्रिका का प्रकाशन विश्वनाथ त्रिपाठी के संपादन में योजनाभवन, नई दिल्ली से होता है। यह पत्रिका हिंदी के साथ -असमिया, बंगाली, गुजराती, अंग्रेजी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, तमिल, उड़िया, पंजाबी, तेलुगू, उर्दू में भी प्रकाशित की जाती है। भारत के एशिया के साथ आख्रथक संबंध, भूमंडलीकरण के विविध रूप, स्वास्थ्य, चिकित्सा, विकास योजनाएँ इसकी प्रमुख चिंता के विषय हैं। +कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हिंदी पत्र-पत्रिकाओं ने अनेक उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए भाषा और विषय को परिपक्व किया है व अपनी सशक्त उपस्थितिदर्ज की है। + +राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986: +भाग 1. +भूमिका. +1.1 मानव इतिहास के आदिकाल से शिक्षा का विविध भांति विकास एवं प्रसार होता रहा +है। प्रत्येक देश अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता को अभिव्यक्ति देने और पनपाने के लिए और +साथ ही समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी विशिष्ट शिक्षा प्रणाली विकसित करता +है, लेकिन देश के इतिहास में कभी-कभी ऐसा समय आता है, जब मुद्दतों से चले आ रहे उस सिलसिले +को एक नई दिशा देने की नितान्त जरूरत हो जाती है। आज वही समय है। +1.2 हमारा देश आर्थिक और तकनीकी लिहाज से उस मुकाम, पर पहुंच गया है जहाँ से हम +अब तक के संचित साधनों का इस्तेमाल करते हुए समाज के हर वर्ण को पफायदा पहुंचाने का प्रबल +प्रयास करें। शिक्षा उस लक्ष्य तक पहुंचने का प्रमुख साधनहै। +1.3 इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने जनवरी, 1985 में यह घोषणा की थी +कि एक नई शिक्षा नीति निर्मित की जायेगी। शिक्षा की मौजूदा हालत का जायजा लिया गया और एक +देशव्यापी बहस इस विषय पर हुई। कई स्रोतों से सुझाव व विचार प्राप्त हुए, जिन पर कापफी +मनन-चिंतन हुआ। +1968 की शिक्षा नीति और उसके बाद. +1.4 1968 की राष्ट्रीय नीति आजादी के बाद के इतिहास में एक अहम कदम थी। उसका +उद्देश्य राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाना तथा सामान्य नागरिकता व संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की भावना को +सुदृढ़ करना था। उसमें शिक्षा प्रणाली के सर्वांगीण पुनर्निर्माण तथा हर स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता को +ऊँचा उठाने पर जोर दिया गया था। साथ ही उस शिक्षा नीति में विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर नैतिक +मूल्यों को विकसित करने पर तथा शिक्षा और जीवन में गहरा रिश्ता कायम करने पर भी ध्यान दिया +गया था। +1.5 1968 की नीति लागू होने के बाद देश में शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है। आज गांवों +में रहने वाले 90 प्रतिशत से अधिक लोगों के लिए एक किलोमीटर के पफासले के भीतर प्राथमिक +विद्यालय उपलब्ध हैं। अन्य स्तरों पर भी शिक्षा की सुविधाएं पहले के मुकाबले कहीं अधिक बढ़ी हैं। +1.6 पूरे देश में शिक्षा की समान संरचना और लगभग सभी राज्यों द्वारा 10+2+3 की प्रणाली +को मान लेना शायद 1968 की नीति की सबसे बड़ी देन है। इस प्रणाली के अनुसार स्कूली पाठ्यक्रम में +छात्र-छात्राओं को एक समान शिक्षा देने के अलावा विज्ञान व गणित को अनिवार्य विषय बनाया गया +और कार्यानुभव को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया। +1.7 स्नातक स्तर की कक्षाओं के पाठ्यक्रम बदलने की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई। स्नातकोतर +शिक्षा तथा शोध के लिए उच्च अध्ययन के केन्द्र स्थापितकिए गए। हम देश की आवश्यकता के +अनुसार शिक्षित जनशक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति भीकर सके हैं। +1.8 यद्यपि ये उपलब्धियाँ अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु यह भी सत्य है कि 1968 की +शिक्षा नीति के अधिकांश सुझाव कार्यरूप में परिणत नहीं हो सके, क्योंकि क्रियान्वयन की पक्की +योजना नहीं बनी, न स्पष्ट दायित्व निर्धारित किए गए औरन ही वित्तीय एवं संगठन संबंधी व्यवस्थाएं +हो सकी। नतीजा यह है कि विभिन्न वर्गों तक शिक्षा को पहुँचाने, उसका स्तर सुधारने और विस्तार +करने और आर्थिक साधन जुटाने जैसे महत्त्वपूर्ण काम नहीं हो पाए, और आज इन कमियों ने एक बड़े +अंबार का रूप धारण कर लिया है। इन समस्याओं का हल निकालना वक्त की पहली जरूरत है। +1.9 मौजूदा हालात ने शिक्षा को एक दुराहे पर ला खड़ा किया है। अब न तो अब तक होते +आये सामान्य विस्तार से, और न ही सुधार के वर्तमान तौर-तरीकों या रफ्रतार से काम चल सकेगा। +1.10 भारतीय विचारधारा के अनुसार मनुष्य स्वयं एक बेशकीमती संपदा है, अमूल्य संसाधन +है। जरूरत इस बात की है कि उसकी परवरिश गतिशील एवं संवेदनशील हो और सावधानी से की जाये। +हर इंसान का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व होता है, जन्म से मृत्युपर्यन्त, जिन्दगी के हर मुकाम पर उसकी +अपनी समस्याएं और जरूरतें होती हैं। विकास की इस पेचीदा और गतिशील प्रक्रिया में शिक्षा अपना +उत्प्रेरक योगदान दे सकें, इसके लिए बहुत सावधानी से योजना बनाने और उस पर पूरी लगन के साथ +अमल करने की आवश्यकता है। +1.11 आज भारत राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसमें +परम्परागत मूल्यों के ”ास का खतरा पैदा हो गया है और समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र तथा +व्यावसायिक नैतिकता के लक्ष्यों की प्राप्ति में लगातार बाधाएं आ रही हैं। +1.12 देहात में रोजमर्रा की सहूलियतों के अभाव में पढ़े-लिखे युवक गांवों में रहने के लिए +तैयार नहीं हैं। इसलिए गांव और शहर के पफ़र्क को कम करने और ग्रामीण क्षेत्रो में रोजगार के विविध +और व्यापक साधन उपलब्ध कराने की बड़ी जरूरत है। +1.13 आने वाले दशकों में जनसंख्या की बढ़ती हुई रफ्ऱतार पर काबू पाना होगा। इस समस्या +को हल करने में जो सबसे अहम् उपाय कारगर साबित हो सकता है, वह है महिलाओं का साक्षर और +शिक्षित होना। +1.14 अगले दशक नए तनावों और समस्याओं के साथ अभूतपूर्व अवसर भी प्रदान करेंगे। उन +तनावों से निपटने और अवसरों का पफायदा उठाने के लिए मानव संसाधन को नए ढंग से विकसित +करना होगा। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह भी जरूरी होगा कि वे नए विचारों को सतत् सृजनशीलता +के साथ आत्मसात कर सकें। उन पीढ़ियों में मानवीय मूल्यों और सामाजिक न्याय के प्रति गहरी +प्रतिबद्धता प्रतिष्ठित करनी होगी। यह सब अधिक अच्छी शिक्षा से ही संभव है। +1.15 अतएव इन नई चुनौतियों और सामाजिक आवश्यकताओं का तकाजा है कि सरकार एक +नई शिक्षा नीति तैयार करें और उसकी क्रियान्वित करे।इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। +भाग 2. +शिक्षा का सार और उसकी भूमिका. +2.1 हमारे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ‘‘सबके लिए शिक्षा’’ हमारे भौतिक और आध्यात्मिक विकास +की बुनियादी आवश्यकता है। +2.2 शिक्षा सुसंस्कृत बनाने का माध्यम है। यह हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर +करती है, जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है, वैज्ञानिक तरीकेके अमल की संभावना बढ़ती है और समझ +और चिंतन में स्वतन्त्रता आती है। साथ ही शिक्षा हमारे संविधान में प्रतिष्ठित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता +और लोकतंत्र के लक्ष्यों की प्राप्ति में अग्रसर होने में हमारी सहायता करती है। +2.3 शिक्षा के द्वारा ही आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों के लिए जरूरत के अनुसार +जनशक्ति का विकास होता है। शिक्षा के आधार पर ही अनुसंधान और विकास को सम्बल मिलता है +जो राष्ट्रीय आत्म-निर्भरता की आधारशिला है। +2.4 कुल मिलाकर, यह कहना सही होगा कि शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का +अनुपम साधन है। इसी सिद्धांत को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण की धुरी माना गया है। +भाग 3. +राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था. +3.1 जिन सिद्धांतों पर राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था की परिकल्पना की गई है वे हमारे संविधान में +ही निहित हैं। +3.2 राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था का मूल मंत्र यह है कि एक निश्चित स्तर तक हर शिक्षार्थी को +बिना किसी जात-पात, धर्म स्थान या लिंग भेद के, लगभगएक जैसी अच्छी शिक्षा उपलब्ध हो। इस +लक्ष्य को हासिल करने के लिये सरकार उपुयक्त रूप से वित्तपोषित कार्यक्रमों की शुरूआत करेगी। +1968 की नीति में अनुशंसित सामान्य स्कूल प्रणाली को क्रियान्वित करने की शिक्षा में प्रभावी कदम +उठाये जाएंगे। +3.3 राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत यह जरूरी है कि सारे देश में एक ही प्रकार की +शैक्षिक संरचना हो। 10+2+3 के ढांचे को पूरे देश में स्वीकार कर लिया गया है। इस ढांचे के पहले +दस वर्षों के संबंध में यह प्रयत्न किया गया जाएगा कि उसका विभाजन इस प्रकार हो : प्रारंभिक शिक्षा +में 5 वर्ष का प्राथमिक स्तर और 3 वर्ष का उच्च प्राथमिक स्तर, तथा उसके बाद 2 वर्ष का हाई स्कूल। +3.4 राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था पूरे देश के लिये एक राष्ट्रीय शिक्षाक्रम के ढांचे पर आधारित +होगी जिसमें एक ‘‘सामान्य केन्द्रिक’’ ;कॉमन कोरद्ध होगा और अन्य हिस्सों की बाबत लचीलापन +रहेगा, जिन्हें स्थानीय पर्यावरण तथा परिवेश के अनुसार ढाला जा सकेगा। ‘‘सामान्य केन्द्रिक’’ में +भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, संवैधानिक जिम्मेदारियों तथा राष्ट्रीय अस्मिता से संबंधित +अनिवार्य तत्त्व शामिल होंगे। ये मुद्दे किसी एक विषय काहिस्सा न होकर लगभग सभी विषयों में पिरोये +जाएंगे। इनके द्वारा राष्ट्रीय मूल्यों को हर इंसान की सोच और जिंदगी का हिस्सा बनाने की कोशिश की +जायेगी। इन राष्ट्रीय मूल्यों में ये बातें शामिल हैं : हमारी समान सांस्कृतिक धरोहर, लोकतंत्र, +धर्मनिरपेक्षता, स्त्री-पुरूषों के बीच समानता, पर्यावरणका संरक्षण, सामाजिक समता, सीमित परिवार का +महत्त्व और वैज्ञानिक तरीके के अमल की जरूरत। यह सुनिश्चितकिया जायेगा कि सभी शैक्षिक +कार्यक्रम धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के अनुरूप ही आयोजितहों। +3.5 भारत ने विभिन्न देशों में शांति और आपसी भाईचारे के लिये सदा प्रयत्न किया है, +और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्शों को संजोया है। इस परंपरा के अनुसार शिक्षा-व्यवस्था का प्रयास +यह होगा कि नई पीढ़ी में विश्वव्यापी दृष्टिकोण सुदृढ़ हो तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और शांतिपूर्ण +सहअस्तित्व की भावना बढ़े। शिक्षा के इस पहलू की उपेक्षा नहीं की जा सकती। +3.6 समानता के उद्देश्य को साकार बनाने के लिये सभी को शिक्षा का समान अवसर उपलब्ध +करवाना ही पर्याप्त नहीं होगा, ऐसी व्यवस्था होना भीजरूरी है जिससे सभी को शिक्षा में सपफलता प्राप्त +करने के समान अवसर मिले। इसके अतिरिक्त, समानता की मूलभूत अनुभूति केन्द्रिक शिक्षाक्रम के द्वारा +करवाई जाएगी। वास्तव में राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य है कि सामाजिक माहौल और जन्म के +संयोग से उत्पन्न पूर्वग्रह और कुंठाएं दूर हों। +3.7 प्रत्येक चरण पर दी जाने वाली शिक्षा का न्यूनतम स्तर तय किया जायेगा। ऐसे उपाय +भी किये जाएंगे कि विद्यार्थी देश के विभिन्न भागोंकी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था को +समझ सकें। संपर्क भाषा को बढ़ावा देने के अलावा, पुस्तकों का एक से दूसरी भाषा में अनुवाद करने +और बहुभाषी शब्द-कोशों और शब्दावलियों के प्रकाशन के लिये भी कार्यक्रम चलाये जायेंगे। युवा वर्ग +को अपनी कल्पना और सूझ-बूझ के अनुसार देश की महिमाऔर गरिमा पहचानने के लिये प्रोत्साहित +किया जाएगा। +3.8 उच्च शिक्षा, खास तौर से तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने की योग्यता रखने वाले हर +विद्यार्थी को बराबरी के मौके दिये जाने की व्यवस्था की जायेगी और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाकर +अध्ययन करने की सुविधा दी जायेगी। विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा की अन्य संस्थाओं के +सावदेशिक स्वरूप पर जोर दिया जाएगा। +3.9 शोध और विकास तथा विज्ञान व तकनीकी शिक्षा के विषयों में देश की विभिन्न +संस्थाओं के बीच व्यापक तानाबाना ;नेटवर्कद्ध स्थापित करने के लिये विशेष उपाय किए जायेंगे ताकि +वे अपने-अपने साधन सम्मिलित कर राष्ट्रीय महत्त्व की परियोजनाओं में भाग ले सकें। +3.10 शिक्षा के पुनर्निर्माण के लिए, शिक्षा में असमानताओं को कम करने के लिए, प्राथमिक +शिक्षा के सार्वजनिक के लिए, प्रौढ़ साक्षरता के लिए, वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान के लिए, तथा +इस प्रकार के अन्य लक्ष्यों के लिए साधन जुटाने का दायित्वसमूचे राष्ट्र पर होगा। +3.11 आजीवन शिक्षा शैक्षिक प्रक्रिया का एक मूलभूत लक्ष्यहै, और सार्वजनीन साक्षरता +उसका अभिन्न पहलू। युवा वर्ग, गृहिणियों, किसानों, मजदूरों, व्यापारियों आदि को अपनी पसंद व +सुविधा के अनुसार अपनी शिक्षा जारी रखने के अवसर मुहÕया करवाए जायेंगे। भविष्य में खुली शिक्षा +एवं दूरशिक्षण की ओर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। +3.12 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकीशिक्षा परिषद्, भारतीय कृषि +अनुसंधान परिषद् और भारतीय चिकित्सा परिषद् जैसी संस्थाओं को और अधिक मजबूत बनाया जाएगा +ताकि वे राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था को संवारने में अपनीभूमिका अदा कर सकें। इन सभी संस्थाओं को +एक समेकित योजना के द्वारा जोड़ा जाएगा ताकि इनमें आपस में कार्यात्मक संबंध स्थापित हो तथा +अनुसंधान और स्नातकोतर शिक्षा के कार्यक्रम मजबूत बन सकें। इन संगठनों को, तथा राष्ट्रीय शैक्षिक +अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन संस्थान तथा अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान +एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा संस्थान की शिक्षा नीति के कार्यान्वयन में सहभागी बनाया जाएगा। +सार्थक सहभागिता. +3.13 वर्ष 1976 का संविधान संशोधन जिसके द्वारा शिक्षा को समवर्ती सूची में शामिल किया +गया, एक दूरगामी कदम था। उसमें यह निहित है कि शैक्षिक, वित्तीय तथा प्रशासनिक दृष्टि से राष्ट्रीय +जीवन से जुड़े हुए इस महत्त्वपूर्ण मामले में केन्द्र औरराज्यों के बीच दायित्व की नई सहभागिता +स्थापित हो। शिक्षा के क्षेत्र में राज्यों की भूमिकाऔर उनके दायित्व में मूलतः कोई परिवर्तन नहीं होगा, +लेकिन केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित विषयों में अब तक से अधिक जिम्मेदारी स्वीकार करेगीः- शिक्षा के +राष्ट्रीय तथा समाकलनात्मक ;इंटेग्रेटिवद्ध रूप को बल देना, गुणवत्ता एवं स्तर बनाए रखना ;जिसमें +सभी स्तरों पर शिक्षकों के शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता एवं स्तर शामिल हैद्ध, विकास के निमित्त +जनशक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शैक्षिक व्यवस्थाओं का अध्ययन और देखरेख, +शोध एवं उच्च अध्ययन की जरूरतों को पूरा करना, शिक्षा, संस्कृति तथा मानव संसाधन विकास के +अंतर्राष्ट्रीय पहलुओं पर ध्यान देना और सामान्य तौर पर शिक्षा में प्रत्येक स्तर पर उत्कृष्टता लाने का +निरन्तर प्रयास। समवर्तिता एक ऐसी भागीदारी है जो स्वयं में सार्थक व चुनौतीपूर्ण है, और राष्ट्रीय शिक्षा +नीति इसे हर मायने में पूरा करने की ओर उन्मुख रहेगी। +भाग 4. +समानता के लिए शिक्षा. +'विषमताएँ ' +4.1 नई शिक्षा नीति विषमताओं को दूर करने पर विशेष बल देगी और अब तक वंचित रहे +लोगों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के समान अवसर मुहैया करेगी। +'"महिलाओं की समानता हेतु शिक्षा +4.2 शिक्षा का उपयोग महिलाओं की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन लाने के लिए एक साधन +के रूप में किया जायेगा। अतीत से चली आ रही विकृतियोंऔर विषमताओं को खत्म करने के लिए +शिक्षा-व्यवस्था का स्पष्ट झुकाव महिलाओं के पक्ष में होगा। राष्ट्रीय शिक्षा-व्यवस्था ऐसे प्रभावी दखल +करेगी जिनसे महिलाएं, जो अब तक अबला समझी जाती रही हैं, समर्थ और सशक्त हों। नए मूल्यों की +स्थापना के लिए शिक्षण संस्थाओं के सक्रिय सहयोग सेपाठ्यक्रमों तथा पठन-पाठन सामग्री की +पुनर्रचना की जायेगी तथा अध्यापकों व प्रशासकों का पुनःप्रशिक्षण किया जायेगा। महिलाओं से संबंधित +अध्ययन को विभिन्न पाठ्यचर्याओं के भाग के रूप में प्रोत्साहन दिया जायेगा। इस काम को सामाजिक +पुनर्रचना का अभिन्न अंग मानते हुए इसे पूर्णकृत संकल्प होकर किया जायेगा और शिक्षा संस्थाओं को +महिला विकास के सक्रिय कार्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित किया जायेगा। +4.3 महिलाओं में साक्षरता प्रसार को तथा उन रुकावटों को दूर करने को जिनके कारण +लड़कियां प्रारंभिक शिक्षा से वंचित रह जाती हैं, सर्वोपरि प्राथमिकता दी जायेगी। इस काम के लिए +विशेष व्यवस्थाएँ की जायेंगी, समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए जायेंगे और उनके कार्यान्वयन पर कड़ी +निगाह रखी जायेगी। विभिन्न स्तरों पर तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी पर +खास जोर दिया जायेगा। लड़के और लड़कियों में किसी प्रकार का भेद-भाव न बरतने की नीति पर पूरा +जोर देकर अमल किया जायेगा ताकि तकनीकी तथा व्यावसायिक पाठ ्यक्रमों में पारंपरिक रवैयों के +कारण चले आ रहे लिंगमूलक विभाजन ;सेक्स स्टीरियोटाइपिंगद्ध को खत्म किया जा सके तथा +गैर-परम्परागत आधुनिक काम-धंधों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ सके। इसी प्रकार मौजूदा और नई +प्रौद्योगिकी में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जायेगी। +अनुसूचित जातियों की शिक्षा +4.4 अनुसूचति जातियों के शैक्षिक विकास पर बल दिया जायेगा जिससे कि वे +गैर-अनुसूचित जाति के लोगों के बराबर आ सकें। यह बराबरी सभी स्तरों पर इन चारों आयामों में होनी +जरूरी है : ग्रामीण पुरूषों में, ग्रामीण स्त्रियों में, शहरी क्षेत्रों के पुरूषों में और शहरी क्षेत्रा ें की स्त्रियों में। +4.5 इस मकसद के तहत नई नीति में ये उपाय सोचे गए हैं- +14 साल की उम्र तक नियमित रूप से स्कूल भेज सकें। +परिवारों के बच्चों के लिए मैट्रिक-पूर्व छात्रवृत्ति योजना पहली कक्षा से शुरू की +जायेगी। ऐसे परिवारों की आय पर ध्यान दिए बिना, उनके सभी बच्चों को इस +योजना में शामिल किया जायेगा तथा उनके लिए समयबद्ध कार्यक्रम शुरू किये +जाएंगे। +कि जिससे पता चलता रहे कि अनुसूचित जातियों के बच्चों के नामांकन होने, +नियमित रूप से अध्ययन जारी रखने और पढ़ाई पूरी करनेकी प्रक्रिया में कहीं +गिरावट तो नहीं आ रही है। साथ ही इन बच्चों की आगे की शिक्षा और +रोजगार पाने की संभावना को बढ़ाने के उद्देश्य से उनके लिए उपचारात्मक +पाठ्यचर्या की व्यवस्था करना। +क्रमिक रूप से बढ़ाना। +अनुसूचित जाति के व्यक्तियों की सहूलियत पर विशेष ध्यान देना। +ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम तथा ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम के +साधनों का उपयोग करना। +तरीकों की खोज जारी रखना। +अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा. +4.6 अनसूचित जनजातियों को अन्य लोगों की बराबरी परलाने के लिए निम्नलिखित कदम +तत्काल उठाए जाएंगेः +जाएगी। इन क्षेत्रों में स्कूल भवनों के निर्माण का कार्य शिक्षा के बजट, राष्ट्रीय +ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम, जनजातीय +कल्याण योजनाओं आदि के अन्तर्गत प्राथमिकता के आधार पर हाथ में लिया +जाएगा। +बहुधा उनकी अपनी बोलचाल की भाषाएँ होती हैं। पाठ्यक्रम निर्माण में तथा +शिक्षण सामग्री तैयार करने में यह जरूरी है कि शुरूआतकी अवस्था में +आदिवासी भाषाओं का उपयोग किया जाये, तथा ऐसा इन्तजाम किया जाये कि +आदिवासी बच्चे शुरू के कुछ वर्षों के बाद क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से शिक्षा +प्राप्त कर सके। +शिक्षक बनने के लिए प्रोत्साहन दिया जायेगा। +जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ऐसी प्रोत्साहन योजनाएं तैयार की जाएंगी जिनसे +शिक्षा प्राप्ति में आने वाली बाधाएं दूर हों। उच्च शिक्षा के लिए दी जाने वाली +छात्रवृत्तियों में तकनीकी और व्यावसायिक पढ़ाई की ज्यादा महत्त्व दिया जायेगा। +सामाजिक तथा मानसिक अवरोध को दूर करने के लिए विशेष उपचारात्मक +पाठ्यचर्या और अन्य कार्यक्रम चला जाएंगे ताकि आदिवासी शिक्षार्थी सपफलता +से अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें। +इलाकों में प्राथमिकता के आधार पर खोल जाएंगे। +बारे में चेतना सभी स्तरों के पाठ्यक्रमों का जरूरी हिस्सा होगी। +शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए दूसरे वर्ग और क्षेत्र +4.7 शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए सभी वर्गों को, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, समुचित +प्रोत्साहन दिया जायेगा। पहाड़ी और रेगिस्तानी जिलोंमें, दूरस्थ और दुर्गभ क्षेत्रों में और टापुओंमें +पर्याप्त संख्या में शिक्षा संस्थाएं खोली जाएंगी। +अल्पसंख्यक. +4.8 अल्पसंख्यकों के कुछ वर्ग तालीमी दौड़ में काफी +और समता का तकाजा है कि ऐसे वर्गों की तालीम पर पूरा ध्यान दिया जाये। संविधान में उन्हें अपनी +भाषा और संस्कृति की हिफाजत करने तथा अपनी शैक्षिक संस्थाएं कायम करने और उन्हें चलाने के जो +अधिकार दिये गए हैं, वे भी इनमें शामिल हैं। साथ ही पाठ्यपुस्तकें तैयार करने में और सभी स्कूलों +क्रियाकलापों में वस्तुगतता रखी जायेगी तथा ‘‘सामान्य केन्द्रिक शिक्षाक्रम’’ के अनुरूप राष्ट्रीय लक्ष्यों +और आदर्शों के आधार पर एकता को बढ़ावा देने के लिये सभी सम्भव प्रयास किये जाएंगे- +विकलांग. +4.9 शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से विकलांगों को शिक्षा देने का उद्देश्य यह होना चाहिये +कि वे समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें, उनकी सामान्य तरीके से प्रगति हो और वे पूरे +भरोसे और हिम्मत के साथ जिन्दगी जिएँ। इस संबंध में निम्नलिखित उपाय किये जाएंगेः- +बच्चों के साथ हो। +होगी। इस तरह के स्कूल, जहाँ तक सम्भव होगा, जिला मुख्यालयों में बनाए +जाएंगे। +भी नया रूप दिया जायेगा ताकि वे विकलांग बच्चों की कठिनाइयों को ठीक +तरह से समझ कर उनकी सहायता कर सकें। +प्रोत्साहित किया जायेगा। +प्रौढ़ शिक्षा. +4.10 हमारे प्राचीन ग्रन्थों में कहा गया है : सा विद्याया विमुक्तये, शिक्षा वह है जो अज्ञान +और दमन से मुक्ति दिलाती है। शिक्षा की इस परिकल्पना के तहत हर व्यक्ति को लिखना-पढ़ना तो +आना ही चाहिए क्योंकि आज के युग में यही सीखने का प्रमुख माध्यम है। इसी कारण साक्षरता और +प्रौढ़ शिक्षा का महत्त्व अधिक है। +4.11 आज विकास का अहम् मुद्दा रहा है कि किस तरह कुशलताओं को निरंतर बढ़ाया जाए +और समाज को जिस तरह की और जिस मात्रा में जनशक्तिकी जरूरत हो उसे तैयार किया जाये। +विकास के कार्यक्रमों में उन लोगों की भागीदारी बहुतजरूरी है जिनको उनका लाभ मिलना है। प्रौढ़ +शिक्षा को राष्ट्रीय लक्ष्यों से जोड़ा जायेगा। इन राष्ट्रीय लक्ष्यों में ये सब शामिल हैं : निर्धनता को दूर +करना, राष्ट्रीय एकता, पर्यावरण संरक्षण, लोगों की सांस्कृतिक सृजनशीलता का संवर्धन, छोटे परिवार +के आदर्श का पालन, महिलाओं की समानता, इत्यादि। प्रौढ़ शिक्षा के वर्तमान कार्यक्रमों का +पुनरावलोकन करके उन्हें मजबूत बनाया जाएगा। +4.12 समूचे देश को निरक्षरता उन्मूलन के लिए निष्ठापूर्वक प्रतिबद्ध होना है, खासकर 15-35 +आयुवर्ग के निरक्षर लोगों की। केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारों, राजनैतिक दलों तथा उनके +जन-संगठनों, जन-संचार के माध्यमों और शिक्षा संस्थाओं को विविध प्रकार के जन-साक्षरता कार्यक्रमों +को सपफल बनाने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। इस कार्य में शिक्षकों, युवावर्ग, छात्र-छात्राओं, स्वैच्छिक +संस्थाओं और नियोजकों आदि को बड़े पैमाने पर शामिल करना होगा। शोध संस्थानों की सहायता से +शैक्षिक पहलुओं में सुधार लाने के ठोस प्रयास किए जाएंगे। साक्षरता के अलावा, कार्यात्मक ज्ञान और +कुशलताओं का विकास, तथा शिक्षार्थियों में सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता की समझ पैदा करना और +इस स्थिति को बदल सकने की संभावना के प्रति उन्हें सचेत बनाना प्रौढ़ शिक्षा का अंग होगा। +4.13 विभिन्न पद्धतियों और माध्यमों का उपयोग करते हुए प्रौढ़ तथा सतत शिक्षा का एक +व्यापक कार्यक्रम कार्यान्वित किया जाएगा। इसके अन्तर्गत निम्नप्रकार के कार्यक्रम आएंगे- +प्रोत्साहन। +उपयोग। +भाग 5. +विभिन्न स्तरों पर शिक्षा का पुनर्गठन. +शिशुओं की देखभाल और शिक्षा +5.1 बच्चों से संबंधित राष्ट्रीय नीति इस बात पर विशेष बल देती है कि बच्चों के विकास +पर पर्याप्त विनियोग किया जाये, विशेषकर ऐसे तबकोंपर जिन के बच्चों की पहली पीढ़ी बड़ी संख्या +में शिक्षा प्राप्त कर रही है। +5.2 बच्चों के विकास के विभिन्न पहलुओं को अलग-अलगकरके नहीं देखा जा सकता। +पौष्टिक भोजन व स्वास्थ्य को और बच्चों के सामाजिक,मानसिक, शारीरिक नैतिक और भावनात्मक +विकास को समेकित रूप में ही देखना होगा। इस दृष्टि से शिशुओं की देखभाल और शिक्षा पर विशेष +ध्यान दिया जाएगा और इसे जहाँ भी संभव हो, समेकितबाल विकास सेवा कार्यक्रम के साथ जोड़ा +जाएगा। प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के संदर्भ मेंशिशुओं की देखभाल के केन्द्र खोले जाएंगे, +जिससे अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने वालीलड़कियों को स्कूल जाने की सुविधा मिल सके। +साथ ही निर्धन तबके की कार्यरत स्त्रियों को भी इन केन्द्रों से मदद मिल सकेगी। +5.3 शिशुओं की देखभाल और शिक्षा के केन्द्र पूरी तरह बाल-केन्द्रित होंगे। उनकी +गतिविधियाँ खेल-कूद और बच्चों के व्यक्तित्व पर आधारित होगी। इस अवस्था में औपचारिक रूप से +पढ़ना-लिखना नहीं सिखाया जाएगा। इस कार्यक्रम में स्थानीय समुदाय का पूरा सहयोग लिया जाएगा। +5.4 शिशुओं की देखभाल और पूर्व प्राथमिक शिक्षा के कार्यक्रमों को पूरी तरह समेकित +किया जाएगा ताकि इससे प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा मिले और मानव संसाधन विकास में सामान्य रूप +से सहायता मिल सके। इसके साथ ही स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम को और सुदृढ़ किया जायेगा। +प्रारम्भिक शिक्षा +5.5 प्रारम्भिक शिक्षा की नई दिशा में दो बातों परविशेष बल दिया जाएगाऋ ;कद्ध 14 वर्ष +की अवस्था तक के सब बच्चों की विद्यालयों में भर्ती और उनका विद्यालय में टिके रहना, और ;खद्ध +शिक्षा की गुणवत्ता में कापफी सुधार। +बाल-केन्द्रित दृष्टिकोण +5.6 बच्चों को विद्यालय जाने में सबसे अधिक सहायता तब मिलती है जब वहाँ का +वातावरण प्यार, अपनत्व और प्रोत्साहन से भरा हो और विद्यालय के सब लोग बच्चों की +आवश्यकताओं पर ध्यान दे रहे हों। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा की पद्धति बाल-केन्द्रित और गतिविधि पर +आधारित होनी चाहिए। पहली पीढ़ी के सीखने वाले बच्चों को अपनी गति से आगे बढ़ने देना चाहिए +और उनके लिए पूरक और उपचारात्मक शिक्षा की भी व्यवस्था होनी चाहिए। ज्यों-ज्यों बच्चे बड़े होंगे +उनके सीखने में ज्ञानात्मक तत्त्व बढ़ते जाएंगे और अभ्यासके द्वारा वे कुछ कुशलताएँ भी ग्रहण करते +चलेंगे। प्राथमिकता स्तर पर बच्चों को किसी भी कक्षा में पफेल न करने की प्रथा जारी रखी जायेगी। +बच्चों का मूल्यांकन वर्ष पर में पफैला दिया जाएगा। शिक्षा की व्यवस्था में से शारीरिक दंड को सर्वथा +हटा दिया जाएगा और विद्यालय के समय का और छुट्टियों का निर्णय भी बच्चों की सुविधा को देखते +हुये किया जायेगा। +विद्यालय में सुविधाएं +5.7 प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाएगी। इनमें किसी भी +मौसम में काम देने लायक कम से कम दो बड़े कमरे, आवश्यक खिलौने, ब्लैकबोर्ड, नक्शे, चार्ट और +अन्य शिक्षण सामग्री शामिल है। हर स्कूल में कम से कम दो शिक्षक होंगे, जिनमें एक महिला होगी। +यथासंभव जल्दी ही प्रत्येक कक्षा के लिए एक-एक शिक्षक की व्यवस्था की जाएगी। पूरे देश में +प्राथमिक विद्यालयों की दशा को सुधारने के लिए एक क्रमिक अभियान शुरू किया जाएगा जिसका +सांकेतिक नाम ‘‘आपरेशन ब्लैक बोर्ड’’ होगा। इस कार्यमें शासन, स्थानीय निकाय, स्वयं सेवी संस्थाओं +और व्यक्तियों की पूरी भागीदारी होगी। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम और ग्रामीण भूमिहीन रोजगार +गारंटी कार्यक्रम की निधियों का पहला उपयोग स्कूल की इमारतों के बनाने में होगा। +अनौपचारिक शिक्षा +5.8 ऐसे बच्चे जो बीच में स्कूल छोड़ गए हैं, या जोऐसे स्थानों पर रहते हैं जहाँ स्कूल नहीं +है या जो काम में लगे हैं, और वे लड़कियां जो दिनके स्कूल में पूरे समय नहीं जा सकती, इन सबके +लिए एक विशाल और व्यवस्थित अनौपचारिक शिक्षा का कार्यक्रम चलाया जाएगा। +5.9 अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों में सीखने की प्रक्रियाको सुधारने के लिए आधुनिक +टैक्नालाजी के उपकरणों की सहायता ली जाएगी। इन केन्द्रों में अनुदेशक के तौर पर काम करने के +लिए स्थानीय समुदाय के प्रतिभावान और निष्ठावान युवकों और युवतियों को चुना जाएगा और उनके +प्रशिक्षण की विशेष व्यवस्था की जाएगी। अनौपचारिक धारा में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चे +योग्यतानुसार औपचारिक धारा के विद्यालयों में प्रवेशपा सकेंगे। इस बात पर पूरा ध्यान दिया जाएगा +कि अनौपचारिक शिक्षा का स्तर औपचारिक शिक्षा के समतुल्य हो। +5.10 ‘‘राष्ट्रीय केन्द्रिक शिक्षाक्रम’’ की तरह का एक शिक्षाक्रम अनौपचारिक शिक्षा पद्धति +के लिये भी तैयार किया जाएगा, लेकिन यह शिक्षाक्रम विद्यार्थियों की जरूरतों पर आधारित होगा और +इसका संबंध स्थानीय पर्यावरण से रहेगा। उच्चकोटि की शिक्षण सामग्री बनाई जाएगी और वह सभी +विद्यार्थियों को मुफ्रत दी जाएगी। अनौपचारिक शिक्षा के कार्यक्रम में सहभागी होते हुए शिक्षा प्राप्त करने +का वातावरण उपलब्ध किया जाएगा, और इसमें खेल-कूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, भ्रमण आदि की +व्यवस्था की जाएगी। +5.11 अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों को चलाने का अधिकतरकार्य स्वयंसेवी संस्थाएँ और +पंचायती राज की संस्थाएँ करेंगी। इस कार्य के लिये इन संस्थाओं को पर्याप्त धन समय पर दिया जाएगा। इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र की कुल जिम्मेदारी सरकार पर रहेंगी। +एक संकल्प +5.12 नई शिक्षा नीति में स्कूल छोड़े जाने वाले बच्चों की समस्या के सुलझाने को उच्च +प्राथमिकता दी जाएगी। बच्चों को बीच में स्कूल छोड़ने से रोकने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के +परिप्रेक्ष्य में इस समस्या का बारीकी से अध्ययन किया जाएगाऔर तद्नुसार प्रभावशाली उपाय खोज +कर दृढ़ता के साथ उनका प्रयोग करने हेतु देशव्यापी योजना बनाई जाएगी। इस प्रयत्न का अनौपचारिक +शिक्षा की व्यवस्था के साथ पूरा तालमेल होगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि 1990 तक जो बच्चे +11 के हो जाएंगे उन्हें विद्यालय में 5 वर्ष की शिक्षा,या अनौपचारिक धारा में इसकी समतुल्य शिक्षा, +अवश्य मिल जाए। इसी प्रकार 1995 तक 14 वर्ष की अवस्था आने वाले सभी बच्चों को निःशुल्क और +अनिवार्य शिक्षा अवश्य दी जाएगी। +माध्यमिक (सेकेण्डरी) शिक्षा +5.13 माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर विद्यार्थियों को विज्ञान, मानविकी और सामाजिक विज्ञानों +की विशिष्ट भूमिकाओं का ज्ञान होने लगता है। इसी अवस्था पर बच्चों को इतिहासबोध और राष्ट्रीय +परिप्रेक्ष्य सही ढंग से दिया जा सकता है। साथ ही इस अवस्था पर अपने संवैधानिक दायित्व और +नागरिकों के अधिकारों से भी उन्हें परिचित हो जानाचाहिए। अच्छे शिक्षाक्रम द्वारा उनमें चेतन रूप से +कर्मशीलता के और करुणाशील सामाजिक संस्कृति के संस्कार डाले जाएंगे। इस स्तर पर विशेष संस्थाओं +में व्यवसायों की शिक्षा के द्वारा और माध्यमिक शिक्षाकी पुनर्रचना के द्वारा देश के आर्थिक विकास के +लिये मूल्यवान जनशक्ति जुटाई जा सकती है। जिन क्षेत्रों में अभी सैकण्डरी शिक्षा नहीं पहुचीं है वहाँ +तक इसे पहुंचाकर अधिक सुलभ बनाया जाएगा। दूसरे क्षेत्रों में दृढ़ीकरण पर बल रहेगा। +गतिनिर्धारक विद्यालय +5.14 यह एक सर्वमान्य बात है कि जिन बच्चों में विशेष प्रतिभा या अभिरुचि हो, उन्हें +अच्छी शिक्षा उपलब्ध करा कर अधिक तेजी से आगे बढ़ने केअवसर दिए जाने चाहिए। उनकी आर्थिक +स्थिति जैसी भी हो उन को ऐसे अवसर मिलने चाहिए। +5.15 इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये देश के विभिन्न भागों में एक निर्धारित ढांचे पर +गतिनिर्धारक विद्यालयों की स्थापना की जाएगी। इनमें नई-नई पद्धतियों को अपनाने और प्रयोग करने की +छूट रहेगी। मोटे तौर पर इन विद्यालयों का उद्देश्य होगा कि वे समता और सामाजिक न्याय के साथ +शिक्षा में उत्कृष्टता लाएँ। अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिये इन विद्यालयों में आरक्षण रहेगा। +इन विद्यालयों में देश के विभिन्न भागों के, मुख्यतया ग्रामीण क्षेत्रों के, प्रतिभाशाली बच्चे एक साथ +रहकर पढ़ेंगे जिससे उनमें राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास होगा। इन विद्यालयों में बच्चों को +अपनी क्षमताओं के पूरे विकास का अवसर मिलेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि ये विद्यालय समूचे देश +में विद्यालय सुधार के कार्यक्रम में उत्प्रेरक का काम करेंगे। ये विद्यालय आवासीय और निःशुल्क होंगे। +व्यावसायीकरण +5.16 शिक्षा के प्रस्तावित पुनर्गठन में व्यवस्थित और सुनियोजित व्यावसायिक शिक्षा के +कार्यक्रम को दृढ़ता से क्रियान्वित करना बहुत ही जरूरी है।इससे व्यक्तियों के रोजगार पाने की क्षमता +बढ़ेगी, आजकल कुशल कर्मचारियों की माँग और आपूर्ति में जो असंतुलन है वह समाप्त होगा और ऐसे +विद्यार्थियों को एक वैकल्पिक मार्ग मिल सकेगा जो इस समय बिना किसी विशेष रुचि या उद्देश्य के +उच्च शिक्षा की पढ़ाई किए जाते हैं। +5.17 व्यावसायिक शिक्षा अपने में शिक्षा की एक विशिष्टधारा होगी जिसका उद्देश्य कई क्षेत्रों +के चुने हुए काम-धंधों के लिये विद्यार्थियों को तैयार करना होगा। ये कोर्स आम तौर पर सेकंडरी शिक्षा +के बाद दिए जायेंगे लेकिन इस योजना को लचीला रखा जाएगा ताकि आठवीं कक्षा के बाद भी +विद्यार्थी ऐसे कोर्स ले सकें। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान भी बड़ी व्यावसायिक शिक्षा के ढांचे के +अनुसार चलेंगे ताकि इनमें प्राप्त सुविधाओं का पूरा लाभ उठाया जा सके। +5.18 स्वास्थ्य नियोजन और स्वास्थ्य सेवा प्रबंध को उस क्षेत्र के लिये आवश्यक जनशक्ति +प्रशिक्षण से जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिये स्वास्थ्य संबंधी व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की आवश्यकता +होगी। प्राथमिक और मध्य स्तर पर स्वास्थ्य की शिक्षा पाने से व्यक्ति परिवार और समाज के स्वास्थ्य के +प्रति प्रतिबद्ध होगा। इससे उच्चतर माध्यमिक स्तर पर स्वास्थ्यसे संबंधित व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में +विद्यार्थियों की रुचि बढ़ेगी। कृषि, विपणन, सामाजिक सेवाओं आदि के क्षेत्र में भी इसी प्रकार के +पाठ्यक्रम तैयार किये जायेंगे। व्यावसायिक शिक्षा में ऐसी मनोवृत्तियों, ज्ञान और कुशलताओं पर बल +रहेगा जिनसे उद्यमीपन और स्वरोजगार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिले। +5.19 व्यावसायिक पाठ्यचर्चाओं या संस्थाओं को स्थापित करने का दायित्व सरकार पर और +सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के सेवा नियोजकों ;एम्पलायर्सद्धपर होगा, तो भी सरकार स्त्रियों, ग्रामीण और +जनजातियों के विद्यार्थियों और समाज के वंचित वर्गों की आवश्यकता पूरी करने के लिये विशेष कदम +उठाएगी। विकलांगों के लिये भी समुचित कार्यक्रम शुरू किये जायेंगे। +5.20 व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के स्नातकों को ऐसे अवसरदिये जायेंगे जिन के पफलस्वरूप वे +पूर्व निर्धारित शर्तों के अनुसार व्यावसायिक विकास कर सकें, कैरियर में तरक्की पा सकें और सामान्य +तकनीकी एवं उच्च स्तरीय व्यवसायों के कोर्सों में प्रवेश पा सकें। +5.21 नवसाक्षर लोगों, प्राथमिक शिक्षा पूरी किये हुएयुवाओं, स्कूल छोड़ जाने वालों और +रोजगार में या आंशिक रोजगार में लगे हुए व्यक्तियों के लिये भी अनौपचारिक लचीले और आवश्यकता +पर आधारित शिक्षा के कार्यक्रम चलाए जायेंगे। इस संबंध में महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। +5.22 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की अकादमिक धारा के स्नातक यदि चाहें तो उनके लिए +उच्चस्तरीय व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का प्रबंध किया जाएगा। +5.23 यह प्रस्ताव है कि उच्चतर माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों का दस प्रतिशत 1990 तक +और 25 प्रतिशत 1995 तक व्यावसायिक पाठ्यचर्या में आ जाए। इस बात के लिये कदम उठाए जाएंगे +कि व्यावसायिक शिक्षा पाकर निकले हुए विद्यार्थियों मेंसे अधिकतर को या तो नौकरी मिले या वे +अपना रोजगार स्वयं कर सकें। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का पुनरीक्षण नियमित रूप से किया जाएगा। +माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रमों के वैविध्यकरण को बढ़ावा देने के लिये सरकार अपने अधीन की जाने +वाली भर्ती की नीति पर भी पुनः विचार करेगी। +उच्च शिक्षा +5.24 उच्च शिक्षा से लोगों को इस बात का अवसर मिलता है कि वे मानव जाति की +सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में आई हुई समस्याओं पर विचार कर +सकें। विशिष्ट ज्ञान और कुशलताओं के प्रसारण के द्वारा उच्च शिक्षा राष्ट्र के विकास में सहायक बनती +है। इसलिये समाज के जीवन में उसकी निर्णायक भूमिका है, शैक्षिक पिरामिड में शीर्ष पर होने के नाते +समूची शिक्षा व्यवस्था के लिये अध्यापक तैयार करने में भी इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। +5.25 आजकल ज्ञान का जो अभूतपूर्व विस्पफोट हो रहा हैउसे देखते हुए उच्च शिक्षा को +पहले से कहीं ज्यादा गतिशील होना है और नवीन अध्ययन-क्षेत्रों में निरन्तर कदम बढ़ाते रहना है। +5.26 आज भारत में करीब 150 विश्वविद्यालय और 5000 कॉलेज हैं। इन संस्थाओं में सभी +प्रकार का सुधार लाने की दृष्टि से यह प्रस्ताव है कि निकट भविष्य में मुख्य बल विद्यमान संस्थाओं को +दृढ़ करने और उनकी सुविधाओं के विस्तार पर हो। +5.27 उच्च शिक्षा-व्यवस्था को गिरावट से बचाने के लिए सभी संभव उपाय किये जाएंगे। +5.28 विश्वविद्यालयों से कालेजों के अनुबंधन ;एपिफलिएशनद्ध की प्रथा का अनुभव कहीं +संतोषप्रद और कहीं असंतोषप्रद रहा है। इसलिए अनुबंधन को घटाकर बड़ी संख्या में कालेजों को +स्वायत्तता देने पर बल दिया जाएगा। उद्देश्य यह है कि वर्तमान अनुबंधन की प्रथा के स्थान पर +विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के बीच एक स्वतंत्र और अधिक सृजनशील संबंध का जन्म हो। इसी तरह +विश्वविद्यालयों के कुछ चुने हुये विभागों को भी स्वायत्तता देने को प्रोत्साहित किया जाएगा। स्वायत्तता +और स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही भी अवश्य ही रहेगी। +5.29 विशिष्टीकरण की मांग को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिये पाठ्यक्रमों और कार्यक्रमों +को नये सिरे से बनाया जायेगा। भाषिक क्षमता पर विशेष बल दिया जाएगा। विद्यार्थी कौन-कौन से +कोर्स एक साथ ले सकते हैं, यह तय करने में अधिक लचीलापन रहेगा। +5.30 राज्य स्तर पर उच्च शिक्षा का नियोजन और उच्च शिक्षा संस्थाओं में समन्वय संपन्न +करने हेतु शिक्षा परिषदें बनाई जाएंगी। शिक्षा के स्तर पर निगरानी रखने के लिये विश्वविद्यालय अनुदान +आयोग और ये परिषदें समन्वय पद्धतियाँ बनायेगी। +5.31 न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जाएगी और शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश +उनकी ग्रहण-क्षमता के अनुसार किया जायेगा। शिक्षण विधियों को बदलने के प्रयास किये जाएंगे। +दृश्य-श्रव्य साधनों और इलेक्ट्रानिक उपकरणों का प्रयोगप्रारम्भ होगा। विज्ञान भी टैक्नॉलाजी के +शिक्षाक्रम और शिक्षण सामग्री के विकास पर और अनुसंधान एवं अध्यापक प्रशिक्षण पर ध्यान दिया +जायेगा। इसके लिये अध्यापकों की सेवा-पूर्व तैयारी और बाद में उनकी सतत् शिक्षा आवश्यक होगी। +अध्यापकों के कार्य का मूल्यांकन व्यवस्थित ढंग से किया जायेगा। सभी पद योग्यता के आधार पर भरे +जायेंगे। +5.32 विश्वविद्यालयों में अनुसंधान के लिये अधिक सहायतादी जाएगी और उसकी उच्च +गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिये कदम उठाये जायेंगे। विश्वविद्यालय में किये जा रहे अनुसंधान +और अन्य संस्थाओं द्वारा किये जा रहे अनुसंधान के बीच, विशेषकर विज्ञान और टेक्नालाजी के अग्रवर्ती +क्षेत्रों में, तालमेल बनाये रखने के लिये विश्वविद्यालयअनुदान आयोग के द्वारा उचित व्यवस्था की +जायेगी। राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थाओं की सुविधाओं को विश्वविद्यालयीन प्रणाली के अंतर्गत स्थापित करने +के प्रयास किये जाएंगे और इन संस्थाओं में स्वायत्त प्रबंध की समुचित व्यवस्था की जाएगी। +5.33 भारत विद्या, मानविकी और सामाजिक विज्ञानों में अनुसंधान के लिये पर्याप्त सहायता दी +जाएगी। ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में संश्लेषण लाने की दृष्टि से अंतरविषयी अनुसंधान को प्रोत्साहन दिया +जायेगा। इस बात का भी प्रयत्न होगा कि भारत के प्राचीन ज्ञान के भण्डार में पैठा जाए और उसे +समकालीन वस्तुस्थिति से जोड़ा जाए। इसके लिये संस्कृत और अन्य श्रेष्ठ भाषाओं के गहन अध्ययन का +विकास करना जरूरी होगा। +5.34 नीति में अधिक समन्वय और सामंजस्य लाने के लिये,उपलब्ध सुविधाओं का सबके +द्वारा उपयोग करने और अंतरविषयी अनुसंधान का विकास करने की दृष्टि के सामान्य कृषि, चिकित्सा, +कानून और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में उच्च शिक्षा केलिये एक राष्ट्रीय निकाय स्थापित किया जाएगा। +खुला विश्वविद्यालय और दूरस्थ अध्ययन +5.35 उच्च शिक्षा के लिये अधिक अवसर देने और शिक्षा को जनतांत्रिक बनाने की दृष्टि से +खुले विश्वविद्यालय की प्रणाली शुरू की गई है। +5.36 इन उद्देश्यों के लिये 1985 में स्थापित ‘‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय’’ को +सुदृढ़ किया जायेगा। +5.37 इस प्रबल साधन का विकास एवं विस्तार सावधानी से और सोच समझकर करना होगा। +5.38 कुछ चुने हुये क्षेत्रों में डिग्री को नौकरी सेअलग करने के लिये कदम उठाये जाएंगे। +5.39 विशिष्ट व्यावसायिक क्षेत्रों, जैसे इंजीनियरी, चिकित्सा, कानून, शिक्षण आदि में इस +प्रस्ताव को लागू नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार मानविकी, सामाजिक विज्ञान और विज्ञान आदि में, +जहाँ विशेषज्ञों की सेवाओं की आवश्यकता होती है, अकादमिक अर्हताओं की आवश्यकता बनी रहेगी। +5.40 डिग्री को नौकरी से अलग करने की योजना उन सेवाओं में शुरू की जाएगी जिनमें +विश्वविद्यालय की डिग्री आवश्यक नहीं होनी चाहिए। इस योजना को लागू करने से विशेष कार्यों, +अपेक्षित कुशलताओं पर आधारित नये पाठ्यक्रम बनने लगेंगे और इससे उन प्रत्याशियों के साथ अधिक +न्याय हो सकेगा जिनके पास किसी विशेष काम को करने की क्षमता तो है लेकिन उन्हें वह काम +इसलिये नहीं मिल सकता क्योंकि उसके लिये स्नातक प्रत्याशियों को अनावश्यक रूप से तरज़ीह दी +जाती है। +5.41 नौकरियों को डिग्री से अलग करने के साथ-साथ क्रमिक रूप में एक राष्ट्रीय परीक्षण +सेवा प्रारंभ की जाएगी। इसके द्वारा स्वैच्छिक रूप से विशिष्ट कामों के लिये प्रत्याशियों की उपयुत्तफता +की जांच की जाएगी और इससे देश भर में समतुल्य योग्यताओं के मानक स्थापित हो सकेंगे। +ग्रामीण विश्वविद्यालय +5.42 ग्रामीण विश्वविद्यालय के नये ढांचे को सुदृढ़ किया जाएगा और इसे महात्मा गांधी के +शिक्षा संबंधी क्रांतिकारी विचारों के अनुरूप विकसित किया जाएगा। इसका उद्देश्य होगा कि ग्रामीण क्षेत्र +के उन्नयन के लिये सूक्ष्म रूप से आयोजन प्रक्रिया ग्राम स्तरपर चलाने की दृष्टि से योग्य शिक्षा दी +जाए। महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा से सम्बद्ध संस्थाओं और कार्यक्रमों को सहायता दी जाएगी। +भाग 6. +Kartik mahan. +6.1 यद्यपि तकनीकी शिक्षा और प्रबंध शिक्षा अलग Ggjjdjjcgधाराओं के रूप में चल रही है। तथापि +उनके आपसी घनिष्ठ संबंध और पूरक उद्देश्यों को ध्यानमें रखते हुए दोनों पर इकट्ठा विचार करना +आवश्यक है। तकनीकी और प्रबंध शिक्षा का पुनर्गठन करतेसमय नई शताब्दी के आरंभ में जिस प्रकार +की परिस्थिति की संभावना है, उसे ध्यान में रखना होगा। अर्थव्यवस्था, सामाजिक वातावरण, उत्पादन +और प्रबंधकीय प्रक्रियाओं में संभावित परिवर्तन, ज्ञान में तेजी से होते पफैलाव, तथा विज्ञान और +प्रौद्योगिकी में होने वाली प्रगति को इस संदर्भ में देखना होगा। +6.2 अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढाँचे और सेवा क्षेत्रों के साथ-साथ असंगठित ग्रामीण क्षेत्रों को +भी उन्नत टेक्नॉलाजी को और तकनीकी और प्रबंधकीय जनशक्ति की बेहद जरूरत है। सरकार द्वारा इस +ओर ध्यान दिया जायेगा। +6.3 जनशक्ति सूचना के संबंध में स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से हाल ही में स्थापित +तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली को आगे विकसित तथा सुदृढ़ किया जायेगा। +6.4 वर्तमान तथा उभरती प्रौद्योगिकी दोनों में सतत्शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जायेगा। +6.5 क्योंकि संगणक ;कम्प्यूटरद्ध महत्त्वपूर्ण और सर्वव्यापक साधन बन गया है, अतः +संगणक के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी और उनके प्रयोग में प्रशिक्षण व्यावसायिक शिक्षा का अंग +बनाया जायेगा। संगणक-साक्षरता ;कम्प्यूटर लिटरेसीद्ध के कार्यक्रम स्कूल स्तर से ही बड़े पैमाने पर +आयोजित किए जाएंगे। +6.6 औपचारिक पाठ्यक्रमों में दाखिले की वर्तमान कड़ीशर्तों के कारण साधारण लोगों में +अधिकांश को आज तकनीकी तथा प्रबंधकीय शिक्षा नहीं मिलती। ऐसे लोगों के लिये दूर शिक्षण +सुविधायें जिनमें जनसंचार माध्यम का उपयोग भी शामिलहै, प्रदान की जायेंगी। तकनीकी तथा प्रबंध +शिक्षा कार्यक्रम, पालिटेक्निक शिक्षा सहित, लचीली माड्यूलर पद्धति के अनुसार चलेंगे और इसमें +विभिन्न स्तरों पर प्रवेश की सुविधा होगी। इसके लियेपर्याप्त मार्गदर्शन और परामर्श सेवा भी उपलब्ध +कराई जायेगी। +6.7 प्रबंध शिक्षा की प्रासंगिकता को, विशेष रूप से गैर-नियमित तथा कम व्यवस्थित क्षेत्रों +में, बढ़ाने के उद्देश्य से प्रबंध शिक्षा प्रणाली द्वारा भारतीय अनुभव एवं अध्ययन पर आधारित दस्तावेजी +जानकारी तैयार की जायेगी और ऊपर बताये गये क्षेत्रोंके लिये उपयुक्त ज्ञान एवं शिक्षा कार्यक्रमों का +भंडार तैयार किया जायेगा। +6.8 महिलाओं, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों एवं विकलांगों के लाभ के +लिये तकनीकी शिक्षा के लिये समुचित औपचारिक तथा अनौपचारिक कार्यक्रम तैयार किये जायेंगे। +6.9 व्यावसायिक शिक्षा और उसके विस्तार पर बल देने केलिये व्यावसायिक शिक्षा, +शैक्षिक प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रम विकास आदि के लिये अनेकशिक्षकों और प्रोपफेशनल्स की आवश्यकता +होगी। इस मांग को पूरा करने के लिये कार्यक्रम शुरू किए जायेंगे। +6.10 यह आवश्यक है कि ‘‘स्वयं रोजगार’’ को छात्रगण जीविका-विकल्प के रूप में स्वीकार +करें। इसके लिये उन्हें उद्यम-विषयक ;आन्त्रप्रिन्योरशिपद्ध प्रशिक्षण दिया जायेगा जिसकी अव्यस्था डिग्री +तथा डिप्लोमा स्तर पर माड्यूलर तथा वैकल्पिक कोर्सोंद्वारा की जायेगी। +6.11 पाठ्यक्रम की अद्यतन बनाने की सतत् आवश्यकताओं कोपूरा करने के लिये नवीकरण +द्वारा नई प्रौद्योगिकियों और विषयों को शुरू करना होगा तथा पुराने और अर्थहीन होते विषयों को +क्रमशः हटाना होगा। +संस्थागत झुकाव की दिशा +6.12 ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ पालिटेक्निकों ने सामुदायिक पालिटेक्निकों की प्रणाली के माध्यम +से कमजोर वर्गों को उत्पादक व्यवसायों में प्रशिक्षणदेना शुरू किया है। सामुदायिक पालिटेक्निक +प्रणाली का मूल्यांकन किया जायेगा और उसे समुचित रूप से मजबूत बनाया जायेगा ताकि इसकी +गुणवत्ता और प्रसार को बढ़ाया जा सके। +नवाचार, शोध और विकास +6.13 शिक्षा की प्रक्रियाओं के नवीकरण के साधनों के रूप में सभी उच्च तकनीकी संस्थान +शोध कार्य में पूरी तत्परता से जुट जायेंगी। इनका पहला मकसद होगा उच्च कोटि की जनशक्ति उपलब्ध +कराना, जो शोध और विकास में उपयोगी साबित हो सके। विकास के लिये शोध कार्य, मौजूदा +प्रौद्योगिकी में सुधार, नई देशज प्रौद्योगिकी की खोज तथा उत्पादन की जरूरतों को पूरा करने से संबंधित +होगा। प्रौद्योगिकी में होने वाले परिवर्तनों पर नजररखने और नये आविष्कारों का अनुमान लगाने के +लिये भी उपयुक्त व्यवस्था की जायेंगी। +6.14 इस क्षेत्र में विभिन्न स्तरों पर कार्य करने वाली संस्थाओं और उनका उपयोग करने वाली +प्रणालियों के बीच सहयोग, सहकार्य और आदान-प्रदान के रिश्ते कायम करने के अवसरों का पूरा +लाभ उठाया जायेगा। उपयुक्त रख-रखाव तथा रोजमर्रा के जीवन में नये-नये प्रयोग करने और उन्हें +सुधारने की मनोवृत्ति को व्यवस्थित ढंग से विकसित किया जायेगा। +सभी स्तरों पर दक्षता और प्रभावकारिता बढ़ाना +6.15 तकनीकी और प्रबंध शिक्षा खर्चीली होती है। लागत के हिसाब से इसको कारगर बनाने +और उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिये निम्नलिखित मुख्य उपाय किये जायंगे- +आधुनिकीकरण को महज पफैशन के तौर पर या प्रतिष्ठा चिर्िं के रूप में नहीं बल्कि +कार्यात्मक दक्षता बढ़ाने के लिये अपनाया जायेगा। +अवसर देकर अपने लिये संसाधन जुटाने के लिये प्रोत्साहित किया जायेगा। उन्हें अद्यतन +शिक्षण संसाधनों, पुस्तकालयों और कम्प्यूटर सुविधाओं से सज्जित किया जायेगा। +रचनात्मक कार्य और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिये सुविधाएँ बढ़ाई जायेंगी। +विकास के अवसरों, सेवा शर्तों, कन्सलटेंसी के मानदंडों, तथा अन्य सुविधाओं को +सुधारा जायेगा। +तैयार करना तथा संस्था के प्रबंध में हाथ बढ़ाना। संकाय सदस्यों के लिये सेवापूर्व और +सेवाकालीन प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिये जाएंगे और पर्याप्त प्रशिक्षण रिजर्व उपलब्ध +किये जायेंगे। स्टापफ विकास कार्यक्रम राज्य स्तर पर समेकित, तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय +स्तरों पर समन्वित किये जायेंगे। +उपयोग करने वालों की वर्तमान और भावी आवश्यकताएँ पूरी हो सकें। तकनीकी अथवा +प्रबंध संस्थानों और उद्योगों के बीच सक्रिय कार्यसंबंध स्थापित करने का प्रयास किया +जायेगा। यह संबंध कार्यक्रम-नियोजन में, कार्यान्वयन में,कर्मचारियों के विनिमय में, +प्रशिक्षण-सुविधाओं और संसाधनों में, अनुसंधान और कन्सलटेन्सी ;सलाहकारीद्ध में, +और पारस्परिक लाभ के अन्य क्षेत्रों में स्थापित कियाजायेगा। +जाएगा। घटिया स्तर की संस्थाओं का उभरना रोका जाएगा। प्रशिक्षक संकाय के पूर्ण +सहयोग से एक ऐसा संस्थागत माहौल तैयार किया जायेगाजिसमें उत्कृष्टता और +नव-प्रयास को पनपने का अवसर प्राप्त हो सके। +दी जायेगी, लेकिन साथ ही जिम्मेदारी के समुचित निर्वाहके लिये जवाबदेही की +व्यवस्था भी की जायेगी। +सामुदायिक विकास कार्यक्रमों से तथा पूरक स्वरूप वाले अन्य शिक्षा-क्षेत्रों से स्थापित +किया जायेगा। +प्रबंध कार्यकलाप और परिवर्तन +6.16 प्रबन्ध पद्धतियों में संभावित परिवर्तनों की, और इन परिवर्तनों के साथ कदम मिलाकर +चलने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, परिवर्तन प्रक्रिया के स्वरूप और दिशा को समझने की +कारगर पद्धतियां तैयार की जायेंगी। परिवर्तन को पचाने की दक्षता को विकास किया जायेगा। +6.17 अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् को विधिक प्राधिकार प्रदान किया जायेगा। +परिषद् इस प्राधिकार के द्वारा तकनीकी शिक्षा का नियोजन करेगी, स्तरों और मानदंडों का निर्धारण और +अनुरक्षण, प्रत्यापन, प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्रों के लिये वित्तीय व्यवस्था, अनुश्रवण और मूल्यांकन, प्रमाणन +एवं पुरस्कारों की समकक्षता का निर्वहन, तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा के बीच समन्वय- ये सब कार्य +सम्पन्न करेगी। समुचित रूप से गठित एक मान्यताप्राप्त बोर्डनिश्चित अवधियों पर अनिवार्य रूप से +तकनीकी शिक्षा की प्रक्रिया का मूल्यांकन करेगा। +6.18 शिक्षा प्रमाणों को बनाये रखने तथा अन्य अनेकअनुकूल कारणों को ध्यान में रखकर +तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के व्यापारीकरण को रोका जायेगा। इसके विकल्प के रूप में स्वीकृत +मानदंडों और सामाजिक लक्ष्यों के अनुरूप इन क्षेत्रों में निजी और स्वैच्छिक प्रयासों को शामिल करने +की एक नई पद्धति तैयार की जायेगी। +भाग 7. +शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाना. +7.1 यह स्पष्ट है कि शिक्षा से संबंधित ये तथा अन्य बहुत से नये कार्य अव्यवस्था की दिशा +में नहीं किये जा सकते। शिक्षा का प्रबंध चरम बौद्धिक अनुशासन और गंभीर सोद्देश्यता की मांग +करता है। अवश्य ही इसके साथ वह स्वतंत्रता भी होनी चाहिये जिसमें नये प्रयोगों और सृजनशीलता को +पूरा अवसर मिले। शिक्षा की गुणवत्ता में और उसके विस्तार के संबंध में तो दूरगामी परिवर्तन करने ही +होंगे, किन्तु जो कुछ आज की स्थिति है, उसी में अनुशासन स्थापित करने की प्रक्रिया का प्रारंभ तुरंत +ही करना होगा। +7.2 देश ने शिक्षा-व्यवस्था में असीम विश्वास रखा है और लोगों को यह अधिकार है कि वे +इस व्यवस्था से ठोस परिणामों की आशा करें। सबसे पहला काम तो इस तंत्र को सक्रिय बनाना है। यह +आवश्यक है कि सभी अध्यापक पढ़ाएं और सभी विद्यार्थी पढ़ें। +7.3 इसके लिए निम्नलिखित युक्तियाँ अपनाई जायेंगी। +के मूल्यांकन की पद्धति का सृजन। +भाग 8. +शिक्षा की विषय-वस्तु और प्रक्रिया को नया मोड़ देना. +सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य +8.1 इस समय शिक्षा की औपचारिक पद्धति और देश की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक +परंपराओं के बीच एक खाई है, जिसे पाटना आवश्यक है। आधुनिक टेक्नॉलाजी की धुन में यह नहीं +होना चाहिए कि नई पीढ़ी भारतीय इतिहास और संस्कृतिके मूल में ही कट जाये। +संस्कृतिविहीनता-अमानवीयता और विलगाव ;एलिएनेशनद्ध के भाव से हर कीमत पर बचना होगा। +परिवर्तनपरक टेक्नॉलाजी और सतत् चली आ रही देश की सांस्कृतिक परंपरा में एक सुन्दर समन्वय की +आवश्यकता है और शिक्षा इसे बखूबी कर सकती है। +8.2 शिक्षा की पाठ्यचर्या और प्रक्रियाओं को सांस्कृतिक विषयवस्तु के समावेश द्वारा अधिक +से अधिक रूपों में समृद्ध किया जाएगा। इस बात का प्रयत्न होगा कि सौन्दर्य, सामंजस्य और परिष्कार +के प्रति बच्चों की संवेदनशीलता बढ़े। सांस्कृतिक परंपरा में निष्णात व्यक्तियों को, उनके पास +औपचारिक शैक्षिक उपाधि के न होने पर भी, शिक्षा में सांस्कृतिक तत्त्वों का योगदान करने के लिए +आमंत्रित किया जाएगा। इस काम में लिखित और मौखिकदोनों परंपराएं शामिल होंगी। सांस्कृतिक +परंपरा को कायम रखने और आगे बढ़ाने के लिए परम्परागत तरीकों से पढ़ाने वाले गुरुओं और उस्तादों +की सहायता की जाएगी और उनके कार्य को मान्यता दी जाएगी। +8.3 विश्वविद्यालय प्रणाली के और कला, पुरातत्व, प्राच्य अध्ययन आदि की उच्च संस्थाओं +के बीच संपर्क कायम किया जाएगा। ललित कलाओं, संग्रहालय-विज्ञान, लोक साहित्य आदि विशिष्ट +विषयों पर उचित ध्यान दिया जाएगा। इन क्षेत्रों में शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान की अधिक व्यवस्था +की जाएगी ताकि उनके लिए आवश्यक विशेष योग्यता प्राप्तव्यक्तियों की कमी को पूरा किया जाता +रहे। +मूल्यों की शिक्षा +8.4 इस बात पर गहरी चिन्ता प्रकट की जा रही है कि जीवन के लिए आवश्यक मूल्यों का +ह्रास हो रहा है और मूल्यों पर से ही लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। शिक्षाक्रम में ऐसे परिवर्तन +की जरूरत है जिससे सामाजिक और नैतिक मूल्यों के विकास में शिक्षा एक सशक्त साधन बन सके। +8.5 हमारा समाज सांस्कृतिक रूप से बहु-आयामी है, इसलिएशिक्षा के द्वारा उन सार्वजनीन +और शाश्वत मूल्यों का विकास होना चाहिए जो हमारे लोगों को एकता की ओर ले जा सकें। इन मूल्यों +से धार्मिक अंधविश्वास, कट्टरता, असहिष्णुता, हिंसा और भाग्यवाद का अन्त करने में सहायता मिलनी +चाहिए। +8.6 इस संघर्षात्मक भूमिका के साथ-साथ मूल्य-शिक्षा का एक गंभीर सकारात्मक पहलू भी +है जिसका आधार हमारी सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय लक्ष्य और सार्वभौम दृष्टि है, जिस पर मुख्य तौर +से बल दिया जाना चाहिए। +भाषाएँ +8.7 1968 की शिक्षा नीति में भाषाओं के विकास के प्रश्न पर विस्तृत रूप से विचार किया +गया था। उस नीति की मूल सिपफारिशों में सुधार की संभावना शायद ही हो और वे जितनी प्रासंगिक +पहले थीं उतनी ही आज भी हैं। किन्तु देश भर में 1968 की नीति का पालन एक समान नहीं हुआ। +अब इस नीति की अधिक सक्रियता और सोद्देश्यता से लागू किया जाएगा। +पुस्तकें और पुस्तकालय +8.8 जन शिक्षा के लिए कम कीमत पर पुस्तकों का उपलब्ध होना बहुत ही जरूरी है। समाज +के सभी वर्गों को आसानी से पुस्तकें उपलब्ध कराने केप्रयास किए जाएंगे। साथ ही पुस्तकों की +गुणात्मकता को सुधारने, पढ़ने की आदत का विकास करनेऔर सृजनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने +के लिए कदम उठाये जाएंगे। लेखकों के हितों की रक्षाकी जाएगी। विदेशी पुस्तकों के भारतीय भाषाओं +में अच्छे अनुवादों को सहायता दी जायेगी। बच्चों के लिए अच्छी पुस्तकों के निर्माण पर विशेष ध्यान +दिया जाएगा। इनमें पाठ्य पुस्तकें और अभ्यास पुस्तकें भी सम्मिलित होंगी। +8.9 पुस्तकों के विकास के साथ-साथ मौजूदा पुस्तकालयों के सुधार के लिए और नए +पुस्तकालयों की स्थापना के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियानचलाया जायेगा। प्रत्येक शैक्षिक संस्था में +पुस्तकालय की सुविधा के लिए प्रावधान किया जाएगा और पुस्तकालाध्यक्षों के स्तर को सुधारा जाएगा। +संचार माध्यम और शैक्षिक प्रौद्योगिकी +8.10 आधुनिक संचार-प्रौद्योगिकी से यह संभव हो गया है कि पहले की दशाब्दियों में शिक्षा +की जिन अवस्थाओं और क्रमों से गुजरना पड़ता था उनमें से अधिकांश को लांघकर आगे बढ़ा जाए। +इस टेक्नालॉजी से देश और काल के बंधनों पर काबू पा सकना संभव हो गया है। हमारा समाज दो +खंडों में बँटा न रहे, इसके लिए आवश्यक है कि शैक्षिक प्रौद्योगिकी संपन्न वर्गों के साथ-साथ उन क्षेत्रों +में पहुंचे जो इस समय अधिक से अधिक अभावग्रस्त हैं। +8.11 शैक्षिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग उपयोगी जानकारी के लिए, अध्यापकों के प्रशिक्षण और +पुनःप्रशिक्षण के लिए, शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए, और कला और संस्कृति के प्रति +जागरूकता और स्थाई मूल्यों के संस्कार उत्पन्न करने केलिए किया जाएगा। औपचारिक और +अनौपचारिक दोनों प्रकार की शिक्षा में इस टेक्नॉलाजी का प्रयोग होगा। मौजूदा व्यवस्थाओं +(इन्फ्रास्ट्राक्चर) का अधिक से अधिक लाभ उठाया जाएगा। जिनगांवों में बिजली नहीं है वहां प्रोग्राम +चलाने के लिए बैटरी अथवा सौर ऊर्जा पैक से काम लिया जाएगा। +8.12 शैक्षिक टेक्नॉलोजी के द्वारा मुख्य रूप से ऐसे कार्यक्रमों का निर्माण होगा जो प्रासंगिक +हों और सांस्कृतिक रूप से संगत हों। इस उद्देश्य के लिएदेश में विद्यमान सभी संसाधनों का उपयोग +किया जाएगा। +8.13 संचार माध्यमों का प्रभाव बच्चों और बड़ों केमन पर बहुत गहरा पड़ता है। आजकल +इन संचार माध्यमों के कुछ प्रोग्राम अति उपभोग की संस्कृति और हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते प्रतीत +होते हैं और उनका प्रभाव हानिकारक है। रेडियो और दूरदर्शन के ऐसे कार्यक्रमों को बंद किया जाएगा +जो शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति में बाधक बन सकते हों। पिफल्मों और अन्य संचार माध्यमों में भी इस +प्रवृत्ति को रोकने के लिए कदम उठाए जाएंगे। बच्चों के लिए उच्च कोटि के और उपयोगी पिफल्मों के +निर्माण के लिए सक्रिय अभियान चलाया जाएगा। +कार्यानुभव +8.14 कार्यानुभव को, सभी स्तरों पर दी जाने वाली शिक्षा का एक आवश्यक अंग होना +चाहिए। कार्यानुभव एक ऐसा उद्देश्यपूर्ण और सार्थक शारीरिक काम है जो सीखने की प्रक्रिया का +अनिवार्य अंग है जिससे समाज को वस्तुएँ या सेवाएँ मिलती हैं। यह अनुभव एक सुसंगठित और क्रमबद्ध +कार्यक्रम के द्वारा दिया जाना चाहिए। कार्यानुभव की गतिविधियाँ विद्यार्थियों की रूचियों, योग्यताओं +और आवश्यकताओं पर आधारित होंगी। शिक्षा के स्तर के साथ ही कुशलताओं और ज्ञान के स्तर में +वृद्धि होती जाएगी। इसके द्वारा प्राप्त किया गया अनुभव आगे चलकर रोजगार पाने मेंं बहुत सहायक +होगा। माध्यमिक स्तर पर दिए जाने वाले पूर्व-व्यावसायिक कार्यक्रमों से उच्चतर माध्यमिक स्तर पर +व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के चुनाव में सहायता मिलेगी। +शिक्षा और पर्यावरण +8.15 पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने की बहुत जरूरत है और यह जागरूकता बच्चों +से लेकर समाज के सभी आयुवर्गों और क्षेत्रों में पफैलनी चाहिए। पर्यावरण के प्रति जागरूकता विद्यालयों +और कॉलेजों की शिक्षा का अंग होनी चाहिए। इसे शिक्षा की पूरी प्रक्रिया में समाहित किया जाएगा। +गणित-शिक्षण +8.16 गणित को एक ऐसा साधन माना जाना चाहिए जो बच्चों को सोचने, तर्क करने, +विश्लेषित करने और अपनी बात को तर्कसंगत ढंग से प्रकट करने में समर्थ बना सकता है। एक विशिष्ट +विषय होने के अतिरिक्त गणित को ऐसे किसी भी विषय का सहवर्ती माना जाना चाहिए जिसमें +विश्लेषण और तर्कशक्ति की जरूरत होती है। +8.17 अब विद्यालयों में भी कम्प्यूटरों का प्रवेश होने लगा है। इससे शैक्षिक कम्प्यूटरी का +मौका मिलेगा। कार्यकारण संबंध की ओर चरों की पारस्परिक क्रिया को समझने और सीखने की प्रक्रिया +को नई दिशा मिलेगी। गणित शिक्षण को इस प्रकार सेपुनर्गठित किया जाएगा कि वह आधुनिक +टेक्नॉलाजी के उपकरणों के साथ जुड़ सके। +विज्ञान शिक्षा +8.18 विज्ञान शिक्षा को सुदृढ़ किया जाएगा ताकि बच्चोंमें जिज्ञासा की भावना, +सृजनात्मकता, वस्तुगतता, प्रश्न करने का साहस और सौंदर्यबोध जैसी योग्यताएं और मूल्य विकसित हो +सकें। +8.19 विज्ञान शिक्षा के कार्यक्रमों को इस प्रकार बनाया जाएगा कि उनसे विद्यार्थियों में +समस्याओं को सुलझाने और निर्णय करने की योग्यताएँउत्पन्न हो सकें और वे स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग +तथा जीवन के अन्य पहलुओं के साथ विज्ञान के सम्बन्ध को समझ सकें। जो लोग अब तक औपचारिक +शिक्षा के दायरे के बाहर रहे हैं उन तक विज्ञान की शिक्षा को पहुंचाने का हर सम्भव प्रयास किया +जाएगा। +खेल और शारीरिक शिक्षा +8.20 खेल और शारीरिक शिक्षा सीखने की प्रक्रिया के अभिन्न अंग हैं और इन्हें विद्यार्थियों +की कार्यसिद्धि के मूल्यांकन में शामिल किया जाएगा। शारीरिक शिक्षा और खेल-कूद की राष्ट्रव्यापी +अधोरचना ;इन्Úास्ट्रक्चरद्ध को शिक्षा व्यवस्था का अंग बनाया जाएगा। +8.21 इस अधोरचना के तहत खेल के मैदानों और उपकरणों की व्यवस्था की जाएगी। +शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों की नियुक्ति होगी। शहरों में उपलब्ध खुले क्षेत्र खेलों के मैदान के लिए +आरक्षित किए जाएंगे और यदि आवश्यक हुआ तो इसके लिए वैधानिक कार्यवाई की जाएगी। ऐसा खेल +संस्थाएँ और छात्रावास स्थापित किए जाएंगे जहाँ आम शिक्षा के साथ-साथ खेलों की गतिविधियों और +उनसे संबद्ध अध्ययन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। खेलकूदमें प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को उपयुक्त +प्रोत्साहन दिया जाएगा। भारत के पारम्परिक खेलों पर उचित बल दिया जाएगा। शरीर और मन के +समेकित विकास के साधन के रूप में योग शिक्षा पर विशेष बल दिया जाएगा। सभी विद्यालयों में योग +की शिक्षा की व्यवस्था के लिए प्रयास किए जाएंगे और इस दृष्टि से शिक्षक-प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में +योग की शिक्षा भी सम्मिलित की जाएगी। +युवावर्ग की भूमिका +8.22 शैक्षिक संस्थाओं के माध्यम से और उनके बाहर भी युवाओं को राष्ट्रीय और सामाजिक +विकास के कार्य में सम्मिलित होने के अवसर दिए जाएंगे।इस समय राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट +कोर आदि जो योजनाएँ चल रही हैं उनमें से किसी एक में भाग लेना विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य +होगा। संस्थाओं के बाहर भी युवाओं को विकास, सुधार और विस्तार के कार्य शुरू करने के लिए +प्रोत्साहित किया जाएगा। राष्ट्रीय सेवाकर्मी योजना को सुदृढ़ किया जाएगा। +मूल्यांकन प्रक्रिया और परीक्षा में सुधार +8.23 विद्यार्थियों के कार्य का मूल्यांकन सीखने और सिखाने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। +एक अच्छी शैक्षिक नीति के अंग के रूप में शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए परीक्षाओं का उपयोग +होना चाहिए। +8.24 परीक्षा में इस प्रकार सुधार किया किया जाएगा जिससे कि मूल्यांकन की एक वैध और +विश्वसनीय प्रक्रिया उभर सके और वह सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में एक सशक्त साधन के रूप +में काम कर सके। क्रियात्मक रूप में इसका अर्थ होगा। +और शास्त्रेत्तर पहलू समाविष्ट हो जाएँ और जो शिक्षण की पूरी अवधि में व्याप्त रहें। +उपयोग। +8.25 ये उद्देश्य बाह्य परीक्षाओं और शिक्षा-संस्थाओंके अन्दर के मूल्यांकन दोनों के लिए +प्रासंगिक हैं। संस्थागत मूल्यांकन की प्रणाली को सरल बनाया जाएगा और बाहरी परीक्षाओं की प्रचुरता +को कम किया जाएगा। +भाग 9. +शिक्षक +9.1 किसी समाज में अध्यापकों के दर्जे से उसकी सांस्कृतिक-सामाजिक दृष्टि का पता लगता +है। कहा गया है कि कोई भी राष्ट्र अपने अध्यापकों केस्तर से ऊपर नहीं उठ सकता। सरकार और +समाज को ऐसी परिस्थितियाँ बनानी चाहिए जिनसे अध्यापकों को निर्माण और सृजन ओर बढ़ने की +प्रेरणा मिले। अध्यापकों को इस बात की आजादी होनी चाहिए कि वे नये प्रयोग कर सकें और संप्रेषण +की उपयुक्त विधियाँ और अपने समुदाय की समस्याओं और क्षमताओं के अनुरूप नये उपाय निकाल +सकें। +9.2 अध्यापकों को भर्ती करने की प्रणाली में इस प्रकार परिवर्तन किया जाएगा कि उनका +चयन उनकी योग्यता के आधार पर व्यक्ति-निरपेक्ष रूप से और उनके कार्य की अपेक्षाओं के अनुरूप +हो सके। शिक्षकों का वेतन और सेवा की शर्तें उनकेसामाजिक और व्यावसायिक दायित्व के अनुरूप +हों और ऐसी हों जिनसे प्रतिभाशाली व्यक्ति शिक्षक-व्यवसाय की ओर आकृष्ट हों। यह प्रयत्न किया +जाएगा कि पूरे देश में वेतन में, सेवा शर्तों में और शिकायतें दूर करने की व्यवस्था में समानता का +वांछनीय उद्देश्य प्राप्त किया जा सके। अध्यापकों की तैनाती और तबादले में व्यक्ति-निरपेक्षता लाने के +लिए निर्देशक सिद्धान्त बनाए जाएंगे। उनके मूल्यांकन की एक पद्धति तय की जाएगी जो प्रकट होगी, +आंकड़ों एवं तथ्यों पर आधारित होगी और जिसमें सबका योगदान होगा। ऊपर के ग्रेड में तरक्की के +लिए शिक्षकों को उचित अवसर दिए जाएंगे। जवाबदेही केमानक तय किए जाएंगे। अच्छे कार्य को +प्रोत्साहित और निष्क्रियता को निरूत्साहित किया जाएगा। शैक्षिक कार्यक्रमों के बनाने और उन्हें +क्रियान्वित करने में अध्यापकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका बनी रहेगी। +9.3 व्यावसायिक प्रामाणिकता की हिमायत करने, शिक्षक कीप्रतिष्ठा को बढ़ाने और +व्यावसायिक दुर्व्यवहार को रोकने में शिक्षक-संघों को अहम् भूमिका निभानी चाहिए। शिक्षकों के राष्ट्रीय +संघ शिक्षकों के लिए एक व्यावसायिक आचार-संहिता बनासकते हैं और उसका अनुपालन करा सकते +हैं। +अध्यापकों की शिक्षा +9.4 अध्यापकों की शिक्षा एक सतत् प्रक्रिया है और इसकेसेवापूर्व और सेवाकालीन अंशों +को अलग नहीं किया जा सकता। पहले कदम के रूप में अध्यापकों की शिक्षा की प्रणाली को आमूल +बदला जाएगा। +9.5 अध्यापकों की शिक्षा के नये कार्यक्रम में सतत् शिक्षा पर और इस शिक्षा-नीति में नई +दिशाओं के अनुसार आगे बढ़ने की आवश्यकता पर बल होगा। +9.6 ‘जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान’ स्थापित किए जाएंगे जिनमें प्राथमिक विद्यालयों के +अध्यापकों की और अनौपचारिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था +होगी। इन संस्थानों की स्थापना के साथ बहुत सी घटिया प्रशिक्षण संस्थाओं को बन्द किया जाएगा। कुछ +चुने हुए माध्यमिक अध्यापक-प्रशिक्षण कॉलेजों का दर्जाबढ़ाया जाएगा ताकि वे राज्य शैक्षिक +अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थानों के पूरक के रूप में काम कर सकें। राष्ट्रीय अध्यापक-शिक्षा परिषद् +को सामर्थ्य और साधन दिए जाएंगे जिससे यह परिषद् अध्यापक-शिक्षा की संस्थाओं को मान्यता देने के +लिए अधिकारिक हो और उनके शिक्षाक्रम और पद्धतियों के बारे में मार्गदर्शन कर सके। अध्यापक +शिक्षा की संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के शिक्षा-विभागों में आपस में मिलकर काम करने की +व्यवस्था की जाएगी। +भाग 10. +शिक्षा का प्रबंध +10.1 शिक्षा की आयोजना और प्रबन्ध की व्यवस्था के पुनर्गठन को उच्च प्राथमिकता दी +जायेगी। इस सम्बन्ध में जिन सिद्धांतों को ध्यान में रखा जायेगा वे निम्नलिखित हैं- +विकासात्मक और जनशक्ति विषयक आवश्यकताओं से जोड़ना। +प्रयास शामिल हैं। +राष्ट्रीय स्तर +10.2 केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड शैक्षिक विकास का पुनरावलोकन करेगा, शिक्षा व्यवस्था +में सुधार के लिए आवश्यक परिवर्तनों को सुनिश्चित करेगा और कार्यान्वयन सम्बन्धी देखरेख में +निर्णायक भूमिका अदा करेगा। बोर्ड उपयुक्त समितियों के माध्यम से एवं मानव संसाधन विकास के +विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क तथा समन्वयन के लिए बनाए गए प्रक्रमों के माध्यम से कार्य करेगा। केन्द्र +तथा राज्यों के शिक्षा विभागों को सुदृढ़ बनाने के लिए इनमें व्यावसायिक दक्षता रखने वाले व्यक्तियों +को लाया जाएगा। +भारतीय शिक्षा सेवा +10.3 शिक्षा के प्रबंध में उपयुक्त ढांचे के निर्माण केलिए तथा इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लाने +के लिए यह आवश्यक होगा कि भारतीय शिक्षा सेवा का एकअखिल भारतीय सेवा के रूप में गठन +किया जाये। इस सेवा से सम्बन्धित बुनियादी सिद्धान्तों, कर्त्तव्यो, तथा नियोजन की विधि की बाबत +निर्णय राज्य सरकारों के परामर्श से किया जायेगा। +राज्य स्तर +10.4 राज्य सरकारें केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की तरह के राज्य शिक्षा सलाहकार बोर्ड +स्थापित करेंगीं। मानव संसाधन विकास के संबंधित राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के समाकलन के +लिए कारगर उपाय किए जाने चाहिए। +10.5 शैक्षिक आयोजकों, प्रशासकों और संस्थाध्यक्षों के प्रशिक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया +जाएगा। इस प्रयोजन के लिए उचित चरणों में संस्थागत प्रबन्ध किए जाने चाहिए। +जिला तथा स्थानीय स्तर +10.6 उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का प्रबंध करने के लिए जिला शिक्षा बोर्डों की +स्थापना की जाएगी तथा राज्य सरकारें यथाशीघ्र इस संबंध में कार्रवाई करेंगी। शैक्षिक विकास के +विभिन्न स्तरों पर आयोजना, समन्वयन, मानिटरिंग तथा मूल्यांकन में केन्द्रीय, राज्य, जिला तथा स्थानीय स्तर की एजेंसियां सहभागिता निभायेंगी। +10.7 शिक्षा व्यवस्था में संस्थाध्यक्षों की भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए। उनके चयन +तथा प्रशिक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया जायेगा। लचीला रवैया अपनाते हुए विद्यालय संगमों ;स्कूल +काम्पलेक्सेजद्ध को विकसित किया जायेगा ताकि वे शिक्षा संस्थाओं के आपसी तानेबाने ;नेटवर्कद्ध का +माध्यम बनें, तथा शिक्षकों की व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने और उनके द्वारा कर्त्तव्यनिष्ठा के मानदण्डों के +पालन में सहायक हों। साथ ही विद्यालय संगमों के द्वारा, संबधित संस्थाओं के लिए अनुभवों का आपसी +आदान-प्रदान करना, तथा एक दूसरे की सुविधाओं में साझेदारी का रिश्ता बनाना संभव होना चाहिए। +यह अपेक्षा की जा सकती है कि विद्यालय संगमों की व्यवस्था के बनने के साथ वे निरीक्षण कार्य का +ज्यादातर जिम्मा संभाल लेंगें। +10.8 उपयुक्त निकायों के माध्यम से स्थानीय लोग विद्यालय सुधार कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण +भूमिका निभाएंगे। +स्वैच्छिक एजेन्सियाँ तथा सहायता प्राप्त संस्थाएँ +10.9 गैर-सरकारी तथा स्वैच्छिक प्रयासों को, जिनमें समाजसेवी सक्रिय समुदाय भी शामिल +हैं, प्रोत्साहन दिया जाएगा और वित्तीय सहायता भी मुहÕया करवाई जाएगी बशर्तें कि उनकी प्रबंध +व्यवस्था ठीक हो। इसके साथ ही ऐसी संस्थाओं को रोका जाएगा जो शिक्षा को व्यापारिक रूप दे रही +हैं। +भाग 11. +संसाधन तथा समीक्षा +11.1 शिक्षा आयोग (1964-66), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968) और शिक्षा से संबंधित अन्य +सभी लोगों ने इस बात पर बल दिया है कि हमारे समतावादी उद्देश्यों और व्यावहारिक तथा +विकासोन्मुख लक्ष्यों को तभी प्राप्त किया जा सकता है जब कि इस कार्य के स्वरूप और आयामों के +अनुरूप शिक्षा में पूँजी निवेश हो। +11.2 जिस हद तक सम्भव होगा, इन विभिन्न तरीकों से साधन जुटाए जाएंगे-चंदा इकट्ठा +करना, इमारतों का रख-रखाव तथा रोजमर्रा काम में आने वाली वस्तुओं की पूर्ति में स्थानीय लोगों की +मदद लेना, उच्च शिक्षा स्तर पर पफीस बढ़ाना तथा उपलब्ध साधनों का बेहतर उपयोग करना। वे संस्थाएँ +जो अनुसंधान में या वैज्ञानिक जनशक्ति के विकास के क्षेत्र में काम कर रही हैं, अपने काम का उपयोग +करने वाली एजेंसियों पर उपकर या प्रभार लगा कर कुछ साधन जुटा सकती हैं। इन एजेंसियों में सरकार +और उद्योगों को शामिल किया जा सकता है। ये सभी उपाय न केवल राज्य संसाधनों पर बोझ को कम +करने के लिये किये जाएंगे, अपितु शैक्षिक प्रणाली मेंजनता के प्रति जवाबदेही की व्यापक भावना को +पैदा करने के लिए भी कारगर होंगे। तथापि, साधनों की समूची वित्तीय आवश्यकता के मुकाबले में इन +उपायों से थोड़े ही अंश में योगदान हो पाएगा। वास्तव में सरकार तथा देशवासियों को ही मिलकर इस +प्रकार के कार्यक्रमों के लिये वित्तीय साधन जुटाने होंगे, यथा प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वजनीकरण, +निरक्षरता निवारण, देश भर में सभी वर्गों के लिये समान शैक्षिक अवसर प्रदान करना, शिक्षा की +सामाजिक दृष्टि से प्रासंगिकता बढ़ाना, शैक्षिक कार्यक्रमों की गुणवत्ता और कार्यात्मकता में वृद्धि करना, +ज्ञान तथा वैज्ञानिक क्षेत्रों में स्वयं-स्पफूर्त आर्थिक विकास के लिए प्रौद्योगिकी का विकास, राष्ट्रीय +अस्मिता बनाए रखने के लिये अनिवार्य माने गये मूल्यों के प्रति चेतन जागरूकता पैदा करना। +11.3 शिक्षा में आवश्यक पूँजी न लगाने या अपर्याप्त मात्रा में लगाने के हानिकारक परिणाम +वास्तव में बहुत गम्भीर हैं। इसी तरह, व्यावसायिक तथा तकनीकी शिक्षा और अनुसंधान की उपेक्षा से +होने वाली हानि अस्वीकार्य होगी। इन क्षेत्रों में पूरी तरह संतोषप्रद स्तर के कार्य का निष्पादन न होने से +हमारे देश की अर्थव्यवस्था को अपरिहार्य क्षति होगी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रयोग को सुचारू +बनाने के लिये स्वतन्त्रता से अब तक समय-समय पर गठित संस्थाओं के नेटवर्क को पर्याप्त मात्रा में +और तत्परता से आधुनिक बनाने की जरूरत होगी क्योंकि ये संस्थाएँ बड़ी तेजी से पुरानी पड़ती जा रही +हैं। +11.4 इन अनिवार्यताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षाको राष्ट्रीय विकास और पुनरूत्थान के +लिये पूँजी लगाने का एक अत्यंत आवश्यक क्षेत्र माना जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में यह +निर्धारित किया गया था कि शिक्षा पर होने वाले निवेश को धीरे-धीरे बढ़ाया जाए ताकि वह यथाशीघ्र +राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत तक पहुंच सके। चूंकि तब से अब तक शिक्षा पर लगी पूँजी का स्तर उस +लक्ष्य से कापफी कम रहा है, अतः यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि अब इस नीति में निर्धारित कार्यक्रमों की +वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अधिक दृढ़संकल्प दर्शाया जाए। यद्यपि समय-समय पर +विभिन्न कार्यक्रमों की प्रगति के जायजे के आधार पर वास्तविक आवश्यकताओं का अनुमान लगाया +जाएगा, पर इस नीति के कार्यान्वयन में पूँजी निवेश जिसहद तक जरूरी होगा, उस हद तक सातवीं +पंचवर्षीय योजना में ही बढ़ाया जाएगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि आठवीं पंचवर्षीय योजना से +शुरू करके यह वह राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत से सर्वदा अधिक हो। +समीक्षा +11.5 नई शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं के कार्यान्वयन की समीक्षा प्रत्येक पांच वर्षों में +अवश्य ही की जाएगी। कार्यान्वयन की प्रगति और समय-समय पर उभरती हुई प्रवृत्तियों की जांच करने +के लिये मध्यावधि मूल्यांकन भी होंगे। +विष्य + +सबके लिए सुन्दर आवाजें: +सबके लिए सुन्दर आवाजें कवि नरेश अग्रवाल द्वारा रचित एक काव्य पुस्तक हैं। यह सन २००६ में प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। +विडम्बना +
+चिनार के पेड़ + +हिन्दी उपन्यास का इतिहास: +भारतेन्दु युग. +इस युग का नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर रखा गया था ।इसी युग में हिंदी में पहली उपन्यास 'परीक्षा गुरु ' लाला श्रीनिवासदास द्वारा लिखी गयी थी । हिंदी में भारतेंदु से पूर्व जो कथात्मक पुस्तकें लिखी गईं । वे आधुनिक उपन्यास और कहानी से मिलती-जुलती होने पर भी उनसे भिन्न थीं। वास्तव में उपन्यास और कहानी पश्चिमी साहित्य की देन है। भारतेन्दु-युग में जो उपन्यास लिखे गये, उनमें उपन्यास विद्या का उचित निर्वाह न होने के कारण उन्हें सच्चा उपन्यास नहीं कहा जा सकता है। सच तो यह है कि हिन्दी में वास्तविक उपन्यास की रचना सर्वप्रथम प्रेमचन्द ने ही की। यों, ऐतिहासिक दृष्टि से लाला श्रीनिवास दास का ‘परीक्षा-गुरु’ (1882 ई.) ही हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता है। यह पश्चिमी उपन्यास की शैली पर आधारित है और यथार्थ जीवन का चित्र भी प्रस्तुत करता है, परन्तु कला की दृष्टि से बहुत अपरिपक्व है। इसमें उपदेश की प्रवृत्ति प्रधान है। +‘परीक्षा-गुरु’ के पूर्व भी ‘देवरानी-जेठानी’ (1872 ई.) ‘रीति-रत्नाकर’, ‘वामा शिक्षक’, ‘भाग्यवती’ आदि कुछ उपन्यास जैसी कथा-पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं परन्तु वे भी मुख्यतः शिक्षात्मक तथा अपरिपक्व हैं। भारतेन्दु ने भी 1866 ई. में कहानी ‘कुछ आप बीती कुछ जग बीती’ लिखने का यत्न किया था और ‘चन्द्र प्रभा और पूर्ण प्रकाश शीर्षक मराठी उपन्यास का अनुवाद व संशोधन भी किया था। उनकी प्रेरणा से राधा चरण गोस्वामी, गदाधर सिंह, राधाकृष्णदास, प्रतापनारायण मिश्र आदि ने बंगला के बहुत से उपन्यासों का हिन्दी में अनुवाद किया और मौलिक उपन्यास भी लिखे। इन लेखकों के अतिरिक्त बाबू कार्तिकप्रसाद खत्री, रामकृष्ण वर्मा आदि और भी कई लेखकों ने बंगला उपन्यासों का अनुवाद किया। अंग्रेजी से भी कुछ उपन्यासों का अनुवाद हुआ। +भारतेन्दु काल के मौलिक कथा-ग्रन्थों और उपन्यासों में महत्वपूर्ण हैं : ठाकुर जगमोहन सिंह का ‘श्याम स्वप्न’ (काव्यात्मक गद्य-कथा), पं. बालकृष्ण भट्ट रचित ‘नूतन ब्रह्मचारी’ तथा ‘सौ अजान और एक सुजान’ किशोरी लाल गोस्वामी का ‘स्वर्गीय कुसुम’, राधाचरण गोस्वामी का ‘विधवा-विपत्ति’, राधाकृष्ण दास का ‘निस्सहाय हिन्दू’, अयोध्यासिंह उपा +द्विवेदी युग. +द्विवेदी युग में भी मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के उपन्यासों का प्रकाशन हुआ। इस समय अधिकतर तिलस्म, ऐयारी, जासूसी और रोमांस के कथानक प्रस्तुत किए गए। उपन्यास घटना-प्रधान बना रहा। अंग्रेजी से भी साहसिक, जासूसी तथा प्रेमचर्या-प्रधान उपन्यासों का अनुवाद हुआ। इस युग के तीन उपन्यासकार बहुत प्रसिद्ध हैं : देवकीनन्दन खत्री, किशोरीलाल गोस्वामी और गोपालराम गहमरी। खत्री जी ने ‘चन्द्रकांता’, ‘चन्द्रकांता-संतति’ तथा ‘भूतनाथ’ नामक तिलस्म और ऐयारी के रोचक उपन्यास कई भागों में प्रकाशित किए। इन उपन्यासों के पहले भी भारतेन्दु काल में उन्होंने ‘नरेन्द्रमोहनी’, वीरेन्द्र वीर’ आदि उपन्यास लिखे थे। हरेकृष्ण जोहरी आदि कई लेखकों ने उनके अनुकरण पर तिलस्मी उपन्यास लिखे। बहुत लोगों ने उनके मनोरंजक उपन्यास पढ़ने के लिए ही हिन्दी सीखी। +किशोरीलाल गोस्वामीने सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। गोस्वामी जी के सामाजिक उपन्यास वस्तुतः नाम के ही सामाजिक हैं। उनमें समाज की बहुत ही स्थूल और ऊपरी झलक है, यथार्थ चित्रण नहीं। उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में इतिहास के तथ्यों का उचित निर्वाह नहीं हुआ। देशकाल का भी ध्यान उन्होंने कहीं-कहीं नहीं रखा। कुछ उपन्यासों में समाज की कुरीतियों पर प्रहार करने का यत्न किया गया और यत्र-तत्र राष्ट्र-प्रेम की भावना भी है। परन्तु गोस्वामी जी के अधिकांश उपन्यास उत्तेजक शृंगार से युक्त हल्के मनोरंजन के साधन हैं। गोस्वामी जी ने लगभग पैंसठ उपन्यास लिखे हैं। उनमें कुछ उपन्यासों के नाम हैं ‘कुसुमकुमारी’, ‘हृदयहारिणी’, ‘लबंगलता’, ‘रजिया बेगम’, ‘तारा’, ‘कनक कुसुम’, ‘मल्लिका देवी’, ‘राजकुमारी’, लखनऊ की कब्र’, ‘चपला’, ‘प्रेममयी’। जैसा कि नामों में प्रकट है ये उपन्यास नारी-प्रधान और शृंगारिक हैं। वास्तव में उनमें समाज और इतिहास के संदर्भ में कामुकता तथा विलासिता का अंकन हुआ है। उन्होंने ‘उपन्यास’ नामक पत्रिका भी निकाली थी जिसमें उनके पैंसठ छोटे-बड़े उपन्यास प्रकाशित हुए थे। आचार्य शुक्ल ने गोस्वामी जी के सम्बन्ध में लिखा है कि ‘इस द्वितीय उत्थानकाल के भीतर उपन्यासकार इन्हीं को कह सकते हैं, परन्तु वस्तुतः उपन्यासकार की सच्ची प्रतिभा इनमें भी नहीं है।’ +गोपालराम गहमरी ‘जासूस’ नामक पत्रिका प्रकाशित करते थे, जिसमें उनके साठ के लगभग उपन्यास छपे। अंग्रेजी के जासूसी उपन्यासों के अनुकरण पर उन्होंने ‘जासूस की भूल’, ‘घर का भेदी’, ‘अद्भुत खून’, ‘भोजपुर की ठगी’, आदि रहस्यपूर्ण, साहसिक और डकैती तथा ठगी की कथाएं निर्मित कीं। वैसे उन्होंने जासूसी उपन्यासों के क्षेत्र में भी आदर्श के निर्वाह और लोकोपकार की भावना के समावेश का यत्न किया और आदर्श जासूसों की सृष्टि की। गहमरी जी ने वंगला से गृहस्थ जीवन-सम्बन्धी कुछ उपन्यासों का अनुवाद भी किया था। दूसरी ओर द्विवेदी युग में कुछ ऐसे उपन्यासकार भी हुए, जिन्होंने अपनी रचनाओं में नैतिकता का ध्यान रखते हुए स्वच्छ-स्वस्थ सामग्री प्रस्तुत की। इस तरह के उपन्यासकारों में उल्लेखनीय हैं : हरिऔध, लज्जाराम मेहता और ब्रजनन्दन सहाय। हरिऔध जी ने ‘ठेठ हिन्दी का ठाठ’ और ‘अधखिला फूल’ लिखकर इनमें मुहावरेदार ठेठ भाषा का नमूना भी पेश किया। मेहता जी ने सुधारवादी दृष्टिकोण से ‘आदर्श हिन्दू’, ‘आदर्शदम्पति’ और ‘हिन्दू गृहस्थ आदि उपन्यास लिखे। ब्रजनन्दन सहाय के ‘सौन्दर्योपासक’ में काव्य का आनन्द मिलता है। स्पष्ट है कि गोस्वामी जी, गहमरी जी और खत्री जी के उपन्यासों में जहाँ स्थूल सौन्दर्य और उत्तेजक शृंगारिकता प्रस्तुत है वहाँ इन उपन्यासकारों के ग्रन्थ ‘उपदेशात्मक भावना की छटा दिखाने वाले या काव्यात्मक है। मानव चरित्र और मानव जीवन के सच्चे चित्रण और उपन्यास-काल की पूर्णता की ओर इस समय तक किसी का भी यथोचित ध्यान नहीं गया था। इस काल में किशोरीलाल गोस्वामी के अतिरिक्त कुछ और लेखकों ने भी ऐतिहासिक उपन्यास लिखें। इनमें उल्लेखनीय हैं : गंगाप्रसाद गुप्त का ‘वीर पत्नी’ और ‘मिश्रबंधुओं के विक्रमादित्य’, चन्द्रगुप्त मौर्य’ तथा ‘पुष्य मित्र’। +द्विवेदी युग में भी अधिकतर साधारण जनता के मनोरंजन और मनोविनोद के लिए घटना प्रधान उपन्यास ही लिखे गये। उनमें कथा का रस तो है, किन्तु चरित्र-चित्रण का सौन्दर्य, समाज का सही अंकन और उपन्यास का परिपक्व शिल्प नहीं। इस समय के उपन्यासकारों को न तो मानव-जीवन का और न मानव-स्वभाव का सूक्ष्म एवं व्यापक ज्ञान था और न उपन्यास की कला से ही उनका अच्छा परिचय था। इस काल में अधि कतर प्रेमप्रधान, साहसिक तथा विस्मयकारक (तिलस्मी-जासूसी) उपन्यास ही लिखे गये। ऐतिहासिक, शिक्षात्मक और काव्यात्मक उपन्यास भी लिखे गये, परन्तु कम। पात्र अधिकतर सौंदर्य के प्रति आकर्षित होने वाले विलासी प्रेमी-प्रेमिका और राजकुमार-राजकुमारी हैं या पिफर ऐयार तथा जासूस। इस काल के उपन्यास भारतेन्दु काल के उपन्यासों की अपेक्षा रोचक और मनोरंजक अधिक हैं। शिक्षा देने की प्रवृत्ति भी कम है। प्रतापनारायण मिश्र, गोपालराम गहमरी, ईश्वरीप्रसाद शर्मा, हरिऔध, कार्तिकप्रसाद खत्री, रूपनारायण पाण्डेय, रामकृष्ण वर्मा आदि साहित्यकारों ने बंगला, अंग्रेजी और उर्दू आदि भाषाओं के उपन्यासों का अनुवाद किया। आचार्य शुक्ल का कथन है कि हिन्दी के मौलिक उपन्यास-सृजन पर इन अनुवाद कार्यों का अच्छा प्रभाव पड़ा और इसके कारण हिन्दी उपन्यास का आदर्श काफी ऊँचा हुआ। +प्रेमचन्द युग. +द्विवेदी युग के अन्त तक (1917 ई. तक) हिन्दी के मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के उपन्यास काफी संख्या में लिखे जा चुके थे। मौलिक उपन्यास अनेक प्रकार के और अनेक विषयों पर थे। उपन्यास क्रमशः जीवन और समाज के निकट आ रहा था, परन्तु अब भी उसमें बहुत-सी, त्रुटियां थी। प्रेमचन्द के समय से विशेष कर उनके ‘सेवासदन’ के प्रकाशन काल (सन् 1918 ई.) से हिन्दी-कथा साहित्य में एक नये युग का आरम्भ होता है। प्रेमचंदने ही उपन्यास में मानव मन का स्वाभाविक एवं सजीव अंकन आरम्भ किया। उन्होंने ही पहली बार हिन्दी उपन्यास में घटना और चरित्र का संतुलन स्थापित कर मनोविज्ञान का उचित समावेश किया। उन्होंने ही समाज की समस्याओं को सर्वप्रथम कथा-साहित्य में स्थापित किया। उन्होंने जीवन और जगत के विविध क्षेत्रों का, समाज के विभिन्न वर्गों का ग्रामीण तथा नागरिक क्षेत्रों की बहुत-सी दशाओं तथा परिस्थितियों का सूक्ष्म निरीक्षण कर व्यापक अनुभव प्राप्त किया था। मनोविज्ञान +के वे पंडित थे। मानव-स्वभाव के विविध पक्षों से भली-भांति परिचित थे। उपन्यास-कला का भी उन्हें बहुत अच्छा ज्ञान था। पश्चिम के ताल्सताय, दोस्तोवस्की, तुर्गनेव, गोर्की, अनातोले प्रफांस आदि महान उपन्यासकारों की रचनाओं का भी उन्होंने गम्भीर अध्ययन किया था। +प्रेमचन्द प्रारम्भ में उर्दू के लेखक थे और कहानियां लिखते थे। उर्दू में उनके कुछ उपन्यास भी प्रकाशित हुए थे। बाद में उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया। उनके महत्वपूर्ण उपन्यास हैं : सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान और मंगलसूत्र (अपूर्ण)। प्रेमचन्द उपन्यास को मनोरंजन की वस्तु नहीं मानते थे। वे अपने उपन्यासों द्वारा भारतीय जनता के जागरण और सुधार तथा निर्माण की भावना का प्रसार करना चाहते थे। प्रेमचन्द मानवतावादी सहृदय व्यक्ति थे। वे गरीबी में पले थे, गरीबों के दुःख-दर्द को समझते थे। समाज के निम्न वर्ग से उन्हें सहानुभूति थी। जीवन के अन्तिम समय में, जैसा कि उनके अन्तिम उपन्यासों (‘गोदान’ और ‘मंगलसूत्र’) से प्रकट है, उनका झुकाव साम्यवाद की ओर हो गया था और वे सच्चे अर्थ में यथार्थवादी और प्रगतिशील हो गये थे। अपनी पुस्तकों में प्रेमचन्द ने किसानों की आर्थिक दशा, जमीदारों और पुलिस के अत्याचारों, ग्रामीण जीवन की कमजोरियों, समाज की कुरीतियों, शहरी समाज की कमियों, विधवाओं और वेश्याओं की समस्याओं, नारी की आभूषणप्रियता, मध्यवर्ग की झूठी शान और दिखावे की प्रवृत्ति, सम्मिलित हिन्दू-परिवार में नारी की दयनीय स्थिति आदि प्रश्नों और पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने कई उपन्यासों में गांव और शहर की कहानी, ग्रामीण और नागरिक जीवन की झांकी साथ-साथ प्रस्तुत की है। उनके उपन्यासों में कथानक सुगठित है चरित्र-चित्रण प्रायः मनोविज्ञान के अनुकूल सजीव और स्वाभाविक है। संवाद पात्रों और परिस्थितियों के अनुसार हैं और भाषा सरल एवं व्यवहारिक है। +प्रेमचन्द की उपन्यास-कला की मुख्य विशेषताएं हैं : व्यापक सहानुभूति-विशेषकर शोषित किसान, मजदूर और नारी का सहानुभूतिपूर्ण चित्रण, यथार्थवाद अर्थात् उपन्यास में जीवन का यथार्थ चित्रण, मानव-जीवन और मानव-स्वभाव की अच्छी जानकारी होने से सजीव पात्रों और सजीव वातावरण का निर्माणऋ चरित्र-चित्रण में नाट्कीय कथोपकथनात्मक तथा घटनापरक पद्धतियों का उपयोग, समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि पात्रों की सृष्टि, अपने व्यक्तित्व को पात्रों से पृथक रखकर उन्हें प्रायः अपनी सहज-स्वच्छन्द गति से चलने देना, अनेकानेक सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं का चित्रण, समाज के साथ पारिवारिक जीवन की सुन्दर अभिव्यक्ति, मानव-कल्याण की ओर संकेत करने वाले नैतिक आदर्शों की प्रतिष्ठा और सरल व्यावहारिक भाषा का संग्रह। प्रेमचन्द युग के अन्य उल्लेखनीय उपन्यासकार हैं। विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक, प्रसाद, निराला, सुदर्शन, चतुरसेन शास्त्री, वृन्दावन लाल वर्मा, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, सियारामशरण गुप्त, पांडेय बेचन शर्मा ‘उर्ग्र’, भगवती प्रसाद वाजपेयी, गोविन्दवल्लभ पंत, राहुल सांकृत्यायन और जैनेन्द्र। कोशिक जी के उपन्यास ‘मां’ और भिखारिणी नारी-हृदय का मनोवैज्ञानिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। आचार्य चतुरसेन ने नारी की समस्या पर ‘हृदय की परख’, ‘हृदय की प्यास’, ‘अमर अभिलाषा’ आदि उपन्यास प्रारम्भ में लिखे थे। बाद में उनके बहुत से सामाजिक ऐतिहासिक और वैज्ञानिक उपन्यास प्रकाशित हुए। उनके कुछ उल्लेखनीय उपन्यास हैं : ‘गोली’, ‘वैशाली की नगर वधू’ ‘वयं’ रक्षामः’ ‘सोमनाथ’ ‘महालय’, ‘सोना और खून’ तथा ‘खग्रास’। वृन्दावनलाल वर्मा ने इतिहास के तथ्यों की पूर्णतः रक्षा करते हुए कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की है। उन्होंने ‘विराटा की पद्मिनी’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कचनार’, ‘मृगनयनी’, ‘माधवजी सिंधिया’ आदि उच्चकोटि के ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। हिन्दी के कुछ अन्य उल्लेखनीय ऐतिहासिक उपन्यास हैं। जयशंकर प्रसाद का ‘इरावती’ (अधूरा), हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘वाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘चारु चन्द्रलेख’, चतुरसेन का ‘वैशाली की नगरवधू’, ‘राजसिंह’, ‘सोमनाथ’, ‘सह्याद्रि की चट्टानें’, सेठ गोविन्ददास का ‘इन्दुमती’, राहुल सांकृत्यायन के ‘सिंह सेनापति’, ‘जय यौधेय’, सत्यकेतु दिद्यालंकार का ‘आचार्य चाणक्य’, रांगेय राघव का ‘अंधा रास्ता’, उमाशंकर का ‘नाना फड़नवीस’ तथा ‘पेशवा की कंचना’। +प्रसाद जी ने ‘इरावती’ के पहले ‘कंकाल’ और ‘तितली’ नामक दो उपन्यास और लिखे थे, ‘कंकाल’ में हिन्दू नारी की असहाय स्थिति और धार्मिक पाखंड पर प्रकाश डाला गया है। ‘तितली’ में नारी-हृदय की महत्ता के उद्घाटन के साथ-साथ ग्राम-सुधार और यथास्थिति के विरुद्ध आन्दोलन की भावना है। प्रसाद जी मूलतः कवि हैं। उनके उपन्यासों में भी प्रायः जीवन की काव्यात्मक और भावपूर्ण व्याख्या मिलती है। निराला जी ने भी ‘अप्सरा’ ‘अल्का’, ‘निरूपमा’ आदि उपन्यास लिखे। इनके उपन्यासों में भी प्रसाद जी की भांति रोमांटिक वातावरण है। नारी को निराला जी ने महत्वपूर्ण स्थान दिया है। श्री प्रतापनारायण श्रीवास्तव के प्रारम्भिक उपन्यासों में ‘विदा’, ‘विसर्जन’ और ‘विजय’ उल्लेखनीय हैं। +सियारामशरण गुप्तके ‘गोद’, ‘अन्तिम आकांक्षा’ और ‘नारी’ उपन्यासों में नारी-जीवन और उसकी सामाजिक स्थिति का मार्मिक अंकन हुआ है। साधारण मनुष्य में भी उच्च गुण दिखाने में गुप्त जी निपुण है। पांडेय बेचन शर्मा ‘उर्ग्र’ के प्रारम्भिक उपन्यासों में पत्रात्मक शैली में लिखे ‘चन्द हसीनों के खतूत’ का विशिष्ट स्थान है। इसमें हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रश्न उपस्थित करते हुए प्रेम का महत्व दिखाया गया है। उनके ‘दिल्ली का दलाल’, ‘बुधुआ की बेटी’, ‘जीजी जी’ आदि उपन्यासों में दुष्टों द्वारा भोली युवतियों को फंसाएं जाने की कथाएं हैं। सभ्य समाज की भीतरी दुर्बलताओं और दुष्प्रवृत्तियों का उन्होंने अच्छा उद्घाटन किया है। भगवती प्रसाद वाजपेयीके ‘प्रेममयी’, ‘अनाथ स्त्री’, ‘त्यागमयी’, ‘पतिता की साधना’ आदि शुरू के उपन्यासों में स्त्री-पुरुष के रूपाकर्षण और प्रेम के चित्र हैं। उनके ‘गुप्त धन’, ‘चलते-चलते’, ‘पतवार’, ‘उनसे न कहना’, ‘रात और प्रभाव’, ‘टूटते बन्धन’ आदि कई उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। गोविन्दवल्लभ पंतके ‘सूर्यास्त’, ‘प्रतिमा’, आदि उपन्यास काफी पहले प्रकाशित हुए थे। बाद में भी उनके ‘जल समाधि’, ‘नारी के सपने’, ‘मैत्रेय’ आदि उपन्यास निकले हैं। +जैनेन्द्र के परख (सन् 1929 ई.) से हिन्दी उपन्यास के क्षेत्र में एक नई प्रवृत्ति का आरम्भ होता है। वस्तुतः यह उपन्यास एक लम्बी कहानी है जिसमें कट्टो नाम की देहातिन बालविधवा के भावुकतापूर्ण आत्मसमर्पण का चित्रण किया गया है। जैनेन्द्र ने आगे चलकर कई महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक उपन्यास ‘सुनीता’, ‘सुखदा’, ‘त्यागपत्र’, विवर्त्त’ आदि लिखे, जिनमें प्रायः स्त्री का पर-पुरुष की ओर झुकाव दिखाकर आधुनिक नारी के कु +ण्ठाग्रस्त मन पर प्रकाश डाला है। मनोविश्लेषण की इस प्रवृत्ति का विकास किया इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेयने। प्रेमचन्द काल के उत्तरार्ध में इस क्षेत्र में आने वाले अन्य प्रतिभाशाली उपन्यासकार हैं। ऋषभचरण जैन (कैंदी गदर, भाई, भाग्य, रहस्यमयी, तपोभूमि, बादशाह की बेटी, सत्याग्रह, दिल्ली का व्यभिचार आदि), भगवतीचरण वर्मा (पतन, तीन वर्ष, चित्रलेखा, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, सबहिं नचावत राम गुसाईं) राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह (राम-रहीम, पुरुष और नारी, टूटा तारा, सूरदास, संस्कार आदि) +इस काल में जो उपन्यास लिखे गए, उन्हें चार वर्गों में विभिक्त किया जा सकता है : यथार्थवादी सामाजिक उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास, स्वच्छन्दतापरकउपन्यास और मनोवैज्ञानिकउपन्यास। उपन्यास-लेखन की बहुत-सी शैलियों (ऐतिहासिक, आत्मकथात्मक, पत्रात्मक आदि) का प्रयोग हुआ है। इस काल में यूरोप की अनेक समृद्ध भाषाओं (रूसी, अंग्रेजी, प्रफांसीसी आदि) से उपन्यासों का अनुवाद भी हुआ। +प्रेमचन्दोत्तर युग. +प्रेमचन्द के बाद हिन्दी उपन्यास कई मोड़ों से गुजरता हुआ दिखाई पड़ता है। सन् ‘40 से’ 50 तक की कालावधि के उपन्यास मुख्यतः प्रफायड और मार्क्स की विचारधारा से, सन् ‘50 से’ 60 तक के उपन्यास प्रयोगात्मक विशेषताओं से और सन् ‘60 से अब तक के उपन्यास आधुनिकतावादी विचारधारा से प्रभावित हैं। प्रेमचन्द समाज की स्वीकृत मान्यताओं के भीतर संघर्ष करते रहे। किन्तु प्रथम महायुद्ध के बाद पश्चिम के पुराने मूल्यों का तेजी के साथ विघटन हुआ। प्रफायड ने काम-सम्बन्धी मान्यताओं को नैतिकता-अनैतिकता से परे बताकर सामाजिक नैतिकता के आगे प्रश्नचि” लगा दिया। पूंजीवादी समाज में व्यक्ति-चेतना उभर कर सामने आई। मार्क्स ने समष्टि चेतना पर विशेष बल दिया। हिन्दी उपन्यास इन विचारधाराओं से प्रभावित हुए बिना न रहा। फलस्वरूप सन् ‘50 के बाद उपन्यासकारों का ध्यान व्यक्ति और समाज की मुक्ति की ओर गया। किन्तु स्वतंत्रता के बीस वर्षों बाद भी मानव जीवन में एक विशेष प्रकार की कुण्ठा, निराशा, त्रास, अर्थहीनता आदि की अनुभूति होने के कारण सन् ‘60 के बाद के उपन्यासों में इन्हीं मनोदशाओं का चित्रण किया गया। प्रेमचन्द-युग में ही जैनेन्द्र ने प्रफायड से प्रभावित होकर मानव-चरित्र के स्थान पर व्यक्ति-चरित्र की सृष्टि की थी। किन्तु सन् ‘51 में अज्ञेय के ‘शेखर : एक जीवनी’ के प्रकाशन के साथ ही हम उपन्यास की दिशा में एक नया मोड़ पाते हैं। अज्ञेयके तीन उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। : ‘शेखर : एक जीवनी’ (दो भाग), ‘नदी के द्वीप’ और ‘अपने-अपने अजनबी’। पहले दो उपन्यासों में व्यक्तिपात्रों के मनो विश्लेषण की प्रवृत्ति है। तीसरी रचना में कोई सम्बद्ध कथानक नहीं है। अज्ञेय ने उपन्यास को पात्र-प्रधान बनाया और सामाजिक मानव के स्थान पर व्यक्ति-मानव के अन्तर्मन का विश्लेषण करने का यत्न किया। +इलाचन्द्र जोशी को उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा ‘संन्यासी’ (1914) उपन्यास-प्रकाशन के द्वारा मिली। इस उपन्यासो में ही पहली बार मनोविश्लेषणात्मक पद्धति की विकृति देखी जा सकती है। ‘संयासी’ के अतिरिक्त ‘पर्दे की रानी’ (1941), ‘प्रेत और छाया’ ‘निर्वासित’, ‘मुक्तिपथ’ (1950) ‘सुबहके भूले’ (1957), ‘जिप्सी’, ‘जहाज का पंछी’ (1955) और ‘ऋतुचक्र’ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उनके उपन्यासों की विकास-यात्रा में ‘मुक्तिपथ’ एक नए मोड़ की सूचना देता है। ‘मुक्तिपथ’ के पूर्ववर्ती उपन्यास ग्रन्थियों के विश्लेषण पर आधारित है। उनकी भाव-भूमियाँ एकांगी, संकुचित और छोटी हैं। ‘मुक्तिपथ’ तथा उसके बाद जो उपन्यास लिखे गये, उनमें परिदृष्य का विस्तार और सामाजिकता का समावेश दिखाई पड़ता है। +प्रेमचन्दोत्तर उपन्यासकारों में अपनी विशिष्ट विचारधारा, ईमानदारी और सर्जनात्मक शक्ति के कारण यशपालने स्वतंत्र व्यक्तित्व बना लिया। ऐतिहासिक दृष्टि से यशपाल को प्रेमचन्द उपन्यास-परम्परा की अगली कड़ी के रूप में माना जा सकता है। यशपाल का प्रारम्भिक जीवन क्रांतिकारी दल से सम्बद्ध था। वे इसके सक्रिय सदस्य थे, इसके लिए उन्हें चौदह वर्ष का कारावास भी मिला। कारावास काल में उनका सारा समय अध्ययन-मनन में व्यतीत हुआ। इसी समय मार्क्सवादी विचारधारा का इन पर गहरा प्रभाव पड़ा। साहित्य के क्षेत्र में उतरने पर उन्होंने इसी विचारधारा को आगे बढ़ाया। उनके उपन्यास हैं : ‘अमिता’, ‘दिव्या’, ‘दादा कामरेड’ (1941), ‘देशद्रोही’ (1943), ‘पार्टी कामरेड’ (1946), ‘मनुष्य के रूप में’ (1949), ‘झूठा सच’ : प्रथम भाग, ‘वतन और देश’ (1958), दूसरा भाग ‘देश का भविष्य’ (1960)। +रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ यशपाल की परम्परा में आते हैं। चढ़ती धूप, नई इमारत, उल्का और मरुप्रदीप उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। पर इनमें द्वन्द्वात्मक चेतना पूरे तौर पर नहीं उभरती। भगवतीचरण वर्मा प्रेमचन्दीय परम्परा के उपन्यासकार हैं। सन् ‘50 तक यह परम्परा चलती रही प्रेम चन्द ने अपने साहित्य में समसामयिक समस्याओं को चित्रित किया और वर्मा जी परिवर्तमान ऐतिहासिक धारा को मध्यमवर्ग के माध्यम से अंकित करते रहे हैं : मुख्यतः ‘40 के बाद लिखे गये उपन्यासों में। इनमें टेढ़े-मेढ़े रास्ते’, ‘आखिरी दाव’ ‘भूले-बिसरे-चित्र’, ‘सामर्थ्य और सीमा’, ‘सबहिं नचावत राम गुसाईं’, मुख्य हैं। उपेन्द्रनाथ अश्कको प्रेमचन्द-परम्परा का उपन्यासकार कहा जाता है। पर वे समग्र रूप से प्रेमचन्दीय परम्परा से नहीं जुड़ पाते। जहाँ तक मध्यवर्गीय परिवारों और व्यक्तियों की परिस्थितियों, समस्याओं और परिवेश का सम्बन्ध है, वहाँ तक वे प्रेमचन्दीय परम्परा के उपन्यासकार हैं प्रेमचन्द की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी, इसलिए प्रामाणिक भी। प्रेमचन्द के वैविध्य और जीवन-चेतना का इनमें अभाव है। ‘सितारों के खेल’ के बाद इनके कई उपन्यास प्रकाशित हुए हैं : गिरती दीवारें, ‘गर्म राख’ ‘बड़ी-बड़ी आँखे’, पत्थर अल पत्थर’, ‘शहर में घूमता आइना’ और ‘एक नन्हीं किन्दील’। ‘गिरती दीवारें’ इनका सर्वोत्तम उपन्यास है। गर्म राख, बड़ी-बड़ी आँखे, पत्थर अल पत्थर सुगठित उपन्यासों की श्रेणी में रखे जायेंगे। अन्तिम दोनों उपन्यास ‘गिरती दीवारें’ का विस्तार हैं। +प्रेमचन्द के उपन्यासों में सामाजिक समस्याओं के आवर्त में पड़ा व्यक्ति कभी अपने को उनके अनुरूप ढालता है कभी उनसे आहत होता है, कभी छोटे-मोटे सुधारों के द्वारा समाज का परिष्कार करता है। वहाँ समाज प्रधान है, व्यक्ति गौण। मनोवैज्ञानिक उपन्यासकारों ने व्यक्ति की सनकों, अन्तर्द्वन्द्वों को समाज से अधिक महत्व दिया है। +अमृतलाल नागरके उपन्यासों में व्यक्ति और समाज के सापेक्षिक सम्बन्धों को चित्रित किया गया है। ‘नवाबी मसनद’, ‘सेठ बाँकेमल’, ‘महाकाल’, ‘बूंद और समुद्र’, शतरंज के मोहरे’, ‘सुहाग के नूपुर’, ‘एकदा नैमिषारण्ये’ और ‘मानस का हंस’ उनके प्रकाशित उपन्यास हैं। अपने विस्तार और गहराई के कारण ‘बूंद और समुद्र’ विशेष महत्वपूर्ण बन पड़ा है। +‘50 के बाद के दशक को आंचलिक उपन्यासों का दशक मान लिया जाता है। वस्तुतः इस समय के उपन्यासों वैयक्तिकता और सामाजिकता दोनों हैं। वैयक्तिक इसलिए कि वह पुराने नैतिक मूल्यों से मुक्त होकर खुले वातावरण में सांस लेना चाहता है, सामाजिक इसलिए कि अभी समाज को आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र होने में लम्बी मंजिल तय करनी थी। देश के विभाजन के कारण जो नई समस्याएं उत्पन्न हुई, उन्हें भी औपन्यासिक रूप दिया गया। प्रवृत्तिक दृष्टि से इस दशक के उपन्यासों को तीन प्रवृत्तियों में बांटा जा सकता है : ग्रामांचल के उपन्यास, मनोवैज्ञानिक उपन्यास और प्रयोगशील उपन्यास। +ग्रामांचल को ही समग्रता से चित्रित करने वाले उपन्यासों को ही आंचलिक कहकर आंचलिकता के अर्थ को सीमित कर दिया जाता है। फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ के प्रकाशन के पूर्व नागार्जुन का ‘बलचनमा’ (1952) प्रकाशित हो चुका था। पर इसे आंचलिक नहीं कहा गया। यद्यपि इसमें आंचलिकता का कम रंग नहीं है। नागार्जुन के उपन्यासों में दरभंगा-पूर्णिया जिले का राजनीतिक-सांस्कृतिक साक्षात्कार होता है। इनका मार्क्सवादी दृष्टिकोण गाँव की कहानी पर आरोपित प्रतीत होता है। कथानक स्वयं विकसित न होकर पूर्वनिध ार्रित योजना के अनुसार चलता है। इसके फलस्वरूप उपन्यासों की सर्जनात्मकता शिथिल और अवरुद्ध हो जाती है। ‘बलचनमा’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘नई पौध’, ‘बाबा बटेसरनाथ’, ‘दुखमोचन’, ‘वरुण के बेटे’ आदि उनके प्रकाशित उपन्यास हैं। +फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यासों को ही सर्वप्रथम आंचलिक उपन्यास की संज्ञा दी गयी क्योंकि स्वयं रेणु ने ही ‘मैला आंचल’ को आंचलिक उपन्यास कहा। ‘मैला आंचल’ के प्रकाशन के बाद ‘परती परिकथा’ प्रकाशित हुआ। +उदयशंकर भट्ट का ‘सागर, लहरे और मनुष्य’ (1955) में बम्बई के पश्चिमी तट पर बसे हुए बरसोवा गांव के मछुओं की जीवन-गाथा वर्णित है। रांगेय राघव का ‘कब तक पुकारूँ’ में जरायमपेशा नटों की जिन्दगी को उजागर किया गया है। नट-जीवन और आधुनिक जीवन की असंगतियों को चित्रित करते हुए लेखक ने उज्ज्वल भविष्य का संकेत किया है कि शोषण की घुटन सदैव नहीं रहेगी। भैरवप्रसाद गुप्त का ‘सत्ती मैया का चौरा’ मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखा गया ग्रामांचल का ही उपन्यास है। +सातवें दशक में भी ग्रामांचल को आधार बना कर राही मासूम रजा, शिवप्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र आदि ने उपन्यास लिखे। राही का ‘आधा गांव’ शिया मुसलमानों की जिन्दगी पर लिखा गया है और शिवसाद सिंह की ‘अलग-अलग वैतरणी’ में आधुनिकता-बोध को सन्न्विष्ट करने का प्रयास किया गया है। किन्तु इनके मूल स्वर त्रासद (ट्रेजिक) हैं। रामदरश मिश्र के ‘जल टूटता हुआ’ तथा ‘सूखता हुआ तालाब’ और देवेन्द्र सत्यार्थी का ‘रथ के पहिये’ ग्रामांचलीय उपन्यास हैं। श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’ पारंपरिक अर्थ में उपन्यास नहीं हैं। यद्यपि इसकी कथा ग्रामांचल से सम्बद्ध है। पिफर भी यह आंचलिक नहीं है। रिपोर्ताज शैली में लिखे गये इस उपन्यास में स्वतंत्र देश की नवीन व्यवस्थाओं का मखौल उड़ाया गया है। +छठे दशक में देवराज मुख्यतः मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार की श्रेणी में आते हैं। धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ मनोविज्ञान पर आधारित उपन्यास है, यद्यपि वह पांचवे दशक में प्रकाशित हुआ। भारती और देवराज दोनों के उपन्यासों का वातावरण महाविद्यालयीय है। ‘गुनाहों का देवता’ अपनी कैशोर्य भावुकता तथा रूमानियत के कारण काफी लोकप्रिय हुआ। ‘पथ को खोज’, ‘बाहर भीतर’, ‘रोड़े और पत्थर’, ‘अजय की डायरी’ और ‘मैं, वे और आप’ देवराज के उपन्यास हैं। इन सभी उपन्यासों की मूलवर्तिनी धारा है : विवाह के बाहर का प्रेम। +मन्मथनाथ गुप्त, भैरवप्रसाद गुप्त, अमृतराय, लक्ष्मीनारायण लाल, राजेन्द्र यादव आदि नवीन सामाजिक चेतना के उपन्यासकार हैं। भैरवप्रसाद गुप्त के ‘मशाल’, ‘गंगा मैया’, ‘सती मैया का चौरा’, अमृतराय के ‘बीज’, ‘नागफनी का देश’, ‘हाथी के दांत’ संघर्ष और प्रगति के मिथक के सूचक हैं। लक्ष्मीनारायण लाल के ‘ध रती की आँखें’, काले फूलों का पौधा’, रूपाजीवा’ में उपर्युक्त स्तर की सामाजिक चेतना को उभारने की कोशिश है। ‘काले फूलों का पौधा’ चरित्र-चित्रण, संस्कृति-संघर्ष और नव्यतर तकनीक के कारण विशिष्ट बन पड़ा है। +‘प्रेत बोलते हैं’, ‘सारा आकाश’, ‘उखड़े हुए लोग’ और ‘एक इंच मुस्कान’ राजेन्द्र यादव के उपन्यास हैं। ‘एक इंच मुस्कान’ यादव और मन्नू भंडारी का सहयोगी लेखन है। इसमें खंडित व्यक्तित्व वाले आधुनिक व्यक्तियों की प्रेम-त्रासदी (ट्रेजिडी) है। आधुनिक जीवन की इस त्रासदी को अंकित करने के कारण यह उपन्यास यादव के अन्य उपन्यासों की अपेक्षा कहीं अधिक समकालीन और महत्वपूर्ण है। +कविता में नए प्रयोगों के साथ-साथ कहानी-उपन्यास आदि में भी नये प्रयोग हुए हैं। अब कहानी का तत्व क्षीण हो गया है, कथानक का पुराना रूप विघटित होकर नया हो गया है। अब जिन्दगी पूरे तौर पर विश्लेषित न होकर चेतना प्रवाह, स्वप्न सृष्टि के साथ जुड़ गई है, प्रतीक, कालांतर आदि के द्वारा उपन्यासों में नए शिल्प के दर्शन हुए हैं। इस प्रयोग-संपर्क में प्रभाकर माचवे के परन्तु’, ‘साँचा’, और आभा’, भारतीका ‘सूरज का सांतवा घोड़ा’, गिरधर गोपाल का ‘चांदनी रात के खंडहर’, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का ‘सोया हुआ जल’ नरेश मेहता का ‘डूबते मस्तूल’ आदि अनेक प्रकार की विसंगतियों से भरे हुए प्रयोगशील उपन्यास हैं। उद्योगीकरण, महानगरीय सभ्यता, बदले हुए मानसिक परिवेश और भ्रष्ट व्यवस्था के कारण आज व्यक्ति यांत्रिक, अजनवी, अकेला या विद्रोही हो गया है। इसकी अभिव्यक्ति मुख्यतः साठोत्तरी साहित्य में होती है, भले ही उपन्यास, नाटक की अपेक्षा इसका तेवर कविता और कहानी में ही अधिक तेजस्वितापूर्ण दिखाई देता है। इस प्रकार के उपन्यासों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है : +इनके अतिरिक्त गिरिराज किशोर का ‘जुगलबन्दी’ और ‘ढाई आखर’, लेख बख्षी का ‘वैषाखियों वाली इमारत’, देवराज उपाध्यायका ‘दूसरा सूत्र’ और ‘अजय की डायरी’ कमलेश्वर का ‘डाक बंगाला’ और ‘काली आंधी’ और मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ श्री लाल शुक्ल का ‘मकान’ शिवप्रसाद सिंह का ‘नीला चाँद’ आदि उपन्यास उल्लेखनीय हैं। रमेश चौधरी आरिगमूडि, ओंकार शरद, मार्कण्डेय, मुद्राराक्षस, आनन्द प्रकाश चौबे, श्रीलाल शुक्ल, मोहन सिंह सेंगर, सत्येन्द्र गुप्त, राजेन्द्र अवस्थी, हंसराज रहबर, रामदरश मिश्र, मनहर चौहान, शिवप्रसाद सिंह, राही मासूम रजा, शिवानी आदि उपन्यास के क्षेत्र में अच्छा कार्य कर रहे हैं। यूरोप के पुराने और नये उपन्यासों के अनुवाद का कार्य भी हो रहा है। +इस प्रकार हम देखते हैं कि साठोत्तरी हिन्दी उपन्यास का युग प्रयोग का युग रहा। जीवन-मरण सम्बन्धी पुराने सभी मत मतान्तरों को चुनौती दी गई है। महानगरीय अकेलापन, अत्यधिक निकटता में अजनबी पन, विसंगति, संत्रास यांत्रिक तटस्थता आदि का चित्रण किया गया है। बाह्य यथार्थ की अपेक्षा आन्तरिक यथार्थ को अधिक महत्ता दी गई है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का ‘सोया हुआ लाल’, लक्ष्मी नारायण लाल का ‘हरा समन्दर गोपी चन्दर’ जैसे आधुनिक उपन्यासों में कथा का ह्रास हुआ है कथानक का नहीं। उपन्यासों में पीढ़ियों का वैचारिक मतभेद, पति-पत्नी, भाई-बहन, माँ-बाप के सम्बन्ध में दोहरा व्यक्तित्व, अन्तःबाह्य संघर्ष, मिल मालिक और मजदूरों का संघर्ष, कृषकों का जागरूक होना पुलिस की धांधलियाँ, महाजनों के धन शोषण के तरीके महानगर, कस्बे और गावों के परिवर्तन को समग्रता में रेखांकित किया गया है। उपन्यासों में पूर्वदीप्ति शैली, आत्म कथात्मक शैली, संकेत शैली, प्रतीक शैली द्वारा मानवीय संवेदना को उभारा गया है। विषय और शैली दोनों दृष्टियों से आज के उपन्यास समृद्ध दिखाई देते हैं। + +हिन्दी निबन्ध का इतिहास: +हिन्दी निबन्ध का जन्म भारतेन्दु-काल में हुआ। यह नवजागरण का समय था। भारतीयों की दीन-दुखी दशा की ओर लेखकों का बहुत ध्यान था। पुराने गौरव, मान, ज्ञान, बल-वैभव को फिर लाने का प्रयत्न हो रहा था। लेखक अपनी भाषा को भी हर प्रकार से सम्पन्न और उन्नत करने में लग गए थे, और सबसे बड़ी बात यह थी कि इस काल के लेखक स्वतंत्र विचारों के थे। उनमें अक्खड़पन और फक्कड़पन भी था। ऐसा युग निबन्ध के बहुत अनुकूल होता है, इसलिए इस युग में जितने अच्छे निबन्ध लिखे गये उतने अच्छे नाटक, आलोचना, कहानी आदि नहीं लिखे गए। +भारतेन्दु युग. +भारतेन्दु काल के वातावरण और परिस्थितियों से तो आप परिचित ही है। उस युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमधन’, बालमुकुन्द गुप्त, राधाचरण गोस्वामी जैसे प्रमुख निबन्धकार हुए। +भारतेन्दु जीके निबन्ध भी अनेक विषयों पर हैं। ‘काश्मीर कुसुम’ ‘उदयपुरोदय’, ‘कालचक्र’, ‘बादशाह दर्पण’-ऐतिहासिक, ‘वैद्यनाथ धाम’, ‘हरिद्वार’, सरयू पार की यात्रा’ : विवरणात्मक, ‘कंकण स्तोत्र’ : व्यंग्यपूर्ण वर्णनात्मक और ‘नाटक’, ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ विचारात्मक निबन्ध हैं। भारतेन्दु सबसे अधिक सफल हुए अपने व्यंगात्मक निबन्धों में। ‘लेवी प्राणलेवी’, ‘स्वर्ग में विचार-सभा का अधिवेशन’, ‘पाँचवें पैगम्बर’, ‘अंग्रेज स्त्रोत’, कंकड़ स्तोत्र’ आदि में गजब का हास्य-व्यंग्य है ही ‘सरयू पार की यात्रा’ में भी भारतेन्दु अपने व्यंग्य का बढ़िया नमूना उपस्थित करते हैं। जैसे : वाह रे बस्ती। झक मारने बसती है। अगर बस्ती इसी को कहते हैं, तो उजाड़ किसे कहेंगे? +इनके निबन्धों की भाषा स्वच्छ और श्लेषपूर्ण है। कहीं-कहीं तो उर्दू की बढ़िया शैली भी आपने उपस्थित की। भाव और विचार की दृष्टि से युग की वे सभी विशेषताएं इनमें भी हैं जो भट्ट जी या प्रतापनारायण मिश्र में हैं। +बालकृष्ण भट्ट अपने समय के सर्वश्रेष्ठ निबन्धकार कहला सकते हैं। इन्हें हिन्दी का ‘मान्तेन, कहा जाता है। भट्ट जी ने सभी प्रकार के निबन्ध लिखे। ‘मेला-ठेला’, ‘वकील’ : वर्णनात्मक, ‘आंसू’, ‘चन्द्रोदय’, ‘सहानुभूति’, ‘आशा माधुर्य’, ‘खटका’ : भावात्मक ‘आत्म-निर्भरता’, ‘कल्पना-शक्ति’, ‘तर्क’, और ‘विश्वास’ : विचारात्मक निबन्ध हैं। ‘खटका’, ‘इंगलिस पढ़े तो बाबू होय’, ‘रोटी तो कमा खाय किसी भांति’, ‘मुछन्दर’, ‘अकल अजीरन राग’ आदि निबन्धों में मस्ती, हास-परिहास, विनोद-व्यंग्य सभी कुछ हैं। ऐसे निबन्धों की भाषा चलती और दैनिक व्यवहार की है। भट्ट जी की भाषा विषय के अनुकूल और अपने समय में सबसे अधिक मंजी हुई सबल और प्रभावशाली है। समाज, व्यक्ति, जीवन, धर्म, दर्शन, राष्ट्र, हिन्दी : सभी विषयों पर आपने लिखा। जन-साहित्य को जन-भाषा में लिखने वालों में प्रतापनारायण मिश्रका नाम सर्वप्रथम आएगा। इनके व्यक्तित्व और निबन्धों में निराला आकर्षण है। लापरवाही, चुभता व्यंग्य, गुदगुदीभरा विनोद इनकी रचनाओं की विशेषताएँ हैं। इस युग में इतनी चुलबुली भाषा लिखने वाला और कोई नहीं हुआ। यह ‘ब्राह्मण’ नामक पत्र निकालते थे, जिसमें इनके निबन्ध छपते थे। छोटे-छोटे विषयों पर इतने बढ़िया, मनोरंजन और उच्च उद्देश्य को लेकर किसी लेखक ने नहीं लिखा। ‘नाक’, ‘भौह’, ‘वृद्ध’, ‘दांत’, ‘पेट’, ‘मृच्छ’ आदि विषयों को लेकर आपने अपने निबन्धों में मनोरंजन का सामान भी जुटाया और देश-प्रेम, समाज-सुधार, हिन्दी के प्रति प्रेम, स्वाभिमान, आत्म-गौरव का सन्देश भी दिया। इनकी शैली में घरेलू बोलचाल की शब्दावली तथा पूर्वी बोलियों की कहावतों और मुहावरों का प्रयोग मिलता है। लापरवाही के कारण भाषा की अशुद्धयाँ रहना साधारण बात है। ‘आत्मीयता’, ‘चिन्ता’, ‘मनोयोग’ इनके विचारात्मक निबन्ध हैं। +प्रेमघन जी अपने निरालेपन के लिए याद किए जाते हैं। उनका उद्देश्य यह नहीं था कि उनकी बात साधारण समाज तक पहुंचे, उसका मनोरंजन हो या उसके विचारों में परिवर्तन हो। कलम की करामात दिखाना ही उनका उद्देश्य था। वह स्वाभाविक, प्रवाहमय, सुबोध भाषा नहीं लिखते। बल्कि शब्दों की जड़ाई करते थे। भाषा बनावटी होते हुए भी उसमें कहीं-कहीं विवेचन की शक्ति पायी जाती है। आप ‘नागरी नीरद’ और ‘आनन्द कादम्बिनी’ नामक पत्र निकालते थे। इन्हीं में उनके निबन्ध छपा करते थे। इनके शीर्षक उनकी भाषा-शैली को प्रकट करते हैं जैसे सम्पादकीय, सम्पत्ति सीर, हास्य, हरितांकुर, विज्ञापन और वीर बधूटियां। ‘हमारी मसहरी’ और ‘हमारी दिनचर्या’ जैसे मनोरंजक लेख उन्हीं के लिखे हुए हैं। ‘फागुन’, ‘मित्र’, ‘Rतु-वर्णन उनके अच्छे निबन्ध हैं। +बावमुकुन्द गुप्त इस युग के अन्तिम और सबसे अधिक महत्वपूर्ण निबन्धकार थे। ‘शिवशम्भू’ के नाम से ‘भारतमित्र’ में वह ‘शिवसम्भू’ का चिट्ठा’ लिखा करते थे। हास्य-व्यंग्य के बहाने ‘शिवशम्भू का चिट्ठा नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुए। उनका व्यंग्य शिष्ट और नागरिक होता था। भाषा मिली-जुली हिन्दी-उर्दू। राधाचरण गोस्वामीको भी इस युग के प्रगतिशील लेखकों में गिना जाएगा। ‘यमपुर की यात्रा’ में उन्होंने धार्मिक अंधविश्वास का बहुत मजाक उड़ाया है। धार्मिक विचारों के लोग गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करते हैं। इसमें कुत्ते के पूंछ पकड़कर वैतरणी पार कराई गई है। पहले ऐसी बात सोचना घोर पाप समझा जा सकता था। +भारतेन्दु-काल के निबन्धकारों की विशेषताएँ हैं : निबन्धों के विषयों की विविधता, व्याकरण-सम्बन्धी लापरवाही और अशुद्धयां, देशज या स्थानीय शब्दों का प्रयोग, शैली के विविध रूप और विचार-स्वतन्त्रता, समाज-सुधार, देश-भक्ति, पराधीनता के प्रति रोष आत्म-पतन पर खेद, देशोत्थान की कामना, हिन्दी-सम्मान की रक्षाभावना, हिन्दू, पर्व-त्यौहारों के लिए उत्साह और नवीन विचारों का स्वागत। निबन्ध की एक विशेष शैली भी इस युग की विशेषता है : ‘राजा भोज का सपना’ (शिवप्रसाद सितारे हिन्द), एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न (भारतेन्दु) एक अनोखा स्वप्न (बालकृष्ण भट्ट), यमपुर की यात्रा (राधाप्रसाद गोस्वामी) : इन रचनाओं में स्वप्न के बहाने राजनैतिक अधिकार पाने, समाज सुधार तथा धर्म-संस्कार का संदेश दिया गया है। +द्विवेदी युग. +भारतेन्दु-युग के बाद द्विवेदी-युग आता है। भारतेन्दु-युग गद्य-साहित्य के बचपन का समय था। बचपन में लापरवाही, खिलवाड़, विनोद, मनोरंजन, मुग्धता, चंचलता रहती है। किशोर अवस्था में थोड़ी जिम्मेदारी, समझदारी, शिक्षा, नियम-पालन, साज-संवार, स्थिरता आ जाती है। इसी अवस्था में प्रतिस्पर्धा की भावना भी जागती है। अन्य साथियों की शिष्टता, शील, ज्ञान, आत्मसम्मान आदि को देखकर उनके समान ही हम भी गुण विकसित करना चाहते हैं। यही बात भारतेन्दु युग के संदर्भ में समझनी चाहिए। भारतेन्दु-काल में साहित्य तो बहुत लिखा गया था, पर भाषा की भूलें साधारण बात थी। निबन्ध के विषय भी साधारण हुआ करते थे। इस युग में इन अभावों की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इस काल के निबन्धों का आरम्भ दो अनुवाद-पुस्तकों से हुआ। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अंग्रेज लेखक बेकन के निबन्धों का अनुवाद ‘बेकन-विचार-रत्नावली’ के नाम से, गंगा प्रसाद अग्निहोत्री ने मराठी लेखक चिपलूणकर के निबन्धों का अनुवाद प्रकाशित कराया। लेकिन यहाँ यह बात ध्यान रखने की है कि द्विवेदी-युग का निबन्ध-साहित्य भारतेन्दु-युग के निबन्ध-साहित्य के समान सम्पन्न नहीं है। महावीर प्रसाद द्विवेदी, माधव प्रसाद मिश्र, अध्यापक पूर्णसिंह और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी इस युग के प्रमुख निबन्धकार हैं। गोविन्द नारायण मिश्र, पद्मसिंह शर्मा और श्यामसुन्दरदास का नाम दूसरी श्रेणी में लिया जा सकता है। +द्विवेदी-युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम सबसे पहले आता है। अपने युग के यह आचार्य थे। आचार्य का काम होता है शिक्षा देना, ज्ञान-वद्धर्न कराना, समाज पर नया संस्कार डालना और सुधार करना। ये सब काम इन्होंने किये, इसलिए यह आचार्य कहलाए और इनके नाम पर ही इस काल का नाम द्विवेदी-युग रखा गया। अपने निबन्धों और समालोचनाओं के द्वारा सबसे मुख्य काम इन्होंने भाषा-सुधार का किया। ‘किंकर्तव्य’ नामक निबन्ध में यह लिखते हैं : ‘कविता लिखने में व्याकरण के नियमों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। शुद्ध भाषा का जितना मान होता है, अशुद्ध का नहीं होता। जहां तक सम्भव हो, शब्दों का मूल रूप न बिगाड़ना चाहिए। मुहावरे का विचार रखना चाहिए। क्रोध क्षमा कीजिए, इत्यादि वाक्य कान को अतिशय पीड़ा पहुंचाते हैं।कृ’ इस अवतरण से इनके भाषा सम्बन्धी विचार स्पष्ट हो जाते हैं। +द्विवेदी जी ने सभी प्रकार के निबन्ध लिखे। ‘कवि और कविता’ ‘प्रतिभा’, ‘साहित्य की महत्ता’ इनके विचारात्मक निबन्ध हैं। ‘लोभ’, ‘क्रोध’ ‘संतोष’ : भावात्मक, ‘हंस का क्षीरनीर विवेक’, ‘जापान में पतंगबाजी’, ‘हजारों वर्ष पुराने खंडहर’ और ‘प्रताप सुषमा’ : वर्णनात्मक है और ‘हंस-संदेश’ तथा ‘नल का दुस्तर दूत-कार्य’ : विवरणात्मक। यहाँ यह बात ध्यान रखने की है कि इनके निबन्धों में जानकारी अधिक रहती है, इनकी रचनाओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि एक आचार्य शिष्य-मण्डली को पढ़ा रहा है। +माधवप्रसाद मिश्र भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन, साहित्य कला के सच्चे उपासक थे। इनका अपना व्यक्तित्व था। यदि ये किसी को भारतीय और प्राचीन साहित्य का गौरव घटाने का प्रयत्न करते हुए पाते थे, तो उनकी आलोचना करते थे। आचार्य द्विवेदी और श्रीधर पाठक की भी उन्होंने निर्भय आलोचना की थी। इनकी भाषा निर्दोष, साफ-सुथरी, विषयानुकूल, व्यंग्यात्मक और प्रभावशाली है। संस्कृत का प्रभाव उन पर स्पष्ट है। इनके लिखे ‘धृति’, ‘क्षमा’, ‘श्री वैष्णव सम्प्रदाय’, ‘काव्यालोचना’, ‘वेबर’ का भ्रम’ : विचारात्मक और ‘सब मिट्टी हो गया’ : भावात्मक निबन्ध हैं। भारतेन्दु युग की यह परम्परा मिश्र जी के निबन्धों के साथ ही समाप्त हो गई। +अध्यापक पूर्णसिंह इस युग के सबसे प्रमुख, भावुक और विचारक निबन्धकार हैं। इससे अधिक गौरव की बात और क्या होगी कि इन्होंने केवल छः निबन्ध लिखे और पिफर भी अपने समय के श्रेष्ठ लेखक माने गए। उनमें से प्रमुख हैं ‘मजदूरी और प्रेम’, ‘आचरण की सभ्यता’, और ‘सच्ची वीरता’। अध्यापक जी के निबन्धों में प्रेरणा देने वाले नए-नए विचार हैं। इनकी भाषा बड़ी ही शक्तिशाली है। उसमें एक खास बाँकपन है जिससे भाव का प्रकाशन भी निराले ढंग से होता है। विषय भी ऐसे नए कि अब तक किसी को सूझे ही नहीं। साथ, ही इनमें भावुकता का माधुर्य भरा है। वीरता, आचरण, शारीरिक परिश्रम का जो महत्व उन्होंने समझाया, उसको ठीक समझा जाए तो आज धर्म का नया रूप सामने आ जाए। समाज में क्रांति हो जाए, मनुष्य और सारा देश उन्नति के शिखर पर पहुंच जाए। ‘‘जब तक जीवन के अरण्य में पादरी, मौलवी, पंडित और साधु-संन्यासी, हल कुदाल और खुरपा लेकर मजदूरी न करेंगे तब तक उनका आलस्य जाने का नहीं।’’ ‘मजदूरी और प्रेम’ का यह उद्धरण कितना महान् संदेश देता है। भाषा की लाक्षणिकता इनकी विशेषता है। +चन्द्रधर शर्मा गुलेरी भी स्वतंत्र विचारों के लिए प्रसिद्ध हैं। निबन्ध इन्होंने भी थोड़े ही लिखे। इनकी रचनाओं में भी जीवन को उठाने की प्रेरणा और नए विचारों का खजाना मिलता है। संस्कृत के महापण्डित होते हुए भी पुरानी लकीर पीटने वाले ये नहीं थे। प्राचीन धार्मिक कथाओं की ये वैज्ञानिक और बुद्धसम्मत व्याख्या करते थे। ‘कछुआ धर्म’ नामक निबंध भी गम्भीर तर्कपूर्ण, प्रभावशाली, विचार-प्रधान शैली इनकी विद्वता और तर्क-कुशलता का सुन्दर उदाहरण है। +गोविन्दनारायण मिश्र का नाम उनकी विचित्र अलंकारपूर्ण संस्कृत शब्दावली से लदी काव्यमय और बनावटी शैली के लिए लिया जा सकता है। आपको याद होगा भारतेन्दु-काल में ‘प्रेमघन’ जी भी इसलिए याद किए जाते हैं। +प्रसाद-युग. +प्रसाद युग हिन्दी साहित्य का स्वर्ण काल है। क्या कविता, क्या गद्य दोनों का विकास इस काल में ऊँचे शिखर पर पहुंचा। कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध, आलोचना सभी का खूब विकास हुआ। वर्णन और विवरण प्रधान निबन्धों की रचना बहुत कम हुई, विचारात्मक और भावात्मक की अधिक। इन दोनों प्रकार के सर्वश्रेष्ठ निबन्ध इसी युग में लिखे गए। विचारात्मक निबन्धकारों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और भावात्मक निबन्धकारों में डॉ. रघुवीर सिंह, सिरमौर हैं। गुलाबराय, वासुदेवशरण अग्रवाल, शांतिप्रिय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, वियोगी हरि और रायकृष्णदास का नाम भी उल्लेखनीय है। +गुलाबराय जी के सामने द्विवेदी-युग का सारा साहित्य-भण्डार था। इनके साहित्य का बहुत कुछ रंग द्विवेदी-युग का रहा। यह निबन्धकार पहले हैं, आलोचक बाद में। ‘पिफर निराशा क्यों? ‘मेरी असफलताएं’, ‘अंधेरी कोठरी’ इनके निबन्ध संग्रह हैं। ‘मेरी असफलताएं’ आत्मपरक या वैयक्तिक व्यंग्यात्मक निबन्धों का संग्रह है। शेषदोनों संग्रहों में विचारात्मक निबन्ध हैं। अन्तिम संग्रह मनोवैज्ञानिक निबन्धों का है। आपकी भाषा बड़ी सरल और सुबोध होती है। विचारात्मक और मनोवैज्ञानिक निबन्धों तक में भाषा या भाव की उलझन नहीं मिलेगी। +आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का निबन्ध-संग्रह ‘चिन्तामणि’ भारतीय साहित्य में ही नहीं, विश्व-साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। विचारात्मक निबन्धों में शुक्ल जी के निबन्ध सर्वश्रेष्ठ हैं। इनमें विचारों की बारीकी और गंभीरता, भावों की मनोवैज्ञानिकता, भाषा का गठन और उसकी शक्ति आदि आदर्श हैं। ‘चिन्तामणि’ में ‘क्रोध’, ‘ईर्ष्या’, ‘लोभ और प्रीति’, ‘उत्साह’, ‘श्रद्धाभक्ति’, ‘भय’, ‘करुणा’, ‘घृणा’, ‘लज्जा’ और ‘ग्लानि’ आदि विषयों पर लिखे निबन्ध मानसिक भावों, वृत्तियों और विचारों से सम्बन्ध रखते हैं। ‘कविता क्या है?’ ‘साधारणीकरण और व्यक्तिवैचित्रय’ साहित्यिक व्याख्या और विश्लेषण सम्बन्धी हैं और ‘तुलसीदास का भक्ति मार्ग’, ‘मानस की धर्म-भूमि’ आदि साहित्य-समीक्षा-सम्बन्धी। ‘मित्रता’ और ‘प्राचीन भारतीयों का पहरावा’ परिचयात्मक वर्णनात्मक निबन्ध हैं। +मनोभावों या चित्तवृत्तियों का विवेचन करते हुए वे राजनीति, समाजनीति, धर्म, पारस्परिक व्यवहार आदि पर भी यह अपने मौलिक विचार प्रकट करते चलते हैं। इन निबन्धों की शैली में लेखक का गहन ज्ञान और गम्भीर व्यक्तित्व प्रकट होता है। थोड़े शब्दों में बड़ी से बड़ी बात कहने की शक्ति इनमें है। जो उच्च स्थान इनका आलोचक के रूप में है, वही निबन्धकार के रूप में भी है। लोक मंगल की भावना भी इनके निबन्धों की प्रमुख विशेषता है। +छायावाद-युग के कवियों ने भी कुछ रेखाचित्र, संस्मरण और ललित निबन्धों की सम्मिश्रित विधा में रचनाएं की हैं। ऐसी रचनाओं में महादेवी वर्मा की ये पुस्तकें उल्लेखनीय मानी जाती हैं : ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘अतीत के चलचित्र’ तथा ‘शृंखला की कड़ियां’। इनके अतिरिक्त गम्भीर विचारपूर्ण निबन्धों के लेखक सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’को भी नहीं भुलाया जा सकता। उसके तीन निबन्ध-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘पृथिवी पुत्र’ में आपने एक स्थान पर कहा है : ‘‘विदेशी विचारों को मस्तिष्क में भर कर उन्हें अधपके ही बाहर उंडेल देने से किसी साहित्य का लेखक लोक में चिर जीवन नहीं पा सकता। हिन्दी साहित्यकारों को अपनी खुराक भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक भूमि से प्राप्त करना चाहिए।’’ ये भारतीयता के पुजारी और पक्ष-पोषक थे। ‘कला संस्कृति’ में प्राचीन और नवीन भारतीय ऋषियों, दार्शनिकों, कवियों और कलाकारों के विषय में निबन्ध हैं। इन्होंने ‘समुद्र-मंथन’, ‘कल्पवृक्ष’ आदि की व्याख्या नवीन वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक ढंग से की है। आपके सभी निबन्ध विचारात्मक हैं। +निबन्ध-लेखकों में शांतिप्रिय द्विवेदी को भी नहीं भुलाया जा सकता। ‘संचारिणी’, ‘सामयिकी’, ‘पदचि”’ ‘युग और साहित्य’, ‘परिव्राजक की प्रथा’ इनकी पुस्तकें हैं। गांधीवादी नैतिकता और छायावादी भाषा रचनाओं की विशेषता है। ‘धरातल’ में आप अपने को समाजवाद का हिमायती बताते हैं। इस संग्रह में जीवन की समस्याओं का भौतिक समाधान खोजा गया है। विचारात्मक और भावात्मक दोनों प्रकार के निबन्ध उन्होंने लिखे हैं। हिन्दी निबन्ध-साहित्य को इनकी देन है इनके वैयक्तिक निबन्ध। इस क्षेत्र में यह अद्वितीय है। अपने माता-पिता-बहन के जो चित्र इन्होंने खींचे हैं उनमें करुणा की नमी है और हृदय को स्पर्श करने वाली सच्चाई। इनके ये अनुपम वैयक्तिक निबन्ध ‘पदचि”’ और ‘परिव्राजक की प्रथा’ में संगृहीत हैं। आप काव्यमय, कोमल-कान्त भाषा का प्रयोग करते हैं। +डॉ. रघुवीर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी, रायकृष्ण दास, वियोगी हरि आदि ने भावात्मक निबन्ध लिखे। रघुवीर सिंह और माखनलाल जी के निबन्ध काफी बड़े हैं, शेष दोनों के बहुत छोटे-छोटे एक डेढ़ पृष्ठ के। इनके निबन्धों की शैली अन्य निबन्धकारों की शैली से भिन्न हैं : छोटे-छोटे वाक्य, कहीं खण्डित, कहीं अपूर्ण। आश्चर्य, शोक, करुणा, प्रेम का आवेश इसमें उमड़ता सा दिखता है, ऐसी रचनाओं को हिन्दी गद्यकाव्य का नाम दिया गया है। हम इन्हें निबन्ध मानते हैं। गद्य-काव्य के भीतर तो कहानी, नाटक, उपन्यास, शब्दचित्र, निबन्ध, आलोचना, सभी कुछ सम्मिलित हैं। +रघुवीर सिंह इतिहास के विद्वान हैं। मुगलकालीन घटनाओं, इमारतों, चरित्रों को लेकर इन्होंने ‘अतीत स्मृति’ और ‘शेष स्मृतियाँ’ दो पुस्तकें लिखी। वैसे तो इन निबन्धों में वर्णन और विवरण है, पिफर भी ये भावात्मक हैं। क्योंकि लेखक ने इनमें वर्णन को महत्व नहीं दिया, इनको देखकर अपने हृदय में उठने वाले भावों को ही प्रकाशित किया है। +माखनलाल जी ने विचार-प्रधान निबन्धों को भी भावात्मक शैली में लिखा। ‘युग और कला’, ‘साहित्य देवता’, ‘रंगों की बोली’, ‘व्यक्तित्व’ आदि निबन्ध : कला, साहित्य, चित्रकला और व्यक्तित्व विषयों पर हैं, ये विचारात्मक हो सकते हैं। लेकिन विचार भी प्रभावात्मक ढंग से दिये गये हैं। लेखक की मुग्धता, श्रद्धा, करुणा, सहानुभूति ही इसमें प्रकट हुई है। +वियोगी हरि और रायकृष्णदास जी की रचनाओं में भक्ति, प्रेम, विस्मय, पश्चाताप, आत्म-निवेदन, मनोमुग्धता, करुणा, संवेदना आदि अनेक भाव और भावना प्रकट हुई हैं। ‘भावना’ और ‘अन्तर्नाद’ वियोगी हरि की और ‘साधना’ रायकृष्ण दास की पुस्तक है। इन सभी निबन्धकारों ने उर्दू शब्दों का भी यथावसर प्रयोग किया है। +प्रसादोत्तर युग. +प्रसादोत्तर या प्रगतियुग में निबन्ध-साहित्य ने सबसे अधिक विकास किया। विषयों की संख्या और विविधता की दृष्टि से तो इस युग का मुकाबला ही नहीं। यह युग उथल-पुथल का युग है। दूसरा विश्वयुद्ध हुआ, समाजवादी विचारों का आगमन हुआ। भारत स्वतंत्र होकर विभाजित हुआ। प्राचीन साहित्य, संस्कृति और कला की ओर हमारा ध्यान गया। अनेक आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएं भी पैदा हुईं। इन सब बातों की छाया निबन्धों में भी मिलती है। इस युगके चार निबन्धकार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। : आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्र कुमार भवन्त आनन्द कौशल्यायन तथा यशपाल। +कौसल्यायन जी बौद्धभिक्षु थे और समाजवादी विचारों का इन पर बहुत प्रभाव था। निबन्ध तो इन्होंने बहुत नहीं लिखे, पर पृथक् विषय की दृष्टि से इनका महत्व है। ‘जो न भूल सका’ इनके संस्मरणात्मक निबन्धों का संग्रह है, जिनमें सामाजिक विषमता, धार्मिक शोषण, आर्थिक उत्पीड़न के तीखे चित्र हैं। धर्म को यह शोषण का संगठित साधन बताते हैं और अमीरों के भवनों को गरीबों की हड्डियों की ईंटों और खून के चूने से बना मानते हैं। जनवादी लेखक होने से इनकी भाषा सरल है। +प्रगतिवादी निबन्ध-साहित्य में यशपाल बेजोड़ हैं। इनके ये निबन्ध-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं : ‘चक्कर क्लब’, ‘न्याय का संघर्ष, ‘गांधीवाद की शव परीक्षा’, ‘देखा, सोचा, समझा’, ‘बात में बात’, ‘राम-राज्य की कथा’ इन सभी पुस्तकों के नामों से भी पता चलता है कि ये समाजवाद के समर्थक ही नहीं, प्रचारक भी हैं। पुरानी परम्पराओं, समाज के ढांचे, धर्म की बुनियादों पर उन्होंने बड़े जोश के साथ वार किए हैं। इनका विश्वास है कि पुराने दर्शन और संस्कृति, मानव की उन्नति में रोड़े हैं। इसलिए इनका विरोध यह निडर होकर करते हैं। वर्तमान समाज में धन के गलत बंटवारे के कारण कोई राजा बन गया और कोई गुलाम। वे कहते हैं कि ‘मानव की घृणा’, मानव से मानव की शत्रुता, मानव द्वारा मानव का शोषण और अपमान तभी दूर हो सकेगा, जब सबको अपने परिश्रम का फल मिले, विकास का अवसर प्राप्त हो।’’ सभ्यता, संस्कृति, कला, साहित्य, समाज सभी के विषय में इन्होंने अपने मौलिक विचार प्रकट किए। विविधता की दृष्टि से इन्होंने हिन्दी निबन्ध-साहित्य को धनी बताया है। +जैनेन्द्र कुमार शुद्ध रूप से विचारक हैं। धर्म, युद्ध, न्याय, राष्ट्रीयता, दान की बात, दीन की बात, पैसा कमाई और भिखाई, गांधीवाद का भविष्य, रोटी का मोर्चा, संस्कृति की बात, उपवास और लोकतंत्र, दुःख, सत्यं शिवं सुन्दरं, साहित्य की सच्चाई, प्रगतिवाद, जड़चेतन, सम्पादकीय मैटर-इनके इन निबन्धों से विषय की विविधता का तो पता चलता ही है, यह भी पता चलता है कि लेखक समाज, साहित्य, धर्म, राजनीति, जीवन की यथार्थ उलझनों आदि किसी से भी बेखबर नहीं। इनके ये निबन्ध-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं : ‘जड़ की बात’, पूर्वोदय’, ‘जैनेन्द्र के विचार’ ‘इतस्ततः’। इनके निबन्धों की विशेषताएं हैं : गांधीवाद, नैतिकता, संस्कृति-प्रेम, मौलिक विचार, स्वतंत्रता और सबल, संक्षिप्त गठी हुई शैली। व्यक्तित्व और शैली को निबन्ध का प्राण मानें, तो जैनेन्द्र जी एक महान लेखक हैं। भाषा सरल, हाट-घाट-बाट की है, लेकिन उसमें अर्थ गजब का मिलेगा। इनकी शैली के लिए कुछ अवतरण देखिए : +निबन्धकारों में राहुल सांकृत्यायन का नाम भी महत्वपूर्ण है। इनके निबन्ध देश-दशा, राजनीति, यात्रा-वृत्तान्त तथा इतिहास को लेकर ही होते हैं। देश-दशा और राजनीति से सम्बन्धित निबन्धों के एक संग्रह का नाम है : ‘तुम्हारा क्षय’। इस संग्रह के सभी निबन्धों का निष्कर्ष यह है कि जो रूढ़िवादी है, जो रास्ता रोककर खड़े हैं, उनका क्षय हो। इनके कुछ संस्मरणात्मक निबन्धों के संग्रह ये हैं बचपन की स्मृतियां, जिनका मैं कृतज्ञ, मेरे असहयोग के साथी, राहुल जी का अपराध आदि। राहुल जी के असली व्यक्तित्व और निबन्धकार की आत्मा का यदि दर्शन करना हो तो उनका ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ पढ़ना चाहिए। +राहुल जी जैसी मस्ती और जैनेन्द्र कुमार जैसी शैली की झलक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के निबन्धों में मिलती है। इनके निबन्धों के 6 संग्रह हैं : ‘जिन्दगी मुस्कराई’, ‘आकाश के तारे’, ‘धरती के फूल’, ‘दीप जले’ ‘शंख बजे’, ‘माटी हो गयी सोना’, ‘महके आंगन, चहके द्वार’ तथा ‘बूँद-बूँद सागर लहराया’। +आधुनिक निबन्धकारों में विद्यानिवास मिश्र का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने अधिकतर ललित निबन्ध लिखे हैं। इन निबन्धों में कविता और पाण्डित्यपूर्ण शास्त्र का आनन्द एक साथ मिलता है। इनके तीन निबन्ध संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं : (1) छितवन की छाँह, (2) कदम की फूली डाल तथा (3) तुम चन्दन हम पानी। नये निबन्धकारों में प्रभाकर माचवे, नामवर सिंह, हरिशंकर परसाई, श्रीनिधि सिद्धान्तालंकार, शरद जोशी, श्री लाल शुक्ल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। प्रभाकर माचवेके निबन्धों के संग्रह का नाम है : ‘खरगोश के सींग’ और नामवर सिंहका निबन्ध-संग्रह है : बकलम-खुद’। हरिशंकर परसाई के व्यंग्य-विनोदपूर्ण निबन्धों में मस्ती और जान है। ‘भूत के पाँव’ ‘सदाचार का ताबीज’ और ‘निठल्ले की डायरी’ में उनके व्यंग्य लेख संग्रहीत हैं। विद्या निवास मिश्र का ‘छितवन की छाह’, ‘तुम चन्दन हम पानी’, ‘आंगन का पंछी’ ‘बनजारामन’ और ‘मेरे राम का मुकुट’ भीग रहा है’, कुबेर नाथ राय का ‘प्रिया-नीलकंठी’, ‘गन्ध मादन’, ‘माया बीज’, विवेकी राय का ‘आम रास्ता नहीं है’, ‘देवेन्द्र सत्यार्थी का ‘एक युग का प्रतीक’ हरिशंकर परसाई का ‘शिकायत मुझे भी है’ हरीशनवल का ‘बागपत के खरबूजे आदि प्रसिद्ध निबन्ध संकलन हैं। +हिन्दी निबन्ध लेखन की परम्परा अत्यन्त समृद्ध है लेकिन इधर कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में नये लेखकों का आगमन बहुत कम हुआ है। ललित भावात्मक, विचारात्मक निबन्ध लेखन की प्रवृत्ति कम हुई है और जो लिख भी रहे हैं वे पुराने पीढ़ी के ही लेखक हैं। नये लेखकों की निबन्ध लेखन की ओर से यह उदासीनता अत्यन्त चिन्ताजनक है। +हिन्दी निबन्ध का जन्म भारतेन्दु-काल में हुआ। यह नवजागरण का समय था। भारतीयों की दीन-दुखी दशा की ओर लेखकों का बहुत ध्यान था। पुराने गौरव, मान, ज्ञान, बल-वैभव को पिफर लाने का प्रयत्न हो रहा था। लेखक अपनी भाषा को भी हर प्रकार से सम्पन्न और उन्नत करने में लग गए थे, और सबसे बड़ी बात यह थी कि इस काल के लेखक स्वतंत्र विचारों के थे। उनमें अक्खड़पन और फक्कड़पन भी था। ऐसा युग निबन्ध के बहुत अनुकूल होता है, इसलिए इस युग में जितने अच्छे निबन्ध लिखे गये उतने अच्छे नाटक, आलोचना, कहानी आदि नहीं लिखे गए। + +हिन्दी नाटक का इतिहास: +प्राचीन हिन्दी नाटक. +हिन्दी साहित्य में नाटक का विकास आधुनिक युग में ही हुआ है। इससे पूर्व हिन्दी के जो नाटक मिलते हैं, वे या तो नाटकीय काव्य हैं अथवा संस्कृत के अनुवाद मात्र या नाम के ही नाटक हैं, क्योंकि उनमें नाट्यकला के तत्वों का सर्वथा अभाव है, जैसे नेवाज का ‘शकुन्तला’, कवि देव का ‘देवमायाप्रपंच’, हृदयराम का ‘हनुमन्नाटक’ राजा जसवन्तसिंह का ‘प्रबोधचन्द्र चन्द्रोदय’ नाटक आदि। रीवां नरेश विश्वनाथ सिंह का ‘आनन्द रघुनन्दन’ नाटक हिन्दी का प्रथम मौलिक नाटक माना जाता है। जो लगभग 1700 ई. में लिखा गया था, किन्तु एक तो उसमें ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है, दूसरे वह रामलीला की पद्धति पर है। अतः वह भी आधुनिक नाट्यकला से सर्वथा दूर है। हिन्दी साहित्य के आदि और मध्य युग में गद्य अत्यन्त अविकसित स्थिति में था और अभिनयशालाओं का सर्वथा अभाव था। अस्तु, हिन्दी साहित्य के आदि और मध्य युग में नाट्यकला का विकास न हो सका, जबकि हिन्दी लेखकों के सम्मुख संस्कृत की नाट्यकला अत्यन्त विकसित और उन्नत अवस्था में विद्यमान थी। आधुनिक युग में हिन्दी नाटक का सम्पर्क अंग्रेजी से स्थापित हुआ। अंग्रेज लोग नाट्यकला और मनोरंजन में अत्यधिक रुचि रखते थे और साहित्य में नाटकों की रचना भी प्रभूत मात्रा में हो चुकी थी। इसके साथ ही इस युग में हिन्दी-गद्य भी स्थिर हो गया और उसमें अभिव्यंजना शक्ति का भी विकास हो गया। इसलिए हिन्दी-नाट्यकला को पनपने का समुचित अवसर इसी युग में आकर प्राप्त हुआ। +आधुनिक हिन्दी नाटक. +आधुनिक काल की अन्य गद्य-विधाओं के ही समान हिन्दी नाटक का भी आरम्भ पश्चिम के संपर्क का फल माना जाता है। भारत के कई भागों में अंग्रेजों ने अपने मनोरंजन के लिए नाट्यशालाओं का निर्माण किया जिनमें शेक्सपीयर तथा अन्य अंग्रेजी नाटककारों के नाटकों का अभिनय होता था। उधर सर विलियम जोन्स ने फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत के ‘अभिज्ञान शाकुन्तलं’ के हिन्दी अनुवाद के अभिनय की भी प्रेरणा दी। इस बीच ‘अभिज्ञान शाकुन्तलं’ के कई हिन्दी अनुवाद हुए जिनमें राजा लक्ष्मण सिंह का अनुवाद आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है। सन् 1859 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के पिता बाबू गोपालचन्द्र ने ‘नहुष’ नाटक लिखा और उसको रंगमंच पर प्रस्तुत किया। इधर पारसी नाटक कम्पनियां नृत्य : संगीत प्रधान, नाटकों को बड़े धूम-धड़ाके से प्रस्तुत कर रही थी जिससे सुरुचि सम्पन्न तथा साहित्यिक गुणों के खोजी हिन्दी-साहित्यकार क्षुब्ध थे। इस सबसे प्रेरित होकर भारतेन्दु बाबू ने जनता की रुचि का परिष्कार करने के लिए स्वयं अनेक नाटक लिखे और अन्य लेखकों को नाट्य साहित्य की रचना के लिए प्रोत्साहित किया। +अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से हिन्दी-नाट्यकला के विकास को चार कालों में बाँटा जा सकता है : +भारतेन्दु-युगीन नाटक. +हिन्दी में नाट्य साहित्य की परम्परा का प्रवर्त्तन भारतेन्दु द्वारा होता है। भारतेन्दु युग नवोत्थान का युग था। भारतेन्दु देश की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक दुर्दशा से आहत थे। अतः साहित्य के माध्यम से उन्होंने समाज को जाग्रत करने का संकल्प लिया। समाज को जगाने में नाटक सबसे प्रबल सिद्ध होता है। भारतेन्दु ने इस तथ्य को पहचाना और नैराश्य के अन्धकार में आशा का दीप जलाने के लिए प्रयत्नशील हुए। युग-प्रवर्त्तक भारतेन्दु ने अनूदित/मौलिक सब मिलाकर सत्रह नाटकों की रचना की, जिनकी सूची इस प्रकार है : +मौलिक नाटक. +भारतेन्दु जी की मौलिक कृतियों में वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, प्रेमयोगिनी, विषस्य विषमोषधम्, चन्द्रावली, भारत दुर्दशा, नीलदेवी, अंधेर नगरी तथा सती प्रताप हैं। वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, प्रेम योगिनी और पाखण्ड विखंडन में धार्मिक रूढ़ियों और विडम्बनाओं से ग्रस्त समाज के पाखण्ड, आडम्बर, भ्रष्टाचार आदि का नाटकीय आख्यान हुआ है। ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ में ऊपर से सफेदपोश दिखने वाले धर्मात्माओं के साथ ही तत्कालीन देशी नरेशों और मंत्रियों के व्यभिचार की पोल खोली गयी है। अपने युग की धार्मिक स्थिति के प्रति जो तीव्र आक्रोश नाटककार में है, वही उसकी अपूर्ण नाटिका ‘प्रेमयोगिनी’ में प्रस्तुत हुआ है। ‘पाखण्ड विखंडन’ में हिन्दुओं के सन्त-महन्तों की हीन दशा का चित्रण हुआ है। इस प्रकार धार्मिक पाखण्डों का खण्डन करना ही इन नाटकों का मूल स्वर रहा है। +भारतेन्दु-युग में अंग्रेजों ने बहुत से राजाओं से उनका शासन छीन कर उनका राज्य अपने अधीन कर लिया था। अंग्रेजों की इस नीति की प्रशंसा पर गुलामी के भय के द्वन्द्व की परिकल्पना ‘विषस्य विषमौषध म्’ प्रहसन में साकार हो उठी है। देशोद्धार की भावना का संघर्ष भारतेन्दु जी के ‘भारत जननी’ और ‘भारत दुर्दशा’ में घोर निराशा के भाव के साथ प्रस्तुत होता है। ‘भारत दुर्दशा’ में भारत के प्राचीन उत्कर्ष और वर्तमान अधःपतन का वर्णन निम्नलिखित पंक्तियों में मिलता है : +भारतेन्दु ने राजनीतिक संघर्ष की पृष्ठभूमि पर नौकरशाही की अच्छी आलोचना करते हुए ‘अंधेर नगरी’ प्रहसन लिखा है। ‘अन्धेर नगरी’ के चौपट राजा को फांसी दिलाकर नाटककार कामना करता है कि कभी इस अयोग्य राजा की तरह नौकरशाही भी समाप्त होगी और देश के कुशासन की समाप्ति होगी। अंग्रेजों के शासन से देश मुक्ति की कामना ही ‘नील देवी’ नाटक में ऐतिहासिक पृश्ठभूमि पर उभरती है। साथ ही तत्कालीन समाज में तीव्रता से उठ रहे ‘नारी स्वातंत्रय’ के पक्ष विपक्ष के द्वन्द्व को भी प्रस्तुत किया है। +‘‘चन्द्रावली’ और ‘सती प्रताप’ प्रेम की कोमल अभिव्यंजना से अभिभूत नाटक हैं। चन्द्रावली में ईश्वरोन्मुख प्रेम का वर्णन है। ‘सती प्रताप’ में भी पति-प्रेम का अनुकरणीय उज्जवल आदर्श है। इस प्रकार भारतेन्दु के नाटकों में भी प्रेम धारा तथा शृंगारिक मोहकता का वातावरण बना रहा है। +अनूदित और रूपान्तरित नाटक. +भारतेन्दु ने अंग्रेजी, बंगला तथा संस्कृत के नाटकों के हिंदी अनुवाद भी किए, जिनमें रत्नावली नाटिका, पाखण्ड विखंडन, प्रबोध-चंद्रोदय, धनंजय-विजय, कर्पूर मंजरी, मुद्रा राक्षस तथा दुर्लभ बन्धु आदि हैं। अंग्रेजी से किए गए अनुवादों में भारतेन्दु की एक विशेषता यह भी है कि उन्होंने उसमें भारतीय वातावरण एवं पात्रों का समावेश किया है। सभी नाटकों में मानव-हृदय के भावों की अभिव्यक्ति के लिए गीतों की योजना की है। इन नाटकों का अनुवाद केवल हिन्दी का भण्डार भरने की दृष्टि से नहीं किया गया बल्कि हिन्दी नाटकों के तत्वों में अपेक्षित परिवर्तन के लिए दिशा-निर्देश करने के उद्देश्य से किया गया। रूपांतरित नाटकों में ‘विद्या सुन्दर’ और ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ नाटक आते हैं। ‘विद्यासुन्दर’ में प्रेम विवाह का समर्थन करते हुए भारतेन्दु मां-बाप के आशीर्वाद को अनिवार्य मानते हैं। ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ में सामाजिक विकृतियों से ऊपर उठ कर सत्य के आदर्शों से अनुप्राणित होने का आह्नान किया है। +नाट्य-शास्त्र के गम्भीर अध्ययन के उपरान्त भारतेन्दु ने ‘नाटक’ निबन्ध लिख कर नाटक का सैद्धान्तिक विवेचन भी किया है। सामाजिक एवं राष्ट्रीय समस्याओं को लेकर-अनेक पौराणिक, ऐतिहासिक एवं मौलिक नाटकों की रचना ही नहीं की, अपितु उन्हें रंगमंच पर खेलकर भी दिखाया है। उनके नाटकों में जीवन और कला, सुन्दर और शिव, मनोरंजन और लोक-सेवा का सुन्दर समन्वय मिलता है। उनकी शैली सरलता, रोचकता एवं स्वभाविकता के गुणों से परिपूर्ण है। भारतेन्दु अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे। सबसे बड़ी बात यह है कि वे अद्भुत नेतृत्व-शक्ति से युक्त थे। वे साहित्य के क्षेत्र में प्रेरणा के स्रोत थे। फलतः अपने युग के साहित्यकारों और नाटक तथा रंगमंच की गतिविधियों को प्रभावित करने में सफल रहे। इसके परिणामस्वरूप प्रतापनारायण मिश्र, राधाकृष्ण दास, लाला श्रीनिवास, देवकी नन्दन खत्री आदि बहुसंख्यक नाटककारों ने उनके प्रभाव में नाट्य रचना की। यह भी विचारणीय है कि भारतेन्दु मण्डल के नाटककारों ने पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, चरित्रप्रधान राजनैतिक आदि सभी कोटियों के नाटक लिखे। इस युग में लिखे गये नाटक परिमाण और वैविध्य की दृष्टि से विपुल हैं। यहाँ मुख्य धाराओं का परिचय प्रस्तुत हैः +आलोच्य युग के नाटक साहित्य का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इस युग के नाटक विषयवैविध्य में पूर्ण हैं। भारतेन्दु युग के नाम से अभिहित इस संक्रांति काल में अनेक युग प्रश्नों यथा-कर, आलस्य, पारस्परिक फूट, मद्यपान, पाश्चात्य-सभ्यता का अन्धानुकरण, धार्मिक अंधविश्वास, पाखंड, छुआ-छूत, आर्थिक शोषण, बाल विवाह, विधवा-विवाह, वेश्या गमन आदि को नाटकों का विषय बनाया गया। ऐसा नहीं है कि किसी एक नाटक में इनमें से एक या दो बातों को लिया गया हो, पर अवसर पाते ही सभी बातें एक ही नाटक में गुम्पिफत हुई हैं। इससे कथानक में भले ही शिथिलता आ गई हो किंतु जनजीवन की विसंगति अवश्य स्पष्ट हो जाती है। नाटकों में प्रधान रूप से समाज में व्याप्त अशांति और व्यग्रता का चित्रण हुआ है। नाटककार अपने युग के प्रति बड़े सजग दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने भारत का अधःपतन अपनी आंखों से देखा था। चारों ओर रूढ़िग्रस्त, निष्क्रिय और मानसिक दासता में जकड़ी हुई जनता, पाश्चात्य सभ्यता का दूषित प्रभाव, भ्रष्ट राजनीति, हृदयविदारक आर्थिक अवस्था आदि ने उनके हृदय में सुधारवादी और राष्ट्रीय विचारों का उद्रेक किया। फलस्वरूप नाटकों में राष्ट्रीय जीवन को उन्नत बनाने के अनेक उपाय संकेतित हुए हैं। इनकी वाणी में नवोदित भारत की आकांक्षाओं का स्वर प्रतिध्वनित होता है। +शास्त्रीय दृष्टि से भारतेन्दु-कालीन नाटक संस्कृत-नाट्यशास्त्र की मर्यादा की रक्षा करते हुए लिखे गये। साथ ही पाश्चात्य नाट्य शास्त्र का प्रभाव भी इन पर लक्षित होता है। पाश्चात्य ट्रेजडी की पद्धति पर दुःखान्त नाटक लिखने की परम्परा भारतेन्दु के ‘नीलदेवी’ नाटक से प्रारम्भ हुई। इस युग के नाटक एक ओर पारसी कम्पनियों की अश्लीलता और फूहड़पन की प्रतिक्रिया थे, तो दूसरी ओर पाश्चात्य और पूर्व की सभ्यता की टकराहट के परिणाम। इसलिए उनमें अविचारित पुरानापन या अविचारित नयापन कहीं नहीं है। अभिनेयता की दृष्टि से ये नाटक अत्यधिक सफल हैं। भारतेन्दु और उनके सहयोगी स्वयं नाटकों में भाग लेते थे और हिन्दी रंगमंच को स्थापित करने के लिए उत्सुक थे। नाटकों के माध्यम से जनता को वे जागरण का और आने वाले युग का सन्देश देना चाहते थे। इसी कारण भारतेन्दु-काल में विरचित ये नाटक सुदृढ़ सामाजिक पृष्ठभूमि पर अवस्थित थे। +अनूदित प्रस्तुत संदर्भ में भारतेन्दु युगीन, नाटकों पर विचार कर लेना भी समीचीन होगा। इस युग में संस्कृत, बंगला तथा अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध नाटकों के हिन्दी में अनुवाद किए गए। अनुवाद की परम्परा भी भारतेन्दु से ही प्रारम्भ हुई थी जिसकी चर्चा पीछे की जा चुकी है। उनके अतिरिक्त भी अनेक लेखक संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी के नाटक अनूदित करने में संलग्न रहे। +संस्कृत +भवभूतिः +कालिदासः +कृष्णमित्र +शूद्रक +हर्ष +भट्टनारायण +बंगला +माइकेल मधुसूदन दत्तः +द्वारिकानाथ गांगुली : वीरनारी-रामकृष्ण वर्मा (1899)। +राजकिशोर दे : पद्मावती : रामकृष्ण वर्मा (1888)। +मनमोहन वसुः सती : उदित नारायण लाल (1880)। +अंग्रेजी +शेक्सपीयर +(१) मरचेंट आफ वेनिस (वेनिस के व्यापारी) : आर्या (1888)। +(२) द कॉमेडी आफ एरर्स (भ्रमजालक) : मुन्शी इमदाद अली, भूल भुलैया : लाल सीताराम (1885)। +(३) एज यू लाइक इट (मनभावन) : पुरोहित गोपीनाथ (1896)। +(४) रोमियो जूलियट (प्रेमलीला) : पुरोहित गोपीनाथ (1897)। +(५) मैकबैथ (साहसेन्द्र साहस) : मथुराप्रसाद उपाध्याय (1893)। +जोजेफ एडीसनः केटो (कृतान्त) : बाबू तोता राम (1879) +भारतेन्दु-युगीन नाटककारों की अनूदित रचनाएं केवल उनकी अनुवाद वृत्ति का ही दिग्दर्शन नहीं कराती, वरन् सामाजिक जीवन के उन्नयन के लक्ष्य को भी प्रकट करती हैं। अनुवादक उन रचनाओं के माध्यम से वस्तुतः एक नाट्यादर्श प्रस्तुत करना चाहते थे और उन नैतिक तत्वों के प्रति भी जागरूक थे जो नव-जागरण में सहायक थे। इस प्रकार भारतेन्दु-युगीन इन नाटकों की विषय वस्तु में वैविध्य मिलता है। रामायण और महाभारत के प्रसंगों को लेकर पौराणिक नाटक बहुतायत से लिखे गये। इसी संदर्भ में ऐसे नाटकों की संख्या भी पर्याप्त कही जा सकती है जो नारी के सतीत्व और पतिव्रता के आदर्श से सम्बन्धित है। सामाजिक नाटकों में भी विषयवस्तु का वैविध्य और विस्तार मिलता है। इस काल में मुख्य रूप से अनमेल विवाह, विधवा विवाह, बहु विवाह, मद्यपान, वेश्या गमन, नारी स्वातंत्रय आदि समस्याओं पर विचार किया है। किन्तु युगीन सन्दर्भ के प्रति इस प्रकार की जागरूकता के बावजूद अनुभूति की तीव्रता और नाट्य शिल्प की विशिष्टता के अभाव में इस युग का नाट्य साहित्य कोई महत्वपूर्ण साहित्यिक देन नहीं दे सका। पिफर भी नाट्य रचना और रंगमंच के लिए जैसा वातावरण इस युग में बन गया था, वैसा हिन्दी साहित्य के किसी काल में सम्भव नहीं हुआ। +द्विवेदीयुगीन नाटक. +भारतेन्दु के अनन्तर साहित्य का जो दूसरा उत्थान हुआ, उसके प्रमुख प्रेरणा-केन्द्र महावीर प्रसाद द्विवेदी थे। हिन्दी नाटकों के ऐतिहासिक विकास-क्रम में पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान भारतेन्दु की तुलना में इतना नगण्य है कि नाटक के क्षेत्र में द्विवेदी-युग को अलग से स्वीकार करना और महत्त्व प्रदान करना औचित्यपूर्ण प्रतीत नहीं होता है। भारतेन्दु के अवसान के साथ नाटक के ”ास के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। अपने युग की समस्याओं को नाट्यरूप प्रदान करने का जो अदम्य साहस भारतेन्दु युग के लेखकों में दिखाई पड़ा था उसके दर्शन द्विवेदी-युग में नहीं होते। इसके कई कारण थे। प्रथम तो हिन्दी के नाटककारों में नाटक के सूक्ष्म नियमों एवं विधियों की योजना की क्षमता न थी। दूसरे, नाटकों के इस उदयकाल की सामाजिक स्थिति विक्षोभ पैदा करने वाली थी। इस प्रवृति ने कुछ कर बैठने की प्रेरणा तो दी किन्तु भावों और विचारों को घटनाओं के साथ कलात्मक ढंग से नियोजित करने के लिए मानसिक सन्तुलन नहीं प्रदान किया। तीसरे, आर्य समाज के आन्दोलन के लेखकों पर सुधारवादी जीवन दृष्टि और शास्त्रार्थ शैली का प्रभाव पड़ा जो निश्चय ही नाटकों के कलात्मक विकास में बाधक हुआ। चौथे, पाश्चात्य ‘कॉमेडी’ के अंधानुकरण के कारण भारतेन्दु के उपरान्त हिन्दी साहित्य में प्रहसनों की प्रवृत्ति भी पनप उठी। प्रहसनों की वृिद्ध ने साहित्यिक एवं कलात्मक अभिनयपूर्ण नाटकों की रचना में व्याघात उपस्थित किया। पांचवें, द्विवेदी-युग नैतिकता और सुधार का युग था। नैतिकता और आदर्श के प्रतिस्थापन में उनकी दृष्टिकोण संस्कृत के नाटककारों की भांति उदारवादी था अतएव भारतेन्दु-युग की नवीनता परवर्ती युग के स्वभाव के अनुकूल न थी। अतः कठोर नीतिवादी अथवा आदर्शात्मक बुद्धिवाद के फलस्वरूप द्विवेदी-युग, भारतेन्दु-युग की परम्परा को अग्रसर नहीं कर सका। +उपर्युक्त सभी कारणों के फलस्वरूप आलोच्य युग में मौलिक नाटकों की संख्या अत्यल्प है अनुवाद-कार्य पर अधिक बल रहा है। मौलिक नाटकों में साहित्य की दो धाराएं प्रमुख हैं : +साहित्यिक नाट्य धारा को विकसित करने के उद्देश्य से अनेक नाटक मंडलियों की स्थापना की गई जेसे प्रयाग की ‘हिन्दी नाटक मण्डली’, कलकत्ते की नागरी नाटक मंडल’ मुजफ्रफरनगर की ‘नवयुवक समिति’ आदि। इनमें ‘हिन्दी नाट्य-समिति’ सबसे अधिक पुरानी थी। सन् 1893 ई. में यह ‘रामलीला नाटक मंडली’ के रूप में स्थापित हुई थी। इसके संस्थापकों में प्रमुख थे : पंडित माधव शुक्ल जो स्वयं अच्छे अभिनेता और रंगकर्मी थे और जिन्होंने राष्ट्रीयता चेतना प्रचार-प्रसार के लिए नाटकों को सशक्त माध्यम बनाया था। किन्तु हिन्दी रंगमंच समुचित साधन और संरक्षण के अभाव में तथा जनता की सस्ती रुचि के कारण अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाया। फलतः नाटक का साहित्यिक रूप ही सामने आया। संख्या की दृष्टि में आलोच्यकाल में लिखे गये नाटक कम नहीं हैं किन्तु मौलिक नाटकों के नाम पर ऐतिहासिक पौराणिक प्रसंगों को ही नाटकों में या कथोपकथन में परिवर्तित कर दिया गया। अध्ययन की सुविधा के लिए आलोच्य युग के नाटकों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है : पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक उपादानों पर रचित नाटक, रोमांचकारी नाटक, प्रहसन और अनूदित नाटक। +पौराणिक नाटक. +हृदय की वृत्तियों की सत्त्व की ओर उन्मुख करने का प्रयास भारतेन्दु-युग के नाटकों में बहुत पहले से होता आ रहा था। द्विवेदी-युग से इन वृत्तियों के उत्कर्ष के लिए पौराणिक आख्यानों का निःसंकोच ग्रहण किया गया। आलोच्य युग में पौराणिक नाटकों के तीन वर्ग देखने को मिलते हैं : कृष्णचरित-सम्बन्धी, रामचरित सम्बन्धी तथा अन्य पौराणिक पात्रों एवं घटनाओं से सम्बन्धित। कृष्ण चरित सम्बन्धी नाटकों में राधाचरण गोस्वामी कृत ‘श्रीदामा’ (1904), ब्रज नन्दन सहाय-कृत ‘उद्धव’ (1909), नारायण मिश्र-कृत ‘कंसवध’ (1910), शिव नन्दन सहाय-कृत ‘सुदामा।’ (1907) और बनवारी लाल-कृत ‘कृष्ण तथा कंसवध’ (1910) को विशेष ख्याति प्राप्त है। रामचरित-सम्बन्धी नाटकों में रामनारायण मिश्र-कृत ‘जनक बड़ा’ (1906) गिरधर लाल-कृत ‘रामवन यात्रा’ (1910) और गंगाप्रसाद-कृत ‘रामाभिषेक’ (1910), नारायण सहाय-कृत ‘रामलीला’ (1911), और राम गुलाम लाल-कृत ‘धनुषयज्ञ लीला (1912), उल्लेखनीय हैं। अन्य पौराणिक घटनाओं से सम्बन्धित नाटकों में महावीर सिंह का ‘नल दमयन्ती’ (1905), सुदर्शनाचार्य का ‘अनार्थ नल चरित’ (1906), बांके बिहारी लाल का ‘सावित्री नाटिका’ (1908), बालकृष्ण भट्ट का ‘बेणुसंहार’ (1909), लक्ष्मी प्रसाद का ‘उर्वशी’ (1907) और हनुमंतसिंह का ‘सती चरित’ (1910), शिवनन्दन मिश्र का ‘शकुन्तला’ (1911), जयशंकर प्रसाद का ‘करुणालय (1912) बद्रीनाथ भट्ट का ‘कुरुवन दहन’ (1915), माधव शुक्ल का ‘महाभारत-पूर्वाद्धर्’ (1916), हरिदास माणिक का ‘पाण्डव-प्रताप’ (1917) तथा माखन लाल चतुर्वेदी का ‘कृष्णार्जुन-युद्ध (1918) महत्वपूर्ण हैं। +इन नाटकों का विषय पौराणिक होते हुए भी पारसी रंगमंच के अनुरूप मनोरंजन करने के लिए हास-परिहास, शोखी और छेड़छाड़ के वातावरण का ही आधार ग्रहण किया गया है। +ऐतिहासिक नाटक. +पौराणिक नाटकों के साथ ही इस काल में कुछ ऐतिहासिक नाटक भी लिखे गए जिनमें : गंगाप्रसाद गुप्त का ‘वीर जय माल’ (1903), शालिग्राम कृत ‘पुरु विक्रम’ (1905), वृन्दावन लाल वर्मा का ‘सेनापति ऊदल’ (1909), कृष्ण प्रकाश सिंह कृत ‘पन्ना’ (1915), बद्रीनाथ भट्ट कृत ‘चन्द्रगुप्त’ (1915), हरिदास माणिक-कृत ‘संयोगिता हरण’ (1915), जयशंकर प्रसाद का ‘राज्यश्री’ (1915) और परमेश्वरदास जैन का ‘वीर चूड़ावत सरदार’ (1918) महत्त्वपूर्ण हैं। इन नाटकों में प्रसाद के ‘राज्यश्री’ नाटक को छोड़कर और किसी भी नाटक में इतिहास-तत्त्व की रक्षा नहीं हो सकी। +सामाजिक-राजनैतिक समस्यापरक नाटक. +द्विवेदी-युग में भारतेन्दु-युग की सामाजिक-राजनीतिक और समस्यापरक नाटकों की प्रवृत्ति का अनुसरण भी होता रहा है। इस धारा के नाटकों में प्रताप नारायण मिश्र-कृत ‘भारत दुर्दशा’ (1903) भगवती प्रसाद-कृत ‘वृद्ध विवाह’ (1905), जीवानन्द शर्मा-कृत ‘भारत विजय’ (1906), रुद्रदत शर्मा-कृत ‘कंठी जनेऊ का विवाह’ (1906), कृष्णानन्द जोशी-कृत ‘उन्नति कहां से होगी’ (1915), मिश्र बन्धुओं का ‘नेत्रोन्मीलन' (1915) आदि +कई नाटक गिनाए जा सकते हैं। नाट्यकला की दृष्टि से विशेष महत्व न रखते हुए भी ये नाटक, समाज सुधार और नैतिकवादी जीवन दृष्टि से युक्त हैं। +व्यवसायिक दृष्टि से लिखे नाटक. +इस युग में पारसी रंगमंच सक्रिय रहा जिसके लिए निरन्तर रोमांचकारी, रोमानी और धार्मिक नाटक लिखे जाते रहे। पारसी नाटक कम्पनियों के रूप में व्यवसायी रंगमंच का प्रसार भारतेन्दु-युग में ही हो चुका था। इस काल में ‘ओरिजिनल थियेट्रिकल कम्पनी’, ‘विक्टोरिया थियेट्रिकल कम्पनी’, ‘एल्प्रफेड थियेट्रिकल कम्पनी’, ‘शेक्सपीयर थिटेट्रिकल कम्पनी’, ‘जुबिली कम्पनी’ आदि कई कम्पनियां 'गुलबकावली’, ‘कनकतारा’, ‘इन्दर सभा’, ‘दिलफरोश’, ‘गुल फरोश’, ‘यहूदी की लड़की’, जैसे रोमांचकारी नाटक खेलती थीं। रोमांचकारी रंगमंचीय नाटककारों में मोहम्मद मियाँ रादक’, हुसैन मियाँ ‘जर्राफ’, मुन्शी विनायक प्रसाद ‘तालिब’, सैयद मेंहदी हसन ‘अहसान’, नारायण प्रसाद बेताब’, आगा मोहम्मद हश्र’ और राधेश्याम ‘कथावाचक’ उल्लेखनीय हैं। इनमें राधेश्याम कथावाचक और ‘बेताब’ ने सुरुचिपूर्ण धार्मिक-सामाजिक नाटक भी लिखे, किन्तु पारसी रंगमंच का सारा वातावरण दूषित ही रहा, जिसने द्विवेदी-युग में नाट्य लेखन की धारा को कुंठित कर दिया। +प्रहसन. +इस काल में अनेकानेक स्वतंत्र प्रहसन भी लिखे गये। अधिकांश प्रहसन लेखकों पर पारसी रंगमंच का प्रभाव है, इसलिए वे अमर्यादित एवं उच्द्दष्ंखल हैं। प्रहसनकारों में बदरीनाथ भट्ट एवं जी. पी. श्रीवास्तव के नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं। भट्ट जी के ‘मिस अमेरिका’, ‘चुंगी की उम्मीदवारी’, ‘विवाह विज्ञापन’, ‘लबड़ध ोंधों’ आदि शिष्ट-हास्यपूर्ण प्रहसन हैं। जी.पी. श्रीवास्तव ने छोटे-बड़े अनेक प्रहसन लिखे हैं। इन प्रहसनों में सौष्ठव और मर्यादा का अभाव है। +अनूदित नाटक. +मौलिक नाटकों की कमी द्विवेदी-युग में अनूदित नाटकों द्वारा पूरी की गई। सामाजिक तथा राजनीतिक अशान्ति के इस वातावरण में लेखकों को हिन्दी नाटक-साहित्य की हीनता स्पष्ट दिखाई देती थी। अतः कुछ थोड़े उदात्तवादी परम्परा के लोगों का ध्यान संस्कृत नाटकों की ओर गया, परन्तु अधिकांश का अध्ययन बंगला तथा पाश्चात्य नाटकों की ओर ही अधिक था। +संस्कृत से लाला सीताराम ने ‘नागानन्द’, ‘मृच्छकटिक’, ‘महावीरचरित’, ‘उत्तररामचरित’, मालती माधव’ और ‘मालविकाग्निमित्र’ और सत्यनारायण कविरत्न ने ‘उत्तररामचरित’ का अनुवाद किया। अंग्रेजी से शेक्सपीयर के नाटकों ‘हेमलेट’, ‘रिचर्ड’ द्वितीय’, ‘मैकवेथ’ आदि का हिन्दी में अनुवाद भी लाला सीताराम ने किया। प्रफांस के प्रसिद्ध नाटककार ओलिवर’ के नाटकों को लल्लीप्रसाद पांडेय और गंगाप्रसाद श्रीवास्तव ने अंग्रेजी के माध्यम से अनूदित किया। +बंगला नाटकों का अनुवाद प्रस्तुत करने वालों में गोपालराम गहमरी स्मरणीय हैं। उन्होंने ‘बनवीर’ ‘बभ्रुवाहन’, ‘देश दशा’, ‘विद्याविनोद’, ‘चित्रागंदा’ आदि बंगला नाटकों के अनुवाद किये। बंगला नाटकों के अन्य समर्थ अनुवादक रामचन्द्र वर्मा तथा रूप नारायण पांडेय हैं। उन्होंने गिरीशचन्द्र घोष, द्विजेन्द्र लाल राय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मनमोहन गोस्वामी, ज्योतीन्द्रनाथ ठाकुर तथा क्षीरोद प्रसाद के नाटकों का अनुवाद किया। पांडेय जी के अनुवाद बड़े सफल हैं, उनमें मूल नाटकों की आत्मा को अधिक सुरक्षित रखने का प्रयत्न किया गया है। +इसी प्रकार भारतेन्दु-युग तथा प्रसाद-युग को जोड़ने वाले बीच के लगभग 25-30 वर्षों में कोई उल्लेखनीय नाटक नहीं मिलता। भले ही प्रसाद-युगीन नाटककारों की आरम्भिक नाट्य कृतियाँ द्विवेदी-युग की सीमा में आती हैं परन्तु आगे चलकर उनकी नाट्य कृतियों में जो वैशिष्ट्य आता है, वह उन्हें द्विवेदी-युग के लेखकों से पृथक्क् कर देता है। द्विवेदी-युग में हिन्दी रंगमंच विशेष सक्रिय नहीं रहा। इस युग में बद्रीनाथ भट्ट ही अपवादस्वरूप एक ऐसे नाटककार थे, जिन्होंने नाटकीय क्षमता का परिचय दिया है किन्तु इनके नाटक भी पारसी कम्पनियों के प्रभाव से अछूते नहीं हैं। उनमें उत्कृष्ट साहित्यिक तत्त्व का अभाव है। +प्रसाद-युगीन नाटक. +प्रसाद का आगमन नाट्य रचना में व्याप्त गतिरोध को समाप्त करने वाले युग-विधायक व्यक्ति के रूप में हुआ। उन्होंने एक प्रवर्त्तक के रूप में कविता, नाटक तथा निबंध आदि सभी क्षेत्रों में युग का प्रतिनिधित्व किया। डॉ. गुलाबराय का कहना है, ‘प्रसाद जी स्वयं एक युग थे।’ उन्होंने हिन्दी नाटकों में मौलिक क्रांति की। उनके नाटकों को पढ़कर लोग जितेन्द्र लाल के नाटकों को भूल गये। वर्तमान जगत के संघर्ष और कोलाहलमय जीवन से ऊबा हुआ उनका हृदयस्थ कवि उन्हें स्वर्णिम आभा से दीप्त दूरस्थ अतीत की ओर ले गया। उन्होंने अतीत के इतिवृत्त में भावना का मधु और दार्शनिकता का रसायन घोलकर समाज को एक ऐसा पौष्टिक अवलेह दिया जो ह्रास की मनोवृत्ति को दूर कर उसमें एक नई सांस्कृतिक चेतना का संचार कर सके। उनके नाटकों में द्विजेन्द्रलाल राय की सी ऐतिहासिकता और रवि बाबू की-सी दार्शनिकतापूर्ण भावुकता के दर्शन होते हैं। +प्रसाद की आरम्भिक नाट्य कृतियां : सज्जन (1910), ‘कल्याणी परिणय (1912), प्रायश्चित (1912), करुणालय (1913) और राज्यश्री (1918), द्विवेदी-युग की सीमा के अंतर्गत आती हैं। प्रसाद के इन नाटकों में उनका परम्परागत रूप तथा प्रयोग में भटकती हुई नाट्य दृष्टि ही प्रमुखता से उभर कर सामने आती है। नाटक रचना का प्रारम्भिक काल होने के कारण इन कृतियों में प्रसाद की नाट्य कला का स्वरूप स्थिर नहीं हो पाया है, वह अपनी दिशा खोज रही है। यह दिशा उन्हें विशाख (1921), अजातशत्रु (1922), कामना (1927), जनमेजय का नागयज्ञ (1926) स्कन्दगुप्त (1928), एक घूँट (1930), चन्द्रगुप्त (1931) और ध्रुवस्वामिनी (1933) में प्राप्त हुई। इन नाटकों में प्रसाद जी ने अपनी गवेषणा शक्ति और सूक्ष्म दृष्टि का परिचय दिया। +‘सज्जन’ का कथानक महाभारत की एक घटना पर आधारित है। इस नाटक में प्रसाद जी ने परम्परागत मान्यताओं को स्वीकार करते हुए भारतेन्दु-कालीन नाट्य-प्रणाली को अपनाया है। ‘कल्याणी : परिणय’ भी प्रसाद का प्रारम्भिक प्रयास है, जिसका अंतर्भाव उन्होंने बाद में ‘चन्द्रगुप्त’ के चतुर्थ अंक के रूप में किया है। ‘करुणालय’ बंगला के ‘अमित्राक्षर अरिल्ल छंद’ की शैली पर लिखा गया गीति-नाट्य है। ‘प्रायश्चित’ हिन्दी का प्रथम दुखांत मौलिक रूपक है। शिल्प-विधान की दृष्टि से प्रसाद ने इसमें सर्वप्रथम पाश्चात्य नाट्य-शिल्प को अपनाने का प्रयास किया है। सही अर्थों में ‘राज्यश्री’ प्रसाद का प्रथम उत्कृष्ट ऐतिहासिक नाटक है। ‘विशाख’ प्रसाद की पूर्ववर्ती और परवर्ती नाटकों में एक विभेदक रेखा है। इनका कथानक साधारण होते हुए भी देश की तत्कालीन राजनैतिक धार्मिक और सामाजिक समस्याओं की अभिव्यक्ति से ओतप्रोत है यद्यपि प्रसाद के अधिकांश नाटक ऐतिहासिक ही हैं परन्तु इतिहास की पीठिका में वर्तमान की समस्याओं को वाणी देने का विचार प्रसाद ने सर्वप्रथम इसी नाटक में व्यक्त किया है। भूमिका में वे लिखते हैं मेरी इच्छा भारतीय इतिहास के अप्रकाशित अंश में से उन प्रकांड घटनाओं का दिग्दर्शन कराने की है जिन्होंने हमारी वर्तमान स्थिति को बनाने में बहुत प्रयास किया है। और वह वर्तमान स्थिति परतंत्र भारत के राजनैतिक सामाजिक परिवेश से जुड़ी हुई थी। अपनी सत्ता को स्थानयी बनाये रखने के लिए ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीयों में फूट डालने के लिए अपनाये गये साम्प्रदायिकता, प्रांतीयतावाद के हथकण्डे प्रसाद से छिपे नहीं थे। अतः इतिहास की पीठिका पर उन्होंने वर्तमान के इन प्रश्नों को यथार्थ की दृष्टि से उठाते हुए समन्वयवादी आदर्श समाधान प्रस्तुत किये। युगीन साम्प्रदायिक प्रभावों को आत्मसात करते हुए प्रसाद ने अपने नाटकों में ब्राह्मण-बौद्ध धार्मिक संघर्षों को रूपायित किया है। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ नाटक आर्यों और नागजति तथा आर्य-नाग-संघर्ष की पृष्ठभूमि में रचा गया है। ‘अजातशत्रु’ में आर्य जनपदों का पारस्परिक संघर्ष परोक्ष रूप में युगीनसाम्प्रदायिक संघर्षों का ही प्रतिरूप है। इस प्रकार अपनी इन प्रौढ़ कृतियों में प्रसाद ने जातीय, क्षेत्रीय तथा वैयक्तिक भेदों को मिटाकर व्यापक राष्ट्रीयता का आह्नान किया है। इस दृष्टि से ‘स्कन्दगुप्त’ और ‘चन्द्रगुप्त’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ‘कामना’ और ‘एक घूंट’ भिन्न कोटि के नाटक हैं। इनकी कथावस्तु ऐतिहासिक नहीं है। कथ्य की दृष्टि से भी ये भिन्न हैं। इनमें प्रसाद ने भौतिक विलासिता का विरोध किया है। ‘कामना’ में विभिन्न भावों को पात्र रूप में प्रस्तुत किया गया है, इसलिए उसे प्रतीक नाटक कहा जा सकता है। ‘एक घूट’ एकांकी है और उसमें प्रसाद ने यथार्थ और आदर्श की स्थिति, जीवन का लक्ष्य और स्त्री-पुरुष की प्रेम-भावना के सामंजस्य को चित्रित किया है। ‘धु्रवस्वामिनी प्रसाद की अन्तिम कृति है। अन्य नाटकों में प्रसाद विशेष रूप से राजनैतिक प्रश्नों के यथार्थ से जूझते रहे हैं, परन्तु ‘ध्रुवस्वामिनी’ में सामाजिक जीवन की वर्तमान युगीन नारी समस्या पर बौद्धक विचार विमर्श कर यथार्थ दृष्टि का परिचय दिया है। नारी-जीवन की इस सामाजिक समस्या के प्रति प्रसाद का आकर्षण वर्तमान नारी-आन्दोलन का ही परिणाम है। आज के समाज में नारी की स्थिति, दासता की श्रृंखला से उसकी मुक्ति, विशिष्ट परिस्थितियों में पुर्नविवाह की समस्या को बड़े साहस, संयम, तर्क और विचार एवं धर्म की पीठिका पर स्थित करके इस नाटक में सुलझाया गया है। +स्पष्ट है कि प्रसाद जी ने हिन्दी नाटक की प्रवहमान् धारा को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा किया। वे एक सक्षम साहित्यकार थे। उनके हृदय में भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध ममता थी। उन्हें विश्वास था कि भारतीय संस्कृति ही मानवता का पथ प्रशस्त कर सकती है। इसी कारण अपने नाटकों द्वारा प्रसाद जी ने भारतीय संस्कृति के भव्य रूप की झांकी दिखाकर राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ-साथ अपने देश के अधुनातन निर्माण की पीठिका भी प्रस्तुत की है। भारतेन्दु ने अपने नाटकों में जिस प्राचीन भारतीय संस्कृति की स्मृति को भारत की सोई हुई जनता के हृदय में जगाया था, प्रसाद ने नाटकों में उसी संस्कृति के उदात्त और मानवीय रूप पर अपनी भावी संस्कृति के निर्माण की चेतना प्रदान की। पर यह समझना भी भूल होगी कि उन्होंने केवल भारतीय संस्कृति के गौरव-गान के लिए ही नाटकों की रचना की। वस्तुतः उनका नाट्य साहित्य ऐतिहासिक होते हुए भी सम-सामयिक जीवन के प्रति उदासीन नहीं है, वह प्रत्यक्ष को लेकर मुखर है और उनमें लोक-संग्रह का प्रयत्न है, राष्ट्र के उद्बोधन की आकांक्षा है। +प्रसाद से पूर्व साहित्यिक नाटकों का अभाव था। जिस समय भारतेन्दु ने नाटक-रचना की शुरुआत की, उनके सामने पहले से निश्चित, प्रतिष्ठित हिन्दी का कोई रंगमंच न था, अतः उन्होंने संस्कृत, लोकनाटक एवं पारसी रंगमंच शैली की विभिन्न रंगपरम्पराओं को सुधारवादी यथार्थ कथ्य के अनुरूप मोड़ देने का स्तुत्य प्रयास किया। प्रसाद के युग तक नाटकों में पारसी रंगशिल्प का स्वरूप निर्धारित हो चुका था, अतः पारसी रंगमंच की अतिरंजना, चमत्कार, फूहड़ता, शोखभाषा, चुलबुले संवाद, शेरोशायरी के घटियापन की प्रतिक्रिया में प्रसाद ने अपने ऐतिहासिक, राष्ट्रीय नाटकों की रचना की। दार्शनिकता, सांस्कृतिक बोध, उदात्त कल्पना, काव्यमय अलंकृति, दुरूह भाषा का विन्यास उनकी उपलब्धि था। पिफर भी साहित्यिक और कलात्मक वैशिष्ट्य होते हुए भी प्रसाद में नाट्य शिल्प के अनेक दोष दिखाई देते हैं। एक तथ्य यह है कि प्रकारान्तर से उन्होंने अतिरंजना की रूढ़ि को किंचित परिवर्तन के साथ ग्रहण किया। यह परिवर्तन प्रमुखतः शेक्सपीयर के जीवन-बोध, एवं रंगविधान के प्रभावस्वरूप ही आया था। शेक्सपीयर का रोमानी बोध एवं नियतिवाद संभवतः भारतीय युगीन परिवेश के कारण भी स्वतः उद्भूत होकर प्रसाद की चेतना पर छा गया था। इन्हीं कारणों से प्रसाद मूलतः कवि, दार्शनिक तथा संस्कृति के जागरूक समर्थक थे। जीवन दृष्टि के अनुरूप उन्होंने अपने नाटकों की रचना स्वच्छन्दतावादी नाट्य-प्रणालियों को आधार बनाकर कल्पना, भावुकता, सौन्दर्य-प्रेम, अतीत के प्रति अनुराग, उच्चादर्शों के प्रति मोह तथा शैली शिल्प की स्वच्छन्दता आदि को ग्रहण किया। किन्तु ऐसे साहित्यिक नाटकों के अनुरूप रंगमंच हिन्दी में नहीं था इसलिए अन्य सभी दृष्टियों से सफल होते हुए भी प्रसाद के नाटक अभिनय की दृष्टि से सफल नहीं हो सके। इधर हिन्दी रंगमंच के क्षेत्र में नए प्रयोग हो रहे हैं जिससे आज के रंगकर्मी, प्रसाद के नाटकों को चुनौती के रूप में स्वीकार करने लगे हैं। उनके नाटकों को इसीलिए सर्वथा अभिनेय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनमें से कुछ छुटपुट रूप से उनके जीवन काल में ही खेले गये थे। पिफर भी आकार की विपुलता, दृश्यों की भरमार, चरित्र-बाहुल्य और विलक्षण दृश्य-योजना उनके नाटकों को रंगमंच के लिए अति कठिन बना देती है। +आधुनिक हिन्दी नाटक साहित्य के विकास में जयशंकर प्रसाद के बाद हरिकृष्ण प्रेमी को गौरवपूर्ण स्थान दिया जाता है। प्रसाद-युग में ‘प्रेमी’ ने ‘स्वर्ण-विहान’ (1930), ‘रक्षाबन्धन’ (1934), ‘पाताल विजय’ (1936), ‘प्रतिशोध’ (1937), ‘शिवासाधना’ (1937) आदि नाटक लिखे हैं। इनमें ‘स्वर्ण विहान’, गीतिनाट्य है और शेष गद्य नाटक। प्रसाद ने जहाँ प्राचीन भारत का चित्रण करते हुए सत्य, प्रेम, अहिंसा व त्याग का संदेश दिया, वहाँ प्रेमी जी ने मुस्लिम-युगीन भारत को नाट्य-विषय के रूप में ग्रहण करते हुए हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया। देश के उत्थान और संगठन के लिए इनके नाटक राष्ट्रीय भावना का प्रचार करने वाले हैं। प्रेमी जी प्रसाद की परम्परा के अनुयायी हैं। परन्तु उन्होंने प्रसाद जी की भांति अपने नाटकों को साहित्यिक और पाठ्य ही न रखकर उनको रंगमंच के योग्य भी बनाया है। साहित्यिकता और रंगमंचीयता का समन्वय है उनके नाटकों की विशेषता है। उन्होंने संस्कृत नाट्य परम्परा का अनुसरण न करके पाश्चात्य नाट्यकला को अपनाया है। इन नाटकों के कथानक संक्षिप्त एवं सुगठित, चरित्र सरल एवं स्पष्ट, संवाद पात्रानुकूल एवं शैली सरल व स्वभाविक है। +उपर्युक्त प्रमुख नाट्य कृतियों के अतिरिक्त आलोच्य युग में धार्मिक-पौराणिक और ऐतिहासिक नाटकों की रचना अत्यधिक हुई। इन नाटकों में कलात्मक विकास विशेष रूप से नहीं हुआ, किन्तु युग की नवीन प्रवृत्तियों से प्रभावित होकर कई नाटककारों ने अपनी रचनाओं में नवीन दृष्टिकोण को अपनाया। धार्मिक नाट्यधाराके अन्तर्गत कृष्ण चरित-राम चरित, पौराणिक तथा अन्य सन्त महात्माओं के चरित्रों को लेकर रचनाएं प्रस्तुत की गइंर्। इस धारा की उल्लेखनीय रचनाएं हैं : अम्बिकादत्त त्रिपाठी कृत ‘सीय-स्वयंवर’ (1918), रामचरित उपाध्याय-कृत ‘देवी द्रौपदी’ (1921), राम नरेश त्रिपाठीकृत ‘सुभद्रा’ (1924) तथा ‘जयन्त’ (1934), गंगाप्रसाद अरोड़ा-कृत ‘सावित्री सत्यवान’ गौरीशंकर प्रसाद-कृत- ‘अजामिल चरित्र नाटक’ (1926), पूरिपूर्णानन्द वर्मा-कृत ‘वीर अभिमन्यु नाटक’ (1927), वियोगी हरि-कृत (1925), ‘छद्मयोगिनी’ (1929) और ‘प्रबुद्ध यामुन’ अथवा ‘यामुनाचार्य चरित्र’ (1929), जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी-कृत ‘तुलसीदास’ (1934) लक्ष्मीनारायण गर्ग-कृत’ श्री कृष्णावतार’, किशोरी दास वायपेयी-कृत ‘सुदामा’ (1934), हरिऔध-कृत ‘प्रद्युम्न विजय व्यायोग’ (1939), सेठ गोविन्ददास-कृत ‘कर्त्तव्य’ (1936) आदि। राष्ट्रीय चेतना की प्रधानता होने के कारण धार्मिक नाटकों में भी राष्ट्रीयता का चित्रण हुआ। नाटकों में अति-नाटकीय और अति-मानवता का बहिष्कार किया गया है। प्राचीन रूढ़ियों और मान्यताओं को पूर्ण रूप से हटाने की चेष्टा की गयी है। इस प्रकार की रचनाओं में नाटककारों ने प्रायः कथावस्तु प्राचीन साहित्य से लेकर उसी पुराने ढांचे में नई बुद्धवादी धाराओं तथा विचारधाराओं के अनुसार आधुनिक युग की समस्याओं को उनमें पिफट कर दिया है। +प्रसाद युग में इतिहास का आधारलेकर अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाएं प्रस्तुत की गई। इस समय के नाटककारों की दृष्टि इतिहास की ओर विशेष रूप से गई क्योंकि यह युग पुनरुत्थान और नवजागरणवादी प्रवृत्तियों से अनुप्राणित था। फलतः जन साधारण में अपने गौरवपूर्ण इतिहास तथा अपनी महान सांस्कृतिक चेतना का संदेश देना इन नाटककारों ने अपना कर्त्तव्य समझा। इस काल की गौण ऐतिहासिक कृतियों में गणेशदत्त इन्द्र-कृत ‘महाराणा संग्रामसिंह’ (1911), भंवरलाल सोनी-कृत ‘वीर कुमार छत्रसाल’ (1923), चन्द्रराज भण्डारी-कृत ‘सम्राट’ अशोक (1923) ज्ञानचन्द्र शास्त्री-कृत ‘जयश्री’ (1924) प्रेमचन्द-कृत ‘कर्बला’ (1928), जिनेश्वर प्रसाद भायल-कृत ‘भारत गौरव’ अर्थात् ‘सम्राट चन्द्रगुप्त’ (1928) दशरथ ओझा-कृत ‘चित्तौड़ की देवी’ (1928) और प्रियदर्शी सम्राट अशोक (1935), जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द-कृत ‘प्रताप प्रतिज्ञा’ (1929), चतुरसेन शास्त्री-कृत ‘उपसर्ग’ (1929) और ‘अमर राठौर’ (1933) उदयशंकर भट्ट-कृत ‘विक्रमादित्य’ (1929) और ‘दाहर अथवा सिंधपतन’ (1943), द्वारिका प्रसाद मौर्य : कृत ‘हैदर अली या मैसूर-पतन’ (1934), धनीराम प्रेम-कृत ‘वीरांगना पन्ना’ (1933) जगदीश शास्त्री-कृत ‘तक्षशिला’ (1937) उमाशंकर शर्मा-कृत ‘महाराणा प्रताप’ आदि को विशेष ख्याति प्राप्त हुई है। इन नाटककारों ने आदर्शवादी प्रवृत्ति के बावजूद स्वभाविकता का बराबर ध्यान रखा और कल्पना और मनोविज्ञान की सहायता से प्राचीन काल की घटनाओं और चरित्रों को स्वाभाविकता के साथ चित्रित करने की चेष्टा की। पुरानी मान्यताओं तथा अतिलौकिक वर्णनों के स्थान पर वास्तविक कथा-वस्तु को प्रयोग में लाया गया है। इन चरित्रों में संघर्ष का भी समावेश हुआ। सारांश यह है कि इन नाटकों के कथानक महत् हैं, चरित्र सभी दार्शनिक और आदर्शवादी हैं, शैली कवित्वपूर्ण और अतिरंजित है और नाटकों का वातावरण संगीत और काव्यपूर्ण है। ये नाट्य-कृतियां हिन्दी नाट्य-कला विकास का एक महत्त्वपूर्ण चरण पूरा करती हैं। +इस युग में पौराणिक और ऐतिहासिक नाटकों की परम्परा का महत्त्वपूर्ण स्थान तो रहा ही है, इसके अतिरिक्त सामाजिक नाटकोंकी रचना भी बहुतायत से हुई है। सामाजिक नाटकों में विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ कृत ‘अत्याचार का परिणाम’ (1921) और ‘हिन्द विधवा नाटक’ (1935), ‘प्रेमचन्द-कृत ‘संग्राम’ (1922) ईश्वरी प्रसाद शर्मा-कृत दुर्दशा (1922), सुदर्शन-कृत ‘अंजना’ (1923), ‘आनरेरी मैजिस्ट्रेट’ (1929), और ‘भयानक’ (1937), गोविन्दवल्लभ पन्त-कृत ‘कंजूस की खोपड़ी’ (1923) और ‘अंगूर की बेटी’ (1929), बैजनाथ चावला-कृत ‘भारत का आधुनिक समाज’ (1929), नर्मदेश्वरी प्रसाद ‘राम’-कृत ‘अछूतोद्वार’ (1926), छविनाथ पांडेय-कृत ‘समाज’ (1929), केदारनाथ बजाज-कृत ‘बिलखती ‘विधवा’ (1930), जमनादास मेहरा-कृत ‘हिन्दू कन्या’ (1932), महादेव प्रसाद शर्मा-कृत ‘समय का फेर’, बलदेव प्रसाद मिश्र-कृत ‘विचित्र विवाह’ (1932) और ‘समाज सेवक’ (1933) रघुनाथ चौधरी-कृत ‘अछूत की लड़की या समाज की चिनगारी’ (1934), महावीर बेनुवंश-कृत ‘परदा’ (1936), बेचन शर्मा ‘उग्र’-कृत ‘चुम्बन’ (1937) और डिक्टेटर’ (1937), रघुवीर स्वरूप भटनागर-कृत ‘समाज की पुकार’ (1937), अमर विशारद-कृत ‘त्यागी युवक’ (1937) चन्द्रिका प्रसाद सिंह-कृत ‘कन्या विक्रय या लोभी पिता’ (1937) आदि उल्लेखनीय हैं। इन नाटकों में सामाजिक विकृतियों : बाल विवाह, विधवा-विवाह का विरोध, नारी स्वतंत्रता आदि का चित्रण करते हुए उनके उन्मूलन का प्रयास दृष्टिगोचर होता है। इन नाटकों में समुन्नत समाज की स्थापना का प्रयास किया गया है, भले ही नाट्यकला की दृष्टि से ये नाटक उच्चकोटि के नहीं हैं। +आलोच्य युग में शृंगार-प्रधान नाटकों का प्रायः ह्रास हो गया था। थोड़ी बहुत प्रतीकवादी परम्परा चल रही थी, किन्तु उसकी गति बहुत धीमी थी। प्रतीक का महत्व वस्तुतः सांकेतिक अर्थ में है। इस अवधि में प्रसाद की ‘कामना’ के पश्चात् सुमित्रानन्दन पन्त-कृत ज्योत्स्ना’ (1934) इस शैली की उल्लेखनीय रचना है। इसमें पंत की रंगीन कल्पनामयी झांकी का मनोरम स्वरूप व्यक्त होता है। इसके अतिरिक्त एक नाट्य-धारा व्यंग्य-विनोद प्रधान नाटकों को लेकर थी। इसको प्रमुख रूप से समाज की त्रुटियों, रूढ़िगत विचारों अथवा किसी व्यक्ति विशेष की विलक्षण प्रवृत्तियों पर चोट करने के लिए प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार से किसी भी समस्या पर किया हुआ प्रहार ऊपर से तो साधारण सा प्रतीत होता है। किन्तु तनिक भी ध्यान देने पर उसके पीछे छिपा हुआ अर्थ-गाम्भीर्य स्पष्ट हो जाता है। हास्य-व्यंग्य प्रधान नाटकों में जी.पी. श्रीवास्तव का ‘दुमदार आदमी’ (1919) गड़बड़ झाला (1919), नाक में दम उपर्फ जवानी बनाम बुढ़ापा उपर्फ मियां का जूता मियां के सर (1926) भूलचूक (1928), चोर के घर छिछोर (1933) चाल बेढव (1934), साहित्य का सपूत (1934), स्वामी चौखटानन्द (1936) आदि प्रसिद्ध हैं। जनता में इन नाटकों का खूब प्रचार हुआ परन्तु रस और कला की दृष्टि से ये निम्नकोटि की रचनाएं हैं। इस युग में कतिपय गीति-नाटकों की भी रचना हुई। इसमें प्रमुख हैं : मैथिलीशरण गुप्त का ‘अनघ’ (1928) हरिकृष्ण प्रेमी-कृत ‘स्वर्ण विहान’ (1937) भगवतीचरण वर्मा-कृत ‘तारा’, उदयशंकर भट्ट का मत्स्यगंधा (1937) और विश्वमित्र (1938) आदि उल्लेखनीय है। ‘स्वर्ण विहान’ में जीवन की बहिरंग व्यवस्था की ओर अधिक ध्यान दिया गया है और अन्य में आन्तरिक क्रिया-व्यापारों का चित्रण है। भाव प्रधान होने के कारण इन नाटकों में कार्य-व्यापार तथा घटना चक्र की कमी मिलती है। भावातिरेक ही भाव-नाट्यों की प्राणभूत विशेषता है। +इस प्रकार प्रसाद-युग हिन्दी नाटकों के क्षेत्र में नवीन क्रांति लेकर आया। इस युग के नाटकों में राष्ट्रीय जागरण एवं सांस्कृतिक चेतना का सजीव चित्रण हुआ है किन्तु रंगमंच से लोगों की दृष्टि हट गयी थी। जो नाटक इस युग में रचे गये उनमें इतिहास तत्व प्रमुख था और रंगमंच से कट जाने के कारण वे मात्र पाठ्य नाटक बनकर रह गए। कथ्य के स्तर पर वे देश की तत्कालीन समस्याओं की ओर अवश्य लिखे गये किन्तु उनमें आदर्श का स्वर ही प्रमुख रहा। पिफर भी इतिहास के माध्यम से अपने युग की यथार्थ समस्याओं को अंकित करने में वे पीछे नहीं रहे। +प्रसादोत्तर-युगीन नाटक. +प्रसादोत्तर-युगीन नाटक अधिकाधिक यथार्थ की ओर उन्मुख दिखाई पड़ते हैं। परन्तु भारत के सामने एक विशिष्ट उद्देश्य था राष्ट्र की स्वाधीनता की प्राप्ति और विदेशी शासकों के अत्याचारों से मुक्ति प्राप्त करना, फलस्वरूप व्यापक स्तर पर पुनरुत्थान एवं पुनर्जागरण की लहर फैल गई। इस समूचे काल में पुनर्जागरण की शक्तियों का प्रभाव होने के कारण चेतना के स्तर पर भावुक, आवेशात्मक, आदर्शवादी, प्रवृत्तियों से आक्रांत होना नाटककारों के लिए स्वाभाविक था। यही कारण है कि प्रसादोत्तर काल तक किंचित परिवर्तनों के साथ सभी रचनाकारों की दृष्टि मूलतः आस्था, मर्यादा एवं गौरव के उच्चादर्शों से मंडित रही। भारतेन्दु ने अपनी अद्भुत व्यंग्यशक्ति एवं समाज-विश्लेषण की पैनी दृष्टि से सामाजिक यथार्थ का चित्रण किया परन्तु उनकी मूल चेतना सुधारवादी आग्रहों का परिणाम होने के कारण आस्थामूलक थी। द्विवेदी युग में भी दो दशकों के अनवरत साहित्यिक अनुशासन आदर्शवादी मर्यादा एवं नैतिकता के कठोर बन्धन के कारण यथार्थ के स्वर मिद्धम पड़ गए। प्रसाद युगीन नाटकों की मूलधारा भी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक आदर्श चेतना से सम्बन्धित थी परन्तु खल पात्रों की चारित्रिक दुर्बलताओं तथा सद् पात्रों की जीवन चरित्र-सृष्टि में यथार्थ चेतना को नकारा नहीं जा सकता। 19वीं शताब्दी में पश्चिमी नाट्य साहित्य में इब्सन् एवं शॉ द्वारा प्रवर्तित यथार्थवादी नाट्यान्दोलन ने भारतीय नाट्य साहित्य की गतिविधियों को भी प्रेरित एवं प्रभावित किया। लक्ष्मी नारायण मिश्र ने समस्या नाटकों का सूत्रपात करके बुद्धवादी यथार्थ को प्रतिष्ठित करने का दावा किया है। परन्तु सिद्धांत एवं प्रयोग में पर्याप्त अन्तर पाते हुए हम देखते हैं कि एक ओर वैचारिक धरातल पर प्रकृतवाद सुलभ जीवन के क्रांतिव्यंजक सम्बन्ध उभरते हैं, वहीं दूसरी ओर समाधान खोजते हुए परम्परा के प्रति भावुकता-सिक्त दृष्टि भी पाई जाती है। ‘भावात्मकता और बौद्धकता’ का घपला होने के कारण उनके नाटकों का मूल स्वर यथार्थ से बिखर जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व अन्य युगीन सामाजिक समस्याओं के साथ राष्ट्र की मुक्ति का प्रश्न सभी नाटककारों की चेतना पर छाया हुआ था। स्वाधीन भारत से उन्हें अनेक प्रकार की मीठी अपेक्षाएं थीं, परन्तु विडम्बना यह है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जीवन समस्याओं से आक्रांत, बोझिल और जटिल हो उठा। परिवेश के दबाव से ही यथार्थ बोध की शुरुआत हुई। +लक्ष्मीनारायण मिश्र ने अपने नाटक का लेखन प्रसाद-युग में ही प्रारम्भ किया था। उनके अशोक (1927), संन्यासी (1829), ‘मुक्ति का रहस्य’ (1932), राक्षस का मन्दिर (1932), ‘राजयोग’ (1934), सिन्दूर की होली (1934), ‘आधी रात’ (1934) आदि नाटक इसी काल के हैं। किन्तु मिश्र जी के इन नाटकों में भारतेन्दु और प्रसाद की नाट्यधारा से भिन्न प्रवृत्तियां दृष्टिगोचर होती हैं। जैसा कि पहले संकेत किया जा चुका है कि भारतेन्दु और प्रसाद-युग के नाटकों का दृष्टिकोण मूलतः राष्ट्रीय और सांस्कृतिक था। यद्यपि इस युग के नाटकों में आधुनिक यथार्थवादी धारा का प्रादुर्भाव हो चुका था। तथापि प्राचीन सांस्कृतिक आदर्शों के द्वारा राष्ट्रीयता का उद्घोष इस युग के नाटककारों का प्रमुख लक्ष्य था। अतः उसे हम सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि कह सकते हैं, जिनमें प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों और नयी यथार्थवादी चेतना में समन्वय और सन्तुलन परिलक्षित होता है। मिश्र जी नयी चेतना के प्रयोग के अग्रदूत माने जाते हैं। डॉ. विजय बापट के मतानुसार नयी बौद्धक चेतना का विनियोग सर्वप्रथम उन्हीं के तथाकथित समस्या नाटकों में मिलता है। इस बौद्धक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टि का प्रादुर्भाव बीसवीं शताब्दी में पश्चिमी चिन्तकों के प्रभाव से हुआ था। डारविन द्वारा प्रतिपादित विकासवादी सिद्धान्त, प्रफायड के मनोविश्लेषण सिद्धान्त और मार्क्स के द्वन्द्वात्मक भौतिकतावादी सिद्धान्तों ने यूरोप को ही नहीं, भारतीय जीवन पद्धति को भी प्रभावित किया जिसके फलस्वरूप जीवन में आस्था और श्रद्धा की बजाय तर्क को प्रोत्साहन मिला। पश्चिम में इस प्रकार की बौद्धक चेतना ने समस्या नाटक को जन्म दिया। उन्हीं की प्रेरणा से मिश्र जी ने भी हिन्दी नाटकों में भावुकता, रसात्मकता और आनन्द के स्थान पर तर्क और बौद्धकता का समावेश किया। साथ ही द्रष्टव्य है कि बुद्धवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए भी वे परम्परा-मोह से मुक्त नहीं हो पाए। युगीन मूल्यगत अन्तर्विरोधी चेतना समान रूप से उनके प्रत्येक नाटकों में देखी जा सकती है। इनके नाटकों का केन्द्रीय विषय स्त्री-पुरुष सम्बन्ध एवं सेक्स है। राष्ट्रोद्धार, विश्व-प्रेम आदि के मूल में भी मिश्र जी ने काम भावना को ही रखा है, जो परितृप्ति के अभाव में अपनी दमित वृत्ति को देश सेवा आदि के रूप में अभिव्यक्त करती है और प्रायः इस प्रकार परितष्प्ति’ के साधन जुटा लेती है। +मिश्र जी के नाटकों के साथ हिन्दी-नाटक के विषय और शिल्प दोनों में बदलाव आया है। मिश्र जी के सभी नाटक तीन अंकों के हैं। इनमें इब्सन की नाट्य पद्धति का अनुसरण कर किसी भी अंक में बाह्यतः कोई दृष्य विभाजन नहीं रखा गया है यद्यपि दृष्य-परिवर्तन की सूचना यत्र-तत्र अवश्य दे दी जाती है। प्रेम, विवाह और सेक्स के क्षेत्र में विघटित जीवन मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिए मिश्र जी ने शिल्पगत नवीनता को अपनाया है। पात्र समस्या के सम्बन्ध में तर्कमूलक वाद-विवाद करते हुए दिखाई देते हैं। कार्य-व्यापार के अभाव से इनके नाटकों में रुक्षता आ गई। जिसके फलस्वरूप प्रभावान्विति खण्डित हो गई। रसात्मकता, प्रभावन्विति के स्थान पर बौद्धक आक्रोश और उत्तेजना ही इनके नाटकों में प्रधान है। लेकिन भावुकता के कारण इनके नाटकों का शिल्पगत गठन प्रभावित हुआ है। इस अन्तर्विरोध के रहते हुए भी इनके नाटक अकलात्मक नहीं कहे जा सकते। +उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ उन नाटककारों में हैं जिन्होंने प्रसादोत्तर काल में नाट्य परम्परा को निर्भीक और बुनियादी यथार्थ की मुद्रा प्रदान की। काल-क्रम के अनुसार उनके प्रमुख नाटक हैं : ‘जय-पराजय’ (1937), स्वर्ग की झलक’ (1938, ‘छठा बेटा’ (1940), ‘कैद’ (1943-45), ‘उड़ान’ (1943-45), ‘भंवर’ (1943), ‘आदि मार्ग’ (1950), ‘पैतरे’ (1952), ‘अलग-अलग रास्ते’ (1944-53), ‘अंजो दीदी’ (1953-54), ‘आदर्श और यथार्थ’ (1954) आदि। अश्क के प्रायः सभी नाटकों में विकसित नाट्य-कला के दर्शन होते हैं। वस्तु-विन्यास की दृष्टि से इनके नाटक सुगठित, स्वाभाविक, सन्तुलित एवं चुस्त बन पड़े हैं। उच्च मध्य वर्गीय समाज की रुढ़ियों, दुर्बलताओं, उनके जीवन में व्याप्त ‘कृत्रिमता’, दिखावे और ढोंग का पर्दाफाश करना उनके नाटकों का मूलभूत कथ्य है। यह कथ्य समाज के स्थूल यथार्थ से सम्बन्धित है। कथ्य की स्थूलता और सतही प्रगतिशील यथार्थवादिता ही अश्क के नाटकों की सीमा है, तथापि स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति के सम्मोहन से हिन्दी नाटक को मुक्त करने का श्रेय भी उन्हीं को प्राप्त है। उनकी विशेषता इस बात में है कि उन्होंने जीवन और समाज को एक आलोचक की दृष्टि से देखा है। इनके अनेक नाटक मंचित तथा रेडियो पर प्रसारित हो चुके हैं। इनका योगदान हिन्दी नाटक और रंगमंच के लिए एक विशेष उपलब्धि है। +आलोच्य-युग में कुछ पुराने खेमे के नाटककार यथा : सेठ गोबिन्ददास, लक्ष्मी नारायण मिश्र, हरिकृष्ण प्रेमी, गोविन्द वल्लभ पंत, उदयशंकर भट्ट, जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ आदि भी नाट्य साहित्य को समृद्ध करते रहे। सेठ गोविन्ददास के ‘कर्ण’ (1942), शशि गुप्त (1942) आदि पौराणिक नाटकों और ‘हिंसा और अहिंसा’ (1940), सन्तोष कहाँ (1941) आदि सामाजिक नाटकों की रचना की। हरिकृष्ण प्रेमी के ‘छाया’ (1941) और बन्धक (1940), सामाजिक नाटक हैं। दोनों नाटकों में आर्थिक शोषण एवं विषमता का यथार्थ मुखरित है। ऐतिहासिक नाटकों में ‘आहुति’ (1940), स्वप्नभंग (1940), विषपान (1945), साँपों की सृष्टि, उद्धार आदि उल्लेखनीय हैं। ‘अमृत-पुत्री’ (1978), नवीनतम ऐतिहासिक नाटक हैं। गोबिन्द वल्लभ पंत ने आलोच्य युग में ‘अन्तःपुर का छिद्र (1940), ‘सिन्दूर बिन्दी’ (1946) और ‘ययाति’ (1951) नाटकों की रचना की। पन्त जी ने ‘कला के लिए कला’ की भावना से प्रेरित होकर नाटकों की रचना अवश्य की है, किन्तु उनके नाटक उद्देश्य से रहित नहीं हैं। उन्होंने जीवन की गहरी उलझनों एवं समस्याओं को बड़ी सूक्ष्मता से चित्रित किया है। पंत ने यद्यपि प्रसाद-युग की परम्परा का निर्वाह किया है, किन्तु उनके परवर्ती नाटकों में सामाजिक चेतना अधिकाधिक मुखर होती गई है। लक्ष्मीनारायण मिश्र ने ‘गरुड़ध्वज’ (1945), ‘नारद की वीणा’, ‘वत्सराज’ (1950) ‘दशाश्वमेघ (1950), ‘वितस्ता की लहरें’ (1953), ‘जगदगुरु’, चक्रव्यूह (1953), कवि भारतेन्दु (1955), ‘मृत्यु×ज्य’ (1958) चित्रकूट, अपराजित, धरती का हृदय आदि नाटकों की रचना की। सभी नाटकों में वर्तमान युग के शिक्षित व्यक्तियों की समस्याओं, उनकी संशयात्मक मनः स्थिति, उनकी कुंठाओं और मानसिक विकृतियों का स्वाभाविक और मनोविश्लेषणात्मक चित्रण किया गया है। उदयशंकर भट्ट के नाटकों में ‘राधा’ (1961), ‘अन्तहीन-अन्त’ (1942) ‘मुक्तिपथ’ (1944) ‘शक विजय’ (1949), कालीदास (1950) ‘मेघदूत’ (1950), विक्रमोर्वशी (1950), ‘क्रांतिकारी’ (1953), ‘नया समाज’ (1955), पार्वती (1962), मत्स्यगंधा (1976), आदि हैं। भट्ट जी के ऐतिहासिक और पौराणिक नाटकों की मूल प्रेरणा राष्ट्रीयता है। इसमें इतिहास और मिथक के बीच में यथार्थ और समस्या का अहसास भी दिखाई देता है। सामाजिक नाटकों के माध्यम से भट्ट जी ने वर्तमान जीवन के व्यक्तिगत एवं समाजगत संघर्षों एवं समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया है। जगन्नाथप्रसाद मिलिन्दका ‘समर्पण’ (1950) और ‘गौतम नन्द’ (1952) ख्याति प्राप्त रचनाएं हैं। इनके अतिरिक्त कई अन्य साहित्यकारों ने भी नाटक के क्षेत्र में अवतरण किया, किन्तु उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। इनमें बैकुण्ठनाथ दुग्गल, वृन्दावनलाल वर्मा, सीताराम चतुर्वेदी, चतुरसेन शास्त्री, जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द आदि उल्लेखनीय हैं। +इसी काल में स्वतंत्रता के बाद हिन्दी नाटक में परिवर्तन की एक नई स्थिति दिखाई देती है। प्रसादोत्तर नाटक के पहले चरण में यथार्थवादी प्रवृत्ति से अनुप्राणित हुआ और उसके साथ ही समस्यामूलक नाटक का आविर्भाव हुआ। किन्तु स्वतंत्रता के बाद सामाजिक यथार्थ और समस्या के प्रति जागरूकता के साथ-साथ नाटक के क्षेत्र में कथ्य और शिल्प के कई नए आयाम उभरे। इसके अतिरिक्त स्थूल यथार्थ के प्रति नाटककार के दृष्टिकोण में भी अन्तर आया। +युगीन परिवेश के ऐतिहासिक संदर्भों में पाँचवें दशक तक जीवन के समस्या संकुल होने पर भी आम जनता की स्थिति में सुधार और परिवर्तन आने की अभी धुँधली सी आशा दिखाई दे रही थी परन्तु छठे दशक के बाद से मीठे मोहक सपने वालू की भीत की भांति ढह गए, परिवेश का दबाव बढ़ा, मोहासक्ति भंग हुई और आज परिवेशगत यथार्थ अधिक नंगा होकर सामने आ रहा है। यथार्थ बोध का सही अभिप्राय मोहभंग की इस प्रक्रिया से ही जोड़ा जा सकता है। जगदीश चन्द्र माथुर, लक्ष्मी नारायण लाल आदि नाटककारों ने अपनी ऐतिहासिक एवं सामाजिक रचनाओं द्वारा कुछ सीमाओं के साथ यथार्थ दृष्टि का परिचय दिया। ‘जगदीशचन्द्र माथुर’ के चार नाटक प्रकाशित हुए हैं : ‘कोणार्क’ (1954), ‘पहला राजा’ (1969), शारदीया तथा ‘दशरथनन्दन’। इन नाटकों में क्रमशः मार्क्स एवं प्रफायड के प्रभावसूत्रों को आत्मसात करते हुए छायावादी रोमानी कथास्थितियों की सृष्टि करने में माथुर की दृष्टि यथार्थवादी एवं आदर्शवादी, कल्पना तथा स्वच्छन्दतावादी भावुकता को एक साथ ग्रहण करती है। परिणामतः उनके नाटकों में अन्तर्निहित समस्याएं जीवन के यथार्थ को व्याख्यायित करते हुए भी यथार्थवादी कलाशिल्प में प्रस्तुत नहीं हुई हैं। समस्याओं का विश्लेषण एवं विकास बौद्धक एवं तार्किक क्रिया द्वारा प्रेरित नहीं है। कोणार्क में कलाकार एवं सत्ता के संघर्ष की समस्या धर्मपद के तार्किक उपकथनों के माध्यम से विश्लेषित हुई हैं। परन्तु ‘शारदीया’ एवं ‘पहला-राजा’ की समस्याएं प्रगतिशील एवं ”ासशील मूल्यों के संघर्ष की भूमि पर अवतरित होते हुए भी बौद्धक एवं तार्किक प्रक्रिया के अभाव में यथार्थवादी कला की दृष्टि से हमारी चिन्तन शक्ति को उद्बुद्ध नहीं करती क्योंकि माथुर का विशेष बल आन्तरिक अनुभूतियों एवं मानवीय संवेदना को जगाने पर है। फलस्वरूप उन्होंने काव्यात्मकता एवं रसोत्कर्ष के साधनों का सहारा लिया है। अपनी विचारधारा के अनुरूप ही जगदीश चंद्र माथुर ने नाटकीय कला को संस्कृत एवं लोकनाट्य तथा यथार्थवादी मंच की विशेषताओं से अभिमंडित किया है। काव्य-तत्त्व, अलंकरण एवं रस परिपाक से सम्बन्धि त तत्त्व उन्होंने संस्कृत नाटकों से ग्रहण किए हैं। संघर्ष, अन्तर्द्वन्द्व का तत्त्व पाश्चात्य यथार्थवादी नाटक शिल्प का प्रभाव है। संक्षेप में, एक ऐसे मंच की परिकल्पना पर उनका ध्यान केन्द्रित रहा है जो बहुमुखी हो, एक ही शैली में सीमित नहीं हो, भिन्न-भिन्न सामाजिक आवश्यकताओं और चेतनाओं का परिचायक हो। +स्वतंत्रता के बाद हिन्दी नाटक ने पाश्चात्य प्रभाव से जो नये आयाम ग्रहण किए उनकी प्रथम अभिव्यक्ति धर्मवीर भारती के ‘अन्धायुग’ में प्रकट हुई है। पश्चिम में दो महायुद्धों के बाद नाटक के क्षेत्र में कथ्य और शिल्प के अनेक प्रयोग हुए। इसके साथ ही युद्ध की परिस्थितियों के कारण जीवन मूल्यों में भी जो बड़ा भारी परिवर्तन आया उसकी अभिव्यक्ति भी नाटक में हुई। भारत में समानान्तर सामाजिक परिस्थिति तो नहीं आई किन्तु पश्चिम की विचारधारा का उस पर प्रभाव पड़े बिना न रहा। नई कविता और नई कहानी उससे अनुप्राणित थी ही, हिन्दी नाटक को भी उससे एक दिशा मिली। ऐसी स्थिति में आधुनिक भाव-बोध को उजागर करने का प्रयास हुआऔर धर्मवीर भारती, लक्ष्मी नारायण लाल, मोहन राकेश आदि नाटककारों ने उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। +डॉ. धर्मवीर भारती के ‘अन्धा युग’ (1955) गीति-नाटक ने हिन्दी गीत नाट्य-परम्परा को एक नया मोड़ दिया है। इसमें नाटककार ने महाभारत के युद्ध को अनीति, अमर्यादा और अद्धर्-सत्य से युक्त माना है। इसीलिए उन्होंने इस काल को अन्धायुग कहा है। इस नाटक में मिथकीय पद्धति द्वारा विगत और आगत का समन्वय कर, निरन्तरता में आस्था उत्पन्न करने का सघन प्रयास ‘भारती’ ने किया है। इसमें अस्तित्ववादी दर्शन की स्पष्ट झलक मिलती है। ‘अन्धायुग’ के अतिरिक्त सुमित्रानन्दन पन्त के ‘रजतशिखर’, ‘शिल्पी’ और ‘सौवर्ण’ में संगृहीत गीतिनाट्य, गिरजाकुमार माथुर का ‘कल्पान्तर’, सृष्टि की सांझ और अन्य काव्य-नाटक’ में संगृहीत सिद्धान्त कुमार के पांच गीतिनाट्य-सृष्टि की साँझ, लोह देवता, संघर्ष, विकलांगों का देश और बादली का शाप तथा दुष्यन्तकुमार के गीतिनाटक ‘एक कण्ठ विषपायी’ (1963) आदि भी विशेष उल्लेखनीय हैं। डॉ. लक्ष्मी नारायण लाल के हैं : ‘अन्धा कुआँ’ (1955), ‘मादा कैक्टस’ (1959), ‘तीन आँखों वाली मछली’ (1960), ‘सुन्दर रस’, ‘सूखा सरोवर’ (1960), रक्त कमल (1961), ‘रात रानी’ (1962), ‘दर्पण’ (1963)’ ‘सूर्यमुख’ (1968), ‘कलंकी’, ‘मिस्टर अभिमन्यु’ (1971), ‘करफ्रयू’ (1972) आदि। ‘अन्धा कुआँ’ में आर्थिक संघर्ष के कारण उत्पन्न ग्राम्य-जीवन के सामाजिक और पारिवारिक द्वन्द्व का चित्रण है। ‘मादा कैक्टस’, ‘सुन्दर रस’, ‘सूखा सरोवर’ और ‘रक्त कमल’ उनके प्रतीक नाटक हैं। ‘तोता मैना’ नाटक टेकनीक के नये प्रयोगों को प्रस्तुत करता है। यह नाटक लोकवृत्त पर आधारित है। ‘दर्पण’ और ‘रातरानी’ समस्या नाटक हैं। दर्पण में मनुष्य को अपने वास्तविक रूप की तलाश में भटकते हुए दिखाया गया है। ‘कलंकी’ नाटक में अनेक जटिल प्रश्नों यथा सक्रांति कालीन लोकचेतना को प्रस्तुत करना, आज के समय में भी कर्मकाण्ड, अन्धविश्वास, देखना, यथार्थ का सामना करने से कतराना आदि को लोकरंगमंचीय संस्कृति, अभिव्यंजनावादी नाट्य-संरचना में प्रस्तुत किया गया है। ‘सूर्य-मुख’ में महाभारत-युद्ध के बाद की घटना ली गयी है। इस नाटक पर ‘अन्धायुग’ और ‘कनुप्रिया’ की स्पष्ट छाप है। ‘मिस्टर अभिमन्यु’ और ‘कफ्रर्यू’ आधुनिक जीवन की संवेदना को लेकर लिखे गये विचारोत्तेजक नाटक हैं। डॉ. लाल अपने चारों ओर के परिवेश और युग जीवन के प्रति सजग हैं। उनका लक्ष्य समाज की विरुपता को संयम और तर्क के साथ चित्रित कर समाज को बदलते जीवन-मूल्यों और नैतिक मानदंडो से अवगत कराना है। +हिन्दी नाटकों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर ‘मोहन राकेश’ ने एक नये युग की स्थापना की है। उनका ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1956), ‘लहरों के राजहंस (1963) तथा ‘आधे-अधूरे’ (1969) नाटक निश्चय ही ऐसे आलोक स्तम्भ हैं जो सुदूर भविष्य में भी हिन्दी-नाटक को एक नवीन गति-दिशा प्रदान करते रहेंगे। मानवीय सम्बन्धों में विघटन के कारण टूटते हुए व्यक्ति के आभ्यंतर यथार्थ का चित्रण करना इन नाटकों का केन्द्रीय कथ्य एवं मूल स्वर है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ कवि कालिदास और उसकी बाल-संगिनी मल्लिका के प्रेम और संघर्ष की कथा पर आधारित है। कालिदास अपने परिवेश एवं मल्लिका से कट जाने के कारण जीवन के नये अर्थ की तलाश में निकल पड़ता है। ‘लहरों के राजहंस’ अश्वघोष के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘सौन्दरानन्द’ पर आधारित है। इस नाटक में नन्द सुन्दरी और गौतम दोनों से निरपेक्ष हो जाने के बाद अलगाव की स्थिति में आंतरिक सत्य की तलाश करने के लिए चल पड़ता है। उनका जीवन-बोध अस्तित्ववाद की वैचारिक भूमिका पर ही उभरा है। राकेश की दृष्टि का यह यथार्थ जीवन-अर्थो की खोज तक ही सीमित है। किसी परिणति तक पहुंचना राकेश का अभीष्ट भी नहीं है। इसी कारण उनके समस्त नाटकों का समापन किसी निश्चित अन्त पर पहुंच कर नहीं होता। ‘आधे-अधूरे’ द्वारा आधुनिक जीवन से साक्षात्कार कराया गया है, इसमें महानगर के मध्यम वर्गीय परिवार का चित्रण है। आज के परिवार की टूटन और चुक गये आपसी सम्बन्धों को नाटक में बड़े सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया गया है। अस्तु, राकेश ने अपनी नाट्य-सृष्टि में अन्तर्निहित यथार्थ को पकड़ने की चेष्टा की है। सभी नाटक रंगमंचीय सम्भावनाओं से पूर्ण है। प्रसाद जी के बाद सर्वाधिक सशक्त नाटककार हम राकेश को कह सकते हैं। उन्होंने अतीत के सघन कुहासे और अपने समसामयिक जीवन के अन्धे-गलियारों में भटक कर सभी स्तरों पर अपनी नाट्यकला को पूर्णतया आधुनिक रखा है। +मोहन राकेश के बाद जिस नाटककार के प्रति विश्वास जागता है, वह है ‘सुरेन्द्र वर्मा’। उनके नाटकों में ‘द्रोपदी’, ‘सूर्य की अन्तिम किरण से पहली किरण तक’, ‘आठवां सर्ग’ आदि उल्लेखनीय हैं। प्रथम नाटक में आधुनिक नारी की मनःस्थिति का चित्रण पुराने मिथक-प्रतीकों के माध्यम से बड़ी सफलतापूर्वक किया गया है। ‘सूर्य की अन्तिम किरण से पहली किरण तक’ का आधार छद्म इतिहास हैं, पर इसमें लेखक ने एक पौरुषहीन व्यक्ति के विवाह बन्धन में पड़ी नारी की शाश्वत समस्या को आधुनिक भाव-बोध के साथ उठाने का प्रयास किया है। आठवाँ सर्ग’ कालिदास के जीवन और लेखन पर आधारित है और उसका कथ्य लेखकीय स्वातंत्रय की आधुनिक चेतना को उजागर करता है। +व्यवस्था के संदर्भ में समाज एवं व्यक्ति के बाह्य एवं आंतरिक यथार्थ का चित्रण करना नये नाटककारों के नाटकों का केन्द्रीय कथ्य लगता है। ब्रजमोहन शाह के ‘त्रिशंकु’, ज्ञानदेव अग्निहोत्री के ‘शुतुरमुर्ग’, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के ‘बकरी’ आदि नाटकों में सत्ता के छद्म और पाखंडो का ही पर्दाफाश किया है। अधुनातन नाटककार मुद्राराक्षस, लक्ष्मीकांत वर्मा, मणि मधुकर, शंकर शेष और भीष्म साहनी भी क्रमशः अपने नाटकों ‘योअर्स-फेथ-फुल्ली’, ‘तेंदुआ’, ‘मरजीवा’, ‘रोशनी एक नयी है’, ‘रसगन्धर्व’, ‘एक और द्रोणाचार्य’ तथा ‘हानूश’ के माध्यम से इन्हीं प्रश्नों से जूझ रहे हैं। इन्होंने जहाँ एक ओर वर्ग-वैषम्यो की चेतना को जाग्रत करके व्यवस्था के ह्रासशील रूपों का यथार्थ चित्रण किया है वहीं सत्ता के दबाव में पिस रहे आम आदमी की करुण नियति और उससे उत्पन्न संत्रास का भी रुपायन किया है। इस तरह नाटक सीधे जिन्दगी की शर्तों से जुड़े और उनकी विषमताओं के साथ जूझते व्यक्ति की यंत्रणा उसके भीतर यथार्थ को रंग-माध्यम से प्रस्तुत करने का बीड़ा उठाते हैं। बदलाव की चेतना और आकुलता को उजागर करने के सशक्त कथ्य से ही हिन्दी के रचनात्मक नाट्य के लिए शुभारम्भ की स्थिति मानी जा सकती है। नये नाटककार सत्यदेव ‘दूबे, रमेश उपाध्याय, रामेश्वर प्रेम, शरद जोशी, गिरिराज, सुशील कुमार सिंह, बलराज पंडित, मृदुला गर्ग, सुदर्शन चोपड़ा नये नाटक लिखकर आंतरिक यथार्थ बोध की संपुष्टि में योग दे रहे हैं। अभी हाल ही में कुछ नाटक प्रकाशित हुए हैं : +प्रभात कुमार भट्टाचार्य का ‘काठ महल’, गंगाप्रसाद विमल का ‘आज नहीं कल’, प्रियदर्शी प्रकाश का ‘सभ्य सांप’, रमेश बख्षी का ‘वामाचरण’, भगवतीचरण वर्मा का ‘वसीयत’, इन्द्रजीत भाटिया का ‘जीवन दण्ड’ सुदर्शन चोपड़ा का ‘काला पहाड़’ शिवप्रसाद सिंह का ‘घाटियां गूंजती हैं’ नरेश मेहता का ‘सुबह के घण्टे’ ज्ञानदेव अग्निहोत्री का ‘नेफा की एक शाम’ अमृतराय की ‘विंदियों की एक झलक’ गोविन्द चातक का’ अपने अपने खूंटे’ विपिन कुमार अग्रवाल का ‘लोटन’, विष्णुप्रभाकर का ‘टगर’, सुरेन्द्र वर्मा का ‘द्रोपदी’ और ‘आठवाँ सर्ग’ भीष्म साहनी का ‘कबिरा खड़ा बाजार में’, राजेन्द्र प्रसाद का ‘प्रतीतियों के बाहर’ और ‘चेहरों का जंगल’ आदि। इन नाटकों में जो सामान्य प्रवृत्तियां उभर कर आई हैं वे इस प्रकार हैं : आकार में छोटे, वर्तमान जीवन से उनका सम्बन्ध, वस्तुवाद का प्राधान्य, अधिकांश मनोवैज्ञानिक और समस्यात्मक, रंगमंचीय संकेतों का बाहुल्य संकलन त्रय के पालन की प्रवृत्ति आदि। इनमें से अन्तर्मन की सच्चाइयों को नकार कर तटस्थता का मुखौटा लगा लेने का उपदेश देने वाले नाटककार कहां तक सफल हो पायेंगे, इसका सही मूल्यांकन उनकी आने वाली कृतियों से ही लग सकेगा। +किसी भी रचना की सम्पूर्णता कथ्य और शिल्प के सानुपातिक कलात्मक संयोजन में निहित रहती है। हिन्दी नाटकों में इन दोनों तत्वों के बीच तालमेल की स्थिति पर यदि विचार किया जाए तो हिन्दी के बहुत कम नाटक इस स्तर तक ऊंचे उठ पाते हैं। जब तक रंग जगत में वे सफल नहीं होते, उन्हें अर्थवान साबित नहीं किया जा सकता। यह एक सुखद संयोग है कि हिन्दी रंगमंच व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय रंगमंच की भूमिका में क्रियाशील है। आज के हिन्दी नाटकों की उपलब्धि पर विचार किया जाए तो यह निष्कर्ष निकलता है कि हिन्दी नाटक ने अपनी निरर्थकता और कलाहीनता के घेरे को तोड़कर उल्लेखनीय सर्जनात्मकता प्राप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। और अब नाट्यलेखन केवल सतही सामाजिक उद्देश्यपरकता के आसपास चक्कर नहीं काटता बल्कि गहरी या मूलभूत मानवीय अनुभूति या स्थितियों का सन्धान करता है। इन नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जीवन और समाज की विसंगतियों को उभारते हैं, पीड़ा संत्रास और अजनबीपन के बीच आज के मानव की दयनीय नियति को रेखांकित करते हैं। स्वतंत्रता के बाद नाटक आधुनिक युग बोध के साथ ही जुड़ता नहीं दिखाई देता, वरन् रंगशिल्प के प्रति अधिक जागरूक भी हो गया है। + +हिन्दी कहानी का इतिहास: +प्रारम्भिक युग. +हिन्दी में कहानी वस्तुतः द्विवेदी-युग से प्रारम्भ होती है। भारतेन्दु-काल में और उसके पूर्व जो कहानियाँ लिखी गयीं, वे पश्चिमी ढंग की आधुनिक कहानी से काफी भिन्न हैं। वैसे तो ब्रज-भाषा की वैष्णव वार्ताओं तथा दृष्टांतों, राजस्थानी बातों ‘गिलक्राइस्ट' या लल्लूलाल द्वारा सम्पादित ‘लतायफ’ आदि की लघु कहानियों में कहानी के बहुत से तत्व हैं। राजस्थानी बातें तो कहानियाँ ही हैं, परन्तु आधुनिक कहानी से विषयवस्तु और शैली दोनों दृष्टि से पृथक्क है। इंशा अल्ला खाँ की ‘रानी केतकी की कहानी’ (1805 ई. के लगभग) भी दास्तान शैली की लम्बी कहानी ही है। वास्तविक मानव-जीवन से दूर, अतिमानव प्रसंगों से युक्त कथाकृति से हिन्दी कहानी-परम्परा का आरम्भ नहीं माना जा सकता। इसकी रचना शुद्ध हिन्दी की छटा दिखाने के लिए की गयी थी। 1860 ई. के आस-पास उस समय के शिक्षा-संचालकों की प्रेरणा से ‘बुद्धफलोदय', ‘सूरजपुर की कहानी’, ‘धरमसिंह का वृतान्त’, ‘तीन देवां की कहानी’ आदि शिक्षात्मक कहानियाँ लिखी गयी थीं, जो प्रायः अंगेजी या उर्दू से अनूदित हैं। राजा शिवप्रसाद ‘सितारे हिन्द’ की लिखी और लिखवायी हुई ‘गुलाब और चमेली का किस्सा’, ‘वीर सिंह वृतान्त’ आदि रचनाएँ भी प्रायः अनूदित या रूपान्तरित हैं। हिन्दी की प्रारम्भिक कहानियाँ आख्यायिका शैली की हैं। उनमें उल्लेखनीय हैं : पं. माधवप्रसाद मिश्र रचित ‘मन की चंचलता (1900 ई. के लगभग), किशोरीलाल गोस्वामी कृत ‘इन्दुमती’ (1900 ई. के लगभग), ‘गुलबहार’, मास्टर भगवानदास कृत ‘प्लेग की चुड़ैल’, आचार्य रामचन्द्र शुक्लप्रणीत ‘ग्यारह वर्ष का समय’, गिरिजादत्त वाजपेयीकी ‘पंडित और पंडितानी’ और ‘पति का पवित्र प्रेम’, बंगमहिला की ‘दुलाई वाली’ तथा ‘कुम्भ में छोटी बहू’, पार्वती नन्दन की ‘मेरा पुनर्जन्म’ और वृन्दावनलाल वर्मा द्वारा लिखित ‘राखीबन्द भाई’। इनमें कई कहानियाँ बंगला और अंग्रेजी की कहानियों के अनुकरण पर लिखी गई हैं। कुछ काफी लम्बी हैं और शुद्ध कहानी की श्रेणी में नहीं आती। इन कहानियों में से प्रथम द्विवेदी-युग के प्रारम्भ में ‘सुदर्शन’ में तथा शेष कहानियाँ ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई थीं। डॉ. श्रीकृष्णलाल किशोरी लाल गोस्वामीकी ‘इन्दुमती’ को हिन्दी की प्रथम कहानी मानते हैं। डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल का कहना है कि शुक्ल जी की ‘ग्यारह वर्ष का समय’ नामक कहानी ही हिन्दी की पहली कहानी है। लगभग इसी समय (1909 ई. से) प्रसाद जी की प्रेरणा से ‘इन्दु’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इसमें प्रकाशित प्रसाद जी की ‘ग्राम’ शीर्षक कहानी हिन्दी जगत में नए युग का प्रारम्भ करती है। +भारतेन्दु युग में लेखकों का ध्यान नाटक, निबन्ध और उपन्यास की ओर अधिक था। कहानी को उन्होंने अधिक महत्व नहीं दिया। द्विवेदी युग के प्रारम्भ में भी इस ओर कम ध्यान दिया गया। अनुवाद-कार्य, भाषा के परिष्कार और गद्य के अन्य रूपों पर साहित्यकारों ने अधिक बल दिया। इन सब कारणों से प्रसाद और प्रेमचन्द से पूर्व कहानी साहित्य की रचना बहुत कम हुई। उसमें वास्तविक साधारण जीवन का यथार्थ विचित्र न उभर सका। इन्हीं दिनों संस्कृत और अंग्रेजी नाटकों की कथाओं के आधार पर लम्बी आख्यायिकाएँ भी लिखी गयीं। अधिकतर कथानक-प्रधान (घटना-प्रधान), उपदेशात्मक-कल्पनात्मक, विस्मयपूर्ण, व्यंग्यविनोदमय कहानियाँ लिखी गईं। शैली की दृष्टि से प्रेमचन्द से पहले की हिन्दी कहानियाँ प्रायः तीन प्रकार की हैं : ऐतिहासिक शैली में, आत्मकथात्मक और यात्रा शैली में लिखित। द्विवेदी-युग में पारसनाथ त्रिपाठी, बंगमहिला और गिरिजाकुमार घोष ने बंगला की कई सुन्दर कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया। आधुनिक ढंग की अंग्रेजी कहानियों का अनुवाद भी द्विवेदी-युग में प्रारम्भ हुआ। +प्रसाद-प्रेमचन्द युग. +सन् 1916 ई. के आस-पास प्रेमचन्द और प्रसाद कहानी के क्षेत्र में आए। इसके बाद हिन्दी कहानी पर अंग्रेजी और बंगला कहानीकारों का प्रभाव कम होने लगा। द्विवेदी-युग की ‘सरस्वती’, ‘सुदर्शन’, ‘इन्दु’, ‘हिन्दी गल्प-माला’ आदि पत्रिकाओं का हिन्दी-कहानी के प्रारम्भिक विकास में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान है। इन पत्रिकाओं में सैकड़ों मौलिक और अनूदित कहानियाँ प्रकाशित हुई, जिनमें विविध विषय और शैलियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। कहानी का वास्तविक विकास प्रेमचन्दके समय से ही प्रारम्भ होता है। उनके समय से ही आख्यायिका के स्थान पर सच्ची कहानी का प्रारम्भ हुआ। कहानी में घटना की प्रधानता के स्थान पर पात्र और भावना की प्रधानता हुई। वास्तविक मानव-जीवन और मनोविज्ञान से उनका सम्बन्ध स्थापित हुआ। प्रसाद जीकहानी क्षेत्र में प्रेमचन्दसे कुछ पहले आए थे। वे मूलतः कवि हैं और बाद में नाटककार। उनकी कहानियों में भी काव्यात्मकता और नाटकीयता है। उनकी कहानियों को लक्ष्य में रखते हुए उन्हें यथार्थपरक, आदर्शवादी या रोमांटिक आदर्शवादी कहा जा सकता है। प्रसाद की कहानियों के संग्रह हैं : ‘प्रतिध्वनि’, ‘आकाश : दीप’, ‘आंधी’, ‘इन्द्रजाल’ तथा ‘छाया’। प्रसादने अधिकतर भावनाप्रधान, कल्पनापरक कहानियाँ लिखी, जो प्रायः सांस्कृतिक पृश्ठभूमि पर आधारित हैं। उन्होंने चरित्र-प्रधान कहानियाँ भी लिखी हैं। नाटकीयता, अर्थ की गंभीरता, भावुकतापूर्ण वातावरण, काव्यात्मक भाषा और सांकेतिक व्यंजना उनकी कहानियों की अन्य विशेषताएँ हैं। प्रसादप्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रेमी थे। +प्रेमचन्द का आधुनिक काल के यथार्थवादी जीवन पर अधिक आग्रह था। वे यथार्थवादी हैं। प्रेमचन्द ने लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियाँ ‘मानसरोवर’ (6 भाग) तथा ‘गुप्त धन’ (2 भाग) में संगृहीत हैं। ‘प्रेम-पचीसी’, ‘प्रेम-प्रसून’, ‘प्रतिमा’, ‘सप्तसुमन’ आदि नामों से भी उनकी कहानियों के संग्रह छपे हैं। प्रेमचन्द की प्रारम्भ की कहानियों में घटना की प्रधानता और वर्णन की प्रवृत्ति है। चरित्र-चित्रण और मनोविज्ञान की ओर उचित ध्यान नहीं दिया गया। भाषा अपरिपक्व तथा व्याकरण : सम्बन्धी दोषों से युक्त है। वस्तुतः प्रेमचन्द प्रारम्भ में उर्दू के लेखक थे और वहाँ से हिन्दी में आए थे। उनकी प्रारम्भिक राष्ट्रीय कहानियाँ ‘सोजे वतन’ संग्रह में प्रकाशित हुई थी। आगे चलकर प्रेमचन्द ने चरित्र-प्रधान, मनोविज्ञान-मूलक, वातावरण-प्रध ान, ऐतिहासिक आदि कई प्रकार की कहानियाँ लिखीं और वास्तविक-जीवन तथा मानव-स्वभाव के मार्मिक चित्र प्र्रस्तुत किए। प्रेमचन्द की भाषा सरल, व्यावहारिक है और उनके संवाद स्वाभाविक तथा सजीव हैं। साधारण घटनाओं और बातों को मार्मिक बनाने में वे कुशल हैं। प्रेमचन्द नवीन जीवन-रुचि रखने वाले मानवतावादी लेखक थे। प्रारम्भ में प्रेमचन्द गांधी और ताल्स्ताय से प्रभावित रहे। बाद में वे मार्क्स और लेनिन की विचारधारा की ओर झुक गए थे। +प्रसाद-प्रेमचन्द-युग के प्रारम्भ के कहानीकारों में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी और पं. ज्वाला दत्त शर्मा के नाम भी उल्लेखनीय हैं। गुलेरी जी की 'उसने कहा था' शीर्षक कहानी हिन्दी की श्रेष्ठ कहानियों में से एक है। इस कहानी में भावुक वीर तथा कर्त्तव्य-परायण लहनासिंह के पवित्र प्रेम और बलिदान का चित्रण है। सुन्दर ढंग से विकसित होने वाला, सुगठित, कुतूहलपरक नाटकीय कथानक, सजीव वातावरण, मार्मिक अन्त, संवादों तथा घटनाओं की योजना द्वारा पात्रों का स्वाभाविक चरित्र-चित्रण, पात्रानुकूल संवाद, मुहावरेदार सरल-जीवन्त भाषा और सांकेतिक अभिव्यक्ति इस कहानी की मुख्य विशेषताएँ हैं। गुलेरी ने केवल तीन कहानियाँ लिखी हैं, परन्तु तीन कहानियों के बल पर वे हिन्दी के इतिहास में अपना एक विशिष्ट स्थान बना गए हैं। सुदर्शन, विश्वम्भरनाथ ‘कौशिक’, पांडेय बेचन शर्मा, ‘उग्र’, ‘चतुरसेन शास्त्री’, ‘रायकृष्णदास’, ‘चण्डीप्रसाद, ‘हृदयेश’, ‘गोविन्द वल्लभ पंत’, ‘वृन्दावन लाल वर्मा’, ‘जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, ‘राधिकारमण प्रसाद सिंह’, ‘सियारामशरण गुप्त’ और भगवतीप्रसाद वाजपेयी, प्रेमचन्द-प्रसाद-काल के अन्य उल्लेखनीय कहानीकार हैं। +सुदर्शन और कौशिक प्रेमचन्द की शैली के कहानीकार हैं। दोनों ने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद को अपनाकर सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक कहानियाँ लिखी हैं। चरित्र-चित्रण और भाषा की दृष्टि से भी ये दोनों प्रेमचन्द के निकट हैं। सुदर्शन ने मानव-जीवन के विविध पक्षों और अनेक सामाजिक सत्यों का चित्रण किया है। कौशिक जी ने अपनी कई कहानियों में पारिवारिक जीवन के सुन्दर चित्र प्रस्तुत किए हैं। उनकी ‘ताई’ नामक चरित्र प्रधान कहानी हिन्दी जगत् में प्रसिद्ध है। चरित्र-परिवर्तन उनकी कहानी में स्वाभाविक रूप से होता है। संवादों द्वारा पात्रों की मनःस्थिति पर कहीं-कहीं उन्होंने अच्छा प्रकाश डाला है। सुदर्शन के कहानी-संग्रहों के नाम हैं : ‘परिवर्तन’, ‘सुदर्शन-सुधा’, ‘तीर्थयात्रा’, सुदर्शन-सुमन’, ‘पुष्पलता’, ‘सुप्रभात’, ‘नगीना’, ‘फूलवती’, ‘पनघट’। कौशिक जी की कहानियाँ ‘गल्पमन्दिर’, ‘चित्रशाला’, ‘प्रेम-प्रतिमा’, ‘कल्लोल’ आदि शीर्षकों से प्रकाशित हुई है। +उग्र जी (‘चाकलेट’, ‘चिनगारियां’, ‘इन्द्रधनुष’, ‘निर्लज्जा’, ‘दोजख की आग’, ‘बलात्कार’, ‘सनकी अमीर’, ‘पीली इमारत’, ‘चित्र-विचित्र’, ‘यह कंचन सी काया’, ‘कला का पुरस्कार’ आदि के लेखक) की कहानियों में समाज और राजनीति का मार्मिक अंकन हुआ है। रूढ़ियों तथा राजनीतिक एवं राष्ट्रीय दुष्प्रवृत्तियों पर उन्होंने तीव्र रोष प्रकट किया है। उसके पात्र सजीव-सबल होते हैं, संवाद प्रायः छोटे तथा स्पष्ट और भाषा वक्र होने पर भी सरल। उग्र जी ने कई तरह की कहानियाँ लिखी हैं : भावुकता तथा कल्पना से पूर्ण प्रतीकात्मक, समस्यामूलक और नाटकीय रेखाचित्र जैसी। चतुरसेन (राजकण, अक्षय आदि) ने अधिकतर सामाजिक परिस्थितियों का अंकन किया है। राधाकृष्णदास (‘सुधांशु’ आदि) भावप्रधान कहानियों के लेखक हैं। वे प्रसाद-पद्धति के कहानीकार हैं। रायकृष्णदासने ऐतिहासिक और सामाजिक दोनों प्रकार की कहानियाँ लिखी हैं। लघु प्रकृति-चित्र भी उन्होंने कहीं-कहीं दिए हैं। उनकी भाषा संस्कृतपरक और प्रांजल है। चण्डीप्रसाद ‘हृदयेश’ (‘नन्दन निकुंज’, ‘वन माला’ आदि) की कहानियाँ भी लगभग इसी प्रकार की भाषा-शैली में लिखी गयी हैं : भावुकता, उच्च भावों की व्यंजना, स्वल्प कथानक और अलंकृत भाषा उनकी विशेषताएं हैं। पं. गोविन्दवल्लभ पंतमें भी भावुकता तथा कल्पना की रंगीनी है, साथ ही यथार्थ की कटुता भी प्राप्त होती है। उनकी कहानियों में रोचकता भी काफी है। श्री वृन्दावनलाल वर्मा (‘कलाकार का बल’ आदि) मुख्यतः उपन्यासकार हैं। उनकी कहानियों में कल्पना तथा इतिहास का समन्वय होता है और सरल, स्वाभाविक भाषा : शैली होती है। प्रायः सभी कहानियाँ वर्णनपरक, बहिर्द्वन्द्वपूर्ण तथा आदर्शोन्मुख हैं। राधिकारमणप्रसाद सिंह की शैली भी काव्यात्मक तथा जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ (किसलय, मृदुदल, मधुमयी आदि) की कहानियाँ भी मार्मिक तथा करुणापूर्ण हैं। राधिकारमणप्रसाद सिंह की शैली भी काव्यात्मक तथा अलंकृत ही है। उनकी कहानियों का वातावरण प्रायः भावात्मकता तथा मार्मिकता से पूर्ण होता है। सियारामशरण गुप्तकी कहानियों में सरल रोचक शैली में कोमल भावों की अभिव्यक्ति हुई है। भगवती प्रसाद वाजपेयी (पुष्करिणी, खाली बोतल, हिलोर आदि) की कहानियों में प्रायः घटनाओं की सांकेतिक व्यंजना रहती है। उन्होंने असाधारण परिस्थितियों में पड़े हुए नर-नारियों के चरित्र का मनोवैज्ञानिक निरूपण किया है। इस समय के अन्य उल्लेखनीय कहानीकार हैं : विनोद शंकर व्यास, मोहनलाल महतो ‘वियोगी’तथा शिवपूजन सहाय। सुमित्रानन्दन पंतऔर निराला जीने भी कुछ कहानियाँ लिखी हैं। उपर्युक्त कहानीकारों में कौशिक, सुदर्शन, वाजपेयी आदि प्रेमचन्द के आदर्शों से प्रभावित हैं और राधिकारमण प्रसाद सिंह, रायकृष्णदास, विनोदशंकर व्यास, द्विजआदि प्रसाद के आदर्शों से। कुछ कहानीकार अपना पृथक्क् व्यक्तित्व रखते हैं और उन्हें इन दोनों में से किसी वर्ग में नहीं रखा जा सकता। +वर्तमान युग : तीन पीढ़ियाँ. +वर्तमान समय में हिन्दी में कई पीढ़ियाँ एक साथ कहानी लिखने में लगी रही हैं। प्रेमचन्द काल के उत्तरार्ध में इस क्षेत्र में आने वाले कुछ कहानीकार हैं : जैनेन्द्र (‘फांसी’ ‘स्पर्धा’, ‘वातायन’, ‘पाजेब’, ‘जयसंधि’, ‘एकरात’, ‘दो चिड़ियां’ आदि), यशपाल (‘वो दुनिया’, ‘ज्ञान दान’, ‘अभिशप्त’, ‘पिंजड़े की उड़ान’, ‘तर्क का तूफान’, ‘चित्र का शीर्षक’, ‘यशपाल : श्रेष्ठ कहानी’) इलाचन्द जोशी (‘रोमांटिक छाया’, ‘आहुति’, ‘दिवाली और होली’, ‘कंटीले फूल लजीले कांटे’), अज्ञेय (‘त्रिपथगा’, ‘कोठरी की बात’, ‘परम्परा’, ‘जयदोल’ आदि) भगवतीचरण वर्मा (‘दो बाँके’, ‘इन्स्टालमेंट आदि), चन्द्रगुप्त विद्यालंकार (‘चन्द्रकला’, ‘वापसी’, ‘अमावस’, ‘तीन दिन’)। ये कथाकार जो उस समय नयी पीढ़ी के कहानीकार माने जाते थे अब पुराने हो चुके हैं। इनके बाद कहानीकारों की दो और पीढ़ियां विकसित हो चुकी हैं। इन तीनों पीढ़ियों के कहानीकारों ने हिन्दी कहानी का विषय-वस्तु तथा शिल्प दोनों दृष्टियों से पर्याप्त विकास किया है। +जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी और अज्ञेय ने चरित्रप्रधान मनोवैज्ञानिक कहानियाँ लिखी हैं। मार्मिक दृष्यों का चयन, एक ही दृष्य या घटना के सहारे कथानक का निर्माण करके देशकाल के संकलन का निर्वाह, असाधारण परिस्थितियों में पड़े मानवों का सूक्ष्म मनोविश्लेषण, विचारात्मकता और यत्र-तत्र वक्र-अस्पष्ट भाषा जैनेन्द्र की कहानीकला की विशेषताएं हैं। इलाचन्द्र जोशीकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक सत्यों का मार्मिक उद्घाटन है। साधारण-असाधारण दोनों प्रकार के पात्रों का चित्रण उन्होंने किया। जोशी जी का कहना है कि मनोविश्लेषण करते हुए व्यक्ति के अहं पर प्रहार करना ही मेरा लक्ष्य है। अज्ञेयने मनोवैज्ञानिक तथा सामयिक सत्य की व्यंजना करने वाली कहानियों के साथ समाज के मध्यम-वर्ग के दैनिक जीवन की विशेषताओं और उनकी साधारण तथा कारुणिक स्थितियों के खण्डचित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियाँ भी लिखी हैं और राजनीतिक विद्रोह से सम्बन्धित कहानियाँ भी। इनकी कई कहानियाँ पात्रों के पिछले जीवन की अस्फुट चित्र : कल्पनाओं के रूप में हैं। कुछ अधूरापन-सा होने पर भी अज्ञेय की कहानियाँ प्रभावपूर्ण होती हैं। +यशपाल प्रगतिशील लेखक थे। जीवन के संघर्षो और विविध परिस्थितियों का उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर सजीव अंकन किया है। उनकी कहानियों में वर्तमान समाज की विशेषताओं पर तीव्र व्यंग्य-प्रहार है। भगवतीचरण वर्माकी शैली बड़ी सरस और आकर्षक है। इनकी कहानियों में पात्र कम होते हैं, परन्तु वे पूर्णतः सजीव और विश्वसनीय हैं। आप आधुनिक मानव और उसके जीवन को अच्छी तरह समझते हैं। सामाजिक तथा ऐतिहासिक : दोनों प्रकार की कहानियाँ उन्होंने लिखी हैं। चन्द्रगुप्त विद्यालंकारने दैनिक जीवन की साधारण घटनाओं को लेकर प्रभावपूर्ण कहानियाँ लिखी हैं। उन्होंने मनोवैज्ञानिक अध्ययन करते हुए कुछ शाश्वत सत्यों और साथ ही सामयिक सत्यों की सुन्दर व्यंजना की है। उनकी कुछ कहानियों में एक सुगठित कथानक न होकर कई सम्बद्ध कथा-खण्ड प्रस्तुत किए गये हैं, जिनके द्वारा उन्होंने किसी सत्य की व्यंजना की है। इन कहानीकारों ने चरित्रप्रधान, प्रभाववादी, मनोविश्लेषणपरक, भावना-प्रधान, वातावरण-प्रधान, किसी शाश्वत या सामयिक सत्य की व्यंजना करने वाली कई प्रकार की कहानियाँ लिखी हैं। ऐतिहासिक शैली के अलावा, आत्मकथा, पत्र, डायरी आदि अनेक शैलियों का प्रयोग किया गया है। +आधुनिक काल की इस पहली पीढ़ी के कुछ बाद और दूसरी पीढ़ी के कुछ पहले आने वाले उल्लेखनीय कथाकार हैं : उपेन्द्रनाथ अश्क, नागार्जुन, उषादेवी मित्रा, पहाड़ी, विष्णु प्रभाकर, अमृतराय, रांगेय राघव। दूसरी पीढ़ी के उल्लेख कथाकार हैं : फणीश्वरनाथ रेणु, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मार्कण्डेय, अमरकांत, मोहन राकेश, नरेश मेहता, शिवप्रसाद सिंह, धर्मवीर भारती, मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती, शैलेश मटियानी, मुद्राराक्षस।हिन्दी की बिल्कुल नई पीढ़ी के कहानीकारों में उल्लेखनीय हैं : निर्मल वर्मा, रामकुमार, विजय चौहान, कृष्ण बलदेव वैद। ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’ (राजेन्द्र यादव), ‘चाँद और टूटे हुए लोग’ (धर्मवीर भारती), ‘धरती अब भी घूम रही है’ (विष्णु प्रभाकर), ‘जानवर और जानवर’, ‘नए बादल’ (मोहन राकेश), ‘गीली मिट्टी’ (अमृतराय), ‘कुमारी’ (रेणु), ‘भूदान’ (मार्कण्डेय), ‘चाय का रंग’ (देवेन्द्र सत्यार्थी), ‘जीने की सजा’ (आरिगपूडि), ‘नरक का न्याय’ (मोहरसिंह सेंगर), ‘प्यार के बन्धन’ (रावी), ‘मेरी तेतीस कहानियाँ’ (शैलेश मटियानी) आदि संग्रह चर्चा में रहे हैं। हिन्दी की नवीनतम कहानियों में कथा-तत्व की न्यूनता, कामकुण्ठाओं का विश्लेषण, व्यक्ति की पीड़ा, विवशता की अभिव्यक्ति, किसी मनः स्थिति का अंकन और आलोचना-प्रवृत्ति भी दृष्टिगोचर होती है। वर्तमान युग में आँचलिक कहानियाँ भी लिखी गयी हैं। भावकथाएँ, गाथाएँ और लम्बी कहानियाँ पत्रिकाओं में दिखाई देती हैं। +हिन्दी में हास्य और व्यंग्यप्रधान कहानियाँ भी लिखी गई हैं। इस प्रकार की कहानियाँ जी. पी. श्रीवास्तव, हरिशंकर शर्मा, कृष्णदेव प्रसाद गौड़, अन्नपूर्णानन्द, हरिशंकर परसाई, शरद जोशीआदि ने लिखी हैं। जहूर बख्ष आदि ने बाल कहानियाँ लिखी हैं। नारी कहानीकारों में सुभद्रा कुमारी चौहान, सत्यवती मलिक, कमला चौधरी, शिवरानी देवी, तारा पाण्डेआदि ने अच्छा कार्य किया है। +आज के प्रयोगवादी युग में हिन्दी कहानी सभी रूपों में बढ़ रही है। कुछ कहानीकार कथानक-रहित कहानी लिखने का यत्न कर रहे हैं। कहानी बहुत अमूर्त्त (ऐबस्ट्रैक्ट) होती जा रही है। आज कहानी में प्रायः एक मनःस्थिति, क्षण-विशेष की अनुभूति, व्यंग्यचित्र या चिन्तन की झलक प्रस्तुत की जाती है। कहानी में विषय-वस्तु क्षीण, पात्र बहुत थोड़े (एक दो ही) और अस्पष्ट होते जा रहे हैं और पुराने ढंग की सरलता समाप्त होती जा रही है। नयी कविता की तरह नयी कहानी भी कहानीपन छोड़कर निबन्ध के निकट (कथात्मक निबन्ध के निकट) पहुंच रही है। भारतेन्दुकाल में जो कहानी घटना-प्रधान थी, प्रेमचन्द युग में जो चरित्र-प्रधान तथा मनोवैज्ञानिक हुई, जैनेन्द्र-अज्ञेय के उत्कर्ष-काल में जो कहानी घटना-प्रधान थी, प्रेमचन्द युग में जो चरित्र- प्रधान तथा मनोवैज्ञानिक हुई, जैनेन्द्र-अज्ञेय के उत्कर्ष-काल में जो मनोविश्लेषणमय तथा चिन्तनपरक बनी, वही अब कथानकपरक तो है ही नहीं, चरित्र-चित्रणपरक भी नहीं रही। विषय-वस्तु और शिल्प दोनों में वह काफी आगे बढ़ गई है। काशीनाथ सिंह, ज्ञान रंजन, सुरेश सेठ, गोविन्द मिश्र, मृदुला गर्ग, नरेन्द्र मोहन, मृणाल पाण्डेय, उदय प्रकाश, ओम प्रकाश वाल्मीकि, चित्र प्रभा मुदगल, प्रभा खेतान, नासिरा शर्मा आदि अनेक कथाकार हैं जिन्होंने बदलते मनुष्य, समाज, परिस्थितियों, समस्याओं को अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की है। + +हिन्दी एकांकी का इतिहास: +आधुनिक हिन्दी साहित्य की जिन गद्यात्मक विधाओं का विकास विगत एक शताब्दी में हुआ है, उनमें एकांकी का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से, हिन्दी-साहित्य में इसका उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चतुर्थाश में माना जाता है। यदि इसके संवादात्मक स्वरूप एवं एक नाट्य विधा के अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाय तो इसके सूत्र हमें अत्यन्त प्राचीन समय से मिलने लगते हैं। +आधुनिक एकांकी वैज्ञानिक युग की देन है। विज्ञान के फलस्वरूप मानव के समय और शक्ति की बचत हुई है। पिफर भी जीवन संघर्ष में मानव की दौड़-धूप अव्याहत जारी है। जीवन की त्रस्तता और व्यस्तता के कारण आधुनिक मानव के पास इतना समय नहीं है कि वह बड़े-बड़े नाटकों, उपन्यासों, महाकाव्यों आदि का सम्पूर्णतः रसास्वादन कर सके और इसलिए गीत, कहानी, एकांकी आदि साहित्य के लघुरूपों को अपनाया जा रहा है। किन्तु एकांकी की लोकप्रियता का एकमात्र कारण समयाभाव ही नहीं है। भोलानाथ तिवारी के शब्दों में ‘‘यह नहीं कहा जा सकता कि चूंकि हमारे पास बड़ी-बड़ी साहित्यिक रचनाओं को पढ़ने के लिए समय नहीं हैं, इसलिए हम गीत, कहानी, एकांकी आदि पढ़ते हैं। बात यह है कि हम जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं और समस्याओं आदि को क्रमबद्ध एवं समग्र रूप से भी अभिव्यक्त देखना चाहते हैं और उन अभिव्यक्तियों का स्वागत करते हैं मगर साथ ही साथ किसी एक महत्त्वपूर्ण भावना, किसी एक उद्दीप्त क्षण, किसी एक असाधारण एवं प्रभावशाली घटना या घटनांश की अभिव्यक्ति का भी स्वागत करते हैं। हम कभी अनगिन फूलों से सुसज्जित सलोनी वाटिका पसन्द करते हैं और कभी भीनी सुगन्धि देने वाली खिलने को तैयार नन्हीं सी कली। दोनों बातें हैं, दो रुचियाँ हैं, दो पृथक किन्तु समान रूप से महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण हैं, समय के अभाव या अधिकता की इसमें कोई बात नहीं।’’ +इस प्रकार, समयाभाव के अतिरिक्त एकांकी की लोकप्रियता के अन्य भी कई कारण हैं यथा देश में सिनेमा के बढ़ते हुए प्रभाव के विरुद्ध हिन्दी रंगमंच के उद्धार द्वारा जीवन और साहित्य में सुरुचि का समावेश करना, रेडियो से हिन्दी एकांकियों की मांग, केन्द्रीय सरकार के शिक्षा-विभाग की ओर से आयोजित ‘यूथ फेस्टीवल’ में एकांकी नाटक का भी प्रतियोगिता का एक विषय होना, विश्वविद्यालयों में विशेष अवसरों पर एकांकी नाटकों का अभिनय आदि। इन सब कारणों के परिणामस्वरूप एकांकी नाटक आज एक प्रमुख साहित्यिक विधा बन गया है। +एकांकी ने नाटक से भिन्न अपना स्वतंत्र स्वरूप प्रतिष्ठित कर लिया है। एकांकी बड़े नाटक की अपेक्षा छोटा अवश्य होता है परन्तु वह उसका संक्षिप्त रूप नहीं है। बड़े नाटक में जीवन की विविधरूपता, अनेक पात्र, कथा का साँगोपांग विस्तार, चरित्र-चित्रण की विविधता, कुतूहल की अनिश्चित स्थिति, वर्णनात्मकता की अधिकता, चरम सीमा तक विकास तथा घटना-विस्तार आदि के कारण कथानक की गति मन्द होती है जबकि एकांकी में, इसके विपरीत, जीवन की एकरूपता, कथा में अनावश्यक विस्तार की उपेक्षा, चरित्र-चित्रण की तीव्र और संक्षिप्त रूप-रेखा, कुतूहल की स्थिति, प्रारम्भ से ही व्यंजकता की अधिकता और प्रभावशीलता, चरम सीमा तक निश्चित बिन्दु में केन्द्रीयकरण तथा घटना-न्यूनता आदि के कारण कथानक की गति क्षिप्र होती है सद्गुरुशरण अवस्थी का कथन है कि ‘जीवन की वास्तविकता के एक स्फुलिंग को पकड़कर एकांकीकार उसे ऐसा प्रभावपूर्ण बना देता है कि मानवता के समूचे भाव जगत् को झनझना देने की शक्ति उसमें आ जाती है।’’ +ऐतिहासिक दृष्टि से हिन्दी-एकांकी के विकास-क्रम को निम्नलिखित प्रमुख काल-खण्डों में विभाजित किया जा सकता है: +वास्तव में प्रारम्भिक एकांकी-प्रयोगों में भी भटकती हुई नाटय-दृष्टि ही प्रमुखता से उभरकर सामने आई है किन्तु विकास की दृष्टि से उन्हें नकारा नहीं जा सकता। +भारतेन्दु-द्विवेदी युग. +जिस प्रकार भारतेन्दु हिन्दी में अनेकांकी नाटकों के लिखने वालों में प्रथम नाटककार माने जाते हैं उसी प्रकार हिन्दी में सबसे पहला एकांकी भी उन्होंने ही लिखा। यद्यपि इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद अवश्य है। पिफर भी भारतेन्दु-प्रणीत ‘प्रेमयोगिनी’ (1875 ई.) से हिन्दी एकांकी का प्रारम्भ माना जा सकता है। आलोच्य युग में विषयगत दृष्टिकोण को सामने रखकर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिकएवं सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँउभरीं। समाज में प्रचलित प्राचीन परम्पराओं, कुप्रथाओं एवं स्वस्थ सामाजिक विकास में बाधक रीति-रिवाजों को दूर करने का प्रयास उन सामाजिक समस्या-प्रधान रचनाओंके माध्यम से किया गया। इन एकांकीकारों ने जहाँ सामाजिक कुरीतियों पर हास्य एवं व्यंग्यपूर्ण प्रहार किये वहीं सामाजिक नवनिर्माण के लिए भी समाज को प्रेरित एवं जाग्रत किया। इन रचनाओं के पात्र भारतीय जन-जीवन के जीवित एवं सजीव पात्र हैं जिनके संवादों द्वारा भारतीय भद्र जीवन में प्रविष्ट पाखण्ड एवं व्यभिचार का भण्डाफोड़ होता है। इस दृष्टि से भारतेन्दु-रचित ‘भारत-दुर्दशा’, प्रतापनारायण मिश्र रचित ‘कलि कौतुक रूपक’, श्री शरण-रचित ‘बाल-विवाह’, किशोरीलाल गोस्वामी-रचित ‘चौपट चपेट’, राधाचरण गोस्वामी-रचित ‘भारत में यवन लोक’, ‘बूढ़े मुंह मुहासे’ आदि महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं जिनमें धार्मिक पाखण्ड, सामाजिक रूढ़ियों एवं कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किये गये हैं। देवकीनन्दन रचित ‘कलियुगी उनेऊ’, ‘कलियुग विवाह’, राधाकृष्णदास रचित ‘दुखिनी बाला’, काशीनाथ खत्री रचित ‘बाल विधवा’ आदि रचनाएं भारतीय नारी के त्रस्त विवाहित जीवन का यथार्थ चित्रण हैं। सामाजिक भ्रष्टाचार का चित्रण कातिक प्रसाद खत्री-रचित ‘रेल का विकट खेल’ में मिलता है जिसमें रेलवे विभाग में रिश्वत लेने वालों का भण्डा-फोड़ किया गया है। समाज सुधार की परम्परा के पोषक इन एकांकीकारों के प्रयास के फलस्वरूप भारतीय समाज का यथार्थ चित्रण समाज के समक्ष उपस्थित हुआ तथा इन्हीं के द्वारा जन सामान्य को नवीन एवं प्रगतिशील विचारों को ग्रहण करने की प्रेरणा भी मिली। इन्हीं के प्रयासों का परिणाम था कि भारतीय जनता समाज में प्रचलित रूढ़ियों एवं परम्पराओं के प्रति घृणाभाव से भर उठी तथा उनके उन्मूलन के लिए कृत संकल्प हो गयी। +इस प्रकार भारतेन्दु युग नवचेतना और जागृति का युग था। देशभक्ति और राष्ट्रीयता का उन्मेष होने से इस काल के एकांकीकारों ने जन-जागृति के विचारों को मुखरित करने वालेनाटक लिखे। जिनमें भारत की तत्कालीन दुर्दशा, पराधीनता पर क्षोभ, अतीत की स्मृति, राष्ट्र में आत्म गौरव की भावना का जागरण, राष्ट्रहित, आशा-निराशा का द्वन्द्व, उज्जवल भविष्य आदि का चित्रण किया गया है। इस युग में सामाजिक नवजागरण के साथ-साथ राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने का प्रयत्न भी किया गया है। इस सम्बन्ध में भारतेन्दु-कृत ‘भारत दुर्दशा’ एवं ‘भारत-जननी’, राधाकृष्ण गोस्वामी-कृत ‘भारत माता’ और ‘अमरसिंह राठौर’, राधाकृष्ण दास-कृत ‘महारानी पद्मावती’, रामकृष्ण वर्मा-कृत ‘पद्मावती’ ‘दीर नारी’ आदि उल्लेखनीय हैं। भारतेन्दु-कालीन एकांकियों की धार्मिक पौराणिक धाराके अन्तर्गत वे एकांकी आते हैं, जिनमें धार्मिक कथानकों के आधार पर भारतीय संस्कृति का आदर्श रूप प्रस्तुत किया गया है। इस क्षेत्र में भारतेन्दु जी के ‘सत्य हरिश्चन्द्र’ और ‘धनंजय’, लाला श्रीनिवासदास का ‘प्रींद चरित्र’, बदरीनारायण प्रेमघन का ‘प्रयाग राजा-गमन’, राधाचरण गोस्वामी का ‘श्रीदामा’ और ‘सती चन्द्रवली’ बालकृष्ण भट्ट का ‘दमयन्ती स्वयंवर’, जैनेन्द्र किशोर का ‘सोमावती’ अथवा ‘धर्मवती’, कार्तिक प्रसाद का ‘ऊषाहरण’, ‘गंगोत्तरी’, ‘द्रोपदी चीर हरण’ और ‘निस्सहाय हिन्दू’, मोहनलाल विष्णुलाल पाण्डया का ‘प्रींद’, खड्गबहादुर मल्ल का ‘हरतालिका’ आदि में धार्मिक कथानकों पर आधारित पौराणिक एकांकियों के माध्यम से सांस्कृतिक आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया। +आलोच्य युग में हास्यव्यंग्य-प्रधानएकांकी सर्वाधिक लिखे गए जो प्रहसन की श्रेणी में आते हैं। ये प्रहसन धार्मिक और सामाजिक दोनों प्रकार के विषयों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन प्रहसनों पर पारसी रंगमंच का सर्वाधिक प्रभाव है इसलिए उच्चकोटि का हास्य एवं व्यंग्य इनमें नहीं मिलता। पिफर भी सामाजिक क्षेत्र में बाल-विवाह, अनमेल विवाह, वेश्यागमन, मद्यपान, विलासप्रियता आदि पर व्यंग्य किया गया है और धार्मिक क्षेत्र में धार्मिक संकीर्णता और उसकी आड़ में किया पाखण्ड, पंडागिरी, कर्मकाण्ड, ज्योतिषियों की धोखेबाजी आदि पर आक्षेप किए गए हैं। इस प्रकार के एकांकियों में कमलाचरण मिश्र का ‘अद्भुत नाटक’, श्री जगन्नाथ का ‘वर्ण व्यवस्था’, माधोप्रसाद का ‘वैसाखनन्दन’, घनश्यामदास का ‘वृद्धावस्था-विवाह’, दुर्गाप्रसाद मिश्र का ‘प्रभात मिलन’, अम्बिकादत्त व्यास का ‘गौ-संकट’ और ‘मन की उमंग’, देवकीनन्दन त्रिपाठी का ‘जय नरसिंह की’, ‘सैकड़ों में दस-दस’, ‘कलयुगी जनेऊ’, ‘कलियुगी विवाह’, ‘एक एक के तीन तीन’, ‘बैल छः टके का’, ‘वेश्याविलास’ आदि, बालकृष्ण का ‘शिक्षादान’, खघगबहादुर मल्ल का ‘भारत-आरत’ आदि उल्लेखनीय हैं। +उपर्युक्त रचनाओं में से कुछ का उल्लेख नाटक के अन्तर्गत भी किया जाता है। वास्तव में ये एक अंक के नाटक ही हैं। एकांकी की परम्परा में आते हुए भी इन्हें सभी दृष्टियों से पूर्ण ‘एकांकी’ नहीं कहा जा सकता। इनमें एकांकी के कुछ तत्त्व अवश्य ढूँढ़े जा सकते हैं। +कुल मिलाकर विचार किया जाय तो ज्ञात होगा कि उस काल के एकांकी-साहित्य को प्रेरित करने वाली कई नाट्य शैलियाँ थीं : (क) संस्कृत की नाट्य परम्परा (ख) अंग्रेजी, बंगला, पारसी रंगमंच और (ग) लोक नाटक। आलोच्य युग के सभी एकांकीकारों ने इन्हें आत्मसात् किया। इस प्रकार इस युग में परम्परा के प्रभाव की प्रधानता रही। नए-नए प्रयोग होते रहे। इसलिए कला की सूक्ष्म दृष्टि इस काल के एकांकीकारों में भले न हों, पर वे आधुनिक एकांकियों के पूर्वगामी अवश्य हैं। +प्रसाद-युग. +हिन्दी एकांकी के विकास की दृष्टि से द्वितीय युग प्रसाद के युग से जाना जाता है। इस संदर्भ में आधुनिक एकांकी-साहित्य की प्रथम मौलिक कृति के रूप में प्रसाद के ‘एक घूँट’ का उल्लेख किया जा सकता है। यह रचना सन् 1929 में प्रकाशित हुई। यहीं से हम एकांकी के शिल्प में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखते हैं। रसोद्रेक के लिए संगीत-व्यवस्था, संस्कृत नाट्य प्रणाली का विदूषक, स्वगत कथन आदि प्राचीन परम्पराओं के निर्वाह के साथ ही स्थल की एकता, पात्रों का मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण, गतिशील कथानक, आदि आधुनिक एकांकी की सभी विशेषताएं ‘एक घूंट में’ मिलती है। अतः भारतेन्दु ने यदि आधुनिक एकांकी की नींव डाली है तो उसे पल्लवित और पुष्पित करने का श्रेय प्रसाद जी को ही है। +वास्तव में आधुनिक ढंग से हिन्दी एकांकियों का विकास प्रसाद-युग में ही हुआ क्योंकि इस युग में कुछ महत्त्वपूर्ण नवीन प्रयोग एकांकी क्षेत्र में हुए। इस युग में एकांकीकारों ने पाश्चात्य अनुकरण पर नवीन शैली में एकांकी लिखना प्रारम्भ किया तथा पाश्चात्य टेकनीक को अपनाया। स्पष्टतः इस युग में एकांकी नाटकों में पाश्चात्य नाट्य सिद्धान्तों की प्रेरणा एवं प्रभाव विद्यमान है। पाश्चात्य नाटककारों हैनरिक, इब्सन, गाल्सवर्दी तथा बर्नार्ड शॉ आदि का प्रभाव इस युग के एकांकियों पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ा तथा इससे एकांकी साहित्य को परिपक्वता की स्थिति पर पहुंचने में सहायता मिली। भारतेन्दु युग में जो एकांकी संस्कृत परिपाटी पर विरंचित हुआ था, इस युग में आकर वह नवीन रूपों में विकसित होने लगा। पा्रचीनता का मोह छोड़कर नवीन ढंग के एकांकी नाटक लिखे गये जो कथानक की दृष्टि से मानव जीवन के अत्यधिक निकट थे। प्राचीन कथावस्तु में जो कृत्रिमता होती थी उसके स्थान पर सामाजिक, पारिवारिक एवं दैनिक समस्याओं को एकांकी का विषय बनाना प्रारम्भ किया गया। ये रचनाएं समाजिक यथार्थ के निकट आयीं। प्राचीन कृत्रिम प्रणाली, काव्यमय कथोपकथन, प्राचीन रंगमंच एवं अस्वाभाविकता के बहिष्कार का स्वर इस युग की रचनाओं में प्रमुखतया प्राप्त होता है। नई समस्याएँ, विचारधारा एवं गद्यात्मक शिष्ट भाषा का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। +इस युग के अधिकांश एकांकी रंगमंच को दृष्टि में रखकर लिखे गये जिससे उनका अभिनय हो सके और प्रेक्षक अपना ज्ञानवर्धन कर सकें। एकांकी में प्रयुक्त संवादों में सजीवता, संक्षिप्तता एवं मार्मिकता की ओर ध्यान दिया गया। प्रहसन, फेंटेसी, गीति-नाट्य, ओपेरा, संवाद या सम्भाषण, रेडियो प्ले, झांकी तथा मोनोड्रामा आदि एकांकी से नवीन रूपों का विकास इसी युग में हुआ। युगीन सामाजिक, राजनैतिक एवं धार्मिक पृश्ठभूमि का प्रभाव आलोच्य युगीन एकांकीकारों की रचनाओं पर पड़ने के कारण कतिपय प्रवृत्तियों का जन्म हुआ जिनमें सामाजिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियां प्रमुख हैं। +प्रसाद-युग में जिन सामाजिक एकांकियों की रचना हुई उन पर युगीन सामाजिक पृश्ठभूमि का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है। इस युग के अनेक एकांकीकारों ने सामाजिक जीवन की विभिन्न पक्षीय समस्याओं का चित्रण किया है तथा उसमें प्रचलित विभिन्न जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों को अपनी आलोचना का केन्द्र बनाया है। बाल-विवाह, विधवा-पुनर्विवाह, जातीयता, अस्पृश्यता की समस्या, मद्यपान, जुआ तथा समाज में फैला व्यभिचार आदि समस्याएँ जिस रूप में भारतेन्दु युग में परिव्याप्त थीं वह अभी तक उसी रूप में बनी हुई थी। यद्यपि भारतेन्दु युगीन एकांकीकारों ने भी इन पर प्रहार किया था, किंतु इनका निवारण अथवा उन्मूलन सरल नहीं था क्योंकि इनकी जड़ें समाज में बहुत गहरी थीं। अतः प्रसाद युगीन एकांकीकारों ने भी विषय-रूप में इन सामाजिक समस्याओं को अपनी रचनाओं में चित्रित किया। +तत्कालीन समाज की नग्न विकृतियों का चित्रणकरने वाले अनेक एकांकियों की रचना इस युग में हुई। जीवानन्द शर्मा कृत ‘बाला का विवाह’ सुधारवादी दृष्टिकोण को प्रकट करता है। हरिकृष्ण शर्मा कृत ‘बुढ़ऊ का ब्याह’ वृद्ध अनमेल विवाह एवं दहेज समस्या पर कुठाराघात है। जी. पी. श्रीवास्तव रचित ‘गड़बड़झाला’ में वृद्धों की अनियंत्रित काम वासना एवं समाज के लोगों का भ्रष्टाचार चित्रित किया गया है। रामसिंह वर्मा कृत ‘रेशमी रूमाल’ में पतिव्रत धर्म की प्रतिष्ठा, शैक्षिक वृत्तियों एवं रोमांस की त्रुटियों का चित्रण है। प्रेमचन्द कृत ‘प्रेम की देवी में’ लेखक ने अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन प्रबल रूप में किया है। श्री बदरीनाथ भट्ट कृत ‘विवाह विज्ञापन’ में आधुनिक शिक्षित वर्ग की रोमांस वृत्ति पर व्यंग्यात्मक प्रहार है। डॉ. सत्येन्द्र कृत ‘बलिदान’ में दहेज समस्या का चित्रण है। जी. पी. श्रीवास्तव-कृत ‘भूलचूक’ से विधवा विवाह समर्थन, ‘अच्छा उपर्फ अक्ल की मरम्मत’ में शिक्षित पति एवं अशिक्षित पत्नी के मध्य उत्पन्न कटुता, ‘लकड़बग्घा’ में )ण समस्या आदि पर व्यंग्य किया गया है। इनके अतिरिक्त ‘बंटाधार’, ‘दुमदार आदमी’, ‘कुर्सीमैन’, ‘पत्र पत्रिका सम्मेलन’, ‘न घर का न घाट का’, ‘चोर के घर मोर’ आदि रचनाओं में श्रीवास्तव जी का दृष्टिकोण सुध ारवादी रहा है। श्रीवास्तव जी का ‘अछूतोद्वार’ एकांकी अछूत समस्या पर लिखा गया है। श्री चण्डीप्रसाद हृदयेश कृत ‘विनाश लीला’ में भारतीय नारी के जन्म से अन्त तक के सामाजिक कष्टों का चित्रण है। पं. हरिशंकर शर्मा कृत ‘बिरादरी विभ्राट’, ‘पाखण्ड प्रदर्शन’, तथा ‘स्वर्ग की सीधी सड़क’ सामाजिक छुआछूत तथा वर्ग वैषम्य की हानियों को चित्रित करते हैं। श्री सुदर्शन कृत ‘जब आँखें खुलती हैं’ में वेश्या का हृदय-परिवर्तन स्वाध ीनता संग्राम के वातावरण में चित्रित किया गया है। आलोच्य युग में श्री रामनरेश त्रिपाठी कृत ‘समानाधिकार’, ‘सीजन डल है’, ‘स्त्रियों की काउन्सिल’, पांडेय बेचन शर्मा उग्र-कृत ‘चार बेचारे’, बेचारा सम्पादक’, बेचारा सुधारक’, श्री रामदास-कृत ‘नाक में दम’, ‘जोरू का गुलाम’, ‘करेन्सी नोट’, ‘लबड़ धौं धौं’ आदि एकांकियों को भी विशेष ख्याति प्राप्त हुई है। +भारतेन्दु युग में जिस राजनीतिक एकांकीकी प्रवृत्ति का उदय हुआ था वह प्रसाद-युग में आकर और अधिक गतिशील हो गई। इस युग में राष्ट्रीयता का स्वर सर्वाधिक मुखरित हुआ है। राजनीतिक भावना से प्रभावित होकर एकांकीकारों ने अपनी रचनाओं से स्वतंत्रता-आन्दोलन, विदेशी शासन के प्रति आक्रोश एवं घृणा तथा स्वतंत्रता की भावनाओं का स्वर मुखरित किया है। इस संदर्भ में मंगल प्रसाद विश्वकर्मा कृत ‘शेरसिंह’, सुदर्शन कृत ‘प्रताप प्रतिज्ञा’, ‘राजपूत की हार’, तथा ‘जब आंखें खुलती हैं’ आदि राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत एकांकी रचनाएं हैं। श्री ब्रजलाल शास्त्री रचित ‘दुर्गावती’ में विद्रोह एवं स्वातंत्रय भावना की प्रधानता है। ‘पन्ना धाय’ में स्वामिभक्ति एवं अपूर्व बलिदान का चित्रण है। बदरीनाथ भट्ट कृत ‘बापू का स्वर्ग समारोह’ में राष्ट्रपिता बापू के अपूर्व त्याग एवं बलिदान युक्त चरित्र का उद्घाटन किया गया है। श्री वृन्दावन लाल वर्मा रचित ‘दुरंगी’ में भारतीय नारियों को देश प्रेम की भावना जाग्रत करने में रत दिखाया गया है। रामनरेश त्रिपाठी रचित ‘सीजन डल है’ में विदेशी बहिष्कार एवं स्वदेश की भावना का चित्रण है। सेठ गोविन्द दास के ‘अपरिग्रह की पराकाष्ठा’ में गांधीवाद के अपरिग्रह के सिद्धान्त का चित्रण है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रसाद युग में विभिन्न राजनीतिक दृष्टिकोणों को लेकर एकांकियों की रचना हुई। उन्होंने प्राचीन भारतीय राष्ट्रीय गौरव की स्थापना करते हुए भविष्य में उसकी प्राप्ति की ओर संकेत किया है। भारत भूमि की स्वतंत्रता राष्ट्र-प्रेम, राष्ट्र भक्ति की भावधारा का भारतीय मानव के अन्तःकरण में उद्रेक करना इनका उद्देश्य रहा है। चूंकि ये एकांकीकार स्वयं देशप्रेम की भावना से आपूरित थे। अतः उसके चित्रण में स्वाभाविकता एवं प्रभावोत्पादकता का प्राधान्य रहा है। इनकी रचनाओं का परिणाम यह हुआ कि पूर्व प्रसाद-युग में अंकुरित राष्ट्र-प्रेम की भावना इस युग के एकांकीकारों के विचारों की खाद प्राप्त करके भारतीय जनता के हृदय में अधिक पुष्पित एवं पुल्लवित हो उठी। +प्रसाद-युगीन एकांकीकारों ने अनेक ऐतिहासिक एकांकियोंकी रचना करके प्राचीन भारतीय गौरव एवं अतीत के स्वरूप का स्मरण भारतीय जनता को कराया। यद्यपि विदेशी सरकार का भय होने के कारण ये भावना प्रत्यक्ष रूप से प्रगट न हुई किन्तु इसमें निरन्तर विकास के चि” अंकित होते चले गये। जैसे-जैसे स्वतंत्रता आन्दोलनों में तीव्रता आई, त्यों-त्यों उनका स्वर एकांकियों में अधिकाधिक मुखरित होने लगा। इन एकांकीकारों ने भारतीय नारी के पतिव्रत धर्म के महान आदर्श, उनकी त्याग एवं बलिदानमयी भावना अपने राष्ट्र के हित के लिए सर्वस्व त्याग की भावना, राष्ट्रहित के लिए प्राणों की वलि चढ़ाना, कर्त्तव्यों के प्रति जागरूकता आदि सद्गुणों का चित्रण अपनी कृतियों में किया है। +मंगलाप्रसाद विश्वकर्मा कृत ‘शेरसिंह’ में राष्ट्रीयता, स्वातंत्रय प्रेम तथा भारतीय अतीत के गौरवशाली स्वरूप की प्रतिष्ठा है। श्री आनन्दी प्रसाद श्रीवास्तव कृत ‘नूरजहां’, ‘चाणक्य और चन्द्रगुप्त’, ‘शिवाजी और भारत राजलक्ष्मी’ ऐतिहासिक कृतियाँ हैं। श्री ब्रजलाल शास्त्री रचित ‘दुर्गावती’, ‘पप्रिनी’, ‘पन्ना’, ‘तारा’, ‘किरण देवी’, आदि ऐतिहासिक आदर्शवाद से प्रभावित अतीत गौरव को स्पष्ट करने वाली रचनाएं हैं। श्री सुदर्शनकृत ‘राजपूत की हार’, ‘प्रताप प्रतिज्ञा’, आदि में राजपूती शौर्य, राजपूती स्त्रियों का स्वदेश हित हेतु कर्त्तव्य का पालन एवं देश प्रेम की भावना का प्रभावपूर्ण वर्णन हुआ है। सेठ गोविन्ददास ने तो बहुत बड़ी संख्या में ऐतिहासिक एकांकियों की रचना की है, जिनमें ‘बुद्ध के सच्चे स्नेही कौन’? ‘बुद्ध की एक शिष्या’, ‘सहित या रहित’, ‘अपरिग्रह की पराकाष्ठा’, ‘चैतन्य का संन्यास’, ‘सूखे संतरे’ आदि ऐतिहासिक धारा के अन्तर्गत आते हैं। इनमें प्राचीन भारतीय गौरव एवं संस्कृति की प्रतिष्ठा, आचार-विचार का प्रतिपादन सेठ जी का प्रमुख उद्देश्य रहा है। गोविन्द वल्लभ पंत के ‘विष कन्या’, ‘भस्म रेखा’, ‘एकाग्रता की परीक्षा’ आदि ऐतिहासिक कथावस्तु पर आधारित हैं। इस प्रकार प्रसाद युग में अनेक ऐतिहासिक एकांकियों की रचना हुई जिनके माध्यम से भारत के अतीतमय गौरव एवं संस्कृति पर दृष्टिपात किया गया। +प्रसाद-युगीन कुछ एकांकीकारों ने धार्मिक पौराणिकक्षेत्र में भी प्रवेश किया है। प्रसाद-युग के धार्मिक एकांकी अपने पूर्व युग में विरचित एकांकी नाटकों से भिन्न थे। भारतेन्दु-युग में इनका विषय प्रधान रूप से राम तथा कृष्ण की कथाओं से ही सम्बद्ध रहा। प्रसाद युग में अन्य पौराणिक कथाओं को भी महत्त्व दिया गया क्योंकि सामाजिक सुधार की प्रवृत्ति का प्राधान्य होने के कारण धार्मिक एकांकियों से जनता सन्तुष्ट नहीं होती थी। जनता की धार्मिक अश्रद्धा का कारण धार्मिक भ्रष्टाचारों का प्रधान्य एवं वास्तविक धर्म के स्वरूप का लोप होना था। अतः वह धार्मिक क्षेत्र में सुधार परमावश्यक समझती थी। अतः कुछ धार्मिक कथाओं को आधार रूप में ग्रहण कर भारत के प्राचीन धार्मिक आदर्शों को प्रस्तुत करना इस युग के कलाकारों को युक्ति संगत प्रतीत हुआ। धार्मिक पौराणिक एकांकी धारा को प्रवाहित करने में राधेश्याम कथावाचक कृत ‘कृष्ण-सुदामा’, ‘शान्ति के दूत भगवान’, ‘सेवक के रूप में भगवान कृष्ण’, जयदेव शर्मा रचित ‘न्याय और अन्याय’, जयशंकर प्रसाद कृत ‘सज्जन’ और ‘करुणालय’ आनन्दी प्रसाद-कृत ‘पार्वती और सीता’, चतुरसेन शास्त्री कृत ‘सीताराम’, ‘राधा-कृष्ण’, ‘हरिश्चन्द्र शैव्या’, आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इस प्रकार प्रसाद-युग में कुछ एकांकीकारों ने धार्मिक पौराणिक एकांकी की प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया। +भारतेन्दु-युग में जिस हास्य-व्यंग्य-प्रधान धाराको सामाजिक सुधार-हेतु माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया था उसका निर्वाह प्रसाद-युग में भी दृष्टिगोचर होता है। इन एकांकीकारों ने समाज में प्रचलित अनेक जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों, कुप्रथाओं एवं परम्पराओं पर व्यंग्य किये हैं। उनका लक्ष्य सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक सुधार ही अधिक रहा है। श्री बद्रीनाथ भट्ट रचित ‘चुंगी की उम्मेदवारी’ में चुनाव की प्रणाली पर व्यंग्य किया गया है। श्री जी. पी. श्रीवास्तव रचित ‘दुमदार आदमी’, ‘पत्र-पत्रिका सम्मेलन’, ‘अच्छा उपर्फ अक्ल की मरम्मत’, ‘न घर का न घाट का’, ‘गड़बड़झाला’, ‘लकड़बग्घा’, ‘घर का मनेजर’ आदि हास्य व्यंग्य प्रधान एकांकी हैं जिनमें विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक कुरीतियों व रूढ़ियों पर व्यंग्यात्मक प्रहार किये गये हैं। इन रचनाओं में लेखक ने दहेज समस्या, विवाह समस्या तथा सामाजिक विरूपताओं एवं मिथ्या प्रदर्शन की भावना पर सुन्दर व्यंग्य किया है। इसी सन्दर्भ में द्वारिकाप्रसाद गुप्त रचित ‘बशर्ते कि’ बद्रीनाथ रचित ‘लबड़ धौं-धौं’, ‘पुराने हकीम का नया नौकर’, ‘मिस अमेरिकन’, ‘रेगड़ समाचार के एडीटर की धूल दच्छना’ आदि हास्य व्यंग्य प्रध ान रचनाएं हैं जिनमें मध्यम तथा अल्प शिक्षित वर्ग की समस्याओं का चित्रण किया गया है। भट्ट जी का यह हास्य शिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण बन पड़ा है। श्री रामचन्द्र रघुनाथ रचित ‘पाठशाला का एक दृष्य’, ‘सभी हा ः हा :’, ‘मदद मदद’, ‘यमराज का क्रोध’, रूप नारायण पांडेय रचित ‘समालोचना रहस्य’, गरीबदास कृत ‘मियाँ की जूती मियां के सिर’, मुकन्दीलाल श्रीवास्तव कृत ‘घर का सुख कहीं नहीं है’, श्री गोविन्द वल्लभ पंत रचित ‘140 डिग्री.’, ‘काला जादू’, पांडेय बेचन शर्मा उग्र कृत ‘चार बेचारे’, ‘बेचारा अध्यापक’, ‘बेचारा सुध ारक’, सेठ गोविन्ददास कृत ‘हंगर स्ट्राइक’, ‘उठाओ खाओ खाना अथवा बफेडिनर’, ‘वह मेरा क्यों?’ आदि रचनाएं इसी श्रेणी के अन्तर्गत आती हैं। +इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रसाद-युग में भी विभिन्न एकांकीकारों ने विविध क्षेत्रीय समस्याओं एवं परिस्थितियों के उद्घाटन हेतु हास्य व्यंग्य को महत्व दिया तथा उसका सफलतापूर्वक प्रयोग भी किया। प्रसाद-युग के उपर्युक्त प्रतिभाशाली एकांकीकारों के अतिरिक्त अन्य अनेक एकांकीकार भी हुए जिन्होंने एकांकी के क्षेत्र में अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया है। अनेक एकांकीकारों ने अन्य भाषाओं में लिखित एकांकियों का हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया। यद्यपि इस युग में आधुनिक युग की अपेक्षा विकास नगण्य कहा जाता है किन्तु इसमें संदेह नहीं कि प्रसाद-युग में आकर नाट्यकला विषयक मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस युग ने आगामी एकांकीकारों को एक पुष्ट आधारभूमि प्रदान की जिसमें आधुनिक एकांकी साहित्य और भी स्वतंत्र रूप से विकसित हुआ। +प्रसादोत्तर-युग. +प्रसादोत्तर-युग हिन्दी एकांकी के विकास की तीसरी अवस्था है जिसका समय सन् 1938 से 1947 ई. (स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व) तक रहा। इसके भी हम दो उप-सोपान मान सकते हैं : +प्रथम सोपान अर्थात् इस काल के प्रारम्भिक समय में हिन्दी एकांकी में अपने समय की विभिन्न समस्याओं एवं परिस्थितियों पर तर्क-वितर्क मिलता है। तभी कुछ विचित्र एवं क्रांतिकारी परिस्थितियों ने विषय, शैली, और दृष्टिकोण को भी नया मोड़ दिया। हिन्दी के अनेक एकांकीकार इस समय पाश्चात्य नाट्य शैलियों एवं विकसित प्रवृत्तियों से प्रभावित हो उनका अनुकरण कर रहे थे। इब्सन, विल्यिम आर्चर, बर्नार्ड शॉ आदि ख्याति प्राप्त पाश्चात्य लेखकों का प्रभाव हिन्दी एकांकीकारों पर पड़ ही रहा था। अतः इस युग के एकांकीकारों ने परम्परागत एकांकी-तत्त्वों का निर्वाह करने के साथ-साथ अभिनव शिल्प-रूपों को भी स्थान दिया तथा विषय की दृष्टि से एकांकी को मात्र मनोरंजन की वस्तु न बनाकर उसमें मानव जीवन की सामयिक समस्याओं एवं विरूपताओं का चित्रण प्रारम्भ कर दिया। अर्थात् इस समय हिन्दी एकांकी आदर्शवाद के एकांगी घेरे से निकल कर यथार्थवाद की ओर बढ़ा। सन् 1940 से 1947 तक का समय भारत के लिए आपत्तियों का समय था। युद्ध की विभीषिकाएं, बंगाल का अकाल, आजादी की हुंकार, विदेशी शासकों के लोमहर्षक अत्याचार, चोर बाजारी आदि इन्हीं सात वर्षों के भीतर की ही बातें हैं। इन सबने हमारे चिन्तन और हमारी कला को प्रभावित किया। एकांकी भी इनसे अछूता नहीं रह सका। कृत्रिमता की बजाय स्वाभाविक और सहज जीवन को प्रतिबिम्बित करने वाले एकांकी की रचना प्रारम्भ हुई। इन एकांकियों में नाटकीय अभिनय के स्थान पर सरल अभिनयात्मक संकेत दिये जाने लगे। इसमें परम्परागत रंगमंच-विधान सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया और उससे सहजता, सरलता, स्वाभाविकता एवं यथार्थ के दर्शन होने लगे। शिल्प विधान के अनावश्यक आडम्बर बन्धन से इस युग का एकांकी साहित्य मुक्त हो गया। संकलन त्रय को वस्तुतः इसी समय एकांकी का अनिवार्य अंग माना जाने लगा। अब एकांकी केवल साहित्यिक विधा ही न रह गयी अपितु इस युग में रंगमंच की स्थापना के साथ उसके स्वरूप में भी अन्तर परिलक्षित हुआ। इस समय तक ‘हंस’ तथा ‘विश्वमित्र’ आदि पत्रिकाओं में एकांकी नाटक एकांकी के नाम से प्रकाशित होने प्रारम्भ हो गये तथा इनकी प्रारम्भिक भूमिकाओं में एकांकी के शिल्प आदि पर विचार प्रस्तुत किये जाने लगे। जिस प्रकार भारतेन्दु-युग और प्रसाद-युग में हिन्दी एकांकी की विविध प्रवृत्तियाँ उभरी थीं उसी प्रकार प्रसादोत्तर युग में भी हिन्दी एकांकी की विविध प्रवृत्तियां परिलक्षित होती हैं। वास्तव में प्रस्तुत युग में भी पूर्वयुगीन प्रवृत्तियों को ही आधार बनाकर एकांकियों की रचना हुई किन्तु उनको आदर्शवाद के स्थान पर यथार्थवादी आधारभूमि पर निर्मित किया गया। +प्रसादोत्तर युग में यद्यपि एकांकी की अनेक प्रवृत्तियों को प्रश्रय मिला है तथापि सामाजिक एकांकी की प्रवृत्ति पर लगभग सभी युगीन एकांकीकारों ने अपनी लेखनी चलाई। प्रस्तुत युग के प्रमुख एकांकीकार डा.रामकुमार वर्मा ने तो अनेक सामाजिक समस्या प्रधान एकांकियों की रचना करके हिन्दी एकांकी साहित्य को बहुमूल्य धरोहर प्रदान की है। इन्होंने जीवन की वास्तविकताको अपने एकांकियों का आधार बनाया। इस दृष्टि से इनके ‘एक तोले अफीम की कीमत’, ‘अठारह जुलाई की शाम’, ‘दस मिनट’, ‘स्वर्ग का कमरा’, ‘जवानी की डिब्बी’, ‘आंखों का आकाश’, ‘रंगीन स्वप्न’, आदि एकांकी सामाजिक एकांकी की प्रवृत्ति का प्रतिनिधि त्व करते हैं। वर्मा जी के समान उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’का ध्यान भी विविध वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं की ओर गया। इनकी एकांकी रचनाओं में : ‘चरवाहे’, ‘चिलमन’, ‘लक्ष्मी का स्वागत’, ‘पहेली’, ‘सूखी डाली’, ‘अन्धी गली’, ‘तूफान से पहले’, आदि सामाजिक दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें लेखक ने युगीन सामाजिक रूढ़ियों, परम्पराओं, विरूपताओं विकृतियों, एवं अज्ञानताओं का बड़ा ही प्रभावोत्पादक किन्तु व्यंग्यात्मक चित्र उपस्थित किया है। युगीन एकांकीकार भुवनेश्वर-रचित ‘श्यामा एक वैवाहिक विडम्बना’, ‘स्ट्राइक’, ‘एक साम्यहीन साम्यवादी’ तथा ‘प्रतिमा का विवाह’ आदि प्रसिद्ध हैं। इसमें सामाजिक बाह्याडम्बर, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, यौन विषयक समस्याओं एवं प्राचीन अप्रगतिशील मान्यताओं का चित्रण किया गया है जो मानव जीवन के विकास पथ को अवरुद्ध किए हैं। श्री जगदीश चंद्र माथुरका दृष्टिकोण भी सामाजिक जीवन की समस्याओं के प्रति स्वस्थ एवं उदार रहा है। वे उन एकांकियों को सफल नहीं मानते जो समाज से निरपेक्ष होकर मात्र साहित्यिक विधा बनकर रह जाते हैं। उन्होंने ‘ओ मेरे सपने’ के पूर्व निवेदन में लिखा है कि ‘कौन ऐसा लेखक होगा कि जिसकी कलम पर सामाजिक समस्याएँ सवार न होती हों अनजाने ही या डंके की चोट के साथ ?’ इस विचार के अनुसार उनके ‘मेरी बाँसुरी’, ‘खिड़की की राह’, ‘कबूतर खाना’, ‘भोर का तारा’, ‘खंडहर’, आदि एकांकी उल्लेखनीय हैं। इनमें सामाजिक बन्धनों के प्रति तीव्र विद्रोही भावना व्यक्त हुई है। श्री शम्भुदयाल सक्सेनारचित ‘कन्यादान’, ‘नेहरू के बाद’, ‘मुर्दो का व्यापार’, ‘नया समाज’, ‘नया हल नया खेत’, ‘सगाई’, ‘मृत्युदान’ आदि एकांकी सामाजिक समस्याओं को प्रस्तुत करते हैं। सक्सेना जी पर गाँधीवादी जीवन का प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है। यही कारण है कि इनकी रचनाओं में सादा जीवन का महत्त्व, मानवतावादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा, नैतिक उन्नयन के प्रति आग्रह, बाह्याडम्बर के प्रति घृणा एवं कर्त्तव्य के प्रति जागरूकता के दर्शन होते हैं। हरिकृष्ण प्रेमी ने ‘बादलों के पार’, ‘वाणी मन्दिर’, ‘सेवा मन्दिर’, ‘घर या होटल’, ‘निष्ठुर न्याय’ आदि एकांकी रचनाओं में विविध सामाजिक समस्याओं का अंकन किया है जिनमें विधवा समस्या, ‘नारी की आध ुनिकता’, वर्ग वैषम्य, जातीय बन्धन की संकीर्णता, प्राचीन परम्पराओं एवं मान्यताओं की अर्थहीनता, पुरुष की वासना लोलुपता एवं दुश्चरित्रता आदि का चित्रण प्रमुख रूप के किया है। भगवतीचरण वर्माकृत ‘मैं और केवल मैं’, ‘चौपाल में’ तथा ‘बुझता दीपक’, में पीड़ित मानव की अन्तर्वेंदना का करुण स्वर उभर कर सामने आया है। श्री रामवृक्ष बेनीपुरीरचित ‘नया समाज’, ‘अमर ज्योति’, तथा ‘गाँव का देवता’ आदि रचनाएं सामाजिक समस्या प्रधान हैं। श्री सद्गुरुशरण अवस्थी ने भारतीय संस्कृति के आदर्शों को उपयुक्त एवं उचित तर्को की कसौटी पर कसकर उनको समाज के लिए उपयोगी सिद्ध किया जिनमें बुद्ध, तर्क एवं विवेक का प्राधान्य है। इस दृष्टि से ‘हाँ में नहीं का रहस्य’, ‘खद्दर’, ‘वे दोनों’ आदि विशेष महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। इनके अतिरिक्त चन्द्रगुप्त विद्यालंकाररचित ‘प्यास’ तथा ‘दीनू’, श्री यज्ञदत्त शर्माकृत ‘छोटी-बात’, ‘साथ’, ‘दुविधा’, एस.सी. खत्री रचित,‘बन्दर की खोपड़ी’, ‘प्यारे सपने’, श्री सज्जाद जहीररचित ‘बीमार’ आदि रचनाओं में सामाजिक जीवन के सत्य को उभारते हुए और उनका सर्वपक्षीय चित्रण किया गया है। +प्रसादोत्तर युग राजनीतिक क्रांति का युग था। गाँधी जी का प्रभाव राजनीतिक जीवन में विशेष रूप से पड़ रहा था। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार का दमन चक्र भी राजनीतिक क्रांति को कुचलने के लिए तीव्र गति से चल रहा था। एकांकीकारों ने तत्कालीन राजनीतिक समस्याओं एवं गतिविधियों का चित्रण करना तथा देशवासियों में देशप्रेम एवं स्वतंत्रता की भावना को प्रबल करना अपना महान कर्त्तव्य समझा। श्री भगवती चरण वर्मा ने ‘बुझता दीपक’ में राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस के उच्च पदाधिकारियों अथवा नेताओं के खोखलेपन पर भी व्यंग्यात्मक प्रहार किया है। श्री हरिकृष्ण प्रेमीने अपनी राजनीतिक रचनाओं में राष्ट्र के नवनिर्माण, देशभक्तों भारतीय नेताओं एवं जनता के स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये जाने वाले कार्यों, हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष, साम्प्रदायिक एकता की आवश्यकता, दासता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए कृत संकल्प देशभक्तों की चारित्रिक महानता आदि को चित्रित किया है। इस दृष्टि से इनकी ‘राष्ट्र मन्दिर’, ‘मातृ-मन्दिर’, ‘मान-मन्दिर’ तथा ‘न्याय मन्दिर आदि उल्लेखनीय रचनाएं हैं। श्री लक्ष्मी नारायण मिश्ररचित ‘देश के शत्रु’ शीर्षक एकांकी में उन स्वार्थलोलुप व्यक्तियों पर व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया है जो अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति हेतु देश के प्रति अपने कर्त्तव्य को भुलाकर देशद्रोही बन बैठे हैं। जगदीश चंद्र माथुररचित ‘भोर का तारा’ शीर्षक एकांकी में देशभक्त कवि के महान बलिदान की कहानी है। डा. सुधीन्द्ररचित ‘खून की होली’, ‘नया वर्ष’, ‘नया संदेश’, ‘राखी’, ‘संग्राम’ आदि तथा चन्द्रगुप्त विद्यालंकाररचित ‘कासमोपोलिटन क्लबों’ आदि रचनाएँ राजनीतिक भावना से ओतप्रोत हैं। इस प्रकार युगीन एकांकीकारों ने राजनीतिक भावना से प्रभावित होकर राष्ट्रीयता का स्वर अपनी रचनाओं में प्रस्फुटित किया है। +आलोच्य युग में कुछ देशद्रोही वैयक्तिक स्वार्थों के कारण ब्रिटिश शासकों का साथ दे रहे थे। ऐसे देश-द्रोहियों को देशभक्ति की शिक्षा देने की दृष्टि से एकांकीकारों ने ऐतिहासिक पात्रों के आदर्श एवं त्यागमय चरित्र को प्रस्तुत करके प्राचीन भारतीय गौरव की ओर ध्यान भी आकर्षित करवाया। डॉ. वर्मा के ऐतिहासिक एकांकियों में ‘चारुमित्रा’, ‘पृथ्वीराज की आँखें’, ‘दीपदान’, ‘रात का रहस्य’, ‘प्रतिशोध’, ‘राज श्री’, आदि प्रमुख हैं। जगदीशचन्द्र माथुर ने ‘कलिंग विजय’, तथा ‘शारदीया’, शीर्षक एकांकियों की रचना ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर की है तथा भारतीय सांस्कृतिक वातावरण का प्रभावोत्पादक स्वरूप चित्रित किया है। राष्ट्रीय ऐतिहासिक भावना पर ‘सिकन्दर’, ‘जेरुसलम’ आदि एकांकियों की रचना करके भुवनेश्वर प्रसाद ने अपने देश प्रेम का परिचय दिया है। +हरिकृष्ण प्रेमीरचित ‘मान मन्दिर’, ‘न्याय मन्दिर’, ‘मातृ भूमि का मान’, ‘प्रेम अन्धा है’, ‘रूपशिखा’ आदि राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत ऐतिहासिक रचनाएं हैं। श्री यज्ञदत्त शर्मारचित ‘प्रतिशोध’ तथा ‘हेलन’ में भारत के गौरवमय अतीत की झाँकी प्रस्तुत की गई है। डा. सत्येन्द्ररचित ‘कुणाल’, ‘प्रायश्चित, ‘विक्रम का आत्ममेघ’ में प्राचीन कथानक लेकर स्वस्थ तथा तार्किक विचारधारा का प्रतिपादित किया गया है। भारतीय सांस्कृतिक गौरव की प्रतिष्ठा, अतीत कालीन भारतीय गौरव की महत्ता तथा नागरिकों के चारित्रिक बल की अभिवृिद्ध करने वाले आदर्श पात्रों की सृष्टि करके लेखक ने राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में सहयोग प्रदान किया है। गिरिजाकुमार माथुररचित ‘विषपान’, ‘कमल और रोटी’, ‘वासवदत्ता’ आदि में देशभक्तिपूर्ण आत्म वलिदान तथा राष्ट्रीय स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये गये शौर्यपूर्ण कार्यों का चित्रण है। श्री रामवृक्ष बेनीपुरीरचित ‘संघमित्रा’, ‘सिंहल विजय’, ‘नेत्रदान’, ‘तथागत’, आदि इतिहास प्रसिद्ध घटनाओं पर आधारित हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रसादोत्तर युग में अनेक एकांकीकारों ने बहुत बड़ी संख्या में ऐतिहासिक पृश्ठभूमि के आधार पर एकांकियों की रचना करके प्राचीन भारतीय गौरव को वर्तमान के समक्ष रखा है। +धर्म-प्रधान देश के नागरिक होने के कारण भारतीय हिन्दी एकांकीकारों ने अपने एकांकियों की रचना धार्मिक आधार पर करने की प्रवृत्ति इस युग में भी नहीं छोड़ी। श्री शम्भुदयाल सक्सेनाने विशेष रूप से धार्मिक पौराणिक प्रसंगों पर आधारित एकांकियों की रचना की है। इन्होंने प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक गौरव की प्रतिष्ठा करने की दृष्टि से उन गौरवशाली चित्रों को उपस्थित किया जिन्होंने भारतीय हिन्दू संस्कृति की मर्यादा को बनाये रखा। इनके द्वारा रचित ‘सीताहरण’, ‘शिला का उद्धार’, ‘उतराई’, ‘सोने की मूर्ति’, ‘विदा’, ‘वनपथ’, ‘तापसी’, ‘पंजवटी’ आदि एकांकी प्रमुख हैं। लगभग सभी एकांकियों में हिन्दू संस्कृति की महत्ता भारतीय आर्य सभ्यता के उच्चादर्शों, बौद्ध धर्म की भव्यता तथा भारतीय नैतिक दृष्टिकोण की श्रेष्ठता के स्वरूप का चित्रण किया गया है। डा. रामकुमार वर्माने ‘अन्धकार’ तथा ‘राजरानी सीता’, शीर्षक एकांकियों में पाप, पुण्य, प्रेम तथा वासना संबंधी प्रश्नों को उठाते हुए यह चित्रित किया है कि प्रेम के बिना वासना असम्भव है। लक्ष्मीनारायण मिश्ररचित ‘अशोक वन’, शीर्षक एकांकी में लेखक ने सीता के आदर्श चरित्र की विशेषताओं, पतिव्रत, चारित्रिक बल, तार्किक बुद्ध तथा सात्विक प्रवृत्ति की आकर्षक झांकी प्रस्तुत करके नीति एवं मर्यादा पर विशेष बल दिया है। +प्रो. सद्गुरुशरण अवस्थीरचित ‘कैकेयी’, ‘सुदामा’, ‘प्रींद’, ‘शम्बूक’, ‘त्रिशंकु’ आदि एकांकियों में प्राचीन पौराणिक एवं धार्मिक पात्रों को मौलिक ढंग से नवीन तर्क, विचार, आदर्श एवं नैतिक तत्वों सहित प्रस्तुत किया है। तथा इन पात्रों के माध्यम से प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का गौरव गुणगान किया है। अवस्थी जी ने अतीत की व्याख्या आधुनिक तथा नवीन दृष्टिकोण से की है। +आलोच्य युग में अनेक एकांकीकारों ने अनेक हास्य व्यंग्य प्रधान एकांकियों की रचना करके विभिन्न समसामयिक समस्याओं की अभिव्यक्ति एवं समाधान प्रस्तुत किया है। इन एकांकीकारों ने उन विभिन्न समस्याओं पर व्यंग्यात्मक प्रहार किया है। जो सामाजिक, साहित्यिक एवं राजनीतिक जीवन के लिए अभिशाप बनी हुई थीं। उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ने विशेष रूप से इस श्रेणी के एकांकियों की रचना की। इनकी ‘कइसा साब काइसी बीबी’, ‘जोंक’, ‘पक्का गाना’, ‘घपले’ आदि रचनाएँ हास्य व्यंग्य प्रधान हैं। भगवती चरण वर्मारचित ‘दो कलाकार’ तथा ‘सबसे बड़ा आदमी’, में हास्यमय वातावरण की सृष्टि करते हुए व्यंग्यात्मक प्रहार किये गये हैं। गिरिजाकुमार माथुर‘बरात चढ़े’, ‘मध्यस्थ’, ‘पिकनिक’, श्री पृथक््वीनाथ शर्मारचित ‘मुक्ति’ तथा डा.रामकुमार वर्मारचित ‘रूप की बीमारी’ आदि रचनाएं हास्य व्यंग्य प्रधान हैं। +मनोवैज्ञानिक एकांकी की प्रवृत्ति का जन्म भी प्रसादोत्तर युग में हुआ। पाश्चात्य एकांकीकारों के प्रभावस्वरूप हिन्दी एकांकीकारों ने भी पात्रों के मन की गहराइयों में पहुंचकर उनके मनोभावों के चित्रण को परमावश्यक समझा। जगदीशचन्द्र माथुररचित ‘मकड़ी का जाला’ शीर्षक एकांकी में अतीत की घटनाओं को स्वप्न के माध्यम से चित्रित करते हुए अवचेतन मन की ग्रंथियों का अत्यन्त कलात्मक ढंग से चित्रण किया है ‘भुवनेश्वर प्रसाद’रचित ‘ऊसर’, ‘प्रतिमा का विवाह’ तथा ‘लाटरी’ आदि मनोविश्लेषण प्रधान मनोवैज्ञानिक रचनाएं हैं। इन रचनाओं पर प्रफायड के मनोविज्ञान का स्पष्ट प्रभाव है। श्री शम्भुदयाल सक्सेनारचित ‘जीवन धारणी’, ‘नन्दरानी’, ‘पंचवटी’ आदि, गिरिजाकुमार माथुररचित ‘अपराधी’, श्री उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’रचित ‘छटा बेटा’, ‘भंवर’, ‘अंधी गली’, ‘मेमना’, ‘सूखी डाली’ आदि मनोवैज्ञानिक रचनाएं हैं। इन एकांकियों में मन की अतृप्त इच्छाओं, महत्वकांक्षाओं तथा मन की दलित अनुभूतियों का सजीव चित्रण किया गया है। +इस प्रकार, प्रसादोत्तर युग में पहुंचकर, हर दृष्टि से एकांकी साहित्य का एक स्वतंत्र अस्तित्व परिलक्षित होता है। अनेक पाश्चात्य नाटककारों जैसे इब्सन, शॉ, गाल्सवर्दी, चेखव आदि एकांकीकारों की रचनाओं का हिन्दी अनुवाद प्रारम्भ हो गया था। इन अंग्रेजी एकांकियों के हिन्दी अनुवादों की माँग रेडियो के क्षेत्र में अधिक थी। प्रो. अमरनाथ गुप्त ने ए. ए. मिलन के एकांकी का हिन्दी अनुवाद किया। कामेश्वर भार्गव द्वारा ‘पुजारी’ शीर्षक हिन्दी अनुवाद प्राप्त हुआ जो ‘विशप्स कैन्डिलस्टिक्स’ का हिन्दी अनुवाद है। इसके अतिरिक्त हैराल्ड व्रिगहाउस की रचनाओं के भी हिन्दी अनुवाद हुए। इस प्रकार आलोच्य युगीन एकांकीकारों ने विभिन्न नवीन प्रयोगों के द्वारा हिन्दी एकांकी साहित्य को समृिद्धशाली बनाया गया। +स्वातंत्रयोत्तर युग. +हिन्दी एकांकी के विकास की चौथी अवस्था स्वतंत्रता के पश्चात् प्रारम्भ होती है, जिसे स्वातंत्रयोत्तर युग के नाम से जाना जाता है। इस अवस्था में हिन्दी एकांकियों पर रेडियो का प्रभाव बड़ी गहराई से पड़ा है। रेडियो नाटकों के रूप में नाटकों का नवीन रूप हमारे समक्ष आया। रेडियो माध्यम होने के कारण श्रोतागण इसमें रुचि लेने लगे। इसलिए रेडियो एकांकियों की मांग इस युग में अधिक रही। डॉ. दशरथ ओझाने लिखा है कि ‘हिन्दी के जितने-नाटक आज रेडियो स्टेशनों पर अभिनीत होते हैं उतने सिनेमा की प्रयोगशालाओं में भी नहीं होते होंगे। अतः नाट्यकला का भविष्य रेडियो-रूपक के रचयिताओं के हाथ में है।’ +स्वातंत्रयोत्तर युगीन हिन्दी एकांकी का स्वरूप विविधता लिए हुए हैं। इनमें एक ओर परम्परागत शैली में राष्ट्रीय भावना प्रधान एकांकी लिखे गये तो दूसरी ओर ध्वनि नाट्य तथा गीति नाट्य का भी विकास हुआ। इस युग के एकांकीकारों ने सामाजिक, राजनीतिक, मानवतावादी तथा यथार्थवादी विचारधाराओं से प्रभावित होकर एकांकियों की रचना की। इन एकांकीकारों का दृष्टिकोण प्रगतिशील तत्त्वों से प्रभावित रहा। जिससे इनकी रचनाओं में पूँजीवाद विरोध , वर्ग संघर्ष, सड़ी-गली रूढ़ि़यों के प्रति अनास्था, मानव अन्तर्मन की सूक्ष्म भावनाओं का विश्लेषण, भ्रष्टाचार उन्मूलन, कृषक एवं मजदूर की दयनीय स्थिति तथा ब्रिटिश सरकार के प्रति असन्तोष आदि विचार व्यक्त हुए। +इस क्षेत्र में विनोद रस्तोगी रचित ‘बहू की विदा’, कणाद ऋषि भटनागर रचित ‘नया रास्ता’, तथा ‘अपना घर’ दहेज की कुप्रथा का पर्दाफाश करते हैं। विनोद रस्तोगी, जयनाथ नलिन, लक्ष्मीनारायण लाल, राजाराम शास्त्री, कैलाश देव, विष्णु प्रभाकर, प्रभाकर माचवे, रेवतीसरण शर्मा, श्री चिरंजीत, भारत भूषण अग्रवाल, कृष्ण किशोर, करतार सिंह दुग्गल, स्वरूप कुमार बख्षी, गोविंद लाल माथुर आदिने समाज में परिव्याप्त विभिन्न सामाजिक रूढ़ियों एवं विकृतियों के चित्र खींचे हैं। इस युग के एकांकीकारों का यथार्थपरक दृष्टिकोण एवं मानवीय मूल्यों के प्रति विशेष आग्रह रहा है। विष्णु प्रभाकर के ‘बन्धन मुक्त’ में अछूतोद्धार, ‘पाप’ में अविवाहित युवती का अनुचित पैगाम, ‘साहस’ में निर्धनता और वेश्यावृत्ति, ‘प्रतिशोध’ तथा ‘इंसान’ में हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों से उत्पन्न साम्प्रदायिकता की समस्या, ‘वीर पूजा’ में शरणार्थी समस्या, ‘किरण और कुहासा’ में अन्तर्जातीय-विवाह की सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया गया है। विष्णु प्रभाकर पर गाँधीवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इनके ‘स्वतंत्रता का अर्थ’, ‘काम’, सर्वोदय, ‘समाज सेवा’, ‘नया काश्मीर’ आदि एकांकियों में गांधीवादी सामाजिक एवं आर्थिक विचारधाराओं की अभिव्यक्ति हुई है। चिरंजीत के एकांकी यथार्थ एवं कल्पना का सम्मिलित रूप प्रकट करते हैं। सामाजिक एकांकियों में इनका यथार्थवादी आलोचनात्मक एवं व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण रहा है। कणाद ऋषि भटनागर कृत ‘नया रास्ता’ तथा ‘लांछन’ में नारी स्वातंत्रय एवं समानाधिकार का स्वर मुखरित हुआ है। देवीलाल सामर कृत ‘परित्यक्त’, देवराज दिनेश कृत ‘समस्या सुलझ गई’, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वातंत्रयोत्तर एकांकीकारों ने अपनी रचनाओं में उन विविध सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया है जो सहज ही मानव संवेदनाओं का संस्पर्श करती हैं। +आलोच्य युग में हिन्दी एकांकी में राजनीतिक जीवन, स्वाधीनता संघर्ष, बंगाल का अकाल, भुखमरी, फासीवाद का विरोध, जागीरदारी और देशी नरेशों का जीवन तथा अन्य अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय समस्याएं प्रकट हुई हैं। गाँधी जी द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु चलाये गये विभिन्न आन्दोलनों एवं क्रिया-कलापों का चित्रण भी इन एकांकियों में मिलता है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात् हिन्दी एकांकीकारों की लेखनी निर्बाध रूप से निर्भय होकर चल पड़ी। अतः उन्होंने अपनी लेखनी से ब्रिटिश प्रशासकों के काले कारनामों का भी भण्डाफोड़ उन्मुक्त रूप से किया तथा देशद्रोहियों की वैयक्तिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु ब्रिटिश सरकार के प्रति चाटुकारिता की प्रवृत्ति का चित्रण करते हुए उनकी कटु आलोचना भी की है। जयनाथ नलिनकी राष्ट्रीय रचनाओं में सृजनात्मक प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। देश की स्वतंत्रता, इसके लिए किया गया बलिदान, त्याग, सतत उद्योग एवं कर्म की आवश्यकता के महत्त्व का प्रतिपादन इनकी रचनाओं में हुआ है। इनके ‘विद्रोही की गिरफ्रतारी’, ‘देश की मिट्टी’, ‘युग के बाद’, ‘लाल दिन’ आदि राष्ट्रीय भावना से परिपूर्ण एकांकी हैं। विष्णु प्रभाकर ने जो राजनीतिक भावना से परिपूर्ण एकांकी लिखे उनमें राजनीतिक उथल-पुथल, समाज पर राजनीतिक प्रभाव, स्वतंत्रता आन्दोलन तथा राजनीतिक गौरव का चित्रांकन किया है। इस श्रेणी के प्रमुख एकांकी : ‘क्रांति’, ‘कांग्रेस मैन बनो’, ‘हमारा स्वाधीनता संग्राम’ आदि हैं। ‘हमारा स्वाधीनता संग्राम’, संयम, स्वतंत्रता का अर्थ, काम, सर्वोदय आदि गांधीवादी भावना से प्रभावित रचनाएं हैं। राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य एवं जागरूकता का चित्रण प्रेमराज शर्मा कृत ‘गाँधी की आंधी’। देवीलाल सागर ने ‘बहादुर शाह’, ‘वाजिद अली शाह’, तथा ‘शेरशाह सूरी’ में परिपूर्णानन्द वर्माने राष्ट्रीय एकता एवं संगठन का संकेत किया है। भारतीय नारी द्वारा राजनीतिक क्षेत्र में दिये गये सक्रिय सहयोग का चित्रण भी इन एकांकीकारों ने किया है। +प्रसादोत्तर युग में ऐतिहासिक राजनीतिक एकांकी की धारा तीव्रवेग से प्रवाहित हो रही थी। इस युग के एकांकीकारों ने प्राचीन ऐतिहासिक पात्रों के महान चरित्रों को समक्ष रख भारतीय इतिहास का गौरवमय चित्र सामने रखा तथा देशद्रोहियों को उनके दुष्कृत्यी पर धिक्कारा। इसी धारा का पोषण स्वातंत्रयोत्तर युगीन एकांकीकारों ने उन्मुक्त हृदय से किया है। इन एकांकीकारों ने मुगलकाल से लेकर ब्रिटिश काल तक के इतिहास को अपनी एकांकी रचनाओं में प्रस्तुत किया है। भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई का इतिहास प्रस्तुत कर आगामी पीढ़ी के लिए एक अमूल्य धरोहर प्रदान की है। साथ ही गाँधीवाद से प्रभावित एकांकीकारों ने गांधी के सत्य, अहिंसा एवं मानवतावादी एवं शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक आन्दोलन की स्वतंत्रता के युद्ध की पृष्ठभूमि में अभिव्यक्ति की है। श्री विनोद रस्तोगीने ‘पुरुष का पाप’, ‘पत्नी परित्याग’, ‘साम्राज्य और सोहाग’, ‘प्यार और प्यास’ आदि एकांकियों में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार बना आधुनिक समस्याओं पर प्रकाश डाला है। देवीलाल सागर ने ‘वीर बल्लू’, ‘ओ नीला घोड़ा वा असवार’, तथा ‘जीवन दान’, शीर्षक ऐतिहासिक एकांकियों में प्राचीन राजपूती शौर्य, मातृभूमि प्रेम, स्वातंत्रय प्रेम तथा त्याग का सुन्दर चित्रण किया है। प्रो. जयनाथ नलिनने ‘देश की मिट्टी’, ‘विद्रोही की गिरफ्रतारी’ आदि एकांकियों में देश की स्वतंत्रता, देशहेतु किए गए शौर्यपूर्ण बलिदान, देश सेवा तथा देश के प्रति कर्त्तव्य का सन्देश दिया है। श्री परिपूर्णानन्द वर्माने ‘वाजिद अली शाह’, ‘शेरशाह सूरी’ तथा ‘बहादुरशाह’ आदि में तीनों मुगल बादशाहों के शासन-काल की सुन्दर झांकी प्रस्तुत की है। प्रेमनारायण टंडनने ‘अजात शत्रु’, ‘गान्धार पतन’, ‘संकल्प’, ‘माता’ की रचना ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर की है। विष्णु प्रभाकररचित ‘अशोक’ शीर्षक एकांकी जहाँ हिंसा पर अहिंसा, असत्य पर सत्य तथा दानवता पर मानवता की विजय को चित्रित करता है वहीं ऐतिहासिक पात्र कलिंग कुमार के देशभक्तिपूर्ण बलिदान, शौर्य, वीरता एवं दृढ़ता का भी सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस प्रकार ये एकांकीकार ऐतिहासिक एकांकी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। +स्वातन्त्रयोत्तर युगीन एकांकीकारों ने अपनी रचनाओं में प्राचीन सांस्कृतिक, पौराणिक, धार्मिक तथा नैतिक प्रसंगों की अभिव्यक्ति अपनी एकांकी रचनाओं में नवीन विचारों तथा तर्क की कसौटी पर नवीन ढंग से की है। प्रो. कैलासदेव बृहस्पति ने अतीत भारत की सांस्कृतिक परम्परा का पुनरुत्थान तथा उसके आदर्शमय अतीत गौरव का चित्रांकन अपने पौराणिक तथा ऐतिहासिक रूपकों में किया है। इसके ‘सागर मंथन’, ‘विश्वामित्र’, ‘स्वर्ग में क्रान्ति’, आदि महत्वपूर्ण रेडियो रूपक हैं जिनमें भारतीय सांस्कृतिक गौरव का कलात्मक चित्रण किया गया है। कणाद ऋषि भटनागरने ‘आज का ताजा अखबार’, में भारतीय संस्कृति की महत्ता चित्रित की है। ओंकारनाथ दिनकररचित गणतंत्र की गंगा, अभिसारिका, सीताराम दीक्षित रचित‘रक्षाबन्धन’, देवीलाल सामर रचित ‘आत्मा की खोज’, ‘ईश्वर की खोज’ आदि में पौराणिक एवं धार्मिक कथानकों के आधार पर प्राचीन भारतीय राजनैतिक, सांस्कृतिक मानवतावादी एवं दार्शनिक आदर्शों की प्रतिष्ठा की है। इनमें से कतिपय एकांकियों में गांधीवादी विचारधारा की अभिव्यक्ति हुई है। +आलोच्य युगीन एकांकीकारों ने विभिन्न वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक समस्याओं का चित्रण हास्य व्यंग्य प्रधान शैली में किया है। जैसे देवीलाल सामरने ‘वल्लभ’, ‘तवायफ के घर बगावत’, ‘उपन्यास का परिच्छेद’, ‘अमीर की बस्ती अछूत’ आदि में आश्रयहीन तिरस्कृत विधवाओं, समाज के उनके प्रति दुर्व्यवहार, छुआछूत, रूढ़ियों तथा परिवारों में होने वाले छोटे-छोटे अत्याचारों पर व्यंग्य किया है। प्रो. जयनाथ नलिन ने‘संवेदना सदन’, ‘शान्ति सम्मेलन’, ‘वर निर्वाचन’, ‘नेता’, ‘मेल मिलाप’ आदि व्यंग्य प्रधान एकांकी लिखे हैं। लक्ष्मीनारायण लाल ने ‘गीत के बोल’, ‘मुर्ख’, ‘सरकारी नौकरी’, ‘कला का मूल्य’, ‘रिश्तेदार’ आदि भावना प्रधान कटु व्यंग्य मिश्रित एकांकियों का सृजन किया है। कृष्ण किशोर श्रीवास्तव रचित ‘मछली के आंसू’, जीवन का अनुवाद’, ‘आँख’, ‘बेवकूफ की रानी’ आदि में सामाजिक यथार्थ चित्रण कर कटु व्यंग्यात्मक प्रहार किया गया है। इसके अतिरिक्त राजाराम शास्त्री, श्री चिरंजीत आदि को हास्य रस के छोटे-छोटे व्यंग्यात्मक एकांकी लिखने में अच्छी सफलता मिली है। +उपर्युक्त एकांकीकारों के अतिरिक्त स्वातंत्रयोत्तर युग में अन्य अनेक प्रतिभा सम्पन्न एकांकीकार भी उल्लेखनीय हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय देते हुए हिन्दी एकांकी को सम्पन्न एवं समृद्ध बनाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया है। कुछ एकांकीकारों ने मनोविश्लेषण प्रधान एकांकियों की रचना की जिनमें मानसिक कुण्ठाओं एवं जटिल भावना-ग्रन्थियों का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत किया। इस युग में विविध विषयों एवं समस्याओं को लेकर बहुत बड़ी संख्या में एकांकियों की रचना हुई। +संक्षिप्ततः, हिन्दी एकांकी का विकास क्रमशः भारतेन्दु-युग, प्रसाद-युग, प्रसादोत्तर-युग तथा स्वतंत्रयोत्तर-युग में सम्पन्न हुआ। भारतेन्दु युग में जो एकांकी लिखे गये वे प्रायः नाटक का ही लघु रूप थे। इस युग में एकांकी का स्वतंत्र रूप नहीं मिलता। किन्तु प्रसाद-युग से प्रारम्भ होकर स्वातंत्रयोत्तर काल तक इसका स्वतंत्र स्वरूप निश्चित हुआ जो निश्चित रूप से प्रगति युग कहा जा सकता है। ऐसे विकास-क्रम को देखते हुए कहा जा सकता है कि निश्चय ही हिन्दी एकांकी का भविष्य उज्जवल होगा। + +हिन्दी गद्य साहित्य का इतिहास: +लेखिकाद्वय : डॉ. विजयबाला तिवारी एवं डॉ. मंजुला मोहन + +हिन्दी आत्मकथा का इतिहास: +आत्मकथा स्वानुभूति का सबसे सरल माध्यम है। आत्मकथा के द्वारा लेखक अपने जीवन, परिवेश, महत्त्वपूर्ण घटनाओं, विचारधारा, निजी अनुभव, अपनी क्षमताओं और दुर्बलताओं तथा अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। +आरंभिक-युग. +हिन्दी में आत्मकथाओं की एक लंबी परंपरा रही है। हिंदी की प्रथम आत्मकथा बनारसीदास जैन कृत ‘अद्धर्कथा’ (1641 ई.) है। आत्मकथा की मूलभूत विशेषताओं : निरपेक्षता ओैर तटस्थता को इसमें सहज ही देखा जा सकता है। इसमें लेखक ने अपने गुणों और अवगुणों का यथार्थ चित्रण किया है। पद्य में लिखी इस आत्मकथा के अतिरिक्त पूरे मध्यकाल में हिंदी में कोई दूसरी आत्मकथा नहीं मिलती। +अन्य कई गद्य विधाओं के साथ आत्मकथा भी भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय में विकसित हुई। भारतेंदु ने अपनी पत्रिकाओं के माध्यम से इस विधा का पल्लवन किया। उनकी स्वयं की आत्मकथा ‘एक कहानी कुछ आपबीती कुछ जगबीती’ का आरंभिक अंश ‘प्रथम खेल’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। उनकी संक्षिप्त-सी आत्मकथा की भाषा आम-बोलचाल के शब्दों से निर्मित हुई है, जो एक तरह से बाद की आत्मकथाओं के लिए आधार दृष्टि का काम करती है। भारतेंदु के अतिरिक्त इस काल के आत्मकथाकारों में सुधाकर द्विवेदीकृत ‘रामकहानी’ और अंबिकादत्त व्यासकृत ‘निजवृतांत’ को महत्वपूर्ण माना जा सकता है। कलेवर की दृष्टि से इन आत्मकथाओं को भी संक्षिप्त कहा जा सकता है। व्यास जी की आत्मकथा मात्र 56 पृष्ठों की है। इसमें उन्होंने सरल भाषा का प्रयोग करते हुए अपने जीवन संघर्षों को स्वर दिया है। +स्वामी दयानंद सरस्वती की आत्मकथा सन् 1875 में प्रकाश में आई। इस आत्मकथा में दयानंद सरस्वती के जीवन के विविध पक्षों यथा-ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, विद्वत्ता, सत्यनिष्ठा और निर्भीकता आदि का सजीव चित्रण हुआ है। सत्यानंद अग्निहोत्रीकृत ‘मुझ में देव जीवन का विकास’ का पहला खण्ड सन् 1909 में और दूसरा खण्ड सन् 1918 में प्रकाशित हुआ। इस आत्मकथा में आत्मश्लाघा की प्रधानता है। सन् 1921 में भाई परमानंदकी आत्मकथा ‘आपबीती’ प्रकाशित हुई। इसे किसी क्रांतिकारी की प्रथम आत्मकथा माना जा सकता है। इसमें लेखक ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदान, अपनी जेल यात्रा और अपने ऊपर पड़े आर्य समाज के प्रभाव को रेखांकित किया है। सन् 1924 में स्वामी श्रद्धानंद की आत्मकथा ‘कल्याणमार्ग का पथिक’ प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने अपने जीवन संघर्षों और आत्मोत्थान का वर्णन किया है। +स्वतंत्रता-पूर्व युग. +हिंदी के आत्मकथात्मक साहित्य के विकास में ‘हंस’ के आत्मकथांक का विशिष्ट योगदान है। सन् 1932 में प्रकाशित इस अंक में जयशंकर प्रसाद, वैद्य हरिदास, विनोदशंकर व्यास, विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, दयाराम निगम, मौलवी महेशप्रसाद, गोपालराम गहमरी, सुदर्शन, शिवपूजन सहाय, रायकृष्णदास, श्रीराम शर्मा आदि साहित्यकारों और गैर-साहित्यकारों के जीवन के कुछ अंशों को प्रेमचंद ने स्थान दिया है। +इस काल की सबसे महत्वपूर्ण आत्मकथा श्यामसुंदर दास कृत ‘मेरी आत्मकहानी’ (सन् 1941) है। इसमें लेखक ने अपने जीवन की निजी घटनाओं को कम स्थान दिया है। इसकी बजाय काशी के इतिहास और समकालीन साहित्यिक गतिविधियों को भरपूर स्थान मिला है। लगभग इसी समय बाबू गुलाबराय की आत्मकथा ‘मेरी असफलताएँ’ प्रकाशित हुई। इस आत्मकथा में लेखक ने व्यंग्यपूर्ण रोचक शैली में अपने जीवन की असफलताओं का सजीव चित्रण किया है। +सन् 1946 में राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा ‘मेरी जीवन यात्रा’ का प्रथम भाग प्रकाशित हुआ। सन् 1949 में दूसरा तथा सन् 1967 में उनकी मृत्यु के उपरांत इसके तीन भाग और प्रकाशित हुए। इस बृहत् आकार की आत्मकथा की विशेषता इसकी वर्णनात्मक शैली है। +सन् 1947 के आरंभ में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा इसी शीर्षक से प्रकाशित हुई। इस बृह्दकाय आत्मकथा में राजेंद्र बाबू ने बड़ी सादगी और निश्छलता से स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान देश की दशा का वर्णन किया है। +स्वातंत्रयोत्तर युग. +सन् 1948 में वियोगी हरि की आत्मकथा ‘मेरा जीवन प्रवाह’ प्रकाशित हुई। इस आत्मकथा के समाज सेवा से संबंधित अंश में समाज के निम्न वर्ग का लेखक ने बहुत मार्मिक वर्णन किया है। यशपाल कृत ‘सिंहावलोकन’ का प्रथम भाग सन् 1951 में प्रकाशित हुआ। इसका दूसरा भाग सन् 1952 और तीसरा सन् 1955 में आया। यशपाल की आत्मकथा की विशेषता उसकी रोचक और मर्मस्पर्शी शैली है। सन् 1952 में शांतिप्रिय द्विवेदी की आत्मकथा ‘परिव्राजक की प्रजा’ प्रकाशित हुई। इसमें लेखक ने अपने जीवन के प्रारंभिक इकतालीस वर्षों की करुण कथा का वर्णन किया है। सन् 1953 में यायावर प्रवृत्ति के लेखक देवेंद्र सत्यार्थी की आत्मकथा ’चाँद-सूरज के बीरन’ प्रकाशित हुई। इसमें लेखक ने अपने जीवन की आरंभिक घटनाओं का चित्रण किया है। +सन् 1960 में प्रकाशित पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ बहुत चर्चित हुई। इसमें उनके जीवन की विद्रूपताओं के बीच युगीन परिवेश की यथार्थ अभिव्यक्ति हुई है। +हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा हिंदी की सर्वाधिक सफल और महत्वपूर्ण आत्मकथा मानी जाती है। ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ (सन् 1969), ‘नीड़ का निर्माण फिर’ (सन् 1970), ‘बसेरे से दूर’ (सन् 1977) और ‘दशद्वार से सोपान तक’ (सन् 1985) चार भागों में विभाजित उनकी आत्मकथा इस विधा को नए शिखर पर ले गई। प्रथम खंड में बच्चन जी ने अपने बचपन से यौवन तक के चित्र खींचे हैं। द्वितीय भाग में आत्मविश्लेषणात्मक पद्धति को अधिक स्थान मिला है। तीसरे भाग में लेखक ने अपने विदेश प्रवास का वर्णन किया है तथा चौथे और अंतिम भाग में बच्चन ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों के अनुभवों को संचित किया है। अत्यंत विस्तृत होने के बावजूद बच्चन जी की आत्मकथा की विशेषता उसका सुव्यवस्थित होना है। उनके गद्य की भाषा सहज-सरल है। बच्चन की आत्मकथा ने अनेक साहित्यकारों को अपने जीवन को लिपिबद्ध करने के लिए प्रेरित किया। उनके बाद प्रकाशित आत्मकथाओं में वृन्दावनलाल वर्मा की ‘अपनी कहानी’ ( (सन् 1970), देवराज उपाध्याय की ‘यौवन के द्वार पर’ (सन् 1970), शिवपूजन सहाय की ‘मेरा जीवन’ (सन् 1985), प्रतिभा अग्रवाल की ‘दस्तक ज़िंदगी की’ (सन् 1990) और भीष्म साहनी की ‘आज के अतीत’ (सन् 2003) प्रकाशित हुई। देश विभाजन की त्रासदी को भीष्म साहनी ने जीवंत भाषा में चित्रित किया है। उनकी शैली मर्मस्पर्शी है। +समकालीन आत्मकथा साहित्य में दलित आत्मकथाओं का उल्लेखनीय योगदान है। ओमप्रकाश बाल्मीकि कृत ‘जूठन’, मोहनदास नैमिशराय कृत ‘अपने-अपने पिंजरे’ और कौशल्या बैसंत्री कृत ‘दोहरा अभिशाप’ आदि आत्मकथाओं ने इस विधा को यथार्थ अभिव्यक्ति की नई ऊँचाई पर पहुँचाया है। वर्तमान समय में महिला और दलित रचनाकारों ने इस विधा को गहरे सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है। इस संदर्भ में मैत्रेयी पुष्पा, प्रभा खेतान आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। +संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हिंदी आत्मकथा साहित्य एक लंबी यात्रा के बाद आज उस मुकाम पर पहुँचा है जहाँ वह आत्मश्लाघा के दुर्गुण से मुक्त होकर व्यक्तिगत गुण-दोषों की सच्चाई को बयान करने में सक्षम है। + +हिन्दी यात्रा-साहित्य का इतिहास: +यात्रा-साहित्य का उद्देश्य : यात्रा करना मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति है। हम अगर मानव इतिहास पर नज़र डालें तो पाएँगे कि मनुष्य के विकास की गाथा में यायावरी का महत्वपूर्ण योगदान है। अपने जीवन काल में हर आदमी कभी-न-कभी कोई-न-कोई यात्रा अवश्य करता है लेकिन सृजनात्मक प्रतिभा के धनी अपने यात्रा अनुभवों को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर यात्रा-साहित्य की रचना करने में सक्षम हो पाते हैं। यात्रा-साहित्य का उद्देश्य लेखक के यात्रा अनुभवों को पाठकों के साथ बाँटना और पाठकों को भी उन स्थानों की यात्रा के लिए प्रेरित करना है। इन स्थानों की प्राकृतिक विशिष्टता, सामाजिक संरचना, सामाज के विविध वर्गों के सह-संबंध, वहाँ की भाषा, संस्कृति और सोच की जानकारी भी इस साहित्य से प्राप्त होती है। +आरंभिक युग. +हिंदी साहित्य में अन्य गद्य विधाओं की भाँति ही भारतेंदु-युग से यात्रा-साहित्य का आरंभ माना जा सकता है। उनके संपादन में निकलने वाली पत्रिकाओं में ‘हरिद्वार’, ‘लखनऊ’, ‘जबलपुर’, ‘सरयूपार की यात्रा’, ‘वैद्यनाथ की यात्रा’ और ‘जनकपुर की यात्रा’ आदि यात्रा-साहित्य प्रकाशित हुआ। इन यात्रा-वृतांतों की भाषा व्यंग्यपूर्ण है और शैली बड़ी रोचक और सजीव है। इस समय के यात्रा-वृतांतों में हम दामोदर शास्त्री कृत ‘मेरी पूर्व दिग्यात्रा’ (सन् 1885), देवी प्रसाद खत्री कृत ‘रामेश्वर यात्रा’ (सन् 1893) को महत्वपूर्ण मान सकते हैं किंतु यह यात्रा-साहित्य परिचयात्मक और किंचित स्थूल वर्णनों से युक्त है। +बाबू शिवप्रसाद गुप्त द्वारा लिखे गए यात्रा-वृतांत ‘पृथ्वी प्रदक्षिणा’ (सन् 1924) को हम आरंभिक यात्रा-साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान दे सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता चित्रात्मकता है। इसमें संसार भर के अनेक स्थानों का रोचक वर्णन है। लगभग इसी समय स्वामी सत्यदेव परिव्राजक कृत ‘मेरी कैलाश यात्रा’ (सन् 1915) तथा ‘मेरी जर्मन यात्रा’ (सन् 1926) महत्वपूर्ण हैं। इन्होंने सन् 1936 में ‘यात्रा मित्र’ नामक पुस्तक लिखी, जो यात्रा-साहित्य के महत्व को स्थापित करने का काम करती है। विदेशी यात्रा-विवरणों में कन्हैयालाल मिश्र कृत ‘हमारी जापान यात्रा’ (सन् 1931), रामनारायण मिश्र कृत ‘यूरोप यात्रा के छः मास’ और मौलवी महेशप्रसाद कृत ‘मेरी ईरान यात्रा’ (सन् 1930) यात्रा-साहित्य के अच्छे उदाहरण हैं। +स्वतंत्रता-पूर्व युग. +यात्रा-साहित्य के विकास में राहुल सांकृत्यायान का योगदान अप्रतिम है। इतिवृत्त-प्रधान शैली होने के बावजूद गुणवत्ता और परिमाण की दृष्टि से इनके यात्रा-वृतांतों की तुलना में कोई दूसरा लेखक कहीं नहीं ठहरता है। ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘किन्नर देश में’, ‘रूस में 25 मास’, ‘तिब्बत में सवा वर्ष’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘यात्रा के पन्ने’, ‘जापान, ईरान, एशिया के दुर्गम खंडों में’ आदि इनके कुछ प्रमुख यात्रा-वृतांत हैं। राहुल सांकृत्यायन के यात्रा-साहित्य में दो प्रकार की दृष्टि को साफ देखा जा सकता है। उनके एक प्रकार के लेखन में यात्राओं का केवल सामान्य वर्णन है और दूसरे प्रकार के यात्रा-साहित्य को शुद्ध साहित्यिक कहा जा सकता है। इस दूसरे प्रकार के यात्रा-साहित्य में राहुल सांकृत्यायन ने स्थान के साथ-साथ अपने समय को भी लिपिबद्ध किया है। सन् 1948 में इन्होंने ‘घुम्मकड़ शास्त्र’ नामक ग्रन्थ की रचना की जिससे यात्रा करने की कला को सीखा जा सकता है। इनका अधिकांश यात्रा-साहित्य सन् 1926 से 1956 के बीच लिखा गया। +स्वातंत्रयोत्तर युग. +राहुल सांकृत्यायन के बाद यात्रा-साहित्य में बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि-कथाकार अज्ञेय का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। अज्ञेय अपने यात्रा-साहित्य को यात्रा-संस्मरण कहना पसंद करते थे। इससे उनका आशय यात्रा-वृतांतों में संस्मरण का समावेश कर देना था। उनका मानना था कि यात्राएँ न केवल बाहर की जाती हैं बल्कि वे हमारे अंदर की ओर भी की जाती हैं। ‘अरे यायावर रहेगा याद’ (सन् 1953) और ‘एक बूँद सहसा उछली’ (सन् 1960) उनके द्वारा लिखित यात्रा-साहित्य की प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। ‘अरे यायावर रहेगा याद’ में उनके भारत भ्रमण का वर्णन है और दूसरी पुस्तक ‘एक बूँद सहसा उछली में’ उनकी विदेशी यात्राओं को शब्दबद्ध किया गया है। अज्ञेय के यात्रा-साहित्य की भाषा गद्य भाषा के नए मुकाम तक ले जाती है। +आज़ादी के बाद हिंदी साहित्य में बहुतायत से यात्रा-साहित्य का सृजन हुआ। अनेक प्रगतिशील लेखकों ने इस विधा को समृिद्ध प्रदान की। रामवृक्ष बेनीपुरी कृत ‘पैरों में पंख बाँधकर’ (सन् 1952) तथा ‘उड़ते चलो उड़ते चलो’, यश्पाल कृत ‘लोहे की दीवार के दोनों ओर’ (सन् 1953), भगवतशरण उपाध्याय कृत ‘कलकत्ता से पेकिंग तक’ (सन् 1953) तथा ‘सागर की लहरों पर’ (सन् 1959), प्रभाकर माचवे कृत ‘गोरी नज़रों में हम’ (सन् 1964) उल्लेखनीय हैं। +हिंदी यात्रा-साहित्य के संदर्भ में मोहन राकेश तथा निर्मल वर्मा को भी बड़े हस्ताक्षर माना जाता है। इन्होंने यात्रा-साहित्य को नए अर्थों से समन्वित किया। मोहन राकेश द्वारा लिखित ‘आखिरी चट्टान तक’ (सन् 1953) में दक्षिण भारत का विस्तार से वर्णन किया गया है। दक्षिण भारतीय जीवन पद्धति के विविध बिम्बों को इसमें लेखक ने यथावत प्रस्तुत कर दिया है। इनके यात्रा-साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कहानी की-सी रोचकता और नाटक का-सा आकर्षण देखा जा सकता है। निर्मल वर्मा ने ‘चीड़ों पर चाँदनी’ (सन् 1964) में यूरोपीय जीवन के चित्रों को उकेरा है। निर्मल वर्मा के यात्रा-साहित्य में न केवल अपने समय का वर्णन रहता है बल्कि इतिहास और संस्कृति के अनेक बिंदुओं को भी इसमें अभिव्यक्ति मिलती है। विदेशी संदर्भों को भी उनके गद्य की सहजता बोझिल नहीं होने देती। +कोई भी लेखक अच्छा लेखक तभी बनता है जब वह जीवन को समीप से देखता है और जीवन को समीप से देखने का सबसे सरल माध्यम यात्रा करना हैै। रचनात्मक लेखन करने वाला हर लेखक अपने साहित्य में किसी न किसी रूप में यात्रा-साहित्य का सृजन अवश्य करता है। हमने उपर्युक्त संक्षिप्त विवरण में देखा कि हिंदी में यात्रा विषयक प्रचुर साहित्य उपलब्ध है। हिंदी गद्य के साथ-साथ इसने भी पर्याप्त विकास किया है। अधिकांश लेखकों ने इस विधा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। + +हिन्दी रिपोर्ताज़ का इतिहास: +‘रिपोर्ताज’ का अर्थ एवं उद्देश्य : जीवन की सूचनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए रिपोर्ताज का जन्म हुआ। रिपोर्ताज पत्रकारिता के क्षेत्र की विधा है। इस शब्द का उद्भव प्रफांसीसी भाषा से माना जाता है। इस विधा को हम गद्य विधाओं में सबसे नया कह सकते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यूरोप के रचनाकारों ने युद्ध के मोर्चे से साहित्यिक रिपोर्ट तैयार की। इन रिपोर्टों को ही बाद में रिपोर्ताज कहा गया। वस्तुतः यथार्थ घटनाओं को संवेदनशील साहित्यिक शैली में प्रस्तुत कर देने को ही रिपोर्ताज कहा जाता है। +आरंभिक युग. +हिंदी खड़ी बोली गद्य के आरंभ के साथ ही अनेक नई विधाओं का चलन हुआ। इन विधाओं में कुछ तो सायास थीं और कुछ के गुण अनायास ही कुछ गद्यकारों के लेखन में आ गए थे। वास्तविक रूप में तो रिपोर्ताज का जन्म हिंदी में बहुत बाद में हुआ लेकिन भारतेंदुयुगीन साहित्य में इसकी कुछ विशेषताओं को देखा जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, भारतेंदु ने स्वयं जनवरी, 1877 की ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ में दिल्ली दरबार का वर्णन किया है, जिसमें रिपोर्ताज की झलक देखी जा सकती है। रिपोर्ताज लेखन का प्रथम सायास प्रयास शिवदान सिंह चौहान द्वारा लिखित ‘लक्ष्मीपुरा’ को मान जा सकता है। यह सन् 1938 में ‘रूपाभ’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ। इसके कुछ समय बाद ही ‘हंस’ पत्रिका में उनका दूसरा रिपोर्ताज ‘मौत के खिलाफ ज़िन्दगी की लड़ाई’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। हिंदी साहित्य में यह प्रगतिशील साहित्य के आरंभ का काल भी था। कई प्रगतिशील लेखकों ने इस विधा को समृद्ध किया। शिवदान सिंह चौहान के अतिरिक्त अमृतराय और प्रकाशचंद गुप्त ने बड़े जीवंत रिपोर्ताजों की रचना की। +रांगेय राघव रिपोर्ताज की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ लेखक कहे जा सकते हैं। सन् 1946 में प्रकाशित ‘तूफानों के बीच में’ नामक रिपोर्ताज में इन्होंने बंगाल के अकाल का बड़ा मार्मिक चित्रण किया है। रांगेय राघव अपने रिपोर्ताजों में वास्तविक घटनाओं के बीच में से सजीव पात्रों की सृष्टि करते हैं। वे गरीबों और शोषितों के लिए प्रतिबद्ध लेखक हैं। इस पुस्तक के निर्धन और अकाल पीड़ित निरीह पात्रों में उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता को देखा जा सकता है। लेखक विपदाग्रस्त मानवीयता के बीच संबल की तरह खड़ा दिखाई देता है। +स्वातंत्रयोत्तर युग. +स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के रिपोर्ताज लेखन का हिंदी में चलन बढ़ा। इस समय के लेखकों ने अभिव्यक्ति की विविध शैलियों को आधार बनाकर नए प्रयोग करने आरंभ कर दिए थे। रामनारायण उपाध्याय कृत ‘अमीर और गरीब’ रिपोर्ताज संग्रह में व्यंग्यात्मक शैली को आधार बनाकर समाज के शाश्वत विभाजन को चित्रित किया गया है। फणीश्वरनाथ रेणु के रिपोर्ताजों ने इस विधा को नई ताजगी दी। ‘)ण जल धन जल’ रिपोर्ताज संग्रह में बिहार के अकाल को अभिव्यक्ति मिली है और ‘नेपाली क्रांतिकथा’ में नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन को कथ्य बनाया गया है। +अन्य महत्वपूर्ण रिपोर्ताजों में भंदत आनंद कौसल्यायन कृत ‘देश की मिट्टी बुलाती है’, धर्मवीर भारती कृत ‘युद्धयात्रा’ और शमशेर बहादुर सिंह कृत ‘प्लाट का मोर्चा’ का नाम लिया जा सकता है। +संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अपने समय की समस्याओं से जूझती जनता को हमारे लेखकों ने अपने रिपोर्ताजों में हमारे सामने प्रस्तुत किया है। लेकिन हिंदी रिपोर्ताज के बारे में यह भी सच है कि इस विधा को वह ऊँचाई नहीं मिल सकी जो कि इसे मिलनी चाहिए थी। + +हिंदी साहित्य का विधागत इतिहास/हिन्दी रेखाचित्र का इतिहास: +रेखाचित्र का अर्थ : ‘रेखाचित्र’ शब्द अंग्रेजी के 'स्कैच' शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। जैसे ‘स्कैच’ में रेखाओं के माध्यम से किसी व्यक्ति या वस्तु का चित्र प्रस्तुत किया जाता है, ठीक वैसे ही शब्द रेखाओं के माध्यम से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को उसके समग्र रूप में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। ये व्यक्तित्व प्रायः वे होते हैं जिनसे लेखक किसी न किसी रूप में प्रभावित रहा हो या जिनसे लेखक की घनिष्ठता अथवा समीपता हो। +आरंभिक युग. +रेखाचित्र को स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने का श्रेय पद्म सिंह शर्मा कृत ‘पद्म पराग’ को दिया जा सकता है। ‘पद्म पराग’ में संस्मरणात्मक निबंधों और रेखाचित्रों का संकलन है। इन रेखाचित्रों में समकालीन महत्वपूर्ण लोगों को विषय बनाया गया है। पद्म सिंह शर्मा से प्रभावित होकर श्रीराम शर्मा, हरिशंकर शर्मा और बनारसीदास चतुर्वेदी आदि ने रेखाचित्र लिखने आरंभ किए। श्रीराम शर्मा के रेखाचित्रों का प्रथम संग्रह ‘बोलती प्रतिमा’ शीर्षक से सन् 1937 में प्रकाशित हुआ। इसकी विशेषता यह है कि इसमें समाज के निम्नवर्ग के पात्रों का सजीव चित्रण हुआ है। +बनारसीदास चतुर्वेदी के रेखाचित्रों की शैली सरस और व्यंग्यपूर्ण है। रेखाचित्र के स्वरूप के बारे में इन्होंने सैद्धांतिक विवेचन भी किया है। इनका कथन है कि, ‘‘जिस प्रकार एक अच्छा चित्र खींचने के लिए कैमरे का लैंस बढ़िया होना चाहिए और फिल्म भी काफी कोमल या सैंसिटिव, उसी प्रकार साफ चित्रण के लिए रेखाचित्रकार में विश्लेषणात्मक बुद्ध तथा भावुकतापूर्ण हृदय दोनों का सामंजस्य होना चाहिएऋ पर-दुःखकातरता, संवेदनशीलता, विवेक और संतुलन इन सब गुणों की आवश्यकता है।’’ निस्संदेह बनारसीदास चतुर्वेदी के लेखन में उपर्युक्त सभी विशेषताएँ हम देख सकते हैं। राष्ट्रीयता की भावना के साथ-साथ वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को इनके रेखाचित्रों में देखा जा सकता है। इनके रेखाचित्र ‘हमारे साथी’ और ‘प्रकृति के प्रागंण’ नामक ग्रंथों में संकलित हैं। +उत्कर्ष युग. +रामवृक्ष बेनीपुरी निर्विवाद रूप से हिंदी के सर्वश्रेष्ठ रेखाचित्रकार माने जाते हैं। इनके रेखाचित्रों में हम सरल भाषा शैली में सिद्धहस्त कलाकारी को देख सकते हैं। परिमाण की दृष्टि से इन्होंने अनेक रेखाचित्रों की रचना की है। ‘माटी की मूरतें’ (सन् 1946) संग्रह से इन्हें विशेष ख्याति मिली। इस संग्रह में इन्होंने समाज के उपेक्षित पात्रों को गढ़कर नायक का दर्जा दे दिया। उदाहरणस्वरूप ‘रजिया’ नामक रेखाचित्र के माध्यम से निम्नवर्ग की एक बालिका को जीवंत कर दिया गया है। इस संग्रह के अन्य रेखाचित्रों में बलदेव सिंह, मंगर, बालगोबिन भगत, बुधिया, सरजू भैया प्रमुख हैं। इन रेखाचित्रों की श्रेष्ठता का अनुमान मैथिलीशरण गुप्त के इस कथन से लगाया जा सकता है, ‘‘लोग माटी की मूरतें बनाकर सोने के भाव बेचते हैं पर बेनीपुरी सोने की मूरतें बनाकर माटी के मोल बेच रहे हैं।’’ सन् 1950 में रामवृक्ष बेनीपुरी का दूसरा रेखाचित्रसंग्र्रह ‘गेहूँ और गुलाब’ प्रकाशित हुआ। इसमें इनके 25 रेखाचित्र संकलित हैं। कलेवर की दृष्टि से लेखक ने इन्हें अपने पुराने रेखाचित्रों की अपेक्षा छोटा रखा है। रामवृक्ष बेनीपुरी के रेखाचित्रों की भाषा भावना प्रधान है। कुछ आलोचक तो उनकी भाषा को गद्य काव्य की संज्ञा भी दे चुके हैं। बेनीपुरी के रेखाचित्रों के बारे में संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इन्हें जीवन में जो भी पात्र मिले इन्होंने अपनी कुशल लेखनी से उन्हें जीवंत कर दिया। विषय की विविधता और शैली की सरसता का इनके यहाँ अपूर्व संयोजन मिलता है। +महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों ने विधा के रूप में संस्मरण और रेखाचित्र की सीमाओं का उल्लंघन किया। उनके लेखन को संस्मरणात्मक रेखाचित्रों की श्रेणी में रखा जा सकता है। ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘पथ के साथी’ और ‘शृंखला की कड़ियाँ’ इनके संग्रह हैं। ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘स्मृति की रेखाएँ’ में समाज के षोषित वर्ग और नारी के प्रति इनकी सहानुभूति प्रकट हुई है। ‘पथ के साथी’ में इन्होंने अपने साथी साहित्यकारों के चित्रों को लिपिबद्ध किया है। +कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर को शैली की दृष्टि से रामवृक्ष बेनीपुरी के समान ही सम्मान प्राप्त है। इनके बहुविध विषयों में जीवन की प्रेरणा देने वाले रेखाचित्रों की भरमार है। ‘भूले हुए चेहरे’, ‘बाजे पायलिया के घुंघरू’, ‘ज़िन्दगी मुस्काई’, ‘दीप जले शंख बजे’, ‘क्षण बोले कण मुस्काए’, ‘महके आँगन चहके द्वार’ और ‘माटी हो गई सोना’ इनके रेखाचित्रों के संग्रह हैं। +प्रकाशचंद्र गुप्त ने इस विधा को स्थापित करने के लिए ‘रेखाचित्र’ नाम से ही संकलन प्रकाशित कराया। इनके रेखाचित्रों की विशेषता यह है कि इन्होंने अपने विषयों को मनुष्य की परिधि से बाहर ले जाते हुए पेड़-पौधों तथा पशु-पक्षियों तक को अपने रेखाचित्रों में स्थान दिया है। +विष्णु प्रभाकर के रेखाचित्र ‘जाने-अनजाने’, ‘कुछ शब्द कुछ रेखाएँ’ और ‘हँसते निर्झर दहकती भट्टी’ में संकलित हैं। इनके रेखाचित्रों में विशाल कैनवस पर सामाजिक सजगता के साथ मानवीय चित्र उकेरे गए हैं। इनके अन्य समकालीन रेखाचित्रकारों में देवेंद्र सत्यार्थी, डॉ. नगेन्द्र, विनयमोहन शर्मा, जगदीशचंद्र माथुर आदि का नाम लिया जा सकता है। समकालीन हिंदी साहित्य में रचनाकारों ने विधा के बंधनों को थोड़ा शिथिल किया है। आज हम परंपरागत मानदंडों पर कसकर कई विधाओं को नहीं देख सकते। रेखाचित्र विधा का भी रूप बदला है। उसको हम कहीं कहानी के भीतर तो कहीं संस्मरण अथवा आत्मकथा के भीतर अन्तर्भुक्त पाते हैं और कहीं स्वतंत्र विधा के रूप में भी देख सकते हैं। हिंदी रेखाचित्र ने अपनी सीमाओं का लगातार अतिक्रमण किया है। यह इस विधा के भविष्य के लिए शुभ संकेत है। +रेखाचित्र का अर्थ : ‘रेखाचित्र’ शब्द अंग्रेजी के 'स्कैच' शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। जैसे ‘स्कैच’ में रेखाओं के माध्यम से किसी व्यक्ति या वस्तु का चित्र प्रस्तुत किया जाता है, ठीक वैसे ही शब्द रेखाओं के माध्यम से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को उसके समग्र रूप में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। ये व्यक्तित्व प्रायः वे होते हैं जिनसे लेखक किसी न किसी रूप में प्रभावित रहा हो या जिनसे लेखक की घनिष्ठता अथवा समीपता हो। + +हिंदी साहित्य का विधागत इतिहास/हिन्दी व्यंग्य का इतिहास: +आरंभिक युग. +हिंदी में संत-साहित्य से व्यंग्य का आरंभ माना जा सकता है। कबीर व्यंग्य के आदि प्रणेता हैं। उन्होंने मध्यकाल की सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्यपूर्ण शैली में प्रहार किया है। जाति-भेद, हिंदू-मुस्लमानों के धर्माडंबर, गरीबी-अमीरी, रूढ़िवादिता आदि पर कबीर के व्यंग्य बड़े मारक हैं। +आदि अनेक उद्धरण कबीर की व्यंग्य-क्षमता के प्रमाण हैं। लेकिन उत्तर-मध्यकालीन सामंती समाज कबीर आदि संतों के समाज-बोध को समझ पाने में असफल रहा और पूरे रीतिकाल में व्यंग्य रचनाओं की उपस्थिति नगण्य रही। कबीर के बाद भारतेंदु ने सामाजिक विषमताओं के प्रति व्यंग्य को हथियार बनाया। अंग्रेज़ों के खिलाफ लिखते हुए वे कहते हैं, ‘‘होय मनुष्य क्यों भये, हम गुलाम वे भूप।’’ इस पंक्ति में औपनिवेशिक भारत की मूल समस्या हमें दिखाई देती है। पराधीन भारत की समस्याएँ वर्तमान भारत से अलग थीं। ‘अंधेर नगरी’ और ‘मुकरियों’ में गुलाम भारत की विडंबनापूर्ण परिस्थितियों, अंग्रेजी साम्राज्यवाद और उनकी शोषक दृष्टि के प्रति आक्रोश को देखा जा सकता है। भारतेंदु-युग के अन्य महत्वपूर्ण व्यंग्यकार बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ और प्रतापनारायण मिश्र हैं। किंतु प्रेमघन की कृति ‘हास्यबिंदु’ और प्रतापनारायण मिश्र के निबंधों में व्यंग्य सहायक प्रवृत्ति के रूप में मौजूद है। व्यंग्य इनकी रचनाओं में केंद्रीय भूमिका का निर्वहन नहीं करता है। व्यंग्य का पूर्ण उन्मेष इनके बाद के व्यंग्य रचनाकार बालमुकुंद गुप्त की रचनाओं में दिखाई देता है। ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ नामक अपनी प्रसिद्ध व्यंग्य लेखमाला में इन्होंने समसामयिक परिस्थितियों पर तीव्र व्यंग्य किए। राजनीति और तत्कालीन शासन-व्यवस्था से टकराव इनकी व्यंग्य रचनाओं की आधार सामग्री का काम करते हैं। +स्वतंत्रता-पूर्व युग. +युगीन समस्याओं पर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति प्रेमचंद में भी बहुत मिलती है। इन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों में आम आदमी और कृषक वर्ग की दैनंदिन कठिनाइयों पर करारा व्यंग्य किया है। प्रेमचंद के बाद के रचनाकारों में निराला साहित्य में इसे देखा जा सकता है। इनकी ‘कुकुरमुत्ता’ आदि रचनाओं में व्यंग्य की अभिव्यक्ति विद्रूपता फैलाने वाले समाज के खिलाफ चुनौती के रूप में हुई है। इनके अलावा स्वतंत्रता-पूर्व के रचनाकारों में पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ और रांगेय राघव का नाम भी लिया जा सकता है लेकिन इन लेखकों में व्यंग्य की वह धार नहीं है जो हमें भारतेंदु अथवा बालमुकुंद गुप्त की रचनाओं में दिखाई देती है। +स्वातंत्रयोत्तर युग. +सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ और देश की आज़ादी के साथ ही आम आदमी खुशहाली के सपने देखने लगा। लेकिन विपरीत परिस्थितियों और राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण आम आदमी के ये सपने पूरे नहीं हो सके। स्वतंत्रता के बाद भारत में समाज, राजनीति, धर्म, शिक्षा, आदि सभी क्षेत्रों में असंगतियाँ बढ़ी हैं। सामाजिक-नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आम आदमी के लिए शांतिपूर्वक जीवन जीने के अवसर कम हुए हैं। सत्य, सदाचरण, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा आदि शाश्वत मूल्यों का स्थान अनेक विसंगतियों ने ले लिया है। आजादी पूर्व देखे गए स्वप्न तो बीसवीं शताब्दी के छठे दशक तक आते-आते ही खण्डित हो गए। गुलाम भारत में होने वाले शोषण-अत्याचार आजादी के बाद कम होने के बजाय और अधिक बढ़ गए। व्यक्ति और समाज की आंतरिक जटिलताओं के साथ-साथ अन्तर्विरोध भी बढ़े हैं। व्यक्ति निजी स्वार्थ तक सीमित होकर रह गया है। ये विसंगतियाँ और जटिलताएँ व्यंग्य के लिए आधारभूमि बनीं। स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी साहित्य में व्यंग्य का पर्याप्त सृजन हुआ है। निरन्तर बढ़ती सामाजिक विषमताओं से विक्षुब्ध होकर करुणापूर्ण व्यंग्य लेखन की एक लम्बी परम्परा मिलती है। हरिशंकर परसाई इस परम्परा के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। +परसाई की रचनाएं ‘आजाद भारत का सृजनात्मक इतिहास’ कही जा सकती हैं। इन रचनाओं का वर्तमान भारत की यथार्थ स्थितियों के संदर्भ में ही आकलन किया जा सकता है। सामान्य सामाजिक स्थितियों को परसाई ने वैचारिक चिन्तन से पुष्ट करके प्रस्तुत किया है। स्वतंत्र भारत के सकारात्मक-नकारात्मक सभी पहलुओं की परसाई ने बखूबी पड़ताल की है। परसाई की रचनाओं में उस पीड़ित भारत की छटपटाहट को महसूस किया जा सकता है जो शोषकों के तिलिस्म में कैद है। शोषक इस तिलिस्म को बनाए रखने के लिए तरह-तरह के छद्म करते हैं। इन छद्मों का खुलासा परसाई करते हैं। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और सतर्क वैज्ञानिक दृष्टि के कारण परसाई छद्म के उन सभी रूपों को आसानी से पहचान लेते हैं जिन तक सामान्यतः रूढ़िवादी दृष्टि नहीं पहुँच पाती। परसाई का रचना संसार बहुत व्यापक है। निजी अनुभूतियों की निर्वैयक्तिक अभिव्यक्ति उनके व्यंग्य लेखन की विशिष्टता है। परसाई की सृजनशील दृष्टि निम्नवर्गीय सामान्य आदमी से प्रारम्भ होकर बहुराष्ट्रीय समस्याओं तक को अपने भीतर समेटती है। परसाई व्यंग्य के माध्यम से सृजन और संहार दोनों एक साथ करते हैं। परसाई का व्यंग्य जब शोषक वर्ग के प्रति होता है तो वह उस वर्ग के प्रति घृणा और आक्रोश उत्पन्न करता है लेकिन जब वही व्यंग्य अभावग्रस्त व्यक्ति पर होता है तो करुणा पैदा करता है। +परसाई के व्यंग्य लेखन की भाषा सप्रयास नहीं है। उनका मानना है कि समाज में रहने के कारण वह हमें अनुभव देता है और विषयानुरूप नई भाषा सिखाता है। यही कारण है कि परसाई की भाषा उनके कथ्य का अनुसरण करती हैं। +शरद जोशी भी परसाई की ही तरह एक अलग भाषाई तेवर के साथ व्यंग्य लेखन करते हैं। शिल्प की सजगता इनके व्यंग्य लेखन की विशेषता है। भाषा में वक्रता के द्वारा ये शब्दों और विशेषणों का विशिष्ट संयोजन करते हैं। +श्रीलाल शुक्लका नाम भी स्वातंत्रयोत्तर व्यंग्य लेखन में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। इनके उपन्यास ‘रागदरबारी’ ने मोहभंग की स्थितियों के यथार्थ को सजीव रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। रवींद्रनाथ त्यागीका लेखन आत्म-व्यंग्य के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है। इनके लेखन को हम हास्य और व्यंग्य का संयोजन कह सकते हैं। यह न सिर्फ पाठक को प्रफुल्लित करता है बल्कि उसे सोचने के लिए बाध्य भी करता है। +लतीफ घोंघी के व्यंग्य में राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ को विषय बनाया गया है। इनके व्यंग्य में मारकता का अभाव है, किंतु इनका कथ्य बहुत व्यापक है। नारी-शोषण, कालाबाज़ारी, भुखमरी, शैक्षिक-साहित्यिक दुनिया की गड़बड़ियाँ आदि विषयों के साथ-साथ इन्होंने आम आदमी की दैनिक परेशानियों को अपने व्यंग्यों में स्थान दिया है। भाषा में उर्दू का पुट है। +सामाजिक मूल्यों के विघटन को केंद्र में रखकर समकालीन साहित्यिक परिदृष्य में व्यंग्य का लगातार सृजन हो रहा है। समकालीन व्यंग्य में सुरेश कांत, ज्ञान चतुर्वेदी,सुशील सिद्धार्थ,नरेन्द्र कोहली,शंकर पुणतांबेकर,जवाहर चौधरी का नाम लिया जा सकता है। सुरेश कांत ने व्यंग्य-जगत को एक दर्जन से अधिक व्यंग्य-संकलनों के साथ-साथ दो अद्भुत व्यंग्य-उपन्यास दिए हैं--'ब से बैंक' और 'जॉब बची सो'। नरेन्द्र कोहली ने अपने व्यंग्यों में नए प्रयोगों पर विशेष ध्यान दिया है।सुशील सिद्धार्थ के पास कमाल की भाषा है जो समृद्ध भी है और बेहद पठनीय भी।’नारद की चिंता’ इनका प्रमुख संग्रह है।अब वे हमारे बीच नहीं रहे पर उनके व्यंग्य समकालीन साहित्य को समृद्ध करते हैं। व्यंग्य को सामाजिक सतर्कता के हथियार के रूप में देखा जाता है।अन्य व्यंग्यकारों में डॉ.रमेश चन्द्र खरे, केपी सक्सैना,माणिक वर्मा,यशवंत व्यास,सुभाष चंदर,अरविंद तिवारी,अनूप मणि त्रिपाठी,पिलकेंद्र अरोरा, डॉ. सुरेश कुमार मिश्र, संतोष त्रिवेदी,सुरजीत सिंह ,निर्मल गुप्त,मलय जैन,शशिकांत सिंह शशि प्रमुख हैं। +व्यंग्य आलोचना. +हिंदी व्यंग आलोचना परम्परा में सबसे पहले जी.पी श्रीवास्तव का नाम लिया जाता है जिन्होंने हास्य व्यंग्य आलोचना की प्रारंभिक अवधारणाएं हमारे सामने प्रस्तुत की इसके बाद डॉ श्यामसुंदर घोष, डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी, डॉ शेरजंग गर्ग, डॉ. शंकर पुताम्बेकर, बालेंद्र शेखर तिवारी, नंदलाल, डॉ. सुरेश महेश्वरी, डॉ. हरिशंकर दुबे, डॉ. भगवान दास काहार, बापूराव देसाई, डॉ. शैलेंद्रकुमार शर्मा, डॉ. सुरेश कांत, मधुसूधन पाटिल,एम एम चंद्रा, प्रेम जन्मेजय,गौतम सान्याल इत्यादि ने व्यंग्य आलोचना में मुख्य भूमिका निभाई है। इनमें सुरेश कांत की 'हिंदी गद्य लेखन में व्यंग्य और विचार' और 'व्यंग्य एक नई दृष्टि' पुस्तकें हिंदी व्यंग्य आलोचना के लिए रामचरित मानस और गीता जैसी हैं। मुख्यधारा के आलोचकों में डॉ. धनंजय, डॉ मलय इत्यादि आलोचकों भी समय के लिए सक्रिय होकर व्यंग्य आलोचना को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से समृद्ध किया है। + +हिन्दी संस्मरण का इतिहास: +संस्मरण और रेखाचित्र में बहुत सूक्ष्म अंतर है। कुछ विद्वानों ने तो इन दोनों विधाओं को एक-दूसरे की पूरक विधा भी कहा है। संस्मरण का सामान्य अर्थ होता है सम्यक् स्मरण। सामान्यतः इसमें चारित्रिक गुणों से युक्त किसी महान व्यक्ति को याद करते हुए उसके परिवेश के साथ उसका प्रभावशाली वर्णन किया जाता है। इसमें लेखक स्वानुभूत विषय का यथावत अंकन न करके उसका पुनर्सृजन करता है। रेखाचित्र की तरह यह वर्ण्य विषय के प्रति तटस्थ नहीं होता। आत्मकथात्मक विधा होते हुए भी संस्मरण आत्मकथा से पर्याप्त भिन्नता रखता है। +आरंभिक युग. +बालमुकुंद गुप्त द्वारा सन् 1907 में प्रतापनारायण मिश्र पर लिखे संस्मरण को हिंदी का प्रथम संस्मरण माना जाता है। बाद में इस काल की एकमात्र संस्मरण पुस्तक ‘हरिऔध’ पर केंद्रित गुप्त जी द्वारा लिखित ‘हरिऔध’ के संस्मरण’ के नाम से प्रकाशित हुई। इसमें हरिऔध को वर्ण्य विषय बनाकर पंद्रह संस्मरणों की रचना की गई है। +द्विवेदी युग. +हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं ने गद्य विधाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। ‘सरस्वती’ में स्वयं महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कई संस्मरण लिखे। उन्होंने अपने साथी लेखकों को नई गद्य विधाओं के लिए प्रेरित भी किया। इस समय के प्रमुख संस्मरण लेखकों में द्विवेदी जी के अतिरिक्त रामकुमार खेमका, काशीप्रसाद जायसवाल और श्यामसुंदर दास हैं। श्यामसुंदर दास ने लाला भगवानदीन पर रोचक संस्मरण लिखे। अपने समकालीन साहित्यकारों पर उस समय से आरंभ हुई परंपरा आज तक लगातार चल रही है। +छायावादोत्तर युग. +रेखाचित्र की तरह ही संस्मरण को गद्य की विशिष्ट विधा के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी पद्म सिंह शर्मा (1876-1932) का महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इनके संस्मरण ‘प्रबंध मंजरी’ और ‘पद्म पराग’ में संकलित हैं। महाकवि अकबर, सत्यनारायण कविरत्न और भीमसेन शर्मा आदि पर लिखे हुए इनके संस्मरणों ने इस विधा को स्थिरता प्रदान करने में मदद की। विनोद की एक हल्की रेखा इनकी पूरी रचनाओं के भीतर देखी जा सकती है। +महादेवी वर्मा ने अपने संस्मरणों में अपने जीवन में आए अनमोल पलों को अपने ‘पथ के साथी’ में संकलित किया है। अपने समकालीन साहित्यकारों पर इन रेखाचित्रों में अब तक किसी भी लेखक द्वारा लिखी गई सर्वश्रेष्ठ टिप्पणी कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति की बात न होगी। +निराला के ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ और ‘कुल्लीभाट’ में संस्मरण और रेखाचित्र का अनुपम संयोग हुआ है। इन्हें किसी एक विधा के अन्तर्गत रखना संभव नहीं है लेकिन अपनी सजीवता और व्यंग्य के कारण इन्हें अप्रतिम कहा जा सकता है। +प्रकाशचंद गुप्त ने ‘पुरानी स्मृतियाँ’ नामक संग्रह में अपने संस्मरणों को लिपिबद्ध किया। इलाचंद्र जोशी कृत ‘मेरे प्राथमिक जीवन की स्मृतियाँ’ और वृंदावनलाल वर्मा कृत ‘कुछ संस्मरण’ इस काल की उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। +स्वातंत्रयोत्तर युग. +सन् 1950 के आस-पास का समय संस्मरण लेखन की दृष्टि से विशेष महत्त्व का है। इस समय अनेक लेखक संस्मरणों की रचना कर रहे थे। बनारसीदास चतुर्वेदी को संस्मरण लेखन के क्षेत्र में विशेष सफलता मिली। पेशे से साहित्यिक पत्रकार होने के कारण इनके संस्मरणों के विषय बहुत व्यापक हैं। अपनी कृति ‘संस्मरण’ में संकलित रचनाओं की शैली पर इनके मानवीय पक्ष की प्रबलता को साफ देखा जा सकता है। इनके संस्मरण रोचकता के लिए विशेष प्रसिद्ध हुए। शैली वर्णनात्मक है और भाषा अत्यंत सरल है। कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपनी कृतियों ‘भूले हुए चेहरे’ तथा ‘दीप जले शंख बजे’ के कारण इस समय के एक अन्य महत्त्वपूर्ण संस्मरण लेखक हैं। लगभग इसी समय उपेंद्रनाथ अश्क का ‘मंटो मेरा दुश्मन’ प्रकाशित हुआ जिसका साहित्यिक और गैर-साहित्यिक दोनों स्थानों पर भरपूर स्वागत हुआ। जगदीशचंद्र माथुर ने ‘दस तस्वीरें’ और ‘जिन्होंने जीना जाना’ के माध्यम से अपने समय की महत्वपूर्ण संस्मरणात्मक चित्र प्रस्तुत किए। +संस्मरण और रेखाचित्रों में कोई भी तात्विक भेद नहीं मानने वाले आलोचक डा. नगेन्द्र ने ‘चेतना के बिंब’ नाम की कृति के माध्यम से इसविधा को समृद्ध किया। प्रभाकर माचवे, विष्णु प्रभाकर, अज्ञेय और कमलेश्वर इस समय के अन्य प्रमुख संस्मरण लेखक रहे हैं। +समकालीन युग. +समकालीन लेखन में आत्मकथात्मक विधाओं की भरमार है। संस्मरण आज बहुतायत में लिखे जा रहे हैं। अपने अतीत को बयान करने की ललक हर आदमी के भीतर होती है और उसकी अभिव्यक्ति करना अन्य विधाओं की तुलना में काफी आसान होता है। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा नामवर सिंह पर लिखित संस्मरण ‘हक अदा न हुआ’ ने इस विधा को नई ताजगी से भर दिया है और इससे प्रभावित होकर कई नए और पुराने लेखक इस ओर मुड़े हैं। इनकी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘नंगातलाई का गांव’ (2004) को उन्होंने स्मृति आख्यान कहा है। वर्तमान समय के संस्मरण लेखकों में काशीनाथ सिंह, कांतिकुमार जैन, राजेंद्र यादव, रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया अखिलेश का नाम काफी प्रमुखता से ले सकते हैं। + +सतत् भविषय कॆ लिए कृषि में नव परिवर्तन संभावनाएं एंव चुनोतिंया: +सतत् भविषय कॆ लिए कृषि में नव परिवर्तन संभावनाएं एंव चुनोतिंया बनाएँ + +स्वभाषा का महत्व: +...स्वभाषा की उपेक्षा का अर्थ है आत्मघात की ओर बढ़ना। जैसे जड़ कटा वृक्ष पुष्पित, फलित होना तो दूर, शीघ्र ही अपनी हरियाली खोकर सूख जाता है, उसी प्रकार अपनी भाषा से कटा राष्ट्र भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। इसी कारण प्रत्येक चतुर राष्ट्र सब से पहले विजित देश की भाषा को दबाकर उस पर अपनी भाषा थोपता है। यहाँ विश्वविख्यात भारतीय विद्वान डॉ. रघुबीर के जीवन की युगांतरकारी घटना का उल्लेख, जो उन्होंने स्वयं मुझे सुनाई थी। इस प्रकार है : +वे जब कभी पेरिस जाते तो फ्रांस के राजवंश से संबंधित एक अति-कुलीन फ्रैंच परिवार में ठहरते थे। उस परिवार में एक युवा-दंपति के अतिरिक्त उनकी एक ग्यारह वर्ष की कन्या भी थी। एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक आत्मीय का पत्र मिला, जिसे देने कन्या स्वयं उनके कमरे में आई। उसने उत्सुकतावश डॉ.रघुबीर से पत्र खोल कर उसकी लिपि उसे दिखाने का आग्रह किया, जिससे वह जान सके कि उनकी मातृभाषा कैसे लिखी जाती है। न चाहते हुए भी, कन्या के अत्याग्रह के कारण उन्हें पत्र उसे दिखाना पड़ा। इस पर वह मानों आकाश से गिर कर बोली, ‘‘यह तो अंग्रेजी में है। क्या आपकी अपनी कोई भाषा नहीं है ?’’ डॉ.रघुबीर को सच्चाई खोलनी पड़ी, जिस पर लड़की उदास हो कर चली गई। +भोजन के समय उन्हें गृह-स्वामिनी ने बुलाया और वहाँ उन्होंने अन्य दिनों की भाँति परिवार के साथ भोजन किया, किन्तु उस दिन कमरे में पूर्ण मौन छाया रहा, अन्य दिनों की भाँति उनसे कोई बोला नहीं। भोजन की समाप्ति पर गृह-स्वामिनी ने कहा, ‘‘डॉ. रघुबीर, बड़े खेद के साथ मुझे कहना पड़ता है कि अब आगे से आप अपने टिकने की व्यवस्था कहीं अन्यत्र कर लें। इस परिवार में रहना संभव न होगा, क्योंकि मुझे अभी बच्ची ने बताया कि आपकी अपनी कोई भाषा नहीं है, और जिसकी अपनी कोई भाषा न हो उसे हम फ्रैंच लोग बर्बर कहते हैं तथा उससे किसी प्रकार का संबंध रखना अगौरव की बात समझते हैॅं।’’ +डॉ. रघुबीर अत्यधिक लज्जित हुए। गृह-स्वामिनी ने पुनः कहा ‘‘हम फ्रैंच लोग अपने आतिथ्य के लिए प्रसिद्ध हैं, इसलिए आपका ऐसा तिरस्कार करते हुए मुझे दुःख है, पर इस विषय में हम किसी प्रकार का समझौता नहीं कर सकते। यहाँ मैं अपनी माता का उदाहरण आपके सामने रखती हूँ। वे लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थीं। प्रथम विश्व-युद्ध से पूर्व वह फ्रैंच भाषी प्रदेश जर्मनों के अधीन था। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रैंच के माध्यम से शिक्षण बन्द कर के जर्मन भाषा थोप दी थी। फलतः प्रदेश का सारा काम-काज एकमात्र जर्मन भाषा में होता था; फ्रैंच के लिए वहाँ कोई स्थान न था। स्वभावतः स्कूलों में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही था। मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थीं, और लोरेन के सर्वश्रेष्ठ कान्वेंट स्कूल में पढ़ती थीं। एक बार जर्मन सम्राज्ञी कैथराइन लोरेन का दौरा करती हुई उस स्कूल का निरीक्षण करने पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुन्दरी होने के साथ-साथ अत्यधिक कुशाग्रबुद्धि की भी थीं। सब बच्चियाँ नये कपड़ों में सज-धजकर आई थीं और उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था। बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद सम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है ? किन्तु मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुन्दर ढंग से सुनाया कि सम्राज्ञी गद्गद हो गईं। खुद जर्मन बच्चे भी कदाचित् इसे इतने अच्छे ढंग से न सुना पाते। सम्राज्ञी ने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार-बार आग्रह करने पर वह बोली, महारानी जी, क्या जो कुछ मैं माँगूं वह आप देंगी ? सम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा-बच्ची सम्राज्ञी का वचन कभी अन्यथा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो। इस पर मेरी माता ने कहा, ‘‘महारानी जी, यदि आप सचमुच अपने वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब आगे से इस प्रदेश में सारा काम एकमात्र फ्रैंच में हो, जर्मन में नहीं।’’ +इस सर्वथा अप्रत्याशित माँग को सुनकर सम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यचकित रह गईं, किन्तु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं, ‘‘लड़की ! नैपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मन साम्राज्य पर किया है। सम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन अन्यथा नहीं हो सकता, पर तुझ जैसी छोटी-सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज शिकस्त दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती। जर्मनों ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया। मैं भली-भाँति जानती हूँ कि अब आगे लोरेन प्रदेश अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।’’ यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गईं। +गृह-स्वामिनी ने कहा- ‘‘डॉ. रघुबीर, इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ। हम फ्रैंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं, क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र-प्रेम और भाषा-प्रेम में कोई अन्तर नहीं।’’ + +वर्गमूल निकालने की सरलतम विधि: +Upendra saheb +जैसे 1024 का वर्गमूल निकालना है तो कालम में 1024 का इकाई अंक अर्थात 4, 2 व 8 में आता है तो वर्गमूल का इकाई अंक 2 या 8 होगा फिर कालम [B में 1024, 900 व 1600 के बीच में आता है और दोनो के L.H.S. में 30 व 40 है तो ऊपर वाले संख्या अर्थात 900 के L.H.S. में 30 है तो 30 को 2 व 8 के साथ पारी-पारी जोड़ने पर 32 व 38 होता है तो अब वर्गमूल 32 या 38 होगा अब 30 व 40 का बीच का संख्या 35 है तो इसका वर्ग 35*35=1225 ! 1024, 1225 से छोटा है अत: वह वर्गमूल संख्या 32 है यदि बड़ा होता तो वर्गमूल संख्या 38 होता। + +मुखपृष्ठ/बन्धु प्रकल्प: +यह विकि विकिमीडिया फाउंडेशन द्वारा संचालित की जाती है, जिनसे संचालित अन्य प्रकल्प निम्न हैं: +विकिपीडिया +ज्ञानकोश +शब्दकोश +सूक्ति +स्रोत सामग्री +समाचार +यात्रा मार्गदर्शक +पढ़ाई की सामग्री + +विभिन्न विषयों के संस्कृत ग्रन्थ: +आयुर्वेद. +:* आरोग्य कल्पद्रुम +वास्तुशास्त्र. +३५० से भी अधिक ग्रन्थों में स्थापत्य की चर्चा मिलती है। इनमें से प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं- +यांत्रिकी. +भारद्वाज मुनि उनसे पूर्व हुए विमान शास्त्र के आचार्य तथा उनके ग्रंथों के बारे में लिखते हैं- +कामशास्त्र. +इसकी तीन टीकाएँ प्रसिद्ध हैं- +अन्य. +इन बहुश: प्रकाशित ग्रंथों के अतिरिक्त कामशास्त्र की अनेक अप्रकाशित रचनाएँ उपलब्ध हैं - + +सामान्य ज्ञान भास्कर/भूगोल: + +सामान्य ज्ञान भास्कर/प्राचीन भारत: + +सामान्य ज्ञान भास्कर/भूगोल-२: +सामान्य ज्ञान भास्कर +ADDRESS - SHREE GANESH GAS AGENCY KE PASS NAI BASTI PICHHORE +8889477388,9617210904, 7024706804 +ADDRESS - SHREE GANESH GAS AGENCY KE PASS NAI BASTI PICHHORE + +प्रश्नसमुच्चय-४: +सामान्य ज्ञान भास्कर + +प्रश्नसमुच्चय-५: + +प्रश्नसमुच्चय-६: +सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें +भारतीय अर्थव्यवस्था + +प्रश्नसमुच्चय-७: +सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें + +प्रश्नसमुच्चय-८: +'"सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें +भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन +Saiman kamishan Bharat yatra kis San me hui + +प्रश्नसमुच्चय-१०: + +प्रश्नसमुच्चय--११: +सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें +विश्व इतिहास की जानकारी + +प्रश्नसमुच्चय-९: +सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें +(क्वथनांक - रसायन विज्ञान में दाब के किसी दिए हुए नियत मान के लिए वह नियत ताप जिस पर कोई द्रव उबलकर द्रव अवस्था से वाष्प की अवस्था में परिणत हो जाय तो वह नियत ताप द्रव का क्वथनांक कहलाता है। +दाब - किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहते हैं।" दाब का मात्रक एम. के. एस. पद्धति में न्यूटन प्रति वर्ग मीटर होता है। जिस वस्तु का क्षेत्रफल जितना कम होता है, वह किसी सतह पर उतना ही अधिक दाब डालती है। ) +वैज्ञानिक --- खोज का नाम +बैटिन --- इंसुलिन +जी डोमाग --- सल्फा ड्रग्स +डा. पल मुलर --- डी. डी. टी. +ओईजकमैन --- बेरी बेरी की चिकित्सा +आर्थर बर्ग तथा जेम्स वाटसन --- आर. एन. ए. +जेम्स वाटसन तथा क्रिक --- डी. एन. ए. +सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग --- पेनिसिलिन +एंड फ्लोरे(१९२९) विलियम हार्वे (१६२८) --- रुधिर परिवहन +कार्ल लैंडस्टीनर --- रुधिर समूह +हैनीमैन --- होम्योपैथी की स्थापना +फंक --- विटामिन +मैकुलन --- विटामिन ‘ए’ +मैकुलन --- विटामिन ‘बी’ +युजोक्स होल्कट --- विटामिन ‘सी’ +एफ. जी. हॉपकिंस(१९९२) --- विटामिन ‘डी’ की खोज +एडवर्ड जेनर(१७९६) --- चेचक का टिका +ड्रेसर --- एस्प्रिन +रेबी --- क्लोरोक्विन(कुनैन) +हर गोविन्द खुराना --- जेनेटिक कोड +फिनले --- टेरामाईसिन +ल्युवेनहॉक --- जीवाणु +रो बर्थ --- टायफाइड के जीवाणु +रीड --- पीले बुखार की चिकित्सा +पॉल एरिक --- सिफिलिस की चिकित्सा +फिन्सेन अल्ट्रा --- वायलेट किरणों द्वारा चिकित्सा +रॉबर्ट कोच (१८८२) --- टी.बी. की चिकित्सा +लेनेक (१८१६) --- स्टेथोस्कोप +लॉर्ड जोसेफ लिस्टर(१८६७) --- एंटीसेप्टिक द्वारा चिकित्सा +लुई पाश्चर(१८८२) --- हाईड्रोफोबिया की चिकित्सा +डा. रोनल्ड रॉस(१९२०) --- मलेरिया की चिकित्सा +डा. जोन्स ई.साल्क(१९५५) --- एंटी पोलियो वैक्सीन +सर जेम्स हैरिसन --- क्लोरोफॉर्म की खोज +वैक्समैन --- स्ट्रेप्तोमाइसिन +क्रिश्चियंस बर्नार्ड --- हृदय प्रत्यारोपण +हैनीमैन --- होम्योपैथी +शाखा -- अध्ययन का विषय + +प्रश्नसमुच्चय--१२: +किस मेवाड शासक ने ठाट और पाट की प्रथा शुरू की थी? +स्वतंत्रता आंदोलन. +भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम : सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी +प्रागैतिहासिक काल. +विश्व मे कौनसी एसी झील जो प्रत्येक 12 बर्ष बाद मीठे व खारी जल मे परिवर्तित होता रहती है ? +विश्व की सबसे लम्बी बस कहा है ? +विश्व मे कौनसी पहाडी जो प्रतिदिन अप ना र्ंग बदला करती है ? +विश्व का सबसे पहला जहाज किस देश मे उडा था, चालक कौन था? +17 दिसम्बर 1903, अरबिले राइट ने +विश्व मे कितनी भाषाये बोली जाती है ? +विश्व मे उस देश का नाम बताइए जहॉ सिर्फ पुरुष है तथा उसकी जनस्ंख्या क्या है ? +विश्व मे कौन सी नदी है, जिस नदी मे मछ्ली नही पायी जाती है ? +विश्व की सबसे लम्बी औरत कौन है ? +विश्व की सबसे लम्बी नहर कौन सी है +विश्व की सबसे बडा एयर पोर्ट कहॉ है ? +विश्व की सबसे ऊची चोटी ? +विश्व की सबसे बडा स्टेडियम है ? +विश्व की सबसे बडा महल है ? +विश्व की सबसे लम्बी सडक सुरंग कौन सी है ? +भारत का राष्ट्रीय सूत्र (वाक्य ) क्या है ? +विश्व की सबसे बडा सेना कौन सी है ? +विश्व मे कौन सा देश है जिसमे सर्प नही है ? +विश्व की सबसे बडी लायब्रेरी कौन सी है ? +विश्व का सबसे बडा संग्रहालय कौन सा है +विश्व का सबसे बडा बन्दरंगाह कौन सा है +विश्व मे सोने का सर्वाधिक उत्पादन बाल देश कौन सा है ? +उत्त = दछीण अफ्रीका मे +विश्व का कौनसा देश है जो कभी गुलाम नही हुआ है ? +विश्व का वह कौनसा जन्तु है जो जिन्दगी भर बिना पानी पीये जीता है ? +विश्व की प्रथम महिला जो अंतरिछ यात्री कौन है ? +विश्व का वह कौनसा देश है जो कपडे पर अखबार निकालता है ? +विश्व मे कौन - सा पौधा है जिसकी शक्ल आदमी से मिलती जुलती है और उसे उखाड्ने पर उसमे से बच्चे की रोने की आवाज आती है वह पौधा कहॉ पाय जाता है ? +मैडुक अफ्रीका मे +विश्व मे प्रथम बाइसिकल कब कहॉ और किसने चलाई थी ? +विश्व मे कौनसी चिडिया के पंख नौ र्ंग के होते है ? +पिटा चिडिया (आस्ट्रेलिया मे ) +दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश कौनसा है +भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री कौन थ ? + +प्रश्नसमुच्चय--१३: +सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें +भारत की कृषि. +फसल और उत्पादक राज्य. +चावल - प. बंगाल, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, बिहार और पंजाब,हरियाणा +गेहूं - उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान +ज्वार - महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और आंध्रप्रदेश +दलहन - मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, प. बंगाल, गुजरात और आंध्रप्रदेश +बाजरा - गुजरात, राजस्थान और उत्तरप्रदेश +जौ - उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार और पंजाब +तिलहन - गुजरात, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, प. बंगाल और उड़ीसा +मुंगफली - गुजरात, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश +गन्ना - उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, हरियाणा और पंजाब +कहवा - कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र +चाय - असम, प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र +पटसन - प. बंगाल, बिहार, असोम, उड़ीसा एवं उत्तरप्रदेश +कपास - महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, पंजाब, कर्नाटक, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश +रबड़ - केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, असोम और अंडमान-निकोबार द्वीप-समूह +तंबाकू - आंध्रप्रदेश, गुजरात, बिहार, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और प. बंगाल +काली - मिर्च केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और पुदुचेरी +हल्दी - आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और बिहार +काजू - केरल, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश + +प्रश्नसमुच्चय--१४: +सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें +1. उत्तक संवर्धन प्रयोगशाला- स्थापना-अलीगंज (लखनऊ) +2. राजकीय फल संरक्षण एवं डिब्बाबन्दी संस्थान- लखनऊ +3. आगरा, मुरादाबाद, वाराणसी, बरेली तथा गौतमबुद्ध नगर में पाॅंच क्षेत्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केन्द्र स्थापित है। +4. उत्तर प्रदेश डेवलपमेन्ट काॅर्पोरेशन लिमिटेड की स्थापना 15 मार्च, 1977 में की गई थी। +5. केन्द्र सरकार के सहयोग से राज्य के इलाहाबाद में साइंस सिटी की स्थापना की गयी। +6. भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान- इसकी स्थापना वर्ष 1952 में लखनऊ में की गई। +7. सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय- उत्तराखण्ड के गठन के बाद पन्तनगर स्थित कृषि विश्वविद्यालय उत्तराखण्ड में चला गया है। इसके +फलस्वरूप पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मेरठ, मुरादाबाद एवं बरेली मण्डल में कृषि शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रसार हेतु राज्य सरकार द्वारा 2 अक्टूबर, 2000 को । +8. कृषि डीम्ड विश्वविद्यालय- इलाहाबाद के नैनी में। +9. नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय- फैजाबाद(उ0प्र0) स्थापना-1978 +जनजाति निवास स्थल प्रमुख तथ्य +1. प्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति '"थारू +2. प्रदेश की न्यूनतम जनसंख्या वाली जनजाति "'वनरावत +3. सर्वाधिक अनुसूचित जनजाति संख्या वाला जिला '"सोनभद्र +4. सर्वाधिक अनुसूचित जनजाति संख्या का प्रतिशत वाला जिला "'सोनभद्र +5. न्यूनतम अनुसूचित जनजाति जनसंख्या वाला जिला '"बागपत +6. न्यूनतम अनुसूचित जनजाति जनसंख्या प्रतिशत वाला जिला "'बागपत +7. अनुसूचित जनजाति का राज्य की कुल जनसंख्या में प्रतिशत 0.57 प्रतिशत +8. थारू जनजाति की उप-जाति होती है- '"उल्टहवा +9. थारू जनजाति में प्रथा का प्रचलन है- "'संयुक्त परिवार +10. उत्तर प्रदेश की जनजाति इस्लाम धर्म को मानती है- '"माहीगीर +11. खरवार जनजाति का नृत्य- "'करमा +12. उत्तर प्रदेश की दस नई जनजातियों को केन्द्र सरकार द्वारा सूचीबद्ध किया गया- '"वर्ष 2003 में +1. वर्ष 1971 में सैडलर कमीशन की अनुशंसा के आधार पर राज्य में विश्वविद्यालय शिक्षा को माध्यमिक स्तर की शिक्षा से अलग कर दिया गया। +2. राज्य में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिसर की स्थापना- 1981 +3. उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद का गठन- 25 जुलाई, 1972 +4. राज्य सरकार द्वारा शिक्षा मित्र योजना का शुभारम्भ- वर्ष 2000-2001 +1. पोषाहार योजना +2. कस्तूरबा गाॅंधी बालिका विद्यालय योजना "' 2004 में प्रारम्भ +3. कल्प शिक्षा योजना '" प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र से सम्बन्धित +4. आॅपरेशन ब्लैक बोर्ड योजना "' 2000-2001 में प्रारम्भ +5. शिक्षा मित्र योजना '" 2000-2001 में +6. सर्व शिक्षा अभियान "' 2001 में प्रारम्भ +7. स्कूल चलो अभियान '" 2000 में प्रारम्भ +8. प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना "' 2000-2001 में प्रारम्भ +9. माध्यमिक शिक्षा चयन बोर्ड का गठन '" 1982 +10. विद्या वाहिनी परियोजना "' 2003 में प्रारम्भ, कम्प्यूटर के माध्यम से शिक्षा को बढ़ावा देना +1. उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी- लखनऊ +2. राज्य ललित कला अकादमी- लखनऊ +3. प्रयाग संगीत समिति- इलाहाबाद +4. शुभारती विश्वविद्यालय- मेरठ +5. एमिटी विश्वविद्यालय- गौतम बुद्ध नगर +6. जगत्गुरू रामधाम भद्राचार्य विश्वविद्यालय- चित्रकूट +7. उत्तर प्रदेश का प्रथम विकलांग विश्वविद्यालय- चित्रकूट +8. उत्तर प्रदेश में केन्द्रीय विश्वविद्यालय- 04 +9. उत्तर प्रदेश में कुल कृषि विश्वविद्यालय- 04 +10. उत्तर प्रदेश में उर्दू को द्वितीय राजभाषा घोषित किया गया- वर्ष 1989 +1. देश का सबसे बड़ा विद्युत उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है। +2. राज्य के कुल विद्युत उत्पादक का लगभग 88%तापीय विद्युत +3. 10% जल विद्युत +4. लगभग 2% नाभिकीय विद्युत के रूप में +5. उत्तर प्रदेश में विद्युत नियामक आयोग का गठन- वर्ष 1998 +नोट- यह अक्सर मिलान कराने के लिए आता है +नोट -राज्य में विद्युत ऊर्जा के विकास में तीव्रता लाने के उद्देश्य से अप्रैल, 1959 में उत्तर प्रदेश विद्युत परिषद का गठन किया गया। +1. ओेबरा तापप विद्युुत केन्द्र की स्थापना किस देश के सहयोग से की गई- +2. हरदुआगंज ताप विद्युत गृह कहा स्थापित किया गया- +3. विद्युत उत्पादन की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का सम्पूर्ण देश में कौन-सा स्थान है- +4. उत्तर प्रदेश में विद्युत का उत्पादन उसकी माग से क्या सम्बन्ध रखता है- +5. खातिमा शक्ति केन्द्र उत्तर प्रदेश में किस नहर पर स्थापित किया गया- +6. बेतवा नदी पर निर्मित राजघाट बाध परियोजना में उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त कौन-सा राज्य शामिल है ? +मध्य प्रदेश। +7. गोविन्द बल्लभ पन्त सागर परियोजना निम्नलिखित में से कहा स्थित है- +8. निम्नलिखित में से किस परियोजना में उत्तर प्रदेश, बिहार व नेपाल सम्मिलित हैं ? +9. बिरला समूह द्वारा उत्तर प्रदेश के किस स्थान पर 600 मेगावाट के ताप विद्युत केन्द्र की शुरूआत की गयी थी- +10. उत्तर प्रदेश में परमाणु विद्युत केन्द्र्र स्थापित है- +11. नरौरा परमाणु संयंत्र अवस्थित है- +12. उत्तर प्रदेश में विद्युत नियामक आयोग का गठन कब किया गया- +13. उत्तर प्रदेश में वैकल्पिक ऊर्जा के विकास हेतु वैकल्पिक ऊर्जा विकास संस्थान की स्थापना की गई- +14. ऊॅंचाहार ताप विद्युत परियोजना स्थित है- +15. आवला ताप विद्युत परियोजना निम्न में से कहाॅं स्थित है- +16. ‘उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद्’ का गठन कब किया गया ? +17. वैकल्पिक ऊर्जा से सम्बन्धित एक शोध एवं प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की गई है- +18. राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड का गठन कब किया गया ? +19. रामपुरा, जो भारत में अपना सौर ऊर्जा प्लान्ट लगाने वाला प्रथम गाॅंव कहाॅं स्थित है- +हिमालय से निकलने वाली नदियां - गंगा यमुना गंडक काली (शारदा) रामगंगा सरयू (घाघरा )राप्ती +गंगा के मैदानी भाग से निकलने वाली नदियाँ - गोमती, वरुण, पांडो, इसन +दक्षिण पठार से निकलने वाली नदियाँ - चम्बल, बेतवा ,केन, सोन, रिहंद, टोंस ,कन्हार +नोट - प्रश्न सीधे सीधे आता है कि कौन सी नदी हिमालय से नहीं निकलती है +नोट -साक्षात्कार में भी प्रश्न पूछा जाता है कि उत्तर प्रदेश की पांच मैदानी नदियों के नाम बताइये +गंगा<अलकनंदा + भागीरथी = देवप्रयाग +गंगा नदी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में प्रवेश करती है +गंगा नदी मैदानी भाग में प्रवेश करती है - हरिद्वार में +गंगा नदी के दाए तट की सहायक नदिया - यमुना ,सोन, टोंस, कर्मनाशा ,चन्द्रप्रभा +गंगा नदी की बाए तट की सहायक नदियाँ -रामगंगा, गोमती , घाघरा , राप्ती , गंडक +यमुना नदी - बंदरपूंछ के निकट यमुनात्री हिमनद से निकलती है +यमुना + बेतवा = हमीरपुर के निकट +यमुना + हिंडन = नोएडा के निकट +रामगंगा - गंगा के बाई ओर मिलने वाली सहायक नदी +यह दूधातोली पर्वत (उत्तराखंड )के निकट से निकलती है +यह बिजनौर जिले में प्रवेश करती है +कन्नौज के निकट यह गंगा से मिल जाती है +नोट - कन्नौज इत्र के लिए जाना जाता है +नोट - कोह इसकी सहायक नदी है +राप्ती((बूढी गण्डक ) - गंगा के बाई ओर से मिलने वाली सहायक नदी ; +यह रुकुमकोट (धौलागिरी के निकट ) से निकलती है ; रोहिणी नदी इसकी सहायक नदी है +घाघरा - मापचाचुंगो हिमनद से निकलती है जो कि तिब्बत के पठार पे है +पर्वतीय प्रदेश में यह करनाली नदी के नाम से और मैदानी भाग में यह घाघरा के नाम से जानी जाती है +नोट - यह लखीमपुर व् सीतापुर कि सीमा का निर्धारण करती है +चम्बल -मध्य प्रदेश के जानापाव पहाड़ी से निकलती है एवं यह यमुना की सहायक नदी है +बेतवा -मध्य प्रदेश के कुमरा गाव से निकलती है +नोट - यह यमुना की सहायक नदी है +धसान नदी बेतवा की सहायक नदी है +सिंध - यह राजस्थान के नैनवास से निकलती है +नोट - यह यमुना की सहायक नदी है +केन - यह कैमूर की पहाड़ी से निकलती है +नोट- यह कर्णवती के नाम से मशहूर है एवं यह यमुना की सहायक नदी है +सोन -यह नर्मदा के उद्गम स्थल के समीप शेषकुंड नामक स्थान से निकलती है +नोट -बनास , रिहंद , गोपद इसकी सहायक नदियाँ है । +गोमती नदी -यह पीलीभीत के दलदली क्षेत्र से निकलती है एवं यह गंगा की सहायक नदी है। +नोट- सई इसकी सहायक नदी है । +टोंस - तमसा कुंड (कैमूर की पहाड़ी में ) से निकलती है । +नोट - बिहार जलप्रपात इसी नदी पर है। +नोट - बेलन इसकी सहायक नदी है। +बखिरा --'"संत कबीर नगर +फुलर झील --"'पीलीभीत +टाण्डादरी --'"मिर्ज़ापुर +बलहपारा --"'कानपुर +कीठम --'"आगरा +करेला --"'लखनऊ +मदन सागर --'"महोबा +राजा का बाँध --"'सुल्तानपुर +बडाताल --'"शाहजहांपुर +रामगढ़ ताल --"'गोरखपुर +मोती / गौर --'"रामपुर +नलकूपों द्वारा (७१%)> नहरों द्वारा > कुओ द्वारा > तालाबों द्वारा +नोट -उत्तर भारत में सिंचाई का प्रमुख स्त्रोत नलकूप है एवं दक्षिण भारत में तालाब . +ऊपरी गंगा नहर --"'हरिद्वार से +मध्य गंगा नहर --'"बिजनौर से +निचली गंगा नहर --"'बुलंदशहर (नरौरा से ) +बेतवा नहर --'"झांसी के निकट पारीक्षा से +आगरा नहर --"'यमुना नदी से निकाली गई है +शारदा नहर --'"यह राज्य कि सर्वाधिक प्राचीन नहर है +गण्डक नहर--"'यह उत्तर प्रदेश व् बिहार कि संयुक्त परियोजना है +नौगढ़ बाँध नहर --'"यह कर्मनाशा नदी से निकाली गई है +नगवां बाँध नहर --"'यह कर्मनाशा नदी से निकाली गई है +मेजा जलाशय --'"बेलन नदी पे है +ख़ातिमा शक्ति केंद्र स्थापित है --"'शारदा नहर पे +जरगो बाँध --'"जरगो नदी ; मिर्ज़ापुर +माताटीला बाँध --"'बेतवा नदी ; झाँसी +रिहंद बाँध (गोविन्द बल्लभ पन्त सागर ) --'"रिहंद नदी ; मिर्ज़ापुर +रामगंगा बाँध --"'रामगंगा ; बिजनौर +मूसा कहद बाँध --'"कर्मनाशा नदी ; वाराणसी +भौगोलिक क्षेत्रफल --"'3287.3 लाख हेक्टेयर +कृषि योग्य भूमि --'"1870.09 लाख हेक्टेयर +वन भूमि --"'694.07 लाख हेक्टेयर +शुद्ध बोया गया क्षेत्र --'"1411.01 लाख हेक्टेयर +एक से अधिक बार बोया गया क्षेत्र --"'459.08 लाख हेक्टेयर +शुद्ध सिंचित क्षेत्र --'"556.98 लाख हेक्टेयर +सिंचित क्षेत्र --"'762.68 लाख हेक्टेयर +शुद्ध बोये गये क्षेत्र में सिंचित का प्रतिशत --'"68.40 प्रतिशत +चारागाह भूमि --"'108.97 लाख हेक्टेयर +उत्तर प्रदेश का भारत के राज्यों में क्षेत्रफल में स्थान - चौथा +नोट - राजस्थान > मध्य प्रदेश > महाराष्ट्र > उत्तर प्रदेश +राज्य की सीमाएं आठ राज्यों व् एक केंद्रशासित प्रदेश को छूती है +नोट - प्रश्न में आता है कि उत्तर प्रदेश की सीमा रेखा कितने राज्यों /केंद्रशासित प्रदेश को छूती है -9 +राज्य का क्षेत्रफल -240928 वर्ग किलोमीटर +उत्तर प्रदेश का कुल क्षेत्रफल देश के क्षेत्रफल का है -7.33% +उत्तर प्रदेश का पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण विस्तार - क्रमश : 650 और 240 किलोमीटर +विस्तार -23"52' से 30"25' तक (उत्तरी अक्षांश ) +देशांतरीय विस्तार -77"3' से 84"39' तक +उत्तर प्रदेश भाग है - गोंडवानालैंड का (भारत भी ) +जनसँख्या के आधार पर उत्तर प्रदेश का स्थान - पहला +'" भूगर्भिक संरचना +विंध्य शैल समूह - कैमूर श्रेणी का निर्माण - पूर्व कैम्ब्रियन काल में निर्माण +बुन्देलखण्ड नीस- आद्य कल्प में निर्माण +टर्शियरी शैल समूह - टेथिस सागर में अत्यधिक निक्षेप के कारण निर्माण +क्वाटरली समूह - तराई व भाभर का निर्माण +भाभर क्षेत्र -शिवालिक का गिरपदीय क्षेत्र (कंकड़ पत्थर ) यहाँ नदिया अंदर समा जाती है +उत्तर प्रदेश में विस्तार - मुख्यतः सहारनपुर, बिजनौर , पीलीभीत +नोट - पीलीभीत की खड़ाऊ प्रसिद्ध है +तराई क्षेत्र - यह सहारनपुर से लेकर देवरिया तक फैला है +यह दलदली क्षेत्र होता है क्योंकि यही पे भाभर से विलुप्त नदियाँ यही पे निकलती है +नोट - तराई क्षेत्र में मलेरिया का प्रकोप ज्यादा होता है +बांगर - पुरानी जलोढ़ मृदा +खादर - नवीन जलोढ़ मृदा +नोट- खादर बांगर की अपेक्षा अधिक उपजाऊ होती है +उत्तर से दक्षिण का क्रम +भाभर -> तराई > खादर > बांगर +राज्य में पूर्व से पश्चिम की ओर जाने पर वर्षा की मात्रा घटती जाती है +सर्वाधिक वर्षा - गोरखपुर में और सबसे कम वर्षा मथुरा में होती है +उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक औसत तापमान पाया जाता है - बुंदेलखंड +प्रदेश में वर्षा का प्रारम्भ जून के अंतिम सप्ताह से होता है +उत्तर प्रदेश में शीत ऋतु में पश्चिमी गंगा मैदान में सबसे कम तापमान होती है +उत्तर प्रदेश के दक्षिणी पठार में सम्मिलित भाग - झाँसी , जालौन , हमीरपुर ,बांदा ,इलाहाबाद ,मिर्ज़ापुर ,चंदौली +वर्षा के वितरण के आधार पे उत्तर प्रदेश को दो जलवायु प्रदेशों में बाटा गया है +वर्षा ऋतु में उत्तर प्रदेश में वर्षा होती है - 75 से 80 % (अधिकाँश बंगाल की खाडी से होती है ) +उत्तर प्रदेश की सबसे ऊँची चोटी - सोनाकर +सोनाकर व् कैमूर जिले में है - मिर्ज़ापुर व सोनभद्र +उत्तर प्रदेश को पहले जाना जाता था - यूनाइटेड प्रोविंस +​"' आधुनिक इतिहास + +प्रश्नसमुच्चय--१७: +सामान्य ज्ञान भास्कर पर चलें +वर्ण विचार +शब्द भेद +संज्ञा +श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द. +श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्द का अर्थ है- सुनने में समान लगने वाले किन्तु भिन्न अर्थ वाले दो शब्द। अर्थात वे शब्द जो सुनने और उच्चारण करने में समान प्रतीत हों, किन्तु उनके अर्थ भिन्न-भिन्न हों। +उदाहरण के लिए, अवलम्ब और अविलम्ब -- दोनों शब्द सुनने में समान लग रहे हैं, किन्तु वास्तव में समान हैं नहीं। अत: दोनों शब्दों के अर्थ भी पर्याप्त भिन्न हैं , 'अवलम्ब ' का अर्थ है - सहारा , जबकि अविलम्ब का अर्थ है - बिना विलम्ब के अर्थात शीघ्र । + +प्रश्नसमुच्चय--१६: + +लेटिन: +लेटिन और इसका व्याकरण अँग्रेजी से काफी अलग है। + +हिन्दी: +हिन्दी विश्व की प्रमुख भाषा है,यह 50 करोड़ लोगों की भाषा हैं। हिन्दी भाषा, भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हिन्दी के अधिकतम शब्द संस्कृत , अरबी और फारसी भाषा के शब्दों से लिए गए हैं। हिन्दी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। +व्याकरण. +हिन्दी भाषा में भी व्याकरण का अति महत्व है। हिन्दी व्याकरण सरल है, लेकिन कई बार बिना जाने लिखने पर गलती हो ही जाती है। हिन्दी अच्छी तरह से लिखने के लिए यह आवश्यक है कि हिन्दी के मूल व्याकरण को अच्छी तरह से समझना। हिन्दी में संज्ञा, सर्वनाम मुख्यतः केवल शब्द के उपयोग के बारे में है। जिससे आप एक साधारण वाक्य बना सकते हो। सर्वनाम के साथ आप उसी से जुड़ा दूसरा या अन्य वाक्य बना सकते हो। इसके अलावा क्रिया से आप किसी कार्य के बारे में लिख या बोल सकते हो। विशेषण में आप किसी कि तारीफ, अच्छाई आदि कर सकते हो। इसके अलावा काल इसमें सबसे अहम है। +काल में कई बार लोग समय कल आज और कल में व अगले वर्ष और पिछले वर्ष में गलती कर देते हैं। जिसे थोड़े व्याकरण के ज्ञान से पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। हिन्दी व्याकरण निम्न पर आधारित है: - + +हिन्दी/आधारभूत हिन्दी: +आधारभूत हिन्दी जिसमें साधारण रूप से हिन्दी में वाक्य हैं। जिससे हिन्दी सीखने में आसानी होगी। + +हिन्दी व्याकरण/संज्ञा: +संज्ञा किसी वस्तु, प्राणी ,स्थान तथा भाव के नाम को कहते हैं। कम शब्दों में कहें तो "किसी भी नाम को संज्ञा कहते हैं" ऐसा कहा जा सकता है। +उदाहरण : +पेड़ ,लडका,श्याम,बाडमेर इत्यादि । +प्रकार. +व्यक्तिवाचक संज्ञा. +किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु या स्थान के नाम का बोध कराने वाले शब्दों को व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं। +गहरे रंग में दिया गया शब्द संज्ञा है। इसके स्थान पर यदि वह यह वहाँ आदि आने पर उसे संज्ञा नहीं सर्वनाम कहेंगे। +जातिवाचक संज्ञा. +शब्द के जिस रुप से किसी प्राणी, वस्तु अथवा स्थान की पूरी जाति का बोध होता है, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं। +वस्तुवाचक संज्ञा. +इस संज्ञा में किसी भी प्रकार के वस्तु के नाम को वस्तु वाचक संज्ञा कहते हैं। जैसे किताब, मोबाइल, दर्पण, वाहन, कलम, बल्ल आदि। +समूहवाचक संज्ञा. +१.४ जो संज्ञा किसी वस्तु या फिर व्यक्ति के समूह का बोध करे समूहवाचक संज्ञा (Noun) कहलाती है। +उदाहरण +उसकी कक्षा में ५० विद्यार्थी हैं। + +हिन्दी व्याकरण/सर्वनाम: +सर्वनाम हमेशा संज्ञा के स्थान पर कहा या बोला जाता है। +उपयोग. +लिखते या बोलते समय बार बार किसी का नाम लेना अच्छा नहीं लगता है और न ही यह सही व्याकरण के रूप में माना जाता है। किसी के बारे में बात करते समय केवल उसका एक ही बार नाम अर्थात संज्ञा का उपयोग करते हैं और जब तक कोई और संज्ञा का उपयोग नहीं हो जाता तब तक हम आसानी से सर्वनाम का उपयोग कर सकते हैं। +इसमें अलग अलग प्रकार के शब्द का उपयोग किया जाता है जैसे- यह, वह, वहाँ, यहाँ, इधर, उधर, उसने, इसने, उसकी, इसकी आदि। +ध्यान रहे, हिन्दी में पहले वाक्य में संज्ञा होना चाहिए। उसके बाद ही सर्वनाम का उपयोग होता है। + +हिन्दी व्याकरण/क्रिया: +क्रिया किसी भी भाषा में क्रिया का अधिक योगदान होता है। हम किसी भी प्रकार का कुछ भी काम करते हैं उसे क्रिया कहते हैं। +व्याख्या. +यदि कोई वाक्य किसी कार्य के बारे में बताता है, तो उसे क्रिया कहते हैं। + +हिन्दी व्याकरण/विशेषण: +विशेषण जो शब्द संज्ञा व सर्वनाम की विशेषता बताते है, उन्हें विशेषण कहते है। +विशेष्य. +विशेषण, जो संज्ञा व सर्वनाम शब्दों की विशेषता प्रकट करते हैं, उन्हें "विशेष्य" कहते हैं अर्थात संज्ञा व सर्वनाम शब्दों को "विशेष्य" के नाम से जाना जाता है। +उदाहरण. +यहां ताजी विशेषण है तथा सब्जियॉ विशेष्य है। +यहां भूरि विशेषण है तथा गाय विशेष्य + +हिन्दी व्याकरण/काल: +काल जब किसी शब्द से किसी समय या दिन के बारे में पता चलता है तो उसे काल कहते हैं। यह तीन प्रकार के होते हैं। +प्रकार. +भूत काल. +जब किसी शब्द से किसी बीते हुए समय के बारे में पता चलता है तो वह भूत काल कहलाता है। इसमें था, थे आदि शब्द का उपयोग होता है। +वर्तमान काल. +जब किसी शब्द से वर्तमान काल के बारे में पता चलता है, तो उसे वर्तमान काल कहते हैं। इसके लिए मुख्यतः चल रहा है, हो रहा है, हो रही है, चल रही है आदि शब्द उपयोग होता है। +यह काम अभी चल रहा है। +भविष्य काल. +जब किसी शब्द में किसी कार्य को बाद में करने का बोध हो तो उसे भविष्य काल कहते हैं। इसमें कोई कार्य हुए नहीं रहता और न ही शुरू हुए रहता है। + +हिन्दी व्याकरण/संधि: +संधि दो या दो से अधिक शब्दों को एक साथ जोड़ने को संधि कहते हैं। संधि का अर्थ ही जोड़ना होता है। इनमें ऐसे शब्दों को लिया जाता है जो अलग अलग होने पर भी उनका अर्थ होता है। +संधि की परिभाषा– +दो वर्णों अथवा अक्षरों के मेल (अर्थात जुड़ने या संयोग) से जो विकार उत्पन्न होता है‚ उसे संधि कहते हैं। +उदाहरण– + +भौतिकी अध्ययन मार्गदर्शक: +भौतिकी अध्ययन मार्गदर्शक + +भौतिकी अध्ययन मार्गदर्शक/उद्देश्य: +भौतिकी अध्ययन का उद्देश्य. +वास्तविक दुनिया को समझने के लिए हमें भौतिकी को समझना आवश्यक है। इससे दैनिक जीवन में होने वाले परिवर्तन और उस परिवर्तन के होने के कारण का पता चलता है। जिससे हम पूरे आकाशगंगा या अनंत को समझ सकते हैं। इसे हम दैनिक जीवन में हमारे कार्यों में भी उपयोग कर सकते हैं। इससे हमारा जीवन और भी आसान हो जाता है। + +भौतिकी अध्ययन मार्गदर्शक/नियम: +भौतिकी के नियम. +भौतिकी को आसानी से समझने के लिए नियम बनाए जाते हैं। इससे कोई भी आसानी से नियम को पढ़ कर उसका उपयोग कर सकता है। + +भौतिकी अध्ययन मार्गदर्शक/वैज्ञानिक विधि: +वैज्ञानिक विधि. +इसमें किसी भी वस्तु के साथ होने वाले क्रिया को देख कर उसे परखा जाता है। उसमें लगने वाला समय और परिवर्तन को लिखा जाता है। इसके बाद उससे होने वाले प्रभाव को भी लिखा जाता है। +इसमें किसी प्रयोग को सफलता पूर्वक कैसे किया जाये, उसके लिए उस प्रयोग को कई बार किया जाता है। उसके सही विधि को लिखी जाती है। जिससे उसमें कोई त्रुटि न रह जाये। + +भौतिकी अध्ययन मार्गदर्शक/ऊर्जा: +ऊर्जा. +गतिज ऊर्जा वेग के आधे द्रव्यमान के बराबर होता है। + +हिन्दी/रंग: + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय: +प्रत्यय (suffix) उन शब्दों को कहते हैं जो किसी अन्य शब्द के अन्त में लगाये जाते हैं। इनके लगाने से शब्द के अर्थ में भिन्नता या वैशिष्ट्य आ जाता है। +उदाहरण +वान +यह किसी व्यक्ति की विशेषता दर्शाते समय उपयोग होता है। जैसे यह पहलवान बहुत बलवान है। +ता +ई +ओं +इसका उपयोग एक वचन शब्दों को बहुवचन शब्द बनाने के लिए किया जाता है। +याँ + +हिन्दी व्याकरण/समास: +समास का तात्पर्य है ‘संक्षिप्तीकरण’। दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए एक नवीन एवं सार्थक शब्द को समास कहते हैं। जैसे - ‘रसोई के लिए घर’ इसे हम ‘रसोईघर’ भी कह सकते हैं। संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में समास का बहुतायत में प्रयोग होता है। जर्मन आदि भाषाओं में भी समास का बहुत अधिक प्रयोग होता है। +जिस समास का पहला पद प्रधान हो और वह अव्यय हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। जैसे - यथामति (मति के अनुसार), आमरण (मृत्यु कर) न् इनमें यथा और आ अव्यय हैं। +कुछ अन्य उदाहरण - + +सामाजिक जालस्थल: +सामाजिक जालस्थल. +उन जालस्थल को कहते हैं, जो किसी सामाजिक व्यक्ति को दूसरे से बात करने की सुविधा देता है। यह कई प्रकार के वार्तालाप या संदेश या अन्य माध्यम द्वारा किसी व्यक्ति की जानकारी दूसरे तक और दूसरे की जानकारी पहले व्यक्ति तक पहुंचता है। +लाभ. +यह एक दूसरे से बात करने का अच्छा माध्यम है। इससे दुनिया के किसी भी व्यक्ति से बात की जा सकती है। लगभग सभी सामाजिक जालस्थल सभी के लिए पूरी तरह से निःशुल्क होता है। +हानि. +अन्य सुविधाओं की तरह इसमें भी हानि होती है। इससे आपको गोपनीयता को बहुत बड़ा खतरा होता है। इसके अलावा कई बार खाते को किसी ओर द्वारा हेक भी कर लिया जाता है। जिससे कोई भी आपकी जानकारी ले सकता है। इसके अलावा कभी कभी कोई धोखा देने के लिए गलत नाम से खाता खोल कर मूर्ख भी बनाता है। + +जीमेल: + +जीमेल/परिचय: +जीमेल गूगल द्वारा दी जाने वाली एक प्रकार की ईमेल सेवा है। यह गूगल के खाता द्वारा संचालित होता है। इसका उपयोग ईमेल के लिए किया जाता है। लेकिन यह गूगल के खाते का मुख्य जानकारी होता है। किसी भी गूगल के सेवा के लिए यदि आप खाता खोलते हैं तो आपको जीमेल मिल ही जाएगा। + +जीमेल/सामान्य: +सामान्य जीमेल. +यह एक प्रकार के एचटीएमएल से बना जालस्थल होता है, जिसमें जीमेल का सामान्य रूप होता है। जो किसी धीमी गति से इंटरनेट चलाने वालों के लिए बना होता है। इससे ईमेल जल्दी खुल जाते हैं और अधिक डाटा नष्ट भी नहीं होता है। + +जीमेल/रूप: +जीमेल रूप. +यह अलग अलग उपकरण पर अलग अलग दिखाई देता है। इसके अलावा यह एक बहुत अधिक डाटा लेने वाला मूल रूप में है और दूसरा कम डाटा लेने वाला कभी कभी दिखाई देता है, जब कोई धीमी गति में कोई इसके जालस्थल को खोलने की कोशिश करता है। + +जीमेल/मेल भेजना: +जीमेल से मेल भेजना. +इसके द्वारा आसानी से मेल भेजा जा सकता है। इसके साथ ही इसमें संपर्क सूची होती है, जिससे एक या इससे अधिक लोगों को एक साथ चुनकर संदेश भेज सकते हैं। इससे त्रुटि होने की प्रायिकता कम होती है। + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/अक: +प्रत्यय. +लेख्, पाठ्, +लेखक, पाठक, कारक, गायक + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/अन: +प्रत्यय. +पाल्, सह्, ने, चर् +पालन, सहन, नयन, चरण + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/अना: + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/अनीय: +प्रत्यय. +मान्, रम्, दृश्, पूज्, श्रु +माननीय, रमणीय, दर्शनीय, पूजनीय, श्रवणीय + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/आ: +प्रत्यय. +सूख, भूल, जाग, पूज, इष्, भिक्ष् +सूखा, भूला, जागा, पूजा, इच्छा, भिक्षा + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/आई: +प्रत्यय. +लड़, सिल, पढ़, चढ़ +लड़ाई, सिलाई, पढ़ाई, चढ़ाई + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/आन: +प्रत्यय. +उड़, मिल, दौड़ +उड़ान, मिलान, दौड़ान + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/इ: +प्रत्यय. +हर, गिर, दशरथ, माला +हरि, गिरि, दाशरथि, माली + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/इया: +प्रत्यय. +छल, जड़, बढ़, घट +छलिया, जड़िया, बढ़िया, घटिया + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/इत: +प्रत्यय. +पठ, व्यथा, फल, पुष्प +पठित, व्यथित, फलित, पुष्पित + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/इत्र: +प्रत्यय. +चर्, पो, खन् +चरित्र, पवित्र, खनित्र + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/इयल: +क्यूं की उसका जन्मदिन 29 फेब्रुवरी को था जो 4साल में एकबार आता है +प्रत्यय. +अड़, मर, सड़ +अड़ियल, मरियल, सड़ियल + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/ई: +प्रत्यय. +हँस, बोल, त्यज्, रेत +हँसी, बोली, त्यागी, रेती + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/उक: +प्रत्यय. +इच्छ्, भिक्ष् +इच्छुक, भिक्षुक + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/तव्य: +प्रत्यय. +कर्तव्य, वक्तव्य + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/ता: +प्रत्यय. +आ, जा, बह, मर, गा +आता, जाता, बहता, मरता, गाता + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/ति: +प्रत्यय. +अ, प्री, शक्, भज +अति, प्रीति, शक्ति, भक्ति + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/ते: +प्रत्यय. +जा, खा +जाते, खाते + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/त्र: +प्रत्यय. +अन्य, सर्व, अस् +अन्यत्र, सर्वत्र, अस्त्र + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/न: +प्रत्यय. +क्रंद, वंद, मंद, खिद्, बेल, ले +क्रंदन, वंदन, मंदन, खिन्न, बेलन, लेन + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/ना: +प्रत्यय. +पढ़, लिख, बेल, गा +पढ़ना, लिखना, बेलना, गाना + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/म: +प्रत्यय. +दा, धा +दाम, धाम + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/य: +प्रत्यय. +गद्, पद्, कृ, पंडित, पश्चात्, दंत्, ओष्ठ् +गद्य, पद्य, कृत्य, पाण्डित्य, पाश्चात्य, दंत्य, ओष्ठ्य + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/या: +प्रत्यय. +मृग, विद् +मृगया, विद्या + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/वाला: +प्रत्यय. +देना, आना, पढ़ना +देनेवाला, आनेवाला, पढ़नेवाला + +हिन्दी व्याकरण/प्रत्यय/हार: +प्रत्यय. +होना, रखना, खेवना +होनहार, रखनहार, खेवनहार + +गूगल: +मुख्यतः एक प्रकार का खोज प्रणाली है। यह जालस्थल कई अन्य जालस्थल की जानकारी लेकर उनमें से खोज की जानकारी को परिणाम में दर्शाता है। + +गूगल मेल: +गूगल मेल. +यह कुछ कुछ गूगल के जीमेल से मिलता है। लेकिन इसमें यह लोगों को जीमेल जैसी सुविधा कुछ पैसों में प्रदान करता है। इसके लिए केवल पैसे देने के बाद वह आपको आपके ही जालस्थल के नाम पर मेल सुविधा देगा। लेकिन सभी जानकारी गूगल के पास ही होगी। आप को यदि कोई मेल देखना है या आपके किसी कर्मचारी को भी यदि कोई मेल देखना है तो उसे गूगल के मेल पते पर जाना होगा। उसके बाद खाता में जाकर आप यह जानकारी देख सकते हैं। इसमें अन्य ईमेल सुविधा से भिन्न यह लाभ होता है कि आप गूगल के स्मृति का उपयोग कर सकते हो। जबकि अन्य स्थान पर उतनी स्मृति के लिए आपको अधिक पैसे देने होते थे। + +गूगल जालशिक्षक: +गूगल जालशिक्षक. +यह गूगल का मुख्य उत्पाद में से एक है। इसके द्वारा गूगल आपको ऐसे जालस्थल को बनाने कहता है जिसे केवल गूगल ही अच्छा समझता है। इससे अन्य खोज प्रणाली के जालस्थल आपके जालस्थल के सामग्री को कम सोचते हैं और केवल गूगल से ही अधिक लोग आते हैं। चूंकि यह गूगल ने ही कहा होता है। इस कारण आपका जालस्थल गूगल में अधिक ऊपर दिखाई देता है। +लेकिन यह हमेशा ही जालस्थल को नहीं सुधारता है। इसे कई बार लोगों के आने की संख्या भी कम हुई। इसका कारण यह है कि गूगल कभी भी अपने परिणाम दिखाने के नियम में हेरफेर कर देता है। इससे अधिक दिखने वाला लेख भी बहुत पीछे हो जाता है और अन्य किसी का लेख बहुत आगे दिखने लगता है। +इसका उपयोग गूगल विज्ञापन को सही तरह से दिखाने के लिए भी करता है। यदि आप गूगल के अलावा कोई अन्य विज्ञापन दिखाते हो तो वह आपके विज्ञापन को विषाणु भी कह सकता है। इससे आपके जालस्थल का परिणाम नीचे हो जाएगा। + +गूगल छवि: +गूगल छवि. +गूगल का खोज प्रणाली एक ही साथ कई छवि को भी खोजता है। यह जिस जालस्थल में जाता है, वहाँ के सभी चित्र को ले लेता है। और खोज के दौरान उसका एक बहुत ही कम आकार का हिस्सा दिखा देता है। इससे उसके स्मृति पटल पर अधिक भार भी नहीं पड़ता है और न ही खोजने वाले के डाटा का अधिक उपयोग होता है। + +गूगल अनुप्रयोग: +गूगल अनुप्रयोग. +गूगल कई प्रकार के अनुप्रयोग बनाती है। इसमें मुख्यतः गूगल अनुप्रयोग नाम उसके एक सेवा का है, जिसमें वह कई प्रकार के सेवा को एक साथ जोड़ दिया है। इसमें मेल, कार्यालय का खाता, कागजात आदि को सहेजने आदि के लिए अनुप्रयोग बनाया गया है। +उद्देश्य. +इसका प्रमुख उद्देश्य यह है कि अनेक कार्यालय किसी भी सेवा के लिए पैसे खर्च कर सकते हैं और वह कई लंबे समय तक ऐसा कर सकते हैं। इसका लाभ गूगल को मिल सकता है। जिससे यदि सभी कंपनी और सरकारी कार्यालय इस तरह एक अनुप्रयोग का उपयोग करते हैं तो गूगल आसानी से उनके निजी और कंपनी के आदि जानकारी का उपयोग कर अपने विरोधी कंपनी को अपने मार्ग से हटा सकता है। इसके साथ ही उसे बाजार में होने वाले परिवर्तन के बारे में भी पहले से पता चल जाएगा। +गूगल हमेशा अपने जानकारी चुराने के गुण के कारण चर्चा में रहता है और इसी के कारण डकडकगो जैसे खोज जालस्थल का निर्माण हुआ और हर वह प्रयोक्ता जो अपनी निजी जानकारी गूगल को नहीं देना चाहता, वह इस प्रकार कि जालस्थल पर जाकर उसका उपयोग करता है। + +गूगल क्रोम: +गूगल क्रोम. +एक प्रकार का जाल विचरक है। इसके द्वारा गूगल ने अपने जालस्थल के कई प्रकार भी विकसित किए हैं। +गूगल को लाभ. +कुल मिलाकर आप यदि क्रोम का उपयोग करते हो तो आप गूगल के जालस्थल पर हर दिन आते ही रहेंगे। चाहे आप चाहो या न चाहो। +प्रचार. +गूगल अपने हर सेवा में अपने अन्य सेवा का प्रचार करता है और कई ऐसे मुक्त सेवा भी प्रदान करता है ताकि आप उसका उपयोग कर केवल गूगल पर ही रहें। इसका उद्देश्य हमेशा यही होता है कि हर प्रयोक्ता हमेशा इंटरनेट पर गूगल या उसकी सेवा प्रदान करने वाले जालस्थल पर ही रहे। उसका ही ब्राउज़र उसका ही संचालन प्रणाली का उपयोग करे। अपने जालस्थल में केवल गूगल का ही उपयोग कर पूरा जालस्थल बनाए और उसका विज्ञापन भी गूगल से हो। + +गूगल पुस्तक: +गूगल पुस्तक गूगल का पुस्तक खोजने का एक औज़ार है। यह साथ ही अनेक पुस्तकालय के पुस्तक की जानकारी और उसके पाठ्य का अक्षरों के रूप में संचित रखती है। जिससे कोई भी इसके पाठ्य को गूगल खोज के माध्यम से आसानी से खोज सके। इसके अलावा यह उसे ईपुस्तक के रूप में कम्प्युटर में डालने की विशेषता भी देती है। लेकिन यह सुविधा कुछ ही पुस्तकों के लिए होता है। +इसमें कोई भी अपने भाषा में लिखी पुस्तक को भी आसानी से डाल सकता है। इसके लिए वह निःशुल्क या शुल्क दोनों रख सकता है। + +गूगल विज्ञापन: +गूगल विज्ञापन गूगल के पैसे कमाने का मुख्य साधन है। इसका उपयोग वह अपने लगभग सभी सुविधाओं में करता है। वह सभी सुविधा जो वह लोगों को निःशुल्क प्रदान करता है। इसके द्वारा विज्ञापनदाता उसके जालस्थल पर आकार कुछ पैसे देकर अपना विज्ञापन दिखाते हैं। इससे कोई भी गूगल का प्रयोक्ता उसे देखकर उसमें चले जाता है और गूगल को पैसे मिल जाते हैं। +कुछ लोग जो पैसे स्वयं कमाना चाहते हैं, उनके लिए गूगल ने विज्ञापन की सुविधा दी है। जिसमें कोई भी अपने जालस्थल में विज्ञापन दिखाता है। गूगल के कमाई से उसे 69% पैसे मिल जाते हैं। इससे गूगल को बिना कुछ कार्य के 31% पैसे मिल जाते हैं। इसका उपयोग वह कुछ भाग अपने कर्मचारी को देने के लिए और कुछ निःशुल्क सेवाएँ प्रदान करने के लिए करता है। बाकी बचे रकम का उपयोग अपने लाभ हेतु या अन्य परियोजना में करता है। + +गूगल अनुवादक: +गूगल अनुवादक एक प्रकार का गूगल का निःशुल्क प्रदान किया जाने वाला उपकरण है। इसका उपयोग गूगल अपने अन्य परियोजनाओं के विज्ञापन हेतु करता है। जब आप किसी अन्य ब्राउज़र (जाल विचरक) से इसके अनुवादक का उपयोग करेंगे तो आप को यह गूगल क्रोम नामक अपना ही ब्राउज़र को अपने कम्प्युटर पर डालने हेतु कहता है। यदि आप इसे स्थापित करते हैं तो लगभग सभी गूगल की परियोजना जैसे गूगल खोज, गूगल सिंक, गूगल मुख्य पृष्ठ, गूगल अनुवादक, गूगल खाते और अन्य कई प्रकार के गूगल से जुड़े परियोजना स्वतः ही आपके लिए आ जाएँगे। इसके बिना आप इस अनुप्रयोग का उपयोग नहीं कर सकते हैं। +परेशानी. +यह ठीक ठीक रूप से अनुवाद नहीं करता है। कई शब्द जैसे के तैसे ही डाल देता है। इसके अलावा इसमें कोई व्याकरण संबंधी जानकारी अंग्रेज़ी के अलावा अन्य भाषाओं के लिए उपलब्ध नहीं है। अर्थात यदि आप इसका उपयोग करते है तो आपको अंग्रेज़ी का ज्ञान होना चाहिए या आप अर्थ का कोई और अर्थ मान लेंगे। +यह बहुत हद तक गलत शब्द को दिखाता है। जिसमें शब्द के मात्राओं में कई गलती होने की संभावना होती है। + +गूगल प्लस: +गूगल प्लस. +यह गूगल का एक सामाजिक जालस्थल है। जिससे कोई भी एक दूसरे से बातचीत कर सकता है। यह मुख्यतः अपने बहुत बड़े आकार के कारण तेज गति वाले इंटरनेट उपयोग करने वालों की पसंद है। यह इसकी प्रचार हेतु अपने अन्य सेवा में गूगल के इस सेवा का अत्यधिक विज्ञापन और प्रचार करता है। + +गूगल रुझान: +गूगल रुझान. +गूगल का वर्तमान और पिछले हुए खोज की सूची द्वारा अधिक खोजे गए सामग्री के बारे में बताता है। इससे लोगों द्वारा क्या खोजा जा रहा है। उसकी जानकारी मिलती है। यह मुख्यतः अंग्रेज़ी भाषा के लिए उपलब्ध है। लेकिन हिन्दी के कई शब्दों के लिए यह परिणाम दिखाता है। पर इसकी अधिक खोजे गए परिणाम को नहीं दिखाता है। +इससे गूगल का मुख्य उद्देश्य लोगों को गूगल में खोजने हेतु आकर्षित करना ही है। जिससे अधिक लोग गूगल के खोज का उपयोग करें। यह इसके साथ ही ऐसे लोगों को देखता है जो अधिक खोजने वाली जानकारी का उपयोग करना चाहते हैं। इसके द्वारा वह लोग ऐसे परिणाम देखते हैं और उस परिणाम के अनुसार अपने कार्य करते हैं। लेकिन इस के साथ ही वे लोग गूगल के सेवा से भी जुड़ जाते हैं और गूगल को नई प्रयोक्ता भी मिलते रहते हैं। +यह पूर्ण रूप से निःशुल्क सेवा है, क्योंकि गूगल को इसके द्वारा नए प्रयोक्ता मिलते ही रहते हैं साथ ही जो पुराने प्रयोक्ता हैं, वह भी इस जानकारी को प्राप्त करने हेतु आ जाते हैं। + +गूगल वीडियो: +गूगल वीडियो. +गूगल का मुख्य वीडियो खोज प्रणाली में यूट्यूब है। लेकिन इस खोज माध्यम के द्वारा वह अन्य सभी जालस्थल के वीडियो को तो दिखाता है, लेकिन अपने यूट्यूब के वीडियो को भी उसमें दिखाता है। चूंकि यूट्यूब का पूरा अधिकार गूगल के पास ही है तो वह जितना हो सके गूगल के वीडियो खोज में यूट्यूब के ही वीडियो का मुख्य रूप से परिणाम दिखाता है। जिससे कोई भी गूगल से गूगल के ही सेवा में रहे। +यह एक ही ऐसा सेवा नहीं है, जिसमें गूगल लोगों को केवल अपने ही जालस्थल में रखने हेतु कार्य करता है। इसके अलावा ब्लॉग हेतु भी गूगल ने ऐसा ही कार्य कर दिया है। ब्लॉग में कोई भी खोजे तो उसे ब्लॉग्स्पॉट का ही नाम दिखाई देगा क्योंकि गूगल उसमें कोई विज्ञापन शुरू में नहीं दिखाता है। लेकिन अपने सारे सेवा को उसमें दिखाता है। जिससे उसका निःशुल्क विज्ञापन हो सके। जैसे उसका गूगल प्लस सेवा भी उसमें रहता है। इसके अलावा वह गूगल का अनुवादक, समाचार, खोज आदि कई प्रकार के उपकरण भी रखे हैं। जिससे कोई भी इसके ब्लॉग पर आने पर केवल गूगल पर ही जाए। +लेकिन गूगल के वीडियो में अन्य वीडियो के कड़ी भी दिखाई देते हैं। इस कारण यह गूगल के लिए सरल नहीं होता है की वह सभी वीडियो को यूट्यूब पर ही रखे। इस कारण वह यूट्यूब को भी निःशुल्क रखता है। और अपने कई जानकारी को यूट्यूब पर डालकर वह लोगों को यह बताता है की यह एक व्यावसायिक तरीका है। जिससे कोई भी व्यापारी अपने जानकारी को इसके माध्यम से बहुत लोगों तक पहुंचा सकता है। + +गूगल टंकण औज़ार: +गूगल टंकण औज़ार. +इसे पहले पहले सभी जालस्थल के लिए भी गूगल ने प्रदान किया था। लेकिन 2012 से पहले ही इसे हटा दिया। यह एक प्रकार का ऐसा औज़ार था। जिससे हिन्दी में या अन्य भाषाओं में लिखने में आसानी होती थी। लेकिन इसके पीछे एक नकारात्मक कारण भी है। +परेशानी. +रोमन लिपि में लिखकर उसे देवनागरी लिपि में अनुवादित करने वाला औजार - +मूल कुंजी पटल को दिखाने वाला अन्य जालस्थल में उपयोग किया जाने वाला औजार - + +गूगल मानचित्र: +गूगल मानचित्र. +गूगल की किसी भी मानचित्र या नक्से को दिखाने की एक सेवा है। इसमें अपने मानचित्र को सबसे बेहतर दिखाने हेतु गूगल ने अपने कई कर्मचारी को कई जगह के छवि लेने हेतु भेजा है और भेजता रहा है। इससे लोगों को लगता है की इसमें बहुत से जगह की अच्छी गुणवत्ता के साथ छवि होगी। लेकिन इसमें अपने ही जगह को खोजने हेतु काफी मेहनत करनी पड़ती है। इसके साथ ही यदि आप ऐसे किसी दुकान या कार्यालय को खोज रहे हो जो अधिक प्रसिद्ध नहीं है तो वह शायद ही आपको कभी इसमें मिलेगा। +बुराई. +यह मुख्य रूप से सही चित्र नहीं दिखाता है। इसके अलावा इसके चित्र की गुणवत्ता भी काफी कम होती है। इसके उपयोग के साथ ही इसमें कई बुराई भी है। + +गूगल व्यवसाय: +गूगल व्यवसाय. +यह सेवा गूगल के द्वारा दी जाती है, जिसमें ऐसा लगता है की गूगल सभी को व्यवसाय से जुड़ी सेवा दे रहा है। लेकिन इसके साथ ही गूगल अपने अन्य परियोजना में भी इसका भरपूर रूप से उपयोग करता है। +जानकारी का उपयोग. +आपके द्वारा आपके व्यवसाय से जुड़ी जानकारी का उपयोग गूगल कई तरह के कार्यों में करता है। जैसे नई सेवा शुरू करने, अपनी सेवा में आपकी जानकारी का उपयोग करने आदि। +व्यवसाय से जुड़ी जानकारी जैसे नाम पता आदि को यह गूगल खोज, गूगल प्लस आदि सेवा में मुख्य रूप से उपयोग करता है। +यह आपके व्यवसाय के स्थल की जानकारी अपने मानचित्र में रख देता है। जिससे कोई भी आपके व्यवसाय तक पहुँच सके। लेकिन इसका मुख्य लाभ गूगल को होता है जो आपके द्वारा किए गए कार्यों के कारण ही पैसे कमा लेता है और लोगों को लगता है की इसमें बहुत अधिक जानकारी होती है। +गूगल को लाभ. +गूगल आपके द्वारा दी जाने वाली सभी जानकारी को अपने पास रखता है और उसका व्यावसायिक रूप से भी उपयोग करता है। किसी भी कंपनी के पास जितनी अधिक आपके और आपकी कंपनी की जानकारी होगी, वह कंपनी उतनी अच्छी तरह से आपके व्यवसाय को समझ सकेगी और उसके अनुरूप बाद में अपनी कोई सेवा शुरू कर देगी। इसके कई उदाहरण भी हैं, जिसमें गूगल ने बाजार के और उसके मांग को देख कर अपनी कोई नई सेवा को शुरू किया। +गूगल इस जानकारी का उपयोग गूगल प्लस पर करता है। यदि आपने गूगल प्लस का खाता बनाया है तो वह आपको इसे हमेशा ताजा रखने कहता है। जीतने लोग गूगल के इस सेवा का उपयोग करेंगे। उतने ही लोग उससे और जुड़ेंगे भी। उदाहरण के लिए यदि आपने उसकी इस सेवा को ले लिया और किसी ने आपको इस तरह के किसी जालस्थल पर संदेश देने हेतु कहा तो आप उसे गूगल प्लस के उपयोग हेतु कहेंगे। इससे गूगल का विज्ञापन भी हो जाता है। साथ ही यदि आपके पास कोई आपकी कंपनी के जालस्थल है, तो आप संपर्क हेतु भी गूगल प्लस के पते का उपयोग करोगे। इससे भी गूगल को लाभ मिलता है। क्योंकि कोई भी आपके जालस्थल पर जाएगा तो उसे आपके कंपनी से वार्ता करनी होगी तो वह सीधे गूगल के प्लस सेवा में खाता खोल कर आप से बात करेगा और बात करने के बाद भी वह उस सेवा में बने रहेगा जब तक की उसे वह बेकार न लगे। इसी तरह गूगल के पास नए नए प्रयोगकर्ता आते रहेंगे। +केवल इतना ही इसके लाभ का कारण नहीं है। यदि आप इसके किसी सेवा का बहुत उपयोग करते हो तो आप इसके आदी हो जाते हो। उदाहरण के लिए आपके सभी मित्र और ग्राहक इसमें हैं और आप इतने लोगों को खोना नहीं चाहते और न ही आप उन लोगों को किसी और माध्यम से संपर्क कर सकते हो। इस स्थिति में गूगल आपको अपनी सेवा हेतु पैसे मांगता है। लेकिन यह केवल तभी करता है जब आप 1 जीबी से अधिक गूगल के स्मृति का उपयोग कर लेते हो। लेकिन किसी किसी सेवा के लिए गूगल 2 या अधिक जीबी भी रखता है। लेकिन इतनी अधिक स्मृति को पुनः अपने पास रखना कठिन हैं और यदि आप ऐसा कर भी लेते हैं तो आपके मित्र और ग्राहक तो दूर हो ही जाते हैं। और आपने जो गूगल पर मेहनत भी की होगी वह भी पानी में चले जाता है। आप उन ग्राहकों के लिए कोई छवि भी नहीं डाल पाएंगे क्योंकि स्मृति की सीमा पूर्ण हो चुकी होगी। इसके बाद आपके पास केवल एक ही रास्ता बचता है। गूगल को पैसे देने का। +इसके बाद आप कुछ समय और गूगल की सेवा का उपयोग कर सकते हो। इसमें वह आपको 16 जीबी या 1 टीबी (टेराबाइट) देता है। यह सभी मासिक किस्त में ही मिलेगी। अर्थात यदि आप इस में फंस गए तो उसके बाद आपको उस स्मृति का तो उपयोग करना ही है। लेकिन यदि आपने उस स्मृति का उपयोग कर लिया तो उसके बाद आपको हर महीने उसके लिए पैसे देने होंगे। यदि आपने पैसे दिये तो आपको अगले महीने तक उपयोग करने की स्वीकृति मिल जाएगी। यदि आप ने ऐसा किसी महीने नहीं किया तो आपको कुछ समय के लिए स्मृति तो गूगल रख लेगा लेकिन आप कोई भी और छवि या वीडियो नहीं डाल पाएंगे। साथ ही यदि आपने इसमें देरी की तो वह सभी सामग्री हटा दी जाएगी। +कुल मिलाकर यदि आप गूगल की किसी भी सेवा में एक पैसे भी भर रहे हो तो इस पर जानकारी लेना आवश्यक है की आप उस पैसे को कितने बार दे रहे हो और क्या आपके लिए यह आवश्यक है। यह भी देखना अत्यधिक आवश्यक है की पैसे देने का अर्थ है की आप उसमें धीरे धीरे और पैसे देने लगेंगे। इसके बाद यह सिलसिला कभी समाप्त नहीं होगा। + +वैज्ञानिक विधि: +वैज्ञानिक विधि + +वैज्ञानिक विधि/प्रस्तावना: +वैज्ञानिक विधि. +यह वैज्ञानिक विधि नामक इस विकिपुस्तक में आपका स्वागत है। यह एक विकिपुस्तक है, जिसे कोई भी प्रयोक्ता संपादित कर सकता है। इस पुस्तक का अधिकार जीएफ़डीएल के तहत प्रदान किया गया है। +यह किसके लिए है. +कोई भी व्यक्ति जिसे वैज्ञानिक विधि में कोई दिलचस्पी है। उसके लिए यह पुस्तक बना है। जिसमें सामान्य रूप से कुछ वैज्ञानिक विधि और उसके इतिहास से जुड़े कुछ तथ्यों के बारे में लिखा हुआ है। +इसे किस तरह से संकलित किया गया है।. +इसे मूल रूप से तीन अनुभाग में तैयार किया गया है। जिसमें पहले अनुभाग में इतिहास और उससे जुड़े कुछ जानकारी है और दूसरे अनुभाग में सामान्य प्रश्नो से जुड़े कुछ तथ्य और जानकारी है। वहीं तीसरे अनुभाग में कुछ प्रयोग आदि की जानकारी है। + +वैज्ञानिक विधि/विज्ञान का परिचय: +विज्ञान. +वर्तमान में विज्ञान की इतनी शाखाएँ हैं, कि कोई भी सभी के बारे में एक बार में नहीं कह सकता है। यह दिन प्रतिदिन और बढ़ती जा रही है। इसी तरह वैज्ञानिक विधि में भी परिवर्तन होता रहता है। जैसे यदि आप जिस वैज्ञानिक विधि का उपयोग पहले खाना बनाने के लिए करते थे। उसके जगह आप पहले से बने कई प्रकार के उपकरण से खाना बनाते हो। इस प्रकार वैज्ञानिक विधि में परिवर्तन होता रहता है। +विधि का स्तर. +पहले स्तर में हम केवल उसकी प्रकृति के बारे में जानकारी एकत्रित करते हैं। उसे अच्छी तरह से समझते हैं। उसकी कई समय तक परखने के पश्चात उसमें होने वाले परिवर्तन को भी देखते हैं। +दूसरा स्तर प्रयोग हेतु विधि बनाने का होता है। जिसमें यह तय करना होता है कि किस तरह से विधि पहले ही प्रयास में कार्य कर जाएगी। इससे कई बार प्रयोग विफल होने का कारण पहले ही पता चल जाता है। जिससे पैसे व्यर्थ में नहीं जाते हैं। लेकिन इसके बाद भी कई बार कई प्रकार के चूक और हादसे हो चुके हैं। +तीसरा चरण होता है, विधि का उपयोग करना। इसमें तब तक उसका उपयोग करते हैं, जब तक कि उसे बनाने या करने का सही विधि ज्ञात न हो जाये। जैसे कि खाना बनाने के लिए हमें कितना समय लगता है। इसके लिए कितना चावल और कितना पानी का आवश्यकता पड़ा था। अलग अलग जानकारी को मिला कर तीसरा विधि सम्पन्न होता है। इसके बाद यदि कोई गड़बड़ी नहीं हुई तो इसे वैज्ञानिक विधि घोषित कर दिया जाता है। + +प्राथमिक चिकित्सा/प्रस्तावना: +चिकित्सा अस्वीकरण. +इस पुस्तक में दी गई जानकारी में किसी भी प्रकार का त्रुटि हो सकता है। इसके आधे या पूरे पुस्तक को ऐसे लोगों द्वारा लिखा गया है, जो इस कार्य में नहीं हैं। अतः इसमें किसी भी प्रकार से किसी भी सामग्री या उपचार के सही या गलत होने की किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं है। हो सकता है कि इसमें दी गई जानकारी सही हो, लेकिन हो सकता है कि यह आपके चोट या बीमारी में कारगर सिद्ध न हो। +इस विकि पुस्तक में दी गई जानकारी की गुणवत्ता को अच्छी तरह से बढ़ाने का प्रयास किया गया। जिससे यह सभी के समझ में भी आ सके। इसे किसी भी प्रकार से चिकित्सकीय परामर्श न समझें। विकि पुस्तक कोई चिकित्सक नहीं है। +विकि पुस्तक या उसकी कोई भी परियोजना या मीडियाविकि संस्थान किसी भी प्रकार से कोई चिकित्सा से जुड़े परामर्श नहीं देती है। + +योग: +"जीवन जीने की सँयमी पद्धति ही 'योग' है!" —योगी कुमार प्रदीप. +"योग" +भारत के छै:प्रमुख दर्शनों में से एक दर्शन है| इसका प्राचीनतम नाम राजयोग है| योग, परमर्षि कपिल मुनि रचित 'साँख्य दर्शन' का ही एक सरल व क्रियात्मक स्वरूप है| यह दर्शन विश्व के सभी धर्म, जाति-प्रजाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, मत-मतान्तर व ऊँच-नीच आदि के भेद-भाव से रहित है| यह सभी लिंग व आयु वर्ग के बच्चों, किशोर, युवाओं, अधेड़ व बृद्ध मनुष्यों का, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्ग दर्शन करने की क्षमता रखता है| अाध्यात्मिकता में रूची रखने वालों के लिए, 'आत्मा को परमात्मा से मिलाने का एक साधन है' तो भौतिकता को अपनाने वालों के लिए, 'मानवीय चैतन्य ऊर्जा को विश्व चैतन्य ऊर्जा से जोड़ने का साधन है| कुछ लोग इसे स्थूलता से सूक्षमता की ओर जाने का तरीका मानते हैं| मूलत: योग के दो आधार या दो पैर हैं- 1.अभ्यास, 2. ग्यानपूर्ण आचरण| इस पद्धति पर चलकर, निजी, सामाजिक, आध्यात्मिक व प्राकृतिक दुनियाँ के मानसिक, शारीरिक, सार्वजनिक स्वास्थ्य को मूलभूत रूप से श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। इसके अभ्यास से, लगभग सभी तरह की बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है| कालान्तर में, अभ्यासियों की योग्यता, क्षमता, रूचि व देश-काल-परिस्थितियों के अनुरूप, योग की अनेक शाखायें(पद्धतियाँ) +विकसित हो गयीं जैसे- राजयोग, अष्टाँग योग, हठ योग, सँयम योग, कर्म योग, ग्यान योग, सहज योग, सहज राज योग, भक्ति योग, उपासना योग, तन्त्र योग, आदि| सभी शाखाओं का उद्देश्य या तो परमात्मा, ईश्वर, भगवान, अल्लाह, खुदा, प्रभु, GOD आदि नामों से जाने-पहचाने जाने वाली उस, अग्यात शक्ति को जानकर, उससे सम्बन्ध बनवाना है या अपने-अपने मानसिक-शारीरिक-सामाजिक स्वास्थ को ठीक करके, निरोगी काया व निरोगी समाज का निर्माण करना है| +योग की सभी पद्धतियाँ, पुरूषार्थि/अभ्यासियों से, सामान्यत: कुछ विशेष आचरण की अपेक्षा रखती हैं, जैसे– +1. स्वयँ से व स्वयँ में सच्चाई व सफाई| 2. प्रकृति एवं जीव जगत प्रति +3. श्रेष्ठ मानवीय गुणों की धारणा| +4. निरन्तर परमात्मा/खुदा/GOD की याद में + +योग/योग कैसे करें?: +योग क्या है? यह समझ लेने पर, योग कैसे करैं? यह समझना आसान हो जाता है! +अधिकाँशत: वर्तमान में योग को, योगा कहकर, जीविकोपार्जन व कारोवारी तौर-तरीकों से धन अर्जित करने का व्यवसाय बनाया लिया गया है| योगा को आधुनिक बनाने के लिए, इसमें ध्वनि, प्रकाश व व्यायाम यन्त्रों आदि साधनों को शामिल किया गया है| जिससे इसने काफी रोचक व आकर्षक स्वरूप ले लिया है तो दूसरी ओर योग व योग करने के तरीकों को लेकर, जनसामान्य में अनेक भ्राँतियाँ भी पनप गयीं हैं| +पुनश्चय: योग के अभ्यासियों हेतु अतिआवश्यक है कि वह किसी अनुभवी शिक्षक के निर्देशन में योग सीखना प्रारम्भ करैं! +तैयारियाँ– +अ. जीवन शैली– +१. देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप व अनुकूल, खान-पान, रहन-सहन की नियमित दिनचर्या, २. प्रकृति से निकटतम सम्पर्क-सम्बन्ध ३. स्वयँ,परिवार,समाज के लोगों,देश-राष्ट्र,विश्व व प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी व जबावदेहीपूर्ण सम्पर्क-सम्बंधों का निर्वहन| +व. शारीरिक व्यायाम/आसन/प्राणायाम/ध्यान– +१. सुवह/शाम किसी भी समय शरीर की प्रत्येक कोशिका को सक्रिय करने हेतु कर्मेन्द्रियों का व्यायाम| २. रीड़ की हड्डी में लोच के लिए व्यायाम व अासन| ३. स्वसनतन्त्र सुदृढ करने के लिए आसन व प्राणायाम ४. पाचनतन्त्र की मजबूती हेतु, ५. मलतन्त्र हेतु व्यायाम, आसन, मुद्रा, व प्राणायाम, ६. मन-बुद्धि की शुद्धि व संस्कार परिवर्तन हेतु सूक्ष्म योग– मौन,ध्यान व चिन्तन-मनन-मन्थन| +तरीका. +किसी भी योग को करने के लिए पहले एक अच्छे वातावरण का होना आवश्यक है। जहाँ किसी भी प्रकार का शोर न होता हो। यह मुख्य रूप से सुबह करने से उपयुक्त होती है। + +योग/सामान्य योग: +सामान्य योग. +सामान्य योग उसे कहते हैं, जिसे कोई भी किसी भी समय कर सकता है। लेकिन किसी भी योग को करने से उसका लाभ उसी समय से दिखना शुरू हो जाता है, लेकिन अच्छी तरह से जब तक उसका अभ्यास न किया जाये तब तक उसका लाभ नहीं मिल पाता है। सामान्य या दैनिक रूप से किसी के भी द्वारा किए जा सकने वाले योग से कोई भी प्रतिदिन योग कर सकता है। कुछ योग को करने हेतु स्वास्थ्य ठीक होना आवश्यक होता है और किसी भी योग को धीरे धीरे ही और करना चाहिए। जिससे शरीर उसके अनुरूप कार्य करने लगे। + +योग/योग क्या है?: +योग क्या है? +अपने शरीर और आत्मा को एक साथ करना और उसकी शक्ति का योग ही योग कहलाता है। इसमें शरीर और मन दोनों को स्वस्थ करने हेतु अभ्यास किया जाता है। + +योग/ध्यान लगाना: +ध्यान लगाना. +ध्यान लगाना योग का सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। यदि आपने ध्यान नहीं लगाया तो योग करना या न करना दोनों एक ही बराबर है। यह मुख्य रूप से मन से जुड़े योग में कार्य करता है। जब भी आप अपने मन को ताजा और अच्छे से कार्य करने हेतु तैयार करना चाहते हो। तब ध्यान लगाया जाता है। इस क्रिया में यदि वातावरण शांत और साफ सुधरा हो तो इससे अधिक लाभ होता है। + +पायथन 3 के लिए गैर-प्रोग्रामर जानकारी: +पायथन 3 के लिए गैर-प्रोग्रामर जानकारी + +पायथन 3 के लिए गैर-प्रोग्रामर जानकारी/प्रस्तावना: +पायथन एक प्रकार की कार्यक्रम निर्माण करने वाली भाषा है। अर्थात जब आप इस भाषा में कुछ लिखते हो तो आप एक प्रकार के कार्यक्रम का निर्माण कर रहे हो। यह किसी उत्सव हेतु कुछ कार्यक्रम रखने हेतु तैयारी करने जैसा ही है। जिसमें जब आप एक दो बार कार्यक्रम की तैयारी करने लगोगे तो धीरे धीरे आप इसे और अच्छी तरह से सीखने लगोगे उसके बाद त्रुटि होना भी कम हो जाएगा। +किसी भी भाषा हो या कोई कार्यक्रम सभी में पहली या कुछ और बार त्रुटि होती ही है। कई बार कुछ समझ में भी नहीं आता है। इस कारण लोग इसे छोड़ कुछ और करने के पीछे पड़ जाते हैं। लेकिन यदि आप शुरू से किसी कार्य को करते हो तो वह बहुत आसानी से आ जाती है। जैसे की हम अपनी हिन्दी भाषा को आसानी से समझ सकते हैं और लिख भी सकते हैं। उसी प्रकार कोई भी इस कार्यक्रम निर्माण की भाषा को भी समझ कर लिख सकता है। लेकिन यदि आपको इसमें और अच्छा बनना है तो आपको और मेहनत करनी होगी। लेकिन इसकी शुरुआती ज्ञान बहुत ही सरल है, जिसे कोई भी सीख सकता है। इस पुस्तक में भी इस तरह से ही सरल उदाहरण द्वारा यह दिखाया गया है। +उदाहरण. +इसमें सबसे सरल कार्य को पहले दिखाया गया है। किसी भी कार्यक्रम निर्माण की भाषा में कुछ शब्द को दिखाना सबसे सरल होता है। यह इस भाषा में भी सरल ही है। आप नीचे इसे देख सकते हैं। इस तरह से आप कुछ भी शब्द लिख सकते हो। +यही शब्द नीचे दिये गए पाठ्य की तरह प्रदर्शित होगा। +स्थापना. +यदि आपके पास यह स्थापित नहीं है तो आप इसे http://www.python.org/download से डाउनलोड कर अपने कम्प्यूटर पर स्थापित कर सकते हो। + +पायथन 3 के लिए गैर-प्रोग्रामर जानकारी/नमस्ते दुनिया: +इस पृष्ठ को पढ़ने के बाद आपको पता चलेगा कि इस पायथन का निर्माण कैसे करना है और उसे संपादित और सहेजना कैसे है। +दिखाना. +यदि आपको कोई लेख या शब्द दिखाना है तो आप यह लिख सकते हैं। +लिखने के बाद उसे किसी भी संपादक औज़ार से codice_1 नाम से सहेजें और codice_2 से चलाएँ। जब आप इसे चलाएँगे तो आप नीचे दिये गए परिणाम प्राप्त करेंगे। +लेकिन यदि आप एक से अधिक वाक्य को एक से अधिक पंक्ति में लिखना चाहते हैं तो वह भी सरल है। नीचे दिये गए उदाहरण से आप समझ सकते हो। किस प्रकार हम एक से अधिक पंक्ति में यह दिखा सकते हैं। वह भी पहले वाले उदाहरण को ही समझ कर। +अब इसे जब आप देखने के लिए चलाओगे तो आप को नीचे दिये गए पाठ्य जैसे ही परिणाम मिलेंगे। +जब कम्प्यूटर आपकी यह भाषा को पढ़ता है तो वह पहले पहली पंक्ति से शुरू करता है। जैसे हम और आप बात करते हैं। या आप इस भाषा को पढ़ रहे हैं। +इसके बाद आपके आदेशानुसार यह कम्प्यूटर दिखा देता है। +उसके बाद कम्प्यूटर आपके द्वारा लिखे गए दूसरे आदेश को पढ़ता है। +अब पहले कि तरह इस आदेश को भी दिखा देता है। +यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक आपके द्वारा दिये गए आदेश या एक तरह से आपके द्वारा बनाए गए कार्यक्रम की समाप्ति नहीं हो जाती है। + +शिक्षा का अधिकार: +बच्चों को किसी भी देश के सर्वोच्च संपत्ति हैं। वे संभावित मानव संसाधन है किहै करने के लिए दृढ़ता से जानकार और देश की प्रगति सक्षम पुण्य किए जाने हैं। शिक्षा एक आदमी के जीवन में ट्रान्सेंडैंटल महत्व का है। आज, शिक्षा, संदेहके एक कण के बिना, एक है कि एक आदमी के आकार है। RTE अधिनियमविभिन्न विशेषताओं के साथ जा रहा है, एक अनिवार्य प्रकृति में है, इसलिएसच के रूप में, लंबे समय लगा और सभी के लिए शिक्षा प्रदान करने कीआवश्यकता सपना लाने के लिए में आ गया है। भारत 66 प्रतिशतक के एकगरीब साक्षरता दर, के रूप में अपनी रिपोर्ट 2007 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन द्वारा दी गई और जैसा कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट, 2009 में शामिल के साथ विश्व साक्षरता रैंकिंग में149, स्थान है। +वास्तव में, शिक्षा जो एक संवैधानिक अधिकार था शुरू में अब एक मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त है। अधिकार की शिक्षा के लिए विकास इस तरह हुआ है: भारत के संविधान की शुरुआत में, शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 41 के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता दी गई थी जिसके अनुसार, +"राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करते हैं, सही हासिल करने के लिए प्रभावी व्यवस्था करने और नाहक के अन्य मामलों में चाहते हैं ". +मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का आश्वासन राज्य के नीति निर्देशक अनुच्छेद 45, जो इस प्रकार चलाता है के तहत, सिद्धांतों के तहत फिर से किया गया था, "राज्य के लिए प्रदान करने का प्रयास, दस साल की अवधि के भीतर होगा मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए इस संविधान के सभी बच्चों के लिए प्रारंभ से जब तक वे चौदह वर्ष की आयु पूर्ण करें." इसके अलावा, शिक्षा प्रदान करने के साथ 46 लेख भी संबंधित जातियों अनुसूची करने के लिए, जनजातियों और समाज के अन्य कमजोर वर्गों अनुसूची. तथ्य यह है कि शिक्षा का अधिकार 3 लेख में किया गया है साथ ही संविधान के भाग IV के तहत निपटा बताते हैं कि कैसे महत्वपूर्ण यह संविधान के निर्माताओं द्वारा माना गया है। 29 लेख और आलेख शिक्षा के अधिकार के साथ 30 समझौते और अब, हम अनुच्छेद 21A है, जो एक मजबूत तरीके से आश्वासन अब देता है। +2002 में, संविधान (अस्सी छठे संशोधन) अधिनियम शिक्षा के अधिकार के माध्यम से एक मौलिक अधिकार के रूप में पहचाना जाने लगा। लेख 21A इसलिए सम्मिलित होना जिसमें कहा गया है आया, "राज्य राज्य के रूप में इस तरीके से, विधि द्वारा, निर्धारित कर सकते में छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा। we should punish those teachers who just sitv in the classes not teaching the students यह अंततः उन्नी कृष्णन जेपी वी. राज्य आंध्र प्रदेश की कि शिक्षा को एक मौलिक अधिकार में लाया जा रहा में दिया निर्णय किया गया था। इस के बाद भी, यह शामिल संघर्ष की एक बहुत अनुच्छेद 21A के बारे में लाने के लिए और बाद में, शिक्षा का अधिकार अधिनियम. इसलिए, RTE अधिनियम के लिए एक कच्चा मसौदा विधेयक 2005 में प्रस्ताव किया गया। +बच्चों के अधिकार को नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम, लोकप्रिय शिक्षा का अधिकार अधिनियम के रूप में जाना अप्रैल, 2010 के 1 को प्रभाव में आया था। RTE अधिनियम के 4 अगस्त 2009 को भारत की संसद द्वारा 2 जुलाई 2009 और निधन पर कैबिनेट मंत्रालय द्वारा 20 वीं जुलाई, 2009 को राज्य सभा के अनुमोदन के बाद पारित किया गया था। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस विधेयक को मंजूरी दे दी है उसके और इस के राजपत्र में नि: शुल्क बच्चे के अधिकार पर और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के रूप में अधिसूचित किया गया सितम्बर, 2009 3. 1 अप्रैल 2010 पर, यह भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर, पूरा करने के लिए लागू के रूप में अस्तित्व में आया। +इस प्रकार, अंत में एक बहुत महत्वपूर्ण अधिकार महत्वपूर्ण एक सही है कि यह कैसे की स्थिति से वसूली के बाद आकार ले लिया। +नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक, २००९ भारतीय संसद द्वारा सन् २००९ में पारित शिक्षा सम्बन्धी एक विधेयक है। इस विधेयक के पास होने से बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार मिल गया है। +नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक, २००९ +1 मुख्य प्रावधान +2 कमियाँ एवं आलोचना +3 इन्हें भी देखें +4 बाहरी कड़ियाँ +मुख्य प्रावधान +6 से 14 साल के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी. +निजी स्कूलों को 6 से 14 साल तक के 25 प्रतिशत गरीब बच्चे मुफ्त पढ़ाने होंगे। इन बच्चों से फीस वसूलने पर दस गुना जुर्माना होगा। शर्त नहीं मानने पर मान्यता रद्द हो सकती है। मान्यता निरस्त होने पर स्कूल चलाया तो एक लाख और इसके बाद रोजाना 10 हजार जुर्माना लगाया जायेगा। +विकलांग बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा के लिए उम्र बढ़ाकर 18 साल रखी गई है। +बच्चों को मुफ़्त शिक्षा मुहैया कराना राज्य और केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी होगी। +इस विधेयक में दस अहम लक्ष्यों को पूरा करने की बात कही गई है। इसमें मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने, शिक्षा मुहैया कराने का दायित्व राज्य सरकार पर होने, स्कूल पाठ्यक्रम देश के संविधान की दिशानिर्देशों के अनुरूप और सामाजिक ज़िम्मेदारी पर केंद्रित होने और एडमिशन प्रक्रिया में लालफ़ीताशाही कम करना शामिल है। +प्रवेश के समय कई स्कूल केपिटेशन फ़ीस की मांग करते हैं और बच्चों और माता-पिता को इंटरव्यू की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है। एडमिशन की इस प्रक्रिया को बदलने का वादा भी इस विधेयक में किया गया है। बच्चों की स्क्रीनिंग और अभिभावकों की परीक्षा लेने पर 25 हजार का जुर्माना। दोहराने पर जुर्माना 50 हजार। +शिक्षक ट्यूशन नहीं पढ़ाएंगे। +कमियाँ एवं आलोचना +इस विधेयक की आलोचना में जो बातें कहीं जा रहीं हैंुनमें से कुछ इस प्रकार हैं- +मुफ्त और अनिवार्य से जरूरी है समान शिक्षा - अच्छा होता कि सरकार मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का बिल लाने पर जोर देने के बजाय कॉमन स्कूल का बिल लाने पर ध्यान केंद्रित करती। सरकार यह क्यों नहीं घोषणा करती कि देश का हर बच्चा एक ही तरह के स्कूल में जाएगा और पूरे देश में एक ही पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा। +मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के तहत सिर्फ 25 फीसदी सीटों पर ही समाज के कमजोर वर्ग के छात्रों को दाखिला मिलेगा। यानि शिक्षा के जरिये समाज में गैर-बराबरी पाटने का जो महान सपना देखा जाता वह अब भी पूरा नहीं होगा। +मुफ्त शिक्षा की बात महज धोखा है, क्योंकि इसके लिए बजट प्रावधान का जिक्र विधेयक में नहीं है। +विधेयक में छः साल तक के 17 करोड़ बच्चों की कोई बात नहीं कही गई है। संविधान में छः साल तक के बच्चों को संतुलित आहार, स्वास्थ्य और पूर्व प्राथमिक शिक्षा का जो अधिकार दिया गया है, वह इस विधेयक के जरिए छीन लिया गया है। +इस विधेयक में लिखा है कि किसी भी बच्चे को ऐसी कोई फीस नहीं देनी होगी, जो उसको आठ साल तक प्रारंभिक शिक्षा देने से रोक दे। इस घुमावदार भाषा का शिक्षा के विभिन्ना स्तरों मनमाने ढंग से उपयोग किया जाएगा। +इस कानून का क्रियान्वन कैसे होगा, यह स्पष्ट नहीं है। नि:शुल्क शिक्षा को फीस तक परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसमें शिक्षण सामग्री से लेकर सम्पूर्ण शिक्षा है या नहीं, यह देखना होगा। + +यौन स्वास्थ्य/बलात्कार: +बलात्कार एक प्रकार का अपराध है, जिसमें अपराधी बल पूर्वक किसी के साथ यौन संबंध बनाने कि कोशिश करता है। +बलात्कार क्या है? +बल पूर्वक किसी के साथ कोई कार्य करना बलात्कार कहलाता है। + +विंडोज से सामान्य अभिकलन: + +विंडोज से सामान्य अभिकलन/शुरुआत: +शुरुआत. +विंडोज से सामान्य अभिकलन अर्थात उसे स्थापित कर उसका उपयोग करना है। +कम्प्यूटर क्या है? +यह शब्द ग्रीक शब्द से बना है, जिसका अर्थ गणना करना होता है। इसे हिन्दी में अभिकलित्र कहते हैं। यह दो अलग अलग प्रकार के भागों से बना होता है। पहला एक कठोर भाग होता है, जो हमें खुली आँखों से दिखाई देता है। वहीं दूसरा भाग अदृश्य होता है। उसे हम केवल स्क्रीन की सहायता से देख सकते हैं। +प्रकार. +हार्डवेयर. +यह भाग कठोर होता है इस कारण इसे "हार्ड" कहते हैं और "वेयर" शब्द जोड़ देते हैं। इस भाग के द्वारा ही आप इसे कोई संदेश या कोई जानकारी दे सकते हो। यह आप कुंजीपटल और माउस के द्वारा कर सकते हो। +सॉफ्टवेयर. +यह सॉफ्ट नाम के कारण लोगों को मुलायम लगता है। लेकिन यह न तो मुलायम होता है और न ही कठोर। यह पूरी तरह से सीडी या कोई अन्य उपकरण में बन्द होता है। जिसे हम स्क्रीन के द्वारा ही देख सकते हैं। यह एक प्रकार का कार्यक्रम होता है जो एक अलग भाषा में कम्प्यूटर को निर्देश देता है। एक बार हम संचालन प्रणाली को इस में स्थापित कर देते हैं तो वह संचालन प्रणाली ही सारे जानकारी को स्क्रीन पर दिखाता है। इस में ही अनेक अनुप्रयोग होते हैं, जो अनेक कार्यों को करने देते हैं। उदाहरण के लिए आप कोई चित्र देख रहे हैं तो वह भी किसी अनुप्रयोग के कारण है। विंडोज में अनुप्रयोग (.exe) प्रारूप में मिलते हैं। + +विंडोज से सामान्य अभिकलन/संचालन प्रणाली और नियंत्रण: +सॉफ्टवेयर - एक प्रकार का कार्यक्रम होता है जो हार्डवेयर को किस तरह कार्य करना है। उसके निर्देश देता है। +अनुप्रयोग - यह बहुत छोटा कार्यक्रम भाषा से तैयार एक अनुप्रयोग होता है। यह केवल कुछ या थोड़ा सा कार्य करता है। इसमें मुख्य रूप से इंटरनेट (अंतरजाल) के द्वारा इस तरह के अनेक अनुप्रयोग लोग हर दिन अपने मोबाइल या कम्प्युटर में डालते रहते हैं। +'Interface अंतरफ़लक - एक प्रकार का चलने या रुका हुआ चित्र होता है। जिसे हम देख सकते हैं और माऊस या कुंजीपटल के द्वारा नियंत्रित कर सकते हैं। + +विंडोज से सामान्य अभिकलन/व्यवस्था: +व्यवस्था विंडोज में मूल रूप से control panel नियंत्रण स्थल में होती है। जहाँ आप अपने अनुसार किसी भी तरह का बदलाव कर व्यवस्थित रख सकते हो। + +जीमेल/मेल पढ़ना: +हमें कैसे पता चलेगा कि नया संदेश आया है? +इनबॉक्स में इनबॉक्स (1) लिखा होगा और यदि आप देखें तो पढ़ा हुआ मेल और नया मेल अलग अलग होता है। जिससे नए संदेशों को पहचाना जा सकता है। +पढ़ना. +यदि आप कोई मेल पढ़ना चाहते हैं तो आप कोई भी संदेश के शीर्षक में क्लिक करें। + +जीमेल/खोज: +गूगल के जीमेल में खोज का भी विकल्प है। आप ऊपर में मेल में खोजें जैसे विकल्प द्वारा कोई भी मेल को खोज सकते हैं। यदि आप जीमेल को हिन्दी में उपयोग कर रहे हैं तो आप को वह खोज हेतु एक विकल्प दे रहा होगा। जिसे आप अपने कोई महत्वपूर्ण मेल को खोज सकते हैं। +उपयोग. +यदि आपको कोई मेल खोजना है तो आपको केवल उससे जुड़े नाम जैसे शीर्षक मेल आईडी, प्रयोक्ता का नाम आदि में से कोई भी एक का उपयोग कर सकते हैं। यदि आप को कई परिणाम दिख रहे हैं तो आप कोई अन्य शब्द के द्वारा खोज सकते हैं जिसमें कम परिणाम में ही आपका कार्य हो जाएगा। + +जीमेल/संपर्क: +गूगल के संपर्क के द्वारा आप जीमेल में पते में त्रुटि बहुत कम कर सकते हैं। कई बार लोग गलत ईमेल पता का उपयोग करते हैं, लेकिन यदि आपके पास प्रयोक्ता का सही ईमेल पता होगा तो आप को इस गलती से छुटकारा मिल जाएगा। यह गूगल के खातों से आपके नाम को दिखा देता है। यदि आपको किसी ने अपने ईमेल से कोई मेल किया है या आपने किसी को कोई मेल किया है तो आपके गूगल के खाते से यह छवि और नाम दोनों उस तक पहुँचा देता है। यह आपने आप ही सहेजा जाता है और बाद में आप कभी भी उस प्रयोक्ता को मेल कर सकते हो। +सहेजना. +यदि कोई गैर गूगल खाता से आपको मेल करता है तो भी आप उस के खाते को आपने सम्पर्क सूची में सहेज सकते हो। आप सीधे सीधे किसी के मेल को खोलें और उसमें सम्पर्क सूची में डालने के विकल्प को चुने इसके बाद आपको उसका नाम और अन्य जानकारी डालनी है। यह केवल आपको ही दिखाई देगा। + +जीमेल/सितारे: +अपने अनुसार मेल के महत्व को आप दिखा सकते हैं। इसके लिए आपको केवल मेल को देख कर उसके बाएँ ओर के सितारे के चिन्ह को दबाना है। इसके बाद आप चाहें तो आप इसे अलग अलग रंग में भी बना सकते हैं। इससे आपको महत्वपूर्ण मेल खोजने में सहायता मिलेगी। + +जीमेल/उन्नत: +हमने अब तक जीमेल के सरल रूप में अध्ययन किया है। इसके कुछ अन्य उपयोग भी हैं। जिसके लिए थोड़ी मेहनत करने पड़ सकती है। + +जीमेल/छन्नी: +आप इसके द्वारा किसी के द्वारा कोई मेल आने को रोक सकते हो। उदाहरण के लिए यदि आपको कोई अनेक व्यापारिक मेल कर रहा है या किसी अनावश्यक वस्तु का प्रचार कर रहा है तो आप उस मेल पते को भी इससे छन्नी द्वारा हटा सकते हो। या फिर किसी शब्द को भी आप इस इसे छन्नी के द्वारा हर मेल में उस शब्द को देख कर मेल को इनबॉक्स तक नहीं आने देगा। +कमजोरी. +यदि आपने छन्नी में Bike शब्द लिखा हो तो यह BIKE, bike और Bike आदि तरह के सभी शब्दों को रोक देगा। इसके लिए कुछ ऐसा नहीं है, जिससे आप किसी एक रूप को ही रोक सकें। + +जीमेल/मित्र को बुलाएँ: +मित्र को बुलाएँ या आमंत्रित करें एक विकल्प है, जिससे आप कोई ऐसे व्यक्ति को जीमेल में ला सकते हो जो जीमेल का उपयोग नहीं कर रहा है। इसका लाभ मुख्य रूप से गूगल को मिलता है। क्योंकि उसके सदस्य और भी अधिक हो जाते हैं और उपयोग करने वाले लोग भी और सक्रिय रहेंगे। जिससे लाभ में गूगल को और अधिक बढ़ोतरी मिलेगी। + +जीमेल/जीमेल से वार्ता: +जीमेल से वार्ता एक प्रकार से मेल भेजने जैसा ही है। लेकिन इसमें केवल प्रयोक्ता सक्रिय होता है और आपके भेजे संदेश का त्वरित ही उत्तर दे देता है। यदि आपके द्वारा भेजा संदेश प्रयोक्ता नहीं पढ़ पाता है तो वह उसके जीमेल में चले जाएगा। अर्थात उसे एक मेल के रूप में मिल जाएगा। + +अक्षय ऊर्जा: +यह पुस्तक अक्षय ऊर्जा के कार्य और उसकी जानकारी बताने हेतु बनायी गयी है। + +अक्षय ऊर्जा/प्रस्तावना: +प्रस्तावना. +अक्षय ऊर्जा उस ऊर्जा को कहते हैं, जिसका एक बार उपयोग करने के बाद भी हम उसे दोबारा भी उपयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए पवन ऊर्जा ।यह ऊर्जा स्वतः ही पवन के चलने पर हमें मिलती है। जिसे हम पवन चक्की की सहायता से कभी भी उस ऊर्जा का उपयोग कर सकते हैं। यह पवन ऊर्जा धरती में अलग अलग स्थानों में हुए दाब के परिवर्तन के कारण बनते हैं। यह कभी क्षय नहीं हो सकते हैं। इस कारण इस ऊर्जा को अक्षय ऊर्जा कहते हैं। + +अक्षय ऊर्जा/जैव ऊर्जा: +यह ऊर्जा मरे हुए जीव-जन्तु पेड़ पौधे आदि के सड़ने से प्राप्त होते हैं। सूक्ष्म जीवों द्वारा किए गए कार्य के कारण एक प्रकार के गैस का निर्माण हो जाता है। इस गैस को ही एकत्रित कर इसका उपयोग खाना बनाने विद्युत उत्पन्न करने आदि में करते हैं। +उपयोग. +इसका उपयोग रसोई गैस के रूप में या विद्युत उत्पन्न करने आदि के लिए किया जा सकता है। +निर्माण. +किसी पेड़ पौधे या जीव के मरने के बाद पानी और हवा के कारण जमीन में वह सड़ने लगता है। इससे उसके अन्दर से गैस निकलने लगता है। यही गैस जलने लायक होता है। इसे हम अपने से भी किसी गड्डे में बहुत सारा पत्ता आदि डाल कर उसमें निश्चित मात्रा में पानी मिला कर उसे बंद कर के उससे किसी टंकी को जोड़ कर उसमें से निकलने वाले गैस को उसमें रख सकते हैं। इसके बाद कुछ महीनों में उसमें से गैस निकलने लगता है और उस टंकी में जमा होने लगता है। इसके बाद जब गैस निकलना बंद हो जाये तो उसमें बचे हुए पदार्थ का उपयोग खाद के रूप में करते हैं और टंकी को रसोई गैस के रूप में भी उपयोग कर सकते हैं या उसका उपयोग विद्युत निर्माण में भी कर सकते हैं। +लाभ. +यह केवल कचरा या ऐसे चीजों से निर्मित होता है, जिसका उपयोग हम नहीं करते हैं। अर्थात कोई खर्च नहीं लगता है। इसके अलावा हमें उच्च गुणवत्ता का खाद भी मिल जाता है। इसके उपयोग से वातावरण भी अच्छा रहता है। + +अक्षय ऊर्जा/सौर ऊर्जा: +सौर ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है। इसके अलावा पृथ्वी पर कोई अन्य तारे की रोशनी इतनी ऊर्जा के साथ नहीं आती है। क्योंकि अन्य तारे बहुत दूरी पर हैं। सूर्य की रोशनी स्वतः ही धरती पर आते रहती है। जिसे यदि हम सौर ऊर्जा में परिवर्तित न भी करें तो भी यह पृथ्वी में आते ही रहेगी। चूंकि इस ऊर्जा के उपयोग से किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होता है। इस कारण इसे भी अक्षय ऊर्जा कहते हैं। +उपयोग. +पानी उबालने में. +सौर ऊर्जा का उपयोग पानी उबालने में किया जाता है। सामान्यतः पानी को गर्म होने में काफी समय लग जाता है। इसके अलावा ईंधन भी काफी नष्ट हो जाता है। जबकि सौर ऊर्जा निःशुल्क मिलने के कारण दिन में कोई भी आसानी से पानी गर्म कर सकता है। +भोजन पकाने में. +इसके द्वारा भोजन भी पकाया जा सकता है। इसके लिए एक अलग तरह का कुकर भी आता है, जिसे सौर कुकर कहते हैं। इसके चारों ओर काँच लगा होता है और दिन में सूर्य के प्रकाश से यह आसानी से गर्म हो कर खाना पकाने लगता है। इसके अतिरिक्त यदि रात में भोजन पकाना हो तो बैटरी का उपयोग कर सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर के उसमें संचित करने से रात में भी भोजन बनाना आदि कार्य हो जाता है। +विद्युत निर्माण में. +हम सौर ऊर्जा को आसानी से विद्युत ऊर्जा में बदल सकते हैं। इसे बदल कर बैटरी में संचित रख सकते है, जिससे इसका उपयोग बाद में भी किया जा सके। इसका उपयोग भी दो अलग अलग ढंग से किया जाता है। पहले विधि में हम सीधे सूर्य से प्रकाश के रूप में ऊर्जा लेते हैं और दूसरे में ताप के द्वारा ऊर्जा लेते हैं। +हानि. +इससे किसी प्रकार की कोई हानि नहीं होती है। लेकिन यदि बादल वाला मौसम हो और सूर्य का प्रकाश न मिले तो ऊर्जा प्राप्त नहीं होगी और यह कार्य नहीं कर पाएगा। + +अक्षय ऊर्जा/वायु ऊर्जा: +वायु ऊर्जा वायु द्वारा प्राप्त होने वाली ऊर्जा है। इसका उपयोग हम पवन चक्की के द्वारा कर सकते हैं। जब वायु पवन चक्की से टकराती है, तो उस ऊर्जा के कारण चक्की घूमने लगता है और जितनी अधिक गति से पवन चलेगी उतनी अधिक गति से वह पवन चक्की भी चलने लगेगी। +इस ऊर्जा का उपयोग हम कुआँ से पानी निकालने या विद्युत ऊर्जा का निर्माण करने के लिए करते हैं। + +अक्षय ऊर्जा/हाइड्रो ऊर्जा: +इसका उपयोग करने हेतु यंत्र का निर्माण ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक एजीएम ने 1903 में विकसित किया था। 1912 से 1919 में हंगरी और आस पास के जगहों में इसका उपयोग होने लगा। इसके संचालन हेतु सिद्धान्त भी विकसित किया गया। इसके सरल रूप और आकार के कारण इसे विकासशील देशों ने भी मुख्य रूप से उपयोग करना शुरू किया। + +अक्षय ऊर्जा/ज्वारीय ऊर्जा: +ज्वारीय ऊर्जा समुद्र में उत्पन्न होता है। इस क्रिया के दौरान ही समुद्र में बह रहे कचरे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आ जाते हैं। कई बार टूटे जहाज के मलबे भी कई किलो मीटर की दूरी तय कर के किसी दूर स्थल तक आ जाते हैं। इस ऊर्जा को जल में चक्की के जैसा यंत्र बना कर रखा जाता है। जब यह ऊर्जा सक्रिय रहती है तो वह चक्की के द्वारा ऊर्जा हमें विद्युत ऊर्जा के रूप में प्राप्त हो जाती है। + +अक्षय ऊर्जा/तरंग ऊर्जा: +यह सभी को पता है कि पृथ्वी में 71 प्रतिशत भाग जल से ढका हुआ है। इस क्षेत्र में लहर भी होती है। इसे तरंग ऊर्जा भी कहते हैं। यह ऊर्जा प्रकृति में अपने आप ही बनती है और यह एक प्रकार कि अक्षय ऊर्जा है। इसका उपयोग करने के लिए कई तरह के उपकरण का उपयोग किया जा सकता है। जिससे इस ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा के रूप में उपयोग कर लिया जाता है। +इसमें से एक उपकरण में मोटर और पंखा होता है। नीचे और ऊपर वायु के आने जाने के लिए मार्ग भी होता है। जब लहर में हलचल होता है तो वह पंखा वायु के ऊपर नीचे होने के कारण घूमने लगता है और मोटर के विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होने लगती है। + +अक्षय ऊर्जा/ऊर्जा संग्रहण: +किसी भी ऊर्जा का संग्रहण करना बाद में उसके उपयोग करने के लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग हम केवल दिन में आसमान साफ रहते समय ही कर सकते हैं और पवन चक्की का उपयोग भी केवल हवा के चलते समय ही कर सकते हैं। अन्य कई प्रकार के ऊर्जा स्रोत में भी इस तरह के बाधा होते हैं। +इस सभी बाधा से निजात पाने के लिए हम बैटरी का उपयोग करते हैं। इससे एक बार ऊर्जा को संग्रहण करने के बाद हम कभी भी उसका उपयोग कर सकते हैं। बैटरी में यह रासायनिक रूप में भी हो सकता है। इसके अलावा कुछ क्षय ऊर्जा का भी हम संग्रहण कर सकते हैं। जैसे मिट्टी तेल आदि। लेकिन यह सभी एक बार उपयोग के बाद पूरी तरह से नष्ट हो जाते है और कभी उसका उपयोग नहीं कर सकते हैं। इस तरह के ऊर्जा का निर्माण भी नहीं हो किया जाता है, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक तापमान और दाब कि आवश्यकता पड़ती है, जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। +यदि इस ऊर्जा का निर्माण भी करना चाहें तो भी इसके लिए अनेक पेड़-पौधे जीव-जन्तु की आवश्यकता होगी। यदि यह संख्या कम होती है तो इसका कोई लाभ ही नहीं होगा और अधिक भी होने से इस पूरे क्रिया में उससे अधिक पैसे लग जाएँगे। इससे अच्छा और सस्ता मार्ग अक्षय ऊर्जा पर निर्भर होना है और उसके लगातार उपयोग करने के लिए हमें ऊर्जा संग्रहण करना चाहिए। जिससे इस तरह के ऊर्जा का बाद में भी उपयोग कर सकें और क्षय ऊर्जा पर हमारी निर्भरता हट सके। + +सर्वप्रथम तार रहित उपकरण का अविष्कार किस महान वैज्ञानिक ने किया ?: +सर्वप्रथम तार रहित उपकरण का अविष्कार किस महान वैज्ञानिक ने किया ? + +आव्यूह: +गणित में आव्यूह एक अदिश राशियों से निर्मित आयताकार रचना है। यह आयताकार रचना लघु कोष्ठक "()", दोहरे दण्ड "|| ||" अथवा दीर्घ कोष्ठक "[ ]" के अन्दर बंद होती है। इसमें संख्याओं का एक विशेष प्रकार का विन्यास किया जाता है, अत: इसे आव्यूह, या मैट्रिक्स, की संज्ञा दी गई है। मैट्रिक्स के अवयव संख्याएँ होती हैं किन्तु ये ऐसी कोई भी अमूर्त वस्तु हो सकती है जिनका गुणा किया जा सके एवं जिन्हें जोड़ा जा सके। +परिचय. +सर्वप्रथम सिल्वेस्टर (1850) ने आव्यूह की यह परिभाषा दी थी कि संख्याओं के किसी आयताकार सरणी को, जिसमें से सारणिक (determinants) बन सकें, आव्यूह कहते हैं। आधुनिक समय में आव्यूह को एक अतिसंमिश्र (hypercomplex) संख्या के रूप में मानते हैं। इस दृष्टिकोण के प्रवर्तक हैं मिल्टन (1853) और केली (1858)। + +प्रदूषण: +प्रदूषण इस पर्यावरण में कई रूपों में पाई जाती है। इसमें मुख्य जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण होते हैं। यह सभी प्रदूषण पर्यावरण को हानि पहुँचाने का कार्य करते हैं। यह सभी मुख्यतः मनुष्यों द्वारा उनके दैनिक कार्यों के कारण भी होते हैं। इसमें सबसे आम है: वाहनों का उपयोग, लकड़ी के जुल्हे, जल जमाव आदि हैं। + +प्रदूषण/जल प्रदूषण: +यह प्रदूषण जल में अपशिष्ट पदार्थ, गंदगी, साबून या नहाने के बाद का पानी, कारखानों का कचरा, रासायनिक तत्व आदि के जाने पर होता है। इससे जलीय जीवन को खतरा होता है। जल में ऑक्सीजन घुल नहीं पाता जिससे जल में रहने वाले मछली आदि इसकी कमी से मर जाते हैं। कई तरह के मछली नदी तालाब में रहने वाले गंदगी आदि को खा कर साफ सफाई का काम भी करते हैं। लेकिन उनके बाद यह कार्य कोई भी नहीं करता है इससे नदी आदि में गंदगी जमने लगते हैं। + +प्रदूषण/मृदा प्रदूषण: +मृदा प्रदूषण मृदा में किसी भी प्रकार के अन्य तत्वों के मिलने से होता है, जिसका कोई भी कार्य मृदा में नहीं होता है और वह पर्यावरण, जीव जन्तुओं और पेड़ पौधों के लिए हानिकारक होते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई कृषि करते समय अधिक कीटनाशक का उपयोग करता है तो वह कीटों के मारने के साथ ही पौधों पर और उस मृदा पर भी प्रभाव डालता है। + +प्रदूषण/ध्वनि प्रदूषण: +ध्वनि प्रदूषण मुख्यतः यातायात में उपयोग किए जाने वाले वाहनों द्वारा उत्पन्न होती है। इसके अलावा कई तरह के मरम्मत के कार्य हेतु कई तरह के औज़ार का उपयोग किया जाता है। इस कार्य को करते समय भी ध्वनि प्रदूषण होता रहता है। यह समस्या मुख्यतः शहरी क्षेत्रों में होता है, जहाँ पहले ही विकास हो चुका होता है और फिर से कोई नया कार्य करने हेतु कोई पुराने कार्यों को हटाना होता है। + +जलवायु परिवर्तन: +जलवायु परिवर्तन नामक यह पुस्तक जलवायु में हो रहे परिवर्तन से संबंधित विषयों पर लिखी गई है। मूलतः माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक इस विषय में रुचि रखने वाले शिषकों एवं शोधार्थियों के लिए भी उपयोगी हो सकती है। + +प्रश्नसमुच्चय--१५: +मध्यप्रदेश में 11वीं पंचवर्षीय योजना में विकास दर कितनी निर्धारित की गई थी ? -- 0.076 +मध्यप्रदेश में बेरोजगार युवक-युवतियों को स्वरोजगार हेतु प्रेरित करने के लिए कौन सी योजना प्रारंभ की गई है ? -- दीनदयाल रोजगार योजना +मध्य प्रदेश के किस जिले में सर्वाधिक सड़क घनत्व है ? -- सतना +मध्य प्रदेश राज्य में सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है ? -- गोंड +ग्वालियर किले का निर्माण राजपूत राजा सूरज सेन ने किसकी स्मृति में कराया था ? -- ऋषि गालब की स्मृति में +किस नदी को मध्यप्रदेश की गंगा कहा जाता है ? -- बेतवा +मध्य प्रदेश के किस शहर में कुंभ का मेला लगता है? -- उज्जैन +बाणसागर परियोजना किस नदी पर अवस्थित है? -- सोन +मध्यप्रदेश में सर्वाधिक तालाबों से सिंचाई वाला जिला कौन सा है? -- बालाघाट +मध्यप्रदेश में सर्वाधिक प्रसार वाला अखबार है ? -- नई दुनिया +बेतवा नदी मध्य प्रदेश के किस जिले से निकलती है ? -- रायसेन +मध्य प्रदेश के किस शहर को पर्यटन नगरी के नाम से जाना जाता है ? -- उज्जैन +मध्य प्रदेश के किस शहर को प्राचीन में अवंतिका ने कहा जाता था ? -- उज्जैन +मध्य प्रदेश के किस जिले में सर्वाधिक चावल का उत्पादन होता है ? -- बालाघाट +कौन सी नदी पर जोवट परियोजना बनाई गई है ? -- हथनी +ग्वालियर किले में राजा मानसिंह तोमर ने किस मंदिर का निर्माण करवाया था ? -- मान मंदिर +मध्य प्रदेश साहित्य परिषद द्वारा अखिल भारतीय महाराज वीर सिंह देव पुरस्कार किस क्षेत्र में दिया जाता है ? -- उपन्यास +कौन सी रानी रामगढ़ की झांसी की रानी के नाम से प्रसिद्ध है ? -- रानी दुर्गावती +हीरा उत्पादन करने में राज्य का देश में कौनसा स्थान है ? -- प्रथम +मध्य प्रदेश में स्थित राजघाट बांध किस नदी पर बना हुआ है? -- बेतवा +विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के भव्य मंदिरों का निर्माण चंदेल राजाओं ने कब करवाया था ? -- 950 से 1050 ईसवी के मध्य +मध्यप्रदेश में सिंचाई का प्रमुख साधन क्या है? -- कुँँवे और नलकूप +सन 2011 तक मध्य प्रदेश में कितनी तहसील है? -- 342 +मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए कितने सदस्य चुने जाते हैं? -- 11 +मध्य प्रदेश का सोमनाथ कहा जाता है? -- भोजपुर को +मध्य प्रदेश के किन जिलों से कर्क रेखा गुजरती है? -- सागर, राजगढ़, अनूपपुर +मध्यप्रदेश में एकमात्र यूनानी चिकित्सा महाविद्यालय कहां पर स्थापित है? -- बुरहानपुर +मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र है? -- सोहागपुर +निम्न में से खानदेश की राजधानी थी? -- बुरहानपुर +कौन सा महीना मालवा पठारी क्षेत्र का सबसे गर्म महीना है ? -- मई +पंचमढ़ी किस श्रेणी पर अवस्थित है ? -- महादेव श्रेणी +मध्य प्रदेश राज्य में सर्वाधिक सोयाबीन का उत्पादन करने वाला जिला है ? -- उज्जैन +मध्य प्रदेश राज्य में प्रति व्यक्ति औसत कृषि भूमि कितनी है? -- ०.25 हेक्टेयर +मध्य प्रदेश की बैगा जनजाति में कितने प्रकार के विवाह प्रचलित है? -- 6 प्रकार के +राज्य में शुष्क बंदरगाह कहाँ स्थापित किया गया है ? -- पीथमपुर +अन्य. +मध्य प्रदेश राज्य में कपास के लिए सर्वाधिक क्षेत्रफल वाला जिला कौन सा है? खरगोन +मध्यप्रदेश में रेलवे स्प्रिंग बनाने का कारखाना कहां स्थित है? ग्वालियर +मध्यप्रदेश में कत्था बनाने के कारखाने स्थित है? शिवपुरी मुरैना + +हिन्दी/इतिहास: +हिन्दी का विकास मुख्य रूप से विदेशी आक्रमणों के मध्य हुआ है। वर्ष 1947 से पहले तक हिन्दी भाषा का विकास केवल बोली के रूप में ही हुआ। कुछ हिन्दी समाचार पत्र ही इससे पहले तक चलते थे। +मुगल काल. +हिन्दी भाषा का सबसे अधिक विकास मुगल काल के दौरान ही हुआ। लेकिन इससे पहले मुगलों ने फारसी भाषा का ही प्रचार करते थे। बाद में फारसी भाषा के प्रचार करने के बाद भी कोई लाभ नहीं हुआ और फारसी भाषा जानने वालों को हिन्दी भाषा आने लगी। इस दौरान फारसी के कई शब्द हिन्दी भाषा में आ गए और इसके बाद हिन्दी भाषा का मुगल काल में विकास शुरू हुआ। +अंग्रेज़ों के समय. +अंग्रेजों ने भी हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि को समाप्त करने के भरपूर प्रयास किए। आजादी से पहले तक अंग्रेज़ो ने कभी हिन्दी भाषा को बढ़ने नहीं दिया। उन लोगों को यह डर था, कि कहीं इस भाषा के विस्तार और प्रसार लोगों में एकता न बढ़ जाये। क्योंकि हिन्दी भाषा बहुत बड़े क्षेत्र के लोगों द्वारा बोली जाती है और कई अन्य भाषाओं के लोग भी इसे आसानी से समझ सकते हैं। इस कारण कई इस एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेज़ो ने कई तरह के कहानी भी बनाई जैसे आर्य द्रविड़ आदि। इसके अलावा यह कई तरह से हिन्दी भाषा के प्रसार और विकास को रोकने के लिए फूट डालो और राज करो की नीति के साथ साथ भाषा की राजनीति भी करने लगे थे। +आज़ादी के बाद. +आज़ादी के बाद भी हिन्दी का सही रूप से विकास नहीं हो पाया। जब आजादी के बाद राजभाषा चयन का समय आया तो लोगों ने हिन्दी को इसके लिए चुना, क्योंकि हिन्दी सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती थी। लेकिन कुछ लोगों ने हिन्दी भाषा का राजभाषा के रूप में चुने जाने का विरोध किया १४ सितंबर १९४९ को संविधान द्वारा हिन्दी को राजभाषा के रूप में मान्यता तो दी गई, पर पूर्णरूपेण नहीं; एक बैसाखी के साथ, कि सरकारी व ग़ैरसरकारी कार्यालयों का कामकाज सुचारु ढंग से चलाने के लिए सह-राजभाषा के तौर पर अंग्रेज़ी १५ वर्षों तक हिंदी के साथ चलेगी। संविधान के अनुच्छेद ३४३(१) के अंतर्गत अनुसूची एक में संघ की भाषा हिन्दी निर्धारित की,अनुच्छेद ३४३(३) में यह सुविधा दी गई कि १५ वर्षों की अवधि के बाद भी अंग्रेज़ी का प्रयोग आवश्यकतानुसार जारी रखा जा सकता है। और संविधान के अनुच्छेद ३४५-३४६ में राज्यों की प्रांतीय भाषाओं को विकसित व लागू करने की पूरी छूट दी गई। संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी सहित १४ प्रादेशिक भाषाओं को मान्यता दी गई थी, ये थी:-असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, मराठी, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलगु उर्दू। +इस कारण अंग्रेज़ी भाषा को भी सह-राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। लेकिन उस समय मुख्य रूप से हिन्दी भाषा ही सबसे अधिक लोगों द्वारा बोला जाता था। जबकि अंग्रेज़ी कुछ लोग ही समझते थे। अंग्रेज़ी के सह-राजभाषा बनने के बाद उसका और अधिक प्रसार हुआ। सभी सरकारी कार्यालय में अंग्रेज़ी में काम होने के कारण लोग अंग्रेज़ी को जानने में अधिक समय व्यर्थ करने लगे और जिन लोगों को हिन्दी का ज्ञान था। वे भी हिन्दी को छोड़ अंग्रेज़ी भाषा सीखने के प्रति रुचि दिखाने लगे। क्योंकि हिन्दी भाषा में सरकारी कार्यालयों में कोई काम ही नहीं होता था। इस कारण उन्हें मजबूरी में अपने जीवन यापन के लिए अंग्रेज़ी सीखना पड़ता था। +अंग्रेज़ी को सह-राजभाषा बनाने का विरोध भी हुआ था। लेकिन समय के साथ वह विरोध धीमा हो गया। हिन्दी को अपना स्थान दिलाने के लिए हिन्दी दिवस मनाने की योजना बनाई गई। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा जानने वालों को अपने भाषा के प्रति सचेत होने और उसके विकास के बारे में सोचें आदि है। क्योंकि राजभाषा के नाम पर हिन्दी केवल नाम मात्र के लिए यह स्थान मिला है। जबकि अंग्रेज़ी को पहले वैकल्पिक रूप से सह-राजभाषा के रूप में स्थान दिया गया और बाद में उसे अनिवार्य कर दिया गया व हिन्दी का कोई जिक्र भी नहीं किया गया। तब से अब तक हिन्दी केवल नाम मात्र के लिए भारत की राजभाषा है। + +हिन्दी दिवस: +हिन्दी दिवस प्रतिवर्ष 14 सितम्बर के दिन मनाया जाता है। इस दिन हिन्दी भाषा में विद्यालय आदि में कवितायें, निबंध लेखन आदि प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को उनके मातृ भाषा के लिए जागरूक करना है। + +हिन्दी दिवस/पुरस्कार: +हिन्दी दिवस के दिन कई प्रकार के पुरस्कारों का वितरण भी किया जाता है। इस का उद्देश्य लोगों को हिन्दी भाषा के प्रति आकर्षित करना है। इस दिन राजभाषा गौरव पुरस्कार और राजभाषा कीर्ति पुरस्कार दिया जाता है। +राजभाषा गौरव पुरस्कार. +यह पुरस्कार किसी व्यक्ति को दिया जाता है। यह पुरस्कार केवल भारतीय नागरिक को ही दिया जाता है। जिसने भी हिन्दी भाषा में विज्ञान और तकनीकी के विषय में कोई पुस्तक लिखा हो। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा को विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में आगे बढ़ाना है। क्योंकि हिन्दी के लेखक मुख्यतः इन विषयों में बहुत कम ही लिखते हैं या जो लिखते भी हैं, वो इसमें गैर-हिन्दी शब्दों का अधिक उपयोग करते हैं। +यह पुरस्कार कुल 13 लोगों को 14 सितम्बर के दिन दिया जाता है। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को ₹2,00,000 व द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को ₹1,50,000 और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को ₹75,000 रुपये मिलता है। इसके अलावा 10 लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में ₹10,000 रुपये मिलता है। इसके अलावा सभी लोगों को स्मृति चिन्ह भी मिलता है। +कोई भी भारतीय लेखक, जिसने हिन्दी भाषा में विज्ञान या तकनीकी के विषय में 100 या उससे अधिक पृष्ठ में कोई पुस्तक लिखा हो वह इस पुरस्कार हेतु अपनी पुस्तक की जानकारी सरकार को भेज सकता है। जिसमें से श्रेष्ठ 13 लोगों के पुस्तक को इस पुरस्कार के लिए चुना जाएगा। +राजभाषा कीर्ति पुरस्कार. +यह पुरस्कार किसी संस्थान, कार्यालय आदि को दिया जाता है। इसका उद्देश्य किसी भी कार्य में हिन्दी के उपयोग को बढ़ावा देना है। क्योंकि कई कार्यालय जिसमें सरकारी कार्यालय भी शामिल हैं, कई कारणों से हिन्दी का उपयोग नहीं करते हैं। जो करते भी हैं, वे अच्छे हिन्दी शब्दों का उपयोग नहीं करते। इस कारण इस क्षेत्र में हिन्दी भाषा के विकास हेतु यह पुरस्कार ऐसे संस्थान या कार्यालय को दिया जाता है, जिसने अपने दैनिक कार्यों में अच्छे हिन्दी भाषा का उपयोग कर यह दिखाया हो कि हिन्दी भाषा में भी बात कर के किसी भी कार्य को आसानी से और बहुत अच्छे से किया जा सकता है। + +हिन्दी दिवस/विरोध: +हिन्दी दिवस का विरोध मुख्यतः इस कारण से किया जाता है, क्योंकि सरकार केवल एक दिन हिन्दी दिवस के रूप में कुछ कार्यक्रम आयोजित कर हिन्दी को भूल जाती है। पूरे साल हिन्दी भाषा के लिए कुछ काम नहीं होता और न ही हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला। सरकारी कार्यालयों में भी केवल हिन्दी नाम मात्र के लिए होता है। सभी सरकारी कार्यक्रम में भी हिन्दी का उपयोग नहीं होता, और हिन्दी दिवस या हिन्दी के किसी कार्यक्रम में भी कई बार हिन्दी भाषा का उपयोग नहीं किया जाता है। + +हिन्दी दिवस/कार्यक्रम: +हिन्दी दिवस के दिन सभी हिन्दी माध्यम के विद्यालयों में हिन्दी भाषा में कविता, निबंध आदि लिखने की प्रतियोगिता होती है। इसमें हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है और हिन्दी दिवस का महत्व और हिन्दी भाषा जानने के महत्व को समझाया जाता है। इस दिन हिन्दी भाषा में वाद-विवाद, चर्चा आदि होती है। जिससे लोग आसानी से अपने दैनिक जीवन में भी हिन्दी भाषा का उपयोग करना सीख सकें। + +हिन्दी दिवस/इतिहास: +हिन्दी दिवस का इतिहास बहुत पुराना है। 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी भाषा के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। इस दिन हिन्दी भाषा को राजभाषा बनाया गया था। लेकिन कई तरह के विरोध के कारण एक गैर भारतीय भाषा अंग्रेज़ी को भी भारत की राजभाषा का स्थान मजबूरी में देना पड़ा था। इस कारण हिन्दी भाषा के विकास और अंग्रेज़ी भाषा को पूरे देश से हटाने के लिए हिन्दी दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। 14 सितम्बर को ही हिन्दी भाषा के कई निर्णय लिए जाने के कारण इसे इस दिवस के लिए सबसे अच्छा दिन माना गया। + +हिन्दी दिवस/कारण: +हिन्दी दिवस मनाने का सबसे मुख्य कारण हिन्दी भाषा के प्रति लोगों को जागरूक करना है। क्योंकि कभी कोई देश अपनी मातृ भाषा को छोड़ कर अपना विकास नहीं कर सकता और न ही ऐसे विकास का कोई महत्व है। हिन्दी दिवस के द्वारा विद्यालय में बच्चों को अपने मातृ भाषा के प्रति जागरूक हो कर अपनी भाषा का ज्ञान और प्रसार करने की शिक्षा दी जाती है। +मुख्य कारण. +हिन्दी भाषा का विकास मुगलों के शासन काल के दौरान ही हो पाया। इसके बाद जब अंग्रेजों ने व्यापार के नाम पर देश को गुलाम बनाया तो उसके बाद वह सभी लोग केवल अंग्रेज़ी भाषा का विकास और हिन्दी भाषा को हानि पहुंचाने लगे। इससे कई लोगों को मातृ भाषा में अंग्रेज़ी भाषा घुलने लगी। इस कारण जब तक देश अंग्रेजों से आजाद हुआ तब तक हिन्दी का बहुत बुरा हाल हो चुका था। विश्व की मातृ भाषा के रूप में सबसे अधिक बोले जाने वाली तीसरी भाषा होने के बावजूद बहुत कम लोग ही अच्छे से हिन्दी बोल पाते हैं। +जब आजादी के बाद हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा देने का समय आया तो कई लोगों ने जाति-भाषा की राजनीति हेतु इसका विरोध किया। इसके कारण अंग्रेज़ी (एक गैर-भारतीय भाषा को) हिन्दी भाषा के समान अधिकार दिया गया और वह भी भारत कि राजभाषा बन गया। इस भाषा के प्रभाव से बचाने के लिए हिन्दी दिवस मानना शुरू किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य अपनी मातृ भाषा हिन्दी की रक्षा करना और उसका विकास करना है। + +देवनागरी: +देवनागरी लिपि मुख्यतः भारत और नेपाल के भाषाओं को लिखने के लिए उपयोग की जाती है। इसमें हिन्दी, नेपाली, मराठी, संस्कृत, पालि, भोजपुरी, नेवाड़ी, कोंकणी, मैथिली, कश्मीरी आदि का समावेश हैं। यह ध्वनि या उच्चारण पर आधारित है, इस कारण इसमें जो भी हम बोल सकते हैं, उसे आसानी से लिखा जा सकता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इस लिपि के लिए कहा था कि देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयंसिद्ध है। अर्थात इसकी वैज्ञानिक विशेषताओं को सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसे देखते साथ कोई भी जान सकता है कि यह अन्य लिपियों से काफी अलग और उपयोगी है। + +देवनागरी/स्वर: +देवनागरी लिपि में स्वर पहले से अलग श्रेणी में होते हैं, जिससे उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है। + +देवनागरी/व्यंजन: +व्यंजन. +आधिकारिक रूप से देवनागरी लिपि में 36 व्यंजन होते हैं। इसे हिन्दी लिखने में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा अन्य उच्चारण संस्कृत, पालि आदि भाषाओं को लिखते समय उपयोग करते हैं। +क्ष, त्र, ज्ञ + +देवनागरी/इतिहास: +अंग्रेजों ने अपने भाषा के विस्तार करने हेतु देवनागरी लिपि को हमेशा नष्ट और हटाने के बारे में ही सोचते थे। हालांकि इस लिपि में अंग्रेजी के शब्द का समान उच्चारण आ जाता है, लेकिन लोग उसके शब्द को अंग्रेजी में नहीं लिख सकते हैं, क्योंकि देवनागरी लिपि पूरी तरह उच्चारण पर आधारित है। इस कारण अंग्रेजी भाषा से केवल हिन्दी भाषा में कुछ शब्द ही आ सके। लेकिन अंग्रेज अपनी लिपि ला कर हिन्दी में और भी अंग्रेजी शब्दों को डालना चाहते थे। +देवनागरी लिपि के सरल होने के कारण अंग्रेजों के द्वारा रोमन लिपि का उपयोग न के बराबर होने लगा था। लेकिन बाद में जब कम्प्युटर के आने पर देवनागरी लिपि में लिखने के साधन कई समय पहले ही आ गए थे। लेकिन लोगों को इसके बारे में अधिक जागरूक नहीं किया जा सका। देवनागरी लिपि में लिखने हेतु कई लाखों साधन सभी जगह मौजूद है, लेकिन कोई एक साधन का उपयोग हर व्यक्ति नहीं करता है। इस कारण इसके साधन के बारे में लोगों में अधिक जानकारी नहीं है। +जानकारी की कमी. +जानकारी के अभाव में हिन्दी भाषा के 50 करोड़ मातृ भाषा होने के बाद भी सभी लोग देवनागरी लिपि में न लिख पाने के कारण हिन्दी व अन्य भाषाओं की सामग्री तक नहीं पहुँच पाते हैं। देवनागरी लिपि में लिखने के कई ऐसे साधन भी मौजूद हैं, जिससे कोई भी आसानी से हिन्दी लिख सकता है। लेकिन उसे इसकी जानकारी नहीं है। यही इस लिपि के प्रसार में सबसे बड़ी बाधा है। + +देवनागरी/बाधा: +देवनागरी लिपि के प्रसार और विकास में सबसे बड़ी बाधा इसके लिखने के साधन का सही तरीके से विकास और प्रचार का न होना है। इसके कई लिखने के साधन तो हैं, लेकिन इसके बारे में आम जन में बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी होती है। इस कारण मजबूरी में उन्हें दूसरे लिपि का सहारा लेना पड़ता है। +देवनागरी लिपि की 10 कमियाँ ! +1.ग, ण,और श में आकार लगे होने का भ्रम होता है ! +2.वर्ण के प्रकार -- +क, र ध्वनि-राजा,क्रम,कर्म,ट्रक,ऋण,कृपा +ख.द - दम,विद्या,छद्म,गद्दी +ग. क-कर,वक्त ,क्वाथ +घ .श-शाम,श्रम,श्याम +ङ.म-मन,म्यान,छद्म,ब्रह्म +च.भ-भवन,अभ्युक्ति,उद्भव, +3.संयुक्ताक्षर में आधे अक्षर बाएँ,दाएँ और नीचे लगते हैं-वह, व्यय, द्वार,जिह्वा! +4.शुद्ध में द पूरा अक्षर लिखा है,लेकिन उच्चारण आधा होता है!ध आधा लिखा होता है,लेकिन उच्चारण पूरा होता है !इसी तरह वृद्ध,श्रद्धा आदि! +5.शक्ति में क पर भी इकार लगता है!ऐसे ही निश्चित,बल्कि आदि! +6.द्विज का उच्चारण दु+वि+ज होता है!लिखने और पढ़ने दोनों में दुविधा होती है! +7.जो लिखा दिखता है वह उच्चारित नहीं होता है!और जो कहते हैं वह नहीं लिखा जाता है! +क.शुरू में एकार लगा नहीं है लेकिन उच्चारित होता है! जैसे-क्या का उच्चारण के+या होता है!इसी तरह-व्यय, प्यास,प्याज,ब्याज,व्यापार,व्यवस्था,व्यवहार,आदि! +ख.शुरू में ओकार नहीं लगा है,लेकिन उच्चारित होता है! जैसे-द्वार दो+वा+ र,द्वंद्व,ज्वर,त्वरित आदि! +8.शब्दों के उच्चारण के हिसाब से वर्णों का क्रम अस्पष्ट होता है!असमंजस की स्थिति रहती है!जैसे-क.वृद्ध उच्चारण वृ+द्+ध होता है! +ख.निर्देश लिखे वर्ण का क्रम देखें तो नि+दे+र्+श उच्चारण के अनुसार ' दे ' के पहले ' र ' ध्वनि संकेत लिखा होना चाहिए ! लेकिन ऐसा नहीं है-दे के बाद र का संकेत लगता है! +9.अनुनासिक अनेक ध्वनि संकेतों के बदले सिर्फ अनुस्वार का प्रयोग होने के कारण ध्वनि का गलत संकेत लिखा जा रहा है ! जैसे-अंत उच्चारित करें तो अ+न्+त=अन्त होता है!इसी तरह कंपनी/कम्पनी,खंड/खन्ड/खण्ड आदि! +10.देवनागरी एक हजार साल पुरानी लिपि है!कम्प्यूटर से हिंदी टाइपिंग में लगभग140ध्वनि संकेतों की आवश्यकता होती है! +देवनागरी लिपि से विकसित होडो़ सेंणा लिपि में उपर्युक्त सभी कमियों का समाधान है!इस लिपि से मात्र 45 ध्वनि संकेत चिह्नों से शुद्ध वर्तनी लिखी जा सकती है!सिर्फ हिंदी और मुंडा भाषाएँ ही नहीं,अनेक भारतीय भाषाएँ भी शुद्ध वर्तनी के साथ लिखी जा सकती हैं ! +रवीन्द्र नाथ सुलंकी +www.hindikinailipi.com +साधन के सही विकास की कमी. +देवनागरी लिपि में लिखने हेतु साधन कई सारे हैं, लेकिन सभी में कुछ न कुछ कमी होती है। जैसे कृति देव नामक फॉन्ट से कार्यालय में लोग हिन्दी लिखते हैं। लेकिन यह फॉन्ट यूनिकोड में नहीं होता है। अर्थात यह केवल एक दिखावटी हिन्दी है, जो केवल फॉन्ट के रखने तक ही होती है। इसका उपयोग इंटरनेट पर नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसका उपयोग छपाई और चित्र बनाने जैसे फोटो शॉप आदि में सरलता से किया जा सकता है। +इसके दूसरी विधि है। उच्चारण के अनुसार रोमन लिपि के कुंजीपटल पर लिखना। इससे यदि आप रोमन लिपि अच्छे से लिख सकते हो तो उससे उच्चारण के समान कुछ देवनागरी लिपि में भी लिख सकते हो। लेकिन इससे हर शब्द नहीं लिखा जा सकता है और कुछ इस तरह के साधन में यदि लिखा भी जाता है तो उसके लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। +तीसरी विधि कुंजीपटल से अलग अलग अक्षर लिखने की है। लेकिन लोग ज़्यादातर या हमेशा रोमन लिपि के कुंजीपटल का उपयोग करते हैं। इस कारण यह विधि काफी कठिन है। लेकिन एक बार यह विधि कोई सीख ले तो बहुत आसानी हो जाती है। लेकिन इस विधि में भी कई बार कई अक्षर नहीं होते हैं। इस कारण यदि कोई इस विधि को सीख भी ले तो उसे बार बार अपने कुंजी पटल की व्यवस्था को बदलते रहना पड़ेगा। +साधन के प्रचार की कमी. +यदि कोई हिन्दी लिखने का अच्छा साधन है, तो भी उसके प्रचार में इतनी कमी है कि लोग उस तक पहुँच भी नहीं पाते हैं। कुछ लोग जो लिखने के लिए सरल तरीका चाहते हैं, उनके लिए भी कई तरह के साधन है और जो लोग कृति देव आदि फॉन्ट का उपयोग लिखने के लिए करना चाहते हैं, उनके लिए परिवर्तक भी मौजूद है जो आपके द्वारा कृति देव के रोमन लिपि को देवनागरी लिपि के यूनिकोड में बदल देता है। इससे आप इंटरनेट पर कहीं भी इसे किसी को भी दिखा सकते हो। +हिन्दी में उपलब्ध हर जालस्थल (वेबसाइट) अपने ओर से या तो कोई साधन उपलब्ध कराता है या उतना भी उपलब्ध नहीं कराता है। इस कारण लोगों के पास हिन्दी लिखने के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है या फिर उपलब्ध साधन उनके लिए ठीक नहीं होता है। इस कारण देवनागरी लिपि के सही साधनों के प्रचार की बहुत आवश्यकता है। +बाधा दूर करने के उपाय. +ेवनागरी लिपि से विकसित होडो़ सेंणा लिपि में देवनागरी लिपि की सभी कमियों के समाधान हैं! कृपया सम्पूर्ण जानकारी के लिए निम्नलिखित वेबसाइट पर देखें - +www.hindikinailipi.com रवीन्द्र नाथ सुलंकी www.hindikinailipi.com + +देवनागरी/विकास: +हिन्दी एवं अन्य भारतीय व नेपाली भाषाओं के विकास हेतु देवनागरी लिपि का विकास करना अति आवश्यक है। क्योंकि इन भाषाओं में कई ऐसे उच्चारण होते हैं, जिसे किसी अन्य लिपि में लिखा नहीं जा सकता है। और यदि लिखा भी गया तो उसका सही उच्चारण नहीं होगा। इस कारण इससे भाषा के शब्दों का विलुप्त होने की प्रक्रिया शुरू होने लगेगी। जो किसी भी भाषा के विलुप्त होने के पहले चरण में आता है। इस कारण इस लिपि का विकास बहुत आवश्यक है। +विकास. +उच्चारण और विभिन्न तरीकों में यह लिपि पहले ही विकसित है। लेकिन "कम्प्युटर" व इंटरनेट के अधिक उपयोग के साथ इसे भी इनमें अपना स्थान बनाना होगा। लेकिन इसके लिए इसके साधन और समर्थन की आवश्यकता है। देवनागरी लिपि की 10 खामियाँ ! +1.ग, ण,और श में आकार लगे होने का भ्रम होता है ! +2.वर्ण के प्रकार -- +क, र 'ध्वनि-राजा , क्रम , कर्म , ट्रक , ऋण , कृपा +ख.द - दम , विद्या , छद्म , गद्दी +ग. क-कर , वक्त , क्वाथ , +घ .श-शाम,श्रम,श्याम +ङ.म-मन,म्यान,छद्म,ब्रह्म +च.भ-भवन,अभ्युक्ति,उद्भव, +3.संयुक्ताक्षर में आधे अक्षर बाएँ, दाएँ और नीचे लगते हैं-वह, व्यय, द्वार,जिह्वा! +4.शुद्ध में द पूरा अक्षर लिखा है,लेकिन उच्चारण आधा होता है!ध आधा लिखा होता है,लेकिन उच्चारण पूरा होता है !इसी तरह वृद्ध,श्रद्धा आदि! +5.शक्ति में क पर भी इकार लगता है!ऐसे ही निश्चित,बल्कि आदि! +6.द्विज का उच्चारण दु+वि+ज होता है!लिखने और पढ़ने दोनों में दुविधा होती है! +7.जो लिखा दिखता है वह उच्चारित नहीं होता है!और जो कहते हैं वह नहीं लिखा जाता है! +क.शुरू में एकार लगा नहीं है लेकिन उच्चारित होता है! जैसे-क्या का उच्चारण के+या होता है!इसी तरह-व्यय, प्यास,प्याज,ब्याज,व्यापार,व्यवस्था,व्यवहार,आदि! +ख.शुरू में ओकार नहीं लगा है,लेकिन उच्चारित होता है! जैसे-द्वार दो+वा+ र,द्वंद्व,ज्वर,त्वरित आदि! +8.शब्दों के उच्चारण के हिसाब से वर्णों का क्रम अस्पष्ट होता है!असमंजस की स्थिति रहती है ! जैसे-क.वृद्ध उच्चारण वृ+द्+ध होता है! +ख.निर्देश लिखे वर्ण का क्रम देखें तो नि+दे+र्+श उच्चारण के अनुसार ' दे ' के पहले ' र ' ध्वनि संकेत लिखा होना चाहिए ! लेकिन ऐसा नहीं है-दे के बाद र का संकेत लगता है! +9.अनुनासिक अनेक ध्वनि संकेतों के बदले सिर्फ अनुस्वार का प्रयोग होने के कारण ध्वनि का गलत संकेत लिखा जा रहा है ! जैसे-अंत उच्चारित करें तो अ+न्+त=अन्त होता है!इसी तरह कंपनी/कम्पनी,खंड/खन्ड/खण्ड आदि! +10.देवनागरी एक हजार साल पुरानी लिपि है! कम्प्यूटर में हिंदी टाइपिंग में लगभग140ध्वनि संकेतों की आवश्यकता होती है! +देवनागरी लिपि से विकसित होडो़ सेंणा लिपि में उपर्युक्त सभी कमियों का समाधान है!इस लिपि से मात्र 45 ध्वनि संकेत चिह्नों से शुद्ध वर्तनी लिखी जा सकती है!सिर्फ हिंदी और मुंडा भाषाएँ ही नहीं,अनेक भारतीय भाषाएँ भी शुद्ध वर्तनी के साथ लिखी जा सकती हैं ! +रवीन्द्र नाथ सुलंकी +www.hindikinailipi.com +हर क्षेत्र में. +हिन्दी फिल्मों का भारत के अलावा कई देशों में बहुत अधिक लोकप्रियता है, लेकिन अन्य देशों में अधिक कमाई के कारण यह देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि का अधिक उपयोग करते हैं। जब कई वर्ष पूर्व हिन्दी फिल्में केवल यहीं के दर्शक देखते थे, तब हिन्दी/उर्दू के लिखे जाने वाले लिपि में होता था। लेकिन बाद बाद में क्षेत्र के विस्तार के साथ साथ यह इन सभी को भूल कर रोमन लिपि का उपयोग करने लगे। इस कारण इस लिपि को काफी हानि हुई। इसे फिर से इस क्षेत्र में विकास करने हेतु इसके साथ देवनागरी लिपि में लिखे नाम की भी आवश्यकता है। +वैसे तो धारावाहिक में कई बार नाम देवनागरी लिपि में ही होता है। लेकिन कुछ लोग "फॉन्ट" की कमी या अन्य कारण से इस लिपि के स्थान पर अन्य लिपि का उपयोग कर रहे हैं। धारावाहिक देखने वाला व्यक्ति हर दिन इसे देखता है। यदि इसमें देवनागरी लिपि नहीं होने से उससे उसके पढ़ने में भी देवनागरी लिपि कमजोर होती जाएगी। इससे लोगों को धीरे धीरे देवनागरी लिपि पढ़ने में कठिन लगने लगेगा। इस कारण यदि देवनागरी लिपि का विकास करना है तो हर धारावाहिक के नाम को भी देवनागरी में ही होना चाहिए और हर विज्ञापन जो दिखाया जाता है उसे भी देवनागरी लिपि में ही होना चाहिए। +वैसे समाचार पत्र में जो हिन्दी भाषा में होते हैं, उनमें इस लिपि को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं और इसी लिपि का उपयोग करते हैं। लेकिन कई बार इसके समाचार में भी देवनागरी लिपि के स्थान पर अन्य लिपि का उपयोग होता है। इससे उस समाचार को पढ़ने वाले पाठक के मन में भी धीरे धीरे अन्य लिपि के शब्द आने लगते हैं। जो किसी भी लिपि के लिए अच्छे संकेत नहीं है। इस लिपि के विकास हेतु हर समाचार पत्र को देवनागरी लिपि का सम्मान के साथ उपयोग करना चाहिए और जो विज्ञापन देने वाले ऐसा नहीं करते, उन्हें समझाना चाहिए कि इससे देवनागरी लिपि को बहुत हानि होगी। इस तरह के विज्ञापन देने वाले लोगों को भी यह स्वयं से समझना चाहिए कि वे बिना जाने की गलती से देवनागरी लिपि का विनाश कर रहे हैं। +मोबाइल सेवा प्रदाता कई बार देवनागरी लिपि में यूनिकोड का उपयोग कर संदेश भेज देते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता रहता है कि वह जिस उपकरण में यह भेज रहे हैं, वह उसे आसानी से दिखा सकता है या नहीं। इस कारण मोबाइल सेवा प्रदाता हिन्दी में संदेश ही लिखना बंद कर देते हैं। जबकि उन्हें हर मोबाइल ग्राहक को एक संदेश भेज कर यह जानना चाहिए कि उन्हें यह संदेश स्पष्ट दिख रहा है या नहीं। ताकि भविष्य में उन्हें आसानी से वे लोग हिन्दी में संदेश भेज सकें। इसके अलावा जो मोबाइल बनाते हैं, उन्हें भी अपने हर मोबाइल पर हिन्दी लिखने और पढ़ने की सेवा उपलब्ध रखनी चाहिए। इसके अलावा हर मोबाइल खरीदने वाले व्यक्ति को भी यह ध्यान देना चाहिए कि उसके मोबाइल में हिन्दी में लिखने और पढ़ने कि एक बहुत छोटी सी सुविधा है या नहीं। यह बहुत ही छोटी सी सुविधा है और इसके होने या न होने से मोबाइल के दाम में कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन इससे आपके लिए बहुत सारे काम आसान हो जाएँगे। +सबसे बड़ी समस्या इंटरनेट पर वार्तालाप के दौरान होती है। लेकिन हिन्दी में शब्दों का आकार अन्य भाषाओं की तुलना में काफी कम होता है। इस कारण कोई भी वार्तालाप में भी यूनिकोड के साथ हिन्दी लिख सकता है। लेकिन लोग ऐसा नहीं करते हैं। इस कारण यह देवनागरी के विकास में सबसे बड़ी बाधा भी है। जब तक लोग एक दूसरे से वार्तालाप के लिए इस लिपि का उपयोग नहीं करते तब तक इसका सही विकास नहीं हो सकता है। लेकिन इसमें एक बहुत उपयोगी बात यह है कि देवनागरी लिपि में अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं होती है। उदाहरण के लिए आप अमर लिखते हो तो आपको कुछ हिन्दी लिखने के साधन में केवल तीन अक्षर ही लिखने होते हैं। यह अपने आप ही बाकी को तय कर के आपके लिए अमर लिख देता है। इससे कोई भी आसानी से वार्तालाप के लिए इस लिपि का उपयोग कर सकता है। +यदि आप देवनागरी लिपि में लिखने वाले कुछ साधन को उपयोग कर देखें तो आपको पता चलेगा कि केवल कुछ शब्दों को छोड़ कर हिन्दी के हर शब्द के लिए आपको दो से तीन बटन दबाने पड़ेंगे। अर्थात जो अन्य भाषाओं में आपको छोटे रूप में लिखने पर 3 से 5 बटन दबाने पड़ते हैं। उनके लिए सही मात्रा के साथ हिन्दी यूनिकोड में आप को मात्र 2 से 3 बटन ही दबाने होते हैं। यह एक आश्चर्य की बात है, लेकिन आप हिन्दी के लिखने वाले कई साधन से आसानी से ऐसा कर के फेसबूक आदि में अपने मित्रो से बात कर सकते हो। इसके अलावा उन्हें पढ़ने में भी कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि आप देवनागरी लिपि में लिख रहे होंगे। देवनागरी लिपि की मुख्य विशेषताओं में से यह भी है कि आप जो भी बोल सकते हो वह आप लिख भी सकते हो। जबकि अन्य लिपियों में ऐसा नहीं है। +तेजी. +देवनागरी लिपि को लोग शायद धीमी गति के कारण नहीं लिखते होंगे। ऐसा हो सकता है लेकिन देवनागरी लिपि में लिखने वाले साधन इतने अधिक तेजी से आपको देवनागरी लिपि में लिखने देते हैं कि आप रोमन लिपि से भी तेजी से इस लिपि को लिख सकते हो। +रोमन लिपि में जो शीघ्र लेखन का उपयोग कर स्वर को भूल कर अपने लेख लिखते हैं। वैसा ही यदि आप देवनागरी लिपि में करोगे तो आप स्वर अपने आप ही लिखोगे। इसमें देवनागरी लिपि की विशेषता है कि इसके व्यंजन को लिखते समय स्वतः ही इसमें स्वर आ जाता है और आपके द्वारा लिखा गया एक अक्षर रोमन लिपि के दो से चार अक्षर के समान होता है। +शीघ्र लेखन. +क्या लोग रोमन लिपि कि तरह शीघ्र लेखन का कार्य इस लिपि में कर सकते हैं? हमेशा, क्योंकि इसके कई साधन आपको केवल शीघ्र लेखन के द्वारा ही इस लिपि को लिखने देते हैं। मतलब आप इस कला से अच्छे गुणवत्ता वाले हिन्दी शब्दों को रोमल लिपि के शीघ्र लेखन की तरह ही लिख सकते हो। +यदि आपको शीघ्र लेखन कला आती है तो भी आप समान गुणवत्ता में देवनागरी लिपि में अपनी बात लिख सकते हो। या ये भी बोल सकते हैं कि देवनागरी लिपि को लिखने के लिए आपको शीघ्र लेखन कला आना चाहिए या आप इस लिपि में लिख कर यह कला सीख सकते हो। +कुल मिला कर यदि आप पूरे ज़ोर शोर से रोमन लिपि को आधे अधूरे शब्दों में लिख कर कुछ लिखोगे ठीक उतनी गति में आप बड़े बड़े देवनागरी लिपि के शब्द भी लिख सकते हो। लेकिन यह जानकारी लोगों तक नहीं पहुँचती है। + +देवनागरी/मात्रा: +देवनागरी लिपि में मात्राओं का सबसे मुख्य काम होता है। यह स्वर में अदृश्य रूप में होती हैं और व्यंजन में अलग तरह से जुड़ती है। + +हिन्दी/नामकरण: +हिन्दी एक फारसी भाषा का शब्द है। फारसी लोग सिन्ध शब्द का उच्चारण हिन्द के रूप में करते थे। इस कारण साम्राज्य स्थापित करने के बाद उसे हिंदुस्तान नाम दिया गया और वहाँ बोले जानी भाषा का नाम उसी से हिन्दी पड़ा। हिन्दी का अर्थ हिन्दुस्तान की भाषा होता है। +तुर्की भाषा में. +तुर्की भाषा में हिन्दी अर्थ "भारत का" होता है। अर्थात हिन्दी भाषा का अर्थ भारत की भाषा से है। यह शब्द तुर्की में हिन्दी नाम चिड़िया के लिए उपयोग किया जाता है। इस चिड़िया के कई गुण भारत में पाई जाने वाली मुर्गियों से मिलता है। इस कारण इसका नाम वहाँ हिन्दी पड़ा। + +हिन्दी/आजादी के बाद: +आजादी के बाद 13 सितम्बर 1949 भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि किसी विदेशी भाषा से कोई देश महान नहीं बन सकता, क्योंकि कोई भी विदेश भाषा आम लोगों की भाषा नहीं बन सकता है। उसके एक दिन बाद 14 सितंबर 1949 में हिन्दी भाषा को लेकर कई निर्णय लिए गए। इसमें यह निर्णय लिया गया कि हिन्दी भाषा लिपि देवनागरी और अंक अंतरराष्ट्रीय होगा। यह भारत की राजभाषा भी होगा। +हिन्दी का विरोध और अंग्रेज़ी को स्थान. +हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने के बाद ही इसका विरोध शुरू होने लगा। क्योंकि कुछ प्रतिशत लोगों को हिन्दी का कोई ज्ञान नहीं था। इस विरोध के बाद यह फैसला लिया गया कि अंग्रेज़ी भाषा को 15 वर्षों के लिए राजभाषा का स्थान जाएगा। इसके बाद केवल हिन्दी ही राजभाषा होगी। इन 15 वर्षों में सभी को हिन्दी भाषा सिखाया जाएगा, जिससे किसी को भी हिन्दी भाषा में किसी भी प्रकार की तकलीफ न हो। +15 वर्षो के बाद. +15 वर्षों के बाद हिन्दी भाषा का विकास नहीं हुआ और तब तक अंग्रेज़ी भाषा ने काफी हद तक हिन्दी का स्थान ले लिया था। 26 जनवरी 1965 को संसद में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि "हिन्दी का सभी सरकारी कार्यों में उपयोग किया जाएगा, लेकिन उसके साथ साथ अंग्रेज़ी का भी सह राजभाषा के रूप में उपयोग किया जाएगा।" वर्ष 1967 में संसद में "भाषा संशोधन विधेयक" लाया गया। इसके बाद अंग्रेज़ी को अनिवार्य कर दिया गया। इस विधेयक में धारा 3(1) में हिन्दी की चर्चा तक नहीं की गई। इसके बाद अंग्रेज़ी का विरोध शुरू हुआ। 5 दिसंबर 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राज्यसभा में कहा कि हम इस विधेयक में विचार विमर्श करेंगे। लेकिन इसके बाद भी कोई परिवर्तन नहीं किया गया। + +उर्दू भाषा: +उर्दू भाषा भारत और पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा है। यह भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है और पाकिस्तान में यह 2 आधिकारिक भाषाओं में से एक है। यह हिन्दी भाषा के समान ही है। यदि आपको हिन्दी भाषा का ज्ञान है तो आपको केवल लिपि और कुछ शब्दों का ही ज्ञान होने पर आप आसानी से उर्दू में लिख और पढ़ सकते हैं। +विषय-सूची. +प्रथम अध्याय. +प्रथम अध्याय में हम अक्षरों को पहचानना सीखेंगे। उसे किसी और अक्षर से जोड़ने से कैसे पहचान सकते हैं और किस तरह पढ़ते हैं। +द्वितीय अध्याय. +इस अध्याय में हम अक्षरों से बने शब्दों के बारे में पढ़ेंगे। इस अध्याय में आने से पहले आपको प्रथम अध्याय पूरा करना चाहिए, अन्यथा आपको ये अध्याय समझ नहीं आएगा। और यदि आप प्रथम अध्याय पूरा कर लिए हैं तो ये अध्याय किसी जादू से कम नहीं लगेगा। + +भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988: +Aapradhik avchaar +धारा 1. संक्षिप्त नाम और विस्तार. +1) यह अधिनियम भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 कहा जा सकेगा। +2) इसका विस्तार जम्मू और कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है और यह भारत के बाहर भारत के सब नागरिकों पर भी लागू है। +धारा 2. परिभाषाएँ. +इस अधिनियम में जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो - +क. “निर्वाचन” से अभिप्रेत है, कोई निर्वाचन जो किसी अधिनियम के अधीन सांसदों के निर्वाचन या किसी विधान सभा, स्थानीय प्राधिकरण या अन्य लोक प्राधिकरण के निर्वाचन के लिए किसी भी प्रकार किए जाते हैं। +ख. “लोक कर्तव्य” से अभिप्रेत है, कोई ऐसा कर्तव्य जिसके निर्वहन में राज्य की जनता या समाज की रुचि है। +स्पष्टीकरण – इसमें “राज्य” में केन्द्रीय, प्रान्तीय या राज्य के किसी अधिनियम के अधीन निर्मित नियम या कोई प्राधिकरण या कोई निकाय जो सरकार द्वारा स्वामित्वधीन या नियंत्रनाधीन या सहायता प्राप्त है या कोई सरकारी कम्पनी जैसा कि कम्पनी अधिनियम , 1956 ( 1956 का सं 1) की धारा 617 में परिभाषित है। +ग. “लोक सेवक” से अभिप्रेत है- +एक. कोई व्यक्ति जो किसी लोक कर्तव्य के निर्वहन हेतु सरकार की सेवा में हहो अथवा वेतनाधीन हो अथवा इसके लिए कोई फीस, कमीशन या पारिश्रमिक प्रदत्त किया जाता हो, +दो. कोई व्यक्ति जो, किसी स्थानीय निकाय की सेवा में हॉ, वेतनाधीन हो, +तीन. कोई व्यक्ति, जो किसी केन्द्रीय प्रान्तीय या राज्य की किसी विधि के द्वारा या गठित किसी नियम अथवा कॉरपोरेशन या किसी निकाय जो सरकार द्वारा स्वामित्वधीन या निंयत्रणाधीन या सहायता प्राप्त है या कोई सरकारी कम्पनी जैसा कि कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का सं 1) की धारा 617 में परिभाषित है, की सेवा में हो या वेतनाधीन हो, +चार. कोई न्यायाधीश, या विधि द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति, जिसे स्वयं या किसी समूह के सदस्य के नाते न्याय- निर्णयन का कार्य करता हो, +पाँच कोई व्यक्ति जिसे न्याय-निर्णयन के संबंध में न्यायिलय के न्यायाधीश द्वारा किसी कर्तव्य के निर्वहन हेतु प्राधिकृत किया गया हो एवं इसमें सम्मिलित है न्यायालय द्वारा नियुक्त समापक, प्रापक या आयुक्त, +छः कोई मध्यस्थ या अन्य व्यक्ति जिसे किसी न्यायालय या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा कोई प्रकरण या विषय, निर्णयन या रिपोर्ट के लिए निर्देशित किया गया हो। +सात. कोई व्यक्ति जो ऐसा पद धारण करता हो, जिसके आधार पर वह निर्वाचक नामावली तैयार करने, प्रकाशित करने या बनाए रखने या पुनरक्षित करने के लिए या निर्वाचन या उसके किसी भाग को संचालित करने के लिए सशक्त हो। +आठ, कोई व्यक्ति जो ऐसा पद धारण करता है जिसके आधार पर वह किसी लोक कर्तव्य का पालन या निर्वहन करने के लिए प्राधिकृत है। +नौ. कोई व्यक्ति जो किसी रजिस्टर्ड सहकारी संस्था के लिए कृषि, उद्योग व्यापार या बैकिंग में लगा हुआ है जिसे केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा केन्द्रीय, प्रान्तीय या राज्य सरकार की किसी विधि के अधीन गठित किसी कॉरपोरेशन, प्राधिकरण या निगम द्वारा जो सरकार के स्वामित्वधीन, नियंत्रणाधीन या सहायता प्राप्त है या किसी शासकीय कम्पनी, जैसा कि कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का सं 1) की धारा 617 में परिभाषित है किसी प्रकार की आर्थिक सहायता प्राप्त है या प्राप्त हो रही है, का अध्यक्ष सचिव या अन्य पदाधिकारी है। +दस. कोई व्यक्ति जो किसी सेवा आयोग या किसी अन्य नाम से जाने जाना वाला हो, का अध्यक्ष सचिव या कर्मचारी अथवा ऐसे सेवा आयोग या मंडल द्वारा नियुक्त चयन समितिका सदस्य जिसे किसी परीक्षा संचालन अथवा ऐसे सेवा आयोग या मंडल द्वारा उसकी ओर से किसी चयन हेतु नियुक्त किया गया हो, +ग्यारह. कोई व्यक्ति जो किसी विश्वविद्यालय का उपकुलपति या सदस्य है या किसी अधिवासी निकाय या लोक प्राधिकरण का प्राध्यापक, प्रस्तुतकार, व्याख्याता या कोई अन्य अध्यापक या कर्मचारी चाहे वह किसी भी पदनाम से जाना जाता हो जो परीक्षाओं के संयोजन या संचालन से संबंधित हो, +बारह. कोई व्यक्ति जो किसी शैक्षणिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, सांस्कुतिक या अन्य किसी ऐसी संस्था, चाहे जैसे स्थापित की गई हो जिसे केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, या किसी स्थानीय या लोक प्राधिकरण द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त है या प्राप्त कर रही है, का पदाधिकारी या कर्मचारी है। +स्पष्टीकरण 1 – उपर वर्णित उपखण्डों में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति लोक सेवक है चाहे वह सरकार द्वारा नियुक्त किय गया हो या नहीं। +स्पष्टीकरण 2- जहाँ कहीं “ लोक सेवक” शब्द आए है, वे उस व्यक्ति के संबंध में समझे जाएँगे, जो लोक सेवक के पद को वास्तव में धारण किए हुए है, चाहे उस पद के धारण करने में भी कैस विधिक त्रुटि हो। +धारा 3 विशेष न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार. +1) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचनाद्वारा ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए ऐसे मामलों या मामलों के समुहों के लिए जैसा कि अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए जैसा वह आवश्यक समझे निम्नां कित अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायाधीश नियुक्त कर सकती है, अर्थात- +2) कोई व्यक्ति विशेष न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने के लिए तब तक अर्ह न होगा जबतक कि वह दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (1974 का 2) के अधीन सत्र न्यायाधीश, अपर सत्र न्यायाधीश या सहायक सत्र न्यायाधीश न हो या न रह चुका हो। +धारा 4 विशेष न्यायाधीशों द्वारा विचारण के प्रकरण. +1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का सं 2) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी धारा 3 की उपधारा 1 में विनिर्दिष्ट प्रकरणों का विचारण विशेष न्यायाधीशों द्वारा ही किया जाएगा। +2) धारा 3 की उपधारा 1 में विनिर्दिष्ट प्रत्येक अपराध का विचारण उस क्षेत्र के लिए नियुक्त या उस अपराध के विचारण के लिए नियुक्त या यथास्थिति विशेष न्यायाधीश द्वारा किया जावेगा या उस क्षेत्र में यदि एक से अधिक न्यायाधीश है, तो उस न्यायाधीश द्वारा किया जाएगा जैसा कि केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे। +3) किसी मामले के विचारण के दौरान, विशेष न्यायाधीश द्वारा धारा याधीश द्वारा धारा 3 में विनिर्दिष्ट अपराधों के अतिरिक्त ऐसे अपराधों की सुनवाई भी कर सकेगा जो दंड प्रकिता संहिता 1973(1974 का सं 2) के अधीन उस अभियुक्त पर उस विचारण के साथ अधिरोपित किए जा सकते हैं। +4) दंड प्रकिता संहिता 1973(1974 का सं 2) में किसी बात के होते हुए भी विशेष न्यायाधीश अपराध का विचारण दिन – प्रतिदिन के आधार पर करेगा। +धारा 5 विशेष न्यायाधीश के अधिकार एवं प्रक्रिया. +1) विशेष न्यायाधीश किन्हीं अपराधों का संज्ञान उसे विचारण के लिए अभियुक्त की सुपुर्दगी के बिना कर सकता है और विचारण के लिए दंड प्रकिता संहिता 1973(1974 का सं 2) में मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट मामलों के विचारण के लिए विनिर्दिष्ट प्रक्रिया अपनाएगा। +2) विशेष न्यायाधीश अपराध से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबध्द किसी व्यक्ति का साक्ष्य अभिप्राप्त करने की दृष्टि से उस व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमादान कर सकता है कि वह अपराध के संबंध में और उसके किए जाने में चे कर्ता या दुष्प्रेरण के रूप में संबध्द प्रत्येक अन्य व्यक्ति के संबंध में समस्त परिस्थितियों की जिनकी उसे जानकारी है पूर्ण और सत्यता प्रकटन कर दे और तब दंड प्रकिता संहिता 1973(1974 का सं 2) की धारा 308 की उपधारा 1 से 5 तक के प्रयोजन के लिए समझा जाएगा कि क्षमादान उस संहिता की धारा 307 के अधीन दिया गया है। +3) उपधारा 1 की उपधारा 2 में किसी बात के होते हुए भी, दंड प्रकिता संहिता 1973(1974 का सं 2) के प्रावधान जहाँ तक वह इस अधिनियम से असंगत न हो विशेष न्यायाधीश की कार्यवाहियोँ पर लागू होंगे और इन प्रावधानों के प्रयोजन के लिए विशेष न्यायाधीश का न्यायालय सत्र न्यायालय समझा जाएगा और विशेष न्यायाधीश के समक्ष अभियोजन संचलित करने वाला व्यक्ति लोक अभियोजक समझा जाएगा। +4) उपधारा 3 के उपबऩ्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना दंड प्रकिता संहिता 1973(1974 का सं 2) की धारा 326 और 475 के प्रावधान जहाँ तक संभव हो, विशेष न्यायाधीश के समक्ष की कार्यवाहियों पर लागू होंगे और इन प्रावधानों के प्रयोजन के लिए विशेष न्यायाधीश मजिस्ट्रेट समझा जाएगा। +5) विशेष न्यायाधीश किसी दोषसिद्ध व्यक्ति जो उस अपराध के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी दंडादेश पारित कर सकता है जिस अपराध के लिए वह व्यक्ति दोषसिध्द हुआ है। +6) इस अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराध का विचारण करने वाला विशेष न्यायाधीश दंड विधि (संशोधन) अध्यादेश, 1944 (1944 का अधयादेश 38) द्वारा जिला न्यायाधीश को प्रदत्त शक्तियों एवं कृत्योँ का प्रयोग कर सकेगा। +धारा 6 संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति. +1) जहाँ विशेष न्यायाधीश धारा 3 की उपधारा 1 में विहीत अपराध का विचारण किसी लोक सेवक जिसके विरुद्ध आवश्यक वस्तु अधिनियम , 1955( 1955 का 10) की धारा 12-क की उपधारा 1 में वर्णित विशेष आदेश अथवा उस धारा की उपधारा 2 के खंड क के उल्लंघन का आरोप है तो इस अधिनियम की धारा 5 अथवा दंड प्रक्रिया संहिता 1973(1974 का सं 2) की धारा 260 में किसी बात के होते हुए भी विशेष न्यायाधीश उस अपराध का संक्षिप्त विचारण करेगा और संहिता की धारा 262 से धारा 265 दोनों को सम्मिलित करते हुए के प्रावधान जहाँ तक संभव होगा लागू होंगेः +परन्तु यह कि इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण दोषसिध्द होने पर विशेष न्यायाधीश के लिए यह विधि संगत होगा कि वह एक वर्ष की अवधि तक का दंडादेश दे सकता हैः +परन्तु यह और भी कि इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण प्रारम्भ होने के पूर्व या उसके दौरान विशेष न्यायाधीश को ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकरण ऐसी प्रकृति का है कि एक वर्ष से अधिक अवधि के कारावास का दंडादेश आवश्यक होगा अथवा अनय किसी कारण से उसका संक्षिप्त विचारण अपेक्षित नहीं है तो विशेष न्यायाधीश पक्षकारों की सुनवाई के पश्चात आदेश अभिलिखित करेगा और तत्पश्चात किसी साक्षी को जिसका कि परीक्षण किया चुका है पुनः बुला सकेगा और संहिता के प्रावधानोँ में विनर्दिष्ट मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट मामलों के विचारण की प्रक्रिया अपनाएगा या मामले का विचारण जारी रखेगा। +2) इस अधिनियम दंड प्रकिता संहिता 1973(1974 का सं 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण, जिसमें विशेष न्यायाधीश द्वारा एक मास से अनधिक की अवधि के कारावास और दो जार रूपए से अनधिक जुर्माने से दंड दिया गया है और उक्त संहिता की धारा 425 के अधीन इसके अतिरिक्त कोई आदेश दिया गया हो अथवा दंड के विरुद्ध कोई अपील नही होगी किन्तु उपरोक्त वर्णित सीमा से अधिक द॔डादेश पर अपील हो सकेगी। +धारा 7 लोक सेवक द्वारा अपने पदीय कृत्य के संबंध में वैध पारिश्रमिक से भिन्न परितोषण प्रतिग्रहीत करना. +जो कोई लोक सेवक होते हुए या ने की प्रत्याशा रखते हुए, वैध पारिश्रमिक से भिन्न प्रकार का भी कोई परितोषण किसी बात करने के प्रयोजन से या ईनाम के रूप में किसी व्यक्ति से प्रतिग्रहीत या अभिप्राप्त करेगा या करने को सहमत होगा या करने का प्रयत्न करेगा कि वह लोक सेवक कोई पदीय कार्य करे या पदीय कार्य करने का लोप करे या किसी व्यक्ति को अपनी पदीय कार्यों के प्रयोग से कोई अनुग्रह करे या करने से प्रतिविरत करे अथवा केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या संसद या राज्य के विधान मंडल या किसी स्थानीय प्राधिकारी, निगम या धारा 2 के खंड ग में वर्णित शासकीय कम्पनी अथवा किसी लोक सेवक से, चाहे नामित हो या अन्यथा ऐसे कारावास से जिसकी अवधि पाँच वर्ष तक की हो सकेगी किन्तु जो छह मास से कम कीनही होगी दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय गा। +स्पष्टीकरण. +क- “लोक सेवक होने की प्रत्याशा रखते हुए” यदि कोई व्यक्ति जो किसी पद पर होने की प्रत्याशा न रखते ए दूसरों को प्रवंचना से विश्वास कराकर कि वह किसी पद पर पदासीन होनेवाला है, और तब वह उसका अनुग्रह करेगा, उससे पारितोषण अभिप्राप्त करेगा, तो वह छल करने का दोषी हो सकेगा। किन्तु वह इस धारा में परिभाषित अपराध का दोषी नही है। +ख. “परितोषण”- परितोषण शब्द धन संबंधी परितोषण तक, या उन परितोषणों तक ही जो धन में आँ के जाने योग्य है, सीमित नहीं है। +ग. “वैध पारिश्रमिक” – वैध पारिश्रमिक शब्द उस पारिश्रमिक तक ही सीमित नहीं है जिसकी माँग कोई लोक सेवक विधिपूर्ण रूप से कर सकता है, किन्तु उसके अन्तर्गत वह समस्त पारश्रमिक आता है, जिसको प्रतिग्रहीत करने के लिए वह उस सरकार द्वारा या उस संगठन द्वारा, जिसकी सेवा में वह है, उसे दी गई। +घ. “करने के लिए हेतु या इनाम” – वह व्यक्ति जो वह बात करने के लिए हेतु या इनाम के रूप में जिसे करने का उसका आशय नही या वह ऐसा करने की स्थिति में नहीं है अथवा जो उसने नहीं की है, परितोषण प्राप्त करता है, इस स्पष्टीकरण के अन्तर्गत आता है। +च. जहाँ कोई लोक सेवक किसी व्यक्ति को गलत विश्वास के लिए उत्प्रेरित करता है कि उसके प्रभाव से उसने, उस व्यक्ति के लिए अभिलाभ प्राप्त किया है और इस प्रकार उस कार्य के लिए कोई रूपया या अन्य परितोषण इनाम के रूप में प्राप्त करने के लिए उत्प्रेरित करताहै तो ऐसे लोक सेवक ने इस धारा के अधीन अपराध किया है। +टिप्पणियाँ. +रिश्वत— माँग—अभियुक्त कोई जावक लिपिक नहीं है जो सम्पत्ति मूल्यांकन प्रमाण-पत्र जारी कर सकता है—वह केवल एक अनुशंसा प्राधिकारी है— यह और कि, अभिकथित रिश्वत की माँग से पूर्व उक्त सम्पत्ति मूल्यांकन प्रमाण-पत्र अग्रेषित और अन्तिम प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित किया जा चुका था— यह रिश्वत की माँग के बारे में संदेह उत्पन्न करता है, अतः दोषमुक्ति उचित थी। राज्य बनाम नरसिम्हाचारी ए. आई. आर. 2006 एस. सी. 628। +धारा 8. लोक सेवक पर भ्रष्ट या विधि विरुद्ध साधनों द्वारा असर डालने के लिए परितोषण लेना. +जो कोई अपने लिए या किसी अन्य के लिए किसी प्रकार का कोई परितोषण किसी लोक सेवक को चाहे नामित हो या अन्यथा, को भ्रष्ट या अवैध साधनों द्वारा ऐसी बात के लिए उत्प्रेरित करने के लिए हेतु या ईनाम के रूप में किसी व्यक्ति से प्रतिग्रहीत या अभिप्रापत करेगा या करने के लिए सहमत होगा या करने का प्रयत्न करेगा कि वह लोक सेवक अपना कोई पदीय कार्य करे या करने से प्रतिविरत रहे या किसी व्यक्ति का अपने पदीय कृत्यों के प्रयोग में कोई अनुग्रह करे या दिखाए अथवा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार, संसद या राज्य विधान मंडल या किसी स्थानीय प्राधिकारी, निगम या धारा 2 के खंड ग में वर्णित शासकीय कम्पनी अथवा किसी लोक सेवक से चाहे नामित हो या अन्यथा ऐसे कारावास से जिसकी अवधि पाँच वर्ष तक की हो सकेगी किन्तु जो छह मास से कम नही होगी दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा। +धारा 9. लोक सेवक पर वैयक्तिक असर डालने के लिए परितोषण का लेना. +जो कोई अपने लिए या किसी अन्य के लिए किसी प्रकार का कोई परितोषण किसी लोक सेवक को चाहे नामित या अन्यथा अपने वैयक्तिक प्रभाव के प्रयोग दवारा इस बात के लिए उत्प्रेषित करने के लिए हेतु या ईनाम के रूप में किसी व्यक्ति से प्रतिग्रहीत करेगा या अभिप्राप्त करेगा या करने को सहमत होगा या करने का प्रयत्न करेगा कि वह लोक सेवक कोई पदीय कार्य करे या करने का लोप करे अथवा किसी व्यक्ति को ऐसे लोक सेवक के पदीय कृत्यो के प्रयोग में कोई उपकार करे या दिखाए या दिखाने का लोप करे अथवा केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या संसद या राज्य विधान मंडल या किसी स्थानीय प्राधिकारी, निगम या धारा 2 के खंड ग में वर्णित शासकीय कम्पनी अथवा किसी लोक सेवक से चाहे नामित हो या अन्यथा ऐसे कारावास से जिसकी अवधि पाँच वर्ष तक हो सकेगी किन्तु जो छह मास से कम की नहीं होगी दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडणीय होगा। +धारा 10. धारा 8 या धारा 9 में परिभाषित अपराधों को लोक सेवक द्वारा उत्प्रेरण के लिए दंड. +जो कोई लोक सेवक होते हुए धारा 8 या 9 में परिभाषित अपराधों का दुष्प्रेरण करेगा चाहे उसके परिणामस्वरूप अपराध घटित हुआ हो या नही तो उसे ऐसे दुष्प्रेरण के लिए ऐसे कारावास से जिसकी अवधि पाँच वर्ष तक की हो सकेगी, किन्तु जो छह मास से कम की नहीं होगी दंडित किया जाएगा और जुर्माने से दंडणीय होगा। +धारा 11. लोक सेवक जो ऐसे सेवक द्वारा की गई प्रक्रिया कारबार से सम्पृक्त व्यक्ति से प्रतिफल के बिना मूल्यवान चीज अभिप्राप्त करता है. +जो कोई लोक सेवक होते हुए अपने लिए या किसी अन्य के लिए किसी व्यक्ति से यह जानते हुए कि ऐसे लोक सेवक द्वारा की गई या की जाने वाली किसी क्रिया या कारबार से वह व्यक्ति संपृक्त हो चुका है या उसका संप्क्त होना संभाव्य है या स्वयं उसके या किसी ऐसे लोक सेवक जिसका वह अधीनस्थ है पदीय कृत्यों से वह व्यक्ति आशक्त है या किसी ऐसे व्यक्ति से यह जानते हुए कि वह इस प्रकार संप्रृक्त व्यक्ति से हितबध्द है या रिश्तेदारी रखता है किसी मूल्यवान वस्तु को किसी प्रतिफल के बिना किसी ऐसे प्रतिफल के लिए जिसे वह जानता हो कि अपर्याप्त है प्रतिग्रीत करेगा या अभिप्राप्त करेगा, करने को सहमत होगा, या करने का प्रयत्न करेगा वह ऐसे कारावास से दंडित किया जाएगा जिसकी अवधि पाँच वर्ष तक की हो सकेगी परन्तु जो छह मास से कम की नहीं होगी और जुर्माने से भी दंडनीय होगा। +धारा 12. धारा 7 या धारा 11 में परिभाषित अपराधों के दुष्प्रेरण के लिए दंड. +जो कोई धारा 7,या धारा 11 के अधीन दँडनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा, चाहे भले ही उसे दुष्प्रेरण के परिणामें स्वरूप कोई अपराध घटित हुआ हो या नही ऐसे कारावास से दंडित किया जाएगा जिसकी अवधि पाँच वर्ष तक की हो सकेगी किन्तु जो छह मास से कम नहीं गी और जुर्माने से दंडनीय होगा। +टिप्पणियाँ. +अभियुक्त –अपीलार्थी हत्या के एक प्रकरण में अन्तर्गस्त था- परिवादी- पुलिस निरीक्षक को रिश्वत के रूप में रूपये 10,000/- भेंट करने के लिए दोषसिध्द- सुबह सबेरे परिवादी के घर पर दो आरक्षकों की उपस्थिति में रिश्वत दिया जाना अभिकथित किया गया- प्रथम सूचना रिपोर्ट दाखिल करने में 4 घंटे का विलंब यद्यपि पुलिस थाना बहुत दुर नही था- अभियुक्त फौरन ही गिरफ्तार नही किया गया- उन दो आरक्षकों में से एक की जाँच नहीं की गई- रपयों के पार्सलको सीलबन्द करने के ढंग एवं रिती में विसंगति – अपीलार्थी संदेह का लाभ पानेका हकदार है और इसलिए दोषमुक्त। ओम प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य, ए. आई. आर. 2006 एस सी 894 = (2006) 2 एस. सी. सी. 250 =2006 (II) एम. पी. डब्ल्यु एन. 1 (एस. सी)। +धारा 13 लोक सेवक द्वारा आपराधिक अवचार. +1) लोक सेवक आपराधिक अवचार के अपराध का करने वाला कहा जाता है- +क. यदि वह अपने लिए या किसी अन्य के लिए वैध पारिश्रमिक से भिन्न कोई पारितोषण हेतु या ईनाम के रूप में जैसा कि धारा 7 में उपबन्धित है किसी व्यक्ति से अभ्यासतः प्रतिग्रीत या अभिप्राप्त करता है, करने को सहमत होता है या करने का प्रयत्न करता है; या +ख. यदि वह अपने लिए या कीसी अन्य के लिए कोई मूल्यवान वस्तु प्रतिफल के बिना या ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका पर्याप्त होना वह जानता है किसी ऐसे व्यक्ति से जिसका अपने द्वारा की गई या की जाने वाली किसी प्रक्रिया या कारबार से संबंध रहा होगा या हो सकना अथवा अपने या किसी ऐसे लोक सेवक जिसका वह अधीनस्थ है पदीय कार्यों से कोई संबंद होना वह जानता है अभ्यासतः प्रतिग्रहीत या अभिप्राप्त करता है या प्रतिग्रहीत करने के लिएसमत होता है या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करता ; या +ग. यदि वह लोक सेवक के रूप में उसे सौंपी गई या उसके नियंत्रणाधीन कोई संपत्ति अपने उपयोग के लिए बेईमानी से या कपटपूर्वक दुर्विनियोग करता है या अन्यथा सम्परिवर्तत कर लेता है या किसी अन्य को ऐसे करने देता है, या +घ. यदि वह- +ड़. यदि उसके या उसकी ओर से किसी व्यक्ति के आधिपत्य में ऐसे धन संबंधी साधन एवं ऐसी सम्पति जो उसकी आय की ज्ञात स्त्रोतों की आनुपातिक है अथवा उसकी पदीय कालावधि के दौरान किसी समय आधिपत्य में रही है जिसका लोक सेवक समाधानप्रद रूप से विवरण नहीँ दे सकता। +स्पष्टीकरण- इस धारा के उद्देश्यों के लिए आय के ज्ञात स्त्रोतों पद का तात्पर्य होगा कोई ऐसे वैध स्त्रोत जिससे आय प्राप्त की गई है औरलोक सेवक पर तत्समय प्रवृत्त किसी विधि, नियम या आदेश के अधीन उसकी प्राप्ति की सूचना दे दी गई है। +2) कोई लोक सेवक जो आपराधिक अवचार करेगा ऐसे अवधि के कारावास सेदंडित किया जाएगा जो एक वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी दंडनीय किया जाएगा। +धारा 15 प्रयत्न के लिए दंड. +जो कोई धारा 13 की उपधारा 1 के खंड ग या खंड घ में वर्णित अपराध करने का प्रयत्न करता है वह तीन वर्ष की अवधि तक के हो सकने वाले कारावास से दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा। +धारा 16 – जुर्माना निर्धारण में विचारणीय विषय होंगे. +जहाँ धारा 13 की उपधारा 2 या धारा 14 के अधीन अर्थदंड अधिरोपित किया जाना है तो दंड आदेश जारी करने वाला न्यायालय, उस सम्पति का मूल्य, यदि कोई है जिसे अभियुक्त व्यक्ति ने अपराध में उपार्जित किया है या जहां धारा 13 की उपधारा 1 के खंड ड़ में वर्णित अपराध के लिए सिध्ददोष होता है तो उस खंड में वर्णित अथवा धन संबंधी स्त्रोत जिसके संबंध में अभियुक्त समाधानप्रद विवरण नहीं दे सका , विचार में ले सकेगा। +धारा 17 – अन्वेषण के लिए प्राधिकृत व्यक्ति. +दंड प्रक्रिया स॔हिता, 1973(1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी निम्न पंक्ति के नीचे का कोई भी पुलिस अधिकारी- +क. दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना की दशा में पुलिस निरीक्षक। +ख. बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और अहमदाबाद तथा किसी अन्य मेट्रोपोलिटिन क्षेत्र में, जैसा कि दंड प्रक्रिया स॔हिता, 1973(1974 का 2) की धारा 8 की उपधारा 1 द्वारा अधिसूचना के क्षेत्र में, सहायक पुलिस आयुक्त। +ग. अन्यत्र उप –पुलिस अधीक्षक या इसके समकक्ष पद का अधिकार, +इस अधिनियम के अन्तर्गत दंडनीय किसी अपराध का अन्वेषण यथासिति मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना अथवा उसके लिए कोई गिरफ्तारी वारंट के बिना नही करेगाः +परन्तु यदि पुलिस निरीक्षक की पँक्ति से अनिम्न कोई पुलिस अधिकारी साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत हो तो वह ऐसे किसी अपराध का अन्वेषण, यथास्थिति मेट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना अथवा उसके लिए गिरफ्तारी वारंट के बिना कर सकेगाः +परन्तु आगे यह भी कि धारा 13 की उपधारा 1 के खंड ड़ में निर्दिष्ट किसी अपराध का अन्वेषण ऐसे पुलिस अधिकारी के आदेश के बिना नही किया जाएगा जो पुलिस अधीक्षक की पंक्ति से अनिम्न हो। +धारा 18 – बैँककार, बहियों के अवलोकन का प्राधिकार. +यदि प्राप्त जानकारी द्वारा या अन्यथा किसी पुलिस अधिकारी के पास किसी ऐसे अपराध के कारित होने के संदेह के कारण है, जिसका अन्वेषण करने के लिए वह धारा 17 के अधीन सशक्त है वह यह जानता है कि ऐसे अपराध का अन्वेषण या जांच करने के प्रयोजनों के लिए किन्ही बैंककार बहियों का निरीक्षण किया जाना समीचीन है तो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी वह किन्ही बैंककार बहियों का वहां तक निरीक्षक कर सकेगा जहा तक कि वे उस व्यक्ति कॅ, जिसके द्वारा अपराध किए जाने का सन्देह या किसी अन्य व्यक्ति के जिसके द्वारा ऐसे व्यक्ति के लिए धन धारण किए जाने का संदेह है, लेखाओं से संबंधित है, और उसमें से सुसंगत प्रविष्टियों की प्रमाणित प्रतियां ले सकेगा या लेने का निदेश दे सकेगा तथा संबंधित बैंक उस पुलिस अधिकारी की, इस धारा के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग में सहायता करने के लिए आबध्द होगाः +परन्तु किसी व्यक्ति की लेखाओं के संबंध में इस धारा के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग पुलिस अधीक्षक से अनिम्न किसी पुलिस अधिकारी द्वारा नहीं किया जाएगा, जब तक कि पुलिस अधीक्षक की पंक्ति या उससे ऊपर के किसी पुलिस अधिकारी द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त न किया गया हो। +स्पष्टीकरण- इस उपधारा में बैंक और बैंककाए बही पदों के वे ही अर्थ होंगे जो उन्हे बैँककार बही अधिनियम, 1891 (1891 का 18) में दिए गए है। +धारा 19 – अभियोजन पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता. +1) कोई न्यायालय धारा 7, 10, 11, 13, 15 के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान जिसके संबंध में यह अधिकथित है कि वह लोक सेवक द्वारा किया गया है, निम्नलिखित की पूर्व स्वीकृति के बिना नही करेगा- +2) जहाँ किसी कारण से इस बाबत शंका उत्पन्न हो जाए, कि उपधारा 1 के अधीन अपेक्षित पूर्व मंजूरी केन्द्रीय या राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी में से कुसके द्वारा दी जानी चाहिए वहां ऐसी मंजूरी उस सरकार या प्राधिकारी द्वारा दी जाएगी जो लोक सेवक को उसके पद से उस समय हटाने के लिए सक्षम था जिस समय अपराध किया जाना अभिकथित। +3) दंड प्रक्रिया स॔हिता, 1973(1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी- +4) उपधारा 3 के अधीन अवधारणों के लिए, कि ऐसी मंजूरी के अभाव या किसी अनियमितता, लोप या त्रुटि के कारण न्याय नहीं हो सका है, न्यायालय इन तथ्यों को विचार में लेगा की आपत्ति, किसी कार्यवाही के दौरान उठाई जा सकती थी और उठाई गई थी। +स्पष्टीकरण – इस धारा के प्रयोजनोँ के लिए – +क. “त्रुटि” में मंजूरी देने वाला प्राधिकारी की सक्षमता शामिल है; +ख. “अभियोजन के लिए अपेक्षित मंजूरी” में किस विहीत प्राधिकारी के आवेदन पर किया जाने वाला अभियोजन कि आवश्यकता का सन्दर्भ अथवा किसी विहीत व्यक्ति द्वारा दी गई मंजूरी या इसी प्रकृति की अन्य अपेक्षा सम्मिलित है। +टिप्पणियाँ. +अभियोजन की मंजूरी – एल लोक सेवक के विरुद्ध अभियोजन के लिए मंजूरी प्राप्त की गई- धारा 19 के अधीन अभियोजन की मंजूरी विशिष्ट अभियुक्त के विरुद्ध स्वीकृत की जाती -अतः अन्य लोक सेवक को अभियुक्त के रुप में बुलाया जाना अनुज्ञेय नहीं है। दिलावर सिंह बनाम परविन्दर सिंह उर्फ इकबाल सिंह और अन्य ए. आई. आर 2006 एस. सी. 389। +अभियोजन की मंजूरी- राज्य सरकार का सचिव राज्यपाल के नाम से मंजूरी के आदेश को केवल अधिप्रमाणित करता है- धारा 74 के अधीन यह एक लोक दस्तावेज है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 47 के अनुसार इसका सिध्द किया जाना नही चाहा जा सकता – उक्त आदेश की प्रामाणिकता पर भी प्रश्न नहीं किया जा सकता। राज्य बनाम नरसुम्हाचारी, ए आई. आर 2006 एस. सी 628। +मंजूरी- मंजूरी को स्वीकार या अस्वीकार करने का उचित ढंग एवं रीति- अभिनिर्धारित मंजूरी का आदेश समुचित प्राधिकारी द्वारा मस्तिष्क का प्रयोग करने के बाद दिया जाना चाहिये- इस पर विधि के एक सक्षम न्यायालय में प्रश्न किया जा सकता है यदि अभियुक्त द्वारा यह प्रदर्शित किया जाता है कि आदेश देते समय मस्तिष्क का उचित प्रयोग नहीं किया गया। रोमेश लाल जैन बनाम नागिन्दर सिंह राणा (2006) एस, सी, सी, 294। +धारा 20 – जहाँ लोक सेवक वैध पारिश्रमिक के भिन्न पारिश्रमिक ग्रहण करता है वहाँ उपधारणा. +1) जहाँ धारा 7 या धारा 13 की उपधारा 1 के खंड क या खंड ख के अधीन दंडनीय अपराधों के विचारण में यह साबित कर दिया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति ने, किसी व्यक्ति से वैध वैध पारश्रमिक से भिन्न कोई परितोषण या कोई मूल्यवान वस्तु अपने लिए या किसी अन्य के लिए प्रतिगर्हीत या अभिप्राप्त की है या करने का प्रयत्न किया है या करने की सहमति द है वहा जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए यह उपधारण की जाएगी कि उसने यथास्थिति, उस परितोषण या मूल्यवान वस्तु को ऐसे हेतु या ईनाम के रूप में, जैसा कि धारा 7 में वर्णित है, जिसका अपर्याप्त होना वह जानता है, प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त किया है अथवा सहमत हुआ है या करने का प्रयत्न किया है। +2) जहाँ धारा 12, या धारा 14 के खंड ख के अधीन दंडनीय किसी अपराध के किसी विचारण में यहसा बित कर दिया जाता है कि अभियुक्त ने वैध पारिश्रमिक से भिन्न कोई पारितोषण या कोई मूल्यवान वस्तु दी हो या देने की स्थापना की हो या देने का प्रयत्न किया हो, वहाँ जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए यह उपधारण की जाएगी कि उसने यथास्थिति, उस पारितोषण या मूल्यवान वस्तु को ऐसे ईनाम के रुप में जैसा कि धारा 7 में वर्णित है या, जैसी भी स्थिति हो प्रतिफल के बिना ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका अपर्याप्त होना वह जानता है दिया है, देने की प्रस्थापना की है, या देने का प्रयत्न किया है। +3) उपधारा 1 और 2 में किसी बात के होते हुए भी न्यायालय उक्त अपराधों में निर्दिष्ट उपधारणा करने से इंकार कर सकेगा यदि पूर्वोक्त पारितोषण या वस्तु, उसकी राय में इतनी तुच्छ है कि भ्रष्टाचार का कोई निष्कर्ष उचित रूप से नहीँ निकाला जा सकता है। +टिप्पणियाँ. +लागू होना- सुबह सबेरे परिवादी के घर पर दो आरक्षकों की उपस्थिति में रिश्वत दिया जाना अभिकथित किया गया- प्रथम सूचना रिपोर्ट दाखिल करने में चार घंटे का विलम्ब यद्यपि पुलिस थाना बहुत दूर नही था- अभियुक्त फौरन ही गिरफ्तार नही किया गया- उन दो आरक्षकों में से एक की जांच नहीं की गई – रूपयों के पार्सल को सीलबन्द करने के ढंग एवं रीति में विसंगति – अपीलार्थी संदेह का लाभ पाने का हकदार है और इसलिए दोषमुक्त – रिश्वत की माँग सिध्द नही- अभिनिर्धारित , धारा 20 लागू नहिं होगी- वर्तमान प्रकरण वह प्रकरण नहीं है जहाँ सिध्द करने का भार धारा 20 के अनुसार अभियुक्त पर होता है ओम प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य ए. आई. आर. 2006 एस. सी. 894= (2006) 2 एस. सी. सी. 250 – 2006 (II) एम. पी. डब्ल्यु. एन. 1 (एस. सी)। +धारा 21 – अभियुक्त का सक्षम साक्षी होना. +इस अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराध से आरोपित कोइ व्यक्ति प्रतिरक्षा के लिए सक्षम होगा और वह अपने विरुद्ध या उसी विचारण में अपने साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध किए गए आरोपों को ना साबित करने के लिए शपथ पर साक्ष्य दे सकेगा- +परन्तु- +क. साक्षी के रूप में वह अपनी प्रार्थना पर के सिवाय आहूत नही किया जाएगा। +ख. साक्ष्य देने में उसकी असफलता पर अभियोजन पक्ष कोई टीका टिप्पणी नही करेगा अथवा उससे उसके या उसी विचारण में उसके साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई उपधारणा उत्पनन नहीं होगी। +ग. कोई ऐसा प्रश्न जिसकी प्रकृति यह दर्शित करने की हॆ जिसे अपराध का आरोप उस पर लगाया गया हो, उससे भिन्न कोई अपराध उसने किया है या उसके लिए सिध्ददोष हो चुका है, या बुरे शील का उससे उस दशा में के सिवाय न पूछा जाएगा या पूछे जाने पर उसका उत्तर देने की अपेक्षा नहीं की जाएगी, जिसमें- +धारा 22 – दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का कुछ उपांतरों के अध्यधीन लागू होना. +दंड प्रक्रिया स॔हिता, 1973(1974 का 2) के संबंध में अधिनियम के अधीन दंडनीय अपराध के संबंध में किसी कार्य प्रभावी होने से ऐसे प्रभावी होंगे मानो- +क. धारा 243 की उपधारा 1 में ‘तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी’ शब्दों के लिए ‘तब अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी कि वह तुरन्त या इतने समय के भीतर जितना न्यायालय अनुज्ञात करे, उन व्यक्तियों की ( यदि कोई हो) जिनकी वह अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा करना चाहता है, एक लिखित सूची दे, और तब उससे अपेक्षा की जाएगी’, शब्द स्थापित कर दिए गए हो। +ख. धारा 309 की उपधारा 2 के तीसरे परन्तुक के पश्चात निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित कर दिया गया हो- यथा- +‘परन्तु यह भी कि कार्यवाही को केवल इस आधार पर स्थगित या मुल्तवी नहीं किया जाएगा कि कार्यवाही के एक पक्षकार द्वारा जाएगा कि कार्यवाही के एक पक्षकार द्वारा 397 के अधीन आवेदन दिया है’। +ग. धारा 317 की उपधारा 2 के पश्चात निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित कर दी गई हो, यथा – ‘उपधारा 1 या उपधारा 2 में विनिर्दिष्ट किसी बात के होते हुए भी न्यायाधीश यदि वह तिक समझता है तो, उसके द्वारा अभिलिखित किए जाने वाले कारणों के लिए अभियुक्त या उसके अभिभाषक की अनुपस्थिति में जांच या विचारण करने के लिए अग्रेसर हो सकेगा और किसी साक्षी के प्रति साक्ष्य की परीक्षा के लिए साक्षी को पुनःबुलाने के लिए अभियुक्त के अधिकार के अध्यधीन अभिलिखित कर सकेगा। +घ. धारा 379 की उपधारा 1 में स्पष्टीकरण के पहले निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित कर दिया गया हो, अर्थात- +‘परन्तु’ जहाँ किसी न्यायालय द्वारा इस दारा के अधीन शक्तियों का प्रयोग ऐसी कार्यवाहियों के किसी एक पक्षकार द्वारा किए गए आवेदन पर किया जाता हो वहां न्यायालय कार्यवाही के अभिलेख को मामूली तौर पर- +धारा 23 – धारा 13 (1) के अधीन किसी अपराध के संबंध में आरोप की विशिष्टियां. +दंड प्रक्रिया स॔हिता, 1973(1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी जब कोई अभियुक्त धारा 13 की उपधारा 1 खंड ग के अधीन किसी अपराध से आरोपित किया जाता है। तब आरोप से उस सम्पत्ति की, जिसके संबंध में उस अपराध का किया जाना अभिकथित है और उन तारीखों को जिनके मध्य में की, जिसके संबंध में उस अपराध का किया जाना अभिकथित है और उन तरीखों को जिनके मध्य में अपराध का किया जाना अभिकथित है विशिष्ट मदोँ या ठिक – ठिक तारीखो॔ को विनिर्दिष्ट किए बिना, वर्णित करना पर्यापत होगा और ऐसे विरचित आरोप को उक्त संहिता की धारा 219 के अर्थ में एक अपराध का आरोप समझा जाएगाः +परन्तु ऐसी प्रथम और अन्तिम तारीखोँ के मध्य का समय एक वर्ष से अधिक नहीं होगा। +धारा 24 – रिश्वत देने का अपने कथन पर अभियोजन न होना. +तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी इस विधान की धारा 7 से 11 अथवा धारा 13 या धारा 15 के अधीन अपराध के लिए किसी लोक सेवक के विरुद्ध किसी कार्यवाही में किसी व्यक्ति के इस कथन से कि उस लोक सेवक को वैध पारिश्रमिक से भिन्न को पारितोषण या मूल्यवान चीज देने की प्रस्थापना की थी या प्रस्थापना करने के लिए सहमति दी थी ऐसे व्यक्ति के विरूद्ध धारा 12 के अधीन अभियोजन नहीं हो सकेगा। +धारा 25. थलसेना, जलसेना और वायुसेना अथवा अन्य विधि का प्रभावित न होना. +1) इस अधिनियम की कोई बात, आर्मी अधिनियम, 1950 (1950 का 45), वायुसेना अधिनियम 1950 (1950 का 46), नेवी एक्टस, 1957 (1957 का 62) तट रक्षक अधिनियम 1978 (1978 का 30) सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 (1968 का 47) एवं नेशनल सिक्युरिटी गार्ड अधिनियम, 1986 (1986 का 47) के अधीन की जाने वाली किसी कार्यवाही को या किसी न्यायालय अथवा प्राधिकारी की,उनके अधीन की अधिकारिता को प्रभावित नहीं करेगी। +2) सन्देह का निवारण करने केलिए, यह घोषित किया जाता है कि ऐसी विधि जैसा कि उपधारा 1में वणित है, के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायाधीश का न्यायालय साधारण दांडिक न्यायालय समझा जाएगा। +धारा 26. 1952 के अधिनियम क्रमांक 46 के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश का इस अधिनियम के अधीन भी विशेष न्यायाधीश होना- दंड विधि ( संशोधन) अधिनियम, 1952 के अधीन नियुक्त प्रत्येक विशेष न्यायाधीश, जो इस अधिनियम के प्रभावशील होने के समय, किसी क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए ऐसा पद धारण किए हुए है, के स॔बंध में यह माना जाएगा कि वह उस क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश है और उसके प्रभावशील होने पर और प्रभावशील होने के पश्चात ऐसा प्रत्येक न्यायाधीश, उसके समक्ष लम्बित समस्त कार्यवाहियों को इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार जारी रखेगा। +धारा 27- अपील एवं पुनरीक्षण. +इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, द॔ड प्रकिया संहिता 1973 (1974 का 2)द्वारा प्रदत्त अपील एवं पुनरीक्षण के अधिकार, उच्च न्यायालय द्वारा जहाँ तक संभव हो प्रयुक्त किए जाएंगे, और विशेष न्यायाधीश का न्यायालय, उस उच्च न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता का सत्र न्यायाधीश समझा जाएगा। +धारा 28 – इस विधान का अन्य विधियों के परिवर्धन में होना. +इस अधिनियम के प्रावधान, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के परिवर्धन के लिए होंगे, न कि उसके अल्पीकरण के लिए और उसमें की कोई भी बात किसी लोक सेवक को उसके विरुद्ध इस अधिनियम की कार्यवाही के अतिरिक्त की जाने वाली किसी कार्यवाही से छूट प्रदान नहीं करेंगे। +धारा 29 – 1944 के अध्यादेश 38 का संशोधन. +1944 के दंड विधि संशोधन अध्यादेश में- +क. धारा के दंड विधि संशोधन अध्यादेश में- + +हिन्दी/विलुप्त करने का प्रयास: +हिन्दीs भाषा विश्व की दूसरी सबसे अधिक बोले जानी वाली भाषा है और मातृभाषा के रूप में भी यह तीसरी या चौथी सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा है। इस कारण इसके विकास को रोकने और विलुप्त करने का कई लोगों ने प्रयास किया है। यह प्रयास इस भाषा के निर्माण से लेकर वर्तमान समय में भी हो रहा है। +अंग्रेजों द्वारा. +हिन्दी भाषा को विलुप्त करने और इसके विकास को रोकने का सबसे अधिक प्रयास अंग्रेज़ो ने ही किया है। वर्तमान में अंग्रेजी भाषा का बहुत लोगों को ज्ञान है, लेकिन बहुत से लोग इसे समझ नहीं पाते हैं, जबकि हिन्दी को जो भी सीखता है, वह आसानी से इसे समझने और बोलने लगता है। इसके अलावा यह जान कर भी सभी को आश्चर्य होगा कि अंग्रेजी भाषा से अधिक लोग हिन्दी भाषा को जानते हैं। +अलग करने की नीति. +अंग्रेजों ने भाषा में भी फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया था। हिन्दी को बहुत बड़ी संख्या में बोला जाता था, इस कारण अंग्रेजों ने इसे दो अलग अलग भाषाओं में बाँटने का निर्णय लिया। इससे यह हिन्दी और उर्दू जो एक ही भाषा है, वह दो अलग अलग भाषाओं में बाँट दिये गए। इसके कारण इस भाषा की शक्ति लगभग आधी हो गई। इसके साथ ही अंग्रेजों ने कुछ कुछ दूरी में क्षेत्र आदि के अनुसार हिन्दी भाषा को ही अलग अलग भाषा के रूप देने लगे। हिन्दी भाषा का उस समय कोई विद्यालय नहीं था, इस कारण कई लोग इस भाषा के उच्चारण और व्याकरण में गलती करते थे, या यह भी कहा जा सकता है कि हर कोई अपने ढंग से इस भाषा को बोलता था। इस कमजोरी का लाभ अंग्रेजों ने उठाया और हिन्दी को मातृभाषा के रूप में थोड़े अलग ढंग से बोलने वालों को यह विश्वास दिलाया कि वह कोई अन्य भाषा बोलते हैं। इस कारण हिन्दी कई अलग अलग क्षेत्रीय भाषा और बोली के रूप में बट गई। +काल्पनिक कहानी की नीति. +अंग्रेजों ने इसके अलावा आर्यन और द्रविड़ भाषा नामक एक काल्पनिक कहानी तैयार की। जिसका मुख्य लक्ष्य भाषाओं के मध्य मतभेद पैदा करना था। मुख्य रूप से हिन्दी भाषा के रूपों को अंग्रेजों ने आर्यन के रूप में दिखाया और बाकी को द्रविड़ भाषा के रूप में। लेकिन यह काल्पनिक का पता कोई भी आसानी से लगा सकता है। क्योंकि इन सभी भाषाओं कि लिपि ब्राह्मी लिपि से बनी है। इसके अलावा सभी भाषाओं में संस्कृत भाषा का प्रभाव मिलता है। लेकिन हिन्दी भाषा और उसके कुछ अन्य ढंग में फारसी भाषा का बहुत प्रभाव मिलता है, क्योंकि अंग्रेजों से पहले फारसी लोगों ने यहाँ अपनी भाषा के प्रचार करने में लगे थे। फारसी लोग मुख्यतः हिन्दी भाषा के बोलने वाले क्षेत्रों में ही इस भाषा का मुख्य रूप से प्रचार कर रहे थे। इस कारण इसका प्रभाव मुख्य रूप से हिन्दी पर पड़ा था और इसी से अंग्रेजों ने इस कहानी को निर्मित करने कि योजना बनाई। +अपने भाषाओं को तोड़ने के नीति को मजबूत बनाने के लिए इस नीति का भी अंग्रेजों ने सहारा लिया था। इस कारण ही हिन्दी भाषा का कई लोग विरोध करने लगे और अंग्रेजी भाषा को भारत की आधिकारिक भाषा बनाना पड़ा। +लिपि हटाने की नीति. +हिन्दी भाषा में मुख्य रूप से ऐसे शब्द हैं, जिसे किसी अन्य लिपि में लिखा ही नहीं जा सकता है। अंग्रेजों ने अपनी भाषा के कई शब्द हिन्दी में डालने का प्रयास किया लेकिन देवनागरी लिपि में उच्चारण पर आधारित होने के कारण हिन्दी शब्दों को ही लोगों ने स्वीकारा और अंग्रेजी शब्दों को हटाते गए। इस कारण अंग्रेजों ने लिपि को हटाने कि नीति पर काम करने लगे। क्योंकि यदि हिन्दी भाषा से देवनागरी लिपि को हटा दिया जाये और रोमल लिपि का उपयोग किया जाये तो उसमें कोई भी अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करने लगेगा और धीरे धीरे अंग्रेज़ उसमें और अपने भाषा का शब्द जोड़ कर हिन्दी भाषा को विलुप्त कर देंगे। +व्याकरण त्रुटि की नीति. +अंग्रेजों ने हिन्दी के कई व्याकरण के पुस्तक लिखें हैं, लेकिन इसका उद्देश्य केवल हिन्दी भाषा के विनाश का ही है। वे लोग हिन्दी व्याकरण को अंग्रेजी व्याकरण की तरह बनाने का प्रयास करते हैं। इसके अलावा कई गैर हिन्दी अर्थात अंग्रेजी शब्द को हिन्दी के रूप में डालने लगे हैं। +भाषा को कठिन बताने की नीति. +कई लोगों को यह कहा जाता है कि हिन्दी भाषा बहुत कठिन है, शुद्ध हिन्दी समझ नहीं आती है। लेकिन यह केवल अंग्रेजों द्वारा बनाया गया भ्रम ही है। क्योंकि हिन्दी भाषा दिल से निकलने वाली भाषा है। लेकिन "मानक हिन्दी" जिसे पढ़ाई के लिए उपयोग किया जाता है, उसे अच्छे अनुवाद करके बनाया गया है। इस कारण कई बार "मानक हिन्दी" लोगों को कठिन लगने लगती है। क्योंकि ये दिल से निकली भाषा न हो कर अनुवाद की गई भाषा है। कोई भी अनुवाद की गई भाषा कभी अच्छे से समझ नहीं आती है। लेकिन इस अनुवाद की गई भाषा को लोग हिन्दी भाषा कठिन है कि रट लगा कर इसे कठिन बताते रहते हैं। +वैसे हिन्दी भाषा इतना आसान है कि इसके सामने फारसी और अंग्रेजी भाषा भी टिक नहीं सकी। लेकिन आजादी के बाद लोगों को पढ़ाने के लिए "मानक हिन्दी" के उपयोग के साथ ही अंग्रेजों ने और हिन्दी विरोधी लोगों ने इस नीति का उपयोग करने लगे। अंग्रेजों ने हिन्दी भाषा को कमजोर करने के लिए आजादी के बाद अखबार, टीवी आदि का सहारा लेने लगे। +अंग्रेजी भाषा को लाने की नीति. +भारत के आजादी के बाद भी कई हजार कंपनियों ने भारत में व्यापार नहीं छोड़ा। इसके अलावा "बीबीसी" जैसे कई "ब्रिटिश कंपनी" निरंतर हिन्दी भाषा आदि के बारे में नकारात्मक बातें लिख लिख कर इसे हटा कर अंग्रेजी भाषा को लाने की तैयारी में हैं। वैसे "बीबीसी" हिन्दी में भी समाचार प्रदान करता है, लेकिन उसका उद्देश्य केवल अपने देश, भाषा और धर्म को अच्छा बताना और बाकी को बुरा आतंकी आदि बताने भर का ही है। इस तरह के कार्य करने के कारण भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित करने का भी निर्णय लिया था। लेकिन इससे "बीबीसी" किसी तरह बच निकला। +यह नीति अभी भी सक्रिय है और कई तरह से देवनागरी लिपि को हटाने का प्रयास भी इन लोगों द्वारा जारी है। अतः यदि हमें हिन्दी भाषा को विलुप्त होने से बचाना है तो इन सभी नीतियों को सफल होने से रोकना होगा और देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा जो दिल से निकलती है, उसके लिए प्रचार प्रसार का कार्य करना होगा। + +हिन्दी/विकास: +हिन्दी भाषा का मुख्य रूप से विकास मुग़ल के शासन काल के दौरान ही हुआ था। उसके बाद जब अंग्रेजों ने व्यापार करने के नाम पर आए तो उसके बाद उन्होने केवल फूट डालो और राज करो की नीति अपना कर हिन्दी भाषा को बहुत हानि पहुँचाई। + +हिन्दी/विकास में बाधा: +हिन्दी भाषा के विकास में कई तरह के बाधाओं का डेरा लगा हुआ है। हिन्दी लिखने के साधन तक का सही तरह से प्रचार नहीं हो पाता है। इस कारण कई लोगों को हिन्दी लिखना भी अच्छे से नहीं आता है। इसके अलावा कई समाचार पत्र वाले भी हिन्दी भाषा लिखने के साधन की जानकारी लोगों तक नहीं पहुँचाते हैं। इसके अलावा यह अखबार आदि वाले भारी मात्रा में हिन्दी शब्दों को छोड़ कर अंग्रेजी शब्दों का उपयोग करने लगे हैं। यह हिन्दी भाषा के विकास में सबसे बड़े बाधक बने हुए हैं। हिंदी भाषा को विष पिलाने में सरकार का बहुत बड़ा हाँथ है, एक तरफ एक राष्ट, और एक भाषा, कहते थकते नहीं, दूसरी तरफ अंग्रेजी स्कूल को बढ़ावा देते है। + +हिन्दी व्याकरण: +हिंदी व्याकरण की यह पुस्तक माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों के लिए तैयार की गई है। + +पशु व्यवहार: +पशु व्यवहार +यह एक मार्गदर्शक है, जो बताता है कि पशुओं में एक दूसरे से कैसे वार्ता होती है और वे अन्य से किस तरह से जुड़े होते हैं। +"एक मुक्त पुस्तक" + +पशु व्यवहार/परिभाषा: +पशु व्यवहार एक प्रकार का वैज्ञानिक अध्ययन है, जिससे पशुओं के व्यवहार का और उनका अन्य पशुओं से कैसे वार्ता होता है और किस प्रकार से अपनी दिनचर्या करते हैं आदि का ज्ञान होता है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि वे किस प्रकार से भौगोलिक रूप स वातावरण से जुड़े होते हैं। इसके साथ ही यह भी पता चलता है कि वे किस प्रकार से अपना आहार ढूंढते हैं और अपने दुश्मनों से किस प्रकार अपनी रक्षा करते हैं। + +पशु व्यवहार/भाषा: +मनुष्यों में भाषा का गुण बहुत अधिक विकसित हो चुका है। इससे वह एक दूसरे से बात करने और आसानी से अपने मन की बात एक दूसरे तक भेजने में सक्षम है। इसके साथ ही यह कई अलग अलग भाषाओं में बोल भी सकता है और समझ भी सकता है। किसी भी मनुष्य को उसके सही विकास के लिए सर्वप्रथम उसके मातृ भाषा का ज्ञान उसे मिलना आवश्यक होता है। यदि जन्म के कुछ वर्षों तक उसे पढ़ाई में शुरू से ही उसके मातृ भाषा की शिक्षा नहीं मिलती है तो उसका सही विकास नहीं हो पाता है। ठीक उसी प्रकार यह पशुओं में भी होता है। +यदि कोई पशु बचपन में ही अपने माता-पिता से पिछड़ जाता है तो वह उनकी भाषा सीख नहीं पाता है और बड़े होने के बाद भी उस पर कहीं न कहीं इसका बुरा प्रभाव पड़ता ही है। + +विकिपीडिया/सन्दर्भ: +सन्दर्भ विकिपीडिया के किसी भी लेख में जानकारी के सही होने के बारे में बताते हैं। यह किसी समाचार, आधिकारिक वेबसाइट आदि के होते होते हैं। इससे किसी को भी इस बात का पता चल जाता है कि इसमें दी गई यह जानकारी सही है। यदि किसी लेख में कोई जानकारी के लिए सन्दर्भ न दिया जाये तो उसे कोई भी हटा सकता है। अतः विकिपीडिया में कोई भी नए लेख बनाने से पहले देख लें कि उसका पर्याप्त मात्रा में सन्दर्भ है भी या नहीं। +सन्दर्भ जोड़ना. +आप किसी भी लेख में सन्दर्भ codice_1 के द्वारा जोड़ सकते हो। यह एक सरल रूप है। लेकिन विकिपीडिया में बाद में इससे अधिक विकल्प वाले सन्दर्भ का उपयोग किया जाने लगा है। यह सन्दर्भ के लिए आपके सम्पादक के ऊपर में एक "सन्दर्भ जोड़ें" नाम का विकल्प दिया होगा। यदि यह विकल्प न दिया हो तो आप "पसंद" में जा कर सन्दर्भ का विकल्प ले सकते हैं। इसके बाद जब आप इस विकल्प को खोलेंगे तो आपको इसमें चार और विकल्प मिलेंगे। +वेब सन्दर्भ. +सामान्य वेबसाइट जैसे सरकारी वेबसाइट या कंपनी का वेबसाइट डालने के लिए इसका उपयोग कर सकते हैं। लेकिन यह ध्यान रखें कि इसमें केवल उन वेबसाइट के पते आप जोड़ सकते हैं, जो पहले से ही किसी समाचार आदि में आते हों। इसके लिए सभी सरकारी वेबसाइट का उपयोग कर सकते हैं। क्योंकि वे सभी प्रमाणित होते हैं। लेकिन किसी कंपनी आदि के वेबसाइट का उपयोग करने से पहले यह जान लें कि उसकी जानकारी सही हो और वेबसाइट विश्वास योग्य हो। +समाचार सन्दर्भ. +यदि आप किसी समाचार वेबसाइट के पते का उपयोग कर रहे हैं तो यह सन्दर्भ इसके लिए ही है। इस तरह के सन्दर्भ का पता करने का बहुत आसान तरीका है। किसी खोज प्रणाली (सर्च इंजन) में आप समाचार खोज सकते हैं। इसमें आपको केवल समाचार वाले ही सन्दर्भ मिलेंगे। लेकिन इस सन्दर्भ में केवल समाचार वाले वेबसाइट का ही उपयोग करें। +इस तरह के वेबसाइट के कुछ उदाहरण है। जैसे दैनिक भास्कर, नव भारत, हरिभूमि, पत्रिका, दैनिक जागरण, आदि। +पुस्तक सन्दर्भ. +यदि आप किसी पुस्तक के पते का उपयोग कर रहे हैं तो यह सही है। इनमें आपको पुस्तक का नाम और हो सकते तो उस वेबसाइट की भी कड़ी देना ठीक होगा जिसमें आपको यह पुस्तक मिला है। लेकिन किसी ऐसे स्रोत का उपयोग न करें जिसमें कोई भी अपना पुस्तक डाल सकता है। क्योंकि ऐसे स्रोतों में कोई भी गलत जानकारी भी डाल सकता है और किसी भी बात को प्रमाणित भी नहीं किया जा सकता है। + +विकिपीडिया/श्रेणी: +विकिपीडिया में एक प्रकार या किसी तरह की सूची के लिए श्रेणी बहुत काम आते हैं। इससे आपको पता चल जाता है कि किस में कितने लेख हैं। जैसे हिन्दी फिल्में के श्रेणी में आप जाते हैं तो आपको वहाँ उन लेखों की सूची भी मिल जाती है और यह भी पता चल जाता है कि हिन्दी विकिपीडिया में कितने हिन्दी फिल्मों के लेख मौजूद है। इससे हमें सूची बनानी नहीं पड़ती है और इससे रखरखाव का कार्य भी बहुत आसान हो जाता है। +श्रेणी का प्रारूप codice_1 है। इसमें उपश्रेणी भी लगाई जा सकती हैं। + +विकिपीडिया/लेख बनाना: +विकिपीडिया में लेख बनाना बहुत आसान है। लेकिन आप यदि सही शीर्षक और आवश्यक जानकारी के बिना कोई लेख बनाते हो तो हो सकता है कि लेख को हटा दिया जाये। लेकिन यदि आप इसमें आप आवश्यक जानकारी जैसे उस लेख का विवरण कि वह किसके बारे में और कुछ आवश्यक सन्दर्भ डाल देते हो तो उसे कोई नहीं हटाएगा। +लेख कैसे बनाएँ. +यदि आप को लगता है कि आप जो लेख बनाना चाहते हैं वह विकिपीडिया में रहने लायक है और आपके पास उस लेख को बनाने के लिए पर्याप्त सन्दर्भ है तो आप उसे निम्न तरीके से बना सकते हैं। + +विकिपीडिया/लेख हटाना: +आप विकिपीडिया में किसी भी लेख को हटाने हेतु नामांकन कर सकते हैं। यदि उस लेख को रखा नहीं जा सकता है तो उसे हटा दिया जाता है। +कारण. +लेख हटाने के निम्न कारण हो सकते हैं। +कैसे हटाना है. +यदि आप कोई लेख हटाना चाहते हैं तो आपको उसके लिए हटाने के साँचा वहाँ डालना होगा। लेकिन केवल प्रबन्धक ही पृष्ठ हटा सकते हैं। + +विकिपीडिया/श्रेणी बनाना: +विकिपीडिया में किसी भी श्रेणी को बनाने से पहले यह देख लें कि उससे मिलता जुलता कोई श्रेणी उसके स्थान पर उपयोग तो नहीं हो रहा है। कई बार किसी अन्य नाम से श्रेणी का उपयोग होता रहता है। यदि आप उस श्रेणी को दूसरे नाम से बना लेते हो तो उससे कई लेखों में अलग अलग श्रेणी का उपयोग होने लगेगा। इससे रखरखाव आदि कार्य में बाधा उत्पन्न हो जाती है। इस कारण यदि आप कोई श्रेणी बना रहे हो तो एक बार पक्का कर लें कि वह श्रेणी किसी और नाम से भी विकिपीडिया में नहीं है। +कैसे बनाएँ. +श्रेणी बनाना बहुत आसान है। इसके लिए आपको केवल किसी भी लेख में कोई भी श्रेणी जो आप बनाना चाहते हैं, को जोड़ना होता है। उसके बाद आप उसमें जा कर उस श्रेणी को बना कर पृष्ठ को सहेज सकते हो। जैसे ही आप उसे सहेजते हो वैसे ही वह श्रेणी बन जाता है। लेकिन आपको रखरखाव हेतु उस श्रेणी में भी कोई मुख्य श्रेणी से जुड़ी कोई श्रेणी जोड़नी होगी। इससे कोई भी उस श्रेणी में मुख्य श्रेणी से भी आ सकेगा और बाद में कोई दूसरे श्रेणी को बनाने से पहले ही इस श्रेणी को आसानी से देख सकेगा। + +विकिपीडिया/श्रेणी हटाना: +किसी श्रेणी को हटाना भी लेख को हटाने जैसा ही है। यदि आपको कोई श्रेणी उपयोग करने के लायक न लगे तो आप उसे हटाने हेतु नामित कर सकते हैं। लेकिन श्रेणी हटाने में विशेष सावधानी रखनी पड़ती है। किसी श्रेणी को हटाने से उससे जुड़े पन्ने में वह लाल कड़ी के रूप में सम्मलित रहती हैं। इसलिए या तो उनमें से श्रेणी हटा देनी चाहिए या नव निर्मित श्रेणी लगा देनी चाहिए। कुछ कारण जिनसे श्रेणी हटाई जा सकती है निम्नलिखित हैं: +कारण. +श्रेणी हटाने के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें कुछ निम्न है: + +विकिपीडिया/इतिहास: +विकिपीडिया का निर्माण जनवरी 2001 में अमेरिकी जिमी वेल्स ने किया था। उन्होंने 2001 में सबसे पहले अंग्रेज़ी संस्करण जारी किया था। 2003 में हिन्दी संस्करण जारी हुआ। विकिपीडिया विकिमीडिया फाउंडेशन की कई परियोजनाओं में से एक है जिसमें विकिपुस्तक भी शामिल है। +इसमें सबसे बड़ा विवाद यह रहा कि इसमें कोई भी लिख सकता है और ज्ञानकोश के साथ छेड़छाड़ बहुत आसान हो जाता है। इस कारण कई लोग विकिपीडिया की जानकारी पर विश्वास न करने के लिए बोलते हैं। लेकिन यही इसकी कामयाबी की सबसे बड़ी वजह रही है। लाखों स्वयंसेवक इससे जुड़े हुए है और इसको सबसे प्रसिद्ध ज्ञानकोश बना पाएं हैं। + +विकिपीडिया/लेख: +विकिपीडिया में सभी ज्ञानकोश के पन्नों को लेख बोला जाता है। इसमें किसी 'उल्लेखनीय' विषय के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाती है। इसके साथ ही इसमें आप भी किसी लेख में कोई गलती दिखने पर सुधार कर सकते हो या आप और भी विस्तार कर सकते हो। इससे कोई और लेख पढ़ने वाला आएगा तो उसे आपके द्वारा लिखी गई जानकारी प्राप्त होगी। +इसका मूल उद्देश्य प्रमाणिक और सटीक जानकारी प्रदान करना है। इसका प्रारूप कुछ ऐसा होता है:- भूमिका, अनुभाग एंव उप-अनुभाग बनाकर विस्तृत जानकारी। इसमें सटीक जानकारी प्रदान करने के लिए स्रोत देना आवश्यक है जिन्हें 'सन्दर्भ' कहा जाता है। अन्यथा आपके लिखे को 'मूल शोध' माना जा सकता है जिसकी मनाही है। + +विकिमीडिया: +विकिमीडिया एक संस्थान है, जो मीडियाविकि नामक एक सॉफ्टवेयर का निर्माता है। इसी सॉफ्टवेयर के द्वारा ही विकिपीडिया आदि को बनाया गया है। + +कार्बनिक रसायन: +कार्बनिक रसायन रसायन में कार्बन से बने अन्य यौगिकों के बारे में बताता है। + +सामान्य रसायन: +सामान्य रसायन +सामान्य रसायन नामक इस विकिपुस्तक में रसायन के बारे में बहुत आम जानकारी दी गई है। जिससे इसे समझना बहुत आसान हो जाएगा। +"एक मुफ्त पुस्तक" +इन्हें भी देखें. +सत्या + +सामान्य रसायन/ठोस: +ठोस उन तत्वों को कहा जाता है जो सामान्यतः ठोस अवस्था में पाये जाते हैं। उदाहरण के लिए लोहा आदि। + +हिंदी में विज्ञान साहित्य का विहंगावलोकन: +हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में विज्ञान साहित्य के निर्माण के प्रयास 19वीं शताब्दी के अवसान और 20वीं शती के उन्मेष काल से ही आरंभ हो चुके थे और 20वीं शती के साठादि-सत्तरादि तक इस दिशा में अभूतपूर्व प्रयास हुए लेकिन अस्सी आदि तक आते-आते यह परंपरा शनैः शनैः अवसान को प्राप्त होने लगी। +हिंदी में विज्ञान साहित्य के निर्माण की एक गौरवशाली और सुदीर्घ परंपरा रही है जिसकी अब स्वर्णिम स्मृतियां ही शेष हैं। भाग्यवश हमारे बीच अब कुछेक लोग ही बचे हैं जिन्होंने उस काल खंड को जिया और उससे प्रेरित होकर उनमें भी ऐसी प्रवृत्ति का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने अपनी ज्ञान की सीमाओं में और स्वाध्याय से इस परंपरा को पुष्पित और पल्लवित किया। इस सुदीर्घ यात्रा के विहंगावलोकन के लिए हमें अतीत में जाना होगा। हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में विज्ञान साहित्य के निर्माण के प्रयास 19 वीं शताब्दी के अवसान और 20 वीं शती के उन्मेष काल से ही आरंभ हो चुके थे और 20 वीं शती के साठादि-सत्तरादि तक इस दिशा में अभूतपूर्व प्रयास हुए लेकिन अस्सी आदि तक आते-आते यह परंपरा शनैः शनैः अवसान को प्राप्त होने लगी। ऐसा क्यों कर हुआ, उसकी चर्चा हम आगे करेंगे। +हिंदी में विज्ञान साहित्य के पुरोधा स्वामी डॉ.सत्य प्रकाश सरस्वती एक स्थल (अगस्त, 1937 ) पर 1855 में आगरे से छपी पंडित कुंज बिहारी लाल की किताब ‘लघु त्रिकोणमिति’ को आधुनिक विज्ञान का प्रथम ग्रंथ सूचित करते हैं लेकिन इसके पूर्व ओंकार भट्ट ‘ज्योतिष चंद्रिका’ 1840 में ही प्रस्तुत कर चुके थे। बहरहाल, इसके बाद वापूदेव शास्त्री कृत संस्कृत में लिखी ‘त्रिकोणमिति’ का वेणीशंकर झा कृत हिंदी अनुवाद 1859 में प्रकाशित हुआ। फिर 1860 में आरा से बलदेव झा ने अंग्रेजी पुस्तक ‘पापुलर नेचुरल फिलासफी’ का ‘सरल विज्ञान विटप’ नाम से हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया। 1859-60 में पादरी शोरिंग द्वारा संपादित ‘विद्यासागर’ नामक विज्ञान पुस्तक माला मिर्जापुर से प्रकाशित हुई। सरकार की ओर से 1861 में ‘मैन’ से लेसन्स इन जनरल केमिस्टीं’ का मथुरा प्रसाद मिश्र कृत हिंदी अनुवाद छपा। नाम था- ‘बाह्य प्रपंच दर्पण’। 1860 में वंशीधर, मोहनलाल और कृष्ण दत्त द्वारा अनुवादित ग्रंथ ‘सिद्ध पदार्थ विज्ञान’ (यंत्र शास्त्र का ग्रंथ) प्रकाशित हुआ। 1860 में ही प्रयाग से बाल कृष्ण शास्त्री खंडरकर की ज्योतिष का ‘खगोल’ नाम से हिंदी अनुवाद हुआ। +1867 में जयपुर के राजवैद्य कालिन एस. वैलेन्टाइन ने ‘वायु की उत्पत्ति’ और रसायन विद्या की ‘संक्षेप पाठ’ नामक किताब छपवायी। आगरा निवासी बद्री लाल ने एक अंग्रेजी किताब का अनुवाद किया ‘रसायन प्रकाश’ नाम से, जो कलकत्ते के बैपटिस्ट मिशन प्रेस ने छापा। इसी किताब का दूसरा संस्करण 1883 में लखनऊ के नवल किशोर प्रेस ने छापा। 1887 में वंशीधर की पुस्तक ‘चित्रकारी सार’ छपी। 1870 से 1880 के बीच रूड़की इंजीनियरिंग कॉलेज के अध्यापक जगमोहन लाल ने कई पुस्तकें कॉलेज के छात्रों के लिए लिखीं। इसी समय 1875 में काशी के मिश्र बंधुओं- लक्ष्मीशंकर, प्रभाशंकर और रमाशंकर ने ‘पदार्थ विज्ञान विटप’, ‘त्रिकोणमिति’, ‘प्रकृति विज्ञान विटप’, ‘गति विद्या’, ‘स्थिति विद्या’ और ‘गणित कौमुदी’ पुस्तकें लिखीं। 1882 में लाहौर के नवीन चंद्र राय ने पंजाब विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए ‘स्थिति तत्व’ और ‘गणित तत्व’ पुस्तकें छपवायीं। इसी वर्ष लखनऊ के नवल किशोर प्रेस ने ‘सृष्टि का वर्णन’ पुस्तक छापी। +1883 में इलाहाबाद जिले के निवासी काशी नाथ खत्री द्वारा अनुवादित कृषि की पहली पुस्तक ‘खेती की विद्या के मुख्य सिद्धांत’ शाहजहाँपुर के आर्य दर्पण प्रेस में छपी। 1885 में काशी के पंडित सुधाकर द्विवेदी ने गणित की उच्चकोटि की किताबें ‘चलन कलन’ और ‘चल राशि कलन’ प्रकाशित कीं। पंडित सुधाकर द्विवेदी ने वराहमिहिर कृत ‘पंच सिद्धांतिका’ की टीका 1889 में प्रकाशित की और 1902 में ‘गणतरंगिणी’ लिखी। प्रायः इसी समय उदय नारायण सिंह ने ‘सूर्य सिद्धांत’ की टीका प्रस्तुत की ( 1903 ) और बलदेव प्रसाद मिश्र ने 1906 में इसी ग्रंथ की टीका लिखी। उदयनारायण सिंह वर्मा ने प्रख्यात गणितज्ञ आर्यभट ( 5 वीं शती) के ‘आर्यभटीयम्’ नामक ग्रंथ का हिंदी अनुवाद 1906 में प्रकशित किया। पंडित सुधाकर द्विवेदी ने ‘गणित का इतिहास’ ( 1910 ) लिखकर इसका पूर्ण परिपाक कर दिया। डा विभूति भूषण दत्त और अवधेश नारायण सिंह प्रणीत ‘हिस्टीं ऑफ हिंदू मैथेमेटिक्स’ का हिंदी अनुवाद ‘हिंदू गणित शास्त्र का इतिहास’ (भाग 1 , अनु. डॉ. कृपा शंकर शुक्ल, हिंदी समिति, लखनऊ, 1954 ) भी इस विधा का गंभीर और प्रामाणिक अध्ययन है। इसी परंपरा में डॉ. ब्रज मोहन कृत ‘गणित का इतिहास’ (हिंदी समिति, लखनऊ, 1965 ) , डॉ. गोरख प्रसाद कृत ‘भारतीय ज्योतिष का इतिहास’, ‘नीहारिकाएं’, ‘सौर परिवार’ और ‘चंद्र सारिणी’ आदि ज्योतिष और खगोल के अप्रतिम ग्रंथ हैं। डॉ. गोरख प्रसाद ने मेधावी खगोलज्ञ फ्रेड हॉयल की ‘फ्रंटियर्स ऑफ एस्ट्रोनॉमी’ का ‘ज्योतिष की पहुंच’ शीर्षक से उत्कृष्ट हिंदी अनुवाद भी किया। इसी तरह पैटिंक मूर कृत ‘दि प्लेनेट्स’ का ‘ग्रह और उपग्रह’ शीर्षक से (अनु. पवन कुमार जैन, सी.एस.टी.टी., 1968 ) और वी. फेडिंस्की कृत ‘मीटिऑर्स’ का हिंदी अनुवाद ‘उल्काएं (अनु. पवन कुमार जैन, सी.एस.टी.टी., 1964 ) शीर्षक से प्रायः उसी काल में पाठकों की जिज्ञासाओं के शमन के लिए सामने आयीं। इसके पहले ही ‘सूर्य सिद्धांत’ का विज्ञान भाष्य (दो खंडों में, भाष्यकार महावीर प्रसाद श्रीवास्तव) विज्ञान परिषद, प्रयाग ने दिसंबर 1940 में ही प्रकाशित करके ज्योतिष (सिद्धांत) में अभिरुचि रखने वाले पाठकों की उत्कंठाओं का शमन कर दिया था। आगे चलकर पांचवीं सदी के प्रख्यात खगोलज्ञ आर्यभट के अपूर्व ग्रंथ ‘आर्यभटीयम्’ (रचना काल ई. सन् 499 ) का हिंदी अनुवाद ‘इन्सा’ ने भी आर्यभट की पंद्रहवीं जन्मशती के अवसर पर 1976 में प्रस्तुत किया। अनुवाद राम निवास राय ने किया था। +अब विज्ञानेतिहास पर दृष्टिपातः प्राचीन भारतीय विज्ञानों पर गवेषणापरक ग्रंथों की रचना की परंपरा आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय प्रणीत ‘हिस्टीं ऑफ हिंदू केमिस्टीं’ (दो खंड, प्रकाशन क्रमशः 1902 , 1908 ) से आरंभ होती है। इन ग्रंथों के अवलोकन से, प्राचीन भारत में रसायन की महनीय परंपराओं से परिचित होकर पाश्चात्य जगत विस्मित और विमूढ़ रह गया। इस परंपरा को आगे बढ़ाया इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रसायन विभाग के आचार्य डॉ. सत्य प्रकाश (आगे चलकर स्वामी डॉ. सत्य प्रकाश सरस्वती) ने। डॉ. सत्य प्रकाश प्रणीत ‘प्राचीन भारत में रसायन का विकास’ (प्रकाशन शाखा, सूचना विभाग, उ.प्र., 1960 ) आचार्य राय की ही परंपरा का गौरव वर्धन है। डॉ. सत्य प्रकाश प्रणीत ‘वैज्ञानिक विकास की भरतीय परंपरा’ (बिहार राष्टंभाषा परिषद, 1959 ) और ‘फाउंडर्स ऑफ साइंसेज इन एन्शेंट इंड